ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
रक्षा करो. तुम्हारे द्वारा रक्षित हम लोगों का विनाश शत्रु नहीं कर पाएंगे. (३) यो नो अग्ने अररिवाँ अघायुररातीवा मर्चयति द्वयेन. मन्त्रो गुरुः पुनरस्तु सो अस्मा अनु मृक्षीष्ट तन्वं दुरुक्तैः.. (४) हे अग्नि! जो हमारे प्रति मारण आदि पाप का अभिलाषी है, दान नहीं देता, मानसिक एवं वाचिक दोनों प्रकार के मंत्रों द्वारा जो हमें दान देने से रोकता है, उसके लिए मंत्र का पहला मानसिक रूप हृदय का भार बने एवं दूसरा वाचिक रूप दुर्वाक्य उसका ही शरीर नष्ट करे. (४) उत वा यः सहस्य प्रविद्वान्मर्तो मर्त्तं मर्चयति द्वयेन. अतः पाहि स्तवमान स्तुवन्तमग्ने माकिर्नो दुरिताय धायीः.. (५) हे बलपुत्र अग्नि! जो व्यक्ति वाचिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के मंत्रों द्वारा मनुष्य को प्रभावित करता है, हे स्तूयमान अग्नि! मैं प्रार्थना करता हूं कि मुझ स्तुतिकर्त्ता की ऐसे व्यक्ति से रक्षा करो एवं मुझे पाप का भाजक मत बनाओ. (५) सूक्त—१४८ देवता—अग्नि मथीद्यदीं विष्टो मातरिश्वा होतारं विश्वाप्सुं विश्वदेव्यम्. नि यं दधुर्मनुष्यासु विक्षु स्वर्ष्ण चित्रं वपुषे विभावम्.. (१) वायु ने लकड़ियों के भीतर प्रविष्ट होकर देवों के होता, नानारूप धारण करने वाले एवं समस्त देवों से संबंधित यज्ञकार्य करने में कुशल अग्नि को बढ़ाया. प्राचीन काल में देवों ने इसी अग्नि को ऋत्विज् रूप में यज्ञसिद्धि के लिए धारण किया था. (१) ददानमिन्न ददभन्त मन्मानिर्वरूथं मम तस्य चाकन्. जुषन्त विश्वान्यस्य कर्मोपस्तुतिं भरमाणस्य कारोः.. (२) अग्नि को उत्तम हव्य या स्तुति देने वाले मुझको शत्रु नष्ट नहीं कर सकते. अग्नि मेरे उत्तम स्तोत्र की कामना करते हैं. स्तुति करने वाले यजमान द्वारा दिए गए हव्य स्वीकार करते हैं. (२) नित्ये चिन्नु यं सदने जगृभ्रे प्रशस्तिभिर्दधिरे यज्ञियासः. प्र सू नयन्त गृभयन्त इष्टावश्वासो न रथ्यो रारहाणाः.. (३) यज्ञ योग्य यजमान जिस अग्नि को नित्य अग्निस्थान में धारण करते हैं एवं स्तुतियां करते हुए स्थापित करते हैं, उसी अग्नि को ऋत्विजों ने शीघ्रगामी एवं रथ में जुड़े हुए घोड़े के समान यज्ञ के निमित्त निर्मित किया. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
पुरूणि दस्मो नि रिणाति जम्भैराद्रोचते वन आ विभावा. आदस्य वातो अनु वाति शोचिरस्तूर्न शर्यामसनामनु ध्यून्.. (४) विनाशक अग्नि अपने शिखारूपी दांतों से विविध प्रकार के वृक्षों को नष्ट करते हैं एवं विविध प्रकाशयुक्त होकर दीप्त होते हैं. जिस प्रकार फेंकने वाले के पास से बाण शीघ्रतापूर्वक जाता है, उसी प्रकार वायु अग्नि का मित्र बनकर चलता है. (४) न यं रिपवो न रिषण्यवो गर्भे सन्तं रेषणा रेषयन्ति. अन्धा अपश्या न दभन्नभिख्या नित्यास ईं प्रेतारो अरक्षन्.. (५) अरणि के मध्य में वर्तमान जिसको शत्रु दुःख नहीं दे सकते, अंधा व्यक्ति भी उस अग्नि के महत्त्व को नष्ट नहीं कर सकता. अविचलभक्ति वाले यजमान यज्ञादि द्वारा उसी अग्नि को तृप्त करते एवं उसकी रक्षा करते हैं. (५) सूक्त—१४९ देवता—अग्नि महः स राय एषते पतिर्दन्निन इनस्य वसुनः पद आ. उप ध्रजन्तमद्रयो विधन्निन्.. (१) पूज्य गौ आदि धन के स्वामी अग्नि मनचाही वस्तुएं प्रदान करते हुए देवयज्ञ के सामने जाते हैं. स्वामियों के भी स्वामी अग्नि धन के आश्रय वेदी का सहारा लेते हैं. सोम कूटने के लिए हाथ में पत्थर लिए हुए यजमान आए हुए अग्नि की सेवा करते हैं. (१) स यो वृषा नरां न रोदस्योः श्रवोभिरस्ति जीवपीतसर्गः. प्र यः सस्राणः शिश्रीत योनौ.. (२) वे अग्नि मनुष्यों के समान ही धरती और आकाश के भी उत्पन्न करने वाले हैं. वे यशों से शोभित हैं एवं उन्होंने जीवों को नाना प्रकार से स्वाद प्राप्त कराया है. वे अपनी वेदीरूपी योनि में प्रविष्ट होकर प्राप्त पुरोडाश आदि को पचाते हैं. (२) आ यः पुरं नार्मिणीमदीदेदत्यः कविर्नभन्यो३ नार्वा. सूरो न रुरुक्वाञ्छतात्मा.. (३) क्रांतदर्शी एवं आकाश में भ्रमण करने में कुशल वायु के समान अपेक्षित स्थानों में जाने वाले अग्नि यजमानों द्वारा बनाई हुई वेदी को दीप्त करते हैं. सैकड़ों प्रकार के रूप वाले अग्नि सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं. (३) अभि द्विजन्मा त्री रोचनानि विश्वा रजांसि शुशुचानो अस्थात्. होता यजिष्ठो अपां सधस्थे.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
दो अरणियों द्वारा उत्पन्न अग्नि तीनों लोकों को प्रकाशित करते हुए एवं समस्त संसारों को आलोकित करते हुए स्थित होते हैं. वे देवों को बुलाने वाले एवं यज्ञकर्त्ता बनकर प्रोक्षणी आदि पात्रों के जल के समीप स्थित होते हैं. (४) अयं स होता यो द्विजन्मा विश्वा दधे वार्याणि श्रवस्या. मर्तो यो अस्मै सुतुको ददाश.. (५) जो अग्नि द्विजन्मा हैं, वे ही यज्ञ निष्पन्नकर्त्ता एवं समस्त उत्तम धनों को हव्य प्राप्ति की इच्छा से धारण करते हैं. इन अग्नि के लिए जो व्यक्ति हवि देता है, वह उत्तम पुत्र वाला बनता है. (५) सूक्त—१५० देवता—अग्नि पुरु त्वा दाश्वान्वोचेऽरिरग्ने तव स्विदा. तोदस्येव शरण आ महस्य.. (१) हे अग्नि! मैंने तुम्हें तुम्हारा प्रिय हव्य दिया है. इसलिए मैं भांति-भांति की प्रार्थनाएं कर रहा हूं. मैं तुम्हारा ही सेवक हूं. जिस प्रकार महान् स्वामी के घर में सेवक रहता है, उसी प्रकार तुम्हारे यज्ञस्थल में मैं निवास करता हूं. (१) व्यनिनस्य धनिनः प्रहोषे चिदरुषः. कदा चन प्रजिगतो अदेवयोः.. (२) हे अग्नि देव! जो धनी लोग तुम्हें स्वामी नहीं मानते, जो उत्तम यज्ञ के लिए दक्षिणा नहीं देते एवं जो देवों की स्तुति नहीं करते, उन देवविरोधी लोगों को धन मत देना. (२) स चन्द्रो विप्र मर्त्यो महो व्राधन्तमो दिवि. प्रप्रेत्ते अग्ने वनुषः स्याम.. (३) हे अग्नि! जो बुद्धिमान् मनुष्य तुम्हारा यज्ञ करता है, वह आकाश में चंद्रमा के समान सबका आह्लादक बनता है एवं प्रधानों का भी प्रधान होता है. इसलिए हम विशेष रूप से तुम्हारे सेवक हैं. (३) सूक्त—१५१ देवता—मित्र व वरुण मित्रं न यं शिम्या गोषु गव्यवः स्वाध्यो विदथे अप्सु जीजनन्. अरेजेतां रोदसी पाजसा गिरा प्रति प्रियं यजतं जनुषामवः.. (१) गायों के स्वामी होने के इच्छुक एवं शोभन ध्यान वाले यजमानों ने गायों की प्राप्ति के निमित्त एवं अपने मनुष्यों की रक्षा के लिए मित्र के सेमान जिस अग्नि को जल के भीतर यज्ञकर्म से उत्पन्न किया, धरती और आकाश जिस अग्नि के बल और शब्द से कांपते हैं, उसी प्रिय एवं यज्ञसाधन अग्नि की वे रक्षा करते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
