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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( ३५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वातविध्वंसन रस । सूतमभ्रकसत्त्वं च कांस्यं शुद्धञ्च माक्षिकम् । गन्धकं तालकं सर्वं भागोत्तरविवर्द्धितम् ॥ ६० ॥ कज्जलीकृत्य तत्सर्वं वातारिस्नेहसंयुक्तम् । सप्ताहं मर्दयित्वा तु गोलकीकृत्य यत्नतः ॥ ६१ ॥ निम्बुद्रवेण संपीड्य तिलकल्केन लेपयेत् । अर्द्धांगुलदलेनैव परिशोष्य प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥ प्रपचेद्वालुकायन्त्रे द्वादशप्रहरं ततः । जठरस्य रुजः सर्वास्तथा च मलनिग्रहम् ॥ ६३ ॥ आध्मानक तथानाहं विषूचीं वह्निमान्द्यकम् । आमदोषमशेषञ्च गुल्मं छर्दिञ्च दुर्जराम् ॥ ६४ ॥ ग्रहणीं श्वासकासौ च क्रिमिरोगं विशेषतः । हन्यात्सर्वाङ्गशूलञ्च मन्यास्तम्भं तथैव च ॥ ६५ ॥ ज्वरे चैवातिसारे च शूलरोगे त्रिदोषजे । पथ्यं रोगानुसारेण देयमस्मिन् भिषग्वरैः ॥ श्रीमता नन्दिनाथेन वातविध्वंसनो रसः ॥ ६६ ॥ पारा १ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग,कांसाभस्म ३ भाग, सोनामाखी भस्म ४ भाग, गंधक ५ भाग और हरिताल ६ भाग लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर एरण्डीके तेलमें सात दिनतक खरल करके पिंडाकार बना लेवे; पश्चात् तिलोंको नींबूके रसमें पीसकर कल्क बनाकर उस गोलेके ऊपर आधा आधा अंगुल ऊंचा लेप कर देवे । फिर इसको सुखाकर वालुकायंत्रमें द्वादश प्रहर तक पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे उदरस्थित सर्वप्रकारकी पीड़ा, मलरोध, आध्मान, आनाह,

भाषाटीकासहित । ( ३५७ ) विषूचिका, मंदाग्नि, सर्व प्रकारके आमदोष, गुल्म, वमन, संग्रहणी, श्वास, खाँसी, क्रिमि, सर्वांगशूल और मन्यास्तम्भ रोग नष्ट होते हैं । इसको ज्वर, अतिसार, शूल और त्रिदोषज रोगमें यथोचित अनु- पानके साथ सेवन करे । यह वातविध्वंसन रस श्रीमान् महादेवने कहा है ॥ ६०–६६ ॥ पलाशादि वटी । पलाशबीजोत्थरसेन सूतं गन्धेन युक्तं त्रिदिनं विमर्द्य। श्लक्ष्णीकृतं तद्विषतिन्दुबीजं संयोजयेदस्य कलाप्रमाणम् ॥ मासद्वयं निष्कमितं प्रयत्ना- दर्शांसि हन्त्याशु नियोजनीयम् ॥ ६७ ॥ वातरक्तं तथा शोथमस्पर्शाख्यानिलामयम् । वातवत्पित्तरोगेऽपि तत्र पित्तेन भावयेत् ॥ पलाशादिवटी ख्याता वातरोगकुलान्तिका ॥६८॥ पारा और गंधक दोनोंको समान भाग लेकर ढाकके बीजोंके रसमें तीन दिनतक अच्छे प्रकारसे खरल करके फिर उसमें पारे और गंध- कसे सोलहवां भाग कुचिलेका चूर्ण मिला लेवे । इसमेंसे प्रतिदिन चार मासे परिमाण औषधि लेकर प्रातःकाल भक्षण करे । इस प्रकार दो मास पर्यत औषधि सेवन करनेसे बवासीर, वातरक्त, शोथ और स्पर्शज्ञानकी हीनता रोग दूर होते हैं । इस औषधिको पित्तके रोगोंमें प्रयुक्त करे तो पांच पित्तोंके द्वारा भावना देवे । इसको वातनाशक- पलाशादि वटी कहते हैं ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ दशसार वटी । यष्टी धात्री बला द्राक्षा एला चन्दनवालुकम् । मधूकपुष्पं खर्जूरं दाडिमं पेषयेत्समम् ॥ ६९ ॥ सर्वतुल्या सिता योज्या पलार्द्धं भक्षयेत्सदा ।

