महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तेऽपि सर्वे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगैः ॥ १९ ॥ किंतु अंधे, गूँगे, बहरे आदि जिन-जिन ब्राह्मणोंको श्राद्धमें वर्जित बताया गया है, उन सबको वेदपारंगत ब्राह्मणोंके साथ श्राद्धमें सम्मिलित किया जा सकता है ॥ १९ ॥
प्रतिग्रहश्च वै देयः शृणु यस्य युधिष्ठिर । प्रदातारं तथाऽऽत्मानं यस्तारयति शक्तिमान् ॥ २० ॥ युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि कैसे व्यक्तिको दान देना चाहिये। जो दाताको और अपने-आपको भी तारनेकी शक्ति रखता हो ॥ २० ॥
तस्मिन् देयं द्विजे दानं सर्वागमविजानता । प्रदातारं यथाऽऽत्मानं तारयेद् यः स शक्तिमान् ॥ २१ ॥ सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता मानव उसी ब्राह्मणको दान दे, जो दाताका तथा अपना भी संसारसागरसे उद्धार कर सके। वही शक्तिशाली ब्राह्मण है ॥ २१ ॥
न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः । अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यातिथिभोजने ॥ २२ ॥ कुन्तीनन्दन! अतिथियोंको भोजन करानेसे अग्निदेव जितने संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें हविष्यका हवन करने तथा पुष्प और चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होता ॥ २२ ॥
तस्मात् त्वं सर्वयत्नेन यतस्वातिथिभोजने । पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ॥ २३ ॥ प्रयच्छन्ति तु ये राजन् नोपसर्पन्ति ते समम् । इसलिये तुम सभी उपायोंसे अतिथियोंको भोजन देनेका प्रयत्न करो। राजन्! जो लोग अतिथिको चरण धोनेके लिये जल, पैरमें मलनेके लिये तेल, उजालेके लिये दीपक, भोजनके लिये अन्न तथा रहनेके लिये स्थान देते हैं, वे कभी यमराजके यहाँ नहीं जाते ॥ २३ ½ ॥
देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टावमार्जनम् ॥ २४ ॥ आकल्पः परिचर्या च गात्रसंवाहनानि च । अत्रैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्व्यतिरिच्यते ॥ २५ ॥ नृपश्रेष्ठ! देवविग्रहोंपर चढ़े हुए चन्दन-पुष्प आदिको यथासमय उतारना, ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करना, उन्हें चन्दन-माला आदिसे अलंकृत करना, उनकी सेवा-पूजा करना और उनके पैर आदि अंगोंको दबाना, इनमेंसे एक-एक कार्य गोदानसे भी अधिक महत्त्व रखता है ॥ २४-२५ ॥
कपिलायाः प्रदानात् तु मुच्यते नात्र संशयः । तस्मादलंकृतां दद्यात् कपिलां तु द्विजातये ॥ २६ ॥ कपिला गौका दान करनेसे मनुष्य निःसंदेह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसलिये कपिला गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान करना चाहिये ॥ २६ ॥
श्रोत्रियाय दरिद्राय गृहस्थायाग्निहोत्रिणे । पुत्रदाराभिभूताय तथा ह्यनुपकारिणे ॥ २७ ॥ दान लेनेवाला ब्राह्मण श्रोत्रिय हो, निर्धन हो, गृहस्थ हो, नित्य अग्निहोत्र करता हो, दरिद्रताके कारण जिसे स्त्री और पुत्रोंके तिरस्कार सहने पड़ते हों तथा दाताने न तो जिससे प्रत्युपकार प्राप्त किया हो और न आगे प्रत्युपकार प्राप्त होनेकी सम्भावना ही हो ॥ २७ ॥ एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत । को गुणो भरतश्रेष्ठ समृद्धेष्वभिवर्जितम् ॥ २८ ॥ भारत! ऐसे ही लोगोंको गोदान करना चाहिये, धनवानोंको नहीं। भरतश्रेष्ठ! धनवानोंको देनेसे क्या लाभ है? ॥ २८ ॥ एकस्यैका प्रदातव्या न बहूनां कदाचन । सा गौर्विक्रयमापन्ना हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम् ॥ २९ ॥ न तारयति दातारं ब्राह्मणं नैव नैव तु । एक गौ एक ही ब्राह्मणको देनी चाहिये; बहुतोंको कभी नहीं (क्योंकि एक ही गौ यदि बहुतोंको दी गयी, तो वे उसे बेचकर उसकी कीमत बाँट लेंगे)। दान की हुई गौ यदि बेच दी गयी, तो वह दाताकी तीन पीढ़ियोंको हानि पहुँचाती है। वह न तो दाताको ही पार उतारती है न ब्राह्मणको ही ॥ २९ १/२ ॥ सुवर्णस्य विशुद्धस्य सुवर्णं यः प्रयच्छति ॥ ३० ॥ सुवर्णानां शतं तेन दत्तं भवति शाश्वतम् । जो उत्तम वर्णवाले विशुद्ध ब्राह्मणको सुवर्ण-दान करता है उसे निरन्तर सौ स्वर्णमुद्राओंके दानका फल प्राप्त होता है ॥ ३० १/२ ॥ अनड्वाहं तु यो दद्याद् बलवन्तं धुरंधरम् ॥ ३१ ॥ स निस्तरति दुर्गाणि स्वर्गलोकं च गच्छति । जो लोग कंधेपर जुआ उठानेमें समर्थ बलवान् बैल ब्राह्मणोंको दान करते हैं, वे दुःख और संकटोंसे पार होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ ३१ १/२ ॥ वसुन्धरां तु यो दद्याद् द्विजाय विदुरात्मने ॥ ३२ ॥ दातारं ह्यनुगच्छन्ति सर्वे कामाभिवाञ्छिताः । जो विद्वान् ब्राह्मणको भूमिदान करता है, उस दाताके पास सभी मनोवाञ्छित भोग स्वतः आ जाते हैं ॥ ३२ १/२ ॥ पृच्छन्ति चात्र दातारं वदन्ति पुरुषा भुवि ॥ ३३ ॥ अध्वनि क्षीणगात्राश्च पांसुपादावगुण्ठिताः । तेषामेव श्रमार्तानां यो ह्यन्नं कथयेद् बुधः ॥ ३४ ॥ अन्नदातृसमः सोऽपि कीर्त्यते नात्र संशयः ।
यदि कोई रास्तेके थके-माँदे, दुबले-पतले पथिक धूलभरे पैरोंसे भूखे-प्यासे आ जायँ और पूछें कि क्या यहाँ कोई भोजन देनेवाला है? उस समय उन्हें जो विद्वान् अन्न मिलनेका पता बता देता है, वह भी अन्नदाताके समान ही कहा जाता है, इसमें संशय नहीं है॥ ३३-३४ १/२॥
तस्मात् त्वं सर्वदानानि हित्वाऽन्नं सम्प्रयच्छ ह॥ ३५॥ न हीदृशं पुण्यफलं विचित्रमिह विद्यते। अतः युधिष्ठिर! तुम सारे दानोंको छोड़कर केवल अन्नदान करते रहो। इस संसारमें अन्नदानके समान विचित्र एवं पुण्यदायक दूसरा कोई दान नहीं है॥ ३५ १/२॥
