भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रे व्याध ! तू क्यों भ्रममें पड़ा है ? इस क्षणभङ्गुर संसारमें अपने दीर्घकालव्यापी दुःखके लिये धनुषसे इन मृगोंको क्यों मारता है ? अहिंसा-अभयदान आदि शास्त्रमर्यादाका पालन क्यों नहीं करता ? अरे पुत्र ! वायुसे टकराये हुए मेघमण्डलमें लटकते हुए जलकी बूँदकी भाँति आयु विनाशी है। भोग बादलोंकी घटाके मध्य कौंधनेवाली बिजलीकी तरह चञ्चल हैं। जवानीके भोग-विलास जलके वेगके समान चपल हैं। शरीर क्षण-विध्वंसी है; अतः इस संसारसे भयभीत होकर तू निर्वाणकी ही खोज कर।'*

तब व्याधने पूछा—'मुनिराज ! यदि ऐसी बात है तो बताइये कि दुःखका पूर्णतया विनाश करनेके लिये जो न कठोर हो और न कोमल हो—ऐसा कौन-सा व्यवहारक्रम हो सकता है ?

मुनिने कहा—'व्याध ! तू इसी समय बाणोंसहित इस धनुषको सदाके लिये त्याग दे और मुनिके-से आचरणका आश्रय लेकर दुःखरहित हो यहीं निवास कर।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रामभद्र ! उक्त मुनिके यों उपदेश देनेपर उसने धनुष और बाणोंका परित्याग करके मुनियोंका-सा आचरण अपना लिया। फिर बिना माँगे जो कुछ मिल जाता था, उसीपर जीवन-निर्वाह करते हुए वह वहीं रहने लगा। कुछ ही दिनोंमें सारासारकी विवेक-शीलताने उस मौनीके मनमें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे पुष्प गन्धद्वारा मनुष्योंके हृदयमें अपना स्थान बना लेता है।

तदनन्तर व्याधद्वारा किये गये प्रश्नके उत्तरमें मुनिने धारणाके अभ्याससे परकाय-प्रवेशद्वारा देखे गये स्वप्नका, दो जीवोंके सम्मेलनसे दुगुने विश्वदर्शनका, एकता होनेपर एक विश्वके दीखनेका, विस्तारपूर्वक प्रलयदर्शनका, प्रलय-सागरके हटने, गाँवमें ब्राह्मणरूपमें स्थिति, दूसरेके शरीरसे बाहर निकलने आदिका वर्णन करनेके पश्चात् कहा।

मुनि बोले—'व्याध ! सृष्टिकी उत्पत्तिका वस्तुतः कोई कारण नहीं है। अतः उसकी उत्पत्तिका अभाव स्पष्ट है। इसलिये सृष्टि शब्द और उसका अर्थ दोनों ही सर्वथा नहीं हैं। ऐसी स्थितिमें कहाँ शरीर है, कहाँ हृदय है, कहाँ स्वप्न है, कहाँ जल आदि है, कहाँ ज्ञान है, कहाँ अज्ञान है और कहाँ जन्म-मरण आदि है ? वास्तवमें तो वह निर्मल चिन्मात्र ही है, जिसकी अपेक्षा आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होते हुए भी उसी प्रकार स्थूल लगता है जैसे परमाणुओंके निकट पर्वत। वह चिदाकाश अपने आकाशरूप शरीरके नियममें स्वभावतः जो कुछ संकल्प करता है, उससे वह अपनेको जगद्रूपसे जानता है। जैसे स्वप्नमें केवल चेतन जीव ही नगररूपसे प्रतीत होता है, वास्तवमें वहाँ नगर आदि कुछ भी नहीं है, वैसे ही आत्माकाशमें शान्त, अखण्ड, अप्रत्यक्ष चिन्मात्र ही जगद्रूपसे भासित होता है। जैसे नेत्रोंमें तिमिर रोग हो जानेसे प्रकाशमय आकाशमें धुँआँ-सा दीख पड़ता है, उसी तरह चिद्रूपी दृष्टिमें अज्ञानरूपी तिमिर रोगके कारण जगत्‌का भान होता है। परन्तु वस्तुतः न भान है न अभान, न प्रतिभासिक जगत् है न व्यावहारिक तथा भूताकाश भी नहीं है; बल्कि केवल निराकार, अनादि, अनन्त, अद्वितीय चिदाकाश ही है। जिस हेतुसे कारणके बिना स्वप्नमें केवल शुद्ध द्रष्टा ही भासित होता है, उसी हेतुसे जाग्रत्‌में भी कारणका अभाव है और उसमें न द्रष्टा है न दर्शन। जैसे एक काल सृष्टि और प्रलय—दोनों रूपोंमें व्याप्त है अथवा बीज अङ्कुरसे लेकर पुष्प-फलपर्यन्त सभी अवस्थाओंमें वर्तमान है, उसी प्रकार ब्रह्म सर्वव्यापी है। जो एककी दृष्टिमें महान् दीर्घालरूप है, वही दूसरेकी


* आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलम्वाम्बुवद्‌भङ्गुरं
भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामनीचञ्चलाः ।
लोला यौवनलालना जलरयः कायः क्षणापायवान्
पुत्र त्रासमुपेत्य संसृतिवगान्निर्वाणमन्विष्यताम् ॥
( नि० प्र० उ० १३६ । ३३ )

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन * ६४५

दृष्टिमें निर्मल आकाश-सा दीखता है। यह बात स्थिर-स्वप्न, संकल्प और भ्रम आदि अवस्थाओंमें देखी गयी है। जैसे आत्मा एक निर्मल चिदाकाशस्वरूप होकर स्वप्नमें जाग्रत्की तरह प्रतीत होता है, उसी तरह जाग्रन्मय स्वप्नमें भी भासित होता है। दोनों अवस्थाओंमें उसकी जरा-सी भी अन्यथाप्रतीति नहीं होती। अतः व्याध ! समस्त मनोव्यापारका त्याग कर देनेपर तुम जैसा रहते हो, वही तुम्हारा निरामय स्वरूप है, तुम वस्तुतः बाहर-भीतर सर्वत्र अनन्त आत्मारूपसे निरन्तर स्थित हो।

ब्रह्मा आदि जो स्वयंभू अपने-आप उत्पन्न होनेवाले हैं, वे सृष्टिके आदिमें स्वयं ही प्रकट होते हैं; क्योंकि उनके शरीर ज्ञानमात्रस्वरूप होते हैं। अतः उनके जन्म और कर्म नहीं होते। उनकी दृष्टिमें न संसार है, न द्वैत है और न कल्पनाएँ हैं। विशुद्ध ज्ञानस्वरूप शरीरवाले वे सदा सर्वात्मारूपसे स्थित रहते हैं। सृष्टिके आरम्भकालमें जैसे परब्रह्मस्वरूप ब्रह्मा आदि प्रकट होते हैं, उसी तरह सैकड़ों-हजारों दूसरे जीव भी प्रकट होते हैं; किंतु जो अज्ञानी हैं, वे अपनेको ब्रह्मसे भिन्न मानते हैं। वे असात्त्विक जीव इस जड दृश्यमय द्वैत प्रपञ्चको सत्य समझकर ही पहले मृत्युको प्राप्त हुए थे। अतः अब उनका कर्मसहित पुनः जन्म दिखायी देता है; क्योंकि उन्होंने स्वयं ही अचेतन देहात्मरूप होकर अवस्तुका आश्रय ग्रहण किया है। सर्वात्मरूप चेतनकी निर्मलता स्वाभाविक है। नित्य ब्रह्म स्व-स्वभावमें ही स्थित है। जिसे वह परमात्म-स्वरूप ज्ञात हो गया है, उसका वह कर्म नष्ट हो जाता है। तब जिसका अस्तित्व ही नहीं है, उसके विनाशमें कठिनाई ही कौन-सी है। जबतक पाण्डित्यकी—परमात्मस्वरूपके ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो जाती, तभीतक माया संसारभयको उत्पन्न करनेमें समर्थ होती है। पाण्डित्य वही है, जिससे पुनः इस संसारचक्रमें पतन नहीं होता। इसलिये विशुद्ध ज्ञानसे भरपूर उस पाण्डित्यकी प्राप्तिके लिये अविराम प्रयत्न करना चाहिये। इसके सिवा अन्य किसी उपायसे तुम्हारा यह संसार-भय नष्ट नहीं हो सकता।

(सर्ग १३६–१४२)


पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन

मुनि बोले—व्याध ! जो परमधामरूपी गन्तव्य स्थानके मार्गके ज्ञाता हैं तथा जिन्हें आत्मज्ञानका पूर्णबोध है, ऐसे पण्डित जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसके सामने इन्द्रका ऐश्वर्य जीर्ण-शीर्ण तृणके समान तुच्छ है। मुझे तो पाताल, भूतल और स्वर्गलोकमें कहीं भी ऐसा सुख अथवा ऐश्वर्य नहीं दीख रहा है; जो पाण्डित्यसे बढ़कर हो। जैसे ज्ञान हो जानेसे मालामें सर्पकी भ्रान्ति तुरंत मिट जाती है, वैसे ही ज्ञानीकी दृष्टिमें यह अविद्यात्मक दृश्य-प्रपञ्च क्षणमात्रमें ब्रह्मरूपमें परिणत हो जाता है। ब्रह्मका जो प्रतिभास है, वही यह जगत् कहा जाता है। इसी कारण ये पृथ्वी आदि पञ्चभूत कहाँ हैं और इनका कारण कहाँ है अर्थात् जगत्की उत्पत्तिमें इन कारणोंकी अपेक्षा नहीं है। जैसे स्वप्नद्रष्टाको स्वप्नमें दीखनेवाले मनुष्योंकी स्थिति काल्पनिक है, वास्तविक नहीं है, उसी तरह जाग्रत्स्वरूप स्वप्नमें दीखनेवाले मनुष्योंकी स्थिति भी पूर्वकामनाके अनुसार कल्पित है, यथार्थ नहीं है।

व्याध ! जैसे स्वप्नावस्थामें तुम्हारे अन्तःकरणके संकल्पमें नगर दीखता है, वैसे ही ब्रह्मके संकल्पमें यह सृष्टि वर्तमान है और जैसी कार्यकारणता तुम्हारे स्वप्नकालमें कही गयी है, वैसी ही कार्यकारणता यहाँ भी है।

यद्यपि यह सम्पूर्ण जगत् असत् है, तथापि स्वप्नकी तरह इसका अनुभव होता है। यदि 'जगत् नहीं है' यों कहा जाय तो पूर्ण चेतन ही इस रूपमें

६४६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विकसित होता है। जैसे हमलोगोंका यह जगत् है, वैसे ही आकाशमें अन्य प्राणियोंके लाखों जगत् हैं; परंतु उनकी परस्पर अनुभूति नहीं होती। सरोवर, सागर और कूपमें पृथक्-पृथक् निवास करनेवाले मेढकोंको अपने-अपने निवासस्थानका ही अनुभव रहता है, उन्हें परस्पर एक-दूसरेके दृश्यादिका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। जैसे एक ही घरमें सैकड़ों मनुष्योंके सैकड़ों स्वप्न-नगर होते हैं, उसी प्रकार आकाशमें बहुत-से जगत् भासित होते हैं; परंतु अज्ञानियोंके अनुभवमें आनेसे ही उन आकाशीय जगर्तोंकी सत्ता है और ज्ञानियोंके अनुभवका विषय न होनेसे वे असत् हैं। जैसे एक घरमें सैकड़ों मनुष्योंके सैकड़ों स्वप्न-नगर विकसित होते हैं और नहीं भी होते, उसी तरह आकाशमें जगत् है और नहीं भी है।

यह भुवन चिन्मात्रमें स्थित है। 'त्वम्', 'अहम्' आदि रूप जगत् भी चिन्मय है। इस न्यायसे उत्पन्न न होता हुआ भी जगत् परमाणुके अंदरतक चला जाता है अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। मै परमाणुरूप हूँ, अतः समस्त जगत्के आकारमें स्थित हूँ। इसी कारण मैं सर्वत्र यहाँतक कि परमाणुके अंदर भी विद्यमान हूँ। यह चिदाकाशरूप मैं चिन्मात्र परमाणु होकर जगद्रूपसे जहाँ स्थित रहता हूँ, वहीं तीनों लोकोंको देखता हूँ। मेरे अन्तरात्मामें तीनों लोकोंका जैसा रूप विकसित होता है, वैसा बाहर नहीं होता; क्योंकि कहीं भी किसीने उसे देखा नहीं है। स्वप्न अथवा जाग्रतमें जब-जब अथवा जहाँ-जहाँ जगत्का जो भान होता है, वह बाह्य एवं आभ्यन्तर-सहित समस्त दृश्य चेतन आत्माका भान ही है। जब स्वप्नमें प्राणीका विस्तृत जगत् भासित होता है, तब वह चिदणुरूप आत्माका ही भान होता है और वह स्वप्न-स्थानरूपसे होता है।