( ३५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दशसारवटी ख्याता सर्ववातविकारनुत् ॥ अथ दाडिममित्यत्र गणमिच्छन्ति चापरे॥७०॥ मुलैठी, आमले, खिरैंटी, दाख, इलायची, लालचंदन, सुगंधवाला, महुवेके फूल, खजूर और अनार यह सब औषधि समान भाग लेवे और सबकी बराबर मिश्री लेवे । सबको एकत्र मिलाकर प्रतिदिन इसमेंसे दो तोले परिमाण औषधि सेवन करे । और कितनेक वैद्य इसमें दाडिमके स्थानमें दाडिमाद्यगण व्यवहार करते हैं । इसको दशसारवटी कहते हैं ॥ ६९ ॥ ७० ॥ गगनादिवटी । मृतगगनरसार्कं मुण्डतीक्ष्णं सताप्यं सवलि सम- मिदं स्याद्यष्टितोयप्रविष्टम् । तदनु सलिलजातै- र्वासकैर्गोस्तनीभिर्मृदितमनुविदारीवारिणा घस्र- मेकम् ॥ ७१ ॥ घृतमधुसहितेयं वल्लमात्रा वटीति क्षपयति गुरुवातं पित्तरोगं क्षयञ्च । भ्रममदकफ- शोषान् दाहतृष्णासमुत्थान् मलयजमिह पेयं चानुपेयं सचन्द्रम् ॥ ७२ ॥ अभ्रकभस्म, शुद्ध पारा, तांबाभस्म, मुण्डलोहभस्म, तीक्ष्णलोह- भस्म, शुद्ध सोनामाखीभस्म और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर मुलैठीके क्वाथमें मर्दन करके फिर अडूसे और दाखके क्वाथमें घोटे । पश्चात् विदारीकंदके रसमें एक दिन तक खरल करके २-२ रत्तीकी गोली बना लेवे । घी और सहतके साथ इस औषधिके भक्षण करनेसे अत्यंत दुस्तर वातरोग, पित्तरोग, क्षय, भ्रम, मत्तता, कफज शोथ, दाह और तृषारोग नष्ट होते हैं । इसका सेवन करके ऊपरसे सफेद चंदन और कपूरको भक्षण करे । इसको गगनादिवटी कहते हैं ॥ ७१ ॥ ७२ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३५९ ) सर्वाङ्गसुन्दर रस । शुद्धसूताभ्रताम्रायोहिङ्गुलं कार्षिकं समम् । गन्धकश्चैकभागः स्यात्सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ७३ ॥ सप्तपर्णार्कस्नुक्क्षीरवासावातारिवारिणा । विषमुष्टिसमं सर्वं पेष्यं तद्गोलकीकृतम् ॥ ७४ ॥ विपचेद्वालुकायन्त्रे द्वियामान्ते समुद्धरेत् । पिप्पलीविषसंयुक्तो रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥ सर्ववातविकारघ्नः सर्वशूलनिषूदनः ॥ ७५ ॥ पारा, अभ्रकभस्म, तांबाभस्म, लोहभस्म, सिंग्रफ और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर सतोनेके दूध, आकके दूध, थूहरके दूध, अडूसेके रस और एरंडकी जड़के रसके द्वारा खरल करके उसमें समभाग कुचला मिलावे । फिर खरल करते करते जब खूब गाढ़ा होजाय तब गोलासा बना लेवे । फिर इसको दो प्रहरतक बालुकायंत्रमें पकावे । शीतल होनेपर फिर उसमें पीपलका चूर्ण १ कर्ष और विष १ कर्ष मिलावे । इस औषधिको यथोचित मात्रानुसार यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके वातरोग और सर्व प्रकारके शूल नष्ट होते हैं । इसको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं ॥ ७३-७५ ॥ तालकेश्वर रस । एकभागो रसस्य स्याच्छुद्धस्तालैकभागिकः । अष्टौ स्युर्विजयायाश्च गुटिकां गुडतश्चरेत् ॥ ७६ ॥ ऐकैकां भक्षयेत्प्रातश्छायायामुपवेशयेत् । तालकेश्वरनामायं रोगश्चास्पर्शनाशनः ॥ ७७ ॥ रससिन्दूर १ भाग, हरिताल १ भाग, भांगका चूर्ण ८ भाग लेवे और सब औषधियोंसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । इसकी गोली बना-

