मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय ३२ * | १२३ |
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| देवयान्युवाच | देवयानी बोली — शर्मिष्ठे ! तुमने मेरे अधीन होकर भी मुझे अप्रिय लगनेवाला बर्ताव क्यों किया ? तुम फिर उसी असुर-धर्मपर उतर आयी। क्या मुझसे नहीं डरती ? ॥ १९ ॥ | | मदधीना सती कस्मादकार्षीर्विप्रियं मम।<br>तमेवासुरधर्मं त्वमास्थिता न बिभेषि किम् ॥ १९ | | | शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठा बोली — मनोहर मुसकानवाली सखी ! मैंने जो ऋषि कहकर अपने स्वामीका परिचय दिया था, सो सत्य ही है। मैं न्याय और धर्मके अनुकूल आचरण करती हूँ, अतः तुमसे नहीं डरती। जब तुमने राजाका पतिरूपमें वरण किया था, उसी समय मैंने भी कर लिया। शोभने ! तुम ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ हो, ब्राह्मणपुत्री हो, अतः मेरे लिये माननीय एवं पूजनीय हो; परंतु ये राजर्षि मेरे लिये तुमसे भी अधिक पूजनीय हैं। क्या यह बात तुम नहीं जानती ? (शुभे ! तुम्हारे पिता और मेरे गुरु (शुक्राचार्यजी)-ने हम दोनोंको एक ही साथ महाराजकी सेवामें समर्पित किया है। तुम्हारे पति और पूजनीय महाराज ययाति भी मुझे पालन करने योग्य मानकर मेरा पोषण करते हैं।) ॥ २०–२२ ॥ | | यदुक्तमृषिरित्येव तत् सत्यं चारुहासिनि।<br>न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते ॥ २०<br><br>यदा त्वया वृतो राजा वृत एव तदा मया।<br>सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ॥ २१<br><br>पूज्यासि मम मान्या च श्रेष्ठा ज्येष्ठा च ब्राह्मणी।<br>त्वत्तो हि मे पूज्यतरो राजर्षिः किं न वेत्सि तत् ॥ २२ | | | शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं — शर्मिष्ठाका यह वचन सुनकर देवयानीने कहा—'राजन्! अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी। आपने मेरा अत्यन्त अप्रिय किया है।' ऐसा कहकर तरुणी देवयानी आँखोंमें आँसू भरकर सहसा उठी और तुरन्त ही शुक्राचार्यजीके पास जानेके लिये वहाँसे चल दी। यह देख उस समय राजा ययाति व्यथित हो गये। वे व्याकुल हो देवयानीको समझाते हुए उसके पीछे-पीछे गये, किंतु वह नहीं लौटी। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह राजासे कुछ न बोलकर केवल नेत्रोंसे आँसू बहाये जाती थी। कुछ ही देरमें वह कवि-पुत्र शुक्राचार्यके पास पहुँची। पिताको देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गयी। तदनन्तर राजा ययातिने भी शुक्राचार्यकी वन्दना की ॥ २३–२७ ॥ | | श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम्।<br>राजन् नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे त्वया कृतम् ॥ २३<br><br>सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम्।<br>तूर्णं सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥ २४<br><br>अनुवव्राज सम्भ्रान्तः पृष्टतः सान्त्वयन् नृपः।<br>न्यवर्तत न सा चैव क्रोधसंरक्तलोचना ॥ २५<br><br>अविब्रुवन्ती किंचिच्च राजानं साश्रुलोचना।<br>अचिरादेव सम्प्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥ २६<br><br>सा तु दृष्ट्वैव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता।<br>अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥ २७ | | | देवयान्युवाच | देवयानीने कहा — पिताजी ! अधर्मने धर्मको जीत लिया। नीचकी उन्नति हुई और उच्चकी अवनति। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मुझे लाँघकर आगे बढ़ गयी। इन महाराज ययातिसे ही उसके तीन पुत्र हुए हैं, किंतु तात ! मुझ भाग्यहीनाके दो ही पुत्र हुए हैं। यह मैं आपसे ठीक बता रही हूँ। भृगुश्रेष्ठ ! ये महाराज धर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध हैं, किंतु इन्होंने मर्यादाका उल्लङ्घन किया है। कवि-नन्दन ! यह मैं आपसे यथार्थ कह रही हूँ ॥ २८–३० ॥ | | अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम्।<br>शर्मिष्ठा यातिवृत्तास्ति दुहिता वृषपर्वणः ॥ २८<br><br>त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञानेन ययातिना।<br>दुर्भागाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते ॥ २९<br><br>धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह।<br>अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत् कथयामि ते ॥ ३० | |
३६- इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना
| १२४ | * मत्स्यपुराण * |
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| शुक्र उवाच<br>धर्मज्ञस्त्वं महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम्।<br>तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया॥ ३१ | शुक्राचार्यने (ययातिसे) कहा— महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है। इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी॥ ३१॥ | | ययातिरुवाच<br>ऋतुं यो याच्यमानाया न ददाति पुमान् वृतः।<br>भ्रूणहेत्युच्यते ब्रह्मन् स चेह ब्रह्मवादिभिः॥ ३२<br><br>ऋतुकामां स्त्रियं यस्तु गम्यां रहसि याचितः।<br>नोपैति यो हि धर्मेण ब्रह्महेत्युच्यते बुधैः॥ ३३<br><br>इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह।<br>अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान्॥ ३४ | ययाति बोले— भगवन्! दानवराजकी पुत्री मुझसे ऋतुदान माँग रही थी, अतः मैंने धर्मसम्मत मानकर यह कार्य किया, किसी दूसरे विचारसे नहीं। ब्रह्मन्! जो पुरुष न्याययुक्त ऋतुकी याचना करनेवाली स्त्रीको ऋतुदान नहीं देता, वह ब्रह्मवादी विद्वानोंद्वारा भ्रूण (गर्भ)-की हत्या करनेवाला कहा जाता है। जो न्यायसम्मत कामनासे युक्त गम्या स्त्रीके द्वारा एकान्तमें प्रार्थना करनेपर उसके साथ समागम नहीं करता, वह धर्मशास्त्रके विद्वानोंद्वारा गर्भ या ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला बताया जाता है। (ब्रह्मन्! मेरा यह व्रत है कि मुझसे कोई जो भी वस्तु माँगे, उसे वह अवश्य दे दूँगा। आपके ही द्वारा मुझे सौंपी हुई शर्मिष्ठा इस जगत्में दूसरे किसी पुरुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती थी; अतः उसकी इच्छा पूर्ण करना धर्म समझकर मैंने वैसा किया है। आप इसके लिये मुझे क्षमा करें।) भृगुश्रेष्ठ! इन्हीं सब कारणोंका विचार करके अधर्मके भयसे उद्विग्न हो मैं शर्मिष्ठाके पास गया था॥ ३२-३४॥ | | शुक्र उवाच<br>न त्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव।<br>मिथ्याचरणधर्मेषु चौर्यं भवति नाहूष॥ ३५ | शुक्राचार्यने कहा— राजन्! तुम्हें इस विषयमें मेरे आदेशका भी ध्यान रखना चाहता था; क्योंकि तुम मेरे अधीन हो। नहुषनन्दन! धर्ममें मिथ्या आचरण करनेवाले पुरुषको चोरीका पाप लगता है॥ ३५॥ | | शौनक उवाच<br>क्रोधेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा।<br>पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत॥ ३६ | शौनकजी कहते हैं— क्रोधमें भरे हुए शुक्राचार्यके शाप देनेपर नहुष-पुत्र राजा ययाति उसी समय पूर्वावस्था (यौवन)-का परित्याग करके तत्काल बूढ़े हो गये॥ ३६॥ | | ययातिरुवाच<br>अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह।<br>प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं मा विशेत माम्॥ ३७ | ययाति बोले— भृगुश्रेष्ठ! मैं देवयानीके साथ युवावस्थामें रहकर तृप्त नहीं हो सका हूँ, अतः ब्रह्मन्! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे यह बुढ़ापा मेरे शरीरमें प्रवेश न करे॥ ३७॥ | | शुक्र उवाच<br>नाहं मृषा वदाम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप।<br>जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन् संक्रामय यदिच्छसि॥ ३८ | शुक्राचार्यने कहा— भूमिपाल! मैं झूठ नहीं बोलता। बूढ़े तो तुम हो ही गये, किंतु तुम्हें इतनी सुविधा देता हूँ कि यदि चाहो तो किसी दूसरेसे जवानी लेकर इस बुढ़ापाको उसके शरीरमें डाल सकते हो॥ ३८॥ | | ययातिरुवाच<br>राज्यभाक् स भवेद् ब्रह्मन् पुण्यभाक् कीर्तिभाक् तथा।<br>यो दद्यान्मे वयः शुक्र तद् भवाननुमन्यताम्॥ ३९ | ययाति बोले— ब्रह्मन्! मेरा जो पुत्र अपनी युवावस्था मुझे दे, वही पुण्य और कीर्तिका भागी होनेके साथ ही मेरे राज्यका भी भागी हो। शुक्राचार्यजी! आप इसका अनुमोदन करें॥ ३९॥ |
| * अध्याय ३३ * | १२५ |
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| शुक्र उवाच | शुक्राचार्यने कहा— नहुषनन्दन! तुम भक्तिभावसे मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्थाका इच्छानुसार दूसरेके शरीरमें संचार कर सकोगे। उस दशामें तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा। साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक संतानोंसे युक्त होगा॥ ४०-४१॥ | | संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज।<br>मामनुध्याय तत्त्वेन न च पापमवाप्स्यसि॥ ४०<br>वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति।<br>आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च॥ ४१ | |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिचरित नामक बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३२॥
तैंतीसवाँ अध्याय
ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| शौनक उवाच<br>जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि।<br>पुत्रं ज्येष्ठं वरिष्ठं च यदुमित्यब्रवीद् वचः॥ १ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! राजा ययाति बुढ़ापा लेकर वहाँसे अपने नगरमें आये और अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र यदुसे इस प्रकार बोले—॥ १॥ |
| ययातिरुवाच<br>जरा बली च मां तात पलितानि च पर्यगुः।<br>काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने॥ २<br>त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयान्हम्॥ ३<br>पूर्णे वर्षसहस्रे तु त्वदीयं यौवनं त्वहम्।<br>दत्त्वा सम्प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह॥ ४ | ययातिने कहा— तात! कवि-पुत्र शुक्राचार्यके शापसे मुझे बुढ़ापेने घेर लिया, मेरे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और बाल सफेद हो गये, किंतु मैं अभी जवानीके भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। यदो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा विषयोंका उपभोग करूँ। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी देकर बुढ़ापेके साथ अपना दोष वापस ले लूँगा॥ २-४॥ |
| यदुरुवाच<br>सितश्मश्रुधरो दीनो जरसा शिथिलीकृतः।<br>बलीसंततगात्रश्च दुर्दर्शो दुर्बलः कृशः॥ ५<br>अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवने।<br>सहोपजीविभिश्चैव तज्जरां नाभिकामये॥ ६<br>सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप।<br>जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ पुत्रमन्यं वृणीष्व वै॥ ७ | यदु बोले— महाराज! मैं उस बुढ़ापेको लेनेकी इच्छा नहीं करता, जिसके आनेपर दाढ़ी-मूँछके बाल सफेद हो जाते हैं, जीवनका आनन्द चला जाता है। वृद्धावस्था सर्वथा शिथिल कर देती है। सारे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और मनुष्य इतना दुर्बल तथा कृशकाय हो जाता है कि उसकी ओर देखते नहीं बनता। बुढ़ापेमें काम-काज करनेकी शक्ति नहीं रहती, युवतियाँ तथा जीविका पानेवाले सेवक भी तिरस्कार करते हैं, अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता। धर्मज्ञ नरेश्वर! आपके बहुत-से पुत्र हैं, जो आपको मुझसे भी अधिक प्रिय हैं; अतः बुढ़ापा लेनेके लिये आप अपने किसी दूसरे पुत्रको चुन लीजिये॥ ५-७॥ |
३७- ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना
१२६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>पापान्मातुलसम्बन्धाद् दुष्प्रजा ते भविष्यति॥ ८<br>तुर्वसो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>यौवनेन चरेयं वै विषयांस्तव पुत्रक॥ ९<br>पूर्Readणे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम्।<br>तथैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह॥ १० | ययातिने कहा— तात! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न (औरस पुत्र) होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते हो, इसलिये इस पापके कारण तुम्हारी संतान मामाके अनुचित सम्बन्धद्वारा उत्पन्न होकर दुष्प्रजा कहलायेगी। (अब उन्होंने तुर्वसुको बुलाकर कहा—) 'तुर्वसो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष ले लो। बेटा! मैं तुम्हारी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर मैं तुम्हें जवानी लौटा दूँगा और बुढ़ापेसहित अपने दोषको वापस ले लूँगा'॥ ८—१०॥ |
| तुर्वसुरुवाच<br>न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम्।<br>बलरूपान्तकरणीं बुद्धिमानविनाशिनीम्॥ ११ | तुर्वसु बोले— तात! काम-भोगका नाश करनेवाली वृद्धावस्था मुझे नहीं चाहिये। वह बल तथा रूपका अन्त कर देती है और बुद्धि एवं मान-प्रतिष्ठाका भी नाश करनेवाली है॥ ११॥ |
| ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>तस्मात् प्रजासमुच्छेदं तुर्वसो तव यास्यति॥ १२<br>संकीर्णाश्चोधर्मेषु प्रतिलोमचरेषु च।<br>पिशिताशिषु लोकेषु नूनं राजा भविष्यसि॥ १३<br>गुरुदारप्रसक्तेषु तिर्यग्योनिरतेषु च।<br>पशुधर्मिषु म्लेच्छेषु पापेषु प्रभविष्यसि॥ १४ | ययातिने कहा— तुर्वसो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते हो, इसलिये तुम्हारी संतति नष्ट हो जायगी। मूढ़! जिनके आचार और धर्म वर्णसंकरोंके समान हैं, जो प्रतिलोम—संकर जातियोंमें गिने जाते हैं तथा जो कच्चा मांस खानेवाले एवं चाण्डाल आदिकी श्रेणीमें हैं, ऐसे (यवनादिसे अधिष्ठित आट्टादि देशोंके) लोगोंके तुम राजा होगे। जो गुरु-पत्नियोंमें आसक्त हैं, जो पशु-पक्षी आदिका-सा आचरण करनेवाले हैं तथा जिनके सारे आचार-विचार भी पशुओंके समान हैं, तुम उन पापात्मा म्लेच्छोंके राजा होगे॥ १२—१४॥ |
| शौनक उवाच<br>एवं स तुर्वसुं शप्त्वा ययातिः सुतमात्मनः।<br>शर्मिष्ठायाः सुतं ज्येष्ठं द्रुह्युं वचनमब्रवीत्॥ १५ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! राजा ययातिने इस प्रकार अपने पुत्र तुर्वसुको शाप देकर शर्मिष्ठाके ज्येष्ठ पुत्र द्रुह्युसे यह बात कही—॥ १५॥ |
| ययातिरुवाच<br>द्रुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम्।<br>जरां वर्षसहस्रं मे यौवनं स्वं प्रयच्छताम्॥ १६<br>पूर्Readणे वर्षसहस्रे तु ते प्रदास्यामि यौवनम्।<br>स्वं चादास्यामि भूयोऽहं पाप्मानं जरया सह॥ १७ | ययातिने कहा— द्रुह्यो! कान्ति तथा रूपका नाश करनेवाली यह वृद्धावस्था तुम ले लो और एक हजार वर्षोंके लिये अपनी जवानी मुझे दे दो। हजार वर्ष पूर्ण हो जानेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी तुम्हें दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष फिर ले लूँगा॥ १६-१७॥ |
| द्रुह्युरुवाच<br>न राज्यं न रथं नाश्वं जीर्णो भुङ्क्ते न च स्त्रियम्।<br>न रागश्चास्य भवति तज्जरां ते न कामये॥ १८ | द्रुह्यु बोले— पिताजी! बूढ़ा मनुष्य न तो राज्य-सुखका अनुभव कर सकता है, न घोड़े और रथपर ही चढ़ सकता है। वह स्त्रीका भी उपभोग नहीं कर सकता। उसके हृदयमें राग-प्रेम उत्पन्न ही नहीं होता; अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता॥ १८॥ |
| ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>तद् द्रुह्यो वै प्रियः कामो न ते सम्पत्स्यते क्वचित्॥ १९ | ययातिने कहा— द्रुह्यो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी जवानी मुझे नहीं दे रहे हो, इसलिये तुम्हारा प्रिय मनोरथ कभी नहीं सिद्ध होगा। |
३८- ययाति और अष्टकका संवाद
| * अध्याय ३३ * | १२७ |
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| नौरूपप्लवसंचारो यत्र नित्यं भविष्यति।<br>अराजभोजशब्दं त्वं तत्र प्राप्स्यसि सान्वयः॥ २०<br><br>ययातिरुवाच<br>अनो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>एकं वर्षसहस्रं तु चरेयं यौवनेन ते॥ २१<br><br>अनुरुवाच<br>जीर्णः शिशुरिवादत्तेऽकालेऽन्नमशुचिर्यथा।<br>न जुहोति च कालेऽग्निं तां जरां नाभिकामये॥ २२<br><br>ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>जरादोषस्त्वयोक्तो यस्तस्मात् त्वं प्रतिपद्यसे॥ २३<br><br>प्रजाश्च यौवनं प्राप्ता विनश्यन्ति ह्यनो तव।<br>अग्निप्रस्कन्दनगतस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि॥ २४॥<br><br>ययातिरुवाच<br>पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>त्वं मे प्रियतरः पुत्रस्त्वं वरीयान् भविष्यसि॥ २५<br><br>जरा बली च मां तात पलितानि च पर्यगुः।<br>काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने॥ २६<br><br>किञ्चित्कालं चरेयं वै विषयान् वयसा तव।<br>पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रतिदास्यामि यौवनम्।<br>स्वं चैव प्रतिपत्स्येऽहं पाप्मानं जरया सह॥ २७<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा।<br>यथात्थ त्वं महाराज तत् करिष्यामि ते वचः॥ २८<br><br>प्रतिपत्स्यामि ते राजन् पाप्मानं जरया सह।<br>गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान् यथेप्सितान्॥ २९ | (जहाँ घोड़े जुते हुए उत्तम रथों, घोड़ों, हाथियों, पीठकों, पालकियों, गदहों, बकरों, बैलों और शिबिका आदिकी भी गति नहीं है) जहाँ प्रतिदिन (केवल) नावपर ही बैठकर घूमना-फिरना होगा, ऐसे (पञ्चनदके निचले) प्रदेशमें तुम अपनी संतानोंके साथ चले जाओगे और वहाँ तुम्हारे वंशके लोग राजा नहीं, भोज कहलायेंगे॥ १९-२०॥<br><br>तदनन्तर ययातिने अनुसे कहा—अनो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष-पाप ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा एक हजार वर्षतक सुखसे चलते-फिरते आनन्द भोगूँगा॥ २१॥<br><br>अनु बोले—पिताजी! बूढ़ा मनुष्य बच्चोंकी तरह असमयमें भोजन करता है, अपवित्र रहता है तथा समयपर अग्निहोत्र आदि कर्म नहीं करता, अतः वैसी वृद्धावस्थाको मैं नहीं लेना चाहता॥ २२॥<br><br>ययातिने कहा—अनो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहे हो और बुढ़ापेके दोष बतला रहे हो, अतः तुम वृद्धावस्थाके समस्त दोषोंको प्राप्त करोगे और तुम्हारी संतान जवान होते ही मर जायगी तथा तुम भी बूढ़े-जैसे होकर अग्निहोत्रका त्याग कर दोगे॥ २३-२४॥<br><br>तत्पश्चात् ययातिने पूरुसे कहा—पूरो! तुम मेरे अत्यधिक प्रिय पुत्र हो। गुणोंमें तुम श्रेष्ठ होओगे। तात! मुझे बुढ़ापेने घेर लिया, सब अङ्गोंमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और सिरके बाल सफेद हो गये। बुढ़ापेके ये सारे चिह्न मुझे एक ही साथ प्राप्त हुए हैं। कवि-पुत्र शुक्राचार्यके शापसे मेरी यह दशा हुई है; किंतु मैं जवानीके भोगोंसे अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ। पूरो! (तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोष-पापको ले लो और) मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ कालतक विषयोंका उपभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष ले लूँगा॥ २५-२७॥<br><br>शौनकजी कहते हैं—ययातिके ऐसा कहनेपर पूरुने अपने पितासे विनयपूर्वक कहा—'महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचनका मैं पालन करूँगा। (गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन मनुष्योंके लिये पुण्य, स्वर्ग तथा आयु प्रदान करनेवाला है। गुरुके ही प्रसादसे इन्द्रने तीनों लोकोंका शासन किया है। गुरुस्वरूप पिताकी अनुमति प्राप्त करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है।) राजन्! मैं बुढ़ापेके साथ आपका दोष ग्रहण कर लूँगा। आप मुझसे जवानी ले लें और इच्छानुसार विषयोंका उपभोग करें। |
