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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( १२३ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०
(निघ०-) आहनः ॥११॥
[निरु०] “अन्येन मदाहनो याहि तूयम्” ।
( ऋ० सं० ७, ६, ७, ३ ) ॥
अन्येन मत् आहनो गच्छ क्षिप्रम्, आहांसि इव
भाषमाण, इति असभ्यभाषणात् आहना इव भवति,
एतस्मात् आहनः स्यात् ।
‘आहनः’ यह पद सम्बोधन अनवगत है । क्यों कि-इसमें अर्थ की
प्रतीति नहीं होती । “आहांसि” यह अर्थ की प्रतीति है ।
“ न तिष्ठन्ति न निमिषन्त्येते देवानां स्पश
इहये चरन्ति । अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन
विवह रथ्येवंचक्रा ॥ ( ऋ० सं० ७, ६, ७, ३ )
यम और यमी का संवाद-सूक्त है, वहा यह यम का वाक्य है ।
वह मैथुन के लिये प्रार्थना करती हुई यमी को कहता है—
हे यमि ! तू मत समझ, इस समय एकान्त है, किन्तु
‘ न तिष्ठन्ति ’ [ छिद्र देखनेवाले जन क्षणमात्र भी ] नहीं
रुकते, और ‘न’ निमिषन्ति’ नहीं पलक झिंपाते, [ बराबर
फिरते और देखते रहते हैं । ] कौन ? ‘एते’ ये ‘देवानां स्पशः’
देवताओंके गुप्तचर, ‘ये’ जो ‘इह’ इस संसारमें ‘चरन्ति’ विच-
रते हैं । इससे कहता हूं—हे ‘आहनः ! ’ असभ्य भाषण से
हनन करने वाली ! ‘मत्’ मुझसे ‘अन्येन’ दूसरे कुलमें उत्पन्न
हुए पुरुष के साथ तू ‘तूयम्’ शीघ्र ‘याहि’ मैथुन को प्राप्त हो
मैं तेरे इस असभ्य वचन को सुन भी नहीं सकता, करना तो
दूर रहा । अतः तू दूसरे ही पुरुष के साथ मैथुन ( रति ) के

हिन्दी निरुक्त ( १२४ ) ५ अ० १ पा० २ खं०
लिये विचर । ‘तेन’ उसी से ‘विवह’ विवाह कर । ‘रथ्या
इव चक्रा’ जैसे एक रथमें दो चक्र (पहिये) जुड़े हुए होते हैं,
उसी प्रकार एक मनकर, उसी प्रयोजन में तेरे साथ वह कामी
और तू उसके साथ, दोनों जुड़ जाओ । किन्तु इस प्रयोजन
से तू मुझे कम्पित नहीं कर सकती, यह अभिप्राय है ॥
गरुड़पुराण के देव दूतों की बात को अवैदिक समझने
वाले तथा बहिन भाईके योनि संबन्धको वैदिक बनाने वाले
इस मन्त्र की ओर घूरकर देखें !
निरुक्तार्थ-हे आहनः ! मुझसे दूसरे के संग शीघ्र जा ।
‘आहनः’ क्यों ? मारती हुई जैसो है, बोलती हुई अर्थात्-
असभ्य (गन्दे) भाषण (बोल चाल) से आहना (मारने
वाली) जैसी होती है । पुरुष भी इसी से ‘आहन’ हो सकता
है । [क्योंकि-जिसके समीप ऐसा असभ्य वचन होता है,
उसका भी आहनन होता है ] ॥
इस मन्त्र में मैथुन-समाचार अनिष्ट होने से ‘आहनः’
यह यमीके- लिये सम्बोधन है, ऐसा निश्चय हो जाता है ॥
[निघ०] नदः ॥१२॥
[निरु०] ऋषिर्नदो भवति, नदतेःस्तुतिकर्मणः ॥
“नदस्य मारुधतः काम आगन् ॥” [ऋ०सं०
२, ४, २२, ४ ] ॥
नदनस्य मा रुधतः काम आगमत् । संरुद्ध-
प्रजननस्य ब्रह्मचारिणः,-इति ऋषिपुत्र्या विलापितं
वेदयन्ते ॥ २ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १२५ ) ५ अ० १ पा० २ खं०
अर्थः— 'नद्' ( १२ ) क्या ? ऋषि होता है , स्तुति
अर्थ में 'नद्' ( भ्वा० प० ) धातु से है । अर्थात्-जब ऋषि
देवताओं की स्तुति करता है,तब ऐसा प्रतीत होता है,मानों
यह संसार के विषयोंको तिरस्कार करता हुआ नाद (गर्जना)
करता है, इसी से वह 'नद्' कहा जाता है। लोक में भी जब
कोई किसी का बल पूर्वक तिरस्कार करता है, उस समय उसे
नाद करता है, धाड़ता है, गर्जता है, इत्यादि कहते हैं ।
प्रयोजन यह है कि-'नदः' ऐसा कहने से व्याख्येय शब्द
का ज्ञान होता है, कि-इसका व्याख्यान होगा । फिर 'ऋषि
र्भवति' (ऋषि है ) ऐसा पर्याय देने से ज्ञान होता है कि-
अन्तमें ठीक इसी वस्तु ( अर्थ ) पर इस शब्द को रहना है ।
फिर 'नदतेः स्तुतिकर्मणः' (स्तुत्यर्थक 'नद्' धातु से है । ) इस
से व्युत्पत्ति या उस शब्द के संस्कार ( प्रकृति-प्रत्यय ) का
ज्ञान होता है-कैसे बना ? क्या व्याकरण से विरुद्ध नहीं ?
तथा उसके तत्वके कुछ समीप पहुंचता है । फिर 'नदति-इव'
( नाद जैसा करता है ) इससे उस अर्थ की प्रतीति होती है,
जो उसमें घटता हो अर्थात्-व्युत्पत्ति 'नदति' (नाद करता है)
है, किन्तु विद्वान् ऋषि नाद ( अव्यक्त वाणी ) नहीं करता,
वह व्यक्त वाणी बोलता है अतः अर्थ की प्रतीति अपेक्षित
होती है-'नदति इव' ( नाद जैसा करता है ) अर्थात्-नाद
नहीं करता, नाद जैसा करता है । जब संसार के विषय उसके
साम्हने आते हैं, उन्हे' वेदार्थ-विज्ञान के बलसे बलपूर्वक
तिरस्कार करता है। लोक में भी जो बलपूर्वक किसी का
प्रत्याख्यान करता है, उसे ' गर्जता है , गर्जन करता है,
इत्यादि कहते हैं यह प्रकार शब्द के अर्थ को घटाने बढ़ाने

