सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
'निषेक अध्याय : १९७
सिंह राशि में मघा, पूर्वा फा० पुरे और उ० फा० का १ चरण, मिलकर होता है
यहाँ मघा गत होकर पूर्वा फाल्गुनी के तीसरे चरण में १ घ० १७ पछ भुक्ति परः पंचम
सें समय मिलने पर जन्म होगा ।
आधान लग्न से जन्मपद ज्ञान या जन्म समय से आधान समय जानना
जन्ममास + ४ इस प्रकार अंक जोड़ने से गभं
„ तिथि+३ मास आदि निकल आता है 1 यदि लग्न
„ नक्षत्र+१० में संदेह हो तब इस प्रकार विचारना ।
„ S+"
„ वार+ ३
आधान-लग्न से पंचम या नवम लग्न में जन्म होता है ।
प्रसव मास
ऊपर ९ या १० मास में जन्म होना बताया है । सो प्रश्न समय में गर्भ कितने
आस का है उसक्ते जानने के लिए कई युक्त्या हैँ उनमें से एक यह भी है।
१-लग्न से, या लग्न से, जिस स्थान में शुक्र हो उससे गर्भ का मिलान मिळता
छो उतने महीने का गर्भ जानना, उससे ९-१० मास गिन लेना ।
३--दूसरा प्रकार आधान काल में लग्न चर राशि होवे तो दशम मास में, स्थिर
हो तो व्यारहवें मास में, द्विस्वभाव हो तो बारहवें मास में प्रसव जानो ।
आधान लग्न ज्ञान न होने से प्रश्न लग्न, प्रश्न नवांश में जो बलवान् हो उससे
कहना ।
साधारण प्रसव नवम या दशम मास में ही होता है अधिक समय-समय के. योग हैं
उनसे जानना ।
दिन या रात में जन्म होगा
तत्काल लग्न में वर्तमान नवांशक दिवाबली हो तो दिन में, रात्रि बली हो तो रात्रि
3 जन्म होगा ।
उदाहरण--लग्न में नवांशक वृष यह रात्रिवली है तो रात्रि में जन्म होगा । लग्न
स्पष्ट ४ रा ५९-५९९-१४" है सिंह राशि में ५०-५९-१४” देखा तो दूसरा वृष का
नवांश आया 1
लग्न सिंह ५०-५९१-१४" १ नवांश २००” रात्रिमान पूरे २९-६
एक गत नवांश __ ३-२० घडी में तो दोष १५९९-१४ कितने में ?
शेष २-३९-१४ (१५९-१४) > (२९-६)
१५९'- १४” ०० =
९ wo ç që ४६३३-२७-२४ रात्रिमात २९ घ० (४६१३-२७-२४) र ॥ २३-१० घ. प
रात्रि इष्ट
१९८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फित खण्ड
यदि दिवाबली अंश हो तो दिन का जन्म जानो । तब दिनमान का गुणा करना ।
२०० का भाग देना तो दिन का इष्ट निकलेगा ।
३ वर्ष में प्रसूति योग-- निषेक लग्न में मकर या कुम्भ के नवांश का उदय हो और
उसके सप्तम घर में शनि हो तो गभं ३ वर्ष में .प्रसव हो ।
१२ वर्ष में प्रसव--यदि निषेक लग्न में ककं राशि का नवांश हो और चन्द्रमा
सप्तम हो तो वह गर्भ १२ वषं में निमुक्त हो ।
संभोग में मनोवृत्ति--आघान या प्रश्न लग्न के सप्तम में जैसी राशि हो उसके
अनुरूप पुरुष या स्त्री की प्रकृति होती है । सप्तम में पापदृष्टि योग हो. तो कलह युक्त
या सरोष या बलात्कार हो । यदि सप्तम में शुभग्रह या योगदृष्टि हो तो प्रेम व हास
भोर विलासपूर्वक मैथुन हुआ !
संभोग प्रकार--सप्तम में जो राशि हो उसके समान संभोग कहना जैसे सप्तम में
मेष हो तो बकरे के सदृश, वृष बेल के तुल्य, इत्यादि ।
चारों केन्द्र में पापग्रह हो तो पशु के समान संभोग ।
यदि ३ केन्द्र में भी ग्रह हो तो पशु के समान संभोग ।
संभोगकर्ता कोन था जिससे गर्भ रहा--उस पुरुष के चन्द्र, को गुरु न देखता हो;
सूयं देखता हो तो स्त्री का संमोगकर्ता कोई ओहदेदार या'साहुकार हो
मंगल देखे तो--संभोगकर्ता सिपाही आदि ।
शुक्र देखे तो--संभोगकर्ता उत्तम जाति का सुन्दर ।
हानि देखे तो--संभोगकर्ता शूद्र नौकर से गर्भ सम्भव ।
इन ४ में से कोई न देखे तो गभं सम्भव नहो है ।
पुत्र होगा या कन्या
लात १) करता यदि हो गर्भ लग्न का नवांश पुरुष पुरुष राशि राशि हो हो याा वहाँ वहाँ पुरुष पुरुष ग्रह हो तो पुत्र होगा, गा.
(३) यदि गर्माघान के समय को लग्न:से ५,,७, या ९ वें घर पर शुभ ग्रह या पुरुष ग्रह
की दृष्टि हो तो पुत्र होगा । पुरुष ग्रह सूर्य और मंगल हैं ।
(३) स्त्रियों को ऋतु १६ रात्रि तक रहती. है इसमें प्रथम को ७ रात्रि छोड़ कर संभोग
करने से विषम में कन्या, सम में पुत्र पैदा हो । :
(४) बली सूर्य, गुरु आघात काल में विषम राशि विषमांश में हो तो पुत्र होगा, बली
चन्द्र शुक्र या मंगल सम राशि या संगांशको में हो तो कन्या हो 1
(५) सूर्य चन्द्र या गुर विषम राशि या विषम नवांश में होकर बली हो लग्न को छोड़ कर
शनि और कोई स्थान में हो विषम राशि में हो तो पुत्र होगा सम राशि या सम
नवांश में हो तो कन्या होगी ।
(६) शनि या राहु पुरुष राशि में हो या सुर्य गुरु बलवान् होकर पुरुष राशि में हो या
ह होकर दशम या एकादश भाव में हो तो पुत्र होगा अन्यथा कन्या
निषेक अध्याय : १९९,
(७) आघान लग्न से २-५-९ भावों पर शुभ ग्रह हो या पुरुप ग्रहको दृष्टि होया
उसमें पुरुषांश होवे तो पुत्र । इसके विपरीत दृष्टि-स्त्रीग्रह की दृष्टि हो या सम
राश्यंशक होवे तो कन्या होगी ।
(८) आघान लग्न में अष्टम स्थान और उससे अष्टम स्थान अर्थात् लग्न से तीसरे स्थान
पर सूर्य हो तो पुत्र ।
(९) आधान लग्न से त्रिकोण में सूर्य हो तो पुत्र ।
इस:आधान लग्न में शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो जातक दीर्घायु भाग्यत्रान् और सवं
विद्या का ज्ञाता हो ।
(१०) इन योगों के अभाव में लग्न को छोड़ कर विषम राशि में शनि हो--अन्यमत से
विषम भाव में शनि हो तो पुत्र ।
(११) परुष ग्रह बलवान् होकर केन्द्र में हो ठो पुत्र होगा ।
(१२) बुध लगन में या विषम राशि के नवांश में हो तो पुत्र होगा ।
(१३) बुध लग्न में या सम राशि के नवांश में हो तो कन्या होगी ।
यमल (जुड़वां) योग |
(१) गुरु, सूयं, चन्द्र, शुक्र, मंगल ये द्वि-स्वभाव राशि के नवांश में हों और उन्हें बुध
