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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

२२०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

“बैद्यक में ज्ञान की उन्नति हो विवाद में जय, लेखन में, अच्छे शास्त्र पढ़ने में, या

` “लिखा पढ़ी के काम में प्रतिष्ठा या धन लाभ हो, राजा के आश्रय से गौरव प्राप्त हो,

“राजाका मंत्री होवे ।

मध्य वली-पूर्वोक्त फल साधारण होगा । रास्ता चलना व्यापार में लाभ पुत्र

-व मित्र से सुख । यदि शुभ ग्रह से इत्यशाल हो तो यह फल होता है अन्यथा अच्छा

'फल नहीं होता ।

बल हीन-वल बुद्धि की हानि, धर्म का नाश अर्थात्‌ अधर्म का उदय, अपने ही

“वचन के दोष से अनादर, झूठी गवाही देनी पड़े, दूसरों के व्यवहार से पुत्र, धन,

मित्र की हानि होती है चित्त में विक्षेप होने से आपत्ति, राजा, शत्रु या चोर से भय,

नेत्र, हृदय, गले में रोग ।

,(५) वर्षश गुरु

पूर्ण बली-परिवार में सुख, धर्म गुण-ग्राहकता. धन कीति पुत्र का सुख हो, जगत

“में विश्वास बढे, श्रेष्ठ बुद्धि हो, पराक्रम बढ़े, गड़े हुए धन का लाभ, राजा से गौरव

“बढे, शत्रु नाश हो ।

मध्यबली-पूर्वोकत फल साधारण हो, राजा से मिलाप, विज्ञान शास्त्र में प्रीति।

यदि पाप ग्रह से इसराफ योग होता हो तो दरिद्रता हो धन का नाश स्त्री को कष्ट

“ये अशुभ फल हों । हीन बल-धन, अर्थ और सुख की हानि, पुत्र स्त्री मित्र भी उसे छोड़ देवें, कलंक लगने का भय, व्याकुलता, कष्ट से निर्वाह, शरीर में कफ खाँसी दमा शत्रु से “भय, कलह भी हो । A

-(६) वर्षश शुक्र पुणं बली-शरीर निरोग, अनेक भोग विलास, अच्छे शास्त्र के पढ्ने में प्रेम,

“अनेक रत्नों का लाभ, मिष्ठान्न भोजन, सन्तोष एवं कल्याण प्रताप बढ़े, जय प्राप्त

  • हो, स्त्री के साथ सुख हास्य, राजा से धन लाभ और सुख।

मध्य बली-उपरोक्त फल मध्यम होता है । आजीविका कम, गुप्त दुःख, बंधी हुई जीविका, पाप ग्रह या शरु ग्रह से युक्त दुष्ट हो तो अनेक प्रकार की विपत्ति हो, “धन नाश हो ।

बल हीन-मन में संताप, लोगों में हंसी होती है, विपत्ति हो अपनी आजीविका - नाश हो, स्त्री पुत्र मित्रों से विरोध, कष्ट से भोजन प्राप्ति, कार्य में असफलता, सुख

  • नहीं मिले ।

. (७) वर्षद शनि

पूर्ण बली-नवीन भूमि घर खेत आदि का लाभ, म्लेच्छ राजा से धन समूह का “लाभ, बगीचा लगाना व जलाशय का सुख, शरीर पुष्टि, कुलोचित पद की प्राप्ति ~गुणियों में अग्रगण्य ।

मध्य बळी-उपरोक्त फल मध्यम, कष्ट से भोजन मिले, नौकर उँट भँ पालने

मासेश ओर दिनेश का फल : २०५.

वाले व अन्य के संसर्ग में आसक्त रहे, लाभ हो । पाप ग्रहों से युक्‍त या दुष्ट होने से

अशुभ फल हो ।

हीन बल्ली-कार्यों में असफलता, धन व्यय, विपत्ति शत्रु का भय, स्त्री पुत्र भित्रजनो '

से बेर, खराव अन्न का भोजन । शुभ ग्रह से इत्थशाल हो तो थोड़ा सुख भी मिले ।.

छे

अध्याय २१

मासेश ओर दिनेश का फल

मासेश और दिनेश का फल वर्षेश के समान होता है। परन्तु यहाँ मासेश का

फल संक्षेप से दिया है । प ८

(१) सूये मासेश-राजा से धन की प्राप्ति, मन में हषं, महत्व की वृद्धि निरंतर:

देशान्तरो में यश का प्रचार ।

(२) चंद्र मासेश-इवेत वस्त्रों का लाभ, मोती के हार की प्राप्ति, धनागम, .

राजा से एवं आत्मीय जनों से सुख, तीथं यात्रा आदि शुभ फल हो ।

(३) मंगल मासेश-संग्राम में विजय, रक्त वस्तु एवं धन की प्राप्ति, घर में”

सर्वत्र मंगल ।

(४) मासेश बुध-राजा से धन का लाभ, सुन्दर वस्त्रों का लाभ, कीति बढ़ें, .

अनेक भोग विलास से सुख ।

(५) मासेश गुरु श्रेष्ठ बुद्धि हो, लोक में आदर, देव कार्य में मन ।

(६) मासेञ्च शुक्र-जल क्रीड़ा में प्रसन्नता, काम क्रीडा में अधिक मन, कुटुम्बियों '

से आदर प्राप्त ।

(७) मासेश्च शनि-राजा से मान प्राप्ति, हास्य विलास, घमंड दुर करने में समर्थ ।

उपरोक्त फळ के विचार में इन का बल एवं पाप शुभ दृष्टि आदि पर विचार:

कर फल निर्णय करना ।

साव अनुसार सासेश का फल

(१) लग्न में मासेश-राजा से मान प्राप्ति, सन्तान सुख, धन का राभ;

भाग्योदय, वाहुवल का प्रताप, शत्रु का नाश ।

(२) द्वितीय में मासेश-हुषं, घन लाभ, वाहुबळ का प्रताप, वाहून घर आदि की

प्राप्ति, यदि शुभ युक्त या दृष्ट हो तो ये सव शुभ फल होते हैं ।

(३) तृतीय में मासेश-स्वतः के पराक्रम द्वारा सिद्धि प्राप्त करे, भाई के शरीर

में सुख हो । पाप युक्त या दुष्ट होने से ऐसा फल नहीं करता GE

(४) चतुर्थं में मासेश-शुभ युक्त या दुष्ट हो तो वाहन एव सुवर्ण का छाभ,.

सत संग, ब्राह्मण और देव में भवित ।

४२०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफलखण्ड

(५) पंचम में मासेश-सन्तान का सुख, स्त्री से विलास,'घनागम, शत्रु और

रोग का नाश, सुख, अर्थ की सिद्धि ।

(६) षष्ठ में मासेश-कार्य नाश, शत्रु का उदय, रोग हो, वाहन और धन

को हानि.।

(७) सप्तम में मासेश-व्यापार में लाभ, धान्य की वृद्धि, स्त्री का सुख हो ।

*यदि शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तव उपरोक्त फल होता है ।

(८) अष्टम में मासेश-बलू बुद्धि की हानि, शरीर की हानि, लक्ष्मी का वियोग

“देश विदेश में भ्रमण, पुत्र और भाई को दुःख ।

(९) नवम में मासेश-धर्म की वृद्धि, भाग्योदय, मित्र लाभ, स्त्री विलास,

सन्तान सुख । |

(१०) दशम में मासेश-प्रताप की वृद्धि, पुत्र सुख, धन धान्य का लाभ, स्त्रियों

का विलास, सर्वे अर्थो की मिद्धि हो ।

(११) लाभ में मासेश-यदि शुभ युक्त या शुभ दृष्ट हों तो बहुत लाभ हो, हषं

हो, विलास, स्त्री और घर का सुख ।

(१२) व्यय भाव में मासेश-धन का खर्च, धान्य का नाश, स्त्री को कष्ट, पुत्र

सुख की हानि, शत्रु का आतंक, मस्तक एवं शरीर में पीडा ।

सास प्रवेश का मास फल का संक्षिप्त विचार

मास प्रवेशा काल में लग्न के नवांश के स्वामी की लग्नेश से या उसके नवांशेश

:से मित्र दृष्टि हो या दोनों एक साथ हों तथा चंद्रमा की उन दोंनों पर मित्र दृष्टि

(३, ५, ९, ११) हो तो उस महीने में मास प्रवेश जब तक हैं सुख और निरोगता रहे

यह बलाबल एवं दृष्टि योग से विचार कर फल का निर्णय करना ।

यदि वही लग्न नवांशेश और लग्नेश का नवांश स्वामी ये. दोनों परस्पर शत्रु

-दुष्टि से देखते हों या चंद्रमा भी शत्रु दृष्टि से देखे तो मानसिक दुःख देते हैं। यदि