(सर्ग १४३-१४४)


मुनिका व्याधके प्रति बहुत-से प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःखकी प्राप्तिके निमित्तका निरूपण करना

इस प्रकार स्वप्न, सुषुप्ति आदिके भेदोंका वर्णन करके मुनिने पुनः कहा—'व्याध ! यद्यपि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय स्वरूपवाला आत्मा आकाररहित होकर भी सर्वाकार है, कल्पनाओंसे शून्य होते हुए भी सृष्टिरूपी शरीर धारण करनेवाला है और शून्यरूप दृश्यात्मक चित्-शरीरसे शून्याकाशको व्याप्त करके स्थित है, तथापि यह आकाशात्मक चिन्मात्र अपने शुद्ध चिदाकाशस्वरूपसे कभी भी तनिक भी भिन्न नहीं है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, लोकान्तर और मेघ आदि भूत-भौतिक पदार्थों-सहित यह दृश्यजगत् सृष्टिके आदिमें भी कारणका अनुभव न होनेसे केवल चिदात्मक ही है। वास्तवमें यह नाम-रूपसे रहित और बोधस्वरूप ही है; क्योंकि अन्ततो-गत्वा मनोलय हो जानेपर यह सारा-का-सारा शुद्ध ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही रह जाता है, कोई अन्य वस्तु नहीं।'

व्याधने पूछा—मुने ! प्रलय आदि सैकड़ों महावृत्तान्तों-से जिसकी अनेकों सृष्टियाँ समाप्त हो चुकी हैं, ऐसे आपका उन-उन लोकोंमें कैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसका रहस्य बतलाइये।

मुनिने कहा—सदाचारकी स्पृहा रखनेवाले साधुस्वभाव व्याध ! खगगत किसी प्राणीके ओजमें स्थित होनेपर उस प्राणीके हृदयस्थित ओजमें जो अपूर्व वृत्तान्त घटित हुआ, उसे सुनो। उस समय वहाँ मेरा आत्मज्ञान-सम्बन्धी सारा चमत्कार विस्मृत हो गया और वर्ष-ऋतुरूप काल धीरे-धीरे व्यतीत होने लगा। मेरा आत्म-चिन्तन छूट गया और बुद्धि पुत्र-कलत्र आदिमें अनुरक्त हो गयी। इस प्रकार उस गृहस्थाश्रममें रहते मेरे सोलह वर्ष बीत गये। तदनन्तर किसी समय एक सम्मान्य विद्वान् मुनि अतिथिरूपसे मेरे घर पधारे।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिका बहुत-से प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःख-प्राप्तिका निमित्त बताना * ६४७


वे मननशील तथा अगाध ज्ञानसम्पन्न थे। उनकी तपस्या बड़ी उग्र थी। मैने उनका भलीभाँति आदर-सत्कार किया। तात! जब वे भोजन करके संतुष्ट हो आसनपर शयन करने लगे, तब मैने जनताके सुख-दुःखके क्रमका विचार करके उनसे यों प्रश्न किया—'भगवन्! चूँकि आप महाज्ञानी हैं। जगत्की सारी गतिविधियाँ आपको विदित हैं। आपमें क्रोध तो लेशमात्र भी नहीं दीखता तथा सुखमें आपकी तनिक भी आसक्ति नहीं है; अतः यह बतानेकी कृपा कीजिये कि जैसे शरत्कालमें फलार्थी पुरुषोको धान आदिकी प्राप्ति होती है, वैसे ही कर्मशील जीवोंके अपने शुभाशुभ कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। तो क्या ये सारी प्रजाएँ एक साथ ही अशुभ कर्म करती हैं, जिनके फलस्वरूप दुर्भिक्षादि सभी दोष इन्हें एक साथ ही प्राप्त होते हैं? यदि दुर्भिक्ष एवं अनावृष्टि आदि उपद्रव सबके लिये एक-से ही होते हैं तो इसका क्या रहस्य है तथा किस-किसके दुष्कर्म समान होते हैं?' मेरा यह प्रश्न सुनकर वे मुनि मेरी ओर देखकर मुस्कराये और अमृत-प्रवाहकी तरह सुन्दर एवं प्रशंसनीय वचन बोले।

समागत मुनिने कहा—साधो! यह तो बतलाओ, अन्तःकरणके पूर्णतया विवेकसम्पन्न होनेपर इस दृश्यका जो सत् या असत्रूप कारण है, उसे किससे जानते हो। तुम कौन हो और इस जगत्में कहाँ स्थित हो—यों अपने आत्माका पूर्णरूपसे स्मरण करो। मैं कहाँ हूँ? यह दृश्य क्या है? क्या सार है? क्या असार है? यह सब स्वप्नमात्र ही प्रतीत होता है। इसे तुम क्यों नहीं समझते हो? मैं तुम्हारे लिये स्वप्न-पुरुष हूँ और तुम मेरे लिये स्वप्न-पुरुषके तुल्य हो। यह जगत् निराकार अनिर्वचनीय अनादि और कल्पनारहित है। यह चिन्मात्ररूपी काँचकी चमकके समान स्थित है। इस सर्वव्यापक चिन्मात्रका स्वाभाविक रूप ही ऐसा है कि यह जहाँ जैसा समझता है, वहाँ वैसा ही हो जाता है। जब यह वस्तुओंके सकारणत्वकी कल्पना करता है, तब सब कुछ सकारण है और जब अकारणत्वकी कल्पना करता है, तब सभी कुछ अकारण है। साधुपुरुष! जैसे बहुत-से वृक्षोंपर एक साथ बिजली गिरती है, वैसे ही कुछ प्राणियोंके कतिपय दुष्कर्म रहनेपर एक साथ ही दुःख आदिके पहाड़ टूट पड़ते हैं। कर्मोंकी कल्पनासे जीवात्माको अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है, परंतु जब वह कर्मोंकी कल्पनासे उन्मुक्त हो जाता है, तब उसे कर्मफलका भोग नहीं प्राप्त होता। स्वप्नमय नगरकी भाँति इस जगत्में सहकारी कारण आदि कोई भी कारण नहीं है। इसलिये वह अनादि, चेतन, अजर, मङ्गलमय परब्रह्म ही है। यह स्वप्नवत् जगद्भ्रम कोई बिना कारणके प्रतीत होता है और कोई कारणके साथ। वास्तवमें तो यह मिथ्या ही है।

महामते! ये सारी सृष्टियाँ पहलेसे इसी तरह अकारण ही प्रवृत्त होती आ रही हैं। जैसे आकाशमें देरतक देखते रहनेसे नेत्रोंके सामने चक्राकार गोले दीखने लगते हैं, वैसे ही जगत्मे ये ढेर-की-ढेर सृष्टियाँ चक्कर काटती रहती हैं। चित्-शक्तिने ही अपनेमें 'मैं ही अमुक हूँ' यों जिस-जिस भावात्मक रूपकी स्वतः कल्पना की, वह आज भी वैसा ही स्थित है। पुनः वही चित् उससे भी उत्कृष्ट दूसरे महान् यत्नसे उसे अन्यथा करनेमें भी समर्थ है। विद्वान्-द्वारा जहाँ कारणकी कल्पना की जाती है, वहाँ तो कारणकी सारता रहती है और जहाँ उसकी कल्पना नहीं की जाती, वहाँ कारणहीनता ही है। यह विस्तृत जगत् पहले बवंडरकी तरह असत् ही आभासित हुआ और उस समय जैसा भान हुआ वैसा ही आज भी स्थित है। कुछ लोग अपना शुभ-अशुभ पुण्य-पापरूप कर्म मिला-जुलाकर करते हैं, अतः उन्हें उनका फल भी उसी तरह सम्मिश्रित रूपमें मिलता है।

(सर्ग १४५—१४९)

६४८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मुनिके उपदेशसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति, पूर्वदेहमें गमनकी असमर्थताके विषयमें प्रश्न करनेपर देह आदिके भस्म होनेके प्रसंगमें मुनिके आश्रम और दोनों शरीरोंके जलने तथा वायुद्वारा उस अग्निके शान्त होनेका वर्णन

मुनिने कहा—व्याध ! उस समय उन मुनिने इस प्रकारकी युक्तिसे मुझे ऐसा ज्ञानोपदेश किया, जिससे तत्काल ही ज्ञेय-तत्त्व मेरी बुद्धिमें बैठ गया। जिन मुनिने यह चन्द्रोदयके समान मनोहर वचन कहा था, वे ही ये मुनिवर तुम्हारे बगलमें बैठे हैं। (उक्त मुनिको दिखाकर कहा—) उनकी ओर दृष्टिपात करो। ये मूर्तिमान् यज्ञके समान हैं। इन्हें दृश्यके पूर्वापरका पूर्ण ज्ञान है। ये ही मेरे अज्ञानका विनाश करनेवाले हैं। यद्यपि मैने इनसे कहनेके लिये प्रार्थना नहीं की थी, तथापि इन्होंने ही मुझसे यह बात कही थी।

अग्नि बोले—विपश्चित् ! उन मुनिकी वह बात सुनकर वह व्याध उस समय विचारने लगा कि यह स्वप्नसृष्टि प्रत्यक्ष कैसे हो गयी। यों सोचकर उसे महान् विस्मय हुआ।

तब व्याधने कहा—मुने ! भव-तापका अपहरण करने-वाले आपने अभी-अभी जो बात मुझसे कही है, वह तो महान् आश्चर्यजनक है और मेरे मनमें नहीं बैठ रही है। मुनिवर ! स्वप्नमें जिनका आपने अपने उपदेशक-रूपसे वर्णन किया था, उन्हींकी जाग्रत्में प्रत्यक्षता बतला रहे हैं और मै भी उन्हें प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। इसीलिये मै इसे परम विस्मयकी बात मानता हूँ।

मुनि बोले—महाभाग व्याध ! तदनन्तर यहाँ मेरी कौन-सी विस्मयजनक घटना घटी, उसका मै संक्षेपमें वर्णन करता हूँ; सुनो। सहसा उतावली मत करो। तुम्हारे समीप बैठे हुए इन मुनिवरने उस समय वहाँ मुझे ज्ञानोपदेश करनेके लिये वैसा वर्णन किया था और मै उन महात्माकी उस वाणीसे तुरंत ज्ञानसम्पन्न हो गया। तत्पश्चात् उनकी वाणीके प्रभावसे मुझे अपने पहलेके अनादिसिद्ध सन्मात्ररूप निर्मल स्वभावका स्मरण हो आया, फिर तो मेरे हृदयमें यह भावना जाग उठी कि मै ही वह मुनि था। ऐसा ध्यान आते ही प्रचुर आश्चर्यवश स्नान किये हुएकी तरह मेरा हृदय आर्द्र हो गया। मै विषय-भोगकी आसक्तिसे इस-अवस्थाको प्राप्त हो गया हूँ—ठीक उसी तरह जैसे अज्ञानी पथिक मार्गके परिश्रमसे पीड़ित होकर जलके लिये मिथ्याभूत मृगतृष्णा-के पीछे दौड़ता है। अहो ! आश्चर्य है, बढ़ते हुए इस मिथ्याज्ञानने, जो सर्वार्थशून्य है, मुझे यह किस दशाको पहुँचा दिया। वास्तवमें तो न मैं हूँ, न यह स्त्री है, न यह घर है और न यह भ्रम ही है—यह सब कुछ मिथ्या है, फिर भी सद्-सा प्रतीत होता है। यह महान् आश्चर्य है। अच्छा, अब इस विषयमें मुझे क्या करना चाहिये। मेरे अंदर बन्धनको तोड़ डालनेमें समर्थ जो ग्रहाकार वृत्तिरूप अङ्कुर है, वह भी काट डालने योग्य है, अतः तबतक मै उसीका परित्याग करता हूँ। यों सोच-विचारकर मैने वहाँ उन मुनिसे इस प्रकार कहा—'मुनीश्वर ! मैं अपने आश्रमस्थित मुनि-शरीरका तथा जिस शरीरको देखनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ, उसका भी निरीक्षण करनेके लिये जाता हूँ।'

यह सुनकर वे मुनिवर उस समय ठाठकर हँस पड़े और मुझसे कहने लगे—'वे दोनों शरीर अब हैं कहाँ। वे तो अब बहुत दूर चले गये। अथवा वृत्तान्तज्ञ ! तुम स्वयं ही जाओ और उस वृत्तान्तको देखो। वहाँ घटित हुई घटनाको जब तुम यथार्थरूपसे देख लोगे, तब स्वयं ही जान जाओगे।' मुनिके यों कहनेपर मैने अपने उस प्राक्तन मुनि-शरीरका स्मरण करके वहाँ जानेकी इच्छासे इस स्वप्नकल्पित रूपका परित्याग कर दिया और चिदात्मारूप अपने जीवको प्राणके द्वारभूत पवनसे संयुक्त

