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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ७ अ० ६ पा० ३ खं० पहिले स्तुति की जाती है और पीछे मांगा जाता है, इससे यही न्याय वेद में भी लेना चाहिये, यह दिखाने के लिये पहिले पाद् की व्याख्या अन्य पादों की व्याख्या के पीछे की है। पहिले पाद् में प्रार्थना और अन्य पादों में देवता की स्तुति है ॥ २ ( २२ ) ॥ ( खं० ३ ) (निरु०) “प्रनू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूरवो वृत्रहणं सचन्ते । वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वान् अधूनोत् काष्ठा अवशम्बरं भेत् ॥” [ऋ० सं० १,४, २५,६] ॥ प्रब्रवीमि तन्महित्वं माहाभाग्यं वृषभस्य वर्षितुः अपां, यं पूरवः पूरयितव्याः मनुष्या वृत्रहणं मेघ- हनं सचन्ते सेवन्ते वर्षकामाः । ‘दस्युः’ दस्यतेः क्षयार्थात् । उपदस्यन्ति अस्मिन् रसाः। उपदासयति कर्माणि, तम्-अग्निर्वैश्वानरः घ्नन् अवाधूनोत् अपः काष्ठाः, अभिनत् शम्बरं मेघम् ।' अथासौ आदित्यः-इति पूर्वे याज्ञिकाः ॥३॥ अर्थ :-“प्रनू महित्वं वृषभस्य०” इस ऋचा का नोधास ऋषि, त्रिष्टुप् छंदः, वैश्वानर अग्नि देवता । ( अहम् ) मैं ( तस्य ) उस 'वृषभस्य' वर्षितुः ( अपाम् ) जलके बरसाने वाले मेघके ( तत् ) महित्वं ( माहाभाग्यम् )

हिन्दी निरुक्त ( ८७ ) ७ अ० ६। पा० ४ खं० ( उस ) महिमाको ‘प्रवोचम्’ ( प्रब्रवीमि ) बखानताहूं, ‘यम्’ जिस ‘वृत्रहत्याय’ ( मेघहनम् ) मेघके हनन करने वाले को ‘पूरवः’ [ पूरयितव्या मनुष्याः ) मनुष्य ‘सचन्ते’ ( सेवन्ते ) सेवन करते हैं । “वैश्वानरः अग्निः” वैश्वानर अग्नि ने ‘दस्युम्’ रसों के नष्टकरने वाले ( अनावृष्टि के द्वारा ) ‘शम्बरम्’ ( मेघम् ) मेघको ‘जघन्वान्’ ( घ्नन् ) मारते हुये ‘भेत्’ अभिन्नत् विदारण किया और ‘काष्ठाः’ ( अपः ) ‘अवअवधूनोत्’ जलोंको कंपाया या बरसाया ॥ पूरु क्या? पूरयितव्य = पूरण करने योग्य । कौन! मनु- ष्य । दस्यु क्यों? उसके न बरसने से रस ( धान ) आदि उपदस्त = क्षीण हो जाते हैं । अथवा यह कर्मों को अनावृष्टि के द्वारा क्षीण कर देता है, इस से यह दस्यु है । अब ‘वोह आदित्य है’ ऐसा पुराने याज्ञिक मानते हैं ॥३॥ ( खं०४ ) [निरु०] एषां लोकानां रोहेण सवनानां रोह आम्नातः, रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः, ताम् अनुकृतिं होता आग्निमारुते शस्त्रेवैश्वानरीयेण सूक्तेन प्रतिपद्यतेसोऽपि न स्तोत्रियम् आदियेत आग्नेयोहि भवति, तत आगच्छति मध्यस्थाना देवता रुद्रं च मरुतश्चततोऽग्निम् इहस्थानम् अत्रैव स्तोत्रियं शंसति ॥ ४ ॥ अर्थः- “एषां लोकानाम्०” इन लोकों के रोहण के क्रमसे सवनों का रोहण आम्नान (विधान) किया है-जो ही