लग्नेश या लग्नेश का नवांशेश में कोई नीच का या अस्तंगत हो तो बड़ा कष्ट भोग

-कर सुख पावे और यदि .दोनों नीच में या अस्तंगत हों और चंद्रमा शत्रु दृष्टि से देखे

“तो मरण हो । परन्तु इसी मास में जन्म तथा वर्ष का भी अरिष्ट हो तो मृत्यु होती

“है अन्यथा मृत्यु तुल्य कष्ट हो । यदि जन्म का अरिष्ट उस महीने में हो वर्ष में न हो

“तो मास के पूर्वाद्ध में मृत्यु तुल्य कष्ट हो और वर्ष का अरिष्ट हो जन्म का उस मास

“भै न हो तो मास के उत्तराद्ध में उक्त अरिष्ट होता है।

ऐसा ही सम्पूर्ण भावों का विचार करना कि जिस भाव का नवांशेश तथा उस

“भावेषा के नवांशेश परस्पर मित्र दृष्टि से देखें और चंद्रमा भी इनको मित्र दृष्टि से

“देखे तो इस मास में उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होता है यदि उक्त ग्रह परस्पर शत्रु

दृष्टि से देखें या युक्त हों तथा चंद्रमा भी इन्हें शत्रु दृष्टि से देखे तो उस भाव सम्बन्धी

कष्ट होगा । ऐसे ही नीच या अस्तंगत में से एक या दोनों हों तो भी कष्ट होगा ।

"ऐसा सव भाव से विचारना ।

मासेश ओर दिनेश का फल : २०७

लग्नेश मासेश वर्षेश और लग्न नवांश स्वामी ये चारों या इनमें से कोई जिस “भाव नवांश पति से मित्र दृष्टि से युक्त या दुष्ट हों और चंद्रमा भो मित्र दृष्टि से युक्त या दुष्ट हो तो उस भाव के सम्वन्ध से सुख होता है। ऐसे योग में जो जन्म काळ में इस भाव सम्बन्धी अनिष्ट फल हो तो यहाँ मध्यम फल होगा । जो जन्म में “भी. शुभ फल देने वाला हो तो यहाँ अधिक शुभ होगा । एसे ही वलहीन होवे और शत्रु दृष्टि का होवे तो अनिष्ट का बुद्धि से विचार लेना ।

„ ६-८-१२ भाव के स्वामी और इनके नवांश स्वामी निर्वेल हों और भावों के

स्वामी सवल हों तो शुभ फल देते हैं । यदि ६-८-१२ के नवांश स्वामी सवल हों और

भावों के निर्वळ हों तो कष्ट होता है ।

लग्नेश मासेश वर्षश और मुंथेश ६-८-१२ भाव में हों पाप युक्त हो और ग्रहों से

"शत्रु दृष्टि से दुष्ट हों तो इस मास में रोग आदि से क्लेश हो और दानु द्वारा दुःख

प्राप्त हो ।

लग्नेश, “मासेश और वर्षश वलवान हो तथा केन्द्र त्रिकोण ओर लाभ में हो तो

“निरोग हो शत्रु नाश हो और कुलानुमान से राज्य लाभ हो, मानव कीति को प्राप्त हो।

मास प्रवेश कुण्डली में साव में ग्रह फल

(१ ) लग्न में सुर्य-मस्तक नेत्र और मुख में पीड़ा, चित्त में उद्वेग, स्त्री के

शारीर में पीड़ा, वहुत चिन्ता ।

लग्न में चंद्र-कास तथा स्वासादि का रोग मुख और नेत्र में पीड़ा । पूर्ण चंद्र हो

मतो धन का लाभ करे । शुभ युक्‍त या दृष्ट शुभ फल । पाप युक्त या दुष्ट दुष्ट फल ।

क्षीण चंद्र हो तो अशुभ फल ।

लग्न में मंगल-कलह, धन खर्च, रक्त पित्त का रोग, मस्तक मुख व नेत्र में रोग ।

  • लग्न में बुध-राजा से मान यश, तेज बल की वृद्धि, वुद्धि की वृद्धि, देह सुख

"आप्त ।

लग्न में गुरु-पुत्र स्त्री से सुख, राजा से सम्मान, लाभ, वात रोग ।

लग्न में शुक्र-राजसमान, कुल की वृद्धि, हषं सुख, जगतप्रीति ।

लग्न में शानि-सिर मुख पेट में रोग, कफ बात की पीड़ा, मित्र से वेर, स्वगृही

ग्या उच्च का हो तो शरीर सुख देता है ।

लग्न में राहु-पुत्र मित्र आदि का कष्ट, धन नादा, कलह, वात पीड़ा, वस्त्र

आदि का कष्ट ।

लग्न में केतु-शिर में रोग ताप, विदेवा से भय, उद्वेग, स्त्री आदि की चिन्ता,

"चोट, शरीर में व्यथा ।

मास प्रवेश में धन में सुयं-धन नाश, राजा अग्नि चोर शत्रु से झगड़े में धन

हानि, कुटुम्ब में कलह । धन में चंद्र-इष्ट मित्रों से लाभ हो । पूर्ण चंद्र हो तो सवेत वस्तु के व्यापार से

अन लाभ हो ।

२०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

धन में मंगल-राजा, अग्नि चोर से भय, कष्ट शोक क्रूरता, धन का खच !'

घन में बुध-इष्ट मित्रों से सुख, शरीर सुख, धन का लाभ |

घन में गुरु-राज्य .से मौन, शरीर सुख, मित्रों से सुख, धन का लाभ।

घन में शुक्र-मितरों की वुद्धि, शत्रु नाश, स्त्री सुख, घन लाभ।

धन में रानि-धन नाश, राजा से भय, मुख नेत्र में पीड़ा, स्त्री पुत्रादि को कष्ट ॥

घन में राहु-धन नाश, चिन्ता, देह में रोग, गुदा मुख व नेत्र में पीड़ा ।

` घन में केतु-घन धान्य का नाश, कुटुम्ब से विरोध, मुख में रोग, धन की

चिन्ता, घर में सुख नहीं मिले ।

मास प्रवेश में तीसरे भाव में सूयं-धन सम्पदा की वृद्धि) रोग नाश, धमं कीः

वृद्धि स्त्री पुत्र मित्र का सुख । ०

तीसरे भाव में चंद्र-पराक्रम से सुख, मित्र व भाई से सुख, पूर्ण चंद्र हो तों

आरोग्यता हो । ०

तीसरे भाव में मंगल-मित्र और धन का लाभ, राजा से मान, शत्रु नाश, पदः

प्राप्ति, उत्सव ।

तीसरे भाव में बुध-शात्रु मित्र का मिलाप, दुःख और सुख लाभ हो खर्च भी हो,.

मिथ्या बचन बोले । `

तीसरा गुरु-राजा से मान, धन लाभ, मित्र और भाई का लाभ, अल्प सुख,

स्त्री को सुख । द

तीसरा शुक्र-धन का खर्च, अपने मनुष्यों से विवाद, अल्प सुख, भाई बहनों

का पोषण । र ) प

तीसरा दानि-धन लाभ, राजा से मान दुःख की निवृत्ति)

तीसरा रांहु-दात्रु नाश, धन लाभ, आरोग्यता, मित्र सुख, ऐश्वर्य की वृद्धि,.'

बन्धु कष्ट ।

तीसरा केतु-विवाद, बन्धु नाश, वाहु पीडा, दानधर्म से हीन, शत्रु नाश, पराक्रम

की वृद्धि, ऐश्वर्य युक्त ।

मास प्रवेश में चतुर्थ सूर्य-राजा से भय, पशु और.सनुष्य की पीड़ा, मित्रों से.

