श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१६- विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा
अध्याय १६ ] | विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा | ६३५
सोलहवाँ अध्याय
विविध नाम-रूपोंमें शिवकी आराधनाकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>पुनरेव महाबुद्धे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः शब्दितानि मुनीश्वरैः॥ १ | सनत्कुमार बोले—हे महाबुद्धे! मुनीश्वरोंके द्वारा बहुत-से नामोंमें अनेक प्रकारसे कहे गये शिवके रूपोंको मैं यथार्थ रूपमें पुनः सुनना चाहता हूँ॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>पुनः पुनः प्रवक्ष्यामि शिवरूपाणि ते मुने।<br>बहुभिर्बहुधा शब्दैः शब्दितानि मुनीश्वरैः॥ २ | शैलादि बोले—हे मुने! मैं मुनीश्वरोंके द्वारा बहुत-से नामोंसे अनेक प्रकारसे कहे गये शिवके रूपोंका वर्णन आपसे पुनः-पुनः करूँगा॥ २॥ |
| क्षेत्रज्ञः प्रकृतिर्व्यक्तं कालात्मेति मुनीश्वरैः।<br>उच्यते कैश्चिदाचार्यैरागमार्णवपारगैः॥ ३ | वेदरूपी समुद्रके पारगामी कुछ आचार्य तथा मुनीश्वर उन शिवको क्षेत्रज्ञ, प्रकृति, व्यक्त तथा कालात्मा—ऐसा कहते हैं॥ ३॥ |
| क्षेत्रज्ञं पुरुषं प्राहुः प्रधानं प्रकृतिं बुधाः।<br>विकारजातं निःशेषं प्रकृतेर्व्यक्तमित्यपि॥ ४<br>प्रधानव्यक्तयोः कालः परिणामैककारणम्।<br>तच्चतुष्टयमीशस्य रूपाणां हि चतुष्टयम्॥ ५ | विद्वज्जनोंने पुरुषको क्षेत्रज्ञ, प्रधानको प्रकृति और प्रकृतिके सम्पूर्ण विकारसमूहको व्यक्त कहा है; प्रधान तथा व्यक्तके विस्तारमें एकमात्र कारण काल ही है। ये चारों ही ईश्वरके रूपचतुष्टय हैं॥ ४-५॥ |
| हिरण्यगर्भं पुरुषं प्रधानं व्यक्तरूपिणम्।<br>कथयन्ति शिवं केचिदाचार्याः परमेश्वरम्॥ ६<br>हिरण्यगर्भः कर्तास्य भोक्ता विश्वस्य पूरुषः।<br>विकारजातं व्यक्ताख्यं प्रधानं कारणं परम्॥ ७<br>तेषां चतुष्टयं बुद्धेः शिवरूपचतुष्टयम्।<br>प्रोच्यते शङ्करादन्यदस्ति वस्तु न किञ्चन॥ ८ | कुछ आचार्य परमेश्वर शिवको हिरण्यगर्भ, पुरुष, प्रधान तथा व्यक्तरूपवाला भी कहते हैं। इस जगत्का कर्ता हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) है, भोक्ता पुरुष (विष्णु) है, समस्त प्रपंच 'व्यक्त' नामवाला है और मुख्य कारण प्रधान है। उन हिरण्यगर्भ आदिका तथा बुद्धि आदिका चतुष्टय भगवान् शिवका रूपचतुष्टय कहा जाता है, शंकरसे भिन्न अन्य कोई भी वस्तु नहीं है॥ ६–८॥ |
| पिण्डजातिस्वरूपी तु कथ्यते कैश्चिदीश्वरः।<br>चराचरशरीराणि पिण्डाख्यान्यखिलान्यपि॥ ९<br>सामान्यानि समस्तानि महासामान्यमेव च।<br>कथ्यन्ते जातिशब्देन तानि रूपाणि धीमतः॥ १० | कुछ लोग ईश्वर शिवको पिण्ड तथा जातिरूपवाला कहते हैं। चर तथा अचर समस्त शरीर ही पिण्डपदवाच्य है। उन बुद्धिसम्पन्न शिवके वे जाति, व्यक्ति और द्रव्योंके समस्त रूप ही जातिशब्दवाच्य हैं॥ ९-१०॥ |
| विराट् हिरण्यगर्भात्मा कैश्चिदीशो निगद्यते।<br>हिरण्यगर्भो लोकानां हेतुर्लोकात्मको विराट्॥ ११<br>सूत्राव्याकृतरूपं तं शिवं शंसन्ति केचन।<br>अव्याकृतं प्रधानं हि तद्रूपं परमेष्ठिनः॥ १२<br>लोका येनैव तिष्ठन्ति सूत्रे मणिगणा इव।<br>तत्सूत्रमिति विज्ञेयं रूपमद्भुतविक्रमम्॥ १३ | कुछ लोग शिवको विराट् तथा हिरण्यगर्भरूप कहते हैं। हिरण्यगर्भ समस्त लोकोंका कारण है और विराट् लोकस्वरूप है। कुछ लोग उन शिवको सूत्राव्याकृतरूप कहते हैं। परमेष्ठी शिवका वह रूप अव्याकृत तथा प्रधान है। समस्त लोक उनमें उसी भाँति ओतप्रोत हैं, जैसे सूत्रमें मणियाँ, अतः उनके अद्भुत पराक्रमी स्वरूपको सूत्ररूप समझना चाहिये॥ ११–१३॥ |
| ६३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्तर्यामी परः कैश्चित्कैश्चिदीशः प्रकीर्त्यते।<br>स्वयंज्योतिः स्वयंवेद्यः शिवः शम्भुर्महेश्वरः॥ १४<br>सर्वेषामेव भूतानामन्तर्यामी शिवः स्मृतः।<br>सर्वेषामेव भूतानां परत्वात्पर उच्यते॥ १५ | कोई-कोई लोग स्वयंज्योतिरूप तथा स्वयंवेद्य ईश परमेश्वर शंकर शम्भुको अन्तर्यामी तथा पर कहते हैं। वे शिव सम्पूर्ण प्राणियोंमें विराजमान हैं, अतः अन्तर्यामी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंसे श्रेष्ठ होनेके कारण वे परमात्मा परमेश्वर शम्भु शंकर शिव 'पर' कहे जाते हैं॥ १४-१५ १/२ ॥ |
| परमात्मा शिवः शम्भुः शङ्करः परमेश्वरः।<br>प्राज्ञतैजसविश्वाख्यं तस्य रूपत्रयं विदुः॥ १६<br>सुषुप्ति स्वप्नजाग्रन्तमवस्थात्रयमेव तत्।<br>विराट् हिरण्यगर्भाख्यमव्याकृतपदाह्वयम्॥ १७<br>तुरीयस्य शिवस्यास्य अवस्थात्रयगामिनः।<br>हिरण्यगर्भः पुरुषः काल इत्येव कीर्तिताः॥ १८<br>तिस्रोऽवस्था जगत्सृष्टिस्थितिसंहारहेतवः।<br>भवविष्णुविरिञ्चाख्यमवस्थात्रयमीशितुः॥ १९<br>आराध्य भक्त्या मुक्तिं च प्राप्नुवन्ति शरीरिणः। | प्राज्ञ, तैजस और विश्व नामक उनके तीन रूप कहे गये हैं। इन्हें ही सुषुप्ति, स्वप्न तथा जाग्रत्—तीन अवस्थाएँ भी कहते हैं और ये ही विराट्, हिरण्यगर्भ और अव्याकृत पदके भी वाचक हैं। तीनों अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले उन तुरीयस्वरूप शिवके हिरण्यगर्भ, पुरुष और काल—ये तीनों ही जगत्की सृष्टि, स्थिति और संहारकी कारणरूपा तीन अवस्थाएँ कही गयी हैं। भव, विष्णु, विरिंचि (ब्रह्मा) नामक तीनों अवस्थाएँ महेश्वरकी ही हैं; भक्तिपूर्वक इनकी आराधना करके प्राणी मुक्ति प्राप्त करते हैं॥ १६-१९ १/२ ॥ |
| कर्ता क्रिया च कार्यं च करणं चेति सूरिभिः॥ २०<br>शम्भोश्चत्वारि रूपाणि कीर्त्यन्ते परमेष्ठिनः।<br>प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं प्रमितिस्तथा॥ २१<br>चत्वार्येतानि रूपाणि शिवस्यैव न संशयः।<br>ईश्वराव्याकृतप्राणविराड्भूतेन्द्रियात्मकम् ॥ २२<br>शिवस्यैव विकारोऽयं समुद्रस्येव वीचयः। | कर्ता, क्रिया, कार्य तथा करण—ये विद्वानोंके द्वारा परमेष्ठी शिवके चार रूप कहे गये हैं। प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय तथा प्रमिति—ये चारों भी शिवके ही रूप हैं; इसमें संशय नहीं है। ईश्वर, अव्याकृत, प्राण, विराट्, भूत, इन्द्रिय और आत्मा—ये सब समुद्रकी तरंगोंकी भाँति शिवके ही विकार हैं॥ २०-२२ १/२ ॥ |
| ईश्वरं जगतामाहुर्निमित्तं कारणं तथा॥ २३<br>अव्याकृतं प्रधानं हि तदुक्तं वेदवादिभिः।<br>हिरण्यगर्भः प्राणाख्यो विराट् लोकात्मकः स्मृतः॥ २४<br>महाभूतानि भूतानि कार्याणि इन्द्रियाणि च।<br>शिवस्यैतानि रूपाणि शंसन्ति मुनिसत्तमाः॥ २५ | ईश्वरको जगत्का निमित्त कारण कहा गया है। वेदवेत्ताओंने अव्याकृतको प्रधान कहा है। हिरण्यगर्भको ही प्राण नामवाला तथा विराट्को लोकरूप कहा गया है। महाभूत, भूत, कार्य तथा इन्द्रियाँ—श्रेष्ठ मुनिगण इन्हें शिवके रूप कहते हैं॥ २३-२५॥ |
| परमात्मा शिवादन्यो नास्तीति कवयो विदुः।<br>शिवजातानि तत्त्वानि पञ्चविंशन्मनीषिभिः॥ २६<br>उक्तानि न तदन्यानि सलिलादूर्भिवृन्दवत्।<br>पञ्चविंशत्पदार्थेभ्यः शिवतत्त्वं परं विदुः॥ २७<br>तानि तस्मादनन्यानि सुवर्णकटकादिवत्।<br>सदाशिवेश्वराद्यानि तत्त्वानि शिवतत्त्वतः॥ २८ | परमात्मा शिवसे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं है—ऐसा कवियोंने कहा है। मनीषियोंने [समस्त] पचीस तत्त्वोंको शिवसे ही उत्पन्न बताया है, वे जलसे तरंगकी भाँति उन [शिव]-से अभिन्न हैं। किंतु शिवतत्त्वको पचीस तत्त्वोंसे भी पर कहा गया है। वे [सब तत्त्व] सुवर्णसे कुण्डल आदिकी तरह उनसे अभिन्न हैं। सदाशिव आदि सगुण तत्त्व भी उन्हीं शिवतत्त्वसे |
१७- भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन
अध्याय १७] भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन ६३७
| जातानि न तदन्यानि मृद्द्रव्यं कुम्भभेदवत्।<br>माया विद्या क्रिया शक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियामयी॥ २९<br><br>जाताः शिवान्न सन्देहः किरणा इव सूर्यतः।<br>सर्वात्मकं शिवं देवं सर्वाश्रयविधायिनम्॥ ३०<br><br>भजस्व सर्वभावेन श्रेयश्चेत्प्राप्तुमिच्छसि॥ ३१ | प्रादुर्भूत हैं, वे सब भी मिट्टी तथा घड़ेकी ही भाँति उनसे भिन्न नहीं हैं। माया, विद्या, क्रिया, शक्ति तथा क्रियामयी ज्ञानशक्ति—ये पंचरूप गौरी भी शिवसे ही उसी प्रकार उत्पन्न हुई हैं—जैसे सूर्यसे किरणें। अतः [हे सनत्कुमार!] यदि आप कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं तो सबको आश्रय प्रदान करनेवाले सर्वात्मा भगवान् शिवकी सब प्रकारसे आराधना कीजिये॥ २६—३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवतत्त्वमाहात्म्यवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवतत्त्वमाहात्म्यवर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा देवताओंसे अपने यथार्थ स्वरूपका कथन