देखता हो तो यमल (दो बालक) का जन्म हो । बली ग्रह हों तो पूर्ण फल 1
(अ) यहाँ द्वि-स्वभाव के पुरषांश (३,९। में गुरु ओर सूयं हो तो दो पत्र हों।
(ब) एवं चन्द्र शुक्र और मंगल द्विस्वभाव के स्त्री नवांश ( ६,१२ ) में हों तोदो
कन्या हों ।
(स) यदि दोनों योग हों तो एक पुत्र एक कन्या हो 1
(२) लग्न चन्द्र सम राशियों में हो और पुरुष ग्रह की दृष्टि हो तो उपरोक्त फल ।
(३) बुघ मंगल गुरु लग्न समराशि में हो और बलवान् हो तो उपरोक्त फल।
(४) सूर्य चतुष्पद राशि में हो शेष ग्रह से युक्त. होकर द्विस्वमाव राशि में हो तो यमल
का जन्म ।
(५) गर्माबान कुंडली में आतृ स्थानेश और लग्नेश का योग हो तो यमल का जन्म होगा ।
(६) लग्नेश waq स्थान में हो या अन्य स्थान मे हो तो यमल हो ।
(७) आधान लग्न या उससे तीसरे में तृतीयेश हो तो यमल का जन्म हो।
(८) आधान लग्नेश और तृतीयेश लग्न में हो तो यमल हो ।
(९) आधान लग्नेश और तृतीयेश तृतीय भाव में हो तो यमल हो ।
(१०) जन्म लग्न कोई हो परन्तु चन्द्र शुक्र ये दोनों ग्रह समराशि में हों व बुध मंगल
गरु व लग्न ये ४ विषम राशि में हों तो यमल १ लड़का, १ लड़को हो 1
(११) दवि स्वभाव के अंश में स्थित सूयं और गुर यदि बुघ से दुष्ट हो तो २ पुत्र हों ।
(१२) चन्दर, शुक्र और मंगल द्विस्वभाव में हों तो २ कन्या हों।
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२०० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
यमल २ बालक
(१) बुध, मंगल, गरु और लग्न ये हिस्वमाव के हों, लग्न यदि द्विस्वभाव नवांश में
हो, बुघ स्वनवांश में होकर सम को देखता हो तो ३ यमल बालक हों ।
(२) उपरोक्त ग्रह मिथुन व घन राशियों में हों उन पर बुध की दृष्टि हो, 'यह बुध
मिथुन लग्न के नवांशक में हो तो २ पुत्र हों । अन्यमत--मिथुन व घन नवांश वाले
लग्न गत ग्रहों को मिथुनांशक बुघ देखे तो ३ पुत्र हों ।
(३) कन्या व मीनांशक वाले छग्न गत पूर्वोक्त ग्रह मंगल गुर को कन्यांश गत बुध देखे
तो ३ कन्या हों । अन्यमत--कन्या व मोन इन राशियों के ' नवांश में “उपरोक्त ग्रह
हों व. कन्या राशि:के नवांश में होकर बुध देखे तो ३ कन्या हों । :अथवा कव्या
या मिथुन नवांश गत ग्रहों व लग्न को कन्यांश गत बुघ देखे तो ३. कन्या हों 1
(४) पूर्वोक्त योगकर्ता ग्रहों को मिथुनांश गत बुध देखे तो २ पुत्र १ कन्या हो ।
अन्यमत-मंगल गुरु व लग्न ये द्विश्वमाव नवांशक में हों वं बुध मिथुनांश में दिस्वभाव अंश में होकर सबको देखता हो तो २ पुत्र, १ कन्या हो ।
(५) पूर्वोक्त ग्रह मंगल गुरु को द्विस्वभावांश में बुध बैठकर देखे तो २ कन्या, १ पुत्र हो ।
अन्यमत-पुर्वोक्त ग्रह द्विस्वभाव राशि के नवांश में हों इनको कन्या राशि के नवांश
गत बुष देखे तो २ कन्या १ पुत्र गर्भ में होगा ।
३ से अधिक संतान
लग्न घनु के अंत्य नवांश का लर्न हो ओर पूर्वोक्त योग कारक ग्रह घनु के नवांश
में हो और लरन को बलवान् बुध और शनि देखे तो गर्भ में ३ से अधिक बच्चे
होंगे । अन्यमतरूघन लग्न में घन नवांश हो पूर्वोक्त योग कारक ग्रह ९-१२ राशि
के अंशको में हों और वलवान् बुध शनि ऊग्न को देखे तो गर्भ में बहुत बच्चे हों ३
से अधिक १० तक हो सकते हैं ।
नपुंसक योग
(१ ) सम राशि में बैठा चन्द्र विषम राशि के qq को देखे परस्पर दृष्टि हो।
मतांतर--चंद्र और सुर्य की परस्पर दृष्टि हो ।
11 = या चन्द्र सम राशि में हो, विषम में सूर्य हो जिस पर चन्द्र की दृष्टि हो ।
(२) शनि और बुध में परस्पर दृष्टि हो :
मतांतर--शनि विषम राशि में हो, वुध सम राशि में हो परस्पर दृष्टि हो ।
» शनि बुष द्विस्वमाव राशि में हों ।
„विषम बुघ पर सम राशि में स्थित शनि की दृष्टि हो ।
( ३ ) विषम में शनि हो सूर्य पर दृष्टि हो या युग्म राशियों में हों ।
(४) सम राशि में चन्द्र विषम में बुघ हो मंगल की दृष्टि दोनों पर हो मंगळ कोई
राशि में हो। मवांतर-=चन्द्र सम राशि में वुध विषम में हो दोनों को परस्पर
दृष्टि हो ।
निषेक अध्याय : २०१
(५) लग्नेश बुध के साथ हो पुरुष (विषम) नवांश में शुक्र व लग्न में चन्द्र हो ।
मतांतर--शुक्र छर्न चंद्र विषम नवांशक में हों ।
मवांतर--शुक्र चन्द्र विषम नवांशक में हों ।
( ६ ) विषम चंद्र मंगल के साथ या सम राशि गत मंगल से दृष्ट हो ।
'मतांतर--छूग्न चन्द्र विषम राशि में हो मंगळ सम राशि गत होकर चंद्र को देखे ।
» ऊन और चन्द्र विषम में हो जिस पर मंगल को दृष्टि हो ।
गए लग्न सम, चन्द्र विषम दोनों विषम नवांश में हों जिन पर मंगल को दुष्ट हो ।
(७) मंगल विषम में सूर्य सम राशि में हो दोनों को परस्पर दृष्टि हो । विषम में
सूर्य हो उस पर सम राशि गत मंगल की दृष्टि हो ।
( ८) शुक्र सूर्यं लर्न बली होकर विषम नवां में हों ।
( ९ ) लग्नेश बुध हो शुम दृष्ट न हो तो भो नपुंसक उत्पन्न करता है ।
यहाँ बुध नपुंसक उत्पन्न करने वाला ग्रह है। इसी प्रकार चन्द्र और शनि भी
नपुंसक उत्पन्न करता है । क्योंकि बुध शनि नपुंसक ग्रह हैं और चन्द्र शुक्र स्त्री ग्रह हैं ।
सूर्य मंगल गुरु पुरुष ग्रह हैं । :
स्त्री पुरुष दोनों नपुसक--बुध को राशि में लग्न में षष्ठेश हो, लग्नेश भी बुध को
राशि में हो तो स्त्री पुरुष दोनों नपुंसक हों ।
मतांतर--बुत्र की राशि में जन्म हो उसमें षष्ठेश हो, वुध युक्त या दृष्ट हो तो
उपरोक्त फल केवल पुरुष नपुंसकच्यूर्वो्त योग में ऐसी राशि पर मंगल ओर qd हो तो
भी केवल पुरुष नपुंसक हो ।
यहाँ ऊपर बताये नपुंसक योग में एक बात विचारणीय है यह कुछ खटकतो है ।
एक ग्रह सम में हो दूसरा विषम में हो तो उनकी परस्पर पूर्ग दृष्टि कैसे हो सकती है ?