( ३६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कर प्रातःकाल भक्षण करे और छायामें विश्राम करे । इसके सेवन करनेसे स्पर्शज्ञानकी हीनता दूर होती है । इसको तालकेश्वर रस कहते हैं ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ महाराजेश्वर रस । रसभस्म लौहमभ्रं सिंदूरं स्वर्णभस्मकम् । प्रवालं रजतं कांस्यं तालकं च समं समम् ॥ ७८॥ आर्द्रकस्वरसेनैव त्रिदिनं मर्दयेद्भिषक् । ततश्चतुष्टयं यामं पुटं दद्याद्गजाव्हये ॥ ७९ ॥ ततः समुद्धतं चैतद् वाटचालकरसेन च । मर्दयित्वा वटी कार्या त्रिगुञ्जाफलसन्निभा ॥ ८० ॥ बहुदोषान्वितं वातं रक्तेन सह मूर्च्छितम् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु वातपित्तकफोत्थितान् ॥८१॥ रससिन्दूर, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, स्वर्णसिन्दूर, सोनेकी भस्म, मूंगाभस्म, रूपाभस्म, कांसाभस्म और हरिताल यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें तीन दिन तक खरल करके चार प्रहरतक गजपुटमें पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब निकाल कर खिरेंटीके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दोषयुक्त वातरोग, रक्तवात, वातपित्त और कफज रोग नष्ट होते हैं ॥ ७८-८१ ॥ वातकेशरी रस । शिलायां निगुंडं नागं ताप्यं भस्मार्द्धभागिकम् । पादं पादं क्षिपेद्भस्म शुद्धस्य विमलस्य च ॥८२॥ कान्ताभ्रसत्त्वयोश्चापि स्फटिकस्य पृथक् पृथक् । सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पुटेत्त्रिफलवारिणा ॥ ८३ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३६१ ) त्रिंशद्वनोपलेनैव त्रिंशद्वारं विचूर्णयेत् । व्योषवल्कलचूर्णैश्च समांशैः सह लेहयेत् ॥ ८४ ॥ मध्वाज्यसहितं हन्ति प्रलीढं वल्लमात्रया । अशीतिवातजान्रोगान्धनुर्वातं विशेषतः ॥ ८५ ॥ कफरोगानशेषांश्च मूत्ररोगांश्च सर्वशः । कासं श्वासं पाण्डुरोगं श्वयथुं सूतिकामयम् ॥ ८६ ॥ ग्रहणीमामदोषं च वह्निमान्द्यं मृदुज्वरम् । सर्वान् रोगांश्च दोषांश्च नाशयेदनुपानतः ॥ ८७ ॥ सीसेकी भस्म १ भाग, सोनामाखी आधा भाग, शुद्ध रूपामाखी, कांतलोह, अभ्रक और स्फटिककी भस्म यह प्रत्येक औषधि सीसेसे चौथाई भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र त्रिफलेके रसमें खरल करके पुटमें पकावे । इसप्रकार तीस बार त्रिफलेके रसमें खरल करके तीस बार पुटके द्वारा पकावे । पश्चात् चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर दो रत्ती परिणाम त्रिकुटे और दालचीनीके चूर्णके साथ सेवन करे । सहत और घृतमें मिलाकर चाटनेसे अस्सी प्रकारके वातरोग, धनुर्वात, बहुत प्रकारके कफज रोग, सर्व प्रकारके मूत्ररोग, खाँसी, श्वास, क्षय, पांडु, शोथ, सूतिका, संग्रहणी, आमदोष, मंदाग्नि और मन्दज्वर नष्ट होते हैं । इसको भिन्न भिन्न अनुपानोंके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग और सर्व प्रकारके दोष दूर होते हैं । इसको वातकेशरी रस कहते हैं ॥ ८२-८७ ॥ त्रैलोक्यचिन्तामणि रस । हीरं सुवर्णं सुमृतञ्च तारमेषां समं तीक्ष्णरजश्चतु- र्णम् । समं मृताभ्रं रससिन्दुरञ्च निष्पिष्टतीक्ष्णस्य तथाश्मनो वा ॥ ८८ ॥ खल्ले द्रवेणैव कुमारिकाया गुञ्जाप्रमाणां वटिकां प्रकुर्यात् । त्रैलोक्यचिन्ता-

( ३६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मणिरेष नाम्ना संपूज्य सम्यग्गिरिजां दिनेशम् ॥ ॥ ८९ ॥ हन्त्यामयान्योगशतैर्विवर्ज्यामयप्रणाशाय मुनिप्रणीतः । अस्य प्रसादेन गदानशेषाञ्जरां विनिर्जित्य सुखं विभाति ॥ ९० ॥ हीराभस्म, सोनाभस्म और चाँदीभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, तीक्ष्ण लोहभस्म ३ भाग, अभ्रकभस्म ६ भाग, और रस- सिन्दूर ६ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके लोह अथवा पत्थरके खरलमें घीक्वारके रसके द्वारा खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । पार्वती और सूर्यदेवकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करना आरम्भ करे । जो रोग सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे भी शांत नहीं होते उन समस्त रोगोंको शमन करनेके लिये यह औषधि मुनिजनोंने कही है । इस औषधिके प्रभावसे मनुष्योंके समस्त रोग और वृद्धता नष्ट होकर सुखकी वृद्धि होती है ॥ ८८–९० ॥ स्निग्धे श्लेष्मण्यार्द्रकस्य रसेन पाययेत्सुधीः । शुष्के च माक्षिकेणैव पित्ते घृतसितायुतम् ॥९१॥ श्लेष्मणि मारुते सम्यग्दुष्टे च समतां गते । कणाचूर्णं क्षौद्रयुतं प्रमेहे दुग्धसंयुतम् ॥ ९२ ॥ बलवर्णाग्निजननः कासघ्नः कफवातजित् । आयुःपुष्टिकरो वृष्यः सर्वरोगनिषूदनः ॥ ९३ ॥ इति वातव्याध्यधिकारः । जो कफकी स्निग्धता हो तो अदरखके रसके साथ, कफ शुष्क ( खुश्क ) होय तो सहतके साथ, पित्तयुक्त वातरोगमें घृत और मिश्रीके साथ, कफाश्रित वायुमें और जो वायु अच्छे प्रकारसे दूषित होकर चिकित्सासे शमन नहीं होती ऐसी वायुमें पीपलके चूर्ण और

