साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
२२४ श्रीसाम्बपुराणम्
मुनिगण कहते हैं—हे महातेजस्वी! यदि आप प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तब हे देवेश! आपकी कृपा से हम इस जगत् के सृष्टिकर्त्ता हो जायें॥२४॥
वशिष्ठ उवाच तत्प्रसन्नो महातेजाः पुनर्वचनमब्रवीत्। एवं भवतु भूयोऽपि प्रजासर्गं प्रकल्प्यथ॥२५॥ अन्यच्छृणुत वक्ष्यामि कीर्त्तिकारणहेतुना। इदं तपोवनं रम्यं यदा स्थानमनुत्तमम्॥२६॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—उनके प्रति सन्तुष्ट होकर महातेजस्वी सूर्यदेव पुनः कहते हैं—ऐसा ही हो। तुम प्रजासृष्टि करो। और भी सुनो, यह कीर्ति का हेतु होगा। यह स्थान अतुलनीय रम्य तपोवन होगा॥२५-२६॥
श्रुत्वा तु निर्मलं वाक्यं ते वै प्राहुर्दिवाकरम्। त्वत्प्रसादेन चास्माकं देव यत्प्रीतिकारकम्॥२७॥ कीर्त्यर्थं प्रतिलप्स्यामो रोचयस्व दिवाकर। इदं स्थानं समासाद्य वयं तीर्णाः सुरप्रभो॥२८॥ प्रजानां च हितार्थाय ममैवानुग्रहाय च। अत्र कीर्तिं करिष्यामः प्रसादात्तव भास्करः॥२९॥
यह सुनिर्मल बात सुनकर मुनिगण पुनः दिवाकर देव से कहते हैं—हे देव! आपकी कृपा से हमारे लिये जो कीर्तिकर है, उसे हमने प्राप्त किया। हे दिवाकर! आप प्रकाशित हो जायें। हे देवताओं के स्वामी! इस स्थान को प्राप्त करके हम उत्तीर्ण होंगे। प्रजागण के कल्याण के लिये यह हम पर अनुग्रह का निमित्त है। हे भास्कर! आपकी कृपा से हम कीर्त्ति प्राप्त करेंगे॥२७-२९॥
देव उवाच दत्वा यूयं मम स्थानं सप्तद्वीपेषु दुर्लभम्। मन्वन्तरमथैकं च कीर्त्तिमन्तो भविष्यथ॥३०॥ मन्त्रसिद्धास्तु ये चान्ये मुनयश्च सुरोत्तमाः। मम स्थानरताः सर्वे तेनोर्ध्वं नैव भाषितम्॥३१॥
सूर्यदेव कहते हैं—सप्त द्वीपों के मध्य मेरे इस दुर्लभ स्थान को दान करके तुम एक मन्वन्तर-पर्यन्त कीर्तिमान रहोगे। अन्य जो मन्त्रसिद्ध मुनिगण तथा देवश्रेष्ठ लोग हैं, वे मेरे इस स्थान की सेवा करके ऊर्ध्वलोकों में गमन करेंगे। इस विषय में और कुछ नहीं कहना है॥३०-३१॥
एकोनविंशतिः शून्यै रूपैरेकावसानकैः ।
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२५
नारद उवाच
एकोनविंशतिः शून्यै रूपैरेकावसानकैः ।
एतैः प्रमाणैर्वषाणां गण्डको ब्रह्मणः स्मृतः ॥३२॥
गण्डानां शतसाहस्रैर्मनुरेकः प्रकीर्त्तितः ।
याम्येन च पुरा कुर्यात्ततः स्वारोचिषेण च ॥३३॥
तृतीये मन्वन्तरे देवश्चतुर्थे कीर्त्तितो मनुः ।
पञ्चमे मन्वन्तरे सत्यः षष्ठे ऋतुश्च कीर्त्तिमान् ॥३४॥
सप्तमे सनत्कुमारस्तु कीर्त्तितं भुवनं रवेः ।
वैवस्वतेन मनुना वर्त्तमानेन कीर्त्तितम् ॥३५॥
अत ऊर्ध्वं भवेच्छम्भुः शम्भोरूर्ध्वं महानसः ।
महानसाद्वशिष्ठश्च ततः कल्पः समाप्यते ॥३६॥
इति श्रीशाम्बपुराणे यात्रानियमो नाम द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
नारद कहते हैं—उन्नीस शून्य रूप १९ प्रमाण वर्ष को ब्रह्मा का गण्डक कहते हैं। शतसहस्र गण्डक को एक मनु का काल कहते हैं। प्रथम है—याम्य मन्वतर एवं द्वितीय है—स्वारोचिष। इसी प्रकार तृतीय है—सूर्यदेव एवं चतुर्थ मन्वन्तर है—मनु। पञ्चम मन्वन्तर है—सत्य एवं षष्ठ है—कीर्तिमान केतु। सनत्कुमार को रवि का भुवन कहा गया है। वर्तमान में वैवस्वत मनु का काल है। इसके पश्चात् होगा शम्भु, तदनन्तर महानस, तत्पश्चात् होगा वशिष्ठ। तदनन्तर कल्प समाप्त हो जाता है।।३२-३६।।
श्री साम्बपुराणोक्त यात्रानियम नामक बयालीसवाँ अध्याय समाप्त
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(सूर्यस्तुतिः भक्तमाहात्म्यञ्च)
वसिष्ठ उवाच
तस्मिंस्तपोवने देशे तीरे तु लवणोदधेः ।
तिष्ठन्ति ये च सम्प्राप्ता देवदर्शनकाङ्क्षिणः ॥१॥
केचिद् ध्यायन्ति पूतात्मा केचित्तद्गतमानसाः ।
यजन्ति हव्यसम्पन्नाश्चिन्तयन्त्यात्मतत्पराः ॥२॥
गायन्ति सिद्धगन्धर्वा नृत्यन्त्यप्सरसांवराः ।
वीणाहस्ताश्च ये केचिदर्घहस्तास्तथापरे ॥३॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—लवणसमुद्र के तीर पर तपोवन देश में देवदर्शन की इच्छा से जो स्थित थे, उनमें पूतचित्त होकर कोई ध्यान कर रहा था, कोई तद्गत चित्त होकर स्थित था, कोई हव्यादि यज्ञ में रत था तो कोई आत्मनिष्ठा-चिन्तन में लीन था। सिद्ध तथा देवगण गायन कर रहे थे, श्रेष्ठ अप्सरायें नृत्यरत थीं। उनमें किसी के हाथों में वीणा थी तो कोई अर्घ्य हस्त (अर्घ्य प्रदान) था॥१-३॥
कृताञ्जलिपुटाः केचित् केचिदानतमस्तकाः ।
योगिनो योगचित्ताश्च मुनयो यतमानसाः ॥४॥
ऋषयः क्षान्तिसंयुक्ता देवाः स्तुन्वन्ति भास्करम् ।
यातुधानास्तथा यक्षाः सिद्धाश्चैव महोरगाः ॥५॥
दिक्पाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविनायकाः ।
सर्वे भक्तिपरा भूत्वा तिष्ठन्ति सूर्यकानने ॥६॥
कोई अञ्जलियुक्त था, किसी ने मस्तक झुका रखा था। योगचित्त योगीगण, यतमानस मुनिगण, क्षमान्वित ऋषिगण तथा देवगण भास्कर की स्तुति कर रहे थे। ऐसे ही यातुधान, यक्ष, सिद्ध, महासर्पगण, दिक्पालगण तथा विघ्ननाशक लोकपालगण भक्तितत्पर होकर सूर्यवन में स्थित थे॥४-६॥
क्षीणगात्रेन्द्रियप्राणा देवाराधनतत्पराः ।
जागरार्त्तिपराः क्लिष्टा अध्वभिः परिपीडिताः ॥७॥
स्तूयमानाः स्थिताः सर्वे भास्करोदयकाङ्क्षिणः ।
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२७
उनके शरीर, इन्द्रियाँ तथा प्राण शीर्ण हो गये थे। वे देवता (सूर्य) की आराधना में लगे थे। जागरण से थके, क्लान्त, आर्त्त तथा पथ चलने से प्रपीड़ित थे। सूर्यदेव की कृपाकांक्षार्थ वहाँ सभी स्तवन कर रहे थे।।७।।
ततः प्रभातसमये पद्मरागारुणप्रभे ॥८॥
विमला भूर्दिशः सर्वाः किरणोद्योतने रवेः।
स्तूयमानाः स्थिताः सर्वे भास्करोदयकाङ्क्षिणः ॥९॥
तदनन्तर पद्मराग के समान अरुणवर्ण प्रभात में पृथ्वी तथा समस्त दिशायें उदीयमान सूर्य-किरणों से निर्मल हो गयीं और सूर्यदेव के उदय की अपेक्षा में सभी स्तव करने लगे।।८-९।।
