ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
प्र यात शीभमाशुभिः सन्ति कण्वेषु वो दुवः. तत्रो षु मादयाध्वै.. (१४)
हे मरुद्गणो! अपने तीव्रगामी वाहन के द्वारा यज्ञभूमि में शीघ्र आओ. बुद्धिमान्
यजमानों के द्वारा की गई सेवा से उनके प्रति तृप्त बनो. (१४)
अस्ति हि ष्मा मदाय वः स्मसि ष्मा वयमेषाम्. विश्वं चिदायुर्जीवसे.. (१५)
हे मरुद्गणो! हमारे द्वारा दिया हुआ हवि तुम्हें तृप्त करने के लिए है. हम पूर्ण आयु
जीने के लिए तुम्हारे सेवक बने हैं. (१५)
सूक्त—३८ देवता—मरुद्गण
कद्ध नूनं कधप्रियः पिता पुत्रं न हस्तयोः. दधिध्वे वृक्तबर्हिषः.. (१)
हे मरुद्गणो! प्रार्थना चाहने वाले तुम लोगों के लिए कुश बिछा दिए गए हैं. जिस प्रकार
पिता पुत्र को हाथों पर धारण करता है, क्या तुम भी हमें उसी प्रकार धारण करोगे? (१)
क्व नूनं कद्धो अर्थं गन्ता दिवो न पृथिव्याः. क्व वो गावो न रण्यन्ति.. (२)
हे मरुद्गणो! इस समय तुम कहां हो? तुम इस यज्ञ में कब आओगे? तुम यहां आकाश
से आओ, धरती से मत आना. जिस प्रकार गाएं रंभाती हैं, उसी प्रकार यजमान तुम्हें यहां
बुलाते हैं. (२)
क्व वः सुम्ना नव्यांसि मरुतः क्व सुविता. क्वो३विश्वानि सौभगा.. (३)
हे मरुद्गणो! तुम्हारी प्रजा पशुरूपी नवीन धन, मणि, मुक्ता आदि रूपी शोभन धन
और गज, अश्व आदि रूपी सौभाग्य धन कहां है? (३)
यद्द्यूं पृश्निमातरो मर्तासः स्यातने. स्तोता वो अमृतः स्यात्.. (४)
हे पृश्नि नामक धेनु के पुत्र मरुद्गण! यद्यपि तुम मरणधर्मा हो, पर तुम्हारी स्तुति करने
वाला अमर होगा. (४)
मा वो मृगो न यवसे जरिता भूदजोष्यः. पथा यमस्य गादुप.. (५)
घास के बीच में मृग जिस प्रकार सेवारहित नहीं रहता, अपितु घास खाता है, उसी
प्रकार तुम्हारी स्तुति करने वाले तुम्हारी सेवा से कभी शून्य न हों. इस प्रकार वे यमराज के
मार्ग पर नहीं जाएंगे. (५)
मो षु णः परापरा निर्ऋतिर्दुर्हणा वधीत्. पदीष्ट तृष्णया सह.. (६)
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हे मरुद्गण! अत्यंत शक्तिशाली पाप की देवी निर्ऋति का कोई विनाश नहीं कर
सकता. वह हमारा वध न करे और हमारी तृष्णा के साथ ही समाप्त हो जाए. (६)
सत्यं त्वेषा अमवन्तो धन्वञ्चिदा रुद्रियासः. मिहं कृण्वन्त्यवाताम्.. (७)
रुद्र द्वारा पालित, दीप्तिसंपन्न एवं बलशाली मरुद्गण मरुस्थल में भी वायुरहित वर्षा
करते हैं, यह बात सत्य है. (७)
वाश्रेव विद्युन्मिमाति वत्सं न माता सिषक्ति. यदेषां वृष्टिरसर्जि.. (८)
दूध भरे स्तनों वाली रंभाती हुई गाय के समान बिजली गरजती है. गाय जिस तरह
बछड़े को चाटती है, उसी प्रकार बिजली मरुद्गणों की सेवा करती है. इसी के फलस्वरूप
मरुद्गणों ने वर्षा की है. (८)
दिवा चित्तमः कृण्वन्ति पर्जन्येनोदवाहेन. यत्पृथिवीं व्युन्दन्ति.. (९)
मरुद्गण जल ढोने वाले बादलों की सहायता से दिन में भी अंधेरा कर देते हैं. वे उसी
समय धरती को सींचते हैं. (९)
अध स्वनान्मरुतां विश्वमा सद्म पार्थिवम्. अरेजिन्त प्र मानुषाः.. (१०)
मरुद्गणों के गरजने की ध्वनि से धरती पर बने सभी घर एवं उन में रहने वाले मनुष्य
कांपने लगते हैं. (१०)
मरुतो वीळुपाणिभिश्चित्रा रोधस्वतीरनु. यातेमखिद्रयामभिः.. (११)
हे मरुद्गणो! जिस प्रकार विचित्र किनारों वाली नदी बहती है, उसी प्रकार तुम अपने
शक्तिशाली हाथों की सहायता से बिना रुके हुए चलते रहो. (११)
स्थिरा वः सन्तु नेमयो रथा अश्वास एषाम्. सुसंस्कृता अभीशवः.. (१२)
हे मरुद्गणो! तुम्हारी नेमि, रथ और घोड़े शक्तिशाली हों. तुम्हारी उंगलियां सावधानी से
घोड़ों की लगाम पकड़ें. (१२)
अच्छा वदा तना गिरा जराये ब्रह्मणस्पतिम्. अग्निं मित्रं न दर्शतम्.. (१३)
हे ऋत्विजो! मंत्र के पालक मरुद्गण, अग्नि एवं दर्शनीय मित्र की प्रार्थना के लिए हमारे
सामने ऐसे मंत्रों से स्तुति करो जो उन देवताओं का स्वरूप बताने वाले हों. (१३)
मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः. गाय गायत्रमुक्थ्यम्.. (१४)
हे ऋत्विजो! अपने मुंह से स्तोत्रों की रचना करो. जिस प्रकार बादल वर्षा का विस्तार
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सूक्त—३९ देवता—मरुद्गण
करते हैं, उसी प्रकार तुम उस स्तोत्र के श्लोकों को बढ़ाओ, तुम गायत्री छंद द्वारा निर्मित
शास्त्रसम्मत स्तोत्र को पढ़ो. (१४)
वन्दस्व मारुतं गणं त्वेषं पनस्युमर्किणम्. अस्मे वृद्धा असन्निह.. (१५)
हे ऋत्विजो! प्रकाशयुक्त, स्तुतियोग्य एवं सब लोगों द्वारा अर्चित मरुद्गणों की तुम
वंदना करो, जिससे वे हमारे इस यज्ञ में वृद्धि को प्राप्त हों. (१५)
सूक्त—३९ देवता—मरुद्गण
प्र यदिस्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ.