यद्ध त्यद्वां पुरुमीळ्हस्य सोमिनः प्र मित्रासो न दधिरे स्वाभुवः. अध क्रतुं विदतं गातुमर्चत उत श्रुतं वृषणा पस्त्यावतः.. (२) हे मित्र एवं वरुण! तुम विविध इच्छाएं पूर्ण करने वाले हो. तुम्हारे मित्र बने हुए ऋत्विजों ने अभिलाषा पूर्ण करने वाला एवं कर्म करने की प्रेरणा देने वाला सोमरस धारण किया है. इसलिए तुम दोनों अपने सेवक के घर जाओ और उसकी पुकार सुनो. (२) आ वां भूषन्क्षितयो जन्म रोदस्योः प्रवाच्यं वृषणा दक्षसे महे. यदीमृताय भरथो यदर्वते प्र होत्रया शिम्या वीथो अध्वरम्.. (३) हे कामवर्षक मित्र और वरुण! यजमान समस्त शक्तियां पाने के उद्देश्य से धरती और आकाश में आपके स्तुति योग्य जन्म की प्रशंसा करते हैं. तुम अपने पूजक यजमान को अभीष्ट फल देते हो एवं स्तुतिवचन तथा हव्यदान आदि कर्मों को स्वीकार करते हो. (३) प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत्. युवं दिवो बृहतो दक्षमाभुवं गां न धुर्युप युञ्जाथे अपः.. (४) हे बलशाली मित्र एवं वरुण! जो यज्ञस्थल की भूमि आपको बहुत अधिक प्यारी है, उसे भली प्रकार सुशोभित कर दिया गया है. हे सत्यवादियो! उस पर बैठकर हमारे विशाल यज्ञ की प्रशंसा करो. जिस प्रकार शारीरिक बल प्राप्त करने के लिए गाय के दूध का उपभोग किया जाता है, उसी प्रकार आप आकाश में स्थित देवों को प्रसन्न करने के लिए सर्वत्र होने वाले यज्ञों को स्वीकार करते हो. (४) मही अत्र महिना वारमृण्वथोऽरेणवस्तुज आ सद्मन्धेनवः. स्वरन्ति ता उपरताति सूर्यमा निम्रुच उषसस्तक्ववीरिव.. (५) हे मित्र और वरुण! तुम अपने महत्त्व के कारण गायों को विशाल धरती के जिस उत्तम स्थान में ले जाते हो, वे चोर आदि के अपहरण से सुरक्षित गोशाला में लौट आती हैं एवं प्रचुर दूध देती हैं. जिस प्रकार चोरों द्वारा पकड़े गए लोग चिल्लाते हैं, उसी प्रकार वे गाएं सांझ- सवेरे आकाश स्थित सूर्य की ओर देखकर रंभाती हैं. (५) आ वामृताय केशिनीरनूषत मित्र यत्र वरुण गातुमर्चथः. अव त्मना सृजतं पिन्वतं धियो युवं विप्रस्य मन्मनामिरज्यथः.. (६) हे मित्र और वरुण! तुम जिस यज्ञप्रदेश में जाना स्वीकार कर लेते हो, वहां केश वाली अग्निज्वालाएं तुम्हारे यज्ञ के निमित्त तुम्हारी पूजा करती हैं. तुम आकर नीचे की ओर वर्षा को प्रेरित करो एवं मेधावी यजमान की उत्तम स्तुतियां स्वीकार करो. (६) यो वां यज्ञैः शशमानो ह दाशति कविर्होता यजति मन्मसाधनः. उपाह तं गच्छथो वीथो अध्वरमच्छा गिरः सुमतिं गन्तमस्मयू.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
जो मेधावी एवं भली-भांति यज्ञ संपन्न करने वाला यजमान उत्तम यज्ञ साधनों द्वारा तुम्हारे निमित्त सोमयाग आदि के उद्देश्य से स्तुति करता हुआ हव्य देता है, उसी शोभनमति यजमान के समीप जाओ एवं उसी के यज्ञ की अभिलाषा करो. तुम हम पर कृपा की कामना करते हुए हमारी स्तुतियों को स्वीकार करो. (७) युवां यज्ञैः प्रथमा गोभिरञ्जत ऋतावाना मनसो न प्रयुक्तिषु. भरन्ति वां मन्मना संयता गिरोऽदृप्यता मनसा रेवदाशाथे.. (८) हे यज्ञशाली मित्र एवं वरुण! जिस प्रकार किसी काम में सबसे पहले मन लगाया जाता है, उसी प्रकार यजमान यज्ञों में सबसे पहले तुम्हें घृतादि हव्यों से पूजित करते हैं. वे तुममें भली-भांति संलग्नचित्त से स्तुति करते हैं. तुम प्रसन्नचित्त से अन्नयुक्त यज्ञ में पधारो. (८) रेवद्वयो दधाथे रेवदाशाथे नरा मायाभिरितऊति माहिनम्. न वां द्यावोऽहभिनोंत सिन्धवो न देवत्वं पणयो नानशुर्मघम्.. (९) हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों धनसहित अन्न धारण करते हो, इसलिए धनयुक्त अन्न प्रदान करो. वह विशाल धन तुम्हारी बुद्धि द्वारा रक्षित है. दिन एवं रात को तुम्हारे समान शक्ति प्राप्त नहीं है. नदियों और पणियों ने तुम्हारा देवत्व नहीं पाया. पणियों को तो तुम्हारे समान धन भी प्राप्त नहीं है. (९) सूक्त—१५२ देवता—मित्र व वरुण युवं वस्त्राणि पीवसा वसाथे युवोरच्छिद्रा मन्तवो ह सर्गाः. अवातिरतमन्ृतानि विश्व ऋतेन मित्रावरुणा सचेथे.. (१) हे मित्र और वरुण! तुम दोनों मोटे एवं तेजस्वी वस्त्र धारण करो. तुम्हारे द्वारा की गई सृष्टियां निर्दोष एवं मनोहर हैं. तुम दोनों समस्त असत्यों का विनाश करके हमें सत्यों से युक्त करो. (१) एतच्चन त्वो वि चिकेतदेषां सत्यो मन्त्रः कविशस्त ऋघावान्. त्रिरश्रिं हन्ति चतुरश्रिरुग्रो देवनिदो ह प्रथमा अजूर्यन्.. (२) हे मित्र और वरुण! तुम दोनों में से प्रत्येक विशेष रूप से कर्म करता है, सत्यभाषी, मननशील, मेधावियों द्वारा प्रशंसनीय एवं शत्रुनाशक है, चार अस्त्र धारण करके तीन अस्त्र धारण करने वालों का नाश करता है एवं प्रत्येक के सामर्थ्य से देवनिंदक लोग पहले ही समाप्त हो जाते हैं. (२) अपादेति प्रथमा पद्धतीनां कस्तद्वां मित्रावरुणा चिकेत. गर्भो भारं भरत्या चिदस्य ऋतं पिपर्त्यनृतं नि तारीत्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे मित्र और वरुण! चरणहीन उषा पैरों वाले मनुष्यों से पहले ही आ जाती है. ऐसा तुम्हारे ही कारण होता है, इस बात को कौन जानता है? तुम दोनों के पुत्र सूर्य सत्य