जैसे
शनि
सम
सम
चन्द्र,
बुघ विषम
विषम
आदि
में सूर्य
की परस्पर
को या व
थूणं दृष्टि नहों हो सकती परन्तु एक
पाद, द्विपाद या त्रिपाद दृष्टि हो सकती
है इसमें पूर्ण दृष्टि का विचार न कर
अन्य दृष्टि का विचार हो सकता है।
“इसी कारण किसो-किसी ने सम विषम
का बंधन न कर परस्पर पुर्ण दृष्टि ही होना इस योग के लिये बताया है ।
पिंडाकार जन्म
आधान लर्न में बुध या शनि हो उसपर पापग्रह की दृष्टि हो तो उस गर्म में पिडा"
कार बालक ( बेडोल ) होगा । परन्तु उस बुध शनि पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो पिडा
कार नहीं होगा । . :
२०२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
नाल वेष्टित ( नाल से लिपटा हुआ )
( १) मेष, वृष, सिंह लग्न हो, शनि मंगल से युक्त हो तो लग्न में जो राशि हो
उस राशि विभाग के समान अंग में नाल वेष्टित जन्म होगा । मंगल qa से युक्त हो
तो नाल वेष्टित न होगा ।
मतांतर--मेष वृष व सिंह लग्न हो उसमें शनि या मंगल हो तो लग्न में जिस राशि
का नवांश हो उस अङ्ग में नाल वेष्टित जन्म होगा ।
( २ ) मेष वृष सिंह वृश्चिक लग्नो में जन्म लेने वाला नाल वेष्टित पैदा होता है L:
जन्म लग्न पुरुष राशि हो तो दक्षिण पाएवं में स्त्री राशि हो तो वाम पाइवँ में नाल
लपटा समझना ।
(३) == में पापग्रह हो, बहुत पापग्रहों को दृष्टि हो या वह पापग्रह के घरमें
दया राहु,केतु से युक्त हो । २
(४ ) लग्न पापग्रहों के बोच हो, लग्न में राहु हो या लग्न में मंगल सूर्य से दृष्ट
हो या लग्न में शनि मंगल से दृष्ट हो तो राशि समान अंग में नाछ वेष्टित हो ।
(५) लग्न में १-२-५ राशि में से कोई हो उसमें मंगल व सूर्य हो या सूर्य
सहित शनि हो तो राशि के अंश समान अंग में नाल वेष्टित होगा ।
(६ ) आघान लग्न मेष हो उप्त पर पापग्रह मंगल या शनि हो उसका नवांश कर्क
हो तो छाती के ऊपर वच्चे का नाळ छाटा qr क्योंकि करे नाल-पुरुष का हृदय है
यमल नाल वेष्टित :
सूर्य चतुष्पद राशि में हो, अन्य ग्रह बलवान्, एवं हिस्वभाव रा ज्ञयों में हो तो
यमल ( २ बालक ) नाल वेष्टित होंगे ।
मपं वेष्टित ( सर्पाकार नसों से व तदाकार नाल से रिपटा ) ।
( १ ) चन्द्रमा मंगल के द्रेष्काण में हो और शुभग्रह २-११ स्थान में हों तो बालक
सप कार ( नाल वेष्टित ) होगा ।
(२) चन्द्रमा पापग्रह को राशि में छःन में हा, लग्न मंगल के द्रेष्काण में हो शुभ
ग्रह २-११ स्थान में हो तो उपरोक्त फल i .
( ३ ) अष्टमेश लग्न में राहु सहित हो तो वालक सपं वेष्टित होगा ।
(४) लग में सर्प या अण्डज द्रेऔकाण हो तथा द्रेऽकाग अपने स्वामो से युत हो.
ओर शुभ दृष्टि रहित हो तो उपरोक्त फल ।
(५) जन्म लन कोई हा चन्द्र किसा स्थान में हो या किती राशिका हो परन्तु
चन्द्र मंगल के द्रेष्काण में हो तो सर्पाकार हो। ;
(६) राहु और गुलिक किसो भो केन्द्र में हाँ या आघ्रान लगन का स्त्रामी अष्टमेश
युत केन्द्र में हो, लग्न में पाप ग्रह हो ।
( ७ ) आधान लग्न का द्रेष्काण पापयुक्त हो ।
(८) लग्न में पापग्रह हो, बहुत पाप ग्रहों से दृष्ट हो या पाप ग्रह के घर में राहु-
केतु युक्त हो ।
निषेक अध्याय : २०३
( ९.) लग्नेश पापग्रह हो, लग्नेश और चतुर्थेश एक दूसरे के घर में हों ।
(१० ) आधान लग्न में पापग्रह हों कई पापग्रहों की दृष्टि हो या पापग्रह की
राशि में राहु या केतु हो ।
उपयोग--ये सब वातें जन्म समय सत्य है या नहों यह मिलान करने के लिये हैं ।
वामन ( ठिगना )--छूग्त मकर राशि के अंत्य नवांश में हो उस पर सूर्य चन्द्र व
शनि को दृष्टि हो तो ५२ अंगुल का शरीर हो अर्थात् ठिंगना हो 1
अर्थात् लग्न मकर हो मकर का ही नवांश हो अर्थात् वर्गोत्तम हो उस पर इन ग्रहों
की दृष्टि हो ।
गूगा १--कोई क्रूर ग्रह किसी भी राशि के नवम नवांश में आ पड़े, चन्द्र वृष!का
हो उस पर मंगल व शनि की दृष्टि हो तो गूगा हो 1 इस चन्द्र पर णुभ ग्रह की दृष्टि
हो तो कुछ दिन में बोलने लगता ë ।
x—q का चन्द्र हो पापग्रह कर्क वुश्चिक मीन इन नवांशो में हो तो गूगा हो।
चन्द्र पर शुभग्रहों की दृष्टि हो तो बहुत वर्षों में बोलने लगता है । पाप दृष्टि हो तो
वाणी हीन हो ।
पंगु ( लंगड़ा )--मीन लग्न हो उस में चन्द्र हो तथा ५-१-५ राशि के अंत्यांश
गत पाप ग्रहं हो । या वृष का चन्द्र सूर्य शनि मंगल से दृष्ट हो शुभग्रह की दृष्टि न हो
तो लंगडा हो ।
३--लग्न में तीसरा द्रेष्काण हो लग्न में पापग्रह हो शनि चन्द्र सूयं देखते हों तो
पैर से लंगड़ा हों ।
कुबड़ा या लूंगड़ा--शनि मंगल ये वुध के नवांशक में हों या बुध को राशि में हों
तो कुवड़ा या लंगडा हो 1 : :
(२) ककं फा चन्द्र लग्न में हो उसे शनि मंगल देखते हों तो उपरोक्त फल ।
लूला ( हाथ रहित )--लग्न में दूसरा द्रेष्काण हो लग्न में पाप ग्रह हो शनि चन्द्र
सूयं ये लग्न को देखते हों तो ठूला हो 1
छोटा सिर--रूग्न में प्रथम द्रेष्काण हो. लग्न में पापग्रह हो शनि चन्द्र सूर्य की
दृष्टि हो तो छोटा सिर हो ।
दुगुने अंग--बुघ त्रिकोण ५-९ भाव में हो, अन्य ग्रह बल रहित हों उस बालक:
के सिर हाथ पैर दूने हों अर्थात् २ सिर ४ हाथ ४ पैर आदि हों ।
सिर बाहु पाँव रहित-=कग्न में मंगल हो उसपर सूर्य चन्द्र शनि की दृष्टि हो ।
यदि लग्न में प्रथम द्रेष्काण हो=सिर रहित हो ।
: यदि लग्न में दूसरा द्रेष्काण होच्हाथ रहित ।
यदि लग्न में तीसरा द्रेष्काण हो-पैर रहित 1
परन्तु शुभ दृष्टि न हो तब पूरा फल होता है ।
अन्य मत से छर्न में पाप ग्रह हो द्रेष्काण हो तब उक्त फल हो ।
२०४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अन्य मत--बिना हाथ--लग्न में प्रथम द्रेष्काण हो और 'दूसरा तीसरा द्रेष्काण
पाप युक्त हो । बिना पैर--छरन में दूसरा द्रेश्काण* हो और पहिला
तीसरा द्रेष्काण पाप युक्त हो । बिना सिर- लग्न में तीसरा द्रेष्काण
हो और पहिला: दूसरा द्रोष्काण पाप युक्त हो ।
अन्य मत--बिना हाथ--लग्न से पंचम में जो द्रेष्काण हो यह मंगल युक्त हो और
सूयं चन्द्र शनि से दुष्ट हो । बिना सिर--लस्त में जो द्रेष्काण हो यह
मंगल युक्त हो और सूये चन्द्र शनि से दृष्ट हो। विना पैर--नवम
स्थान में जो प्रोष्काण हो वह मंगल युक्त हो और सूर्य चंद्र शनि से
दृष्ट हो।
बहिरा—सूर्य, मंगल, शनि व चन्द्र ये ग्रह कर्क वृष्चिक मीन इन राशियों के नवांश
में हों तो बहिरा हो।
मूर्स--चंद्र और पाप ग्रह संधि में अर्थात् कर्क वृश्चिक मीन के अंत नवांशों में हों
तो मूखं हो । इनपर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तव पुरा फल होता है यदि
शुभदुष्ट हुआ तो वुरा फल नहीं होता ।