कस्य क्रत्वा मरुतः कस्य वर्पसा कं याथ कं ह धूतयः.. (१)
हे कंपनकारी मरुद्गणो! जिस प्रकार सूर्य आकाश से अपनी तेज रोशनी धरती पर
फेंकता है, उसी प्रकार जब तुम दूर आकाश से अपनी शक्ति धरती पर डालते हो तो तुम
किस यज्ञ में किस यजमान द्वारा आकर्षित किए जाते हो तथा किस यजमान के समीप जाते
हो? (१)
स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे.
युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः.. (२)
हे मरुद्गणो! तुम्हारे आयुध शत्रु विनाश के लिए स्थिर और शत्रुओं को रोकने के लिए
दृढ़ हों. तुम्हारी शक्ति स्तुति करने योग्य हो, हमारे प्रति धोखा करने वाले शत्रुओं की शक्ति
प्रशंसनीय न हो. (२)
परा ह यत्स्थिरं हथ नरो वर्तयथा गुरु.
वि याथन वनिनः पृथिव्या व्याशाः पर्वतानाम्.. (३)
हे नेताओ! जब तुम वृक्षादि स्थिर वस्तु को तोड़ते हुए एवं पत्थर आदि भारी वस्तुओं
को हिलाते हुए चलते हो, तब पृथ्वी पर खड़े वनों के बीच से तथा पर्वतों के बगल वाले मार्ग
से चलते हो. (३)
नहि वः शत्रुर्विविदे अधि द्यवि न भूम्यां रिशादसः.
युष्माकमस्तु तविषि तना युजा रुद्रासो नू चिदाधृषे.. (४)
हे शत्रुनाशकारी! धरती और आकाश में तुम्हारा कोई शत्रु नहीं हुआ. हे रुद्रपुत्रो! तुम
सबकी सम्मिलित शक्ति शत्रुओं का दमन करने के लिए विस्तृत हो. (४)
प्र वेपयन्ति पर्वतान्वि विञ्चन्ति वनस्पतीन्.
प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वया विशा.. (५)
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मरुद्गण पर्वतों को भली प्रकार कंपित करते एवं वृक्षों को एक-दूसरे से अलग करते हैं.
हे देवो! जिस प्रकार मतवाले लोग स्वेच्छा से सब जगह जाते हैं. उसी प्रकार तुम भी प्रजाओं
के साथ सर्वत्र जाते हो. (५)
उपो रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं प्रष्टिर्वहति रोहितः.
आ वो यामाय पृथिवी चिदश्रोदबीभयन्त मानुषाः.. (६)
तुम बुंदकियों वाले हरिणों को अपने रथ में जोतते हो. लाल हरिण तुम्हारे रथ के जुए
को खींचता है. तुम्हारे आने की ध्वनि धरती और आकाश ने सुनी है तथा मनुष्य भयभीत हो
उठे हैं. (६)
आ वो मक्षू तनाय कं रुद्रा अवो वृणीमहे.
गन्ता नूनं नोऽवसा यथा पुरेत्था कण्वाय बिभ्युषे.. (७)
हे रुद्रपुत्रो! हम पुत्र-प्राप्ति के लिए तुम्हारी रक्षणशक्ति की शीघ्र प्रार्थना करते हैं. पहले
किए गए यज्ञों में हमारी रक्षा के लिए तुम जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार भयभीत एवं
बुद्धिमान् यजमान की रक्षा के लिए उनके समीप आओ. (७)
युष्मेषितो मरुतो मर्त्येषित आ यो नो अभ्व ईषते.
वि तं युयोत शवसा व्योजसा वि युष्माकाभिरूतिभिः.. (८)
हे मरुद्गणो! तुम्हारी अथवा किसी अन्य पुरुष की प्रेरणा से जो भी शत्रु हमारे सामने
आवे, तुम उसका बल और अन्न छीन लो और उससे अपनी रक्षा भी वापस कर लो. (८)
असामि हि प्रयुज्यवः कण्वं दद प्रचेतसः.
असामिभिर्मरुत आ न ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं न विद्युत:.. (९)
हे मरुद्गणो! तुम पूर्ण रूप से यज्ञपात्र एवं परम ज्ञानसंपन्न हो. तुम यजमान को धारण
करो. जिस प्रकार बिजली वर्षा लेकर आती है, उसी प्रकार तुम अपनी पूरी शक्ति से हमारी
रक्षा करने को आओ. (९)
असाम्योजो बिभृथा सुदानवोऽसामि धूतयः शवः.
ऋषिद्विषे मरुतः परिमन्यव इषुं न सृजत द्विषम्.. (१०)
हे शोभन दान करने वाले मरुतो! तुम अपनी समस्त शक्ति धारण करो. हे
कंपनकर्त्ताओं! ऋषियों से द्वेष करने वाले एवं क्रोधी शत्रु के प्रति बाण के समान अपना क्रोध
व्यक्त करो. (१०)
सूक्त—४० देवता—ब्रह्मणस्पति
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उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे.
उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! हम पर अनुग्रह करने के लिए अपने निवासस्थान से उठो. देवताओं की
इच्छा करने वाले हम तुमसे याचना करते हैं. सुंदर दान करने वाले मरुद्गण तुम्हारे समीप
जावें. हे इंद्र! तुम ब्रह्मणस्पति के सोमरस का सेवन करो. (१)
त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते.
सुवीर्यं मरुत आ स्वश्व्यं दधीत यो व आचके.. (२)
हे परम बल पालक! शत्रुओं के बीच फंसे हुए धन को प्राप्त करने के लिए मनुष्य
तुम्हारी ही स्तुति करते हैं. हे मरुद्गणो! धन का इच्छुक जो मनुष्य, ब्रह्मणस्पति सहित
तुम्हारी स्तुति करता है, वह सुंदर अश्व एवं शोभन वीर्य संपन्न धन प्राप्त करता है. (२)
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता.
अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (३)
ब्रह्मणस्पति एवं प्रिय सत्य रूपा वाग्देवी हमें प्राप्त हों. ब्रह्मणस्पति आदि देव वीर
शत्रुओं को हमसे बहुत दूर ले जावें एवं हमें मानव हितकारी तथा द्रव्यपूर्ण यज्ञों में ले जावें.
(३)
यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः.
तस्मा इळां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (४)
ऋत्विज् को उत्तम धन देने वाला यजमान अक्षय अन्न प्राप्त करता है. उस यजमान के
निमित्त हम सुवीरा इला से याचना करते हैं. वह शत्रु का नाश करती है, पर उसे कोई नहीं मार
सकता. (४)
प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्.
यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे.. (५)
ब्रह्मणस्पति होता के मुख में बैठकर निश्चय ही पवित्र मंत्र बोलते हैं. उस मंत्र में इंद्र,
वरुण, मित्र और अर्यमा देव निवास करते हैं. (५)
तमिद्द्रोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम्.
इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद्वामा वो अश्नवत्.. (६)
हे ब्रह्मणस्पति प्रभृति देवो! हम उसी इंद्र प्रतिपादक पवित्र मंत्र को बोलते हैं. हे
नेताओ! यदि आप हमारे वचनों को चाहते हैं तो सभी शोभन वचन आपको प्राप्त होंगे. (६)
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को देवयन्तमश्ववज्जनं को वृक्तबर्हिषम्
प्रप्र दाश्वान्पस्त्याभिरस्थितान्तर्वात्वक्षयं दधे.. (७)
देवों की अभिलाषा करने वाले एवं यज्ञ के निमित्त कुश तोड़ने वाले यजमान के समीप
ब्रह्मणस्पति के अतिरिक्त कौन देवता आ सकता है? हव्यदाता यजमान ऋत्विजों के साथ
भांति-भांति की संपत्तियों से युक्त घर से निकलकर यज्ञस्थल की ओर प्रस्थान कर चुके हैं.
(७)
उप क्षत्रं पृञ्चीत हन्ति राजभिर्भये चित्सुक्षितिं दधे.
नास्य वर्ता न तरुता महाधने नार्भे अस्ति वज्रिण:... (८)
ब्रह्मणस्पति अपने शरीर में शक्ति का संचय करें. वे वरुण आदि राजाओं के साथ
शत्रुओं का नाश करते हैं एवं भयानक युद्ध में भी डटे रहते हैं. वज्रधारी ब्रह्मणस्पति को प्रभूत
घर प्राप्ति के लिए होने वाले बड़े अथवा छोटे युद्ध में प्रेरित या उत्साहहीन करने वाला दूसरा
नहीं है. (८)
सूक्त—४१ देवता—वरुण आदि
यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्र अर्यमा. नू चित्य दभ्यते जन:... (१)
उत्तम ज्ञान से संपन्न वरुण, मित्र और अर्यमा देवता जिसकी रक्षा करते हैं, वह शीघ्र ही
सब शत्रुओं को मार डालता है. (१)
यं बाहुतेव पिप्रति पान्ति मर्त्यं रिष:. अरिष्ट: सर्व एधते.. (२)
वरुणादि देव जिस यजमान को अपने हाथ से धनसंपन्न करते एवं हिंसकों से बचाते हैं,
वह सबसे सुरक्षित रहकर उन्नति करता है. (२)
वि दुर्गा वि द्विषः पुरो घ्नन्ति राजान एषाम्. नयन्ति दुरिता तिर:... (३)
वरुणादि राजा अपने यजमान के सामने स्थित शत्रु का दुर्ग तोड़कर शत्रुओं का नाश
करते हैं. इसके पश्चात् वे यजमान के पापों को भी नष्ट कर देते हैं. (३)
सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते. नात्रावखादो अस्ति व:... (४)
हे आदित्यो! तुम जिस मार्ग से यज्ञ में जाते हो, वह सुगम और निष्कंटक है. इस यज्ञ में
ऐसा हवि नहीं, जिससे तुम्हें घृणा हो. (४)
यं यज्ञं नयथा नर आदित्या ऋजुना पथा. प्र वः स धीतये नशत्.. (५)
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हे नेतारूप आदित्यो! तुम सरल मार्ग से जिस यज्ञ में आते हो, उस में तुम्हें सोमरस का
उपभोग मिले. (५)
स रत्नं मर्त्यो वसु विश्वं तोकमुत त्मना. अच्छा गच्छत्यस्तृतः.. (६)
तुम्हारे द्वारा अनुगृहीत यजमान तुम्हारे सामने ही सभी रमणीय धन प्राप्त करता है.
कोई उसकी हिंसा नहीं कर सकता, अपितु वह अपने समान संतान भी प्राप्त करता है. (६)
कथा राधाम सखायः स्तोमं मित्रस्यार्यम्णः. महि प्सरो वरुणस्य.. (७)
हे ऋत्विज् मित्रो! हम मित्र, अर्यमा और वरुण के महत्त्व के अनुरूप स्तोत्र कब प्राप्त
करेंगे? (७)
मा वो घ्नन्तं मा शपन्तं प्रति वोचे देवयन्तम्. सुम्नैरिद्ध आ विवासे.. (८)
हे मित्रादि देवो! देवों की कामना करने वाले यजमान को मारने वाले एवं कटु वचन
बोलने वाले मनुष्य के विरुद्ध मैं कुछ नहीं कहता. मैं तो तुम्हें धन से तृप्त करता हूं. (८)
चतुरश्चिद्ददमानाद्विभीयादा निधातोः. न दुरुक्ताय स्पृहयेत्.. (९)
जुए के खेल में चार कौड़ियां हाथ में रखने वाले से लोग तभी तक डरते हैं, जब तक
वह उन्हें फेंक नहीं देता, उसी प्रकार यजमान दूसरे की निंदा नहीं करना चाहता, अपितु उससे
डरता है. (९)
सूक्त—४२ देवता—पूषा
सं पूषन्नध्वनस्तिर व्यंहो विमुचो नपात्. सक्ष्वा देव प्र णस्पुरः.. (१)
हे पूषा! हमें मार्ग के पार लगा दो. पाप विघ्नों का कारण है, तुम उसे नष्ट करो. हे
जलवर्षक मेघ के पुत्र! हमारे आगे चलो. (१)
यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति. अप स्म तं पथो जहि.. (२)
हे पूषा! यदि कोई आक्रमणकारी, धन अपहरण करने वाला एवं दुष्ट शत्रु हमें गलत
रास्ता दिखाता है तो उसे हमारे मार्ग से हटा दो. (२)
अप त्यं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितम्. दूरमधि सुतेरज.. (३)
तुम हमारा रास्ता रोकने वाले चोर एवं कुटिल व्यक्ति को हमारे मार्ग से दूर भगा दो. (३)
त्वं तस्य द्वयाविनोऽघशंसस्य कस्य चित्. पदाभि तिष्ठ तपुषिम्.. (४)
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हे देव! हमारे सामने और पीठ पीछे दोनों प्रकार से हमारा धन हरण करने वाले
अनिष्टसाधक चोर के परपीड़क शरीर को अपने पैरों से कुचल दो. (४)
आ तत्ते दस्र मन्तुमः पूषन्नवो वृणीमहे. येन पितॄनचोदयः.. (५)
हे ज्ञानसंपन्न एवं शत्रुनाशक पूषा! तुमने जिस रक्षाशक्ति से अंगिरा आदि पूर्वजों को
प्रेरित किया था, हम तुम्हारी उसी शक्ति की प्रार्थना करते हैं. (५)
अधा नो विश्वसौभग हिरण्यवाशीमत्तम. धनानि सुषणा कृधि.. (६)
हे सर्वसंपत्तिशाली एवं सुवर्णमय आयुधों वाले पूषा! हमारी प्रार्थना के पश्चात् हमें