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिके उपदेशसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति * [ ६४९

कर दिया। चलते समय मैंने उन मुनिसे कहा— 'मुने ! अपने प्राक्तन शरीरका अवलोकन करके जबतक मैं लौटता हूँ, तबतक आपको यहीं बैठे रहना चाहिये।' यों कहकर मैं वायुमे प्रविष्ट हुआ। तदनन्तर मैं बडी उतावलीके साथ उस वायुरूपी रथपर आरूढ होकर पुष्पकी सुगन्धकी तरह उस अनन्त आकाशमें जाकर चिरकालतक भ्रमण करता रहा। परंतु बहुत देरतक भटकते रहनेपर भी मुझे वहांसे निकलनेके लिये उस प्राणीके गलेका छिद्र आदि कोई मार्ग प्राप्त नहीं हुआ। तब मैंने मुनिके पास जाकर उनसे पूछा--'मुनिराज ! यद्यपि मैं स्थावर-पर्यन्त अपने विस्तृत संसारमण्डलमें चिरकालतक भ्रमण करता रहा, तथापि मुझे वह गलेका छिद्र नहीं प्राप्त हुआ—इसका क्या कारण है ?' मेरे यों प्रश्न करनेपर वे महाशय मुनि बोले--'कमलनयन ! तुम उस शरीर-वृत्तान्तको (उपदेश किये गये बिना ही) स्वयं अपनी बुद्धिसे कैसे जान गये। यदि योगसे एकाग्र हुई बुद्धिके द्वारा तुम स्वयं ही इसका अवलोकन करते हो तब तो हाथपर रखे हुए कमलकी तरह तुम्हें उसका पूर्णतया ज्ञान है ही। तथापि यदि तुम्हें मेरे मुखसे सुननेकी इच्छा है तो मैं उस यथाघटित वृत्तान्तका पूर्णरूपसे वर्णन करता हूँ, सुनो--

'तुम अपनेको जैसा समझते हो, वैसे व्यष्टि जीवरूप नहीं हो। तुम तो समस्त प्राणियोंके तपरूपी कमलके लिये सूर्यरूप, कल्याणरूपी कमलोंकी खान और भगवान् श्रीहरिके नाभिकमलकी कर्णिका अर्थात् हिरण्यगर्भ हो। वही तुम किसी समय व्यष्टिभावरूप स्वप्न देखनेकी इच्छासे तपस्यामें स्थित होकर उस पुष्ट हुई बुद्धिद्वारा किसी प्राणीके हृदयमें प्रविष्ट हुए। जिस हृदयमें तुमने प्रवेश किया था, वहाँ पृथ्वी और स्वर्गलोक जिसका उदर है, उस विस्तृत त्रिलोकीको देखा था। इस प्रकार यद्यपि तुम वहाँ बडी देरतक स्वप्न देखनेमें व्यग्र थे, तथापि तुम्हारे शरीरमें तथा महावनमें सोये हुए उस जीवके शरीरमें, जिसमें तुम स्थित थे, आग लग गयी। फिर तो धुएँसे धूमिल हुए मेघरूपी वस्त्रोंसे आच्छादित आकाश चंदोवा-सा मालूम पडने लगा। अलातचक्र-सी उड़ती हुई बड़ी-बड़ी चिनगारियाँ सूर्यमण्डल एव चन्द्रमण्डल-सी जान पडने लगीं। उस अग्निने जले हुए मेघोंपर भस्मपूर्ण धुएँके मेघ-रूपी कम्बलोंद्वारा आकाशको ऐसा आच्छादित कर दिया था मानो वे नीले आकाशदलकी रक्षा कर रहे हों। दूर देशमें स्थित लोगोंने उसे एक जगह स्थिर हुई बिजली-सा देखा। उसकी प्रभासे आकाश पिघले हुए स्वर्ण रससे अनुलिप्त फर्श-सा लग रहा था। उसकी दीप्तिमती चिनगारियाँ उड़-उड़कर आकाशमें पहुँच रही थीं, जो ताराओंकी संख्याको दुगुनी बना रही थीं। वह वक्षःस्थलमें स्थित ज्वालारूपी बालवनिताओँके कटाक्षोंसे आनन्द प्रदान कर रही थी। उस दावाग्निने, जो प्रलयाग्निके समान भीषण थी तथा वेगपूर्वक रेंगते हुए सर्पकी तरह चारों ओर फैल रही थी, तुम्हारे आश्रमके साथ-साथ तुम्हारे तथा उस प्राणीके शरीरको भी जलाकर भस्म कर दिया।'

व्याधने पूछा—मुने ! वहाँ उस अग्निदाहकी उत्पत्ति-का प्रधान कारण क्या है तथा वह वन और आपके वे शिष्य—सब-के-सब एक साथ ही कैसे नष्ट हो गये ?

मुनिने कहा—व्याध ! जैसे संकल्प आदिके विनाश और उदयमें संकल्पकर्ताके मनका स्पन्दन ही कारण है, वैसे ही त्रिजगत्का संकल्प करनेवाले विधाताका मनः-स्पन्द ही त्रिजगत् है और वही तुरत उसके विनाश और उदयका कारण है। चूँकि ब्रह्माका संकल्पनगर ही जगत् है, इसलिये उनके मनका स्पन्दन ही इस संसारमें प्रजाओंकी उन्नति, क्षय, क्षोभ, वृद्धि और अवृद्धि आदिका कारण है। ब्रह्माका मानसिक संकल्प इस त्रिलोकीका कारण है, अतः यह त्रिलोकी कल्पित है। विद्वानोंकी निर्मल दृष्टिमें चिदाकाशमें चिदाकाशकी ही शोभा विकसित होती है, किंतु जो मूर्ख हैं, उनकी दृष्टिमें

६५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यह जैसी अथवा जिस प्रकारकी भासती है, तन्मयी ही है। वास्तवमें तो वह सत् नहीं है।

समागत मुनिने कहा—मुने! वहाँ उस अग्निने दोनो शरीर, आश्रम, नगर, वे घर और वे वृक्ष आदि सबको सूखे तिनकेके समान शीघ्र ही जलाकर राखका ढेर बना दिया तथा अत्यन्त दाहके कारण जिसकी बड़ी-बड़ी शिलाएँ फट गयी थीं, ऐसे तुम्हारे उस आश्रममें सोये पड़े हुए वे दोनो शरीर भस्म हो गये। इस प्रकार सम्पूर्ण वनको पूर्णरूपसे जलाकर वह आग धीरे-धीरे उसी प्रकार शान्त हो गयी, जैसे समुद्रके जलको पीकर अगस्त्यजी शान्त हो गये थे। तत्पश्चात् वह अग्नि अदृश्य हो गयी। उस अग्निके अदृश्य हो जानेपर वायु उस सम्पूर्ण भस्मराशिको, जो पहले हवाके लगनेसे उदीप्त होकर फिर अत्यन्त शीतल हो गयी थी, पुष्पराशिकी भाँति कण-कण करके उड़ा ले गयी। इससे अब पता ही नहीं चलता कि वह आश्रम कहाँ था और वे दोनों शरीर कहाँ चले गये तथा जो पेटीकी तरह बहुत-से लोगोंका निवास-स्थान था, वह नगर जाग्रत्‌पुरुषके स्वप्ननगरीकी तरह कहाँ विलीन हो गया। इस प्रकार जब तुम्हारे तथा उस प्राणीके शरीरका अभाव हो गया, उस समय तुम स्वप्नके भ्रमसे ग्रस्त थे, परंतु इस समय तुम्हारी संवित् ही स्फुरित हो रही है। इसलिये कहाँ बाहर निकलनेका द्वारभूत उस प्राणीके गलेका छिद्र और कहाँ तुम्हारा वह विराट् आत्मा अर्थात् दोनोंमें महान् अन्तर है; क्योंकि ओजसहित जले हुए उस प्राणीका ओजसहित शरीर भी तो जल गया था। मुने! इसी कारण तुम्हें वे दोनों शरीर प्राप्त नहीं हुए हैं; क्योंकि इस समय तुम, जिसका अन्त नहीं है, ऐसे स्वप्न-संसाररूपी जाग्रत्-अवस्था में स्थित हो। सुव्रत! इस प्रकार तुम्हारा यह स्वप्न ही जाग्रद्भावको प्राप्त हो गया है और हम सब लोग तुम्हारे स्वप्नपुरुष हो गये हैं। यों तुम हमारे स्वप्नपुरुष हो और हमलोग तुम्हारे स्वप्नपुरुष हैं, किंतु यह चिदाकाशरूप आत्मा सर्वदा अपने स्वभावमें ही स्थित है। स्वप्नपुरुष होते हुए जबसे तुम्हें 'मैं जाग्रत्-पुरुष हूँ' ऐसी प्रतीति हुई, तबसे तुम जाग्रत्-पुरुष बनकर पूर्णरूपसे गृहस्थाश्रममें स्थित हो। तात! इस प्रकार वहाँ जैसी घटना घटी थी, वह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें पूर्णरूपसे सुना दिया। अब यदि तुम्हें मेरे कथनमें संदेह हो तो तुम स्वयं ही ध्यानद्वारा इस अनुभूत दृश्यको देख सकते हो। इस प्रकार जो आदि और मध्यसे रहित है, जिसका रूप अनन्त है तथा शरीर अपनी विकसन-शक्तिके उत्कर्षसे चञ्चल हो रहा है, ऐसा यह संविद्घन (ज्ञानस्वरूप) चिन्मयात्मा ही स्वयं अपने आपमें अनेक शुभाशुभ दृष्टियोंके रूपमें आकाशमें फैले हुए सूर्यके सुनहले घामकी तरह विकसित होता है।

(सर्ग १५०-१५१)

व्याध और उस मुनिके वार्तालापके प्रसंगमें जीवन्मुक्त ज्ञानीके स्वरूपका वर्णन तथा अभ्यासकी प्रशंसा

समागत मुनिने कहा—मुने! उस प्राणीके शरीर तथा मेरे शरीर आदिका वास्तवमें अस्तित्व न होनेके कारण यह सब आदि-अन्तरहित चिदाकाश ही है। इसका रूप कर्ता, कर्म और करणसे हीन, क्रमशून्य चिद्घन है। ये घट, पट और अद्रि आदि चिदाकाशके विकास हैं, अतः ये स्पष्ट आकारवाले कहाँसे हो गये। वस्तुतः यह चिन्मात्रका भी विकास नहीं है, बल्कि केवल चिन्मात्रकाश ही है; फिर उसका कैसा और क्या विकास। क्या कहीं आकाशका विकास होता है? भला, शून्य वस्तु कैसे विकसित होगी। चिन्मात्रका विकास महान् चिद्घनरूप शुद्ध ब्रह्म है। वही जगत्‌की तरह अवभासित हो रहा है। ऐसी दशामें दृश्य कहाँ और द्रष्टापन तो फिर आ ही कहाँसे सकता है? अतः जो कालतः आदि-अन्तशून्य, देशतः आदि-मध्यहीन, वस्तुतः अद्वितीय, कारण, कार्य

' निर्वाण-प्रकरण उ० ] * व्याध और उस मुनिके वार्तालापके प्रसंगमें जीवन्मुक्तके स्वरूपका वर्णन * ६५१