अंघा--आघान लग्न या जन्म लर्न सिंह हो जिसमें सूर्य व चंद्र हो व मंगल व
शनि की दृष्टि हो यदि लग्न में शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट न हो तो जन्म से
अंधा हो। यदि शुभाशुभ दोनों योग दृष्टि हों तो नेत्र चंचल या
कातर हो।
काना--सिंह लग्न में केवल सूर्यं हो उसपर मंगल शनि की दृष्टि हो तो=दाहिनी
आँख कानी हो । सिंह लग्न में केवल चन्द्र हो उसपर मंगल शनि को
दृष्टि हो तोच्यांई आँख कानी हो ।
लगत से ११ वें स्थान में पाप युक्त चंद्र हो=्तो बाई आँख रहित ।
लग्न से १२वें स्थान में पापयुक्त चन्द्र हो=्तो दाहिनी आँख रहित ।
इन योगों में योगकर्ता ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो सम्पूर्ण बुरा फल नहीं
होता । इन योगों में शुभ दृष्टि भी हो तो बुद-बुद लोचन अर्थात् १ आँख छोटी या आँख
पर फूली आदि हो ।
फूली-सिंह लगन में सूर्य चन्द्र हो उसपर शुभ और पाप ग्रहों को दृष्टि हो तो
आँख में फूलो हो ।
गर्भ में दांत जमे--शनि और मंगल बुध के राशि नवांशक में हों तो बालक के गभं
में ही दांत जमे ।
(१) बुध की राशि ३-६ या वुधांश एक में भी शनि मंगल हो तो.भी वही फल।
दांत उगने का मासानुसार फल
पहिले गास में दाँत जमॅस्बालक आप ही न रहे ।
दुसरे मास में दाँत जमॅस्भाई न रहे।
~
निषेक अध्याय : २०५
तीसरे मास में दात जमें=बहिन न रहे!
चौथे मास में दाँत जमें-ःमाता न रहे ।
पांचवें मास में दांत जमेंल्जेज्ठ भ्राता न रहे ।
दीर्घायु आहह sÑ पर शुभ ग्रह हो या शुभ ग्रहो की दृष्टि हो तो जातक र्घायु हो ।
स्वभाव--निषेक समय स्त्री पुरुष का मन या स्वभाव जैसा हो वैसा ही गर्भ गत
बालक होता है ।
स्त्री पुरुष को रोग--सूर्य से सप्तम था लग्न से सप्तम शनि मंगल हो तो पुरुष को,
यदि चन्द्र सप्तम हो तो स्त्री को रोग हो।
स्त्री रोग--प्ररन लग्न से चन्द्र बुध अष्टम हो तो उस स्त्री को कई प्रकार के रोग
' हों भूत देव आदि का दोष हो | गमं नहीं ठहरता, या काक वंघ्या (एक
बार गमं रह कर फिर नहीं रहता ) हो जाती हैं ।
सगभं स्त्रो का मरण
(१) छन या चन्द्र दोनों या एक भी, राशियों से या अंशो से पाप ग्रहों के बीच हो और
शुभ ग्रह न देखे तो वह गर्भिणी स्त्री गर्भ सहित नाश हो 1
(२) लर्न या चन्द्र पाप ग्रहों से युवत या दृष्ट हो शुभ युक्त या दृष्ट न हो तो भो उपरोक्त फल ।
(३) पाप ग्रह चन्द्र से चतुर्थं हो भोर अष्टम में मंगल हो तो सगभं स्त्री का नाश ।
(४) लग्न से चतुथं में पाप ग्रह हो अष्टम में मंगल हो तो सगभ स्त्री का नाण हो ।
(५) लग्न में चौथा मंगल बारहवा सूर्यं और क्षीण चन्द्र हो तो सगभं स्त्री का नाश ।
(६) लग्न में शनि हो जिसे मंगल और क्षोण चन्द्र पूर्ण दृष्टि से देखे तो सगर्भ स्त्री का
नाश ।
(७) आघान लग्न में पापग्रह बारहवें हों लग्न में जाने वाला हो व लग्न को कोई शुभ ग्रह
न देखता हो तो उपरोक्त फल ।
(८) लग्न में चन्द्र हो लग्न से दूसरे स्थान में पाप ग्रह हो व दूसरा पाप ग्रह लग्न से
ब्रारहवें स्थान में हो । लग्न में चन्द्र पाप ग्रह के नवांश में हो तो उपरोक्त फल । या
लग्न में चन्द्र पाप ग्रहसे दृष्ट हो। २-१२ भाव में पापग्रह हों तो उपरोक्त
फल हो ।
(९) आघान लग्न से बारहवें स्थान में पाप ग्रह हो, दुसरे स्थान में भी पाप ग्रह हो
तीमरे स्थान में मो चन्द्र, चतुर्थ में पाप ग्रह हो लग्न पाप ग्रहों के बीच हो लन को
शुभ ग्रह या चन्द्र न देखे तो उपरोक्त फल ।
(१०) पापग्रह वारहर्वे भावः में हो शुभ ग्रह उसे न देखे तो,उपरोक्त फल ।
(११) पाप ग्रह १, ६, ७, ८, १२, भावों में हो तो निःसंदेह पुत्र सहित माता मरे ।
(१२) शनि के साथ चन्द्र हो, सूर्य बारहवें मंगल चौथे भाव में हो तो गर्भ सहित मां
मरे ।
२०६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(१३) लग्न और चन्द्र एक साथ अलग-अलग पापग्रहों के मध्य में हों शुभ दृष्टि रहित
हों तो उपरोक्त फल ।
(१४) ६, ८, १२ भाव में क्रूर ग्रह हो इन स्थानों में शुभ ग्रह न हों पाप ग्रह के मध्य के
शुक्र या गुरु हो तो प्रसव होते हो स्त्री पुत्र दोनों मरे ।
(१५) रूरन में चन्द्र व ७, ८, स्थानों में पापग्रह हो शुभ दृष्टि न हो तो दोनों मरें ।
(१६) चन्द्र या पापग्रह उक्त शनि या राहु युक्त लग्न से अष्टम स्थान में हों तो दोनों
भरें ।
(१७) लग्न में ग्रस्त चन्द्रमा (राहु युक्त ग्रहण नक्षत्र का) पाप युक्त हो अष्टम मङ्गल
हो, तो दोनों मरे ।
(१८) (अमावस्या को राहु केतु युक्त) ग्रस्त सूर्य लग्न गत हो शनि च बुध से युक्त हो
मंगल अष्टम में हो । यदि सुयंबली हो शुभ युक्त या दृष्ट हो तो योग भंग हो जाता
है । अरिष्ट भंग के और भी योग आगे मिलेंगे ।
(१९) शनि राहु के साथ लग्न में हो मंगल. अष्टम हो तो बालक सहित माता की
मृत्यु हो।
(२०) बली सूर्य, शनि से युक्त या दृष्ट होकर, शुक्र से तीसरे भाव में हो या क्षीण चंद्र
पाप युक्त शुक्र से तीसरे घर में हो ।
(२१) चन्द्रमा पापग्रह युक्त लग्न में हो अष्टम में मंगल हो ।
(२२) सूर्य पापग्रह युक्त यः राहु केतु युक्त लग्न में हो अष्टम में मंगल हो ।
(२३) लग्न दशम स्थान में नीच का होकर पाप क्षेत्री मंगल हो.तो उपरोक्त फल ।
(२४) पापग्रह सप्तम स्थान में हो पापग्रह से दृष्ट हो शुम. दृष्टि न हो तो माता सहित
बालक का क्षप हो ।
(२५) सप्तम या अध्टम स्थान में पापग्रह हों शुभ दृष्टि न हो तो माता और बालक को
कष्ट हो ।
बालक मरे मां बचे
(१) उपरोक्त योग में चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो बालक मरे मां वचे ।
(२) यदि ६-१२ भाव में पाप ग्रह हो तो पुत्र मरे ।
(३) अष्टम में गुरु शुक्र हो तो स्त्री का पुत्र मरे ।
प्राता मरे बालक बचे
(१) १-७-८ भाव में पाप ग्रह हों तो माता मरे बालक नहीं मरे ।
माता का शस्त्र स मरण
लग्न में शनि राहु युस्त चन्द्र हो मंगल अष्टम हो यहः१९ वाँ योग बालक सहित
माता के मरण का बताया है इसमें--
(१) सूर्य भी साथ हो तो शस्त्र से मृत्यु हो ।
(२) या चंद्रमा की तरह सूयं भी हो तो शस्त्र से व गिरने से मृत्यु हो।
नषेक अध्याय : २०७
- (३) दो पाप ग्रह लर्न और सप्तम स्थान में हाँ शुभयुक्त दृष्ट न हों तो भो मासा-
'घिप नष्ट प्रभाव हो उस समय गर्भिणी की शस्त्र से मृत्यु हो । सप्तम में सूर्य लग्न में
मंगळ हो तो शस्त्र प्रहार से मुत्यु हो ।
साता की मृत्यु
(१) ४-७ भाव में पापग्रह हों उसके साथ चंद्र भो हो तो माता को मृत्यु हो ।
(२) लग्न में सूर्य चतुर्थ चन्द्र, सप्तम शनि हो ।
(३) लग्त और चन्द्रमा क्रूर ग्रह से दृष्ट हो शुभ बुघ दृष्ट न हो यदि गुरु केन्द्र में
न हो तो माता का नाश हो.