भांति-भांति का धन देना. (६)
अति नः सश्चतो नय सुगा नः सुपथा कृणु. पूषन्निह क्रतुं विदः.. (७)
हमें बाधा पहुंचाने के लिए आए हुए शत्रुओं से हमें दूर ले जाओ. हमारा मार्ग सुगम और
शोभन बनाओ. हे पूषा! इस मार्ग में हमारी रक्षा का उत्तरदायित्व तुम्हारा है. (७)
अभि सूयवसं नय न नवज्वारो अध्वने. पूषन्निह क्रतुं विदः.. (८)
तुम हमें घास वाले सुंदर देश में ले जाओ. हमें मार्ग में कोई नया कष्ट न हो. हे पूषा! इस
मार्ग में हमारी रक्षा के विषय में तुम्हीं जानते हो. (८)
शग्धि पूर्धि प्र यंसि च शिशीहि प्रास्युदरम्. पूषन्निह क्रतुं विदः.. (९)
हे पूषा! हम पर अनुग्रह करके हमारे घरों को धनधान्य से भर दो, हमें अन्य इच्छित
वस्तुएं देकर परम तेजस्वी बनाओ एवं उत्तम अन्न से हमारी उदरपूर्ति करो. हे पूषा! इस मार्ग
में हमारी रक्षा का उपाय तुम्हें ही करना है. (९)
न पूषणं मेथामसि सूक्तैरभि गृणीमसि. वसूनि दस्ममीमहे.. (१०)
हम पूषा की निंदा नहीं करते, अपितु सूक्तों से उनकी स्तुति करते हैं. हम दर्शनीय पूषा
से धन की याचना करते हैं. (१०)
सूक्त—४३ देवता—रुद्र आदि
कद्रुद्राय प्रचेतसे मीळ्हुष्टमाय तव्यसे. वोचेम शन्तमं हृदे.. (१)
प्रकृष्ट ज्ञान युक्त, मनोकामना पूर्ण करने वाले, अत्यंत महान् एवं हृदय में निवास करने
वाले रुद्र को लक्ष्य करके हम कब सुखकर स्तोत्र पढ़ेंगे? (१)
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यथा नो अदितिः करत्पश्वे नृभ्यो यथा गवे. यथा तोकाय रुद्रियम्.. (२)
अदिति येन-केन प्रकारेण हमें, पशुओं को, मनुष्यों को, गायों को और हमारी संतान को
रुद्र संबंधी ओषधि प्रदान करें. (२)
यथा नो मित्रो वरुणो यथा रुद्रश्चिकेतति. यथा विश्वे सजोषसः.. (३)
मित्र, वरुण, रुद्र और परस्पर समान प्रीति रखने वाले अन्य सब देवता हमारे ऊपर कृपा
करें. (३)
गाथपतिं मेधपतिं रुद्रं जलाषभेषजम्. तच्छंयोः सुम्नमीमहे.. (४)
स्तुतिपालक, यज्ञरक्षक एवं सुखकारी ओषधियों से युक्त रुद्र के समीप हम बृहस्पतिपुत्र
शंयु के समान सुखों की याचना करते हैं. (४)
यः शुक्र इव सूर्यो हिरण्यमिव रोचते. श्रेष्ठो देवानां वसुः.. (५)
जो रुद्र सूर्य के समान दीप्तिमान् एवं सोने के समान चमकीले हैं, वे देवताओं में श्रेष्ठ
एवं उनके निवास के कारण हैं. (५)
शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये. नृभ्यो नारिभ्यो गवे.. (६)
देवगण, हमारे घोड़ों, मेष, भेड़, पुरुष, स्त्री और गायों के लिए सुलभ सुख प्रदान करें.
(६)
अस्मे सोम श्रियमधि नि धेहि शतस्य नृणाम्. महि श्रवस्तुविनृम्णम्.. (७)
हे सोमदेव! हमें सौ मनुष्यों के बराबर पर्याप्त धन तथा प्रभूत बलयुक्त एवं महान् अन्न
दो. (७)
मा नः सोम परिबाधो मारातयो जुहुरन्त. आ न इन्दो वाजे भज.. (८)
सोम के विरोधी एवं शत्रु हमारी हिंसा न करें. हे इंद्र देव! हमें अन्न दो. (८)
यास्ते प्रजा अमृतस्य परस्मिन्धामन्नृतस्य.
मूर्धा नाभा सोम वेन आभूषन्तीः सोम वेदः.. (९)
हे सोम! मरणरहित एवं उत्तम स्थान प्राप्त करने वाले तुम सब देवों के शिरोमणि
बनकर अपनी प्रजाओं की कामना करो. वह प्रजा तुम्हें सुशोभित करती है, तुम उसका ध्यान
रखो. (९)
सूक्त—४४ देवता—अग्नि आदि
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अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य.
आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः.. (१)
हे मरणरहित, सर्वभूतज्ञाता अग्नि! तुम हवि देने वाले यजमान के लिए उषा देवता के
पास से लाकर टिकने योग्य एवं विभिन्न प्रकार का धन दो. उषाकाल में जागने वाले देवों को
तुम आज यहां ले आना. (१)
जुष्टो हि दूतो असि हव्यवाहनोऽग्ने रथीरध्वराणाम्.
सजूरश्विभ्यामुषसा सुवीर्यमस्मे धेहि श्रवो बृहत्.. (२)
हे अग्नि! तुम देवताओं द्वारा सेवित दूत एवं हव्य वहन करने वाले हो. तुम यज्ञों के रथ
हो. तुम अश्विनीकुमारों तथा उषा से मिलकर हमें शोभन एवं शक्तिसंपन्न पर्याप्त धन दो. (२)
अद्या दूतं वृणीमहे वसुर्मग्निं पुरुप्रियम्.
धूमकेतुं भ्राऋजीकं व्युष्टिषु यज्ञानामध्वरश्रियम्.. (३)
हम देवताओं के दूत, निवास हेतु सबके प्रिय, धूम रूपी ध्वजा से युक्त, प्रसिद्ध प्रकाश
से सुशोभित तथा प्रातःकाल यजमान के यज्ञ का सेवन करने वाले अग्नि को वरण करते हैं.
(३)
श्रेष्ठं यविष्ठमतिथिं स्वाहुतं जुष्टं जनाय दाशुषे.
देवाँ अच्छा यातवे जातवेदसमग्निमीळे व्युष्टिषु.. (४)
मैं उषाकाल में देव समूह के अभिमुख जाने के लिए श्रेष्ठ, अतिशय युवक, नित्य, चलने
में सक्षम, सबके द्वारा बुलाए गए, हव्यदाता के प्रति प्रसन्न एवं सब प्राणियों को जानने वाले
अग्नि की स्तुति करता हूं. (४)
स्तविष्यामि त्वामहं विश्वस्यामृत भोजन.
अग्ने त्रातारममृतं मियेध्य यजिष्ठं हव्यवाहन.. (५)
हे मरणरहित, विश्वरक्षक, हव्यवाहन एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! मैं तुम्हारी स्तुति करूंगा.
(५)
सुशंसो बोधि गृणते यविष्ठ्य मधुजिह्वः स्वाहुतः.