| सनत्कुमार उवाच<br>भूयो देवगणश्रेष्ठ शिवमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिस्त्वद्वाक्यामृतपानतः॥ १<br><br>कथं शरीरी भगवान् कस्माद्रुद्रः प्रतापवान्।<br>सर्वात्मा च कथं शम्भुः कथं पाशुपतं व्रतम्॥ २<br><br>कथं वा देवमुख्यैश्च श्रुतो दृष्टश्च शङ्करः।<br><br>शैलादिरुवाच<br>अव्यक्तादभवत्स्थाणुः शिवः परमकारणम्॥ ३<br><br>स सर्वकारणोपेत ऋषिर्विश्वाधिकः प्रभुः।<br>देवानां प्रथमं देवं जायमानं मुखाम्बुजात्॥ ४<br><br>ददर्श चाग्रे ब्रह्माणं चाज्ञया तमवैक्षत।<br>दृष्टो रुद्रेण देवेशः ससर्ज सकलं च सः॥ ५<br><br>वर्णाश्रमव्यवस्थाश्च स्थापयामास वै विराट्।<br>सोमं ससर्ज यज्ञार्थं सोमादिदमजायत॥ ६<br><br>चरुश्च वह्निर्यज्ञश्च वज्रपाणिः शचीपतिः।<br>विष्णुर्नारायणः श्रीमान् सर्वं सोममयं जगत्॥ ७<br><br>रुद्राध्यायेन ते देवा रुद्रं तुष्टुवुरीश्वरम्।<br>प्रसन्नवदनस्तस्थौ देवानां मध्यतः प्रभुः॥ ८ | **सनत्कुमार बोले—**हे देवगणोंमें श्रेष्ठ! आपके वचनामृतका बार-बार पान करके भी उसे सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। भगवान् रुद्र शरीरवान् कैसे हुए, वे प्रतापी कैसे हुए, शिवजी सर्वात्मा कैसे हैं, पाशुपतव्रत कैसा है और प्रमुख देवताओंने शंकरजीके विषयमें श्रवण तथा उनका दर्शन कैसे किया?॥ १-२ १/२॥<br><br>**शैलादि बोले—**अव्यक्त परमात्मासे संसारमण्डपके स्तम्भ तथा जगत्के परम कारण शिव उत्पन्न हुए। सर्वकारणमय, सर्वोपरि तथा ऋषिरूप उन प्रभुने अपने मुखकमलसे प्रकट हुए देवताओंके आदिदेव ब्रह्माको अपने सम्मुख देखा और सृष्टि करनेकी आज्ञासे उनकी ओर दृष्टिपात किया॥ ३-४ १/२॥<br><br>रुद्रके द्वारा देखे गये उन ब्रह्माने सम्पूर्ण जगत्का सृजन किया और तदुपरान्त वर्णाश्रमव्यवस्था स्थापित की। इसके बाद उन विराटने यज्ञहेतु सोमकी सृष्टि की। पुनः उस सोमसे ये सब—चरु, अग्नि, यज्ञ, वज्रपाणि इन्द्र, श्रीयुक्त नारायण विष्णु आदि उत्पन्न हुए; इस प्रकार सम्पूर्ण जगत् सोममय हो गया॥ ५-७॥<br><br>तब वे समस्त देवगण रुद्राध्यायसे भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे। वे प्रभु महेश्वर इन देवताओंका ज्ञान अपहृत करके प्रसन्नमुख होकर इनके मध्य स्थित हो गये। |
६३८ ·श्रीलिङ्गमहापुराण· [ उत्तरभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अपहृत्य च विज्ञानमेषामेव महेश्वरः।<br>देवा ह्यपृच्छंस्तं देवं को भवानिति शङ्करम्॥ ९<br><br>अब्रवीद्भगवान् रुद्रो ह्यहमेकः पुरातनः।<br>आसं प्रथम एवाहं वर्तामि च सुरोत्तमाः॥ १०<br><br>भविष्यामि च लोकेऽस्मिन् मत्तो नान्यः कुतश्चन।<br>व्यतिरिक्तं न मत्तोऽस्ति नान्यत्किञ्चित्सुरोत्तमाः॥ ११ | तत्पश्चात् देवताओंने भगवान् शंकरसे पूछा—आप कौन हैं? तब भगवान् रुद्रने कहा—हे श्रेष्ठ देवगण! मैं एक पुरातन पुरुष हूँ। सर्वप्रथम मैं ही था, अब भी हूँ और भविष्यमें भी रहूँगा, इस लोकमें मुझसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ! अन्य कुछ भी मुझसे भिन्न नहीं है॥ ८–११॥ |
| नित्योऽनित्योऽहमनघो ब्रह्माहं ब्रह्मणस्पतिः।<br>दिशश्च विदिशश्चाहं प्रकृतिश्च पुमानहम्॥ १२<br><br>त्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप् च च्छन्दोऽहं तन्मयः शिवः।<br>सत्योऽहं सर्वगः शान्तस्त्रेताग्निर्गौरवं गुरुः॥ १३<br><br>गौरहं गह्वरश्चाहं नित्यं गहनगोचरः।<br>ज्येष्ठोऽहं सर्वतत्त्वानां वरिष्ठोऽहमपां पतिः॥ १४ | मैं नित्य हूँ तथा अनित्य भी हूँ। मैं पापशून्य, ब्रह्मा तथा ब्रह्मणस्पति (वेदोंका पालक) हूँ। मैं [पूर्व आदि] दिशाएँ तथा [आग्नेय आदि] विदिशाएँ भी हूँ। मैं प्रकृति हूँ और पुरुष भी हूँ। मैं त्रिष्टुप्, जगती और अनुष्टुप् छन्द हूँ, मैं छन्दराशिसे परिपूर्ण हूँ। मैं कल्याणस्वरूप, सत्यरूप, सर्वगामी, शान्त, त्रेताग्नि (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय)-रूप गौरव और हितोपदेशक हूँ। मैं पृथ्वीरूप हूँ। मैं गह्वर (गुहारूप) तथा आनन्दवन आदिमें सदा प्रत्यक्ष रहनेवाला हूँ। मैं समस्त तत्त्वोंमें ज्येष्ठ तथा वरिष्ठ हूँ, मैं समुद्ररूप हूँ॥ १२–१४॥ |
| आपोऽहं भगवानीशस्तेजोऽहं वेदिरप्यहम्।<br>ऋग्वेदोऽहं यजुर्वेदः सामवेदोऽहमात्मभूः॥ १५<br><br>अथर्वणोऽहं मन्त्रोऽहं तथा चाङ्गिरसां वरः।<br>इतिहासपुराणानि कल्पोऽहं कल्पनाप्यहम्॥ १६<br><br>अक्षरं च क्षरं चाहं क्षान्तिः शान्तिरहं क्षमा।<br>गुह्योऽहं सर्ववेदेषु वरेण्योऽहमजोऽप्यहम्॥ १७ | भगवान् शिव कहते हैं—मैं जल हूँ, मैं तेज हूँ और मैं परिष्कृत यज्ञभूमिरूप भी हूँ। मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद हूँ। मैं आकाशरूप हूँ। मैं अंगिरसोंमें श्रेष्ठ अथर्वणमन्त्र (चतुर्थ वेदरूप) हूँ। मैं [महाभारत आदि] इतिहास, पुराण तथा कल्प (कर्मप्रयोगरचना) हूँ। मैं कल्पना भी हूँ। मैं अक्षर (कूटस्थरूप) तथा क्षर (नाशवान्) हूँ। मैं क्षान्ति (धैर्य), शान्ति तथा क्षमा हूँ। मैं सभी वेदोंमें गुह्य (संवृतरूप) हूँ। मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ। मैं अजन्मा भी हूँ॥ १५–१७॥ |
| पुष्करं च पवित्रं च मध्यं चाहं ततः परम्।<br>बहिश्चाहं तथा चान्तःपुरस्तादहमव्ययः॥ १८<br><br>ज्योतिश्चाहं तमश्चाहं ब्रह्माविष्णुर्महेश्वरः।<br>बुद्धिश्चाहमहङ्कारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च॥ १९<br><br>एवं सर्वं च मामेव यो वेद सुरसत्तमाः।<br>स एव सर्ववित्सर्वं सर्वात्मा परमेश्वरः॥ २० | मैं पवित्र हृदयकमलरूप हूँ, मैं उसका मध्यभाग हूँ तथा उससे पर भी हूँ। मैं बाहर हूँ, भीतर हूँ तथा समक्ष भी हूँ। मैं शाश्वत हूँ। मैं ज्योति हूँ तथा अन्धकार भी हूँ। मैं ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर हूँ। बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ तथा इन्द्रियाँ मैं ही हूँ। हे श्रेष्ठ देवगण! इस प्रकार जो मुझ विश्वरूपको जानता है, वही सर्वज्ञ है, सर्वात्मा है और वह परमेश्वररूप हो जाता है॥ १८–२०॥ |
१८- देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति
अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६३९
| गां गोभिर्ब्राह्मणान् सर्वान् ब्राह्मण्येन हवींषि च।<br>आयुषायुस्तथा सत्यं सत्येन सुरसत्तमाः ॥ २१<br>धर्मं धर्मेण सर्वांश्च तर्पयामि स्वतेजसा।<br>इत्यादौ भगवानुक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ २२<br>नापश्यन्त ततो देवं रुद्रं परमकारणम्।<br>ते देवाः परमात्मानं रुद्रं ध्यायन्ति शङ्करम् ॥ २३<br>सनारायणका देवाः सेन्द्राश्च मुनयस्तथा।<br>तथोध्र्वबाहवो देवा रुद्रं स्तुवन्ति शङ्करम् ॥ २४ | हे श्रेष्ठ देवगण ! मैं वाणीको वेदोंसे, सभी ब्राह्मणों तथा हवियोंको ब्राह्मण्यसे, आयुको आयुसे, सत्यको सत्यसे, धर्मको धर्मसे और अन्य सबको अपने तेजसे तृप्त करता हूँ—ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर जब उन देवताओंने परमकारणरूप रुद्रको नहीं देखा, तब वे उन परमात्मा शंकरका ध्यान करने लगे। नारायण विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता और मुनिगण ऊपरकी ओर हाथ उठाकर कल्याणकारी रुद्रकी स्तुति करने लगे ॥ २१–२४ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवमाहात्म्यवर्णन' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥
अठारहवाँ अध्याय
देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति
| देवा ऊचुः | देवता बोले— |
|---|---|
| य एष भगवान् रुद्रो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>स्कन्दश्चापि तथा चेन्द्रो भुवनानि चतुर्दश।<br>अश्विनौ ग्रहताराश्च नक्षत्राणि च खं दिशः ॥ १<br>भूतानि च तथा सूर्यः सोमश्चाष्टौ ग्रहास्तथा।<br>प्राणः कालो यमो मृत्युरमृतः परमेश्वरः ॥ २<br>भूतं भव्यं भविष्यच्च वर्तमानं महेश्वरः।<br>विश्वं कृत्स्नं जगत्सर्वं सत्यं तस्मै नमो नमः ॥ ३ | जो ये भगवान् रुद्र हैं, वे ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, कार्तिकेय, इन्द्र, चौदहों भुवन, दोनों अश्विनीकुमार, सभी ग्रह, तारा, नक्षत्र, आकाश तथा दिशाएँ हैं। समस्त प्राणी, सूर्य, चन्द्रमा, आठों ग्रह, प्राण, काल, यम, मृत्यु तथा मोक्षरूप वे परमेश्वर ही हैं। पूर्वकालिक विश्व, उत्पद्यमान सम्पूर्ण संसार, आगे होनेवाले जगत् और वर्तमानकालिक सभी पदार्थ—ये सब वास्तवमें महेश्वर ही हैं। उन्हें बार-बार नमस्कार है ॥ १–३ ॥ |
| त्वमादौ च तथा भूतो भूर्भुवः स्वस्तथैव च।<br>अन्ते त्वं विश्वरूपोऽसि शीर्षं तु जगतः सदा ॥ ४<br>ब्रह्मैकस्त्वं द्वित्रिधार्थमधश्च त्वं सुरेश्वरः।<br>शान्तिश्च त्वं तथा पुष्टिस्तुष्टिश्चाप्यहुतं हुतम् ॥ ५<br>विश्वं चैव तथाविश्वं दत्तं वादत्तमेश्वरम्।<br>कृतं चाप्यकृतं देवं परमप्यपरं ध्रुवम्।<br>परायणं सतां चैव ह्यसतामपि शङ्करम् ॥ ६ | आदि तथा अन्तमें आप ही प्रादुर्भूत हुए। आप भूर्भुवः स्वः (तीनों व्याहृतियाँ)-स्वरूप हैं। आप विश्वरूप हैं तथा सदा जगत्के शीर्ष हैं। आप अद्वितीय हैं, आप प्रकृतिपुरुष द्विधारूप हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिधारूप ब्रह्म हैं। आप सबके आधार तथा देवताओंके ईश्वर हैं। शान्ति, पुष्टि तथा तुष्टि आप ही हैं। हुत, अहुत, विश्व, अविश्व, दत्त, अदत्त, कृत, अकृत, पर, अपर, प्रभु, ईश्वर आप ही हैं। आप शंकर ही साधुओं तथा असाधुओंके आश्रयरूप ब्रह्म हैं ॥ ४–६ ॥ |
| अपामसोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्।<br>किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृतं मर्त्यस्य ॥ ७ | हम उमासहित सदाशिवके सौन्दर्यामृतका अपने |