भाषाटीकासहित । ( ३६३ ) सहतके साथ और प्रमेह रोगमें दूधके साथ इस औषधिको भक्षण करे । इस औषधिके सेवन करनेसे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है। कासरोग, कफरोग और सब प्रकारके वायुरोग नष्ट होते हैं। आयु, पुष्टि और शुक्रकी वृद्धि होती है तथा सब प्रकारके रोग नष्ट होते हैं। इसको त्रैलोक्याचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ९१-९३ ॥ इति वातव्याधिचिकित्सा । अथ कफरोगाधिकार । श्लेष्मकालानल रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं गन्धकाद्विगुणं विषम् । विषात्तु द्विगुणं देयं चूर्णं त्रिकटुसम्भवम् ॥ १ ॥ रसतुल्या प्रदातव्या चाभया सविभीतकी । धात्रीपुष्करमूलञ्च अजमोदाजगन्धिका ॥ २ ॥ विडङ्गं कट्फलं चव्यं पञ्चैव लवणानि च । लवङ्गं त्रिवृता दन्ती सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥ ३ ॥ भावयेत्सप्तधा रौद्रे स्वरसैः सुरसोद्भवैः । हन्ति सर्वं कफोद्भूतं व्याधिं कालानलो रसः ॥ ४ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, विष ४ भाग, त्रिकुटेका चूर्ण ८ भाग, हरड़ १ भाग, बहेड़ा १ भाग, आमला १ भाग, कूठ १ भाग, अजवायन १ भाग, अजमोद १ भाग, वायविडंग १ भाग, कायफल १ भाग, चव्य १ भाग, पांचों लवण ५ भाग, लौंग १ भाग, निसोध १ भाग और दंती १ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर तुलसीके रसमें सात भावना देवे । इसके सेवन करनेसे समस्त कफज रोग नष्ट होते हैं। इसको श्लेष्मकालानल रस कहते हैं ॥१-४॥

( ३६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्लेष्मशैलेन्द्र रस । पारदं गन्धकं लौहं त्र्यूषणं जीरकद्वयम् । शृङ्गी शटी यमानी च पौष्करञ्चार्द्रकन्तथा ॥ ५ ॥ गैरिकं यावशूकञ्च टङ्कणं गजपिप्पली । जातीकोषाजमोदा च वरायासलवंगकम् ॥ ६ ॥ कणकारुणबीजानि कट्फलं चव्यकं तथा । प्रत्येकं तोलकञ्चैषां श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥ ७ ॥ पाषाणे विमले खल्ले घृष्टं पाषाणमुद्गरैः । बिल्वमूलरसं दत्त्वा चार्कचित्रफलत्रिकाः ॥ ८ ॥ निर्गुण्डी गणिका वासा चेन्द्राशनं प्रचोदनी । धुस्तूरं कृष्णजीरञ्च पारिभद्रकपिप्पली ॥ ९ ॥ एतेषाञ्च रसैर्मर्द्यमार्द्रकैश्च विभावयेत् । उष्णतोयानुपानेन सर्वं व्याधिं विनाशयेत् ॥ १० ॥ विंशतिं श्लैष्मिकान्रोगान्सन्निपातभवान्गदान् । उदराष्टकदुर्नाममामवातञ्च दारुणम् ॥ ११ ॥ पञ्च पाण्ड्वामयान्दोषान्कृमिं स्थौल्यमथो नृणाम् । यथा शुष्केन्धने वह्निस्तथैवाग्निविवर्द्धनः ॥ १२ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, त्रिकुटा, जीरा, काला जीरा, काकड़ा- शिंगी, कचूर, अजवायन, कूठ, सोंठ, गेरू, जवाखार, सुहागा, गज- पीपल, जावित्री, अजमोद, त्रिफला, धमासा, लौंग, धतूरेके बीज, आकके बीज, कायफल और चव्य यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके पत्थ- रके खरलमें डालकर पत्थरकी मूसलीसे पीसे । फिर बेलकी जड़का रस, आककी जड़का रस, चित्रककी जड़का रस, त्रिफलेका रस,

भाषाटीकासहित । ( ३६५ ) सम्हालके पत्तोंका रस, अरणीकी जड़का रस, अडूसेके पत्तोंका रस, भांगके पत्तोंका रस, कटेरीका रस, धतूरेके पत्तोंका रस, काले जीरेका क्वाथ, फरहदका क्वाथ, पीपलका क्वाथ और अदरखका रस इन प्रत्ये- कके रसमें अलग २ मर्दन करके सात सात वार भावना देकर गोली बना लेवे । उष्ण जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बीस प्रका- रके कफके रोग, त्रिदोष व्याधि, आठ प्रकारके उदररोग, बवासीर, आमवात, पांच प्रकारका पांडु रोग, क्रिमि और मेदरोग नष्ट होते हैं । जिस प्रकार सूखे काष्ठमें अग्नि शीघ्र ही प्रविष्ट होकर प्रचण्ड हो जाती है उसी प्रकार इस औषधिसे जठरानल दीप्त होती है । इसको श्लेष्मशैलेन्द्र रस कहते हैं ॥ ५-१२ ॥ महाश्लेष्मकालानल रस । हिंगुलसम्भवं सूतं शिलागन्धकटंकणम् । ताम्रं वङ्गं तथाभ्रञ्च स्वर्णमाक्षिकतालकम् ॥ १३ ॥ धूस्तूरं सैन्धवं कुष्ठं हिंगु पिप्पलिकट्फलम् । दन्तीबीजं सोमराजी वनराजफलत्रिवृत् ॥१४॥ वज्रीक्षीरेण संमर्द्य वटिकां कारयेद्भिषक् । कलायपरिमाणान्तु खादेदेकां यथाबलम् ॥ १५ ॥ सन्निपातं निहन्त्याशु वृक्षमन्द्राशनिर्यथा । मदसिंहो यथारण्ये मृगाणां कुलनाशनः ॥ तथाऽयं सर्वरोगाणां सद्यो नाशकरो महान् ॥ १६ ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा, मैनशिल, गंधक, सुहागा, तांबा- भस्म, वंगभस्म, अभ्रकभस्म, सोनामाखीभस्म, हरिताल, धतूरेके बीज, सेंधानमक, कूठ, हींग, पीपल, कायफल, दंतीके बीज, बाव- चीके बीज, अमलतासकी फली और निसोतकी जड़ इन सब औष- धियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मटरकी बरा- १३