रविरागारुणीभूतसागराकाशभूतलम् ।
तत्क्षणेनैव सर्वांसामैकज्वालात्वमागताः ॥१०॥
तस्यामुदयवेलायां विवस्वद्धयैकमास्पदम्।
वीक्ष्यमाणाद्भुतं रूपं विराजन्तं दिवाकरम् ॥११॥
दिविस्थं सागरस्थं च द्विविधं मण्डलोद्यतम्।
अपरा भगवन्मूर्तिर्जलमध्ये विराजते ॥१२॥
पूर्वेदित रविकिरणों के अरुण वर्ण से सागर-आकाश-भूतल में मानो सूर्यरश्मि की ज्वाला आ पड़ी। उस उदयकाल में सूर्य ही एकमात्र अवलम्बन थे। अपूर्व रूप में विराजित सूर्यदेव की मूर्त्ति (आकृति) परिलक्षित होने लगी। आकाश तथा सागर में दो मण्डल देखे गये और एक अन्य भगवद् मूर्त्ति (सूर्यदेव की मूर्त्ति) जल में भी विराजित दिखाई देने लगी।।१०-१२।।
सर्वे विस्मयमापन्ना दृष्ट्वा चाद्भुतदर्शनम्।
मनवो बाहुसंवाहैरवतीर्णा महोदधिम् ॥१३॥
इस अलौकिक दर्शन को देखकर सभी विस्मित हो गये। तभी मनुगण बाँहें फैलाये महासमुद्र में अवतीर्ण हो गये।।१३।।
बाहुभिः संगृहीत्वा तु ह्यानयित्वा तपोवनम्।
स्थापयित्वा विधानेन मनवे हृष्टमानसाः ॥१४॥
स्तोत्रैः स्तुवन्ति ते चित्रैः साङ्गोपाङ्गैः सुसम्मितैः।
त्वं देव प्रलयः कालः क्षयः क्षान्तः क्षपानलः ॥१५॥
उद्भवः स्थितिसम्पत्तिः प्रजास्ते चाङ्गसम्भवाः।
सोषवर्षहिमं घर्मप्रह्लादं सुखशीतलम् ॥१६॥
त्वं देव ऋषिकर्त्ता च प्रकृतिः पुरुषः प्रभुः।
छाया संज्ञा प्रतिष्ठापि निरालम्बो निराश्रयः ॥१७॥
२२८ | श्रीसाम्बपुराणम्
हृष्टचित्त मनुगण उन्हें बाहुओं में उठाकर तपोवन में लाये एवं यथाविधान से उन्हें स्थापित करके सुसम्मत साङ्गोपाङ्ग विधि के साथ विचित्र स्तवन करने लगे। हे देव! आप प्रलय हैं। कालस्वरूप हैं। क्षमागुणान्वित हैं। रात्रि में अनल के समान हैं। आप सृष्टि-स्थितिकारक हैं। प्रजागण आपके अंगों से उत्पन्न हैं। आप शोषण (जलशोषण), वर्षण (शोषण के द्वारा वर्षण), हिम, घर्म, आनन्द, सुख तथा शीतलताकारक भी हैं। हे देव! आप ऋषियों के स्रष्टा हैं। आप ही पुरुष-प्रकृति तथा प्रभु हैं। आप ही छाया तथा संज्ञा (सूर्यपत्नीद्वय) की प्रतिष्ठा हैं। आप निरालम्ब तथा निराश्रय हैं।।१४-१७।।
आश्रयः सर्वभूतानां नमस्तेऽस्तु सदा मम।
त्वं देव सर्वतश्चक्षुः सर्वतः सर्वदा गतिः ॥१८॥
सर्वदः सर्वदा सर्वः सर्वसेव्यस्त्वमार्त्तिहा।
त्वं देव ध्यानिनां ध्यानं योगिनां योग उत्तमः ॥१९॥
त्वं भासा फलदः सर्वः सद्यः पापहरो विभुः ।
सर्वार्त्तिनाशं नोऽनाशीकरणं करुणाप्रभुः ॥२०॥
आप ही समस्त प्राणीगण के आश्रय हैं। आपके प्रति सर्वदा हम प्रणत रहें। हे देव! आप सर्वत्र देखते हैं। सर्वदा सभी ओर आपकी (अव्याहत) गति है। आप सर्वदा सबको सब कुछ देते हैं। आप सर्वस्वरूप हैं। सबके सेव्य तथा आर्तिनाशक हैं। हे देव! आप ध्यानीगण के ध्यान तथा योगीगण के उत्तम योग भी हैं। आप प्रकाशक, फल देने वाले, सर्वरूप तथा तत्क्षण पापहर्त्ता हैं। आप विभु हैं। सबकी आर्त्ति के नाशक, स्थितिकारक तथा करुणा करने में समर्थ हैं।।१८-२०।।
दयाशक्तिः क्षमावासः सघृणिर्घृणिमूर्त्तिमान् ।
त्वं देव सृष्टिसंहारस्थितिरूपः सुराधिपः ॥२१॥
बकः शोषो वृको दाहस्तुषारो दहनात्मकः ।
प्रणतार्त्तिहरो योगी योगमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥२२॥
त्वं देव हृदयानन्द शिरोरत्नप्रभामणिः ।
बोधकः पाठको ध्यायी ग्राहको ग्रहणात्मकः ॥२३॥
त्वं देव नियमो न्यायी नायको न्यायवर्द्धनः ।
अनित्यो नियतो नित्यो न्यायमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥२४॥
त्वं देव त्रायसे प्राप्तान् पालयस्यर्णवस्थितान् ।
ऊर्ध्वं त्राणार्दितांल्लोकांल्लोकचक्षुर्नमोऽस्तु ते ॥२५॥
आप दया, शक्ति तथा क्षमा के आश्रय हैं। कृपा तथा करुणा की मूर्ति हैं। हे देव! आप सृष्टि-संहार तथा स्थितिरूप हैं। आप समस्त देवताओं के अधिपति हैं। आप बकरूप हैं, पोषक हैं, वृकस्वरूप, दाहक, तुषार तथा दहनात्मक हैं। प्रणतजनों की आर्ति का
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २२९
हरण करने वाले आप योगी हैं। हे योगमूर्तिरूप! आपको नमस्कार है। हे देव! आप हृदयानन्द-दायक हैं, मस्तक के रत्नरूप प्रभामणि हैं। आप ही बुद्धि देने वाले, पाठक, ध्यानकारक, ग्राहक तथा ग्रहणरूप भी हैं।
हे देव! आप नियम, न्यायनिष्ठ, न्यायप्रवर्त्तक तथा न्यायवर्द्धक हैं। अनित्य होते हुये भी सदा नित्यरूप, न्यायमूर्त्ति हैं। आपको नमस्कार है। हे देव! आप प्रपन्न का त्राण करते रहते हैं। समुद्रस्थित जनों का पालन करते हैं और उन्हें कष्टदायक लोकों से उठाकर ऊर्ध्व में ले जाते हैं। आप लोकचक्षु हैं, आपको नमस्कार है।।२१-२५।।
दमनोऽसि त्वं दुर्दान्तः साध्यानां चैव साधकः।
बन्धुस्त्वं बन्धुहीनानां नमस्ते बन्धुरूपिणे ॥२६॥
कुरु शान्तिं दयावास! प्रसीद जगतः पते।
यदस्माभिरिहितं वाक्यमभीष्टं कीर्त्तितं प्रभो ॥२७॥
आप दमनकारी तथा दुर्दान्त हैं। साध्य के साधक एवं बन्धुहीन के बन्धुस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। हे दयाश्रय! आप शान्तिविधान करें। हे जगत् के पालक! प्रसन्न हो जाईये। हे प्रभु! हमने हितकारी अभीष्ट वाक्य कहा है।।२६-२७।।
एवं श्रुत्वा ततः सर्वे पप्रच्छुः प्रतिमां रवेः।
केनेयं निर्मिता मूर्त्तिः केन त्वं प्रतिपादितः।
कस्मादिहागतो देव संशयोऽत्र नियच्छ नः ॥२८॥
इस प्रकार सुनकर सबने तब सूर्यप्रतिमा से जिज्ञासा किया—किसने इस मूर्ति का निर्माण किया? किसने आपको प्रतिपन्न किया? किसलिये आप यहाँ आये? हे देव! हमारा सन्देह दूर करिये।।२८।।
देव उवाच
तस्मिन् काले समादेशान्निर्मिता विश्वकर्मणा।
सर्वलोकहितार्थाय ससुरैरर्चिता पुरा ॥२९॥
तस्मिन् हिमवतः पृष्ठे कल्पवृक्षे निधापिता।
तस्मात्तु चन्द्रभागायां प्रविष्टा स्थानकारणात् ॥३०॥
चन्द्रभागात्तु वैपाशं वैपाशाच्च शतद्रवम्।
शतद्रवाच्च विजेया प्रविष्टा यमुनां नदीम् ॥३१॥
यमुनातो जाह्नवीं च तयानीता शनैः शनैः।
भागीरथीतो विजेया मोदगङ्गा महानदी ॥३२॥