की पूर्ति एवं असत्य का विरोध करने का भार धारण करते हैं. (३) प्रयन्तमित्परि जारं कनीनां पश्यामसि नोपनिपद्यमानम्. अनवपृग्णा वितता वसानं प्रियं मित्रस्य वरुणस्य धाम.. (४) हम कमनीय उषाओं के प्रेमी सूर्य को सदा चलता हुआ देखते हैं, कभी स्थिर नहीं देखते. विस्तृत तेज को धारण करने वाले सूर्य मित्र व वरुण के प्रिय हैं. (४) अनश्वो जातो अनभीशुरर्वा कनिक्रदत्पतयदूर्ध्वसानुः. अचित्तं ब्रह्म जुजुषुर्युवानः प्र मित्रे धाम वरुणे गृणन्तः.. (५) सूर्य अश्व एवं लगाम के अभाव में भी शीघ्र गमन करते हैं, जोर से गरजते हैं एवं क्रमशः ऊपर चढ़ते जाते हैं. लोग इन अचिंत्य एवं महान् कर्मों को मित्र एवं वरुण का समझकर बार- बार स्तुतियां करते हुए सेवा करते हैं. (५) आ धेनवो मामतेयमवन्तीर्ब्रह्मप्रियं पीपयन्तस्मिन्नूधन्. पित्वो भिक्षेत वयुनानि विद्वानासाविवासन्नदितिमुरुष्येत्.. (६) यज्ञप्रिय एवं ममता के पुत्र दीर्घतमा की रक्षा करती हुईं गाएं अपने थनों के दूध से उसे तृप्त करें. वे यज्ञानुष्ठान को जानती हुईं दीर्घतमा के पिता एवं माता से हुतशेष अन्न खाने के लिए मांगें एवं तुम दोनों की सेवा करती हुईं यज्ञ को अखंडित रूप से रक्षित करें. (६) आ वां मित्रावरुणा हव्यजुष्टिं नमसा देवाववसा ववृत्याम्. अस्माकं ब्रह्म पृतनासु सह्या अस्माकं वृष्टिर्दिव्या सुपारा.. (७) हे मित्र और वरुण देवो! मैं अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारे प्रति नमस्कारयुक्त स्तोत्र से हव्य देने का प्रयत्न करूंगा. हमारा यह यज्ञकर्म युद्ध में शत्रुओं को हरावे एवं दिव्यवर्षा हमारा उद्धार करे. (७) सूक्त—१५३ देवता—मित्र व वरुण यजामहे वां महः सजोषा हव्येभिर्मित्रावरुणा नमोभिः. घृतैर्घृतस्नू अध यद्धामस्मे अध्वर्यवो न धीतिभिर्भरन्ति.. (१) हे घृतवर्षक एवं महान् मित्र, वरुण! समान प्रीति वाले हमारे अध्वर्यु और हम यजमान हव्य द्वारा तुम्हारी पूजा एवं अपनी स्तुतियों द्वारा तुम्हारा पोषण करते हैं. (१) प्रस्तुतिर्वां धाम न प्रयुक्तिरयामि मित्रावरुणा सुवृत्तिः. ebook converter DEMO Watermarks*
अनक्ति यद्द्वां विदथेषु होता सुमन्ं वां सूरिर्वृषणावियक्षन्.. (२) हे मित्र और वरुण! मैं तुम्हारे यज्ञ का प्रस्ताव मात्र करता हूं, प्रयोग नहीं कर पाता. इतने से ही मैं तुम्हारा तेज प्राप्त कर लेता हूं. हे कामवर्षको! जब तुम्हारे बुद्धिमान् होता तुम्हारे लिए हवन करते हैं, उस समय वे सुख के भागी बनते हैं. (२) पीपाय धेनुरदितिर्ऋताय जनाय मित्रावरुणा हविर्दे. हिनोति यद्द्वां विदथेषु सपर्यन्त्स रातहव्यो मानुषो न होता.. (३) हे मित्र और वरुण! जैसे रातहव्य नामक राजा ने साधारण मनुष्य रूप यजमान के होता के समान यज्ञ में अपनी सेवा से तुम्हें प्रसन्न किया था और उसकी गाएं बहुत दूध वाली बन गई थीं, उसी प्रकार तुम्हें हव्य देने वाले मेरी गाएं दूध वाली बनकर मुझे तृप्त करें. (३) उत वां विक्षु मद्यास्वन्धो गाव आपश्च पीपयन्त देवी:. उतो नो अस्य पूर्व्यः पतिर्दन्वीतं पातं पयस उस्रियायाः.. (४) हे मित्र और वरुण! अन्न, दिव्य गाएं एवं जल तुम्हारी कृपा प्राप्त करने वाले यजमानों को प्रसन्न करें. हमारे यजमान के पूर्वकालीन पालक अग्नि दाता हों. तुम दोनों दुधारू गाय का दूध पिओ. (४) सूक्त—१५४ देवता—विष्णु विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्र वोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि. यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः.. (१) हे मानवो! मैं उन वीर कर्मों को शीघ्र कहूंगा. उन्होंने पृथ्वी और तीनों लोकों को नापा था एवं अति विस्तृत अंतरिक्ष को स्थिर किया था. अनेक प्रकार से स्तुतिपात्र उन विष्णु ने तीन चरण रखे थे. (१) प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः. यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा.. (२) जिस विष्णु के तीन विशाल पादक्षेपों में संपूर्ण लोग समा जाते हैं, उस विष्णु की स्तुति लोग उसकी शक्ति के कारण उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार किसी पहाड़ पर रहने वाले लोग हिंसक, जंगली पशु की शक्ति की प्रशंसा करते हैं. (२) प्र विष्णवे शूषमेतु मन्म गिरिक्षित उरुगायाय वृष्णे. य इदं दीर्घं प्रयतं सधस्थमेको विममे त्रिभिरित्पदेभिः.. (३) पर्वत के समान ऊंचे स्थान पर रहने वाले, अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित एवं कामवर्षक ebook converter DEMO Watermarks*
विष्णु को हमारे मनोहर स्तोत्र एवं यज्ञकर्म से उत्पन्न शक्ति प्राप्त हो. उन्होंने अत्यंत विस्तृत एवं स्थिर इन तीनों को अकेले ही तीन कदम रखकर नाप लिया था. (३) यस्य त्री पूर्णा मधुना पदान्यक्षीयमाणा स्वधया मदन्ति. य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा.. (४) जिस विष्णु के मधु से पूर्ण एवं क्षीणतारहित तीन चरणों ने अन्न द्वारा मनुष्यों को प्रसन्न किया है, उन्होंने अकेले ही तीनों धातुओं, धरती, आकाश एवं समस्त लोकों को धारण किया है. (४) तदस्य प्रियमभि पाथो अश्यां नरो यत्र देवयवो मदन्ति. उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः.. (५) स्वयं को विष्णु रूप में परिवर्तित करके इच्छुक लोग विष्णु के जिस प्रिय एवं सबके द्वारा सेवनीय अविनाशी ब्रह्मलोक में तृप्ति प्राप्त करते हैं, मैं उसी लोक को प्राप्त करूं. वे सबके बंधु हैं एवं उनके स्थान पर अमृत बरसता है. (५) ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः. अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमव भाति भूरि.. (६) हे यजमान एवं यजमान पत्नी! हम तुम दोनों के उस लोक में जाने की अभिलाषा करते हैं, जहां बड़े सींगों वाली गाएं निवास करती हैं. अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित विष्णु का परम पद सभी प्रकार