यथाशक्ति च यो दद्यादन्नं विप्रेषु संस्कृतम्॥ ३६॥ स तेन कर्मणाऽऽप्नोति प्रजापतिसलोकताम्। जो अपनी शक्तिके अनुसार अच्छे ढंगसे तैयार किया हुआ भोजन ब्राह्मणोंको अर्पित करता है वह उस पुण्यकर्मके प्रभावसे प्रजापतिके लोकमें जाता है॥ ३६ १/२॥
अन्नमेव विशिष्टं हि तस्मात् परतरं न च॥ ३७॥ अन्नं प्रजापतिश्चोक्तः स च संवत्सरो मतः। संवत्सरस्तु यज्ञोऽसौ सर्वं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ ३८॥ अतः अन्न ही सबसे महत्त्वकी वस्तु है। उससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। वेदोंमें अन्नको प्रजापति कहा गया है। प्रजापति संवत्सर माना गया है। संवत्सर यज्ञरूप है और यज्ञमें सबकी स्थिति है॥ ३७-३८॥
तस्मात् सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च। तस्मादन्नं विशिष्टं हि सर्वेभ्य इति विश्रुतम्॥ ३९॥ यज्ञसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। अतः अन्न ही सब पदार्थोंसे श्रेष्ठ है। यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है॥ ३९॥
येषां तटाकानि महोदकानि वाप्यश्च कूपाश्च प्रतिश्रयाश्च। अन्नस्य दानं मधुरा च वाणी यमस्य ते निर्वचना भवन्ति॥ ४०॥ जो लोग अगाध जलसे भरे हुए तालाब और पोखरे खुदवाते हैं, बावली, कुएँ तथा धर्मशालाएँ तैयार कराते हैं, अन्नका दान करते और मीठी बातें बोलते हैं, उन्हें यमराजकी बात भी नहीं सुननी पड़ती है अर्थात् यमराज उसे वचनमात्रसे भी दण्ड नहीं दे सकते॥ ४०॥
धान्यं श्रमेणार्जितवित्तसंचितं विप्रे सुशीले च प्रयच्छते यः। वसुन्धरा तस्य भवेत् सुतुष्टा
धारां वसूनां प्रतिमुञ्चतीव ॥ ४१ ॥
जो अपने परिश्रमसे उपार्जित और संचित किया हुआ धन-धान्य सुशील ब्राह्मणको दान करता है, उसके ऊपर वसुधादेवी अत्यन्त संतुष्ट होती और उसके लिये धनकी धारा-सी बहाती हैं ॥ ४१ ॥
अन्नदाः प्रथमं यान्ति सत्यवाक् तदनन्तरम् ।
अयाचितप्रदाता च समं यान्ति त्रयो जनाः ॥ ४२ ॥
अन्न-दान करनेवाले पुरुष पहले स्वर्गमें प्रवेश करते हैं। उसके बाद सत्यवादी जाता है। फिर बिना माँगे ही दान करनेवाला पुरुष जाता है। इस प्रकार ये तीनों पुण्यात्मा मानव समान गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ४२ ॥
वैशम्पायन उवाच
कौतूहलसमुत्पन्नः पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ।
मार्कण्डेयं महात्मानं पुनरेव सहानुजः ॥ ४३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ और उन्होंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया—॥ ४३ ॥
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च ।
कीदृशं किम्प्रमाणं वा कथं वा तन्महामुने ।
तरन्ति पुरुषाश्चैव केनोपायेन शंस मे ॥ ४४ ॥
'महामुने! इस मनुष्यलोकसे यमलोक कितनी दूर है, कैसा है, कितना बड़ा है? और किस उपायसे मनुष्य वहाँके संकटोंसे पार हो सकते हैं? ये मुझे बतलाइये' ॥ ४४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
सर्वगुह्यतमं प्रश्नं पवित्रमृषिसंस्तुतम् ।
कथयिष्यामि ते राजन् धर्म्यं धर्मभृतां वर ॥ ४५ ॥
**मार्कण्डेयजीने कहा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने ऐसे विषयके लिये प्रश्न किया है, जो सबसे अधिक गोपनीय, पवित्र, धर्मसम्मत तथा ऋषियोंके लिये भी आदरणीय है। सुनो, मैं इस विषयका वर्णन करता हूँ ॥ ४५ ॥
षडशीतिसहस्राणि योजनानां नराधिप ।
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च ॥ ४६ ॥
महाराज! मनुष्यलोक और यमलोकके मार्गमें छियासी हजार योजनोंका अन्तर है ॥ ४६ ॥
आकाशं तदपानीयं घोरं कान्तारदर्शनम् ।
न तत्र वृक्षच्छाया वा पानीयं केतनानि च ॥ ४७ ॥
विश्रमेद् यत्र वै श्रान्तः पुरुषोऽध्वनि कर्शितः।
उसके मार्गमें जलरहित शून्य आकाशमात्र है। वह देखनेमें बड़ा भयानक और दुर्गम है। वहाँ न तो वृक्षोंकी छाया है, न पानी है और न कोई ऐसा स्थान ही है जहाँ रास्तेका थका-माँदा जीव क्षणभर भी विश्राम कर सके॥ ४७१/२॥
नीयते यमदूतैस्तु यमस्याज्ञाकरैर्बलात् ॥ ४८ ॥
नराः स्त्रियस्तथैवान्ये पृथिव्यां जीवसंज्ञिताः।
यमराजकी आज्ञाका पालन करनेवाले यमदूत इस पृथ्वीपर आकर यहाँके पुरुषों, स्त्रियों तथा अन्य जीवोंको बलपूर्वक पकड़ ले जाते हैं॥ ४८१/२॥
ब्राह्मणेभ्यः प्रदानानि नानारूपाणि पार्थिव ॥ ४९ ॥
हयादीनां प्रकृष्टानि तेऽध्वानं यान्ति वै नराः।
संनिवार्यातपं यान्ति छत्रेणैव हि छत्रदाः ॥ ५० ॥
राजन्! जिनके द्वारा यहाँ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके अश्व आदि वाहनोंका उत्कृष्ट दान किया गया है, वे उस मार्गपर (उन्हीं वाहनोंद्वारा सुखसे) यात्रा करते हैं। छत्र-दान करनेवाले मनुष्य वहाँ प्राप्त हुए छत्रके द्वारा ही धूपका निवारण करते हुए चलते हैं॥ ४९-५०॥
तृप्ताश्चैवान्नदातारो ह्यतृप्ताश्चाप्यनन्नदाः।
वस्त्रिणो वस्त्रदा यान्ति अवस्त्रा यान्त्यवस्त्रदाः ॥ ५१ ॥
अन्न-दान करनेवाले जीव वहाँ भोजनसे तृप्त होकर यात्रा करते हैं; किंतु जिन्होंने अन्नदान नहीं किया है वे भूखका कष्ट सहते हुए चलते हैं। वस्त्र देनेवाले लोग कपड़े पहनकर जाते हैं और जिन्होंने वस्त्रदान नहीं किया है, उन्हें नंगे होकर जाना पड़ता है॥ ५१॥
हिरण्यदाः सुखं यान्ति पुरुषास्त्वभ्यलंकृताः।
भूमिदास्तु सुखं यान्ति सर्वैः कामैः सुतर्पिताः ॥ ५२ ॥