ममैवानुग्रहेणासौ तीर्थानां प्रवरः स्मृतः।
तस्माद्वै मोदगङ्गायाः प्रविष्टा लवणोदधिम् ॥३३॥
साम्प्रतं च प्रवर्त्तध्वं स्थापनं मे मनूत्तमाः।
२३० श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्यदेव कहते हैं—एक बार समस्त लोकों के हितार्थ आदेश पाकर विश्वकर्मा ने इस मूर्त्ति का निर्माण किया है। पूर्वकाल में देवताओं के साथ विश्वकर्मा ने इस मूर्ति का अर्चन किया था। तब हिमालय के पृष्ठदेश में कल्पवृक्ष की स्थापना की थी। वहाँ से स्थान के लिये चन्द्रभागा में प्रविष्ट हुये थे (मूर्त्ति प्रविष्ट हुई थी)। चन्द्रभागा से वैपाश में, वैपाश से शतद्रु में एवं वहाँ से यमुना नदी में प्रविष्ट जानना चाहिये। यमुना से धीरे-धीरे जाह्नवी में आयी। वहाँ से महानदी मोदगंगा में, तदनन्तर मोदगंगा से लवणसमुद्र में मूर्त्ति प्रविष्ट हो गयी। हे मनुष्यश्रेष्ठ! अब मुझे स्थापित करने का कार्य करो।।२९-३३।।
श्रुत्वा देवास्तु तद्वाक्यं निर्मलं प्रीतिवर्द्धनम् ॥३४॥
प्राञ्जलिप्रणता भूताः स्तूयमाना रविस्थिता।
ततो वैवस्वतः प्राज्ञः सर्वधर्मप्रणोदितः ॥३५॥
कारयामास विप्रान्तु विदुर्दैवालयं शुभम्।
स्थापयित्वा रविं भक्त्या त्रिःस्थानेषु सुरोत्तमाः ॥३६॥
निवृत्तिं याति सुकृतो देवकार्यार्थतत्पराः।
सर्वे दीक्षापरा भूत्वा भास्कराद् विधिकाङ्क्षिणः ॥३७॥
देवगण उनकी निर्मल प्रीतिवर्द्धक वाणी सुनकर अञ्जलिबद्ध मुद्रा में प्रणत होकर भगवान् सूर्य की स्तुति करने लगे। तब समस्त धर्मों के प्रेरक वैवस्वत ने ब्राह्मणों द्वारा सूर्य का शुभ देवालय प्रस्तुत कराया। उत्तम देवगणों ने तीन स्थानों पर (सूर्य की तीन मूर्त्ति थी) भक्तिपूर्वक सूर्य को स्थापित करके निवृत्ति प्राप्त की। तदनन्तर देवकार्य में तत्पर उन लोगों ने दीक्षा ग्रहण करके सूर्यदेव से विधि एवं नियम जानने की इच्छा व्यक्त की।।३४-३७।।
यतोऽधिमण्डलं कुर्युस्तद्गतैरन्तरात्मभिः।
लिखितं मण्डलं दिव्यं यथोक्तं भास्करेण तु ॥३८॥
यथाविधि समुद्दिष्टं क्रियां सौरिसमाश्रिताम्।
विश्वकर्माभ्यनुज्ञाय सवर्णां मूर्द्धजाः प्रजाः ॥३९॥
ततो नाम प्रकुर्वन्ति सम्प्रहृष्टतनूरूहाः।
अनेन मुण्डिताः सर्वे तेन मुण्डित उच्यते ॥४०॥
उन्होंने अन्तःकरण के तद्गत भाव से अधिमण्डल की भावना किया (बनाया)। तदनन्तर भास्कर द्वारा कथित दिव्य मण्डल अंकित किया। विश्वकर्मा की अनुमति से सूर्य से सम्बन्धित यथाविधि क्रिया सम्पन्न की। सबके ऊपर प्रजा थी अर्थात् सबसे पहले प्रजा (उपस्थित लोग) का प्रसङ्ग लिया गया। तत्पश्चात् हृष्ट तथा रोमाञ्चित होकर प्रजागण का नामकरण किया गया। सबने मुण्डन कराया था, इसलिये उन्हें 'मुण्डित' कहा गया।।३८-४०।।
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३१
अथ कृतार्थसंज्ञाश्च निगमज्ञैरुदाहृताः ।
मुडि प्रमर्दने धातुः संज्ञायां च विधीयते ।
प्रकर्षाद्दर्द्येद्येन तेन मुण्डीर उच्यते ॥४१॥
शास्त्रज्ञों द्वारा इनका नाम यथार्थ संज्ञा वाला हो गया। प्रदर्शन अर्थ में 'मुडि' धातु का संज्ञार्थ में प्रयोग होता है। जहाँ सम्यक् रूप से अर्दन किया गया हो, वह 'मुण्डित' होता है।।४१।।
वशिष्ठ उवाच
एवमाद्यमिदं स्थानं कीर्त्यते च युगे युगे।
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वतीर्थमयं शुभम् ॥४२॥
ये तु केचिन्नराः लोके भक्तियुक्तात्तिर्वेदकाः ।
तस्मिन् यन्त्रे समापन्नाः सद्यो मुञ्चन्ति वर्तिताः ॥४३॥
केचित्तत्र महामोहादस्मिंस्तीर्थे विबुद्धयः ।
न तेषां सम्पदां स्थैर्यं यदि प्राप्तुं सुदुष्करम् ॥४४॥
वशिष्ठ देव कहते हैं—इस प्रकार से इस आदि स्थान का युग-युग में वर्णन किया गया है। यह समस्त पापों का हरण करने वाला है। पुण्यप्रद, शुभ तथा समस्त तीर्थमय है। जो कोई भी पृथ्वी का व्यक्ति भक्तियुक्त तथा आर्त स्थिति में इस सूर्ययन्त्र के पास आयेगा, वह सदा मुक्त हो जायेगा। यदि कोई ज्ञानी इस तीर्थ के सम्बन्ध में मोहग्रस्त हो जाता है, तब सुदुष्कर सम्पत्तिवान होने पर भी उसकी (सम्पत्ति में) स्थिरता नहीं रहती।।४२-४४।।
यावत् प्रतपते भानुर्यावच्च लवणोदधिः ।
यावद् भूमिधरा देवास्तावत् कीर्त्तिर्विभावसोः ॥४५॥
ये च पापसमायुक्ता जायन्ते भुवि मानवाः ।
तेषामेव रविस्त्राता ये तत्क्षेत्रसमाश्रिताः ॥४६॥
एवंविधो ह्ययं सूर्यः सदा कार्यों विजानता ।
देवः कीर्त्तिधनाकाङ्क्षी किं पुनर्भूवि मानवाः ॥४७॥
जब तक सूर्य अपनी किरणें प्रसारित करते रहेंगे, जब तक यह लवण समुद्र रहेगा। जब तक पर्वत तथा देवगण रहेंगे, तब तक सूर्य की कीर्ति स्थायी रहेगी। इस पृथ्वी पर जो समस्त मनुष्य पापयुक्त होकर जन्म लेते हैं, उनके सूर्य ही त्राणकर्त्ता हैं। यदि वे मनुष्य उनके स्थान का आश्रय लेते हैं, तब सूर्य उनका त्राण करते हैं। ऐसे प्रभाव से युक्त ये सूर्य हैं। यह सब जानकर सदैव उनकी सेवा करना ही उचित है। उनसे ही देवता भी कीर्ति तथा धन की आकांक्षा करते हैं, पृथ्वी के मनुष्य की तो बात ही क्या है।।४५-४७।।
२३२ श्रीसाम्बपुराणम्
एतत्स्थानं सुरेशस्य सर्व्वैर्देवैरधिष्ठितम्।
शान्तिं पुष्टिं सुखं कामं सर्व्वभूतार्त्तिनाशनम्॥४८॥
यह स्थान देवेश सूर्यदेव का है। यहाँ सभी देवता अधिष्ठित हैं। शान्ति, पुष्टि, सुख, कामप्रदायक तथा समस्त प्राणियों की आर्त्ति का नाशक यह स्थान है॥४८॥
एतदेव हि सा कीर्त्तिः कीर्त्तिता मुनिभिः पुरा।
अत्र पश्यन्ति ये भानुमुद्यन्तं मूर्त्तिसंस्थितम्॥४९॥
तारयन्ति नराः पूता आत्मानं गोलवर्द्धनम्।
यां यां क्रियां समारभे सूर्यक्षेत्रेषु मानवः॥५०॥
तां तां सिद्धिमवाप्नोति इह लोके परत्र च।
जम्बूद्वीपो महाद्वीपः कर्मभूमिरनुत्तमः॥५१॥
यत्रेयमीदृशी कीर्त्तिर्देवेनैव प्रकीर्त्तिता।
यत्र पश्येत् सहस्त्रांशुमित्यसौ शोध्यते जनैः॥५२॥