प्रस्कण्वस्य प्रतिरन्नायुर्जीवसे नमस्या दैव्यं जनम्.. (६)
हे अतिशय युवक अग्नि! यजमान के लिए स्तुति करने वाले स्तोता के तुम्हीं स्तुति
विषय हो. तुम्हारी जिह्वाएं सुख देने वाली हैं. भली प्रकार बुलाए जाने पर तुम हमारा
अभिप्राय समझो एवं आयु बढ़ा कर प्रस्कण्व को दीर्घजीवी बनाओ. वह देवभक्त है, तुम
उसका सम्मान करो. (६)
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होतारं विश्ववेदसं सं हि त्वा विश इन्धते.
स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत्.. (७)
तुझ होम निष्पादक एवं सर्वज्ञ अग्नि को प्रजाएं भली-भांति प्रज्वलित करती हैं. हे
बहुतों द्वारा आहूत अग्नि! तुम उत्तम ज्ञान संपन्न देवों को इस यज्ञ में शीघ्र लाओ. (७)
सवितारमुषसमश्विना भगमग्निं व्युष्टिषु क्षप:.
कण्वासस्त्वा सुतसोमास इन्धते हव्यवाहं स्वध्वर.. (८)
हे शोभन यज्ञ से युक्त अग्नि! निशा समाप्ति के पश्चात् प्रभात होने पर सविता, उषा,
अश्विनीकुमार, भग आदि को यज्ञ में ले आओ. सोमरस निचोड़ने वाले मेधावी ऋत्विज् तुम्हें
प्रचंड करते हैं. (८)
पतिर्ह्यध्वराणामग्ने दूतो विशामसि.
उषर्बुध आ वह सोमपीतये देवाँ अद्य स्वर्दृश:.. (९)
हे अग्नि! तुम प्रजाओं के यज्ञपालक एवं देवताओं के दूत हो. प्रातःकाल जागकर सूर्य
के दर्शन करने वाले देवों को सोमरस पीने के लिए यहां लाओ. (९)
अग्ने पूर्वा अनूषसो विभावसो दीदेथ विश्वदर्शत:.
असि ग्रामेष्वविता पुरोहितो ऽसि यज्ञेषु मानुष:.. (१०)
हे विशिष्ट प्रकाशवान् एवं धन के स्वामी अग्नि! तुम सबके दर्शनीय हो. तुम अतीतकाल
में उषा के पश्चात् प्रकाशित होते रहे हो. तुम गायों के रक्षक, यज्ञ की वेदी के पूर्व दिशा वाले
भाग में अब भी स्थित एवं यज्ञकर्त्ताओं के हितसाधक हो. (१०)
नि त्वा यज्ञस्य साधनमग्ने होतारमृत्विजम्.
मनुष्वद्देव धीमहि प्रचेतसं जीरं दूतममर्त्यम्.. (११)
हे अग्नि! तुम यज्ञ के साधन, देवताओं का आह्वान करने वाले, ऋत्विज्, उत्तम
ज्ञानसंपन्न, शत्रुओं की आयु नष्ट करने वाले, देवदूत तथा मरणरहित हो. हम मनु के समान
तुम्हें यज्ञ में स्थापित करते हैं. (११)
यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम्.
सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः.. (१२)
हे मित्रपूजक अग्नि! जब तुम यज्ञवेदी के पूर्व भाग में स्थापित होकर देवयज्ञ में वर्तमान
रहते हुए उनका दूतकर्म करते हो, तब तुम्हारी लपटें उसी प्रकार चमकती हैं, जिस प्रकार
गरजते हुए सागर की लहरें चमकती हैं. (१२)
श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः.
आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम्.. (१३)
हे सुनने में समर्थ कानों वाले अग्नि! हमारी स्तुति सुनो. मित्र, अर्यमा तथा जो अन्य
देवता प्रातःकाल देवयज्ञ में जाते हैं, अपने साथ आने वाले अन्य हव्यवाही देवों सहित तुम
यज्ञ के निमित्त बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१३)
शृण्वन्तु स्तोमं मरुतः सुदानवोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः.
पिबतु सोमं वरुणो धृतव्रतोऽश्विभ्यामुषसा सजूः.. (१४)
शोभन फलदाता, अग्नि रूपी जिह्वा वाले एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले मरुद्गण हमारा
स्तोत्र सुनें. वे व्रत धारण करने वाले वरुण, अश्विनीकुमार एवं उषा के साथ सोमपान करें.
(१४)
सूक्त—४५ देवता—अग्नि
त्वमग्ने वसूँरिह रुद्राँ आदित्याँ उत. यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम्.. (१)
हे अग्नि! तुम इस अनुष्ठान में वसुओं, रुद्रों और आदित्यों का यजन करो. तुम शोभन
यज्ञ करने वाले, प्रजापति मनु द्वारा उत्पादित एवं जल सींचने वालों की भी अर्चना करो. (१)
श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः.
तान् रोहिदश्व गिर्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह.. (२)
हे अग्नि! विशेष बुद्धि वाले देवता हव्य देने वाले यजमान को फल देते हैं. हे रोहित अश्व
के स्वामी एवं स्तुतिपात्र अग्नि! तुम तैंतीस देवों को यहां ले आओ. (२)
प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत्.
अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम्.. (३)
हे अनेक कर्म करने वाले एवं सर्वज्ञ अग्नि! प्रियमेधा, अत्रि, विरूप और अंगिरा नामक
ऋषियों के समान प्रस्कण्व की पुकार भी सुनो. (३)
महिकेरव ऊतये प्रियमेधा अहूषत.
राजन्तमध्वराणामग्निं शुक्रेण शोचिषा.. (४)
प्रौढ़कर्मा एवं प्रिय यज्ञों से सुशोभित ऋषियों ने अपनी रक्षा के लिए यज्ञ के मध्य शुद्ध
प्रकाश द्वारा चमकने वाले अग्नि का आह्वान किया था. (४)
घृताहवन सन्त्येमा उ षु श्रुधी गिरः.
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याभिः कण्वस्य सूनवो हवन्तेऽवसे त्वा.. (५)
हे घृत द्वारा बुलाए गए एवं फलप्रद अग्नि! कण्व के पुत्र तुम्हें जिन वचनों से अपनी
रक्षा के लिए बुलाते थे, हमारे द्वारा प्रयुज्यमान उन्हीं वचनों को सुनो. (५)
त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः.
शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोळ्हवे.. (६)
हे विविध हविरूप अन्नयुक्त एवं यजमानों के प्रियकारक अग्नि! तुम्हारी चमकीली लपटें
तुम्हारे केश हैं. यजमान तुम्हें हव्य-वहन करने के लिए बुलाते हैं. (६)
नि त्वा होतारमृत्विजं दधिरे वसुवित्तमम्.
श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं विप्रा अग्ने दिविष्टिषु.. (७)
हे अग्नि देव! बुद्धिमान् लोग आह्वान करने वाले, ऋतुओं में यज्ञ संपन्न करने वाले,
विविध धन प्राप्त कराने वाले, श्रवण समर्थ कानों से युक्त एवं अत्यंत प्रसिद्ध तुमको यज्ञों में
धारण करते हैं. (७)
आ त्वा विप्रा अचुच्यवुः सुतसोमा अभि प्रयः.
