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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
* अध्याय ४३ *१५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
च्छित्त्वा बाहुसहस्रं ते प्रथमं तरसा बली।<br>तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वां स वधिष्यति भार्गवः॥ ४३हरण कर लेगा। भृगुकुलमें उत्पन्न एक तपस्वी एवं बलवान् ब्राह्मण पहले तुम्हारी सहस्रों भुजाओंको काटकर फिर तुम्हारा वध कर देगा'॥ २९—४३॥
सूत उवाच<br>तस्य रामस्तदा त्वासीन्र्मृत्युः शापेन धीमतः।<br>वरश्चैवं तु राजर्षेः स्वयमेव वृतः पुरा॥ ४४<br>तस्य पुत्रशतं त्वासीत् पञ्च तत्र महारथाः।<br>कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो महाबलाः॥ ४५<br>शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टः क्रोष्टुस्तथैव च।<br>जयध्वजश्च वैकर्ता अवन्तिश्च विशांपते॥ ४६<br>जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजङ्घो महाबलः।<br>तस्य पुत्रशतान्येव तालजङ्घा इति श्रुताः॥ ४७<br>तेषां पञ्च कुलाः ख्याता हैहयानां महात्मनाम्।<br>वीतिहोत्राश्च शार्याता भोजाश्चावन्तयस्तथा॥ ४८<br>कुण्डिकेराश्च विक्रान्तास्तालजङ्घास्तथैव च।<br>वीतिहोत्रसुतश्चापि आनर्तो नाम वीर्यवान्।<br>दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामित्रकर्शनः॥ ४९<br>सद्भावेन महाप्राज्ञः प्रजा धर्मेण पालयन्।<br>कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान्॥ ५०<br>येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही।<br>यस्तस्य कीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानवः॥ ५१<br>न तस्य वित्तनाशः स्यान्नष्टं च लभते पुनः।<br>कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः।<br>यथावत् स्विष्टपूतात्मा स्वर्गलोके महीयते॥ ५२**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार उस शापके कारण परशुरामजी उसकी मृत्युके कारण तो अवश्य हुए, परंतु पूर्वकालमें उस राजर्षिने स्वयं ही ऐसे वरका वरण किया था। राजन्! सहस्रार्जुनके पुत्र तो एक सौ हुए, परंतु उनमें पाँच महारथी थे। उनके अतिरिक्त शूरसेन, शूर, धृष्ट, क्रोष्टु, जयध्वज, वैकर्ता और अवन्ति—ये सातों अस्त्रविद्यामें निपुण, बलवान्, शूरवीर, धर्मात्मा और महान् पराक्रमशाली थे। जयध्वजका पुत्र महाबली तालजङ्घ हुआ। उसके एक सौ पुत्र हुए जो तालजङ्घके नामसे विख्यात हुए। हैहयवंशी इन महात्मा नरेशोंका कुल विभक्त होकर पाँच भागोंमें विख्यात हुआ। उनके नाम हैं—वीतिहोत्र, शार्यात, भोज, आवन्ति तथा पराक्रमी कुण्डिकेर। ये ही तालजङ्घके भी नामसे प्रसिद्ध थे। वीतिहोत्रका पुत्र प्रतापी आनर्त (गुजरातका शासक) हुआ। उसका पुत्र दुर्जय हुआ जो शत्रुओंका विनाशक था। अमित बुद्धिसम्पन्न एवं सहस्रभुजाधारी कृत्तवीर्य-नन्दन राजा अर्जुन सद्भावना एवं धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन करता था। उसने अपने धनुषके बलसे सागरपर्यन्त पृथ्वीपर विजय पायी थी। जो मानव प्रातःकाल उठकर उसका नाम स्मरण करता है उसके धनका नाश नहीं होता और यदि नष्ट हो गया है तो पुनः प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य कार्तवीर्य अर्जुनके जन्म-वृत्तान्तको कहता है उसका आत्मा यथार्थरूपसे पवित्र हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें प्रशंसित होता है॥ ४४—५२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे सहस्रार्जुनचरिते त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें सहस्रार्जुनचरित नामक तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४३॥

१५४ * मत्स्यपुराण *

चौवालीसवाँ अध्याय

कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन

ऋषय ऊचुः<br>किमर्थं तद् वनं दग्धमापवस्य महात्मनः।<br>कार्तवीर्येण विक्रम्य सूत प्रब्रूहि तत्त्वतः॥ १<br>रक्षिता स तु राजर्षिः प्रजानामिति नः श्रुतम्।<br>स कथं रक्षिता भूत्वा अदहत् तत् तपोवनम्॥ २ऋषियोंने पूछा—सूतजी! कार्तवीर्यने बलपूर्वक महात्मा आपवके उस वनको किस कारण जलाया था? अभी-अभी हम लोगोंने सुना है कि वे राजर्षि कार्तवीर्य प्रजाओंके रक्षक थे तो फिर रक्षक होकर उन्होंने महर्षिके तपोवनको कैसे जला दिया?॥ १-२॥
सूत उवाच<br>आदित्यो द्विजरूपेण कार्तवीर्यमुपस्थितः।<br>तृप्तिमेकां प्रयच्छस्व आदित्योऽहं नरेश्वर॥ ३सूतजी कहते हैं—ऋषियो! एक बार सूर्य* ब्राह्मणका रूप धारण करके कार्तवीर्यके निकट पहुँचे और कहने लगे—'नरेश्वर! मैं सूर्य हूँ, आप मुझे एक बार तृप्ति प्रदान कीजिये'॥ ३॥
राजोवाच<br>भगवन् केन तृप्तिस्ते भवत्येव दिवाकर।<br>कीदृशं भोजनं दद्मि श्रुत्वा तु विदधाम्यहम्॥ ४राजाने पूछा—भगवन्! किस पदार्थसे आपकी तृप्ति होगी? दिवाकर! मैं आपको किस प्रकारका भोजन प्रदान करूँ? आपकी बात सुनकर मैं उसी प्रकारका विधान करूँगा॥ ४॥
आदित्य उवाच<br>स्थावरं देहि मे सर्वमाहारं ददतां वर।<br>तेन तृप्तो भवेयं वै सा मे तृप्तिर्हि पार्थिव॥ ५सूर्य बोले—दानिशिरोमणे! मुझे समस्त स्थावर अर्थात् वृक्ष आदिको आहाररूपमें प्रदान कीजिये। मैं उसीसे तृप्त होऊँगा। राजन्! वही मेरे लिये सर्वश्रेष्ठ तृप्ति होगी॥ ५॥
कार्तवीर्य उवाच<br>न शक्याः स्थावराः सर्वे तेजसा च बलेन च।<br>निर्दग्धुं तपतां श्रेष्ठ तेन त्वां प्रणमाम्यहम्॥ ६कार्तवीर्यने कहा—तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ सूर्य! ये समस्त वृक्ष मेरे तेज और बलद्वारा जलाये नहीं जा सकते; अतः मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ६॥
आदित्य उवाच<br>तुष्टस्तेऽहं शरान् दद्मि अक्षयान् सर्वतोमुखान्।<br>ये प्रक्षिप्ता ज्वलिष्यन्ति मम तेजः समन्विताः॥ ७<br>आविष्टा मम तेजोभिः शोषयिष्यन्ति स्थावरान्।<br>शुष्कान् भस्मीकरिष्यन्ति तेन तृप्तिर्नराधिप॥ ८सूर्य बोले—नरेश्वर! मैं आपपर प्रसन्न हूँ, इसलिये मैं आपको ऐसे अक्षय एवं सर्वतोमुखी बाण दे रहा हूँ, जो मेरे तेजसे युक्त होनेके कारण चलाये जानेपर स्वयं जल उठेंगे और मेरे तेजसे परिपूर्ण हुए वे सारे वृक्षोंको सुखा देंगे; फिर सूख जानेपर उन्हें जलाकर भस्म कर देंगे। उससे मेरी तृप्ति हो जायगी॥ ७-८॥
सूत उवाच<br>ततः शरांस्तदादित्यस्त्वर्जुनाय प्रयच्छत।<br>ततो ददाह सम्प्राप्तान् स्थावरान् सर्वमेव च॥ ९<br>ग्रामांस्तथाऽऽश्रमांश्चैव घोषाणि नगराणि च।<br>तपोवनानि रम्याणि वनान्युपवनानि च॥ १०<br>एवं प्राचीनमन्वदहं ततः सर्वां सदक्षिणाम्।<br>निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर्हता घोरेण तेजसा॥ ११सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर सूर्यने कार्तवीर्य अर्जुनको अपने बाण प्रदान कर दिये। तब अर्जुनने सम्मुख आये हुए समस्त वृक्षों, ग्रामों, आश्रमों, घोषों, नगरों, तपोवनों तथा रमणीय वनों एवं उपवनोंको जलाकर राखका ढेर बना दिया। इस प्रकार पूर्व दिशाको जलाकर फिर समूची दक्षिण दिशाको भी भस्म कर दिया। उस भयंकर तेजसे पृथ्वी वृक्षों एवं तृणोंसे रहित होकर नष्ट-

* यहाँ आदित्य सूर्य हैं, पर हरिवंशपु० १।३३ आदिके अनुसार अग्निदेव ही ब्राह्मणवेषमें आये थे।

४६- वृष्णि-वंशका वर्णन

  • अध्याय ४४ * १५५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतस्मिन्नेव काले तु आपवो जलमास्थितः।<br>दशवर्षसहस्राणि तत्रास्ते स महान् ऋषिः॥ १२<br><br>पूर्णे व्रते महातेजा उदतिष्ठत्तपोधनः।<br>सोऽपश्यदाश्रमं दग्धमर्जुनेन महामुनिः॥ १३भ्रष्ट हो गयी। उसी समय महर्षि आपव जो महान् तेजस्वी और तपस्याके धनी थे, दस हजार वर्षोंसे जलके भीतर बैठकर तप कर रहे थे, व्रत पूर्ण होनेपर बाहर निकले तो उन महामुनिने अर्जुनद्वारा अपने आश्रमको जलाया हुआ देखा। तब उन्होंने क्रुद्ध होकर राजर्षि अर्जुनको उक्त शाप दे दिया, जैसा कि मैंने अभी आप लोगोंको बतलाया है॥ ९–१३ १/२॥
क्रोधाच्छाप राजर्षि कीर्तितं वो यथा मया।<br>क्रोष्टोः शृणुत राजर्षेर्वंशमुत्तमपौरुषम्॥ १४<br>यस्यान्ववाये सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः।ऋषियो! (अब) आपलोग राजर्षि क्रोष्टुके उस उत्तम बल-पौरुषसे सम्पन्न वंशका वर्णन सुनिये, जिस वंशमें वृष्णिवंशावतंस भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) अवतीर्ण हुए थे।
क्रोष्टोरेवाभवत् पुत्रो वृजिनीवान् महारथः॥ १५क्रोष्टुका पुत्र महारथी वृजिनीवान् हुए।
वृजिनीवतश्च पुत्रोऽभूत् स्वाहो नाम महाबलः।<br>स्वाहुपुत्रोऽभवद् राजन् रुषङ्गुर्वदतां वरः॥ १६वृजिनीवान्‌के स्वाह (पद्मपुराणमें स्वाति) नामक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन्! वक्ताओंमें श्रेष्ठ रुषङ्गु स्वाहके पुत्ररूपमें पैदा हुए।
स तु प्रसूतिमिच्छन् वै रुषङ्गुः सौम्यमात्मजम्।<br>चित्रश्वित्ररथश्चास्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः॥ १७रुषङ्गुने संतानकी इच्छासे सौम्य स्वभाववाले पुत्रकी कामना की। तब उनके सत्कर्मोंसे समन्वित एवं चित्र-विचित्र रथसे युक्त चित्ररथ नामक पुत्र हुआ।
अथ चैत्ररथिर्वीरो जज्ञे विपुलदक्षिणः।<br>शशबिन्दुरिति ख्यातश्चक्रवर्ती बभूव ह॥ १८चित्ररथके एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ जो शशबिन्दु नामसे विख्यात था। वह आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। वह यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था।
अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतस्तस्मिन् पुरावभवत्।<br>शशबिन्दोस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम्॥ १९पूर्वकालमें इस शशबिन्दुके विषयमें वंशानुक्रमणिकारूप यह श्लोक गाया जाता रहा है कि शशबिन्दुके सौ पुत्र हुए।
धीमतां चाभिरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम्।<br>तेषां शतप्रधानानां पृथुसाह्ना महाबलाः॥ २०उनमें भी प्रत्येकके सौ-सौ पुत्र हुए। वे सभी प्रचुर धन-सम्पत्ति एवं तेजसे परिपूर्ण, सौन्दर्यशाली एवं बुद्धिमान् थे। उन पुत्रोंके नामके अग्रभागमें 'पृथु' शब्दसे संयुक्त छः महाबली पुत्र हुए।
पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुधर्मा पृथुञ्जयः।<br>पृथुकीर्तिः पृथुमना राजानः शशबिन्दवः॥ २१उनके पूरे नाम इस प्रकार हैं—पृथुश्रवा, पृथुयशा, पृथुधर्मा, पृथुंजय, पृथुकीर्ति और पृथुमना। ये शशबिन्दुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा थे।
शंसन्ति च पुराणज्ञाः पृथुश्रवसमुत्तमम्।<br>अन्तरस्य सुयज्ञस्य सुयज्ञस्तनयोऽभवत्॥ २२पुराणोंके ज्ञाता विद्वान्‌लोग इनमें सबसे ज्येष्ठ पृथुश्रवाकी विशेष प्रशंसा करते हैं। उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले पृथुश्रवाका पुत्र सुयज्ञ हुआ।
उशना तु सुयज्ञस्य यो रक्षेत् पृथिवीमिमाम्।<br>आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः॥ २३सुयज्ञका पुत्र उशना हुआ, जो सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा था। उसने इस पृथ्वीकी रक्षा करते हुए सौ अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था।
तितिक्षुरभवत् पुत्र औशनः शत्रुतापनः।<br>मरुत्तस्तस्य तनयो राजर्षीणामनुत्तमः॥ २४उशनाका पुत्र तितिक्षु हुआ जो शत्रुओंको संतप्त कर देनेवाला था। राजर्षियोंमें सर्वश्रेष्ठ मरुत्त तितिक्षुके पुत्र हुए।
आसीन्मरुत्ततनयो वीरः कम्बलबर्हिषः।<br>पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान् कम्बलबर्हिषः॥ २५मरुत्तका पुत्र वीरवर कम्बलबर्हिष था। कम्बलबर्हिषका पुत्र विद्वान् रुक्मकवच हुआ।
निहत्य रुक्मकवचः परान् कवचधारिणः।<br>धन्विनो विविधैर्बाणैरवाप्य पृथिवीमिमाम्॥ २६रुक्मकवचने अपने अनेकों प्रकारके बाणोंके प्रहारसे धनुर्धारी एवं कवचसे सुसज्जित शत्रुओंको मारकर इस पृथ्वीको प्राप्त किया था।