| ६४० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| | नेत्रपुटोंसे पान करें। फलतः अर्धनारीश्वर भगवान् शिवके दर्शनसे मुक्त हो जायें। शिवज्योतिको प्राप्तकर दिग्जयी कामादिको हम नहीं जानते; क्योंकि हम शिवाराधकोंका ये कामक्रोधादि शत्रु क्या करेंगे और मरणधर्मा इस शरीरादिकी मृत्यु या अमरतासे भी क्या प्रयोजन ? ॥ ७ ॥ | | एतज्जगद्धितं दिव्यमक्षरं सूक्ष्ममव्ययम्॥ ८<br>प्राजापत्यं पवित्रं च सौम्यमग्राह्यमव्ययम्।<br>अग्राह्येणापि वा ग्राह्यं वायव्येन समीरणः॥ ९<br>सौम्येन सौम्यं ग्रसति तेजसा स्वेन लीलया।<br>तस्मै नमोऽपसंहर्त्रे महाग्रासाय शूलिने॥ १० | यह जगत् शिवरूप है, जो हितकारक, दिव्य, नाशरहित, सूक्ष्म तथा शाश्वत है। आप प्राजापत्य (सर्वजनक), पावन, शान्त, अग्राह्य, अविनाशी, वायुसम्बन्धी स्पर्शगुणके कारण वायुरूप और अग्राह्य मनसे भी ग्राह्य हैं। आप अपने चन्द्रतेजसे भक्तोंके अन्तःकरणको लीलापूर्वक अपनेमें विलीन कर लेते हैं। महत्तत्त्वको भी अपना ग्रास बना लेनेवाले अपसंहर्ता उन भगवान् शूलीको नमस्कार है॥ ८-१०॥ | | हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणे प्रतिष्ठिताः।<br>हृदि त्वमसि यो नित्यं तिस्रो मात्राः परस्तु सः॥ ११ | हृदयदेशमें विराजमान तीनों मात्राएँ तथा सभी देवता हृदयके अधिकरण—प्राणमें प्रतिष्ठित हैं। जो प्राणरूप आप सबके हृदयमें नित्य विराजमान हैं, वह नाद नामक अर्धमात्रारूप आप ही हैं॥ ११॥ | | शिरश्चोत्तरतश्चैव पादौ दक्षिणतस्तथा।<br>यो वै चोत्तरतः साक्षात्स ओङ्कारः सनातनः॥ १२ | उत्तरवर्ती शिरस्थानीय अकार, दक्षिणवर्ती पादस्थानीय मकार, मध्यवर्ती मध्यस्थ उकार, यह उत्तरवर्ती अकारसे संश्लिष्ट जो साक्षात् ॐकार है, वह सनातन शिव ही है॥ १२॥ | | ओङ्कारो यः स एवेह प्रणवो व्याप्य तिष्ठति।<br>अनन्तस्तारसूक्ष्मं च शुक्लं वैद्युतमेव च॥ १३<br>परं ब्रह्म स ईशान एको रुद्रः स एव च।<br>भवान् महेश्वरः साक्षान्महादेवो न संशयः॥ १४ | यहाँ यह जो ॐ है, वही प्रणव सर्वव्यापी है [सबको व्याप्त करके रहता है]। अनन्त, तारक, सूक्ष्म, शुक्ल, ज्योतिर्मय, परब्रह्म ईशान अद्वितीय रुद्र भगवान् महेश्वर साक्षात् महादेव हैं, इसमें संशय नहीं है॥ १३-१४॥ | | ऊर्ध्वमुन्नामयत्येव स ओङ्कारः प्रकीर्तितः।<br>प्राणानवति यस्तस्मात्प्रणवः परिकीर्तितः॥ १५ | यह उच्चारण करते ही सारे शरीरको ऊपरकी ओर खींचता है, अतः इसे ओंकार कहा जाता है और प्राणोंकी रक्षा करता है, अतः प्रणव कहलाता है। | | सर्वं व्याप्नोति यस्तस्मात्सर्वव्यापी सनातनः।<br>ब्रह्मा हरिश्च भगवानाद्यन्तं नोपलब्धवान्॥ १६ | यह चराचर जगत्को व्याप्त करता है, इसलिये सर्वव्यापी सनातन कहा जाता है। ब्रह्मा, षडैश्वर्यवान् हरि तथा अन्य इन्द्रादिक भी इसके आदि और अन्तको न पा सके। | | तथान्ये च ततोऽनन्तो रुद्रः परमकारणम्।<br>यस्तारयति संसारात्तार इत्यभिधीयते॥ १७ | अतः इन परम कारण रुद्रको अनन्त कहा जाता है। ये संसारसे तारते हैं, अतः तार कहे जाते हैं। |
अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूक्ष्मो भूत्वा शरीराणि सर्वदा ह्यधितिष्ठति।<br>तस्मात्सूक्ष्मः समाख्यातो भगवान्नीललोहितः॥ १८<br><br>नीलश्च लोहितश्चैव प्रधानपुरुषान्वयात्।<br>स्कन्दतेऽस्य यतः शुक्रं तथा शुक्रमपैति च॥ १९ | सदा सूक्ष्मरूपसे सभी शरीरोंमें रहते हैं, अतः भगवान् नीललोहित सूक्ष्म कहलाते हैं। नील और लोहितरूप—प्रधान और पुरुषके संयोगसे इन सदाशिवका शुक्रांश स्कन्दित होता है और परम स्थानको प्राप्त होता है, अतः ये शुक्र कहे जाते हैं॥ १५—१९॥ |
| विद्योतयति यस्तस्माद्वैद्युतः परिगीयते।<br>बृहत्त्वाद्वृंहणत्वाच्च बृहते च परापरे॥ २०<br><br>तस्माद्बृंहति यस्माद्धि परं ब्रह्मेति कीर्तितम्।<br>अद्वितीयोऽथ भगवांस्तुरीयः परमेश्वरः॥ २१ | ये दीप्ति प्रदान करते हैं, अतः वैद्युत कहे जाते हैं। ये [शिव] पर तथा अपर (ऐहिक तथा आमुष्मिक) रूपोंका वर्धन तथा पोषण करते हैं, अतः वर्धन तथा पोषणगुणयुक्त होनेके कारण परब्रह्म कहे गये हैं। ये भगवान् परमेश्वर [स्वजातीय, विजातीय तथा स्वगतभेदशून्य होनेके कारण] अद्वितीय (एक) हैं तथा तुरीय भी हैं॥ २०-२१॥ |
| ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशां चक्षुरीश्वरम्।<br>ईशानमिन्द्रसूरयः सर्वेषामपि सर्वदा॥ २२<br><br>ईशानः सर्वविद्यानां यत्तदीशान उच्यते।<br>यदीक्षते च भगवान्निरीक्ष्यमिति चाज्ञया॥ २३<br><br>आत्मज्ञानं महादेवो योगं गमयति स्वयम्।<br>भगवांश्चोच्यते देवो देवदेवो महेश्वरः॥ २४ | इन्द्र आदि प्रमुख देवता इन शिवको इस जगत्का स्वामी, देवताओंका चक्षुस्वरूप तथा सभीका नित्य नियन्ता कहते हैं। ये सभी विद्याओंके स्वामी हैं, अतः 'ईशान' कहे जाते हैं। वे देवदेव महेश्वर महादेव स्वेच्छासे सभी भावोंको देखते हैं, अपना अवबोध कराते हैं और स्वयं योगकी प्राप्ति कराते हैं, अतः वे भगवान् कहे जाते हैं॥ २२—२४॥ |
| सर्वांल्लोकान् क्रमेणैव यो गृह्णाति महेश्वरः।<br>विसृजत्येष देवेशो वासयत्यपि लीलया॥ २५ | ये महेश्वर अपनी लीलासे ही क्रमसे सभी लोकोंको अपनेमें लीन करते हैं, उनकी सृष्टि करते हैं तथा उनका पालन भी करते हैं॥ २५॥ |
| एषो हि देवः प्रदिशोऽनुसर्वाः<br>पूर्वो हि जातः स उ गर्भे अन्तः।<br>स एव जातः स जनिष्यमाणः<br>प्रत्यङ्मुखास्तिष्ठति सर्वतोमुखः॥ २६ | ये ही शिव विश्वरूप होकर क्रीड़ा करते हुए सभी दिशाओंके रूपमें स्थित होते हैं। ये अनादिसिद्ध देव ब्रह्माण्डके उदरमें प्रविष्ट होकर स्वयं उत्पन्न होते हैं और आगे भी उत्पन्न होंगे। हे जीवो! ये सभी कालोंको व्याप्त करके स्थित रहते हैं॥ २६॥ |
| उपासितव्यं यत्नेन तदेतत्सद्भिरव्ययम्।<br>यतो वाचो निवर्तन्ते ह्यप्राप्य मनसा सह॥ २७<br><br>तद्ग्रहणमेवेह यद्वाग्वदति यत्नतः।<br>अपरं च परं वेति परायणमिति स्वयम्॥ २८<br><br>वदन्ति वाचः सर्वज्ञं शङ्करं नीललोहितम्।<br>एष सर्वो नमस्तस्मै पुरुषः पिङ्गलः शिवः॥ २९ | अतएव सज्जनोंको इन अविनाशी प्रभुकी प्रयत्नपूर्वक उपासना करनी चाहिये। इनका वर्णन करनेमें असमर्थ होनेके कारण तत्त्वनिरूपण किये बिना ही मनसहित वाणी लौट आती है। वाणी यत्नपूर्वक इनके विषयमें जो कुछ भी पर, अपर अथवा परायणरूपमें कहती है, वह उनका [वास्तविक] निर्वचन नहीं है। वाणी इन्हें सर्वज्ञ, शंकर तथा नीललोहित कहती है॥ २७-२८ १/२॥ |
| स एष स महारुद्रो विश्वं भूतं भविष्यति।<br>भुवनं बहुधा जातं जायमानमितस्ततः॥ ३० | ये सर्वस्वरूप, पुरुष, पिंगल तथा शिव हैं, इन्हें नमस्कार है। जो अनेक प्रकारसे उत्पन्न हो चुका है, |
| ६४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उत्पन्न है तथा उत्पन्न होगा—वह सम्पूर्ण प्राणिसमुदायस्वरूप चौदह भुवन इन महारुद्रका ही स्वरूप है॥ २९-३०॥ | |
| हिरण्यबाहुर्भगवान् हिरण्यपतिरीश्वरः।<br>अम्बिकापतिरीशानो हेमेरेता वृषध्वजः॥ ३१<br><br>उमापतिर्विरूपाक्षो विश्वसृग्विश्ववाहनः।<br>ब्रह्माणं विदधे योऽसौ पुत्रमग्रे सनातनम्॥ ३२<br><br>प्रहिणोति स्म तस्यैव ज्ञानमात्मप्रकाशकम्। | जो ये हिरण्यबाहु, भगवान्, हिरण्यपति, ईश्वर, अम्बिकापति, ईशान, हेमेरेता, वृषध्वज, उमापति, विरूपाक्ष, विश्वसृक् तथा विश्ववाहन संज्ञावाले शिव हैं, उन्होंने सबसे पहले सनातन ब्रह्माको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और उन्हें आत्माको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान प्रदान किया॥ ३१-३२¹/₂॥ |
| तमेकं पुरुषं रुद्रं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्॥ ३३<br><br>बालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये<br>विश्वं देवं वह्निरूपं वरेण्यम्।<br>तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-<br>स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ ३४ | जो धीर पुरुष उन अद्वितीय, पुरुष, बहुतोंके द्वारा आवाहन किये जानेवाले, बहुतोंके द्वारा स्तुत होनेवाले, हृदयके मध्यमें बालके अग्रभागके समान सूक्ष्मरूपसे विराजमान, विश्वेश्वर देव, अग्निरूप तथा सर्वश्रेष्ठ रुद्रको अपनेमें स्थित देखते हैं, उन्हींको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य लोगोंको नहीं॥ ३३-३४॥ |
| महतो यो महीयांश्च ह्यणोरप्यणुरव्ययः।<br>गुहायां निहितश्चात्मा जन्तोरस्य महेश्वरः॥ ३५<br><br>वेश्मभूतोऽस्य विश्वस्य कमलस्थो हृदि स्वयं।<br>गह्वरं गहनं तत्स्थं तस्यान्तश्चोर्ध्वतः स्थितः॥ ३६<br><br>तत्रापि दहं गगनमोङ्कारं परमेश्वरम्।<br>बालाग्रमात्रं तन्मध्ये ऋतं परमकारणम्॥ ३७<br><br>सत्यं ब्रह्म महादेवं पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्।<br>ऊर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमजोद्भवम्॥ ३८<br><br>अधितिष्ठति योनिं यो योनिं वाचैक ईश्वरः।<br>देहं पञ्चविधं येन तमीशानं पुरातनम्॥ ३९ | जो महान्से भी महान् हैं, अणुसे भी सूक्ष्म हैं तथा अव्यय हैं, वे महेश्वर प्राणियोंकी हृदयरूपी गुहामें आत्मरूपसे स्थित हैं। कमलपर स्थित रहनेवाले वे शिव इस विश्वके आलयभूत होते हुए भी प्राणियोंके हृदयमें स्वयं विद्यमान रहते हैं और उस हृदयकमलमें स्थित जो अयोगियोंके लिये दुर्ज्ञेय हृदयाकाश है, उसके भीतर तथा बाहर अग्निशिखाकी भाँति विराजमान हैं। उस अग्निशिखामें भी बालाग्रके समान सूक्ष्म जो दहरसंज्ञक आकाश है, उसके मध्यमें ऋत, परमकारणरूप, सत्य, ब्रह्मरूप, महादेव, पुरुष, अर्धनारीश्वर, ऊर्ध्वरेता, ईशान, त्रिनेत्र तथा अजोद्भव परमेश्वर ओंकाररूपमें स्थित हैं। एक अथवा अनेक रूपोंवाले वे ईश्वर भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रवेश करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे अन्नमय आदि पंचविध देह ग्रहण करते हैं—उन पुरातन ईशानको जो धीर पुरुष देखते हैं, उन्हें शान्ति प्राप्त होती है॥ ३५-३९॥ |
