निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( २४६ ) ६ अ० १ पा० ५ खं०
“मोषथा वृक्षं कपनेव वेधसः” अर्थात्-हे मरुतो !
तुम 'कपनाः' कँपाने वाले 'वेधसः' वेधने वाले कीड़े 'वृक्षम्-इव'
वृक्षको जैसे 'मोषथा' ( मोषथ ) ( मेघको ) भेदन करो, । यह
भी निगम है।
'भ्राजृजीकः ( १६ ) ( अनवगत ) 'प्रसिद्धभाः' (प्रसिद्ध
कान्तिवाले ) के अर्थ में है ।
“धूमकेतुः समिधा भ्राजृजीकः” अर्थात्-हे अग्नि
देव ! तू 'धूमकेतुः ' धूम से जाना जाता या धूमरूप केतु
(ध्वजा ) वाला है, 'समिधा' धमाने से 'भा ऋजीकः' चमकने
वाला है। यह भी निगम होता है।
'रुजानाः' ( २० ) (अनवगत) है । 'रुजान, क्या ? नदी
होती हैं। क्यों ? वे कूलों (तटों) को रुजन (भंग) करती हैं।
“संरुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः” अर्थात्-' इन्द्रशत्रुः '
इन्द्र का शातयितव्य ( वध्य ) मेघ ' संरुजानाः ' नदियों के
प्रति 'पिपिषे' चूर्ण होगया, । यह भी निगम होता है ॥
' जूर्णिः' ( २१ ) ( अनवगत ) अथवा हिंसार्थक ' ज्र '
( भ्वा०प० ) धातुसे है। अथवा गत्यर्थक 'द्रू' (भ्वा० प० )
धातुसे है। अथवा हिंसार्थक 'द्रू' ( स्वा० प० ) धातु से है ।
“क्षिप्ता जूर्णि र्न वक्षाति” अर्थात्-'क्षिप्ता' राक्षसों की
फेंकी हुई 'जूर्णिः' शक्ति ( अस्त्रविशेष ) 'न-वक्षति' हमारे
ऊपर न आवेगी, । यह भी निगम होता है ॥
' ओमना ' ( २२ (अनवगत ) ('अवनाय' ) रक्षा या
तृप्ति के लिये के अर्थ में ) है।
“परिद्युम्नोमना यां - वयोऽगात् ” अर्थात्-हे
हिन्दी निरुक्त ( २४७ ) ६ अ० २ पा० १ खं०
अश्विनों ! 'द्यु'मत्' (अह्नः) प्रतिदिन 'वाम्' तुम दोनों के
प्रति 'ओमना' (अवनाय) तृप्ति के अर्थ 'वयः' (अन्नम्)
(घृत आदि) 'परि-अगात् सब दिशाओं से जाता है ॥ ५ (४) ॥
इति हिन्दी निरुक्ते षष्ठाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ६, १॥
द्वितीयः पादः ।
( खं० १ )
निघ०- उपल प्रक्षिणी ॥ २३ ॥
निरु०- 'उपलप्रक्षिणी' उपलेषु प्रक्षिणाति। उपल-
प्रक्षेपिणी वा । इन्द्र ऋषीन् पप्रच्छ-'दुर्भिक्ष केन
जीवति' इति । तेषामेकः प्रत्युवाच—
"शकटः शाकिनी गावो जालमस्यन्दनं वन-
मुदधिः पर्वतो राजा दुर्भिक्षे नव वृत्तय" इति सा
निगद्व्याख्याता ) ॥ १ ( ५ ) ॥
अर्थः-'उपलप्रक्षिणी' (२३) (अनवगत) [सत्तू बनाने
वाली स्त्री का नाम है । ] क्यों ? वह यवों (जवों) को उपलों
(पत्थरों) पर प्रक्षीण करती (कूटती या पीसती) है।
अथवा वह तपाए हुए उपलों पर भूंजने के लिये यवों को
प्रक्षेपण करती या डालती है । [ सो यह 'उपलप्रक्षेपिणी'
को 'उपलप्रक्षिणी' (भड़भूजी) कही जाती है ।)
[ इन्द्र ने ऋषियों से पूछा-दुर्भिक्ष (अकाल) में किस
उपाय से मनुष्य जी सकता है ? उनमें एक ने उत्तर दिया
कि- "शकट (गाड़ी, शाकिनी (शाककी भूमि) गोएँ, जाल
(जलसे मछली आदि को पकड़ना), अस्यन्दन (नहर),
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हिन्दी निरुक्त ( २४८ ) ६ अ० २ पा० २ खं०
