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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 9/68-74 नौवाँ अध्याय 259 कामनमयी चित्तवृत्तिसे विष्णु अथवा वैष्णवोंसे सहायताकी प्रार्थना करते हैं। सप्तशती-ग्रन्थमें देवीकी उपासनाके उद्देश्यसे वैसे भक्तिहीन चित्तसे युक्त लोगोंके लिये अनेक प्रकारकी व्यवहारिक कामसिद्धि ही फलके रूपमें कही गयी है। ये समस्त सकाम चेष्टाएँ- ज्ञानचक्षुरहित निर्बोध व्यक्तिका प्रयास मात्र है। विषयी लोग ईश्वरकी निर्मल उपासना करनेपर भी धर्म-अर्थ- काम-मोक्षरूपी अपने लौकिक-स्वार्थके द्वारा चलायमान होकर ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाली 'मुक्ति', स्वर्ग आदि भोग अथवा व्यवहारिक संघर्षसे छुटकारेकी आशा करके कृष्ण और कृष्णभक्तोंकी शुद्धसेवासे विमुख हो जाते हैं॥ 68 ॥ तोमार भजन-फले तोमाते 'प्रेमधन'। विषय लागि' तोमाय भजे, सेइ मूर्ख जन॥ 69 ॥ अनुवाद- केवल आपको सन्तुष्ट करनेके उद्देश्यसे आपके भजनके फलसे भक्तको आपका प्रेमधन प्राप्त होता है। किन्तु जो विषयोंको पानेकी लालसासे आपका भजन करता है, वह व्यक्ति मूर्ख है॥ 69 ॥ अनुभाष्य- आजकल स्त्री-पुत्रोंके पालन, अपने पेटको भरने, अपने स्त्री-पुत्रोंके वस्त्र-आभूषण आदिको संग्रह करनेके लिये मन्त्रका व्यवसाय करनेवाले और धार्मिक वेश लेकर जीवन पालन करनेवाले विषयी व्यक्तियोंने नामप्रचारके द्वारा लोगोंको छलनेका आश्रय किया है। वे श्रीवृन्दावन और नवद्वीपमें वास, ग्रन्थोंके विक्रयके द्वारा अपने भोजन और वस्त्र तथा स्त्री-पुत्रोंका पालन, शास्त्र-पाठको व्यवसाय बनाकर लोकरञ्जनके लिये प्रवचन, श्रीविग्रह-सेवा, दीक्षादान, भिक्षाकरण, आत्मीय लोगोंके रोगको दूर करना, वैरागी-वेश धारण, दरिद्रपूजा, सामाजिक उन्नति साधन आदि अनेक प्रकारके छल-कार्योंका विस्तार करके भक्तितत्त्वज्ञान-हीन मूर्ख लोगोंको ठगकर धनादिके अर्जनके द्वारा विषयोंका ही भजन कर रहे हैं। किन्तु आपके शुद्ध अहैतुक छलरहित भजनके फलसे ही आपके प्रति ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ प्रेमधनकी प्राप्ति होती है-वे इसे समझ नहीं पाते॥ 69 ॥ महाप्रभुकी प्रीतिकी कामना करनेवाले निष्किञ्चन शुद्धभक्तगण :- तोमा लागि' रामानन्द राज्य त्याग कैला। तोमा लागि' सनातन 'विषय' छाड़िला॥ 70 ॥ अनुवाद- आपकी प्रसन्नताके लिये श्रीरामानन्द रायने राजकार्यका त्याग किया है और आपके लिये ही श्रीसनातनने समस्त विषयोंको [प्रधानमन्त्री पद आदिको] छोड़ दिया है॥ 70 ॥ तोमा लागि' रघुनाथ सकल छाड़िल। हेथाय ताहार पिता विषय पाठाइल॥ 71 ॥ तोमार चरण-कृपा हञाछे ताहारे। छत्रे मागि' खाय, 'विषय' स्पर्श नाहि करे॥ 72 ॥ अनुवाद- आपके लिये ही श्रीरघुनाथने घर-परिवार- धनादि सब कुछ छोड़ दिया। उनके पिताने उनके लिये धन-सेवकादिको भेजा, किन्तु उनपर आपके चरणकमलोंकी कृपा होनेके कारण वे उस धनको स्पर्श तक भी नहीं करते। अपितु वे छत्रमें माँगकर खाते हैं॥ 71-72 ॥ श्रीरामानन्दके अनुज गोपीनाथ सकाम व्यापारी नहीं :- रामानन्देर भाइ गोपीनाथ-महाशय। तोमा हैते विषय-वाञ्छा, तार इच्छा नय॥ 73 ॥ अनुवाद- श्रीरामानन्द रायका भाई श्रीगोपीनाथ सज्जन व्यक्ति है। उसकी आपसे किसी प्रकारके विषयको पानेकी इच्छा नहीं है॥ 73 ॥ महाप्रभुके एकान्त शरणागत गोपीनाथको प्राण-दण्ड दिये जानेके प्रयत्नको देखकर उनके हितैषी लोगोंके द्वारा महाप्रभुकी कृपाकी याचना :- तार दुःख देखि' तार सेवकादिगण। तोमारे जानाइल, -याते 'अनन्यशरण' ॥ 74 ॥ अनुवाद- गोपीनाथके दुःखको देखकर उसके कहे

260 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/74-83 ] बिना उसके सेवकोंने स्वयं ही आकर आपको सूचित किया, क्योंकि गोपीनाथ आपके एकान्त शरणागत है॥ 74 ॥ शुद्धभक्तोंकी परिभाषा :- सेइ 'शुद्धभक्त', ये तोमा भजे तोमा लागि'। आपनार सुख-दुःखे हय भोग-भागी ॥ 75 ॥ अनुवाद-वही शुद्धभक्त है जो अनुकूल भावसे आपकी प्रसन्नताके लिये आपकी सेवा करता है। अपने सुख-दुःखको वह अपने ही द्वारा किये गये कर्मोंका फल मानकर उन भोगोंको भोगता है ॥ 75 ॥ शुद्धभक्तोंका आचार-व्यवहार :- तोमार अनुकम्पा चाहे, भजे अनुक्षण। अचिरात् मिले ताँरे तोमार चरण ॥ 76 ॥ अनुवाद-शुद्धभक्त आपकी कृपाको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे निरन्तर आपका भजन करते हैं, इसलिये उन्हें अतिशीघ्र ही आपके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 76 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/8) में- तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥ 77 ॥ अनुवाद-जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिके उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्' अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं ॥ 77 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/261 संख्या देखें ॥ 77 ॥ काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुको नीलाचलमें रहनेके लिये ही प्रार्थना :- तुमि बसि' रह, केने याबे आलालनाथ? केह तोमा ना शुनाबे विषयीर बात् ॥ 78 ॥ अनुवाद-कृपया आप यहीं श्रीजगन्नाथ पुरीमें ही वास कीजिये, आप आलालनाथ क्यों जायेंगे? आपको कोई भी विषयी व्यक्तिकी बात नहीं सुनायेगा ॥ 78 ॥ महाप्रभुकी कृपासे ही भविष्यकालमें गोपीनाथके द्वारा अपनी रक्षाकी निश्चयता :- यदि तोमार तारे राखिते हय मन। आजि ये राखिल, सेइ करिबे रक्षण ॥ ”79 ॥ अनुवाद-यदि आपकी गोपीनाथकी रक्षा करनेकी इच्छा है, तो आज जिन्होंने [भगवान् श्रीजगन्नाथने] उसकी रक्षा की है, वे आगे भी उसकी रक्षा करेंगे ॥ ”79 ॥ प्रतापरुद्रका अपने गुरु श्रीमिश्रके घरमें आगमन :- एत बलि' काशीमिश्र गेला स्व-मन्दिरे। मध्याह्ने प्रतापरुद्र आइला ताँर घरे ॥ 80 ॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीकाशीमिश्र अपने मन्दिरमें चले गये। मध्याह्नके समय राजा प्रतापरुद्र उनके घरपर आये ॥ 80 ॥ राजाका गुरुसेवाका नियम :- प्रतापरुद्रेर एक आछये नियमे। यत दिन रहे तँह श्रीपुरुषोत्तमे ॥ 81 ॥ नित्य आसि' करे मिश्रेर पाद-सम्वाहन। जगन्नाथ-सेवार करे भियान श्रवण ॥ 82 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रका एक नियम था कि जब तक वे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें रहते, तब तक वे प्रतिदिन श्रीकाशीमिश्रके वासस्थानपर आकर उनके चरणोंको दबाते थे और भगवान् श्रीजगन्नाथकी किस प्रकारसे भव्य सेवा होती है, इस विषयमें उनसे श्रवण करते थे ॥ 81-82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भियान',-परिपाटी अभिनय ॥ 82 ॥ राजा मिश्रेर चरण यबे चापिते लागिला। तबे मिश्र ताँरे किछु भङ्गीते कहिला ॥ 83 ॥