हिन्दी निरुक्त ( ८८ ) ७ अ० ६ पा० ४ खं० लोकों के आरोहण (चढने) का क्रम है,-पृथिवी-अन्तरिक्ष- द्यौ, वही सबनों का भी क्रम है-प्रातः सवन- माध्यन्दिन सवन तृतीय सवन । (उससे क्या ?) "रोहात् प्रत्यवरोहः०" रोहणसे प्रत्यवरोहण करना ( उतरना ) इष्ट है- आरोहण के विपरीत क्रमसे उतरना भी किसी कर्म में अभीष्ट है। "ताम् अनुकृतिम्" उस अनुकृति ( नकल ) को होता (एक ऋत्विज्) आग्निनमारुत (अग्निमरुत् देवोंके ) शस्त्र में वैश्वानरीय (वैश्वानर के ) सूक्तसे आरम्भ करता है। "सोऽपि०" वह (होता) भी स्तोत्रिय ( वैश्वानरीयसूक्त) को आदर न करेगा । क्योंकि- वह ( स्तोत्रिय ) अग्निका है सिद्धान्ती के मत में वैश्वानर अग्नि ही है, और उसका सूक्त आग्नेय ही हुआ, अतः द्युलोक में पृथिवी स्थान अग्नि के सूक्त को न पढेगा । क्यों कि पढता है, इससे सिद्ध होता है कि- वैश्वानर आदित्य भी है।) आगेका क्रमभी इसी पक्ष में है- ) "तत आगच्छति०" वहांसे (द्युलोकसे ) आता है मध्यस्थान देवताओं को- रुद्र को और मरुतों को ( स्तुति करता है। "ततोऽग्निम्०" उससे (मध्य स्थानसे उतर कर) यहां के रहने वाले स्तोत्रिय = ( स्तवनीय ) अग्नि को यहीं शंसन करता है स्तुति करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या । निरुक्त शास्त्र के सिद्धान्त में "वैश्वानर" पार्थिव अग्नि ही है। उस पर "तत्को वैश्वानर." इत्यादि ग्रन्थ से विचार आरम्भ हुआ है, तहां पहिले काङ्के नैरुक्तों के मतसे

हिन्दी निरुक्त ( ८६ ) ७ अ० ६, पा० ४ खं० "प्रनू 'महित्वम्' इस निगम में वर्ष कर्म के लिङ्ग से यह आक्षेप किया गया है कि- "वैश्वानर" मध्यम ज्योति है। अब इस खण्डमें "वैश्वानर" आदित्य है यह पूर्व याज्ञिक- ओं के मत से उपपादन किया है। पूर्व याज्ञिक वे हैं, जिन्होंने विधि मन्त्र और अर्थवाद वेद के सब भागोंसे यज्ञ वस्तु को समीचीन रीति से समझा और उसका प्रयोग भी किया या अनुष्ठान भी किया था। वे ही ऐसा कहते हैं कि- "वैश्वानर" आदित्य है। सुतराम् इस प्रत्यय को गौण न समझना चा- हिये। वे लोग किस युक्ति से ऐसा कहते हैं, वही (विधि में अनुकरण की प्रसिद्धि) इस खण्ड में दिखाई गई है। अनुकरण। तृतीय पाद में नैरुक्तों के मत से तीन देवता- ओं के साथ सब संसार बांट दिया है। उस बटवारे में पृथिवी अन्तरिक्ष और द्युलोक भी बट गये हैं। वैसे ही पृथिवी के साथ प्रातःसवन (कर्म) अन्तरिक्ष के साथ माध्यन्दिन सवन और द्युलोक के साथ तृतीय सवन विभक्त किया गया है। किसी कर्म में लोकों का आरोहण या चढ़ना और प्रत्य- वरोहण या उतरना विधान किया है। किन्तु उसका साक्षात् अनुष्ठान करना असंभव है। अतः पूर्वोक्त सवनों के अनुष्ठान द्वारा आरोहण प्रत्यवरोहणों का अनुकरण किया जाता है। इस अनुकरण को होता करता है जिसका यह प्रकार है- होता पृथिवी लोक में स्थित है, अतः पहिले वह पृथिवी के भाग प्रातःसवन के शस्त्र (मन्त्र) को पढता है। उसको पढता हुआ वह पृथिवी पर आरूढ होता है। फिर वह माध्यन्दिन सवन जो अन्तरिक्ष लोक का भाग है, उसके शस्त्र को पढता है। क्योंकि उसी का क्रम है। उस शस्त्र को पढता हुआ वह

हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ७ अ० ६ पा० ५ खं अन्तरिक्ष में आरूढ होता है। फिर तीसरा सवन जो द्युलोक का भाग है, उसके शस्त्र को पढता है, और उसको पढता हुआ तीसरे लोक में आरूढ होता है। वही होता जो द्युलोक में आरूढ है, यज्ञायज्ञिय अग्निष्टोम साम में जो आग्निमारुत शस्त्र है, उसको उन सवनों के लोकों के प्रत्यवरोहण को करता हुआ वैश्वानर के सूक्त से आरम्भ करता है। अर्थात्-अब होता द्युलोक में है, वहा प्रत्यवरोहण का आरम्भ करता है, वह प्रत्यवरोहण आरोहण के उलटे क्रम से होगा, अतः उसे वह सूक्त पढना चाहिये, जो उस लोक के देवता (आदित्य) का हो। उसके अर्थ यह वैश्वानर के "वैश्वानराय पृथु पाजसे०" (ऋ० स० ३,१,३,) सूक्त को पढ़ता है। यदि "वैश्वानर" आदित्य न होता, तो उसके सूक्त को आदित्य लोक में क्यों पढ़ता, तथा ऐसा न करने से प्रत्यवरोहण का अनुकरण भी कैसे हो सकता है। अतः "वैश्वानर" आदि- त्य ही है, यह पूर्व याज्ञिकों का अभिप्राय है। उसी क्रम की पुष्टि के लिये अन्तरिक्ष और पृथिवी लोक के प्रत्यवरो- हण में उस उस के देवतोग्र्यो के शस्त्र पाठ के अनुष्ठान को दिखाता है। शेष सुगम है ॥४॥ (खं० ५) (निरु०-) अथापि वैश्वानरीयो द्वादशकपालो भवति। एतस्य हि द्वादशविधं कर्म। अथापि ब्राह्मणं भवति-“असौ वा आदित्योऽ- ग्रिर्वैश्वानरः-इति।

हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ७ अ० ६ पा० ५ ख० अथापि निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति-“आयो- द्यां भात्या पृथिवीम्”-इति। एष हि द्यावापृथिव्यौ आभासयति । अथापि छान्दोमिकं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति, “दिवि पृष्ठो अरोचत”-इति अथापि हविष्यन्तीयं सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति ॥ ५ ॥ अर्थ :- “अथापि वैश्वान०” और वैश्वानर का द्वादश कपाल ( बारह कपालों पर बनाया हुआ पुरोडाश ) होता है। क्योंकि-इस (आदित्य) का बारह ( १२ ) मासों का विभाग करना कर्म है । और भी- ब्राह्मण है-वोह आदित्य अग्नि वैश्वानर है। और भी- सूर्य वैश्वानर की निविद् [ किसी आहुति का शस्त्र के मध्य में गिरने वाला मन्त्र ] है- 'जो द्युलोक को और पृथिवी लोक को प्रकाशित करता है । क्योंकि-यही (आ- दित्य) द्युलोक और पृथिवी लोक को भासन करता है। और भी छान्दोमिक सूक्त सूर्य वैश्वानर का है।-'द्युलोक में लगा हुआ प्रकाशता है। और भी हविष्यन्तीय सूक्त सूर्य वैश्वानर का है-॥५॥ व्याख्या जिस प्रकार “वैश्वानर” के आदित्य होने में वैश्वा- नरीय सूक्त से प्रत्यवरोहण विधि का अनुकरण प्रमाण है उसी

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं० प्रकार वैश्वानर के द्वादश कपाल पुरोडाश की विधि का अनुकरण भी प्रमाण है । क्योंकि देवताओं के गुणों की समा- नता को लेकर ही यज्ञ में गुणों की विधि कल्पित होती हैं इष्ट देवता में जैसे गुण होते हैं, उसके यज्ञ में वैसे ही गुणों की विधिएं की जाती हैं । जिससे कि वैश्वानर आदित्य है और आदित्य चैत्र आदि बारह मासों का विभाग करता है अथवा चैत्र आदि बारह मासों में भिन्न २ स्वरूपों से बारह प्रकार का होता है, इसी से उसका पुरोडाश बारह कपालों पर संस्कार किया जाता है = पकाया जाता है । सुतराम् वैश्वानर के लिये द्वादशकपाल की विधि का अनुकरण उसके आदित्य होने को सिद्ध करता है । ब्राह्मण निविद् और सूक्त अपने शब्दों में ही "वैश्वानर" को आदित्य कह रहे हैं॥६॥ ( खं० ६ ) [निरु०-] अयमेव अग्निर्वैश्वानरः-इति शाक- पूणिः । विश्वानरौ एते उत्तरे ज्योतिषी, वैश्वानरो ऽयम् । यत् ताभ्यां जायते । कथं नु अयम्-एताभ्यां जायते, इति ? यत्र वैद्युतः शरणम् अभिहन्ति, यावद् अनुपात्तो भवति मध्यमधर्मैस्तावद् भवति- उदकेन्धनः शरीरोपशमनः, उपादीयमान एव अयं सम्पद्यते उदकोपशमनः शरीरदीप्तिः ॥६॥ अर्थ.- "अयमेव०" यही (पार्थिव) अग्नि वैश्वानर

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ७ अ० ६ पा० ६ खं० है,—यह शाकपूणि आचार्य मानता है । 'विश्वानर' ये दूसरे (मध्यम उत्तम) ज्योति हैं, और 'वैश्वानर' यह पार्थिव अग्नि है । क्योंकि उन (ज्योतियों) से उत्पन्न होता है ! कैसे यह (पार्थिव अग्नि) उन (विद्युत् और आदित्य) से उत्पन्न होता है ? जहां वैद्युत (बिजली की) अग्नि किसी आश्रय (काष्ठ या जल) में आती है, जब तक मनुष्यों से ग्रहण नहीं की जाती है, मध्यमधर्मा ही रहती है-उस में विद्युत् का स्वभाव ही रहता है । [स्वभाव कौनसा ?] जल से जलना और पार्थिव वस्तु तृण काष्ठ आदि से बुझना । जैसे ही मनुष्य उसे लेलेते हैं, उदक (जल) से बुझने और कठोर (काष्ठ आदि) से जलने लगती है ॥ ६ ॥ व्याख्या अब भाष्यकार कुछ नैरूक्तों और पूर्व याज्ञिकों के उन मतों को खण्डन करते हैं, जिनमें "वैश्वानर" विद्युत् अथवा आदित्य ठहरता है । इसके लिये आप अपने सहमत शाक- पूणि आचार्य के मतको उद्धृत करते हैं, जिस में कि-पहिले "वैश्वानर" के पार्थिव अग्नि होने में छः प्रमाण दिये हुये हैं और फिर उक्त दोनों विपक्षों के सब हेतुओं का खण्डन भले प्रकार से किया है । तथा और २ भी आवश्यक प्रमाण दिये हैं । भाष्यकार शाकपूणि के मत को इस विषय में बड़ा युक्तिसम्पन्न और पर्याप्त समझते हैं, इस लिये उसके मतके दिखा देने के साथ ही इस विषय और अध्याय को समाप्त कर देंगे । शाकपूणि का मत और स्वपक्ष मण्डन ।

हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं० शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि- "वैश्वानर" शब्द ही इस बात में साक्ष्य देता है कि-यह पार्थिव अग्नि ही वैश्वा- नर है । क्योंकि-'विश्वानर' नाम और 'अण्' तद्धित (प्रत्यय) के योग से 'वैश्वानर' शब्द बनता है । 'विश्वानर' नाम विद्युत् तथा आदित्य का है उनका पुत्र होने से पार्थिव अग्नि 'वैश्वानर' कहलाता है । व्याकरण की रीति से यह अर्थ युक्तिसंगत है । विद्युत् का अपत्य पार्थिव अग्नि । विद्युत् (बिजली) अन्तरिक्ष लोक का तेज है । जब वह ओषधि वनस्पतियों पर गिर जाता है, तो उसी का पार्थिव अग्नि बन जाता है। जब तक वह आकाश में रहता है, पानी से जलता है और काष्ठ आदि पार्थिव कठोर वस्तु- से बुझता है, और जब पृथिवी में आकर पार्थिव अग्नि बन जाता है, तब पानी से बुझने लगता है और काष्ठ से जलने लगता है । इससे ये दोनों आपस में भिन्न २ हैं और पिता पुत्र हैं ॥६॥ ( खं० ७ ) (निरु०-) अथ आदित्यात्। उदीचि मथसमा- वृत्ते आदित्ये कंसं वा मणिं वा परिमृज्य प्रति- स्वरे यत्र शुष्कगोमयम् असंस्पर्शयन् धारयति तत् प्रदीध्यते, सोऽयमेव सम्पद्यते । अथाऽपि आह-"वैश्वानरो यतते सूर्येण-" इति । नच पुनः आत्मना आत्मा संयतते, अन्ये- नैव अन्यः संयतते ।

हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ७ अ० ६ पा० ७ खं० इतः इमम् आदधाति । अमुतः अमुष्य रश्मयः प्रादुर्भवन्ति, इतः अस्य अर्चिषः, तयोर्भासोः संसङ्गं दृष्ट्वा एवम्-अव- क्ष्यत् ॥ ७ ॥ अर्थ :- “अथ आदित्यात्” अब आदित्य से (पार्थिव अग्नि का जन्म कहते हैं-) । उत्तर दिशा में 'पहिले पहिल आए हुये आदित्य में (आदित्य के साम्हने) कंस (कांसी) को और मणि (तैजस = आतिशी कांच आदि) को साफ करके धूप में जहां सूखा गोबर हो उससे न बुझाता हुआ (जैसे कि-उस पर उसकी छाया पड़े) आदमी धारण करता है, तो वह जलने लगता है-उस कांसी या कांच के द्वारा सूर्य से उस गोबर में तेज उतर आता है, यह यही (पार्थिव अग्नि) बन जाता है। और भी मन्त्रद्रष्टा = ऋषि कहता है- “वैश्वानरो०” वैश्वानर सूर्य के साथ मिलता है। और फिर अपने से आप (कोई) मिलता नहीं, (किन्तु) दूसरे से ही दूसरा मिलता है। “इतः इमम्०” इस सूखे गोबर से उत्पन्न अग्नि को (काष्ठ आदि से) रख लेते हैं। (यह प्रकार आदित्य से पार्थिव अग्नि की उत्पत्ति का है।) “अमुतः” उस (आदित्य मण्डल) से उस (आदित्य) की रश्मियें (किरणें) प्रकट होती हैं, इस (पार्थिव अग्नि) से इसकी अर्चिषं (ज्वालाएं) निकलती हैं; उन दोनों प्रकाशों का संयोग देख कर (ऋषि ने) ऐसा कहा होगा-

हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ६ पा० ९ खं० [ “वैश्वानरो यतते सूर्येण०” इससे “वैश्वानर” का सूर्य से पृथक् होना सिद्ध होता है। जैसी पृथक्ता दिखाई गई है, उससे वह पार्थिव अग्नि ही होता है, किन्तु मध्यम नहीं। ] ॥ ७ ॥ ( खं० ८ ) (निरु०-) अथ यानि एतानि औत्तमिकानि सूक्तानि भागानि वा, सावित्राणि वा सौर्याणि वा, पौष्णानि वा, वैष्णवानि वा, वैश्वदेवानि वा, तेषु वैश्वानरीयाः प्रवादा अभविष्यन्, आदित्य- कर्मणा च एनम्- अस्तोष्यन्- इति-“उदेषि” इति, “अस्तमेषि” इति, विपर्य्येपि” इति । आग्नेयेष्वेव हि सूक्तेषु वैश्वानरीयाः प्रवादा भवन्ति, अग्निकर्मणा स्तौति-इति,-“दहसि”- इति, “वहसि” इति, “पचासि” इति । यथो एतद्-वर्षकर्मणा हि एनं स्तौति-इति, अस्मिन्नपि एतदुपपद्यते ॥८॥ अर्थः- “अथ०” दूसरी बात- [यदि सूर्य्य वैश्वानर होता, तो जो ये उत्तम लोक के देवता विशेषों की स्तुति के अर्थ सूक्त हैं, जैसे अथवा भग के, अथवा सविता के, अथवा सूर्य के, अथवा पूषा के, अथवा विष्णु के, अथवा विश्व देवों के, उन में वैश्वानर के प्रवाद

हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ७ अ० ६पा० ८खं होते- भग आदिकों का विशेषण “वैश्वानर” शब्द होता- हे भग!, वैश्वानर ! हे सवितः ! वैश्वानर ! इत्यादि, और आ- दित्य कर्म से इस ( वैश्वानर ) की स्तुति करते- “उदेषि” तू उदय होता है, “अस्तमेषि” तू अस्त होता है, “विपर्य्येषि” तू उलटा फिरता है इत्यादि । [किन्तु ये दोनो बातें नहीं हैं, क्या कि न उत्तम लोक के देवताओं के सूक्तों में वैश्वानर के प्रवाद हैं, और न आदित्य कर्म से वैश्वानर की स्तुति ही है। इससे सूर्य वैश्वानर नहीं है । ] [ और पार्थिव अग्नि ही वैश्वानर शब्द का वाच्य है, इस में यह विशेष हेतु भी है कि-] अग्नि के सूक्तों में ही वैश्वानर के प्रवाद आते हैं- अग्नि का विशेषण 'वैश्वानर'- शब्द आता है- [ “वैश्वानर मृत आजातमग्निम्” [ ऋ० सं० ४, ५, ६, १] इत्यादि ] । और अग्नि के कर्म से (ऋषि, ) ( वैश्वानर को ) स्तुति करता है- “वहसि”- हे वैश्वानर! तू हविओं को पहुंचाता है, “पचसि”-पकाने योग्य द्रव्यों को तू पकाता है, “दहसि”- जलाने योग्य तृण काष्ठ आदि को तू जलाता है ॥ इससे अग्नि ही वैश्वा- नर है, यह स्थिर हो गया ॥ [केचित्मतका खण्डन] “यथो एतद्०” जो कि यह (आक्षेप किया-) क्यों कि वर्ष कर्म से इसकी स्तुति करता है, (इससे मध्यम है) । इस ( पार्थिव अग्नि ) में भी यह उपपन्न होता है- घंटता है- ॥ ८ ॥

हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ७ अ० ६ पा० ६ सं० ( खं० ६ ) ( निरु० ) “समानमेतदुदकमुञ्चैत्यवञ्चाहभिः । भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ॥” [ ऋ० सं० २, ३, २३, ५ ] इति सा निगद- व्याख्याता ॥९ ( २३ ) इति सप्तमाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ७,६ ॥ अर्थ:- “समानमेतत्०” । ‘समानम्’ (एकमेव) एक ही ‘एतत्’ यह ‘उदकम्’ जल ‘अहभिः’ (अहोभिः निमित्त- भूतैः) विशेष दिनों से “उद्- एति च” ऊपर को जाता है अव एति च” और फिर विशेष दिनों से ही नीचे को आता है - दक्षिणायन और उत्तरायण के भेद से यहां दिन समझे गये हैं, सो ही यहां एक ही जल क्रम से उत्तरायण और दक्षिणायन में जगत् के निर्वाह के अर्थ वृष्टि के रूप से ऊपर को जाता है और नीचे को आता है, नीचे को किस प्रकार आता है, यह पहिले कहते हैं- “भूमिं पर्जन्याः” पर्जन्याः, (प्रार्जयितारो रसानाम् ) रसों के बढाने वाले मध्यम लोक के देवगण ( उस लोक से वर्षा को छोड़ते हुए ) ‘भूमिम्’ पृथिवी को ‘जिन्वन्ति’ तृप्त करते हैं (ओषधियों की उत्पत्तिके लिये)। अब ऊपर को कैसे जाता है, यह कहते हैं- “दिवं जिन्व- न्त्यग्नयः” [जिस प्रकार उस लोक से वर्षा के द्वारा पर्जन्य इस पृथिवी की तृप्ति करते हैं, वैसे ही- ] ‘अग्नयः’ अग्निाएं (आहुतियों से उत्पन्न हुई वृष्टि के द्वारा ‘दिवम्’ द्युलोक को

हिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ७ अ० ६ पा० ६ सं० 'पिन्वन्ति' तृप्त करती हैं- अग्नि में आहुतियां छोड़ी जाती हैं, वे अग्नि से दग्ध होकर अग्नि की ज्वालाओं से जल के स्वरूप को प्राप्त करके बहुत सूक्ष्म देवत्आों के उपभोग के योग्य बनाकर द्युलोक में पहुंचाई जाती हैं- वहां के निवासि- यों की तृप्ति के अर्थ वृष्टिके रूप में पहुंचाई जाती हैं, फिर वे द्युलोकनिवासी यहां के अर्थ वृष्टि करते हैं। सो कहा भी है कि- “अमुष्य लोकस्य का गतिः इति, अयं लोक इति होवाच” इति। अर्थात्-‘उस (द्यु) लोक की क्या गति है उसका निर्वाह कहां से होता है, (उत्तर-) यह लोक-इस लोक की आहुतियों से, यह कहा’। इस प्रकार सर्वथा यह पार्थिव अग्नि भी वर्ष कर्म वाला है। क्यों कि सब वृष्टि का मूल आहुतियां हैं। जैसे कि स्मृति है- “अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्या ज्जायते वृष्टि र्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥” (मनुः अ० ३ श्लो० ७६) अर्थात्-‘अग्नि में विधि से छोड़ी हुई आहुति आदित्य को प्राप्त होती है, और आदित्य से वृष्टि वृष्टि से अन्न और अन्न से प्रजा होती हैं।' इस लिये जो कि, यह कहा है कि- वृष्टि कर्म के योग से “वैश्वानर” मध्यम ज्योति है, यह लक्षण अग्नि और आदित्य में भी साधारण है, अतः वर्ष कर्म के लिङ्ग से यह मध्यम नहीं हो सकता।] ‘इति सा०’ यह (समानमेतत्०) ऋचा अपने पाठ से ही व्याख्या की हुई है ॥ ९ (२३) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते सप्तमाध्यायस्य षष्ठः पादः ॥ ७,६ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १०० ) ७ अ० ६ पा० १ खंड सप्तमः पादः ( खं० १ ) (निरु०-) कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपोव- साना दिवमुत्पतन्ति । त आववृत्रन् सदनाहत- स्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते ॥” ( ऋ० सं० १, ३, २३, १ ) कृष्णं निरयणं रात्रिः आदित्यस्य हरयः सुपर्णा हर- णा आदित्यस्य रश्मयः ते यदा अमुतः अर्वाञ्चः पर्य्या- वर्त्तन्ते महस्थानाद् उदकस्य आदित्याद् अथ घृतेन उदकेन पृथिवी व्युद्यते । 'घृतम्' इति उ- दकनाम । जिघर्त्तेः सिञ्चतिकर्मणः । अथापि ब्राह्मणं भवति- “अग्निर्वा इतो वृष्टिं समीरयति धामच्छद् दिवि भूत्वा वर्षति मरुतः सृष्टां वृष्टिं नयन्ति” “यदा सावादित्योऽग्नि रश्मिभिः पर्य्यावर्त्तते अथ वर्षति” इति । यथो एतद् “रोहात् प्रत्यवरोहश्चिकीर्षितः” इति, आम्नायवचनाद् एतद् भवति । यथो एतद्—॥ १ ॥ अर्थः- “कृष्णं नियानम् ” इस ऋचा का दीर्घतमा

हिन्दी निरुक्त ( १०१ ) ७ अ० ६ पा० १ सं० ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, वृष्टिकाम की कारीरी ( इष्टि ) में अग्नि धामच्छद् के लिये अष्टाकपाल (पुरोडाश) होता है, उसकी पुरोनुवाक्या है, तहां मैत्रायणीयक में यह (पार्थिव) अग्नि आदित्य करके स्तुति किया जाता है । ‘कृष्णम्’ काले ‘नियानं’ (निरयणम्) मार्ग से ‘सुपर्णाः’ सुन्दर दौड़ने वाले ‘हरयः’ (हरणाः आदित्यस्य = आदित्य- रश्मयः) हरणशील आदित्य के हरि (रश्मिएं) “अपो- वसानाः” जलको धारण करते हुए ‘दिवम्’ द्युलोक को ‘उत्पतन्ति’ उड़ जाते हैं = चले जाते हैं– सूर्य भगवान् जब जगत् के अनुग्रह के लिये जल का गर्भ अपने में धारण करने की इच्छा से उत्तरायण में आते हैं, तब ये रश्मि इस सब लोक से जलको अपने में धारण करते हुए आदित्य मण्डल के प्रति उड़ते हैं, और उस जलको आदित्य मण्डल में धर देते हैं, फिर सूर्यदेव उत्तरायण के छः मास तक जलके गर्भ को धारण किये हुये रहते हैं, और दक्षिणायन में आकर आषाढ मास से प्रसव करते हैं–जलको बरसते हैं,–सो यह कहा जाता है–“ते आ ववृत्रन्॰” ‘ते’ (रश्मयः) वे रश्मिएं (यदा) जब (अमुतः) उस ‘ऋतस्यसदनात्’ (उदकस्य सहस्थानाद् आदित्यात्) जल के स्थान आदित्य मण्डल से ‘आववृत्रन्’ (अर्वाञ्चः पर्यावर्त्तन्ते) नीचे की ओर लौटते हैं, ‘ओत्’ (अथ) उस समय ‘घृतेन’ (उदकेन) जलसे ‘पृथिवी’ पृथिवी ‘व्युद्यते’ भीग जाती है ॥ ‘घृत’ यह जलका नाम है । ‘सिच’ (तु० प०) धातु के सेचन अर्थ में ‘घृ’ (जु० प०) धातु से है ।

हिन्दी निरुक्त ( १०२ ) ७ अ० ६ पा० १ ख० [ इस प्रकार इस मन्त्र में वर्षकर्म का करने वाला मन्त्र के अक्षरार्थ से आदित्य और प्रकरण से अग्नि है, दोनों ही प्रकार से वृष्टि का करने वाला मध्यम से अन्य है, अतः वर्ष- कर्म के योग से "वैश्वानर" मध्यम है, यह कहना अयुक्त है।] "अथापि ब्राह्मणम्०" और भी ( इस मन्त्र के अर्थ को पुष्ट करने वाला ) ब्राह्मण है-"अग्निर्वा०" 'अग्नि इस लोक से वृष्टि को प्रेरणा करता है- अग्नि की ऊष्मा के साथ ओषधि वनस्पतियों से धूम के रूप में जल आकाश की ओर उड़ते हैं फिर द्युलोक में मेघरूप होकर ( आदित्य ) बरसता है- (आकाश में) उसी आदित्य की रची हुई वृष्टि को मरुत् ( मध्यम लोक के देवगण ) यहां पहुंचाते हैं'। [ और भी ब्राह्मण- ] "यदासौ" जब वह आदित्य रश्मियों से अग्नि के प्रति लौटता है, तब बरसता है। [ इस प्रकार वृष्टिकर्म सब देवताओं का समान है, अतः यह "वैश्वानर" के मध्यम होने में हेतु नहीं होसकता ] । ( पूर्व याज्ञिक मत का खण्डन ) "यथो एतत्०" और जोकि-यह कहा "रोहात् प्रत्यवरोहः" 'रोहण के अनुसार प्रत्यवरोहण करना इष्ट है,- इत्यादि। यह आम्नाय (वेद) के वचन के प्रामाण्य से होता है। अर्थात्-तृतीय सवन में जो 'वैश्वानर के सूक्त' से शस्त्र का आरम्भ होता है, वह विधिवाक्य के अधीन किया जाता है। लोकों को आरोहण तथा प्रत्यवरोहण अर्थवाद मात्र = फलस्तुति मात्र है, उसका कोई विरोध नहीं है।

हिन्दी निरुक्त ( १०३ ) ७ अ० ६ पा० २ खंड अतः "वैश्वानर" उतने से आदित्य नहीं हो सकता। "यथो एतत्०" और भी जो कहा है- ॥१॥ ( खंड २ ) (निरु०-) "वैश्वानरीयो द्वादशकपालोभवति" इति । अनिर्वचनं कपालानि भवन्ति । अस्ति हि सौर्य एककपालः पञ्चकपालश्च । यथो एतद् "ब्राह्मणं भवति०" इति । बहुभक्ति- वादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति- पृथिवी वैश्वानरः, संवत्सरो वैश्वानरः, ब्राह्मणो वैश्वानरः इति । यथो एतद् "निवित् सौर्यवैश्वानरी भवति-" इतिअस्यैव सा भवति 'यो विड्भ्यो मानुषीभ्यो दीदेद्-" इति, एष हि विड्भ्यो मानुषीभ्यो दीप्यते । यथो एतत् "छान्दोमिकं सूक्त सौर्यवैश्वानरं भवति" इति, अस्यैव तद् भवति- जमदग्निभिरा- हुतः" इति । जमदग्नयः प्रजमिताग्नयो वा प्रज्व- लिताग्नयो वा । तैः अभिहुतो भवति । यथो एतद् "हविष्पान्तीर्य सूक्तं सौर्यवैश्वानरं भवति "इति, अस्यैव तद् भवति ॥ २ ( २४ )॥ अर्थः- "वैश्वानरीयो०" 'वैश्वानर का बारह कपालों का (पुरोडाश) होता है, यह भी सूर्य के वैश्वानर होने में

हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ७ अ० ६पा० २खं कारण नही )। क्यों कि- कपाल निर्वचन के साधक नही होते, व्यभिचारी है- यदि इनकी संख्या बारह ( १२ ) ही नियत होती, तो ऐसी कल्पना होती किन्तु स्वयम् सूर्य के एककपाल और पञ्चकपाल भी पुरोडाश होते है, "यथो एतद्०", और यह कहा कि- ब्राह्मण (आदित्य को वैश्वानर कहने वाला) है, (वह भी ठीक नहीं )। क्यों कि- ब्राह्मण बहुभक्ति के कहने वाले हैं- और भी बहुत अर्थों को वैश्वानर कहते है । (जैसे-) 'पृथिवी वैश्वानर है' सवत्सर वैश्वानर है, ब्राह्मण वैश्वानर है, । "यथा एतत्०" और जोयह कहा कि-सूर्य वैश्वानर की निविद् है (यह भी ठीक नहीं। क्यों कि-) इसी (पार्थिव अग्नि) की वह (निविद्) है [ऐसा उसके आद्यन्त पर्यालोचन से प्रतीत होता है] । [जैसे-] “यो विड्भ्यो मानुषीभ्यो दीदेत” जो मनुष्यों की जातियों के अर्थ प्रकाशित होता है । यही पार्थिव अग्नि मानुषी विटों (जातियों) के अर्थ जलता है । "यथो एतत्०" और यह कहा कि- सूर्यवैश्वानर का छन्दोमिक (छन्दोम यज्ञ = दाशरात्रिकों में) सूक्त है । वह इसी पार्थिव अग्नि) का है । [ जैसे- ) “जमदग्निभिरा- हुतः' अर्थात् - बहुत अग्नि वालों से या प्रज्वलित अग्नि वालों से होम किया गया है ([क्यों कि जमदग्नि इसी अग्नि में आहुतियों को देते हैं, किन्तु आदित्य में नही। यह विधि से और संभवसे सिद्ध है । अतः यह सूक्त भी इसी अग्नि का है । ]

हिन्दी निरुक्त ( १०५ ) ७ अ० ६ पा० ३ खं 'जमदग्नि' क्या ? प्रज्वलिताग्नि ( बहुत अग्नि वाले ) अथवा प्रज्वलिताग्नि ( जिनका अग्नि प्रज्वलित रहता है) ॥ “यथो एतद् हविष्पान्तीयम्” और जैसा कि यह कहा- सूर्य वैश्वानर का हविष्पान्तीय सूक्त है, वह भी इसी ( पार्थिव अग्नि ) का है । [ जैसा कि- ] ॥२(२४)॥ ( खं० ३ ) (निरु०-) “हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृ- श्याहुतं जुष्टमग्नौ । तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधयापप्रथन्त ॥” (ऋ०सं० ८,४,१०,१- १०,७,४,१) हविः यत् पानीयम् अजरम् सूर्यविदि दिविस्पृ- शि अभिहुतं जुष्टम् अग्नौ, तस्य भरणाय च भावनाय च धारणाय च एतेभ्यः सर्वेभ्यः कर्मभ्यः इमम् अग्निम् अन्नेन अपप्रथन्त- इति । अथापि आह ॥३(२५)॥ अर्थ :- “हविष्पान्तम्” इस सूक्त का मूर्द्धन्वान् आ- ङ्गिरस ( अङ्गिरा का पुत्र ) अथवा वामदेव ऋषि व्यूढ दश- रात्र के पञ्चम अहन् में आग्निमारुत ( शस्त्र ) की प्रतिपद् ( पहिली ऋचा ) है । ( यत् ) जो 'हविः' हवि 'पान्तम्' (पानीयम्) देवताओं के पान योग्य है, 'अजरम्' जिस से अधिक जरा या पाक न हो, अर्थात्-पूर्णरूप से पका हुआ है, 'स्वर्विदि' (सूर्यविदि)