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वन, समुद्र, पर्वत, और राजा दुर्भिक्ष में नव ( ६ ) वृत्तिएं
होती हैं सो यह पाठमात्र से ही व्याख्यान की गई
है। ] ॥ १ ( ५ ) ॥
( खं० २ )
निघ०- उपासि ॥२४॥ प्रकलवित् ॥२५॥
अभ्यर्द्द्यज्वा ॥ २६ ॥ ईक्षे ॥ २७ क्षो-
णास्य ॥ २८ ॥
निरु०- "कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना
नाना धियोवसूयवोऽनु गा इव तस्थिमेन्द्रा येन्दो
परिस्रव ॥" (ऋ० सं० ७, ५, २५, ३ ) ॥
'कारुः-अहम्-अस्मि'। कर्त्ता स्तोमानाम् ।
ततो भिषक् । 'तत' इति सन्ताननाम, पितुर्वा
पुत्रस्य वा । 'उपलप्रक्षिणी' सक्तुकारिका । 'नना'
नमतेः । माता वा । दुहिता वा । 'नानाधियो'
नानाकर्माणः । 'वसूयवो' वसुकामाः । अन्वास्थि-
ताः स्मो गाव इव लोकम् । 'इन्द्रायेन्दो परिस्रव'
इति-अध्येपणा ॥
"आसीन ऊर्ध्वामुपसि क्षिणाति।" [ऋ० मं०
७, ७, १७, ३ ] उपस्थे ॥
'प्रकलविद्' वणिग् भवति । कलाश्च वेद
प्रकलाश्च ।
हिन्दी निरुक्त ( २४६ ) ६ अ० २ पा० ३ सं०
“ दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमानाः ” ( ऋ० सं०
५, २, २६, ५, ) इत्यपि निगमो भवति ॥
'अभ्यर्द्दयज्वा' अभ्यर्द्दयन् यजति ।
"सिषक्ति पूषा अभ्यर्द्दयज्वा" ( ऋ० सं ४, ८,
८, ५ ) इत्यपि निगमो भवति ॥
'ईक्षे' ईशिषे ।
"ईक्षेहि वस्व उभयस्य राजन्" ( ऋ०सं० ४,६,
८, ५ ) इत्यपि निगमो भवति ॥
'क्षोणस्य' क्षयणस्य ।
"महः क्षोणस्याश्विना कण्व्याय" [ ऋ० सं० १,
८, १४, ३ ] इत्यपि निगमो भवति ॥ २ (६) ॥
"कारुरहम्" यह ऋचा शिशु आंगिरस ऋषि की है। पङ्क्ति छन्द और
इन्द्र देवता है । ऐसा स्मरण होता आया है कि-सोम क निचोड़ने पर जब
वह न झरा (छना) तो ऋषि को आशंका हुई कि-यह मेरे दुष्कृत या पाप
के कारण से नहीं झरता है और अपने पाप को अपने मुख से कहने से
आत्मा की शुद्धि होती है, इस कारण ऋषि इस मन्त्र में अपना ही निर्देश
करता हुआ कहता है—
अर्थः-हे' इन्दो ! सोम ! ' अहम् ' मैं ' कारुः ' ( कर्त्ता
स्तोमानाम् ) किसी अनादि कालमें दूसरोंके यज्ञ कर्ममें होता
के रूप में कारु या स्तुतियोंका करने वाला ( अस्मि ) हूं या
था, अथवा यज्ञसे अलग अपनी जीविका के अर्थ लौकिक
बनावटी बातोंसे औरों के लिये मिठ बोला था । 'ततः' मेरा
पिता अथवा पुत्र (क्योंकि-'ततः' इति सन्तान-नाम, पितुर्वा
३२
हिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) ६ अ० २ पा० २ खं०
निरुक्तार्थ-मैं कारूं हूं या थां । 'कारूं' क्या ? स्तोमों
( स्तुतियों ) का करने वाला । ( मेरा ) 'तत' भिषक् ( वैद्य या
ब्रह्मा ) था । 'तत' यह सन्तान का नाम है । अथवा पिताका
अथवा पुत्र का । 'उपलप्रक्षिणी' सक्तुओं को बनाने वाली ।
'नना' 'नम' (स्वा० पँ०) धातु से है । अथवा माता । अथवा
पुत्री । 'नानाधी क्या ? नानो (अनेक) कर्मों के करने वाले ।
'वसूयु' क्या ? वसुओं धनों की कामना वाले । हम लोक के
प्रति गोओं के समान अनुचर रूप से स्थित थे । हे इन्दो !