सुशोभित होता है. (६) सूक्त—१५५ देवता—इंद्र व विष्णु प्र वः पान्तमन्धसो धियायते महे शूराय विष्णवे चार्चत. या सानुनि पर्वतानामदाभ्या महस्तस्थतुरर्वतेव साधुना.. (१) हे अध्वर्यु लोगो! तुम स्तुति चाहने वाले, महावीर इंद्र एवं विष्णु के निमित्त पीने के योग्य सोमरस विशेष रूप से तैयार करो. वे दोनों अपराजेय, महान् एवं पर्वतों के ऊपर इस प्रकार स्थित हैं, जिस प्रकार कोई इच्छित स्थान पर पहुंचने में समर्थ घोड़े पर बैठता है. (१) त्वेषमित्था समरणं शिमीवतोरिन्द्राविष्णू सुतपा वामुरुष्यति. या मर्त्याय प्रतिधीयमानमित्कृशानोरस्तुरसनामुरुष्यथः.. (२) हे इष्टप्रद इंद्र व विष्णु! यज्ञ से बचे हुए सोमरस को पीने वाले यजमान तुम्हारे यज्ञस्थल पर तेजस्वी आगमन का आदर करते हैं. तुम दोनों यजमान के लिए यज्ञफल रूप में देने योग्य अन्न शत्रुपराजयकारी अग्नि से सदा दिलाते हो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
ता ईं वर्धन्ति मह्यस्य पौंस्यं नि मातरा नयति रेतसे भुजे. दधाति पुत्रोऽवरं परं पितुर्नाम तृतीयमधि रोचने दिवः.. (३) यजमान द्वारा दी गई सोमरस रूपी आहुतियां इंद्र की शक्ति को बढ़ाती हैं, वह सब प्राणियों को पुत्रादि उत्पादन में समर्थ करने एवं रक्षा पाने के उद्देश्य से उसी शक्ति को सबकी माता तुल्य धरती और आकाश में रखते हैं. पुत्र का नाम निम्न, पिता का उच्च और तीसरे नाती का नाम प्रकाशयुक्त आकाश में है. (३) तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसीनस्य त्रातुरवृकस्य मीळ्हुषः. यः पार्थिवानि त्रिभिरिद्विगामभिरुरु क्रमिष्टोरुगायाय जीवसे.. (४) हम सबके स्वामी, पालक, हिंसक एवं नित्य तरुण विष्णु के पराक्रमों की स्तुति करते हैं. उन्होंने तीनों लोकों की प्रशंसनीय रक्षा के लिए तीन चरण रखकर पृथ्वी आदि समस्त लोकों की परिक्रमा कर ली थी. (४) द्वे इदस्य क्रमणे स्वर्दृशोऽभिख्याय मर्त्यो भुरण्यति. तृतीयमस्य नकिरा दधर्षति वयश्चन पतयन्तः पतत्रिणः.. (५) मनुष्य विभूतियों का वर्णन करते हुए स्वर्गदर्शी विष्णु के दो चरणक्षेपों को ही प्राप्त करते हैं. उनके तीसरे पादक्षेप को मनुष्य क्या आकाश में उड़ने वाले पक्षी भी नहीं पा सकते. (५) चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्. बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम्.. (६) विष्णु ने अपनी विशेष गतियों द्वारा काल के चौरासी भागों को चक्र के समान गोलाकार में घुमा रखा है. वह विशाल शरीर वाले, विविध प्राणियों को विभक्त करने वाले, स्तुतिसंपन्न, तरुण एवं कौमार्यरहित हैं. वे युद्ध में गमन करते हैं. (६) सूक्त—१५६ देवता—विष्णु भवा मित्रो न शेव्यो घृतासुतिर्विभूतद्युम्न एवया उ सप्रथाः. अधा ते विष्णो विदुषा चिदर्ध्यः स्तोमो यज्ञश्च राध्यो हविष्मता.. (१) हे विष्णु! तुम मित्र के समान सुखकर्त्ता, घृत की आहुति के पात्र, अधिक अन्नयुक्त, रक्षणकर्त्ता एवं सबसे अधिक स्वस्थ हो, इसलिए तुम्हारी स्तुतियां ज्ञानी यजमानों द्वारा बार- बार वृद्धि करने योग्य हैं. तुम्हारा यज्ञ हव्यसंपन्न यजमान द्वारा पूर्ण करने योग्य है. (१) यः पूर्वाय वेधसे नवीयसे सुमज्जानये विष्णवे ददाशति. ebook converter DEMO Watermarks*
यो जातमस्य महतो महि ब्रवत्सेदु श्रवोभिर्युज्यं चिदभ्यसत्.. (२) जो लोग नित्य, जगत्कर्त्ता, नवीनतम तथा स्वयं उत्पन्न विष्णु को हव्य देते हैं एवं जो इस महापुरुष के पूज्य जन्म वृत्तांत को कहते हैं, वे ही इनका सामीप्य पाते हैं. (२) तमु स्तोतारः पूर्व्यं यथा विद ऋतस्य गर्भं जनुषा पिपर्तन. आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन महस्ते विष्णो सुमतिं भजामहे.. (३) हे स्तोताओ! प्राचीन एवं यज्ञ के गर्भ रूप विष्णु को तुम जैसा जानते हो, उन्हें उसी प्रकार स्वयं प्रसन्न करो एवं उनका नाम जानकर भली-भांति कीर्तन करो. हे महान् विष्णु! हम तुम्हारी स्तुति की सेवा करते हैं. (३) तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः. दाधार दक्षमूत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णुः सखिवाँ अपोर्णुते.. (४) तेजस्वी वरुण एवं अश्विनीकुमार ऋत्विजों वाले यजमान के यज्ञरूप विष्णु की सेवा करते हैं. यजमान आदि की मित्रता से युक्त विष्णु उत्तम एवं स्वर्गोत्पादक बल को धारण करते हैं एवं मेघ को बरसने के लिए आवरणरहित करते हैं. (४) आ यो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः. वेधा अजिन्वत्त्रिषधस्थ आर्यममृतस्य भागे यजमानमाभजत्.. (५) जो विष्णु दिव्य एवं शोभन फलदाताओं में श्रेष्ठ होते हुए उत्तम कर्म करने वाले इंद्र के साथ मिलकर यज्ञ की सहायता करने के लिए आते हैं, वे ही अभिमत फलदाता एवं तीनों लोकों में स्थित विष्णु आने वाले यजमान को प्रसन्न करते थे एवं उसे यज्ञ का भाग देते थे. (५) सूक्त—१५७ देवता—अश्विनीकुमार अबोध्यग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यु१षाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा. आयुक्षातामश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत्पृथक्.. (१) वेदीरूपी धरती पर अग्नि जगे, सूर्य का उदय हुआ और महती उषा अपने तेज से प्राणियों को प्रसन्न करती हुई अंधकार का विनाश करने लगी. हे अश्विनीकुमारो! यज्ञप्रदेश में आने के लिए अपना रथ तैयार करो. सविता देवता समस्त संसार को अपने-अपने काम में लगावें. (१) यद्युञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम्. अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विकुमारो! तुम अपने वर्षाकारक रथ को तैयार करते समय मधुर जल द्वारा हमारी शक्ति बढ़ाओ, हमारी प्रजाओं का तेज बढ़ाओ एवं वीरों के संग्राम में हमें धन दो. (२) अर्वाङ् त्रिचक्रो मधुवाहनो रथो जीराश्वो अश्विनोर्यातु सुष्टुतः. त्रिवन्धुरो मघवा उविश्वसौभगः शं न आ वक्षद् द्विपदे