महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
त्वया हि पृथिवी राजन् रक्ष्यमाणा महात्मना । भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्यं गन्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ राजन्! आप-जैसे महात्मा राजासे सुरक्षित होकर ही यह पृथ्वी सर्वथा भयशून्य हो जायगी। अतः आप वनमें न जाइये ॥ १२ ॥ पालने हि महान् धर्मः प्रजानामिह दृश्यते । न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत् ते बुद्धिरीदृशी ॥ १३ ॥ क्योंकि आपके लिये यहाँ रहकर प्रजाओंका पालन करनेमें जो महान् धर्म देखा जाता है, वैसा वनमें रहकर तपस्या करनेमें नहीं दिखायी देता। अतः आपकी ऐसी समझ नहीं होनी चाहिये ॥ १३ ॥ ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते । प्रजानां पालने यो वै पुरा राजर्षिभिः कृतः ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! पूर्वकालके राजर्षियोंने जिस धर्मका पालन किया है, वह प्रजाजनोंके पालनमें ही सुलभ है। ऐसा धर्म और किसी कार्यमें नहीं दिखायी देता ॥ १४ ॥ रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि । निरुद्विग्नस्तपश्चर्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव ॥ १५ ॥ राजाके लिये प्रजाजनोंका पालन करना ही धर्म है। अतः आपको प्रजावर्गकी रक्षा ही करनी चाहिये। भूपाल! मैं शान्तिपूर्वक तपस्या नहीं कर पा रहा हूँ ॥
ममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु । समुद्रो बालुकापूर्ण उज्वालक इति स्मृतः ॥ १६ ॥ मेरे आश्रमके समीप समस्त मरुप्रदेशमें एक बालूसे पूर्ण अर्थात् बालुकामय समुद्र है, उसका नाम है उज्वालक ॥ १६ ॥ बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायतः । तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः ॥ १७ ॥ मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः । अन्तर्भूमिगतो राजन् वसत्यमितविक्रमः ॥ १८ ॥ उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनकी है। वहाँ महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न एक भयंकर दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभका पुत्र है। वह क्रूर स्वभाववाला राक्षस धुन्धु नामसे प्रसिद्ध है। राजन्! वह अमित पराक्रमी दानव धरतीके भीतर छिपकर रहा करता है ॥ १७-१८ ॥ तं निहत्य महाराज वनं त्वं गन्तुमर्हसि । शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम् ॥ १९ ॥ त्रिदशानां विनाशाय लोकानां चापि पार्थिव । महाराज! उसका नाश करके ही आपको वनमें जाना चाहिये। भूपाल! वह सम्पूर्ण लोकों और देवताओंके विनाशके लिये कठोर तपस्याका आश्रय लेकर (पृथ्वीमें) शयन करता है ॥ १९ १/२ ॥ अवध्यो दैवतानां हि दैत्यानामथ रक्षसाम् ॥ २० ॥ नागानामथ यक्षाणां गन्धर्वाणां च सर्वशः । अवाप्य स वरं राजन् सर्वलोकपितामहात् ॥ २१ ॥ राजन्! वह सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीसे वर पाकर देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों, यक्षों और समस्त गन्धर्वोंके लिये अवध्य हो गया है ॥ २०-२१ ॥ तं विनाशय भद्रं ते मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा । प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं शाश्वतीमव्ययां ध्रुवाम् ॥ २२ ॥ महाराज! आपका कल्याण हो। आप उस दैत्यका विनाश कीजिये। इसके विपरीत आपको कोई विचार नहीं करना चाहिये। उसका वध करके आप सदा बनी रहनेवाली अक्षय एवं महान् कीर्ति प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥ क्रूरस्य तस्य स्वपतो बालुकान्तर्हितस्य च । संवत्सरस्य पर्यन्ते निःश्वासः सम्प्रवर्तते ॥ २३ ॥ बालूके भीतर छिपकर रहनेवाला वह क्रूर राक्षस एक वर्षमें एक ही बार साँस लेता है ॥ २३ ॥ यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना ।
तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत् ।। २४ ।। आदित्यपथमाश्रित्य सप्ताहं भूमिकम्पनम् । सविस्फुलिङ्गं सज्ज्वलं धूममिश्रं सुदारुणम् ।। २५ ।। जिस समय वह साँस लेता है, उस समय पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है। उसके साँसकी आँधीसे धूलका इतना ऊँचा बवंडर उठता है कि वह सूर्यके मार्गको भी ढक लेता है और सात दिनोंतक वहाँ भूकम्प होता रहता है। आगकी चिनगारियाँ, ज्वालाएँ और धूआँ उठकर अत्यन्त भयंकर दृश्य उपस्थित करते हैं ।। २४-२५ ।। तेन राजन् न शक्नोमि तस्मिन् स्थातुं स्व आश्रमे । तं विनाशय राजेन्द्र लोकानां हितकाम्यया ।। २६ ।। राजन्! इस कारण मेरा अपने आश्रममें रहना कठिन हो गया है। महाराज! सब लोगोंके हितके लिये आप उस राक्षसको नष्ट कीजिये ।। २६ ।। लोकाः स्वस्था भविष्यन्ति तस्मिन् विनिहतेऽसुरे । त्वं हि तस्य विनाशाय पर्याप्त इति मे मतिः ।। २७ ।। उस असुरके मारे जानेपर सब लोग स्वस्थ एवं सुखी हो जायँगे। मेरा विश्वास है कि आप अकेले ही उसका नाश करनेके लिये पर्याप्त हैं ।। २७ ।। तेजसा तव तेजश्च विष्णुराप्याययिष्यति । विष्णुना च वरो दत्तः पूर्वं मम महीपते ।। २८ ।। यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः । तेजस्तं वैष्णवमिति प्रवेक्ष्यति दुरासदम् ।। २९ ।। भूपाल! भगवान् विष्णु अपने तेजसे आपके तेजको बढ़ायेंगे। उन्होंने पूर्वकालमें मुझे यह वर दिया था कि जो राजा उस भयानक एवं महान् असुरका वध करनेको उद्यत होगा, उस दुर्धर्ष वीरके भीतर मेरा वैष्णव तेज प्रवेश करेगा ।। २८-२९ ।। तत् तेजस्त्वं समाधाय राजेन्द्र भुवि दुःसहम् । तं निष्षूदय राजेन्द्र दैत्यं रौद्रपराक्रमम् ।। ३० ।। महाराज! अतः आप भगवान्का दुःसह तेज धारण करके पृथ्वीपर रहनेवाले उस भयानक पराक्रमी दैत्यको नष्ट कीजिये ।। ३० ।। न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाल्पेन शक्यते । निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ।। ३१ ।। राजन्! धुन्धु महातेजस्वी असुर है। साधारण तेजसे सौ वर्षोंमें भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता ।। ३१ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०२ ॥
२०३-
त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका वध
मार्कण्डेय उवाच
स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः ।
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**कौरवश्रेष्ठ! उत्तङ्कके इस प्रकार आग्रह करनेपर अपराजित वीर राजर्षि बृहदश्वने उनसे हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥
न तेऽभिगमनं ब्रह्मन् मोघमेतद् भविष्यति ।
पुत्रो ममायं भगवन् कुवलाश्व इति स्मृतः ॥ २ ॥
धृतिमान् क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि ।
‘ब्रह्मन्! आपका यह आगमन निष्फल नहीं होगा। भगवन्! मेरा यह पुत्र कुवलाश्व भूमण्डलमें अनुपम वीर है। यह धैर्यवान् और फुर्तीला है ॥ २ १/२ ॥
प्रियं च ते सर्वमेतत् करिष्यति न संशयः ॥ ३ ॥
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः ।
विसर्जयस्व मां ब्रह्मन् न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ॥ ४ ॥
परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले अपने समस्त शूरवीर पुत्रोंके साथ जाकर यह आपका सारा अभीष्ट कार्य सिद्ध करेगा, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मन्! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैंने अब अस्त्र-शस्त्रोंको त्याग दिया है’ ॥
तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा ।
स तमादिश्य तनयमुत्तङ्काय महात्मने ॥ ५ ॥
क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ।
तब अमित तेजस्वी उत्तङ्क मुनिने ‘तथास्तु’ कहकर राजाको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् राजर्षि बृहदश्वने महात्मा उत्तङ्कको अपना वह पुत्र सौंप दिया और धुन्धुका वध करनेकी आज्ञा दे उत्तम तपोवनकी ओर प्रस्थान किया ॥ ५ १/२ ॥
युधिष्ठिर उवाच
क एष भगवन् दैत्यो महावीर्यस्तपोधन ॥ ६ ॥
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ।
**युधिष्ठिरने पूछा—**तपोधन! भगवन्! यह पराक्रमी दैत्य कौन था? किसका पुत्र और नाती था? मैं यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥
एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन ।। ७ ।। एतदिच्छामि भगवन् याथातथ्येन वेदितुम् । सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ।। ८ ।। तपस्याके धनी मुनीश्वर! ऐसा महाबली दैत्य तो मैंने कभी नहीं सुना था, अतः भगवन्! मैं इसके विषयमें यथार्थ बातें जानना चाहता हूँ। महामते! आप यह सारी कथा विस्तारपूर्वक बताइये ।। ७-८ ।।
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप । कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ।। ९ ।। मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। यह सारा वृत्तान्त मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ।। ९ ।।
एकार्णवे तदा लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । प्रणष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ।। १० ।। भरतश्रेष्ठ! बात उस समयकी है जब सम्पूर्ण चराचर जगत् एकार्णवके जलमें डूबकर नष्ट हो चुका था। समस्त प्राणी कालके गालमें चले गये थे ।। १० ।।