(४) चन्द्र से ४-१० में पापग्रह हो शुभदृष्टि न हो ।
(५) सूयं से १० भाव में पापग्रह हो शुभदृष्टि न हो ।
(६) लर्न में अष्टम. सूर्य या मंगल पापदृष्ट हो शुभदृष्ट न हो चन्द्र कृष्णपक्ष
काहो। |
७) जम्म दिन में हो, शुक्र से सूयं ९-५ भाव में हो, पाप दृष्टि हो शुभ दृष्टि न ह्रो ।
रात्रि में जन्म हो चन्द्र से शनि ९-५ घर में हो उसे पापग्रह देखते हों शुम दृष्टि
न हो या चन्द्रमा बलरहित हो ।
९८) चन्द्रः २ भाव में, शनि मंगल ३ भाव में हों ।
(९) चन्द्रमा, मंगल-दानि में से एक से युवत हो ।
(१०) शनि मंगल के बीच चन्द्र हो तो स्त्रो की मृत्यु ।
युरुष की मृत्यु
१-सूर्य से १२ वें शनि मंगल हों तो पुरुष को अपने मास में मृत्यु देवें !
२--सूर्य मंगल में से एक से युक्त चन्द्र हो तो पुरष की मृत्यु ।
३--शनि मंगल के बीच सूय हो तो पुरुषः की मृत्यु ।
४--चर राशि में मंगल युक्त हो, रात्रि का जन्म हो तो पिता परदेश में मरे।
५--किसी स्थान में सूर्य, शनि मंगळ से युक्त हो तो जन्म से पहिले पिता मरे ।
६--दिन के जन्म में सूर्य, रात्रि के जन्म में शुक्र मंग से दुष्ट हो ।
७--या सूयं शुक्र चर राशि में हों मंगल से युक्त व. दृष्ट हों तो परदेश में पिता
की मृत्यु ।
स्त्री पुरुष दोनों की मृत्यु
- १--श निः मंगल से युक्त सूयं चन्द्र हों या इनसे दृष्ट हों तो स्त्री पुरुष दोनों का
मरण हो । गर्भ के दिनों में इन योगों का फल होता हुः!
माता पिता सहित बालक को मृत्यु
१--चंद्रमा से ७, ८, ९ भावों में सभो पाप ग्रह हों तो उत्पन्न बालक की माता
'पिताँसहित मृत्यु हो 1
— लि oe ५
' २०८ t ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२---चंद्रमा २ पाप ग्रहों के बीच.होकर लग्न में हो और सप्तम-अष्टस स्थान में
पाप ग्रह हों तो माता पिता बहिन एवं बालक को मृत्यु हो ।
मां या बाप को अरिष्ट फल
१--गर्भ लग्न में मंगल व शनि दोनों अरिष्ट कारक हों, इन दोनों ग्रहों में जो
अधिक बली हो उस ग्रह का बल जिस महोने में अधिक हो उसी मास में वह ग्रह अरिष्ट
करेगा ।
२--आधान लग्न को सूर्य देखता हो तो पिता को बुरा ।
झाघान लग्न को शुक्र देखता हो तो माता को बुरा ।
“रात्रि के आघान लग्न को शनि देखता हो तो पिता.को बुरा ।
रात्रि के आघान लग्न को चंद्र देखता हो तो माता को बुरा 1
दिन के आधान लग्न को शनि देखता हो तो काका को बुरा ।
दिन के आधान लग्न को चन्द्र देखता हो तो मौसी को बुरा ।
रात्रि के आधान लग्न को सुयं देखता हो तो. काका को बुरा 1
रात्रि के आघान छन्न को शुक्र देखता हो तो मौसी को बुरा ।
अरिष्ट कारक गभ
आधान लग्न में अरिष्ट कारक ग्रह हों तो सम्वन्धियों को इस प्रकार अरिष्ट होगा-
१--उस लग्न से सूर्य जिस स्थान में हो वहाँ से मंगल शनि सप्तम हो तो वाप फो
रोग कारक ।
उस लग्न से चंद्र जिस स्थान में हो वहाँ से मंगल शनि सप्तम हो तो माता को रोगा
कारक ।
२--उस लग्न से मंगल शनि जिस स्थान में हों वहाँ से दुसरे, वारहयें या दोनों
स्थान में से किसी स्थान में चंद्र हो तो माता को चंद्र का अरिष्ट हो ।
उह लग्न से मंगल शनि जिस स्थान में हों वहां से दुसरे वारहवें या दोनों, स्थान
में से किसी स्थान में सूयं हो तो पिता को चंद्र का अरिष्ट हो ।
३--या उसी लग्न में सूयं चन्द्र एक ही स्थान में हों उससे २-१२ स्थान में मंगल
ब शनि हों तो वे ग्रह उस गर्भ के माता पिता दोनों को अरिष्ट कारक हूँ ।
४-स्ं चन्द्र पाप दृष्ट हों तो माता पिता को मानसी व्यथा हो 1
शुभ पाप ग्रह युक्त या दृष्ट से मिश्रित फल होगा ।
पिता को अरिष्ट
4— से सप्तम में शनि मंगळ हों उसे शुभ ग्रह न देखता हो तो पिता को अरिष्ट p
२--पाप ग्रह १२, ८ भाव में हो लग्नेश बल रहित हो तो पिता रोगी हो। '
३--पाप ग्रह ४, ८ भाव में हो लग्नेश बल रहित हो तो पिता रोगी हो 1
४--जन्म में सूयं शनि बलवान् हो सूयं को शनि या मंगल देखे तो पिता
रोगी हो।
निषेक अध्याय : २०९
पिता आदि का नाश
१--छग्त से ५, ९ भाव पाप ग्रह की राशि हों उसमें सूर्यादि ग्रह हों तो क्रमानुसार
पिता, माता, भाई, नानी, नाना और बालक का शीघ्र नाश करे |
भाई का नाश
१--जछ मन से छठे स्थान में क्रूर ग्रह हो तो भाई का नाश हो 1 किसके समान रूप होगा
. 84 बलवान् हो तो पिता के तुल्य रूप आदि होगा ।
चनः बलवान् हो तो माता के तुल्य रूप आदि होगा ।
सुख प्रसव ॥
t— एवं चन्द्रमा से केन्द्र, घन स्थान, त्रिकोण भावों में शुभ ग्रह हों और