चतुष्पदे.. (३) अश्विनीकुमारो का तीन पहियों वाला मधुवाहक, गतिशील अश्वों से युक्त, प्रशंसित, तीन बंधनों वाला, धनसंपन्न एवं समस्त सौभाग्यों से युक्त रथ हमारे दो पैरो वाले पुत्रादि और चार पैरों वाले पशुओं को सुख प्रदान करे. (३) आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवं मधुमत्या नः कशया मिमिक्षतम्. प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों हमें पर्याप्त बल दो. अपनी मधु वाली कशा से हमें प्रसन्न बनाओ, हमारी आयु की वृद्धि करो, हमारे पापों को दूर करो, शत्रुओं का नाश करो और समस्त कार्यों में हमारे साथी बनो. (४) युवं ह गर्भं जगतीषु धत्थो युवं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः. युवमग्निं च वृषणावपश्च वनस्पतींरश्विनावैरयेथाम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम गायों एवं समस्त प्राणियों में स्थित गर्भ की रक्षा करो. हे कामवर्षको! तुम अग्नि, जल एवं वनस्पतियों को प्रेरित करो. (५) युवं ह स्थो भिषजा भेषजेभिरथो ह स्थो रथ्या३ रथ्येभिः. अथो ह क्षत्रमधि धत्थ उग्रा यो वां हविष्मान्मनसा ददाश.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम ओषधियों के ज्ञान के कारण वैद्य एवं रथ को ढोने में समर्थ अश्वों के कारण रथी हो. हे अधिक बल धारण करने वाले अश्विनीकुमारो! जो तुम्हारे लिए मन से हव्य प्रदान करे, उसकी रक्षा करो. (६) सूक्त—१५८ देवता—अश्विनीकुमार वसू रुद्रा पुरुमन्तू वृधन्ता दशस्यतं नो वृषणावभिष्टौ. दस्रा ह यद्रेक्ण औचथ्यो वां प्र यत्सस्राथे अकवाभिरूती.. (१) हे कामवर्षक, प्रजाओं को वासदाता, पापनाशक, यज्ञदाता, स्तुतियों द्वारा बढ़ते हुए एवं पूजित अश्विनीकुमारो! तुम हमें इच्छित फल दो, क्योंकि उचथ्य का पुत्र दीर्घतमा स्तुति द्वारा धन की प्रार्थना करता है एवं तुम स्तुतियां सुनकर रक्षा प्रदान करते हो. (१) को वां दाशत्सुमतये चिदस्यै वसू यद्धेथे नमसा पदे गोः. ebook converter DEMO Watermarks*
जिगृतमस्मे रेवतीः पुरन्धीः कामप्रेणेव मनसा चरन्ता.. (२) हे वासदाता अश्विनीकुमारो! तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि के अनुकूल तुम्हें कौन हव्य दे सकता है? तुम निश्चित यज्ञवेदी पर आने के लिए हमारा बुलावा सुनकर हमें पर्याप्त अन्न देने का निश्चय करके आते हो. हमें बहुत सी गाएं दो जो हमारा शरीर पुष्ट करें, रंभाती हों और दुधारू हों. तुम यजमानों की कामनाएं पूरी करने की इच्छा से घूमते हो. (२) युक्तो ह यद्वां तौग्र्याय पेरुर्वि मध्ये अर्णसो धायि पज्रः. उप वामवः शरणं गमेयं शूरो नाज्म पतयद्भिरश्वैः.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा पार पहुंचाने वाला रथ तुग्रपुत्र के उद्धार के लिए अश्वयुक्त था. तुमने उस रथ को अपनी शक्ति से समुद्र के बीच स्थापित किया. जिस प्रकार शूर व्यक्ति युद्ध जीत कर गतिशील अश्वों द्वारा अपने घर में पहुंचता है, उसी प्रकार हम तुम्हारी शरण में आए हैं. (३) उपस्तुतिरौचथ्यमुरुष्येन्मा मामिमे पतत्रिणी वि दुग्धाम्. मा मामेधो दशतयश्चितो धाक् प्र यद्वां बद्धस्त्मनि खादति क्षाम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे उद्देश्य से की गई स्तुति उचथ्य के पुत्र दीर्घतमा की दाह आदि से रक्षा करे तथा रात एवं दिन मुझे सारहीन न करे. दस बार प्रज्वलित अग्नि मुझे न जलावे. तुम्हारा यह भक्त पाशों से बंधा हुआ धरती पर लोट रहा है. (४) न मा गरन्नद्यो मातृतमा दासा यदीं सुसमुब्धमवाधुः. शिरो यदस्य त्रैतनो वितक्षत्स्वयं दास उरो अंसावपि ग्ध.. (५) माता के समान संसार का हित करने वाली नदियां मुझे न डुबावें. अनार्य दासों ने मुझे अच्छी तरह बंधनों से जकड़ कर नीचे को मुख करके गिराया है. त्रितन नामक दास ने अनेक प्रकार से मेरा सिर काटने का प्रयत्न किया था एवं सीने तथा दोनों कंधों पर भी चोट की थी. (५) दीर्घतमा मामतेयो जुजुर्वान्दशमे युगे. अपामर्थं यतीनां ब्रह्मा भवति सारथिः.. (६) ममता के पुत्र दीर्घतमा अश्विनीकुमारों के प्रभाव से दसवें युग में वृद्ध हुए थे. वे स्वर्गादि कर्मफल पाने वाली प्रजाओं के नेता एवं सारथि के समान निर्देशक हुए. (६) सूक्त—१५९ देवता—द्यावा-पृथ्वी प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऋतावृधा मही स्तुषे विदथेषु प्रचेतसा. देवेभिर्ये देवपुत्रे सुदंससेत्था धिया वार्याणि प्रभूषतः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
मैं यजमान यज्ञ के बढ़ाने वाले, विस्तृत यज्ञों में हमें सावधान करने वाले, देवपुत्रों द्वारा सेवित एवं शोभनकर्मयुक्त यजमानों वाले धरती व आकाश की विशेष रूप से स्तुति करता हूं. वे हमारे प्रति अनुग्रह बुद्धि रखते हुए उत्तम धन देते हैं. (१) उत मन्ये पितुरद्रुहो मनो मातुर्महि स्वतवस्तद्धवीमभिः. सुरेतसा पितरा भूम चक्रतुरुरु प्रजाया अमृतं वरीमभिः.. (२) मैं पुत्र के प्रति द्रोहहीन धरतीरूपी माता और आकाशरूपी पिता को आह्वान मंत्रों द्वारा अनुग्रहयुक्त मन वाला जानता हूं. ये दोनों माता-पिता अपने शोभन सामर्थ्य से यजमानों की विस्तृत रक्षा करते हुए पर्याप्त अमृत देते हैं. (२) ते सूनवः स्वपसः सुदंससो मही जज्ञुर्मातरा पूर्वचित्तये. स्थातुश्च सत्यं जगतश्च धर्मणि पुत्रस्य पाथः पदमद्वयाविनः.. (३) शोभन कर्म वाली और सुदर्शन प्रजाएं तुम्हारे द्वारा पूर्वकृत अनुग्रह को स्मरण करके तुम्हें महान् एवं माता के समान हितकारी जानती हैं. पुत्ररूप स्थावर और जंगम द्यावापृथिवी को अद्वितीय जानते हैं. तुम इनकी रक्षा का अबाध मार्ग बताओ. (३) ते मायिनो ममिरे सुप्रचेतसो जामी सयोनी मिथुना समोकसा. नव्यन्नव्यं तन्तुमा तन्वते दिवि समुद्रे अन्तः कवयः सुदीतयः.. (४) द्यावापृथ्वी सदा एक स्थान पर युगलरूप में रहने वाली ऐसी प्रजायुक्त एवं चेतनासंपन्न सगी बहिनें हैं, जिन्हें किरणें अलग-अलग करती हैं. अपने व्यापार को