प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम् । यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् ।। ११ ।। सुष्वाप भगवान् विष्णुरप्सु योगत एव सः । नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ।। १२ ।। उस समय वे भगवान् विष्णु एकार्णवके जलमें अमित तेजस्वी शेषनागके विशाल शरीरकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते थे। उन्हीं भगवान्को सिद्ध, मुनिगण सबकी उत्पत्तिका कारण, लोकस्रष्टा, सर्वव्यापी, सनातन, अविनाशी तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं ।। ११-१२ ।।
लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः । नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ।। १३ ।। स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् । नाभ्यां विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ।। १४ ।। साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः ।
महाभाग! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले लोककर्ता भगवान् श्रीहरि नागके विशाल फणके द्वारा धारण की हुई इस पृथ्वीका सहारा लेकर (शेषनागपर) सो रहे थे, उस समय उन दिव्यस्वरूप नारायणकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। उसीमें सम्पूर्ण लोकोंके गुरु साक्षात् पितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे ॥ १३-१४ १/२ ॥
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः ॥ १५ ॥
स्वप्रभावाद् दुर्धर्षो महाबलपराक्रमः ।
वे चारों वेदोंके विद्वान् हैं। जरायुज आदि चतुर्विध जीव उन्हींके स्वरूप हैं। उनके चार मुख हैं। उनके बल और पराक्रम महान् हैं। वे अपने प्रभावसे दुर्धर्ष हैं ॥ १५ १/२ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥ १६ ॥
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् ।
ब्रह्माजीके प्रकट होनेके कुछ काल बाद मधु और कैटभ नामक दो पराक्रमी दानवोंने सर्वसामर्थ्यवान् भगवान् श्रीहरिको देखा ॥ १६ १/२ ॥
शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥ १७ ॥
बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनायते ।
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥ १८ ॥
वे शेषनागके शरीरकी दिव्य शय्यापर शयन किये हुए थे। उनका तेज महान् है। वे जिस शय्यापर शयन करते हैं, उसकी लंबाई-चौड़ाई कई योजनोंकी है। भगवान्के मस्तकपर किरीट और कण्ठमें कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उन्होंने रेशमी पीताम्बर धारण कर रखा था ॥ १७-१८ ॥
दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा ।
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥ १९ ॥
राजन्! वे अपनी कान्ति और तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे। शरीरसे वे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित होते थे। उनकी झाँकी अद्भुत और अनुपम थी ॥ १९ ॥
विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तथा ।
दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्मनिभेक्षणम् ॥ २० ॥
वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ।
वित्रस्यमानो बहुशो ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः ॥ २१ ॥
अकम्पयत् पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ।
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥ २२ ॥
भगवान्को देखकर मधु और कैटभ दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि कमलमें बैठे हुए कमलनयन पितामह ब्रह्माजीपर पड़ी। उन्हें देखकर वे दोनों दैत्य उन अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको डराने लगे। उन दोनोंके द्वारा बार-बार डराये जानेपर
महायशस्वी ब्रह्माजीने उस कमलकी नालको हिलाया। इससे भगवान् गोविन्द जाग उठे। जागनेपर उन्होंने उन दोनों महापराक्रमी दानवोंको देखा ।। २०—२२ ।। दृष्ट्वा तावब्रवीद् देवः स्वागतं वां महाबलौ । ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ।। २३ ।। उन महाबली दानवोंको देखकर भगवान् विष्णुने कहा—‘तुम दोनों बड़े बलवान् हो। तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम दोनोंको उत्तम वर दे रहा हूँ; क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे प्रसन्नता होती है’ ।। २३ ।। तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ । प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ।। २४ ।। महाराज! वे दोनों महाबली दानव बड़े अभिमानी थे। उन्होंने हँसकर इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् मधुसूदनसे एक साथ कहा— ।। २४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1411)
भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका जाँघोंपर वध
आवां वरय देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम।
दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद् ब्रवीह्यविचारयन् ।। २५ ।।
‘सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हें वर देते हैं। देव! तुम्हीं हमलोगोंसे वर माँगो। हम दोनों तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार वर देंगे। तुम बिना सोचे-विचारे जो चाहो, माँग लो’ ।। २५ ।।
श्रीभगवानुवाच
प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम ।
युवां हि वीर्यसम्पन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ।। २६ ।।
**श्रीभगवान् बोले—**वीरो! मैं तुमसे अवश्य वर लूँगा। मुझे तुमसे वर प्राप्त करना अभीष्ट है; क्योंकि तुम दोनों बड़े पराक्रमी हो। तुम्हारे-जैसा दूसरा कोई पुरुष नहीं है ।। २६ ।।
वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ ।
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ।। २७ ।।
सत्यपराक्रमी वीरो! तुम दोनों मेरे हाथसे मारे जाओ। मैं सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये तुमसे यही मनोरथ प्राप्त करना चाहता हूँ ।। २७ ।।
मधुकैटभावूचतुः
अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ।
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ।। २८ ।।
**मधु और कैटभने कहा—**पुरुषोत्तम! हमलोगोंने पहले कभी स्वच्छन्द (मर्यादारहित) बर्तावमें भी झूठ नहीं कहा है, फिर और समयमें तो हम झूठ बोल ही कैसे सकते हैं? आप हम दोनोंको सत्य और धर्ममें अनुरक्त मानिये ।। २८ ।।
बले रूपे च शौर्ये च न शमे च समोऽस्ति नौ ।
धर्मे तपसि दाने च शीलसत्त्वदमेषु च ।। २९ ।।
बल, रूप, शौर्य और मनोनिग्रहमें हमारी समता करनेवाला कोई नहीं है। धर्म, तपस्या, दान, शील, सत्त्व तथा इन्द्रियसंयममें भी हमारी कहीं तुलना नहीं है ।। २९ ।।
उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव ।
उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ।। ३० ।।
किंतु केशव! हमलोगोंपर यह महान् संकट आ पहुँचा है। अब आप भी अपनी कही हुई बात पूर्ण कीजिये। कालका उल्लंघन करना बहुत ही कठिन है ।।
आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो ।
अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम ।। ३१ ।।
देव! सुरश्रेष्ठ! विभो! हम दोनों आपके द्वारा एक ही सुविधा चाहते हैं। वह यह है कि आप इस खुले आकाशमें ही हमारा वध कीजिये ।। ३१ ।।
पुत्रत्वमधिगच्छाव तव चापि सुलोचन ।
वर एष वृतो देव तद् विद्धि सुरसत्तम ॥ ३२ ॥
अनृतं मा भवेद् देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा ।
सुन्दर नेत्रोंवाले देवेश्वर! हम दोनों आपके पुत्र हों। हमने आपसे यही वर माँगा है। आप इसे अच्छी तरह समझ लें। सुरश्रेष्ठ देव! हमने जो प्रतिज्ञा की है, वह असत्य नहीं होनी चाहिये ॥ ३२ १/२ ॥
श्रीभगवानुवाच
बाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद् भविष्यति ॥ ३३ ॥
श्रीभगवान् बोले— बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। यह सब कुछ (तुम्हारी इच्छाके अनुसार) होगा ॥ ३३ ॥
स विचिन्त्याथ गोविन्दो नापश्यद् यदनावृतम् ।
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ॥ ३४ ॥
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा ।
मधुकैटभयो राजन् शिरसी मधुसूदनः ।
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महायशाः ॥ ३५ ॥
भगवान् विष्णुने बहुत सोचनेपर जब कहीं खुला आकाश न देखा और स्वर्ग अथवा पृथ्वीपर भी जब उन्हें कोई खुली जगह न दिखायी दी, तब महायशस्वी देवेश्वर मधुसूदनने अपनी दोनों जाँघोंको अनावृत (वस्त्ररहित) देखकर मधु और कैटभके मस्तकोंको उन्हींपर रखकर तीखी धारवाले चक्रसे काट डाला ॥ ३४-३५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०३ ॥
२०४-
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः
धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना
मार्कण्डेय उवाच
धुन्धुर्नाम महाराज तयोः पुत्रो महाद्युतिः ।
स तपोऽतप्यत महन्महावीर्यपराक्रमः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— महाराज! उन्हीं दोनों मधु और कैटभका पुत्र धुन्धु है जो बड़ा तेजस्वी और महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। उसने बड़ी भारी तपस्या की ॥ १ ॥
अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसंततः ।
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभुम् ॥ २ ॥