( ३६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बर गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक गोली खानेसे वज्रसे नष्ट हुए वृक्षके समान सन्निपातरोग नष्ट होता है । जिस प्रकार उन्मत्त सिंह वनके बीचमें पशुओंका नाश करता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे रोगोंका समूह नष्ट होता है । इसको महाश्लेष्मकालानल रस कहते हैं ॥ १३-१६ ॥ महालक्ष्मीविलास रस । पलं वज्राभ्रचूर्णस्य तदर्द्धं गन्धकं भवेत् । तदर्द्धं वङ्गभस्मापि तदर्द्धं पारदं तथा ॥ १७ ॥ तत्समं हरितालञ्च तदर्द्धं ताम्रभस्मकम् । रससाम्यञ्च कर्पूरं जातीकोषफले तथा ॥ १८ ॥ वृद्धदारकबीजञ्च बीजं स्वर्णफलस्य च । प्रत्येकं कार्षिकं भागं मृतस्वर्णञ्च शाणकम् ॥ १९॥ निष्पिष्य वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । निहन्ति सन्निपातोत्थान्गदान्घोरान्सुदारुणान् २०॥ गलोत्थानन्त्रवृद्धिञ्च तथातीसारमेव च । कुष्ठमेकादशविधं प्रमेहान्विंशतिन्तथा ॥ २१ ॥ श्लीपदं कफवातोत्थं चिरजं कुलजन्तथा । नाडीव्रणं व्रणं घोरं गुदामयभगन्दरम् ॥ २२ ॥ कासपीनसयक्ष्मार्शःस्थौल्यदौर्गन्ध्यरक्तनुत् । आमवातं सर्वरूपं जिह्वास्तम्भं गलग्रहम् ॥२३॥ उदरं कर्णनासाक्षिमूखवैजाड्यमेव च । सर्वशूलं शिरःशूलं स्त्रीरोगञ्च विनाशयेत् ॥ २४ ॥ वज्राभ्रकका चूर्ण १ पल, गंधक आधा पल, वंगभस्म १ तोला, पारा ६ मासे, हरिताल ६ मासे, तांबेकी भस्म ३ मासे, कपूर, जाय-

भाषाटीकासहित । ( ३६७ ) फल और जावित्री यह प्रत्येक औषधि छः छः मासे, विधारेके बीज और धतूरेके बीज यह प्रत्येक एक एक तोला और सोनाभस्म ४ मासे लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे त्रिदोषज सर्व प्रकारके रोग, गलोत्थ रोग, आन्त्रवृद्धि, अतिसार, ग्यारह प्रकारके महाकुष्ठ, बीस प्रकारके प्रमेह, कफवातज श्लीपद, चिरकालका श्लीपद, वंशज श्लीपद, नाड़ीव्रण, व्रण, भगन्दर, खांसी, पीनस, राजयक्ष्मा, बवासीर, मेदरोग, दुर्गंध, रुधिरजनित रोग, सर्व प्रकारका आमवात, जिह्वास्तम्भ, गलग्रह, उदररोग, कर्ण, नासिका, नेत्र और मुखकी जड़ता, सर्व प्रकारका शूल, शिरःशूल और स्त्रीरोग प्रभृति नष्ट होते हैं ॥ १७–२४॥ वटिकां प्रातरैकैकां खादेन्नित्यं यथाबलम् । अनुपानमिह प्रोक्तं मांसं पिष्टं पयो दधि ॥ २५ ॥ वारिभक्तं सुराशीधुसेवनात्कामरूपधृक् । वृद्धोऽपि तरुणस्पर्द्धी न च शुक्रक्षयो भवेत् ॥ २६॥ न च लिङ्गस्य शैथिल्यं न केशा यान्ति पक्कताम् । नित्यं गच्छेच्छतं स्त्रीणां मत्तवारणविक्रमः ॥ २७॥ द्विलक्षयोजनी दृष्टिर्जायते पौष्टिकस्तथा । प्रोक्तः प्रयोगराजोऽयं नारदेन महात्मना ॥ २८ ॥ रसो लक्ष्मीविलासोऽयं वासुदेवो जगत्पतिः । प्रसादादस्य भगवान् लक्षनारीषु वल्लभः ॥ २९ ॥ प्रतिदिन प्रातःकाल नित्य इसकी एक गोली खाय और इसपर मांस, मिष्टान्न ( पक्वान्न ) दूध, दही, जलयुक्त भात अथवा मांडयुक्त भात और मदिरा सेवन करे तो कामदेवके समन स्वरूपवान् हो