में उपयुक्त होता है, निर्वचन में इस की बड़ी आवश्यकता है
“नदस्य मा रुधतः काम आगन्नित आजातो
अमुतः कुतश्चित् । लोपामुद्रावृषणं नीरिणाति
धीरमधीरा धयति श्वसन्तम् ॥” (ऋ० सं० २, ४,
२२, ४) ॥
अगस्त्य ब्रह्मचारी और लोपामुद्रा ऋषिपत्नी के संवाद सूक्त में यह
लोपामुद्रा का वचन है । वह अगस्त्य को भर्त्ता समझ कर बोली—
‘नदस्य’ (नदनस्य) देवताओं की स्तुति करने वाले इस
अगस्त्य को ‘रुधतः’ इन्द्रियों को रोके हुए होने से ‘मा’ मुझे
‘कामः’ काम ‘आगन्’ आया, जिससे मैं अब पीड़ित हो रही
हूं । सो मैं नहीं जानती कि-वह ‘इतः’ ( एव मच्छरीरात् )
इस मेरे ही शरीर से ‘आजातः’ आया, अथवा ‘अमुतः’ उस
अगस्त्य के शरीर से, क्योंकि-पुरुष के गुणों को स्मरण करनेसे
स्त्री को काम हो जाता है (प्रकट होता है) और पुरुष को
स्त्री के स्मरण से । इसी से काम को ‘स्मर’ कहा जाता है ।
इस से यह उपपन्न होता है,-इस मेरे शरीर से या उस नद्
के शरीर से आया । अथवा ‘कुतश्चित्’ कहीं से आया, यह
भी वस्तुतः नहीं जानती । ‘लोपामुद्रा’ इस प्रकार विलाप
करती हुई लोपामुद्रा ‘वृषणम्’ वीर्य के बरसाने वाले अगस्त्य
को ‘नीरिणाति’ निश्चय अधिकता से या काम दोष से प्राप्त
होती है ‘रिणाति’ धातु गत्यर्थों में पढ़ा है । अथवा ‘निरि-
णाति’ (चेतसा उपगच्छति) मनसे उसे प्राप्त होती है । क्यों-
कि-वाञ्छित पुरुष का अनुचिन्तन करना स्त्री का स्वभाव ही
होता है । इससे ऐसा सिद्ध होता है । ‘धीरम्’ ब्रह्मचर्य में

हिन्दी निरुक्त ( १२७ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०
स्थिर बुद्धि अगस्त्यकी 'अधीरा' चञ्चल इन्द्रियों वाली 'धयति'
मनसे पी जैसे रही है अथवा नेत्रों से देखती है। 'श्वसन्तम्'
चित्त से उससे हटते हुए को भी (धयत्येव) पान कर ही रही
है। “श्वसति, नदति” ऐसा गत्यर्थों में पढ़ा है। इस
प्रकार लोपामुद्रा के वाक्य में “नदस्य रुधतो माम्
आगमत् कामः” इस प्रकरण से 'नद' शब्द से ऋषि कहा
जाता है, यह सिद्ध होता है “संरुद्ध प्रजननस्य ब्रह्म-
चारिणः” अर्थात्-“रोक दिया है, गर्भ का आधान जिस ने
ऐसे ब्रह्मचारी के,” ये पद ऋषि पुत्री के विलाप को जना
रहे हैं॥ २॥ ( खं० ३ )
[निघ०-] सोमोअक्षाः ॥ १३ ॥
(निरु०) “न यस्य द्यावा पृथिवी न धन्व ना-
न्तरिक्षं नाद्रयः सोमोअक्षाः।” (ऋ०सं० ८,४,१५,१)
अश्नोतेः इत्येवम्-एके।
अनूपे गोमान् गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः।
( ७, ५, १३, ४ )
“लोपाशः सिंहं प्रत्यञ्चमत्साः ।”
क्षियति निगमः पूर्वः, क्षरति निगमःउत्तरः इत्येके।
'अनूपे गोमान् गोभिर्यदा क्षियति, अथ सोमो दु-
ग्धाभ्यः क्षरति।
सर्वे क्षियतिनिगमाः इति शाकपूणिः॥