लड़ाई, भोजन में कष्ट । द

चतुर्थ चंद्र-राजसी भोजन, अल्पधन का लाभ, गौ आदि का लाभ, भाई स्त्री

_ और मित्र का सुख ।

, चतुर्थ मंगल-राज भय, कुटुम्ब से कलह, शरीर कष्ट, विदेश यात्रा, क्षुधइ से

महान कष्ट ।

चतुर्थ बुध-राज मान, मित्र भाई ओर स्त्री का सुख, मित्र का समागम,

शिल्प ज्ञान । द र ८

चतुर्थ गुरु-राजा से. मान, धन लाभ, स्त्री पुत्र मित्र का सुख, भूमि वाहन,

विद्या से सुख ।

हैक! ¢

मासेद्य और दिनेश का फल : २०९

चतुर्थ शुक्र-धन लाभ आरोग्यता, राजा से मान, ऐब्वर्य वृद्धि, स्वजन और मित्रों से सुख । चतुर्थं शनि-राज भय, धन नाश, मातृ कुछ में कष्ट, विदेश गमने । चतुर्थ राहु-भ्रवास, मित्रों में विवाद, चिन्ता, पशुओं की हानि । चतुर्थं केतु-पिता की हानि, माता आदि का सुख नहीं, यदि उच्च का हो तो बन्धुओ से सुख हो परन्तु अपने स्थान में अधिक रहना न हो। मास प्रवेश में पंचम सूर्य-देह में पीड़ा, बुद्धि की हानि, धन हानि, स्त्री-पुत्र को कष्ट। > मांस प्रवेश में पंचम चंद्र-शुभ दृष्टि हो तो शरीर सुख, उत्सव, पुत्र सुख । मास प्रवेश में पंचम मंगल-दारीर कष्ट; धन हानि, पुत्र-स्त्री को कष्ट, बुद्धि हानि, मित्र भय ।

मास प्रवेश में पंचम बुध-राजा से मान, ऐश्वर्य बढे, स्त्री-पुत्र का सुख । मास प्रवेश में पंचम शुक्र-धन लाभ, अच्छी बुद्धि, स्त्री का सुख, तन्त्र विद्या में कुशलता । ग | पंचम शनि-धन क्षय, बुद्धि नाश, स्त्री पुत्र को कष्ट पेट में पीड़ा । पंचम राहु-पुत्रादिकों को कष्ट, उदर पीड़ा, भाई से विरोध, दुर्मति । पंचम केतु-बुद्धि का हवास, उदर में रोग, सन्तान की न्यूनता, राजपक्ष से आशा में बिलम्ब हो।

मास प्रवेश में छठा सूर्य-शत्रु नाश, राजा से मान, धन लाभ, स्त्री, पुत्र का . सुख, ऐदवर्य बढ़े।

छठा चन्द्र-कफ बात की पीड़ा, राजा व चोर से कष्ट, भाइयों से विरोध । छठा मंगल-शभु नाझ, राजा से मान, धन लाभ, मित्र सुख, हर्ष । छठा बुध-बात रोग, धन हानि, स्त्री पुत्र से भय, शत्रु बढे । छठा गुरुवछक्षीण, मित्रों से वेर, शत्रु वृद्धि, धन हानि, उद्वेग । छठा शुक्र-वात कफ रोग, कष्ट, राज भय, धन खर्च, कलह । छठा शनि-शत्रु नाश, राजः की कृपा, शरीर सुख, स्त्री पुत्र का सुख, धम की वृद्धि । श

छठा राहु-शनु नाश, शरीर सुख, धन लाभ, राजा की प्रसन्नता, स्त्री पुत्र सुख । छठ केतु-शत्रु नाश, व्याधि नाश, मामा से विरोध, चौपायों से सुख | मास वेश में सप्तम सूर्य-स्त्री को पीड़ा, गुदा, उदर मस्तक में रोग, धन हानि . परदेश यात्रा । £ सप्तम चंद्र-्त्री सुख, राजा से मान, व्यापार से अन्य स्थान में लाभ । सप्तम मंगल-स्त्री को हानि तथा कष्ट, भय, देश त्याग, शरीर में रोग । सप्तम बुध-धन लाभ, मार्ग में व्यापार द्वारा सुख । - सप्तम गुरुस्त्री सुख, राजा से सम्मान, व्यापार से धन लाभ ।

१४

| है

२१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

सप्तम शुक्र-स्त्री पुत्र का सूख, हर्ष, मार्ग में लाभ, व्यापार से धन लाभ ।

सप्तम शनि-धन नाश, शत्रु भय, विदेश यात्रा गमन से भय, मित्र को कष्ट ।

सप्तम राहु-स्त्री को कष्ट, बात रोग कटि व गुदा में पीड़ा देह पीड़ा,

विदेश वास । ;

सप्तम केतु-स्त्री को पीड़ा, मागे में निवृत्ति, देह पीड़ा, व्यय से चिता, केन्द्र में

होने से लाभ । -

मास प्रवेश में अष्टमं सूर्य-पित्त रोग, गुदा में रोग, शरीर पीड़ा, धन हानि,

राज भय । र

अष्टम चंद्र-कफ आदि से रोग, धन नाश, संताप ।

अष्टम मंगछ-गुदा में रोग, रक्त पित्त रोग, धन धर्म, मित्र पक्ष से आपत्ति ।

अष्टम वुध-शत्रु नाश, राजा से मान सुख, धन लाभ ।

अष्टम गुरु-ऋलह, रोग, धन खर्चे, वियोग, विदेश यात्रा ।

अष्टम शुक्र-विदेश यात्रा, धर्मे नाश, शरीर रोग, स्त्री पुत्र को पीड़ा, अल्प लाभ।

अष्टम शनि-शरीर में रोग, धन हानि, व्यसन, स्त्री-पुत्र को पीड़ा, वात रोग।

अष्टम राहु-पेट में रोग, विदेश वास, धन खर्च, . स्त्रो को कष्ट, भाइयों में

विरोध, विनाश । र पु

अष्टम केतु-३, ४, ६, राशि का हो तो वात.रोग से व्याकुल, गुदा में पीड़ा,

१-२ राशि का हो तो पुत्र व धत लाभ । ६ १

मास प्रवेश में नवम सूर्य-मन में उद्वेग, स्त्री-पुत्र से कलह, धम हानि ।

नवम चंद्र-राजा से मान, धर्म में रुचि, शत्रु विजय, भोग आदि की प्राप्ति,

यश बढ़े ।

नवम मंगल-धन का व्यय, कलह, धर्म हानि, पाप बुद्धि ।

नवम बुध-शरीर सुख, धर्म में बुद्धि, धर्म में मिथ्यापना, स्त्री-पुत्र का सुख ।

नवम गुरु-धर्म में रुचि, राजा से सुख, धन लाभ, अनेक भोग प्राप्ति ।

नवम शुक्र-धन लाभ, आरोग्यता, उत्तम वुद्धि, स्त्री पुत्र का सुख, अचानक

घन-धान्य धर्म प्राप्ति । नवम शनि-पाप बुद्धि, राजभय, स्त्री-पुत्र को कष्ट, धर्म हानि ।

नवम राहु-धर्म कार्य में विलम्ब, शरीर में पीड़ा, बेर, राजभय, दीनता ।

नवम केंतु-धर्म-हानि, धर्मे कार्य में कभी घटा बढ़ी हो, भुजा में रोग, म्लेच्छ से

भाग्य की वृद्धि, भाई को पीड़ा ।

मास प्रवेश में दशम सूर्य-धन लाभ, भाग्योदय, कीति सुख, पद प्राप्ति ।

दशम में च£-राजा से मान, हषं, छत्रु नाश, स्त्री पुत्र का सुख, लाभ, सुख, `

पद प्राप्ति ।

दशम में मंगल--राजा की प्रसन्नता, व्यापार से धन लाभ, ऐश्वर्य की वृद्धि ।

दशम में बुध--राजा से मान, शत्रु नाश, धन लाभ, व्यापार में वृद्धि ।

मासेश और दिनेश का फल : २११

दम में गुरु--धन लाभ, राजा से मान, कीति, घर में उत्सव, मित्र सुख । दशम में शुक्र--कार्य सिद्धि, धन लाभ, राजा से मान, शत्रु नाश, मित्र सुख । दशम में शनि--राजा से भय, दीनता, धन-हानि, व्यापार में हानि, यात्रा 1 दशम में राहु--धन हानि, मित्रों से बैर, भय, देह में रोग, भुमि की हानि । दशम में केतु--हृदय व जानु में पीड़ा, भाग्यहीन, कष्ट, माता की हानि, पिता को सुख ।

मास प्रवेश में लाभ में सुयं---आरोग्यता, राजा की कृपा, मित्रों द्वारा हर्षे, गौ आदि पशु एवं धन की प्राप्ति, लाभ । लाभ में चंद्र--राजा से लाभ, वेत वस्तु के व्यापार से लाभ, इवेत वस्त्र आदि 'का लाभ ।

लाभ में मंगळ--धन लाभ, प्रताप, राजा की कृपा, शत्रु नाश, स्त्री-पुत् "का सुख |

लाभ में वुध--इवेत वस्तु के व्यापार से लाभ, आरोग्यता, घन लाभ, पुत्र आदि 'का सूख । १

लाभ में गुरु--मित्र सुख, आयु और आरोग्यता की वृद्धि, पशुओं की प्राप्ति, स्त्री-पुत्र का सुख । लाभ में शुक्र--शुभ वस्तु के व्यापार से लाभ, जळू मार्ग से धन प्राप्ति, सुख, स्त्रियो द्वारा धन बढे, प्रियजनो की संगति । र लाभ में शनि--आरोग्यता, राजा से लाभ, घन लाभ, स्त्री सुख, ऐदवयं बढे । लाभ में राहु--नीच वर्ण से लाभ, स्त्री सुख, धन लाभ हो, कुछ हानि भी हो, शरीर सुख, ऐश्वर्य बहे ।

मास प्रवेश में व्यय भाव में सूयं--शरीर में पित्त रोग, नेत्र रोग, राज पीड़ा, "राजदंड में व्यय, भाइयों से विरोध ।

