श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
७९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अधिक अच्छा है, ज्ञानकी अपेक्षा ध्यानकी योग्यता अधिक है, ध्यानकी अपेक्षा कमफलका त्याग ( श्रेष्ठ है) और (इस कर्मफलके) त्यागसे तुरंतही शांति ( प्राप्त होती है) है। | [ कर्मयोगकी दृष्टिसे ये श्लोक अत्यंत महत्त्वके हैं। इन श्लोकोंमें भक्ति- | युक्त कर्मयोगके सिद्ध होनेके लिये अभ्यास, ज्ञान-भजन आदि साधन बतलाकर, | इनके और अन्य साधनोंके तारतम्यका विचार करके अंतमें - अर्थात् १२ वें | श्लोकमें - कर्मफलके त्यागकी, अर्थात् निष्काम कर्मयोगकी, श्रेष्ठता वर्णित | है। निष्काम कर्मयोगकी श्रेष्ठताका वर्णन कुछ यहीं नहीं है; किंतु तीसरे | (३.८), पाँचवें (५. २), छठे (६. ४६) अध्यायोंमेंभी यही अर्थ स्पष्ट रीतिसे | वर्णित है; और उसके अनुसार फलत्यागरूप कर्मयोगका आचरण करनेके लियेभी | स्थान-स्थानपर अर्जुनको उपदेश किया है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३०९-३१०)। | परंतु जिनका संप्रदाय गीता-धर्मसे जुदा है, उनके लिये यह बात प्रतिकूल है, | इसलिये उन्होंने ऊपरके श्लोकोंका और विशेषतया १२ वें श्लोकके पदोंका अर्थ | बदलनेका प्रयत्न किया है। निरे ज्ञान-मार्गी अर्थात् सांख्य-टीकाकारोंको यह | पसंद नही है, कि ज्ञानकी अपेक्षा कर्मफलका त्याग श्रेष्ठ बतलाया जावे, इसलिये | उन्होंने कहा है, कि या तो ज्ञान शब्दसे 'पुस्तकोंका ज्ञान' लेना चाहिये, अथवा | कर्मफलत्यागकी इस प्रशंसाको अर्थवादात्मक याने कोरी प्रशंसा समझनी चाहिये । | इसी प्रकार पातंजलयोगमार्गवालोंको अभ्यासकी अपेक्षा कर्मफलत्यागका बड़प्पन | नहीं सुहाता; और कोरे भक्ति-मार्गवालोंको - अर्थात् जो कहते हैं, कि भक्तिको | छोड़ दूसरे कोईभी कर्म न करो, उनको - ध्यानकी अपेक्षा अर्थात् भक्तिकी | अपेक्षा कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता मान्य नहीं है। वर्तमान समयमें लुप्त-सा हो | गया है, पातंजलयोग, ज्ञान और भक्ति, गीताका भक्तियुक्त कर्म योग-संप्रदाय | इन तीनों संप्रदायोंसे भिन्न, है और इसीसे उस संप्रदायका कोई टीकाकारभी | नहीं पाया जाता है। अतएव आजकल गीतापर जितनी टीकाएँ पाई जाती हैं, | उनमें कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता अर्थवादात्मक समझी गई है। परंतु हमारी रायमें | यह भूल है। गीतामें निष्काम कर्म योगकोही प्रतिपाद्य मान लेनेसे इस श्लोकके | अर्थके विषयमें कोईभी अड़चन नही रहती। यदि मान लिया जाय, कि कर्म | छोड़नेसे निर्वाह नही होता, निष्काम कर्म करनाही चाहिये; तो स्वरूपतः कर्मोंको | त्यागनेवाला ज्ञान-मार्ग कर्मयोगसे हलका जँचने लगता है; और इंद्रियोंकी कोरी | कसरत करनेवाला पातंजलयोग, अथवा सभी कर्मोंको छोड़ देनेवाला भक्ति-मार्गभी | कर्मयोगकी अपेक्षा कम योग्यताका सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार निष्काम | कर्मयोगकी श्रेष्ठता प्रमाणित हो जानेपर यही प्रश्न रह जाता है, कि कर्मयोगमें | आवश्यक भक्तियुक्त साम्य-बुद्धिको प्राप्त करनेके लिये उपाय क्या है ? ये उपाय | तीन हैं - अभ्यास, ज्ञान और ध्यान। इनमेंसे यदि किसीसे अभ्यास न सधे, तो
बारहवाँ अध्याय ७९७ वह ज्ञान अथवा ध्यानमेंसे किसीभी उपायको स्वीकार कर ले । गीताका कथन है, कि इन उपायोंका आचरण करना यथोक्त क्रमसे सुलभ है। १२ वें श्लोकमें कहा है, कि यदि इनमेंसे एकभी उपाय न सधे, तो मनुष्यको चाहिये, कि वह कर्मयोगके आचरण करनेकाही एकदम आरंभ कर दे । अब यहाँ एक शंका यह होती है, कि जिससे अभ्यास नहीं सधता, और जिससे ज्ञान-ध्यानभी नहीं होता, वह कर्मयोग करेगाही कैसे ? अतः कई एकोंने निश्चय किया है, कि कर्म- योगको सबकी अपेक्षा सुलभ कहनाही निरर्थक है। परंतु विचार करनेसे दीख पड़ेगा, कि इस आक्षेपमें कुछभी जान नहीं है। १२ वें श्लोकमें यह नहीं कहा है, कि सब कर्मोंके फलोंका 'एकदम' त्याग कर दे, वरन् यह कहा है, कि पहले भगवानके बतलाये हुए कर्मयोगका आश्रय करके, अर्थात् ततः, तदनंतर धीरे धीरे इस बातको अंतमें सिद्ध कर ले। और ऐसा अर्थ करनेसे कुछभी विसंगति नहीं रह जाती। पिछले अध्यायोंमें कह चुके हैं, कि कर्मफलके स्वल्प आचरणसेही नहीं (गीता २.४०), किंतु जिज्ञासा (गीता ६.४४ और टिप्पणी) हो जानेसेभी मनुष्य, कोल्हूमें धरे जैसे आप-ही-आप अंतमें सिद्धिकी ओर खींचा चला जाता है। अतएव उस मार्गकी सिद्धि पानेका पहला साधन या सीढ़ी यही है, कि कर्म- योगका आश्रय करना चाहिये - अर्थात् इस मार्गसे जानेकी मनमें इच्छा होनी चाहिये। कौन कह सकता है, कि यह साधन अभ्यास, ज्ञान और ध्यानकी अपेक्षा सुलभ नहीं है १२ वें श्लोकका भावार्थभी यही है। न केवल भगवद्गीताहीमें, किंतु सूर्य-गीतामेंभी कहा है :- ज्ञानादुपास्तिरुत्कृष्टा कर्मोत्कृष्टमुपासनात् । इति यो वेद वेदान्तैः स एव पुरुषोत्तमः ॥ “जो इस वेदान्त तत्त्वको जानता है, कि ज्ञानकी अपेक्षा उपासना अर्थात् ध्यान या भक्ति उत्कृष्ट है, एवं उपासनाकी अपेक्षा कर्म अर्थात् निष्काम कर्म श्रेष्ठ है, वही पुरुषोत्तम है" (सूर्यगी. ४. ३७)। सारांश, भगवद्गीताका निश्चित मत यह है, कि कर्मफल-त्यागरूपी योग अर्थात् ज्ञान-भक्तियुक्त निष्काम कर्मयोगही सब मार्गोंमें श्रेष्ठ है; और इसके अनुकूलही नहीं, प्रत्युत पोषक युक्तिवाद १२ वें श्लोकमें है। यदि दूसरे किसी संप्रदायको वह न रुचे, तो वे उसे छोड़ दें, परंतु अर्थकी व्यर्थ खींचातानी न करें। इस प्रकार कर्मफल-त्यागको श्रेष्ठ सिद्ध करके, उस मार्गसे जानेवालेको (स्वरूपतः कर्म छोड़नेवालेको नहीं) जो सम और शांत स्थिति अंतमें प्राप्त होती है, उसका वर्णन करके अब भगवान् बतलाते हैं, कि ऐसाही भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है:- ]
७९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मे भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥ यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥ समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥ (१३) जो किसीसे द्वेष नहीं करता, जो सब भूतोंके साथ मित्रतासे बर्तता है, जो कृपालू है, जो ममत्व-बुद्धि और अहंकारसे रहित है, जो दुःख और सुखमें समान है, एवं जो क्षमाशील है, (१४) जो सदा संतुष्ट, संयमी तथा दृढ निश्चयी है, जिसने अपने मन और बुद्धिको मुझमें अर्पणकर दिया है, वह मेरा (कर्म-)योगी भक्त मुझको प्यारा है। (१५) जिससे न तो लोगोंको क्लेश होता है और न जो लोगोंसेभी क्लेश पाता है, ऐसेही जो हर्ष, क्रोध, भय और विषादसे अलिप्त है, वही मुझे प्रिय है। (१६) मेरा वही भक्त मुझे प्यारा है, कि जो निरपेक्ष, पवित्र और दक्ष है, अर्थात् किसीभी कामको आलस्य छोडकर करता है, जो (फलके विषयमें) उदासीन है, जिसे कोईभी विकार डिगा नहीं सकता, और जिसने (काम्य फलके) सब आरंभ याने उद्योग छोड़ दिये हैं। (१७) जो न (किसीभी बातका) आनंद मानता है, न द्वेष करता है, जो न शोक करता है और न इच्छाभी रखता है, जिसने (कर्मके) शुभ और अशुभ (फल) छोड़ दिये हैं, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है। (१८) जिसे शत्रु और मित्र, मान और अपमान, सर्दी और गर्मी, सुख और दुःख समान हैं, और जिसे (किसीमेभी) आसक्ति नहीं है, (१९) जिसे निंदा और स्तुति दोनों एकसी हैं, जो मितभाषी है, एवं जो कुछ मिल जावे उसीमें संतुष्ट है, जिसका चित्त स्थिर है, और जो अनिकेत है अर्थात् जिसका (कर्म-फलाशारूप) ठिकाना कहींभी नहीं रह गया है, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्यारा है।
बारहवाँ अध्याय ७९९ [ 'अनिकेत' शब्द उन यतियोंके वर्णनोंमेंभी अनेक बार आया करता है, कि जो गृहस्थाश्रम छोड, संन्यास धारण करके भिक्षा माँगते हुए जंगलोंमें घूमते रहते हैं (मनु. ६. २५) और इसका धात्वर्थ 'बिना घरवाला' है। अतः इस अध्यायके 'निर्मम', 'सर्वारंभपरित्यागी' और 'अनिकेत' शब्दोंसे, तथा गीतामें अन्यत्र 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' (गीता ४. २१), अथवा 'विविक्तसेवी', (गीता १८. ५२) इत्यादि जो शब्द हैं, उनके आधारसे संन्यास-मार्गवाले टीकाकार कहते हैं, कि संन्यासाश्रम मार्गका यह परम ध्येय - "घर-द्वार छोड़ कर बिना किसी इच्छाके जंगलोंमें आयुके दिन बिताना)" - ही गीतामें प्रतिपाद्य है; और इसके लिये वे स्मृति-ग्रंथोंके संन्यास-आश्रम प्रकरणके श्लोकोंका प्रमाण दिया करते हैं। गीता-वाक्योंके ये निरे संन्यास-प्रतिपादक अर्थ संन्यास-संप्रदायकी दृष्टिसे महत्त्वके हो सकते हैं, किंतु वे सच्चे नहीं हैं। क्योंकि गीताके अनुसार 'निरग्नि' अथवा 'निष्क्रिय' होना 'सच्चा' संन्यास नहीं है; और पीछे कई बार गीताका यह स्थिर सिद्धान्त कहा जा चुका है (गीता ५. २; ६. १, २), कि केवल फलाशाको छोड़ना चाहिये, न कि कर्मको। अतः 'अनिकेत' पदका 'घर-द्वार छोड़ना' अर्थ न करके, ऐसा करना चाहिये कि जिसका गीताके कर्मयोगके साथ मेल मिल सके। गीताके ४. २० वें श्लोकमें कर्मफलकी आशा न रखनेवाले पुरुषकोही 'निराश्रय' विशेषण लगाया गया है; और गीता ६. १ में उसी अर्थमें 'अनाश्रितः कर्मफलं' शब्द आये हैं। 'आश्रय' और 'निकेत' इन दोनों शब्दोंका अर्थ एकही है। अतएव अनिकेतका गृहत्यागी अर्थ न करके, ऐसा करना चाहिये, कि आदिमें जिसके मनका स्थान फँसा नहीं है। इसी प्रकार ऊपर १६ वें श्लोकमें जो 'सर्वारंभपरित्यागी' शब्द है, उसका अर्थभी "सारे कर्म या उद्योगोंको छोडनेवाला" नहीं करना चाहिये, किंतु गीता ४.१९ में जो यह कहा है, कि "जिसके समारंभ फलाशा- विरहित हैं, उसके कर्म ज्ञानसे दग्ध हो जाते हैं" वैसाही अर्थ याने "काम्य आरंभ अर्थात् कर्म छोड़नेवाला" करना चाहिये, - यह बात गीता १८.