| प्राणेष्वन्तर्मनसो लिङ्गमाहु-<br>र्यस्मिन् क्रोधो या च तृष्णा क्षमा च।<br>तृष्णां छित्त्वा हेतुजालस्य मूलं<br>बुद्ध्याचिन्त्यं स्थापयित्वा च रुद्रे॥ ४० | वे [शिव] प्राणोंके भीतर स्थित हैं। उन्हें मनका स्वरूप कहा गया है, जिसमें क्रोध, तृष्णा, क्षमा आदि विद्यमान रहते हैं। भवबन्धनके हेतुके मूल कारणभूत तृष्णाका छेदन करके उसे रुद्रमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उनका चिन्तन करना चाहिये॥ ४०॥ |
अध्याय १८ ] देवताओंद्वारा भगवान् महेश्वरकी स्तुति ६४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एकं तमाहुर्वै रुद्रं शाश्वतं परमेश्वरम्।<br>परात्परतरं वापि परात्परतरं ध्रुवम्॥ ४१<br>ब्रह्मणो जनकं विष्णोर्वह्नेर्वायोः सदाशिवम्।<br>ध्यात्वाग्निना च शोध्याङ्गं विशोध्य च पृथक्पृथक्॥ ४२<br>पञ्चभूतानि संयम्य मात्राविधिगुणक्रमात्।<br>मात्राः पञ्च चतस्रश्च त्रिमात्राद्विस्ततः परम्॥ ४३<br>एकमात्रममात्रं हि द्वादशान्ते व्यवस्थितम्।<br>स्थित्वा स्थाप्यामृतो भूत्वा व्रतं पाशुपतं चरेत्॥ ४४ | उन्हीं एकमात्र रुद्रको शाश्वत, परमेश्वर, परात्परतरसे भी परात्परतर तथा ध्रुव कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि तथा वायुके जनक सदाशिवका ध्यान करके, अग्निबीज (रं)-से देहका शोधन करके पृथक्-पृथक् पंचभूतोंका विशोधन पुनः मात्राविधि-गुणके क्रमसे पाँच-चार-तीन-दो-एक—इन तन्मात्राओंका संयमन करके द्वादशारचक्रके अन्तमें विराजमान निर्गुण शिवको स्थापित करके तथा स्वयं वहाँ स्थित होकर अमृतरूप होकर पाशुपतव्रत करना चाहिये॥ ४१-४४॥ |
| एतद्व्रतं पाशुपतं चरिष्यामि समासतः।<br>अग्निमाधाय विधिवदृग्यजुःसामसम्भवैः॥ ४५<br>उपोषितः शुचिः स्नातः शुक्लाम्बरधरः स्वयम्।<br>शुक्लयज्ञोपवीती च शुक्लमाल्यानुलेपनः॥ ४६<br>जुहुयाद्विरजो विद्वान् विरजाश्च भविष्यति। | मैं इस पाशुपतव्रतको संक्षेपमें करूँगा—ऐसा संकल्प करके ऋक्, यजुः, सामके मन्त्रोंसे विधिपूर्वक अग्निस्थापन करके, उपवासपूर्वक स्नान करके शुद्ध होकर शुक्ल वस्त्र, शुक्ल यज्ञोपवीत, शुक्ल माला, शुक्ल चन्दन आदि धारण करके रजोगुणसे मुक्त होकर विद्वान् होम करे; इस प्रकार वह रजोगुणरहित हो जायगा॥ ४५-४६ १/२॥ |
| वायवः पञ्च शुध्यन्तां वाङ्मनश्चरणायः॥ ४७<br>श्रोत्रं जिह्वा ततः प्राणस्ततो बुद्धिस्तथैव च।<br>शिरः पाणिस्तथा पार्श्वं पृष्ठोदरमनन्तरम्॥ ४८<br>जङ्घे शिश्नमुपस्थं च पायुर्मेढ्रं तथैव च।<br>त्वचा मांसं च रुधिरं मेदोऽस्थीनि तथैव च॥ ४९<br>शब्दः स्पर्शं च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।<br>भूतानि चैव शुध्यन्तां देहे मेदादयस्तथा॥ ५०<br>अन्नं प्राणे मनो ज्ञानं शुध्यन्तां वै शिवेच्छया।<br>हुत्वाज्येन समिद्भिश्च चरुणा च यथाक्रमम्॥ ५१<br>उपसंहृत्य रुद्राग्निं गृहीत्वा भस्म यत्नतः।<br>अग्निरित्यादिना धीमान् विमृज्याङ्गानि संस्पृशेत्॥ ५२ | शिवकी इच्छासे [मेरे प्राण आदि] पाँचों वायु शुद्ध हों, वाणी, मन, पाद, कान, जिह्वा, प्राण, बुद्धि, सिर, हाथ, पार्श्वभाग, पृष्ठभाग, उदर, दोनों जाँघें, शिश्न, जननेन्द्रिय, गुदा, मेढ्र, त्वचा, मांस, रुधिर, मेद, अस्थियाँ, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पृथ्वी आदि [पंच] महाभूत तथा देहमें स्थित मेद आदि शुद्ध हों; अन्न, प्राण, मन तथा ज्ञान शुद्ध हों—इस प्रकार यथाक्रम आज्य (घृत), समिधा तथा चरुसे विरजाहोम करके रुद्राग्निका उपसंहरणकर यत्नपूर्वक 'अग्निरिति' मन्त्रसे भस्म ग्रहणकर उसे मल करके बुद्धिमान्को अंगोंमें लगाना चाहिये॥ ४७-५२॥ |
| एतत्पाशुपतं दिव्यं व्रतं पाशविमोचनम्।<br>ब्राह्मणानां हितं प्रोक्तं क्षत्रियाणां तथैव च॥ ५३<br>वैश्यानामपि योग्यानां यतीनां तु विशेषतः।<br>वानप्रस्थाश्रमस्थानां गृहस्थानां सतामपि॥ ५४<br>विमुक्तिर्विधिनानेन दृष्ट्वा वै ब्रह्मचारिणाम्।<br>अग्निरित्यादिना भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्॥ ५५<br>सोऽपि पाशुपतो विप्रो विमृज्याङ्गानि संस्पृशेत्।<br>भस्मच्छन्नो द्विजो विद्वान् महापातकसम्भवैः॥ ५६ | यह दिव्य पाशुपतव्रत बन्धनसे मुक्ति दिलानेवाला और ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, विशेषरूपसे योग्य (अदुष्ट तथा अपतित) यतियों, वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित रहनेवालों, सत्पुरुष गृहस्थों तथा ब्रह्मचारियोंके लिये हितकर कहा गया है, इस प्रकार विरजादीक्षासहित भस्म धारण करनेसे मुक्ति होती है—ऐसा जानकर 'अग्निरिति' इत्यादि मन्त्रसे अग्निहोत्रके भस्मको ग्रहण करके उसे मलकर अंगोंमें धारण करना चाहिये; ऐसा करनेवाला |
| ६४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| पापैर्विमुच्यते सद्यो मुच्यते च न संशयः।<br>वीर्यमग्नेर्यतो भस्म वीर्यवान् भस्मसंयुतः ॥ ५७<br><br>भस्मस्नानरतो विप्रो भस्मशायी जितेन्द्रियः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ५८<br><br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भूत्यङ्गं पूजयेद्बुधः।<br>रेरेकारो न कर्तव्यस्तुन्तुन्कारस्तथैव च ॥ ५९<br><br>न तत्क्षमति देवेशो ब्रह्मा वा यदि केशवः।<br>मम पुत्रो भस्मधारी गणेशश्च वरानने ॥ ६० | विप्र भी पाशुपत हो जाता है। भस्मसे अनुलिप्त विद्वान् द्विज महापापोंसे होनेवाले दोषोंसे शीघ्र मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। चूँकि अग्निका भस्म वीर्य (तेजरूप) होता है, अतः भस्म धारण करनेवाला वीर्यवान् (तेजस्वी) होता है। भस्मस्नानपरायण, भस्मशायी तथा जितेन्द्रिय विप्र सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवसायुज्य प्राप्त करता है; अतः बुद्धिमान्को चाहिये कि अंगोंमें विभूति (भस्म) धारण करनेवालेकी पूजा करे, उनके प्रति ‘रे’ अथवा ‘तुम’ शब्द नहीं बोलना चाहिये; हे वरानने! इसे देवेश शिव सहन नहीं करते हैं, ऐसा कहनेवाले चाहे ब्रह्मा, विष्णु अथवा भस्मधारी मेरे पुत्र गणेश ही क्यों न हों? ॥ ५३-६०॥ | | तेषां विरुद्धं यत्त्याज्यं स याति नरकार्णवम्।<br>गृहस्थो ब्रह्महीनोऽपि त्रिपुण्ड्रं यो न कारयेत् ॥ ६१<br><br>पूजा कर्म क्रिया तस्य दानं स्नानं तथैव च।<br>निष्फलं जायते सर्वं यथा भस्मनि वै हुतम् ॥ ६२<br><br>तस्माच्च सर्वकार्येषु त्रिपुण्ड्रं धारयेद्बुधः।<br>इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा स्तुत्वा देवैः समं प्रभुः ॥ ६३ | जो कुछ भी उन पाशुपतव्रत करनेवालोंके विरुद्ध हो, वह त्याज्य है; जो त्याग नहीं करता, वह नरकार्णवमें जाता है। तपस्या आदिसे रहित होते हुए भी जो गृहस्थ त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता है, उसके द्वारा की गयी पूजा, सत्कर्म, क्रिया, दान, स्नान—सब कुछ उसी भाँति निष्फल होता है, जैसे भस्ममें डाली गयी आहुति। अतः बुद्धिमान्को सभी सत्कर्मोंमें त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ६१-६२ १/२ ॥ | | भस्मच्छन्नैः स्वयं छन्नो विरराम विशाम्पते।<br>अथ तेषां प्रसादार्थं पशूनां पतिरीश्वरः ॥ ६४<br><br>सगणश्चाम्बया सार्धं सान्निध्यमकरोत्प्रभुः।<br>अथ सन्निहितं रुद्रं तुष्टुवुः सुरपुङ्गवम् ॥ ६५<br><br>रुद्राध्यायेन सर्वेशं देवदेवमुमापतिम्।<br>देवोऽपि देवानालोक्य घृणया वृषभध्वजः ॥ ६६<br><br>तुष्टोऽस्मीत्याह देवेभ्यो वरं दातुं सुरारिहा ॥ ६७ | हे विशाम्पते! इस प्रकार भस्ममाहात्म्य कहकर स्वयं भस्म धारण किये हुए प्रभु भगवान् ब्रह्मा भस्म धारण किये देवताओंके साथ शिवकी स्तुति करके [ध्यानानन्दमें मग्न होकर] शान्त हो गये। तदनन्तर उन देवताओंपर अनुग्रह करनेके लिये पशुपति प्रभु महेश्वर गणों तथा पार्वतीके साथ प्रकट हुए। इसके बाद वे देवता वहाँ उपस्थित सुरश्रेष्ठ, सर्वेश, देवदेव, उमापति रुद्रकी रुद्राध्यायसे स्तुति करने लगे। तब देवशत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान् वृषभध्वजने कृपापूर्ण दृष्टिसे देवोंको देखकर ‘मैं देवताओंको वर प्रदान करनेके लिये सन्तुष्ट हूँ’—ऐसा कहा ॥ ६३-६७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १८॥
१९- देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित नीललोहित पंचमुख सदाशिवके विराट्स्वरूपका दर्शन होना और उनकी पूजा एवं स्तुति करना
| अध्याय १९ ] | देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित पंचमुख सदाशिवका दर्शन | ६४५ |
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उन्नीसवाँ अध्याय
देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित नीललोहित पंचमुख सदाशिवके विराट्स्वरूपका दर्शन होना और उनकी पूजा एवं स्तुति करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शैलादिरुवाच<br>तं प्रभुं प्रीतमनसं प्रणिपत्य वृषध्वजम्।<br>अपृच्छन्मुनयो देवाः प्रीतिकण्टकितत्वचः॥ १ | शैलादि बोले— [हे सनत्कुमार!] प्रसन्न मनवाले उन प्रभु वृषध्वज शिवको प्रणाम करके हर्षसे रोमांचित शरीरवाले मुनियों तथा देवताओंने उनसे पूछा— ॥ १॥ |
| देवा ऊचुः<br>भगवन् केन मार्गेण पूजनीयो द्विजातिभिः।<br>कुत्र वा केन रूपेण वक्तुमर्हसि शङ्कर॥ २<br>कस्याधिकारः पूजायां ब्राह्मणस्य कथं प्रभो।<br>क्षत्रियाणां कथं देव वैश्यानां वृषभध्वज॥ ३<br>स्त्रीशूद्राणां कथं वापि कुण्डगोलादिनां तु वा।<br>हिताय जगतां सर्वमस्माकं वक्तुमर्हसि॥ ४ | देवता बोले— हे भगवन्! द्विजातिगण किस विधिसे, कहाँ और किस रूपसे आपका पूजन करें, हे शंकर! आप बतानेकी कृपा कीजिये। हे प्रभो! किस ब्राह्मणका [आपकी] पूजामें अधिकार है? हे देव! हे वृषध्वज! क्षत्रियों, वैश्यों, स्त्रियों, शूद्रों, कुण्ड-गोलक आदि वर्णसंकर लोगोंका आपकी पूजामें किस प्रकारसे अधिकार है? जगत्के कल्याणके लिये हमें यह सब बतानेका अनुग्रह करें॥ २–४॥ |
| सूत उवाच<br>तेषां भावं समालोक्य मुनीनां नीललोहितः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा मण्डलस्थः सदाशिवः॥ ५<br>मण्डले चाग्रतो पश्यन् देवदेवं सहोमया।<br>देवाश्च मुनयः सर्वे विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ६<br>अष्टबाहुं चतुर्वक्त्रं द्वादशाक्षं महाभुजम्।<br>अर्धनारीश्वरं देवं जटामुकुटधारिणम्॥ ७<br>सर्वाभरणसंयुक्तं रक्तमाल्यानुलेपनम्।<br>रक्ताम्बरधरं सृष्टिस्थितिसंहारकारकम्॥ ८ | सूतजी बोले— उन देवताओं और मुनियोंकी भक्ति देखकर सूर्यमण्डलमें स्थित नीललोहित सदाशिव गम्भीर वाणीमें बोले। उस अवसरपर सभी देवताओं और मुनियोंने सामने देखा कि सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले देवदेव शिव सूर्यमण्डलमें उमाके साथ विराजमान हैं, करोड़ों विद्युत्के समान उनकी प्रभा है, वे आठ भुजाओं, चार मुखों तथा बारह नेत्रोंसे शोभा पा रहे हैं, वे बड़ी-बड़ी भुजाओंसे युक्त हैं, वे प्रभु अर्धनारीश्वररूपमें हैं, वे जटाजूटरूपी मुकुट धारण किये हुए हैं, वे सभी आभरणोंसे समन्वित हैं और रक्तवर्णकी माला, चन्दन तथा वस्त्र धारण किये हुए हैं॥ ५–८॥ |
| तस्य पूर्वमुखं पीतं प्रसन्नं पुरुषात्मकम्।<br>अघोरं दक्षिणं वक्त्रं नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ९<br>दंष्ट्राकरालमत्युग्रं ज्वालामालासमावृतम्।<br>रक्तश्मश्रुं जटायुक्तं चोत्तरे विद्रुमप्रभम्॥ १०<br>प्रसन्नं वामदेवाख्यं वरदं विश्वरूपिणम्।<br>पश्चिमं वदनं तस्य गोक्षीरधवलं शुभम्॥ ११<br>मुक्ताफलमयैर्हारैर्भूषितं तिलकोज्ज्वलम्।<br>सद्योजातमुखं दिव्यं भास्करस्य स्मरारिणः॥ १२ | उनका पूर्वमुख तत्पुरुषसंज्ञक था, जो पीतवर्ण तथा प्रसन्नतासे युक्त था, उनका अघोर नामक दक्षिणमुख नीले अंजनके तुल्य, विकराल दाढ़ोंसे युक्त, अत्यन्त उग्र, ज्वालासमूहसे समावृत, रक्तवर्णकी दाढ़ीसे युक्त और जटाओंसे सुशोभित था, उत्तर दिशामें उनका वामदेव नामक मुख था, जो प्रवालमणिके सदृश प्रभासे युक्त, प्रसन्न, वरदायक तथा विश्वरूप था और उन कामरिपु भास्कररूप शिवका पश्चिममुख सद्योजात नामवाला था, जो गौके दुग्धके समान धवल, सुन्दर, मुक्ताफलसे युक्त |
| ६४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हारोंसे सुशोभित, तिलकसे प्रकाशित तथा अत्यन्त दिव्य था॥ ९-१२॥ | |
| आदित्यमग्रतोऽपश्यन्पूर्ववच्चतुराननम् ।<br>भास्करं पुरतो देवं चतुर्वक्त्रं च पूर्ववत्॥ १३<br><br>भानुं दक्षिणतो देवं चतुर्वक्त्रं च पूर्ववत्।<br>रविमुत्तरतोऽपश्यन्पूर्ववच्चतुराननम् ॥ १४<br><br>विस्तारां मण्डले पूर्वे उत्तरां दक्षिणे स्थिताम्।<br>बोधनीं पश्चिमे भागे मण्डलस्य प्रजापतेः॥ १५<br><br>अध्यायनीं च कौबेर्यामेकवक्त्रां चतुर्भुजाम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्नाः शक्तयः सर्वसम्मताः॥ १६ | उन्होंने आगेकी ओर शिवके ही सदृश चार मुखोंवाले आदित्यको, पूर्वकी ओर शिवसदृश चतुर्मुख भगवान् भास्करको, दक्षिणकी ओर शिवतुल्य चतुर्मुख प्रभु भानुको और उत्तरकी ओर शिवके ही समान चतुर्मुख रविको देखा। इसी प्रकार उन देवताओंने सूर्यमण्डलकी पूर्वदिशामें देवी विस्ताराको, दक्षिणमें उत्तराको, पश्चिमभागमें बोधनीको और उत्तरदिशामें एक मुख तथा चार भुजाओंवाली अध्यायनीको विराजमान देखा। सबकी पूज्य ये शक्तियाँ सभी आभरणोंसे सम्पन्न थीं॥ १३-१६॥ |
| ब्रह्माणं दक्षिणे भागे विष्णुं वामे जनार्दनम्।<br>ऋग्यजुःसाममार्गेण मूर्तित्रयमयं शिवम्॥ १७<br><br>ईशानं वरदं देवमीशानं परमेश्वरम्।<br>ब्रह्मासनस्थं वरदं धर्मज्ञानासनोपरि॥ १८<br><br>वैराग्यैश्वर्यसंयुक्ते प्रभूते विमले तथा।<br>सारं सर्वेश्वरं देवमाराध्यं परमं सुखम्॥ १९<br><br>सितपङ्कजमध्यस्थं दीप्ताद्यैरभिसंवृतम्।<br>दीप्तां दीपशिखाकारां सूक्ष्मां विद्युत्प्रभां शुभाम्॥ २०<br><br>जयामग्निशिखाकारां प्रभां कनकसुप्रभाम्।<br>विभूतिं विद्रुमप्रख्यां विमलां पद्मसंनिभाम्॥ २१<br><br>अमोघां कर्णिकाकारां विद्युत्तं विश्ववर्णिनीम्।<br>चतुर्वक्त्रां चतुर्वर्णां देवीं वै सर्वतोमुखीम्॥ २२<br><br>सोममङ्गारकं देवं बुधं बुद्धिमतां वरम्।<br>बृहस्पतिं बृहद्बुद्धिं भार्गवं तेजसां निधिम्॥ २३<br><br>मन्दं मन्दगतिं चैव समन्तात्तस्य ते सदा।<br>सूर्यः शिवो जगन्नाथः सोमः साक्षादुमा स्वयं॥ २४<br><br>पञ्चभूतानि शेषाणि तन्मयं च चराचरम्।<br>दृष्ट्वैव मुनयः सर्वे देवदेवमुमापतिम्॥ २५ | देवताओं तथा मुनियोंने उनके दाहिनी ओर ब्रह्माको और बायीं ओर जनार्दन विष्णुको देखा। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके क्रमसे [ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णुमय रूपमें] तीन विग्रहोंसे सुशोभित सबके स्वामी, वरद, ईशान, वरदायक, परमेश्वर शिवको धर्मज्ञानके आसनपर ब्रह्मासनमें स्थित देखा। उन्होंने वैराग्य तथा ऐश्वर्यसे सुशोभित विशाल तथा विमल आसनपर श्वेत कमलके मध्यमें विराजमान सबके स्वामी, देवताओंके आराध्य, सर्वोपरि तथा सुखदायक शिवको दीप्ता आदि [नौ] शक्तियोंसे आवृत देखा। उन देवताओं और मुनियोंने प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान दीप्ताको, विद्युत्प्रभाके समान शुभ सूक्ष्माको, अग्निशिखाके आकारवाली जयाको, सुवर्णके कान्तिसदृश प्रभाको, विद्रुम (मूँगा)-के समान वर्णवाली विभूतिको, कमलसदृश विमलाको, कमलकी कर्णिकाके रूपवाली अमोघाको, अनेक वर्णोंवाली देवी विद्युत्को, चार मुखों और चार वर्णोंवाली देवी सर्वतोमुखीको, चन्द्रमाको, मंगलको, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देव बुधको, महान् बुद्धिवाले बृहस्पतिको, तेजोनिधि शुक्रको और मन्दगतिवाले शनैश्चरको सदा उन शिवके चारों ओर स्थित देखा। स्वयं जगत्स्वामी शिवरूप सूर्य, साक्षात् उमारूप चन्द्र और गगनादि पंचमहाभूतरूप भौम आदि पाँच ग्रह हैं, इन्हींसे चराचर जगत् व्याप्त है। इस प्रकार देवदेव उमापति सदाशिवको देखते ही सभी मुनियोंको पूजाविधिका ज्ञान |
अध्याय १९] देवताओं तथा मुनियोंको सूर्यमण्डलमें उमासहित पंचमुख सदाशिवका दर्शन ६४७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| कृताञ्जलिपुटाः सर्वे मुनयो देवतास्तथा।<br>अस्तुवन् वाग्भिरिष्टाभिर्वरदं नीललोहितम्॥ २६ | हो गया और उन सभी मुनियों तथा देवताओंने हाथ जोड़कर अभिलषित वाणीद्वारा वर प्रदान करनेवाले नीललोहित भगवान् शिवकी स्तुति की॥ १७—२६॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>नमः शिवाय रुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे।<br>मीढुष्टमाय शर्वाय शिपिविष्टाय रंहसे॥ २७<br>प्रभूते विमले सारे ह्याधारे परमे सुखे।<br>नवशक्त्यावृतं देवं पद्मस्थं भास्करं प्रभुम्॥ २८<br>आदित्यं भास्करं भानुं रविं देवं दिवाकरम्।<br>उमां प्रभां तथा प्रज्ञां सन्ध्यां सावित्रिकामपि॥ २९<br>विस्तारामुत्तरां देवीं बोधनीं प्रणमाम्यहम्।<br>आप्यायनीं च वरदां ब्रह्माणं केशवं हरम्॥ ३० | ऋषिगण बोले— शिव, रुद्र, कद्रुद्र, प्रचेता, मीढुष्टम, शर्व, शिपिविष्ट तथा रंहको नमस्कार है। विशाल, विमल, श्रेष्ठ तथा परम सुखदायक आसनपर विराजमान, नौ शक्तियोंसे आवृत तथा कमलके मध्यमें स्थित भगवान् भास्करको, आदित्य-भास्कर-भानु, रवि, देव तथा दिवाकरको उमा, प्रभा, प्रज्ञा, सन्ध्या, सावित्रिका, विस्तारा, उत्तरा, देवी बोधनी, वर प्रदान करनेवाली आप्यायनी, ब्रह्मा, केशव तथा हरको मैं प्रणाम करता हूँ॥ २७—३०॥ |
| सोमादिवृन्दं च यथाक्रमेण<br>सम्पूज्य मन्त्रैर्विहितक्रमेण।<br>स्मरामि देवं रविमण्डलस्थं<br>सदाशिवं शङ्करमादिदेवम्॥ ३१ | विहित विधिसे मन्त्रोंके द्वारा यथाक्रम सोम आदिका सम्यक् पूजन करके मैं सूर्यमण्डलमें विराजमान सदाशिव आदिदेव भगवान् शंकरका स्मरण करता हूँ॥ ३१॥ |
| इन्द्रादिदेवांश्च तथेश्वरांश्च<br>नारायणं पद्मजमादिदेवम्।<br>प्रागाद्यधोध्वं च यथाक्रमेण<br>वज्रादिपद्मं च तथा स्मरामि॥ ३२ | इन्द्र आदि आठ दिक्पालोंका, उनके अधिदेवताओंका, नारायणका, आदिदेव ब्रह्माका, यथाक्रम पूर्व आदि आठ दिशाओंका, ऊर्ध्व तथा अधः दिशाओंका और वज्र, पद्म आदिका स्मरण करता हूँ॥ ३२॥ |