१२८ * मत्स्यपुराण *
| जरयाहं प्रतिच्छन्नो वयोरूपधरस्तव ।<br>यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथेच्छया ॥ ३० ॥ | मैं वृद्धावस्थासे आच्छादित हो आपकी आयु एवं रूप धारण करके रहूँगा और आपको जवानी देकर आप मेरे लिये जो आज्ञा देंगे, उसका पालन करूँगा ॥ २८–३० ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिचरित नामक तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! पूरुके ऐसा कहनेपर राजर्षि ययातिने महान् व्रतपरायण शुक्राचार्यका स्मरण कर अपने महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपनी वृद्धावस्थाका संक्रमण कराया (और उसकी युवावस्था स्वयं ले ली)। नहुषके पुत्र नरश्रेष्ठ ययातिने पूरुकी युवावस्थासे अत्यन्त प्रसन्न होकर अभीष्ट विषय-भोगोंका सेवन आरम्भ किया। उन राजेन्द्रकी जैसी कामना होती, जैसा उत्साह होता और जैसा समय होता, उसके अनुसार वे सुखपूर्वक धर्मानुकूल भोगोंका उपभोग करते थे। वास्तवमें उसके योग्य वे ही थे। उन्होंने यज्ञोंद्वारा देवताओंको, श्राद्धोंसे पितरोंको, इच्छाके अनुसार अनुग्रह करके दीन-दुःखियोंको और मुँहमाँगी भोग्य वस्तुएँ देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया। वे अतिथियोंको अन्न और जल देकर, वैश्योंको उनके धन-वैभवकी रक्षा करके, शूद्रोंको दयाभावसे, लुटेरोंको कैद करके तथा सम्पूर्ण प्रजाको धर्मपूर्वक संरक्षणद्वारा प्रसन्न रखते थे। इस प्रकार साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान राजा ययातिने समस्त प्रजाका पालन किया। वे राजा सिंहके समान पराक्रमी और नवयुवक थे। सम्पूर्ण विषय उनके अधीन थे और वे धर्मका विरोध न करते हुए उत्तम सुखका उपभोग करते थे। वे नरेश शुभ भोगोंको प्राप्त करके पहले तो तृप्त एवं आनन्दित होते थे, परंतु जब यह बात ध्यानमें आती कि ये हजार वर्ष भी पूरे हो जायेंगे, तब उन्हें बड़ा खेद होता था। कालतत्त्वको जाननेवाले पराक्रमी राजा ययाति एक-एक कला और काष्ठाकी गिनती कर एक हजार वर्षके समयकी अवधिका स्मरण रखते थे। जब उन्होंने देखा कि अब समय पूरा हो गया, तब वे अपने पुत्र पूरुके पास आकर बोले—'शत्रुदमन पुत्र ! मैंने तुम्हारी जवानीके द्वारा अपनी रुचि, उत्साह और समयके अनुसार विषयोंका सेवन किया; परंतु विषयोंकी कामना उन विषयोंके उपभोगसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु घीकी आहुति पड़नेसे अग्निकी भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। | | एवमुक्तः स राजर्षिः काव्यं स्मृत्वा महाव्रतम् ।<br>संक्रामयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि ॥ १ | | | पौरवेणाथ वयसा ययातिर्नहुषात्मजः ।<br>प्रीतियुक्तो नरश्रेष्ठश्चचार विषयान् प्रियान् ॥ २ | | | यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् ।<br>धर्माविरुद्धान् राजेन्द्रो यथार्हति स एव हि ॥ ३ | | | देवानतर्पयद् यज्ञैः श्राद्धैरपि पितामहान् ।<br>दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान् ॥ ४ | | | अतिथीन्नन्नपानैश्च विशश्च प्रतिपालनैः ।<br>अनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून् निग्रहणेन च ॥ ५ | | | धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन् ।<br>ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ ६ | | | स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः ।<br>अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम् ॥ ७ | | | स सम्प्राप्य शुभान् कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः ।<br>कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः ॥ ८ | | | परिचिन्त्य स कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् ।<br>पूर्णं मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह ॥ ९ | | | न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।<br>हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १० | |
* अध्याय ३४ *
| यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।<br>नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ ११<br>यथासुखं यथोत्साहं यथाकाममरिंदम।<br>सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव॥ १२<br>पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम्।<br>राज्यं चैव गृहाणेदं त्वं हि मे प्रियकृत् सुतः॥ १३ | इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्यके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं, ऐसा मानकर शान्ति धारण कर लेना चाहिये। पूरो ! तुम्हारा भला हो, मैं प्रसन्न हूँ। तुम अपनी यह जवानी ले लो। साथ ही यह राज्य भी अपने अधिकारमें कर लो; क्योंकि तुम मेरा प्रिय करनेवाले पुत्र हो' ॥ १–१३॥ |
| शौनक उवाच<br>प्रतिपेदे जरां राजा ययातिर्नाहुषस्तदा।<br>यौवनं प्रतिपेदे स पूरुः स्वं पुनरात्मनः ॥ १४<br>अभिषेक्तुकामं च नृपं पूरुं पुत्रं कनीयसम्।<br>ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन् ॥ १५<br>कथं शुक्रस्य दौहित्रं देवयान्याः सुतं प्रभो।<br>ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरोः प्रदास्यसि ॥ १६<br>ज्येष्ठो यदुस्तव सुतस्तुर्वसुस्तदनन्तरम्।<br>शर्मिष्ठायाः सुतो द्रुह्युस्तथानुः पूरुरेव च॥ १७<br>कथं ज्येष्ठमतिक्रम्य कनीयान् राज्यमर्हति।<br>एतत् सम्बोधयामस्त्वां स्वधर्ममनुपालय ॥ १८ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! उस समय नहुषनन्दन राजा ययातिने अपनी वृद्धावस्था वापस ले ली और पूरुने पुनः अपनी युवावस्था प्राप्त कर ली। जब ब्राह्मण आदि वर्णोंने देखा कि महाराज ययाति अपने छोटे पुत्र पूरुको राजाके पदपर अभिषिक्त करना चाहते हैं, तब उनके पास आकर इस प्रकार बोले—'प्रभो! शुक्राचार्यके नाती और देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुके होते हुए उन्हें लाँघकर आप पूरुको राज्य क्यों देते हैं? यदु आपके ज्येष्ठ पुत्र हैं। उनके बाद तुर्वसु उत्पन्न हुए। तदनन्तर शर्मिष्ठाके पुत्र क्रमशः द्रुह्यु, अनु और पूरु हैं। ज्येष्ठ पुत्रोंका उल्लङ्घन करके छोटा पुत्र राज्यका अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको इस बातका स्मरण दिला रहे हैं। आप धर्मका पालन कीजिये'॥ १४–१८॥ |
| ययातिरुवाच<br>ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः।<br>ज्येष्ठं प्रति यतो राज्यं न देयं मे कथंचन ॥ १९<br>मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः।<br>प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ॥ २०<br>मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः।<br>स पुत्रः पुत्रवद् यश्च वर्तते पितृमातृषु ॥ २१<br>यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि वा।<br>द्रुह्युणा चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम् ॥ २२<br>पूरुणा मे कृतं वाक्यं मानितश्च विशेषतः।<br>कनीयान् मम दायादो जरा येन धृता मम ॥ २३<br>मम कामः स च कृतः पूरुणा पुत्ररूपिणा।<br>शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम् ॥ २४<br>पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः।<br>भवन्तः प्रतिजानन्तु पूरुं राज्येऽभिषिच्यताम् ॥ २५ | **ययातिने कहा—**ब्राह्मण आदि सब वर्णके लोग मेरी बात सुनें, मुझे ज्येष्ठ पुत्रको किसी तरह राज्य नहीं देना है। मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदुने मेरी आज्ञाका पालन नहीं किया है। जो पिताके प्रतिकूल हो, वह सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें पुत्र नहीं माना गया है। जो माता और पिताकी आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है, उनके अनुकूल चलता है तथा माता-पिताके प्रति पुत्रोचित बर्ताव करता है, वही वास्तवमें पुत्र है। यदुने मेरी अवहेलना की है, तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनुने भी मेरा बड़ा तिरस्कार किया है। (और) पूरुने मेरी आज्ञाका पालन किया, मेरी बातको अधिक आदर दिया है, इसीने मेरा बुढ़ापा ले रखा था; अतः मेरा यह छोटा पुत्र ही वास्तवमें मेरे राज्य और धनको पानेका अधिकारी है। पूरुने पुत्ररूप होकर मेरी कामनाएँ पूर्ण की हैं। स्वयं शुक्राचार्यने मुझे वर दिया है कि 'जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करे वही राजा एवं समस्त भूमण्डलका पालक हो।' अतः मैं आपलोगोंसे विनयपूर्ण आग्रह करता हूँ कि पूरुको ही राज्यपर अभिषिक्त करें॥ १९–२५॥ |