( ३६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जाता है तथा वृद्ध मनुष्य भी युवाके समान स्पर्द्धायुक्त होता है । कदापि शुक्रक्षय नहीं होता, लिंगमें शिथिलता नहीं उत्पन्न होती, बाल सुफेद् नहीं होते, उन्मत्त हाथीके समान प्रतिदिन सैकड़ों स्त्रियोंसे रमण करनेको समर्थ होता है, दो लक्ष योजन तक देखनेको समर्थ हो जाता है और शरीरमें पुष्टिकी वृद्धि होती है । जगत्पति श्रीकृष्ण भगवान् इसी औषधिका सेवन करके लक्ष स्त्रियोंके साथ विषय करनेको समर्थ हुए थे । इस उत्तम औषधिको महात्मा नारदजीने कहा है । इसको महालक्ष्मीविलास रस कहते हैं ॥ २५-२९ ॥ कफकेतु रस । टङ्कणं मागधी शङ्खं वत्सनाभं समं समम् । आर्द्रकस्य रसेनापि भावयेद्दिवसत्रयम् ॥ ३० ॥ गुञ्जामात्रं प्रदातव्यमार्द्रकस्य रसेन वै । पीनसं श्वासकासं च गलरोगं गलग्रहम् ॥ ३१ ॥ दन्तरोगं कर्णरोगं नेत्ररोगं सुदारुणम् । सन्निपातं निहन्त्याशु कफकेतुरसोत्तमः ॥ ३२ ॥ सुहागा, पीपल, शंखकी भस्म और विष यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें तीन भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । अदरखके रसके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे पीनस, श्वास, खाँसी, गलरोग, गलेकी पीड़ा, दन्तरोग, कर्णरोग, नेत्ररोग और सन्निपात रोग नष्ट होते हैं । इसको कफकेतु रस कहते हैं ॥ ३०-३२ ॥ कफचिन्तामणि रस । हिंगुलेन्द्रयवं टङ्कं त्रैलोक्यबीजमेव च । मरिचञ्च समं सर्वं त्रिभागं रससिन्दुरम् ॥ ३३ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३६९ ) आर्द्रकस्य रसेनैव मर्दयेद्याममात्रकम् । चणकाभा वटी कार्या सर्ववातप्रशान्तये ॥ कफरोगं निहंत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३४ ॥ इति कफरोगाधिकारः । सिंग्रफ, इन्द्रजौ, सुहागा, भांगके बीज और काली मिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, रससिन्दूर ३ भाग इन सबको एकत्र खरल कर फिर अदरखके रसमें एक प्रहरपर्यन्त खरल करके चनेकी बराबर गोली बना सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग और कफरोग ऐसे नष्ट होते हैं जिस प्रकार सूर्योदयसे अन्धकारका समूह नष्ट होता है । इसे कफचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ३३॥ ३४ ॥ इति कफरोगाधिकार सम्पूर्ण । अथ पित्तरोगचिकित्सा । गुडूच्यादिलोह । गुडूचीसारसंयुक्तं त्रिकत्रययुतन्त्वयः । वातरक्तं निहन्त्याशु सर्ववातहरं परम् ॥ १ ॥ गिलोयका सत्त, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, चित्रककी जड़, नागरमोथा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और लोहेकी भस्म १० भाग लेवे । इन सब औषधि- योंको एकत्र खरल करके यथामात्राकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे वातरक्त और सर्व प्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । इसको गुडूच्यादि लोह कहते हैं ॥ १ ॥ धात्रीलोह । धात्रीचूर्णस्याष्टौ पलानि चत्वारि लौहचूर्णस्य । यष्टीमधुकरजश्च द्विपलं दद्यात्पुटे घृष्टम् ॥ २ ॥

( ३७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । धात्र्याश्च क्वाथेन तच्चूर्णं भाव्यञ्च सप्ताहम् । चण्डातपेन संशुष्कं भूयः पिष्टं घटे स्थितम् ॥ ३ ॥ घृतेन मधुना युक्तं भोजनाद्यन्तमध्यतः । त्रीन्वारान्भक्षयेन्नित्यं पथ्यं दोषानुबन्धतः ॥ ४ ॥ भुक्तस्यादौ नाशयेच्च दोषान्पित्तकृतानपि । मध्ये चानाहविष्टब्धं तथान्ते चाग्निमान्द्यताम् । रक्तपित्तसमुद्भूतान् रोगान् हन्ति न संशयः ॥ ५ ॥ आमलौंका चूर्ण ८ पल, लोहेकी भस्म ४ पल और मुलैठीका चूर्ण