२; ८१. ४९ से सिद्ध होती है। सारांश, जिसका चित्त घर-गृहस्थीमें, बाल- बच्चोंमें अथवा संसारके अन्यान्य कामोंमें उलझा रहता है, उसको आगे उसमे दुःख होता है। अतएव गीताका इतनाही कहना है, कि इन सब बातोंमें चित्तको फँसने न दें; और मनकी इसी विरक्त स्थितिको प्रकट करनेके लिये गीताके 'अनिकेत' और 'सर्वारंभपरित्यागी' आदि शब्द स्थितप्रज्ञके वर्णनमें आया करते हैं। यही शब्द यतियोंके अर्थात् कर्म त्यागनेवाले संन्यासियोंके वर्णनोंमेंभी स्मृतिग्रंथोंमें आये हैं। पर सिर्फ इसी बुनियादपर यह नहीं कहा जा सकता, कि कर्मत्यागरूप संन्यासही गीतामें प्रतिपाद्य है। क्योंकि, इसके साथही गीताका यह दूसराभी निश्चित सिद्धान्त है, कि जिसकी बुद्धिमें वैराग्य पूर्णतः भिद गया
८०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीता सुपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ । हो, उस ज्ञानी पुरुषकोभी इसी विरक्त-बुद्धिसे फलाशा छोड़कर शास्त्रतः प्राप्त । होनेवाले सब कर्म करतेही रहना चाहिये । इस समूचे पूर्वापर संबंधको बिना । समझे, गीतामें जहाँ कहीं 'अनिकेत' को जोडके वैराग्यबोधक शब्द मिल जावें, । तो उन्हींपर सारा दारामदार रख कर यह कह देना ठीक नहीं है, कि गीतामें । कर्मसंन्यास-प्रधान मार्गही प्रतिपाद्य है । ] (२०) ऊपर बतलाये हुए इस अमृततुल्य धर्मका जो मत्परायण होते हुए श्रद्धासे आचरण करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं । । [ यह वर्णन पहले हो चुका है ( गीता ६. ४७; ७. १८ ), कि भक्ति- । मान् ज्ञानी पुरुष सबसे श्रेष्ठ है; उस वर्णनके अनुसार भगवानने इस श्लोकमें । बतलाया है, कि उनका अत्यंत प्रिय कौन है, अर्थात् यहाँ परम भगवद्भक्त । कर्मयोगीका वर्णन किया है । पर भगवान्ही गीता ९. २९ वें श्लोकमें कहते हैं, । कि “ मुझे सब एकसे हैं, कोई विशेष प्रिय अथवा द्वेष्य नहीं ।” देखनेमें यह विरोध । प्रतीत होता है सही; पर यह जान लेनेसे कोई विरोध नहीं रह जाता, कि एक । वर्णन सगुण उपासनाका अथवा भक्ति-मार्गका है; और दूसरा अध्यात्म-दृष्टि । अथवा कर्मविपाक-दृष्टिसे किया गया है । गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणके अंतमें । (पृ. ४३०-४३१ ) इस विषयका विवेचन है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग, शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें भक्तियोग नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
तेरहवाँ अध्याय ८०१ त्रयोदशोऽध्यायः। श्रीभगवानुवाच। इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥ तेरहवाँ अध्याय [ पिछले अध्यायमें यह बात सिद्ध की गई, कि अनिर्देश्य और अव्यक्त परमेश्वरका (बुद्धिसे) चितन करनेपर अंतमें मोक्ष तो मिलता है, परंतु उसकी अपेक्षा श्रद्धासे परमेश्वरके प्रत्यक्ष और व्यक्त स्वरूपकी भक्ति करके, परमेश्वरार्पण- बुद्धिसे सब कर्मोंको करते रहनेपर, वही मोक्ष सुलभ रीतिसे मिल जाता है। परंतु इतनेहीसे ज्ञान-विज्ञानका वह निरूपण समाप्त नहीं हो जाता, कि जिसका आरंभ सातवें अध्यायमें किया गया है। परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होनेके लिये बाहरी सृष्टिके क्षर-अक्षर-विचारके साथही साथ मनुष्यके शरीर और आत्माका, अथवा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञकाभी, विचार करना पडता है। ऐसेही यदि सामान्य रीतिसे जान लिया, कि सब व्यक्त पदार्थ जड़ प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं; तोभी यह बतलाये बिना ज्ञान- विज्ञानका निरूपण पूरा नहीं होता, कि प्रकृतिके किस गुणसे यह विस्तार होता है? और उसका क्रम कौन-सा है? अतएव तेरहवें अध्यायमें पहले क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार, और फिर आगे चार अध्यायोंमें गुणत्रयका विचार बतलाकर अठारहवें अध्यायमें समग्र विषयका उपसंहार किया गया है। सारांश, तीसरी षडध्यायी स्वतंत्र नहीं है, तथा कर्मयोगकी सिद्धीके लिये जिस ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका सातवें अध्यायमें आरंभ हो चुका है, उसीकी पूर्ति इस षडध्यायीमें की गई है (गीतारहस्य प्र. १४, पृ. ४५४-४५६)। गीताकी कई प्रतियोंमें इस तेरहवें अध्यायमेंके आरंभमें, यह श्लोक पाया जाता है। अर्जुन उवाच :- "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥" और उसका अर्थ यह है। अर्जुनने कहा :- "मुझे प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेयके जाननेकी इच्छा है, सो बतलाओ।" परंतु स्पष्ट दीख पडता है, कि यह न जानकर, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ- विचार गीतामें आया कैसे है, किसीने पीछेसे यह श्लोक गीतामें घुसेड़ दिया है। टीकाकार इस श्लोकको क्षेपक मानते हैं; और क्षेपक न माननेसे गीताके श्लोकोंकी संख्याभी सात सौमे एक अधिक बढ़ जाती है। अतः इस श्लोकको हमनेभी प्रक्षिप्तही मानकर शांकरभाष्यके अनुसार इस अध्यायका आरंभ किया है।] श्रीभगवानने कहा :- (१) हे कौन्तेय! इम शरीरकोही क्षेत्र कहते हैं। गी. र. ५१