वह दीर्घकालतक एक पैरसे खड़ा रहा। उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया कि नस-नाड़ियोंका जाल दिखायी देने लगा। ब्रह्माजीने उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर उसे वर दिया। धुन्धुने भगवान् ब्रह्मासे इस प्रकार वर माँगा— ॥ २ ॥
देवदानवयक्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् ।
अवध्योऽहं भवेयं वै वर एष वृतो मया ॥ ३ ॥
'भगवन्! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसीके हाथसे न मारा जाऊँ। मैंने आपसे यही वर माँगा है' ॥ ३ ॥
एवं भवतु गच्छेति तमुवाच पितामहः ।
स एवमुक्तस्तत्पादौ मूर्ध्ना स्पृश्य जगाम ह ॥ ४ ॥
तब ब्रह्माजीने उससे कहा—'ऐसा ही होगा। जाओ।' उनके ऐसा कहनेपर धुन्धुने मस्तक झुकाकर उनके चरणोंका स्पर्श किया और वहाँसे चला गया ॥ ४ ॥
स तु धुन्धुर्वरं लब्ध्वा महावीर्यपराक्रमः ।
अनुस्मरन् पितृवधं द्रुतं विष्णुमुपागमत् ॥ ५ ॥
जब धुन्धु वर पाकर महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न हो गया, तब उसे अपने पिता मधु और कैटभके वधका स्मरण हो आया और वह शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके पास गया ॥ ५ ॥
स तु देवान् सगन्धर्वान् जित्वा धुन्धुरमर्षणः ।
बबाध सर्वानसकृद् विष्णुं देवांश्च वै भृशम् ॥ ६ ॥
धुन्धु अमर्षमें भरा हुआ था। उसने गन्धर्व-सहित सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर भगवान् विष्णु तथा अन्य देवताओंको बार-बार महान् कष्ट देना प्रारम्भ किया ॥ ६ ॥
समुद्रे बालुकापूर्णे उज्जालक इति स्मृते ।
आगम्य च स दुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ ॥ ७ ॥
बाधते स्म परं शक्त्या तमुत्तङ्काश्रमं विभो ।
अन्तर्भूमिगतस्तत्र बालुकान्तर्हितस्तथा ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह दुष्टात्मा बालुकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्रमें आकर रहने और उस देशके निवासियोंको सताने लगा। राजन्! वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरतीके भीतर बालूमें छिपकर वहाँ उत्तंकके आश्रममें भी उपद्रव करने लगा ॥ ७-८ ॥
मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्भीमपराक्रमः ।
शेते लोकविनाशाय तपोबलमुपाश्रितः ॥ ९ ॥
उत्तङ्कस्याश्रमाभ्याशे निःश्वसन् पावकार्चिषः ।
मधु और कैटभका वह भयंकर पराक्रमी पुत्र धुन्धु तपोबलका आश्रय ले सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेके लिये वहाँ मरुप्रदेशमें शयन करता था। उत्तङ्कके आश्रमके पास साँस ले-लेकर वह आगकी चिनगारियाँ फैलाता था ॥ ९ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु राजा सबलवाहनः ॥ १० ॥
उत्तङ्कविप्रसहितः कुवलाश्वो महीपतिः ।
पुत्रैः सह महीपालः प्रययौ भरतर्षभ ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसी समय राजा कुवलाश्वने अपनी सेना, सवारी तथा पुत्रोंके साथ प्रस्थान किया। उनके साथ विप्रवर उत्तंक भी थे ॥ १०-११ ॥
सहस्रैरेकविंशत्या पुत्राणामरिमर्दनः ।
कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो बलशालिनाम् ॥ १२ ॥
शत्रुमर्दन महाराज कुवलाश्व अपने इक्कीस हजार बलवान् पुत्रोंको साथ लेकर (सेनासहित) चले थे ॥ १२ ॥
तमाविशत् ततो विष्णुर्भगवान्तेजसा प्रभुः ।
उत्तङ्कस्य नियोगेन लोकानां हितकाम्यया ॥ १३ ॥
तदनन्तर उत्तंकके अनुरोधसे सम्पूर्ण जगत्का हित करनेके लिये सर्वसमर्थ भगवान् विष्णुने अपने तेजोमय स्वरूपसे कुवलाश्वमें प्रवेश किया ॥ १३ ॥
तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् ।
एष श्रीमानवध्योऽद्य धुन्धुमारो भविष्यति ॥ १४ ॥
उन दुर्धर्षवीर कुवलाश्वके यात्रा करनेपर देवलोकमें अत्यन्त हर्षपूर्ण कोलाहल होने लगा। देवता कहने लगे—'ये श्रीमान् नरेश अवध्य हैं, आज धुन्धुको मारकर ये' 'धुन्धुमार' नाम धारण करेंगे ॥ १४ ॥
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात् पर्यवारयन् । देवदुन्दुभयश्चापि नेदुः स्वयमनीरिताः ॥ १५ ॥ देवतालोग चारों ओरसे उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ स्वयं बिना किसी प्रेरणाके बज उठीं ॥ १५ ॥ शीतश्च वायुः प्रववौ प्रयाणे तस्य धीमतः । विपांसुलां महीं कुर्वन् ववर्ष च सुरेश्वरः ॥ १६ ॥ उन बुद्धिमान् राजा कुवलाश्वके यात्राकालमें शीतल वायु चलने लगी। देवराज इन्द्र धरतीकी धूल शान्त करनेके लिये वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥ अन्तरिक्षे विमानादि देवतानां युधिष्ठिर । तत्रैव समदृश्यन्त धुन्धुर्यत्र महासुरः ॥ १७ ॥ युधिष्ठिर! जहाँ महान् असुर 'धुन्धु' रहता था, वहीं आकाशमें देवताओंके विमान आदि दिखायी देने लगे ॥ कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः । देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन् महर्षयः ॥ १८ ॥