  • २ पल इन सब औषधियोंको एकत्र करके आमलोंके क्वाथमें सात भावना देकर प्रचण्ड सूर्यकी धूपमें सुखाकर फिर मर्दन करे । पश्चात् इस औषधिको घृत और सहतके साथ भोजनकी आदि, अंत और मध्य अवस्थामें तीन वार सेवन करावे । इस औषधिके सेवनके अन्तमें यथादोषानुसार पथ्य देवे । भोजनकी आदिमें इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त पित्तज रोग नष्ट होते हैं, भोजनकी मध्य अवस्थामें इस औषधिके सेवन करनेसे आनाह और विष्टब्धाजीर्ण शमन होते हैं, भोजनके अन्तमें सेवन करनेसे मन्दाग्नि और समस्त रक्तपित्तोत्पन्न रोग दूर होते हैं । इसको धात्रीलोह कहते हैं ॥ २-५ ॥ पित्तान्तक रस । जातीकोषफले मांसी कुष्ठं तालीशपत्रकम् । माक्षिकं मृतलौहञ्च अभ्रं दिव्यं समांशकम् ॥ ६ ॥ सर्वतुल्यं मृतं तारं समं निष्पिष्य वारिणा । द्विगुञ्जाभा वटी कार्या पित्तरोगविनाशिनी ॥ ७ ॥ कोष्ठाश्रितञ्च यत्पित्तं शाखाश्रितमथापि वा । शूलञ्चैवाम्लपित्तञ्च पाण्डुरोगं हलीमकम् ॥ ८ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३७१ ) दुर्नामभ्रान्तिवान्तिञ्च क्षिप्रमेव विनाशयेत् । रसः पित्तान्तको ह्येष काशिराजेन भाषितः ॥ ९ ॥ जावित्री, जायफल, वालछड़, कूट, तालीशपत्र, सोनामाखी, लोह- भस्म, अभ्रकभस्म, लौंग यह सब औषधि समान भाग और चाँदी- भस्म सबके बराबर लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके पित्तरोग, कोष्ठाश्रित पित्त, शाखाश्रित पित्त, शूल, अम्लपित्त, पाण्डुरोग, हलीमक, बवासीर, भ्रम और वमन शांत होते हैं । इसको काशिराज दिवोदासने कहा है॥६-९॥ महापित्तान्तक रस । यदात्र माक्षिकं त्यक्त्वा सुवर्णमपि दीयते । महापित्तान्तको नाम सर्वपित्तविनाशनः ॥ १० ॥ इति पित्तरोगचिकित्सा । पित्तान्तक रसमें जो औषधि कही हैं उनमेंसे सोनामाखीको निकाल- कर उसके स्थानमें सोनेकी भस्म डाले तो इसको महापित्तान्तक रस कहते हैं । इससे सर्व प्रकारके पित्तरोग नष्ट होते हैं ॥ १० ॥ इति पित्तरोगधिकार सम्पूर्ण । अथ वातरक्तरोगचिकित्सा । लाङ्गल्याद्य लोह । विशुद्धलाङ्गलीमूलत्रिकटुत्रिफलैस्तथा । द्राक्षागुग्गुलुभिस्तुल्यं लौहचूर्णं नियोजयेत् ॥ १ ॥ मातुलुङ्गरसेनैव त्रिफलाया रसेन च । विमृद्य यत्नतः पश्चाद्गुटिकां कोलसम्मिताम् । भक्षयेन्मधुना सार्द्धं शृणु कुर्वन्ति यान्गुणान् ॥ २ ॥

( ३७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आजानुस्फुटितं घोरं सर्वाङ्ग-स्फुटितं तथा । तत्सर्वं नाशयेत्याशु साध्यासाध्यञ्च शोणितम् ॥३॥ कलिहारीकी जड़, त्रिकुटा, त्रिफला, दाख और गूगल यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, लोहाभस्म ९ नव भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर बिजोरे नींबूके रसमें और त्रिफलेके रसमें खरल करके एक एक तोलेकी गोली बना लेवे । सहतके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे जानुपर्यंत स्फुटित वातरक्त, सर्वांग स्फुटित वातरक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है । इसको लाङ्ग- ल्याद्य लोह कहते हैं ॥ १-३ ॥ वातरक्तान्तक रस । गन्धकं पारदं लौहं शिलां तालं घनं तथा । शिलाजतु पुरं शुद्धं समभागं विचूर्णयेत् ॥ ४ ॥ श्वेतापराजिता दार्वी वागुची चित्रकं तथा । पुनर्नवा देवकाष्ठत्रिफलाव्योषवेल्लकम् ॥ ५ ॥ चूर्णमेषां पृथक् तुल्यं सर्वमेकत्र कारयेत् । त्रिफलाभृंगराजस्य रसेनैव त्रिधा त्रिधा ॥ ६ ॥ भावयेद्भक्षयेत्पश्चाच्चणमात्रं दिने दिने । ततोनुपात्रं निम्बस्य पत्रं पुष्पं त्वचं समम् ॥ ७ ॥ शाणमानं घृतैः कुर्यात्सर्ववातविकारनुत् । वातरक्तं महाघोरं गम्भीरं सर्वजं च यत् ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तं साध्यासाध्यं निहन्त्यलम् ॥ ८ ॥ गंधक, पारा, लोहभस्म, मैनशिल, हरिताल, नागरमोथा, शिला- जीत, गूगल, सफेद कोइलकी जड़, दारुहलदी, बावची, चीतेकी जड़, पुनर्नवा, देवदारु, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग इन सब औषधियोंको

भाषाटीकासहित । ( ३७३ ) समान भाग लेकर त्रिफलेके रसमें तीन और भांगरेके रसमें तीन भावना देवे, पश्चात् चनेकी बराबर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करावे । इस औषधिके सेवन करनेके अंतमें नीमके पत्ते, नीमके फूल और नीमकी छालका चूर्ण बनाकर घृतके द्वारा सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके वातरोग, घोरतर गम्भीर त्रिदोषज, सर्व उपद्रव संयुक्त और साध्यासाध्य वातरक्त नष्ट होता है। इसको वातरक्तान्तक रस कहते हैं ॥ ४-८ ॥ तालभस्म । हरितालं पलं शुद्धं तथा कर्षं विषस्य च । श्वेताङ्कोठरसेनैव द्वयमेकत्र खल्लयेत् ॥ ९ ॥ पलाशभस्म द्विपलं निधाय स्थालिकोपरि । तद्भस्मोपरि तालस्य गोलकं स्थापयेत्सुधीः॥ १० ॥ तस्योपरि अपामार्गभस्म दद्यात्पलत्रयम् । स्थालीमुखे शरावञ्च दद्याद्यत्नेन लेपयेत् ॥ ११ ॥ लेपयित्वा ततश्चुल्यामहोरात्रं पचेद्भिषक् । ततस्तु जायते भस्म शुद्धकर्पूरसन्निभम् ॥ १२ ॥ गुञ्जात्रयं ततो भक्ष्यमनुपानविशेषतः । वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च दद्रुविस्फोटकापचीम् ॥ १३ ॥ विचर्चिकां चर्मदलं वातरक्तञ्च शोणितम् । रक्तपित्तं तथा शोथं गलत्कुष्ठं विनाशयेत् ॥ हलीमकं तथा शूलमग्निमान्द्यमरोचकम् ॥ १४ ॥ शुद्ध हरिताल १ पल और विष १ कर्ष परिमाण लेवे । दोनोंको एकत्र सफेद अंकोलकी जड़के रसमें खरल करके पिंडसा बना लेवे । फिर एक हांडीमें दो पल परिमाण ढाकका खार बिछाकर