८०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥ § § तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥ इसे (शरीरको) जो जानता है, उसे तद्विद अर्थात् इस शास्त्रके जाननेवाले, क्षेत्रज्ञ कहते हैं । (२) हे भारत ! सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञभी मुझेही समझ । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरा ( परमेश्वरका ) ज्ञान माना गया है । [ पहले श्लोकमें 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' इन दो शब्दोंका अर्थ दिया है; और दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञका यह स्वरूप बतलाया है, कि क्षेत्रज्ञ मैं परमेश्वर हूँ, अथवा जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है । दूसरे श्लोकके चापि = भी शब्दोंका अर्थ यह है - न केवल क्षेत्रज्ञही, प्रत्युत क्षेत्रभी मैही हूँ । क्योंकि, जिन सातवें तथा आठवें अध्यायमें बतला चुके हैं, कि पंचमहाभूतोंसे क्षेत्र या शरीर बनता है, वे प्रकृतिसे बने हैं; और यह प्रकृति परमेश्वरकी ही कनिष्ठ विभूति है ( गीता ७. ४; ८. ४; ९. ८ ) । इस रीतिसे क्षेत्र या शरीरके पंच महाभूतोंसे बने रहनेके कारण क्षेत्रका समावेश उस वर्गमें होता है, जिसे क्षर-अक्षर-विचारमें 'क्षर' कहते हैं; और क्षेत्रज्ञही परमेश्वर है । इस प्रकार क्षराक्षर-विचारके समान क्षेत्रज्ञका विचारभी परमेश्वरके ज्ञानका एक भाग बन जाता है ( गीतार. प्र. ६, पृ. १४३- १४९ ) ; और इसी अभिप्रायको मनमें लाकर दूसरे श्लोकके अंतमें यह वाक्य आया है, कि “ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरा अर्थात् परमेश्वरका ज्ञान है ” जो लोग अद्वैत वेदान्तको नहीं मानते, उन्हें ' क्षेत्रज्ञभी मैंही हूँ' इस वाक्यकी खीचातानी करनी पडती है और प्रतिपादन करना पडता है, कि इस वाक्यसे 'क्षेत्रज्ञ' तथा ' मै परमेश्वर'का अभेदभाव नहीं दिखलाया जाता; और दूसरे कई लोग 'मेरी' (मम) पदका अन्वय 'ज्ञान' शब्दके साथ न लगा 'मतं' अर्थात् 'माना गया है' शब्दके साथ लगाकर यों अर्थ करते हैं, कि “इनके ज्ञानको मैं ज्ञान समझता हूँ।" पर ये अर्थ सहज नहीं हैं। आठवें अध्यायके आरंभमेंही वर्णन है, कि देहमे निवास करनेवाला आत्मा ( अधिदेव ) मैही हूँ, अथवा “जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमे है"; और सातवेमेभी भगवानने 'जीव'को अपनीही परा प्रकृति कहा है ( ७. ५ ) इसी अध्यायके २२ वें और ३१ वें श्लोकमेंभी ऐसाही वर्णन है । अब बतलाते हैं, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार कहाँ पर और किसने किया है:- ] (३) क्षेत्र क्या है, वह किस प्रकारका है, उसके और कौन कौन विकार हैं, (उसमें भी) किससे क्या होता है; ऐसे ही वह अर्थात् क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका प्रभाव क्या है ? - इसे मैं संक्षेपमे बतलाता हू, सुन ।
तेरहवाँ अध्याय ८०३ ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ § § महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ (४) ब्रह्मसूत्रके पदोंसेभी, यह विषय गाया गया है, कि जिन्हें बहुत प्रकारसे, विविध छंदोंमें, पृथक् पृथक् ( अनेक ) ऋषियोंने ( कार्यकारणरूप ) हेतु दिखला कर पूर्ण निश्चित किया है। । [ गीतारहस्यके परिशिष्ट प्रकरणमें ( गीतार. पृ. ५३३-५३८ ) हमने । विस्तारपूर्वक दिखलाया है, कि इस श्लोकमें ब्रह्मसूत्र शब्दसे वर्तमानवेदान्त । सूत्र उद्दिष्ट हैं। उपनिषद् किसी एकही ऋषिका कोई एक ग्रंथ नहीं है, । अनेक ऋषियोंको भिन्न भिन्न काल या स्थानमें जिन अध्यात्म-विचारोंका स्फुरण । हो आया, वे विचार बिना किसी पारस्परिक संबंधके भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें । वर्णित हैं, इसलिये उपनिषद् संकीर्ण हो गये हैं, और कई स्थानोंपर वे परस्पर- । विरुद्धसे जान पडते हैं। ऊपरके श्लोकके पहले चरणमें जो 'विविध' और 'पृथक्' । शब्द हैं, वे उपनिषदोंके इस संकीर्ण स्वरूपकाही बोध कराते हैं। इस प्रकार । इन उपनिषदोंके संकीर्ण और परस्परविरुद्ध होनेके कारण, आचार्य बादरायणने । उनके सिद्धान्तोंकी एकवाक्यता करनेके लिये ब्रह्म-सूत्रों या वेदान्त-सूत्रोंकी रच- । नाकी है, और उस सूत्रोंमें उपनिषदोंके सब विषयोंको लेकर प्रमाणसहित अर्थात् । कार्यकारण आदि हेतु दिखलाकरके, पूर्ण रीतिसे सिद्ध किया है, कि प्रत्येक । विषयके संबंधमें सब उपनिषदोंसे एकही सिद्धान्त कैसे निकाला जाता है; फलतः । अर्थात् उपनिषदोंका रहस्य