निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृणक्तु, नो मधुना उदकेन वचनानि इमानि इति ।
'मधु' धमतेर्विपरीतस्य ।
'सविता' सर्वस्य प्रसविता ।
तस्य एषा भवति ॥७(३१)॥
अर्थ:- "आदधिक्राः०" इस ऋचा का वामदेव
ऋषि है।
'दधिक्राः' दधिक्रा देव 'शवसा' ( बलेन ) बल से 'अपः'
जलोंको 'आ—ततान' [ आतनोति ] फैलाता है । कहां ?
"पञ्च कृष्टीः" [ पञ्च मनुष्यजातानि ] पांच ब्राह्मण
आदि वर्णों के प्रति किसके समान "सूर्य इव ज्योतिषा"
जैसे सूर्य भगवान् अपनी ज्योति से सब लोक को व्याप्त करता
है । कैसा दधिक्रा देव है ? 'सहस्रसाः' 'शतसाः' बहुत और
बहुत से भी बहुत जलों का भजने वाला 'वाजी' [वेजनवान्]
शत्रुओं को कंपाने वाला 'अर्वा' [ईरणवान्] जलों की प्रेरणा
करने वाला है । सो दधिक्रा देव 'इमा' [इमानि] इन [नः]
'वचांसि' हमारे वचनों को 'मध्वा' ( मधुना ) मिठास से
'सं—पृणक्तु' संयुक्त करे—जलकी वृष्टिसे सफल करे ।
'मधु' शब्द आदि अन्त से उलटाए हुए 'धम' [भ्वा०प०]
धातु का है ।
'सविता' (२०) क्यों सब का प्रसव करने वाला या
जनने वाला है ।
"तस्य ०" उस सविता देव की यह ऋचा है॥ ७ (३१) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३५८ ) १० अ० ३ पा० ८ ० खं०
( खं० ८ )
निरु०-“सविता यन्त्रैः पृथिवी मरम्णा दस्क-
म्भने सविता द्यामहंहत् । अश्वमिवाधुक्षद्धुनिम-
न्तरिक्षमतूर्त्ते बद्धं सविता समुद्रम् ॥” [ ऋ०सं०
८, ८, ७, १ ] ॥
सविता यन्त्रैः पृथिवीम् अरमयत् । अनारम्भ-
णे अन्तरिक्षे सविता द्याम् अहंहत् । अश्वम्-इव
अधुक्षत् धुनिम्- अन्तरिक्षमेघम्, बद्धम्-अतूर्ते =
बद्धम्-अतूर्णे इति वा, अत्वरमाणे इति वा। सविता
समुदितारम्-इति कम्-अन्यं मध्यमाद् एवम्
अवक्ष्यत् ॥
आदित्योऽपि ‘सविता’ उच्यते । तथाच हैर-
ण्यस्तूपे स्तुतः अर्चन्न् हिरण्यस्तूप ऋषिः इदं सूक्तं
प्रोवाच ।
तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति-॥८ ( ३२ )
अर्थः--“सविता यन्त्रैः ”इस ऋचा का अर्चन्नामा
हैरण्यस्तूप ऋषि है ।
'सविता' मध्यम देव सब बलों के स्वामी सविताने
'यन्त्रैः' यन्त्रोंके द्वारा 'पृथिवीम्' पृथ्वीको 'अरम्णात्' थांमा
या रोका । (अन्यथा यह ऐसी निश्चल न रहती ।) सविता'
सविता ही ने 'अस्कम्भने' (अनारम्भणे अन्तरिक्षे) अमूर्त्त
हिन्दी निरुक्त ( ३५६ ) १० अ० ३ पा० ६ खं०
( पतले ) आकाश में जहां पंत्तां भी नहीं ठहर सकता 'द्याम्'
द्यौ (द्युलोक) को स्थिर किया और भी 'सविता'
सविता देव ने 'अतूर्त्तं' । (अतूर्णे इति वा) (अत्वरमाणो
वा) अंचल 'अन्तरिक्षम्' । (अन्तरिक्षे) आकाश में बद्धम्'
बंधे हुए 'समुदितारम्' समय पर उदय होने वाले 'धुनिम्'
मेघ को 'अश्वम्-इव' घोड़े के समान 'अधुक्षत्' झाड़ दिया-
जिस प्रकार कोई घोड़े को रखने वाला उससे धूली दूर करने
के लिये उसको सहज में कम्पित कर देता है उसी प्रकार
सविता देव जल के गिराने के अर्थ मेघ को कम्पित कर देते हैं
[ भाष्यकार कहते हैं कि- ] मध्यम के अतिरिक्त इस प्रकार
और किस देव को ऐसे कहता [ सर्वथा यह सविता मध्यम
लोक का देव ही है ] ।
आदित्य भी 'सविता' कहलाता है । वैसे ही (जिस
प्रकार कि- सविता आदित्य है) हिरण्यस्तूप सूक्त में स्तुति
किये गये अर्चन् हिरण्यस्तूप ऋषि ने इस सूक्त को बोला था
“तदभि वादिनी०” उसी को कहने वाली यह ऋचा
है-॥ ८ (३२) ॥
( खं० ६ )
निरु०- “हिरण्यस्तूपः सवितर्यथा त्वाङ्गिरसो
जुह्वे वाजेअस्मिन् । एवात्वार्चन्नवसे वन्दमानः
सोमस्येवांशं प्रति जागराहम ॥” (ऋ० सं० ८,
८, ७, ५) ॥
'हिरण्यस्तूपः' हिरण्यमयस्तूपः । हिरण्यमयः
स्तूपोऽस्य - इति वा ।
हिन्दी निरुक्त ( ३६० ) १० अ० ३ पा० १० खंड
'स्तूपः' स्त्यायतेः। सङ्घातः ।
सवितः !.यथा त्वा आङ्गिरसः जुह्वे, वाजे अन्ने
अस्मिन्, एवं त्वा अर्चन्अवनाय वन्दमानः
सोमस्यऽइव अंशुं प्रति जागर्मि अहम् ।
'त्वष्टा' व्याख्यातः,तस्य-एषा भवति ॥९(३३)॥
अर्थ:-“ हिरण्यस्तूपः” इस ऋचा का अर्चन् नामक
हिरण्यस्तूप ऋषि है।
हे 'सवितः' 'यथा' जिस प्रकार दूसरे कल्प के 'आङ्गिरसः'
अङ्गिरस् के पुत्र हिरण्यस्तूप ऋषि ने 'त्वा'तुझे 'जुह्वे' [आजु-
हाव] आवाहन किया 'एवा' वैसे ही ' अस्मिन् ' इस 'वाजे'
[संस्कृते हविषि] बनाये हुये हविः में 'अहम्' मैं इस कल्प का
'अर्चन्' अर्चन् नामा हिरण्यस्तूप ऋषि 'अवसे' (अवनाय)
रक्षा के लिये 'त्वा' तुझे ' वन्दमानः' वन्दना करता हुआ
सोमस्य- इव अंशुम् सोम के अंशु [ रस ] को खरीद
कर जैसे 'प्रतिजगरा' [जागर्मि]जागता हूं- यज्ञ पर्यन्त तेरी
उपासना करता हूं ॥
'हिरण्यस्तूप' क्या ? हिरण्य (सुवर्ण) का स्तूप (समूह)
अथवा हिरण्यमय (सुवर्ण का) स्तूप (कीर्त्ति स्तम्भ) जिसका
हो वह हिरण्यस्तूप है ।
'स्तूप' किस धातु से है ? संघात अर्थ में 'स्त्यै[वा०प०]
धातु से ।क्या ? संघात ।
'त्वष्टा' (२१)शब्द की व्याख्या[२,७,५] हो चुकी । उस
की यह ऋचा है ॥६(३३)॥
हिन्दी निरुक्त ( ३६१ ) १० अ० ३ पा० १० खं०
खं० १०
निरु०-“देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः पुपोष प्रजाः
पुरुधा जजान। इमा च विश्वा भुवनान्यस्य मह-
द्देवाना मसुरत्वमेकम् ॥” (ऋ०सं०३,३,३१,४) ॥
देवः त्वष्टा सविता सर्वरूपः पोषति प्रजाःरसानु-
प्रदानेन बहुधा च इमा जनयति, इमानि च सर्वाणि
भूतानि उदकानि अस्य महञ्च अस्मै देवानाम्
असुरत्वम् एकं प्रज्ञावत्वं वा, अनवत्वं वा ।
अपि वा'असुः'इति प्रज्ञानाम। अस्यति अनर्थान्
अस्ताश्च अस्याम् अर्थाः । असुरत्वम् आदिलुप्तम्
'वातः' (२३) वाति इति सतः ।
तस्य एषा भवति- ॥ १० ( ३४ ) ॥
अर्थः-“देवस्त्वष्टा०” यह विश्वामित्र के पुत्र प्रजा-
पति ॠषि की है। वैश्वदेव में विनियोग है ।
‘त्वष्टा-देवः’ त्वष्टा मध्यम देव ‘विश्वरूपः’
(सर्वरूपः) सर्वरूप ‘सविता’ सब भूतों का उत्पन्न
करने वाला है। और उत्पन्न करके ‘प्रजाः’ सब प्रजा-
ओं को (रसानुप्रदानेन) जल के दान से ‘पुपोष’ (पोषति)
पोषण करता है । केवल इतना ही नहीं-‘पुरुधा’ (बहुधाच)
और बहुत प्रकार से (इमाः) इन प्रजाओं को ‘जजान’(जनय-
=वर्द्धयति) बढाता है। क्यों कि-इमां (इमानि) ‘च’
और ये ‘विश्वा’ (सर्वाणि) सब ‘भुवनानि’ (भूतानि = उदका-
हिन्दी निरुक्त ( ३६२ ) १० अ० ३पा० १० खं०
नि) भूत या जल 'अस्य' इसके हैं । (इसी से सब को उत्पन्न
करता है, पोषण करता है, और बढाता है ।) 'महत्' (च)
और इससे भी किं—'महत्' बड़ा या पूजनीय 'देवानाम्' देव-
ताओं का 'एकम्' एक या असाधारण 'असुरत्वम्'असुरत्व =
प्रज्ञावत्व है । (उस महती प्रज्ञा और जल रूप साधनसे वह
जगत्की उत्पत्ति पालन और वृद्धि करता है । क्योंकि—साधन
होने पर भी निर्बुद्धि पुरुष कुछ नहीं कर सकता) अथवा
'असुरत्वम्' (अनवत्वम्) असुरत्व = प्राणवत्व है । ( क्यों कि-
प्राणवान् ही सब कुछ कर सकता है निष्प्राण का कुछ शक्य
नहीं) कोई 'असुरत्व' का अन्नवत्त्व अर्थ करते हैं। उनके
मत में अन्न का कारण जल है, और देवता जलवाले हैं, इस
प्रकार वे अन्न वाले होते हैं ॥
'असुरत्व' क्या ? 'असु' यह प्रज्ञा या तीखी बुद्धि का
नाम है । क्यों कि— "अस्यति अनर्थान्" वह अनर्थों
को असन करती है- दूर हटाती है । अथवा इसमें सब अर्थ
अस्त हैं, इसी से संसार के सब कार्य सिद्ध होते हैं। और 'असु
(प्रज्ञा) जिसमें हो, वह 'असुर' होता है । यहां 'असु' शब्द
से 'र'प्रत्यय होता है । इसी असुर शब्द के आदि अक्षर कालोप
होने से 'सुर' शब्द बन जाता है, जो कि— लोक में भी प्रसि-
द्ध है । और 'असुर शब्द से भाव प्रत्यय 'त्व' होने से 'असु-
रत्व' होता है । असुरत्व = असुरपना ॥
'वात' (२२) (वायु) कैसे ? 'वाति' (चलता है) इस
कर्त्तृवाच्य गत्यर्थक 'वा'[अदा०प०]धातु से है ।
"तस्य०" उस 'वातमध्यम देवकी यह ऋचा है॥१०(३४)॥
हिन्दी निरुक्त (३६३) १० अ० ३ पा० ११ख०
(खं० ११)
निरु०- “वात आवातु भेषजं शम्भु मयोभु नो
हृदे । प्रण आयूँषि तारिषत् ॥” [ऋ० सं० ८,८,
५४, १ । सा० सं० छ० आ० २,२, ४, १० ]
वात आवातु भेषज्यानि शम्भु मयोभु च नो
हृदयाय प्रवर्द्धयतु च नः आयुः ।
‘अग्निः’ व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति ॥११(३५) ॥
अर्थः-“वात आवातु०” इस ऋचा का उल्लव वाता-
यन ऋषि है। ‘वात:’ पवन देव ‘भेषजम्’ [भैषज्यानि] जो
जो हमारे लिये पथ्य हो, उसे ‘आवातु’ हमारे सामने लावे
‘शम्भु’ और वह हमारे लिये सुखकारी हो तथा ‘हृदे’ हमारे
हृदय के लिये ‘मयोभु’ सुख दायक हो, ‘नः’ [ अस्माकम् ]
हमारी ‘आयूंषि’ आयु को प्रतारिषत्’ [ प्रवर्द्धयतु] बढावे ।
‘अग्नि’ (१३) शब्द की व्याख्या [ ७, ४, १ ] की
जाचुकी है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥११(३५)॥
व्याख्या ।
“वात आवातु०” इस मन्त्र में वायु देवकी प्रार्थना से
स्पष्ट कहा गया है कि- शुद्ध वायु से शरीर में नैरोग्य आयु
की वृद्धि और हृदय की पुष्टि अतएव ज्ञान की वृद्धि होती
है तथा शुद्ध वायु ही प्रधान पथ्य है ॥११(३५)
(खंड १२)
निरु०-“प्रति त्यं चारु मध्वरं गोपीथाय प्रहूय*
से । मरुद्भिरग्न आगहि ॥” [ऋ०सं०१,१,३६,१ ।
सा०सं० छ०आ० १,१, २,६] ॥
तं प्रति चारुम् अध्वरं सोमपानाय प्रहूयसे सो
ऽग्ने मरुद्भिः सह आगच्छ इति कम् अन्यं
मध्यमाद्-एवम् अवक्ष्यत् ।
तस्य एषा भवति ॥ १२ (३६) ॥
अर्थः— “प्रति त्यम्” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि है।
‘अग्ने’! हे भगवन् ! अग्नि देव ! ‘ त्यम् ’ ( तम् ) उस
‘चारुम्’ (अङ्गवैकल्यरहितम्) अङ्ग की विकलता ( हीनता ) से
रहित या सुन्दर ‘अध्वरम्’ ‘प्रति’ यज्ञ के प्रति ( त्वम् ) तू
‘गींपीथाय’ (सोमपानाय) सोमपान के लिये ‘प्रहूयसे’ बुलाया
जाता है, (स त्वम्) सो तू यह जान कर ‘मरुद्भिः’ मरुतों के
साथ ‘आगहि’ (आगच्छ) आ । इस प्रकार मध्यम के अति-
रिक्त किसे कहता (अतः ‘अग्नि’ शब्द से यहां मध्यम ही है
किन्तु पार्थिव नहीं ।) “तस्य०” उसकी यह दूसरी ऋचा
है -- ॥ १२ ( ३६ ) ॥
( खं० १३ )
निरु०-“अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यं
मधु । मरुद्भि रग्न आगहि॥”[ऋ०सं०१,१,३७,४।
सा० सं० छ० आ० ३, २,२,४]॥
अभिमृजामि त्वा पूर्वपीतये पूर्वपानाय सोम्यं
मधु सोममयं सः अग्ने मरुद्भिः सह आगच्छ ।
इति ॥१३ (३७) ॥
इति दशमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥१०, ३॥
हिन्दी निरुक्त ( ३६५ ) १० अ० ४ पा० १ खं०
अर्थ :- “अभित्वा०” इस ऋचाका मेधातिथि ऋषि है
'अग्ने ! ' हे भगवन् ! अग्नि देव ! 'त्वा' - तुझे 'पूर्वपीतये'
(पूर्व-पानाय) प्रथम पान के अर्थ 'अभि-सृजामि (वदामि)
कहता हूं कि 'सोम्यम्' यह सोमरूप 'मधु' मिठाई है,' (सः)
सो तू 'मरुद्भिः (सह) मरुतों के साथ 'आगहि' (आगच्छ)
आ-यह हम चाहते हैं ॥ १३ (३७) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते दशमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥१०,३॥
चतुर्थः पादः
निघ०-वेनः ॥२४॥ असुनीतिः ॥२५॥
ऋतः ॥२६॥ इन्दुः ॥२७॥ प्रजापतिः
॥२८॥ अहिः ॥२६॥ अहिर्बुध्न्यः ॥३०॥
सुपर्णः ॥३१॥ पुरूरवाः ॥ ३२ ॥ इति
द्वात्रिंशत् (३२) पदानि ॥४॥
(खं० १)
निरु०-'वेनः' वेनतेः कान्तिकर्मणः ।
तस्य एषा भवति ॥१(३८)॥
अर्थः- 'वेन' (२४) कान्ति अर्थ में 'वेन' (भ्वा०प०) धातु
का है । क्योंकि-मध्यम देव सब लोक का प्यारा है, जिससे
कि वह सबका उपकारी है ।
“तस्य०” उस वेन देव की यह ऋचा है-॥१(३८)॥
(खं० २)
निरु०-“अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योति-
[Header] हिन्दी निरुक्त (३६६) , १० अ० ४ पा० २ खं०
जरायु॒ रज॑सो वि॒माने॑ । इ॒मम॒पां स॒ङ्गमे॒ सूर्य॑स्य
शिशुं॒ न विप्रा॑ म॒तिभी॑रिहन्ति ॥” [ ऋ०सं० ८,
७,७,१ । य०वा०सं०७,१६] ॥
अयं वेनः चोदयत् ‘पृश्निगर्भाः’ प्राष्टवर्णगर्भाः
आपः इति वा । ‘ज्योतिर्जरायुः’ ज्योतिः अस्य
जरायुस्थानीयं भवति । ‘जरायुः’ जरया गर्भस्य,
जरया यूयत इति वा । इमम् अपां च सङ्गमे
सूर्य्यस्य च शिशुम्-इव विप्रा मतिभिः—रिहन्ति
लिहन्ति, स्तुवन्ति, वर्द्धयन्ति, पूजयन्ति इति वा ।
‘शिशुः’ शंसनीयो भवति । शिशीतेर्वा स्याद्
दानकर्मणः । “चिरलब्धो गर्भः” इति ।
‘असुनीतिः’ असून् नयति ।
तस्य एषा भवति-॥९(३९)॥
अर्थः-“अयं वेनः०” इस ऋचा का भार्गव वेन
ऋषि है । इस ऋचा से शुक्र का ग्रहण होता है । भार्गव वेन
अपनी समाधि में देवता का साक्षात्कार करता हुआ प्रत्यक्ष
देवता को दिखाता हुआ जैसा किसी से कहता है ।
‘अयम्’ यह ‘वेनः’ वेन देव, ‘ज्योतिर्जरायुः’ जिसका
ज्योतिः या बिजली ही जरायु = जेर = गर्भ की कांचली है,
अथवा जो अपनी ज्योतिः से गर्भ की जरा (जेर) के समान
(यु) मिलाहुआ या लिपटा हुआ है “रजसः-विमाने”
हिन्दी निरुक्त ( ३६७ ) १० अ० ४ पा० ३खं०
जलके संग्रह स्थान अन्तरिक्ष में बैठा हुआ 'पृश्निगर्भाः'
सूर्य की रश्मियों में गर्भ रूप से स्थित जलों को अथवा
पृश्नि (पाष्टवर्ण) प्रकृष्ट = बहुत तेज वर्ण वाले सूर्य के गर्भ
भाव को प्राप्त हुए जलों को 'चोदयत्' ( चोदयति ) प्रेरणा
करता है । 'इमम्' इस वेन को 'अपाम्' जलों के 'सूर्यस्य'
(च) और सूर्य के 'संगमे' संगमन या मिलाप के स्थान
(अन्तरिक्ष) पे स्थित को 'विप्राः'मेधावी ब्राह्मण "शिशु-न"
बालक को जैसे 'मतिभिः ज्ञान पूर्वक स्तुतियों से 'रिहन्ति'
(लिहन्ति) चाटते हैं ( स्तुवन्ति ) अथवा स्तुति करते हैं
( वर्द्धयन्ति ) अथवा बढ़ावा देते हैं ( पूजयन्ति ) अथवा
सराहते हैं ।
'शिशु' क्यों ? 'शंसनीयो भवति' वह शंसनीय या
प्रशंसनीय होता है । क्योंकि प्रयोजन से या बिना प्रयोजन
के उसके प्रलापों में उसी प्रशंसा की जाती है । अथवा दान
अर्थ में 'शी' (अदा० आ०) धातु से है । क्यों कि वह पुरुषसे
स्त्री के लिये धारणार्थ दिया जाता है । जैसे कि- नया गर्भ
ग्रहण करने वाली स्त्रियों में कहा जाता है- "चिरलब्धो
गर्भः"इसने देरमें गर्भ पाया है ('अचिरलब्धो गर्भः) या शीघ्र
ही गर्भ पाया है ।
'असुनीति' (२५) शब्द देवता पद है । और वह मध्यम
इन्द्र = प्राण देवता है । 'असुनीति' क्यों? वह असुओं(प्राणों)
को नयन करता है लेजाता है-अर्थात्- जब वह इस शरीर
से उत्क्रमण करता है या निकलता है, तो अपनेसाथ दूसरे
प्राणों को भी लेजाता है । जैसा कि- कहा है-
"प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति"
हिन्दी निरुक्त ( ३६८ ) १० अ० ४ पा० ३ खं०
अर्थात् प्राणके उड़ने पर सब प्राण उसके पीछे उड़जातेहैं।
“तस्य०” उस असुनीति या प्राण देवता की यह
ऋचा है ॥२ (३६)॥
( खं० ३ )
निरु०-“असुनीते मनो अस्मासु धारय जीवात-
वे सुप्रतिरा न आयुः रारन्धि नः सूर्य्यस्य संदृशि
घृतेन त्वं तन्वं वर्द्धयस्व ॥”(ऋ०सं०८,१,२२,५)॥
असुनीते ! मनः अस्मासु धारय चिरं जीवनाय
प्रवर्द्धय च नः आयु, रन्धय च नः सूर्य्यस्यसन्दर्शनाय ।
‘रध्यतिः’ वशगमनेऽपि दृश्यते ।
“मा रधाम द्विषते सोम राजन्”- (ऋ सं० ८,
७, १२, ५ । अथ० सं० ५, ३, ६, ७) । इत्यपि
निगमो भवति ।
घृतेन त्वम् आत्मानं तन्वं वर्धयस्व ।
‘घृतो’ व्याख्यातः,
तस्य एषा भवति ॥ ३[ ४० ] ॥
अर्थः-“ असुनीते ! ”इस ऋचा को श्रुत बन्धु ऋषि
है । 'असुनीते !' हे प्राण ! (त्वम् ) तू 'अस्मासु' हममें 'मनः'
मनको 'धारय' धारण कर—मन आदि इन प्राणों को हमारे
शरीर में ही धारण कर, किन्तु तू उत्क्रमण मतकर,तेरे ठहरने
से ये भी ठहरे रहेंगे । ‘जीवातवे’ ( चिरजीवनाय ) हमारे
हिन्दी निरुक्त ( ३६६ ) १० अ० ४ पा० ४ खं०
बहुत कालतक जीने के अर्थ (मनः धारय) मनको धारणकर ।
'नः' ( अस्माकम् ) हमारी 'आयुः' आयुको 'सुप्रतिर' (प्रकर्षेण
वर्द्धय) भले प्रकार बढ़ा । 'नः' ( अस्मान् ) और हमें 'रारन्धि'
( रन्धय— (च) ) साधन कर या साधले । और ऐसा अनुग्रह
कर जिस प्रकार हम 'सूर्यस्य' सूर्य के 'सन्दृशि' (सन्दशर्नाय )
भले प्रकार दर्शन के लिये समर्थ होवें हमें दिव्य दृष्टि दे,
जिससे सूर्य के संदर्शन में समर्थ हों । और 'घृतेन' ( उदकेन )
जलसे 'त्वम्' तू 'तन्वम्' अपने शरीर को 'वर्द्धयस्व' बढ़ा—
अर्थात्-यथा समय वृष्टि करने से यह सब होगा, इसी से तू
बरस ।
'रध' ( दि०प०) धातु वशगमन ( अधीन चलने ) अर्थ
में भी देखा जाता है । जैसे-
" मा रधाम द्विषते सोम राजन् "
अर्थात्- हे भगवन् ! सोम ! राजन् ! तुझसे विशेष रूप
से कहा जाता है कि—'द्विषते' शत्रुके 'मा' न 'रधाम' वश हों
इन उक्त प्रार्थनाओं के लिये हम शत्रुओं के अधीन नहीं,
किन्तु वे ही सब प्रकार हमारे अधीन हों । क्योंकि-शत्रुके
अधीन होना बहुत अनिष्ट है । यहां मन्त्रार्थ के सामर्थ्य से
'रध' धातु वश गमन अर्थ में स्थिर होता है ।
'ऋत' शब्द की व्याख्या ( २, ७, ३ ] की जाचुकी है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है—॥ ३ (४०) ॥
( खं० ४ )
निरु० " ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वी ऋत-
स्य॒धीति॒ र्वृ॑जि॒नानि॑ ह॒न्ति॒ । ऋतस्य श्लोको
हिन्दी निरुक्त ( ३७० ) १० अ० ४ पा० ४ खं०
बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः ॥ ”
ऋ० सं० ३, ६, १०, ३ ) ॥
ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति, पूर्वीःऋतस्य प्रज्ञा
वर्जनीयानि हन्ति ऋतस्य श्लोको बधिरस्यापि
कर्णौ आतृणक्षि ।
‘बधिरः’ बद्धश्रोत्रः ।
कर्णौ बोधयन् दीप्यमानश्च आयोः = अय-
नस्य = मनुष्यस्य । ज्योतिषो वा । उदकस्य वा ।
‘इन्दुः’ इन्धेः । उनत्तेर्वा ।
तस्य एषा भवति ॥ ४ ( ४१ ) ॥
अर्थः- “ऋतस्य हि शुरुधः०” इस ऋचा का वाम-
देव ऋषि है ।
‘हि’ क्योंकि—‘ऋतस्य’ ऋत मध्यम देव के ‘पूर्वीः’
पहिली या पूर्व अनेक काल की संचित की हुई ‘शुरुधः’
( आपः ) अप् [ जल ] हैं, [ अतः ] इससे ‘ऋतस्य’ ऋत देव
की ‘धीतिः’ [प्रज्ञा] बुद्धि ‘वृजिनानि’ सब लोकों के कष्टों
को ‘हन्ति’ नाश करती है, या ‘वृजिनानि [ वर्जनीयानि =
अयशांसि ] लोकों के अपयशों को ‘हन्ति’ नाश करती है ।
क्योंकि-अकाल में ही भूख प्यास के मारे हुये लोकों की अप-
यश के करने वाले चोरी आदि कामों में प्रवृत्ति होती है,
किन्तु ऋतदेव के यथा समय वृष्टि करने पर नहीं होती ।
इसी से ‘ऋतस्य’ [ ज्योतिषो वा ] ऋतकी ज्योति [ बिजली ]
का [ उदकस्य वा ] अथवा जलका ‘श्लोकः’ श्लोक या शब्द
हिन्दी निरुक्त ( ३७१ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०
'बुधानः' (बोधयन् ) जगाता हुआ 'शुचमानः' ( दीप्यमानः)
प्रकाशित होता हुआ 'बधिरा' [ बधिरस्यापि ] बहरे भी
'आयोः' ( अयनस्य = मनुष्यस्य ) मनुष्य के 'कर्णा' [कर्णौ ]
कानों को 'ततर्द' [ आतृणत्ति ] भेदन करदेता है वा फोड़
देता है । बहरे भी उस के यश को जानते हैं, ऐसा ऋतः
देव है ।
'इन्दुः' [ २७ ] कैसे ? दीप्ति अर्थ में 'इन्ध' ( रु०आ० )
धातु से है । अथवा क्लेदन [ भिगोना ] अर्थ में 'उन्द्' ( रु०
उ० ) धातु से है । क्योंकि—इन्दु ( चन्द्रमा) में प्रकाश करना
और भिगोना दोनों ही क्रियाएं संभव हैं ।
“तस्य०” उस की यह ऋचा है—॥ ४ (४१) ॥
(खं०५)
निरु०—“प्रतद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य
इषवान्मम रेजति रक्षोहा मन्म रेजति । स्वयं सो
अस्मदानिदो वधैरजेत दुर्मतिम् । अवस्रवेदघशं-
सोऽवतरमव क्षुद्रमिवस्रवेत् ॥ ऋ०सं०२,१,१७,१] ।
प्रब्रवीमि तद् भव्याय इन्दवे हवनाई इव य इषवान्
अन्नवान् कामवान् वा मननानि च नोरजयति रक्षो-
हाच बलेन रेजयति स्वयं सो अस्मदभिनिन्दि-
तारम् । “ वधै रजेत दुर्मतिम्” । “ अवस्रवेद-
घशंसः ।” ततश्च अवतरं क्षुद्रमिव अवस्रवेद् ।
“ अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते ” यथा- अहो
दर्शनीया-अहो दर्शनीया, इति ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३७२ ) १० अ० ३ पा० ५ ख०
तत् परुच्छेपस्य शीलम् ॥
'परुच्छेपः' ऋषिः । पर्ववच्छेपः । परुषि परुषि
शेपः अस्य — इति वा ॥
इति इमानि सप्तविंशति ( २७ ) दैवतानाम-
धेयानि अनुक्रान्तानि-सूक्तभाञ्जि हविर्भाञ्जि॥
तेषाम्-एतानि अहविर्भाञ्जि-वेनः, असुनीतिः,
ऋतः, इन्दुः ॥
'प्रजापतिः' प्रजानां पाता वा पालयिता वा ॥
तस्य एषा भवति ॥५ (४२) ॥
अर्थः- "प्रतद्वोचेयम्०" यह अतिच्छन्द है । परुच्छेप
ऋषि और षष्ठ अहन् (दिन) में मरुत्वतीय में शस्त्र है।
(यद् यद्-इष्टं तस्य इन्दोः) जो जो उस इन्द्र देव को
प्रिय है, 'तत्' (तत्) सो सो (अहम्) मैं 'भव्याय' उस भव्य
या भवन-योग्य = आत्मवान् = अपने वाञ्छितों के पात्र
'इन्दवे' इन्दु देव के लिये 'प्रवोचेयम्' (प्रब्रवीमि) कहता हूं।
'यः' जो इन्दु 'हव्येान' ( हवनार्ह इव ) हवन के योग्य जैसा
'इषवान्' ( अन्नवान् ) अन्न या उदक = जल वाला है—
यद्यपि उसके लिये यज्ञ में हविः नहीं दिया जाता, तो भी
वह अन्न या हविः वाला है—अर्थात्-अन्न के भी कारण
भूत जल को धारण करने वाला है जिससे कि—हविः उसी
से उत्पन्न होते हैं, इससे हविर्भाग् देवताओं से भी अधिक
महिमा वाला है । अथवा 'इषवान्' (कामवान्) कामनांवाले
हिन्दी निरुक्त ( ३७३ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०
होताओं को नित्य ही उनके वाञ्छित फलों के देने में प्रस्तुत
(तैयार) रहता है । इसीसे 'मन्म' (नः मननानि) हमारे मनों
को या प्रजाओं को 'रेजति' (रेजयति) (आकम्पयति) कम्पित
करता है- कैसे हम इसकी नित्य ही स्तुति करें ?- अपने
अनुग्रहों से हमारे मनों को नई नई स्तुतियों के लिये चञ्चल
करता रहता है । "रक्षोहा मन्म रेजति" (रक्षोहा च
बलेन रेजयति) और बल से राक्षसों को मारता हुआ हमारे
मनों को फुलाता है। और 'स्वयम्' अपने आप आदर युक्त
होकर 'सः' वह इन्दु 'अस्मदानिंदः' (अस्मदभिनिन्दिताम्)
हमारी निन्दा करने वाले 'दुर्मतिम्' दुष्टमति या पापमति
पुरुष को 'वधैः वज्र के प्रहारों से 'अजेत' प्राप्त होता है या
जीत लेता है या दूर फेंक देता है । 'अघशंसः' हमारे पापों
को कहने वाला-थोड़े पापों को भी देश में बढ़ाकर फैलानेवाला
'अवस्रवेत्' उस अतिबलवान् इन्दु से हन्यमान होता हुआ
अधोगति को प्राप्त हो । "अवतरम्" - नीचे से भी नीचे
'क्षुद्रम्-इव' अति तुच्छ वस्तु के समान 'अवस्रवेत्' नीचे चला
जावे- जैसे कोई क्षुद्र वस्तु जड़ से नष्ट होजाता है, उसी
प्रकार वह हमारा शत्रु नष्ट होजावे (यह हम चाहते हैं)।
इस मन्त्र में 'रेजति' 'रेजति' 'स्रवेत्' 'स्रवेत्' इस प्रकार एक २
पद फिर २ पढ़ा गया है, उसका क्या प्रयोजन है ? ऐसा प्रश्न
उठाकर भाष्यकार स्वयम् समाधान करते हैं-
"अभ्यासे भूयांसमर्थ मन्यन्ते"
अर्थात् - जहां शब्द के अभ्यास या आवृत्ति में दूसरा
कोई विशेष प्रयोजन नहीं है, वहां मन्त्रोंके अर्थ तत्व के
हिन्दी निरुक्त ( ३७४ ) १० अ० ४ पा० ५ खं०
जानने वाले आचार्य अर्थ के बाहुल्य को ही अभ्यास का
प्रयोजन मानते हैं क्यों कि- अकस्मात् वही शब्द दोहराया
नहीं जाता, अवश्य ही उनके पुनः कथन में कोई प्रयोजन
रहता है। और लोक में भी ऐसा देखागया है-
“यथा-अहो दर्शनीया अहो दर्शनीया”
अर्थात्- जैसे 'अहो (आश्चर्य, यह स्त्री दर्शनीय है अहो
यह स्त्री दर्शनीय है।
यहां स्त्री के गुणों के अतिशय या आधिक्य के बताने के
अर्थ 'दर्शनीय' पद को दोहराया गया है। इससे मन्त्रों में भी
वैसा ही शब्द स्वभाव है।
क्या कुछ और भी ? हाँ, -
“तत् परुच्छेपस्य शीलम्” अर्थात्- वह अभ्यास
मन्त्र के द्रष्टा परुच्छेप ऋषि का स्वभाव है- परुच्छेप ऋषि
का ऐसा ही स्वभाव है कि- वह अपने देवता की स्तुति
में एक २ शब्द को दोहरा २ कर बोलता है।
इससे भाष्यकार ने यह भी दिखाया कि- मन्त्रों के अर्थ
दर्शन काल में शब्दों के स्वभाव तक ही ध्यान नहीं रखना
चाहिये बल्कि मन्त्र के द्रष्टा ऋषि के स्वभाव का भी अनुरोध
करना चाहिये। इसी लिये लोक में भी वाच्य, लक्ष्य और
व्यङ्ग्य अर्थ के अतिरिक्त एक तात्पर्यार्थ भी माना जाता है
जो वक्ता की इच्छा से ज्ञान से प्रतीत होता है।
'परुच्छेप' कौन? ऋषि । सो क्यों? उसका पर्व या ग्रन्थि
वाला महान् शेप (लिङ्ग) है। अथवा 'पर्व्वणि पर्व्वणि शेपः अस्य'
अङ्गों की सन्धि २ में उसका शेप है- इतना लम्बा है कि-
उसका स्पर्श सब अङ्गों पर होजाता है।
हिन्दी निरुक्त ( ३७५ ) १० अ० ४ पा० ६खं०
"इति इमानि०" इस प्रकार ये सताईस (२७) 'वायु'
से आरम्भ कर 'इन्दु' पर्य्यन्त देवताओं के नाम गिनाए गए।
किस प्रयोजन से ? विशेष अर्थ के कहने के लिये ।
वह क्या विशेष है ?
"सूक्तभाजि हविर्भाञ्जि"
अर्थात्-ये सब देवता सूक्त के भजन करने वाले और
हविः के भजन करने वाले हैं- इनकी सूक्तों में प्राधान्य से
स्तुति भी है और यज्ञ में इनकी हविः भी है।
"तेषाम्-एतानि अहविर्भाञ्जि-वेनः, असुनीतिः,
ऋतः इन्दुः ।"
किन्तु उनमें ये चार देवता हविर्भाक् नहीं हैं,-वेन,
असुनीति, ऋत और इन्दु-इनकी सूक्तोंमें स्तुतिमात्र है और
यज्ञमें इन्हें हविः नहीं दीजाती । शेष सब तेईस ( २३ )
देवता वायु आदि हविः और सूक्त दोनों के भागी हैं ।
यह देवताओं के स्वभाव के दिखाने के अर्थ कहा है ।
जिस प्रकार मन्त्रार्थ के ज्ञान में शब्द स्वभाव और ऋषि-
स्वभाव का ज्ञान आवश्यक है, उसी प्रकार देवता का भी
स्वभाव ज्ञातव्य है। जैसे कि- यहां जो वेन आदि देवता
हविः के भजने वाले नहीं हैं, उनके मन्त्रों में जो "घृत" 'अन्न'
आदि शब्द आते हैं, उनका अर्थ मध्यम देवता के स्वभावा-
नुसार जल आदि ही लिया जावेगा । जो ऐसा अनुसन्धान
न रख कर प्रसिद्ध अर्थ के अनुसार घृत आदि ही अर्थ लेगा
वह देवता के प्रतिकूल ही अर्थ करेगा, जो यज्ञ में विगुणता
को उत्पन्न करने वाला है ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३७६ ) १० अ० ४ पा० ६ खं०
'प्रजापति' (२८) क्या ? प्रजाओं का पाता या पालयिता
( पालन करने वाला ) ।
"तस्य०" उसे प्रजापति देवकी यह ऋचा है ॥५(४२)॥
( खंड ६ )
निरु०- "प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वाजाता-
नि परिताँ बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु
वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥" (ऋ०सं०८,७,४,५
य०वा०सं० १०,२, २३,६५) ॥
प्रजापते ! नहि त्वद्-एतानि अन्यः सर्वाणि
जातानि तानि परि बभूव । यत्कामाः ते जुहुमः,
तद् नः अस्तु, वयं स्याम पतयो रयीणाम्, इत्याशीः।
'अहिः' व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति-॥६(४३)॥
अर्थः- "प्रजापते०" इस ऋचाका प्राजापत्य हिरण्य-
गर्भ ऋषि है। पितृयज्ञ में उपस्थान में विनियोग है और
राजसूय में होम में विनियोग है ।
'प्रजापते!' हे प्रजापति देव ! 'त्वत्' तेरे से 'अन्यः' अन्य
कोई भी एतानि इन 'ता' (तानि) उन 'विश्वा' (विश्वानि
= सर्वाणि) सब 'जातानि' (देवतारूपाणि) देवता रूपों को
'न' 'परिबभूव' (परिगृह्य भवति) सब ओर से ग्रहण
करके नहीं रहता है, किन्तु तू ही इन सब रूपोंको सब ओर
से लिये हुये है। 'यत्कामाः' जिस २ कामना को करते हुये