. व्यय में चंद्र---चिता, नेत्र रोग, अच्छे काम में धन का व्यय, घर मे. कलह, शत्रु -की उत्पत्ति ।

व्यथ में मंगल--राजा से भय, धन-हानि, शरीर कष्ट, नेत्र रोग, स्त्री पुत से विरोध ।

व्यय में बुध--राजा से भय, कुटुम्ब में कलह, अधिक खर्च, अल्प लाभ। , _ व्यय में गुरुराज भय, धन का खर्च, विदेश यात्रा, स्वजनों से विरोध, शरीर में क्षय ।

व्यय में शुक्र--अच्छे काम में खर्च, विदेश यात्रा, मित्र तथा भाइयों से विरोध, विछोह ।

व्यय में शनि --राज भय, धन का नाश, कुटुम्त्र से विरोध, पाँव, नेत्र और

“छाती में रोग । र व्यय में राहु--शत्रु का उदय, राज से पीडा, स्त्री को पीड़ा, धन का खर्च,

शरीर कष्ट ।

२१२ : सचित्र ज्योतिष दिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

व्यय में केतु--गुह्य और वस्ति रोग, पाँव और नेत्र में पीड़ा, शत्रु नाश, मामा

रहित हो, राजा तुल्य ।

भास कुण्डली के कुछ योग

(१) मासेश लग्न में हो तो घन और सन्तान का सुख हो, राजमान प्राप्त हो ।

बाहुबल का प्रताप बढ़े, शत्रु क्षय हो, कमं का उदय हो ।

(२) लग्न में शुक्र चंद्र युक्त हो तो उस मास में पुत्र एवं धन-घान्य का सुख हो

(३) लग्न में राहु युक्त चंद्र हो तो उस मास में ज्वर पीड़ा हो शरीर दुर्वेछ

हो जावे ।

(४) लर्न में गुरु हो चतुर्थ में बुध हो तो सुख हो, धन-धान्य की प्राप्ति हो।

(५) लग्न या अष्टम में क्षीण चन्द्रमा हो पाप युक्त या दृष्ट हो तो वह्‌ पात्र के

वदा हो, शस्त्र का भय, रोग या मृत्यु हो ।

(६) धन-भाव में शनि हो और लाभ में सूर्यं हो तो शरीर पीड़ा और नेत्र

रोग हो । ट

(७) तीसरे घर में मंगल और चंद्र हों तो स्त्री सुख हो उस माप में धन-धान्य

का लाभ हो।

(८) तीसरे घर में गुरु चंद्र हो चौथे शुक्र हो तो उस भाव में सब अरिष्ट कष्ट

आदि दुर होकर सुख प्राप्त हो ।

(९) तीसरे भाव में सूर्य हो, दशम में गुरु हो तो उस मास में अरिष्ट, कष्ट

आदि नाश होकर सुख हों 1

(१०) चतुर्थ में पाप ग्रह हों तो वाहन से गिरे और शरीर में बहुत पीड़ा हो ।

“1 १) चतुथं में सूयं और दशम में पाप ग्रह हों तो मानसिक चिता और राज?

भयहो।

(१२) मासेश पंचम भाव में हो तो संतान सुख और धन लाभ हो सर्वार्थ लाभ

प्रताप बृद्धि हो ।

(१३) चन्द्रमा से पंचम में गुरु हो, गुरु से नवम में चंद्र हो तो रोग और शत्रु का

नाश हो अरिष्ट का नाश हो ।

(१४) मासेश छठे भाव में हो तो शत्रु का उदय हो, रोग हो, धन और वाहन

की हानि हो, कार्य सिद्ध हो ।

(१५) जब वर्षश, मासेश, दिनेश, मु थेश पाप ग्रह से युक्त होकर ६-८ या १२

स्थान में हों तो कीति और सम्मान की हानि हो ।

(१६) मंगळ सहित चंद्र ६ या ८ स्थान में हो तो शस्त्र से या शत्रु से भय हो।

(१७) जब लग्नेश, मासेश, वर्षेश, मु थेश पाप ग्रह युक्त हो, पाप ग्रह से दुष्टि

होकर ६ या ८ घर में हो तो शत्रु भय, व्याधि ओर दुःख हो ।

(१८) सप्तम भाव में राहु के साथ चंद्र हो. तो उस मास में बहुत कष्ट हो,

बिशेष कर स्त्रियों को कष्ट हो |

मासेश और दिनेश का फल : २१३

(१९) सप्तम स्थान में शुभ ग्रह हो तो उस दिन जुआ खेलने में जीतेगा ।

(२०) मासेश्च अष्टम हो तो अनेक कष्ट हो, संताप बढे, भय हो, शत्रु का उदय

हो, शत्रु घात, विषारिन की पीड़ा ।

(२१) लग्नेश और अष्टमेश अष्टम हो तो उस मास में अनेक प्रकार से शरीर

कष्ट हो, रधिर विकार हो ।

(२२) मंगल चन्द्रमा से युक्त अष्टम हो और मंगल के साथ सूर्य हो तो शरीर में

श्धिर स्राव हो, गुह्मेन्द्रिय में पीड़ा हो, दुःख बढ़े ।

(२३) जम्म लग्नेश के साथ सूर्य अष्टम हो तो गुल्योन्द्रिय मे पीड़ा हो दुःख वढे ।

(२४) नवम में मकर का मंगल हो, मु थेश पंचम हो तो अरिष्ट नहीं होता ।

(२४) मासेश नवम में हो तो भाग्योदय हो, स्त्री व संतान का सुख हो, मित्र

लाभ व धर्म की वृद्धि हो, धनागम हो, सर्वार्थ लाभ हो ।

(२६) नवम में मंगळ शुक्र से युक्त हो तो उस महिने में अरिष्ट और कष्ट का

नाश हो, सुख हो ।

(२७) लग्नेश नवम में हो, नवमेश पंचम हो तों भाग्योदय हो, सुख लाभ हो ।

(२८) नवम में शुभ ग्रह हों तो धन, धर्म गौरव व कीति बढे।

(२९) बारहवें स्थान में मुथा हो तो अभीष्ट की प्राप्ति न हो, चोर का भय,

शर्म अर्थं का नाश, मित्रों को कष्ट उद्यम हीन हो ।

(३०) व्यय में शुभ ग्रह शुभ कां में व्यय कराते हैं, २-१२ स्थानों में पाप ग्रह

हानि करते हैं, इन दोनों घर में पाप (पाप कतंरी योग) हो तो रोग हो । शुभ ग्रह

की कतरी शुभ होती है।

(३१) जिस मास का मासेश केन्द्र में हो, शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो धन और

'सुख की बढ़ती हो, कष्ट दूर हो ।

(३२) लग्नेश केन्द्र में हो, शुभ ग्रह से दुष्ट हो तो अपनी दशा में धन कीत्ति

और सुख की वृद्धि करे ।

(३३) लग्नेश मासेश वर्षेश बलवान होकर केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हो राज्य

:छाभ आदर, यश प्राप्त हो नीरोग्यता प्राप्त हो, शत्रु नाश हो ।

(३४) चंद्र या ग्न से केन्द्र त्रिकोण या लाभ में बलवान शुभ ग्रह बैठे हों, पाप

अह ३, ६, ११ स्थानों में हो तो यश सन्मान भोग-विलास आदि सुख प्राप्त हों ।

अध्याय २२

दिन प्रवेश का संक्षिप्त फल

दिन प्रवेश काल में ग्रह स्पष्ट और भाव स्पष्ट कर और चन्द्रमा व लग्न इन

बोनों के नवांश में फल कहना ।

दिन प्रवेश में ७ अधिकारी होते हैं । (१) जन्म लग्नेश, (२) वर्ष लग्नेश,,

(३) मास लग्नेश, (४) मुंथेश, (५) त्रिराशीश, (६) दिन लग्नेश, (७) दिन का सूर्य

राशीश, रात्रिका चंद्र राशीश । इनमें से अधिक लग्न को देखने वाल ग्रह दिनेश कहलाता है ।

दिनेश, मासेश, वर्षेश, मुंथेश ६-८-१२ घर में हों तो इस दिन रोग होता है यश और मान की हानि होती है । यदि ये केन्द्र त्रिकोण और लाभ में हों तो साथ देते हैं ।

शुभ ग्रह वली होकर लग्न व चंद्र से केन्द्र या त्रिकोण में हों और पापग्रह ३-६-११ घर में हों तो इस दिन मनोविनोद हो, सम्मान हो, धन और यश सहित सुख होवे । दिन प्रवेश से लग्न का नवांश स्वामी शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो या चंद्र से मित्र

दृष्टि से दृष्ट हो तो निरोगता, शरीर पुष्टि और राज्यादि सुख प्राप्त हो। यदि वे निर्बल या ६-८-१२ घर में हों तो मास प्रवेशोक्त वत्‌ दुःख होवे ।