[ 9/83-94 नौवाँ अध्याय 261 श्रीमिश्रके द्वारा राजाको महाप्रभुके पुरी-त्यागका समाचार देना :- “देव, शुन, आर एक अपरूप बात़्! महाप्रभु क्षेत्र छाड़ि' याबेन आलालनाथ !!” 84 ॥ अनुवाद—जब राजा श्रीकाशीमिश्रके चरणोंकी सेवा करने लगे, तब श्रीकाशीमिश्रने कुछ सङ्केतके द्वारा उनसे कहा,—“हे राजन्! आप एक अद्भुत बात श्रवण कीजिये ! महाप्रभु श्रीजगन्नाथपुरीको छोड़कर आलालनाथ चले जायेंगे !” 83-84 ॥ राजाका दुःख और उसके कारणकी जिज्ञासा, उत्तरमें श्रीमिश्रके द्वारा गोपीनाथके वृत्तान्तका वर्णन :- शुनि' राजा दुःखी हैला, पुछिलेन कारण। तबे मिश्र कहे ताँरे सब विवरण ॥ 85 ॥ “गोपीनाथ-पट्टनायके चाङ्गे चढ़ाइला। तार सेवक आसि' प्रभुरे कहिला ॥ 86 ॥ राज-सम्पत्तिका अपहरण करनेवाले गोपीनाथका धर्मविग्रह और धर्मरक्षक महाप्रभुके द्वारा तीव्र तिरस्कार; लौकिक, राजनैतिक और अर्थनैतिक अथवा शुक्लवित्तको अर्जित करनेकी विधिका वर्णन :- शुनिया क्षोभित हैल महाप्रभुर मन। क्रोधे गोपीनाथे कैला बहुत भर्त्सन ॥ 87 ॥ 'अजितेन्द्रिय हञा करे राजविषय। नाना असत्पथे करे राजद्रव्य व्यय ॥ 88 ॥ ब्रह्मस्व-अधिक एइ हय राजधन। ताहा हरि' भोग करे महापापी जन ॥ 89 ॥ राजार वर्त्तन खाय, आर चुरि करे। राजदण्ड्य हय सेइ शास्त्रेर विचारे ॥ 90 ॥ निज-कौड़ि मागे, राजा नाहि करे दण्ड। राजा-महाधार्मिक, एइ हय पापी भण्ड ! !91 ॥ राज-कड़ि ना देय, आमारे फुकारे। एइ महादुःख इँहा के सहिते पारे ? ?92 ॥ निर्जनवासकी इच्छा अर्थात् जहाँ विषयकी बातें हों, ऐसे स्थानरूपी दुःसङ्गका त्याग :- आलालनाथ याइ' ताँहा निश्चिन्ते रहिमु। विषयीर भाल मन्द वार्त्ता ना शुनिमु ॥” 93 ॥ अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्र बहुत दुःखी हुए और उन्होंने श्रीकाशीमिश्रसे इसका कारण पूछा। तब श्रीकाशीमिश्रने महाराज प्रतापरुद्रको समस्त विवरण बतलाया,—“जब गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ाया गया, तब उसके सेवकोंने आकर महाप्रभुको यह सूचना दी। इसे सुनकर महाप्रभुका मन बहुत दुःखी हुआ और उन्होंने क्रोधित होकर गोपीनाथकी बहुत भर्त्सना करते हुए कहा,—'गोपीनाथ अजितेन्द्रिय होनेपर भी राजसम्पत्तिका रक्षक बनता है और अनेक असत् कार्योंमें राजधनका व्यय करता है। राजधन ब्राह्मणके धनसे भी अधिक पूजनीय है। महापापी लोग ही राजधनका हरण करके उसका भोग करते हैं। जो जीवन निर्वाह करनेके लिये राजासे वेतन लेकर भी राजधनकी चोरी करता है, शास्त्रोंके विचारके अनुसार ऐसा व्यक्ति राजदण्डके योग्य होता है। राजा केवल अपना धन ही तो चाहता है, वह कोई दण्ड नहीं देना चाहता! इसलिये राजा अवश्य ही महाधार्मिक है, किन्तु यह गोपीनाथ धोखा देनेवाला पापी है !! गोपीनाथ स्वयं ही राजधन नहीं दे रहा और वह मुझसे सहायताके लिये उच्च स्वरसे रो रहा है। यह तो महापापकी बात है, इसे कौन सहन कर सकता है? मैं तो आलालनाथ जाकर वहाँ निश्चिन्त होकर रहूँगा और विषयी लोगोंकी अच्छी-बुरी किसी भी बातको नहीं सुनूँगा ॥” 85-93 ॥ अनुभाष्य—'फुकारे',—उच्च स्वरसे रोदन करता है ॥ 92 ॥ महाप्रभु पुरीमें ही रहें इसके लिये राजाका सर्वस्व त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :- एत शुनि' कहे राजा पाञा मने व्यथा। “सब द्रव्य छाड़ौं, यदि प्रभु रहेन एथा ॥ 94 ॥

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262 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/94-104 ] क्षणकाल महाप्रभुका दर्शन भी परम लोभनीय :- एकक्षण प्रभुर यदि पाइये दरशन। कोटिचिन्तामणि-लाभ नहे तार सम ॥ 95 ॥ कोन् छार पदार्थ एइ दुइलक्ष काहन ? प्राण-राज्य करों प्रभुsingleपदे निर्मञ्छन ॥" 96 ॥ अनुवाद-यह सब विवरण सुनकर राजा मनमें बहुत दुःखी हुए और कहने लगे,-"यदि महाप्रभु यहीं रहें तो मैं गोपीनाथसे प्राप्य अपना सम्पूर्ण धन छोड़ दूँगा। यदि मुझे एक क्षणके लिये भी महाप्रभुके दर्शन प्राप्त हों तो करोड़ों चिन्तामणियोंका लाभ भी उसके समान नहीं है। तब फिर दो लाख काहन जैसी तुच्छ राशिका तो कहना क्या? मैं महाप्रभुके चरणकमलोंमें अपने प्राण और राज्य दोनों ही न्यौछावर कर दूँगा ॥" 94-96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'निर्मञ्छन', - (आरती अथवा पूजाके समय) अर्घ्य प्रदान, विशेष अर्पण ॥ 96 ॥ भक्तके दुःखसे महाप्रभुका दुःख :- मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, -नहे प्रभुर मन। तारा दुःख पाय, -एइ ना याय सहन ॥ "97 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,- "महाप्रभु नहीं चाहते कि आप राजधन छोड़ दें। उनसे यह सहन नहीं हो रहा कि गोपीनाथ पट्टनायकादि दुःखी हो रहे हैं ॥ "97 ॥ राजाके द्वारा गोपीनाथको दण्ड देनेके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बतलाना :- राजा कहे, - "तारे आमि दुःख नाहि दिये। चाङ्गे चड़ा, खड्गे डारा, आमि ना जानिये ॥ 98 ॥ पुरुषोत्तम-जानारे तँह कैल परिहास। सेइ 'जाना' तारे देखाइल मिथ्या त्रास ॥ 99 ॥ श्रीमिश्रको महाप्रभुको सन्तुष्ट करनेके लिये और श्रीभवानन्दके वंशके व्यक्तियोंके प्रति अपनी स्वाभाविक प्रीतिके विषयमें बतलानेके लिये राजाका अनुरोध :- तुमि याह, प्रभुरे राखह यत्न करि'। एइ मुइ ताहारे छाड़िनु सब कौड़ि ॥" 100 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"मैंने गोपीनाथ पट्टनायकको दुःख नहीं दिया। उसे चाङ्गपर चढ़ाने तथा तलवारोंपर गिरानेके विषयमें मैं कुछ भी नहीं जानता था। उसने युवराज पुरुषोत्तम जानाके साथ परिहास किया था, इसलिये युवराजने गोपीनाथको केवल डरानेके लिये ऐसा मिथ्या नाटक किया था। आप जाकर महाप्रभुको यहाँ रोकनेके लिये प्रयास कीजिये। मैं गोपीनाथके द्वारा देय समस्त राशिको छोड़ रहा हूँ॥ "98-100 ॥ मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, नहे प्रभुर मने। कौड़ि छाड़िले प्रभु कदाचित् सुख माने ॥ "101 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,-"महाप्रभु नहीं चाहते कि आप प्राप्य राजधन छोड़ दें। धन छोड़नेपर महाप्रभुको कोई सुख नहीं होगा ॥ "101 ॥ राजा कहे, - "कौड़ि छाड़िमु, -इहा ना कहिबा। सहजे मोर प्रिय तांरा, -इहा जानाइबा ॥ 102 ॥ भवानन्द-राय-आमार पूज्य-गर्वित। ताँर पुत्रगणे आमार सहजेइ प्रीत ॥" 103 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"आप महाप्रभुसे ऐसा मत कहना कि मैंने धन छोड़ दिया है। आप उन्हें यह कहना कि भवानन्द राय और उनका परिवार तो स्वभावतः मेरे प्रिय हैं। श्रीभवानन्द राय मेरे पूज्य तथा गौरवके पात्र हैं, इसलिये उनके पुत्रोंके प्रति मेरी प्रीति होना स्वाभाविक ही है ॥ "102-103 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पूज्य-गर्वित',-पूज्य और सम्मानके पात्र ॥ 103 ॥ गोपीनाथको युवराजके अनुग्रहका प्रदर्शन और विदायी प्रदान :- एत बलि' मिश्रे नमस्करि' घरे गेला। गोपीनाथे 'बड़ जाना' डाकिया आनिला ॥ 104 ॥

[ 9/104-114 नौवाँ अध्याय 263 अनुवाद—यह कहकर राजा श्रीप्रतापरुद्र श्रीकाशीमिश्रको प्रणाम करके अपने राजभवनमें लौट गये और युवराज और श्रीगोपीनाथको बुलवाया॥104॥ राजा कहे,—“सब कौड़ि तोमारे छाड़िलुँ। सेइ मालजाठ्या-पाट तोमारे त' दिलुँ॥105॥ आर बार ऐछे ना खाइह राजधन। आजि हैते दिलुँ तोमाय द्विगुण वर्त्तन॥”106॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने श्रीगोपीनाथ पट्टनायकसे कहा,—“मैं तुम्हारे समस्त देय धनको छोड़ रहा हूँ और पुनः तुम्हें मालजाठ्या-दण्डपाट नामक स्थानका अधिकारी नियुक्त कर रहा हूँ। अब आगेसे तुम इस प्रकार राजधनको खा मत जाना। आजसे मैं तुम्हें दोगुणा वेतन प्रदान करूँगा॥” 105-106॥ एत बलि' नेतधटी तारे पराइल। “प्रभु-आज्ञा लञा याह, विदाय तोमा दिल॥” 107॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने यह कहकर श्रीगोपीनाथको पुनः अधिकारी नियुक्त करनेके उपलक्ष्यमें रेशमी वस्त्र पहनाया और कहा,—“अब तुम अपना कार्य प्रारम्भ करनेसे पहले महाप्रभुकी आज्ञा लेकर जाओ। मैं तुम्हें विदायी देता हूँ, तुम जा सकते हो॥” 107॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'नेतधटी',—रेशमी वस्त्र॥107॥ गोपीनाथके दण्डके वर्णनके प्रसङ्गमें महाप्रभुकी कृपाके फलसे व्यवहारिक और पारमार्थिक उन्नति अथवा श्रेयके वैशिष्ट्यका वर्णन :— परमार्थे प्रभुर कृपा, सेह रहु दूरे। अनन्त ताहार फल, के बलिते पारे ?? 108॥ अनुवाद—परमार्थ पथपर महाप्रभुकी कृपाकी बात तो दूर रहे, उस कृपाके अनन्त फल हैं, इसे कौन बतला सकता है? 108॥ 'राज्य-विषय' फल एइ-कृपार 'आभासे'। ताहार गणना कारों, मने नाहि आइसे!! 109॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथको 'राज-अधिकारी पदकी प्राप्ति' रूपी फल तो महाप्रभुकी कृपाके आभाससे ही प्राप्त हो गया! महाप्रभुकी पूर्ण कृपाके फलकी गणना कौन कर सकता है! 109॥ काँहा चाङ्गे चड़ाञा लय धन-प्राण! काँहा सब छाड़ि' सेइ राज्यादि-प्रदान!! 110॥ अनुवाद—कहाँ तो श्रीगोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ाकर उनके प्राण और समस्त धन लेनेकी बात! और कहाँ उनके सम्पूर्ण ऋणको क्षमा करके उन्हें पुनः राज्य-अधिकारीका पद आदि प्रदान करना! 110॥ काँहा सर्वस्व बेचि' लय, देया ना याय कौड़ि! काँहा द्विगुण वर्त्तन, पराय नेतधड़ि!! 111॥ अनुवाद—कहाँ तो श्रीगोपीनाथका सबकुछ बेचकर भी राजधन सम्पूर्ण रूपसे चुक नहीं रहा था, और कहाँ अब स्वयं राजाके द्वारा दो गुणा वेतन और उन्हींके हाथोंसे रेशमी वस्त्रकी प्राप्तिरूपी सम्मान! 111॥ प्रभुर इच्छा नाहि, तारे कौड़ि छोड़ाइबे। द्विगुण वर्त्तन करि' पुनः 'विषय' दिबे॥112॥ तथापि तार सेवक आसि' कैल निवेदन। ताते क्षुब्ध हैल यबे महाप्रभुर मन॥113॥ विषय-सुख दिते प्रभुर नाहि मनोबल। निवेदन-प्रभावहे तबु फले एत फल॥114॥ अनुवाद—महाप्रभुकी इच्छा नहीं थी कि राजा श्रीगोपीनाथका ऋण क्षमा कर दें, उनका वेतन दोगुणा कर दें और उन्हें पुनः उसी स्थानका राजस्व अधिकारी बना दें। तथापि जब श्रीगोपीनाथके सेवकोंने आकर महाप्रभुसे निवेदन किया, तो उनकी स्थिति जानकर जब महाप्रभुका मन दुःखी हुआ, तब भी महाप्रभुकी उन्हें विषयरूपी सुखोंको प्रदान करनेकी इच्छा नहीं थी। किन्तु उनसे निवेदन करनेके प्रभावके फलस्वरूप ही