सूर्य की इस प्रकार की कीर्त्ति की बात का मुनिगण पुराकाल से कीर्त्तन करते हैं। यहाँ मूर्त्तिस्थित उदीयमान सूर्य को जो देखते हैं, वे पवित्र लोग अपने वंश का तथा लोक का उद्धार करते हैं। लोग सूर्यक्षेत्र में जिस-जिस कार्य को प्रारम्भ करते हैं, इहलोक तथा परलोक में उनको वही-वही सिद्धि प्राप्त होती है। जम्बूद्वीप महाद्वीप है। यह श्रेष्ठ कर्मभूमि है। यहाँ सूर्यदेव ने ऐसी कीर्त्ति स्थापित की है कि यहाँ जो सहस्त्रांशु सूर्य का दर्शन करेंगे, वे शुद्ध हो जायेंगे॥४९-५२॥
एका मूर्त्तिर्द्विधा कृत्वा भूतलेष्ववतारिता।
प्रत्यूषे चैव मुण्डीरं ये पश्यन्ति नराः सकृत्॥५३॥
न कदाचिद् भयं शोको रोगस्तेषां प्रपद्यते।
कालहृत् कालप्रीत्या च मध्याह्ने ये त्ववेक्षकाः।
तेषामेव सुखोदर्को ह्यचिरेणैव जायते॥५४॥
साम्बकृतपुरे भानुः सायाह्ने यैरुदीक्षितः।
सद्यः सम्पद्यते तेषां धर्मकामार्थसाधनम्॥५५॥
एक ही मूर्त्ति पृथ्वी पर दो भाग में अवतीर्ण है। प्रत्यूष काल में जो मुण्डीर (सूर्य) को देखते हैं, उन्हें शोक तथा रोग नहीं होता। काल की प्रीति में जो मध्याह्न में कल्याणकारी सूर्य को देखते हैं, उन्हें अतिशीघ्र सुख मिलता है। साम्ब द्वारा निर्मित नगरी में जो सन्ध्याकाल में सूर्य का दर्शन करते हैं, उनको तत्क्षण धर्म, अर्थ तथा काम का साधन प्राप्त हो जाता है॥५३-५५॥
त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३३
एवं युक्तिं समाधाय सर्वधर्मपरायणाः।
कीर्त्तयित्वा रवेः कीर्त्तिर्जग्मुः सूर्यालयं प्रति॥५६॥
प्रजापतीनामिदमालयं रवेर्विधायितं देववरानुकम्पितम्।
विघातकास्तत्र पतन्त्यसाधवो वह्नेः शिखायां शलभा इव क्षणात्॥५७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यस्तुतिर्भक्तमाहात्म्यं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
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ऐसा स्थिर निश्चय करके सभी धर्मपरायण लोग सूर्य की कीर्त्ति-कथा का गान करते हुये सूर्यालय में गये। प्रजापतियों द्वारा निर्धारित सूर्य का यह मन्दिर देवश्रेष्ठ सूर्यदेव से अनुकम्पित है। इसके विघ्नकारी असाधुगण अग्निशिखा में पड़ते जा रहे पतङ्गों के समान तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं॥५६-५७॥
श्री साम्बपुराणोक्त सूर्यस्तुति तथा भक्तमाहात्म्यनामक तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त
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चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
(आचारलक्षणम्)
वशिष्ठ उवाच
स जयति सुरपतिनाथः करनिकरविनिहतसकलकलिः ।
शाश्वतममलनयनमखिलभुवनभवनप्रदीपो रविः ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सुरपतिपालक सूर्यदेव की जय हो, जिनका रश्मिजाल समस्त पापों का विनाशक है। वे शाश्वत, निर्मल नयन हैं, जो निखिल भुवनरूप भवन के प्रदीपरूप हैं अर्थात् अपनी किरणों से समस्त भुवन को आलोकित करते हैं।।१।।
साम्ब उवाच
आचारः परमो धर्म इति धर्मविदोऽवदन् ।
आचाराद्वर्धते ह्यायुर्ह्याचारो हन्त्यलक्षणम् ॥२॥
आचारात् सुखभागी स्यादाचाराच्छ्रियमश्नुते ।
अतस्तमहमाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥
आदित्यभक्तः पुरुषः कीदृगाचारमाचरेत् ।
देवस्य प्रियतामेति श्रियमायुश्च विन्दति ॥४॥
साम्ब कहते हैं—आचार श्रेष्ठ धर्म है, यह धर्मज्ञ लोगों का कथन है। आचार से आयु बढ़ती है, आचार ही अशुभ का नाश करता है। प्राणी आचार के फल से सुखभागी हो जाते हैं। इससे ऐश्वर्य-भोग करते हैं। इसलिये तत्त्वतः आचार को सुनने की इच्छा है। आदित्यभक्त किस प्रकार के आचार का अनुष्ठान करके सूर्यदेव को प्रिय होकर ऐश्वर्य तथा आयु प्राप्त करते हैं?।।२-४।।
नारद उवाच
अत्र ते संप्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
आयुर्लक्ष्मीर्यशो हेतुः सूत्रमाचरणस्य यत् ॥५॥
नारद कहते हैं—तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, मैं उसे तुमको सम्यक् रूप से बतलाता हूँ। जो आयु, धन-सम्पत्ति तथा यश का कारण है, उस आचरण के सूत्र (लक्षण) को कहता हूँ।।५।।
नास्तिकेनाश्रद्दधानेन गुरुणा शास्त्रलङ्घिना ।
भिन्नमर्यादसङ्कीर्ण मैथुने न भवितव्यम् ॥६॥
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३५
नास्तिक, अश्रद्धाशील होना, गुरु तथा शास्त्रवाक्य का लङ्घन करने का कार्य करना, अवैध मैथुन में प्रवृत्त होना उचित नहीं है।।६।।
अतः अक्रोधेन सत्यवादिना भूतानामहिंसकेनानसूयुनाशुचिनाऽजिह्येनानालस्येन भवितव्यम्। अतोऽङ्गमर्दिना तृणच्छेदिना नखशोधिना नित्योच्छिष्टेनाऽशङ्कमनसा सुकेशोनाभाव्यम्।
ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थाय धर्मार्थसाधुचिन्तकः।
आचम्य सन्ध्यां वन्देत पूर्वा च पश्चिमां तथा ॥
आदित्यमुद्यन्तमस्तं यान्तं वारिस्थमहमर्धमथ्मुपसृष्टं च नेक्षेत। परदारा न गन्तव्याः। केशप्रसाधनदन्तधावनान्यदेवतापूजनानि मध्याह्ने न कुर्वीत। मूत्रपुरीषे नाधितिष्ठेन्न पश्येच्च उदक्यया न प्रभाषेत। ग्रामसमीपे कृष्टक्षेत्रे न च पुरीषयेत्। विण्मूत्रे नाप्सु कुर्यात्। न भस्मनि मग्नो व्रजेन्न वास्थिनि। न प्राङ्मुखो न च कुत्सितमन्नमश्नीयात्। भुक्त्वाग्निमालम्भयेन्न सर्वप्राणान् स्पृशेत्। तुषकेशभस्मकार्पासास्थिउद्वर्त्तनावरक्तास्वेदादीनाधितिष्ठेत।
शान्तिहोमादीनि पवित्राणि कारयेत्। न सुप्तं गच्छन्तं स्थविरं प्रत्युत्थापयेत् न सुप्तं गच्छन्तं वा उपस्थापयेत्। आर्द्रार्नाईपादौ भोजनशयने। न वाग्निब्राह्मणोच्छिष्ठमालभेत्। न पश्येच्च सूर्याचन्द्रमसौ, नक्षत्राणि च न पश्येत्। आगच्छन्तं स्थविरं प्रत्युत्थायाभिवाद्यासनं दद्यात्। गच्छन्तं पृष्ठतोऽनुयायात्। भिन्नकांस्यासनं वर्जयेत्। नैकवस्त्रो भुञ्जीत न नग्नः स्नायाच्छयीत। नोच्छिष्टः स्पृशेच्छिरः। शिरसि केशप्रहरणं परिहरेत्। न पाणिद्वयेन शिरः कण्डूयेत्। नाभीक्ष्णं शिरसा स्नायात्। न द्विः स्नायाच्च। शिरः स्नातस्तैलेनाङ्गं न किञ्चित्स्पृशेत्। घृतं मधुसमं विषम्। मुद्गतिलान् भ्रष्टान्राश्नीयात्। उच्छिष्टो नाधीयात्। न वाध्यापयेत्, पूतिगन्धवातेन च।