हिन्दी निरुक्त (१२८) ५ अ० १ पा० ३ खं०
“सोमो अक्षः” (१३) ये दो पद है। इन में “अक्षः” यह पद अनव-
गत है। और पक्ष में अनेकार्थ भी है। अर्थात् कुछ आचार्य ‘अश्नोति’ (व्याप्ति)
अर्थ, और कुछ आचार्य ‘क्षियति’ (गति) और ‘क्षरति’ (झरना) अर्थ मानते
हैं। किन्तु शाकपूर्णि सब स्थानों में क्षियति (गति) अर्थ ही मानते हैं। यही
पक्ष में अनेकार्यता है। यहां पर ‘सोम’ शब्द ‘अक्ष’ शब्द के साथ इस लिये
दिया है, कि—इस का उदाहरण “न यस्य द्यावा पृथिवी” यही मन्त्र बने ।
क्योंकि उस मन्त्र में “सोमो अक्षा” ऐसा ही विशिष्ट पाठ है। समाम्नाय के
आचार्यों के ध्यान में ‘अक्ष’ शब्द ‘अश्नोति’ का ही होना अच्छा है और वह
उक्त मन्त्र में भली प्रकार संगत होता है।
‘यस्य’ जिस इन्द्रकी महिमा को ‘द्यावा पृथिवी’ द्युलोक
और पृथिवी लोक ‘न’ नहीं ‘अक्षाः’ (अश्नुवाते) व्यापन करते
या पाते हैं। ‘न-धन्व’ न जल, ‘न-अन्तरिक्षम्’ न अन्तरिक्ष,
और ‘न-अद्रयः’ न पर्वत पाते हैं। किन्तु ‘सोमः-अक्षाः’ सोम
ही उसकी महिमा को व्यापन करता है। इस प्रकार कोई
‘अश्नोति’ पद का ‘अक्षाः’ शब्द मानते हैं।
“अनूपे गोमान्०” जब कोई ‘गोमान्’ गोओं वाला
‘गोभिः’ गोओं सहित ‘अनूपे’ सजल देशमें ‘अक्षा’ (क्षियति =
निवसति) निवास करता है ‘अथ’ तो उस देशके सुन्दर तृण
(घास युक्त होने से ‘दुग्धाभिः’ (पुनःपुनः ‘दुग्धाभ्यः’ अपि
गोभ्यः) बारबार दोही हुई भी गोओंसे ‘सोमः’ सोम ‘अक्षाः’
(‘क्षरति’ एव) झरता ही है। जिस वनमें ‘मत्साः’ मदयुक्त
‘लोपाशः’ छेदन-समर्थ गोएँ ‘सिंह’ सिंह के ‘प्रत्यञ्च’ (प्रति
अञ्चन्ति) साम्हने जाती हैं। [ऐसी गोओंकी महिमा जो
सुनते रहे, उसे आज इस मन्त्र में भी देखते हैं।]
मन्त्र में पहिला ‘अक्षाः’ पद ‘क्षियति’ (निवास) का

निगम है, और दूसरा 'अक्षाः' पद 'क्षरति' (भरने) का
निगम है। यह कोई आचार्य मानते हैं।
शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि ये पूर्वोक्त सब निगम
'क्षियति' (निवास) अर्थ के ही हैं। प्रथम उदाहरण में जिस
इन्द्र का द्यावापृथिवी निवास नहीं, न जल और न अन्तरिक्ष,
अपितु सोम ही इन्द्र का निवास है। "अनूपे" मन्त्रमें जब
गोमान् अनूप (सजल) देश में निवास करता है. तब दोही
हुई गोत्रों में भी सोम निवास करता ही है किन्तु वे दूध के
रूप में सोम से खाली नहीं होतीं इस प्रकार तीनों ही स्थानों
में निवास अर्थ घट जाता है। यही शाकपूणि का मत है।
[निघ०-] श्वात्रम् ॥१४॥
[निरु०] 'श्वात्रम्' (१४) इति क्षिप्रनाम। आशु
अतनं भवति । "स पतत्रीत्वरं स्था जगद्यच्छ्वा-
त्रमग्निरकरोज्जातवेदाः ।" (ऋ० सं० ८,४,१०,४)
स. पतत्रि च इत्वरं स्थावरं जङ्गमं च यत्, तत्
क्षिप्रम् अग्निरकरोज्जातवेदाः ॥
अर्थ-'श्वात्र' यह शीघ्र का नाम है। क्यों ? वह 'आशु
अतन' (जलदी जलदी चलता) है।
'सः' उस 'जातवेदाः' कार्य मात्रके जानने वाले अग्निने 'यत्' जो
'पतत्रि' इधर उधर उड़ने वाले 'इत्वरम्' पक्षी आदि, 'स्थाः'
(स्थावरम्) और स्थावर वृक्ष आदि 'जगत्' (जङ्गमं च)
और जङ्गम गो आदि (तत्) उस सब को प्रलय काल में
'श्वात्रम्' (क्षिप्रम्) शीघ्र 'अकरोत्' अपने में कर लिया था।
१७