264 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/112-122 ] श्रीगोपीनाथको इतने अधिक फलकी प्राप्ति हो गयी॥ 112-114॥ महाप्रभुका अद्भुत ऐश्वर्यमय स्वभाव :- के कहिते पारे गौरेर आश्चर्य स्वभाव ? ब्रह्मा-शिव आदि याँर ना पाय अन्तर्भाव ॥ 115 ॥ अनुवाद-श्रीगौरसुन्दरके आश्चर्यमय स्वभावका कौन अनुमान लगा सकता है? जिसका मर्म तो ब्रह्मा-शिव आदि भी नहीं जान पाते ॥ 115 ॥ महाप्रभु और श्रीकाशीमिश्रका गोपीनाथके प्रति राज्यव्यवहारके विषयमें वार्तालाप :- एथा काशीमिश्र आसि' प्रभुर चरणे। राजार चरित्र सब कैला निवेदने ॥ 116 ॥ अनुवाद-इधर श्रीकाशीमिश्रने महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित होकर राजाकी समस्त इच्छाके विषयमें बतलाया॥ 116 ॥ प्रभु कहे,—“काशीमिश्र, कि तुमि करिला? राज-प्रतिग्रह तुमि आमा' कराइला??” 117 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे काशीमिश्र ! यह आपने क्या किया? आपने परोक्षरूपसे मुझे राजासे दान ग्रहण करवा दिया?” 117 ॥ अनुभाष्य-श्रीकाशीमिश्रकी यह बात सुनकर कि राजाने गोपीनाथसे प्राप्य अर्थको महाप्रभुके लिये छोड़ दिया है, तो महाप्रभुके विचारमें यह उनके द्वारा राजासे धनरूपी दान ग्रहण करना प्रमाणित हुआ॥ 117 ॥ मिश्र कहे, - “शुन, प्रभु, राजार वचने। अकपटे राजा एइ कैला निवेदने ॥ 118 ॥ 'प्रभु येन नाहि जानेन, - राजा आमार लागिया। दुइलक्ष काहन कौड़ि दिलेक छाड़िया ॥ 119 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा, - “हे महाप्रभु ! आप महाराज प्रतापरुद्रके वचन सुनिये। राजाने निष्कपट होकर यह निवेदन किया है, - 'महाप्रभुको इस प्रकारसे बतलाना कि वे कभी भी ना सोचें कि मैंने उनके कारण दो लाख काहन राशि छोड़ दी है ॥ 118-119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैंने महाप्रभुके लिये धन छोड़ दिया है, वे ऐसा न समझें, उन्हें इस प्रकारसे कहना ॥ 119 ॥ भवानन्देर पुत्र सब - मोर प्रियतम। इँहा-सबाकारे आमि देखि आत्मसम ॥ 120 ॥ अतएव याँहा ताँहा देइ अधिकार। खाय, पिये, लुटे, बिलाय, ना करौं विचार ॥ 121 ॥ पहले प्रतापरुद्रके अनुग्रहसे राजमहेन्द्रीके भूमि-अधिकारीके रूपमें श्रीराम-रायको लगाना :- राजमहीन्द्रे 'राजा' कैनु राम-राय। ये खाइल, येबा दिल, नाहि लेखा-दाय ॥ 122 ॥ अनुवाद-वास्तवमें श्रीभवानन्द रायके सभी पुत्र मुझे विशेष प्रिय हैं, मैं उन सभीको अपने परिवारके समान ही मानता हूँ। इसलिये मैंने उन्हें अपने राज्यमें इधर-उधर सर्वत्र राजस्व एकत्रित करनेका अधिकार दिया हुआ है। वे उस राजस्वको खायें, पियें, लूटें या बाँटें-मैं इस सबका कोई विचार नहीं करता। मैंने रामानन्द रायको राजमहेन्द्रीका राज्याधिकारी बनाया, उसने राजस्वमें-से जो अपने पास रखा, जो राजकोषमें दिया, मैंने उसका कोई लेखा-जोखा नहीं किया ॥ 120-122 ॥ अनुभाष्य-वर्तमान राजमहेन्द्री-नगर-गोदावरीके उत्तरी-तटपर अवस्थित है। रामानन्दरायके समयकी राजधानी 'विद्यानगर'- गोदावरीके दक्षिण-तटपर थी। विद्यानगर अथवा विद्यापुर गोदावरी नदीके सागर-सङ्गममें अर्थात् कोटदेशमें था। वह प्रदेश उस समय राजमहेन्द्रीके नामसे प्रसिद्ध था। कलिङ्ग देशका उत्तर-अंश ही उत्कलिङ्ग अथवा उत्कल-देश था। उत्कलिङ्ग-राज्यके दक्षिण-प्रदेशकी राजधानी ही 'राजमहेन्द्री' थी। वर्तमान

[ 9/122-132 नौवाँ अध्याय 265 समयमें 'राजमहेन्द्री'-नगरका स्थान-परिवर्तन हो गया है॥ 122 ॥ गोपीनाथ एइमत 'विषय' करिया। दुइचारि-लक्ष काहन रहे त' खाञा॥ 123 ॥ किछु देय, किछु ना देय, ना करि विचार। 'जाना'-सहित अप्रीत्ये दुःख पाइल एइबार ॥ 124 ॥ 'जाना' एत कैला, - इहा मुइ नाहि जानौं। भवानन्देर पुत्र-सबे आत्मसम मानौं ॥ 125 ॥ ताँहा लागि' द्रव्य छाड़ि, - इहा मात् माने। सहजेइ मोर प्रीति हय ताहा-सने ॥" 126 ॥ अनुवाद - गोपीनाथने भी इसी प्रकार राजस्व संग्रह करके उसमें-से दो-चार लाख काहन राशि ही तो अपने पास रखी है। वे राजकोषमें कुछ देता है अथवा कुछ नहीं देता है, मैं इस सबका कोई विचार नहीं करता। युवराज जानासे परिहास करके उसे रुष्ट करनेके कारण ही उसने इस बार दुःख पाया है। युवराजने इतना सब किया, मुझे उसकी कोई जानकारी नहीं थी। मैं तो श्रीभवानन्द रायके समस्त पुत्रोंको अपने परिवारका सदस्य ही मानता हूँ। आप महाप्रभुसे कहना कि वे यह नहीं मानें कि मैंने उनके कारण गोपीनाथके ऋणको क्षमा कर दिया है, मैंने जो कुछ भी किया है वह श्रीभवानन्द रायके परिवारके प्रति मेरी स्वाभाविक प्रीतिके कारण ही है।'॥" 123-126 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'मात्', - (हिन्दीका शब्द) मत अर्थात् नहीं ॥ 126 ॥ राजाके दैन्यके विषयमें सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता, सपुत्र श्रीराय-भवानन्दका आगमन, दीनतासहित महाप्रभुकी कृपाके माहात्म्यके विषयमें बतलाना :- शुनिया राजार विनय प्रभुर आनन्द। हेनकाले आइला तथा राय-भवानन्द ॥ 127 ॥ पञ्चपुत्र-सहिते आसि' पड़िला चरणे। उठाञा प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गने ॥ 128 ॥ अनुवाद - श्रीकाशीमिश्रके मुखसे राजा प्रतापरुद्रके विनीत वचनोंको सुनकर महाप्रभु आनन्दित हुए। उसी समय वहाँपर श्रीभवानन्द राय आये। वे अपने पाँचों पुत्रों सहित आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े, महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥ 127-128 ॥ रामानन्द-राय आदि सबाइ मिलिला। भवानन्द-राय तबे बलिते लागिला ॥ 129 ॥ सपरिवार श्रीभवानन्दकी महाप्रभुके चरणोंमें अपने आपको बेच देनेवाली उक्ति :- “तोमार किङ्कर एइ सब मोर कुल। ए विपदे राखि' प्रभु, पुनः निला मूल ॥ 130 ॥ पाँच-पाण्डवोंके विपत्तिसे उद्धारकी उपमा देकर महाप्रभुके भक्तवात्सल्यका वर्णन :- भक्तवात्सल्य एबे प्रकट करिला। पूर्वे येन पञ्चपाण्डवे विपदे तारिला ॥" 131 ॥ अनुवाद - श्रीरामानन्दराय आदि सभी भाई महाप्रभुसे मिले। तब श्रीभवानन्द रायने महाप्रभुसे कहा, - “मेरा यह पूरा परिवार ही आपका दास है। ऐसी विपत्तिमें आपने हमारी रक्षा करके हमें पुनः मूल्य देकर खरीद लिया है। आपने अब वैसा ही भक्त-वात्सल्य प्रकटित किया है, जैसे आपने पूर्वकालमें पाँचों पाण्डवोंका विपत्तिसे उद्धार करके प्रकटित किया था ॥" 129-131 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'निला मूल', - पुनः मूल्य देकर खरीद लिया ॥ 130 ॥ गोपीनाथके उद्धार-हेतु कृतज्ञता जतलाना, महाप्रभुकी महिमाका गान :- 'नेतधटी'-माथे गोपीनाथ चरणे पड़िला। राजार कृपा-वृत्तान्त सकल कहिला ॥ 132 ॥