जानने वाली प्रकाशयुक्त रश्मियां चमकते हुए आकाश में विस्तृत होती हैं. (४) तद्राधो अद्य सवितुर्वरेण्यं वयं देवस्य प्रसवे मनामहे. अस्मभ्यं द्यावापृथिवी सुचेतुना रयिं धत्तं वसुमन्तं शतग्विनम्.. (५) हम यजमान सविता देव की अनुज्ञा से उस उत्तम धन को मांगते हैं. धरती और आकाश हमारे प्रति अनुग्रहबुद्धि के द्वारा निवास योग्य घर एवं सैकड़ों गायों के रूप में धन दें. (५) सूक्त—१६० देवता—द्यावा-पृथ्वी ते हि द्यावापृथिवी विश्वशम्भुव ऋतावरी रजसो धारयत्कवी. सुजन्मनी धिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणा सूर्यः शुचिः.. (१) शुद्ध एवं दीप्यमान सूर्य समस्त प्राणियों को सुख देने वाले, यज्ञसंपन्न, जल उत्पादन के प्रयत्नों सहित, शोभनजन्म वाले एवं अपने कार्यकुशल धरती और आकाश के बीच में अपनी विशेषताओं की रक्षा करता हुआ सदा गमन करता है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
उरुव्यचसा महिनी असश्चता पिता माता च भुवनानि रक्षतः. सुधृष्टमे वपुष्ये३ न रोदसी पिता यत्सीमभि रूपैरवासयत्.. (२) विस्तीर्ण, महान् एवं एक-दूसरे से अलग, माता एवं पितारूप धरती-आकाश समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं. अत्यंत शक्तिसंपन्न धरती-आकाश शरीरधारियों के हित के लिए चेष्टा करते हैं एवं माता-पिता के समान सबको रूपनिर्माण से अनुगृहीत करते हैं. (२) स वह्निः पुत्रः पित्रोः पवित्रवान्पुनाति धीरो भुवनानि मायया. धेनुं च पृश्निं वृषभं सुरेतसं विश्वाहा शुक्रं पयो अस्य दुक्षत.. (३) पावन, रश्मियुक्त, धीर, फल धारण करने वाले एवं अपनी बुद्धि से समस्त प्राणियों को पवित्र करने वाले सूर्य माता-पिता तुल्य धरती और आकाश के पुत्र हैं. वे धरतीरूपी शुक्लवर्ण धेनु और आकाशरूपी सामर्थ्यसंपन्न बैल को प्रकाशित करते हैं एवं आकाश से उज्ज्वल दूध दुहते हैं. (३) अयं देवानांमपसामपस्तमो यो जजान रोदसी विश्वशम्भुवा. वि यो ममे रजसी सुक्रतूययाजरेभिः स्कम्भनेभिः समानृचे.. (४) वे सूर्य देवों एवं कर्मकर्त्ताओं में अत्यंत श्रेष्ठ हैं. उन्होंने प्राणियों को सभी प्रकार से सुख देने वाले धरती और आकाश को उत्पन्न एवं शोभन कर्म की इच्छा से दोनों को विभक्त करके मजबूत खूंटों द्वारा स्थिर किया है. (४) ते नो गृणाने महिनी महि श्रवः क्षत्रं द्यावापृथिवी धासथो बृहत्. येनाभि कृष्टीस्ततनाम विश्वहा पनाय्यमोजो अस्मे समिन्वताम्.. (५) हमारे द्वारा जिन धरती और आकाश की स्तुति की जाती है, वे महान् हैं एवं हमें सर्वत्र प्रसिद्ध अन्न और यश देते हैं. इन्हीं के बल पर हमने पुत्र आदि प्रजाओं का विस्तार किया है. तुम हमें प्रशंसायोग्य शक्ति प्रदान करो. (५) सूक्त—१६१ देवता—ऋभु किमु श्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन्किमीयते दूत्यं१ कद्यदूचिम. न निन्दिम चमसं यो महाकुलोऽग्ने भ्रातर्द्रुण इद्भूतिमुदिम.. (१) ऋभुओं ने अग्नि को देखकर आपस में कहा—"जो हमारे सामने आया है, यह हमसे अवस्था में बड़ा है या छोटा? क्या यह देवों का दूत बनकर आया है? इसे किस प्रकार निश्चित करें?" इसके पश्चात् वे अग्नि से बोले—"भ्राता अग्नि! हम चमस की निंदा नहीं करेंगे, क्योंकि यह महाकुल में उत्पन्न हुआ है. लकड़ी के बने इस चमस की प्राप्ति का हम वर्णन करेंगे." (१) ebook converter DEMO Watermarks*
एकं चमसं चतुरः कृणोतन तद्भो देवा अब्रुवन्तद्ध आगमम्. सौधन्वना यद्येवा करिष्यथ साकं देवैर्यज्ञियासो भविष्यथ.. (२) इस पर अग्नि ने कहा—"सुधन्वा के पुत्र ऋभुओ! एक चमस के चार भाग कर लो, यह प्रेरणा देकर मुझे देवों ने तुम्हारे समीप भेजा है. मैं उनकी बात तुम्हें बताने आया हूं. यदि तुम मेरी बताई हुई बात करोगे तो तुम देवों के साथ अंश प्राप्त करोगे.” (२) अग्निं दूतं प्रति यदब्रवीतनाश्वः कत्वर्यो रथ उतेह कत्वर्यः. धेनुः कत्वर्या युवशा कत्वर्या द्वा तानि भ्रातरनु वः कृत्व्येमसि.. (३) “हे आगत अग्नि! दूत कर्म करने वाले तुमसे देवों ने जो कुछ कहा है, उसके अंतर्गत हमें अश्व एवं रथ का निर्माण करना है, चर्मरहित मृत गौ को नया बनाना है एवं जीर्ण माता- पिता को युवा करना है. हे भ्राता! हम इन सब कार्यों को करके तुम्हारे सामने आएंगे.” (३) चक्रुवांस ऋभवस्तदपृच्छत क्वेदभूद्यः स्य दूतो न आजगन्. यदावाख्यच्चमसाञ्चतुरः कृतानादित्त्वष्टा ग्नास्वन्तन्यानजे.. (४) हे ऋभुओ! यह कार्य करने के पश्चात् तुमने प्रश्न किया कि जो अग्नि देवों का दूत बनकर हमारे समीप आया था, वह कहां चला गया? जिस समय त्वष्टा ने चमस को चार टुकड़ों में विभक्त देखा तो स्वयं को स्त्री मानने लगा. (४) हनामैनाँ इति त्वष्टा यदब्रवीच्चमसं ये देवपानमनिन्दिषुः. अन्या नामानि कृण्वते सुते सचाँ अन्यैरेनान्कन्या३ नामभिः स्परत्.. (५) ज्यों ही त्वष्टा ने कहा कि मैं देवों के पानपात्र चमस का अपमान करने वालों का हनन करूंगा, त्यों ही सोमरस तैयार होने पर वे स्वयं को होता, अध्वर्यु आदि नामों से प्रकट करने लगे एवं उनकी माता भी उन्हें इन्हीं नामों से पुकार कर प्रसन्न होने लगी. (५) इन्द्रो हरी युयुजे अश्विना रथं बृहस्पतिर्विश्वरूपामुपाजत. ऋभुर्विभ्वा वाजो देवाँ अगच्छत स्वपसो यज्ञियं भागमैतन.. (६) इंद्र ने घोड़ों को जोड़ा, अश्विनीकुमारों ने रथ तैयार किया एवं बृहस्पति ने विश्वरूपा नाम की गौ को नवीन रथ देना स्वीकार कर लिया. इसलिए हे ऋभु, विभु एवं वाज नामक भाइयो! तुम इंद्रादि देवों के समीप जाओ. हे शोभन कर्मकर्त्ताओ! तुम लोग यज्ञभाग प्राप्त करो. (६) निश्शर्मणो गामरिणीत धीतिभिर्या जरन्ता युवशा ताकृणोतन. सौधन्वना अश्वादश्वमतक्षत युक्त्वा रथमुप देवाँ अयातन.. (७) हे सुधन्वा के पुत्रो! तुमने चर्मरहित मरी हुई गाय को अपनी बुद्धि से नया बनाया है, बूढ़े माता-पिता को युवा किया है एवं एक घोड़े से दूसरा उत्पन्न किया है, इसलिए तुम तैयारी ebook converter DEMO Watermarks*