ऐसे ही सव भावों का विचारना अर्थात्‌ जिस भाव का नवांशेश शुभ ग्रहों से युक्त मित्र दृष्टि से दृष्ट हो उस भावसम्वन्धी सुख हो और यदि नवांश स्वामी पापग्रह युक्त या शत्रु दृष्टि से दृष्ट हो तो दुःख हो इसमें चंद्रमा कं भी मित्र या शत्रु दृष्टि का विचार करना ।

छठे भाव का नवांशेश शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो रोग करता है । पाप

ग्रहों से युक्त दृष्ट हो तो शुभ है निरोगता देता है । ऐसे ही व्यय भाव के नवांश

राशि में शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो सन्मार्ग में व्यय हो पापयुक्त दृष्ट से व्यर्थं के

काम में धन खर्चे, चोरी आदि से धन हानि हो ।

सप्तम भाव का नवांश यदि शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो अपनी स्त्री से विलासः

आदि सुख मिले पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो स्त्री से कलह, स्त्री सम्बन्धी दुःख

हो! यदि दो पाप ग्रहों के वीच सप्तम भाव की नवांझ राशि पड़े तो मरण होवे ।

जो पाप ग्रह सप्तम भाव में हो तो अन्य स्त्री से संगम होवे । शुभ ग्रहों से बहुत स्त्री सोख्य होवे ।

सप्तम भाव को नवांश राशि यदि दो शुभ ग्रहों के बीच हो तो बहुत स्त्री सुख

होवे । गुरु से युक्त दृष्ट हो तो अपनी स्त्री से प्रेम व संगम हो, गुरु से भिन्न ग्रहों से सप्तम भाव का नवांश युक्त दृष्ट हों तो पर स्त्री से संगम हो ।

दिन प्रवेश का संक्षिप्त फल : २१५

अष्टम भाव का नवांशेश अष्टम भावस्थ ग्रह से युबत या दृष्ट हो तो युद्ध में

मरण हो । यदि पाप और शुभ दोनों से युक्त या दृष्ट हो तो मिश्रफल होगा । यदि

पाप ग्रहों से युक्त हो तो सुख हो, शेष वर्ष लर्न के अनुसार समझना ।

दुसरे और बारहवें स्थान में पाप ग्रह हो तो हानि होती है। धन स्थान में शुभ

ग्रह हो तो घन लाभ, व्यय स्थान में शुभ ग्रह हो तो शुभ काम में व्यय होता है ।

यदि लग्न में पाप ग्रहों की कतंरी हो तो रोगादि दुःख हो । शुभ ग्रहों की कर्तरी हो

तो शुभ फल होता है ।

पापग्रह से युक्त दृष्ट क्षीण चन्द्रमा लग्न या अष्टम स्थान में हो तो मरण हो ।

यदि अन्य उत्तम योग हो और आयु हो तो रोग व शत्रु से शस्त्र भय या बन्धन हो।

चन्द्रमा मंगल युक्त ६ या ८ स्थान में हो तो शस्त्र से या पशु व्याघ्रादि से भय

हो । यदि चतुथं स्थान में पाप ग्रह हो तो वाहन से पतन होवे और शरीर में बहुत

पीड़ा हो ।

शुभ ग्रह सप्तम में हो तो जय जुआ में धन लाभ और सुख हो । नवम स्थान

में शुभ ग्रह हो तो धन, ऐश्वयं राज सम्मान और कीति प्राप्त हो, इसके अतिरिक्‍त

भास कुंडली फर देखने की बातें दिन प्रवेश फल में भी विचारना। `

६-०-१२ भाव के स्वामी के सम्बन्ध से भी विचारना कि ये जिस भाव में होंगे

उसकी हानि करेंगे । दिनेश का भावेश से सम्बन्ध और दिन लग्नेश की स्थिति और

दिन लग्नेश का कार्येश से सम्बन्ध पर भी विचारना ।

दिन प्रवेश काल में चन्द्र अवस्था का फल

दिन प्रवेश में चन्द्र जिस प्रकार की अवस्था में होवे उसी अवस्था के तुल्य फल

देता है।

मास प्रवेश में भी इसका विचार करना ।

चन्द्र की अवस्था जानना

चन्द्र स्पष्ट लेकर राशि को छोड़कर केवल अंशादि लेकर २ से गुणा कर ५ का

भाग देना, लब्धि अवस्था गत हुई उसके आगे की वर्तमान अवस्था हुई। उदाहरण￾चन्द्र ४ रा०-८०-५/-६” । यहाँ राशि के ४ छोड़कर शेष अंश ८९-४/-६” 2८ २=१६-

१०-११-४५ लब्धि ३ गत अवस्था हुई चोथी वर्तमान अवस्था हुई। ३०० में १२

अवस्थो तो इष्ट अंश में=१२-+ ३०=६्‌=% २-+ ५ अवस्था के नाम और फल ये हैं ।

नाम फल

(१) प्रवास प्रवास (यात्रा) (७) क्रीड़ित-सुख लाभ

(२) नाश= घन नाश (८) सुप्त-निद्रा, कलह, पीड़ा,

(३) मरण= मृत्यु भय (९) भुक्ति=भय

(४) जय= विजय (१०) ज्वराख्य-संताप

(५) हास्यः स्त्रियों से विलास (११) कंपिता=धनहानि

(६) रति= . प्रसन्नता, स्त्री संग (१२) सुस्िरता=सुख

२१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड

मेष राशि हो तो १ प्रवास से वर्तमान चन्द्रदशा तक गिनना, वृष राशि में

नाश से, मिथुन में मरण से ककं में जय से इसी प्रकार मीन में बारहवीं स्थिर दशा

से गणित से प्राप्त वर्तमान अवस्था की संख्या तक गिनने में जो अवस्था आवे उसे

लेना जैसे वृश्चिक के चन्द्र में ८ के आगे प्राप्त ४ तक गिना तो १५वीं कंपित आई ।

उपरोक्त कर्क के चन्द्र में वर्तमान चौथी अवस्था आई तो ४ जय से आगे गिना

चौथी क्रीडित अवस्था आई । अन्य मत से राशि कोई भी हो गति से जो वर्तमान

संख्या उसे प्रवास से ही गिनकर अवस्था निकालते हैं ।

अध्याय २३

पुन्या का फल विचार

जिस राशि पर मुंथा हो उस राशि का स्वामी मुंयेश कहलाता है। मुथा अपने

स्वामी (मुंथेश) से या शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो सुख होता है । यदि वह शत्रु पाप

अल्प वली ग्रह से दृष्ट हो तो भय और रोग होता है। भाव,दृष्टि और योग विचार

कर फल निर्णय करना ।

वर्ष लग्न से मुन्था ४, ७, ६, ८, १२ स्थानों में अशुभ फल देती है और ९,१०,

११ स्थानों में सुखदायक होती है और १, २, ३, ५, स्थान में उद्यम करने से धन

देती है ।

जो भाव पाप युक्त हो या जिस पर क्रूर ग्रह की शत्रु दृष्टि हो यदि उत भाव में

मुन्था हो तो वह शुभ स्थान गत भी हो तब उस स्थान का शुभ फल नहीं देती परन्तु

अशुभ फल बढ़ाती है ।

जो मुन्था शुभ ग्रह से या मुंथेश से युक्त दृष्ट हो तथा मुन्येश बलवान हो या

शुभ ग्रह या मुन्येश से इत्यशाली हो तो जिस भाव में वह मुन्या है उसके फल को

बढ़ाती है । अशुभ फल नहीं होता । इसके विपरीत हो अर्थात्‌ मुन्येश व शुभ ग्रहों से

युत दृष्ट न हो निबंल हो और पाप ग्रह से मूसरीफ योग करती हो तो उस भाव के

शुभ फल को नाश कर अशुभ फल बढ़ाती है।

जन्म लग्न से ४, ७, ६, ८, १२ स्थान में मुन्या हो पाप ग्रहों से युक्त दृष्ट भी

हो वैसी मुन्या वर्ष छग्न से जिस भाव में पड़े उस भाव के फल को नाश करती है ।

यदि शुभ ग्रह व अपने स्वामी से दृष्ट हो तो हानि नहीं होती शुभ ही' होता है ।

मुन्या जन्म लग्न से तथा वर्ष लग्न से शुभ स्थान में हो पाप युक्त या दृष्ट न

हो तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल बढ़ता है । जैसे जन्म लग्न से और वर्ष लग्न से