अत्र गाथा यमेन गीता—
आयुरस्य निकृन्तति प्रजा नास्या भवेत्तथा।
य उच्छिष्टः प्रपठति स्वाध्यायं चाधिगच्छति ॥
सूर्यानिलानलसोमोदकगोद्विजनक्षत्राभिमुखः पथि च न मेहेत्। दिवा संध्या-सूदङ्मुखो दक्षिणामुखो रात्रौ तृणान्तर्हितभूमौ अवगुण्ठ्य नीवीविण्मूत्रे कुर्यात्। सामिषं श्राद्धं भुक्त्वा च न संध्यां वदेत्। ब्राह्मणक्षत्रियसर्पन्नात्रामन्येत। मिथ्यासत्याभ्यां गुरुणानुबन्धः कार्यो, गुरुं नापवादयेत्। गुर्वपवादे कर्णौ पिधातव्यौ, गन्तव्यमन्यत्र वा दूरादावसथात्। मूत्रपादावसेचने स्पृष्ट्वा मार्जनानि कर्त्तव्यानि। नाति प्रातर्मध्याह्ने सायाह्नेषु गच्छेत्, नैकौनाज्ञातैर्वृषलैः। गो-ब्राह्मण-क्षत्रिय-वृद्ध-भारतप्त-गर्भिणी-दुर्बलेभ्यः पन्था देयः। धृतं न धारयेद् वस्त्रं पादेनाक्रमते।
२३६ || श्रीसाम्बपुराणम्
अष्टमी-चतुर्दशी-पूर्णिमामावास्यासु ब्रह्मचारी भवेत्। वृथा मांसं भ्रष्टमांसं च न खादेत्। आक्रोशपरिवादपैशून्यनृशंसाभिधानहीनो नारन्तुदः स्यात्, हीनादुत्कृष्टमपि नाददीत। परमर्मदोषान्न वदेत्। हीनातिरिक्ताङ्गरूपद्रविणजातिसत्यहीननिन्दितविगर्हितान्नाधिक्षिपेत्। नास्तिक्यवेदनिन्दाद्वेषदम्भाभिमानतैक्ष्ण्यानि वर्जयेत्।
परस्मिन्दण्डने न इच्छेत्। क्रुद्धोऽपि न हन्यात्। अन्यत्र भार्यापुत्रदासदासीशिष्यभ्रातृभ्यः। न ब्राह्मणपरिवादी, न तिथिनक्षत्रदेशिकः स्यात्। कृत्वा मूत्रपुरीषेऽशुचौ रथ्यामाक्रम्य वा पुनः पादौ प्रक्षालयेत्। यावककृसरमांसशष्कुलीपायसमात्मार्थं न कल्पयेत्।
अग्निपरिचारी नित्यं भिक्षां दद्यात्। वाग्यतः प्राङ्मुखोदन्तकाष्ठं प्रशस्तमद्यात्। नाभ्युदितः स्यात्। प्रातरुत्थाय पितरमाचार्यमभिवादयेत्। अकृत्वा दन्तधावनं देवपूजाकार्यगमनसमागमान्नाचरेत्। अन्यत्र गुरुवृद्धधार्मिकेभ्यः समलो दिशोऽनावलोक्य उदकञ्चाच्छिद्रा न शयीत। अवाक्शिर ऊर्ध्वशिखश्च भग्नावशीर्णान्तर्धानसंयुक्तशयने न तिर्यक् पदाकृष्यासनं प्रमृज्य न विशेत्। सूर्यस्य पूजां कथां भक्तिं कारयेत्, तत्सर्वयमस्य प्राप्नोति धर्मम्।
नित्यं ब्राह्मणं भोजयेत्, कथाकारिणं विशेषतः। अन्यदेते यदखादेत्सर्वमपि। निशायां न स्नायात्, स्नात्वा गात्रं न मार्जयेत्। स्नात्वा नानुलिम्पेत्। न स्नात्वाद्र्रवासा तिष्ठेत्। वासो न विधिनुयात्। स्रजो नावकृष्टव्याः। न बहिर्धार्याश्च। रक्तमाल्यं न धार्यं, शुक्लं धार्यं तु अन्यत्र कमलकुवलयाम्लानासनेभ्यः।
स्नातस्य वर्णमांदद्यात्, श्वासविपर्ययं न कुर्यात्। नान्यद्धृतं धारयेत्। न च जीर्णमलिनं, सति सम्भवे अन्यशय्यायामन्यद्रव्याणामन्यदेवतार्चायाम्। कीटकेशावपन्नमुद्धृतसारं नाश्नीयादन्यदैवावसनपिदालशाकमुदुम्बरान्नादेत्। अजागव्यमायुरशुष्कपर्युषितमांसं च। न पाणौ लवणमादद्यात्। श्वादव्यापदं स्पृष्ट्वाभूभूक्षणहेक्षिय तत अर्चलीणाघ्रातं च।
न रात्रौ भुञ्जीत दधिसक्तून्। श्रोकीसं च वर्जयेत्। बालेन परपुत्रेण च। शाकं प्रातश्च भुञ्जीत नान्तरा न समाहितः। वाग्यतो नैकपात्रश्च नग्नो संविशन्न शब्दकृत्। शेषे न कस्यापि उदकपूर्वमन्त्रमतिथिभ्यो दत्वा समश्नीयात्। एकपंक्तौ गतानां चेद्दधिमधुसक्तुपायसपानीयं निरस्याश्नीयात्। शेषं न कस्यचिद् दद्यात्। दध्यनुपानं शुक्लाशने न कार्यम्।
अक्रोध, सत्यवादी होना चाहिये। प्राणीगण के प्रति हिंसा तथा असूया का आचरण, अशुचि, खलता तथा आलस्य का परित्याग करना चाहिये। लोष्ट्र नहीं फेंकना चाहिये,
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३७
तृण-छेदन नहीं करना चाहिये। नख को साफ रक्खे, सर्वदा जूठन ग्रहण न करे। संशयापन्न मन वाला न हो। सदा अच्छे केश धारण करे।
ब्राह्म मुहूर्त में उठकर धर्म के लिये सत् चिन्तन करे। तदनन्तर आचमन करके पूर्व तथा पश्चिम सन्ध्या (प्रातः तथा मध्याह्न सन्ध्या) वन्दन करे।
उदीयमान, अस्तगामी, जलस्थित, मध्याह्नकालीन सूर्य को न देखे। परस्त्री-गमन न करे। मध्याह्नकाल में केश-प्रसादन, दन्तधावन अथवा सूर्य के अतिरिक्त अन्य देवता का पूजन नहीं करे। मल-मूत्र न रोके तथा उन्हें न देखे। असच्चरित्र के साथ वार्ता न करे। ग्राम की कर्षण भूमि (खेती भूमि) में मलत्याग न करे। जल में विष्ठा अथवा मूत्र-त्याग न करे। भस्म अथवा अस्थि पर नग्न होकर न जाय। पूर्व की ओर मुख करके अन्नग्रहण न करे तथा कदन्न (कुत्सित या बासी अन्न) भोजन न करे। भोजन करके अग्नि स्पर्शोपरान्त समस्त प्राणों का स्पर्श करे। तुष, केश, भस्म, कपास, अस्थि का स्पर्श न करे। शरीर का मार्जन न करे तथा पसीना-युक्त अवस्था में न रहे।
शान्ति, होम आदि पवित्र कर्म कराये। सुप्त अथवा गमनकारी वृद्ध को न उठावे अर्थात् न बैठाये। भीगे तथा बिना धुले पात्र में भोजन न करे। अग्नि अथवा ब्राह्मण का जूठन-लङ्घन न करे। सूर्य तथा चन्द्र को एक साथ न देखे तथा नक्षत्र की ओर न ताके। वृद्ध को आते देखकर उठकर अभिवादन करके उसे आसन पर बैठाये। चलते समय वृद्ध के पीछे-पीछे चलना चाहिये। टूटे काँसे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिये। नग्न होकर स्नान न करे, नग्न होकर शयन भी न करे। जूठे हाथों से मस्तक का स्पर्श नहीं करना चाहिये। सर के बाल नहीं खींचना चाहिये। दोनों हाथों से माथा नहीं खुजलाना चाहिये। बार-बार डुबकी लगाकर स्नान न करे तथा दो बार स्नान न करे। माथा डुबोकर स्नान करने पर तैल से अंग का स्पर्श न कराये। घृत तथा मधु एक साथ विषतुल्य है। मूँग तथा तिल मिलाकर न खाये (एक साथ न खाये)। उच्छिष्ट अवस्था में अध्ययन तथा अध्यापन न करे। सड़ी गन्धयुक्त वायु में भी अध्ययन तथा अध्यापन नहीं करना चाहिये।
इस प्रसङ्ग में यम द्वारा एक गाथा कही गयी है—जो व्यक्ति उच्छिष्ट अवस्था में पाठ करता है अथवा स्वाध्याय करता है, उसकी आयु नष्ट होती है, उसके पुत्रादि नाक से बोलने वाले होते हैं।