३९- अष्टक और ययातिका संवाद
| १३० | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| प्रकृतय ऊचुः<br>यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा।<br>सर्वं सोऽर्हति कल्याणं कनीयानपि स प्रभुः॥ २६<br>अहं पूरोरिदं राज्यं यः प्रियः प्रियकृत् तव।<br>वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम्॥ २७<br><br>शौनक उवाच<br>पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा।<br>अभिषिच्य ततः पूरुं राज्ये स्वसुतमात्मजम्॥ २८<br>दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः।<br>पुरात् स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह॥ २९<br>यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः सुताः।<br>द्रुह्योश्चैव सुता भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः॥ ३०<br>पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव।<br>इदं वर्षसहस्रात् तु राज्यं कुरु कुलागतम्॥ ३१ | **प्रजावर्गके लोग बोले—**जो पुत्र गुणवान् और सदा माता-पिताका हितैषी हो, वह छोटा होनेपर भी श्रेष्ठतम है। वही सम्पूर्ण कल्याणका भागी होने योग्य है। पूरु आपका प्रिय करनेवाले पुत्र हैं, अतः शुक्राचार्यके वरदानके अनुसार ये ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं। इस निश्चयके विरुद्ध अब कुछ भी उत्तर नहीं दिया जा सकता॥ २६-२७॥<br><br>**शौनकजी कहते हैं—**नगर और राज्यके लोगोंने संतुष्ट होकर जब इस प्रकार कहा, तब नहुषनन्दन ययातिने अपने पुत्र पूरुको ही अपने राज्यपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार पूरुको राज्य दे वनवासकी दीक्षा लेकर राजा ययाति तपस्वी ब्राह्मणोंके साथ नगरसे बाहर निकल गये। यदुसे यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए, तुर्वसुकी संतान (सीमन्तसे लेकर यूनानतकके निवासी) यवन कहलायी, द्रुह्युके पुत्र भोज नामसे प्रसिद्ध हुए और अनुसे म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुईं। राजन्! पूरुसे पौरव वंश चला, जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो। हजारों वर्षोंसे यह राज्य कुरुकुलमें सम्मिलित हो गया है, अर्थात् यह कुरुवंश नामसे प्रसिद्ध हो गया है॥ २८-३१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ययातिचरिते चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति
| शौनक उवाच<br>एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम्।<br>राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः॥ १<br>उषित्वा वनवासं स ब्राह्मणैः सह संश्रितः।<br>फलमूलाशनो दान्तो यथा स्वर्गमितो गतः॥ २<br>स गतः स्वर्गवासं तु न्यवसन्मुदितः सुखी।<br>कालस्य नातिमहतः पुनः शक्रेण पातितः॥ ३<br>विवशः प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम्।<br>स्थितश्चासीदन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया॥ ४<br>तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतिः।<br>राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान्।<br>प्रतर्दनेन शिबिना समेत्य किल संसदि॥ ५ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! इस प्रकार नहुषनन्दन राजा ययाति अपने प्रिय पुत्र पूरुका राज्याभिषेक करके प्रसन्नतापूर्वक वानप्रस्थ मुनि हो गये। वे वनमें ब्राह्मणोंके साथ रहकर कठोर व्रतका पालन करते हुए फल-मूलका आहार तथा मन और इन्द्रियोंका संयम करते थे, इससे वे स्वर्गलोकमें गये। स्वर्गलोकमें जाकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और बहुत कालके बाद इन्द्रद्वारा वे पुनः स्वर्गसे नीचे गिरा दिये गये। स्वर्गसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर गिरते समय वे भूतलतक नहीं पहुँचे, आकाशमें ही स्थिर हो गये, ऐसा मैंने सुना है। फिर यह भी सुननेमें आया है कि वे पराक्रमी राजा ययाति मुनिसमाजमें राजा वसुमान्, अष्टक, प्रतर्दन और शिबिसे मिलकर पुनः वहींसे साधु पुरुषोंके सङ्गके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चले गये॥ १—५॥ |
* अध्याय ३५ * १३१
| शतानीक उवाच | |
|---|---|
| कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः।<br>कथमिन्द्रेण भगवन् पातितो मेदिनीतले॥ ६<br><br>सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>कथ्यमानं त्वया विप्र देवर्षिगणसंनिधौ॥ ७<br><br>देवराजसमो ह्यासीद् ययातिः पृथिवीपतिः।<br>वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः॥ ८<br><br>तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तेर्महात्मनः।<br>श्रोतुमिच्छामि देवेश दिवि चेह च सर्वशः॥ ९ | शतानीकने पूछा— भगवन्! किस कर्मसे वे भूपाल पुनः स्वर्गमें पहुँचे थे? तथा इन्द्रने उन्हें भूतलपर क्यों ढकेल दिया था? विप्रवर! मैं ये सारी बातें पूर्णरूपसे यथावत् सुनना चाहता हूँ। इन ब्रह्मर्षियोंके समीप आप इस प्रसंगका वर्णन करें। कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले अग्निके समान तेजस्वी राजा ययाति देवराज इन्द्रके समान थे। उनका यश चारों ओर फैला था। देवेश! मैं उन सत्यकीर्ति महात्मा ययातिका चरित्र, जो इहलोक और स्वर्गलोकमें सर्वत्र प्रसिद्ध है, सुनना चाहता हूँ॥ ६–९॥ |
| शौनक उवाच | |
| हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमां कथाम्।<br>दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १०<br><br>ययातिर्नाहुषो राजा पूरुं पुत्रं कनीयसम्।<br>राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रवव्राज वनं तदा॥ ११<br><br>अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुत्रान् यदुपुरोगमान्।<br>फलमूलाशनो राजा वनेऽसौ न्यवसच्चिरम्॥ १२<br><br>स जितात्मा जितक्रोधस्तर्पयन् पितृदेवताः।<br>अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन् वानप्रस्थविधानतः॥ १३<br><br>अतिथीन् पूजयन् नित्यं वन्येन हविषा विभुः।<br>शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः॥ १४<br><br>पूर्णं सहस्रं वर्षाणामेवंवृत्तिरभून्नृपः।<br>अम्बुभक्षः स चाब्दांस्त्रीनासीन्नियतवाङ्मनः॥ १५<br><br>ततस्तु वायुभक्षोऽभूत् संवत्सरमतन्द्रितः।<br>पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे संवत्सरं पुनः॥ १६<br><br>एकपादस्थितश्चासीत् षण्मासाननिलाशनः।<br>पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्गं जगामावृत्य रोदसी॥ १७ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! ययातिकी उत्तम कथा इहलोक और स्वर्गलोकमें भी पुण्यदायक है। यह सब पापोंका नाश करनेवाली है, मैं तुमसे उसका वर्णन करता हूँ। नहुष-पुत्र महाराज ययातिने अपने छोटे पुत्र पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके यदु आदि अन्य पुत्रोंको सीमान्त (किनारेके देशों)-में रख दिया। फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ वे वनमें चले गये। वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए उन्होंने दीर्घकालतक निवास किया। उन्होंने अपने मनको शुद्ध करके क्रोधपर विजय पायी और प्रतिदिन देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करते हुए वानप्रस्थाश्रमकी विधिसे शास्त्रीय विधानके अनुसार अग्निहोत्र प्रारम्भ किया। वे राजा शिलोञ्छवृत्तिका आश्रय ले यज्ञशेष अन्नका भोजन करते थे। भोजनसे पूर्व वनमें उपलब्ध होनेवाले फल, मूल आदि हविष्यके द्वारा अतिथियोंका आदर-सत्कार करते थे। राजाको इसी वृत्तिसे रहते हुए पूरे एक हजार वर्ष बीत गये। उन्होंने मन और वाणीपर संयम करके तीन वर्षोंतक केवल जलका आहार किया। तत्पश्चात् वे आलस्यरहित हो एक वर्षतक केवल वायु पीकर रहे। फिर एक वर्षतक पाँच अग्नियोंके बीच बैठकर तपस्या की। इसके बाद छह महीनेतक हवा पीकर वे एक पैरसे खड़े रहे। तदनन्तर पुण्यकीर्ति महाराज ययाति पृथ्वी और आकाशमें अपना यश फैलाकर स्वर्गलोकमें चले गये॥ १०—१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३५॥
१३२ * मत्स्यपुराण *
छत्तीसावाँ अध्याय
इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शौनक उवाच<br>स्वर्गतस्तु स राजेन्द्रो न्यवसद् देवसद्मनि।<br>पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा॥ १<br>देवलोकाद् ब्रह्मलोकं स चरन् पुण्यकृद् वशी।<br>अवसत् पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः॥ २<br>स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागतः।<br>कथान्ते तत्र शक्रेण पृष्टः स पृथिवीपतिः॥ ३ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! स्वर्गलोकमें जाकर महाराज ययाति देव-भवनमें निवास करने लगे। वहाँ देवताओं, साध्यगणों, मरुद्गणों तथा वसुओंने उनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। पुण्यात्मा तथा जितेन्द्रिय राजा वहाँ देवलोकसे ब्रह्मलोकतक भ्रमण करते हुए दीर्घकालतक रहे—ऐसी पौराणिक परम्परा है। एक दिन नृपश्रेष्ठ ययाति देवराज इन्द्रके पास आये। वार्तालापके अन्तमें इन्द्रने राजा ययातिसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–३॥ |
| शक्र उवाच<br>यदा स पूरुस्तव रूपेण राज-<br>ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार लोके।<br>तदा राज्यं सम्प्रदायैवमस्मै<br>त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम्॥ ४ | **इन्द्रने पूछा—**राजन्! जिस समय पूरु आपसे वृद्धावस्था लेकर आपके स्वरूपसे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगा, सत्य कहिये, उस समय राज्य देकर आपने उसको क्या आदेश दिया था?॥ ४॥ |