३, ११ भाव में पाप ग्रह हों उन पर सूर्य की दृष्टि हो तो गर्भ बलवान् होकर सुख युक्त जन्मेगा ।
२--पइन लग्न में चतुर्थेश बलवान् हो तो सुख से गर्भ का प्रसव हो, कष्ट न होगा । ३--शुम ग्रह २, ४ भावों में हों तो सुख प्रसव हो ।
४--बक्लेश प्रसव योगों में शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो शुभ प्रसव हो ।
५--"लग्न शुभ ग्रह युव या दृष्ट हो तो सुल प्रसव हो ।
६--चन्द्र से ४, १० घर में शुभ ग्रह हो तो सुख प्रसव हो ।
कृष्ट प्रसव
१--चन्द्र के साथ सूर्य मंगल शनि राहु केतु हो या चन्द्र को देखें तो अति कष्ट
से डावटरों सहायता से जन्म हो । š
२--पाप ग्रह चन्द्र के साथ या लग्न से १ या ७ घर में हो तो प्रसव में अधिक
कष्ट हो |
३--५, ९, ७ भाव में पाप ग्रह हो ।
४--चंद्र पाप युक्त हो या चन्द्र से ४, ७ घर में पाप ग्रह हो ।
५--चंद्र से ४ या ८ घर में पाप ग्रह हो ।
६--चंद्र पाप युक्त ४ या ७ स्थान में हो तो प्रसव में अधिक कष्ट हो ।
कृष्ट समय
लर्न या चन्द्रमा से ४, ७ घर में पाप का अधिकार हो तो १ घडी, पाप दृष्टि हो तो
२ घड़ी, पाप योग होवे तो एक पहर तक माता को अति पीड़ा हो 1
उल्टा प्रसव
१--छग्न में शनि, बारहवां चन्द्र ओर gd नोच राशि या अंश में हो तो उल्टा
प्रसव होवे ( पहिले पैर निकलें ) 1 >
२--आघान लग्नेश दशम में हो, लग्न में राहु हो तो उल्टे ( पैर से) जन्म हो।
लग्नेश या नवांशपति ग्रह या लग्नस्थ ग्रह वक्री हो तो उल्टा प्रसव हो ।
१४
२१० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
किस प्रकार जन्म
१--शीर्पोदय लग्न में सिर से जन्म ।
२-नपृष्ठोदय लग्न में चरण से जन्म ।
३--उभयोदय <ग्न में हाथों से जन्म ।
अन्य प्रकार--शार्षोदय लग्न में जन्म समय आकाश की ओर मुंह ( उत्तान )
फर जन्मा
पृष्णोदय लग्न में जन्म समय नीचे की ओर मुंह कर. ( औँघे ) ।
उभयोदय ५ मीन ) लग्न में जन्म समय करवट होकर जन्मा, तिरछा ।
बालक किस प्रकार जन्मा
लग्न जिस प्रकार की राशि की हो जो स्वभाव उस राशि का हो उसी भांवि जन्मा
जैसे लग्न मेष-भेडों की भांति. वृष-गौ की भांति, मिथुन-मनुष्य की भांति आदि !
जन्म समय बालक का सिर
१, ५, ९ ( राशि ) में सूर्य हो तो पुव की ओर बच्चे का सिर होगा ।
२, ६, १० ( राशि । में सूर्य हो तो दक्षिण की ओर बच्चे का सिर होगा ।
३, ७, ११, ( राशि । में सूर्य हो तो परिचम की ओर बच्चे का सिर होगा ।
४, ८ १२ (राशि ) में सूर्य हो तो उत्तर की ओर बच्चे का सिर होगा 1
संस्कार हीन जन्म
१--लग्न से ९ या १० स्थान के स्वामी दृष्ट स्थान में हों, लग्नेश बलवान् हो तो
बालक के सामन्त, जातकर्मादि संस्कार नहीं होंगे ब्राह्मण पुत्र होने पर भी वह वालक
संस्कार रहित हो ।.
२--लाभ स्थान में पाप.ग्रह या पाप-राणि हो तो भी पूर्वोवत फल ।
मनुष्य जन्म १- बलवान् शुभग्रह स्वस्थान में हों तो पशुयोनि जन्म न होकर मनुष्य योनि का
जन्म समझना ।
२- गुरु शुक्र या बुध अच्छे स्थान में होने से अच्छे मनुष्य का जन्म समझना ।
R — शुभ ग्रह अपने घर में हों पाप ग्रह अपने घर में हों तो पशु जन्म नहीं
समझना ।
वियोनि जन्म
वियोनि--मनुष्य छोडकर इतर पशु पक्षी कोट जलचर पेड़ पौघे आदि समझना 1
१--प्रश्न या जन्म के समय चन्द्रमा जिसके द्वादशांश में हो उसी जाति की योनि
का जम्म समझना 1 कोई पशु आदि की कुंडली दिखा कर पूछे तब इसका विचार करना।
१--मंष द्वादशाश में चन्द्र हो तो बकरा भेड़ आदि का जन्म ।
२-वृष द्वादशांश में चन्द्र हो तो गो बैल भेस आदि का जन्म 1
३--कक ढादशांश में चन्द्र हो तो केकडा कछुवा आदि का जन्म 1
४-- सिंह द्वादशांश में चन्द्र हो तो सिंह मृग कुत्ता बिल्ली आदि का जन्म |
निषेक अध्याय : २११
५--वृश्चिक द्वादशांश में चन्द्र हो तो सपं विच्छू आदि का जन्म ।
६--घन उत्तरार्द्ध द्वादशांश में चन्द्र हो तो मेढ़क, छिपकली आदि का जन्म ।
७--मीन द्वादशांश में चन्द्र हो ता मछली आदि का जन्म 1
जब कुंडली में वियोनि योग दीख पड़े तब उपरोक्त बताना 1
अन्य योग-पशु जन्म का
१--पाप ग्रह बली, शुभ ग्रह निर्बल, नपुंसक ग्रह ( बुध, शनि ) केन्द्र में हो।
२--पाप ग्रह बली, शुभ ग्रह निबेळ लर्न को नपुंसक ग्रह देखे ।
;— a कूर द्रेष्काण में हो शुभ प्रह Fade लग्न चंद्र पर नपुंसक ग्रह की दृष्टि हो ।
४--पाप ग्रह बली एवं नवांश में शुभ ग्रह निर्बल हो दूसरों के नवांश में हो ।
५--पाप ग्रह बली स्वगृहो हो, शुभ ग्रह शत्रु राशि आदि में, लग्न में ' चतुष्पद .