और तदधीन प्राणियोंसे परे, सत्तामय, भुवन, शैल और दिगन्तोंके कारण नाना-अनानारूप, अप्रमेय, सर्वव्यापक चेतन है, वही सब कुछ है ।<br><br> मुनि बोले-व्याध ! ऐसा निर्णय करके मैं इस दृश्यमें स्थित हूँ। मेरा संताप और राग नष्ट हो गया है। मैं आशङ्का और अहंकारसे शून्य होकर निर्वाणस्वरूप हो गया हूँ। न मेरा कोई आधार है और न मैं ही किसीका आधार हूँ। मैं मान और आश्रयसे रहित होकर अपने चित्-स्वभावमें स्थित हूँ तथा सर्वथा शान्त होकर सृष्टि-रूपसे प्रकट हूँ। मैं शान्ति-लाभ कर रहा हूँ, चारों ओरसे निर्वाण-सुखमें निमग्न हूँ और केवल आत्मसुखमें स्थित हूँ। मैं विधि-निषेधसे परे हो गया हूँ। अब मेरे लिये न कुछ बाह्य है न आन्तर । इस प्रकार मैं यहाँ यथाप्राप्त स्थितिके अनुसार निवास करता हूँ। तुम तो आज सहसा मेरे सामने आ गये हो।<br><br> व्याधने कहा-मुनिवर ! यदि ऐसी बात है तो मैं, आप और ये समस्त देवता आदि सब-के-सब परस्पर एक-दूसरेके सत्-असत्-स्वरूप स्वप्नपुरुष हो जायेंगे।<br><br> मुनि बोले-व्याध ! तुम्हारा कथन ठीक है; क्योंकि यह सब-का-सब परस्पर स्वप्नके समान स्थित है तथा अपनेमें एक-दूसरेका सत्-असत्-सा अनुभव होता है। जिसने दृश्यको जैसा समझा है, उसे तदनुकूल ही उसका अनुभव होता है। वह दृश्य वस्तु अनेक है और एक भी है । ( अज्ञानियोंके लिये अनेक है, किंतु जो तत्त्वज्ञानी हैं, उनके लिये ) जाग्रत्-कालमें वह स्वप्न-नगरके समान तथा पहले न देखे हुए दूर देशमें स्थित दृश्यमान नगरके सदृश प्रतीतिमात्र ही है; अतः वह न एक है, न सत् है, न असत् है और न सत्-असत् ही है। लुब्धक ! इस प्रकार मैंने तुमसे सब कुछ वर्णन कर दिया। मेरे निरन्तर ज्ञानोपदेश करते रहनेसे तुमज्ञानसम्पन्न हो गये हो। यों तो तुम स्वयं ही ज्ञानवान् हो और सब कुछ जानते हो; अतः तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो । प्राज्ञ ! यह ज्ञान अभ्यासद्वारा परिपक्व हुए बिना मनके अंदर वैसे ही नहीं प्रवेश करता, जैसे कमण्डलु आदिके आकारमें परिणत हुए बिना काष्ठमें जल नहीं टिक सकता। एकमात्र गुरु और शास्त्रके सेवनरूपी अभ्याससे बोधमें विश्राम प्राप्त होनेपर जब द्वैत और अद्वैतकी दृष्टि शान्त हो जाती है, तब चित्त निर्वाण कहलाता है। जो अभिमान और मोहसे रहित हैं, जिन्होंने सङ्गदोष-आसक्तिपर विजय प्राप्त कर ली है, जो नित्य अध्यात्म-ज्ञानमें लीन रहते हैं, जिनकी कामनाएँ पूर्णरूपसे निवृत्त हो गयी हैं तथा जो सुख-दुःखसंज्ञक द्वन्द्वोंसे विमुक्त हैं, ऐसे ज्ञानी पुरुष ही परमात्माके उस अविनाशी परमपदको प्राप्त होते हैं।*<br><br> यह सुनकर वह अपने व्याध-कर्मका परित्याग करके मुनियोंके साथ रहकर तपस्या करनेको उद्यत हो गया। फिर तो उसने उन्हीं मुनियोंके साथ उन-उन भावनाओंसे भावित होकर सदा उसी लोकमें निवास करते हुए अनेकों-सहस्र वर्षोंतक अत्यन्त घोर तपस्या की। अपने तप-कालमें ही उसने उन मुनिसे पुनः पूछा-‘मुनिवर ! मुझे आत्मविश्रान्ति कब प्राप्त होगी ?’ तब मुनिने कहा।<br><br> मुनि बोले-व्याध ! मैंने तुम्हें जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, वह तुम्हारे हृदयके अंदर मौजूद तो है, किंतु वह पुरानी लकड़ीके अंदर स्थित थोड़ी-सी अग्निके समान बलहीन है, इसलिये जिसे जला डालना उचित है, उस दृश्यपर वह आक्रमण करनेमें असमर्थ

* निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
(नि० प्र० उ० १५४ । १८)
यही श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता (१५।५) में ज्यों-का-त्यों है।

६५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


हैं। अभ्यासकी कमीके कारण अभी तुम्हें कल्याणप्रद ज्ञानमें विश्रामकी प्राप्ति नहीं हुई है। कुछ कालके पश्चात् अभ्यासके सुदृढ़ हो जानेपर तुम्हें पूर्ण विश्राम प्राप्त हो जायगा। (सर्ग १५२-१५५)


मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन, अग्निका स्वर्गलोक-गमन, भासद्वारा आत्म-कथाका वर्णन तथा बहुत-से आश्चर्योंका वर्णन करके आत्मतत्त्वका निरूपण

तदनन्तर मुनिने भविष्यमें व्याधके तप करके ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त करने, उसकी कायाकी वृद्धि होने, मृत्युको प्राप्त होने, फिर राजा सिंधु बनकर मन्त्रीके मुखसे तत्त्व सुननेकी बातका सविस्तर वर्णन करके कहा—'व्याध ! मैंने भविष्यमें होनेवाली सारी घटनाओंका अतीतकी तरह तुमसे वर्णन कर दिया। अब इस समय तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा भलीभाँति सोच-समझकर करो।'

अग्निने कहा—विपश्चित् ! मुनिका पूर्वोक्त वचन सुनकर व्याधका चित्त विस्मयसे पूर्ण हो गया। वह क्षणभरतक ठगा-सा खडा रहा। फिर तुरंत वह तथा वे मुनि स्नान करनेके लिये चले गये। इस प्रकार अकारण ही सुहृद् बने हुए वे दोनों व्याध और महामुनि शास्त्र-चिन्तन करते हुए वहाँ तपस्या करने लगे। तदनन्तर थोडे ही समयमें मुनिको निर्वाणकी प्राप्ति हो गयी। वे आयुके अवसानमें अपने पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग करके परमपदमें लीन हो गये। उधर व्याध चिरकालतक तपस्या करता रहा। जब सैकड़ों युग बीत गये, तब उसकी कामना पूर्ण करनेके लिये पद्मयोनि भगवान् ब्रह्मा वहाँ आये। बेचारा व्याध अपनी वासनाके आवेशको निवारण करनेमें समर्थ न हो सका; अतः मुनिद्वारा पहले ही बतायी हुई अपने वरकी व्यर्थताको जानते हुए भी उसने ब्रह्माजीसे वही वर माँगा। तब ब्रह्माजी 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर अपनी अभीष्ट दिशाकी ओर चले गये और वह व्याध अपनी तपस्याका फल भोगनेके लिये पक्षीकी तरह आकाशकी ओर उड़ चला। वहाँ वह गरुडके सदृश महान् वेगसे ऊपर-नीचे टेढ़ी-मेढ़ी अनेक उड़ानें भरता हुआ आकाशको पूर्ण-सा करने लगा। यों करते-करते उसका बहुत-सा समय बीत गया। इतने लम्बे समयके बीतनेके पश्चात् भी जब उसके अविद्या-भ्रमका अन्त नहीं आया, तब उस विषयसे उसे वैराग्य हो गया। तदनन्तर वैराग्य हो जानेके कारण उसने आकाशमें ही प्राणोंका विरेचन करनेवाली योगधारणा बाँधकर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया और उसका शरीर मुर्दा-सा होकर नीचेकी ओर लटक गया। उसका प्राणवायुसमन्वित चित्त तो उस अव्यक्ताकाशमें ही राजा विदूरथकी शत्रुरूपा पूर्वोक्त सिन्धुताको प्राप्त हो गया। (अर्थात् पूर्वोक्त राजा विदूरथके शत्रु राजा सिन्धुका रूप धारण कर लिया) जो सारे भूमण्डलका पालन करनेवाली थी तथा वह शरीर सैकड़ों मेरुका-सा विशालकाय होकर महाशवके रूपमें परिणत हो गया। फिर तो दूसरी पृथ्वीके सदृश वह विशाल शव अशनि एवं वज्रके गिरनेका-सा शब्द करता हुआ आकाशसे भूतलपर गिर पड़ा।

विपश्चितोंमें श्रेष्ठ पुरुष ! इस प्रकार मैंने तुमसे उस महाशवका वर्णन कर दिया। जिस भूमण्डलरूप जगत्‌में वह शव गिरा था, वही यह जगत् है, जो हमलोगोंके खमनगरके सदृश स्फुरित हुआ है।

भो श्रेष्ठ विपश्चित् ! साधुशिरोमणे ! तुम पुनः प्रकृत व्यवहारके समान स्थिर भूमण्डलमें अपनी अभीष्ट दिशाको चले जाओ। गतिकोविद ! प्रजावर्गके स्वामी इन्द्र स्वर्गलोकमें अपने सौवें यज्ञका अनुष्ठान करना चाहते

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन * ६५३

हैं। उन्होंने मन्त्रद्वारा मुझे आमन्त्रित किया है, अतः मैं तो वहाँ जाता हूँ।

भास बोले—राजन् ! यह कहकर भगवान् अग्नि अपने स्वरूपसे तो वहीं अन्तर्धान हो गये, परंतु अग्नि-रूपसे वे निर्मल आकाशमें बिजलीकी अग्निकी तरह जाते हुए दीख पड़े। तथा मैं भी चित्तद्वारा अपनी प्राक्तन अविद्याके संस्कारोंको वहन करता हुआ पुनः स्वयं अपने दिगन्तगमनरूप कर्मका निर्णय करनेके लिये आकाशमें भ्रमण करता हुआ स्थित रहा। उस समय आकाशमें मुझे फिर अगणित जगत् दृष्टिगोचर हुए। उनकी रूपरेखाएँ भिन्न-भिन्न थीं तथा उनके आचार-विचार भी अनेक तरहके थे। भूपाल ! उन लोकोंमें कहीं बहुत-से प्राणी एकीभूत हो गये थे, जिससे उनके अङ्ग छत्ते-सरीखे भासित होते थे। उनमें चेतना थी। वे मन्दगतिसे चलते थे और दर्शकोंके हृदयोंको हर लेते थे। ऐसे बहुत-से प्राणी मुझे आकाशमें दृष्टिगोचर हुए। इस प्रकार मैं चिरकालतक देखता रहा, किंतु स्वप्नकालिक मनोमात्र देह होनेके कारण उनका विनाश होते हुए तो देखा; परंतु मुझे अविद्याका अन्त नहीं दीख पड़ा। तब मैं उस दृश्यवर्गसे उद्विग्न हो गया और किसी एकान्त स्थानमें जाकर मोक्षसिद्धिके लिये तपस्या करनेको उद्यत हुआ।

उसी समय इन्द्रने मुझसे कहा—'विपश्चित् ! चित्ता-काशमें तुम्हारे लिये दूसरी मृगयोनि उपस्थित है; क्योंकि तुम्हारी यह चित्-शक्ति चिरकालतक मृगयोनिमें ही संसरण करना चाहती है। इस प्रकार मैने तुम्हारे अवश्यम्भावी वृत्तान्तको देख लिया है। तुम मृगयोनिमें उत्पन्न होकर राजा दशरथकी उस महापुण्यस्वरूपा सभा-में पहुँचोगे। वहाँ मेरे द्वारा कहा हुआ सारा-का-सारा ज्ञान तुम्हारी समझमें आ जायगा। इसलिये अब तुम संसारसे खिन्न होकर भूतलपर मृगयोनिमें जन्म धारण करो। वहाँ तुम्हें इस सम्पूर्ण कल्पित आत्मवृत्तान्तका पूर्णरूपसे स्मरण होगा। पुनः जब मृगयोनिसे मुक्त हो जाओगे, तब तुम्हें पुरुषरूपकी प्राप्ति होगी। उस समय जब ज्ञानाग्निद्वारा तुम्हारा शरीर दग्ध हो जायगा, तब तुम्हारा हृदयस्थ आत्मज्ञान स्फुरित होगा। उस आत्मज्ञानके स्फूरणसे तुम उस अविद्या नामक भ्रान्तिको, जो चिरकालसे तुम्हारे हृदयमें स्थित है, त्यागकर स्पन्दरहित वायुके समान उत्तम निर्वाणको प्राप्त हो जाओगे।'

देवराज इन्द्रके यों कहनेपर उसी समय 'इस वनमें मैं यह मृग हूँ' ऐसी मेरी निश्चित प्रतिभा उद्भूत हुई। तभीसे मैं उसी श्रेष्ठ पर्वतनगर मन्दार-वनके भीतरी कोनेमें तृण और दूर्वाङ्कुरोंका आहार करनेवाला मृग हो गया। रघूद्वह ! तदनन्तर एक समय सीमावर्ती एक सामन्त शिकार खेलनेके लिये वहाँ आया। उसे देखकर मैं भयभीत हो गया और छलाँग मारकर भागा; परंतु उसने आक्रमण करके मुझे पकड़ लिया और घर ले जाकर तीन दिनतक वहाँ रखा। तत्पश्चात् वह तुम्हारे मनोविनोदके लिये मुझको यहाँ ले आया। निष्पाप राम ! यों मैंने अपनी सारी आत्मकथाका, जो संसारकी मायाके समान तथा नाना प्रकारके आश्चर्यरूपी रससे पगी है, तुमसे वर्णन कर दिया। इस प्रकार नाना प्रकारकी शाखा-प्रशाखाओंके विस्तारसे युक्त यह अविद्या अनन्त है। यह आत्मज्ञानके अतिरिक्त और किसी भी उपायसे शान्त नहीं हो सकती।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब वह विपश्चित् वहाँ इतना कहकर चुप हो गया, तब उसी क्षण प्रशंसनीय बुद्धिवाले श्रीराम उससे यों बोले।