बृहद्भा बिभ्रतो हविरग्ने मर्ताय दाशुषे.. (८)
हे अग्नि! सोमरस निचोड़ने वाले बुद्धिमान् ऋत्विज् हव्यदाता यजमान के लिए तुम्हें
अन्न के समीप बुलाते हैं. तुम महान् एवं तेजस्वी हो. (८)
प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य.
इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो.. (९)
हे काष्ठबल द्वारा मथित, फलदाता एवं निवास हेतु अग्नि! इस देवयज्ञ में आज
प्रातःकाल आने वाले देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों को सोमपान के लिए कुशों पर
बुलाओ. (९)
अर्वाञ्चं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः.
अयं सोमः सुदानवस्तं पात तिरो अह्न्यम्.. (१०)
हे अग्नि! अपने सामने उपस्थित देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों के समान आह्वानाें
के द्वारा यजन करो. हे शोभन दान करने वाले देवो! जो सोमरस तुम्हारे निमित्त पिछले दिन
निचोड़ा गया है, सामने उपस्थित उस सोमरस का पान करो. (१०)
सूक्त—४६ देवता—अश्विनीकुमार
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एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः. स्तुषे वामश्विना बृहत्.. (१)
यह प्रिय उषा मध्य रात्रि आदि पूर्व कालों में वर्तमान नहीं थी. यह इसी समय आकाश से आकर अंधकार मिटाती है. हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारी बहुत स्तुति करता हूं. (१)
या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम्. धिया देवा वसुविदा.. (२)
मैं दर्शनीय एवं समुद्रपुत्र अश्विनीकुमारों की स्तुति करता हूं. वे शोभन संपत्ति देते हैं और यज्ञ करने पर हमें निवासस्थान प्रदान करते हैं. (२)
वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि. यद्वां रथो विभिष्पतात्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! जिस समय तुम्हारा रथ विविध शास्त्रों द्वारा प्रशंसित स्वर्ग में घोड़ों द्वारा खींचा जाता है, उसी समय हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३)
हविषा जारो अपां पिपर्ति पपुरिर्नरा. पिता कुटस्य चर्षणिः.. (४)
हे नेता रूप अश्विनीकुमारो! दयापूर्ण स्वभाव, पालक, यज्ञकर्म के दर्शक एवं अपने ताप से जल को सुखाने वाले सविता हमारे द्वारा हव्य से देवों को प्रसन्न करें. (४)
आदारो वां मतीनां नासत्या मतवचसा. पातं सोमस्य धृष्णुया.. (५)
हे स्तुति ग्रहण करने वाले नासत्यो! बुद्धिप्रेरक एवं तीव्र मदकारक सोमरस को पिओ. (५)
या नः पीपरदश्विना ज्योतिष्मती तमस्तिरः. तामस्मे रासाथामिषम्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! हमें इस वीर्य आदि ज्योति से युक्त अन्न दो. वह अन्न दरिद्रता रूपी अंधकार को मिटाकर तृप्ति प्रदान करता है. (६)
आ नो नावा मतीनां यातं पाराय गन्तवे. युञ्जाथामश्विना रथम्.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! स्तुतियों रूपी सागर के पार जाने के लिए तुम नौका बनकर आओ एवं धरती पर आने के लिए अपने रथ में घोड़े जोड़ो. (७)
अरित्रं वां दिवस्पृथु तीर्थे सिन्धूनां रथः. धिया युयुज्र इन्दवः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! सागर तट पर स्थित तुम्हारी नौका आकाश से भी विशाल है. धरती पर गमन करने के लिए तुम्हारे पास रथ है. तुम्हारे यज्ञकर्म में सोमरस भी सम्मिलित रहता है. (८)
दिवस्कण्वास इन्दवो वसु सिन्धूनां पदे. स्वं वव्रिं कुह धित्सथः.. (९)
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हे कण्वपुत्रो! अश्विनीकुमारों से यह पूछो कि आकाश से सूर्यकिरणें उत्पन्न होती हैं एवं
वृष्टि के उत्पत्ति स्थल उसी आकाश से हमारे विकास का कारण उषाकालीन प्रकाश भी प्रकट
होता है. हे अश्विनीकुमारो! इन दोनों स्थानों में से तुम अपना रूप कहां स्थापित करना चाहते
हो? (९)
अभूदु भा उ अंशवे हिरण्यं प्रति सूर्यः. व्यख्यज्जिह्वयासितः.. (१०)
सूर्य के प्रकाश से उषाकाल में रश्मियां उत्पन्न हुई हैं. उदित हुआ सूर्य सोने के समान
बन जाता है. आकाश में सूर्य के आ जाने के कारण अग्नि काले रंग की होकर अपनी लपटों
से प्रकाशित है. (१०)
अभूद् पारमेतवे पन्था ऋतस्य साधुया. अदर्शि वि सुतिर्दिवः.. (११)
रात्रि के पार उदयाचल तक जाने के लिए सूर्य का मार्ग सुंदर बना हुआ है. आकाश को
प्रकाशित करने वाले सूर्य की दीप्ति दिखाई देती है. (११)
तत्तदिदश्विनोरवो जरिता प्रति भूषति. मदे सोमस्य पिप्रतोः.. (१२)
स्तोतागण प्रसन्नता के लिए सोमपान करने वाले अश्विनीकुमारों द्वारा की गई अपनी
रक्षा की बार-बार प्रशंसा करते हैं. (१२)
वावसाना विवस्वति सोमस्य पीत्या गिरा. मनुष्वच्छंभू आ गतम्.. (१३)
हे सुखदाता अश्विनीकुमारो! तुम सोमपान और स्तुति श्रवण करने के लिए मनु के
समान परिचारक यजमान के घर में निवास करो. (१३)
युवोरुषा अनु श्रियं परिज्मनोरुपाचरत्. ऋता वनथो अक्तुभिः.. (१४)
हे चारों ओर गमनशील अश्विनीकुमारो! तुम्हारे आगमन की शोभा का अनुसरण करती
हुई उषा आवे. तुम दोनों निशा में संपादित यज्ञ का हवि ग्रहण करो. (१४)
उभा पिबतमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम्. अविद्रियाभिरूतिभिः.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों सोमरस पिओ. इसके पश्चात् तुम अपनी प्रसिद्ध रक्षा द्वारा
हमें सुखदान करो. (१५)
सूक्त—४७ देवता—अश्विनीकुमार
अयं वां मधुमत्तमः सुतः सोम ऋतावृधा.
तमश्विना पिबतं तिरोअह्नयं धत्तं रत्नानि दाशुषे.. (१)
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हे यज्ञवर्द्धनकर्त्ता अश्विनीकुमारो! आपके सामने रखा हुआ सोमरस अत्यंत मधुर एवं
कल ही निचोड़ा गया है. इसे पान करो एवं हव्यदाता यजमान को रमणीय धन दो. (१)
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना.