समझनेके लिये वेदान्त-सूत्रोंकी सदैव ज़रूरत पडती । है, अतः इस श्लोकमें दोनोंकाभी उल्लेख किया गया है। ब्रह्मसूत्रके दूसरे । अध्यायके तीसरे पादके पहले १६ सूत्रोंमें क्षेत्रका विचार और फिर उस पादके । अंततक क्षेत्रज्ञका विचार किया गया है। ब्रह्मसूत्रोंमें यह विचार है, इसलिये । उन्हें 'शारीरक सूत्र' अर्थात् शरीर या क्षेत्रका विचार करनेवाले सूत्रभी कहते । हैं। यह बतला चुके, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार किसने और कहां किया है; । अब बतलाते हैं, कि क्षेत्र क्या है :-] ( ५ ) ( पृथिवी आदि पाँच स्थूल ) महाभूत, अहंकार, बुद्धि ( महान् ), अव्यक्त ( प्रकृति ), दश ( सूक्ष्म ) इंद्रियाँ और एक ( मन ); तथा ( पाँच ) इंद्रियोंके पाँच ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - ये सूक्ष्म ) विषय, ( ६ ) इच्छा,
८०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥ द्वेष, सुख, दुःख, संघात, चेतना अर्थात् प्राण आदिका व्यक्त व्यापार और धृति याने धैर्य, इस (३१ तत्त्वोंके) समुदायको सविकार क्षेत्र कहते हैं। | [ यह क्षेत्र और उसके विकारोंका लक्षण है। पाँचवे श्लोकमें सांख्य-मत- | वालोंके पच्चीस तत्त्वोंमेंसे पुरुषको छोड़ शेष चौबीस तत्त्व आ गये हैं। इन्ही | चौबीस तत्त्वोंमें मनका समावेश होनेके कारण इच्छा, द्वेष आदि मनोधर्मोंको | अलग बतलानेकी जरूरत न थी। परंतु कणाद-मतानुयायियोंके मतसे ये धर्म | आत्माके हैं और इस मतको मान लेनेमे शंका होती है, कि, इन गुणोंका क्षेत्रमेंही | समावेश होता है या नहीं ? अतः क्षेत्र शब्दको व्याख्याको निःसंदिग्ध करनेके | लिये यहाँ स्पष्ट रीतिसे क्षेत्रमेंही इच्छा-द्वेष आदि द्वंद्वोंका समावेश कर लिया | है, और उसीमें भय-अभय आदि अन्य द्वंद्वोंकाभी लक्षणासे समावेश हो जाता | है। यह दिखलानेके लिये, कि सबका संघात अर्थात् समूह क्षेत्रसे स्वतंत्र कर्ता | नहीं है, उसकी गणना क्षेत्रमेंही की गई है। कई बार 'चेतना' शब्दकाही 'चैतन्य' | अर्थ होता है। परंतु यहाँ चेतनासे “जड़ देहमें प्राण आदिके दीख पड़नेवाले | व्यापार, अथवा जीवितावस्थाकी चेष्टाएँ इतनाही अर्थ विवक्षित है; और ऊपर | दूसरे श्लोकमें कहा है, कि जड़ वस्तुमें यह चेतना जिससे उत्पन्न होती है, वह | चिच्छक्ति अथवा चैतन्य, क्षेत्रज्ञ-रूपसे, क्षेत्रसे अलग रहता है। 'धृति' शब्दकी | व्याख्या आगे गीतामेंही (१८. ३३) की है, उसे देखो। छठे श्लोकके 'समासेन' | पदका अर्थ “इन सबका समुदाय” है। अधिक विवरण गीतारहस्यके आठवें | प्रकरणके अंतमें (पृ. १४४, १४५) मिलेगा। पहले 'क्षेत्रज्ञ'के माने 'परमेश्वर' | बतलाकर फिर स्पष्ट किया है, कि 'क्षेत्र' क्या है ? अब मनुष्यके स्वभावपर | ज्ञानके जो परिणाम होते हैं, उनका वर्णन करके यह बतलाते हैं, कि ज्ञान किसको | कहते हैं; और आगे ज्ञेयका स्वरूप बतलाया है। ये दोनों विषय दीखनेमें भिन्न | दीख पड़ते हैं अवश्य; पर वास्तविक रीतिसे वे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारकेही दो भाग | हैं। क्योंकि, प्रारंभमेंही बतला चुके हैं, कि क्षेत्रज्ञका अर्थ परमेश्वर है। अतएव | क्षेत्रज्ञका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है, और उसीका स्वरूप अगले श्लोकोंमें | वर्णित है - बीचमेंही कोई मनमाना विषय नहीं धर घुसेड़ा है।] (७) मानहीनता, दंभहीनता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, पवित्रता, स्थिरता, मनोनिग्रह, (८) इंद्रियोंके विषयोंमे वैराग्य, अहंकारहीनता, और
तेरहवाँ अध्याय ८०५ असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥ जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, व्याधि एवं दुःखोंको ( अपने पीछे लगे हुए ) दोष समझना; (९) कर्ममें अनासक्ति, बाल-बच्चों और घर-गृहस्ती आदिमें लंपट न होना, इष्ट या अनिष्टकी प्राप्ति हो, चित्तकी सर्वदा एकहीसी वृत्ति रखना, (१०) और मुझमें अनन्य भावसे अटल भक्ति, 'विविक्त' अर्थात् चुने हुए अथवा एकान्त स्थानमें रहना, साधारण लोगोंके जमावको पसंद न करना, (११) अध्यात्म- ज्ञानको नित्य समझना, और तत्त्वज्ञानके सिद्धान्तोंका परिशीलन – इनको ज्ञान कहते हैं; इसके व्यतिरिक्त जो कुछ है, वह सब अज्ञान है। । [ सांख्योंके मतमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञका ज्ञानही प्रकृति-पुरुषके विवेकका ज्ञान है, । और उसे इसी अध्यायमें आगे बतलाया है (गीता १३.१९-२३; १४.१९)। । इसी प्रकार अठारहवें अध्यायमें (गीता १८.२०) ज्ञानके स्वरूपका यह । व्यापक लक्षण बतलाया है–"अविभक्तं विभक्तेषु"। परंतु मोक्षशास्त्रम । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानका अर्थ केवल बुद्धिसे यही जान लेना विवक्षित नही होता, । कि अमुक अमुक बातें अमुक प्रकारकी हैं। अध्यात्म शास्त्रका सिद्धान्त यह है, । कि उस ज्ञानकाका देहके स्वभावपर साम्य-बुद्धिरूप परिणाम होना चाहिये, । अन्यथा वह ज्ञान अपूर्ण या कच्चा है। अतएव यह बतलाकर, कि बुद्धिसे । अमुक अमुक जान लेनाही ज्ञान है, ऊपरके पाँच श्लोकोंमें ज्ञानकी व्याख्या इस । प्रकार की गई है, कि जब उक्त श्लोकोंमें बतलाये हुए मान और दंभका छूट । जाना, अहिंसा, अनासक्ति, समबुद्धि इत्यादि बीस गुण मनुष्यके स्वभावमें दीख । पड़ने लगें, तब उसे ज्ञान कहना चाहिये, (गीतार. प्र. ९, पृ. २४९, २५०) । दसवें श्लोकमें "विविक्त-स्थानमें रहना और जमावको नापसंद करना" भी । ज्ञानका एक लक्षण कहा है, उससे कुछ लोगोंने यह दिखानेका प्रयत्न किया है, । कि गीताको संन्यास-मार्गही अभीष्ट है। किंतु हम पहलेही बतला चुके हैं । (गीता १२. १९ की टिप्पणी; गीतार. प्र. १०, पृ. २८५), कि यह मत ठीक । नहीं है, और ऐसा अर्थ करना उचितभी नहीं है। यहाँ इतनाही विचार किया । है, कि ज्ञान क्या है; और इस विषयमें कोई वादभी नहीं है, वह ज्ञान बाल- । बच्चोंमें, घरगृहस्तीमें अथवा लोगोंके जमावमें अनासक्ति है। अब अगला प्रश्न
८०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥ बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥ | यह है, कि इस ज्ञानके हो जानेपर इसी अनासक्त-बुद्धिसे बालबच्चोंमें अथवा | गृहस्तीमें रहकर प्राणिमात्रके हितार्थ जगत्के व्यवहार किये जायें अथवा न | किये जायें; और केवल ज्ञानकी व्याख्यासेही इसका निर्णय करना उचित नहीं | है। क्योंकि भगवानने गीतामें अनेक स्थलोंपर कहा है, कि ज्ञानी पुरुष कर्मोंमें | लिप्त न होकर, उन्हें अनासक्त-बुद्धिसे लोकसंग्रहके निमित्त करता रहे और | इसकी सिद्धिके लिये जनकके बर्तावका और अपने व्यवहारका उदाहरणभी | दिया है ( गीता ३. १९-२५; ४. १४) । समर्थ श्रीरामदास स्वामीके चरितसे | यह बात प्रकट होती है, कि शहरमें रहनेकी लालसा न रहनेपरभी जगत्के | व्यवहार केवल कर्तव्य समझकर कैसे किये जा सकते हैं? ( दासबोध | १९. ६. २९; १९. ९. ११) । यह ज्ञानका लक्षण हुआ; अब ज्ञेयका स्वरूप | बतलाते हैं:- ] ( १२ ) ( अब तुझे ) वह बतलाता हूँ, ( कि ), जिसे जान लेनेसे 'अमृत' अर्थात् मोक्ष मिलता है। ( वह ) अनादि ( सबसे ) परेका ब्रह्म ( है )। न उसे 'सत्' कहते हैं, और न 'असत्'भी । ( १३ ) उसके, सब ओर हाथ-पैर हैं, सब ओर आँखें, सिर और मुंह हैं, सब ओर कान हैं; और वही इस लोकमें सबको व्याप रहा है। ( १४ ) ( उसमें ) सब इंद्रियोंके गुणोंका आभास है, पर उसके कोईभी इंद्रिय नहीं है; वह ( सबसे ) असक्त अर्थात् अलग होकरभी सबका पालन करता है; और निर्गुण होनेपरभी गुणोंका उपभोग करता है। ( १५ ) ( वह ) सब भूतोंके भीतर और बाहरभी है; अचर है और चरभी है; सूक्ष्म होनेके कारण वह अविज्ञेय है; और दूर होकरभी समीप है। ( १६ ) वह ( तत्त्वतः ) 'अविभक्त' अर्थात् अखंडित ( होकरभी ) सब भूतोंमें मानो ( नानात्वसे ) विभक्त हो रहा है;
तेरहवाँ अध्याय ८०७ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥ १७ ॥ और (सब) भूतोंका पालन करनेवाला, ग्रसनेवाला एवं उत्पन्न करनेवालाभी उसेही समझना चाहिये। (१७) उसेही तेजकाभी तेज, और अंधकारसे परेका कहते हैं, ज्ञान, जो जानने योग्य है, वह (ज्ञेय), और ज्ञानगम्य अर्थात् ज्ञानसे (ही) विदित होनेवालाभी (वही) है, और सबके हृदयमें वही अधिष्ठित है। | [ अचिंत्य और अक्षर परब्रह्म जिसे कि क्षेत्रज्ञ अथवा परमात्माभी कहते | हैं, (गीता १३. २२), का जो वर्णन ऊपर है, वह आठवें अध्यायवाले अक्षर- | ब्रह्मके वर्णनके समान (गीता ८. ९-११) उपनिषदोंके आधारपर किया गया | है। पूरा तेरहवाँ श्लोक (श्वे. ३. १६) और अगले श्लोकका यह अर्धांश कि | “सब इंद्रियोंके गुणोंका भास होनेवाला, तथापि सब इंद्रियोंसे विरहित” | श्वेताश्वतर उपनिषदमें (श्वे. ३. १७) ज्यों-का-त्यों है; एवं “दूर होनेपरभी | समीप” ये शब्द ईशावास्य (५) और मुंडक (मुं. ३. १. ७) उपनिषदोंमें | पाये जाते हैं। ऐसेही ‘तेजका तेज’ ये शब्द बृहदारण्यकके (बृ. ४. ४. १६) | हैं; और ‘अंधकारसे परेका’ ये शब्द श्वेताश्वतरके (३. ८) हैं। इसी | भाँति यह वर्णन कि “जो सत्भी नहीं है और असत्भी नहीं कहा जा | सकता है।” ऋग्वेदके “नासदासीन्नो सदासीत्” इस ब्रह्मविषयक प्रसिद्ध | सूक्तको (ऋ. १०. १२९) लक्ष्य कर किया गया है। ‘सत्’ और ‘असत्’ | शब्दोंके अर्थोंका विचार गीतारहस्य प्र. ९, पृ. २४५-२४६ में विस्तारसहित | किया गया है; और फिर गीताके ९. १९वें श्लोककी टिप्पणीमेंभी किया है। | गीता ९. १९ में कहा है, कि ‘सत्’ और ‘असत्’ मैंही हूँ, अतः अब यह वर्णन | विरुद्ध-सा जंचता है, कि सच्चा ब्रह्म न ‘सत्’ है और न ‘असत्भी’। परंतु | वास्तवमें यह विरोध सच्चा नहीं है। क्योंकि ‘व्यक्त’ (क्षर) सृष्टि और | ‘अव्यक्त’ (अक्षर) सृष्टि, ये दोनों यद्यपि परमेश्वरकेही स्वरूप हों, तथापि यह | सिद्धान्त गीतामेंही पहले “भूतभृन्न च भूतस्थो” (गीता ९. ५) श्लोकमें और | आगे फिर (१५. १६, १७) पुरुषोत्तम-लक्षणमेंभी स्पष्टतया बतलाया गया है। | सच्चा परमेश्वर-तत्त्व इन दोनोंसे परे अर्थात् पूर्णतया अज्ञेय है। निर्गुण ब्रह्म | किसे कहते हैं, और जगत्में रहकरभी वह जगतमे बाहर कैसे है, अथवा वह | ‘विभक्त’ अर्थात् नानारूपात्मक दीख पड़े, तोभी मूलमें ‘अविभक्त’ अर्थात् एक-ही | कैसे हैं, इत्यादि प्रश्नोंका विचार गीतारहस्यके नवें प्रकरणमें (पृ. २०९ से आगे) | किया जा चुका है। सोलहवें श्लोकके ‘विभक्तमिव’का अनुवाद यह है-“मानो | विभक्त हुआ-सा-दीख पड़ता है।” यह ‘इव’ शब्द उपनिषदोंमें अनेक वार | इसी अर्थमें आया है, कि ‘जगत्का’ नानात्व भ्रांतिकारक है और एकत्वही
८०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥ § § प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥ | सत्य है। उदाहरणार्थ, “द्वैतमिव भवति”, “य इह नानेव पश्यति” इत्यादि | (बृ. २. ४. १४; ४. ४. १९; ४. ३. ७) । अतएव प्रकट है, कि गीतामें यह | अद्वैत सिद्धान्तही प्रतिपाद्य है, कि नाना-नामरूपात्मक माया भ्रष्ट है, और | उसमें अविभक्त रहनेवाला ब्रह्मही सत्य है। गीता १८. २० में फिर बतलाया | है, कि “अविभक्तं विभक्तेषु” अर्थात् नानात्वमें एकत्व देखना सात्त्विक ज्ञानका | लक्षण है। गीतारहस्यके अध्यात्म प्रकरणमें वर्णन है, कि यह सात्त्विक ज्ञानही | ब्रह्म है। गीतार. प्र. ९, पृ. २१५, २१६; (प्र. ६, पृ. १३२-१३३) । ] (१८) इस प्रकार संक्षेपसे बतला दिया, कि क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय किसे कहते हैं? मेरा भक्त इसे जानकर मेरे स्वरूपको पाता है। | [अध्यात्म या वेदान्तशास्त्रके आधारसे अब तक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयका | विचार किया गया। इनमेंसे 'ज्ञेय' ही क्षेत्रज्ञ अथवा परब्रह्म है और- 'ज्ञान', दूसरे | श्लोकमें बतलाया हुआ, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान है, इस कारण यही परमेश्वरके सब | ज्ञानका संक्षेपमें निरूपण है। १८ वें श्लोकमें यही सिद्धान्त बतला दिया है, कि | जब क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारही परमेश्वरका ज्ञान है, तब आगे यह आपही सिद्ध है, | कि उसका फलभी मोक्षही होना चाहिये। वेदान्तशास्त्रका क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार यहाँ | समाप्त हो गया। परंतु प्रकृतिसेही पाचभौतिक विकारवान् क्षेत्र उत्पन्न हुआ है, | इसलिये और सांख्य जिसे 'पुरुष' कहते हैं, उसेही अध्यात्मशास्त्रमें 'आत्मा' कहते | हैं, इसलिये; सांख्यकी दृष्टिसे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारही प्रकृति-पुरुषका विवेक होता | है। गीताशास्त्र प्रकृति और पुरुषको सांख्यके समान दो स्वतंत्र तत्त्व नहीं मानता; | और सातवें अध्यायमें (गीता ७. ४, ५) कहा है, कि ये एकही परमेश्वरके, | कनिष्ठ और श्रेष्ठ, दो रूप हैं। परंतु सांख्योंके द्वैतके बदले गीताशास्त्रके इस | द्वैतको एकबार स्वीकारकर लेनेपर, फिर प्रकृति और पुरुषके परस्परसंबंधका | सांख्योंका ज्ञान गीताको अमान्य नहीं है। और यहभी कह सकते हैं, कि | क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके ज्ञानकाही रूपांतर प्रकृति-पुरुषका विवेक है (गीतार. प्र. ७) | इसीलिये अबतक उपनिषदोंके आधारसे जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञान बतलाया, | उसेही अब सांख्योंकी परिभाषामें किंतु सांख्योंके द्वैतको अस्वीकार करके प्रकृति- | पुरुष-विवेकके रूपसे बतलाते हैं:- (१९) प्रकृति और पुरुष, दोनोंकोही अनादि समझ। विकार और गुणोंको | प्रकृतिसेही उपजा हुआ जान।
तेरहवाँ अध्याय ८०९ कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान् । कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥ | [ सांख्यशास्त्रके मतमें प्रकृति और पुरुष, दोनों न केवल अनादिही हैं, | प्रत्युत स्वतंत्र और स्वयंभूभी हैं। वेदान्ती समझते हैं, कि प्रकृति परमेश्वरसेही | उत्पन्न हुई है, अतएव वह न स्वयंभू है, और न स्वतंत्रभी है (गीता ४. ५. ६) । | परंतु यह नहीं बतलाया जा सकता, कि परमेश्वरसे प्रकृति कब उत्पन्न हुई | और पुरुष (जीव) परमेश्वरकाही अंश है। (गीता. १५. ७) ; इस कारण | वेदान्तियोंको इतना मान्य है, कि दोनों अनादि हैं। इस विषयका अधिक | विवेचन गीतारहस्यके ७ वें प्रकरणमें और विशेषतः पृ. १६२-१६८ में, एवं १० | वें प्रकरणके पृ. २६४-२६९ में किया है । ] (२०) कार्य अर्थात् देहके और करण अर्थात् इंद्रियोंके कर्तृत्वके लिये प्रकृति कारण कही जाती है; और. (कर्ता न होनेपरभी) सुखदुःखोंको भोगनेके