हिन्दी निरुक्त (१३०) ५ अ० १ पा० ३ खं०
इस प्रकार इस मन्त्र में 'रवात्रम्' यह शीघ्र का नाम है । क्यों
कि स्थावर जङ्गलों को झट पट जलानेके अतिरिक्त अग्नि क्या
करता ? इस से शीघ्र अर्थ का नाम निश्चित होता है । (इस
मन्त्र में पौराणिक प्रलय कालीन अग्निलीला का वर्णन है )
[निघ०-] ऊतिः ॥१५॥
[निरु०] ऊतिः (१५) अवनात् ।
“आ त्वा रथं यथोतये” (ऋ० सं० ६, ५,
१, १,) इत्यपि निगमोभवति ।
अर्थ-‘ऊति’ (१५) अवन (रक्षा) से है ।
हे इन्द्र ! ‘त्वा’ (त्वाम्) तुझे (‘आवर्तयामसि’ (आ-
वर्तयामहे स्तुतिभिः) स्तुतियों द्वारा आवृत्ति (बार बार याद)
करते हैं ।) किस लिये ? ‘ऊतये’ अपनी रक्षा के लिये । किस
प्रकार ? ‘यथा-रथम्’ जैसे कोई समर्थ पुरुष रथ को बार बार
घुमाता है । इस प्रकार आवृत्ति के संबन्ध से ‘ऊति’ शब्द
रक्षा अर्थ में है ॥
[निघ०-] हासमाने ॥ १६ ॥
[निरु०] 'हासमाने' (१६) इति उपरिष्टाद्व्याख्या-
स्यामः ॥ ४ ॥
अर्थ-‘हासमाने' (१६) यह पद आगे “प्रपर्वतानामु-
शती उपस्थात्” पर व्याख्यान करेंगे ।
[निघ०] पद्धभिः ॥१७॥
[निरु०] “वम्रीकः पद्धभिरुपसर्पदिन्द्रम्” ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०

पानैः-इतिवा । स्पाशनैः-इतिवा । (स्पशनैः
इतिवा ।)
पद्भिः (१७) यह अनवगत है । “पानैः” “स्पाशनै” ये शब्दसमाधि हैं ।
वम्र नाम वैखानस ऋषि बोले कि—
हे इन्द्र ! ‘वम्रः’ पूर्व कल्प के वम्र ने ‘पद्भिः’ सोम
पानो ( की भेट ) से (इन्द्रम्’ पूर्व कल्पके इन्द्र को ‘उपसर्पत्’
शरण किया ( इन्द्र की शरण ली ) यहां शब्द की समानता
और प्रकरण से ‘पद्भिः’ यह पान का नाम है ॥
[निघ०] ससम् ॥१८॥
(निरु०) “ससं न पक्वमविदच्छुचन्तम् ।” (ऋ०
सं० ८, ३, १४, ३) स्वपनमेतत् माध्यमिकं ज्योतिः
अनित्यदर्शनं तदिव अविदद् जाज्वल्यमानम् ॥
‘ससम्’ ( १८ ) यह अनवगत पद है । ‘स्वपनम्’ यह अव-
गम ( अर्थ बोधक पद ) है ।
अर्थः—‘ससम्’ (स्वपनम् एतत् माध्यमिकं ज्योतिः अनि-
त्यदर्शनम् तद् ) स्वपन ( सोने वाला ) यह मध्यम (अन्तरिक्ष)
लोक का ज्योति ( बिजली ) जो अनित्यदर्शन अर्थात् आठ
(८) मास तक दिखाई नहीं देता, किन्तु वर्षा ऋतु में ही
दिखाई देता है, तथा ‘पक्वम्’ आकाश देशमें प्रकट होने
वाला है, उसके ‘न’ (इव) समान किसी ऋषिने या और ने
भूमिके सजल तृणयुक्त देशमें ‘शुचन्तम्’ (जाज्वल्यमानं) चमकते
हुये इस अग्नि को ‘अविदत् पाया या जाना ।
• यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से ‘ससं’