श्रीरामजीने पूछा—प्रभो ! यदि दूसरेका सङ्कल्परूपभूत मृग अपने आत्मामें दृष्टिगोचर हुआ है तो इससे सिद्ध हुआ कि इसी प्रकार असंकल्प पुरुष दूसरेके सङ्कल्परूप सृष्टिमें वस्तुएँ देख सकता है। परंतु यह कैसे सम्भव होगा—इसे बतलानेकी कृपा कीजिये।

६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विपश्चित्ने कहा—राघव ! पहले जिस जगत्के भूतलपर वह महाशव गिरा था, उसी भूमिपर इन्द्र यज्ञके गर्वसे गर्वीले होकर विचरण कर रहे थे । वहीं आकाशमें महर्षि दुर्वासा ध्यानमग्न होकर बैठे थे । इन्द्रको यह पता नहीं था कि ये मुनि हैं । उन्होंने अज्ञानवश मुर्दा समझकर उन्हें पैरसे ठोकर मार दी । इससे महर्षि दुर्वासा कुपित हो गये और इन्द्रको शाप देते हुए बोले—'देवराज ! तुम जिस भूतलपर जाना चाहते हो, तुम्हारे उस अवनितलको ब्रह्माण्डके समान विशाल एव महाभयंकर शव शीघ्र ही चूर-चूर कर देगा । मुर्दा समझकर जो तुमने मेरा अतिक्रमण किया है, इस कारण मेरे शापसे तुम शीघ्र ही उस पृथ्वीको प्राप्त होओगे ।' वस्तुतः तो एक ( व्यावहारिक ) जगत् न सत् है और न दूसरा ( कल्पित ) जगत् असत् ही है, क्योंकि ये दोनों, जैसी प्रतिभा उदित होती है, तदनुकूल प्रतीत होते हैं । इसलिये इनमें किसे सत् कहा जाय अथवा किसे असत् कहा जाय । अथवा राघव ! इस प्रसङ्गमें मैं तुम्हें एक दूसरी युक्ति बतलाता हूँ, जिससे बात स्पष्टरूपसे समझमें आ जायगी, उसे सुनो । महाभाग ! जिसमें सब कुछ है, जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं सर्वात्मक एवं सर्वव्यापक है, उस ब्रह्ममें सभी कुछ सम्भव है । इसलिये सर्वात्मामें सङ्कल्पजनित पदार्थ परस्पर मिलते हैं—यह बात अवगत होती है, क्योंकि लोकमें भी देखा जाता है कि जहाँ छाया रहती है, वहीं धूप भी रहता है । ऐसा सम्भव न हो तो उसे सर्वात्मताकी प्राप्ति ही कैसे होगी ? इसलिये सर्वात्मामें संकल्पनगर परस्पर नहीं मिलते हैं—यह भी सत् है और परस्पर मिलते हैं—यह भी सत् है । इस प्रकार जो सत्य नहीं है, उसका अस्तित्व नहीं है और जो मिथ्या नहीं है, वह भी नहीं है; क्योंकि सर्वात्मामें सब कुछ सर्वत्र सर्वथा एवं सर्वदा वर्तमान है ।

रघुनन्दन ! यह ब्रह्मसत्ता ऐसी है, जो स्वयं ही अपनेसे अपना सृजन करती है तथा उसीके प्रभावसे अविद्या सादि एवं अनादिरूपसे अनुभूत होती है । इस ज्ञानदृष्टिसे सभी कुछ क्षणभरमें ही प्रमाणभूत हो जाता है और अन्य दृष्टिसे ऐसा नहीं होता, इसीलिये विद्वान्-लोग ज्ञानदृष्टिसिद्ध वस्तुको ही सारभूत मानते हैं । पूर्ण दृष्टि होनेपर ज्ञानता तथा अज्ञानता एवं सत् और असत्की स्थितिका कुछ भी भेद नहीं है; क्योंकि सत्य ब्रह्ममें सत् और असत्—दोनों एक-से हैं, इसलिये सब कुछ काष्ठवत् मौन अर्थात् चिद्रूप ही है। जो दृश्य है, वह अनन्त है, वही ब्रह्मता है और वही परमपद है, इसलिये यह सब कुछ चिदाकाशमयी सर्गश्री भी सृष्टिके आदिमें स्वप्न-तुल्य शान्त ब्रह्मस्वरूप ही है—यह स्वतः सिद्ध हो जाता है। (सर्ग १५६-१५९)


राजा दशरथका विपश्चित्को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देते हुए सभाको विसर्जित करना, दूसरे दिन सभामें वसिष्ठजीद्वारा कथाका आरम्भ, ब्रह्मके वर्णनद्वारा अविद्याके निराकरणके उपाय, जितेन्द्रियकी प्रशंसा और इन्द्रियोंपर विजय पानेकी युक्तियाँ

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! विपश्चित् यह कह ही रहा था कि सूर्यदेव मानो उस वृत्तान्तका अवेक्षण करनेके लिये अपने दूरतक फैले हुए किरणरूपी पादोंसे दूसरे लोकको चले गये । तब दिनका अन्त सूचित करनेवाला नगाड़ा अपने शब्दसे दसों दिशाओको पूर्ण करता हुआ-सा उसी प्रकार बज उठा मानो संतुष्ट हुई दिशाओंसे जय-जयकारकी ध्वनि आ रही हो । इधर महाराज दशरथ विपश्चित्को अपने राज्यके अनुरूप क्रमशः गृह, स्त्री और धन आदि विभव प्रदान करनेके लिये आदेश देते हुए सिंहासनसे उठ पड़े। फिर तो राजा दशरथ

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा दशरथका विपश्चित्को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देना * ६५५

श्रीराम और वसिष्ठ आदि सभी सभासदोंने परस्पर क्रमानुसार एक-दूसरेको प्रणाम आदिके द्वारा सत्कार किया और फिर सभा विसर्जित करके वे अपने-अपने निवास-स्थानको चले गये। वहाँ उन्होंने स्नान-संध्या आदि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर भोजन किया और रात बिताकर प्रातःकाल वे पुनः सभामें आ गये। फिर तो वह सभा पहलेके ही तरह पूर्णरूपसे स्थित हो गयी। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा अपनी किरणोंसे अमृतकी वर्षा करता है, वैसे ही मुनीश्वरने अपने मुखरूपी किरणोंसे आह्लाद उगलते हुए उस यथाप्रस्तुत कथाका क्रमशः वर्णन करना आरम्भ किया।

राजन् ! यह अविद्या नहीं है। यह असत् होती हुई सत्-सी स्थित है। उपर्युक्त प्रकारका महान् प्रयत्न करनेपर भी विपश्चित् उसका निर्णय नहीं कर सका। इस प्रकार जबतक इस अविद्याका पूर्णतया ज्ञान नहीं हो जाता तभीतक यह अनन्त प्रतीत होती है; किंतु पूर्णरूपसे जान लिये जानेपर तो मृगतृष्णा-नदीके समान इसका अस्तित्व ही मिट जाता है।

श्रीरामजीने पूछा—गुरुदेव ! भासद्वारा वर्णित मुनि और व्याधका जो सुख-दुःखादि नाना दशाओंसे युक्त वृत्तान्त है, यह क्या किसी कारणान्तरसे घटित हुआ था या स्वभावज है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यह अपना आत्मा परमात्मारूप महासागर है। इसमें इसी प्रकारके शून्यात्मक प्रतिभासरूप आवर्त निरन्तर अपने-आप स्वाभाविक ही उठते रहते हैं।

श्रीराम ! सत्य वस्तुमें 'यह जाग्रत् है, यह स्वप्न है' इस प्रकारकी जो भिन्नता प्रतीत होती है, उसका उन दोनोंकी समानरूपताका पूर्णरूपसे अनुभव हो जानेपर विनाश हो जाता है। जो जाग्रत् है, वही स्वप्न है और जो स्वप्न है, वही जाग्रत् है; क्योंकि कालान्तरमें 'निश्चय ही यह ऐसा नहीं है' ऐसी बाधबुद्धि दोनोंमें समान होती है। जैसे जीवनपर्यन्त नियमरहित सैकड़ों स्वप्न होते हैं, उसी तरह निर्वाणरहित महान् अज्ञानमें सैकड़ों जाग्रत् भी होते हैं। जैसे लोग उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले बहुत-से स्वप्नोंका स्मरण करते हैं वैसे ही पूर्वजन्मकी स्मृति करानेवाले योगसे सम्पन्न प्रबुद्ध पुरुषोंको सैकड़ों जन्मोंका भी स्मरण होता है। जैसे दृश्य और जगत्—दोनों नित्य ही एकार्थक हैं, वैसे ही जाग्रत् और स्वप्न—ये दोनों शब्द भी एकार्थक कहे जाते हैं।

रघुकुलभूषण राम ! जैसे तरङ्गें नदीके जलमें द्रवरूपसे स्थित हैं, उसी तरह सृष्टिरूपी लहरें चित्स्वभाव (चेतनका सङ्कल्प) होनेके कारण चेतनमें ही स्थित हैं। यह चित्तकी छाया ही 'जगत्' नामसे प्रस्फुरित होती है। यह आकाररहित होते हुए भी मूर्तिमती-सी होकर द्रव्यकी छायाके समान व्याप्त है। आत्मा ही अपना बन्धु है और आत्मा ही अपना शत्रु है। यदि आत्माद्वारा आत्माकी रक्षा न की गयी तो फिर उसकी रक्षाका दूसरा कोई उपाय नहीं है। जीवकी बाल्यावस्थाको ज्ञानहीन होनेके कारण पशुता-सी और वृद्धावस्थाको मृत्यु-तुल्य ही समझना चाहिये। यदि विवेक सम्पन्न हो तो युवावस्था ही उसका जीवन है। इस संसारको, जो बिजलीके कौंधनेके समान चञ्चल है, प्राप्त होकर सद्-शास्त्र-चिन्तन एवं सत्पुरुषोंके सङ्गद्वारा अज्ञानरूपी कीचड़से आत्माका उद्धार करना चाहिये। अहो ! खेद है। ये मनुष्य कैसे क्रूर हैं, जो कीचड़में फँसे हुए अपने आत्माका भी उद्धार नहीं कर रहे हैं। भला, इनकी क्या गति होगी। * जैसे मिट्टीकी


* आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।
आत्माऽऽत्मना न चेत् त्रातस्तदुपायोऽस्ति नेतरः ॥
शैशवं वार्धकं ज्ञेयं तिर्यक्त्वं मृतिरेव च ।
तारुण्यमेव जीवस्य जीवितं तद्विवेकि चेत् ॥
संसारमिममासाद्य विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ।
सच्छास्त्रसाधुसम्पर्कैः कर्दमात् सारमुद्धरेन् ॥

६५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बनी हुई वेताल-सभा उसके रहस्यसे अनभिज्ञ ग्रामीण पुरुषको भय आदि दुःख प्रदान करनेवाली होती है, किंतु जिसे उसके यथार्थ रहस्यका यों ज्ञान हो गया है कि यह मृन्मयी ही है, उसके लिये वह दुःखदायिनी नहीं होती, वैसे ही यह ब्रह्ममयी दृश्यलक्ष्मी अज्ञानीको भयादि क्लेश पहुँचाती है; किंतु 'यह दृश्य ब्रह्म ही है' यों यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वह कष्टदायिनी नहीं होती। इस दृश्यके तत्त्वका परिज्ञान हो जानेसे यह अशान्त होता हुआ भी शान्त तथा स्थित होता हुआ भी विलीन हो जाता है और दृश्यमान होता हुआ भी दिखायी नहीं पड़ता। जैसे अपने स्वप्नकालमें स्पष्टरूपसे अनुभवमें आया हुआ भी स्वाप्न-जगत् उसका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे अथवा जाग जानेसे असत्य ही हो जाता है, वैसे ही चिदाकाशमें अनुभूयमान अतएव सत्य-सी स्थित हुई भी यह सृष्टि तत्त्वका पूर्ण ज्ञान हो जानेसे केवल शून्यरूप ही अवशिष्ट रह जाती है।