१. भागवत ९। २३। ३१ तथा विष्णुपुराण ४। १२। २ में 'रुशङ्गु' एवं पद्म० १। १३। ४ में 'कुशङ्क' पाठ है।
२. अन्यत्र शिमेयु, रुचक या शितपु पाठ भी मिलता है।

१५६ | * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अश्वमेधे ददौ राजा ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम्।<br>यज्ञे तु रुक्मकवचः कदाचित् परवीरहा॥ २७शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले राजा रुक्मकवचने एक बार बड़े (भारी) अश्वमेध-यज्ञमें ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणा प्रदान की थी॥ १४—२७॥
जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महावीर्या धनुर्भृतः।<br>रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः परिघो हरिः॥ २८<br>परिघं च हरिं चैव विदेहेऽस्थापयत् पिता।<br>रुक्मेषुरभवद् राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयः॥ २९<br>तेभ्यः प्रत्राजितो राज्याज्ज्यामघस्तु तदाश्रमे।<br>प्रशान्तश्चाश्रमस्थश्च ब्राह्मणेनावबोधितः॥ ३०<br>जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी।<br>नर्मदां नृप एकाकी केवलं वृत्तिकामतः॥ ३१<br>ऋक्षवन्तं गिरिं गत्वा भुक्तमन्यैरूपाविशत्।<br>ज्यामघस्याभवद् भार्या शैव्या परिणता सती॥ ३२<br>अपुत्रो न्यवसद् राजा भार्यामन्यां न विन्दति।<br>तस्यासीद् विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप्य सः॥ ३३<br>भार्यामुवाच संत्रासात् स्नुषेयं ते शुचिस्मिते।<br>एकमुक्ताब्रवीदेनं कस्य चेयं स्नुषेति च॥ ३४इन (राजा रुक्मकवच)-के रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, परिघ और हरिनामक पाँच पुत्र हुए, जो महान् पराक्रमी एवं श्रेष्ठ धनुर्धर थे। पिता रुक्मकवचने इनमेंसे परिघ और हरि—इन दोनोंको विदेह देशके राज-पदपर नियुक्त कर दिया। रुक्मेषु प्रधान राजा हुआ और पृथुरुक्म उसका आश्रित बन गया। उन लोगोंने ज्यामघको राज्यसे निकाल दिया। वहाँ एकत्र ब्राह्मणद्वारा समझाये-बुझाये जानेपर वह प्रशान्त-चित्त होकर वानप्रस्थीरूपसे आश्रमोंमें स्थिररूपसे रहने लगा। कुछ दिनोंके पश्चात् वह (एक ब्राह्मणकी शिक्षासे) ध्वजायुक्त रथपर सवार हो हाथमें धनुष धारणकर दूसरे देशकी ओर चल पड़ा। वह केवल जीविकोपार्जनकी कामनासे अकेले ही नर्मदा तटपर जा पहुँचा। वहाँ दूसरोंद्वारा उपभुक्त ऋक्षवान् गिरि (सतपुरा पर्वत-श्रेणी)-पर जाकर निश्चितरूपसे निवास करने लगा। ज्यामघकी सती-साध्वी पत्नी शैव्या* प्रौढ़ा हो गयी थी। (उसके गर्भसे) कोई पुत्र न उत्पन्न हुआ। इस प्रकार यद्यपि राजा ज्यामघ पुत्रहीन अवस्थामें ही जीवन यापन कर रहे थे, तथापि उन्होंने दूसरी पत्नी नहीं स्वीकार की। एक बार किसी युद्धमें राजा ज्यामघकी विजय हुई। वहाँ उन्हें (विवाहार्थ) एक कन्या प्राप्त हुई। (पर) उसे लाकर पत्नीको देते हुए राजाने उससे भयपूर्वक कहा—'शुचिस्मिते! यह (मेरी स्त्री नहीं,) तुम्हारी स्नुषा (पुत्रवधू) है।' इस प्रकार कहे जानेपर उसने राजासे पूछा—'यह किसकी स्नुषा है?'॥ २८—३४॥
राजोवाच<br>यस्ते जनिष्यते पुत्रस्तस्य भार्या भविष्यति।<br>तस्मात् सा तपसोग्रेण कन्यायाः सम्प्रसूत ॥ ३५<br>पुत्रं विदर्भं सुभगा चैत्रा परिणता सती।<br>राजपुत्र्यां च विद्वान् स स्नुषायां क्रथकैशिकौ।<br>लोमपादं तृतीयं तु पुत्रं परमधार्मिकम्॥ ३६<br>तस्यां विदर्भोज्जनयच्छूरान् रणविशारदान्।<br>लोमपादान्मनुः पुत्रो ज्ञातितस्तस्य तु चात्मजः॥ ३७<br>कैशिकस्य चिदिः पुत्रो तस्माच्चैद्या नृपाः स्मृताः।<br>क्रथो विदर्भपुत्रस्तु कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत्॥ ३८<br>कुन्तेर्धृष्टः सुतो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान्।<br>धृष्टस्य पुत्रो धर्मात्मा निर्वृतिः परवीरहा॥ ३९तब राजाने कहा—(प्रिये) तुम्हारे गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसीकी यह पत्नी होगी। (यह आश्चर्य देख-सुनकर वह कन्या तप करने लगी।) तत्पश्चात् उस कन्याकी उग्र तपस्याके परिणामस्वरूप वृद्धा प्रायः बूढ़ी होनेपर भी शैव्याने (गर्भ धारण किया और) विदर्भ नामक एक पुत्रको जन्म दिया। उस विद्वान् विदर्भने स्नुषाभूता उस राजकुमारीके गर्भसे क्रथ, कैशिक तथा तीसरे परम धर्मात्मा लोमपाद नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया। ये सभी पुत्र शूरवीर एवं युद्धकुशल थे। इनमें लोमपादसे मनु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ तथा मनुका पुत्र ज्ञाति हुआ। कैशिकका पुत्र चिदि हुआ, उससे उत्पन्न हुए नरेश चैद्य नामसे प्रख्यात हुए। विदर्भ-पुत्र क्रथके कुन्ति नामक पुत्र पैदा हुआ। कुन्तिसे धृष्ट नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो परम प्रतापी एवं रणविशारद था। धृष्टका पुत्र निर्वृति हुआ जो धर्मात्मा एवं शत्रु-

* प्रायः अठारह पुराणों तथा उपपुराणोंमें एवं भागवतादिकी टीकाओंमें 'ज्यामघ'की पत्नी शैव्या ही कही गयी है। कुछ मत्स्यपुराणकी प्रतियोंमें 'चैत्रा' नाम भी आया है, परंतु यह अनुकृतिमें भ्रान्तिका ही परिणाम है।

— इतिहास तथा देवासुर-संग्रामके प्रसङ्गमें विभिन्न अवान्तर कथाएँ

  • अध्याय ४४ * | १५७ ---|---
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदेको निर्वृतेः पुत्रो नाम्ना स तु विदूरथः।<br>दशार्हस्तस्य वै पुत्रो व्योमास्तस्य च वै स्मृतः।<br>दाशार्हाच्चैव व्योमात्तु पुत्रो जीमूत उच्यते॥ ४०<br><br>जीमूतपुत्रो विमलस्तस्य भीमरथः सुतः।<br>सुतो भीमरथस्यासीत् स्मृतो नवरथः किल॥ ४१<br><br>तस्य चासीद् दृढरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः।<br>तस्मात् करम्भः कारम्भिर्देवरातो बभूव ह॥ ४२<br><br>देवक्षत्रोऽभवद् राजा देवरातिर्महायशाः।<br>देवगर्भसमो जज्ञे देवनक्षत्रनन्दनः॥ ४३<br><br>मधुर्नाम महातेजा मधोः पुरवसस्तथा।<br>आसीद् पुरवसः पुत्रः पुरुद्वान् पुरुषोत्तमः॥ ४४<br><br>जन्तुर्जज्ञेऽथ वैदर्भ्यां भद्रसेन्यां पुरुद्वतः।<br>ऐक्ष्वाकी चाभवद् भार्या जन्तोस्तस्यामजायत॥ ४५<br><br>सात्त्वतः सत्त्वसंयुक्तः सात्त्वतां कीर्तिवर्धनः।<br>इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनः।<br>प्रजावानेति सायुज्यं राज्ञः सोमस्य धीमतः॥ ४६<br><br>सात्त्वतात्सत्त्वसम्पन्नान् कौसल्या सुषुवे सुतान्।<br>भजिनं भजमानं तु दिव्यं देवावृधं नृपम्॥ ४७<br><br>अन्धकं च महाभोजं वृष्णिं च यदुनन्दनम्।<br>तेषां हि सर्गाश्चत्वारो विस्तरेणैव तच्छृणु॥ ४८<br><br>भजमानस्य सृञ्जयां वाह्यकायां च वाह्यकाः।<br>सृञ्जयस्य सुते द्वे तु वाह्यकास्तु तदाभवन्॥ ४९<br><br>तस्य भार्ये भगिन्यौ द्वे सुषुवाते बहून् सुतान्।<br>निमिं च कृमिलं चैव वृष्णिं परपुरंजयम्।<br>ते वाह्यकायां सृञ्जयां भजमानाद् विजज्ञिरे॥ ५०वीरोंका संहारक था। निर्वृतिके एक ही पुत्र था जो विदूरथ नामसे प्रसिद्ध था। विदूरथका पुत्र दशार्ह* और दशार्हका पुत्र व्योम बतलाया जाता है। दशार्हवंशी व्योमसे पैदा हुए पुत्रको जीमूत नामसे कहा जाता है॥ ३५–४०॥<br><br>जीमूतका पुत्र विमल और विमलका पुत्र भीमरथ हुआ। भीमरथका पुत्र नवरथ नामसे प्रसिद्ध था। नवरथका पुत्र दृढरथ और उसका पुत्र शकुनि था। शकुनिसे करम्भ और करम्भसे देवरात उत्पन्न हुआ। देवरातका पुत्र महायशस्वी राजा देवक्षत्र हुआ। देवक्षत्रका पुत्र देव-पुत्रकी-सी कान्तिसे युक्त महातेजस्वी मधु नामसे उत्पन्न हुआ। मधुका पुत्र पुरवस् तथा पुरवस्‌का पुत्र पुरुषश्रेष्ठ पुरुद्वान् था। पुरुद्वान्‌के संयोगसे विदर्भ-राजकुमारी भद्रसेनीके गर्भसे जन्तु नामक पुत्रने जन्म लिया। उस जन्तुकी पत्नी ऐक्ष्वाकी हुई, उसके गर्भसे उत्कृष्ट बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं सात्त्वतवंशियों (या आप)-की कीर्तिका विस्तारक सात्त्वत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार महात्मा ज्यामघकी इस संतान-परम्पराको जानकर मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है और अन्तमें बुद्धिमान् राजा सोमका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। राजन्! कौसल्या (सात्त्वतकी पत्नी थी। उसने) सात्त्वतके संयोगसे जिन बल-पराक्रमसम्पन्न पुत्रोंको जन्म दिया, उनके नाम हैं—भजि, भजमान, दिव्य राजा देवावृध, अन्धक, महाभोज और यदुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले वृष्णि। इनमें चार वंशका विस्तार हुआ। अब उसका विस्तारपूर्वक वर्णन श्रवण कीजिये। सृंजयकी दो कन्याएँ सृंजयी और वाह्यका भजमानकी पत्नियाँ थीं। इनसे वाह्यक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इनके अतिरिक्त उन दोनों बहिनोंने और भी बहुत-से पुत्रोंको जन्म दिया था। उनके नाम हैं—निमि, कृमिल और शत्रु-नगरीको जीतनेवाला वृष्णि। ये सभी भजमानके संयोगसे सृंजयी और वाह्यकाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे॥ ४१–५०॥