सूर्य, वायु, अग्नि, चन्द्र, जल, गौ, ब्राह्मण तथा नक्षत्र की ओर मूत्रत्याग न करे। दिन तथा सन्ध्या काल में उत्तर की ओर मुख करके, रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके तृणाच्छादित भूमि में कमर ढ़ककर मल-मूत्र का त्याग करे।
आमिष भोजन तथा श्राद्ध का भोजन करके सन्ध्या नहीं करे। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा सर्पों की अवज्ञा न करे। मिथ्या तथा सत्य द्वारा गुरु को अनुबद्ध करे। गुरु की निन्दा
२३८ | श्रीसाम्बपुराणम्
कदापि न करे। जहाँ गुरुनिन्दा हो रही हो, वहाँ दोनों कान बन्द कर ले अथवा वहाँ से दूर चला जाय। मूत्र-त्यागोपरान्त पैर धोकर जल द्वारा हाथों की भी मार्जना करनी चाहिये। अत्यन्त प्रातः, मध्याह्न में तथा सन्ध्या काल में शूद्रादि के साथ न जाय। गौ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वृद्ध, भार से दबे, गर्भिणी तथा दुर्बल के लिये मार्ग से बगल होकर उन्हें मार्ग देना चाहिये। बिना धुले वस्त्र न पहने। पैरों से किसी पर आक्रमण न करे। अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा अमावस्या को ब्रह्मचारी रहना चाहिये। वृथा मांस (जिसे देवताओं को अर्पित न किया हो), भ्रष्ट मांस (जीवादि पड़े, कीटाणु पड़े, जीवों द्वारा मारे गये तथा अग्नि पर सेंका गया मांस) कभी न खाये। आक्रोश, निन्दा, चुगली, नृशंसता का त्याग करे। किसी के दिल को चोट न पहुँचाये। हीन लोगों से उत्कृष्ट वस्तु भी ग्रहण न करे। अन्य का गोपन दोष लोगों के समक्ष प्रकट न करे। हीन अंग वाले (अंधे, लंगड़े, अंगरहित) तथा अतिरिक्त अंग जिनका है, उनसे घृणा न करे। जो रूपवान, धनवान, ज्ञाति, झूठे तथा निन्दित एवं विगर्हित हैं, उनसे घृणा न करे। नास्तिक, वेदनिन्दक, द्वेष, दम्भ, अभिमान तथा कठोरता का परित्याग कर देना चाहिये।
अन्य को दण्ड देने की इच्छा न करे। क्रुद्ध होने पर भी आघात न करे। तब भी भार्या, पुत्र, दास-दासी, शिष्य तथा भाईयों पर शासन तो करना ही चाहिये (अनुशासन हेतु)। कभी भी ब्राह्मण की निन्दा न करे। तिथि नक्षत्र गणना कार्य न करे। मल-मूत्र त्याग करके अथवा सड़क से वापस आकर पैर धोना चाहिये। तिल, आधा पका जौ, खिचड़ी, मांस, तण्डुलादि मिश्रित यवागू अथवा पायस अपने लिये तैयार न करे (अर्थात् केवल अकेले न खाये, बाँट कर खाये)।
जो नित्य अग्नि का होम करते हैं, उनको नित्य भिक्षा दे। वाक् संयम करके (मौनी रहकर) पूर्वमुख होकर प्रशस्त दतुअन चबाये। सूर्योदय के पश्चात् सोना नहीं चाहिये। प्रातः उठकर पिता तथा आचार्य को प्रणाम करे। दाँत साफ किये बिना देवपूजा तथा गमनागमन न करे।
गुरु-वृद्ध तथा धार्मिक की ओर एवं सब ओर न देखकर केवल उत्तर पश्चिम की ओर शिर रखकर न सोये अर्थात् गुरु, वृद्ध, धार्मिक की ओर पैर न करे तथा उत्तर एवं पश्चिम की ओर सिर करके न सोये। सर नीचा करके अथवा शिखा ऊपर रखकर, टूटी जीर्ण शय्या पर, पैरों से खींच कर बिना साफ किये आसन पर न बैठे। सूर्य की पूजा-कथा, भक्तिकार्य (सेवाकार्य) कराये। यह सब धर्म यम से प्राप्त होता है (अर्थात् धर्मराज फल देते हैं)।
नित्य ब्राह्मण-भोजन कराये; विशेषतः जो भगवान् की कथा कहते हैं, उनको भोजन कराये। अस्पृश्य द्रव्य को छोड़कर सब कुछ खा सकते हैं। रात्रि में स्नान करना उचित नहीं है। स्नान करके शरीर-मार्जन न करे, स्नानोपरान्त तैलादि न लगाये। स्नान करके
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २३९
गीले कपड़ों में न रहे। वस्त्रों को उड़ाये (फहराये) नहीं। माला को मसलना, तोड़ना उचित नहीं है। उसे बाहर धारण न करे। रक्तमाला धारण न करे। कमल, नीलपद्म, अम्लान असन पुष्प की माला के अतिरिक्त शुभ्र माला धारण करे।
(यहाँ 'स्नातस्य वर्णमां दद्यात्' का अर्थ स्पष्ट नहीं है)। श्वास का विपर्यय न करे। अन्य का पहना वस्त्र न पहने तथा जीर्ण एवं मलिन वस्त्र का व्यवहार न करे। सम्भव होने पर भी अन्य की शय्या, द्रव्य तथा अन्य के देवता-विग्रह को ग्रहण न करे। कीट-केशादि युक्त तथा सत् निकाले द्रव्य का भक्षण करना उचित नहीं है। अन्य देवता को अर्पित पिदाल शाक, गूलर-प्रभृति तथा बकरा-भेंड़ा-गौ-मयूर का शुष्क तथा बासी मांस न खाये। खाली हाथ पर नमक ग्रहण न करे। (यहाँ 'श्वादव्यापदं स्पृष्ट्वा भूभ्रूणहेक्ष्यित तत अर्चलीढ़ाघ्रातं च' का अर्थ संदिग्ध तथा अस्पष्ट होने के कारण नहीं दिया जा रहा है)।
रात्रि में दधि एवं सत्तू न खाये। श्लोकीस (?) का भी वर्जन करे। बालक तथा अन्य के पुत्र का भी वर्जन करे। प्रातः शाक का भोजन करे। असमाहित होकर अन्य समय शाक न खाये। वाक् संयम करके एक पात्र में नग्नावस्था में बैठकर कोई शब्द न करे (? तात्पर्य समझ में नहीं आता)। अन्त में किसी अन्य का जल तथा अन्न अतिथियों देकर भक्षण न करे। एक पंक्ति में भोजन करने वालों के साथ दधि-मधु-सत्तू तथा पानीय का भोजन करे। पात्र में बची वस्तु किसी को न दे। दधि को शुभ्र भोजन के साथ मिलाकर ग्रहण करे।
आचम्य चैकहस्तेन परिश्राव्यं तथोदकम्।
अंगुष्ठे चरणस्याथ दक्षिणस्यावसेचनम्॥७॥
पाणिं मूर्ध्नि समाधाय स्पृष्ट्वाग्निं सुसमाहितः।
ज्ञातीनां श्रेष्ठतामेति प्रयोगकुशलो नरः॥८॥
एक हथेली पर जल लेकर आचमन करना चाहिये। तत्पश्चात् दाहिने पैर के अंगूठे पर जल छोड़े। तदनन्तर हाथ को मस्तक पर रखकर सावधान हो अग्नि का स्पर्श करे। इससे प्रयोगनिपुण व्यक्ति ज्ञातिगण में प्रधानता प्राप्त करता है॥७-८॥
आर्द्रपाणिना नाभिघ्राणपाणितलाभिन्न स्पृशंस्तिष्ठेत्। पतितकथां दर्शनं संसर्गश्च वर्जयेत्। परापवादमप्रियवचनं न ब्रूयात्। न कस्यचिन्मन्युमुत्पादयेत्। न दिवा मैथुनं गच्छेत्। कन्याबन्ध्यकीमज्ञातां गर्भिणीं व्यङ्गां वृद्धां प्रव्रजितां पतिव्रतीं वर्णोत्कृष्टां निकृष्टवर्णां पिङ्गलीं कुष्ठिनीं योगिनीं चित्रिणीं स्वकुलजां ज्ञातिसम्बन्धहीनामपस्मारिणीं च वर्जयेत्। अगम्यां न गच्छेत्। राजसखावैद्यबालवृद्धमृत्युशरणागतसम्बन्धि ब्राह्मणी तदन्येषां स्त्रियं वन्ध्यां च वर्जयेत्। निष्ठीव्य क्षुत्वा न शुचिर्भवेत्।