-राशि हो । '
६--लग्न द्विस्वभाव राशि पक्षी द्रेष्काण में बली पाप ग्रह की दृष्टि हो जो चर
नवांज या वुघ के नवांश में हो । :
७--लग्नेश चतुर्येश परस्पर राशियों में हों या लग्नेश चतुर्थेश राहु केतु युक्त हो ।
८--पाप ग्रह बली शुभ ग्रह निर्बल लंग्नेश.मोर चतुर्थेश के साथ हो और एक
दूसरे के स्थान में हो इसमें राहु केतु हों, केन्द्र में नपुंसक ग्रह हो ।
q— < लग्न में पक्षी द्रेष्काण हो उसमें बुघ का नवांश हो या चर लग्न में बली
पाप ग्रह की दृष्टि हो ।
१०--उदित नवांश बुध का हो जिसमें चर द्रेष्काण हो पाप दृष्टि हो शुभ
दृष्टि न हो ।
वियोनि जन्म-अन्यमत
चतुष्पद जन्म--चतुर्थेश लग्न में लर्नेश चतुर्थ में और ग्रहों से दृष्ट युक्त हो ।
बकरा बकरो--उपरोक्त योग में राहु केतु से युक्त या दृष्ट हो ।
गो--गुर शुक्र और चन्द्र के योग या दृष्टि से ।
महिषी--शनि युक्त या दृष्ट होने से ।
अन्य पशु--अन्य पाप ग्रह युत या दृष्ट हो 1 ५ '
बिल्ली सुअर बंदर आदि-<दितीय या सप्तम में पंचमेश या चतुर्थेश हो, पाप
या दृष्ट हो, पुरुष ग्रह हो तो बंदर सुअर बिल्ली आदि का जन्म । _
पक्षी का जन्म
पक्षी द्रेकाण मिंथुनका सिंह का | तुला का | कुंभ का
दूसरा पहिला दुसरा पहिला
२१२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१-ऊम्न में पक्षी द्रेष्काण हो तो पक्षी का जन्म । इसके २ भेद हँ जल और स्थल
के पक्षी ।
२--लग्न में चर राशि का नवांश हो बलवान् ग्रह से युक्त या दृष्ट हो शनि से
युत दृष्ट हो तो स्थळ पक्षी, चंद्र से युक्त हो तो जल पक्षी जानना ।
३--बुघ का नवांश लग्न में हो उसमें बली ग्रह हो और शनि से युत दृष्ट हो तो
स्थळ पक्षी हो । यदि चंद्र से युक्त दृष्ट हो तो जल पक्षी जानना अर्थात् शनि के योग या
दृष्टि से स्थल,के, चन्द्र के योग या दृष्टि से:जल पक्षी का. इन योगों में विचार करना ।
वृक्ष जन्म
( १) छन, चन्द्रमा, गुरु या सूर्य निर्बल हो तो प्रश्न से वृक्ष कहना । लग्न नवां
जले राशि हो-जल वृक्ष 1 स्थळ राशि हो-स्थल वृक्ष जानो । वृक्ष संख्या-स्थल या जल
राक्षि के स्वामी लग्न से जितनी राशि पर हों उतनी संख्या वृक्षों की जानना ।
उच्च या वक्र गति वाले ग्रह या स्वगृही ग्रह हों तो तिगुनी संख्या जानना अपने
वर्गोत्तम नवांश या राशि में हो तो दुगुनी संख्या जानना 1
वृक्ष प्रकार
छग्नांश पति--सूर्य-भीतर पुष्ट वाली लकडी शीशम आदि ।
दानि-देखने में बुरी अप्रिय कुश आदि ।
'चन्द्र-दूघ वाले या रस वाले गन्ना आदि ।
, मंगल-कांटे वाले वृक्ष बबूरू खैर वेल आदि ।
गुरु फल वाले वृक्ष आम आदि 1
बुघ-विना फल वाले केवल फूल वाले ।
शुक्र -फूल वाळे चम्पा चमेली आदि |
चन्द्र-चिकने चीड़ देवदारु सादि ।
मंगल-कटु नीम गिलोय आदि ।
; वृक्ष की भूमि-पूर्वोक्त स्थल या.जळ राशि के स्वामी --
यदि शुभग्रह पापग्रह की राशि में हो तो अच्छे वृक्ष दुष्ट भूमि में पैदा हों ।
यदि पापग्रह शुम ग्रह की राशि में हो तो अशोभन वृक्ष सुन्दर भूमि में हों ।
यदि शुभग्रह शुभ राशि में हो तो शुभ वृक्ष रुचिर भूमि में होंगे ।
यदि अशुम ग्रह अशुम राशि में हो तो अशुभ वक्ष अशुभ भूमि में होंगे ।
इस प्रकार-चह ग्रह अपने नवांश से जितने नवांश पर हो उतने वृक्ष उसी प्रकार
के कहना ।
ला गुरु चंद्र शुद्ध भ | सुर्य मंगल | शिन बुघ
ë पीला विचित्र “रक्त कृष्ण हरा
निषेक अध्याय : २१३
पशु का कालांग
मनुष्य का कालांग आगे. बताया है । जैसा मनुष्य का काळांग कहा हुँ वेसे ही
राशियों से पशु के शरीर का भी विचार होता ë ।
राशि मेष वृष मिथुन ककं सिह कन्या तुला वृश्चिक घन मकर कुंभ मीन
अंग सिर मुख अगले पीठ चूतड़ sÑ - पुच्छ गुदा . पिछले लिंग स्फिज पुच्छ
कंठ पैर व छाती दोनों . मूल पैर वृषण पेट के
कंधा या दोनों दोनों तफं
पेट - ( गुदा के
दोनों ओर )
रग =
, जो ग्रह लग्न में हो वह रंग नष्ट वस्तु का कहें। लग्न में कोई ग्रह न होतो
जो ग्रह लग्न को देखता हो उस का वर्ण लेना । किसी ग्रह से युक्त या दृष्टन होतो
लग्न के नवांश का वर्ण कहे । यदि लग्न में कई ग्रह हों तो बलवान् ग्रह का रंग अधिक
कहे । स्वामी युवत राशि का यदि लग्न में नवांश हो तो सब को छोड़ उसी का रंग कहे ।
पीठ की रेखा ' :
लग्न से सप्तम स्थान में बज्वान् ग्रह हो तो उसके अनुसार पशु के पीठ को
कहां जन्मा ; =
भूमि में जन्म--३ से अधिक ग्रह नीच राशि में हों या लग्न में या चतुर्थ में वृश्चिक
(नीच ),का चन्द्र होःतो भूमि में जन्म हुआ । :. . . ;
वृक्ष के नीचे जन्म--सप्तम में मंगल, पंचम में सूयं हो तो बन में किसी वृक्ष के नीचे
जन्म--शुभग्रह नीच राशियों में हो वो वृक्ष के नोचे या लकड़ी के घर में 1
जंगल में-जन्म लग्न या जन्म राशि एक हो वहां चंद्र हो, उस चंद्र को यदि
३ ग्रह न देखते हों या. शुभग्रह नीच में और लग्न चन्द्र को ३ से अधिक ग्रह न देखें ।
नौका पुल या ट्रेन में-पूर्ण चंद्र कर्क राशि में हो व. qu ss में हो,, गुर
चतुर्थ में हो ।
जल के ऊपर नाव आदि में--छर्न में जलचर राशि हो, सप्तम में चन्द्र हो ।
लग्न में जलचर राशि हो, चन्द्र भी जलचर राशि का हो, या जल राशि लग्न को
पूर्ण चंद्र देखे, जलचर राशि का चन्द्र लग्न चतुर्थ का दशम में हो, या लग्न चतुर्थ, दशम
में जलचर राशि हो । : ; १
कारागृह में-लन में चंद्र हो पापग्रह से दृष्ट हो, दवादश स्थान में शनि हो, लग्न
== से शनि १२ वां हो उस पर पापग्रह की दृष्टि हो । ; kE.