( सोम ! ) तू इन्द्र के लिये झर । यह अध्येषणा ( सत्कार-
पूर्वक किसी पूज्य या प्रतिष्ठित को प्रेरणा ) है [ इस मन्त्र में
अपने दोषों को अपने मुख से कहने की महानुभावता और
एक जीव के अनेक जन्मों का निदर्शन मिलता है तथा जन्म-
कृत जाति की पुष्टि होती है, या जन्म का आत्मा पर बहुत
काल तक पूरा प्रभाव रहता है, इत्यादि बातो का स्पष्ट
वर्णन हैं । ]
'उपसि' (२४) अनवगतं 'उपस्थे' ( ऊपर के स्थान में )
के अर्थ में है ।
“आसीन ऊर्ध्वा मुपसिक्षिणाति" अर्थात्-'आसीनः'
मध्यस्थान में बैठा हुआ इन्द्र 'ऊर्ध्वाम्' ऊपर स्थित हुई
द्युलोक रूप गो को 'उपसि (उपस्थे) अपने ऊपर ( अन्तरिक्ष
लोक में ) 'शिक्षति' (क्षारयति ) क्षारता है ॥ 'उपस्थे ऊपर
के स्थान में ॥
'प्रकलेवित्' (२५) (अनवगत ) वणिक् ( वाणिज्य करने
वाला ) होता है । क्यों ? वह कलाओं को और प्रकलाओं को
जानता है । [ 'कला' उपयोगी चतुराई के कामों को कहते हैं,
हिन्दी निरुक्त ( २५२ ) ६ अ० २ पा० २ खं०
और उन्हों के भीतरी भेदों को ‘प्रकला’ कहते हैं । ]
“दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमानाः” अर्थात्—‘दुर्मित्राः’
सुमित्र होकर भी अधिक सोच विचार रखने वाले (कंजूस)
‘प्रकलविदः’ (वणिजः) बाणिए, वे जिस प्रकार ‘मिमानाः’
माप कर देते हुए [अल्प (कम) देते हैं] यह भी निगम है ।
‘अभ्यर्द्धयज्वा’ (२६) (अनवगत) ‘अभ्यर्द्धयन्यजति’ (जो
बढाता हुआ यजन (दान) करता है) के अर्थ में है ।-
“सिषक्ति पूषा अभ्यर्द्धयज्वा” अर्थात्—‘पूषा’ सूर्य
अपनी रश्मियों (किरणों) से ‘अभ्यर्द्धयज्वा’ बड़े दान वाला
‘सिषक्ति’ सेचन करता (बरसता) है। यह भी निगम है ।
‘ईक्षे’ (२७) (अनवगत) ‘ईशिषे’ (तू प्रभु होता है) के
अर्थ में है ।-
“ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्” अर्थात् हे राजन् !
राजमान देव ! हि’ क्यों कि—(त्वम्) तू ‘उभयस्य’ द्युलोक
और पृथिवी लोक के ‘वस्वः’ (वसुनः) धन का ‘ईक्षे’ (ईशिषे)
स्वामी है। यह भी निगम है । यहां धन के सम्बन्ध से ‘ईक्षे’
‘ईशिषे’ के अर्थ में सिद्ध होता है ।
‘क्षोणस्य’ (२८) (अनवगत) ‘क्षयस्य’ (घर के) के
अर्थ में है ।-
“महः क्षोणस्याश्विना कण्व्राय” अर्थात् ‘अश्विना’
हे (अश्विनौ !) अश्विनौ ! ‘कण्वाय’ कण्व ऋषि के लिये
‘महः’ (महतः) बड़े ‘क्षोणस्य’ (क्षयस्य) घर के (दातारौ) देने
वाले हो । यह भी निगम है ॥ यहां दानके सम्बन्ध से ‘क्षोण’
नाम घरका है ॥ २ (६) ॥
हिन्दी निरुक्त (२५३) ६ अ० २ पा० ३ खं०
(खं० ३)
[निघ०-] अस्मे ॥२६॥ पाथः ॥३०॥
सवीमनि ॥३१॥ सप्रथाः ॥३२॥ विदथा-
नि ॥३३॥
(निरु-) “अस्मे ते बन्धुः” वयम्-इत्यर्थः ।
“अस्मे यातं नासत्या सजोषाः” (ऋ०सं० १,८,
१९, ६) अस्मान्-इत्यर्थः ।
“अस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः” (ऋ०सं०२,३,
२५, २,) अस्माभिः-इत्यर्थः ॥
“अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्” (ऋ०सं०३,२,
२०, ५) अस्मभ्यम्-इत्यर्थः ।
“अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु” (ऋ०सं०
४, ७, ३२, ३) अस्मत् इत्यर्थः ।
“उर्व इव पप्रथे कामो अस्मे” (ऋ०सं० ३,२,४,४)
अस्माकम्-इत्यर्थः ।
“अस्मे धत्त वसवो वसूनि” अस्मासु-इत्यर्थः ।
‘पाथः’ अन्तरिक्षम् । पथा व्याख्यातम् ।
“श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः” (ऋ० सं० ५, ५,
५, ५) इत्यपि निगमो भवति ।
हिन्दी निरुक्त ( २६४ ) ६ अ० २ पा० ३ खं०
उदकम् अपि 'पाथः' उच्यते। पानात्।