सुवर्णका दान करनेवाले मनुष्य उस मार्गपर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो बड़े सुखसे यात्रा करते हैं। भूमिको दान करनेवाले दाता सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे तृप्त हो वहाँ बड़े आनन्दसे जाते हैं॥ ५२॥
यान्ति चैवापरिक्लिष्टा नसः सस्यप्रदायकाः।
नराः सुखतरं यान्ति विमानेषु गृहप्रदाः ॥ ५३ ॥
खेतमें लगी हुई खेती दान करनेवाले मनुष्य बिना किसी कष्टके जाते हैं। गृहदान करनेवाले मानव विमानोंपर बैठकर अत्यन्त सुख-सुविधाके साथ जाते हैं॥ ५३॥
पानीयदा ह्यतृषिताः प्रहृष्टमनसो नराः।
पन्थानं द्योतयन्तश्च यान्ति दीपप्रदाः सुखम् ॥ ५४ ॥
जिन्होंने जल-दान किया है, उन्हें प्यासका कष्ट नहीं भोगना पड़ता, वे लोग प्रसन्नचित्त होकर वहाँ जाते हैं। दीपदान करनेवाले मनुष्य उस मार्गको प्रकाशित करते हुए सुखसे
यात्रा करते हैं ॥ ५४ ॥
गोप्रदास्तु सुखं यान्ति निर्मुक्ताः सर्वपातकैः ।
विमानैर्हंससंयुक्तैर्यान्ति मासोपवासिनः ॥ ५५ ॥
गोदान करनेवाले मनुष्य सब पापोंसे मुक्ता हो सुखपूर्वक जाते हैं। एक मासतक उपवास-व्रत करनेवाले लोग हंसजुते हुए विमानोंद्वारा यात्रा करते हैं ॥ ५५ ॥
तथा बर्हिप्रयुक्तैश्च षष्ठरात्रोपवासिनः ।
त्रिरात्रं क्षपते यस्तु एकभक्तेन पाण्डव ॥ ५६ ॥
अन्तरा चैव नाश्नाति तस्य लोका ह्यनामयाः ।
जो लोग छठी राततक उपवास करते हैं, वे मोर जुते हुए विमानोंद्वारा जाते हैं। पाण्डुनन्दन! जो लोग एक बार भोजन करके उसीपर तीन रात काट ले जाते हैं और बीचमें भोजन नहीं करते, उन्हें रोग-शोकसे रहित पुण्यलोक प्राप्त होते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
पानीयस्य गुणा दिव्याः प्रेतलोकसुखावहाः ॥ ५७ ॥
तत्र पुष्योदका नाम नदी तेषां विधीयते ।
शीतलं सलिलं तत्र पिबन्ति ह्यमृतोपमम् ॥ ५८ ॥
जलदान करनेका प्रभाव अत्यन्त अलौकिक है। वह परलोकमें सुख पहुँचानेवाला है। जो जलदान करते हैं उन पुण्यात्माओंके लिये उस मार्गमें पुष्योदका नामवाली नदी प्राप्त होती है। वे उसका शीतल और अमृतके समान मधुर जल पीते हैं ॥ ५७-५८ ॥
ये च दुष्कृतकर्माणः पूयं तेषां विधीयते ।
एवं नदी महाराज सर्वकामप्रदा हि सा ॥ ५९ ॥
महाराज! इस प्रकार वह नदी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है; किंतु जो पापी जीव हैं उनके लिये उस नदीका जल पीब बन जाता है ॥ ५९ ॥
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनान् यथाविधि ।
अध्वनि क्षीणगात्रश्च पथि पांसुसमन्वितः ॥ ६० ॥
पृच्छते ह्यन्नदातारं गृहमायाति चाशया ।
तं पूजयथ यत्नेन सोऽतिथिर्ब्राह्मणश्च सः ॥ ६१ ॥
अतः राजेन्द्र! तुम भी इन ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करो। जो रास्ता चलनेसे थककर दुबला हो गया है, जिसका शरीर धूलसे भरा है और जो अन्नदाताका पता पूछता हुआ भोजनकी आशासे घरपर आ जाता है, उसका तुम यत्नपूर्वक सत्कार करो; क्योंकि वह अतिथि है, इसलिये ब्राह्मण ही है। अर्थात् ब्राह्मणके ही तुल्य है ॥
तं यान्तमनुगच्छन्ति देवाः सर्वे सवासवाः ।
तस्मिन् सम्पूजिते प्रीता निराशा यान्त्यपूजिते ॥ ६२ ॥
ऐसा अतिथि जब किसीके घरपर जाता है तब उसके पीछे इन्द्रादि सम्पूर्ण देवता भी वहाँतक जाते हैं। यदि वहाँ उस अतिथिका आदर होता है तो वे देवता भी प्रसन्न होते हैं
और यदि आदर नहीं होता, तो वे देवगण भी निराश लौट जाते हैं ।। ६२ ।।
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनं यथाविधि ।
एतत् ते शतशः प्रोक्तं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। ६३ ।।
अतः राजेन्द्र! तुम भी अतिथिका विधिपूर्वक सत्कार करते रहो। यह बात मैं तुमसे कई बार कह चुका हूँ, अब और क्या सुनना चाहते हो! ।। ६३ ।।
युधिष्ठिर उवाच
पुनः पुनरहं श्रोतुं कथां धर्मसमाश्रयाम् ।
पुण्यामिच्छामि धर्मज्ञ कथ्यमानां त्वया विभो ।। ६४ ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**धर्मज्ञ विभो! आपके द्वारा कही हुई पुण्यमय धर्मकी चर्चा मैं बारंबार सुनना चाहता हूँ ।। ६४ ।।
मार्कण्डेय उवाच
धर्मान्तरं प्रति कथां कथ्यमानां मया नृप ।
सर्वपापहरां नित्यं शृणुष्वावहितो मम ।। ६५ ।।
**मार्कण्डेयजी बोले—**राजन्! अब मैं धर्मसम्बन्धी दूसरी बातें बता रहा हूँ, जो सदा सब पापोंका नाश करनेवाली हैं। तुम सावधान होकर सुनो ।। ६५ ।।
कपिलायां तु दत्तायां यत् फलं ज्येष्ठपुष्करे ।
तत् फलं भरतश्रेष्ठ विप्राणां पादधावने ।। ६६ ।।
भरतश्रेष्ठ! ज्येष्ठपुष्करतीर्थमें कपिला गौ दान करनेसे जो फल मिलता है वही ब्राह्मणोंका चरण धोनेसे प्राप्त होता है ।। ६६ ।।
द्विजपादोदकक्लिन्ना यावत् तिष्ठति मेदिनी ।
तावत् पुष्करपर्णेन पिबन्ति पितरो जलम् ।। ६७ ।।
ब्राह्मणोंके चरण पखारनेके जलसे जबतक पृथ्वी भीगी रहती है, तबतक पितरलोग कमलके पत्तेसे जल पीते हैं ।। ६७ ।।
स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः ।
पितरः पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापतिः ।। ६८ ।।
ब्राह्मणका स्वागत करनेसे अग्नि, उसे आसन देनेसे इन्द्र, उसके पैर धोनेसे पितर और उसको भोजनके योग्य अन्न प्रदान करनेसे ब्रह्माजी तृप्त होते हैं ।। ६८ ।।
यावद् वत्सस्य वै पादौ शिरश्चैव प्रदृश्यते ।
तस्मिन् काले प्रदातव्या प्रयत्नेनान्तरात्मना ।। ६९ ।।