कुवलाश्व और धुन्धुका युद्ध देखनेके लिये उत्सुक हो देवताओं और गन्धर्वोंके साथ महर्षि भी आकर डट गये और वहाँकी सारी बातोंपर दृष्टिपात करने लगे ॥ १८ ॥ नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायितस्तदा । स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतो दिशम् ॥ १९ ॥ अर्णवं खानयामास कुवलाश्वो महीपतिः । कुरुनन्दन! उस समय भगवान् नारायणके तेजसे परिपुष्ट हो राजा कुवलाश्व अपने उन पुत्रोंके साथ वहाँ जा पहुँचे और शीघ्र ही चारों ओरसे उस बालुकामय समुद्रको खुदवाने लगे ॥ १९ १/२ ॥ कुवलाश्वस्य पुत्रैश्च तस्मिन् वै बालुकार्णवे ॥ २० ॥ सप्तभिर्दिवसैः खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महाबलः । कुवलाश्वके पुत्रोंने सात दिनोंतक खुदाई करनेके बाद उस बालुकामय समुद्रमें (छिपे हुए) महाबली धुन्धुको देखा ॥ २० १/२ ॥ आसीद् घोरं वपुस्तस्य बालुकान्तर्हितं महत् ॥ २१ ॥ दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ । बालूके भीतर छिपा हुआ उसका शरीर विशाल एवं भयंकर था। भरतश्रेष्ठ! वह अपने तेजसे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहा था ॥ २१ १/२ ॥ ततो धुन्धुर्महाराज दिशमावृत्य पश्चिमाम् ॥ २२ ॥ सुप्तोऽभूद् राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः । महाराज! तदनन्तर धुन्धु पश्चिम दिशाको घेरकर सो गया। नृपश्रेष्ठ! उसकी कान्ति प्रलयकालीन अग्निके समान जान पड़ती थी ॥ २२ १/२ ॥ कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारितः ॥ २३ ॥ अभिद्रुतः शरैस्तीक्ष्णैर्गदाभिर्मुसलैरपि । पट्टिशैः परिघैः प्रासैः खड्गैश्च विमलैः शितैः ॥ २४ ॥ स वध्यमानः संक्रुद्धः समुत्तस्थौ महाबलः । क्रुद्धश्चाभक्षयत् तेषां शस्त्राणि विविधानि च ॥ २५ ॥ उस समय राजा कुवलाश्वके पुत्रोंने सब ओरसे घेरकर उसपर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धारवाले खड्ग—इन सबके द्वारा चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया और उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको वह क्रोधी असुर खा गया ॥ २३—२५ ॥ आस्याद् वमन् पावकं स संवर्तकसमं तदा । तान् सर्वान् नृपतेः पुत्रानदहत् स्वेन तेजसा ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उसने अपने मुँहसे प्रलयकालीन अग्निके समान आगकी चिनगारियाँ उगलना आरम्भ किया और उन समस्त राजकुमारोंको अपने तेजसे जलाकर भस्म कर
दिया ।। २६ ।।
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्धर्तयन्निव ।
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः ।। २७ ।।
सगरस्यात्मजान् क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
नृपश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें भगवान् कपिलने कुपित होकर राजा सगरके सभी पुत्रोंको
क्षणभरमें दग्ध कर दिया था, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धुन्धुने, मानो वह सम्पूर्ण लोकोंको
नष्ट कर देना चाहता हो, अपने मुखसे आग प्रकट करके कुवलाश्वके पुत्रोंको जला दिया।
यह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई ।। २७ १/२ ।।
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम ।। २८ ।।
तं प्रबुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् ।
आससाद महातेजाः कुवलाश्वो महीपतिः ।। २९ ।।
भरतश्रेष्ठ! जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी
राजा कुवलाश्वने दूसरे कुम्भकर्णके* समान जगे हुए उस महाकाय दानवपर आक्रमण
किया ।। २८-२९ ।।
तस्य वारि महाराज सुस्राव बहु देहतः ।
तदापीय ततस्तेजो राजा वारिमयं नृप ।। ३० ।।
योगी योगेन वह्निं च शमयामास वारिणा ।
महाराज! उस समय धुन्धुके शरीरसे बहुत-सा जल प्रवाहित होने लगा, किंतु राजा
कुवलाश्वने योगी होनेके कारण योगबलसे उस जलमय तेजको पी लिया और जल प्रकट
करके धुन्धुकी मुखाग्निको बुझा दिया ।। ३० १/२ ।।
ब्रह्मास्त्रेण च राजेन्द्र दैत्यं क्रूरपराक्रमम् ।। ३१ ।।
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकभवाय वै ।
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् ।। ३२ ।।
सुरशत्रुममित्रघ्नं त्रैलोक्येश इवापरः ।
राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने
ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया। इस प्रकार
ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान् असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्व दूसरे
इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे ।। ३१-३२ १/२ ।।
धुन्धोर्वधात् तदा राजा कुवलाश्वो महामनाः ।। ३३ ।।
धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्नाप्रतिरथोऽभवत् ।
उस समय महामना राजा कुवलाश्व धुन्धुको मारनेके कारण 'धुन्धुमार' नामसे विख्यात
हो गये। उनका सामना करनेवाला वीर कोई नहीं रह गया था ।। ३३ १/२ ।।
प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा ॥ ३४ ॥
वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा ।
अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजन्! उनकी बात सुनकर कुवलाश्व अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले— ॥ ३४-३५ ॥
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जयः ।
सख्यं च विष्णुना मे स्याद् भूतेष्वद्रोह एव च ॥ ३६ ॥
‘देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करूँ, शत्रुओंके लिये दुर्जय बना रहूँ, भगवान् विष्णुके साथ सख्य भावसे मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणीके प्रति मेरे मनमें द्रोह न रह जाय ॥ ३६ ॥
धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाक्षयः ।
तथास्त्विति ततो देवैः प्रीतैरुक्तः स पार्थिवः ॥ ३७ ॥
‘धर्ममें मेरा सदा अनुराग हो और अन्तमें मेरा स्वर्गलोकमें नित्य निवास हो।' यह सुनकर देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा कुवलाश्वसे कहा—'महाराज! ऐसा ही होगा' ॥ ३७ ॥
ऋषिभिश्च सगन्धर्वैरुत्तङ्केन च धीमता ।
सम्भाष्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृप ॥ ३८ ॥
राजन्! तदनन्तर ऋषियों, गन्धर्वों और बुद्धिमान् महर्षि उत्तंकने भी नाना प्रकारके आशीर्वाद देते हुए राजासे वार्तालाप किया ॥ ३८ ॥
देवा महर्षयश्चापि स्वानि स्थानानि भेजिरे ।
तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा युधिष्ठिर तदाभवन् ॥ ३९ ॥
युधिष्ठिर! इसके बाद देवता और महर्षि अपने-अपने स्थानको चले गये। उस युद्धमें राजा कुवलाश्वके तीन ही पुत्र शेष रह गये थे ॥ ३९ ॥
दृढाश्वः कपिलाश्वश्च चन्द्राश्वश्चैव भारत ।
तेभ्यः परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥
वंशस्य सुमहाभाग राज्ञाममिततेजसाम् ।
भारत! उनके नाम थे—दृढाश्व, कपिलाश्व और चन्द्राश्व। राजन्! महाभाग! उन्हींसे अमित तेजस्वी इक्ष्वाकुवंशी महामना नरेशोंकी वंश-परम्परा चालू हुई ॥
एवं स निहतस्तेन कुवलाश्वेन सत्तम ॥ ४१ ॥
धुन्धुर्नाम महादैत्यो मधुकैटभयोः सुतः ।
कुवलाश्वश्च नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः ॥ ४२ ॥
सज्जनशिरोमणे! इस प्रकार मधुकैटभ-कुमार महादैत्य धुन्धु कुवलाश्वके हाथसे मारा गया और राजा कुवलाश्वकी धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि हुई ।। ४१-४२ ।।
नाम्ना च गुणसंयुक्तस्तदाप्रभृति सोऽभवत् ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ४३ ।।
धौन्धुमारमुपाख्यानं प्रथितं यस्य कर्मणा ।
तभीसे वे नरेश अपने नामके अनुसार वीरता आदि गुणोंसे युक्त हो भूमण्डलमें विख्यात हो गये। युधिष्ठिर! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह सारा धुन्धुमारोपाख्यान मैंने तुमसे कह सुनाया। जिनके पराक्रमसे इस उपाख्यानकी प्रसिद्धि हुई है उन नरेशका भी परिचय दे दिया ।। ४३ १/२ ।।
इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णोः समनुकीर्तनम् ।। ४४ ।।
शृणुयाद् यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नरः ।
आयुष्मान् भूतिमांश्चैव श्रुत्वा भवति पर्वसु ।
न च व्याधिभयं किंचित् प्राप्नोति विगतज्वरः ।। ४५ ।।
जो मनुष्य भगवान् विष्णुके कीर्तनरूप इस पवित्र उपाख्यानको सुनता है वह धर्मात्मा और पुत्रवान् होता है। जो पर्वोंपर इस कथाको सुनता है वह दीर्घायु तथा ऐश्वर्यशाली होता है। उसे रोग आदिका कुछ भी भय नहीं होता। उसकी सारी चिन्ताएँ दूर हो जाती हैं ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २०४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें
धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २०४ ।।
* यह मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके प्रति द्वापरके समय कहा हुआ वचन है। उन्होंने त्रेतामें हुए कुम्भकर्णकी उपमा दी है।
पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य
पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः
पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं सुदुर्विदम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनिसे धर्मविषयक प्रश्न किया, जो समझनेमें अत्यन्त कठिन था ॥ १ ॥