करके इंद्रादि देवों के सामने आओ. (७) इदमूदकं पिबतेत्यब्रवीतनेदं वा घा पिबता मुञ्जनेजनम्. सौधन्वना यदि तन्नेव हर्यथ तृतीये घा सवने मादयाध्वै.. (८) हे देवो! तुमने हमसे कहा था—“हे सुधन्वा के पुत्रो! तुम इसी सोमरस रूपी जल को पिओ अथवा मूंज के तिनकों से शुद्ध किया हुआ दूसरा सोमरस पिओ. यदि तुम इन्हें पीना न चाहो तो तीसरे सवन में सोमपान से मुदित बनो.” (८) आपो भूयिष्ठा इत्येको अब्रवीदग्निर्भूयिष्ठ इत्यन्यो अब्रवीत्. वधर्यन्तीं बहुभ्यः प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसाँ अपिंशत.. (९) तीन ऋभुओं में से एक बोला—“जल ही सर्वोत्तम है.” दूसरे ने अग्नि एवं तीसरे ने धरती को उत्तम स्वीकार किया. इस प्रकार सच्ची बात कहते हुए उन्होंने चमस के चार भाग किए. (९) श्रोणामेक उदकं गामवाजति मांसमेकः पिंशति सूनयाभृतम्. आ निम्रुचः शकृदेको अपाभरत्किं स्वित्पुत्रेभ्यः पितरा उपावतुः.. (१०) ऋभुओं में से एक लाल रंग का उदक अर्थात् रक्त धरती पर रखता है, दूसरा छुरी से काटे गए मांस को रखता है एवं तीसरा उस मांस से मलमूत्र साफ करता है. माता-पिता ऋभुओं से क्या प्राप्त करते हैं? (१०) उद्वत्स्वस्मा अकृणोतना तृणं निवत्स्वपः स्वपस्यया नरः. अगोह्यस्य यदसस्तना गृहे तदद्येदमृभवो नानु गच्छथ.. (११) हे तेजस्वी एवं नेता ऋभुओ! तुम मेरु आदि ऊंचे स्थानों पर प्राणियों के लिए जौ आदि फसलें उत्पन्न करते हो एवं शोभन कर्म की इच्छा से नीचे स्थानों में जल भरते हो. तुम आदित्य मंडल में जितने समय तक रहे, अब उतने समय तक छिपकर मत रहो. (११) सम्मील्य यद्भवना पर्यसर्पत क्व स्वित्तातत्या पितरा व आसतुः. अशपत यः करस्नं व आददे यः प्राब्रवीत्प्रो तस्मा अब्रवीतन.. (१२) हे ऋभुओ! जिस समय तुम समस्त जीवों को बादलों से ढक कर चारों ओर जाते हो, उस समय संसार के पालक सूर्य और चंद्र कहां रहते हैं? जो राक्षस आदि तुम्हारा हाथ पकड़ते हैं, उनका विनाश करो. जो बलवती वाणी से तुम्हें रोकता है, उसको अधिक मात्रा में डराओ. (१२) सुषुप्वांस ऋभवस्तदपृच्छतागोह्य क इदं नो अबूबुधत्. श्वानं बस्तो बोधयितारमब्रवीत्संवत्सर इदमद्या व्यख्यत.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ऋभुओ! तुम सूर्यमंडल में सोकर सूर्य से पूछते हो—“हे आदित्य! हमारे कर्म की प्रेरणा कौन देता है?” सूर्य इसका उत्तर देते हैं—“तुम्हें जगाने वाला वायु है. वर्ष व्यतीत होने पर तुम संसार में प्रकाश फैलाओ।” (१३) दिवा यान्ति मरुतो भूम्यामग्निरयं वातो अन्तरिक्षेण याति. अद्भिर्याति वरुणः समुद्रैर्युष्माँ इच्छन्तः शवसो नपातः.. (१४) हे बल के नाती ऋभुओ! तुम्हें देखने की अभिलाषा से मरुत् स्वर्ग से, अग्नि धरती से, वायु आकाश से एवं वरुण जल से आ रहे हैं. (१४) सूक्त—१६२ देवता—अश्व मा नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतः परि ख्यन्. यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि.. (१) तुच्छ मनुष्य देवजात एवं शीघ्रगतिशाली अश्व के पराक्रमों का वर्णन कर रहे हैं. ऐसे विचारक मित्र, वरुण अर्यमा, आयु, इंद्र, ऋभुक्षा एवं वायु हमारी निंदा न करें. (१) यन्निर्णिजा रेक्णसा प्रावृतस्य रातिं गृभीतां मुखतो नयन्ति. सुप्राङजो मेम्यद्विश्वरूप इन्द्रापूष्णोः प्रियमप्येति पाथः.. (२) ऋत्विज् रूपवान एवं सोने के आभूषणों से सजे हुए घोड़े के सामने भेंट करने के उद्देश्य से बकरे को ले जाते हैं. 'में, में' करता हुआ अनेक रंग का बकरा इंद्र और पूषा का प्रिय है. वह अश्व के सामने आए. (२) एष छागः पुरो अश्वेन वाजिना पूष्णो भागो नीयते विश्वदेव्यः. अभिप्रियं यत्पुरोळाशमर्वता त्वष्टेदैनं सौश्रवसाय जिन्वति.. (३) समस्त देवों के लिए उपयोगी, पर पूषा का अंश वह बकरा शीघ्र गतिशील अश्व के सामने लाया जाता है. घोड़े के साथ इस बकरे को प्रयोग करके त्वष्टा देव के लिए स्वादिष्ट भोजन रूप पुरोडाश बनाया जाए. (३) यद्धविष्यमृतुशो देवयानं त्रिर्मानुषाः पर्यश्वं नयन्ति. अत्रा पूष्णः प्रथमो भाग एति यज्ञं देवेभ्यः प्रतिवेदयन्नजः.. (४) जब ऋत्विज् हवि के योग्य एवं देवों के प्राप्त करने के पात्र अश्व को समय-समय पर तीन बार अग्नि के चारों ओर घुमाते हैं, तब पूषा का भागरूप पहला बकरा अपनी 'में, में' से देवयज्ञ का प्रचार करता हुआ जाता है. (४) होताध्वर्युरावया अग्निमिन्धो ग्रावग्राभ उत शंस्ता सुविप्रः. ebook converter DEMO Watermarks*
तेन यज्ञेन स्वरङ्कृतेन स्विष्टेन वक्षणा आ पृणध्वम्.. (५) होता, अध्वर्यु, आवया, अग्निमिध, ग्रावाग्राम, शंस्ता एवं सुविप्र उस प्रसिद्ध एवं भली- भांति अलंकृत यज्ञ द्वारा नदियों को जल से भरें. (५) यूपव्रस्का उत ये यूपवाहाश्चषालं ये अश्वयूपाय तक्षति. ये चार्वते पचनं सम्भरन्त्युतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु.. (६) जो लोग यूप के लिए उपयोगी पेड़ काटने वाले हैं, जो यूप के निमित्त कटे हुए पेड़ को ढोने वाले हैं, जो अश्व बांधने वाले यूप में चषाल अर्थात् बांधने योग्य सिरा बनाते हैं अथवा जो घोड़े का मांस पकाने के लिए लकड़ी के बरतन तैयार करते हैं, इन सबमें मेरा संकल्प समा जाए. (६) उप प्रागात्सुसन्मेऽधायि मन्म देवानामाशा उप वीतपृष्ठः. अन्वेनं विप्रा ऋषयो मदन्ति देवानां पुष्टे चकृमा सुबन्धुम्.. (७) हमें उत्तम फल प्राप्त हो. सुडौल पीठ वाला घोड़ा यज्ञफल के रूप में देवों की आशापूर्ति हेतु आवे. हम उसे बांधेंगे. इसे देखकर मेधावी ऋत्विज् तुष्ट हों. (७) य द्वाजिनो दाम सन्दानमर्वतो या शीर्षण्या रशना रज्जुरस्य. यद्वा घास्य प्रभृतमास्ये३ तृणं सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. (८) घोड़े की गरदन में बांधी जाने वाली, पैरों में बांधी जाने वाली एवं लगाम के रूप में मुख में डाली जाने वाली रस्सी— ये सब रस्सियां एवं उसके मुंह में पड़ने वाली घास देवों को प्राप्त हो. (८) यदश्वस्य क्रविषो मक्षिकाश यद्वा स्वरौ स्वधितौ रिप्तमस्ति. यद्धस्तयोः शमितुर्यन्नखेषु सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. (९) घोड़े का जो कच्चा मांस मक्खियां खाती हैं, जो उसे काटते समय छुरी में लगा रह जाता है, अथवा काटने वाले के हाथों में लगा रह जाता है, वह भी देवों को प्राप्त हो. (९) यदूवध्यमुदरस्यापवाति य आमस्य क्रविषो गन्धो अस्ति. सुकृता तच्छमितारः कृण्वन्तूत मेधं शृतपाकं पचन्तु.. (१०) घोड़े के पेट में जो बिना पची हुई घास रह जाती है एवं पकाते समय जो कच्चे मांस का अंश बच रहता है, उसे मांस काटने वाले शुद्ध करें एवं यज्ञ के योग्य मांस देवों के निमित्त पकावें. (१०) यत्ते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं निहतस्यावधावति. ebook converter DEMO Watermarks*