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266 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/132-140 ] “बाकी कौड़ि बाद, आर द्विगुण वर्त्तन कैला। पुनः ‘विषय’ दिया ‘नेतधटी’ पराइला ॥ 133 ॥ काँहा चाङ्गेर उपर सेइ मरण-प्रमाद ! काँहा ‘नेतधटी’ पुनः,—ए सब प्रसाद ! ! 134 ॥ अनुवाद—रेशमी वस्त्रको सिरपर धारण किये गोपीनाथ पट्टनायक भी महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने महाप्रभुको स्वयं पर राजा प्रतापरुद्रके द्वारा की गयी कृपाके वृत्तान्तको सम्पूर्ण रूपसे कह सुनाया,—“राजाने मुझे देय राजधनसे मुक्त कर दिया है और उन्होंने मेरा वेतन भी दो गुणा कर दिया है। उन्होंने मुझे पुनः मालजाठ्या दण्डपाटका दायित्व प्रदान करके मुझे अपने हाथोंसे रेशमी वस्त्र ओढ़ाया। कहाँ तो चाङ्गेके ऊपर मरनेका भय ! और कहाँ रेशमी वस्त्रके द्वारा सम्मान, यह सब आपकी कृपा है ! 132-134 ॥ चाङ्गेर उपरे तोमार चरण ध्यान कैलुँ। चरण-स्मरण-प्रभावे एइ फल पाइलुँ ॥ 135 ॥ लोके चमत्कार मोर ए सब देखिया। प्रशंसे तोमार कृपा-महिमा गाञा ॥ 136 ॥ श्रीगौर-स्मरणका मुख्य फल-श्रीगौरप्रीति, गौणफल-विषय-सुख :- किन्तु तोमार स्मरणेर नहे एइ ‘मुख्यफल’। ‘फलाभास’ एइ, —याते ‘विषय’ चञ्चल ॥ 137 ॥ अनुवाद—मैंने चाङ्गेके ऊपर आपके चरणकमलोंका ध्यान किया था और मुझे आपके चरणकमलोंके स्मरणके प्रभावसे ही यह फल प्राप्त हुआ है। मेरे साथ जो कुछ हुआ उसे देखकर लोग चमत्कृत हो गये हैं और वे आपकी कृपा-महिमाको गाकर आपकी प्रशंसा कर रहे हैं। किन्तु यह आपके स्मरणका मुख्य फल नहीं है, यह तो आपके स्मरणके फलका आभासमात्र है, क्योंकि भौतिक वैभव तो अनित्य है ॥ 135-137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपके चरणकमलोंको स्मरण करनेका मुख्य फल—आपके प्रति प्रीति उत्पन्न होना है। जीवन, मान और धनकी रक्षा—उस सत्कर्मका (आपके चरणकमलोंकी सेवाका) फलाभास-मात्र है; क्योंकि जड़ीय विषय—स्वयं ही चञ्चल हैं, इसलिये उनसे सम्बन्धित फल ‘मुख्य’ नहीं है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुके स्मरणसे सर्वसिद्धि हो सकती है। त्रिवर्ग—धर्म-अर्थ-काम और अपवर्ग-मोक्षादि गौण फल ही चञ्चल विषयोंकी उग्र कामनासे युक्त व्यक्तियोंके प्राप्य ‘फलाभास’ हैं, वे—परिपूर्ण नित्यसिद्ध फल कृष्णप्रेमकी प्राप्तिकी तुलनामें अत्यन्त तुच्छ और अल्प लाभमात्र ही हैं ॥ 137 ॥ श्रीगौरकृपाके फलसे श्रीरामानन्द और श्रीवाणीनाथकी निष्किञ्चनता :- राम-राये, वाणीनाथे कैला ‘निर्विषय’। सेइ कृपा आमाते नाहि, याते ऐछे हय ! ! 138 ॥ विषयकी वृद्धिके दर्शनसे महाप्रभुकी सेवाके सौभाग्यके अभावकी आशङ्कासे महाप्रभुके चरणोंमें गोपीनाथके द्वारा अप्राकृत-कृपा और विषयभोग-बुद्धिसे मुक्तिकी प्रार्थना :- शुद्ध कृपा कर, गोसाञि, घुचाह ‘विषय’। निर्विण्ण हइनु, मोते ‘विषय’ ना हय ॥” 139 ॥ अनुवाद—आपकी वास्तविक कृपा रामानन्द राय और वाणीनाथपर हुई है, क्योंकि आपने उन्हें राजकार्यसे मुक्त करा दिया है। किन्तु आपकी वैसी कृपा मुझपर नहीं हुई है जो मुझे भी विषयोंसे मुक्त करवा दे ! हे श्रीचैतन्य गोसांई ! आप मुझपर अपनी शुद्ध कृपा करके मेरे विषयोंको भी छुड़ाइए। वैराग्यके कारण अब मुझे विषय भोगोंकी इच्छा नहीं है ॥” 138-139 ॥ बाह्य संन्यास-वेशके प्रति महाप्रभुका अनादर, गोपीनाथको गृहस्थ आश्रमका अधिकारी जानकर उसीमें रहकर ही हरिभजन करनेका आदेश :- प्रभु कहे, —“संन्यासी यबे हइबा पञ्चजन। कुटुम्ब-बाहुल्य तोमार के करे भरण ? ? 140 ॥

[ 9/140-146 नौवाँ अध्याय 267 सिद्ध गौरदासोंको गृहस्थ और संन्यास-वेशसे निरपेक्ष रहकर सभी अवस्थाओंमें कृष्णभजनकी शिक्षा प्रदान :- महाविषय कर, किबा विरक्त उदास। जन्मे जन्मे तुमि पञ्च-मोर 'निजदास' ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"जब तुम पाँचों भाई ही संन्यासी बन जाओगे, तब फिर तुम लोगोंके इतने बड़े परिवारका भरण-पोषण कौन करेगा? तुम सब बड़े विषय कार्य करो अथवा विषयोंसे पूर्ण विरक्त हो जाओ, तुम पाँचों भाई जन्म-जन्मान्तरमें मेरे 'नित्यदास' हो॥ 140-141 ॥ अनुभाष्य-मैं-भगवान्का नित्य-निजदास हूँ ऐसा शुद्ध अभिमान होनेपर-बाहरीरूपसे संन्यास-ग्रहण अथवा बाहरीरूपसे बृहत् विषयोंकी सेवा,-कुछ भी जीवका बाहरी अमङ्गल नहीं कर पाते; क्योंकि कृष्णसुखको भूलकर लौकिक निज-भोग-परायण होनेपर ही जीवोंका बन्धन होता है और कृष्णसेवापरायण अप्राकृत होनेपर गृहमें रहनेपर भी महासंन्यास होता है; उस अवस्थामें सब समय कृष्णमें आविष्ट होनेके कारण लोक-भयङ्कर महा-महाविषय भी कोई असुविधा उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होते, सभी अवस्थाओंमें ही वे-समभावसे कृष्णसेवक हैं।" 141 ॥ गोपीनाथको राजाके प्रति अपनी कर्तव्यता और शुक्ल-धन अर्जन करके व्ययादिके लिये नैतिक धर्मोपदेश :- किन्तु मोर करिह एक 'आज्ञा'-पालन। 'व्यय ना करिह किछु राजार मूलधन ॥' 142 ॥ राजार मूलधन दिया ये किछु लभ्य हय। सेइ धन करिह नाना धर्मे-कर्मे व्यय ॥ 143 ॥ असद्व्यय ना करिह,-याते दुइ लोक याय।" एत बलि' सबाकारे दिलेन विदाय ॥ 144 ॥ अनुवाद-किन्तु तुम लोग मेरी एक आज्ञाका पालन करना। तुम राजाके मूलधनमें-से कुछ भी व्यय नहीं करना। राजाको मूलधन देनेके पश्चात् आपको जो कुछ मिले, उसी धनको ही विभिन्न धर्म-कर्ममें व्यय करना। धनका असत् व्यय मत करना-इससे यह लोक और परलोक-दोनों नष्ट हो जाते हैं।" यह कहकर महाप्रभुने सभीको विदायी दी ॥ 142-144 ॥ अनुभाष्य-अप्राकृत भगवत् दासके अभिमानको भूलकर सांसारिक-विषय-भोगी बननेपर ही जीव धर्म और नीतिके विरुद्ध पापोंमें प्रवृत्त होता है; उसीका निषेध कर रहे हैं। जीवके पापमें प्रवृत्त होनेपर, उसे लौकिक मङ्गल और अप्राकृत अनुभव-इन दोनों वस्तुओंको प्राप्त करनेमें ही असुविधा होती है ॥ 142-144 ॥ विषयोंके वर्धित होनेके साथ महाप्रभुकी अमन्दोदय-दया ही कृपा-विवर्त्त; उसमें महाप्रभुकी भक्तवश्यताके विषयमें बतलाना :- रायेर घरे प्रभुर 'कृपा-विवर्त्त' कहिल। भक्तवात्सल्य-गुण याते व्यक्त हैल ॥ 145 ॥ अनुवाद-इस प्रसङ्गमें श्रीभवानन्द रायके परिवारपर हुई महाप्रभुकी कृपा-विवर्त्तके विषयमें वर्णन किया गया है, जिसमें महाप्रभुका भक्त-वात्सल्यरूपी गुण व्यक्त हुआ है॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'कृपा-विवर्त्त', - विषय-मङ्गल (उन्नति) रूपी कृपा वास्तविक कृपा नहीं है, किन्तु विषय-बुद्धिसे वह एक वस्तुमें अन्य वस्तुका प्रतीति रूपी 'विवर्त्त' (भ्रम) प्रतीत हुआ ॥ 145 ॥ नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। भक्तोंको महाप्रभुके द्वारा विदायी प्रदान :- सबाय आलिङ्गिया विदाय यबे दिला। हरिध्वनि करि' सब भक्त उठि' गेला ॥ 146 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभुने उपस्थित अन्य भक्तोंको आलिङ्गन करके विदायी दी, तब सब भक्त हरिध्वनि करते हुए उठकर चले गये ॥ 146 ॥