२१४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
खंदक खाई में--वृषिचिक या कक लग्न हो, लग्न में शनि हो, उसे चन्द्र देखे या
वहां चन्द्र हो ।
नृत्यशाला ( क्रीड़ा स्थळ ) आदि में या शयन स्थान में-जलचर राशि लग्न में
हो उस पर बुघ को दृष्टि हो ।
ऊषर भूमि में-जलचर राशि का लग्न हो जिसमें जलचर राशि हो वहां शनि हो
जिन पर चन्द्र की दृष्टि हो । ( अन्य मत से सूर्य की दृष्टि होना बताया है ) ।
देवस्थान मॅ--उपरोक्त शनि पर सूर्य की दृष्ट हो ( अन्यमत में वहां चन्द्र की
दृष्टि होना बताया हे ) ।
दइमशान में--पुरुष राशि लग्न में हो, लग्न में शनि हो जिस पर मंगल को
दृष्टि हो । शिल्प (कारीगरी) गृह में--पुरुष राशि लग्न में हो, लग्न में वुध हो जिस पर मंगल
को दृष्टि हो ।
यज्ञशाला रसोई घर आदि अग्नि स्थान में--पुरष राशि के लग्न में शनि गुरु हो
जिस पर मंगल की दृष्टि हो। _
देवालय में या गौशाला में--पुरुष राशि लग्न में हो, लग्न में सूर्य हो जिसपर मंगल
की दृष्टि हो।
सुन्दर रमणोक घर में--पुरुष राशि लग्न में हो, लग्न में चन्द्र शुक्र हो जिसपर मंगल
की दृष्टि हो ।
बस्ती में बहुत मनुष्यों के समुदाय में--लग्न व चन्द्र को बहुत ग्रह देखें ।
माता-पिता के घर जन्म —a बली होकर उसके पास शुक्र हो।
पिता के घर जन्म--पितु संज्ञक ग्रह सूर्य-शनि बली हों तो पिता व उसके भाइयों
के घर जन्म ।
माता के घर जन्म-मातुसंज्ञक चन्दर-शुक्र बलवान् हों तो माता व उसकी बहन के
घर जन्म ।
फुआ या काका के घर जन्म--शनि ओर सूर्य दोनों बलवान् हों तो उक्त
घर में जन्म ।
सुने घर में जन्म--यदि लग्न या चंद्र एक राशि में हों, किसी ग्रह की दृष्टि न हो
तो जहाँ कोई पुरुष न हो ऐसी जगह मं जन्म हो ।
अंधेरे में जन्म
(१) लग्न से चंद्र कहीं हो परन्तु मकर लग्न हो कुम्भ राशि का नवांश हो अर्थात्
शनि को राशि या नवांश में चन्द्र हो तो जन्म अँधेरे में हुआ, दिन को नहीं हुआ ।
(२) लग्न से चतुर्थ में चन्द्र हो ।
(३) चन्द्र कहों हो उसे शनि देखता हो या शनि चन्द्र युक्त हो ।
(४) चन्द्र कक, मकर व मीन या जलचर राशि के नवांश में हो ।
निषेक अध्याय : २१५
अन्य मत अंधेरे में ओर भूमि में जन्म का
(१) चतुर्थ में चंद्र शनि की राशि और अंशक में ।
(२) या जलराशि में, जलचर राशि के अंशक में, शनि गे युक्त दृष्ट या नीच का 1
दीपवाले घर में जन्म
इसमें विशेष विचार यह है कि सूर्य बलवान् मंगल से दृष्ट हो तो उक्त योगों के
०2, > होते हुए भो अंधेरे में जन्म नहीं समझना । दीपसहित घर में जन्म होगा । या चन्द्र को सूर्य की दृष्टि हो तो भी अधेरे में जन्म नहीं होगा ।
पहिले जो प्रसव स्थान के योग कहे Š उनक्रे अभाव में योग
(१) चर और स्थिर राशि लग्न में, लग्न की और नवांश की राशि के सदृश
भूमि में अर्थात् जिस राशि की जो भूमि कही है उसी प्रकार की भूमि में 1
(२) सभी राशि के लग्न में यदि अपना नवांश वहाँ हो तो अपने घर में जन्म ।
जहाँ राशि के समान या नवांश के समान भूमि कहना इस पर विचार है कि जो बली
हो उसके समान भूमि कहना ।
माग में जन्म--चर राशि की लग्न हो और चर नवांश हो तो मार्ग में प्रसव ।
घर में--लग्न स्थिर राशि ओर नवांश हो या स्थिर राशि या स्वराशि स्वांश की
ग्रहों में हो तो घर में प्रसव । लग्न वर्गोत्तम ददौ तो अपने घर में ।
जहाँ जन्म हुआ वह घर केसा था
जन्म लग्न में शनि बलवान हो--पुराने घर में ।
मंगल बलवान् हो--कहीं जला हुआ होगा 1
चन्द्र बलवान् हो--नवीन घर ।
सूर्यं बलवान् हो-उस घर की लकडी अच्छी है । परन्तु दीवाल अच्छी नहीं है ।
बुध बलवान् हो--कारोगरी का घर |
शुक्र बलवान् हो--रमणीक घर ।
गुरु बलवान् हो--बड़ा घर !
घर के बाहर कांटेदार वृक्ष के समीप--लग्न से दूसरे या बारहवें पाप ग्रह हों ।
पुराना लिपा पुतता घर--लग्न या चन्द्र को बली चन्द्र देखे ।
उत्पन्न हुआ वालक केसा होगा-शरीर रंग वर्ण
शरीर--जन्म समय जो लग्न हो उसमें जो राशिनवांश का स्वामी हो उस सरीखा
बालक का शरीर होगा । या बुध जिस नवांश में हो तो उस राशि के समान खूप होगा U
वर्ण--लग्न में जो ग्रह बलवान् हो उस सरीखा शरीर का वर्ण यां लग्नेश से या
जिस राशि पर चन्द्र हो उसके नवांश स्वामी सरीला बालक का रंग होगा । ग्रहों और राशियों के गुणधमं में उनके रंग बताये गये हैं ।
शरीर पर तिल--जिस स्थान पर राहु और शनि हो वहाँ काला Ps तिल आदि
होंगे । शरीर का वणं तिल आदि पर पूर्ण विचार आगे दिया है और शरीर का अंग भी
विचारना आगे फलांग में दिया है वह पृथक विषय हे ।
२१६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मातृघाती--चन्द्र से त्रिकोण में शनि हो और रात्रिका जन्म हो तो माता का
बघ करे। सूर्य मंगल शनि राहु या केतु युक्त, नीच ग्रह से दुष्ट या युक्त हो तो माता
का वघ करे ।
माता को कष्ट--यदि ४-७ भाव में पापग्रह हो तो माता के कलह से कष्ट होवे ।
माता के दूध से ३ माह तक, पीछे पिता और भाई द्वारा पालित--जन्म समय सूर्य
ओर चन्द्र एक भाव में एक ही नवांश में हों ।
माता से त्यकत--शनि मंगल कहो एक राशि में हों उससे सप्तम या त्रिकोण में चन्द्र
हो तो बालक को माता त्याग देवे । सूर्यं मंगल एक राशि में हों उससे सप्तम पंचम या
नवम में चन्द्र हो तो बालक माता से अलग हो जाता ë ।
त्थवत बालक दीर्घजीवी--एऐसे योग में गुरु चन्द्र को देखे तो वह त्यक्त बालक दीर्घ
जीवी होता है ।
त्यक्त बालक मरे--उक्त योग में पापग्नहों से युत व दुष्ट हो तो त्यक्त बालक मरे |
लग्न में चन्द्र हो पापग्रह ( सूर्य शनि) देखे, सप्तम में मंगल हो । चन्द्र ऊर्न में हो
जिस पर सूयं की दृष्टि हो मंगल और शनि ११वें स्थान में हों। या शनि और मंगल
से १, ११, ७ भावों में किसी भाव. में पाप युक्त चन्द्र हो तो त्यवत वालक मरे ।
त्यक्त दूसरे के हाय लगे--यदि उक्त चन्द्र पर शुभग्रह को दृष्टि हो तो जिस ग्रह की
दृष्टि हो उसके समान जात वाले मनुष्य के हाथ में वह बालक जावे और वह दीर्घायु होवे ।
दूसरे के हाथ लगने पर भी मरे--उक्त चन्द्र पर शुभग्रह की और पाप;ह की भी
दृष्टि हो तो त्यक्त बालक दूसरे के हाथ लग जाने पर भी मर जावे । - अन्य मत से उक्त
चन्द्र पर पाप दृष्टि हो तब भो उपरोक्त फल हो ।
जारज योग ( अन्य से उत्पन्न )
१--षष्ठेश का नवांशेश चतुर्थेश युक्त पापदृष्ट हो ।
२--चतुथ भाव पापग्रहों के बीच, चतुर्थेश या मातृक्रारक चन्द्र पाप दृष्ट हो नवमेश से लग्नेश बलहीन हो ।
३--लग्न या चन्द्र पर गुरु की दृष्टि न हो या गुरु नवांश में ये न हों या सूर्य चन्द्र
साथ हो गुरु की दृष्टि न हो ।
४--सूयं चन्द्र पापग्रह युक्त हों या सूर्य या चन्द्र के साथ राहु केतु हों ।
५--नवम और चतुर्थ में पापग्रह हो लग्नेश पाप युक्त बलहोन हो चतुर्थ घर में
ओर कोई दूसरा नवांश हो या शत्रु का नवांश हो ।
६--६, १, ४, ९ के स्वामी एक साथ कहों मी हों ।
अन्यमत--१, ४, ९ के स्वामी एक भाव में, या १, ३, ४, ७ के भावेश एक साथ ।
७-जजतुर्थश षष्ठेश युक्त नवम में हों ।
चतुर्थ में चतुर्थश भाग्येश दोनों हों ।
९--छन में चन्द्र गुरु की दृष्टि या गुरु के राव्यादि वर्ग से रहित हो ।