| ययातिरुवाच<br>प्रकृत्यनुमते पूरुं राज्ये कृत्वेदमब्रुवम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोऽयं विषयस्तव।<br>मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्तेऽधिपास्तव॥ ५<br>अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट-<br>स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः।<br>अमानुषेभ्यो मानुषश्च प्रधानो<br>विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः॥ ६<br>आक्रोशमानो नाक्रोशेन्मन्युमेव तितिक्षति।<br>आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति॥ ७<br>नारंतुदः स्यान्न नृशंसवादी<br>न हीनतः परमभ्याददीत।<br>ययास्य वाचा पर उद्विजेत<br>न तां वदेद् रुशतीं पापलौल्याम्॥ ८ | **ययातिने कहा—**देवराज! मैंने प्रजाओंकी अनुमतिसे पूरुको राज्याभिषिक्त करके उससे यह कहा था कि 'बेटा! गङ्गा और यमुनाके बीचका यह सारा प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें रहेगा। यह पृथ्वीका मध्य भाग है, इसके तुम राजा होओगे और तुम्हारे भाई सीमान्त देशोंके अधिपति होंगे।' देवेन्द्र! (इसके बाद मैंने यह उपदेश दिया कि मनुष्यको चाहिये कि वह दीनता, शठता और क्रोध न करे। कुटिलता, मात्सर्य और वैर कहीं न करे। माता, पिता, विद्वान्, तपस्वी तथा क्षमाशील पुरुषका बुद्धिमान् मनुष्य कभी अपमान न करे। शक्तिशाली पुरुष सदा क्षमा करता है। शक्तिहीन मनुष्य सदा क्रोध करता है। दुष्ट मानव साधु पुरुषसे और दुर्बल अधिक बलवान्से द्वेष करता है। कुरूप मनुष्य रूपवान्से, निर्धन धनवान्से, अकर्मण्य कर्मनिष्ठसे और अधार्मिक धर्मात्मासे द्वेष करते हैं। इसी प्रकार गुणहीन मनुष्य गुणवान्से डाह रखता है। इन्द्र! यह कलिका लक्षण है।) क्रोध करनेवालोंसे वह पुरुष श्रेष्ठ है जो कभी क्रोध नहीं करता। इसी प्रकार असहनशीलसे सहनशील उत्तम है, मनुष्येतर प्राणियोंसे मनुष्य श्रेष्ठ है और मूर्खोंसे विद्वान् उत्तम है। यदि कोई किसीकी निन्दा करता या उसे गाली देता है तो वह भी बदलेमें निन्दा या गाली-गलौज न करे; क्योंकि जो गाली या निन्दा सह लेता है, उस पुरुषका आन्तरिक दुःख ही गाली देनेवाले या अपमान करनेवालेको जला डालता है। साथ ही उसके पुण्यको भी वह ले लेता है। क्रोधवश किसीके मर्म-स्थानमें |
| * अध्याय ३६ * | १३३ |
|---|
| अरंतुदं पुरुषं तीव्रवाचं<br>वाक्कण्टकैर्विंतुदन्तं मनुष्यान्।<br>विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां<br>मुखे निबद्धं निर्ऋतिं वहन्तम्॥ ९<br><br>सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात्<br>सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात्।<br>सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत्<br>सतां वृत्तं पालयन् साधुवृत्तः॥ १०<br><br>वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति<br>यैराहतः शोचति रात्र्यहानि।<br>परस्य वा मर्मसु ते पतन्ति<br>तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु॥ ११<br><br>नास्तीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।<br>यथा मैत्री च लोकेषु दानं च मधुरा च वाक्॥ १२<br><br>तस्मात् सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित्।<br>पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्नाभिशापं कदाचन॥ १३ | चोट न पहुँचाये (ऐसा बर्ताव न करे, जिससे किसीको मार्मिक पीड़ा हो)। किसीके प्रति कठोर बात भी मुँहसे न निकाले, अनुचित उपायसे शत्रुको भी वशमें न करे। जो जीको जलानेवाली हो, जिससे दूसरेको उद्वेग होता हो ऐसी बात मुँहसे न बोले; क्योंकि पापीलोग ही ऐसी बातें बोला करते हैं। जो स्वभावका कठोर हो, दूसरोंके मर्ममें चोट पहुँचाता हो, तीखी बातें बोलता हो और कठोर वचनरूपी काँटोंसे दूसरे मनुष्यको पीड़ा देता हो, उसे अत्यन्त लक्ष्मीहीन (दरिद्र या अभागा) समझे। उसको देखना भी बुरा है; क्योंकि वह कड़वी बोलीके रूपमें अपने मुँहमें बँधी हुई एक पिशाचिनीको ढो रहा है। (अपना बर्ताव और व्यवहार ऐसा रखे, जिससे) साधु पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ-पीछे भी उनके द्वारा अपनी रक्षा हो। दुष्ट लोगोंकी कही हुई अनुचित बातें सदा सह लेनी चाहिये तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके सदाचारका आश्रय लेकर साधु पुरुषोंके व्यवहारको ही अपनाना चाहिये। दुष्ट मनुष्योंके मुखसे कटुवचनरूपी बाण सदा छूटते रहते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है। वे वाग्बाण दूसरोंके मर्मस्थानोंपर ही चोट करते हैं; अतः विद्वान् पुरुष दूसरेके प्रति ऐसी कठोर वाणीका प्रयोग न करे। सभी प्राणियोंके प्रति दया और मैत्रीका बर्ताव, दान और सबके प्रति मधुर वाणीका प्रयोग—तीनों लोकोंमें इनके समान कोई वशीकरण नहीं है। इसलिये कभी कठोर वचन न बोले। सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले। पूजनीय पुरुषोंका पूजन (आदर-सत्कार) करे। दूसरोंको दान दे और स्वयं कभी किसीसे कुछ न माँगे॥ ५—१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३६॥
४०- ययाति और अष्टकका आश्रमधर्म-सम्बन्धी संवाद
१३४ * मत्स्यपुराण *
सैंतीसवाँ अध्याय
ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना
| इन्द्र उवाच<br>सर्वाणि कार्याणि समाप्य राजन्<br>गृहान् परित्यज्य वनं गतोऽसि।<br>तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र<br>केनासि तुल्यस्तपसा ययाते॥ १ | इन्द्रने कहा—राजन्! आप सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे; अतः नहुषपुत्र ययाते! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप तपस्यामें किसके समान हैं?॥ १॥ |
|---|---|
| ययातिरुवाच<br>नाहं देवमनुष्येषु न गन्धर्वमहर्षिषु।<br>आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव॥ २ | ययातिने कहा—इन्द्र! मैं न तो देवताओं एवं मनुष्योंमें तथा न गन्धर्वों और महर्षियोंमें ही किसीको ऐसा देख रहा हूँ जो तपस्यामें मेरे समान हो (अर्थात् मैं तपमें अद्वितीय हूँ)॥ २॥ |
| इन्द्र उवाच<br>यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च<br>पापीयसश्चाविदितप्रभावः ।<br>तस्माल्लोका ह्यन्तवन्तस्तवेमे<br>क्षीणे पुण्ये पतितोऽस्यद्य राजन्॥ ३ | इन्द्र बोले—राजन्! आपने अपने समान, अपने-से बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः आपके इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) आपका पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब आप यहाँसे नीचे गिरेंगे॥ ३॥ |
| ययातिरुवाच<br>सुरर्षिगन्धर्वनरावमानात्<br>क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः।<br>इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनः<br>सतां मध्ये पतितुं देवराज॥ ४ | ययातिने कहा—देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ॥ ४॥ |
| इन्द्र उवाच<br>सतां सकाशे पतितोऽसि राजं-<br>श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः।<br>एवं विदित्वा तु पुनर्ययाते<br>न तेऽवमान्याः सदृशः श्रेयसे च॥ ५ | इन्द्र बोले—राजन् ययाति! आप यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके ही समीप गिरेंगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लेंगे; किंतु यह सब जानकर आप फिर (आगे) कभी अपनी बराबरीवाले तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान मत कीजियेगा॥ ५॥ |
| शौनक उवाच<br>ततः पपातामरराजजुष्टात्<br>पुण्याल्लोकात् पतमानं ययातिम्।<br>सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त-<br>मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता॥ ६ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग कर राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ एवं उत्तम धर्मविधिके पालक अष्टकने उन्हें गिरते देखा। (तब) उन्होंने उन (ययाति)-से (इस प्रकार) कहा॥ ६॥ |
| अष्टक उवाच<br>कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः<br>स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः।<br>पतस्युदीर्णाम्बुधरप्रकाशः<br>खे खेचराणां प्रवरो यथार्कः॥ ७ | अष्टकने पूछा—'इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष आप कौन हैं? आप अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान आप कैसे गिर रहे हैं? |
| * अध्याय ३८ * | १३५ |
|---|
| दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं<br>वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम्।<br>किं नु स्विदेतत् पततीव सर्वे<br>वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः॥ ८<br>दृष्ट्वा च त्वाधिष्ठितं देवमार्गे<br>शक्रार्कविष्णुप्रतिप्रभावम् ।<br>प्रत्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे<br>तस्मात् पाते तव जिज्ञासमानाः॥ ९<br>न चापि त्वां धृष्णवः प्रष्टुमग्रे<br>न चत्वमस्मान् पृच्छसि के वयं स्म।<br>तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप<br>कस्य त्वं वा किं निमित्तं त्वमागाः॥ १०<br>भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ<br>त्यजाशु देवेन्द्रसमानरूप।<br>त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे<br>शक्रो न सोढुं बलहापि शक्तः॥ ११<br>सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां<br>सतां सदैवामरराजकल्प।<br>ते सङ्गताः स्थावरजङ्गमेशाः<br>प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु॥ १२<br>प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः।<br>प्रभुः सूर्यः प्रकाशाच्च सतां चाभ्यागतः प्रभुः॥ १३ | आपका तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। आप अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हैं। आपको सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित (आश्चर्यचकित) होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि यह क्या गिर रहा है ? आप इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हैं। आपको आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये आपके निकट आये हैं कि आपके पतनका यथार्थ कारण क्या है। हम पहले आपसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और आप भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते कि हम कौन हैं। इसलिये मैं ही आपसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवाले महापुरुष! आप किसके पुत्र हैं और किसलिये यहाँ आये हैं? इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! आपका भय दूर हो जाना चाहिये। अब आपको (स्वर्गसे गिरनेका) विषाद और मोह भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय आप संतोंके समीप विद्यमान हैं। बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब आपका तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं। देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वञ्चित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जङ्गम—सभी प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। आप अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हैं। जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, उसी प्रकार संतोंका स्वामित्व—उनपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिको ही प्राप्त है'॥ ७—१३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते ययातिपतनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
ययाति और अष्टकका संवाद
| ययातिरुवाच<br>अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रः<br>पूरोः पिता सर्वभूतावमानात्।<br>प्रभ्रंशितोऽहं सुरसिद्धलोकात्<br>परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः॥ १ | **ययातिने कहा—**महात्मन्! मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता ययाति हूँ। समस्त प्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो गया है। इस कारण मैं देवताओं तथा सिद्धोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ। |
४१- अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना
१३६ * मत्स्यपुराण *
| अहं हि पूर्वो वयसा भवद्ध्य-<br>स्तेनाभिवादं भवतां न युञ्जे।<br>यो विद्यया तपसा जन्मना वा<br>वृद्धः स वै सम्भवति द्विजानाम्॥ २ | मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है वही पूजनीय माना जाता है॥ १-२॥ |
| अष्टक उवाच<br>अवादीस्त्वं वयसास्मि वृद्ध<br>इति वै राजन्नधिकः कथंचित्।<br>यो वै विद्वांस्तपसा च वृद्धः<br>स एव पूज्यो भवति द्विजानाम्॥ ३ | **अष्टक बोले—**राजन्! आपने जो यह कहा है कि मैं अवस्थामें बड़ा हूँ, इसलिये ज्येष्ठ हूँ, सो इसमें आप कुछ अधिक कह गये; क्योंकि द्विजोंमें जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा होता है, वही पूज्य माना जाता है॥ ३॥ |
| ययातिरुवाच<br>प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-<br>स्तद्दर्त्तिनां प्रवणं पापलोकम्।<br>सन्तोऽसतो नानुवर्तन्त ते वै<br>यदात्मनैषां प्रतिकूलवादी॥ ४ | **ययातिने कहा—**पापको पुण्यकर्मोंका नाशक बताया जाता है। वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है। श्रेष्ठ पुरुष दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका अनुसरण नहीं करते। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे। |
| अभूद् धनं मे विपुलं महत् वै<br>विचेष्टमानोऽधिगन्ता तदस्मि।<br>एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो<br>यो वर्तते स विजानाति धीरः॥ ५ | मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था, किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। मेरी इस दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और धीर है। |
| नानाभावा बहवो जीवलोके<br>दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः।<br>तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो<br>दिष्टं बलीय इति मत्वात्मबुद्ध्या॥ ६ | इस जीव-जगत्में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे |
| सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं<br>दैवाधीनं विन्दति नात्मशक्त्या।<br>तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ७ | 'प्रारब्ध ही बलवान् है'—यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको न प्राप्त हो। जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह उसे प्रारब्ध (भाग्य)-से ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं; अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे। |
| दुःखे न तप्येत सुखे न हृष्येत्<br>समेन वर्तेत सदैव धीरः।<br>दिष्टं बलीय इति मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ८ | दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो। |
| भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित्<br>संतापे मे मानसो नास्ति कश्चित्।<br>धाता यथा मां विदधाति लोके<br>ध्रुवं तदाहं भवितेति मत्वा॥ ९ | अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा वैसे ही रहूँगा। |
| संस्वेदजा ह्याण्डजा ह्युद्भिदश्च<br>सरीसृपाः कृमयोऽप्यप्सु मत्स्याः।<br>तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वं<br>दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते॥ १० | स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ—ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं। |
| * अध्याय ३८ * | १३७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा<br>कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम्।<br>किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये<br>तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः॥ ११ | अष्टक! मैं सुख तथा दुःख—दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतस न होऊँ—इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ, अतः सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ॥ ४–११॥ |
| शौनक उवाच<br>एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-<br>मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत्।<br>मातामहं सर्वगुणोपपन्नं<br>यत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत्॥ १२ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, जैसे मानो स्वर्गलोकमें हों। जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया॥ १२॥ |
| अष्टक उवाच<br>ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्रे प्रधाना-<br>स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथा च।<br>तन्मे राजन् ब्रूहि सर्वं यथावत्<br>क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मम्॥ १३ | अष्टकने कहा—महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक वहाँके सुखोंका भली-भाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये। राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं॥ १३॥ |
| ययातिरुवाच<br>राजाहमासं त्विह सार्वभौम-<br>स्ततो लोकान् महतश्चार्जयं वै।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १४ | ययातिने कहा—अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोंद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोतक (सुखपूर्वक) निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा। |
| ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां<br>सहस्रद्वारां शतयोजनान्ताम्।<br>अध्यावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १५ | वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया। |
| ततो दिव्यमजरं प्राप्य लोकं<br>प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् ।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १६ | तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्यलोकमें जा पहुँचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया। |
| देवस्य देवस्य निवेशने च<br>विजित्य लोकान् न्यवसं यथेष्टम्।<br>सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-<br>स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम्॥ १७ | वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था। |
| तथावसं नन्दने कामरूपी<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>सहाप्सरोभिर्विचरन् पुण्यगन्धान्<br>पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान्॥ १८ | इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे। |