मा तद्भून्मामा श्रिषन्मा तृणेषु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो रातमस्तु.. (११) हे घोड़े! आग में पकाए जाते हुए तुम्हारे गात्र से जो रस छलकता है एवं तुम्हें मारते समय जो रक्त शूल में लग जाता है, वह न धरती पर गिरे और न तिनकों में मिले. संपूर्ण की कामना करने वाले देवों को वह दिया जाए. (११) ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वं य ईमाहुः सुरभिर्निर्हारेति. ये चार्वतो मांसभिक्षामुपासत उतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु.. (१२) जो लोग घोड़े के अवयवों को पकता हुआ चारों ओर से देखते हैं एवं इस प्रकार कहते हैं—“मांस बड़ा सुगंधित है, थोड़ा हमें भी दो.” जो लोग घोड़े के मांस की भीख मांगते हैं, उनकी अभिलाषाएं हमें प्राप्त हों. (१२) यन्नीक्षणं मांसपचन्या उखाया या पात्राणि यूष्ण आसेचनानि. ऊष्मण्यापिधाना चरूणामङ्काः सूनाः परि भूषन्त्यश्वम्.. (१३) मांस पकाने वाले पात्र से रस लेकर जिस पात्र द्वारा परीक्षा की जाती है, जो पात्र उबले हुए मांस का रस सुरक्षित रखते हैं, जो पात्र भाप रोकने एवं मांस से भरे पात्र को ढकने के काम में लाए जाते हैं, वे वेतस की शाखाएं, जिनसे अश्व के हृदय आदि भागों पर निशान लगाते हैं, एक छुरी जिससे चिह्नों के अनुसार मांस काटा जाता है, ये सब अश्व को सुशोभित करते हैं. (१३) निक्रमणं निषदनं विवर्तनं यच्च पड्बीशमर्वतः. यच्च पपौ यच्च घासिं जघास सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. (१४) अश्व के चलने. बैठने एवं लोटने के स्थान, अश्व के पैर बांधने के साधन, उसके पीने का जल और खाई हुई घास, ये सब देवों को प्राप्त हो. (१४) मा त्वाग्निर्ध्वनयीद्धूमगन्धिर्मोखा भ्राजन्त्यभि विक्त जघ्रिः. इष्टं वतिमभिगूर्तं वषट्कृतं तं देवासः प्रति गृभ्णन्त्यश्वम्.. (१५) हे अश्व! धुएं वाली अग्नि को देखकर तुम मत हिनहिनाओ. अधिक अग्नि के ताप के कारण मांस पकाने का पात्र न टूटे. यज्ञ के लिए अभीष्ट, हवन के लिए लाए हुए, सामने भेंट दिए जाने के लिए तैयार एवं वषट्कार द्वारा सुशोभित घोड़े को देवगण स्वीकार करें. (१५) यदश्वाय वास उपस्तृणन्त्यधीवासं या हिरण्यान्यस्मै. सन्दानमर्वन्तं पड्बीशं प्रिया देवेष्वा यामयन्ति.. (१६) बलि के लिए नियत अश्व को ढकने के लिए जो वस्त्र फैलाया जाता है, जिन स्वर्णाभूषणों से घोड़े को सजाया जाता है एवं जिन साधनों से घोड़े के पैर एवं गर्दन बांधी ebook converter DEMO Watermarks*
जाती है, उन सब देवप्रिय वस्तुओं को ऋत्विज् देवों को दें. (१६) यत्ते सादे महसा शूकृतस्य पार्ष्ण्या वा कशया वा तुतोद. स्रुचेव ता हविषो अध्वरेषु सर्वा ता ते ब्रह्मणा सूदयामि.. (१७) हे अश्व! आते समय तुम नाक से महान् शब्द कर रहे थे. न चलने पर तुम्हें कोड़े से मारा गया. जैसे सुच के द्वारा हव्य अग्नि में डाला जाता है, उसी प्रकार उन सब व्यथाओं की मैं मंत्र द्वारा आहुति देता हूं (१७) चतुस्त्रिंशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ् क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति. अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या वि शस्त.. (१८) हे घोड़े को काटने वाले! देवों के प्रिय अश्व की दोनों बगलों की चौंतीस हड्डियों को काटने के लिए छुरी भली प्रकार चलाई जाती है. ऐसी सावधानी बरतना, जिससे अश्व का कोई अंग कट न जाए. एक-एक भाग को देखकर और नाम लेकर काटो. (१८) एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः. या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ताता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ.. (१९) इस दीप्त अश्व का प्रकाशकर्त्ता एकमात्र ऋतु ही है. रात एवं दिन उस ऋतु का नियंत्रण करने वाले हैं. हे अश्व! तुम्हारे जिन अंगों को मैं अनुकूल समय पर काटता हूं, उन्हें पिंड बनाकर मैं अग्नि में हवन करूंगा. (१९) मा त्वा तपत्प्रिय आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व१ आ तिष्ठिपत्ते. मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः.. (२०) हे अश्व! तुम्हारे देवों के समीप जाते समय तुम्हारा प्रिय शरीर तुम्हें दुःखी न करे. छुरी तेरे अंगों पर रुके नहीं. मांस ग्रहण करने का इच्छुक एवं अंगच्छेदन में अकुशल काटने वाला भिन्न-भिन्न अंगों के अतिरिक्त छुरी से शरीर को तिरछा न काटे. (२०) न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः. हरी ते युञ्जा पृषती अभूतामुपास्थाद्वाजी धुरि रासभस्य.. (२१) हे अश्व! इस प्रकार बलि दिए जाने पर न तो तुम मरते हो और न लोगों द्वारा हिंसित होते हो. तुम उत्तम मार्गों द्वारा देवों के समीप जाते हो. इंद्र के हरि नामक घोड़े, मरुत् की वाहन हिरणियां एवं अश्विनीकुमारों के रथ में जुतने वाले गधे तुम्हारे रथ में जोते जाएंगे. (२१) सुगव्यं नो वाजी स्वश्वयं पुंसः पुत्राँ उत विश्वापुषं रयिम्. अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां हविष्मान्.. (२२)