गर्भिणी गौ जिस समय बच्चा दे रही हो और उस बछड़ेका केवल मुख तथा दो पैर ही बाहर निकले दिखायी देते हों, उसी समय पवित्रभावसे प्रयत्नपूर्वक उस गौका दान कर देना चाहिये ।। ६९ ।।
अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद् योन्यां प्रदश्यते ।
तावत् गौ पृथिवी ज्ञेया यावद् गर्भं न मुञ्चति ॥ ७० ॥
जबतक बछड़ा योनिसे निकलते समय आकाशमें ही लटकता दिखायी दे, जबतक गाय अपने बछड़ेको पूर्णतःयोनिसे अलग न कर दे, तबतक उस गौको पृथ्वीरूप ही समझना चाहिये ॥ ७० ॥
यावन्ति तस्या रोमाणि वत्सस्य च युधिष्ठिर ।
तावद् युगसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ७१ ॥
युधिष्ठिर! उसका दान करनेसे उस गौ तथा बछड़ेके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने हजार युगोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ७१ ॥
सुवर्णनासां यः कृत्वा सुखुरां कृष्णधेनुकाम् ।
तिलैः प्रच्छादितां दद्यात् सर्वरत्नैरलंकृताम् ॥ ७२ ॥
प्रतिग्रहं गृहीत्वा यः पुनर्ददति साधवे ।
फलानां फलमश्नाति तदा दत्त्वा च भारत ॥ ७३ ॥
भारत! जो सोनेकी नाक और सुन्दर चाँदीके खुरोंसे विभूषित, सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत, काली गौको तिलोंसे प्रच्छादित करके उसका दान करता है और जो उस दानको लेकर पुनः किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अर्पित कर देता है, वह सर्वोत्तम फलका भागी होता है ॥ ७२-७३ ॥
ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना ।
चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशयः ॥ ७४ ॥
उस गौके दानसे समुद्र, गुफा, पर्वत, वन और काननोंसहित चारों दिशाओंकी भूमिके दानका पुण्य प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ७४ ॥
अन्तर्जानुशयो यस्तु भुङ्क्ते संसक्तभाजनः ।
यो द्विजः शब्दरहितं स क्षमस्तारणाय वै ॥ ७५ ॥
जो द्विज अपने हाथोंको घुटनोंके भीतर किये मौनभावसे पात्रमें एक हाथ लगाये रखकर भोजन करता है, वह अपनेको और दूसरोंको तारनेमें समर्थ होता है ॥ ७५ ॥
अपानपा न गदितास्तथान्ये ये द्विजातयः ।
जपन्ति संहितां सम्यक् ते नित्यं तारणक्षमाः ॥ ७६ ॥
जो मदिरा नहीं पीते, जिनपर किसी प्रकारका दोष नहीं लगाया गया है तथा जो अन्य द्विज विधिपूर्वक वेदोंकी संहिताका पाठ करते हैं, वे सदा दूसरोंको तारनेमें समर्थ होते हैं ॥ ७६ ॥
हव्यं कव्यं च यत् किंचित् सर्वं तच्छ्रोत्रियोऽर्हति ।
दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलितेऽग्नौ यथा हुतम् ॥ ७७ ॥
हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-की जितनी भी वस्तुएँ हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण उन सबको पानेका अधिकारी है। श्रेष्ठ श्रोत्रियको दिया हुआ दान उतना ही सफल होता है, जैसे प्रज्वलित अग्निमें दी हुई आहुति ।। ७७ ।। मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रयोधिनः । निहन्युर्मन्युना विप्रा वज्रपाणिरिवासुरान् ।। ७८ ।। ब्राह्मणोंका क्रोध ही अस्त्र-शस्त्र है। ब्राह्मण लोहेके हथियारोंसे नहीं लड़ा करते हैं। जैसे हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्र असुरोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण क्रोधसे ही अपराधीको नष्ट कर देते हैं ।। ७८ ।। धर्माश्रितेयं तु कथा कथितेयं तवानघ । या श्रुत्वा मुनयः प्रीता नैमिषारण्यवासिनः ।। ७९ ।। निष्पाप युधिष्ठिर! यह मैंने धर्मयुक्त कथा कही है। इसे सुनकर नैमिषारण्यनिवासी मुनि बड़े प्रसन्न हुए थे ।। ७९ ।। वीतशोकभयक्रोधा विपाप्मानस्तथैव च । श्रुत्वेमां तु कथां राजन् न भवन्तीह मानवाः ।। ८० ।। राजन्! इस कथाको सुनकर मनुष्य शोक, भय, क्रोध और पापसे रहित हो फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते हैं ।। ८० ।।
युधिष्ठिर उवाच
किं तच्छौचं भवेद् येन विप्रः शुद्धः सदा भवेद् । तदिच्छामि महाप्राज्ञ श्रोतुं धर्मभृतां वर ।। ८१ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ महर्ष! वह शौच क्या है जिससे ब्राह्मण सदा शुद्ध बना रहता है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ ।। ८१ ।।
मार्कण्डेय उवाच
वाक्शौचं कर्मशौचं च यच्च शौचं जलात्मकम् । त्रिभिः शौचैरुपैतो यः स स्वर्गी नात्र संशयः ।। ८२ ।। **मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! शौच तीन प्रकारका होता है—वाक्शौच (वाणीकी पवित्रता), कर्मशौच (क्रियाकी पवित्रता) तथा जलशौच (जलसे शरीरकी शुद्धि)। जो इस तीन प्रकारके शौचसे सम्पन्न है, वह स्वर्गलोकका अधिकारी है, इसमें संशय नहीं ।। ८२ ।। सायं प्रातश्च संध्यां यो ब्राह्मणोऽभ्युपसेवते । प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् ।। ८३ ।। स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो नष्टकिल्बिषः । न सीदेत् प्रतिगृह्णानो महीमपि ससागराम् ।। ८४ ।।
जो ब्राह्मण प्रातः और सायं—इन दोनों समयकी संध्या और सबको पवित्र करनेवाली वेदमाता गायत्री देवीके मन्त्रका जप करता है; वह ब्राह्मण उन्हीं गायत्री देवीकी कृपासे परम पवित्र और निष्पाप हो जाता है। वह समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका भी दान ग्रहण कर ले, तो भी किसी संकटमें नहीं पड़ता ॥ ८३-८४ ॥
ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ॥ ८५ ॥
इतना ही नहीं, आकाशके सूर्य आदि ग्रहोंमेंसे जो कोई भी उसके लिये भयंकर होते हैं, वे उपर्युक्त गायत्री-जपके प्रभावसे उसके लिये सदा सौम्य, सुखद एवं परम मंगलकारी हो जाते हैं ॥ ८५ ॥