मुत्या का फल विचार : २१७

सुन्था पंचम स्थान में शुभग्रह या मुन्येश युक्त दृष्ट हो तो पुत्र वृद्धि करती है

इत्यादि । यदि जन्म तथा वर्ष लग्न से अनिष्ट स्थान में हो तथा पाप युक्त दृष्ट व

पाप से इत्थशाली हो तो उस भाव का फल अवश्य नष्ट होगा ।

जन्म लग्न से ४, ६, ८, १२ दुष्ट भाव में तथा वर्ष में भी अनिष्ट स्थानों में हो

पाप ग्रह युक्त दृष्ट स्वामी के अस्तंगत आदि से निर्बेल हो तो उस भाव को नाश

करती है और अपने स्वामी से युक्त दृष्ट व इत्यश्ाळ से शुभ फलद होती है ।

जन्म लग्न से मुन्था चतुर्थ भाव में शुभग्रह युक्त हों तो पिता को धन भूमि

राभ कराती है ऐसे ही पाप युक्त हो तो राजा से भय और आजीवन अति कष्ट

होवे । ऐसे ही जन्म लग्न से अष्टम में शुभ युक्त हो तो शुभ फल होगा पाप युक्त

होने से अनिष्ट फल देगी । ऐसे ही षष्ठादि स्थानों में भी विचारना ।

वर्ष लग्न में मुन्था स्वस्वामी या शुभग्रह युक्त दृष्ट जिस भाव में हो वह जन्म

सर्न से जो भाग में हो वह उस भाव की वृद्धि करती है। जैसे वर्ष में मुन्या चतुर्थ

में शुभ ग्रह वा स्वामी से युक्त दृष्ट है और जन्म लग्न से गिनने से यह भाव तीसरा

'होता है तो इस वर्ष में भाई के सम्बन्ध में शुभफल होगा । और पाप युक्‍त वा दृष्ट

जिस भाव में हो वह जन्म लग्न से जो भाव हो उसकी हानि होती है । परन्तु वर्षेश

ली तथा शुभ ग्रह हो तो पाप युक्त मुन्या का पूर्वोक्त फल नहीं होगा ।

मुन्थेश और वर्ष लग्नेश दोनों वक्री, नीच या अस्त हों तो उस वर्ष में घन

हानि, मानसिक चिता, सन्तान चिता आदि हो ।

जन्म लग्न से मुन्था ६-८-१२ भाव में हो और वर्ष में भी जिस भाव में हो

उस भाव की हानि होती है जैसे लाभ में हो तो लाभ भाव सम्बन्धी हानि हो ।

मुन्या, वर्ष मुन्थेश, वर्षेश, वर्ष लग्न और वर्ष लग्नेश ये सब पाप ग्रह से दृष्ट

हों तो उस वर्ष बहुत कष्ट हो ।

लग्न में वर्षेश होकर बुध मुंथा के साथ हो तो परीक्षा इण्टरभ्यु आदि में

सफलता हो ।

मुन्येश, वर्षे लग्नेश, वर्षश, और जन्म लग्नेश यदि ये ६-८-१२ में हों या पाप

युक्त या पाप दृष्ट हों तो उस वर्षे बहुत कष्ट हो ।

भाव के अनुसार वर्षे में मुन्या का फल

(१) लग्न में मुन्या--शत्रु का नाश, पुत्र लाभ, राजा की कृपा, सन्मान, प्रताप

की वृद्धि,शरीर पुष्टि, उद्योग से धन और सुख, मन में संतोष, पराक्रम ।

(२) द्वितीय भाव में मुन्या--उद्योग से धन लाभ, राजा का आश्रय, बन्धुओं से

-सन्मान, तेज वृद्धि, शरीर पुष्टि, सुन्दर भोजन, उत्साह, सुयश, तोथंगमन, सुखप्राप्ति

अनिष्ट का नाश हो, शत्रु को संताप हो ।

(२) तृतीय मे--पराक्रम से धन यश सुख लाभ, सहोदर वन्धुओं से सुख, शरीर

पुष्टि, राजा से सहायता मिले, जय प्राप्त हो, देव ब्राह्मण और गो में भक्ति, मनोरथ

पुणं हो ।

२१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(४) चतुर्थ में-शरीर पीड़ा, रोग, शत्रु से भय, मन में संताप (अशान्ति):

उद्योग में हीनता, निदा, वन्धुओं से विरोध, भय और दुःख की वृद्धि, राजा से भय,.

प्रतिज्ञा भंग ।

(५) पंचम में--धन लाभ, श्रेष्ठ बुद्धि, पुत्र लाभ, राजा की कृपा, प्रताप की'

वृद्धि, अनक भोग विलास, देव ब्राह्मण का पूजन, शरीर सुख, मन की व्यथा दूर हो,.

शत्रु का अपमान हो ।

(६) षष्ठ में -देह दुर्बल, शत्रु की वृद्धि, रोग हो, चोर व राजा का भय, कार्ये

और धन का नाश, वुद्धि भ्रंश, काय में पछतावा, कुटुम्व से बैर ।

(७) सप्तम में--स्त्री तथा बांधव से दुःख, शत्रु से भय, धन धर्म का नाश,.

उत्साह भंग, रोग और शोक हो, मति भ्रम, विरुद्ध कार्ये की चेष्टा हो, झंझट हो

(=) अष्टम में--शत्रु व चोर का भय, धन और धम का नाश, दुव्येसन , रोगः

हो, बल नाश, विदेश गमन, कलह से व्याकुलता, असंतोष, वर्ष भर अशुभ फल रहे।.

(९) नवम में--धर्म कायों में उत्साह, स्त्री पुत्र का सुख, भाग्योदय, परम यश,.

देव ब्राह्मण की पूजा, राजा से धन लाभ, पद प्राप्ति, कुटुम्बी व मित्रों से हित हो।

(१०) दशम में--राजा की कृपा, कीति विद्या धन की वृद्धि, परोपकार, सत्‌

कर्म की सिद्धि, देव ब्राह्मण की भक्ति, मनोरथ सिद्धि, अच्छी पदवी ।

(११) लाभ में--भाग्योदय, आरोग्यता, चित्त की प्रसन्नता, राजा के आश्रय सेः

धन लाभ, सु मित्र तथा पुत्रों से अभिमत प्राप्ति, मनोंरथ सिद्धि, ऐइवयं बढ़े ।

(१२) व्यय में मुन्था--अघिक खच, शरीर कष्ट, दुष्ट संगति, देह में रोग, घन"

और धर्म की हानि, सज्जनों से भी वर, उद्योग में विफलता, देव पूजा से चित्तः

उच्चाटन, लोगों से विरोध, कुटुम्ब से दुःख ।

वषं में ग्रह अनुसार मुन्था का विशेष फल

(१) सुर्ये-मुन्था सूर्य राशि में या सूर्य युक्त हों या किसी भाव में स्थित सूर्ये

से दृष्ट हो तो राज्य लाभ हो, राजा से मिलाप, गुणों की प्राप्ति हो दुसरे अच्छे.

स्थान की प्राप्ति हो भोग विलास आदि का सुख हो, ऐश्वयं मान वढे, शत्रु से

रहित हो ।

(र) चन्द्र--मुन्था चन्द्र राशि में या चन्द्र युक्त या दुष्ट हो तो धर्म और यश

की वृद्धि, निरोगता, संतोष और बुद्धि की वृद्धि हो । यदि पाप दुष्ट हो तो अत्यन्त

क्लेश होता है ।

(३) मंगल- यदि मंगल युक्त या दुष्ट या मंगल की राशि में हो तो पित्त

प्रकोप बढ़े गरमी का प्रकोप हो, शस्त्र से चोट लगे और. रुधिर पीडा हो, बन्ध्रुओं

और मित्रों में अरुचि, घर और भोजन में सुख न मिले, कुमति बढ़े यदि वंसी मुंथा

शनि से दुष्ट हो या शनि के घर में हो तो उक्त फल विशेष रूप से होता है ।

(४) बुध--यदि बुध युक्त या दुष्ट या बुध की राशि में हो या शुक्र युक्त

दृष्ट या शुक्र की राशि में हो तो स्त्री लाभ, बुद्धि वढे, अधिक यश हो, घर्मे ओर

मुन्या का फल विचार : २१९ -

सुख की वृद्धि हो, सन्मागे द्वारा द्रव्य लाभ, बन्धु मिलन, सत्संग, सत्कथा श्रवण) .