शब्दसे स्वपन (सोनेवाले) का ग्रहण होता है, तथा वह मध्यम
लोक की ज्योति बिजली ही है, उसी की उपमा मन्त्र में
अग्नि को दीगई है ॥
(निघ०) द्विता ॥१६॥
(निरु०-) “द्विताच सत्ता स्वधयाच शम्भुः ।”
( ऋ० सं० ३, १, १७, ५) । द्वैधं सत्ता मध्यमे च
स्थाने उत्तमे च । शम्भुः सुखभूः ॥
‘द्विता’ (१६) यह अनवगत है । 'द्वैधम्' (दो प्रकार से ) यह अवगम है ।
अर्थ-हे अग्ने ! तुझ से पूर्व होता वायु की 'द्विता'
(द्वैधंसत्ता ) दो प्रकार की विद्यमानता है। अर्थात्- (मध्यमे
च स्थाने उत्तमे च ।) मध्यम स्थान में विद्युत् (बिजली) के
रूपमें और उत्तम स्थान द्युलोक में सूर्य के रूपमें है । 'स्वधया
च' और वह अन्न के द्वारा सब प्राणियों को 'शम्भु' (सुख-
भूः) सुख देनेवाला है। यहां शब्द की समानता और अर्थ
की योग्यता से 'द्विता' शब्द 'द्वैध' के अर्थ में है ॥
(निघ०) व्राः ॥ २० ॥
(निरु०-) “मृगं न व्रा मृगयन्ते ॥” [ऋ०सं०५,
७, १८, १] मृगमिवव्रात्याः प्रैषाः ॥३॥
'व्राः' (२०) यह अनवगत है । 'व्रात्याः' यह अवगम है ॥
अर्थ-हे भगवन् ! इन्द्र ! 'व्राः' (व्रात्याः-प्रैषाः ) हमारे
प्रैष मन्त्र ( 'व्राः' = व्रात्याः = व्याधाः) व्याध 'मृगं-न'
(इव) ' मृगको जैसे, तुझे 'मृगयन्ते' ढूंढते हैं ॥ यहां पर मृग
के सम्बन्ध से 'व्रा' शब्द व्रात्य या लुब्धक (व्याध) का
नाम है ॥ ३ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३३ ) ५ अ० १ पा० ४ खं०
( खं० ४ )
(निघ०-) वराहः ॥२१॥
(निरु०-) वराहो मेघो भवति । वराहारः ।
“वरमाहारमाहार्षीः” इति च ब्राह्मणम् ।
“विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता” (ऋ०सं० १, ४,
२८, २) इत्यपि निगमो भवति ।
अयमपि इतरो वराहः एतस्मादेव । बृहति
मूलानि । वरं वरं मूलं बृहति इति वा ॥
“वराह मिन्द्र एमुषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०,
४) इत्यपि निगमो भवति ॥
‘वराह’ (२१) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
अर्थः—‘वराह’ मेघ होता है । क्योंकि-उसका वर (जल)
आहार (भोजन) है । और “वर (जल) आहारको आहार
[ भोजन ) किया । या हे पर्जन्य ! तैने श्रेष्ठ (जलरूप) आहार
को (हमारे लिये) आहरण (आनयन) किया। यह ब्राह्मण है
“वराहम्” (मेघम्) मेघको ‘विध्यत्’ ताडन करता हुआ
‘तिरः’ दूर ही अवस्थित (ठहरा हुआ हुआ) ‘अद्रिम्’ (वज्रम्)
वज्र को ‘अस्ता’ फेंकने वाला इन्द्र ।” यह भी निगम है ।
यह भी दूसरा ‘वराह’ (शूकर) इसी से है । क्योंकि-यह
भी वर (मूल) को आहार करता ही है । [ व्युत्पत्ति ]
‘बृहति मूलानि’ काटता है मूलों को । अथवा ‘वरंवरं मूलं
बृहति’ वर वर ( अच्छे अच्छे ) मूल को बर्हण करता
(काटता) है ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३४ ) ५ अ० १ पा० ४ खं०
“विश्वेत्ता विष्णुराभरदुरुक्रमस्त्वेषितः ।
शतं महिषान्क्षीरपाकमोदनं वराहमिन्द्र
एमूषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ४)
‘उरुक्रमः’ बहुत पराक्रम वाले ‘त्वेषितः’ इन्द्र वाक्य से
उत्तेजित ‘इन्द्रः’ ऐश्वर्यवान् ‘विष्णुः’ विष्णुने ‘ता’ (तानि) ‘विश्वा’
(विश्वानि) ‘इत्’ एव उन सबी धनोंको ‘आभरत्’ आहरण
किया किन धनोंको लाया? ‘शतं-महिषान्’ सौ (१००) भैंसोंको,
‘क्षीरपाकम्’ दूधपाक, ‘ओदनम्’ भात ‘ एमूषम् ’ मोह करने
वाले ‘ वराहम् ’ सूकर को ( लाया ) । यह भी निगम है ।
यहां धनोंके लाने के प्रसंगमें ‘वराह’ शब्द प्रसिद्ध वराह
(सूकर) का ही नाम हो सकता है । इस मन्त्र में “त्वेषितः”
पदमें ‘त्वा-इषितः’ ऐसा पद विभाग होकता है, तो भी अर्थ
के अनुरोध से एक पद करके ही निर्वचन किया है ॥
(निरु०-] अङ्गिरसोऽपि वराहा उच्यन्ते ।
“ब्रह्मणस्पति वृषभिर्वराहैः” (ऋ०सं०८, २, १६, १) ।
अर्थः- अङ्गिरस् भी वराह कहे जाते हैं।
“ ‘वृषभिः’ कामनाओं के बरसने वाले ‘वराहैः’ यज्ञ में
बैठने वाले अङ्गिरसों से सहित ‘ब्रह्मणस्पतिः’ इन्द्र”
यद्यपि इस मन्त्र में ‘वराह’ शब्द के अङ्गिरस्-वाचक
होने में कोई लिङ्ग नहीं है, तो भी इस मन्त्र वाले सूक्त में
“विप्रं पदमङ्गिरसो दधानाः०” [ऋ० सं० ८, २, १५, २]
ऋचा में ‘अङ्गिरस्’ पद का उपादान है ॥
(निरु०-) अथापि माध्यमिका देवगणा वराहवः
उच्यन्ते ।