| सिन्दूरवर्णाय समण्डलाय<br>सुवर्णवज्राभरणाय तुभ्यम्।<br>पद्माभनेत्राय सपङ्कजाय<br>ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय ॥ ३३ | सिन्दूरके समान वर्णवाले, मण्डलयुक्त, सुवर्ण तथा हीरेके आभरणोंसे सुशोभित, कमलसदृश नेत्रोंवाले, कमल धारण करनेवाले तथा ब्रह्मा-इन्द्र-नारायणके भी कारणरूप सदाशिवको नमस्कार है॥ ३३॥ |
| रथं च सप्ताश्वमनूरुवीरं<br>गणं तथा सप्तविधं क्रमेण।<br>ऋतुप्रवाहेण च वालखिल्यान्<br>स्मरामि मन्देहगणक्षयं च॥ ३४ | मैं सूर्यके रथको, सात घोड़ोंको, पराक्रमी अरुणको, वसन्तादि ऋतुक्रमसे व्यवस्थित सप्तविध गणोंको, वालखिल्य आदि ऋषियोंको तथा मन्देह नामक असुरोंके विनाशको स्मृति-पथपर लाता हूँ॥ ३४॥ |
| हुत्वा तिलाद्यैर्विविधैस्तथाग्नौ<br>पुनः समाप्यैव तथैव सर्वम्।<br>उद्वास्य हृत्पङ्कजमध्यसंस्थं<br>स्मरामि बिम्बं तव देवदेव॥ ३५ | हे देवदेव! तिल आदि विविध पदार्थोंसे अग्निमें हवन करके पुनः सम्पूर्ण कृत्यका समापन करके हृदयकमलके मध्य संस्थित आपके बिम्बको मण्डलसे निकालकर मैं स्मरण करता हूँ॥ ३५॥ |
| स्मरामि बिम्बानि यथाक्रमेण<br>रक्तानि पद्मामललोचनानि। | मैं क्रमशः आपके रक्तबिम्बोंका, पद्मके समान निर्मल नेत्रोंका, दाहिने हाथमें स्थित पद्म, बायें हाथमें स्थित वरद मुद्राका तथा शोभासम्पन्न आभूषणोंका स्मरण करता हूँ॥ ३६॥ |
२०- पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा
| ६४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| पद्मं च सव्ये वरदं च वामे<br>करे तथा भूषितभूषणानि ॥ ३६<br>दंष्ट्राकरालं तव दिव्यवक्त्रं<br>विद्युतप्रभं दैत्यभयङ्करं च।<br>स्मरामि रक्षाभिरतं द्विजानां<br>मन्देहरक्षोगणभर्त्सनं च ॥ ३७ | मैं विकराल दाढ़ोंवाले, विद्युत्की कान्तिवाले, दैत्योंके लिये भयकारक, ब्राह्मणोंकी रक्षामें संलग्न तथा मन्देह नामक राक्षससमुदायकी भर्त्सना करनेवाले आपके दिव्य मुखका स्मरण करता हूँ ॥ ३७॥ |
| सोमं सितं भूमिजमग्निवर्णं<br>चामीकराभं बुधमिन्दुसूनुम् ।<br>बृहस्पतिं काञ्चनसन्निकाशं<br>शुक्रं सितं कृष्णतरं च मन्दम् ॥ ३८<br>स्मरामि सव्यमभयं वाममूरुगतं वरम् ।<br>सर्वेषां मन्दपर्यन्तं महादेवं च भास्करम् ॥ ३९ | श्वेतवर्णवाले चन्द्रमा, अग्निवर्णके तुल्य मंगल, धत्तूर-वृक्षके समान आभावाले चन्द्रपुत्र बुध, सुवर्णकी आभावाले बृहस्पति, श्वेत वर्णवाले शुक्र, अत्यन्त कृष्ण-वर्णवाले शनि—इस प्रकार शनिपर्यन्त सप्तग्रहरूपामक सभी ग्रहोंके परम कारण तथा दाहिने हाथमें अभय मुद्रा और बायें हाथको अपने उरुदेशमें स्थित करके वरद मुद्रा धारण करनेवाले भास्कररूप महादेवका स्मरण करता हूँ ॥ ३८-३९॥ |
| पूर्णेन्दुवर्णेन च पुष्पगन्ध-<br>प्रस्थेन तोयेन शुभेन पूर्णम् ।<br>पात्रं दृढं ताम्रमयं प्रकल्प्य<br>दास्ये तवार्घ्यं भगवन् प्रसीद ॥ ४०<br>नमः शिवाय देवाय ईश्वराय कपर्दिने ।<br>रुद्राय विष्णवे तुभ्यं ब्रह्मणे सूर्यमूर्तये ॥ ४१ | पूर्ण चन्द्रमाके समान वर्णवाले तथा पुष्पगन्ध फैलानेवाले पवित्र जलसे पूरित दृढ़ ताम्रपात्रको प्रकल्पित करके मैं आपको अर्घ्य प्रदान करता हूँ। हे भगवन्! प्रसन्न होइये। ईश्वर, कपर्दी, रुद्र, विष्णुरूप, ब्रह्मस्वरूप, सूर्यमूर्ति आप भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ ४०-४१॥ |
| सूत उवाच<br>यः शिवं मण्डले देवं सम्पूज्यैवं समाहितः ।<br>प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने पठेत्स्तवमनुत्तमम् ॥ ४२<br>इत्थं शिवेन सायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥ ४३ | सूतजी बोले—[हे ऋषिगण!] इस प्रकार जो मनुष्य एकनिष्ठ होकर सूर्यमण्डलमें भगवान् शिवका विधिपूर्वक पूजन करके प्रातः, मध्याह्न तथा सायंवेलामें इस उत्तम स्तोत्रका पाठ करता है, वह शिवके साथ सायुज्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४२-४३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवपूजनवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवपूजनवर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अथ रुद्रो महादेवो मण्डलस्थः पितामहः ।<br>पूज्यो वै ब्राह्मणानां च क्षत्रियाणां विशेषतः ॥ १<br>वैश्यानां नैव शूद्राणां शुश्रूषां पूजकस्य च ।<br>स्त्रीणां नैवाधिकारोऽस्ति पूजादिषु न संशयः ॥ २<br>स्त्रीशूद्राणां द्विजेन्द्रैश्च पूजया तत्फलं भवेत् ।<br>नृपाणामुपकारार्थं ब्राह्मणाद्यैर्विशेषतः ॥ ३<br>एवं सम्पूजयेयुर्वै ब्राह्मणाद्याः सदाशिवम् ।<br>इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रस्तत्रैवान्तरधात्स्वयम् ॥ ४ | [हे ऋषिगण!] सूर्यमण्डलमें स्थित पितामह महादेव रुद्र ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्योंके विशेषरूपसे पूज्य हैं, वे शूद्रोंके पूज्य नहीं हैं, उन्हें तो शिवपूजककी सेवा करनी चाहिये, स्त्रियोंको भी पूजा आदिमें अधिकार नहीं है, इसमें संशय नहीं है। द्विजेन्द्रोंके द्वारा की गयी पूजासे ही स्त्रियों तथा शूद्रोंको मण्डलपूजाका फल प्राप्त हो जाता है। राजाओंके उपकारके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणके द्वारा विशेषरूपसे पूजा की जानी चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मण आदिको विधिवत् |
अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा | ६४९
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| ते देवा मुनयः सर्वे शिवमुद्दिश्य शङ्करम्।<br>प्रणेमुश्च महात्मानो रुद्रध्यानेन विह्वलाः ॥ ५<br>जग्मुर्यथागतं देवा मुनयश्च तपोधनाः।<br>तस्मादभ्यर्चयेन्नित्यमादित्यं शिवरूपिणम् ॥ ६<br>धर्मकामार्थमुक्त्यर्थं मनसा कर्मणा गिरा। | सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये—ऐसा कहकर भगवान् रुद्र वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥ १—४ ॥<br><br>इसके बाद वे समस्त देवता तथा महान् आत्मावाले मुनिगण कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरको उद्देश्य करके प्रणाम करने लगे। तदनन्तर देवता तथा तपोधन मुनलोग प्रसन्न होकर रुद्रका ध्यान करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। अतएव धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मन-वचन-कर्मसे शिवरूप आदित्यकी नित्य पूजा करनी चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>रोमहर्षण सर्वज्ञ सर्वशास्त्रभृतां वर ॥ ७<br>व्यासशिष्य महाभाग वाह्येयं वद साम्प्रतम्।<br>शिवेन देवदेवेन भक्तानां हितकाम्यया ॥ ८<br>वेदात् षडङ्गादुद्धृत्य सांख्ययोगाच्च सर्वतः।<br>तपश्च विपुलं तप्त्वा देवदानवदुश्चरम् ॥ ९<br>अर्थदेशादिसंयुक्तं गूढमज्ञाननिन्दितम्।<br>वर्णाश्रमकृतैर्धर्मैर्विपरीतं क्वचित्समम् ॥ १०<br>शिवेन कथितं शास्त्रं धर्मकामार्थमुक्तये।<br>शतकोटिप्रमाणेन तत्र पूजा कथं विभोः ॥ ११<br>स्नानयोगादयो वापि श्रोतुं कौतूहलं हि नः। | ऋषिगण बोले—हे रोमहर्षण ! हे सर्वज्ञ ! सभी शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले हे व्यासशिष्य ! हे महाभाग ! अब आप हमें वाह्येय (अग्निपुराणोक्त) शिवपूजाकी विधि बताइये। भक्तोंके कल्याणके लिये देवाधिदेव शिवने देवताओं तथा दानवोंके लिये दुश्चर कठोर तप करके षडंग वेदसे तथा सांख्ययोगसे भलीभाँति ग्रहण करके अर्थ-देश आदिसे युक्त, गूढ़, अविवेकियोंके द्वारा निन्दित, वर्णाश्रमकृत धर्मोंसे कहीं-कहीं विपरीत तथा कहीं-कहीं अनुकूल जिस शतकोटि प्रमाणवाले शास्त्रको धर्म-अर्थ-काम-मोक्षहेतु कहा है, उसमें उन सर्वव्यापी शिवकी पूजा, स्नान, योग आदिका क्या विधान है? उसे सुननेकी हमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ७–११ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>पुरा सनत्कुमारेण मेरुष्पृष्ठे सुशोभने ॥ १२<br>पृष्टो नन्दीश्वरो देवः शैलादिः शिवसम्मतः।<br>पृष्टोऽयं प्रणिपत्यैवं मुनिमुख्यैश्च सर्वतः ॥ १३<br>तस्मै सनत्कुमाराय नन्दिना कुलन्दिना।<br>कथितं यच्छिवज्ञानं शृण्वन्तु मुनिपुङ्गवाः ॥ १४<br>शैव संङ्क्षिप्य वेदोक्तं शिवेन परिभाषितम्।<br>स्तुतिनिन्दादिरहितं सद्यः प्रत्ययकारकम् ॥ १५<br>गुरुप्रसादजं दिव्यमनायासेन मुक्तिदम्। | सूतजी बोले—पूर्वकालमें सनत्कुमारने अत्यन्त सुन्दर मेरुशिखरपर शिवजीके प्रिय शैलादि भगवान् नन्दीश्वरसे यही बात पूछी थी। प्रणाम करके श्रेष्ठ मुनियोंने भी इनसे ऐसा ही पूछा था। हे मुनीश्वरो ! तब अपने कुलको आनन्दित करनेवाले नन्दीने उन सनत्कुमारको जिस शिवज्ञानका उपदेश किया था, उसे आपलोग सुनें। स्वयं शिवके द्वारा संक्षिप्त करके परिभाषित किया गया वह शिवज्ञान वेदप्रतिपादित, निन्दा आदिसे रहित, शीघ्र ही श्रद्धा उत्पन्न करनेवाला, गुरुकृपासे प्राप्त होनेवाला, दिव्य तथा अनायास ही मुक्ति देनेवाला है ॥ १२–१५ १/२ ॥ |
| सनत्कुमार उवाच<br>भगवन् सर्वभूतेश नन्दीश्वर महेश्वर ॥ १६ | सनत्कुमार बोले—हे भगवन् ! हे सर्वभूतेश ! हे नन्दीश्वर ! हे महेश्वर ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके |
| ६५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कथं पूजादयः शम्भोर्धर्मकामार्थमुक्तये ।<br>वक्तुमर्हसि शैलादे विनयेनागताय मे ॥ १७ ॥ | लिये शिवकी पूजा आदिका क्या विधान है? हे शैलादे ! विनयपूर्वक मुझ आये हुएको यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १६-१७ ॥ |
| सूत उवाच<br>सम्प्रेक्ष्य भगवान्नन्दी निशम्य वचनं पुनः ।<br>कालवेलाधिकाराद्यामवदद्वदतां वरः ॥ १८ ॥ | सूतजी बोले—[ हे मुनीश्वरो !] उनकी ओर देखकर तथा पुनः उनका वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् नन्दी समुचित समय उपस्थित जानकर उनसे कहने लगे ॥ १८ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>गुरुतः शास्त्रतश्चैवमधिकारं ब्रवीम्यहम् ।<br>गौरवादेव संज्ञाैषा शिवाचार्यस्य नान्यथा ॥ १९ ॥<br>स्वयमाचरते यस्तु आचारे स्थापयत्यपि ।<br>आचिनोति च शास्त्रार्थानाचार्यस्तेन चोच्यते ॥ २० ॥ | **शैलादि बोले—**गुरु तथा शास्त्रसे प्राप्त ज्ञानके आधारपर मैं अधिकार (पात्रता)-के विषयमें बता रहा हूँ। गौरवके कारण ही शिवशास्त्रके आचार्यकी 'गुरु'—यह संज्ञा होती है, इसके विपरीत नहीं। जो स्वयं आचरण करता है, [दूसरोंको भी] आचारमें स्थापित करता है तथा शास्त्रके अर्थज्ञानका संग्रह करता है, वह आचार्य कहा जाता है ॥ १९-२० ॥ |
| तस्माद्वेदार्थतत्त्वज्ञमाचार्यं भस्मशायिनम् ।<br>गुरुमन्वेषयेद्भक्तः सुभगं प्रियदर्शनम् ॥ २१ ॥<br>प्रतिपन्नं जनान्दं श्रुतिस्मृतिपथानुगम् ।<br>विद्याभयदातारं लौल्यचापल्यवर्जितम् ॥ २२ ॥<br>आचारपालकं धीरं समयेषु कृतास्पदम् ।<br>तं दृष्ट्वा सर्वभावेन पूजयेच्छिववद्गुरुम् ॥ २३ ॥<br><br>आत्मना च धनेनैव श्रद्धावित्तानुसारतः ।<br>तावदाराधयेच्छिष्यः प्रसन्नोऽसौ यथा भवेत् ॥ २४ ॥<br>सुप्रसन्ने महाभागे सद्यः पाशक्षयो भवेत् ।<br>गुरुर्मान्यो गुरुः पूज्यो गुरुरेव सदाशिवः ॥ २५ ॥ | अतः भक्तको चाहिये कि वह वेदार्थतत्त्वज्ञ, भस्म धारण करनेवाले, सुशील, प्रिय दर्शनवाले, सम्मानित लोगोंको आनन्दित करनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिमें प्रतिपादित मार्गका अनुसरण करनेवाले, विद्यासे अभय प्रदान करनेवाले, लालच तथा चपलतासे रहित, आचारका पालन करनेवाले, धैर्यशाली तथा सन्ध्या आदिकालोंमें समुचित स्थानपर स्थित रहनेवाले आचार्य गुरुका अन्वेषण करे। उस गुरुको प्राप्त करके अनन्य भावसे शिवकी ही भाँति उनका पूजन करना चाहिये। शिष्यको चाहिये कि वह शरीरसे, धनसे तथा श्रद्धा-विश्वासके अनुसार गुरुकी वैसी सेवा करे, जिससे वे प्रसन्न हो जायें। महाभाग गुरुके प्रसन्न हो जानेपर शीघ्र पाश (बन्धन)-का क्षय हो जाता है। गुरु मान्य हैं, गुरु पूज्य हैं, गुरु साक्षात् सदाशिव ही हैं ॥ २१-२५ ॥ |
| संवत्सरत्रयं वाथ शिष्यान् विप्रान् परीक्षयेत् ।<br>प्राणद्रव्यप्रदानेन आदेशैश्च इतस्ततः ॥ २६ ॥<br>उत्तमश्चाधमे योज्यो नीच उत्तमवस्तुषु ।<br>आकृष्टस्ताडिता वापि ये विषादं न यान्ति वै ॥ २७ ॥<br>ते योग्याः शिवधर्मिष्ठाः शिवधर्मपरायणाः ।<br>संयता धर्मसम्पन्नाः श्रुतिस्मृतिपथानुगाः ॥ २८ ॥ | गुरुको भी चाहिये कि प्रिय वस्तुके प्रदानसे तथा इधर-उधर अनेक कार्योंके लिये आदेशोंद्वारा तीन वर्षोंतक ब्राह्मण-शिष्योंकी परीक्षा करे। उत्तम [शिष्य]-को अधम कार्यमें तथा अधमको उत्तम कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये। गुरुके द्वारा आकृष्ट तथा ताड़ित होनेपर भी जो शिष्य विषादको प्राप्त नहीं होते, वे ही शिवधर्मके अधिकारी हैं। शिवधर्मिष्ठ, शिवधर्मपरायण, जितेन्द्रिय, धर्मसम्पन्न, श्रुति-स्मृतिके मार्गका अनुसरण करनेवाले, |
अध्याय २० ] पाशुपतयोग एवं शैवी दीक्षाका वर्णन तथा शिवयोगकी महिमा ६५१
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वद्वन्द्वसहा धीरा नित्यमुद्युक्तचेतसः ।<br>परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः ॥ २९<br><br>आर्जवा मार्दवाः स्वस्था अनुकूलाः प्रियंवदाः ।<br>अमानिनो बुद्धिमन्तस्त्यक्तस्पर्धा गतस्पृहाः ॥ ३०<br><br>शौचाचारगुणोपेता दम्भमात्सर्यवर्जिताः ।<br>योग्या एवं द्विजाः सर्वे शिवभक्तिपरायणाः ॥ ३१<br><br>एवंवृत्तसमोपेता वाङ्मनःकायकर्मभिः ।<br>शोध्या एवंविधाश्चैव तत्त्वानां च विशुद्धये ॥ ३२<br><br>शुद्धो विनयसम्पन्नो मिथ्याकटुकवर्जितः ।<br>गुर्वाज्ञापालकश्चैव शिष्योऽनुग्रहमर्हति ॥ ३३ | [सुख-दुःख आदि] सभी द्वन्द्वोंको सहनेवाले, धैर्यशाली, सदा उद्योगशील चित्तवाले, परोपकारमें लगे रहनेवाले, गुरुसेवामें निरत, सरल तथा मृदु स्वभाववाले, स्वस्थचित्त, गुरुके अनुकूल, प्रिय बोलनेवाले, मानरहित, बुद्धिसम्पन्न, स्पर्धाविहीन, कामनाशून्य, शौच-आचार आदि गुणोंसे युक्त, दम्भ तथा मात्सर्यसे विहीन—इस प्रकारके शिवभक्तिपरायण सभी द्विज शिष्य होनेके अधिकारी हैं। [इन्द्रिय आदि चौबीस] तत्त्वोंकी शुद्धिके लिये मन-वाणी-कर्मसे इन आचरणोंसे सम्पन्न इस प्रकारके शिष्योंका शोधन करना चाहिये। शुद्ध हृदयवाले, विनयसे सम्पन्न, मिथ्या तथा कटुभाषणसे रहित और गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला शिष्य ही गुरुकृपाके योग्य होता है ॥ २६–३३ ॥ |
| गुरुश्च शास्त्रवित्प्राज्ञस्तपस्वी जनवत्सलः ।<br>लोकाचाररतो ह्येवं तत्त्वविन्मोक्षदः स्मृतः ॥ ३४ | शास्त्रज्ञ, बुद्धिमान्, तपस्वी, लोकप्रिय, लोकाचारमें रत तथा तत्त्वज्ञानी गुरु मोक्ष देनेमें समर्थ बताया गया है। |
| सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः ।<br>सर्वोपायविधानज्ञस्तत्त्वहीनस्य निष्फलम् ॥ ३५ | गुरु सभी लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त शास्त्रोंमें निष्णात तथा सभी उपायोंके विधानको जाननेवाला भी हो, किंतु यदि वह आत्मज्ञानसे रहित हो, तो सब कुछ निष्फल है। |
| स्वसंवेद्ये परे तत्त्वे निश्चयो यस्य नात्मनि ।<br>आत्मनोऽनुग्रहो नास्ति परस्यानुग्रहः कथम् ॥ ३६ | स्वयं अनुभूत किये जानेवाले परात्मतत्त्वमें जिसकी निश्चित धारणा न हो, उसका अपना ही कल्याण नहीं है, तो उसके द्वारा दूसरेका कल्याण कैसे सम्भव है ? |
| प्रबुद्धस्तु द्विजो यस्तु स शुद्धः साधयत्यपि ।<br>तत्त्वहीने कुतो बोधः कुतो ह्यात्मपरिग्रहः ॥ ३७ | जो आत्मज्ञानी द्विज है, वह स्वयं शुद्ध है और दूसरोंको भी शुद्ध कर देता है। तत्त्वहीन गुरुमें बोध कहाँसे होगा और उसका आत्मोद्धार कैसे होगा! |
| परिग्रहविनिर्मुक्तास्ते सर्वे पशवोदिताः ।<br>पशुभिः प्रेरिता ये तु सर्वे ते पशवः स्मृताः ॥ ३८ | जो आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे सब पशु कहे गये हैं। पशुतुल्य द्विजके द्वारा जो शिष्य ज्ञानप्रेरित किये जाते हैं, वे सब भी पशु ही कहे गये हैं। |
| तस्मात्तत्त्वविदो ये तु ते मुक्ता मोचयन्त्यपि ।<br>संवित्तिजननं तत्त्वं परानन्दसमुद्भवम् ॥ ३९ | अतः जो लोग तत्त्ववेत्ता हैं, वे ही मुक्त हैं और दूसरोंको भी मुक्त कर सकते हैं। आत्मबोध उत्पन्न करनेवाला तत्त्व परानन्दको उत्पन्न करता है। |
| तत्त्वं तु विदितं येन स एवानन्ददर्शकः ।<br>न पुनर्नाममात्रेण संवित्तिरहितस्तु यः ॥ ४० | उस तत्त्वको जिसने जान लिया, वही परमानन्दका दर्शन करानेमें समर्थ है, नाममात्रका गुरु ऐसा नहीं कर सकता। |
| अन्योन्यं तारयेन्नैव किं शिला तारयेच्छिलाम् ।<br>येषां तन्नाममात्रेण मुक्तिर्वै नाममात्रिका ॥ ४१ | जो आत्मज्ञानविहीन है, वह दूसरेको कभी नहीं तार सकता, क्या [कोई] शिला दूसरी |
| ६५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| योगिनां दर्शनाद्वापि स्पर्शनाद्भाषणादपि।<br>सद्यः सञ्जायते चाज्ञा पाशोपक्षयकारिणी॥ ४२<br><br>अथवा योगमार्गेण शिष्यदेहं प्रविश्य च।<br>बोधयेदेव योगेन सर्वतत्त्वानि शोध्य च॥ ४३<br><br>षडर्धशुद्धिर्विहिता ज्ञानयोगेन योगिनाम्।<br>शिष्यं परीक्ष्य धर्मज्ञं धार्मिकं वेदपारगम्॥ ४४<br><br>ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं बहुदोषविवर्जितम्।<br>ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य कर्णात्कर्णागतेन तु॥ ४५<br><br>दीपाद्दीपो यथा चान्यः सञ्चरेद्विधिवद्गुरुः।<br>भौवनं च पदं चैव वर्णाख्यं मात्रमुत्तमम्॥ ४६<br><br>कालाध्वरं महाभाग तत्त्वाख्यं सर्वसम्मतम्।<br>भिद्यते यस्य सामर्थ्यादाज्ञामात्रेण सर्वतः॥ ४७<br><br>तस्य सिद्धिश्च मुक्तिश्च गुरुकारुण्यसम्भवा।<br>पृथिव्यादीनि भूतानि आविशन्ति च भौवने॥ ४८<br><br>शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च भावतः।<br>पदं वर्णाख्यकं विप्र बुद्धीन्द्रियविकल्पनम्॥ ४९<br><br>कर्मेन्द्रियाणि मात्रं हि मनो बुद्धिरतः परम्।<br>अहङ्कारमथाव्यक्तं कालाध्वरमिति स्मृतम्॥ ५०<br><br>पुरुषादिविरिञ्च्यन्तमुन्मनत्वं परात्परम्।<br>तथेशत्वमिति प्रोक्तं सर्वतत्त्वार्थबोधकम्॥ ५१<br><br>अयोगी नैव जानाति तत्त्वशुद्धिं शिवात्मिकाम्॥ ५२ | शिलाको [नदी आदिसे] पार करा सकती है। जिनका नाममात्रका ज्ञान है, उनकी मुक्ति भी नाममात्रकी होती है॥ ३४-४१॥