268 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/147-149 ] महाप्रभुके व्यवहारको नहीं समझ पानेके कारण सभीको विस्मय :- प्रभुर कृपा देखि' सबार हैल चमत्कार। ताहारा बुझिते नारे प्रभुर व्यवहार ॥ 147 ॥ गोपीनाथके उद्धारकी लीलामें महाप्रभुके गूढ़-आचरणके रहस्य और तात्पर्यका वर्णन-(1) सर्वप्रथम गोपीनाथके उद्धारमें असम्मति, (2) गोपीनाथके उद्धारके बाद उसका अशुक्ल (काले) धनके अर्जनके लिये तिरस्कार, (3) विरक्त संन्यासी वैष्णवके आदर्श-रूपमें विषयकथारूपी निर्जनता अथवा दुःसङ्गके त्यागकी इच्छा, (4) गोपीनाथके विषयका वर्धन, (5) विषय भोगोंसे भयभीत गोपीनाथको घरमें रहने अथवा घरको त्याग करने, सभी अवस्थाओंमें ही कृष्णभजनकी योग्यताकी शिक्षा देना :- तारा सबे यदि कृपा करिते साधिल। 'आमा हैते किछु नहे' - प्रभु तब कहिल ॥ 148 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी श्रीभवानन्द रायके परिवारपर की गयी कृपाको देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये। वे महाप्रभुके व्यवहारको समझ नहीं पाये, क्योंकि जब उन सभीने आकर महाप्रभुसे गोपीनाथ पट्टनायकपर कृपा करनेके लिये प्रार्थना की, तब महाप्रभुने कहा था कि 'मेरे द्वारा कुछ भी करना सम्भवपर नहीं है॥' 147-148 ॥ अनुभाष्य-जीव होनेके कारण गोपीनाथ यदि विषयोंकी सेवा करेगा, तो उससे उसका अमङ्गल अनिवार्य है। लौकिक-मङ्गल-साधनको भगवान्‌की गौण कृपा ही समझना होगा। श्रीगौरसुन्दरके स्वयं विरक्त भक्तके रूपमें होकर विषयीका उपकार करनेपर महाप्रभुके वैसे चरित्रके अनुसरणके फलसे विरक्त वैष्णवका आदर्श तुच्छ और घृणित हो जाता; इसलिये निरपेक्ष त्यागी वेषको धारण करनेवाले भागवत व्यक्ति कभी भी विषयीके कार्यमें व्रती (नियुक्त) नहीं होंगे ॥ 147-148 ॥ नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। गोपीनाथेर निन्दा, आर आपन-निर्वेद। एइमात्र कहिल, - इहार ना बुझिल भेद ॥ 149 ॥ अनुवाद-मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदासने) केवल महाप्रभुके द्वारा श्रीगोपीनाथ पट्टनायककी निन्दा और

[ 9/149–153 नौवाँ अध्याय 269 स्वयंको विरक्त संन्यासी कहकर उनकी उदासीनताका वर्णन किया है। किन्तु इस व्यवहार-भेदको समझना बहुत कठिन है॥149॥ काशीमिश्रे ना साधिल, राजारे ना साधिल। उद्योग बिना एतसब फल दिल॥150॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीकाशीमिश्र अथवा राजा प्रतापरुद्रसे सीधे कोई सहायता माँगे बिना श्रीगोपीनाथ पट्टनायकको उपरोक्त समस्त फल प्रदान किये॥150॥ भगवान्‌के भक्तवात्सल्य-वृत्तान्तको श्रवण करनेसे अनर्थकी निवृत्ति और भगवान्‌के प्रति प्रेमका उदय :— येइ इँहा शुने प्रभुर वात्सल्य-प्रकाश। प्रेमभक्ति पाय, ताँर विपद याय नाश॥152॥ अनुवाद—जो महाप्रभुके द्वारा श्रीगोपीनाथ पट्टनायकके प्रति उनके वात्सल्यको प्रकाशित करनेवाले चरित्रका श्रवण करता है, उसे प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है और उसकी समस्त विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं॥152॥ कामभोगसे अविचलित श्रीचैतन्यके प्रति आकृष्ट व्यक्तिकी ही श्रीचैतन्यचरितके मर्मार्थको अनुभव करनेकी योग्यता :— चैतन्यचरित्र एइ परम गम्भीर। सेइ बुझे, ताँर पदे याँर मन 'धीर'॥151॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र परम गम्भीर है। महाप्रभुकी लीलाओंके उद्देश्यको केवल वही व्यक्ति समझ सकता है जिसका मन उनके चरणकमलोंमें स्थिर हो॥151॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥153॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे गोपीनाथपट्टनायकउद्धारो नाम नवमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥153॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें गोपीनाथपट्टनायक-उद्धार नामक नवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

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दसवाँ अध्याय कथासार—रथयात्राके उद्देश्यसे गौड़ीय भक्तोंने पुरुषोत्तमकी यात्रा की। राघव-पण्डित अपनी बहन दमयन्तीके द्वारा दिये गये झोलोंमें बहुत प्रकारकी खाद्य सामग्रीको लेकर चल दिये। पाणिहाटी-निवासी मकरध्वज-कर भी राघवकी झालिके 'मुन्सिब' (परिचालक) बनकर चले। भक्तगण जिस दिन पुरुषोत्तममें पहुँचे, उस दिन नरेन्द्र सरोवरके जलमें क्रीड़ा करनेके लिये श्रीगोविन्ददेवजी नौकामें चढ़े थे। महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ जलक्रीड़ा की। पूर्व वर्षोंकी भाँति गुण्डिचा-मार्जनादि हुआ। श्रीमन्दिरमें जगमोहन-परिमूण्डा कीर्तन हुआ था। कीर्तन-विश्रामके बाद प्रसाद सेवा करके महाप्रभुके गम्भीराके द्वारपर शयन करनेपर श्रीगोविन्दने जिस किसी प्रकारसे निकट जाकर उनका चरण-चापन किया; बाहर नहीं आ पानेके कारण उनकी उस दिन प्रसाद-सेवा नहीं हुई। श्रीगोविन्दके इस चरित्रके द्वारा—'सेवाके लिये अपराध स्वीकार करना उचित है, किन्तु अपने भोगके लिये अपराधके आभास तकका भी परित्याग करना उचित है'—यह शुद्धवैष्णव-सिद्धान्त बतलाया गया है। गौड़ीय भक्तोंने महाप्रभुकी सेवा करनेके लिये जो-जो दिया था, श्रीगोविन्दने महाप्रभुको सब खिलाया। वैष्णवोंने घर-घरमें महाप्रभुको निमन्त्रण देकर खिलाया। श्रीशिवानन्दके पुत्र चैतन्यदासने निमन्त्रणमें स्नेहपूर्वक दही-भात बनाया था। —(अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तोंके द्रव्योंसे सन्तुष्ट भक्तगणोंके द्वारा पूजित श्रीगौरकी वन्दना :— वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यं भक्तानुग्रहकारकम्। येन केनापि सन्तुष्टं भक्तदत्तेन श्रद्धया॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तके द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रदत्त जो कोई भी [सामान्य] वस्तुसे सन्तुष्ट, भक्तोंपर कृपा करनेवाले श्रीकृष्णचैतन्यकी वन्दना करता हूँ॥1॥ अनुभाष्य— श्रद्धया भक्तदत्तेन (भक्तेन दत्तेन अर्पितेन) येन केन अपि (सामान्येन) सन्तुष्टं [तं] भक्तानुग्रहकारकं (भक्तेषु अनुग्रहविधायकं) श्रीकृष्णचैतन्यम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो॥2॥ महाप्रभुके दर्शनोंके लिये गौड़ीय भक्तोंकी रथयात्राके उपलक्ष्यमें पुरी-यात्रा :— वर्षान्तरे सब भक्त प्रभुरे देखिते। परम-आनन्दे सबे नीलाचल याइते॥3॥ अनुवाद—अगले वर्ष समस्त भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये परमानन्दसे नीलाचलके लिये चल दिये॥3॥ अद्वैतप्रमुख गौड़ीय-भक्तगण :— अद्वैत-आचार्य-गोसाञि—सर्व-अग्रगण्य। आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास आदि धन्य॥4॥ अनुवाद—उन गौड़ीय भक्तोंमें श्रीअद्वैताचार्य प्रभु प्रमुख थे। उनके साथ परम धन्य आचार्यरत्न, आचार्यनिधि और श्रीवासादि भक्त थे॥4॥ अनुभाष्य—'आचार्यरत्न,'—चन्द्रशेखर; 'आचार्यनिधि,'— विद्यानिधि, प्रेमनिधि पुण्डरीक॥4॥