४२- राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना
| १३८ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं<br>कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम्।<br>दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो<br>ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण॥ १९<br>एतावन्मे विदितं राजसिंह<br>ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः।<br>वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणा-<br>मनुक्रोशाच्छोचतां मां नरेन्द्र॥ २०<br>अकस्माद् वै क्षीणपुण्यो ययातिः<br>पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः।<br>तानब्रुवं पतमानस्तदाहं<br>सतां मध्ये निपतेयं कथं नु॥ २१<br>तैराख्यातं भवतां यज्ञभूमिं<br>समीक्ष्य चैनामहमागतोऽस्मि।<br>हविर्गन्धैर्दर्शितां यज्ञभूमिं<br>धूमापाङ्गं परिगृह्य प्रतीताम्॥ २२ | वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला—‘गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ।’ राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा। नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी—‘अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं!’ तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा—‘देवताओ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है?’ तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूप्रप्रान्तका अवलोकन कर मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है॥ १४—२२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरितेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३८॥
उन्तालीसवाँ अध्याय
अष्टक और ययातिका संवाद
| अष्टक उवाच<br>यदा वसन् नन्दने कामरूपे<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>किं कारणं कार्तयुगप्रधानं<br>हित्वा तद् वै वसुधामन्वपद्यः॥ १<br>ययातिरुवाच<br>ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो यो यथेह<br>क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि।<br>तथा स्वर्गे क्षीणपुण्यं मनुष्यं<br>त्यजन्ति सद्यः खचरा देवसंघाः॥ २<br>अष्टक उवाच<br>कथं तस्मिन् क्षीणपुण्या भवन्ति<br>सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम्।<br>किं विशिष्ठाः कस्य धामोपयान्ति<br>तद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे॥ ३ | अष्टकने पूछा— सत्ययुगके निष्पाप राजाओंमें प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसार रूप धारण करके दस लाख वर्षोंतक नन्दनवनमें निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है कि आप उसे छोड़कर भूतलपर चले आये?॥ १॥<br>ययाति बोले— जैसे इस लोकमें जाति-भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो, धन नष्ट हो जानेपर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं, उसी प्रकार स्वर्गलोकमें जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है, उस मनुष्यको देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देते हैं॥ २॥<br>अष्टकने पूछा— देवलोकमें मनुष्योंके पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है। प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट (अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले) पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे ज्ञानी जान पड़ते हैं॥ ३॥ |
* अध्याय ३९ * <span style="float: right;">१३९</span>
| ययातिरुवाच<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>लालप्यमाना नरदेव सर्वे।<br>ते कङ्कगोमायुपलाशनाथं<br>क्षितौ विवृद्धिं बहुधा प्रयान्ति॥ ४<br>तस्मादेवं वर्जनीयं नरेन्द्र<br>दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म।<br>आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेतद्<br>भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि॥ ५ | **ययाति बोले—**नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्यकर्मोंका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं। इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया; बोलो, अब तुम्हें क्या बताऊँ॥ ४-५॥ | | अष्टक उवाच<br>यदा तु तांस्ते वितुदन्ते वयांसि<br>तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>त्वत्तो भौमं नरकमहं शृणोमि॥ ६ | **अष्टकने पूछा—**जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, मयूर और पतङ्ग—ये नोच-नोचकर खा लेते हैं तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? आज मैं आपके ही मुखसे (प्रथम बार) भौम नरकका (जिसे कभी नहीं सुना था) नाम सुन रहा हूँ॥ ६॥ | | ययातिरुवाच<br>ऊर्ध्वं देहात् कर्मणो जृम्भमाणाद्<br>व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति।<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान्॥ ७<br>षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि<br>तथाशीतिं चैव तु वत्सराणाम्।<br>तान् वै तुदन्ते प्रपतन्तः प्रयातान्<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः॥ ८ | **ययाति बोले—**कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते। कितने ही प्राणी स्वर्गादि लोकोंमें साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजार वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं। यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंको तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस (दुष्ट प्राणी) अत्यन्त पीड़ा देते हैं॥ ७-८॥ | | अष्टक उवाच<br>यदेतांस्ते सम्पतन्तस्तुदन्ति<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>कथंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ९ | **अष्टकने पूछा—**तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरते हुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसे युक्त होते हैं? और गर्भमें कैसे आते हैं?॥ ९॥ | | ययातिरुवाच<br>असृग्रेतःपुष्परसानुयुक्त-<br>मन्वेति सद्यः पुरुषेण सृष्टम्।<br>तद्वै तस्या रज आपद्यते च<br>स गर्भभूतः समुपैति तत्र॥ १०<br>वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति<br>अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम्।<br>चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्वं<br>एवंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ११ | **ययाति बोले—**अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी असृक् (रक्त) होता है। फिर वही क्रमशः नूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है। (फिर) वह पुष्पके रससे संयुक्त होकर कर्मानुरूप योनिका अनुसरण करता है। गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्ग होनेपर वीर्यमें आविष्ट हुआ वह जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है। तदनन्तर वही गर्भरूपमें परिणत हो जाता है। जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश करते हैं तथा जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इस प्रकार वे भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं॥ १०-११॥ |
| १४० | * मत्स्यपुराण * |
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| अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमें आता है या दूसरा शरीर धारण करता है? आप यह रहस्य मुझे बताइये। मैं संशय होनेके कारण पूछता हूँ। गर्भमें आनेपर वह भिन्न-भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंको तथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछनेपर ये सब बातें आप बताइये। तात! हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) मानते हैं॥ १२-१३॥ | | अन्यद्वपुर्विदधातीह गर्भे<br>उताहोस्वित् स्वेन कामेन याति।<br>आपद्यमानो नरयोनिमेता-<br>माचक्ष्व मे संशयात् पृच्छतस्त्वम्॥ १२<br>शरीरदेहादिसमुच्छ्रयं च<br>चक्षुः श्रोत्रे लभते केन संज्ञाम्।<br>एतत् सर्वं तात आचक्ष्व पृष्टः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां मन्यमाना हि सर्वे॥ १३ | | | ययातिरुवाच | ययाति बोले— ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लेता है और वह वहाँ उसपर अधिकार जमाकर क्रमशः गर्भकी वृद्धि करता रहता है। वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न हो जाता है तब चेतनाका आश्रय ले योनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूप देखता है, नासिकासे गन्ध लेता है, जिह्वासे रसका आस्वादन करता है, त्वचासे स्पर्श और मनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महान् आत्मबलसे सम्पन्न प्राणधारियोंके शरीरमें जीवकी स्थापना होती है॥ १४—१६॥ | | वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि-<br>मृतौ रेतः पुष्परसानुयुक्तम्।<br>स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः<br>क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम्॥ १४<br>स जायमानोऽथ गृहीतगात्रः<br>संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः।<br>स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं<br>स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च॥ १५<br>घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च<br>त्वचा स्पर्शं मनसा देवभावम्।<br>इत्यष्टकेहोपचितं हि विद्धि<br>महात्मनः प्राणभृतः शरीरे॥ १६ | | | अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जलमें बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाता है। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है?॥ १७॥ | | यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा<br>निखन्यते वापि निकृष्यते वा।<br>अभावभूतः स विनाशमेत्य<br>केनात्मानं चेतयते पुरस्तात्॥ १७ | | | ययातिरुवाच | ययाति बोले— राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर उसी पुण्य-पापके अनुसार अन्य योनिको प्राप्त होता है। पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य-योनिमें और पाप करनेवाले मनुष्य पाप-योनिमें जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतङ्ग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब विषयोंको विस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती। | | हित्वा सोऽसून सुम्वन्निष्ठितत्वात्<br>पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं च।<br>अन्यां योनिं पुण्यपापानुसारां<br>हित्वा देहं भजते राजसिंह॥ १८<br>पुण्यां योनिं पुण्यकृतो विशन्ति<br>पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति।<br>कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा-<br>न्र मे विवक्षास्ति महानुभाव॥ १९ | |
* अध्याय ३९ * १४१
| चतुष्पदा द्विपदाः पक्षिणश्च<br>तथाभूता गर्भभूता भवन्ति।<br>आख्यातमेतन्निखिलं हि सर्वं<br>भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह॥ २०॥ | नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चार पैरवाले (चतुष्पाद), दो पैरवाले मनुष्यादि और पक्षियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं। यह सब मैंने पूरा-पूरा बतला दिया। अब और क्या पूछना चाहते हो?॥ १८–२०॥ |
| अष्टक उवाच<br>किंस्वित् कृत्वा लभते तात संज्ञां<br>मर्त्यः श्रेष्ठां तपसा विद्यया वा।<br>तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव-<br>च्छुभॉल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण॥ २१॥ | अष्टकने पूछा— तात! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम यश प्राप्त करता है? वह यश तपसे प्राप्त होता है या विद्यासे? मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्मके द्वारा क्रमशः श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थ-रूपसे बताइये॥ २१॥ |
| ययातिरुवाच<br>तपश्च दानं च शमो दमश्च<br>ह्रीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा।<br>स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो<br>द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम्॥ २२॥<br>सर्वाणि चैतानि यथोदितानि<br>तपः प्रधानान्यभिमर्षकेण ।<br>नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः<br>पुंसः सदैवति वदन्ति सन्तः॥ २३॥<br>अधीयानः पण्डितम्मन्यमानो<br>यो विद्यया हन्ति यशः परस्य।<br>तस्यान्तवन्तः पुरुषस्य लोका<br>न चास्य तद् ब्रह्मफलं ददाति॥ २४॥<br>चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि<br>भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि।<br>पानाग्निहोत्रमुत मानमौनं<br>मानेनाधीतमुत मानयज्ञः॥ २५॥<br>न मान्यमानो मुदमाददीत<br>न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात्।<br>सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके<br>नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते॥ २६॥<br>इति दद्यादिति यजेदित्यधीयीत मे श्रुतम्।<br>इत्येतान्यभयान्याहुस्तान्यवर्ज्यानि नित्यशः॥ २७॥<br>ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं<br>मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम्।<br>तन्निःश्रेयस्तेन संयोगमेत्य<br>परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह॥ २८॥ | ययाति बोले— राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हैं। उनके नाम ये हैं—तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसे आच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है। जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरोंके यशका नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् (विनाशशील) होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता। अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ—ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं; परंतु वे ही ठीकसे न किये जायँ, दूषित भावसे अनुष्ठित हों तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं। विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो, अपमानित होनेपर संतस न हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषोंको 'यह सत्पुरुष है' ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती। ऐसा दान देना चाहिये, इस प्रकार यजन करना चाहिये, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहना चाहिये—ये सभी वचन अभयदायक हैं, अतः नित्य पालनीय हैं—ऐसा मैंने सुना है। जो सबका आश्रय है, पुराण (कूटस्थ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है, वह (परब्रह्म परमात्मा) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं वे उस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होते हैं॥ २२–२८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३९॥
४३- ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा
१४२ * मत्स्यपुराण *
चालीसवाँ अध्याय
ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अष्टक उवाच<br>चरन् गृहस्थः कथमेति देवान्<br>कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा।<br>वानप्रस्थः सत्पथे सन्निविष्टो<br>बहून्यस्मिन् सम्प्रति वेदयन्ति॥ १ | अष्टकने पूछा— महाराज! वेदज्ञ विद्वान् इस धर्मके अन्तर्गत बहुत-से कर्मोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका द्वार बताते हैं, अतः मैं आपसे पूछता हूँ कि आचार्यकी सेवा करनेवाला ब्रह्मचारी, गृहस्थ, सन्मार्गमें स्थित वानप्रस्थ और संन्यासी किस प्रकार धर्माचरण करके उत्तम लोकमें जाते हैं?॥ १॥ |
| ययातिरुवाच<br>आहूताध्यायी गुरुकर्मसु चोद्यतः<br>पूर्वोत्थायी चरमं चाथ शायी।<br>मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः<br>स्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी॥ २<br><br>धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत<br>दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च।<br>अनाददानश्च परैरदत्तं<br>सैषा गृहस्थोपनिषत् पुराणी॥ ३<br><br>स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो<br>दाता परेभ्यो न परोपतापी।<br>तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां<br>वसन्मरण्ये नियताहारचेष्टः॥ ४<br><br>अशिल्पजीवी विगृहश्च नित्यं<br>जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रमुक्तः।<br>अनोकशायी लघु लिप्समान-<br>श्चरन् देशानेकाम्बरः स भिक्षुः॥ ५<br><br>रात्र्या यया चाभिरताश्च लोका<br>भवन्ति कामाभिजिताः सुखेन च।<br>तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा-<br>नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा॥ ६<br><br>दशैव पूर्वान् दशचापरांस्तु<br>ज्ञातींस्तथात्मानमथैकविंशम्।<br>अरण्यवासी सुकृतं दधाति<br>मुक्त्वा त्वरण्ये स्वशरीरधातून्॥ ७ | ययाति बोले— शिष्यको उचित है कि गुरुके बुलानेपर उसके समीप जाकर पढ़े, गुरुकी सेवामें बिना कहे लगा रहे, रातमें गुरुजीके सो जानेके बाद सोवे और सबेरे उनसे पहले ही उठ जाय। वह मृदुल (विनम्र), जितेन्द्रिय, धैर्यवान्, सावधान और स्वाध्यायशील हो। इस नियमसे रहनेवाला ब्रह्मचारी सिद्धिको पाता है। गृहस्थ पुरुष न्यायसे प्राप्त हुए धनको पाकर उससे यज्ञ करे, दान दे और सदा अतिथियोंको भोजन करावे। दूसरोंकी वस्तु उनके दिये बिना ग्रहण न करे। यह गृहस्थधर्मका प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है। वानप्रस्थ मुनि वनमें निवास करे। आहार और विहारको नियमित रखे। अपने ही पराक्रम एवं परिश्रमसे जीवन-निर्वाह करे, पापसे दूर रहे। दूसरोंको दान दे और किसीको कष्ट न पहुँचाये। ऐसा मुनि परम मोक्ष (सिद्धि)-को प्राप्त होता है। संन्यासी शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह न करे। वह शम, दम आदि श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो, सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखे, सबसे अलग रहे, गृहस्थके घरमें न सोये, परिग्रहका भार न लेकर अपनेको हलका रखे, थोड़ा-थोड़ा चले और अकेला ही अनेक स्थानोंमें भ्रमण करता रहे। ऐसा संन्यासी ही वास्तवमें भिक्षु कहलाने योग्य है। जिस समय रूप, रस आदि विषय तुच्छ प्रतीत होने लगें, इच्छानुसार जीत लिये जायँ तथा उनके परित्यागमें ही सुख जान पड़े, उसी समय विद्वान् पुरुष मनको वशमें करके समस्त संग्रहोंका त्याग कर वनवासी होनेका प्रयत्न करे। जो वनवासी मुनि वनमें ही अपने पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग करता है, वह दस पीढ़ी पूर्वके और दस पीढ़ी बादके जाति-भाइयोंको तथा इक्कीसवें अपनेको भी पुण्यलोकोंमें पहुँचा देता है॥ २—७॥ |