कण्वासो वां ब्रह्म कृण्वन्त्यध्वरे तेषां सु शृणुतं हवम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने त्रिविध बंधन काष्ठों वाले, तीनों लोकों में गमनशील एवं
शोभन वर्ण वाले रथ से यहां आओ तथा कण्वपुत्रों द्वारा तुम्हारे लिए किए जा रहे स्तुति पाठ
को आदरपूर्वक सुनो. (२)
अश्विना मधुमत्तमं पातं सोममृतावृधा.
अथाद्य दस्रा वसु बिभ्रता रथे दाश्वांसमुप गच्छतम्.. (३)
हे यज्ञवर्द्धनकर्त्ता अश्विनीकुमारो! अत्यंत मधुर सोमरस पिओ. इसके पश्चात् तुम रथ में
धन लेकर हविदाता यजमान के समीप आओ. (३)
त्रिषधस्थे बर्हिषि विश्ववेदसा मध्वा यज्ञं मिमिक्षतम्.
कण्वासो वां सुतसोमा अभिद्यवो युवां हवन्ते अश्विना.. (४)
हे सर्वज्ञ अश्विनीकुमारो! तीन परतों के रूप में बिछे हुए कुशों पर बैठकर मधुर रस से
इस यज्ञ को सिद्ध करने की इच्छा करो. दीप्तिसंपन्न कण्व पुत्र सोमरस निचोड़कर तुम्हें बुला
रहे हैं. (४)
याभिः कण्वमभिष्टिभिः प्रावतं युवमश्विना.
ताभिः ष्व१स्माँ अवतं शुभस्पती पातं सोममृतावृधा .. (५)
हे शोभनकर्मपालक अश्विनीकुमारो! जिस अभीष्ट रक्षण क्रिया से तुम दोनों ने कण्व की
रक्षा की थी, उसी के द्वारा हमारी भी रक्षा करो. हे यज्ञवर्धक देवो! सोमपान करो. (५)
सुदासे दस्रा वसु बिभ्रता रथे पृक्षो वहतमश्विना.
रयिं समुद्रादुत वा दिवस्पर्यस्मे धत्तं पुरुस्पृहम्.. (६)
हे दर्शनीय अश्विनीकुमारो! तुम जिस प्रकार दानशील सुदास के लिए रथ में धन एवं
अन्न भरकर लाए थे, उसी प्रकार हमें आकाश से लाकर बहुतों द्वारा वांछनीय धन दो. (६)
यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अधि तुर्वशे.
अतो रथेन सुवृता न आ गतं साकं सूर्यस्य रश्मिभिः.. (७)
हे नासत्यो! चाहे तुम दूर देश में रहो, चाहे अत्यंत समीप, पर सूर्योदय होने पर अपने
शोभन रथ पर बैठकर सूर्यकिरणों के साथ हमारे समीप आओ. (७)
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अर्वाञ्चा वां सप्तयोऽध्वरश्रियो वहन्तु सवनेदुप.
इषं पृञ्चन्ता सुकृते सुदानव आ बर्हिः सीदतं नरा.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! यज्ञसेवी सात घोड़े हमारे द्वारा अनुष्ठित तीनों सवनयज्ञों में तुम्हें ले
जावें. हे नेताओ! सुंदर दान करने वाले एवं शोभन कर्म करने वाले यजमान को अन्न देते हुए
तुम लोग कुशों पर बैठो. (८)
तेन नासत्या गतं रथेन सूर्यत्वचा.
येन शश्वदूहथुर्दाशुषे वसु मध्वः सोमस्य पीतये.. (९)
हे नासत्यो! तुमने सूर्यकिरण तुल्य तेजस्वी जिस रथ पर धन लाकर यजमान को सदा
दिया है, उसी रथ के द्वारा मधुर सोमरस पीने के लिए आओ. (९)
उक्थेभिर्वागवसे पुरूवसू अर्कैश्च नि ह्वयामहे.
शश्वत्कण्वानां सदसि प्रिये हि कं सोमं पपथुरश्विना.. (१०)
हम प्रभूत धन के स्वामी अश्विनीकुमारों को उक्थों एवं स्तोत्रों द्वारा अपने समीप बुलाते
हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुमने कण्वपुत्रों के प्रिय यज्ञ में सदा सोमपान किया है. (१०)
सूक्त—४८ देवता—उषा
सह वामेन न उषो व्युच्छा दुहितर्दिवः.
सह द्युम्नेन बृहता विभावरि राया देवि दास्वती.. (१)
हे स्वर्गपुत्री उषा! हमारे धन के साथ प्रभात करो. हे विभावरी! पर्याप्त अन्न के साथ
प्रभात करो. हे देवि! तुम दानशील होकर पशुरूपी धन के साथ प्रभात करो. (१)
अश्वावतीर्गोमतीर्विश्वसुविदो भूरि च्यवन्त वस्तवे.
उदीरय प्रति मा सूनृता उषश्चोद राधो मघोनाम्.. (२)
हे अनेक अश्व सहित, अनेक गायों से युक्त एवं समस्त संपत्ति देने वाली उषादेवी! प्रजा
को सुख देने के लिए तुम्हारे पास अत्यंत धन है. तुम मुझ सत्य भाषण कर्त्ता को बल एवं
धनवानों का धन दो. (२)
उवासोषा उच्छाच्च नु देवी जीरा रथानाम्.
ये अस्या आचरणेषु दध्रिरे समुद्रे न श्रवस्यवः.. (३)
रथों को प्रेरणा देने वाली उषादेवी प्राचीन काल में प्रभात करती थी और अब भी प्रभात
करती है. जिस प्रकार धन के इच्छुक लोग समुद्र में नाव चलाते हैं, उसी प्रकार उषा के आने
पर रथ तैयार किए जाते हैं. (३)
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उषो ये ते प्र यामेषु युञ्जते मनो दानाय सूरयः.
अत्राह तत्कण्व एषां कण्वतमो नाम गृणाति नृणाम्.. (४)
हे उषा! तुम्हारा गमन आरंभ होते ही विद्वान् लोग धन आदि के दान में दत्तचित्त हो
जाते हैं. परम मेधावी कण्व ऋषि इन दानेच्छु लोगों के नाम उषाकाल में उच्चारण करते हैं.
(४)
आ घा योषेव सूनर्युषा याति प्रभुञ्जती.
जरयन्ती वृजनं पद्बदीयत उत्पातयति पक्षिणः.. (५)
उषा घर का काम करने वाली योग्य गृहिणी के समान सबका पालन करती हुई,
गमनशाली प्राणियों को बूढ़ा बनाती हुई, पैरों वाले प्राणियों को चलाती हुई और उड़ाती हुई
आती है. (५)
वि या सृजति समनं व्य१र्थिनः पदं न वेत्योदती.
वयो नकिष्टे पत्तिवांस आसते व्युष्टौ वाजिनीवति.. (६)
तुम कर्मठ पुरुष को काम में लगाती हो और भिक्षुकों को घर छोड़ने पर विवश कर देती
हो. तुम ओस बरसाने वाली हो एवं अधिक देर नहीं ठहरती हो. हे अन्नसंपन्ना उषा! तुम्हारे
प्रभातकाल में पक्षीगण अपने घोंसलों में नहीं रह पाते. (६)
एषायुक्त परावतः सूर्यस्योदयनादधि.