272 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/5-13 ] श्रीगौरके द्वारा निषेध करनेपर भी महाप्रभुके प्रेमिक श्रीनित्यानन्दकी यात्रा :- यद्यपि प्रभुर आज्ञा गौड़े रहिते। तथापि नित्यानन्द प्रेमे चलिला देखिते ॥ 5 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़ देशमें ही रहनेकी आज्ञा दी थी, तथापि महाप्रभुके प्रति अनुराग होनेके कारण श्रीनित्यानन्द प्रभु भी श्रीजगन्नाथ पुरीके लिये चल पड़े॥5॥ श्रीनित्यानन्दका श्रीगौर-आज्ञाके उल्लङ्घनका विचार-यह अनुरागका लक्षण :- अनुरागेर लक्षण एइ,-'विधि' नाहि माने। ताँर आज्ञा भाङ्गे ताँर सङ्गेर कारणे ॥ 6 ॥ अनुवाद-विधिको नहीं मानना-यह अनुरागका लक्षण होता है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके सङ्गके लिये ही उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन किया॥6॥ इसका दृष्टान्त-रासमें गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवा :- रासे यैछे घर याइते गोपीरे आज्ञा दिला। ताँर आज्ञा भाङ्गि' ताँर सङ्गे से रहिला ॥ 7 ॥ अनुवाद-रासके समय जैसे श्रीकृष्णके द्वारा गोपियोंको घर लौट जानेकी आज्ञा देनेपर भी गोपियाँ उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके उनके सङ्गमें ही रहीं॥7॥ अनुभाष्य-भाः 10/29/18-27 श्लोक देखें॥7॥ विधि और अनुराग मार्गमें श्रीविष्णु और श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करनेमें विचित्रता :- आज्ञा-पालने कृष्णेर यैछे परितोष। प्रेमे आज्ञा भाङ्गिले हय कोटिसुख-पोष ॥ 8 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेसे उनको जैसी प्रसन्नता होती है, उससे करोड़ों गुणा सुखकी प्राप्ति उन्हें भक्तके द्वारा अनुरागके कारण उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेसे होती है॥8॥ अनुभाष्य- 'कोटिसुख-पोष', - करोड़ों गुणा सुखकी पुष्टि ॥8॥ पुरीयात्री गौड़ीय-भक्तगण :- वासुदेव-दत्त, मुरारि-गुप्त, गङ्गादास। श्रीमान् सेन, श्रीमान्-पण्डित, अकिञ्चन कृष्णदास ॥ 9 ॥ मुरारि, गरुड़-पण्डित, बुद्धिमन्त-खाँन। सञ्जय-पुरुषोत्तम, पण्डित-भगवान् ॥ 10 ॥ शुक्लाम्बर, नृसिंहानन्द आर यत जन। सबाइ चलिला, नाम ना याय लिखन ॥ 11 ॥ अनुवाद-श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीगङ्गादास, श्रीमान् सेन, श्रीमान् पण्डित, श्रीअकिञ्चन कृष्णदास, श्रीमुरारि पण्डित, श्रीगरुड़ पण्डित, श्रीबुद्धिमन्त खाँन, श्रीसञ्जय, श्रीपुरुषोत्तम, श्रीभगवान् पण्डित, श्रीशुक्लाम्बर, श्रीनृसिंहानन्द आदि अनेक भक्त जो नीलाचलके लिये चले, उन सबके नामोंको लिखना सम्भवपर नहीं है॥9-11॥ कुलीनग्राम, खण्ड और कुमारहट्ट (काञ्चनपल्ली) से भक्तोंकी यात्रा :- कुलीनग्रामी, खण्डवासी मिलिला आसिया। शिवानन्द-सेन आइला सबारे लञा ॥ 12 ॥ अनुवाद-कुलीनग्रामवासी और खण्डवासी भक्त भी उनसे मार्गमें आकर मिल गये। श्रीशिवानन्द सेन समस्त भक्तोंको लेकर श्रीजगन्नाथ पुरीके लिये चल दिये॥ 12 ॥ दमयन्तीके द्वारा बनाये महाप्रभुको प्रिय द्रव्योंसे पूर्ण झोलीके साथ श्रीराघवकी यात्रा :- राघव-पण्डित चले झालि साजाञा। दमयन्ती यत द्रव्य दियाछे करिया ॥ 13 ॥ अनुवाद-श्रीराघव पण्डित अपनी बहन श्रीदमयन्तीके द्वारा बनाकर दी गयी अनेक खाद्य वस्तुओंको भिन्न-भिन्न झोलोंमें भली-भाँति सजाकर रखकर ले आये॥ 13 ॥

[ 10/13-20 दसवाँ अध्याय 273 अनुभाष्य-इसके द्वारा ग्रन्थकारके विचित्र कृष्णनैवेद्य (भोग) को प्रस्तुत करनेकी निपुणता प्रकाशित हो रही है; मध्यलीला 14/26-34 और 15/68-91, 207-218 संख्या देखें ॥ 13 ॥ श्रीराघवकी झोलीका विवरण :- नाना अपूर्व भक्ष्यद्रव्य प्रभुर योग्य भोग। वत्सरेक प्रभु याहा करेन उपयोग ॥ 14 ॥ अनुवाद-श्रीदमयन्ती महाप्रभुके भोगके योग्य अनेक अपूर्व खाद्य सामग्रियाँ बनातीं। महाप्रभु सम्पूर्ण वर्ष उन खाद्य सामग्रियोंको ग्रहण करते थे ॥ 14 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'उपयोग',—व्यवहार, ग्रहण ॥ 14 ॥ आम्र-काशन्दि, आदा-झाल-काशन्दि नाम। नेम्बू-आदा-आम्रकलि विविध सन्धान ॥ 15 ॥ आम्सि, आमखण्ड, तैलाम्र, आमसत्ता। यत्न करि' गुण्डा करि' पुराण सुख्ता ॥ 16 ॥ अनुवाद-उन खाद्य-सामग्रियोंमें कुछ अचार और चटनी-मसाले थे- 'आम्र-कासुन्दि', 'आदा-कासुन्दि' और 'झाल-कासुन्दि' आदि अचार जो क्रमशः आम, अदरक और मिर्चको सरसों और नमक आदिमें मिलाकर बनाये गये थे। उनके झोलेमें नींबू, अदरक और आमकी कली आदिसे बनी विभिन्न भोजन सामग्रियाँ थीं। उन भोजन-सामग्रियोंमें आमसि (सूखे हुए आमके टुकड़े), आम्रखण्ड (आमका खट्टा-मीठा आचार), तैलाम्र (तेलमें बना आमका आचार) और आमसत्ता (आम-पापड़) था। श्रीदमयन्तीने सावधानीपूर्वक पीसकर चूर्ण बनाकर पुराण सुख्ता भेजा ॥ 15-16 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुराण सुख्ता', - सुखाया हुआ कड़वा पाटका साग ॥ 16 ॥ अनुभाष्य- 'तैलाम्र', - सरसोंके तेलमें रक्षित आमका आचार; 'गुण्डा'- पिसा हुआ चूर्ण ॥ 16 ॥ 'सुख्ता' बलि' अवज्ञा ना करिह चित्ते। सुख्ताय ये सुख हय, नहे पञ्चामृते ॥ 17 ॥ अप्राकृत भावग्राही भगवान् :- भावग्राही महाप्रभु स्नेहमात्र लय। सुख्तापाता-काशन्दिते महासुख हय ॥ 18 ॥ अनुवाद-सुख्ताको तुच्छ जानकर अपने चित्तमें श्रीदमयन्तीके प्रति किसी प्रकारका अनादरका भाव मत लाना। वास्तवमें सुख्ताको खानेसे जिस सुखकी प्राप्ति होती है, वह पञ्चामृत (दूध, चीनी, घी, शहद और दही) खानेसे भी प्राप्त नहीं होती। भावग्राही महाप्रभु भक्तके स्नेहमात्रको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें भक्तके द्वारा स्नेहपूर्वक अर्पित किये गये सुख्ता-पत्ता और कासुन्दिको खानेमें महासुख होता है ॥ 17-18 ॥ अनुभाष्य- 'भाव', - अप्राकृत अहैतुकी-कृष्णेन्द्रिय- तोषण-परायण शुद्धसत्त्वमयी हृदयकी वृत्ति; प्राकृत सहजियाओंकी स्वसुखपरायण घृणित चित्तवृत्ति नहीं ॥ 18 ॥ श्रीदमयन्तीकी शुद्ध स्वारसिकी अतीव गाढ़ श्रीगौर-प्रीतिका उदाहरण :- 'मनुष्य'-बुद्धि दमयन्ती करे प्रभुर पाय। 'गुरु-भोजने उदरे कभु 'आम' हञा याय ॥ 19 ॥ सुख्ता पाइले सेइ आम हइबेक नाश।' सेइ स्नेह मने भावि' प्रभुर उल्लास ॥ 20 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रति स्वाभाविक प्रीतिके कारण श्रीदमयन्ती उनके प्रति साधारण 'मनुष्य'-बुद्धि रखती थीं। वे मनमें विचार करती थीं- 'कभी यदि भारी भोजन करनेसे महाप्रभुके उदरमें आँव (बलगम) हो जायेगा तो वह सुख्ता चूर्ण खानेसे दूर हो जायेगा।' श्रीदमयन्तीके उस स्नेहका विचार करनेसे ही महाप्रभु उल्लसित हो उठते थे ॥ 19-20 ॥ अनुभाष्य- 'मनुष्य'- बुद्धि', - गौड़-व्रजवासियोंका शुद्ध सत्त्वमय ऐश्वर्यज्ञानहीन चित्तमें मनुष्य-शरीरधारी गौर-

274 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/19–26 ] [बायाँ स्तम्भ] कृष्णको अपने शुद्ध केवल प्रेमके वशीभूत समझना; 'आम',—जठराग्निके मन्द होनेके कारण अजीर्णता-वशतः अम्लपित्त-व्याधि॥ 19 ॥ प्रेमसे अर्पित वस्तु ही महागुणोंसे युक्त, प्रेमसे प्रदानकी गयी वस्तुके बाहरी दोषों और गुणोंका विचार नहीं :— भारवी-कृत किरातार्जुनीय (8/20) में— प्रियेण संग्रथ्य विपक्ष-सन्निधा- वुपाहितां वक्षसि पीवरस्तने। स्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलां वसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि ॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—किसी प्रियव्यक्तिने अपने हाथोंसे मालाको गूँथकर विपक्षीकी (सौतनकी) उपस्थितिमें उन्नत स्तनवाली पत्नीको पहनायी तो उस स्त्रीने मालाके ऊपर लगे कीचड़को देखकर भी उसका परित्याग नहीं किया, क्योंकि गुण वस्तुमें नहीं रहते, प्रेममें रहते हैं॥ 21 ॥ अनुभाष्य— काचित् (कान्ता) प्रियेण (प्रेमपात्रेण वल्लभेन) संग्रथ्य (स्वयमेव रचयित्वा) विपक्षसन्निधौ (सपत्नीजनसमीपे) पीवरस्तने (समुन्नतपयोधरे) वक्षसि (उरसि) उपाहिताम् (अर्पितां योजितां) जलाविलां (कर्द्दमादियुक्तामपि) स्रजं (मालां) न विजहौ (न त्यक्तवती); हि (यस्मात्) गुणाः प्रेम्णि वसन्ति, न वस्तुनि [प्रेमर्पितमेव वस्तु गुणवत्, अन्यत् तु गुणवदपि गुणहीनं दोषयुक्तमेव, प्रेम तु वस्तुपरीक्षां नापेक्षते इति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [प्रेमसे अर्पित वस्तु ही गुणवान् है, अन्यथा वस्तु गुणवान् होनेपर भी गुणहीन (दोषयुक्त) है, प्रेम वस्तुकी परीक्षाकी अपेक्षा नहीं करता—यह भाव है] ॥ 21 ॥ धनिया-मोहरीर तण्डुल गुण्डा करिया। नाडु बान्धियाछे चिनि-पाक करिया ॥ 22 ॥ शुण्ठीखण्ड, नाडु, आर आमपित्तहर। पृथक् पृथक् बान्धि' वस्त्रेर कुथली-भितर ॥ 23 ॥ [दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—श्रीदमयन्तीने साबुत धनिया और सौंफका चूर्ण बनाकर चीनीकी चासनीसे उनके लड्डू बना दिये। उन्होंने आँव और पित्तका हरण करनेवाले सोंठके लड्डू भी बनाये और दोनों प्रकारके लड्डुओंको पृथक्-पृथक् छोटी-छोटी थैलियोंमें बाँधकर रख दिया ॥ 22–23 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कुथली',—छोटी-छोटी थैलियाँ ॥ 23 ॥ कोलिशुन्ठि, कोलिचूर्ण, कोलिखण्ड आर। कत नाम लइब, आर शतप्रकार 'आचार' ॥ 24 ॥ अनुवाद—उन्होंने सूखे बेर, बेरोंका चूर्ण, गुड़में पकाये बेर और सैंकड़ों प्रकारके आचार बनाये, मैं कितनोंका नाम गिनाऊँ॥ 24 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'कोलिशुन्ठि',—सूखे बेर ॥ 24 ॥ नारिकेल-खण्ड, आर नाडु गङ्गाजलि। चिरस्थायी खण्डविकार करिला सकलि ॥ 25 ॥ अनुवाद—उन्होंने नारियलके छोटे-छोटे टुकड़ोंकी मिठाई और ऐसे लड्डू बनाये जो देखनेमें गङ्गाके जलकी भाँति श्वेत थे। इस प्रकार उन्होंने ऐसे-ऐसे लड्डू बनाये, जो बहुत दिनों तक उपयोग किये जा सकते थे ॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'नाडु गङ्गाजलि',—सफेद लड्डू ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—'चिरस्थायी खण्डविकार',—कद्मा (कदम्ब पुष्पके आकार जैसी गोल और सख्त मिठाई), काटाफेणी, ओला, मठ, तिलमें खाजा, दम्दम्-मिश्री, रेशमी मिठाई आदि ॥ 25 ॥ चिरस्थायी क्षीरसार, मण्डादि-विकार। अमृत-कर्पूर आदि अनेकप्रकार ॥ 26 ॥ अनुवाद—उन्होंने बहुत दिनों तक नष्ट नहीं होनेवाले खोये और चावलकी माँड़ आदिके अनेक