श्रीरामजीने पूछा—मुनिवर ! जब इन्द्रियोंपर विजय पाये बिना इस अज्ञानका उपशमन नहीं होता, तब मुझे यह बतलानेकी कृपा कीजिये कि इन इन्द्रियोंको कैसे जीता जा सकता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! जैसे मन्द दृष्टिवाले पुरुषके लिये सूक्ष्म पदार्थके निरीक्षणमें दीपक उपयोगी नहीं होता, उसी तरह प्रचुर भोगोंमें आसक्त, भौतिक पुरुषार्थ-सम्पादनमें संलग्न, जीविकोपार्जनमें दत्तचित्त तथा इन्द्रियजयविहीन पुरुषके लिये केवल शास्त्रादि साधन उपयोगी नहीं होते। इसलिये तुम इन्द्रियजयमें निमित्तभूत इस युक्तिको अविकल रूपसे श्रवण करो। इस युक्तिके आश्रयसे अपने प्रयत्नद्वारा सम्पादित थोड़ी-सी भी साधन-सम्पत्ति सुखपूर्वक सिद्धिको प्राप्त हो जाती है। इस इन्द्रियरूपी सेनाका चित्त ही सेनापति है, अतः उसपर विजय पा लेनेसे इन्द्रियोंपर स्वतः विजय प्राप्त हो जाती है—ठीक उसी तरह, जैसे जूतेसे सुरक्षित पैरवाले पुरुषके लिये सारी पृथ्वी ही चर्माच्छादित-सी हो जाती है। जो चित्तावच्छिन्न चेतन जीवको संविदाकाशरूप ( ज्ञान-स्वरूप) ब्रह्ममें एकीभूत करके अपने स्वरूपमें स्थित है, उस पुरुषका मन शारदीय कुहरेकी तरह स्वयं ही शान्त हो जाता है। जिसने निरन्तर अपने संवेदन ( ज्ञान ) रूपी प्रयत्नके द्वारा चित्तवृत्तिको विषयरूपी मांससे हटा लिया है, उसे तत्त्वज्ञानियोंका स्वाराज्य पद प्राप्त हुआ ही समझिये। जो स्वधर्मविरुद्ध कार्योंमें आत्मप्रवृत्तिका त्याग करके शम और संतोषका उपार्जन करता हुआ स्थित है, वही जितेन्द्रिय है। जिसका मन अपने अंदर आत्मरसिकता और बाहर नीरसताका अभ्यास करनेमें उद्विग्न नहीं होता, उसका मन शान्त हो जाता है। प्रयत्नपूर्वक भलीभाँति निरोध कर देनेसे मन अपने आश्रय-स्थान ( विषयानुधावनरूप दुर्व्यसन ) का त्याग कर देता है और जब वह चञ्चलतासे निर्मुक्त हो जाता है तब विवेककी ओर मुड़ता है। विवेक सम्पन्न मन उदार आत्मा और विजितेन्द्रिय कहा जाता है। फिर वह भवसागरमें वासनारूपी तरङ्गोके वेगसे विमोहित नहीं होता। इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर वह साधु-समागम और सत्-शास्त्रोंके अनुशीलनसे जगत्को यथार्थरूपसे सत्यब्रह्म-स्वरूप देखने लगता है। उस सत्यब्रह्मके अवलोकनसे संसारभ्रम उसी प्रकार शान्त हो जाता है, जैसे जलका ज्ञान हो जानेपर मरुस्थलमें प्रतीत होनेवाली जलकी भ्रान्ति मिट जाती है। चेत्यभिन्न चिन्मात्र ही यह जगद्रूपसे स्थित है—ऐसा सत्य बोध जिसे प्राप्त हो गया है, उसे बन्ध-मोक्षकी दृष्टि कहाँसे प्राप्त हो सकती है ? 'अहं' 'त्वं' आदिरूप यह जगत् अविद्यामात्र ही है। यह मिथ्या होनेके कारण शान्त अतएव केवल शून्य-स्वरूपवाला है और चिदाकाशमें ही स्थित है।


अहो बत नराः क्रूरा गतिः केषां भविष्यति ।
कुर्वन्ति कर्दमोन्मग्ने नात्मन्यपि निजोदयम् ॥
( नि० प्र० उ० १६२ । १८, २१ से २३ )

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * दृश्यजगत्‌की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ताका प्रतिपादन * ६५७

रघुनन्दन ! जिनका चित्त उस ब्रह्ममें रम गया है और प्राण उसीमें लीन हो गये हैं, वे परस्पर ज्ञानोपदेश करते तथा ब्रह्मविषयक चर्चा करते हुए संतुष्ट होते हैं और आनन्द मनाते हैं । इस प्रकार निरन्तर परमात्मामें युक्तचित्तवाले तथा प्रेमपूर्वक भजन करनेवाले योगियोंको उस बुद्धियोगकी प्राप्ति होती है, जिससे वे उस परमपदको प्राप्त हो जाते हैं।* जब तृणमात्रके संरक्षणमें भी यत्नपूर्वक किया गया साधन ही उपकारी होता है, तब भला, त्रिलोकसमूहका संरक्षण यत्नके बिना कैसे सिद्ध हो सकता है । मनका अङ्कुररूप जो राज्यादि सुख है, वह क्या कोई सुख है ? अर्थात् वह तो अत्यन्त ही तुच्छ है; क्योंकि तत्त्वज्ञानमें पूर्णतया विश्राम प्राप्त हो जानेपर देवराजका पद भी तृणवत् लगने लगता है । जैसे दृश्य-प्रपञ्चमें रत पुरुष सुप्तावस्था अथवा जाग्रदवस्थामें दृश्यको ही देखते हैं, वैसे ही दृश्यसे विरक्त हुए शान्त ज्ञानी महात्मा उस परमपदरूप परमात्माको ही देखते हैं। श्रीराम ! इस परमपदको तुम महान् अभ्यासरूपी वृक्षका फल समझो। यह बिना घोर प्रयत्न किये कभी सिद्ध नहीं हो सकता । यदि अज्ञानी भी मेरे द्वारा कहे गये इस शास्त्रका बारंबार आवृत्तिद्वारा आस्वादन करे, श्रवण करे अथवा वर्णन करे तो वह तत्त्वज्ञानी हो सकता है । विचारपूर्वक मनन किये गये इस उत्तम शास्त्रसे जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, उन ज्ञानोंसे अन्य शास्त्र भी उसी प्रकार रुचिकर लगने लगते हैं, जैसे नमकसे व्यञ्जन । तत्त्वज्ञोंका विषयभूत जो परम ब्रह्म है, वह सभी अवस्थाओंमें भेदादि मलसे रहित सदा एकरस ही रहता है । उसमें कभी किंचिन्मात्र भी द्वैतादि मलका अस्तित्व नहीं रहता । चिदाकाशमें जो यह जगत् स्फुरित होता है, वह चिदाकाशका स्वभाव है, जो सूर्यकी प्रभाके समान इस चिदाकाशमें ही विकसित होता है । (सर्ग १६०-१६५)


दृश्यजगत्की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ता तथा ब्रह्मसे अभिन्नताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! चिन्मय परमात्मा ही इस दृश्यप्रपञ्चके रूपमें फैला हुआ है । इसलिये ये घट, गड्ढे और पट आदि सब पदार्थ वस्तुतः शुद्ध चैतन्यरूप ही हैं । जैसे स्वप्नमें शुद्ध चेतना ही घट-पटादि पदार्थोंके रूपमें भासित होती है और जैसे जल ही तरङ्गरूपमें प्रतीत होता है, वैसे ही विशुद्ध चेतन-तत्त्व ही इस दृश्यरूपमें प्रकाशित हो रहा है । तत्त्वज्ञ पुरुष घट-पट आदि समस्त भौतिक पदार्थोंको ब्रह्मघन, चैतन्यघन, परमार्थघन और शान्तस्वरूप एकरस आनन्दघनका ही प्रसार मानते हैं । श्रीराम ! आत्मख्याति, असत्ख्याति, अख्याति और अन्यथाख्याति—ये जो शब्दार्थ-दृष्टियाँ हैं, तत्त्वज्ञानी पुरुषके लिये खरगोशके सींगकी भाँति असत् हैं । इनमेंसे कोई कभी भी सम्भव नहीं है । केवल चेष्टाशून्य, शान्तस्वरूप, व्यावहारिक नाम आदिसे रहित, ज्ञाता (साक्षी) परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान हैं। वह जो चिन्मय प्रकाशके स्फुरणसे आकाशस्वरूप शरीर (मूर्त जगत्), जो कि बिना दीवालके चित्र-सा पदार्थोंकी सत्तामात्र है, प्रतीत होता है; वास्तवमें अविनाशी ही है। जैसे जलमें तरङ्गैं होती हैं, उसी प्रकार शान्तस्वरूप परमात्मामें सदा और सर्वत्र वह जगत्


* तच्चित्तास्तद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च तन्नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । जायते बुद्धियोगोऽसौ येन ते यान्ति तत्पदम् ॥
(नि० प्र० उ० १६३ । ४०-४१)
कुछ अन्तरसे यही दोनों श्लोक गीता (१० । ९-१०) में आये हैं।

६५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चिन्मयरूपसे ही विद्यमान है। जगत् जिस रूपमें प्रतीत हो रहा है, वैसा ही प्रतीत होता हुआ भी चेतनाकाशरूप होनेके कारण न सर्वथा असत् है और न सत् ही है। सारा दृश्य कुछ है और नहीं भी है। सर्वथा अनिर्वचनीय है। जिस रूपमें इस जगत्की स्थिति है, ऐसा ही इसका रूप है, या ऐसा नहीं है, यह सत् है या असत् है—संसारचक्रके विषयमें उठनेवाले इन प्रश्नोंका यथार्थ उत्तर—जगत्का यथार्थ स्वरूप तत्त्वज्ञानी महात्मा ही जानता है, दूसरा नहीं।

रघुनन्दन ! चिन्मय आकाशमें ही जो चिन्मय आकाशका स्फुरण हो रहा है, उसीने उसीको जगत् समझा है। तत्त्वज्ञान होनेके पश्चात् वह जगत् कहाँ टिक पाता है?

पूर्णपरब्रह्म परमात्मासे ही यह पूर्ण ब्रह्ममय जगत् उसके प्रकट न करनेपर भी प्रकट हुआ-सा प्रतीत होता है। यह प्रतीति भी ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही है। जो स्वयं मेरे अनुभवमें आ रहा है, उस आत्मतत्त्वको इस प्रकार अत्यन्त विशदरूपसे बारंबार उच्चस्वरसे प्रकट कर रहा हूँ, तो भी कुछ मन्दाधिकारी लोगोंके भीतर जो मूढ़ता घर किये बैठी है, वह खम्-तुल्य जगत्में 'यह जाग्रत् सत्य ही है' ऐसे विश्वासका आज भी त्याग नहीं कर रही है। यह महान् खेदका विषय है। जो समझदार होनेके कारण तत्त्वज्ञानका अधिकारी है, वह भी उस भ्रान्त धारणाको शीघ्र नहीं छोड़ रहा है। यह कैसा मोह है!

(सर्ग १६६—१६८)


जीवनमुक्त तथा परमात्मामें विश्रान्त पुरुषके लक्षण तथा आत्मज्ञानीके सुखपूर्वक शयनका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिसकी बुद्धि अन्तर्मुखी है—आत्मस्वरूप परमात्मामें लगी हुई है तथा जिसे सुखके साधन सुख और दुःखके साधन दुःख नहीं दे पाते हैं, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जैसे अज्ञानियोंकी चित्तवृत्ति सब ओर फैले हुए विषयभोगोंमें आसक्त हो उनसे दूर नहीं हटती है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन परमात्मामें अविचल निष्ठा रखनेवाले जिस तत्त्वज्ञानी पुरुषकी विवेकशालिनी बुद्धि वहाँसे विचलित नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका चित्त अपनी चपलता छोड़कर चिन्मात्रस्वरूप परमात्मामें विश्राम लेकर वहीं रम गया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका मन परमात्मामें विश्राम लेनेके पश्चात् फिर वहाँसे हटकर इस दृश्यजगत्में नहीं रमता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है।

जो विशुद्ध बोधस्वरूप ज्ञानी महात्मा एकमात्र चेतनाकाशमय परमात्माके चिन्तनमें अनायास ही दृढ़तापूर्वक संलग्न होनेके कारण किसी लौकिक सुखका अनुभव नहीं करता है, वह परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। जिसके सभी पदार्थोंके विषयमें सारे संदेह विवेकद्वारा वास्तवमें नष्ट हो गये हैं, वह परमपद-स्वरूप परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। व्यवहारमें लगे होनेपर भी जिसके मनमें कहीं किसी भी पदार्थके प्रति अनुराग या आसक्ति नहीं है, वह परमात्मामें विश्रान्त कहलाता है। जो प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करता है तथा जिसके सभी कार्य कामना और संकल्पसे शून्य होते हैं, वह परमात्मामें विश्रान्त कहा गया है। जिस महापुरुषने विश्रामशून्य, आधाररहित तथा लंबे संसारमार्गमें उसकी चिन्मात्ररूपताका साक्षात्कार करके आत्मामें विश्राम पा लिया है, उसकी सर्वत्र विजय है। जन्म-जरा आदि सांसारिक दुःखसे ऊपर उठकर भवसागरके पार पहुँचा हुआ श्रेष्ठ ज्ञानी महात्मा परम विश्रान्ति-सुखका अनुभव करता हुआ आत्मामें प्रतिष्ठित होता है।