सन्मान बढे । यदि ऐसी मुन्था पर पाप दृष्टि या पाप युक्त हो तो कष्ट होता है ।

(४) गुरु-गुरु से युक्त या दृष्ट या गुरु की राशि में मुन्या हो तो पुत्र व पुत्री `

का सुख हो सुवणं वस्त्र और रतन का लाभ, सुकृत कार्य से मन, बुद्धि और ऐश्वयं

बढ़े । यदि शुभ ग्रह से मुन्था का इत्थशाल होता हो तो राज्य का लाभ होता है ।

(६) शुक्र--शुक्र युक्त यां दृष्ट मुंथा हो तो शत्रु का पराजय, बन्धु सुख, सुन्दर |

स्त्री का सुख, पुत्र सुख, सम्मान बढे, राजा के आश्रय से धन बढ़े 1

(७) शनि--शनि युक्त या दृष्ट या शनि की राश्षि में हो तो वात रोग हो,

अपमान हो, अग्नि भय, धन की हानि हो, मन में दुष्ट विचार, कल्ह से चिन्ता, -

ऐश्वर्य वाले उन्मत्त पुरुष से विभव रहित होवे यदि गुरु से इत्यशाल हो या गुरु कीः

दृष्टि हो तो शुभ फल की प्राप्ति होती है।

(८) राहू--मुंथा राहु के मुख (भोग्यांश) में हो तो धन की प्राप्ति, यश, सुख

और धर्मे वृद्धि हो यदि गुरु या शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो अच्छा स्थान (पद) की `

प्राप्ति होती है, सुवर्ण रत्न तथा वस्त्रों का लाभ होता है।

यदि मुन्था राहु के पृष्ठ (मुक्तांश) में हों तो शुभ फल नहीं मिलता । मुंया राहु

से सप्तम पुच्छ में केतु के साथ हो तो शत्रु से भय और कष्ट हो पदि पाप ग्रह से `

दुष्ट हो तो घर में संचित धन या घर और सम्पत्ति का नाश होता है।

जन्म लग्न से सप्तम स्थान में राहु रहने से धन और सम्पत्ति का नाश होता `

है | सारांश यह है कि जन्म काल में मुंथा जन्म लग्न पर ही रहती है और गत वषं `

तो है ही नहीं । और राहु के सप्तम स्थान में पुच्छ है। यदि लग्न से सप्तम स्थान

में राहु रहे तो सप्तम से सप्तम स्थान लग्न ही पुच्छ होगा । जन्म में वहीं पर सुन्या :

के रहने से उपरोक्त फल होगा ।

राहु के भोग्यांश मुख है भुक्तांश पृष्ठ है । जैसे मान लो राहु स्पष्ट ३-५-१०¬

१५ कर्क राशि का राहु है तो ककं के ५-१०-१५ ये भोग्यांश मुख कहलाये क्योंकि

वक्र गति से राहु चरता है और इन बंशों को ३० में से घटाने पर शेष २४-४९- `

५४ में भुक्तांश (पृष्ठ) हुए । ककं का राहु है तो इससे सप्तम मकर हुई यही राहु.

की पुच्छ हुई । राहु से सप्तम सदा केतु रहता है इससे राहु की पुच्छ केतु ही है ।

मुन्येश फल विचार

धन नाश रोग--मुन्था का स्वामी मुंथेश होता है । यदि मुन्थेश ६-८-१२-४

स्थान में हो.या अस्त हो या पापाक्रान्त राशि (क्रूर ग्रह) से ४ या सातवां हो अर्थात्‌ `

शत्रु दृष्टि हो तो शुभ फल नहीं होता रोगोत्पत्ति और धन नाश भी करता है।

मरण कष्ट--मुन्थेश वपं लग्न से अष्टमेश युक्त हो या क्षुत दृष्टि (१-४-७-

१०) से दुष्ट हो तो शुभ फल नहीं देता यहाँ यदि दोनों योग हों अर्थात्‌ दोनों ग्रह

एक साथ ही किसी राशि में हों तो मरण फल होता है। इसमें भी विचारना कि

यदि ६-८-१२ स्थान में यह योग हो अष्टमेश पाप से युक्त हो तो अवशय मरण हो।-

“२२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

यहाँ अष्टमेश का तथा मुन्येश का जो धातु हो उसके दोष से रोग कहना । एक ही

“योग हो अर्थात्‌ क्षुत दृष्टि से अष्टमेश से मुन्येश देखा जाय तो मरण के समान कष्ट

“होता है।

शुभ अंश फल- जन्म काल में मुन्था या मुन्थेश शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो

"तो पूर्वा में शुभ फल देता है । मुत्या और मुन्थेश दोनों शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हों

  • तो अति शुभ फल वपं के पूर्वाद्ध में देते है तथा वर्ष काल में मुन्या या मुन्थेश शुभ

ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो वर्ष के उत्तराद्ध में शुभ फल देते हैं तथा मुन्था मुन्येश शुभ

ग्रह युक्त दुष्ट हो तो अति शुभ फल वर्ष के उत्तराद्ध में हो। ऐसे ही जन्म में मुन्या

-मुन्थेश में से एक भी पापग्रह युक्त या दृष्ट हो तो वर्ष के पूर्वाद्ध में अशुभ फल

«हो । दोनों पाप युक्त दृष्ट हों तो अति अशुभ । यदि वर्ष में मुन्या मुन्येश में से एक

ग्रह पाप युक्त दृष्ट हो तो वर्ष के उत्तराद्ध में अशुभ फल यदि दोनों में हो तो अति

अशुभ फल हो ।

भय, कष्ट, कलह--मुन्येश द्वादश और अष्टम स्थान में वलहीन हो पाप ग्रह

  • या पाप ग्रह के वर्ग में हो तो उस वर्ष कष्ट, भय, मनुष्यों से विवाद और स्वजनों के

साथ अत्यंत कलह हो ।

मित्रता, श्रेष्ठ बुद्धि-वर्ष में मुन्येश, नवम, लाभ, तृतीय या केन्द्र में हो तो

“राजाओं के साथ मित्रता हो प्रताप बड़े बुद्धि श्रेष्ठ हो ।

सुख--मुन्येश, वर्ष लग्नेश, जन्म ऊग्नेश बलवान्‌ होकर केन्द्र त्रिकोण धन या

“लाभ स्थान में हो तो धन सुवर्ण, वस्त्र आदि की प्राप्ति हो सुख हो ।

सन्मान, धन- मुन्येश या उसका मित्र शुम ग्रह हो और बली होकर मुन्था

को देखता हो तो मनोरथ पूर्ण हो, राजा से सन्मान व धन लाभ हो ।

बल अनुसार फल--शुभ-अशुभ मिश्रित मुंथा का फल मुन्थेश की दशा में

“विचारना । मुन्थेश पूर्ण बली हो तो पूर्ण फल, मध्यम वली से मध्यम और हीन बली

  • से हीन फल अनुमान करना । मुन्था जिस ग्रह से युक्त हो उस ग्रह का वल भी देख

कर फल निर्णय करना ।

कष्ट पीड़ा--मुन्थेश और लग्नेश एक साथ अष्टम में हों तो मरे हुए सदृश कर

१ देता है या कंठावरोध, रक्त विकार या गुह्य न्द्रिय पीड़ा करता है ।

रोग पीड़ा--मुन्थेश अष्टम हो दशमेश नवम पंचम घर में हो तो शरीर पीड़ा

` आतृ कष्ट या गुल्म रोग हो ।

धन सुख, लाभ--मुन्थेश बलवान हो वर्ष छग्नेश या जन्म लग्नेश केन्द्र त्रिकोण

“या धन में हो तो सुख हो धन सुवणं वस्त्र आदि का लाभ हो ।

सुख कीति--मुन्थे केन्द्र त्रिकोण लाभ या धन स्थान में हो तो राज्य सुख,

~कीति बंधु सुत आदि का सुख हो !

रोग से शरीर नष्ट-मुन्थेश अष्टम हो अष्टमेश सूर्यं मंगळ से युक्त हो तो कफ,

शपित्त रोग से शरीर नष्ट हो ।

पमपपदपपउथ रमट डक ६४८:४-५०५२५-०४-बप्फनन- कळ र्‍या रमे

मुन्या का फल विचार : २२१४

निधन--मुन्येश त्रिराशीश जन्म लग्नेश ये अस्त सप्तम में हों वर्षेश नीच का

हो तो उसका निधन हो कोई भी उसकी रक्षा नहीं कर सकता ।

अरिष्ट दूर धन प्राप्ति--मुन्येश निज भाग्य स्थान में हो तथा उच्च में होकर

आवी मित्र से दृष्ट हो तो अरिष्ट नाश होकर धन रत्न सुवर्ण आदि की प्राप्ति

पेट में रोग--ुन्थेश अस्त हो लग्नेश नीच में हो तो उस वर्ष अरिष्ट हो औरः

पेट में रोग हो ।

प्रताप सन्मान--मुन्येश ११-३-१-४-७-१० स्थान में हो तो प्रताप बढ़े राजाः

से सन्मान प्राप्त हो ।

अरिष्ट नाश--मुन्थेश नवम स्थान में हो उच्च में हो शुभ ग्रह या मित्र ग्रह से

दृष्ट हो तो धन वाहन सुवर्ण रत्न आदि प्राप्ति होकर अरिष्ट दूर हो ।

गुल्मादि रोग अरिष्ट--मुन्येश अष्टम हो मुन्या छठे घर में होतो उदर मे

गुल्म आदि रोग हो स्त्री को पीड़ा हो अरिष्ट हो ।

मृत्यु--मुन्येश और लग्नेश ६-८ घर में क्रूर ग्रहों से युक्त हों तो अपनी दशा में _

मृत्यु करते हैं यदि शुभ दृष्टि हो तो आधा फल हो ।

अरिष्ट नाश--मुन्थेश्ष सहज भाव में शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो सप्तम में सूयं