[ 10/26–35 दसवाँ अध्याय 275 पकवान बनाये तथा अमृत-कर्पूर आदि अनेक प्रकारके पीठे भी बनाये ॥ 26 ॥ शालिकाचटि-धान्येर 'आतप' चिड़ा करि'। नूतन-वस्त्रेर बड़ कुथली सब भरि' ॥ 27 ॥ अनुवाद—उन्होंने सूक्ष्म शालिकाचटि धानका उबाले बिना सूर्यके तापसे चिड़वा बनाकर उसे नये वस्त्रसे बनी बड़ी झोलीमें भर दिया ॥ 27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शालिकाचटि धान्येर'—(एक प्रकारके) सूखे धानका ॥ 27 ॥ कतेक चिड़ा हुडुम् करि' घृतेते भाजिया। चिनि-पाके नाडु कैला कर्पूरादि दिया ॥ 28 ॥ अनुवाद—उन्होंने कुछ चिड़वा और मुड़िको घीमें भूनकर तथा उसमें कर्पूर आदि मिलाकर चीनीकी चासनीमें पकाकर लड्डू बनाये ॥ 28 ॥ अनुभाष्य—'हुडुम',—(पूर्वबङ्गालमें प्रसिद्ध) मुड़ि, (पश्चिम बङ्गालमें 'हुडुम-चावल'-नामसे एक प्रकारका पृथक् चावल मिलता है) ॥ 28 ॥ शालि-धान्येर तण्डुल-भाजा चूर्ण करिया। घृतसिक्त चूर्ण कैला चिनि-पाक दिया ॥ 29 ॥ कर्पूर, मरिच, लवङ्ग, एलाचि, रसवास। चूर्ण दिया नाडु कैला परम सुवास ॥ 30 ॥ अनुवाद—उन्होंने शालि-धानके चावलको भूनकर उसका चूर्ण बनाया और पुनः उसे घीमें मिलाकर चीनीकी चासनीमें पकाया, फिर उसमें कर्पूर, काली मिर्च, लौंग, इलायची तथा रसवास आदिका चूर्ण बनाकर परम सुगन्धित लड्डू बना दिये ॥ 29–30 ॥ शालि-धान्येर खई पुनः घृतेते भाजिया। चिनि-पाक उखड़ा कैला कर्पूरादि दिया ॥ 31 ॥ अनुवाद—उन्होंने शालिधानकी बनी खीलको घीमें भूनकर उसमें कर्पूर आदि मिलाकर चीनीकी चासनीमें पकाकर मुड़कि (मुरुण्डा) बनाया ॥ 31 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उखड़ा'—मुड़कि ॥ 31 ॥ फुट्कलाइ चूर्ण करि' घृते भाजाइला। चिनि-पाके कर्पूर दिया नाडु कैला ॥ 32 ॥ अनुवाद—उन्होंने तले हुए मटरोंका चूर्ण बनाकर उसे घीमें भूना और फिर उसे कर्पूर मिश्रित चीनीकी चासनीमें पकाकर लड्डू बनाये ॥ 32 ॥ अनुभाष्य—'फुट्कलाइ',—तले हुए मटर ॥ 32 ॥ सुस्वादिष्ट खाद्यको बनानेमें परम निपुण होनेपर भी ग्रन्थकारका दैन्य :— कहिते ना जानि नाम ए-जन्मे याहार। ऐछे नाना भक्ष्यद्रव्य सहस्रप्रकार ॥ 33 ॥ अनुवाद—श्रीमदमयन्तीने ऐसी सैकड़ों खाद्य वस्तुएँ बनायी जिनके नाम मैं पूर्ण जन्ममें भी नहीं कह सकता ॥ 33 ॥ श्रीराघव और श्रीमदमयन्तीकी महाप्रभुके प्रति गाढ़ प्रीति :— राघवेर आज्ञा, आर करेन दमयन्ती। दुँहार प्रभुते स्नेह परम-भकति ॥ 34 ॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितकी आज्ञानुसार श्रीमदमयन्ती समस्त वस्तुओंको बनातीं। उन दोनोंका महाप्रभुके प्रति बहुत स्नेह और परम-भक्ति थी ॥ 34 ॥ गङ्गा-मृत्तिका आनि' वस्त्रेते छानिया। पाँचकुड़ि करिया दिला गन्धद्रव्य दिया ॥ 35 ॥ अनुवाद—श्रीमदमयन्तीने गङ्गाकी मिट्टीको लाकर उसे वस्त्रके द्वारा छाना और उसके पाँच भाग किये एवं उनमें भिन्न-भिन्न सुगन्धित द्रव्य देकर पाँच पोटलियाँ बाँध दी ॥ 35 ॥ अनुभाष्य—'पाँचकुड़ि',—पाठान्तरमें 'पाकौड़ि', पाठान्तरमें, 'पाँपड़ि' अर्थात् दला अथवा 'पर्पटी' ॥ 35 ॥

276 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/36-44 ] पातल मृत्पात्रे चन्दनादि भरि’ । आर सब वस्तु भरे वस्त्रेर कुथली ॥ ३६ ॥ अनुवाद—उन्होंने मिट्टीके बने हल्के पात्रोंमें चन्दन आदिको भर दिया और अन्य समस्त वस्तुओंको वस्त्रोंसे बनी थैलियोंमें भर दिया ॥ ३६ ॥ अनुभाष्य—‘पातल’,—पतला, हल्का, छोटा; किसी- किसीके मतानुसार पत्थर ॥ ३६ ॥ सामान्य झालि हैते द्विगुण झालि कैला। परिपाटि करि’ सब झालि भराइला ॥ ३७ ॥ अनुवाद—उन्होंने सामान्य थैलीसे दो गुनी आकारकी थैलियाँ बनायी और बड़ी सावधानीसे सभी छोटी-छोटी थैलियोंको बड़ी थैलियोंमें भर दिया ॥ ३७ ॥ झालि बान्धि’ मोहर दिला आग्रह करिया। तिन बोझारि झालि बहे क्रम करिया ॥ ३८ ॥ अनुवाद—उन्होंने बड़ी सावधानीपूर्वक थैलियोंको बाँधा और उनपर मोहर लगा दी। तीन भारवाहक उन झोलोंको एकके बाद एक करके उठा रहे थे ॥ ३८ ॥ अनुभाष्य—‘मोहर दिला,’—अन्य लोग जिससे खोल न पायें, इस प्रकारसे सील मोहर लगा दी; ‘बोझारि’,—बोझको (भारको) अरि (कम करनेवाले)—भारवाही, ‘कुली’ अथवा बोझ उठानेवाला ॥ ३८ ॥ इसलिये ही ‘राघवकी झोली’-नाम :— संक्षेपे कहिलुँ एइ झालिर विचार। ‘राघवेर झालि’ बलि’ ख्याति याहार ॥ ३९ ॥ अनुवाद—मैंने संक्षेपमें इन झोलियोंका वर्णन किया जो ‘श्रीराघव पण्डितकी झोली’के नामसे विख्यात हैं ॥ ३९ ॥ श्रीमकरध्वजके द्वारा यत्नपूर्वक झोलियोंकी रक्षा :— झालिर उपर ‘मुन्सिब’ मकरध्वज-कर। प्राणरूपे झालि राखे हञा तत्पर ॥ ४० ॥ अनुवाद—श्रीमकरध्वज-कर उन झोलियोंके ‘मुन्सिब’ (परिचालक) बने और वे सदा तत्पर रहकर झोलियोंकी अपने प्राणोंकी भाँति देखभाल करते थे ॥ ४० ॥ अनुभाष्य—‘मुन्सिब’,—(अरबी भाषा) ‘मन्सिफ’, परिदर्शक, परिचालक; ‘मकरध्वज-कर’—पाणिहाटी ग्रामवासी, राघव पण्डितके अनुगत गौरभक्त; अब भी पाणिहाटीमें उनके घरकी नींव दिखलायी पड़ती है ॥ ४० ॥ गौड़ीयभक्तोंके पुरीमें आनेवाले दिन नरेन्द्र-सरोवरमें श्रीगोविन्द-देवके जलक्रीड़ा-उत्सवका होना :— एइमते वैष्णव सब नीलाचले आइला। दैवे जगन्नाथेर से दिन जल-लीला ॥ ४१ ॥ अनुवाद—इस प्रकार सब वैष्णव श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये। सौभाग्यसे वह दिन भगवान् श्रीजगन्नाथका जलक्रीड़ा-उत्सवका था ॥ ४१ ॥ नरेन्द्रेर जले ‘गोविन्द’ नौकाते चड़िया। जलक्रीड़ा करे सब भक्तगण लञा ॥ ४२ ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीगोविन्ददेवने नौकापर चढ़कर नरेन्द्र सरोवरके जलमें सब भक्तोंके साथ जलक्रीड़ा की ॥ ४२ ॥ उस समय महाप्रभुका भी पुरीवासी भक्तोंके साथ श्रीकृष्णकी जल-केलिका दर्शन :— सेइकाले महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। नरेन्द्रे आइला देखिते जलकेलि-रङ्गे ॥ ४३ ॥ अनुवाद—उसी समय महाप्रभु भक्तोंके साथ भगवान् गोविन्दकी आनन्दमय जलक्रीड़ाको देखनेके लिये नरेन्द्र सरोवरपर आये ॥ ४३ ॥ उस समय ही महाप्रभुके साथ गौड़ीय-भक्तोंका मिलन :— सेइकाले सब गौड़ेर भक्तगण। नरेन्द्रेते प्रभु-सङ्गे हइल मिलन ॥ ४४ ॥ अनुवाद—उसी समय गौड़देशसे आये समस्त भक्तोंका नरेन्द्र सरोवरपर महाप्रभुके साथ मिलन हुआ ॥ ४४ ॥