<br><br>योगियोंके दर्शन, स्पर्श तथा भाषणमात्रसे ही बन्धनका नाश करनेवाला अनुग्रह शीघ्र ही होता है। अथवा गुरुको योगमार्गसे शिष्यके देहमें प्रवेश करके योगके द्वारा सभी तत्त्वोंका शोधन करके शिष्यको ज्ञान प्रदान करना चाहिये। योगियोंके लिये ज्ञानयोगसे तीन गुणोंकी शुद्धि विहित है। गुरुको चाहिये कि धर्मको जाननेवाले, धर्मपरायण, वेदमें पारंगत तथा समस्त दोषोंसे रहित ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य शिष्यकी सम्यक् परीक्षा करके ज्ञानसे ज्ञेयको देखकर गुरुपरम्परासे प्राप्त मार्गके द्वारा एक दीपकसे दूसरे दीपककी भाँति विधिपूर्वक उसे बोधमय करे॥ ४२-४५ १/२॥<br><br>भौवन, पद, वर्ण, मात्रा एवं कालाध्वरसंज्ञक—ये तत्त्व सर्वसम्मत एवं उत्तम हैं। हे महाभाग सनत्कुमार! गुरुके आज्ञामात्रके प्रभावसे जिस शिष्यकी इन तत्त्वोंकी संसारोन्मुखता नष्ट हो जाती है, उसी शिष्यको गुरुकारुण्यसमुत्पन्न सिद्धि और मुक्ति मिल जाती है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचमहाभूत भौवन पदवाच्य हैं अथवा इनका समावेश भौवनमें होता है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये अपने स्वभावसे पद कहलाते हैं। हे विप्र! श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिह्वा, घ्राण—ये पंचज्ञानेन्द्रियाँ वर्णसंज्ञक हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ—ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ मात्रसंज्ञक हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार—इस अन्तःकरण-चतुष्टयको कालाध्वर कहा गया है। मानवीय आनन्दसे लेकर ब्रह्मानन्दपर्यन्त [ब्रह्मापदपर्यन्त] उन्मनी अवस्था [अमनस्कत्व] श्रेष्ठसे श्रेष्ठतर है तथा सर्वतत्त्व-प्रकाशक ईशत्व इनसे भी श्रेष्ठ कहा गया है। इस कल्याणस्वरूपा तत्त्वशुद्धिको योगज्ञानशून्य प्राणी नहीं जानता है॥ ४६-५२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवपूजनोपायवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें ‘शिवपूजनोपायवर्णन’ नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २०॥
२१- शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य
अध्याय २१] शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य ६५३
इक्कीसवाँ अध्याय
शिवदीक्षाविधि-वर्णन एवं शिवार्चनका माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गन्धवर्णरसादिभिः।<br>अलङ्कृत्य वितानाद्यैरीश्वरावाहनक्षमाम्॥ १<br>एकहस्तप्रमाणेन् मण्डलं परिकल्पयेत्।<br>आलिखेत्कमलं मध्ये पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ २<br>चूर्णैरष्टदलं वृत्तं सितं वा रक्तमेव च।<br>परिवारेण संयुक्तं बहुशोभासमन्वितम्॥ ३<br>आवाह्य कर्णिकायां तु शिवं परमकारणम्।<br>अर्चयेत्सर्वयत्नेन यथाविभवविस्तरम्॥ ४ | गन्ध, वर्ण, रस आदिसे भलीभाँति भूमिकी परीक्षा करके ईश्वरके आवाहनयोग्य उस स्थानको वितान (चाँदनी) आदिसे अलंकृत करके वहाँ एक हाथ मापका मण्डल बनाना चाहिये। उसके मध्यमें चूर्णोंके द्वारा पंचरत्नसमन्वित श्वेत या रक्तवर्ण गोल अष्टदल कमलकी रचना करनी चाहिये। तत्पश्चात् [उस कमलकी] कर्णिकामें परिवारसे युक्त, अति शोभामय परम कारण शिवका आवाहन करके अपने सामर्थ्यके अनुसार पूर्ण प्रयत्नसे उनका पूजन करना चाहिये॥ १–४॥ |
| दलेषु सिद्धयः प्रोक्ताः कर्णिकायां महामुने।<br>वैराग्यज्ञाननालं च धर्मकन्दं मनोरमम्॥ ५<br>वामा ज्येष्ठा च रौद्री च काली विकरणी तथा।<br>बलविकरणी चैव बलप्रमथिनी क्रमात्॥ ६<br>सर्वभूतस्य दमनी केसरेषु च शक्तयः।<br>मनोन्मनी महामाया कर्णिकायां शिवासने॥ ७<br>वामदेवादिभिः सार्धं द्वन्द्वन्यायेन विन्यसेत्।<br>मनोन्मनं महादेवं मनोन्मन्याथ मध्यतः॥ ८ | हे महामुने! कर्णिकाके कमलदलोंमें [अणिमा आदि आठ] सिद्धियाँ स्थित बतायी गयी हैं। वैराग्य-ज्ञानरूप उसका नाल है तथा धर्मरूप उसका मनोरम कन्द (मूल) है। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथिनी और सर्वभूतदमनी—क्रमशः ये आठ शक्तियाँ केसरोमें स्थित हैं तथा महामायारूपा मनोन्मनी शिवासनरूप कर्णिकामें विराजमान हैं; उन-उन स्थानोंमें उनका ध्यान करना चाहिये। वामदेव आदिके साथ इन वामा आदि आठ शक्तियोंका तथा मध्यमें देवी मनोन्मनीके साथ मनोन्मन महादेवकी दाम्पत्यरूपसे प्रतिष्ठा करनी चाहिये॥ ५–८॥ |
| सूर्यसोमाग्निसम्बन्धात्प्रणवाख्यं शिवात्मकम्।<br>पुरुषं विन्यसेद्वक्त्रं पूर्वे पत्रे रविप्रभम्॥ ९<br>अघोरं दक्षिणे पत्रे नीलाञ्जनचयोपमम्।<br>उत्तरे वामदेवाख्यं जपाकुसुमसन्निभम्॥ १०<br>सद्यं पश्चिमपत्रे तु गोक्षीरधवलं न्यसेत्।<br>ईशानं कर्णिकायां तु शुद्धस्फटिकसन्निभम्॥ ११ | सूर्य-चन्द्र-अग्निके सम्बन्धसे प्रणव नामक सूर्यतुल्य प्रभाववाले शिवरूप तत्पुरुषका [कमलके] पूर्व पत्रमें न्यास करना चाहिये। नीलांजनसदृश अघोरका दक्षिण पत्रमें, जपाकुसुमके समान वर्णवाले वामदेव नामक शिवका उत्तर पत्रमें, गोदुग्धके समान धवल सद्योजातका पश्चिम पत्रमें और शुद्ध स्फटिकके समान कान्तिवाले ईशानका कमलकी कर्णिकामें न्यास करना चाहिये॥ ९–११॥ |
| चन्द्रमण्डलसङ्काशं हृदयायेति मन्त्रतः।<br>वाह्नये रुद्रदिग्भागे शिरसे धूम्रवर्चसे॥ १२<br>शिखायै च नमश्चेति रक्ताभे नैर्ऋते दले।<br>कवचायाञ्जनाभाय इति वायुदले न्यसेत्॥ १३ | चन्द्रमण्डलसङ्काशाय हृदयाय नमः—इस मन्त्रसे अग्निकोणके दलमें, धूम्रवर्चसे शिरसे नमः—इस मन्त्रसे ईशानकोणके दलमें, रक्ताभाय शिखायै नमः—इस मन्त्रसे नैर्ऋत्यकोणके दलमें और अञ्जनाभाय |
६५४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अस्त्रायाग्निशिखाभाय इति दिक्षु प्रविन््यसेत्।<br>नेत्रेभ्यश्चेति चैशान्यां पिङ्गलेभ्यः प्रविन््यसेत्॥ १४<br>शिवं सदाशिवं देवं महेश्वरमतः परम्।<br>रुद्रं विष्णुं विरिञ्चिं च सृष्टिन्यायेन भावयेत्॥ १५ | कवचाय नमः—इस मन्त्रसे वायव्यकोणके दलमें न्यास करना चाहिये। अग्निशिखाभाय अस्त्राय नमः—इस मन्त्रसे [ऊर्ध्व आदि] दिशाओंमें न्यास करना चाहिये और पिङ्गलेभ्यो नेत्रेभ्यो नमः—इस मन्त्रसे ईशान दिशामें न्यास करना चाहिये। तदनन्तर शिव सदाशिव देव महेश्वर रुद्र, विष्णु और विरिंचि (ब्रह्मा)-की सृष्टिके सृजन, पालन और संहारके क्रमसे भावना करनी चाहिये॥ १२–१५॥ |
| शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे।<br>शान्ताय शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा॥ १६<br>वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्ससे।<br>कालायै च प्रतिष्ठायै तारकायान्तकाय च॥ १७<br>निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च।<br>मन्त्रैरेतैर्महाभूतविग्रहं च सदाशिवम्॥ १८<br>ईशानमुकुटं देवं पुरुषास्यं पुरातनम्।<br>अघोरहृदयं हृष्टं वामगुह्यं महेश्वरम्॥ १९<br>सद्यमूर्तिं स्मरेद्देवं सदसद्व्यक्तिकारणम्।<br>पञ्चवक्त्रं दशभुजमष्टत्रिंशत्कलामयम्॥ २० | शिवाय रुद्ररूपाय शान्त्यतीताय शम्भवे। शान्ताय शान्तदैत्याय नमश्चन्द्रमसे तथा॥ वेद्याय विद्याधाराय वह्नये वह्निवर्ससे। कालायै च प्रतिष्ठायै तारकायान्तकाय च॥ निवृत्त्यै धनदेवाय धारायै धारणाय च—इन [पाँच] मन्त्रोंसे ईशानरूप मुकुट, तत्पुरुषरूप मुख, अघोररूप हृदय, वामदेवरूप गुह्यदेश तथा सद्योजात switch/रूप सम्पूर्ण विग्रहवाले, सत्-असत्की अभिव्यक्तिके कारणभूत, पुरातन, प्रसन्न तथा आकाश आदि पंचमहाभूतके विग्रहवाले महेश्वर सदाशिवका स्मरण करना चाहिये, जो पाँच मुख तथा दस भुजाओंसे सुशोभित और अड़तीस कलाओंवाले हैं। |
| सद्यमष्टप्रकारेण प्रभिद्य च कलामयम्।<br>वामं त्रयोदशविधैर्विभिद्य विततं प्रभुम्॥ २१<br>अघोरमष्टधा कृत्वा कलारूपेण संस्थितम्।<br>पुरुषं च चतुर्धा वै विभज्य च कलामयम्॥ २२<br>ईशानं पञ्चधा कृत्वा पञ्चमूर्त्या व्यवस्थितम्।<br>हंसंसेति मन्त्रेण शिवभक्त्या समन्वितम्॥ २३ | कलामय सद्योजातका आठ प्रकारसे विभाग करके, महाप्रभु वामदेवका तेरह भेदोंसे विभाग करके, कलारूपमें स्थित अघोरका आठ प्रकारसे विभाग करके, कलामय तत्पुरुषका चार प्रकारसे विभाग करके और पाँच मूर्तियोंमें व्यवस्थित ईशानका पाँच प्रकारसे विभाग करके उनका ध्यान करना चाहिये। |
| ओङ्कारमात्रमोङ्कारमकारं समरूपिणम्।<br>आ ई ऊ ए तथा अम्बानुक्रमेणात्मरूपिणम्॥ २४<br>प्रधानसहितं देवं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्।<br>अणोरणीयां समजं महतोऽपि महत्तम्॥ २५<br>उर्ध्वरेतसमीशानं विरूपाक्षमुमापतिम्।<br>सहस्रशिरसं देवं सहस्राक्षं सनातनम्॥ २६<br>सहस्रहस्तचरणं नादान्तं नादविग्रहम्।<br>खद्योतसदृशाकारं चन्द्ररेखाकृतिं प्रभुम्॥ २७<br>द्वादशान्ते ध्रुवोर्मध्ये तालुमध्ये गले क्रमात्।<br>हृद्देशेऽवस्थितं देवं स्वानन्दममृतं शिवम्॥ २८ | हंसहंसाय विद्महे परमहंसाय धीमहि। तन्नो हंसः प्रचोदयात्—इस हंसगायत्रीमन्त्रसे शिवभक्तिसे युक्त, ब्रह्मरूप, प्रणवरूप, अकाररूप, ब्रह्मतुल्यरूपवाले, आ-ई-ऊ-ए अर्थात् क्रमसे देवी-गणेश-सूर्य-विष्णुस्वरूप, प्रकृतियुक्त, उत्पत्ति-प्रलयसे रहित, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, महान्से भी महान्, ऊर्ध्वरेता, विरूपाक्ष, उमापति, हजार सिरोंवाले, हजार नेत्रोंवाले, हजार हाथ तथा चरणोंवाले, सनातन, नादान्त (प्रणवरूप), नादप्रतिपाद्य विग्रहवाले, सूर्यके समान आकारवाले, चन्द्ररेखासे युक्त विग्रहवाले, मूर्धा-भ्रूमध्य-तालुमध्य-कण्ठ तथा हृदयमें क्रमसे विराजमान, अपने आनन्दमें मग्न, अमृतस्वरूप, |