* इन्हींसे श्रीकृष्ण आदि दाशार्हवंशीरूपमें प्रसिद्ध हुए हैं।

१५८* मत्स्यपुराण *

| जज्ञे देवावृधो राजा बन्धूनां मित्रवर्धनः।<br>अपुत्रस्त्वभवद् राजा चचार परमं तपः।<br>पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्पृहन्॥ ५१<br>संयोज्य मन्त्रमेवाथ पर्णाशाजलमस्पृशत्।<br>तदोपस्पर्शनात् तस्य चकार प्रियमपगा॥ ५२<br>कल्याणत्वान्नृपतेस्तस्मै सा निम्नगोत्तमा।<br>चिन्तयाथ परीतात्मा जगामाथ विनिश्चयम्॥ ५३<br>नाधिगच्छाम्यहं नारीं यस्यामेवंविधः सुतः।<br>जायेत तस्मादद्याहं भवाम्यथ सहस्रशः॥ ५४<br>अथ भूत्वा कुमारी सा बिभ्रती परमं वपुः।<br>ज्ञापयामास राजानं तामियेष महाव्रतः॥ ५५<br>अथ सा नवमे मासि सुषुवे सरितां वरा।<br>पुत्रं सर्वगुणोपेतं बभ्रुं देवावृधान्नृपात्॥ ५६<br>अनुवंशे पुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम्।<br>गुणान् देवावृधस्यापि कीर्तयन्तो महात्मनः॥ ५७<br>यथैव शृणुमो दूरादपश्यामस्तथान्तिकात्।<br>बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः॥ ५८<br>षष्टिशतं च पूर्वपुरुषाः सहस्राणि च सप्ततिः।<br>एतेऽमृतत्वं सम्प्राप्ता बभ्रोर्देवावृधान्नृप॥ ५९<br>यज्वा दानपतिर्वीरो ब्रह्मण्यश्च दृढव्रतः।<br>रूपवान् सुमहातेजाः श्रुतवीर्यधरस्तथा॥ ६०<br>अथ कङ्कस्य दुहिता सुषुवे चतुरः सुतान्।<br>कुकुरं भजमानं च शंशिं कम्बलबर्हिषम्॥ ६१<br>कुकुरस्य सुतो वृष्णिर्वृष्णोस्तु तनयो धृतिः।<br>कपोतरोमा तस्याथ तैत्तिरिस्तस्य चात्मजः॥ ६२<br>तस्यासीत् तनुजः सर्पो विद्वान् पुत्रो नलः किल।<br>ख्यायते तस्य नाम्ना स नन्दनो दरदुन्दुभिः॥ ६३ | तत्पश्चात् राजा देवावृधका जन्म हुआ, जो बन्धुओंके साथ सुदृढ़ मैत्रीके प्रवर्धक थे। परंतु राजा (देवावृध)-को कोई पुत्र न था। उन्होंने 'मुझे सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न पुत्र पैदा हो' ऐसी अभिलाषासे युक्त हो अत्यन्त घोर तप किया। अन्तमें उन्होंने मन्त्रको संयुक्त कर पर्णाशा^१ नदीके जलका स्पर्श किया। इस प्रकार स्पर्श करनेके कारण पर्णाशा नदी राजाका प्रिय करनेका विचार करने लगी। वह श्रेष्ठ नदी उस राजाके कल्याणकी चिन्तासे व्याकुल हो उठी। अन्तमें वह इस निश्चयपर पहुँची कि मैं ऐसी किसी दूसरी स्त्रीको नहीं देख पा रही हूँ, जिसके गर्भसे इस प्रकारका (राजाकी अभिलाषाके अनुसार) पुत्र पैदा हो सके, इसलिये आज मैं स्वयं ही हजारों प्रकारका रूप धारण करूँगी। तत्पश्चात् पर्णाशाने परम सुन्दर शरीर धारण करके कुमारीरूपमें प्रकट होकर राजाको सूचित किया। तब महान् व्रतशाली राजाने उसे (पत्नीरूपसे) स्वीकार कर लिया। तदुपरान्त नदियोंमें श्रेष्ठ पर्णाशाने राजा देवावृधके संयोगसे नवें महीनेमें सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न बभ्रु नामक पुत्रको जन्म दिया। पुराणोंके ज्ञाता विद्वान्लोग वंशानुकीर्तनप्रसङ्गमें महात्मा देवावृधके गुणोंका कीर्तन करते हुए ऐसी गाथा गाते हैं—'उद्गार प्रकट करते हैं—'इन (बभ्रु)-के विषयमें हमलोग जैसा (दूरसे) सुन रहे थे, उसी प्रकार (इन्हें) निकट आकर भी देख रहे हैं। बभ्रु तो सभी मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और देवावृध (साक्षात्) देवताओंके समान हैं। राजन्! बभ्रु और देवावृधके प्रभावसे इनके छिहत्तर हजार पूर्वज अमरत्वको प्राप्त हो गये। राजा बभ्रु यज्ञानुष्ठानी, दानशील, शूरवीर, ब्राह्मणभक्त, सुदृढ़व्रती, सौन्दर्यशाली, महान् तेजस्वी तथा विख्यात बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। तदनन्तर (बभ्रुके संयोगसे) कङ्ककी कन्याने कुकुर, भजमान, शशि और कम्बलबर्हिष नामक चार पुत्रोंको जन्म दिया। कुकुरका पुत्र वृष्णि,^२ वृष्णिका पुत्र धृति, उसका पुत्र कपोतरोमा, उसका पुत्र तैत्तिरि, उसका पुत्र सर्प, उसका पुत्र विद्वान् नल था। नलका पुत्र दरदुन्दुभि^३ नामसे कहा जाता था॥ ५१–६३॥ |


१. भारतमें पर्णाशा नामकी दो नदियाँ हैं। ये दोनों राजस्थानकी पूर्वी सीमापर स्थित हैं और पारियात्र पर्वतसे निकली हैं। (द्रष्टव्य मत्स्य० १२।५० तथा वायुपुराण ३८।१७६)।
२. ऊपर ४८वें श्लोकमें 'वृष्णि'का उल्लेख हो चुका है, अतः अधिकांश अन्य पुराणसम्मत यहाँ 'धृष्णु' पाठ मानना चाहिये, या इन्हें द्वितीय वृष्णि मानना चाहिये।
३. पद्म० १।१३।४० में चन्दनोदकदुंदुभि नाम है।

* अध्याय ४४ * । १५९

| तस्मिन् प्रविते यज्ञे अभिजातः पुनर्वसुः।<br>अश्वमेधं च पुत्रार्थमाजहार नरोत्तमः॥ ६४<br>तस्य मध्येऽतिरात्रस्य सभामध्यात् समुत्थितः।<br>अतस्तु विद्वान् कर्मज्ञो यज्वा दाता पुनर्वसुः॥ ६५<br>तस्यासीत् पुत्रमिथुनं बभूवाविजितं किल।<br>आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातं मतिमतां वर॥ ६६<br>इमांश्चोदाहरन्त्यत्र श्लोकान् प्रति तमाहुकम्।<br>सोपासङ्गानुकर्षाणां सध्वजानां वरूथिनाम्॥ ६७<br>रथानां मेघघोषाणां सहस्राणि दशैव तु।<br>नासत्यवादी नातेजा नायज्वा नासहस्रदः॥ ६८<br>नाशुचिर्नाप्यविद्वान् हि यो भोजेष्वभ्यजायत।<br>आहुकस्य भृतिं प्राप्ता इत्येतद् वै तदुच्यते॥ ६९<br>आहुकश्चाप्यवन्तीषु स्वसारं चाहुकीं ददौ।<br>आहुकात् काश्यदुहिता द्वौ पुत्रौ समसूत ॥ ७०<br>देवकश्चोग्रसेनश्च देवगर्भसमावुभौ।<br>देवकस्य सुता वीरा जज्ञिरे त्रिदशोपमाः॥ ७१<br>देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः।<br>तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ॥ ७२<br>देवकी श्रुतदेवी च मित्रदेवी यशोधरा।<br>श्रीदेवी सत्यदेवी च सुतापी चेति सप्तमी॥ ७३<br>नवोग्रसेनस्य सुताः कंसस्तेषां तु पूर्वजः।<br>न्यग्रोधश्च सुनामा च कङ्कः शङ्कुश्च भूयशः॥ ७४<br>अजभू राष्ट्रपालश्च युद्धमुष्टिः सुमुष्टिदः।<br>तेषां स्वसारः पञ्चासन् कंसा कंसवती तथा॥ ७५<br>सुतन्तू राष्ट्रपाली च कङ्का चेति वराङ्गनाः।<br>उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः कुकुरोद्भवः॥ ७६<br>भजमानस्य पुत्रोऽथ रथिमुख्यो विदूरथः।<br>राजाधिदेवः शूरश्च विदूरथसुतोऽभवत्॥ ७७<br>राजाधिदेवस्य सुतो जज्ञाते देवसम्मितौ।<br>नियमव्रतप्रधानौ शोणाश्वः श्वेतवाहनः॥ ७८<br>शोणाश्वस्य सुताः पञ्च शूरा रणविशारदाः।<br>शमी च देवशर्मा च निकुन्तः शक्रशत्रुजित्॥ ७९ | नरश्रेष्ठ दरदुन्दुभि पुत्रप्राप्तिके लिये अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। उस विशाल यज्ञमें पुनर्वसु नामक पुत्र प्रादुर्भूत हुआ। पुनर्वसु अतिरात्रके मध्यमें सभाके बीच प्रकट हुआ था, इसलिये वह विद्वान्, शुभाशुभ कर्मोंका ज्ञाता, यज्ञपरायण और दानी था। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजन्! पुनर्वसुके आहुक नामका पुत्र और आहुकी नामकी कन्या—ये जुड़वीं संतान पैदा हुई। इनमें आहुक अजेय और लोकप्रसिद्ध था। उन आहुकके प्रति विद्वान् लोग इन श्लोकोंको गाया करते हैं—'राजा आहुकके पास दस हजार ऐसे रथ रहते थे, जिनमें सुदृढ़ उपासङ्ग (कूबर) एवं अनुकर्ष (धुरे) लगे रहते थे, जिनपर ध्वजाएँ फहराती रहती थीं, जो कवचसे सुसज्जित रहते थे तथा जिनसे मेघकी घरघराहटके सदृश शब्द निकलते थे। उस भोजवंशमें ऐसा कोई राजा नहीं पैदा हुआ जो असत्यवादी, निस्तेज, यज्ञविमुख, सहस्रोंकी दक्षिणा देनेमें असमर्थ, अपवित्र और मूर्ख हो।' राजा आहुकसे भरण-पोषणकी वृत्ति पानेवाले लोग ऐसा कहा करते थे। आहुकने अपनी बहन आहुकीको अवन्ती-नरेशको प्रदान किया था। आहुकके संयोगसे काश्यकी कन्याने देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों देव-पुत्रोंके सदृश कान्तिमान् थे। देवकके देवताओंके समान कान्तिमान् एवं पराक्रमी चार शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम हैं—देववान्, उपदेव, सुदेव और देवरक्षित। इनके सात बहनें भी थीं, जिन्हें देवकने वसुदेवको समर्पित किया था। उनके नाम हैं—देवकी, श्रुतदेवी, मित्रदेवी, यशोधरा, श्रीदेवी, सत्यदेवी और सातवीं सुतापी॥ ६४–७३॥<br><br>उग्रसेनके नौ पुत्र थे, उनमें कंस ज्येष्ठ था। उनके नाम हैं—न्यग्रोध, सुनामा, कङ्क, शङ्कु अजभू, राष्ट्रपाल, युद्धमुष्टि और सुमुष्टिद। उनके कंसा,कंसवती, सतन्तू, राष्ट्रपाली और कङ्का नामकी पाँच बहनें भी थीं, जो परम सुन्दरी थीं। अपनी संतानोंसहित उग्रसेन कुकुर-वंशमें उत्पन्न हुए कहे जाते हैं। भजमानका पुत्र महारथी विदूरथ और शूरवीर राजाधिदेव विदूरथका पुत्र हुआ। राजाधिदेवके शोणाश्व और श्वेतवाहन नामक दो पुत्र हुए, जो देवोंके सदृश कान्तिमान् और नियम एवं व्रतके पालनमें तत्पर रहनेवाले थे। शोणाश्वके शमी, देवशर्मा, निकुन्त, शक्र और शत्रुजित् नामक पाँच शूरवीर एवं युद्धनिपुण पुत्र हुए। |

१६० * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
शमिपुत्रः प्रतिक्षत्रः प्रतिक्षत्रस्य चात्मजः।<br>प्रतिक्षेत्रः सुतो भोजो हृदीकस्तस्य चात्मजः॥ ८०<br>हृदीकस्याभवन् पुत्रा दश भीमपराक्रमाः।<br>कृतवर्माग्रजस्तेषां शतधन्वा च मध्यमः॥ ८१<br>देवार्हश्चैव नाभश्च धिषणश्च महाबलः।<br>अजातो वनजातश्च कनीयककरम्भकौ॥ ८२<br>देवार्हस्य सुतो विद्वाञ्जज्ञे कम्बलवर्हिषः।<br>असोमजाः सुतस्तस्य तमोजास्तस्य चात्मजः॥ ८३<br>अजातपुत्रा विक्रान्तास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>सुदंष्ट्रश्च सुनाभश्च कृष्ण इत्यन्धका मताः॥ ८४<br>अन्धकानामिमं वंशं यः कीर्तयति नित्यशः।<br>आत्मनो विपुलं वंशं प्रजावानाप्नुते नरः॥ ८५शमीका पुत्र प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्रका पुत्र प्रतिक्षेत्र, उसका पुत्र भोज और उसका पुत्र हृदीक हुआ। हृदीकके दस अनुपम पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए, उनमें कृतवर्मा ज्येष्ठ और शतधन्वा मँझला था। शेषके नाम (इस प्रकार) हैं—देवार्ह, नाभ, धिषण, महाबल, अजात, वनजात, कनीयक और करम्भक। देवार्हके कम्बलवर्हिष नामक विद्वान् पुत्र हुआ। उसका पुत्र असोमजा और असोमजाका पुत्र तमोजा हुआ। इसके बाद सुदंष्ट्र, सुनाभ और कृष्ण नामके तीन राजा और हुए जो परम पराक्रमी और उत्तम कीर्तिवाले थे। इनके कोई संतान नहीं हुई। ये सभी अन्धकवंशी माने गये हैं। जो मनुष्य अन्धकोंके इस वंशका नित्य कीर्तन करता है वह स्वयं पुत्रवान् होकर अपने वंशकी वृद्धि करता है॥ ७४—८५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णनमें चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४४॥