सर्वे नानुगतं चैनं दारुणाः पिशिताशनाः । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति द्विजोत्तमम् ॥ ८६ ॥
भयंकर रूप और विशाल शरीरवाले, समस्त क्रूरकर्मा, मांसभक्षी राक्षस भी गायत्रीजपपरायण उस श्रेष्ठ द्विजपर आक्रमण नहीं कर सकते ॥ ८६ ॥
नाध्यापनाद् याजनाद् वा अन्यस्माद् वा प्रतिग्रहात् । दोषो भवति विप्राणां ज्वलिताग्निसमा द्विजाः ॥ ८७ ॥
वे संध्योपासक ब्राह्मण प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी होते हैं। पढ़ाने, यज्ञ कराने अथवा दूसरेसे दान लेनेके कारण भी उन्हें दोष नहीं छू सकता (क्योंकि वे उनकी जीविकाके कर्म हैं) ॥ ८७ ॥
दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृताः संस्कृतास्तथा । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ॥ ८८ ॥
ब्राह्मण अच्छी तरह वेद पढ़े हों या न पढ़े हों, उत्तम संस्कारोंसे युक्त हों या प्राकृत मनुष्योंकी भाँति संस्कारशून्य हों, उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे राखमें छिपी हुई अताके समान हैं ॥ ८८ ॥
यथा श्मशाने दीप्तौजाः पावको नैव दुष्यति । एवं विद्वानविद्वान् वा ब्राह्मणो दैवतं महत् ॥ ८९ ॥
जैसे प्रज्वलित अग्नि श्मशानमें भी दूषित नहीं होती, उसी प्रकार ब्राह्मण विद्वान् हो या अविद्वान्, उसे महान् देवता ही मानना चाहिये ॥ ८९ ॥
प्राकारैश्च पुरद्वारैः प्रासादैश्च पृथग्विधैः । नगराणि न शोभन्ते हीनानि ब्राह्मणोत्तमैः ॥ ९० ॥
चहारदीवारियों, नगरद्वारों और भिन्न-भिन्न महलोंसे भी नगरोंकी तबतक शोभा नहीं होती जबतक वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण न रहें ॥ ९० ॥
वेदाढ्या वृत्तसम्पन्ना ज्ञानवन्तस्तपस्विनः । यत्र तिष्ठन्ति वै विप्रास्तन्नाम नगरं नृप ॥ ९१ ॥
राजन्! वेदज्ञ, सदाचारी, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मण जहाँ निवास करते हों, उसीका नाम नगर है ॥ ९१ ॥ व्रजे वाप्यथवारण्ये यत्र सन्ति बहुश्रुताः । तत् तन्नगरमित्याहुः पार्थ तीर्थं च तद् भवेत् ॥ ९२ ॥ कुन्तीनन्दन! व्रज (गौओंके रहनेका स्थान) हो या वन, जहाँ बहुश्रुत विद्वान् रहते हों, उसे 'नगर' कहा गया है, वह तीर्थ भी माना गया है ॥ ९२ ॥ रक्षितारं च राजानं ब्राह्मणं च तपस्विनम् । अभिगम्याभिपूज्याथ सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥ ९३ ॥ प्रजाकी रक्षा करनेवाले राजा और तपस्वी ब्राह्मणके पास जाकर उनकी सेवा-पूजा करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ९३ ॥ पुण्यतीर्थाभिषेकं च पवित्राणां च कीर्तनम् । सद्भिः सम्भाषणं चैव प्रशस्तं कीर्त्यते बुधैः ॥ ९४ ॥ पुण्यतीर्थोंमें स्नान, पवित्र मन्त्रोंका कीर्तन और श्रेष्ठ पुरुषोंसे वार्तालाप—इन सबको विद्वान् पुरुषोंने उत्तम बताया है ॥ ९४ ॥ साधुसङ्गमपूतेन वाक्सुभाषितवारिणा । पवित्रीकृतमात्मानं सन्तो मन्यन्ति नित्यशः ॥ ९५ ॥ सत्संगसे पवित्र किये हुए वाणीके सुन्दर सम्भाषणरूप जलसे अभिषिक्त श्रेष्ठ पुरुष अपनेको सदा पवित्र हुआ मानते हैं ॥ ९५ ॥ त्रिदण्डधारणं मौनं जटाभारोऽथ मुण्डनम् । वल्कलाजिनसंवेशं व्रतचर्याभिषेचनम् ॥ ९६ ॥ अग्निहोत्रं वने वासः शरीरपरिशोषणम् । सर्वाण्येतानि मिथ्या स्युर्यदि भावो न निर्मलः ॥ ९७ ॥ त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, सिरपर जटाका बोझ ढोना, मूँड़ मुँड़ाना, शरीरमें वल्कल और मृगचर्म लपेटे रहना, व्रतका आचरण करना, नहाना, अग्निहोत्र करना, वनमें रहना और शरीरको सुखा देना—ये सभी यदि भाव शुद्ध न हो तो व्यर्थ हैं ॥ ९६-९७ ॥ न दुष्करमनाशित्वं सुकरं ह्यशनं विना । विशुद्धिं चक्षुरादीनां षण्णामिन्द्रियगामिनाम् ॥ ९८ ॥ विकारि तेषां राजेन्द्र सुदुष्करकरं मनः । राजेन्द्र! चक्षु आदि इन्द्रियोंके आहारको छोड़ देना कठिन नहीं है; क्योंकि इन्द्रियोंके छहों विषयोंका उपभोग न करनेसे वह अपने-आप सुगमतासे हो जाता है, परंतु उनमेंसे मन बड़ा विकारी है, इस कारण भावकी शुद्धिके बिना उसको वशमें करना अत्यन्त दुष्कर है ॥ ९८ १/२ ॥ ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभिः ।
ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥ ९९ ॥ जो मन, वाणी, क्रिया और बुद्धिके द्वारा कभी पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं। शरीरको सुखा देना ही तपस्या नहीं है ॥ ९९ ॥
न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोऽविकल्मषः । हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तपः स्मृतम् ॥ १०० ॥ जिसने व्रत, उपवास आदिके द्वारा शरीरको तो शुद्ध कर लिया और जो नाना प्रकारके पापकर्म भी नहीं करता, किंतु जिसके मनमें अपने कुटुम्बी जनोंके प्रति दया नहीं आती, उसकी वह निर्दयता उसके तपका नाश करनेवाली है; केवल भोजन छोड़ देनेका ही नाम तपस्या नहीं है ॥ १०० ॥
तिष्ठन् गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृतः । यावज्जीवं दयावांश्च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १०१ ॥ जो निरन्तर घरपर रहकर भी पवित्रभावसे रहता है, सद्गुणोंसे विभूषित होता है और जीवनभर सब प्राणियोंपर दया रखता है, उसे मुनि ही समझना चाहिये; वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १०१ ॥