२४० श्रीसाम्बपुराणम्
वृद्धो गतिरवशत्रो मित्राणि शुकसारिकाः।
पारावताः पुण्यकृताः गेहे स्युस्तैलपायिकाः ॥१९॥
गीली हथेली से पाणितल (हथेली के तल) के अतिरिक्त नाभि तथा नासिका का स्पर्श न करे (अर्थात् हथेली के तल से स्पर्श न करे)। पतितों से वार्त्ता, उनको देखना तथा उनसे संसर्ग रखना छोड़ दे। अन्य की निन्दा न करे तथा अप्रिय वचन न बोले। किसी में क्रोध उत्पन्न नहीं करना चाहिये (क्रोधित न करे)। दिन में मैथुनासक्त न हो। कन्या, पालिता, अज्ञाता, गर्भिणी, अंगहीना, वृद्धा, प्रब्रजिता (संन्यासिनी), व्रतचारिणी, अपनी अपेक्षा उच्च वर्ण वाली, हीन वर्ण वाली, पिङ्गला, कुष्ट रोगग्रस्त, योगिनी, चित्रिणी, अपने वंश में उत्पन्न, जाति-सम्बन्धरहित, अपस्मार रोग से ग्रस्त का वर्जन करे। अगम्या गमन न करे। राजा के सखा, वैद्य, बालक, वृद्ध, मरणोन्मुख—इनकी सम्बन्धन्वित तथा ब्राह्मणी एवं अन्य की स्त्री का भी वर्जन करे। वमन करने तथा नख काटने से पवित्रता नहीं होती। वृद्ध, अवसन्न, मित्र, शुक, सारिका, कबूतर, तैलपक्षी—ये सब घर के लिये मंगलकारी होते हैं॥१९॥
सन्ध्यायां स्वाध्यायं भोजनं न च कुर्यात्। न नक्तं पित्राणि, न प्रसाधनं न च पण्यक्रिया कदाचित्कार्या। दैवे पित्र्ये स्वनक्षत्रे च शिरःस्नातो भवेत्। न पृष्ठपदयो- रग्निं दद्यात्। प्रेतस्य सन्ध्यायां नोच्चरेत् प्रयत्नतः स्यात्। इच्छामपि कुर्वता दारा रक्ष्याः। न दिवास्वापः आयुषे पूरे निशायाश्च। अवृतो यज्ञं न गच्छेदन्यत्र दर्शनात्। नैको रात्रौ व्रजेत्। अनागतायां पश्चिमसन्ध्यायां गृहमधिवसेत्। मातृपितृवचनं हितमहितं चय्यमेव विचार्य। धनुर्वेदहस्तिहयपृष्ठरथचर्य्यासु प्रयत्नः कार्य्यः। युक्तिशब्दकला- गान्धर्वशास्त्रपुराणेतिहासाख्यानमाहात्म्यचरिताभिज्ञेन भवितव्यम्। आदित्यव्रतं सप्तम्यां चरेत्। न गां पादेन स्पृशेत्। गोरज्जुं न लङ्घयेत्। न्यासविश्वासहारिमधम्र्म्यमहतोगो- ब्राह्मणस्त्रीषु न शूरः स्यात्, अकृतज्ञश्च। एको मिष्टं नाश्नीयात्। स्त्रीभ्यः स्त्रीबन्धुभ्यश्च वृत्तिं नाशयेत्। अत्र गाथाः—
आक्रोशकसमालोके सुहृदन्यो न विद्यते।
यस्तु दुष्कृतमादाय सुकृतेनाभिशंसति ॥२०॥
सन्ध्या समय में वेदाध्ययन-अध्यापन तथा भोजन न करे। रात में पितृकार्य, प्रसाधन, वाणिज्य आदि कभी न करे। दैवकार्य, पितृकार्य में तथा अपने नक्षत्र में डुबकी लगाकर स्नान करे। पीठ घुमाकर अथवा पैर से अग्नि ग्रहण न करे। सन्ध्याकाल में (भूत) 'प्रेत' शब्द का उच्चारण नहीं करना चाहिये। इच्छापूर्वक सर्वदा स्त्री की रक्षा करना उचित है। दिन में सोना उचित नहीं है। पूर्ण परमायु के लिये रात्रि के प्रथम भाग में भी नहीं सोना चाहिये। देखने के अतिरिक्त अवृत स्थिति में यज्ञस्थल में नहीं जाना चाहिये। रात्रि में एकाकी कहीं न जाय। रात्रि समाप्त न होने पर घर में ही रहना उचित है। माता-पिता का वाक्य हित हो अथवा अहितपूर्ण, उसे विचार कर करे। धनुर्वेद शिक्षा, हाथी तथा
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४१
घोड़े की सवारी तथा रथचालन में सदा सावधान रहे। न्यायादि तर्कशास्त्र (युक्ति), शब्द (व्याकरणादि शब्दानुशासन), कला (नृत्यादि), गान्धर्वशास्त्र (गीतादि), पुराण, इतिहास (पुरावृत्त), आख्यान (गल्पादि) तथा माहात्म्य (महिमा से इनकी) चरित से अभिज्ञ रहे। इन्हें जाने।
सप्तमी को आदित्य का व्रत करे। गाय का स्पर्श पैर से न करे। गाय के बाँधने की रस्सी अथवा सिक्कड़ को भी न लाँघे। (यहाँ 'न्यासविश्वासहारिमधौमयमहतों' का अर्थ स्पष्ट नहीं है, अतएव अनुवाद नहीं किया गया)। गौ, ब्राह्मण तथा स्त्रीगण के प्रति बहादुरी नहीं दिखाये तथा अकृतज्ञ न हो। अकेले मिठाई न खाये। महिलाओं से तथा स्त्री के बान्धवों से (श्वसुरालय वालों से) जीविका ग्रहण न करे।
इस विषय में कहा गया है कि निन्दक के समान कोई बन्धु नहीं है। वह जिसकी निन्दा करता है, उसका पाप ग्रहण कर लेता है और अपना पुण्य उसे प्रदान कर देता है॥१०॥
कूटसाक्षी न भवेत्। शरणागतं न परित्यजेत्। दानं न कीर्त्तयेत्। बल्वजानां दानेन कांस्यदोहनेन परवत्सेन च गौर्न दोग्धव्या। पत्नीं रजस्वलां नाभिगच्छेत्। शुद्धस्नातां चतुर्थ्यां वा षोडशीं समविषमदिनेषु पुत्रैर्दुहितृकामो निर्विकारोऽधिशयीत। नाग्नाममेध्यं प्रक्षिपेत्।
न वर्षति धावेत्। न च वातेनापचत्। अनिष्ट्वा नवं सस्यं नाद्यात्। शुक्लवस्त्रधारी स्यात्। श्मश्रुकेशनखान्नादीर्घान् बिभृयात्। नोदके स्वरूपं पश्येत्। नापः परिचक्षीत, भार्यया सह नाश्नीयात्। न तामीक्षेत् सुखासीनामश्नन्तीं क्षुवन्तीं सृष्टमैथुनां जृम्भमाणां च परस्त्रियं च नग्नाम्। नाग्निं मुखेन धमेत्। न पादौ प्रतापयेत्। अधस्तान्नोपद्ध्यात्। नैनं लङ्घयेत्। न पादतः कुर्यात्। न भूमिं प्रविलिखेत्। ष्ठीवनामेध्यलिप्तरुधिरवसास्थीनि न जले क्षिपेत्। शून्यगृहे नैकः शयीत। न चाग्निगुरुदेवद्विजपतिधेन्वध्ययनभोजनेषु दक्षिणपाणिमुद्धरेत्। न वारयेद् गां चरन्तीं परसस्यमादयन्तीं परस्मै नाचक्षीत। दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा न कस्यचिद्दर्शयेत्।
अधार्मिकदेशे न वसेत्। व्याधिबहुलो नैको वीथीं प्रपद्येत्। पर्वते न चिरं वसेत्। वृथा चेष्टामञ्जलिना जलपानमुत्सङ्गेन भक्ष्याभक्षणं, कुतूहलं त्यजेत्। नृत्यगीतवादित्रास्फोटनाक्ष्वेलनानि च विरक्तोऽपि नेक्षेत। कांस्यभाजनेन न पादं प्रक्षालयेत्, पादेन च वन्दितश्वादिभिर्न व्रजेत्। बालातपप्रेतधूमसंमार्जनीरजांसि परिहरेत्। न द्यूतं क्रीडेत्। न स्वयमुपानहौ हरेत्। शयनस्थो नाश्नीयात्। न पाणिस्थाने चासनेन बाहुभ्यां नदीं प्रतरेत्। न वृक्षमारोहेत्। न सन्दिग्धां नावमारोहेत्। न कूपमवतरेत्। न देवद्विजगुरुराजस्नातकाचार्य्यमैथुनवासः, न च भुक्त्वा स्नायात्, नातुरो न महानिशि, नाविज्ञाते जलाशये, न वासोभिरजस्रम्। वैरीतत्सहायाधार्मिकतस्करसेवापरिहर्तव्या।