शतं रथेभिः सुभगोषा इयं वि यात्यभि मानुषान्.. (७)
यह सौभाग्यशालिनी एवं रथ में घोड़े जोड़ने वाली उषा दूर सूर्य के उदय स्थान से सौ
रथों द्वारा मनुष्यों के समीप आती है. (७)
विश्वमस्या नानाम चक्षसे जगज्ज्योतिष्कृणोति सूनरी.
अप द्वेषो मघोनी दुहिता दिव उषा उच्चदप सिधः.. (८)
समस्त प्राणी इस उषा के प्रकाश को नमस्कार करते हैं, क्योंकि यह सुंदर नेत्री उषा
प्रकाश देती है और यही धनवती स्वर्गपुत्री द्वेषियों एवं शोषकों को दूर भगाती है. (८)
उष आ भाहि भानुना चन्द्रेण दुहितर्दिवः.
आवहन्ती भूर्यस्मभ्यं सौभगं व्युच्छन्ती दिविष्टिषु.. (९)
हे स्वर्गपुत्री उषा! तुम सबको प्रसन्न करने वाली ज्योति के साथ प्रकाशित होती हुई हमें
प्रतिदिन सौभाग्य दो एवं अंधकार को मिटाओ. (९)
विश्वस्य हि प्राणनं जीवनं त्वे वि यदुच्छसि सूनरि.
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सा नो रथेन बृहता विभावरि श्रुधि चित्रामघे हवम्.. (१०)
हे सुनेत्री उषा! समस्त प्राणियों की चेष्टाएं एवं जीवन तुम्हीं में वर्तमान है, क्योंकि तुम्हीं
अंधकार को मिटाती हो. हे विभावरी! विशाल रथ पर चढ़कर हमारे पास आओ. हे विचित्र
धनसंपन्न! हमारा आह्वान सुनो. (१०)
उषो वाजं हि वंस्व यश्चित्रो मानुषे जने.
तेना वह सुकृतो अध्वराँ उप ये त्वा गृणन्ति वह्नयः.. (११)
हे उषा! यजमान के पास जो विचित्र अन्न है, उसे तुम स्वीकार करो. जो यज्ञकर्त्ता
तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन यजमानों को हिंसारहित यज्ञ में ले आओ. (११)
विश्वान्देवाँ आ वह सोमपीतयेऽन्तरिक्षादुषस्त्वम्.
सास्मासु धा गोमदश्वावदुक्थ्य१मुषो वाजं सुवीर्यम्.. (१२)
हे उषा! तुम सोमपान के लिए अंतरिक्ष से सभी देवों को हमारे यज्ञस्थान में ले आओ. हे
उषा! तुम हमें अश्व एवं गायों से युक्त प्रशंसनीय एवं शक्तिसंपन्न अन्न दो. (१२)
यस्या रुशन्तो अर्चयः प्रति भद्रा अदृक्षत.
सा नो रयिं विश्ववारं सुपेशसमुषा ददातु सुग्म्यम्.. (१३)
जिस उषा का प्रकाश शत्रुओं का नाश करता हुआ कल्याण रूप में दिखाई देता है, वह
हमें सबके द्वारा वरण करने योग्य, सुंदर एवं सुखदायक अन्न प्रदान करे. (१३)
ये चिद्धि त्वामृषयः पूर्व ऊतये जुहूरेऽवसे महि.
सा नः स्तोमाँ अभि गृणीहि राधसोषः शुक्रेण शोचिषा.. (१४)
हे पूजनीय उषा! तुम्हें चिरंतन प्रसिद्ध ऋषियों ने रक्षण एवं अन्न के लिए बुलाया था.
तुम धन एवं तेज से संपन्न होकर हमारी स्तुति को स्वीकार करो. (१४)
उषो यदद्य भानुना वि द्वारावृणवो दिवः.
प्र नो यच्छतादवृकं पृथुच्छर्दिः प्र देवि गोमतीरिषः.. (१५)
हे उषा! तुमने आज प्रभात के समय आकाश के दोनों द्वारों को खोल दिया है, इसलिए
हमें हिंसकरहित एवं विस्तृत घर के साथ-साथ गायों से युक्त धन प्रदान करो. (१५)
सं नो राया बृहता विश्वपेशसा मिमिक्ष्व समिळाभिरा.
सं द्युम्नेन विश्वतुरोषो महि सं वाजैर्वाजिनीवति.. (१६)
हे उषा! हमें प्रभूत एवं अनेक रूप धन एवं गाएं दान करो. हे पूज्य उषा! हमें सब
शत्रुओं का नाश करने वाला यश दो. हे अन्न साधन की क्रिया से संपन्न उषा! हमें धन दो.
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सूक्त—४९ देवता—उषा
(१६)
सूक्त—४९ देवता—उषा
उषो भद्रेभिरा गहि दिवश्चिद्रोचनादधि.
वहन्त्वरुणप्सव उप त्वा सोमिनो गृहम्.. (१)
हे उषा! प्रकाशमान आकाश से सुंदर मार्ग द्वारा आओ. लाल रंग की गाय तुम्हें
सोमयुक्त यजमान के यज्ञ में ले जाए. (१)
सुपेशसं सुखं रथं यमध्यस्था उषस्त्वम्.
तेना सुश्रवसं जनं प्रावाद्य दुहितर्दिव:.. (२)
हे उषा! तुम जिस सुंदर एवं विस्तृत रथ पर बैठती हो, हे स्वर्गपुत्री! उसी रथ से आज
हव्यदाता यजमान के पास आओ. (२)
वयश्चित्ते पतत्रिणो द्विपच्चतुष्पदार्जुन.
उष: प्रारन्नृतूँरनु दिवो अन्तेभ्यस्परि.. (३)
हे शुभ्र वर्ण वाली उषा! तुम्हारा आगमन देखकर दो पैरों वाले मनुष्य, चार पैरों वाले
पशु एवं पंखों वाले पक्षी अपने-अपने व्यापार में लग जाते हैं. (३)
व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम्.
तां त्वामुषर्वसूयवो गीर्भि: कण्वा अहूषत.. (४)
हे उषा! तुम अंधकार का नाश करती हुई अपने तेज से सारे जगत् को प्रकाशित करो.
धन चाहने वाले कण्वपुत्रों ने स्तुति वचनों से तुम्हारी प्रशंसा की है. (४)
सूक्त—५० देवता—सूर्य
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (१)
सूर्य के घोड़े सब प्राणियों को जानने वाले हैं, वे प्रकाशयुक्त सूर्य को इसलिए ऊपर ले
जाते हैं कि सारा संसार उन्हें देख सके. (१)
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (२)
सबको प्रकाशित करने वाले सूर्य का आगमन देखकर नक्षत्र रात्रिसहित इस प्रकार भाग
जाते हैं, जिस प्रकार चोर भागते हैं. (२)
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