सारे जगत्का अभाव करके परम पूर्णताको प्राप्त हुआ आत्मज्ञानी पुरुष खूब छककर ब्रह्मानन्दमय अमृतका पान करता और सुखसे सोता है; कैसी अद्भुत बात है? आत्मज्ञानी

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री-पुत्र आदि परिवारका परिचय * ६५९


पुरुष विषयानन्दके अभावमें भी निरतिशय ब्रह्मानन्द पाकर महान् आनन्दमें निमग्न हो जाता है, अविनाशी अद्वैत सुखका अनुभव करता है तथा दूसरे प्रकाशोंसे प्रकाशित न होनेवाले परमात्माके महान् प्रकाशसे सम्पन्न हो सुखसे सोता है; यह कैसी विलक्षण स्थिति है ? जिसके काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि रूप अन्धकारका नाश हो गया है, जो परमात्माके महान् प्रकाशका रसिक बन गया है तथा केवल अमूर्त आनन्दरसमें ही आह्लादका अनुभव करता है, वह आत्मज्ञानी पुरुष ही सुखसे सोता है; यह कितनी अद्भुत बात है ? आत्मज्ञानी पुरुषका जो सुखपूर्वक शयन है, उसमें अनन्त दुःखोंके अनुभवके विषयमें वह विरत होता है और वर्णाश्रमोचित व्यवहारमें लोकसंग्रहके लिये वह लगा रहता है—उससे विरत नहीं होता । बाह्य पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नहीं होती है तथा वह आन्तरिक सुखका निरन्तर अनुभव करता रहता है । जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा स्थूलसे भी स्थूल है, उस आत्माको चिदाकाशरूपी शय्यापर सुलाकर आत्मज्ञानी पुरुष अपूर्व सुखसे सोता है । इस हमारे जगत्‌को अपने आत्मस्वरूप चेतनाकाशके एक कोनेमें खप्रके समान देखता हुआ वह विशद चिदाकाशस्वरूप आत्मज्ञानी पुरुष सुखसे सोता है । लोकपरम्पराके अनुसार प्राप्त व्यवहाररूप मनोरम तृणराशिसे निर्मित चटाईपर विश्रामको प्राप्त हुआ आत्मज्ञानी पुरुष सुखपूर्वक सोता है । ( सर्ग १६९ )


जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री, पुत्र आदि परिवारका परिचय तथा उस मित्रके साथ रहनेवाले उस महात्माके स्वभावसिद्ध गुणोंका उल्लेख, तत्त्वज्ञानीकी स्थिति, जगत्‌की ब्रह्मरूपता तथा समस्त वादियोंके द्वारा ब्रह्मके ही प्रतिपादनका कथन

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जीवन्मुक्त पुरुषका मित्र कौन है जिसके साथ वह क्रीडा करता है ? उसकी क्रीडाका क्या स्वभाव है ? अपने आत्मस्वरूपमें अवस्थिति ही उसकी क्रीडा है अथवा रमणीय भोग-स्थानोंमें विहार करनेसे जो प्रसन्नता प्राप्त होती है, उसीको वह अपनी क्रीडा समझता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जो अपना परम्परा-प्राप्त सहज कर्म है, जो लोकसंग्रहके लिये किया जाने-वाला अपना शास्त्रीय कर्म है तथा जो प्रयत्नसे अभ्यासमें लाया गया सत्-शास्त्रोंका अभ्यास, विचार, सत्संग, शम, दम, तितिक्षा, उपरति, शौच, संतोष, ईश्वर-ध्यान और संयम आदि अपना कर्म है—ये तीनों प्रकारके कर्म, जो निन्य या निषिद्ध नहीं हैं, वास्तवमें एक ही हैं । केवल उपाधिभेदसे तीन नामोंद्वारा कहे गये हैं । वह एकमात्र त्रिविध कर्म ही जीवन्मुक्त पुरुषका स्वाभाविक मित्र है । वह मित्र पिताके समान आश्वासन देनेवाला, स्त्रीके समान लज्जाद्वारा अकर्तव्यसे रोकनेवाला तथा जिनका निवारण करना कठिन है, ऐसे संकटोंमें भी सदा साथ देनेवाला है । उसके सेवनमें किसी प्रकारकी शङ्काके लिये स्थान नहीं है । वह परमानन्दकी सिद्धिमें पूर्ण सहायक है तथा क्रोधके अवसरोंपर भी कोपरहित होनेके कारण सान्त्वनारूप अमृत प्रदान करनेवाला है । ऐसे स्वकर्म नामक अपने सखीक मित्रके साथ वह जीवन्मुक्त पुरुष स्वभावसे ही रमता है, किसी दूसरेसे प्रेरित होकर नहीं ।

श्रीरामजीने पूछा—मुनीश्वर ! उसके इस मित्रकी स्त्री और पुत्र आदि कौन है तथा उनका स्वरूप क्या है ?—उनमें कौन-कौन-से गुण हैं ? यह संक्षेपसे ही मुझे बताइये ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—महामते ! इस स्वकर्म नामक मित्रके 'स्नान,' 'दान,' 'तप' और 'ध्यान' नामवाले चार महात्मा पुत्र हैं । उनके सद्गुणोंसे सारी प्रजा उनमें

६६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

भलीभाँति अनुरक्त रहती है। इसकी पत्नीका नाम 'समता' है, जो इसे बहुत ही प्रिय है। वह सदा अपने प्रियतमकी हृदयवल्लभा होकर रहती है। चन्द्रलेखाके समान दर्शन-मात्रसे ही लोगोंको आह्लाद प्रदान करती है। सदा संतुष्ट रहती और प्रियतममें अनुराग रखती है। करुणाके कारण सब ओर अपना वैभव बाँटती रहती है। चित्तको चुरा लेनेवाली और आनन्दकी जननी है। सदा पतिके साथ रहती और कभी अलग नहीं होती है। साधो ! जो सदा धैर्य और धर्ममें लगायी जाती है, वह 'बुद्धि' ही इस समता रानीकी प्रतीहारी (द्वारपालिका) है। वह सदा उसके सामने विनम्र रहकर उसे सुख देनेमें तत्पर रहती है। वह उस धर्म-धुरन्धर धन्यभागी वीर पुरुषके आगे-आगे दौड़ती है। इस महातेजस्वी राजाके मित्रकी दूसरी स्त्री 'मैत्री' है, जो राज्यपर बढ़े हुए शत्रुओंको पराजित करनेके लिये राजाको उचित मन्त्रणा प्रदान करती है। वह सदा 'समता'के साथ राजाके कंधे-से-कंधा भिड़ाकर चलती है। इसके सिवा इन माननीय नरेशको आर्य-मर्यादारूपी समस्त कार्योंके विषयमें बड़ी चतुराईके साथ उपदेश देनेवाली आचार्यस्वरूपा 'सत्यता' इसका स्वार्थ सिद्ध करनेवाली धनाध्यक्षा है। इस तरहके उत्तम परिवारवाले मित्र एवं मन्त्रीरूप अपने कर्मके साथ सर्वत्र व्यवहार निर्वाह करता हुआ जीवन्मुक्त पुरुष न तो लौकिक लाभमें हर्ष मानता है और न हानि होनेपर कुपित ही होता है। निर्वाण मोक्षमें मन लगाये रहने-वाला वह मननशील मुनि युद्धादि व्यवहारमें तत्पर होनेपर भी चित्रलिखित योद्धाकी भाँति ज्यों-का-त्यों ही निर्लेप स्थित रहता है। निरर्थक वादविवादोंमें वह पत्थरकी प्रतिमाकी भाँति मूक बना रहता है। बेमतलबकी बातोंको सुननेमें वह परले सिरेका बहिरा बना रहता है। लोकाचारके विरुद्ध सभी कर्मोंमें मुर्देके समान निश्चेष्ट होता है और सदाचारका विवेचन करते समय वह सहस्र जिह्वावाले वासुकि एवं देवगुरु बृहस्पतिके समान वक्ता बन जाता है। उसकी वाणीसे सदा पवित्र चर्चा ही प्रकट होती है। अपने या दूसरोंके कुटिलतापूर्ण दोषोंको वह शीघ्र ही ताड़ लेता है। वस्तुविषयक अत्यन्त दुरूह संदेहका भी पलक मारते-मारते निर्णय करके शीघ्र ही उसके स्वरूपका विवेचन कर देता है। उसकी दृष्टिमें समता और हृदयमें उदारता होती है। वह दानवीर होनेके कारण सबको यथायोग्य धन वितरण करता है। उसका स्वभाव कोमल, स्नेहमय और मधुर होता है। वह सुन्दर एवं पुण्यकीर्ति होता है। जिनकी बुद्धि प्रबुद्ध—तत्त्वज्ञानके प्रकाशसे आलोकित है। वे प्रयत्नसे ऐसे नहीं बनते हैं। जैसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि आदि कभी दूसरेकी प्रेरणासे प्रकाशित नहीं होते, वह प्रकाश उनका स्वाभाविक गुण होता है, वैसे ही जीवन्मुक्त पुरुषोंका यह स्वभावसिद्ध गुण बताया गया है।

शान्त तत्त्वज्ञानी पुरुष चलते-फिरते, खड़े होते, जागते और सोते समय भी सदा एकमात्र सच्चिदानन्द परमात्मामें ही समाहित रहता है। जो भेदमें भी अभेदनिष्ठ है, दुःखमें भी सुखमयी स्थितिवाला है और बाह्य संसारमें रहकर भी अन्तर्मुख होनेके कारण संसारमें नहीं है। ऐसे ज्ञानी महात्माके लिये दूसरा कौन-सा कर्तव्य या प्राप्तव्य शेष रह जाता है ? बाहरके कार्य—व्यवहार करता हुआ भी तत्त्वज्ञ पुरुष हृदयसे न तो कुछ त्याग करता है और न ग्रहण ही करता है। वह सदा अकार्य नित्य परब्रह्म परमात्मामें ही स्थित रहता है। ज्ञानीपुरुष अज्ञानके आवरणसे मुक्त होता है। उसका अन्तःकरण सदा शान्ति और आनन्दका ही अनुभव करता है। उसके शत्रु-मित्रादि-विषयक विकल्प नष्ट हो जाते हैं। उसमें आत्मसुखस्वरूप सार वस्तुकी ही प्रचुरता होती है तथा वह सदा परम शान्तिरूप अमृतसे तृप्त रहता है।

चारों ओर सुन्दर जगत्के रूपमें यह परब्रह्म ही स्फुरित हो रहा है। वह स्फुरण और अस्फुरण (सृष्टि

१०१—**कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र एवं गुरुपदेश आदिको कारण बताना

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका खण्डन * ६६१

और प्रलयकाल) मे भी अपने निर्विकार स्वरूपमें ही अकेला स्थित रहता है। दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें भासित होकर भी निर्मल, प्रशान्त चेतनाकाशरूप ही है। परंतु अज्ञानियोंकी दृष्टिमें अनादिकालसे प्रलय और सृष्टिके उदयरूपसे ही उदित है।

अज्ञ जनताके निश्चयको छोडकर तत्त्वज्ञानी पुरुषकी दृष्टिमें ज्यों-का-त्यो स्थित हुआ यह जगत् सदा निर्विकार ब्रह्मरूप ही है। यदि तरङ्ग चेतन हो और वह युक्तिसे यह समझ ले कि मै तरङ्ग नहीं, जल ही हूँ तो उसकी तरङ्गता कैसे रह सकती है ? वेदान्तियों, जैनियों, सांख्यवादियों, बौद्धों, व्यास आदि आचार्यों, पाशुपतों तथा वैष्णव आदि आगमोंने भलीभाँतिसे प्रतिपादन करके जो-जो दृष्टिकोण उपस्थित किये हैं, उन सबके रूपमें भी हमारा प्रतिपाद्य ब्रह्म ही स्फुरित हो रहा है। उन्होने अपनी-अपनी दृष्टिसे विभिन्न नामोद्वारा उस ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया है। उन वादियोंके अपने-अपने निश्चयके अनुसार पारलौकिक ऐहलौकिक सुख-रूप सारे फलोंके रूपमें वह ब्रह्म ही उपलब्ध होता है। ब्रह्मकी ऐसी ही महिमा है; क्योंकि उसका स्वरूप सर्वात्मक है। (सर्ग १७०—१७३)


निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका खण्डन, चिदाकाशके ही जगद्रूपसे स्फुरित होनेका कथन, ब्रह्मके उन्मेष और निमेष ही सृष्टि और प्रलय हैं, मन जिसमें रस लेता है वैसा ही बनता है, चिदाकाश अपनेको ही दृश्य-रूपसे देखता है तथा अज्ञानसे ही परमात्मामें जगत्की स्थिति प्रतीत होती है—इसका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टियाँ ब्रह्मरूपी समुद्रकी तरङ्ग हैं। उनमें चैतन्य ही जल है। जीवन्मुक्तोके अनुभवमें आनेवाला यह चिन्मय जगत् अज्ञानियोके दुःखमय जगत्से भिन्न है। वह सच्चिदानन्दमयी दूसरी ही सृष्टि है। उसमें द्वैत और एकत्व आदिके दुःखमय भेद किस निमित्तसे रह सकते हैं ? दृश्यका अत्यन्ताभावरूप जो बोध है, उसीको परमपद कहा गया है। वही ब्रह्म है और 'वह ब्रह्म मै हूँ' इस प्रकारका ज्ञान मोक्ष है। ब्रह्म ही सब कुछ है। (क्योकि 'सर्वंमभवत्' इस श्रुतिसे यही बात सिद्ध होती है) तथा वह कुछ भी नहीं है। (क्योंकि 'नेति-नेति' कहकर श्रुतिने इसीका समर्थन किया है)। रघुनन्दन ! ज्ञानी पुरुष ब्रह्मको इसी रूपमें जानता है। सम्यक् ज्ञानसे परम निर्वाणरूप मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है। उसमें ज्यों-का-त्यों स्थित हुआ यह सारा विश्व अत्यन्त प्रलयको प्राप्त हो जाता है। वहाँ न अनेकत्व है, न एकत्व; न कुछ है, न कोई है। वह समस्त सदसद्भावोंकी सीमाका अन्त कहा गया है। जहाँ दृश्यकी सत्ता अत्यन्त असम्भव है, जो शुद्ध बोधका उदय रूप है, जहाँ समस्त विक्षेपोका अभाव हो जाता है तथा जो निरतिशयानन्दरूपसे स्थित और परम शान्त है, उस चिन्मय परमात्माको ही परमपद समझना चाहिये।

यह परमात्मा जबतक अज्ञान रहता है, तभीतक अविद्या-रूप मलकी स्थिति है। उसका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर सब कुछ विशुद्ध परब्रह्म ही है, यह अचल निश्चय हो जाता है। जो अनादि, अनन्त, चिन्मय परमाकाशरूप है, उस परमात्मामें मल कहाँसे हो सकता है (क्योकि ज्ञान होते ही अविद्यारूपी मल घुल जाता है)। प्रिय श्रीराम ! विचारदृष्टिसे देखा जाय तो कुछ भी स्फुरित नहीं होता है; क्योकि यह परम चेतन तो अत्यन्त विशुद्ध कहा गया है। जो एकमात्र सच्चिदानन्दमय है, उसका अपने आपमें कल्पित संकल्प ही इस दृश्य-प्रपञ्चके रूपमें फैला हुआ है। वास्तवमें तो परब्रह्ममे न पृथ्वी आदि भूत हैं, न शरीर है और न चैतन्यसे भिन्न दूसरा ही कोई दृश्यभाव है; किंतु एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही अपने संकल्पद्वारा

१०२—**श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा

६६२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]

समष्टि मनोरूप होकर जगत्‌के आकारमें बारंबार स्फुरित हो रहा है । विचारदृष्टिसे देखनेपर यह जगत्‌का स्फुरण भी कुछ नहीं है । केवल सच्चिदानन्दघन ही स्वयं अपने स्वरूपमें भासित हो रहा है । जहाँसे वाणीं लौट आती है, उस निरतिशयानन्दमय परमपदकी प्राप्तिसे तूष्णीम्भाव—स्वरूपभूत निश्चञ्चता ही शेष रहती है ( वह निश्चञ्चता व्यवहारकालमे भी नहीं हटती है ) । जीवन्मुक्त पुरुष संसारके व्यवहारमे तत्पर रहता हुआ भी शुद्ध चिदाकाशरूप ही होता है और उसी रूपमें वह मुक्तवत् स्थित रहता है । ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! चिदाकाश, ब्रह्म, चिन्मात्र, आत्मा, चिति, महान् और परमात्मा—इन सब शब्दोंको पर्यायवाची ( समानार्थक ) ही समझना चाहिये । ब्रह्म नेत्रकी भाँति उन्मेष और निमेषरूप है अथवा वायुके समान स्पन्द और अस्पन्दरूप है । उसका जैसा प्रलयरूप निमेष है, वैसा ही सृष्टिरूप उन्मेष भी है । इन्हींका नाम जगत् है । उसने आँखें खोलीं तो संसारकी सृष्टि हो गयी और आँखें बंद कीं तो जगत्‌का प्रलय हो गया । परंतु वह परब्रह्म परमात्मा निमेष और उन्मेष—दोनों अवस्थाओमें एकरूप ही रहता है । सौम्य रघुनन्दन ! इस कारण यह सम्पूर्ण जगत् जिस रूपमें स्थित है, इसी रूपमें इसे शान्त, अजन्मा, अजर, सभी अवस्थाओंमें सत् और चिदाकाशरूप ही समझना चाहिये ।

जिसका चित्त जिस वस्तुमें रस लेता है, उसका वह चित्त वैसा ही हो जाता है । अतः एकमात्र परब्रह्म परमात्माका रसिक हुआ जो ज्ञानीका मन है, वह ब्रह्मभाव को ही प्राप्त हो जाता है और जिसका मन जिसमें रस पाता है, उसने उसीको सत् समझा है । जिसकी ज्ञानदृष्टिमें दृश्य-अदृश्य, सत्-असत् तथा मूर्त-अमूर्त सब कुछ ब्रह्म ही है, उसकी दृष्टिमें यहाँ अथवा और कहीं भी न तो कर्त्ता-भोक्ता जीवकी सत्ता है और न उसका अभाव ही ( क्योंकि एकमात्र वही ब्रह्मरूपसे शेष रह जाता है ) ।

सहस्रों वादी मिलकर भी सत्‌से अतिरिक्त वस्तुकी सत्ताका उपपादन नहीं कर सकते तथा उससे भिन्न जगत्‌का कोई यथार्थ कारण नहीं उपलब्ध होता । इसलिये स्वतः यह बात सिद्ध हो गयी कि आदिकालसे ही चिदाकाश अपने आपको ही दृश्यरूपसे देखता है ।

जैसे स्वप्नमें स्वयं चिन्मय जीवात्मा ही स्वप्न-जगत् के रूपसे भासित होता है, वैसे ही यहाँ सृष्टिके आरम्भ में चिदाकाशके सिवा इस दृश्यका अन्य कोई कारण नहीं पाया जाता । ( सर्ग १७४-१७६ )


सृष्टिकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें कोई अज्ञानी है ही नहीं ( वह एकमात्र ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुको देखता ही नहीं है ) । अतः जिसका अस्तित्व ही नहीं है, ऐसे आकाश-वृक्षके सदृश अज्ञानीके विषयमें विचार करना कैसा होगा ? अज्ञानका बोधस्वरूप आत्माके ही भीतर भान होता है; अतः वही उसका अधिष्ठान है । जगत् अज्ञानका अङ्ग है, अतः अज्ञानरूप ही है । जैसे स्वप्न और सुषुप्ति—दोनों निद्राके अन्तर्गत होनेसे निद्राके ही अङ्ग हैं; इसलिये उन्हें केवल निद्रारूप ही कहा जा सकता है, वैसे ही जगत्‌का स्वरूप भी अपने अधिष्ठानभूत चिन्मय परमात्मासे भिन्न नहीं है । जैसे शुद्ध जलराशिमें लहर, भँवर और द्रवता आदिके रूपमें जल ही प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्ममें सर्ग नामक ब्रह्म ही भासित होता है । जैसे निर्मल वायुमें स्पन्दन, आवर्त्त और विवर्त्त आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्मरूप वायुमें सृष्टिरूपी स्पन्दन भासित होता है । जैसे महाकाशमें अनन्तता, छिद्रता और शून्यता आदि

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना * ६६३


आकाशरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सृष्टि भी परात्पर ब्रह्मरूप ही है। जैसे निद्रा आदिमे स्पष्टरूपसे उपलब्ध होनेपर भी ये सारे स्वप्नगत पदार्थ असन्मय ही हैं, उसी प्रकार ये सृष्टिके पदार्थ भी हैं, अतः इनकी सत्ता नहीं है। परंतु सत्स्वरूप परमात्मामें उपलब्ध होनेके कारण उससे अभिन्न ही हैं। जैसे निद्राकालमें मनुष्य एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें स्थित होता है, वैसे ही अजन्मा परमात्मा अपनी सत्तामें ही एक सर्गसे दूसरे सर्गके रूपमें स्थित होते हैं। जैसे साम्प्रतिक सर्वदर्शनरूप परमात्मामें वर्तमान घट, पट आदि शब्द और उनके अर्थ स्थित हैं, उसी प्रकार अद्वितीय महाचैतन्यरूप परमात्मामें भूत और भविष्य कालकी सारी सृष्टियाँ स्थित हैं। जैसे परमात्मामें ही सृष्टिरूप परमात्माका भान होता है, वैसे ही चितिमें ही चिन्मय शब्द और उनके अर्थभूत सर्गोंका चितिके द्वारा ही भान होता है।

इस जगत्में न कोई आकृति है, न संसार है, न संसारका अभावरूप मोक्ष है, न जन्म है, न नाश है, न सत्ता ( भावविकार ) है और न असत्ता ही है। केवल परम शान्त ब्रह्मका ही अपने आपमें स्फुरण होता है अथवा यहाँ ब्रह्मसे भिन्न किसी प्रकारका स्फुरण भी नहीं है। यद्यपि ब्रह्म अनेकानेक सृष्टिरूपी पुतलियोंके समुदायसे भरा हुआ है, तथापि वस्तुतः उसमें जगतरूपी लताएँ, उनकी चोटियाँ, जड़ें, उनकी रचनाएँ और उनकी जड़ोंका भूमिमें प्रवेश—ये सब अलभ्य हैं। वह आदि-अन्तसे रहित है, कालके द्वारा भी उसके जन्म और नाश नहीं होते तथा वह पूर्णरूपसे विशुद्ध एवं सच्चिदानन्दघन है।

चिन्मय प्रकाशरूप परमार्थकाश ही, जो सब पदार्थोंसे रहित है, स्वप्नकी भाँति द्रष्टा, दृश्य और दर्शन रूपसे प्रतीत हो रहा है। इसलिये यह जगत् एकमात्र चेतनाकाश ही है। आकाशमें भ्रमवश होनेवाली वृक्षसमूहोंकी स्फुरणाके समान ब्रह्मरूपी समुद्रमें जो नाम-रूपात्मक जलकणोंका स्फुरण हो रहा है, वही यह सृष्टि है। आकाशमें जो वृक्षसमूहकी प्रतीति होती है, वह तो आकाशसे भिन्न-सी लगती है; क्योंकि उसमें आकाशकी शून्यता नहीं दिखायी देती। परंतु परमब्रह्मरूपी महासागरमें जो सृष्टिरूपी जलबिन्दु विद्यमान हैं, वे उससे किंचिन्मात्र भी भिन्न नहीं हैं।

( सर्ग १७७-१७९ )


श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना और वसिष्ठजीके पूछनेपर कुन्ददन्तका अपने संशयकी निवृत्ति तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिको स्वीकार करते हुए अपना अनुभव बताना

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मेरे मनमें एक संदेह है, आप उसका निवारण कीजिये। एक दिनकी बात है, मैं विद्यामन्दिरके भीतर विद्वानोंकी सभामें बैठा था। उसी समय विदेह जनपदसे वहाँ एक श्रेष्ठ तपस्वी श्रीसम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण आया। आकर उसने उस ब्राह्मणसभाको प्रणाम किया। फिर जब वह एक आसनपर बैठा, तब मैने भी उठकर उसे प्रणाम किया और पूछा—'ब्रह्मन् ! आप लंबा रास्ता तय करके आये हैं; इसलिये थक गये होगे। किसी विशेष उद्देश्यकी सिद्धिके लिये यत्नशील-से दिखायी देते हैं। बताइये, आज कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है?'

ब्राह्मणने कहा—महाभाग ! आपका कहना ठीक है। मैं अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये विशेष प्रयत्नशील हूँ। यहाँ जिस प्रयोजनसे आया हूँ, उसे भी सुन लीजिये। मैं विदेह देशका ब्राह्मण हूँ और विद्याध्ययन कर चुका हूँ। मेरे दाँत कुन्दके फूलकी भाँति उज्ज्वल