[ 10/45–53 दसवाँ अध्याय 277 भक्तोंके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- भक्तगण पड़े आसि' प्रभुर चरणे। उठाञा प्रभु सबारे कैला आलिङ्गने ॥ 45 ॥ अनुवाद—सभी गौड़ीय भक्त आकर महाप्रभुके चरणकमलोंमें पड़ गये। महाप्रभुने उन सबको उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥ 45 ॥ गौड़ीय-भक्तोंका कीर्त्तन-गान, भक्तोंके द्वारा क्रन्दन :- गौड़ीय-सम्प्रदाय सब करेन कीर्त्तन। प्रभुर मिलने उठे प्रेमेर क्रन्दन ॥ 46 ॥ अनुवाद—गौड़ीय-सम्प्रदायके समस्त भक्त कीर्त्तन कर रहे थे और महाप्रभुके साथ मिलन होनेपर वे प्रेममें क्रन्दन करने लगे ॥ 46 ॥ भक्तोंके साथ श्रीगोविन्ददेवकी जलक्रीड़ा :- जलक्रीड़ा, वाद्य, गीत, नर्त्तन, कीर्त्तन। महाकोलाहल तीरे, सलिले खेलन ॥ 47 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्द देवकी जलक्रीड़ाके उपलक्ष्यमें नरेन्द्र सरोवरके तटपर वाद्य-यन्त्र बज रहे थे, गान, नृत्य, कीर्त्तन और कोलाहल हो रहा था। कुछ भक्त नरेन्द्र सरोवरके जलमें क्रीड़ा भी कर रहे थे ॥ 47 ॥ कीर्त्तन और क्रन्दन-ध्वनिका एकसाथ मिलकर महाध्वनि होना :- गौड़ीया-सङ्कीर्त्तने आर रोदन मिलिया। महाकोलाहल-शब्द हैल ब्रह्माण्ड भरिया ॥ 48 ॥ अनुवाद—गौड़ीय भक्तोंके सङ्कीर्त्तन और उच्च स्वरसे रोदनके मिल जानेपर महाकोलाहल हुआ जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गूँज उठा ॥ 48 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी जल-क्रीड़ा :- सब भक्त लञा प्रभु नामिलेन जले। सबा लञा जलक्रीड़ा करेन कुतूहले ॥ 49 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंको लेकर महाप्रभु भी नरेन्द्र सरोवरके जलमें उतरे और उन्होंने सभी भक्तोंके साथ बड़े आनन्दसे जलक्रीड़ा की ॥ 49 ॥ चैतन्यभागवतमें महाप्रभुकी जलक्रीड़ा वर्णित :- प्रभुर एइ जलक्रीड़ा दास-वृन्दावन। 'चैतन्यमङ्गले' विस्तारि' करियाछे वर्णन ॥ 50 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी इस जलक्रीड़ाका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ चैतन्यमङ्गलमें (श्रीचैतन्यभागवतमें) विस्तारसे वर्णन किया है॥ 50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'चैतन्यमङ्गले', — चैतन्यभागवतमें अन्त्य-खण्डका नौवाँ अध्याय देखें ॥ 50 ॥ ग्रन्थके बड़े होनेके भयसे पुनरुक्ति नहीं :- पुनः इँहा वर्णिले पुनरुक्ति हय। व्यर्थ लिखन हय, मोर ग्रन्थ बाड़य ॥ 51 ॥ अनुवाद—पुनः इसी प्रसङ्गका वर्णन करनेसे पुनरुक्ति होगी, इसलिये इसे लिखना व्यर्थ ही होगा और मेरे ग्रन्थका आकार भी बढ़ जायेगा॥ 51 ॥ अपने-अपने भक्तोंके साथ श्रीगोविन्ददेव और महाप्रभुका अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थान :- जललीला करि' गोविन्द चलिला आलय। निजगण लञा प्रभु गेला देवालय ॥ 52 ॥ अनुवाद—जलक्रीड़ा करनेके उपरान्त भगवान् श्रीगोविन्द अपने मन्दिरकी ओर चल दिये। महाप्रभु भी अपने भक्तोंको साथमें लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर चले गये ॥ 52 ॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें विजयमूर्ति श्रीगोविन्ददेवके विग्रह हैं; वे ही नरेन्द्र सरोवरमें जलक्रीड़ा करने जाते हैं॥ 52 ॥ श्रीजगन्नाथ-दर्शनके पश्चात् भक्तोंको भोजन करानेके बाद उनको अपने-अपने स्थानपर भेजना :- जगन्नाथ देखि' पुनः निज-घरे आइला। प्रसाद आनाञा भक्तगणे खाओयाइला ॥ 53 ॥ अनुवाद—महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके

278 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 10/53-63 ] पुनः अपने वासस्थानपर लौट आये। उन्होंने मन्दिरसे प्रसाद मँगवाकर भक्तोंको खिलाया ॥ 53 ॥ इष्टगोष्ठी सबा लञा कतक्षण कैला। निज-निज-पूर्व-वासाय सबाय पाठाइला ॥ 54 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कुछ समय तक अपने समस्त भक्तोंके साथ इष्टगोष्ठी करके सभी भक्तोंको उनके पूर्व-पूर्व वर्षोंवाले अपने-अपने वासस्थानपर भेज दिया ॥ 54 ॥ श्रीराघवके द्वारा श्रीगोविन्दको अपनी झोली देना :- गोविन्द-ठाञि राघव झालि समर्पिला। भोजन-गृहेर कोणे झालि राखिला ॥ 55 ॥ अनुवाद-श्रीराघव पण्डितने श्रीगोविन्दको झोलीको समर्पित कर दिया और श्रीगोविन्दने उस झोलीको भोजन-गृहके एक कोनेमें रख दिया ॥ 55 ॥ पूर्व-वत्सरेर झालि आजाड़ करिया। द्रव्य भरिवारे राखे अन्य गृहे लञा ॥ 56 ॥ अनुवाद-श्रीगोविन्दने पिछले वर्षमें आयी झोलीको भली-भाँति खाली और साफ करके अन्य वस्तुओंको भरनेके लिये अन्य कमरेमें रख दिया ॥ 56 ॥ अनुभाष्य- 'आजाड़'-खाली, शून्य ॥ 56 ॥ अगले दिन प्रातः महाप्रभुका भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- आर दिन महाप्रभु निजगण लञा। जगन्नाथ देखिलेन शय्योत्थाने यात्रा ॥ 57 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभुने अपने भक्तोंको साथ ले जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथके शय्यासे उठते हुए दर्शन किये ॥ 57 ॥ सात-सम्प्रदायोंमें बेड़ा-सङ्कीर्त्तन-वर्णन :- बेड़ा-सङ्कीर्त्तन ताँहा आरम्भ करिला। सात-सम्प्रदाये तबे गाइते लागिला ॥ 58 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने वहाँ बेड़ा-सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। उन्होंने तब भक्तोंकी सात-मण्डलियाँ बनायीं और सभीमें कीर्तन होने लगा ॥ 58 ॥ अनुभाष्य- बेड़ा-सङ्कीर्त्तन,'-मध्यलीला 11/215-238 संख्या देखें ॥ 58 ॥ सात-सम्प्रदाये नृत्य करे सात जन। अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु नित्यानन्द ॥ 59 ॥ वक्रेश्वर, अच्युतानन्द, पण्डित-श्रीवास। सत्यराज-खाँन, आर नरहरिदास ॥ 60 ॥ महाप्रभुके द्वारा महैश्वर्यका प्रकाश :- सात-सम्प्रदाये प्रभु करेन भ्रमण। 'मोर सम्प्रदाये प्रभु'-ऐछे सबार मन ॥ 61 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीअच्युतानन्द, श्रीवास पण्डित, श्रीसत्यराज खाँन और श्रीनरहरिदास-सात मण्डलियोंमें क्रमशः ये सात भक्त नृत्य कर रहे थे। महाप्रभु एक-एक करके सातों मण्डलियोंमें भ्रमण कर रहे थे, परन्तु सभी मण्डलियोंके भक्तोंको ऐसा प्रतीत हो रहा था, -'महाप्रभु हमारी ही मण्डलीमें हैं'॥ '59-61 ॥ महासङ्कीर्त्तन-ध्वनि :- सङ्कीर्त्तन-कोलाहले आकाश भेदिल। सब जगन्नाथवासी देखिते आइल ॥ 62 ॥ अनुवाद-सङ्कीर्त्तनमें आकाश-भेदी ध्वनि हो रही थी। समस्त जगन्नाथपुरीवासी सङ्कीर्त्तनका दर्शन करनेके लिये आये ॥ 62 ॥ रानियोंके साथ राजाके द्वारा सङ्कीर्त्तनका दर्शन :- राजा आसि' दूरे देखे निजगण लञा। राजपत्नी सब देखे अट्टाली चड़िया ॥ 63 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने भी अपने गणोंके साथ आकर दूरसे और रानियोंने अट्टालिकापर चढ़कर सङ्कीर्त्तनका दर्शन किया ॥ 63 ॥