पैंतालीसवाँ अध्याय

वृष्णिवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें स्यमन्तकमणिकी कथा

श्लोकअर्थ
सूत उवाच<br>गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः।<br>गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्॥ १<br>माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषम्।<br>अनमित्रं शिबिं चैव पञ्चमं कृतलक्षणम्॥ २<br>अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्यापि तु द्वौ सुतौ।<br>प्रसेनश्च महावीर्यः शक्तिसेनश्च तावुभौ॥ ३<br>स्यमन्तकः प्रसेनस्य मणिरत्नमनुत्तमम्।<br>पृथिव्यां सर्वरत्नानां राजा वै सोऽभवन्मणिः॥ ४<br>हृदि कृत्वा तु बहुशो मणिं तमभियाचितः।<br>गोविन्दोऽपि न तं लेभे शक्तोऽपि न जहार सः॥ ५<br>कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः।<br>यथाशब्दं स शुश्राव बिले सत्त्वेन पूरिते॥ ६**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (अब आपलोग सात्त्वतके कनिष्ठ पुत्र वृष्णिका वंश-वर्णन सुनिये।) गान्धारी और माद्री—ये दोनों वृष्णिकी पत्नियाँ हुईं। उनमें गान्धारीने सुमित्र और मित्रनन्दन नामक दो पुत्रोंको तथा माद्रीने युधाजित्, तत्पश्चात् देवमीढुष, अनमित्र, शिबि और पाँचवें कृतलक्षण नामक पुत्रोंको जन्म दिया। अनमित्रका पुत्र निघ्न हुआ और निघ्नके महान् पराक्रमी प्रसेन और शक्तिसेन नामक दो पुत्र हुए। इसी प्रसेनके पास स्यमन्तक नामक सर्वश्रेष्ठ मणिरत्न था। वह मणिरत्न भूतलपर समस्त रत्नोंका राजा था। भगवान् श्रीकृष्णने भी अनेकों बार मनमें उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करके प्रसेनसे याचना की, परंतु वे उसे प्राप्त न कर सके। साथ ही समर्थ होनेपर भी उन्होंने उसका अपहरण भी नहीं किया। एक बार प्रसेन उस मणिसे विभूषित हो शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ उसने एक बिल (गुफा)-में, जिसका स्वामी जीव उसमें विद्यमान था, होनेवाले कोलाहलको सुना।
* अध्याय ४५ *१६१
ततः प्रविश्य स बिलं प्रसेनो ह्यक्षमैक्षत।<br>ऋक्षः प्रसेनं च तथा ऋक्षं चैव प्रसेनजित् ॥ ७<br>हत्वा ऋक्षः प्रसेनं तु ततस्तं मणिमाददात्।<br>अदृष्टस्तु हतस्तेन अन्तर्बिलगतस्तदा ॥ ८<br>प्रसेनं तु हतं ज्ञात्वा गोविन्दः परिशङ्कितः।<br>गोविन्देन हतो व्यक्तं प्रसेनो मणिकारणात् ॥ ९<br>प्रसेनस्तु गतोऽरण्यं मणिरत्नेन भूषितः।<br>तं दृष्ट्वा स हतस्तेन गोविन्दः प्रत्युवाच ह।<br>हन्मि चैनं दुराचारं शत्रुभूतं हि वृष्णिषु ॥ १०<br>अथ दीर्घेण कालेन मृगयां निर्गतः पुनः।<br>यदृच्छया च गोविन्दो बिलस्याभ्याशमागमत् ॥ ११<br>तं दृष्ट्वा तु महाशब्दं स चक्रे ऋक्षराड् बली।<br>शब्दं श्रुत्वा तु गोविन्दः खड्गपाणिः प्रविश्य सः।<br>अपश्यज्जाम्बवन्तं तमृक्षराजं महाबलम् ॥ १२<br>ततस्तूर्णं हृषीकेशस्तमृक्षपतिमञ्जसा।<br>जाम्बवन्तं स जग्राह क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३<br>तुष्टावैनं तदा ऋक्षः कर्मभिर्वैष्णवैः प्रभुम्।<br>ततस्तुष्टस्तु भगवान् वरेणैनमरोचयत् ॥ १४कुतूहलवश प्रसेनने उसमें प्रवेश करके एक रीछको देखा। फिर तो रीछकी दृष्टि प्रसेनपर और प्रसेनकी दृष्टि रीछपर पड़ी। (तत्पश्चात् दोनोंमें युद्ध छिड़ गया।) रीछने प्रसेनको मारकर वह मणि ले ली।$^१$ बिलके भीतर प्रविष्ट हुआ प्रसेन रीछद्वारा मार डाला गया, इसलिये उसे कोई देख न सका। इधर प्रसेनको मारा गया जानकर भगवान् श्रीकृष्णको आशङ्का हो गयी कि लोग स्पष्टरूपसे कहते होंगे कि मणि लेनेके लिये श्रीकृष्णने ही प्रसेनका वध किया है। ऐसी किंवदन्तीके फैलनेपर भगवान् गोविन्दने उत्तर दिया कि 'उस मणिरत्नको धारण करके प्रसेन वनमें गया था, उसे देखकर (मणिको हथियानेके लिये) किसीके द्वारा (सम्भवतः) वह मार डाला गया है। अतः वृष्णिवंशके शत्रुरूप उस दुराचारीका मैं वध करूँगा।' तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् आखेटके लिये निकले हुए भगवान् श्रीकृष्ण इच्छानुसार भ्रमण करते हुए उसी बिल (गुफा)-के निकट जा पहुँचे। उन्हें देखकर महाबली रीछराजने उच्चस्वरसे गर्जना की। उस शब्दको सुनकर भगवान् गोविन्द हाथमें तलवार लिये हुए उस बिलमें घुस गये। वहाँ उन्होंने उन महाबली रीछराज जाम्बवान्‌को देखा। तब जिनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये थे, उन हृषीकेश श्रीकृष्णने शीघ्र ही रीछराज जाम्बवान्‌को वेगपूर्वक अपने वशमें कर लिया। उस समय रीछराजने विष्णुसम्बन्धी स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुका स्तवन किया। उससे संतुष्ट होकर भगवान् श्रीकृष्णने जाम्बवान्‌को भी वरप्रदानद्वारा प्रसन्न कर दिया॥ १—१४॥
जाम्बवानुवाच<br>इच्छे चक्रप्रहारेण त्वत्तोऽहं मरणं प्रभो।<br>कन्या चेयं मम शुभा भर्तारं त्वामवाप्नुयात्।<br>योऽयं मणिः प्रसेनं तु हत्वा प्राप्तो मया प्रभो ॥ १५जाम्बवान्‌ने कहा— प्रभो! मेरी अभिलाषा है कि मैं आपके चक्र-प्रहारसे मृत्युको प्राप्त होऊँ। यह मेरी सौन्दर्यशालिनी कन्या आपको पतिरूपमें प्राप्त करे। प्रभो! यह मणि, जिसे मैंने प्रसेनको मारकर प्राप्त किया है, आपके ही पास रहे।
ततः स जाम्बवन्तं तं हत्वा चक्रेण वै प्रभुः।<br>कृतकर्मा महाबाहुः सकन्यं मणिमाहरत् ॥ १६<br>ददौ सत्राजितायै तं सर्वसात्त्वतसंसदि।<br>तेन मिथ्यापवादेन संतप्तोऽयं जनार्दनः ॥ १७<br>ततस्ते यादवाः सर्वे वासुदेवमथाब्रुवन्।<br>अस्माकं तु मतिर्ह्यासीत् प्रसेनस्तु त्वया हतः ॥ १८तत्पश्चात् सामर्थ्यशाली एवं महाबाहु श्रीकृष्णने अपने चक्रसे उन जाम्बवान्‌का वध करके कृतकृत्य हो कन्यासहित मणिको ग्रहण कर लिया।$^२$ घर लौटकर भगवान् जनार्दनने समस्त सात्वतोंकी भरी सभामें वह मणि सत्राजित्‌को समर्पित कर दी; क्योंकि वे उस मिथ्यापवादसे अत्यन्त दुःखी थे। उस समय सभी यदुवंशियोंने वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्णसे यों कहा—'श्रीकृष्ण! हमलोगोंका तो यह दृढ़ निश्चय था कि प्रसेन तुम्हारे ही हाथों मारा गया है।

१. अन्य भागवत, विष्णु आदि पुराणोंके अनुसार सिंहने प्रसेनको और जाम्बवान्ने सिंहको मारा है। परिष्कारदृष्ट्या मत्स्यपुराणकी भागवतादिसे पूर्व स्थिति सिद्ध होती है।
२. यह कथा प्रायः कल्किपुराणसे मिलती है। शेष अन्य भागवत, विष्णु आदि पुराणोंमें जाम्बवान् कन्या-दान करनेके बाद भी जीवित ही रहते हैं। कल्किपुराणके अन्तमें जाम्बवान् तथा शशविन्दुकी ऐसी स्थिति हुई है।

१६२ * मत्स्यपुराण *


| कैकेयस्य सुता भार्या दश सत्राजितः शुभाः।<br>तासूत्पन्नाः सुतास्तस्य शतमेकं तु विश्रुताः।<br>ख्यातिमन्तो महावीर्या भङ्गकारस्तु पूर्वजः ॥ १९<br>अथ व्रतवती तस्माद् भङ्गकारात् तु पूर्वजात्।<br>सुषुवे सुकुमारीस्तु तिस्रः कमललोचनाः ॥ २०<br>सत्यभामा वरा स्त्रीणां व्रतिनी च दृढव्रता।<br>तथा पद्मावती चैव ताश्च कृष्णाय सोऽददात् ॥ २१<br>अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्।<br>सत्यकस्तस्य पुत्रस्तु सात्यकिस्तस्य चात्मजः ॥ २२<br>सत्यवान् युयुधानस्तु शिनेर्नप्ता प्रतापवान्।<br>असङ्गो युयुधानस्य द्युम्निस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ २३<br>द्युम्नेर्युगंधरः पुत्र इति शैनेयाः प्रकीर्तिताः।<br>अनमित्रान्वयो ह्येष व्याख्यातो वृष्णिवंशजः ॥ २४<br>अनमित्रस्य संजज्ञे पृथ्व्यां वीरो युधाजितः।<br>अन्यो तु तनयौ वीरौ वृषभः क्षत्र एव च ॥ २५<br>वृषभः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत।<br>जयन्तस्तु जयन्त्यां तु पुत्रः सम्भवच्छुभः ॥ २६<br>सदायज्ञोऽतिवीरश्च श्रुतवानतिथिप्रियः।<br>अक्रूरः सुषुवे तस्मात् सदायज्ञोऽतिदक्षिणः ॥ २७<br>रत्ना कन्या च शैब्यस्य अक्रूरस्तामवाप्तवान्।<br>पुत्रानुत्पादयामास त्वेकादश महाबलान् ॥ २८<br>उपलम्भः सदालम्भो वृकलो वीर्य एव च।<br>सवीतरः सदापक्षः शत्रुघ्नो वारिमेजायः ॥ २९<br>धर्मभृद् धर्मवर्माणो धृष्टमानस्तथैव च।<br>सर्वे च प्रतिहोतारो रत्नायां जज्ञिरे च ते ॥ ३०<br>अक्रूरादुग्रसेनायां सुतौ द्वौ कुलवर्धनौ।<br>देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसंनिभौ ॥ ३१<br>अश्विन्यां च ततः पुत्राः पृथुर्विपृथुरेव च।<br>अश्वत्थामा सुबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ ॥ ३२<br>वृष्टिनेमिः सुधर्मा च तथा शर्यातिरेव च।<br>अभूमिवर्जभूमिश्च श्रमिष्ठः श्रवणस्तथा ॥ ३३<br>इमां मिथ्याभिशस्तिं यो वेद कृष्णादपोहिताम्।<br>न स मिथ्याभिशापेन अभिशाप्योऽथ केनचित् ॥ ३४ | केकयराजकी दस सौन्दर्यशालिनी कन्याएँ सत्राजित्की पत्नियाँ थीं। उनके गर्भसे सत्राजित्के एक सौ पुत्र उत्पन्न हुए थे, जो विश्वविख्यात, प्रशंसित एवं महान् पराक्रमी थे। उनमें भंगकार ज्येष्ठ था। उस ज्येष्ठ भंगकारके संयोगसे व्रतवतीने तीन कमलनयनी सुकुमारी कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम हैं—स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यभामा, दृढव्रतपरायणा व्रतिनी तथा पद्मावती। भंगकारने इन तीनोंको पत्नीरूपमें श्रीकृष्णको प्रदान किया था। कनिष्ठ वृष्णिनन्दन अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ। उसका पुत्र सत्यक और सत्यकका पुत्र सात्यकि हुआ। सत्यवान् और प्रतापी युयुधान—ये दोनों शिनिके नाती थे। युयुधानका पुत्र असंग और उसका पुत्र द्युम्नि हुआ। द्युम्निका पुत्र युगंधर हुआ। इस प्रकार यह शिनि-वंशका वर्णन किया गया॥ १५—२३ १/२॥<br><br>अब मैं वृष्णि-वंशमें उत्पन्न अनमित्रके वंशका वर्णन कर रहा हूँ। अनमित्रकी दूसरी पत्नी पृथ्वीके गर्भसे वीरवर युधाजित् पैदा हुए। उनके वृषभ और क्षत्र नामवाले दो अन्य शूरवीर पुत्र थे। वृषभने काशिराजकी जयन्ती नामकी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त (ग्रहण) किया। उन्हें उस जयन्तीके गर्भसे जयन्त नामक अत्यन्त सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ, जो सदा यज्ञानुष्ठानमें निरत रहनेवाला, महान् शूरवीर, शास्त्रज्ञ तथा अतिथियोंका प्रेमी था। उससे अक्रूर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वह भी आगे चलकर सदा यज्ञानुष्ठानशील और विपुल दक्षिणा देनेवाला हुआ। शिवि-नरेशकी एक रत्ना नामकी कन्या थी, जिसे अक्रूरने पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे ग्यारह महाबली पुत्रोंको उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं—उपलम्भ, सदालम्भ, वृकल, वीर्य, सविता, सदापक्ष, शत्रुघ्न, वारिमेज, धर्मभृद्, धर्मवर्मा और धृष्टमान। रत्नाके गर्भसे उत्पन्न हुए ये सभी पुत्र यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले थे। अक्रूरके संयोगसे उग्रसेनाके गर्भसे देववान् और उपदेव नामक दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे, जो देवताके सदृश शोभाशाली और वंश-विस्तारक थे। उन्हींकी दूसरी पत्नी अश्विनीके गर्भसे पृथु, विपृथु, अश्वत्थामा, सुबाहु, सुपार्श्वक, गवेषण, वृष्टिनेमि, सुधर्मा, शर्याति, अभूमि, वर्जभूमि, श्रमिष्ठ तथा श्रवण—ये तेरह पुत्र भी पैदा हुए थे। जो मनुष्य श्रीकृष्णके शरीरसे हटाये गये इस मिथ्यापवादको जानता है, वह किसीके भी द्वारा मिथ्याभिशापसे अभिशस्त नहीं किया जा सकता॥२४—३४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णनमें पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥

* अध्याय ४६ *१६३

छियालीसवाँ अध्याय

वृष्णि-वंशका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
ऐक्ष्वाकी सुषुवे शूरं ख्यातमद्भुतमीढुषम्।<br>पौरुषाज्जज्ञिरे शूराद् भोजायां पुत्रका दश॥ १ऋषियो! ऐक्ष्वाकी (माद्री)-ने शूर (शूरसेन) नामक एक अद्भुत पुत्रको जन्म दिया, जो आगे चलकर ईढुष (देवमीढुष) नामसे विख्यात हुआ। पुरुषार्थी शूरके सम्पर्कसे भोजाके गर्भसे दस पुत्रों और पाँच सुन्दरी कन्याओंकी उत्पत्ति हुई।
वसुदेवो महाबाहुः पूर्वमानकदुन्दुभिः।<br>देवभागस्ततो जज्ञे ततो देवश्रवाः पुनः॥ २पुत्रोंमें सर्वप्रथम महाबाहु वसुदेव उत्पन्न हुए, जिनकी आनकदुन्दुभि नामसे भी प्रसिद्धि हुई। उसके बाद देवभाग-(देवमार्ग)-का जन्म हुआ। तत्पश्चात् पुनः देवश्रवा,
अनाधृष्टिः शिनिश्चैव नन्दश्चैव ससृञ्जयः।<br>श्यामः शमीकः संयूपः पञ्च चास्य वराङ्गनाः॥ ३अनाधृष्टि, शिनि, नन्द, सृञ्जय, श्याम, शमीक और संयूप पैदा हुए। कन्याओंके नाम हैं—
श्रुतकीर्तिः पृथा चैव श्रुतदेवी श्रुतश्रवाः।<br>राजाधिदेवी च तथा पञ्चैता वीरमातरः॥ ४श्रुतकीर्ति, पृथा, श्रुतादेवी, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। ये पाँचों शूरवीर पुत्रोंकी माताएँ हुईं।
कृतस्य तु श्रुतादेवी सुग्रीवं सुषुवे सुतम्।<br>कैकेय्यां श्रुतकीर्त्यां तु जज्ञे सोऽनुव्रतो नृपः॥ ५कृतकी पत्नी श्रुतदेवीने सुग्रीव नामक पुत्रको जन्म दिया। केकय देशकी राजमहिषी श्रुतकीर्तिके गर्भसे राजा अनुव्रतने जन्म लिया।
श्रुतश्रवसि चैद्यस्य सुनीथः समपद्यत।<br>बहुशो धर्मचारी स सम्बभूवारिमर्दनः॥ ६चेदि-नरेशकी पत्नी श्रुतश्रवाके गर्भसे एक सुनीथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो अनेकों प्रकारके धर्मोंका आचरण करनेवाला एवं शत्रुओंका विनाशक था।
अथ सख्येन वृद्धोऽसौ कुन्तिभोजे सुतां ददौ।<br>एवं कुन्ती समाख्याता वसुदेवस्वसा पृथा॥ ७तत्पश्चात् शूरने अपनी पृथा नाम्नी कन्याको मित्रतावश वृद्ध राजा कुन्तिभोजको पुत्रीरूपमें दे दिया। इसी कारण वसुदेवकी बहन यह पृथा कुन्ती नामसे विख्यात हुई।
वसुदेवेन सा दत्ता पाण्डोर्भार्या ह्यनिन्दिता।<br>पाण्डोरर्थेन सा जज्ञे देवपुत्रान् महारथान्॥ ८उसे वसुदेवने पाण्डुको (पत्नीरूपमें) प्रदान किया था। उस अनिन्द्यसुन्दरी पाण्डु-पत्नी कुन्तीने पाण्डुकी वंशवृद्धिके लिये (पतिकी आज्ञासे) महारथी देवपुत्रोंको जन्म दिया था।
धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे वायोरर्जज्ञे वृकोदरः।<br>इन्द्राद् धनञ्जयश्चैव शक्रतुल्यपराक्रमः॥ ९उनमें धर्मके संयोगसे युधिष्ठिर पैदा हुए, वायुके सम्पर्कसे वृकोदर (भीमसेन)-का जन्म हुआ और इन्द्रके सकाशसे इन्द्रके ही समान पराक्रमी धनञ्जय (अर्जुन)-की उत्पत्ति हुई।
माद्रवत्यां तु जनितावश्विभ्यामिति शुश्रुमः।<br>नकुलः सहदेवश्च रूपशीलगुणान्वितौ॥ १०साथ ही अश्विनीकुमारोंके संयोगसे माद्रवती (माद्री)-के गर्भसे रूप, शील एवं सद्गुणोंसे समन्वित नकुल और सहदेव पैदा हुए—ऐसा हमलोगोंने सुना है॥ १–१०॥
१६४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रोहिणी पौरवी चैव पत्न्यावानकदुन्दुभेः।<br>लेभे ज्येष्ठं सुतं रामं सारणं च सुतं प्रियम्॥ ११<br>दुर्दमं दमनं सुभ्रुं पिण्डारकमहाहनू।<br>चित्राक्ष्यौ द्वे कुमार्यौ तु रोहिण्यां जज्ञिरे तदा॥ १२<br>देवक्यां जज्ञिरे शौरेः सुषेणः कीर्तिमानपि।<br>उदारो भद्रसेनश्च भद्रवासस्तथैव च।<br>षष्ठो भद्रविदेहश्च कंसः सर्वानघातयत्॥ १३<br>अथ तस्यामवस्थायामायुष्मान् संबभूव ह।<br>लोकनाथो महाबाहुः पूर्वकृष्णः प्रजापतिः॥ १४<br>अनुजा त्वभवत् कृष्णात् सुभद्रा भद्रभाषिणी।<br>देवक्यां तु महातेजा जज्ञे शूरी महायशाः॥ १५<br>सहदेवस्तु ताम्रायां जज्ञे शौरिकुलोद्वहः।<br>उपासङ्गधरं लेभे तनयं देवरक्षिता।<br>एकां कन्यां च सुभगां कंसस्तामभ्यघातयत्॥ १६<br>विजयं रोचमानं च वर्धमानं तु देवलम्।<br>एते सर्वे महात्मानो ह्युपदेव्यां प्रजज्ञिरे॥ १७<br>अवगाहो महात्मा च वृकदेव्यामजायत।<br>वृकदेव्यां स्वयं जज्ञे नन्दनो नाम नामतः॥ १८आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-के संयोगसे रोहिणी (उनकी चौबीस पत्नियोंमें प्रथम)-ने विश्वविख्यात ज्येष्ठ पुत्र राम-(बलराम)-को, तत्पश्चात् प्रिय पुत्र सारण, दुर्दम, दमन, सुभ्रु, पिण्डारक और महाहनुको प्राप्त किया। (उनकी दूसरी पत्नी पौरवीके भी भद्र, सुभद्रादि पुत्र हुए।) उसी समय रोहिणीके गर्भसे चित्रा और अक्षी नामवाली (अथवा सुन्दर नेत्रोंवाली) दो कन्याएँ भी पैदा हुई। वसुदेवजीके सम्पर्कसे देवकीके गर्भसे सुषेण, कीर्तिमान्, उदार, भद्रसेन, भद्रवास और छठा भद्रविदेह नामक पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिन्हें कंसने मार डाला। फिर उसी समय (देवकीके गर्भसे) आयुष्मान् लोकनाथ महाबाहु प्रजापति श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए। श्रीकृष्णके बाद उनकी छोटी बहन शुभभाषिणी सुभद्रा पैदा हुई। तदनन्तर देवकीके गर्भसे महान् तेजस्वी एवं महायशस्वी शूरी नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ताम्राके गर्भसे शौरिकुलका उद्वहन करनेवाला सहदेव नामक पुत्र पैदा हुआ। देवरक्षिताने उपासङ्गधर नामक पुत्रको और एक सुन्दरी कन्याको, जिसे कंसने मार डाला, उत्पन्न किया। विजय, रोचमान, वर्धमान और देवल—ये सभी महान् आत्मबलसे सम्पन्न पुत्र उपदेवीके गर्भसे पैदा हुए थे। महात्मा अवगाह वृकदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए। इसी वृकदेवीके गर्भसे नन्दन नामक एक और पुत्र पैदा हुआ था॥ ११–१८॥
सप्तमं देवकीपुत्रं मदनं सुषुवे नृप।<br>गवेषणं महाभागं संग्रामेष्वपराजितम्॥ १९<br>श्रद्धादेव्या विहारे तु वने हि विचरन् पुरा।<br>वैश्यायामदधाच्छौरिः पुत्रं कौशिकमग्रजम्॥ २०<br>सुतनू रथराजी च शौरेरास्तां परिग्रहौ।<br>पुण्ड्रश्च कपिलश्चैव वसुदेवात्मजौ बलौ॥ २१<br>जरा नाम निषादोऽभूत् प्रथमः स धनुर्धरः।<br>सौभद्रश्च भवश्चैव महासत्त्वौ बभूवतुः॥ २२राजन्! देवकीने अपने सातवें पुत्र मदनको तथा संग्राममें अजेय एवं महान् भाग्यशाली गवेषणको जन्म दिया था। इससे पूर्व श्रद्धादेवीके साथ विहारके अवसरपर वनमें विचरण करते हुए शूरनन्दन वसुदेवने एक वैश्य-कन्याके उदरमें गर्भाधान किया, जिससे कौशिक नामक ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ। वसुदेवजीकी (नवीं) सुतनु और (दसवीं)* रथराजी नामकी दो पत्नियाँ और थीं। उनके गर्भसे वसुदेवके पुण्ड्र और कपिल नामक दो पुत्र तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न सौभद्र और भव नामक दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे। उनमें जो ज्येष्ठ था,

* यहाँ वसुदेवजीकी दस, पर हरिवंशपु० १, ब्रह्मपु० ४। ३६ आदिमें चौदह पत्नियाँ और उनकी संततियाँ निर्दिष्ट हैं।

* अध्याय ४७ *१६५

| देवभागसुतश्चापि नाम्नासावुद्धवः स्मृतः।<br>पण्डितं प्रथमं प्राहुर्देवश्रवःसमुद्भवम् ॥ २३<br>ऐक्ष्वाक्यलभतापत्यमनाधृष्टैर्यशस्विनी ।<br>निधूतसत्त्वं शत्रुघ्नं श्राद्धस्तस्मादजायत ॥ २४<br>करूषायानपत्याय कृष्णस्तुष्टः सुतं ददौ।<br>सुचन्द्रं तु महाभागं वीर्यवन्तं महाबलम् ॥ २५<br>जाम्बवत्याः सुतावेतौ द्वौ च सत्कृतलक्षणौ।<br>चारुदेष्णश्च साम्बश्च वीर्यवन्तौ महाबलौ ॥ २६<br>तन्तिपालश्च तन्तिश्च नन्दनस्य सुतावुभौ।<br>शमीकपुत्राश्चत्वारो विक्रान्ताः सुमहाबलाः।<br>विराजश्च धनुश्चैव श्यामश्च सृञ्जयस्तथा ॥ २७<br>अनपत्योऽभवच्छ्यामः शमीकस्तु वनं ययौ।<br>जुगुप्समानो भोजत्वं राजर्षित्वमवाप्तवान्॥ २८<br>कृष्णस्य जन्माभ्युदयं यः कीर्तयति नित्यशः।<br>शृणोति मानवो नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २९ | वह जरा नामक निषाद हुआ, जो महान् धनुर्धर था। देवभागका पुत्र उद्धव नामसे प्रसिद्ध था। देवश्रवाके प्रथम पुत्रको पण्डित नामसे पुकारा जाता था। यशस्विनी ऐक्ष्वाकीने अनाधृष्टिके संयोगसे शत्रुसंहारक निधूतसत्त्व नामक पुत्रको प्राप्त किया। निधूतसत्त्वसे श्राद्धकी उत्पत्ति हुई। संतानहीन करूषपर प्रसन्न होकर श्रीकृष्णने उसे एक सुचन्द्र नामक पुत्र प्रदान किया था, जो महान् भाग्यशाली, पराक्रमी और महाबली था। जाम्बवतीके चारुदेष्ण और साम्ब—ये दोनों पुत्र उत्तम लक्षणोंसे युक्त, पराक्रमी और महान् बलसम्पन्न थे। नन्दनके तन्तिपाल और तन्तिनामक दो पुत्र हुए। शमीकके चारों पुत्र विराज, धनु, श्याम और सृञ्जय अत्यन्त पराक्रमी और महाबली थे। इनमें श्याम तो संतानहीन हो गया और शमीक भोजवंशके आचार-व्यवहारकी निन्दा करता हुआ वनमें चला गया, वहाँ आराधना करके उसने राजर्षिकी पदवी प्राप्त की। जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके इस जन्म एवं अभ्युदयका नित्य कीर्तन (पाठ) अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥१९–२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे वृष्णिवंशानुकीर्तनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें वृष्णिवंशानुकीर्तन नामक छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४६॥