न हि पापानि कर्माणि शुद्ध्यन्त्यनशनादिभिः । सीदत्यनशनादेव मांसशोणितलेपनः ॥ १०२ ॥ भोजन छोड़ने आदिसे पापकर्मोंका शोधन हो जाता हो, ऐसी बात नहीं है। हाँ, भोजन त्याग देनेसे यह रक्त-मांससे लिपा हुआ शरीर अवश्य क्षीण हो जाता है ॥
अज्ञातं कर्म कृत्वा च क्लेशो नान्यत् प्रहीयते । नाग्निर्दहति कर्माणि भावशून्यस्य देहिनः ॥ १०३ ॥ शास्त्रोंद्वारा जिनका विधान नहीं किया गया है, ऐसे कार्य करनेसे केवल क्लेश ही हाथ लगता है, उनसे पाप नष्ट नहीं किये जा सकते। अग्निहोत्र आदि शुभ कर्म भावशून्य अर्थात् श्रद्धारहित मनुष्यके पापकर्मोंको दग्ध नहीं कर सकते ॥ १०३ ॥
पुण्यादेव प्रव्रजन्ति शुद्ध्यन्त्यनशनानि च । न मूलफलभक्षित्वान्न मौनान्नानिलाशनात् ॥ १०४ ॥ शिरसो मुण्डनाद् वापि न स्थानकुटिकासनात् । न जटाधारणाद् वापि न तु स्थण्डिलशय्यया ॥ १०५ ॥ नित्यं ह्यनशनाद् वापि नाग्निशुश्रूषणादपि । न चोदकप्रवेशेन न च क्ष्माशयनादपि ॥ १०६ ॥ मनुष्य पुण्यके प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। उपवास भी पुण्यसे अर्थात् निष्कामभावसे ही शुद्धिका कारण होता है। (बिना शुद्धभावके) केवल फल-मूल खाने, मौन रहने, हवा पीने, सिर मुँड़ाने, एक स्थानपर कुटी बनाकर रहने, सिरपर जटा रखने, वेदीपर
सोने, नित्य उपवास, अग्निसेवन, जलप्रवेश तथा भूमिशयन करनेसे भी शुद्धि नहीं होती है॥ १०४—१०६॥
ज्ञानेन कर्मणा वापि जरामरणमेव च।
व्याधयश्च प्रहीयन्ते प्राप्यते चोत्तमं पदम्॥ १०७॥
तत्त्वज्ञान या सत्कर्मसे ही जरा, मृत्यु तथा रोगोंका नाश होता है और उत्तम पद (मुक्ति)-की प्राप्ति होती है॥ १०७॥
बीजानि ह्यग्निदग्धानि न रोहन्ति पुनर्यथा।
ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संयुज्यते पुनः॥ १०८॥
जैसे आगमें जले हुए बीज फिर नहीं उगते हैं, उसी प्रकार ज्ञानके द्वारा अविद्या आदि क्लेशोंके नष्ट हो जानेपर आत्माका पुनः उनसे संयोग नहीं होता॥ १०८॥
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्योपमानि च।
विनश्यन्ति न संदेहः फेनानीव महार्णवे॥ १०९॥
जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर सारे शरीर काठ और दीवारकी भाँति जडवत् होकर महासागरमें उठे हुए फेनोंकी तरह नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है॥
आत्मानं विन्दते येन सर्वभूतगुहाशयम्।
श्लोकेन यदि वार्धेन क्षीणं तस्य प्रयोजनम्॥ ११०॥
एक या आधे श्लोकसे भी यदि सम्पूर्ण भूतोंके हृदयदेशमें शयन करनेवाले परमात्माका ज्ञान हो जाय, तो उसके लिये सम्पूर्ण शास्त्रोंके अध्ययनका प्रयोजन समाप्त हो जाता है॥ ११०॥
द्व्यक्षरादभिसंधाय केचिच्छ्लोकपदाङ्कितैः।
शतैरन्यैः सहस्रैश्च प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्॥ १११॥
कोई ‘तत्त्वम्’ अथवा राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि दो अक्षरोंसे ही परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। कोई श्लोक और पदोंसे अंकित अन्य सैकड़ों तथा सहस्रों शास्त्रवाक्योंसे परमात्माके स्वरूपको जानते हैं। जैसे भी हो, बोध ही मोक्षका लक्षण है॥ १११॥
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।
ऊचुर्ज्ञानविदो वृद्धाः प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्॥ ११२॥
जिसके मनमें संशय भरा हुआ है, उसके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है। ‘ज्ञान ही मोक्षका लक्षण है’—यह वृद्ध, ज्ञानी पुरुषोंका कथन है॥ ११२॥
विदितार्थस्तु वेदानां परिवेद प्रयोजनम्।
उद्विजेत् स तु वेदेभ्यो दावाग्नेरिव मानवः॥ ११३॥
जब मनुष्य वेदोंके वास्तविक प्रयोजनको जान जाता है, तब वह वेदवेत्ता मानव (कर्मविधायक) समस्त वेदोंसे उसी प्रकार उपरत हो जाता है, जैसे मनुष्य दावानलसे हट
जाते हैं ॥ ११३ ॥
शुष्कं तर्कं परित्यज्य आश्रयस्व श्रुतिं स्मृतिम् ।
एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि ।
बुद्धिर्न तस्य सिद्धयेत साधनस्य विपर्ययात् ॥ ११४ ॥
प्रणवसे सम्बन्ध रखनेवाले परमात्मतत्त्वको यदि तुम युक्तिपूर्वक अर्थात् निःसंदेहभावसे समझना चाहते हो तो कोरा तर्कवाद छोड़कर श्रुति तथा स्मृतिके वचनोंका आश्रय लो। क्योंकि जो उपर्युक्त साधनका आश्रय नहीं लेता उसकी बुद्धि तत्त्वका निश्चय करनेमें समर्थ नहीं हो सकती ॥ ११४ ॥
वेदपूर्वं वेदितव्यं प्रयत्नात्
तत् वै वेदस्तस्य वेदः शरीरम् ।
वेदस्तत्त्वं तत्समासोपलब्धौ
क्लीबस्तवात्मा तत् स वेद्यस्य वेद्यम् ॥ ११५ ॥
इसलिये जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान वेदोंके द्वारा ही यत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह परमात्मतत्त्व वेदस्वरूप है। वेद उसका शरीर है। उस परमात्मतत्त्वको सहजभावसे प्राप्त करानेमें वेद हेतु है। यह जीवात्मा स्वयं समर्थ नहीं है; क्योंकि वह तत्त्व वेद्यका भी वेद्य है, अर्थात् जाननेमें बड़ा ही गहन है ॥
वेदोक्तमायुर्देवानामाशिषश्चैव कर्मणाम् ।
फलत्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम् ॥ ११६ ॥
देवताओंकी आयु और कर्मोंका शुभाशुभ फल आदि बातें वेदमें कही गयी हैं। उसके अनुसार ही देहधारियोंका प्रभाव संसारमें प्रत्येक युगमें फलित होता है ॥ ११६ ॥
इन्द्रियाणां प्रसादेन तदेतत् परिवर्जयेत् ।
तस्मादनशनं दिव्यं निरुद्धेन्द्रियगोचरम् ॥ ११७ ॥
अतः मनुष्यको इन्द्रियोंकी शुद्धिके द्वारा इन विषयभोगोंको त्याग देना चाहिये। यह इन्द्रियोंकी निर्मलता और निरोधसे होनेवाला अनशन (विषयोंका अग्रहण) दिव्य होता है ॥ ११७ ॥