हिन्दी निरुक्त ( १३५ ) ५ अ० १ पा० ५ खं०
“पश्यन्हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतोवराहून्”
(ऋ०सं० १, ६, १४, ५) ॥४॥
अर्थः-और भी मध्यम लोक के देव-गण 'वराहु' कहे
जाते हैं।
“हे मरुत् देवगणों ! गोतम ऋषि तुम्हें 'हिरण्यचक्रान्'
सोने के चक्रवालों, 'अयोदंष्ट्रान्' लोहे के रथ वालों, 'विधा-
वतः' नाना प्रकार दौड़ते हुओं 'वराहू' वराहु नाम वालों
को 'पश्यन्' (स्तौति) स्तुति करता है” ॥ ४ ॥
(खं० ५)
(निघ०-) स्वसराणि ॥२२॥
(निरु०) स्वमराणि अहानि भवन्ति । स्वयं सा-
रीणि । अपिवा स्व-आदित्यो भवति, सः एनानि
सारयति ।
“उस्रा इव स्वसराणि” । (ऋ० सं० १, १, ६, २)
इत्यपि निगमो भवति ।
'स्वसराणि' (२२) यह अनवगत है । 'स्वयंशारीणि' यह अवगम है ।
'अहानि' (दिन) अर्थ कथन है ।
अर्थः-'स्वसर' अहन् (दिन) होते हैं। क्योंकि-वे स्वयम्
(आप) सरण (गमन) करते हैं, या आपसे आप चले जाते हैं ।
अथवा 'स्वर' आदित्य होता है, वह इन को सारण
करता (चलाता) है ।
“उस्रा इव स्वसराणि” अर्थात्-“'इव' जिस प्रकार
'उस्राः' रश्मियें 'स्वसराणि' (अहानि) दिनों के प्रति ( शीघ्र

हिन्दी निरुक्त (१३७) ५ अ० १ पा० ६ खं०
अर्को मन्त्रो भवति यद्-अनेन अर्चन्ति ।
अर्कम्-अन्नं भवति, अर्चति भूतानि ।
अर्को वृक्षो भवति संवृतः कटुकिम्ना ॥५ (४) ॥
‘अर्क’ (२४) यह शब्द अनेकार्थ है ।
अर्थ-‘अर्क’ देव होता है । क्योंकि-इसे सब पूजते हैं ।
‘अर्क’ मन्त्र होता है । क्योंकि-इस से अर्चन ( पूजन )
करते हैं ।
‘अर्क’ अन्न होता है । क्योंकि-वह भूतों ( प्राणियों )
को अर्चता ( पूजता ) है ।
‘अर्क’ वृक्ष ( आक ) होता है, क्योंकि-वह कडुवे पन से
व्याप्त होता है ॥ ५ ( ४ ) ॥
( खं० ६ )
[निरु०] “गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः,
ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥” ( ऋ०
सं० १, १, १९, १, ) गायन्ति त्वा गायत्रिणः,
प्रार्चन्ति ते अर्कम्-अर्किणो ब्राह्मणाः । त्वा शत-
क्रतो ! उद्येमिरे वंशमिव ।
वंशः, वनशयोभवति। वननात् श्रूयते इतिवा ॥
‘अर्क’ शब्द के देव और मन्त्र अर्थ में निगम—
अर्थ- “गायन्ति त्वा०” अर्थात्-हे भगवन् ! इन्द्र !
‘गायत्रिणः’ ( सामगाः ) साम-गान करने वाले स्तुतियों द्वारा
‘गायन्ति’ गाते हैं । ‘अर्किणः’ ( मन्त्रिणो होतारः ) मन्त्रों
वाले होता लोग ‘अर्कम्’ तुझ अर्चनीय को ‘अर्चन्ति’ प्रार्चन्ति
ऋचाओं द्वारा पूजते हैं । ‘ ब्रह्माणः ’ ( ब्राह्मणाः ) ये सब
१८

हिन्दी निरुक्त ( १३८ ) ५ अ० १ पा० ६ खं०
ब्राह्मण यज्ञ कर्म में 'शतक्रतो' हे इन्द्र ! 'त्वा' तुझे 'वंशम्-इव'
बांस को जैसे 'उद्येमिरे' उठाते हैं। अर्थात् स्तुतियों और
हवियों से तेरी हो महिमा को बढ़ाते हैं। इस प्रकार यहां
'अर्क' शब्द से “अर्कम्” इस पदमें देवअर्थ और “अर्किणः”
पद में मन्त्र अर्थ है।
'अर्क' शब्द का वृक्ष या आक अर्थ प्रसिद्ध ही है, इस से
उस का निगम नहीं दिया ।
[निघ०-] पविः ॥ २५ ॥
[निरु०] 'पविः' (२५) रथनेमिर्भवति । यद्विपुनाति
भूमिम् ।
“उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा ।”
( ऋ० सं० ४, ३, ९, ४, )
“तं मरुतः क्षुरपविनाव्ययुः” इत्यपिनिगमौ
भवतः ॥
अर्थ-'पवि' ( २५ ) शब्द अनवगत है, और रथ की
नेमि (पूठी या पृथ्वी में टिकने वाली पहिये की धार)
का नाम है। क्योंकि-वह पृथ्वी को पवित्र करती या खोद
देती है।
“हे मरुतो ! 'उत' और 'रथानाम्' रथों की 'पव्या'
पूठी से 'अद्रिम्' (मेघम्) मेघ को तुम 'ओजसा' बल से
'भिन्दन्ति' भेदन कर देते हो । ( पुरुष का व्यत्यय वैदिक
है ) ॥”
“ 'मरुतः' मरुतों ने 'तम्' उस मेघ को 'क्षुरपविना' खुरे