श्रोतुमिच्छामि भगवन् स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम् ।
कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥ २ ॥
वे बोले—‘भगवन्! मैं आपके मुखसे (पतिव्रता) स्त्रियोंके सूक्ष्म, धर्मसम्मत एवं उत्तम माहात्म्यका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम् ।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥ ३ ॥
पिता माता च भगवन् गुरुरेव च सत्तम् ।
यच्चान्यद् देवविहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥ ४ ॥
‘भगवन्! श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! इस जगत्में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, अग्नि, पिता, माता और गुरु—ये प्रत्यक्ष देवता दिखायी देते हैं। भृगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूपसे स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओंकी ही कोटिमें हैं’ ॥ ३-४ ॥
मान्या हि गुरवः सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः ।
पतिव्रतानां शुश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे ॥ ५ ॥
‘समस्त गुरुजन और पतिव्रता नारियाँ भी समादरके योग्य हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतिकी जैसी सेवा-शुश्रूषा करती हैं; वह दूसरे किसीके लिये मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है ॥ ५ ॥
पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो ।
निरुद्ध्य चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ ॥ ६ ॥
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्यः स्थिता हि याः ।
भगवन् दुष्करं त्वेतत् प्रतिभाति मम प्रभो ॥ ७ ॥
‘प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियोंकी महिमा सुनावें। निष्पाप सहर्ष! जो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई मनको वशमें करके अपने पतिका देवताके समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं। प्रभो! भगवन्! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है ॥ ६-७ ॥
मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज ।
स्त्रीणां धर्मात् सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् ॥ ८ ॥
‘ब्रह्मन्! पुत्रोंद्वारा माता-पिताकी सेवा तथा स्त्रियोंद्वारा की हुई पतिकी सेवा बहुत कठिन है। स्त्रियोंके इस कठोर धर्मसे बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखायी देता है॥ ८॥
साध्वाचाराः स्त्रियो ब्रह्मन् यत् कुर्वन्ति सदाऽऽदृताः ।
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरं मातरं च वै ॥ ९ ॥
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत ।
‘ब्रह्मन्! समाजमें सदा आदर पानेवाली सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान् कार्य करती हैं वह अत्यन्त कठिन है। जो लोग पिता-माताकी सेवा करते हैं उनका कर्म भी बहुत कठिन है। पतिव्रता तथा सत्यवादिनी स्त्रियाँ अत्यन्त कठोर धर्मका पालन करती हैं ॥ ९ १/२ ॥
कुक्षिणा दश मासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः ॥ १० ॥
नार्यः कालेन सम्भूय किमद्भुततरं ततः ।
‘स्त्रियाँ अपने उदरमें दस महीनेतक जो गर्भ धारण करती हैं और यथासमय उसको जन्म देती हैं, इससे अद्भुत कार्य और कौन होगा? ॥ १० १/२ ॥
संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि ॥ ११ ॥
प्रजायते सुतान् नार्यो दुःखेन महता विभो ।
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव ॥ १२ ॥
‘भगवन्! अपनेको भारी प्राणसंकटमें डालकर और अतुल वेदनाको सहकर नारियाँ बड़े कष्टसे संतान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेहसे उनका पालन भी करती हैं॥ ११-१२॥
याश्च क्रूरेषु सत्त्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः ।
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥ १३ ॥
‘जो सती-साध्वी स्त्रियाँ क्रूर स्वभावके पतियोंकी सेवामें रहकर उनके तिरस्कारका पात्र बनकर भी सदा अपने सती-धर्मका पालन करती रहती हैं, वह तो मुझे और भी अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है॥ १३॥
क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज ।
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मनाम् ॥ १४ ॥
‘ब्रह्मन्! आप मुझे क्षत्रियोंके धर्म और आचारका तत्त्व भी विस्तारपूर्वक बताइये। विप्रवर! जो क्रूर स्वभावके मनुष्य हैं, उनके लिये महात्माओंका धर्म अत्यन्त दुर्लभ है॥ १४॥
एतदिच्छामि भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदां वर ।
श्रोतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥ १५ ॥