सैंतालीसवाँ अध्याय

श्रीकृष्ण-चरित्रका वर्णन, दैत्योंका इतिहास तथा देवासुर-संग्रामके प्रसङ्गमें विभिन्न अवान्तर कथाएँ

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अथ देवो महादेवः पूर्वं कृष्णः प्रजापतिः।<br>विहारार्थं स देवेशो मानुषेष्विह जायते॥ १<br>देवक्यां वसुदेवस्य तपसा पुष्करेक्षणः।<br>चतुर्बाहुस्तदा जातो दिव्यरूपो ज्वलञ्श्रिया॥ २<br>श्रीवत्सलक्षणं देवं दृष्ट्वा दिव्यैश्च लक्षणैः।<br>उवाच वसुदेवस्तं रूपं संहर वै प्रभो ॥ ३ऋषियो! पूर्वकालमें जो प्रजाओंके स्वामी थे, वे ही देवाधिदेव महादेव श्रीकृष्ण लीला-विहार करनेके लिये मृत्युलोकमें मानव-योनिमें अवतीर्ण हुए। वे वसुदेवजीकी तपस्यासे देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए। उनके नेत्र कमल-सदृश अति रमणीय थे, उनके चार भुजाएँ थीं, उनका दिव्य रूप दिव्य कान्तिसे प्रज्वलित हो रहा था और उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सके चिह्नसे विभूषित था। वसुदेवजीने इन दिव्य लक्षणोंसे सम्पन्न श्रीकृष्णको देखकर उनसे कहा—
१६६* मत्स्यपुराण *

| भीतोऽहं देव कंसस्य ततस्त्वेतद् ब्रवीमि ते।<br>मम पुत्रा हतास्तेन ज्येष्ठास्ते भीमविक्रमाः॥ ४<br><br>वसुदेववचः श्रुत्वा रूपं संहरतेऽच्युतः।<br>अनुज्ञाप्य ततः शौरिं नन्दगोपगृहेऽनयत्॥ ५<br><br>दत्त्वैनं नन्दगोपस्य रक्ष्यतामिति चाब्रवीत्।<br>अतस्तु सर्वकल्याणं यादवानां भविष्यति।<br>अयं तु गर्भो देवक्यां जातः कंसं हनिष्यति॥ ६ | 'प्रभो! आप इस रूपको समेट लीजिये। देव! मैं कंससे डरा हुआ हूँ, इसलिये आपसे ऐसा कह रहा हूँ; क्योंकि उसने मेरे उन अत्यन्त पराक्रमी (छः) पुत्रोंको मार डाला है, जो आपसे ज्येष्ठ थे।' वसुदेवजीकी बात सुनकर अच्युतभगवान्‌ने शूरनन्दन वसुदेवजीको (अपनेको नन्दके घर पहुँचा देनेकी) आज्ञा देकर उस रूपका संवरण कर लिया। (तब वसुदेवजी उन्हें नन्दगोपके घर ले गये और) उन्हें नन्दगोपके हाथमें समर्पित करके यों बोले—'सखे! इस (बालक)की रक्षा करो, इससे यदुवंशियोंका सब प्रकारसे कल्याण होगा। देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुआ यह बालक कंसका वध करेगा'॥ १—६॥ | | ऋषय ऊचुः<br><br>क एष वसुदेवस्तु देवकी च यशस्विनी।<br>नन्दगोपश्च कस्त्वेष यशोदा च महाव्रता॥ ७<br><br>यो विष्णुं जनयामास यं च तातेत्यभाषत।<br>या गर्भं जनयामास या चैनं त्वभ्यवर्धयत्॥ ८ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! ये वसुदेव कौन थे, जिन्होंने भगवान् विष्णुको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और जिन्हें भगवान् 'तात-पिता' कहकर पुकारते थे तथा यशस्विनी देवकी कौन थीं, जिन्होंने भगवान्‌को अपने गर्भसे जन्म दिया? साथ ही ये नन्दगोप कौन थे तथा महाव्रतपरायणा यशोदा कौन थीं, जिन्होंने बालकरूपमें भगवान्‌का पालन-पोषण किया?॥ ७-८॥ | | सूत उवाच<br><br>पुरुषः कश्यपस्त्वासीददितिस्तु प्रिया स्मृता।<br>ब्रह्मणः कश्यपस्त्वंशः पृथिव्यास्त्वदितिस्तथा॥ ९<br><br>अथ कामान् महाबाहुर्देवक्याः समपूरयत्।<br>ये तया काङ्क्षिता नित्यमजातस्य महात्मनः॥ १०<br><br>सोऽवतीर्णो महीं देवः प्रविष्टो मानुषीं तनुम्।<br>मोहयन् सर्वभूतानि योगात्मा योगमायया॥ ११<br><br>नष्टे धर्मे तथा जज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले प्रभुः।<br>कर्तुं धर्मस्य संस्थानमसुराणां प्रणाशनम्॥ १२<br><br>रुक्मिणी सत्यभामा च सत्या नाग्नजिती तथा।<br>सुभामा च तथा शैव्या गान्धारी लक्ष्मणा तथा॥ १३<br><br>मित्रविन्दा च कालिन्दी देवी जाम्बवती तथा।<br>सुशीला च तथा माद्री कौसल्या विजया तथा।<br>एवमादीनि देवीनां सहस्राणि च षोडश॥ १४<br><br>रुक्मिणी जनयामास पुत्रान् रणविशारदान्।<br>चारुदेष्णं रणे शूरं प्रद्युम्नं च महाबलम्॥ १५ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! पुरुष (वसुदेवजी) कश्यप हैं और उनकी प्रिय पत्नी देवकी अदिति (प्रकृति) कही गयी हैं। कश्यप ब्रह्माके अंश हैं और अदिति पृथ्वीका। देवकी देवीने अजन्मा एवं महात्मा परमेश्वरसे जो कामनाएँ की थीं, उन सभी कामनाओंको महाबाहु श्रीकृष्णने पूर्ण कर दिया। वे ही योगात्मा भगवान् योगमायाके आश्रयसे समस्त प्राणियोंको मोहित करते हुए मानव-शरीर धारण करके भूतलपर अवतीर्ण हुए। उस समय धर्मका ह्रास हो चुका था, अतः धर्मकी स्थापना और असुरोंका विनाश करनेके लिये उन सामर्थ्यशाली विष्णुने वृष्णिकुलमें जन्म धारण किया। रुक्मिणी, सत्यभामा, नग्नजित्की कन्या सत्या, सुभामा, शैब्या, गान्धारराजकुमारी लक्ष्मणा, मित्रविन्दा, देवी कालिन्दी, जाम्बवती, सुशीला, मद्रराजकुमारी कौसल्या तथा विजया आदि सोलह हजार देवियाँ श्रीकृष्णकी पत्नियाँ थीं। रुक्मिणीने ग्यारह पुत्रोंको जन्म दिया; जो सभी युद्धकर्ममें निष्णात थे। उनके नाम |

* अध्याय ४७ *१६७
सुचारुं भद्रचारुं च सुदेष्णं भद्रमेव च।<br>परशुं चारुगुप्तं च चारुभद्रं सुचारुकम्।<br><br>चारुहासं कनिष्ठं च कन्यां चारुमतीं तथा॥ १६हैं—महाबली प्रद्युम्न, रणशूर चारुदेष्ण, सुचारु, भद्रचारु, सुदेष्ण, भद्र, परशु, चारुगुप्त, चारुभद्र, सुचारुक और सबसे छोटा चारुहास। रुक्मिणीसे एक चारुमती नामकी कन्या भी उत्पन्न हुई थी॥ ९—१६॥
जज्ञिरे सत्यभामायां भानुर्भ्रमरतेक्षणः।<br>रोहितो दीप्तिमांश्चैव ताम्रश्चक्रो जलंधमः॥ १७<br>चतस्रो जज्ञिरे तेषां स्वसारस्तु यवीयसीः।<br>जाम्बवत्याः सुतो जज्ञे साम्बः समितिशोभनः॥ १८<br>मित्रवान् मित्रविन्दश्च मित्रविन्दा वराङ्गना।<br>मित्रबाहुः सुनीथश्च नाग्नजित्याः प्रजा हि सा॥ १९<br>एवमादीनि पुत्राणां सहस्राणि निबोधत।<br>शतं शतसहस्राणां पुत्राणां तस्य धीमतः॥ २०<br>अशीतिश्च सहस्राणि वासुदेवसुतास्तथा।<br>लक्षमेकं तथा प्रोक्तं पुत्राणां च द्विजोत्तमाः॥ २१<br>उपासङ्गस्य तु सुतौ वज्रः संक्षिम एव च।<br>भूरीन्द्रसेनो भूरिश्च गवेषणसुतावुभौ॥ २२<br>प्रद्युम्नस्य तु दायादो वैदर्भ्यां बुद्धिसत्तमः।<br>अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो जज्ञेऽस्य मृगकेतनः॥ २३<br>काश्या सुपार्श्वतनया साम्बाल्लेभे तरस्विनः।<br>सत्यप्रकृतयो देवाः पञ्च वीराः प्रकीर्तिताः॥ २४<br>तिस्रः कोट्यः प्रवीराणां यादवानां महात्मनाम्।<br>षष्टिः शतसहस्राणि वीर्यवन्तो महाबलाः॥ २५<br><br>देवांशाः सर्व एवेह ह्युत्पन्नास्ते महौजसः।<br>देवासुरे हता ये च त्वसुरा ये महाबलाः॥ २६<br><br>इहोत्पन्ना मनुष्येषु बाधन्ते सर्वमानवान्।<br>तेषामुत्सादनार्थाय उत्पन्नो यादवे कुले॥ २७<br><br>कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम्।<br>सर्वमेतत् कुलं यावद् वर्तते वैष्णवे कुले॥ २८<br><br>विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।<br>निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः॥ २९सत्यभामाके गर्भसे भानु, भ्रमरतेक्षण, रोहित, दीप्तिमान्, ताम्र, चक्र और जलन्ध नामक पुत्र उत्पन्न हुए थे। इनकी चार छोटी बहनें भी पैदा हुई थीं। जाम्बवतीके संग्रामशोभी साम्ब नामक पुत्र पैदा हुआ। श्रेष्ठ सुन्दरी मित्रविन्दाने मित्रवान् और मित्रविन्दको तथा नाग्नजिती सत्याने मित्रबाहु और सुनीथको पुत्ररूपमें जन्म दिया। इसी प्रकार अन्य पत्नियोंसे भी हजारों पुत्रोंकी उत्पत्ति समझ लीजिये। द्विजवरो! इस प्रकार उन बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पुत्रोंकी संख्या एक करोड़ एक लाख अस्सी हजार बतलायी गयी है। उपासङ्गके दो पुत्र वज्र और संक्षिस थे। भूरीन्द्रसेन और भूरि—ये दोनों गवेषणके पुत्र थे। प्रद्युम्नके विदर्भ-राजकुमारीके गर्भसे अनिरुद्ध नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो परम बुद्धिमान् एवं युद्धमें उत्साहपूर्वक लड़नेवाला वीर था। अनिरुद्धके पुत्रका नाम मृगकेतन था। पार्श्वनन्दिनी काश्याने साम्बके संयोगसे ऐसे पाँच पुत्रोंको जन्म दिया, जो तरस्वी (एवं फुर्तीले), सत्यवादी, देवोंके समान सौन्दर्यशाली और शूरवीर थे। इस प्रकार प्रबल शूरवीर एवं महात्मा यादवोंकी संख्या तीन करोड़ थी, उनमें साठ लाख तो महाबली और महान् पराक्रमी थे। ये सभी महान् ओजस्वी यादव देवताओंके अंशसे ही भूतलपर उत्पन्न हुए थे। देवासुर-संग्राममें जो महाबली असुर मारे गये थे, वे ही भूतलपर मानव-योनिमें उत्पन्न होकर सभी मानवोंको कष्ट दे रहे थे। उन्हींका संहार करनेके लिये भगवान् यदुकुलमें अवतीर्ण हुए। इन महाभाग यादवोंके एक सौ एक कुल हैं। ये सब-के-सब कुल विष्णुसे सम्बन्धित कुलके अंदर ही वर्तमान थे। भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) उनके नेता और स्वामी थे तथा वे सभी यादव श्रीकृष्णकी आज्ञाके अधीन रहते थे—ऐसा कहा जाता है॥ १७—२९॥