"आचष्ट आसां पाथो नदीनाम्।" (ऋ०सं०
५, ३, २५,९-१०) इत्यपि निगमो भवति॥
अन्नम्-अपि 'पाथः' उच्यते। पानादेव।
"देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान्।" (ऋ०सं०
६, २, २२, ५) इत्यपि निगमो भवति॥
'सवीमनि' प्रसवे।
"देवस्य वयं सवितुः सवीमनि।" (ऋ०सं०
५, १, १५, २) इत्यपि निगमो भवति॥
'सप्रथाः' सर्वतः पृथुः।
"त्वमग्ने सप्रथा असि।" (ऋ० सं० ४, १,
५, ४) इत्यपि निगमो भवति॥
'विदथानि' वेदनानि।
"विदथानि प्रचोदयन्।" (ऋ० सं० ३, १,
२९, २) इत्यपि निगमो भवति॥ ३ (७)॥
'अस्मे' (२६) यह पद सर्वविभक्त्यन्त है, इसीसे अनेकार्थ है। अर्थात्
एक ही 'अस्मे' यह शब्दरूप सातों विभक्तियों के अर्थ में रहता है, प्रकरण
के अनुसार उसका नियम होता है, जैसे कि-पहिले प्रथमा विभक्ति में उदा-
हरण है—
"अस्मे ते बन्धुः" 'अस्मे' (वयम्) हम 'ते' तेरे
(बन्धुः) बन्धु हैं। यह अर्थ है।
(२ या०) "अस्मे यातं नासत्या सजोषाः"
हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) ६ अ० २ पा० ३ खं०
‘नासत्या’ (नासत्यौ) हे अश्विनौ ! (युवाम् ) तुम दोनों स-
जोषाः' मेरे साथ प्रीति करते हुए या आपस में प्रीति करते
हुए ‘अस्मे’ (अस्मान् ) (प्रति) मेरे पास ‘आ-यातम्’ आओ।
यहां ‘अस्मे’ का ‘अस्मान्’ द्वितीयान्त का अर्थ है।
(३ या-) “अस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः”
‘वृषभ’ हे कामों के बरसने वाले इन्द्र देव ! ‘समानेभिः’ (स-
मानैः) समान ‘पौंस्येभिः’ बल वालों ‘अस्मे’ (अस्माभिः) हम
मरुतों के साथ ही [ तुमने बहुत कर्म किये हैं।] [ यहां
‘समानेभिः’ ‘पौंस्येभिः’ इन पदों के साथ सम्बन्ध होने के
कारण ‘अस्मे’ यह ‘अस्माभिः’ (हमसे) तृतीया के अर्थ में है।]
(४ चौं ) “अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्”
‘मघवन्’ हे इन्द्र ! ‘ऋजीषिन्’ ऋजीष (सोम के सूखस) वाले !
‘अस्मे’ (अस्मभ्यम् ) हमारे अर्थ ‘प्रयन्धि’ (देहि ) धन दे।
यहां दान के सम्बन्ध से ‘अस्मे’ यह ‘अस्मभ्यम्’ (हमारे लिये)
के अर्थ में है ॥
(५ मी-) “अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु”
(इन्द्र.) इन्द्रदेव ‘अस्मे’ (अस्मत) हम से ‘आराच्चित्’ दूर कहीं
ले जाकर ‘सनुतः’ हमसे परोक्ष ‘द्वेषः’ पाप को ‘युयोतु’ (नाश-
यतु) नाश करे। यहां ‘आरात्’ (दूर ) पद के योग से ‘अस्मे’
(अस्मत् यह पञ्चमी के अर्थ में है।
(६ ष्ठी-) “ऊर्व इव पप्रथे कामो अस्मे” हे इन्द्र!
‘अस्मे’ (अस्माकम् ) हमारा ‘कामः’ काम या मनोरथ ‘ऊर्वः-इव’
बड़वानल अग्नि के समान ‘पप्रथे’ (प्रथते) बढता है, या बढ़े।
यहां ‘कामः’ पद के साथ सम्बन्ध होने के कारण ‘अस्मे’ यह
‘अस्माकम्’ (हमारा) के अर्थ में षष्ठी का रूप है।
(७ मी) “अस्मे धत्त वसवो वसूनि” हे 'वसवः'
वसुओ ! 'अस्मे' (अस्मासु) हम में 'वसूनि' (धनानि) धनों को
'धत्त' तुम धारण करो ॥ यहां धारण क्रिया के संबन्ध से
'अस्मे' यह (अस्मासु) हममें इसके अर्थ में अधिकरण कारक में
सप्तमी है ॥
'पाथः' ( अनवगत और अनेकार्थ ) अन्तरिक्ष (आकाश)
होता है । इसकी 'पथिन्' (पन्थाः) के समान व्याख्या है ।
“श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः” अर्थात्-सूर्यदेव
'श्येनः-इव' बाज के समान 'दीयन्' ( गच्छन् ) गमन करता
हुआ 'पाथः' अन्तरिक्ष ( आकाश ) में 'अन्वेति' देवनिर्मित
मार्ग से जाता है । यह भी निगम है । यहां सूर्य के वर्णन के
सम्बन्ध से 'पाथः' अन्तरिक्ष है ।
उदक (जल) भी 'पाथस्' (पाथः) कहा जाता है । क्यों ?
पान से । अर्थात् वह पीया जाता है, इससे 'पाथस्' है ।
“आचष्ट आसां पाथो नदीनाम्” अर्थात्-(वरुणः)
वरुण देव 'आसाम्' इन 'नदीनाम्' नदियों के 'पाथः' जलको
'आचष्टे' ( कथयति-इव ) कहता जैसा है । यह भी निगम है ॥
यहां नदियों के संबन्ध से 'पाथः' जल है ।
अन्न भी 'पाथः' कहा जाता है। क्यों ? पानसे । अर्थात्
वह भी प्राणधारणा के लिये पीया जाता है ।
“देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान्” अर्थात्-हे (वन-
स्पते !) वनस्पति देव ! 'विद्वान्' अपने अधिकार को जानने
वाला (त्वम्) तू 'देवानाम्' देवताओं को 'पाथः' हविः-रूप
अन्न 'उपवक्षि' पहुंचाता है । यह भी निगम है । यहां देव-
हिन्दी निरुक्त (२५७) ६ अ० २ पा० ४ खं०
ताओं के पास पहुंचाने के संबन्ध से 'पाथः' अन्न है ॥
'सवीमनि' ( ३१ ) शब्द 'प्रसवे' ( आज्ञा में ) के अर्थ
में है ।
“देवस्य वयं सवितुः सवीमनि” अर्थात्-'वयम्' हम
'सवितुः' सूर्य 'देवस्य' देव के 'सवीमनि (प्रसवे) आज्ञा में
(रहते हैं) । यह भी निगम है। यहां सूर्य देवके सम्बन्ध से
'सवीमनि' 'प्रसवे' (आज्ञामें) के अर्थ में है ॥
'सप्रथाः' ( ३२ ) क्या ? 'सर्वतः पृथुः' सब ओर मोटा ।
“त्वमग्ने सप्रथा असि” 'अग्ने' हे अग्निदेव !
(त्वम्) तू 'सप्रथाः' सब ओर से मोटा 'असि' है ॥ यहां
शब्द की समानता और अर्थ के घटनेसे 'सप्रथाः' 'सर्वतःपृथुः'
के अर्थ में है ॥
'विदथानि' ( ३३ ) पद 'वेदनानि' (विज्ञान) के
अर्थ में है ।
“विदथानि प्रचोदयन्” विज्ञानां को अनुग्रह करता
हुआ' । यह भी निगम है। क्योंकि-अग्नि देव के प्रकाश से
ही सब विज्ञान (प्रत्यक्षज्ञान) अनुगृहीत होते हैं, इससे यहां
'विदथ' नाम विज्ञान का है ॥ ३ (७) ॥
( खं० ४ )
निघ०-श्रायन्तः ॥३४॥ आशीः ॥३५॥
निरु०-“श्रायन्त इव सूर्य्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत।
वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रतिभागं न
दीधिम ॥” (ऋ० सं० ६, ७, ३, ३]
३३
समाश्रिताः सूर्य मुपतिष्ठन्ते ।
अपिवा उपमार्थे स्यात्। सूर्यमिवइन्द्रम्-उपति-
ष्ठन्ते-इति । सर्वाणि इन्द्रस्य धनानि विभक्षमा-
णाः । सयथा धनानि विभजति, जाते च जनिष्य-
माणे च । तं वयं भागम्-अनुध्यायाम ओजसो
बलेन ।
'ओजः' ओजतेर्वा । उब्जतेर्वा ॥
'आशीः' आश्रयणाद् वा । आश्रपणाद् वा ॥
अथ-इयम्-इतरा 'आशीः' आशास्तेः ॥
“ इन्द्राय गाव आशिरम् ” (ऋ० सं० ६, ५,
६, १) इत्यपि निगमो भवति ॥
“सामे सत्याशीर्देवेषु” इति च ॥ ४ ॥
'आयन्तः' ३४) मन्त्रगत 'समाश्रिताः' (किसी में रहे हुए) के अर्थ में है ।
अर्थः-“श्रायन्तइव” इस ऋचाका बृहती छन्द है सुमेध
आङ्गिरस ऋषि है । महाव्रतमें बृहती सहस्त्रमें विनियोग है ।
प्रथम पक्षमें-'इव' (अनर्थक है ) (रश्मयः) रश्मिएं 'आ-
यन्तः' (समाश्रिताः) सब प्रकार आश्रित हुये हुये 'सूर्यम्' सूर्य
की ( उपतिष्ठन्ते ) उपस्थान करते हैं । (अपिवा) दूसरे पक्ष में
'इव' उपमा अर्थ में है । अर्थात्-'सूर्यम्-इव' सूर्य को जैसे,
( इन्द्रम् उपतिष्ठन्ते ) इन्द्र को उपस्थान करते हैं । कैसे ?
“विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत” 'इत्' (अनर्थक) सूर्य के 'विश्वा'
(विश्वानि) सब 'वसूनि' धनों को ' इन्द्रस्य' इन्द्रकी 'भक्षत'
हिन्दी निरुक्त ( २३६ ) ६ अ० २ पा० ४ खं०
(विभज्यमानाः) बांटने की इच्छा करते हुये । [ रश्मियें जिस
प्रकार प्रति दिन सूर्य को उपस्थान करते हैं, उसी प्रकार मध्यै
लोक में रहने वाले जल के स्वामी इन्द्र को भी उपस्थान करते
हैं । ] और (सः-यथा) सो आदित्य अथवा इन्द्र जिस प्रकार
'जाते' उत्पन्न हुये प्राणिमात्र में 'जनमाने' (जनिष्यमाणे) (च)
और उत्पन्न होने वाले प्राणिमात्र में 'वसूनि' (धनानि) धनों
को 'ओजसा' (बलेन) अपने ऐश्वर्य बलसे (विभजति) बांटता
है, उसी प्रकार बांटे हुये (तं) उस 'भागम्' 'प्रति' भागको हम
'न' (अनर्थक०) दीधिय' (अनुध्यायाम ) अनुचिन्तन करते
(चाहते) रहते हैं । [ अर्थात्-हम इन्द्र देव के दिये हुए धना-
दि को भोगना चाहते हैं, किन्तु अन्याय से मिले हुये को
नहीं । ] यहां पर 'आयन्त इव सूर्यम्' ( सूर्य को आश्रित होते
हुये ) इस प्रकार सूर्य के संबन्ध से पहिले रश्मियों का अध्या-
हार होता है, और फिर रश्मि के संबन्ध से 'आयन्तः' यह
पद 'समाश्रिताः' के अर्थ में प्रतीत होता है ।
'ओजः' (बल) वृद्धि अर्थ में 'उज' (चु० औ० पै०) धातु
से अथवा न्यग्भाव ( नीचा करना ) अर्थ में 'उब्ज' (तु०प० )
धातुसे है । [क्योंकि-वह बढ़ाया जाता है, या उससे शत्रु नीचा
किया जाता है । ]
'आशीः' (३५) यह अनवगत और अनेकार्थ है । 'आशिर' (दधि) यह
अर्थ की प्रतीति है ।-
'आशीः' (३५) (आशिर = दधि) क्यों ? 'आश्रयणाद्वा'
अथवा आश्रयण से । क्योंकि-वह यजमान को व्रतधुक् नाम
गोसे दोहा जाता है, और फिर सोम में आश्रित किया (रखा)
जाता है। इसीसे वह आश्रित होता हुआ 'आशीः' कहा जाता
है । 'आश्रपणाद् वा' अथवा आश्रपण ( पकाया जाने ) से ।
क्योंकि-वह दही बनाने के अर्थ कुछ पकाया जाता है।
और यह दूसरी (लौकिक) 'आशीः' (प्रार्थना = आ-
शीर्वाद) आ (ङ्) उपसर्ग 'शास्' (अदा०प०) धातु से है।
“इन्द्राय गाव आशिरं (दुदुह्रे) ” अर्थात्-‘इन्द्राय
इन्द्रके अर्थ ‘गावः' गोओने ‘आशिरम्' आशिर नामक (प्रयो-
जन वाला) दूध दुहा। यह भी निगम है। और-
“सामे सत्याशीर्देवेषु ” अर्थात्-‘'सा' वह 'मे'मेरी
'सत्या' सच्ची 'आशीः' प्रार्थना 'देवान्' (गम्यात्) देवताओं
के प्रति जावे।' यह भी है। यहां पर आशिषा (प्रार्थना)
ही 'आशीः' शब्द से कही जाती है, क्योंकि उसका देवताओं
के प्रति जाना अभीष्ट है ॥ ४ ॥
( खं० ५ )
निघ०- अजीगः ॥ ३६॥ अमूरः ॥३७॥
शशमानः ॥ ३८ देवोदेवाच्या कृपा ॥३९
निरु०- “यदा ते मर्त्तो अनुभोगमानलादिद्
ग्रसिष्ठ ओषधीरजीगः” (ऋ० सं० २,३, १२, २)
यदा ते मर्त्तो भोगमन्वापद्-अथ ग्रसितृतम
ओषधीरगारीः ।
‘जिगर्त्तिः’ गिरतिकर्मावा गृणातिकर्मा वा ।
गृह्णातिकर्मा वा ॥
“मूरा अमूर न वयश्चिकित्वो महित्वमग्ने त्वमङ्ग
हिन्दी निरुक्त ( २६१ ) ६ अ० २ पा० ५ खं०
वित्से । ” ( ऋ० सं० ७, ५,३२, ४) ।
मूढा वयं स्मः, अमूढस्त्वमसि, न वयं विद्मो
महत्त्वमग्ने त्वं तु वेत्थ ॥
‘शशमानः’ शंसमानः ।
“यो वां यज्जैः शशमानो ह दाशति” (ऋ०सं०
१, २, २१, २) । इत्यपि निगमो भवति ।
‘देवो देवान्त्या कृपा’ । देवो देवान् प्रति-अक्तया
कृपा कृप् कृपतेर्वा । कल्पते र्वा ॥ ५ (८) ॥
‘अजीगः’ (३६ ( अनवगत) ‘अगारी’ ( निगलता है) के अर्थ में है।-
“ यदाते ०-० ” अर्थात्- हे अश्व ! ‘ यदा ’ जब
‘मर्त्तः’ ( मनुष्यः ) मनुष्य ‘ते’ तेरे ‘भोगम्’ भोगको ‘अनु-
आनट् ’ ( अन्वापत् ) प्राप्त होता है (तुझे चढ़कर वाहता है)
‘आदित्’ (अथ) फिर तू थका हुआ भी ( ग्रसितृतमः ) बहु-
भोजन-शील ‘ ओषधीः ’ ‘अगारीः : ’ ओषधियों ( घास )
को ग्रहण करता अथवा खाता ही है। अर्थात्-और पशु थके
हुए चर नहीं सकते और तू बहुत अच्छे प्रकार ओषधियों को
खाता है, यह तेरा अधिक सामर्थ्य है। इस प्रकार यहां
ओषधि और अश्वके संबन्धसे ‘जिगत्ति’ धातु ‘गिरति’ धातु
के अर्थ (निगलने ) में अथवा ‘गृह्णाति’ धातुके अर्थ (ग्रहण)
में है, यह सिद्ध होता है।
‘अमूर’ ( ३७ ) शब्द ( अनवगत ) ‘अमूढ’ ( नहीं मूढ )
के अर्थ में है।-
“मूरा वयम्० ०” अर्थात्- हे भगवन् अग्निदेव !
हिन्दी निरुक्त ( २६२ ) ६ अ० २ पा० ६ खं०
'अमूर' ! अमूढ ! 'वयम्' हम 'मूराः' ( मूढाः-स्म ) मूढे हैं ।
'महित्वम्' (महत्वम्) तेरी महिमा को 'न-चिकित्वः' (न-वि-
जानीमः) नहीं जानते हैं। हे 'अग्ने !' 'त्वम्-अङ्ग' (त्वं) किन्तु
तू 'वित्से' (वेत्थ) जानता है ॥ यहां पर 'मूढाः' पदसे अपनी
निन्दा के द्वारा 'अमूढः' पद से अग्नि की स्तुति की गई है,
इससे 'अमूर' शब्दका 'अमूढ' शब्द ही बदला हो सकता है।
'शशमानः' (३८) शब्द ( अनवगत ) 'शंसमानः' ( स्तुति
करता हुआ ) के अर्थ में है।—
“यो वां य॒ज्ञैः शश॑मानो॒ हं दाशा॑ति” अर्थात्-
'यः' जो यजमाने 'वाम्' ( युवाम् ) तुम दोनों को 'यज्ञैः'
यज्ञों से 'शशमानः' (शंसमानः') स्तुति करता हुआ 'दाशति'
(ददाति) हवियों कोदेता है। यह भी निगम होता है। इस
प्रकार यहां यज्ञ के सम्बन्ध और शब्द की समानता से 'शश-
मानः' यह पद 'शंसमानः' के अर्थ में है यह सिद्ध होता है।
'देवो देवाच्या कृपा' (३६) ये दो शब्द अनवगत हैं। 'देव'
शब्द इन्हीं दोनों शब्दों के मन्त्रविशेष में पहिचान कराने के अर्थ है। देवः,
देवाच्या, कृपा, ये तीन पद है। 'देवाच्या'पद की 'देवान्प्रति-अञ्चितया' (देव-
ताओं के प्रति गई हुई से) यह अर्थ-प्रतीति है। 'कृपा' इसकी भी 'कल्पितया'
( कल्पित की हुई से ) अर्थ-प्रतीत है—
“देवो देवाच्या कृपा” अर्थात्-“ 'देवः' देव 'देवांच्या'
( देवान्प्रति-अक्तया ) देवताओं के प्रति गई हुई, 'कृपा'
कल्पित की हुई से' । 'कृप्' शब्द कृपार्थक 'कृप् ( तुं० प० )'
धातु से है। अथवा सामर्थ्य अर्थ में कृप् ( स्वा० आ० ) धातु
से है ॥ ५ ( ८ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( २६३ ) ६ अ० ३ पा ६ खं०
( खं० ६ )
[निघ०-] विजामातुः ॥४०॥ ओमासः
॥४१॥
(निरु०) अश्रवं हि भूरिदावत्तरा वां विजामातु-
रुत वा घा स्यालात् । अथा सोमस्य प्रयती युव-
भ्या मिन्द्राग्नी स्तोमं जनयामि नव्यम् ॥ (ऋ०सं०
१, ७, २८, २ )
अश्रौषं हि बहुदातृतरौ वां विजामातुः = असु-
समाप्तात्-जामातुः ॥
‘विजामाता’-इति शश्वत्-दाक्षिणाजाः क्रीताप-
तिमाचक्षते ।
असुसमाप्तइव वरोऽभिप्रेतः ।
‘जामाता’ जा अपत्यं तन्निर्माता ।
‘उत वा घा स्यालात्’ अपिच स्यालात् ।
‘स्यालः’ आसन्नः संयोगेन-इति नैदानाः। स्यात्
लाजान् आवपति-इति वा ।
‘लाजाः’ लाजन्तेः ।
‘स्यं’ शूर्पम् । स्यतेः ।
‘शूर्पम्’ अशनपवनम् । शृणोतेर्वा ।
अथ सोमस्य प्रदानेन
हिन्दी निरुक्त (२६४) ६ अ० २ पा० ६ खं०
"युवाभ्या मिन्द्राग्नी स्तोमं जनयामि नव्यम्"
नवतरम् ।
'ओमासः' इति उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः ॥
६ (९) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ६, २ ॥
'अश्रवंहि' यह ऋचा कुत्स ऋषि की है। इसका त्रिष्टुप् छन्द है।
अर्थ-'इन्द्राग्नी !' हे इन्द्र अग्नि देवो ! ( अहम् ) मैंने
'वाम्' तुम दोनों को 'विजामातुः' ( असुसमाप्ताज्जामातुः )
अधूरे जामाता या जँवाई से 'वा' अथवा 'घा' (अनर्थक) 'श्या-
लात्' साले से 'भूरिदावत्तरा' (बहुदातृतरौ) अधिक धनके देने
वाले 'अश्रौषम्' सुना है । 'अथा' इस से 'सोमस्य' सोम के
'प्रयती' ( प्रदानेन ) प्रदान (दान) से 'युवाभ्याम्' तुम दोनों
के लिये 'नव्यम्' (नवतरम्) बहुत नया 'स्तोमम्' स्तोत्र 'जन-
यामि' (उच्चारयामि) उच्चारण करता हूं। इस प्रकार यहां पर
'विजामातृ' शब्द से अधूरा जमाई कहा जाता है, क्यों कि-
वह जामाता के गुणों से हीन होने के कारण कन्या के पिता
आदि को बहुत धन देकर उन्हें अपने अनुकूल करता है, इसी
से वह बहुदाता है, और उसकी अपेक्षा इन्द्राग्नी देवता
अधिक देने वाले कहे जाने से उनकी स्तुति होती है ।
यह बात प्रसिद्ध है कि-दक्षिणी लोग क्रीतापति (खरीदी
हुई स्त्री) के पति को 'विजामाता' कहते हैं। क्यों कि-वह
विगुण होने से अपनी भार्या बनाने के अर्थ कन्या को खरीदता
है। इसीसे वह असुसमाप्त (अधूरा) जैसा वर माना गया है ।
'जामाता' क्यों ? 'जा' अपत्य या सन्तान का नाम है,
हिन्दी निरुक्त ( २६५ ) ६ अ० ३ पा० १ खं०
उसका निर्माता होता है, अर्थात् वह मैथुनधर्म के द्वारा उस
(कन्या) में स्त्रीत्व (भार्यापन) को बनाता है, इसी से दुहिता
का पति 'जामाता' कहलाता है।
'स्याल' क्यों ? संयोग से आसन्न (समीप-वर्त्ती) है। यह
शब्द के निदान के जानने वाले विद्वान् मानते हैं। अथवा
'स्य' (छाज) से लाजों (धानकी खीलों) को कन्या की अञ्जलि
में होम के अर्थ प्रावाप करता (घालता) है।
'लाज' कैसे ? 'लाज्' (भ्वा० प०) धातु से है।
'स्य' क्या? शूर्प (छाज) कैसे ? फेंकने अर्थ वाले 'स्य' (सो)
(दि० प०) धातु से है। क्योंकि-उससे तुष (अन्नके छिलके)
फेंके जाते हैं।
'शूर्प' क्यों ? वह अशन-पवन है, अर्थात्-उससे अशन
(खाने योग्य अन्न) पवन (पवित्र) किया जाता है। अथवा
हिंसाार्थक 'शृ' (क्रया० प०) धातु से है। क्यों कि-वह शरों
(सींखों) से बना हुआ होता है।
'ओमासः' (४१) शब्दकी व्याख्या बारहवें अध्याय में
"ओमासश्चर्षणी धृतः” इस मन्त्र में होगी ॥६,२॥
इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्याये द्वितीयः पादः समाप्तः ॥
तृतीयः पादः ।
(खं० १)
[निघ०-] सोमानम् ॥४२॥
(निरु०-) "सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । क-
क्षीवन्तं य औशिजः ।" [ य० सं० ३, २८ ]
हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ३ पा० १ खं०
सोमानं सोतारं प्रकाशनवन्तं कुरु ब्रह्मणस्पते
कक्षीवन्तमिव य औशिजः ।
'कक्षीवान्' कक्ष्यावान् ।
'औशिजः' उशिजः पुत्रः ।
'उशिक्' वष्टेः कान्तिकर्मणः ।
अपितु अयं मनुष्यकक्षएव अभिप्रेतः स्यात् ।
तं सोमानं सोतारं मां प्रकाशनवन्तं कुरु ब्रह्मण-
स्पते ॥ १ (१०) ॥
अर्थः-'सोमानम्' (४२) यह (अनवगत) 'सोतारम्' (उ-
त्पन्न करने वाले) के अर्थ में है—
"सोमानं ०—०" यह ऋचा काण्व मेधातिथि ऋषि की
है। अग्नि के उपस्थान में विनियुक्त है।
'सोमानम्' (सोमानाम्) अनेक सोमों के (सोतारम्) उत्पन्न
करने वाले 'स्वरणम्' (शब्दयितारम्) स्तुति करने वाले (माम्)
मुझ को 'ब्रह्मणस्पते' हे ब्रह्मणस्पति देव ! 'यः' जो 'औशिजः'
(उशिजः पुत्रः) उशिक् का पुत्र (कक्षीवान्) कक्षीवान् (कक्ष्या-
वान्) है, 'कक्षीवन्तम्' (इव) उस कक्षीवान् के समान (प्रका-
शनवन्तम्) प्रकाश वाला 'कृणुहि' (कुरु) कर। इस प्रकार
यहां शब्द की समानता से 'सोमानम्' का 'सोमानाम्' (सोमों
का) परिवर्तन हो सकता है।
'कक्षीवान्' क्या ? कक्ष्यावान् अर्थात्-कक्ष्या (बगल या
काख) वाला होता है। अथवा यह 'कक्ष' मनुष्य का कक्ष ही
माना जा सकता है। क्योंकि-वह कक्ष में उत्पन्न है, इस से