२४२ | श्रीसाम्बपुराणम्
सतीप्रियं सत्यं ब्रूयात्। सत्यमप्रियं प्रियमनृतं च न ब्रूयात्। शुष्कवैरवचनं वर्जयेत्। सर्वं मङ्गलाचरणयुक्तः स्यात्। सर्वगात्राणि नखानि नाभिपाणितलेन न स्पृशेदमन्त्रतः। रहस्यानि रोमाणि वर्जयेत्। देवद्विजोत्तमगुरून् सेवेयेत्, ईश्वरं च रक्षार्थम्। परवशकर्म जहात्। आत्मवशं कुर्वीत सुखार्थी। अन्तरालपरितोषकृद्धार्मिकः स्यात्। अर्थकामौ धर्मविवर्जितौ त्याज्यौ। वाक्पाणिपादनेत्रचपलो न भवेत्। परद्रोही च ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमातुलातिथिशाश्रितवृद्धबालातुरवैद्यज्ञातिसंबन्धिबांधव-मातृपितृभार्यादुहितृभिर्विवादं न समाचरेत्। गोहिरण्यभूम्यश्ववासोऽन्नतिलघृता-न्यविद्वान्न प्रतिगृह्णीयात्। परकीयनिखातेषु न स्नायात्। वापीं च सप्तपिण्डानुद्धृत्य। नदीदेवखातप्रस्रवणेषु स्नानं कुर्यात्।
कृद्धमन्दातुरप्रेष्यगणिकाविद्वज्जुगुप्सितं स्तेनतक्षकवार्धुषिकगायककदर्य-दीक्षितम्। निन्द्यबद्धाभिशस्तशठपुंश्चलीबन्दिचिकित्सकम्, पूगान्त्रशूद्रोच्छिष्टशुष्क-पर्युषितावक्षतुं नाद्यात्। द्विषतश्चायुष्कामः सुवर्णकारान्नं परिहरेत्। अनध्यायिनं वर्जयेत्। तृप्त्यतिशयसुखप्रजा चक्षुर्भूत्यायुरग्रवेश्मरूपचन्द्रसूर्यसालोक्येष्टभार्याशा-श्रुतसर्वैश्वर्यब्रह्मलोकावाप्तिकामः सूर्यनिमित्तछत्रोपानहौ च दद्यात्। उत्तमोत्तमसम्बन्ध्या-वित्तकुलोन्नतिकामः शयनगृहकुशबन्ध्यपुष्पोदकमणिदधिमत्स्यपयोमांसशाका निरग्निर्नुदेत्। देवतातिथिगुरुभूत्यार्चनोद्धरणे कामः अध्यात्मज्ञाननिरतः स्यात्।
इति ते कीर्तितः सम्यगाचारः पुण्यलक्षणः।
आयुर्लक्ष्मीयशोभूतिकारणं ब्रह्मनिर्मितम् ॥१९॥
कूटसाक्षी (जो मिथ्या प्रतारणामूलक गवाही देता है) न बने। शरण में आये का त्याग न करे। दान करके उसका बखान नहीं करना चाहिये। राहु का दान करे। काँसा के पात्र में गोदोहन न करे। अन्य गाय के बछड़े को लगाकर गाय का दोहन नहीं करे। ऋतुमती पत्नी के साथ मैथुन न करे। शुद्ध स्नाता पत्नी के साथ चतुर्थ दिन या सोलहवें दिन समान अथवा विषम दिन पुत्र अथवा कन्या की कामना से निर्विकार होकर शयन करे। नग्न स्त्री पर अमेध्य वस्तु का क्षेपण नहीं करना चाहिये।
बरसात में न दौड़े। हाथ हिलाकर हवा करके अन्न न पकाये। अनिष्टकारी पुरातन शस्य न खाये। शुभ्र वस्त्र पहने। दाढ़ी, बाल तथा नख को न बढ़ाये। जल में अपनी आकृति न देखे। जल को (पशु के समान) जीभ से न चाटे। स्त्री के साथ एक साथ भोजन न करे। सुखासीना, भोजनकारिणी, भूखी, स्पृष्ट मैथुना तथा जंभाई लेती स्त्री को एवं नग्न परस्त्री को न देखे।
सीधे मुख की हवा से अग्नि को न जलाये (बाँस की नली से फूँक मारे)। अग्नि से ऊपर पैर न सेंके। देह के नीचे की ओर अग्नि का ताप ग्रहण नहीं करना चाहिये। अग्नि को लाँघना उचित नहीं है। भूमि पर नहीं लिखे। थूक, अमेध्यलिप्त वस्तु, रक्त, वसा
चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः २४३
तथा अस्थि को जल में न फेंके। शून्य गृह में एकाकी न सोये। अग्नि-गुरु-देवता-ब्राह्मण, पति, धेनु, अध्ययन तथा भोजन—सबसे दाहिने हाथ से व्यवहार करे। तृण खा रही गाय को हठात् रोकना नहीं चाहिये। यदि वह अन्य की फसल खा रही हो, तब भी उस व्यक्ति को न बताये। आकाश में इन्द्रधनुष देखकर अन्य को नहीं दिखलाना चाहिये कि यह देखो इन्द्रधनुष है।
अधार्मिक देश में न रहे। व्याधिग्रस्त अवस्था में एकाकी यात्रा न करे। पर्वत पर दीर्घकाल-पर्यन्त नहीं रहना चाहिये। वृथा चेष्टा, अञ्जली से जल पीना, गोद में रखकर भोजनादि करना तथा कुतूहल का परित्याग करे। नृत्य-गीत-वाद्य-वीरों का बाहुशब्द तथा कुत्सित गायन अथवा क्रीड़ा आदि को विरक्त त्यागी स्थिति हो जाने पर भी न देखे। कांस्य पात्र में पैर न धोये। पैदल स्थिति में शब्दकारी अश्वादि के साथ न चले। उदीयमान सूर्य, श्मशान की धूम, झाड़ू की धूल (हवा) का त्याग करे। लेटे हुये न खाये। हथेली पर अथवा आसन पर रखकर न खाये। हाथ से (पानी काटकर अर्थात् तैरकर) नदी पार नहीं करना चाहिये।
वृक्ष पर न चढ़े। सन्देहप्रद नौका पर न बैठे। कूंयें में न उतरे। देवता-ब्राह्मण-गुरु-राजा-विद्यार्थी तथा मैथुनकारी के साथ न रहे। भोजनोपरान्त स्नान न करे। अस्वस्थावस्था में, गम्भीर रात में तथा अज्ञात जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। अधिक वस्त्र पहन कर भी स्नान न करे। शत्रु, शत्रु के सहायक, अधार्मिक तथा चोर की सेवा करना छोड़ देना चाहिये।
सदा प्रिय सत्य बोले। अप्रिय सत्य तथा प्रिय झूठ कदापि नहीं बोलना चाहिये। अनर्थक शत्रुता तथा अनर्थक वाक्य का वर्जन करना चाहिये। समस्त मंगल आचरण करे। समस्त अंग, नख, नाभिदेश तथा पाणितल का मन्त्र के विना स्पर्श न करे। गोपन स्थान तथा समस्त रोमों का वर्जन करे। देवता, ब्राह्मण तथा गुरु की पूजा करनी चाहिये। अपनी रक्षा हेतु ईश्वर की सेवा करना उचित है। दूसरे के अधीन होकर कार्य करना छोड़ दे। सुखाभिलाषी अपने अधीन होकर कार्य करे। अन्तरात्मा को सन्तोष देने वाले विधान का पालन करके धार्मिक बने। धर्महीन अर्थ तथा काम का त्याग करना ही उचित है। वाणी, हाथ, पैर तथा नेत्र को बेकार न नचाये।
अन्य के साथ द्रोह का आचरण नहीं करना चाहिये। पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, आश्रित, वृद्ध, बालक, आतुर, वैद्य, ज्ञाति, सम्बन्धी, बान्धव, माता-पिता, भ्राता, विमाता, कन्या तथा भृत्य के साथ विवाद नहीं करना चाहिये। गौ, स्वर्ण, भूमि, अश्व, वस्त्रादि, अन्न, तिल तथा घृत को जाने बिना इन्हें ग्रहण न करे। दूसरे के खोदे जलाशय में स्नान नहीं करे। सप्त पिण्ड का दान किये बिना दूसरे के जलाशय में स्नान नहीं करना चाहिये। नदी, अपने-आप जो जलाशय बना है तथा प्रस्रवण में स्नान करना उचित है।