१६८ * मत्स्यपुराण *


श्लोक (संस्कृत)हिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>सप्तर्षयः कुबेरश्च यक्षो मणिचरस्तथा*।<br>शालङ्किर्नारदश्चैव सिद्धो धन्वन्तरिस्तथा॥ ३०<br>आदिदेवस्तथा विष्णुरेभिस्तु सहदैवतैः।<br>किमर्थं सङ्घशो भूताः स्मृताः सम्भूतयः कति॥ ३१<br>भविष्याः कति चैवान्ये प्रादुर्भावा महात्मनः।<br>ब्रह्मक्षत्रेषु शान्तेषु किमर्थमिह जायते॥ ३२<br>यदर्थमिह सम्भूतो विष्णुर्वृष्ण्यन्धकोत्तमः।<br>पुनः पुनर्मनुष्येषु तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्॥ ३३ऋषियोंने पूछा— सूतजी! सप्तर्षि, कुबेर, यक्ष मणिचर (मणिभद्र), शालङ्कि, नारद, सिद्ध, धन्वन्तरि तथा देवसमाज—इन सबके साथ आदिदेव भगवान् विष्णु संघबद्ध होकर किसलिये अवतीर्ण होते हैं? इन महापुरुषके कितने अवतार हो चुके और भविष्यमें कितने अन्य अवतार होनेवाले हैं? ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके थक जानेपर ये किस कारण भूतलपर उत्पन्न होते हैं? वृष्णि और अन्धकवंशमें सर्वश्रेष्ठ विष्णु (श्रीकृष्ण) जिस प्रयोजनसे भूतलपर बारंबार मानव-योनिमें प्रकट होते हैं, वह सभी कारण हम सब प्रश्नकर्ताओंको बतलाइये॥ ३०—३३॥
सूत उवाच<br>त्यक्त्वा दिव्यां तनुं विष्णुर्मानुषेष्विह जायते।<br>युगे त्वथ परावृत्ते काले प्रशिथिले प्रभुः॥ ३४<br>देवासुरविमर्देषु जायते हरिरीश्वरः।<br>हिरण्यकशिपौ दैत्ये त्रैलोक्यं प्राक् प्रशासति॥ ३५<br>बलिनाधिष्ठिते चैव पुरा लोकत्रये क्रमात्।<br>सख्यमासीत् परमकं देवानामसुरैः सह॥ ३६<br>युगाख्यासुरसम्पूर्णं ह्यासीद्दत्याकुलं जगत्।<br>निदेशस्थायिनश्चापि तयोर्देवासुराः समम्॥ ३७<br>मृधो बलिविमर्दार्थं सम्प्रवृद्धः सुदारुणः।<br>देवानामसुराणां च घोरः क्षयकरो महान्॥ ३८<br>कर्तुं धर्मव्यवस्थानं जायते मानुषेष्विह।<br>भृगोः शापनिमित्तं तु देवासुरकृते तदा॥ ३९सूतजी कहते हैं— ऋषियो! युग-युगमें जब लोग धर्मसे विमुख हो जाते हैं तथा शुभ कर्मोंमें विशेषरूपसे शिथिलता आ जाती है, तब भगवान् विष्णु अपने दिव्य शरीरका त्यागकर भूतलपर मानव-योनिमें प्रकट होते हैं। पूर्वकालमें दैत्यराज हिरण्यकशिपुके त्रिलोकीका शासन करते समय देवासुर-संग्रामके अवसरपर भगवान् श्रीहरि अवतीर्ण हुए थे। इसी प्रकार क्रमशः जब बलि तीनों लोकोंपर अधिष्ठित था, उस समय देवताओंकी असुरोंके साथ प्रगाढ मैत्री हो गयी थी। ऐसा समय एक युगत्तक चलता रहा। उस समय सारा जगत् असुरोंसे व्याप्त होकर अत्यन्त व्याकुल हो उठा था। देवता और असुर—दोनों समानरूपसे उसकी आज्ञाके अधीन थे। अन्तमें (बलि-बन्धनके समय) बलिके विमर्दन करनेके लिये देवताओं और असुरोंके बीच अत्यन्त भयंकर एवं महान् विनाशकारी घोर संग्राम प्रारम्भ हो गया। तब भगवान् विष्णु धर्मकी व्यवस्था करनेके लिये तथा देवताओं और असुरोंके प्रति दिये गये भृगुके शापके कारण पृथ्वीपर मानव-योनिमें उत्पन्न हुए॥ ३४—३९॥
ऋषय ऊचुः<br>कथं देवासुरकृते व्यापारं प्राप्तवान् स्वतः।<br>देवासुरं यथा वृत्तं तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्॥ ४०ऋषियोंने पूछा— सूतजी! उस समय भगवान् विष्णु देवताओं और असुरोंके लिये अपने-आप इस अवताररूप कार्यमें कैसे प्रवृत्त हुए थे? तथा वह देवासुरसंग्राम जिस प्रकार हुआ था? वह सब हमलोगोंको बतलाइये॥ ४०॥
सूत उवाच<br>तेषां दायनिमित्तं ते संग्रामास्तु सुदारुणाः।<br>वराहाद्या दश द्वौ च षण्डामर्कोन्तरे स्मृताः॥ ४१सूतजी कहते हैं— ऋषियो! पूर्वकालमें वराह आदि बारह अत्यन्त भयंकर देवासुर-संग्राम भागप्राप्तिके निमित्त हुए थे।

* वायुपुराण ९७। ३ आदिमें मणिकर और मणिरथ पाठ है, सबका भाव 'मणिभद्र' से ही है।

* अध्याय ४७ *१६९
नामतस्तु समासेन शृणु तेषां विवक्षतः।<br>प्रथमो नारसिंहस्तु द्वितीयश्चापि वामनः॥ ४२<br><br>देवासुरक्षयकराः प्रजानां तु हिताय वै।<br>तृतीयस्तु वराहश्च चतुर्थोऽमृतमन्थनः।<br>संग्रामः पञ्चमश्चैव संजातस्तारकामयः॥ ४३<br><br>षष्ठो ह्याडीवकाख्यस्तु सप्तमस्त्रैपुरस्तथा।<br>अन्धकाख्योऽष्टमस्तेषां नवमो वृत्रघातकः॥ ४४<br><br>धात्रश्च दशमश्चैव ततो हालाहलः स्मृतः।<br>प्रथितो द्वादशस्तेषां घोरः कोलाहलस्तथा॥ ४५<br><br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नारसिंहेन पातितः।<br>वामनेन बलिर्बद्धस्त्रैलोक्याक्रमणे पुरा॥ ४६<br><br>हिरण्याक्षो हतो द्वन्द्वे प्रतिघाते तु दैवतैः।<br>दंष्ट्रया तु वराहेण समुद्रस्तु द्विधा कृतः॥ ४७<br><br>प्रह्लादो निर्जितो युद्धे इन्द्रेणामृतमन्थने।<br>विरोचनस्तु प्रह्लादिर्नित्यमिन्द्रवधोद्यतः॥ ४८<br><br>इन्द्रेणैव तु विक्रम्य निहतस्तारकामये।<br>अशक्नुवन् स देवानां सर्वं सोढुं सदैवतम्॥ ४९<br><br>निहता दानवाः सर्वे त्रैलोक्ये त्र्यम्बकेण तु।<br>असुराश्च पिशाचाश्च दानवाश्चान्धकाहवे॥ ५०<br><br>हता देवमनुष्ये स्वे पितृभिश्चैव सर्वशः।<br>सम्पृक्तो दानवैर्वृत्रो घोरो हालाहले हतः॥ ५१<br><br>तदा विष्णुसहायेन महेन्द्रेण निवर्तितः।<br>हतो ध्वजे महेन्द्रेण मायाच्छन्नस्तु योगवित्।<br>ध्वजलक्षणमाविश्य विप्रचित्तिः सहानुजः॥ ५२ये सभी युद्ध शण्डामर्कके पौरोहित्यकालमें घटित हुए बतलाये जाते हैं। मैं संक्षेपमें नामनिर्देशानुसार उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। प्रथम युद्ध नरसिंह (नृसिंहावतार)में, दूसरा वामन, तीसरा वाराह (वराहावतार)-में और चौथा अमृत-मन्थनके अवसरपर हुआ था। पाँचवाँ तारकामय संग्राम घटित हुआ था। इसी प्रकार छठा युद्ध आडीवक, सातवाँ त्रैपुर (त्रिपुरसम्बन्धी), आठवाँ अन्धक, नवाँ वृत्रघातक, दसवाँ धात्र (या वार्त्र), ग्यारहवाँ हालाहल और बारहवाँ भयंकर संग्राम कोलाहलके नामसे विख्यात है।<br>(इन संग्रामोंमें) भगवान् विष्णुने दैत्यराज हिरण्यकशिपुको नृसिंह-रूप धारण करके मार डाला था। पूर्वकालमें त्रिलोकीको नापते समय भगवान्‌ने वामन-रूपसे बलिको बाँध लिया था। देवताओंके साथ भगवान्‌ने वराहका रूप धारण करके द्वन्द्व-युद्धमें अपनी दाढ़ोंसे हिरण्याक्षको विदीर्ण कर मार डाला था और समुद्रको दो भागोंमें विभक्त कर दिया था। अमृत-मन्थनके अवसरपर घटित हुए युद्धमें इन्द्रने प्रह्लादको पराजित किया था। उससे अपमानित होकर प्रह्लाद-पुत्र विरोचन नित्य इन्द्रका वध करनेकी ताकमें लगा रहता था। वह पृथक्-पृथक् देवोंको तथा पूरे देवसमाजको सहन नहीं कर पाता था, किंतु इन्द्रने तारकामय युद्धमें पराक्रम प्रकट करके उसे यमलोकका पथिक बना दिया। त्रिलोकीमें जितने दानव, असुर और पिशाच थे, वे सभी शंकरजीद्वारा अन्धक नामक युद्धमें मौतके घाट उतारे गये। उस युद्धमें देवता, मनुष्य और पितृगण भी सब ओरसे सहायक-रूपमें उपस्थित थे। दानवोंसे घिरा हुआ भयंकर वृत्रासुर हालाहल-युद्धमें मारा गया था।* तत्पश्चात् इन्द्रने विष्णुकी सहायतासे विप्रचित्तिको युद्धसे विमुख कर दिया, परंतु योगका ज्ञाता विप्रचित्ति अपनेको मायासे छिपाकर ध्वजरूपमें परिणत कर दिया, फिर भी इन्द्रने ध्वजमें छिपे होनेपर भी अनुज-समेत उसका सफाया कर दिया। इस प्रकार देवोंकी सहायतासे इन्द्रने कोलाहल नामक युद्धमें संगठित होकर आये हुए सभी पराक्रमी दानवों और दैत्योंको पराजित किया था। (ऐसा प्रतीत होता है कि युद्धके उपरान्त देवताओंने किसी यज्ञका अनुष्ठान किया था, उस) यज्ञकी समाप्तिके अवसरपर अवभृथ-स्नानके

* इसके ९ से ११ वीं संख्यातकके निर्दिष्ट संग्राम वृत्र-इन्द्र-विष्णु-युद्धसे ही सम्बद्ध दीखते हैं।

१७०* मत्स्यपुराण *
दैत्यांश्च दानवांश्चैव संयतान् किल संयुतान्।<br>जयन् कोलाहले सर्वान् देवैः परिवृतो वृषा॥ ५३<br>यज्ञस्यावभृथे दृश्यौ षण्डामर्कौ तु दैवतैः।<br>एते देवासुरे वृत्ताः संग्रामा द्वादशैव तु॥ ५४<br>हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामर्बुदं बभौ॥ ५५<br>द्विसप्तति तथान्यानि नियुतान्यधिकानि च।<br>अशीतिं च सहस्राणि त्रैलोक्यैश्वर्यतां गतः॥ ५६<br>पर्यायेण तु राजाभूद् बलिवर्षायुतं पुनः।<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि नियुतानि च विंशतिः॥ ५७<br>बले राज्याधिकारस्तु यावत्कालं बभूव ह।<br>तावत्कालं तु प्रह्लादो निवृत्तो ह्यसुरैः सह॥ ५८<br>इन्द्रास्त्रयस्ते विज्ञेया असुराणां महौजसः।<br>दैत्यसंस्थमिदं सर्वमासीद् दशयुगं पुनः॥ ५९<br>त्रैलोक्यमिदमव्यग्रं महेन्द्रेणानुपाल्यते।<br>असपत्नमिदं सर्वमासीद् दशयुगं पुनः॥ ६०<br>प्रह्लादस्य हते तस्मिंस्त्रैलोक्ये कालपर्ययात्।<br>पर्यायेण तु सम्प्राप्ते त्रैलोक्यं पाकशासने।<br>ततोऽसुरान् परित्यज्य शुक्लो देवानगच्छत॥ ६१<br>यज्ञे देवानथ गतान् दितिजाः काव्यमाह्वयन्।<br>किं त्वं नो मिषतां राज्यं त्यक्त्वा यज्ञं पुनर्गतः॥ ६२<br>स्थातुं न शक्नुमो ह्यत्र प्रविशामो रसातलम्।<br>एवमुक्तोऽब्रवीद् दैत्यान् विषण्णान् सान्त्वयन् गिरा॥ ६३<br>मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन वोऽसुराः।<br>मन्त्राश्चौषधयश्चैव रसा वसु च यत्परम्॥ ६४<br>कृत्स्नानि मयि तिष्ठन्ति पादस्तेषां सुरेषु वै।<br>तत् सर्वं वः प्रदास्यामि युष्मदर्थे धृता मया॥ ६५समय षण्ड और अमर्क नामक दोनों दैत्यपुरोहित देवताओंके दृष्टिगोचर हुए थे। इस प्रकार ये बारह युद्ध देवताओं और असुरोंके बीच घटित हुए थे, जो देवताओं और असुरोंके विनाशक और प्रजाओंके लिये हितकारी थे॥ ४१—५४॥<br><br>पूर्वकालमें राजा हिरण्यकशिपु एक अरब सात करोड़ बीस लाख अस्सी हजार वर्षोंतक त्रिलोकीके ऐश्वर्यका उपभोग करता हुआ (सिंहासनपर) विराजमान था। तदनन्तर पर्यायक्रमसे बलि राजा हुए। इनका शासनकाल दो करोड़ सत्तर हजार वर्षोंतक था। जितने समयतक बलिको शासनकाल था, उतने कालतक प्रह्लाद अपने अनुयायी असुरोंके साथ निवृत्तिमार्गपर अवलम्बित रहे। इन महान् ओजस्वी तीनों दैत्योंको असुरोंका इन्द्र (अध्यक्ष) जानना चाहिये। इस प्रकार दस युगपर्यन्त यह सारा विश्व दैत्योंके अधीन था। पुनः कालक्रमानुसार गत युद्धमें प्रह्लादके मारे जानेपर पर्याय-क्रमसे त्रिलोकीका राज्य इन्द्रके हाथोंमें आ गया। उस समय दस युगतक यह विश्व शत्रुहीन था, तब इन्द्र निश्चिन्ततापूर्वक त्रिलोकीका पालन कर रहे थे। उसी समय शुक्राचार्य असुरोंका परित्याग कर एक देवयज्ञमें चले आये। इस प्रकार यज्ञके अवसरपर शुक्राचार्यको देवताओंके पक्षमें गया हुआ देखकर दैत्योंने शुक्राचार्यको उपालम्भ देते हुए कहा—'गुरुदेव! आप हमलोगोंके देखते-देखते हमारे राज्यको छोड़कर देवताओंके यज्ञमें क्यों चले गये? अब हमलोग यहाँ किसी प्रकार ठहर नहीं सकते, अतः रसातलमें प्रवेश कर जायँगे।' दैत्योंके इस प्रकार गिड़गिड़ानेपर शुक्राचार्य उन दुःखी दैत्योंको मधुर वाणीसे सान्त्वना देते हुए बोले—'असुरो! तुमलोग डरो मत, मैं अपने तेजोबलसे पुनः तुमलोगोंको धारण करूँगा अर्थात् अपनाऊँगा; क्योंकि त्रिलोकीमें जितने मन्त्र, ओषधि, रस और धन-सम्पत्ति हैं, वे सब-के-सब मेरे पास हैं।* इनका चतुर्थांश ही देवोंके अधिकारमें है। मैं वह सारा-का-सारा तुमलोगोंको प्रदान कर दूंगा; क्योंकि तुम्हीं लोगोंके लिये ही मैंने उन्हें धारण कर रखा है'॥ ५५—६५॥