तपसा स्वर्गगमनं भोगो दानेन जायते ।
ज्ञानेन मोक्षो विज्ञेयस्तीर्थस्नानादघक्षयः ॥ ११८ ॥
तपसे स्वर्गलोकमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है। दानसे भोगोंकी प्राप्ति होती है। ज्ञानसे मोक्ष मिलता है, यह जानना चाहिये तथा तीर्थस्नानसे पापोंका क्षय हो जाता है ॥ ११८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र प्रत्युवाच महायशाः ।
भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रधानविधिमुत्तमम् ॥ ११९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मार्कण्डेयजीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी युधिष्ठिर बोले—'भगवन्! अब मैं (दानकी) उत्तम एवं प्रधान विधि सुनना चाहता हूँ' ॥ ११९ ॥
मार्कण्डेय उवाच
यत् त्वमिच्छसि राजेन्द्र दानधर्मं युधिष्ठिर । इष्टं चेदं सदा मह्यं राजन् गौरवतस्तथा ॥ १२० ॥ **मार्कण्डेयजीने कहा—**महाराज युधिष्ठिर! तुम मुझसे जिस दान-धर्मको सुनना चाहते हो वह गौरवयुक्त होनेके कारण मुझे सदा ही प्रिय है ॥ १२० ॥ शृणु दानरहस्यानि श्रुतिस्मृत्युदितानि च । छायायां करिणः श्राद्धं तत् कर्णपरिवीजिते । दश कल्पायुतानीह न क्षीयेत युधिष्ठिर ॥ १२१ ॥ श्रुतियों और स्मृतियोंमें जो दानके रहस्य बताये गये हैं, उनका वर्णन सुनो—युधिष्ठिर! गुरुवारको अमावस्याके योगमें पीपलके वृक्षकी छायाको गजच्छाया-पर्व कहते हैं। गजच्छायामें जहाँ पीपलके पत्तोंकी हवा लगती हो, उस प्रदेशमें जलके समीप जो श्राद्ध किया जाता है, वह एक लाख कल्पों तक नष्ट नहीं होता ॥ १२१ ॥ जीवनाय समाक्लिन्नं वसु दत्त्वा महीयते । वैश्यं तु वासयेद् यस्तु सर्वयज्ञैः स इष्टवान् ॥ १२२ ॥ जो जीविकाके लिये राँधा हुआ अन्नका दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो आश्रयकी खोज करनेवाले राहगीर-अतिथिको ठहरनेके लिये जगह दे वह सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेता है ॥ प्रतिस्रोतश्चित्रवाहाः पर्जन्योऽन्नानुसंचरन् । महाधुरि यथा नावा महापापैः प्रमुच्यते ॥ १२३ ॥ विप्लवे विप्रदत्तानि दधिमस्त्वक्षयाणि च । पूर्वकी ओर बहनेवाली नदीका प्रवाह जहाँ पश्चिमकी ओर मुड़ गया हो, वह प्रतिस्रोत तीर्थ कहलाता है, उसमें किया हुआ उत्तम अश्वोंका दान अक्षय पुण्यको देनेवाला होता है। अन्नके लिये विचरनेवाले अतिथिरूपी इन्द्रको यदि भोजनसे संतुष्ट किया जाय तो वह भी अक्षयपुण्यका जनक होता है। नदियोंके महान् प्रवाहमें ग्रहणके समय ब्राह्मणोंको दिये हुए दधिमण्ड तथा पूर्वोक्त पदार्थ भी अक्षय पुण्यकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। इसी प्रकार नदियोंके महान् प्रवाहमें स्नान करनेवाला पुरुष बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १२३ ॥
पर्वसु द्विगुणं दानमृतौ दशगुणं भवेत् ॥ १२४ ॥
अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखेषु च । चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते ॥ १२५ ॥ पर्वके अवसरपर दिया हुआ दान दुगुना तथा ऋतु आरम्भ होनेके समय दिया हुआ दान दस गुना पुण्यदायक होता है। उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन, विषुव-योग (तुला और मेषकी संक्रान्ति)-में, मिथुन, कन्या, धनु और मीनकी संक्रान्तियोंमें तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर दिया हुआ दान अक्षय बताया गया है ॥ १२४-१२५ ॥
ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं शतगुणमृत्वयनादिषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहो- र्विषुवति चाक्षयमश्नुते फलम् ॥ १२६ ॥ विद्वान् पुरुष ऋतु प्रारम्भ होनेके दिन दिये हुए दानको दस गुना तथा अयन आदिके दिन सौ गुना बताते हैं। इसी प्रकार ग्रहणके दिन दिये हुए दानका फल सहस्रगुना होता है और विषुवयोगमें दान करनेसे मनुष्य उसके अक्षय पुण्य-फलका उपभोग करता है ॥ १२६ ॥
नाभूमिदो भूमिमश्नाति राजन् नायानदो यानमारुह्य याति । यान् यान् कामान् ब्राह्मणेभ्यो ददाति तांस्तान् कामान् जायमानः स भुङ्क्ते ॥ १२७ ॥ राजन्! जिसने भूमिदान नहीं किया है, वह परलोकमें पृथ्वीका उपभोग नहीं कर सकता। जिसने सवारीका दान नहीं किया है, वह सवारीपर चढ़कर नहीं जा सकता। इस जन्ममें मनुष्य जिन-जिन पदार्थोंका ब्राह्मणोंको दान करता है, भावी जन्ममें वह उन-उन पदार्थोंको उपभोगके लिये पाता है ॥ १२७ ॥
अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः । लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता यः काञ्चनं गाश्च महीं च दद्यात् ॥ १२८ ॥ सुवर्ण अग्निकी प्रथम संतान है। भूमि भगवान् विष्णुकी पत्नी है तथा गौएँ भगवान् सूर्यकी कन्याएँ हैं, अतः जो कोई सुवर्ण, गौ और पृथ्वीका दान करता है, उसके द्वारा तीनों लोकोंका दान सम्पन्न हो जाता है ॥
परं हि दानान्न बभूव शाश्वतं भव्यं त्रिलोके भवते कुतः पुनः । तस्मात् प्रधानं परमं हि दानं
वदन्ति लोकेषु विशिष्टबुद्धयः ॥ १२९ ॥
त्रिलोकीमें दानसे बढ़कर शाश्वत पुण्यदायक कर्म दूसरा पहले कभी नहीं हुआ, अब कैसे हो सकता है? इसीलिये उत्तम बुद्धिवाले पुरुष संसारमें दानको ही सर्वोत्कृष्ट पुण्यकर्म बताते हैं ॥ १२९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि दानमाहात्म्ये द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें दानमाहात्म्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०० ॥