( ३७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उसपर इस हरितालके गोलेको रख देवे और उसके ऊपर तीन पल परिमाण चिरचिटेका क्षार डालकर ऊपरसे एक सिकोरेसे हांडीके मुखको बंद करके मिट्टीसे उसके जोड़ोंको बंद कर देवे । फिर इस हांडीको चूल्हेपर रखकर एक दिन रात बराबर अग्नि देवे । जब शीतल होजाय तब इसमेंसे कर्पूरकी समान हरितालकी भस्मको लेकर तीन रत्ती परिमाण यथोक्त अनुपानके साथ सेवन करनेसे वातरक्त, कुष्ठ, दद्रु, विस्फोटक, अपची, विचर्चिका, चर्म्मदल, रक्तपित्त, शोथ, गलत्कुष्ठ, हलीमक,शूल, मंदाग्नि और अरुचिरोग नष्ट होते हैं । इसको तालभस्म कहते हैं ॥ ९-१४ ॥ महातालेश्वर रस । तथा सिद्धेन तालेन गन्धतुल्येन मेलयेत् । द्वयोस्तुल्यं जीर्णताम्रं वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ १५ ॥ अयं तालेश्वरो नाम रसः परमदुर्लभः । हन्यात्कुष्ठानि सर्वाणि वातरक्तमथापि च ॥ शूलमष्टविधं श्वित्रं रसस्तालेश्वरो महान् ॥ १६ ॥ पूर्वोक्त हरितालकी भस्म और गंधक दोनोंको समान भाग लेवे और दोनोंकी बराबर जारित तांबा मिलाकर वालुकायंत्रमें पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके कुष्ठ, वातरक्त, आठ प्रका- रका शूल और श्वित्र रोग नष्ट होते हैं । इसको महातालेश्वर रस कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ विश्वेश्वर रस । रसादश विषात्पञ्च गन्धकाद्दश शोधितात् । तुत्थाद्दश पलाशस्य बीजेभ्यः पञ्च कारयेत् ॥ १७॥ क्षुद्राश्वमारधूस्तूर-करहाटकनीलितः । दशकं दशकं कुर्याच्छोषयित्वा जटात्वचः ॥ १८ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३७५ ) दशकं दशकं दत्त्वा कुचिलाच्च नूतनात् । भल्लातकाच्च दशकं चूर्णयित्वा भिषक् ततः ॥ १९ ॥ सुदिने च बलिं दत्त्वा वैद्यः पूजापरायणः । रक्तिकाद्वितयं दद्यात्सहते यदि वा त्रयम् ॥ २० ॥ वातरक्तं ज्वरं कुष्ठं खरस्पर्शमसौख्यदम् । आजानुस्फुटितं हन्ति विषजं वाऽस्थिनिःसृतम्॥२१॥ कुष्ठमष्टादशविधमग्निमान्द्यमरोचकम् । विश्वेश्वरो रसो नाम विश्वनाथेन भाषितः ॥ २२ ॥ पारा १० भाग, विष ५ भाग, गन्धक १० भाग, तूतिया १० भाग, ढाकके बीज ५ भाग, कटेरी १० भाग, कनेर १० भाग, धतूरा १० भाग, कमलकी जड १० भाग और नील वृक्ष दश भाग लेवे। इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर कटेरी, कनेर, धतूरा, कमल और नील- वृक्ष इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग दश दश भावना देकर पश्चात् कुचिलेके क्वाथमें दश भावना देवे। फिर भिलावेके क्वाथमें दश भावना देवे । पश्चात् चूर्ण करके एक उत्तम बासनमें भरकर रख देवे । अन- न्तर शुभ दिनमें देवताका पूजन करके दो रत्ती परिमाण अथवा बला- नुसार तीन रत्ती परिमाण औषधि सेवन करावे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातरक्त, ज्वर, कुष्ठ, दुःखको देनेवाला खरस्पर्श, जानुपर्य्यन्त स्फुटित वातरक्त, विषज रोग, अस्थिगत रोग, अठारह प्रकारके कुष्ठ, मंदाग्नि और अरुचि रोग नष्ट होते हैं । इस विश्वेश्वररसको महादेवने कहा है ॥ १७–२२ ॥ वक्ष्यते कुष्ठरोगे यदौषधं भिषजां वरैः । वातरक्ते प्रयुञ्जीत कुर्याच्च रक्तमोक्षणम् ॥ २३ ॥ इति श्रीरसेन्द्रसारसंग्रहे वातरक्ताधिकारः ।