* महाभारत उद्योगपर्व तथा भीष्मपर्व ६। २२-२३ में भी शुक्रको ही धन-रत्नोंका अधिकारी कहा गया है।

* अध्याय ४७ * १७१

| ततो देवास्तु तान् दृष्ट्वा वृतान् काव्येन धीमता।<br>सम्मन्त्रयन्ति देवा वै संविज्ञास्तु जिघृक्षया॥ ६६<br>काव्यो ह्येष इदं सर्वं व्यावर्तयति नो बलात्।<br>साधु गच्छामहे तूर्णं यावन्नाध्यापयिष्यति॥ ६७<br>प्रसह्य हत्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे।<br>ततो देवास्तु संरब्धा दानवानुपसृत्य ह॥ ६८<br>ततस्ते वध्यमानास्तु काव्यमेवाभिदुद्रुवुः।<br>ततः काव्यस्तु तान् दृष्ट्वा तूर्णं देवैरभिद्रुतान्॥ ६९<br>रक्षां काव्येन संहृत्य देवास्तेऽप्यसुरादिताः।<br>काव्यं दृष्ट्वा स्थितं देवा निःशङ्कमसुरा जहुः॥ ७०<br>ततः काव्योऽनुचिन्त्याथ ब्राह्मणो वचनं हितम्।<br>तानुवाच ततः काव्यः पूर्वं वृत्तमनुस्मरन्॥ ७१<br>त्रैलोक्यं वो हृतं सर्वं वामनेन त्रिभिः क्रमैः।<br>बलिर्बद्धो हतो जम्भो निहतश्च विरोचनः॥ ७२<br>महासुरा द्वादशसु संग्रामेषु शरैर्हताः।<br>तैस्तैरुपायैर्भूयिष्ठं निहता वः प्रधानतः॥ ७३<br>किञ्चिच्छिष्टास्तु यूयं वै युद्धं मास्त्विति मे मतम्।<br>नीतयो वोऽभिधास्यामि तिष्ठध्वं कालपर्ययात्॥ ७४<br>यास्याम्यहं महादेवं मन्त्रार्थं विजयावहम्।<br>अप्रतीपांस्ततो मन्त्रान् देवात् प्राप्य महेश्वरात्।<br>युध्यामहे पुनर्देवांस्ततः प्राप्स्यथ वै जयम्॥ ७५<br>ततस्ते कृतसंवादा देवानूचुस्तदासुराः।<br>न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसंनाहा रथैर्विना॥ ७६<br>वयं तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्वने।<br>प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत्॥ ७७<br>ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते।<br>न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः॥ ७८ | तदनन्तर जब देवताओंने देखा कि बुद्धिमान् शुक्राचार्यने पुनः असुरोंका पक्ष ग्रहण कर लिया है, तब विचारशील देवगण समग्र राज्य ग्रहण करनेके विषयमें मन्त्रणा करते हुए कहने लगे—'भाइयो! ये शुक्राचार्य हमलोगोंके सभी कार्योंको बलपूर्वक उलट-पलट देंगे, अतः ठीक तो यही होगा कि जबतक ये उन असुरोंको सिखा-पढ़ाकर बली नहीं बना देते, उसके पूर्व ही हमलोग यहाँसे शीघ्र चलें और उन्हें बलपूर्वक मार डालें तथा बचे हुए लोगोंको पातालमें भाग जानेके लिये विवश कर दें।' ऐसा परामर्श करके देवगण दानवोंके निकट जाकर उनपर टूट पड़े। इस प्रकार अपना संहार होते देखकर असुरगण शुक्राचार्यकी शरणमें भाग चले। तब शुक्राचार्यने असुरोंको देवताओंद्वारा खदेड़ा गया देखकर तुरंत ही उनकी रक्षाका विधान किया। इससे उलटे देवता ही असुरोंद्वारा पीड़ित किये जाने लगे। तब देवगण वहाँ शुक्राचार्यको निःशङ्क भावसे स्थित देखकर असुरोंके सामनेसे हट गये। तदनन्तर ब्राह्मण शुक्राचार्य पूर्वमें घटित हुए वृत्तान्तका स्मरण करते हुए बहुत सोच-विचारकर असुरोंसे हितकारक वचन बोले—'असुरो! वामनद्वारा अपने तीन पगोंसे (बलिद्वारा शासित) सम्पूर्ण त्रिलोकीका राज्य छीन लिया गया, बलि बाँध लिया गया, जम्भासुरका वध हुआ और विरोचनका भी निधन हुआ। इस प्रकार बारह युद्धोंमें तुमलोगोंमें जो प्रधान-प्रधान महाबली असुर थे, वे सभी देवताओंद्वारा तरह-तरहके उपायोंका आश्रय लेकर मार डाले गये। अब थोड़ा-बहुत तुमलोग शेष रह गये हो, अतः मेरा विचार है कि अभी तुमलोग युद्ध बंद कर दो और कालके विपर्ययको देखते हुए चुपचाप शान्त हो जाओ। पीछे मैं तुमलोगोंको नीति बतलाऊँगा। मैं आज ही विजय प्रदान करनेवाले मन्त्रकी प्राप्तिके लिये महादेवजीके पास जा रहा हूँ। जब मैं देवाधिदेव महेश्वरसे उन अमोघ मन्त्रोंको प्राप्त करके लौटूँ, तब पुनः मेरे सहयोगसे तुमलोग देवताओंके साथ युद्ध करना, उस समय तुम्हें विजय प्राप्त होगी'—॥ ६६-७५ ॥<br><br>इस प्रकार परस्पर युद्धविषयक परामर्श करके उन असुरोंने देवताओंके पास जाकर कहा—'देवगण! इस समय हम सभी लोगोंने अपने शस्त्रास्त्रोंको रख दिया है, कवचोंको उतार दिया है और रथोंको छोड़ दिया है। अब हमलोग वल्कल-वस्त्र धारण करके वनमें छिपकर तपस्या करेंगे।' सत्यवादी प्रह्लादके उस सत्य वचनको सुनकर तथा दैत्योंके शस्त्रास्त्र रख देनेपर देवतालोग प्रसन्न हो गये। उनकी चिन्ता नष्ट हो गयी और वे युद्धसे विरत |

१७२ * मत्स्यपुराण *


| ततस्तानब्रवीत् काव्यः कञ्चित्कालमुपास्यथ।<br>निरुत्सिक्तास्तपोयुक्ताः कालं कार्यार्थसाधकम्॥ ७९<br><br>पितुर्ममाश्रमस्था वै मां प्रतीक्षथ दानवाः।<br>तत्सन्दिश्यासुरान् काव्यो महादेवं प्रपद्यत॥ ८०<br><br>शुक्र उवाच<br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ।<br>पराभवाय देवानामसुरणां जयाय च॥ ८१<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् देवो व्रतं त्वं चर भार्गव।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममवाक्शिराः।<br>यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि॥ ८२<br><br>तथेति समनुज्ञाप्य शुक्रस्तु भृगुनन्दनः।<br>पादौ संस्पृश्य देवस्य बाढमित्यब्रवीद् वचः।<br>व्रतं चराम्यहं देव त्वयाऽऽदिष्टोऽद्य वै प्रभो॥ ८३<br><br>ततोऽनुसृष्टो देवेन कुण्डधारोऽस्य धूमकृत्।<br>तदा तस्मिन् गते शुक्रे ह्यसुराणां हिताय वै।<br>मन्त्रार्थं तत्र वसति ब्रह्मचर्यं महेश्वरे॥ ८४<br><br>तद् बुद्ध्वा नीतिपूर्वं तु राज्ये न्यस्ते तदा सुरैः।<br>अस्मिंश्छिद्रे तदामर्षाद् देवास्तान् समुपाद्रवन्॥ ८५<br><br>दंशिताः सायुधाः सर्वे बृहस्पतिपुरःसराः॥ ८६<br><br>दृष्ट्वासुरगणा देवान् प्रगृहीतायुधान् पुनः।<br>उत्पेतुः सहसा ते वै संत्रस्तास्तान् वचोऽब्रुवन्॥ ८७<br><br>न्यस्ते शस्त्रेऽभये दत्ते आचार्ये व्रतमास्थिते।<br>दत्त्वा भवन्तो ह्यभयं सम्प्राप्ता नो जिघांसया॥ ८८<br><br>अनाचार्या वयं देवास्त्यक्तशस्त्रास्तवस्थिताः।<br>चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ८९<br><br>रणे विजेतुं देवांश्च न शक्ष्यामः कथञ्चन।<br>अयुद्धेन प्रपत्स्यामः शरणं काव्यमातरम्॥ ९० | हो गये। युद्ध बंद हो जानेपर शुक्राचार्यने असुरोंसे कहा—'दानवो! तुमलोग अपने अभिमान आदि कुप्रवृत्तियोंका त्याग कर तपस्यामें लग जाओ और कुछ कालतक उपासना करो; क्योंकि काल ही अभीष्ट कार्यका साधक होता है। इस प्रकार तुमलोग मेरे पिताजीके आश्रममें निवास करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षा करो।' असुरोंको ऐसी शिक्षा देकर शुक्राचार्य महादेवजीके पास जा पहुँचे (और उनसे निवेदन करने लगे)॥ ७६—८०॥<br><br>शुक्राचार्यने कहा—'देव! मैं देवताओंके पराभव तथा असुरोंकी विजयके लिये आपसे उन मन्त्रोंको जानना चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके पास नहीं हैं।' ऐसा कहे जानेपर महादेवजीने कहा—'भार्गव! तुम्हारा कल्याण हो। इसके लिये तुम्हें कठोर व्रतका पालन करना पड़ेगा। यदि तुम पूरे एक सहस्र वर्षोंतक नीचा सिर करके कनीके धुएँका पान करोगे, तब कहीं तुम्हें उन मन्त्रोंकी प्राप्ति हो सकेगा।' तब भृगुनन्दन शुक्रने महादेवजीकी आज्ञा शिरोधार्य कर उनके चरणोंका स्पर्श किया और कहा—'देव! ठीक है, मैं वैसा ही करूँगा। प्रभो! मैं आजसे ही आपके आदेशानुसार व्रतपालनमें लग रहा हूँ।' इस प्रकार महादेवजीसे विदा होकर शुक्राचार्य धूमको उत्पन्न करनेवाले कुण्डधार यक्षके निकट गये और असुरोंके हितार्थ मन्त्रप्राप्तिके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक महेश्वरके आश्रममें निवास करने लगे। तदनन्तर जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि असुरोंद्वारा राज्य छोड़नेमें ऐसी कूटनीति और यह छिद्र था, तब वे अमर्षसे भर गये; फिर तो वे संगठित हो कवच धारणकर हथियारोंसे सुसज्जित हो बृहस्पतिजीको आगे करके असुरोंपर टूट पड़े॥ ८१—८६॥<br><br>इस प्रकार पुनः देवताओंको आयुध धारण करके आक्रमण करते देख असुरगण सहसा भयभीत होकर उठ खड़े हुए और देवताओंसे बोले—'देवगण! हमलोगोंने शस्त्रास्त्र रख दिया है, आपलोगोंद्वारा हमें अभयदान मिल चुका है, मेरे गुरुदेव इस समय व्रतमें स्थित हैं—ऐसी परिस्थितिमें अभय-दान देकर भी आपलोग हमारा वध करनेकी इच्छासे क्यों आये हैं? इस समय हमलोग बिना गुरुके हैं, शस्त्रास्त्रोंका परित्याग करके निहत्थे खड़े हैं, तपस्वियोंकी भाँति चीर और काला मृगचर्म धारण किये हुए हैं, निष्क्रिय और परिग्रहरहित हैं। ऐसी दशामें हम किसी प्रकार भी युद्धमें आप देवताओंको जीतनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः बिना युद्ध किये ही काव्यकी माताकी शरणमें जा रहे हैं। |