हो तो अरिष्ट नाश हो ।

लाभ--मुन्येश पंचम हो उसका स्वामी नीच का भाग्य स्थान में हो तो बहुत

लाभ हो राजा तुल्य करें। _

अरिष्ट नाश--मुन्येशा केन्द्र मै हो बलवान 'लग्नेदा केन्द्र में हो और वर्षेश सप्तम

हो तो मुंथा कृत अरिष्ट का नाशक हो 9

अरिष्ट नाश--मुन्येश तीसरे घर में जन्म लरनेषा और सौम्य ग्रह से युक्त हो

तो सम्पूर्ण अरिष्ट नाश हो ।

निरोग्यता-मुन्येश दशम में हो सौम्य ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो निरोग्यता, अर्थ

की प्राप्ति होकर बाहुबल का प्रताप बड़े।

मास प्रवेश में माब गत सून्या फल

(१) लग्न में मास मुन्या-राजा से घन का लाभ और यश, शरीर सुख, मित्र

का लाभ, स्त्री के साथ विलास सुख, पुत्रों में हर्ष 1

(२) द्वितीय में-राजा से धन लाभ, शत्रु नाश, मित्रों से सुख, मिष्ठान्न भोजन,

०, श्रेष्ठ बुद्धि न

(३) तृतीय में-राजा से धन का लाभ, पराक्रम, बड़ी बुडि, भाई से व स्वजनो

से सुख, अनेक विलास । 9

(४) चतुर्थ में-धन की हानि, खेती की हानि, शत्रु भय, शरीर दुर्बल,

अधिक दुःख । ुँ

(५) पंचम में-पुत्रों से सुख, बुद्धि बढ़ो, कार्यों की सिद्धि, कीर्ति हो, देव ब्राह्मण

में भक्ति ।

२२२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(६) षप्ठ में-राजा से भय, चोर से धन हानि, वलहीन, पुत्र को कष्ट, कार्य “में शत्रुता बढ़े ।

(७) सप्तम में-स्त्री को कष्ट, शरीर में पीड़ा, धन नाश, शत्रुता बढ़े, मानसिक

चिन्ता ।

(८) अष्टम में-धन हानि, रोग वृद्धि, शत्रुता बढ़े, मित्र चिन्ता, वळ और धन

` से भय।

(९) नवम में-भाग्य की वृद्धि, स्वजनों से सुख, प्रसिद्धि प्राप्त हो, पुत्र आदि की

शक्ति में वृद्धि । है

(१०) दशम में-राजा से मनोरथ सिद्धि, स्त्री का सुख, स्वजनों से सुख,

“शरीर सुन्दर । :

(१०) लाभ में-राजा से धन प्राप्ति, सुवर्ण आभुषण वस्त्र तथा धन का लाभ,

  • देव ब्राह्मण की भक्ति, स्त्री का सुख ।

(१२) व्यय में-मन में व्याकुछता, अति खर्च; राजा और शत्रु से भय, खेती -से व्यय ।

अध्याय २४ .

सहमेश का बल विचार .

जिस स्थान में सहम हो उस राशि का स्वामी सहमेश कहलाता है ।

सहमेश अपने उच्चादि शुभ स्थानों में होकर लग्न को या अपने सहम को देखे *तों सहम बलवान होता है । जो लर्न को न देखे और बल में निर्वल हो वह निर्बल होता है। १ जन्म कालिक सूर्य राशीश, २ जन्म कालिक चन्द्र राशीश, ३ जन्म मास की पूर्ण मासी जिस लग्न में अन्त हो उसका स्वामी, ४ जन्म मास की अमावस्या जिस लग्न में अन्त हो उसका स्वामी इन का बल भी विचारना । जो ग्रह पंचवर्गी बल में ५ से कम बली हो तथा हर्ष स्थान में न हो लग्न को न देखे वह निर्बल होता है। जो त्रैराशिक (द्रेष्काण) मुसल्लह (नवांश) लघु स्थान में भी हो और लग्न को देखे तो भी बली होता है। स्वगृहोच्च-महाअधिकार है । स्व हृद्य मध्यम और स्वद्रेष्काण, स्व नवांश स्वल्प अधिकार हैं । सहम--जो सहम अपने स्वामी जो चाहे शुभ या पाप ग्रह युक्त दृष्ट हो तथा" शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हो तथा सहमेश पूर्वोक्त प्रकार से बली हो तो उस सहम की वृद्धि होती है।

जो सहम शुभ ग्रह तथा अपने स्वामी से युक्त दृष्ट न हो वह सहम निर्वल होता -है। फल देने में उस की सामं नहीं रहती ।

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सहमेश का बल विचार : २२३

जो सहम वपं लग्न से या अपने स्थान से अष्टमेश से युक्त वा दृष्ट हो और याप ग्रह से युक्त वा दृष्ट हो या पूर्वोक्त अष्टमेश से वा पाप ग्रह से सहमेश इत्यद्षाली' हो तो पूर्वोक्त शुभ फल प्रद लक्षण युक्त भी हो तो भी निवळ समझा जायगा । फल -देने की सामर्थ उसमें नहीं होती । जन्म में प्रथम इसी बल को देख लेना ।

जन्म में सहमों का वलाबल विचार कर वर्ष में भी वल देखना जिसका बल 'अंधिक हो फल देने में समर्थ हो उन्हें ही वर्ष में स्थापना करना । जो फल देने में “समर्थ न हो उसे छोड़ देना ।

सहम फल विचार

(१) पुण्य सहम--पुण्य सहम वलवान हो शुभ ग्रह व स्वस्वामी से युक्त दृष्ट 'हो तो धर्म प्राप्ति और धन का लाभ होता है। इसके विपरीत हो अर्थात्‌ बल रहित हो और पाप युक्त दृष्ट हो तो विपरीत फल हो अर्थात्‌ धन और धमं की हानि होगी ।

पुण्य सहम वर्ष लग्न से ६-८-१२ स्थानों में हो तो धमं भाग्य और यश का “हरण हो । और शुभ ग्रह स्वस्वामी से युक्त दृष्ट हो तो वर्ष के अन्त में सुख धर्म आदि संभव होता है. |

जो पाप आदि युक्त दृष्ट से अशुभ फळ कहा है वह वर्ष के पूर्वाद्ध में होता है । :स्वस्वामी का शुभ युक्त दुष्ट सहम वर्ष के उत्तराद्धं में अर्थात्‌ प्रवेश से ६ मास पश्चात्‌ सोख्य आदि फल देता है । पुण्य आदि सहम पाप युक्त और . शुभ दृष्ट हो तो वर्ष के पूर्वाद्धं में अशुभ उत्तराद्धं में शुभ फल देते हैं। जो शुभ युक्त और पाप दृष्ट हो तो पूर्वाद्धं में शुभ फल उत्तराद्धे में अशुभ फल देते हँ । जो पाप युक्‍त और पाप दृष्ट भी हों तो पूरे वर्ष अशुभ फल होता है । जो शुभ युक्‍त और शुभ दृष्ट भी

'हो तो पूरे वर्ष शुभ ही फल होगा । कर Tn

जिस वर्ष में पुण्य सहम पूर्वोक्त विधि से शुभ हो तो वह समस्त ही शुभ होता “है और सहम अनिष्ट भी हो तो अनिष्ट फल सहसा नहीं दे सकते । जिसमें पुण्य

सहम अशुभ है वह वर्ष अशुभ ही व्यतीत होता है। और सहम शुभ भी हों तो शुभ

"फल नहीं देते । इस कारण जन्म और वर्ष में पुण्य सहम का अवश्य विचार करना ।

जन्म में पुण्य सहम लग्न से ६-८-१२ वाँ हो और वर्ष में पाप युक्त हो और

'सहमेश अस्तगत हो तो धन-धर्म और सुख का नाश करता है।

उक्त प्रकार से सम्पूर्णं सहम जन्म और वर्षे में विचारना चाहिए ।

रोग, शत्रु, काल, मृत्यु सहम पुण्य सहम बलवान होने से धन आदि का लाभ

होता है, परन्तु, रोग, शत्रु, कलि और मृत्यु सहमों का फल विपरीत होता है। ये

अनिष्ट सहम हैं। इनके बलवान होने से अनिष्ट फल अधिक होता है। ये सहम

'निर्बेल हों तो अनिष्ट फल कम होगा तब वर्ष आदि में शुभ फल हो।

कार्यं सिद्धि सहम--शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो या शुभ ग्रह से मुन्थशिळकारी

हो तो संग्राम में जय हो शुभ युत दृष्ट और शुभ मुंथशिली भी हो तो विशेषकर जय