हिन्दी निरुक्त (१३६) ५ अ० १ पा० ६ खं०
के समान पैनी पूठी से 'व्ययुः' भेदन कर दिया।" ये भी
निगम हैं। (यहां रथ और भेदन क्रिया के सम्बन्ध से 'पवि'
शब्द का नेमि (पूठी) अर्थ है)।
(निघ०-) वक्षः ॥२६॥
[निरु०] 'वक्षो' व्याख्यातम् ।
अर्थ-'वक्षः' (२६) इस शब्द का “उपो अदर्शि शु-
न्ध्यवः” (नि० अ० ४ पा० २ खं० ८) मन्त्र पर व्याख्यान
किया जा चुका है ॥
[निघ०-] धन्व ॥२७॥
[निरु०] 'धन्व' अन्तरिक्षम् । धन्वन्ति-अस्मात्
आपः ।
“तिरो॒धन्वा॑तिरोचते” (ऋ० सं० ८,८,४५,२)
इत्यपि निगमो भवति ॥
धन्व (२७) शब्द अनवगत है।
'धन्व' (२७) क्या ? अन्तरिक्ष । क्यों ? इससे जल गिरते
हैं। क्या निगम है ! “तिरो धन्वातिरोचते” अर्थात्-जो
आदित्यरूप अग्नि 'तिरः' अतिविस्तार युक्त 'धन्व' आकाश
देशको 'अति' अतीत्य, लांघ करके 'रोचते' हमारे प्रति प्रकाश
करता है। यह भी निगम है। (यहां आदित्य की स्तुति के
संबन्ध से 'धन्व' अन्तरिक्ष (आकाश) का नाम है) ॥
[निघ०-] सिनम् ॥ २८ ॥
(निरु०-) सिनम्-अन्नं भवति । सिनाति भूतानि ।

हिन्दी निरुक्त ( १४० ) ५ अ० १पा० ६ खं०
“येन स्मा सिनं भरथःसखिभ्यः” (ऋ०सं०३,४,९,१)
इत्यपि निगमो भवति ॥
‘सिन’ (२८) शब्द अनवगत है । ‘सिनाति’ (बांधता है) यह शब्दयुक्ति
है । ‘अन्न भवति’ (अन्न है) यह अभिधेय (अर्थ) वचन है ।
अर्थ- ‘ सिन ’ अन्न होता है । क्योंकि-वह सब भूतों
( प्राणियों ) को सींता ( बांधता ) है ।
हे इन्द्रावरुणा देवो ! ‘ येन ’ जिस माहाभाग्य ( बड़ी
महिमा ) के कारण ( युवाम् ) तुम दोनों ‘ सखिभ्यः ’ समान
ज्ञान वाले यजमानों के लिये ‘सिनम् ’ ( अन्नम् ) अन्न को
‘भरथः’ पूरते हो ( ‘स्म’ पाद् पूरण है ।) ॥ यह भी निगम है
अन्न को ही प्राय करके यजमान मांगते हैं, इस लिए
यही ‘सिन’ शब्द अन्न का ही वाचक होता है ।
‘धन्व’ और ‘सिन’ इत्यादि कई शब्द अपने २ अर्थ में
नैघण्टुक प्रकरण में भी पढे गए हैं,तो भी यहां (नैगमकाण्ड में)
कोई अनवगत संस्कार होनेके कारण और कोई अनेकार्थ होने
के कारण पढ़ेगए हैं ॥
[निघ०] इत्था ॥२६॥
(निरु०) ‘इत्था’‘अमुथा’-इत्येतेन व्याख्यातम्॥५॥
अर्थः-‘इत्था’ ( २६ ) यह निपात है । इस की व्याख्या
‘अमुथा’ ( ३, १६ ) शब्द के समान है ।
(निघ०-) सचा ॥ ३० ॥
[निरु०-] ‘सचा’ सह-इत्यर्थः ।
“वसुभिः सचा भुवा ” ( ऋ० सं०६, ३, १४, १ )

हिन्दी निरुक्त ( १४१ ) ५ अ० १ पा० ६ खं०
वसुभिः सह भुवौ ॥
'सचा' यह निपात अप्रतीतार्थ (अर्थानवगत) है।
'सचा' सह (साथ) यह अर्थ है।
हे अश्विनौ ! अश्विनों ! 'वसुभिः' वसु देवताओं से
'सचा' भुवा (सहभुवौ) सहित होकर (इस सोम को पीओ,
और हमारे अभिप्रेत अर्थ को सिद्ध करो ।) ॥
[निघ०-] चित् ॥ ३१ ॥
[ निरु०- ] 'चित्' इति अनुदात्तः । पुरस्तादेव
व्याख्यातः ।
अथापि पशुनाम इह भवति उदात्तः ।
“ चिदसि मनासि धीरसि ”
चितास्त्वयि भोगाः । चेतयसे इति वा ॥
अर्थः-'चित्' (३१) यह निपात अनुदात्त-स्वर है।
पहिले (नि० अ० १ पा० २ खं० ३) व्याख्यान किया गया
है। अनेकार्थ है।
और उदात्त (आदि-उदात्त) होकर यहां पर [राज-
ऋयणी गोकी स्तुति में- ] पशु का नाम भी होता है।
हे गौः! ('त्वं') तू 'चित्' भोगसाधनी 'असि' है। 'मनासि'
मान्य है। 'धीः-असि' ध्याई जाती (ध्यान की जाती) है।
'चित्' क्यों ? तुझमें सब भोग संचित हैं। अथवा तू घृत,
दूध आदि के दान से मनुष्यों को चेताती है।
(निघ०-) आ ॥ ३२ ॥
[निरु०-] 'आ' इति आकार उपसर्गः, पुरस्तात्-

हिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ५ अ० १ पा० ६-७
एव व्याख्यातः ।
अथापि अध्यर्थे दृश्यते ।
“अभ्र आँ अपः । ” (ऋ० सं० ४,३,२,१) ।
अभ्रे आ अपोऽपोऽभ्रेऽधीति ॥
अर्थः- ‘आ’ ( ३३ ) यह उपसर्ग पहिले ही ( नि०
अ० १ पा० १ खं ५ ) व्याख्यान किया जा चुका है- । ( 'आ'
इति अर्वागर्थे । ) ( “अथापि उपमार्थे दृश्यते” “जार
आ भगम् । ” इत्यादि ।
यही कदाचित् 'अधि' के अर्थ (उपरिभाव या ऐश्वर्य्य)
में होता है । निगम—
“ अभ्र आँ अपः ” जो ही ‘अभ्रे आ अपः’ वाक्य
से कहा गया होता है, वही ‘ अपः अभ्रे अधि’ से । अर्थात्
‘अभ्रे’ मेघ के ‘आ’ ( अधि ) ऊपर ‘अपः’ जलों को ( वित-
नोति ) विस्तार करती है ।
जल मेघ के ऊपर ही रहते हैं, इससे यहां ‘आ’ ‘अधि’के
अर्थ में निश्चित होता है ॥
(निघ०-) द्युम्नम् ॥३३॥
(निरु०-) ‘द्युम्नं’ द्योततेः । यशोवा । अन्नंवा ।
“अस्मे द्युम्नमधिरत्नं च धेहि” [ऋ०सं०५,३,९,३)
अस्मासु द्युम्नं च रत्नं च धेहि ॥ ६ (५) ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ५, १ ॥
‘द्युम्न’ (३३) शब्द अनेकार्थ है । ‘द्योतते’ (प्रकाशता है) यह शब्द-प्रतीति
है । “यशो वा” अथवा यश “अन्नंवा” अथवा अन्न यह अर्थ कथन है ।

हिन्दी निरुक्त (१४३) ५ अ० २पा० १ खं०
'द्युम्न' कैसे ? 'द्युत' (स्वा० आ०) धातु से । यह क्या ?
अथवा यश है, (क्यों? 'द्योतते' वह चमकता है ।) अथवा
अन्न है । (क्यों ? 'द्योतते' उसे खाने वाला प्रकाशमान
होता है ।)
“अस्मेद्युम्न०” हे इन्द्र ! 'अस्मे' (अस्मासु) हम में
'द्युम्नम्' यश या अन्न को 'च' और 'रत्नम्' रत्न को 'धेहि'
धारण कर ॥
यहां आशीः (प्रार्थना) के सम्बन्ध से द्युम्न नाम अन्न
या यश का होता है ॥ ६ (५) ॥
इति पञ्चमाध्याये प्रथमः पादः समाप्तः ॥ ५, १ ॥
:द्वितीयः पादः ।
(खं० १)
[निघ०-] पवित्रम् ॥३४॥ तोदः ॥३५॥
(निरु०) पवित्रं पुनातेः । मन्त्रः पवित्रमुच्यते ।
“येन देवाः पवित्रेणात्मानं पुनते सदा ॥” (सा०
सं० उ० आ० ५, २, ८, ५) इत्यपि निगमो भवति ।
रश्मयः पवित्रमुच्यन्ते ।
“गभस्तिपूतः” “गभस्तिपूतो नृभिरद्रिभिःसुतः”
(ऋ० सं० ७, ३, १८, ४) इत्यपि निगमौ भवतः ।
आपः पवित्र मुच्यन्ते ।
“शतपवित्राः स्वधया मदन्तीः ॥” (ऋ०सं० ५,
४, १४, ३) । बहूदकाः ॥