* यहाँ जो पिता आदि गुरुजन, सेवक और स्त्रियोंको दिया दान व्यर्थ कहा है, इसका अभिप्राय यह है कि माता-पिता आदि गुरुजनोंकी सेवा करना तथा स्त्री और नौकरोंका पालन-पोषण करना तो मनुष्यका कर्तव्य ही है। अतः उनको देना तो अपने कर्तव्यका ही पालन है, इसलिये वह उनको देना दानकी श्रेणीमें नहीं है।
२०१-
एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः
उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तथा ।
मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो महाराज पप्रच्छ भरतर्षभ ।
मार्कण्डेयं तपोवृद्धं दीर्घायुषमकल्मषम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय मुनिके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गप्राप्ति होनेका वृत्तान्त (तथा दानमाहात्म्य) सुनकर राजा युधिष्ठिरने पापरहित, दीर्घायु तथा तपोवृद्ध महात्मा मार्कण्डेयसे इस प्रकार पूछा— ॥ १-२ ॥
विदितास्तव धर्मज्ञ देवदानवराक्षसाः ।
राजवंशाश्च विविधा ऋषिवंशाश्च शाश्वताः ॥ ३ ॥
'धर्मज्ञ मुने! आप देवता, दानव तथा राक्षसोंको भी अच्छी तरह जानते हैं। आपको नाना प्रकारके राजवंशों तथा ऋषियोंकी सनातन वंशपरम्पराका भी ज्ञान है ॥ ३ ॥
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदस्मिंल्लोके द्विजोत्तम ।
कथां वेत्सि मुने दिव्यां मनुष्योरगरक्षसाम् ॥ ४ ॥
देवगन्धर्वयक्षाणां किन्नराप्सरसां तथा ।
'द्विजश्रेष्ठ! इस लोकमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो आपसे अज्ञात हो। मुने! आप मनुष्य, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा अप्सराओंकी भी दिव्य कथाएँ जानते हैं ॥ ४ ॥
इदमिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन द्विजसत्तम ॥ ५ ॥
कुवलाश्व इति ख्यात इक्ष्वाकुरपराजितः ।
कथं नामविपर्यासाद् धुन्धुमारत्वमागतः ॥ ६ ॥
'विप्रवर! अब मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि इक्ष्वाकुवंशमें जो कुवलाश्व नामसे विख्यात विजयी राजा हो गये हैं, वे क्यों नाम बदलकर 'धुन्धुमार' कहलाने लगे? ॥ ५-६ ॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन ज्ञातुं भार्गवसत्तम ।
विपर्यस्तं यथा नाम कुवलाश्वस्य धीमतः ॥ ७ ॥
‘भृगुश्रेष्ठ! बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके इस नाम-परिवर्तनका यथार्थ कारण मैं जानना चाहता हूँ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरेणैवमुक्तो मार्कण्डेयो महामुनिः ।
धौन्धुमारमुपाख्यानं कथयामास भारत ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भारत! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर महामुनि मार्कण्डेयने धुन्धुमारकी कथा प्रारम्भ की ॥ ८ ॥
मार्कण्डेय उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु राजन् युधिष्ठिर ।
धर्मिष्ठमिदमाख्यानं धुन्धुमारस्य तच्छृणु ॥ ९ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— राजा युधिष्ठिर! सुनो। धुन्धुमारका आख्यान धर्ममय है। अब इसका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ९ ॥
यथा स राजा इक्ष्वाकुः कुवलाश्वो महीपतिः ।
धुन्धुमारत्वमगमत् तच्छृणुष्व महीपते ॥ १० ॥
महाराज! इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व जिस प्रकार धुन्धुमार नामसे विख्यात हुए, वह सब श्रवण करो ॥ १० ॥
महर्षिर्विश्रुतस्तात उत्तङ्क इति भारत ।
मरुधन्वसु रम्येषु आश्रमस्तस्य कौरव ॥ ११ ॥
भरतनन्दन! कुरुकुलरत्न! महर्षि उत्तङ्कका नाम बहुत प्रसिद्ध है। तात! मरुके रमणीय प्रदेशमें उनका आश्रम है ॥ ११ ॥
उत्तङ्कस्तु महाराज तपोऽतप्यत् सुदुश्चरम् ।
आरिराधयिषुर्विष्णुं बहून् वर्षगणान् विभुः ॥ १२ ॥
महाराज! प्रभावशाली उत्तङ्कने भगवान् विष्णुकी आराधनाकी इच्छासे बहुत वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या की थी ॥ १२ ॥
तस्य प्रीतः स भगवान् साक्षाद् दर्शनमेयिवान् ।
दृष्ट्वैव चर्षिः प्रह्वस्तं तुष्टाव विविधैः स्तवैः ॥ १३ ॥
उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनका दर्शन पाते ही महर्षि नम्रतासे झुक गये और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥
उत्तङ्क उवाच
त्वया देव प्रजाः सर्वाः ससुरासुरमानवाः ।
स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥ १४ ॥
**उत्तङ्क बोले—**देव! देवता, असुर, मनुष्य आदि सारी प्रजा आपसे ही उत्पन्न हुई है। समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंकी सृष्टि भी आपने ही की है ॥ १४ ॥
ब्रह्म वेदाश्च वेद्यं च त्वया सृष्टं महाद्युते ।
शिरस्ते गगनं देव नेत्रे शशिदिवाकरौ ॥ १५ ॥
निःश्वासः पवनश्चापि तेजोऽग्निश्च तवाच्युत ।
बाहवस्ते दिशः सर्वाः कुक्षिश्चापि महार्णवः ॥ १६ ॥
ऊरू ते पर्वता देव खं नाभिर्मधुसूदन ।
पादौ ते पृथिवी देवी रोमाण्याोषधयस्तथा ॥ १७ ॥
महातेजस्वी परमेश्वर! ब्रह्मा, वेद और जाननेयोग्य सभी वस्तुएँ आपने ही उत्पन्न की हैं। देव! आकाश आपका मस्तक है। चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं। वायु श्वास है तथा अग्नि आपका तेज है। अच्युत! सम्पूर्ण दिशाएँ आपकी भुजाएँ और महासागर आपका कुक्षिस्थान है। देव! मधुसूदन! पर्वत आपके ऊरु और अन्तरिक्ष-लोक आपकी नाभि है। पृथ्वीदेवी आपके चरण तथा ओषधियाँ रोएँ हैं ॥ १५—१७ ॥
इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगाः ।