निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ३२८ ) ६ अ० ५ पा० ५ खं०
यथेष्ट लाभ होता । अतः मत्स्य ऋषिके समान वसिष्ठ आदि
ऋषि भी मन्त्रों में नित्य शब्द के रूप ही में हैं, किन्तु किसी
समय विशेष में होने वाले ऋषि नहीं । मन्त्र स्वतन्त्र हैं वे
जिस प्रकार चाहते हैं, उपादेय अर्थ को प्रकाश कर देते हैं-
कहीं मत्स्य, कहीं सर्प, कहीं ओषधि और कहीं वसिष्ठ
आदि से ।
'मत्स्य' क्यों ? मधु-जलमें स्यन्दन-करते बहते हैं । अथवा
आपस को खाने को मद-प्रमाद करते हैं ।
'जास' क्या ? जलचर-जलमें विचरने वाला होता है ।
अथवा जलमें होने वाला । अथवा जलमें सोने वाला ।
'अंहुर' अंहस्-वान्-पापवान्-पापी होता है ।
'अंहूरण' शब्द भी इसी 'अंहस्-वान्' का होता है ।
“कृण्वन्नंहूरणादुरु” अर्थात्- 'अंहूरणात्' पापरूप
कूप में पड़ने से उद्धार करके 'उरु' बहुत कल्याण 'कृण्वन्'
करते हुये [बृहस्पति देवने त्रितकी पुकार को सुना] । यह भी
निगम होता है । यहां अर्थ के अनुरोध से 'अंहूरण' नाम
पापयुक्त का है ।
'अंहुर' का उदाहरण-
“सप्त मर्यादाः कवय स्ततक्षुस्तासामेकामि-
दभ्यंहुरागात् ” अर्थात्- 'कवयः' (मेधाविनः-हिरण्यगर्भ
मनुप्रभृतयः) कवियों-मेधावियों-ब्रह्मा, मनु आदिकों ने 'सप्त'
मर्यादाः' सात मर्यादाएं 'ततक्षुः' (चक्रुः) की हैं। 'तासाम्'
उन में 'एकाम्-इत्' (एकाम्-अपि) एक मर्यादा को भी
'अभि 'अगात्' (अभिगच्छन्) उल्लंघन करता लांघता हुआ
हिन्दी निरुक्त ( ३२६) ६ अ० ५ पा० ६ खं०
'अंहुः' पापी हो जाता है । सात मर्यादाएं -
(१) स्तेय-चोरी (२) तल्पारोहण-जारी (३) ब्रह्महत्या
ब्राह्मण को मारना (४) भ्रूण हत्या-गर्भ-हत्या (५) सुरापान-
मदिरा पीना (६) दुष्कृत-पाप-कर्म को वार वार करना (७)
और किसी बुरे काम के निमित्त झूठ बोलना ।
'बत' (११२) यह अनवगत निपात पद है और खेद
(दुःख) और अनुकम्पा (दया) अर्थ का वाचक है ॥५(२७)॥
(खं० ६)
निघ०-वाताप्यम् ॥ ११३ ॥ चाकन्
॥११४॥रथर्यति ॥११५॥ असक्राम् ॥११६॥
निरु०-“बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदय-
अविदाम । अन्या किल त्वां कक्ष्यैव युक्तं
परिष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ॥” (ऋ०सं०७,६,८,३)
'बतः' बलात्-अतीतो भवति । दुर्बलो बतासि
यम नैव ते मनो हृदयं च विजानीमः । अन्या
किल त्वां परिष्वङ्क्ष्यते कक्ष्यैव युक्तं लिबुजेव वृक्षम् ।
'लिबुजा' व्रताति र्भवति । लीयते विभजन्ती
इति ।
'व्रतातिः' वरणात् च । शयनात् च । ततनात् च ।
'वाताप्यम्' उदकं भवति । वातः एतत् आ-
प्याययति ।
“पुनानो वाताप्यं विश्वश्चन्द्रम् ।” [ ऋ० सं०
४२
हिन्दी निरुक्त ( ३३० ) ६ अ० ५ पा० ६ खं०
७, ४, ३, ५ ] । इत्यपि निगमो भवति ॥
“वने न वायो न्यधायि चाकन् ।” [ ऋ० सं०
७, ७, २२, १ ] । वने इव वायः—वेः पुत्रः ।
[चाकन्-] चायन्-इति वा। कामयमानः-इति वा
(वायः-) ‘वा’ इति च ‘यः’-इति च चकार
शाकल्यः । उदात्तं तु एवम्-आख्यातम्-अभवि-
ष्यत् । असुसमाप्तश्च अर्थः ।
‘रथर्यति’ इति सिद्धः तत्प्रेप्सुः । रथं कामयते
इति वा ।
“एष देवो रथर्यति” । (ऋ० सं० ६,७,२०,५) ।
इत्यपि निगमो भवति ॥ (२८) ॥
“धेनुं न इषं पिन्वतमसक्राम् ।” (ऋ० सं० ५,
१, ४, ३) । असंक्रमणीम् ॥६॥
इति षष्ठाध्यायस्य पंचमः पादः ॥६,५॥
अर्थः—“ बतो बतासि ” इस मन्त्र में यमी यमसे
कहती है ।—
‘ यम ’ ‘ हे यम ! तू ‘बतः’ (दुर्बलः) दुर्बल ‘असि’ है-
तू अधर्म से डरने वाला मोह में डूबा हुआ है, मेरे बार २
प्रार्थना करने पर भी तू दुःखित-खिन्न होता है-मुझसे संभोग
करना नहीं चाहता है, इससे तू सर्वथा दया- योग्य और
शोचनीय है । ‘बत’ खेद है । अथवा ‘नेव ते मनो हृदयं च
अविदाम-विजानीमः’ तेरे मन-संकल्प और हृदय के निश्चय
हिन्दी निरुक्त ( ३३१ ) ६ अ० ५ पा० ६ खं०
को हम नहीं जानते । अथवा-मैंने तेरा अभिप्राय पा लिया-
“ अन्या किल त्वां परिष्वजाते-परिष्वङ्क्ष्यते ”
दूसरी ही मुझसे उत्तम स्त्री तुझे आलिङ्गन करेगी-उससे
मोहित हुआ ही तू मुझे आलिङ्गन करना नहीं चाहता । कैसे
तुझे वह आलिङ्गन करेगी ? “ कक्ष्येव युक्तं लिबुजेव
वृक्षम् ” कक्ष-बगल में उपजी हुई अच्छी बढ़ी बेल जैसे
अपने पास वाले वृक्ष को चारों ओरसे लपेट लेवे । इस प्रकार
'बतः' यह निपात खेद् और अनुकम्पा-दया अर्थमें है । ऐसे
ही प्रकरण संगत होता है ।
'बत' क्या ? बलसे अतीत-अलग-दूर गया हुआ-दुर्बल
होता है ।
' लिबुजा ' व्रतति-लता-बेल होती है । क्यों ? लप हो
जाती है विभक्त-न्यारी होती हुई भी ।
' व्रतति ' क्यों ? वरणा-स्वीकार- कर लेने ढांपलेने से ।
और शयन-सोजाने से । और ततन-फैलजाने से ।
' वाताप्य ' (११३) ( अनवगत ) उदक-जल होता
है । क्योंकि-वह वात-पवन से आप्यायन होता-बढ़ाया-
लाया जाता है ।
“ पुनानो वाताप्यंविश्वश्चन्द्रम् ” हे सोम ! तू
' विश्वः ' सब का सब 'चन्द्रम्' चमकीले-स्वच्छ 'वाताप्यम्'
जलको प्राप्त होकर पत्ता हुआहुआ [नृमन्तं-] 'पुनानः'पुत्र पौत्र
सहित यजमान को पवित्र करता हुआ । यह भी निगम है।
इस प्रकार यहां अर्थ और शब्द के सादृश्य से 'वाताप्य'
जलका नाम है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३३२ ) ६ अ० ५ पा० ६ खं०
'चाकन्' (११४) यह अनवगत 'चायन्-'पश्यन्' देखता-
हुआ) के अर्थ में अथवा 'कामयमानः' ( इच्छा करता हुआ)
के अर्थ में है ।
“वने न वायो न्यधायि चाकन् "हे इन्द्र ! 'वने'
'न' (वृक्षे इव) वृक्षमें जैसे पक्षी शिशु-जिसके पांख नहीं
जामी हों, 'वायः' अपने बच्चे को 'न्यधायि' (निदधाति)
रख देता है । सो जैसे वहां-घोंसले में रखा हुआ 'चाकन्' (पश्यन्)
भयसे चारों ओर दिशाओं को देखता हुआ रहता है,। अथवा
रक्षक की कामना करता हुआ रहता है । इस प्रकार यहां
'चाकन्' शब्द 'चायन्' (देखता हुआ) या 'कामयमानः'
(कामना करता हुआ) के अर्थ में है ।
'वायः क्या ? 'वेः पुत्रः' वि-पक्षी का पुत्र । शाकल्य
मन्त्रोंके पदकार ने 'वायः' शब्द के 'वा' और 'यः' ये दो पद
किये हैं। किन्तु यदि ऐसा होता तो 'न्यधायि' यह तिङन्त-
आख्यात पद उदात्तस्वर वाला होता, क्योंकि-“ यद्वृत्ता-
न्नित्यम् ” (पा० सू० ८, १, ६६) अर्थात्- 'यद्' शब्द के
के प्रयोग के अनन्तर तिङन्त पद कभी निघात-अनुदात्त नहीं
होता । इस नियम के अनुसार शाकल्य के मतमें 'यद्' शब्दके
'यः' रूपसे पर 'न्यधायि' आख्यात पद होता है, इस से यह
अनुदात्त न होकर उदात्त होना चाहिए था परन्तु यह उदात्त
नहीं बल्कि- अनुदात्त है। दूसरा कारण भाष्यकार यह भी
बताते हैं कि- “ अमुसमाप्तश्च अर्थः ” अर्थ भी अधूरा
रहता है ।
'रथर्यति' (११५) यह अनवगत 'रथ इर्यति' (रथ या रहस्य या गमन
की इच्छा करता है) के अर्थ मे है । अथवा रथ की कामना वाले के
अर्थ में है ।
हिन्दी निरुक्त ( ३३३ ) ६ अ० ६ पा० १ खं०
'रथर्यति' । सिद्धः-बनाहुआ ( सोम ) ' रथर्यति' ( तत्प्रे-
प्सुर्भवति ) उस-रथ रंहण - गमन की इच्छावाला होता है।
या रथकी कामना करता है । (यह नामधातु की क्रिया है । )
“एष देवो रथर्यति” ' एषः ' यह ' देवः ' सोम देव
'रथर्यति' रथ की या गमन की इच्छा करता है- यह भी
निगम है ।
'असक्राम्' (११६) यह अनवगत 'असंक्रमणीम्' ( नहीं
संक्रमण करने वाली ) के अर्थ में है ।
“धेनुं न इषं पिन्वतमसक्राम्” हे अश्विन् देवो!
'नः' हमारे लिये 'असक्राम्' हम से कभी अलग न होने वाली
'धेनुम्' गो को और 'इषम्' अन्न को 'पिन्वतम्' तुम दोनों
भराओ या बढ़ाओ । इस प्रकार यहां शब्द के सारूप्य और
अर्थ के अविरोध से 'असक्राम्' यह 'असंक्रमणीम्' ( अलग न
होने वाली ) के अर्थ में है ॥ ६ ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥६,५॥
षष्ठः पादः ।
( खं० १ )
निघ०-आधवः ॥११७॥ अनवब्रवः
॥ ११८ ॥
निरु०—'आधवः' आधवनात् ।
“मतीनां च साधनं विप्राणां चाधवम् ।” (७,
हिन्दी निरुक्त ( ३३४ ) ६ अ० ६ पा० १ खं०
७, १३, ४) इत्यपि निगमो भवति ।
‘अनवब्रवः’ अनवक्षिप्तवचनः ।
“विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवः ।” [ ऋ० सं० ८,
३, १९, ५ ] । इत्यपि निगमो भवति ॥१९(२९)॥
अर्थः-‘आधव’ (११७) कैसे ? ‘आधवन’-आकम्पन-सब
ओरसे कँपाने से ।
“ मतीनां च साधनं विप्राणां चाधवम् ”
हे देव ! पूषन् ! आदित्य ! हम तुझे मतिनों-प्रज्ञाओं-
बुद्धियों का साधन-देने-वाला मानते हैं । क्योंकि-सूर्य के
उदय होने से ही सब प्राणियों की बुद्धिएं प्रकट होती हैं ।
और मेधावी ब्राह्मणों का कँपाने वाला है। अर्थात् तू ऐसे
अपनी गुण शालिता-अपने गुणों को दिखाता है, जिस प्रकार
हृदय कांपते हुये वे तुझे स्तुति करते हैं। यह भी निगम होता
है । इस प्रकार यहां शब्द की समानता और अर्थ की अनु-
कूलता से ‘आधव’ नाम ‘आकम्पयिता’ ( कँपाने वाला ) के
अर्थ में है ।
‘अनवब्रव’ (११८) यह अनवगत ‘अनवक्षिप्तवचन ’
( जिसके वचन का कोई खण्डन न कर सके ) - अखण्डनीय
वचन के अर्थ में है।
“ विजेषकृदिन्द्र इवानवब्रवः । ” हे मन्यु देव
तू ‘इन्द्रः-इव ’ इन्द्र के समान ‘अनवब्रवः ’ अखण्डनीय
वचन और ‘विजेषकृत् ’ विजय का करने वाला है। यह भी
निगम है । इस प्रकार यहां ‘अनवब्रव ’ शब्द ‘अनवक्षिप्त-
वचन के अर्थ में है ॥ १ ( २६ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ३३५ ) ६ अ० ६ पा० २ खं०
( खं० २ )
निघ०—सदान्वे ॥११९॥ शिरिंविठः
॥१२०॥ पराशरः॥१२१॥ कृविर्दती॥१२२॥
करूलती ॥१२३॥
निरु०—“अरायि काणे विकटे गिरि गच्छ
सदान्वे। शिरिम्बिठस्य सत्वाभिस्तेभिष्ट्वा चात-
यामासि ॥” (ऋ० सं० ८, ८, १३, १) ॥
अदायिनि काणे विकटे ।
‘काणो’ ऽविक्रान्तदर्शनः-इति औपमन्यवः ।
कणते र्वा स्यात् अणूभावकर्मणः ।
‘कणतिः’शब्दाणूभावे भाष्यते-अनुकणति,इति।
मात्राणूभावात् ‘कणः’
दर्शनाणूभावात् ‘काणः’ ।
‘विकटः’ विक्रान्तगतिः, इति औपमन्यवः ।
कुटते र्वा स्याद् विपरीतस्य। विकुटितो भवति।
गिरि गच्छ सदानोनुवे ! शब्दकारिके ! ।
“शिरिम्बिठस्य सत्वाभिः ।” (ऋ०सं०८,८,१३,१)
‘शिरिम्बिठः’ मेघः । शीर्यते विठे ।
‘बिठम् ’ अन्तरिक्षम् । ‘ बिठम् ’ बीरिटेन
व्याख्यातम् ।
तस्य सत्त्वैः उदकैः इति स्यात् तैः त्वा चातयाम्ः
अपि वा ‘शिरिम्बिठः’ भारद्वाजः ।
कालकर्णीपेतः अलक्ष्मीं निर्नाशयांचकार, तस्य
सत्त्वैः कर्मभिः इति स्यात् तैः त्वा चातयाम्ः ।
‘चातयतिः’ नाशने ॥
‘पराशरः’ पराशीर्णस्य वसिष्ठस्य स्थविरस्य जज्ञे
‘पराशरः शतयातु र्वसिष्ठः ।” [ऋ०सं० ५, २,
२८, १] इत्यपि निगमो भवति ॥
‘इन्द्रः’ अपि पराशरः उच्यते । पराशातयिता
यातूनाम् ।
‘इन्द्रो यातूनामभवत्पराशरः ।” [ऋ०सं० ५,
७, ९, १] । इत्यपि निगमो भवति ॥
‘करूलती’ कृत्तदती । अपि वा देवं कञ्चित्
कृत्तदन्तं दृष्ट्वा एवम् अवक्ष्यत्–॥२(३०)॥
‘सदान्वे’ (११६) अनवगत ‘सदानोन्डुवे’-शब्दकारिके-हे शब्द कराने
वाली ! के अर्थ मे है । दुर्भिक्ष की अधिदेवता अथवा अलक्ष्मी – दरिद्रा
वाच्य है ।
“अरायि काणे” यह ऋचा शिरिम्बिठ भारद्वाज ऋषि की है, अनुष्टुप् छन्द
और दुर्भिक्ष-अकाल की अधिदेवता के प्रति कही जाती है ।
अर्थः– हे ‘अरायि !’ अदायिनि ! न दान करने या
कराने वाली ! दुर्भिक्ष की अधिकारिणी देवता ! अथवा हे
अलक्ष्मि ! दरिद्रे ! (क्योंकि दुर्भिक्ष और दारिद्रय से पीड़ित
जनों की दान में मति नहीं होती) इसी से उस देवता को
हिन्दी निरुक्त ( ३३७ ) ६ अ० ६ पा० २ खंड०
‘ अरायि ! ’ सम्बोधन दियागया है । ) हे ‘ काणे ! ’, मन्द
नेत्र वाली ! [ क्योंकि-दुर्भिक्षसे पीडित जनों की दृष्टि मन्द
हो जाती है । ] ( अलक्ष्मी के पक्षमें भी काणी अलक्ष्मी प्रतीत
होती है । क्योंकि = लोकमें भी विरूप स्त्री को अलक्ष्मी कहते
हैं ।) हे ‘विकटे !’ विकट गति वाली ! [ क्योंकि-दुर्भिक्ष से
दुर्बल हुए प्राणियों की गति विकट होजाती है । ] [ अलक्ष्मी
पक्षमें वह विकट-रूपा प्रतीत होती है । ] ‘सदान्वे ²’-सदा
नोनुवे ? -सदा प्राणियों को रुलाने वाली ? (क्योंकि-दुर्भिक्ष
में भूख के मारे पीडित प्राणी हैंकते हुए सदा शब्द करते हैं ।
तू ‘ गिरिंगच्छ ’ पहाड़ पर चली जा । “ शिरिम्बिठस्य
( मेघस्य ) तैः सत्वाभिः (उदकैः) त्वा चातयामासि
( नाशयामः ) मेघ के उन जलों से तुझे हम नाश करते
हैं । अथवा “ शिरिम्बिठस्य (भारद्वाजस्य) सत्वाभिः
नामभिः तेभिः त्वा चातयामासि ” भारद्वाज ऋषि के
देखे हुए स्तुतियुक्त नामों से हम तुझे नाश करते हैं । इस
प्रकार यहां ‘ सदान्वे ’ पद ‘ सदानोनुवे ’, ( शब्द कराने
वाली ! ) के अर्थ में है ।
इस मन्त्र में ‘अरायि’ ( १ ) ‘काणे’ ( २ ) ‘विकटे’ ( ३ )
‘सदान्वे’ ( ४ ) स्त्री लिङ्ग सम्बोधन पद हैं । उनमें पहिला
‘अरायि’ पद दानार्थक ‘रा’ (अदा०प०) धातुका ‘णिन्’ प्रत्यय
के संयोगसे ‘रायि’ होता है । जैसे दानार्थक ‘ दा ’ (जु०उ०)
धातु का ‘ दायि ’ होता है । उसी का निषेध ‘ अरायि ’
है, जिसका लोक में स्त्रीलिङ्ग रूप ‘अरायिनी’ और सम्बोधन
में उसी का ‘ अरायिनि ’ तथा ‘ दा ’ धातु का उसी प्रकार
हिन्दी निरुक्त ( ३३८ ) ६ अ० ६ पा० २ खं०
'अदायिनि' होता है, जैसा कि-भाष्यकार ने कहा है । २ रा
'काणा' और ३ रा 'विकटा' शब्द लोक-प्रसिद्ध हैं । ४ र्थ
'सदान्वे' अनवगत मूल शब्द है ही, जिस का यह प्रकरण
और निगम है ।
इस मन्त्र में शिरिम्बिट्ठ ऋषि इन चारों सम्बोधनों से
दुर्भिक्ष की पूर्णरूप से मूर्ति और उससे प्राणियों पर जैसी
जैसी विपत्तिये' आती हैं, उन सबका यथार्थ रूप से अनुभव
कर रहा है। तथा उसके निवारण का उपाय प्राधान्य से जल
सम्पत्तिको देख रहा है ।
' काण > क्या ? विक्रान्तदर्शन या उसका दर्शन-देखना
विक्रान्त-विकट-तीव्र होता है । क्योंकि दोनों नेत्रों की ज्योति
एक स्थानमें इकट्ठी हो जाती है । अथवा सन्धिके भेदसे 'अवि-
क्रान्तदर्शन है। क्योंकि उसकी दृष्टि मन्द होजाती है। यह औप-
मन्यव आचार्य मानते हैं ( ये दोनों अर्थ एक ही वाक्य से
निकलते हैं और वह औपमन्यव का ही मत है । भाष्य के
पाठ में सन्धि दोनों प्रकार की निकलती है-विक्रान्त और
अविक्रान्त । दोनों ही निर्वचन अपने अपने ढङ्ग से अर्थ में
घट जाते हैं । )
अथवा अणुभाव-छोटा होना अर्थ में 'कण' (स्वा० प०)
धातु से है। अर्थात् सूक्ष्म-बारीक श्यामाक-सामक आदि
अन्न 'कण' कहलाता है और उस की समानता से अल्प दर्शन
या दृष्टि को मन्दता के कारण पुरुष 'काण' कहलाता है ।
अथवा 'कण' धातु शब्द के अणुभाव-अल्पता में बोला
जाता है, जैसे अनुकणति (कुणारता है), और मात्रा के
अल्प या थोड़े पन से 'काण' बोला जाता है । पहिले मत
हिन्दी निरुक्त ( ३३६ ) ६ अ० ६ पा० २ खं०
में कण धातु अपने मुख्य अर्थ को और दूसरे मत में गौण अर्थ
को लेकर 'काण' शब्द में उपयुक्त होता है।
'विकट' क्या ? विक्रान्त गति-जिस की गति विकृत
बिगड़ी हुई हो, यह औपमन्यव आचार्य मानते हैं।
अथवा 'वि' (उप०) सहित 'कुट' (तु० प०) धातु
का है। क्यों ? वह 'विकुटित' कुबड़ा होता है।
'शिरिम्बिठ' क्या ? मेघ ।
'बिठ' क्या ? अन्तरिक्ष-आकाश। 'बिठ' की व्याख्या
'बीरिट' (अ० ५ पा० ४ खं० ६) से की गई जानना ।
अथवा 'शिरिम्बिठ भारद्वाज ऋषि है। उस ने इस
काल कर्ण सूक्त से युक्त हो-अनुष्ठान कर अलक्ष्मी-दरिद्रा
को नाश किया था। अब भी दारिद्रय से दुखा हुआ पुरुष
ठोड़ी समान जलमें घुसकर इस सूक्त का जप करके दारिद्र्य से
मुक्त हो सक्ता है।
'शातयति' नाश करना अर्थ में है !
'पराशर क्या ? पराशीर्ण-स्थविर-बुड्ढे वसिष्ठ ऋषि के
यहां जन्म लिया था।
“पराशरः शातयातु र्वसिष्ठः” हे इन्द्र ! ‘पराशरः’
पराशर 'शातयातुः शत्रुओ राक्षसोंका पातन करने वाला- मारने
वाला और वसिष्ठः' वसिष्ठ (लेकि मैत्रीको नष्ट नहीं करते) ।
यह भी निगम है। इस प्रकार यहा ऋ ष 'पराशर' है, क्यों,
कि- वसिष्ठका सम्बन्ध है।
इन्द्र भी 'पराशर' कहलाता है। क्यों ? वह यातुओं का
यातयितव्यो का-असुर आदिकों का 'परा' सब प्रकार शात-
यिता नाश करने वाला है।
हिन्दी निरुक्त ( ३४० ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
“इन्द्रो यातृना मभवत्पराशरः ” ‘ इन्द्रः ’ इन्द्र
देव ‘यातूनाम्’ राक्षसों का ‘पराशरः’ बड़ा नाश करने वाला
‘अभवत्’ हुआ । यह भी निगम है ॥
‘ क्रिविर्दती ’ ( १२२ ) अनवगत शब्द ‘विकर्तन-दन्ती’
( काटने वाले दांतों वाली ) के अर्थ में है ।
“ यत्रा वो दिद्युद्रदति क्रिविर्दती ” अर्थात्-
‘यत्र’ जिस मेघमें ‘ क्रिविर्दती ’ काटने में समर्थ दांतों वाली
‘दिद्युत्’ (आयुध-विशेष) ‘रदति’ काटती है । यह भी निगम
है । यहां अर्थ के अनुसार ‘ क्रिविर्दती ’ शब्द आयुध का
नाम है ॥
‘करूलती’ ( १२३ ) अनवगत ) शब्द ‘कृत्तदती’ ( कटे
हुये दांतों वाली ) के अर्थ में है ।
अथवा किसी कटे हुये दांतों वाले देवता को देखकर
ऋषि ने ऐसा कहा है- ॥ २ ( ३० ) ॥
( खं० ३ )
निघ०-दनः ॥१२४॥ शरारुः ॥१२५॥
इदंयुः ॥१२६॥
निरु०-“ वामं वामं त आदुरे देवो ददात्वर्यमा ।
वामं पूषा वामं भगो वामं देवः करूलती ॥ ”
(ऋ० सं० ३, ६, २३, ४ )
‘वामं’ वननीयं भवति ।
‘आदुरिः’ आदरणात् ।
हिन्दी निरुक्त ⁕ ( ३४१ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
तत्कः ? 'करूलती' ? भगः । पुरस्तात् तस्य
अन्वादेशः-इत्येकम् ।
पूषा-इत्यपरम् । सोऽदन्तकः ।
“अदन्तकः पूषा”-इति च ब्राह्मणम् ॥
“दनो विश इन्द्र मृध्र वाचः” ( ऋ० सं०
२, ४, १६, २ ) ।
दानमनसो नो मनुष्यान् इन्द्र ! मृदुवाचः कुरु ॥
“अवीराभिव मामयं शरारुरभिमन्यते ॥” (ऋ०
सं० ८, ४, २, ४ ) ।
अबलामिव मामयं बालोऽभिमन्यते संशिशरिषुः
'इदंयुः' इदं कामयमानः ।
अथापि तद्वदर्थे भाष्यते ।
'वसूयुः' इन्द्रो वसुमान्-इत्यत्रार्थः ।
“अश्वयुर्गव्यूरथयुर्वसूयुः” ( ऋ० सं० १, ४, ११,
४) । इत्यपि निगमो भवति ॥३[३१]॥
“वामं वामम् ” यह ऋचा वामदेव ऋषि की है। अनुष्टुप् छन्द और
रात्रिपर्याय में प्रशास्ता के शस्त्र में विनियुक्त है।
' वामम् ' पद का दो बार पाठ भूयस्त्व=आधिक्य के लिये है। क्यों
कि-आगे आचार्य कहेगा-“ अभ्यास भूयासमर्थं मन्यते” अभ्यास-दोहराने में
बहु अर्थ को मानता है ।
अर्थ- 'आदुरे ! ' हे आदरवाले ' यजमान ' जो जो 'तं'
तेरा 'वामम्' ( वननीयम् ) वाञ्छनीय-चाहने योग्य धन है,
हिन्दी निरुक्त ( ३४२ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
सो वो 'अर्यमा-देवः' अर्यमा देव तुझे 'ददातु' देवे । अथवा
अर्यमा देव अपने प्यारे धन को हे यजमान ! तुझे दे । 'पूषा
वामं ददातु' पूषा देव तुझे वाञ्छनीय धन दे । ' भगः वामं
ददातु' भग देव तुझे वाञ्छनीय धन दे । 'करूलती देवः वामं
ददातु ' करूलती कटे दांत वाली देवता तुझे वाञ्छनीय
धन दे ।
यहां ' करूलती ' यह पद कटे हुए दांत रूप गुण को
बोधन करता है, अतः विशेषण शब्द है, किसी देवता का
नाम नहीं, और इसी मन्त्र में इससे पूर्व 'भग' 'पूषा' ये भिन्न
भिन्न देवताओं के नाम आये हैं, इस से यह सन्देह का स्थान
होने से विचार किया जाता है कि “ ततः करूलती ”
सो कौन 'करूलती' है, भग या पूषा ? एकमत है-“ भग” ।
क्योंकि-‘करूलती पद से पूर्व समीप में 'भग' ही पढाहुआ है
इससे प्रतीत होता है कि-‘करूलती' 'भग' को ही कहा गया
है 'करूलती' पदसे उसी को अन्वादेश-फिर स्मरण किया
गया है ।
दूसरा मत है कि-‘करूलती' पूषा देवता को कहा गया
है । क्योंकि-वह अदन्त-बिना दांत का है । यह कहां से
जाना गया कि-पूषा अदन्त है ?
“ अदन्तकः पूषा ” पूषा अदन्त है, यह ब्राह्मण
ग्रन्थ है ।
प्राशित्र भाग के ब्राह्मण में इसका पूरा इतिहास ऐसा
सुनाजाता है-
“ तत् पूष्णे पर्य्याजह्रुः, तत् पूषा प्राश्नात्, तस्य
हिन्दी निरुक्त ( ३४३ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
दतो निर्जघान, तस्मादाहुः- अदन्तकः पूषा”
वह हविः पूषाको दिया गया, पूषाने उसे खालिया, उस
के दांत तोड़ दिये गए, इस कारण पूषा अदन्त है, ऐसा कहते
हैं। इससे जिन्होंने समीपता मात्रके कारण भग को 'करूलती'
कहा, सो ठीक नहीं है। क्योंकि-कहा भी है-
“यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थमपि तस्य तत् ।
अर्थतो ह्यसमर्थानामानन्तर्यमकारणम् ॥”
अर्थात्- जिस पदका जिस पदके साथ अर्थ-सम्बन्ध है-
अर्थ जुड़ता है, वह दूर पढ़ाहुआ भी पद उसीका है। क्योंकि-
अर्थ से असमर्थ सम्बन्ध न रखने वाले पदों का आनन्तर्य-
निकट होना कारण नहीं-सम्बन्ध का हेतु नहीं ॥
'दनः' (१२४) यह अनवगत 'दानमनस' ( दान में मन रखने वाले )
के अर्थ में है।
“दनो विश इन्द्र मृध्रवाचः”
'इन्द्र' हे इन्द्र ! देव ! हमारे लिये 'विशः' ( मनुष्यान् )
मनुष्यों को 'दनः' ( दानमनसः ) देनेके मन वाले और 'मृध्र-
वाचः' ( मृदुवाचः ) मीठी वाणी वाले ( कुरु ) कर ।
'शरारुः' (१२५) यह अनवगत 'सशिशरिषु.१'-'मुमूर्षु.२' ( मरने की
इच्छा वाला ) के अर्थ में है-
“अवीरामिव मामयं शरारुरभिमन्यते ।
उताहमस्मि वीरिणीन्द्रपत्नी मरुत्सखा विश्वस्मा-
दिन्द्र उत्तरः ॥”
इस ऋचा का इन्द्र देवता, इन्द्रपत्नी ऋषि, और पङ्क्ति
छन्द है । इन्द्रपत्नी कहती है-'अयं शरारुः'-( बालः-मूर्खः-
हिन्दी निरुक्त ( ३४४ ) ६ अ० ६ पा० ३ खं०
संशिशरिषुः-सुमूषुः ) यह बालक-अज्ञान-मरने की इच्छा
वाला-मूढ 'माम् अवीराम्-इव मन्यते' मुझे अवीरा-बिना
वीर की अबला जैसी मानता है। यह इसकी अत्यन्त ही क्षुद्र
मति है। किन्तु 'उत' वास्तव में 'अहम् वीरिखी अस्मि' मैं
वीरिखी-वीर वाली इन्द्रपत्नी हूं। 'इन्द्रः मरुत्सखा विश्व-
स्मात् उत्तरः' इन्द्र मरुतों का मित्र और संसार में सबसे बड़ा
बलवान् या प्रभुके गुणोंसे ऊंचा है। इस प्रकार यहां 'शरारु'
शब्द 'संशिशरिषुः' ( शरीर को छोड़ने की इच्छा वाला ) के
अर्थ में है।
इस मन्त्र में जिस अत्याचारी पर इन्द्राणी क्रोधाग्नि
उगल रही है, वह नहुष राजा या और कोई हो सकता है।
क्योंकि-नहुष ने भी किसी समय इन्द्राणी पर आक्रमण करना
चाहा था, यह आख्यान पुराणों में भी मिलता है। यह मन्त्र
इन्द्राणी के द्वारा पतिव्रता के दृढ भावों को सूचित करता है,
इस लिये स्त्रियों को यह बड़ा आदरणीय तथा हृदय में रखने
योग्य है। जिस प्रकार हिन्दुस्थान में हिन्दुओं के इतिहासों
में पुराणों में और प्राचीनतम कालसे अद्य पर्यन्त हिन्दू स्त्रियों
में सतीपना देखागया और देखा जाता है, वैसा ही वेद मन्त्रों
में भी अधिकता से मिलता है। इस से ऐसा समझने का
किसी को अवसर न होगा कि-स्त्रियों का पातिव्रत्य धर्म
किसी समय विशेष में गढ लिया गया होगा। सुतराम् हिन्दू
स्त्रियों का यह पातिव्रत्य धर्म वैदिक और अनादि है।
'इदंयुः' (१२६) यह अनवगत पद अनेक़ार्थ है—इसके अनेक अर्थ हैं।
'इदंयुः' क्या ? 'इदं कामयमानः' (इस की कामना
करने वाला) होता है। यहां 'इदम्' यह पद वाञ्छित वस्तु
हिन्दी निरुक्त ( ३४५ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
मात्र के लिये है, अर्थात्-कामना या प्रार्थना करने वाले को
‘इदंयु’ कहाजाता है । 'यु' शब्द कामना अर्थ में प्रसिद्ध नहीं
इसका बोल चालमें बहुत प्रयोग नहीं होता है, इस कारण
'इदंयु' शब्द अनवगत है ।
और भी 'तद्वत्' (उस वाले) के अर्थ में बोला जाता
है-हिन्दी में जहाँ 'वाला' शब्द जोड़ा जाता है-जिस अर्थ के
लिये कहा जाता है, संस्कृत में उसी प्रयोजन के अर्थ 'यु' शब्द
दिया जाता है । जैसे “वसूयुरिन्द्रः” यहां ‘इन्द्र वसूयु
अर्थात् वसुमान् = वसुवाला = धनवाला है ऐसा अर्थ होना
है। क्योंकि परिपूर्ण इन्द्रमें वसुकी कामना का संभव नहीं
इस से यहां 'यु' तद्वत् अर्थ में है ।
“अश्वयु र्गव्यू रथयुर्वसूयुः”
‘इन्द्रः’ इन्द्र ‘अश्वयुः’ घोड़े वाला ‘गव्युः’ गोवाला ‘रथयुः
रथवाला और ‘वसूयुः’ धनवाला है । यह भी निगम है । इस
प्रकार इस निगम में 'अश्वयु' (अश्ववाला) आदि शब्दों में
अनेक बार 'तद्वत्' के अर्थ में 'यु' शब्द का प्रयोग आया है ।
यहां ये सब इन्द्र के विशेषण हैं, अतः कामना का संभव न
होने से 'तद्वत्' का अर्थ ही लिया जासकता है । ३ ( ३१ ) ॥
( खं० ४ )
निघ०-कीकटेषु ॥१२७॥ बुन्दः ॥१२८॥
निरु०-“किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशिरं
दुह्रेन तपन्ति घर्मम् । आनो भर प्रमगन्दस्य वेदो
नैचाशाखं मघवन््रन्धया नः ॥” ( ऋ० सं० ३,३,
२१, ४ ) ॥
४४
हिन्दी निरुक्त ( ३४६ ) ६ अ० ६ पा० ५खं०
किं ते कुर्वन्ति कीकटेषु गावः ।
'कीकटाः' नाम देशः, अनार्यनिवासः ।
कीकटाः 'किंकृताः । किं क्रियाभिः-इति
प्रेप्सा वा ।
नैव च आशिरं दुह्रे, न तपन्ति घर्मम्, हर्म्यम्
आहर नः प्रमगन्दस्य धनानि ।
'मगन्दः' कुसीदी ।
'मागन्दः' माम् आगमिष्यति इति च ददाति,
तदपत्यं 'प्रमगन्दः' अत्यन्तकुसीदिकुलीनः ।
प्रमदको वा । यः-'अयमेवास्ति लोके, नपरः'
इति प्रेप्सुः ।
षण्डको वा । षण्डकः षण्डगः, प्रार्दको वा ।
प्रार्दयति-अण्डौ । 'आण्डो' आणी इव व्रीड
यति तस् मे ॥
'नैचाशाखम्' नीचाशाखः = नीचैः शाखः ।
'शाखाः' शक्नोतेः ।
१ सोममिश्रणयोग्यं पयः ( सा० भा० )
२ घर्मं घरणम् । इति सायणाभाष्यस्थनिरुक्तपाठः । प्र-
वर्याख्यं कर्मोपयुक्तं महावीरपात्रं स्वपयः प्रदानद्वारेण न
तपन्ति ( सा० भा० )
हिन्दी निरुक्त ( ३४७ ) ६ अ० ६ पा० ४ खं०
'आणिः' अरणात् ।
तन्नो मघवञ्रन्धय इति । रध्यति र्वशगमने ॥
'बुन्दः' इषुुर्भवति । बुन्दो वा । भिन्दो वा ।
भयदो वा । भासमानो द्रवति इति वा ॥४(३२)॥
अर्थः-'कीकटाः' (१५७) यह अनवगत है । 'किंकृताः'
अथवा 'किं-क्रियाभिः' ये इसकी शब्द समाधियें हैं । इस का
वाच्य अर्थ अनार्यों का म्लेच्छों का निवास देश है ।
“किं ते कृण्वन्ति” इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि,
इन्द्र देवता और त्रिष्टुप् छन्द है ।
हे इन्द्रदेव ! (याः) जो 'कीकटेषु' (अनार्यदेशनिवासिषु
मनुष्येषु) म्लेच्छ देश के रहने वाले मनुष्यों में या म्लेच्छों के
देश में 'गावः' गौयें हैं, (ताः) वे 'ते' तेरा 'किम्' क्या 'कृण्व-
न्ति' (कुर्वन्ति) करती हैं ? [ कुछ नहीं ] क्यों? “न आशि-
रं दुहे” न आशिर [सोममें मिलाने योग्य दूध] देती हैं, और
“न तपन्ति घर्मम्” न घर्म [महावीर पात्र] को अपने
दूध से तपाती हैं। [प्रयोजन यह कि-और भी अग्निहोत्रादि
कर्मों में वे उपयुक्त नहीं होतीं ।] इस से हम कहते हैं—
“आभर (हर) नः (ताः गाः)” लेआ उन गौओंको हमारे
पास [क्योंकि-हमउन गौओंसे आशिर आदि हविः तैयार करके
तुम्हारा उपकार करेंगे ।] और “प्रमगन्दस्य वेदः” जो
यह प्रमगन्द-अत्यन्त ही ब्याज खाने वाले पुरुष का धन है,
सो भी 'आभर' लेआ । [क्योंकि-वह भी तेरे यजन में नहीं
लगता ।] और “नैचाशाखं मघवन् ! रन्धय नः'