लिये पुरुष (क्षेत्रज्ञ) कारण कहा जाता है । | [ इस श्लोकमें 'कार्यकरण'के स्थानमें 'कार्यकारण'भी पाठ है; और तब | उसका यह अर्थ होता है : - सांख्योंके महत् आदि तेईस तत्त्व एकसे दूसरा, दूसरेसे | तीसरा, इस कार्यकारण-क्रमसे उपजकर सारी व्यक्त-सृष्टि प्रकृतिसे बनती | है। यह अर्थभी बेजा नहीं है; परंतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारमें क्षेत्रकी उत्पत्ति बतलाना | प्रसंगानुसार नहीं है। प्रकृतिसे जगत्के उत्पन्न होनेका वर्णन तो पहलेही | सातवें और नवें अध्यायमें हो चुका है। अतएव 'कार्यकरण' पाठही यहाँ अधिक | प्रशस्त दीख पड़ता है। शांकरभाष्यमें यही 'कार्यकरण' पाठ है।] (२१) क्योंकि पुरुष प्रकृतिमें अधिष्ठित होकर प्रकृतिके गुणोंका उपभोग करता है; और '(प्रकृतिके) गुणोंको यह संयोग पुरुषको भली-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेके लिये कारण होता है। | [ प्रकृति और पुरुषके पारस्परिक संबंधका और भेदका यह वर्णन | सांख्यशास्त्रका है, (गीतार. प्र. ७, पृ. १५५-१६२) । अब यह कहकर कि | वेदान्ती लोग पुरुषको परमात्मा कहते हैं, सांख्य और वेदान्तका मेल कर दिया | गया है; और ऐसा करनेसे प्रकृति-पुरुष-विचार एवं क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारकी पूरी | एकवाक्यता हो जाती है।]
८१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥ § § ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥ (२२) (प्रकृतिके गुणोंके इस) उपद्रष्टा अर्थात् समीप बैठकर देखनेवाले, अनुमोदन करनेवाले, भर्ता अर्थात् (प्रकृतिके गुणोंको) बढ़ानेवाले, और उपयोग करनेवालेकोही इस देहका परपुरुष, महेश्वर और परमात्मा कहते हैं। (२३) इस प्रकार पुरुष (निर्गुण) और प्रकृतिको (ही) जो गुणोंसमेत जानता है, वह कैसाभी बर्ताव क्यों न किया करे, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। | [ २२ वें श्लोकमें जब यह निश्चय हो चुका, कि पुरुषही देहका परमात्मा | है, तब सांख्यशास्त्रके अनुसार पुरुषका जो उदासीनत्व और अकर्तृत्व है, वही | अब आत्माका अकर्तृत्व हो जाता है और इस प्रकार सांख्योंकी उपपत्तिसे वेदान्त- | की एकवाक्यता हो जाती है। वेदान्तवाले कुछ ग्रंथकारोंकी समझ है, कि सांख्य- | वादी वेदान्तके शत्रु हैं, अतः बहुतेरे वेदान्ती सांख्य-उपपत्तिको सर्वथा त्याज्य | मानते हैं। किंतु गीतामें ऐसा न करके क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारका एक-ही विषय | एक बार वेदान्तकी दृष्टिसे, और दूसरी बार (वेदान्तके अद्वैत मतको बिना | छोड़े) सांख्य-दृष्टिसे, प्रतिपादन किया है, इससे गीताशास्त्रकी सम-बुद्धि प्रकट | हो जाती है। यहभी कह सकते हैं, कि उपनिषदोंके और गीताके विवेचनमें | यह एक महत्त्वका भेद है (गीतार. परिशिष्ट, पृ. ५२८)। इससे प्रकट होता है, | कि यद्यपि गीताको सांख्योंका द्वैतवाद मान्य नहीं है, तथापि उनके प्रतिपादनमें | जो कुछ युक्तिसंगत जान पड़ता है, वह गीताको अमान्य नहीं है। दूसरेही | श्लोकमें कह दिया है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ज्ञानही परमेश्वरका ज्ञान है। अब | पिंडका ज्ञान और देहके परमेश्वरका ज्ञान संपादनकर मोक्ष प्राप्त करनेके मार्ग | प्रसंगके अनुसार संक्षेपसे बतलाते हैं :- ] (२४) कुछ लोग ध्यानसे स्वयंही अपने आपमें आत्माको देखते हैं; (कोई सांख्ययोगसे देखते हैं और कोई कर्मयोगसे (२५) परंतु इस प्रकार जिन्हें (अपने
तेरहवाँ अध्याय ८११ § § यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजंगमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥ समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥ समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥ आपही ) ज्ञान नहीं होता, वे दूसरेसे सुनकर ( श्रद्धासे ) परमेश्वरका भजन करते हैं। सुनी हुई बातको प्रमाण मान बर्तनेवाले ये पुरुषभी मृत्युको पारकर जाते हैं। | [ इन दो श्लोकोंमें पातंजलयोगके अनुसार ध्यान, सांख्य-मार्गके अनुसार | ज्ञानोत्तर कर्मसंन्यास, कर्मयोग-मार्गके अनुसार निष्काम बुद्धि परमेश्वरार्पण- | पूर्वक कर्म करना और ज्ञान न हो, तोभी श्रद्धासे आप्तोंके वचनोंका विश्वास- | कर परमेश्वरकी भक्ति करना ( गीता ४. ३९ ), ये आत्मज्ञानके भिन्न भिन्न | मार्ग बतलाये गये हैं। कोई किसीभी मार्गसे जावे, अंतमें उसे भगवानका ज्ञान | होकर मोक्ष मिलही जाता है। तथापि पहले जो यह सिद्धान्त किया गया है, | कि लोकसंग्रहकी दृष्टिसे कर्मयोग श्रेष्ठ है, वह इससे खंडित नहीं होता । इस | प्रकार साधन बतलाकर अगले श्लोकमें समग्र विषयका सामान्य रीतिसे उपसंहार | किया है; और उसमेंभी वेदान्तसे कापिल-सांख्यका मेल मिला दिया है। ] (२६) हे भरतश्रेष्ठ ! स्मरण रख, कि स्थावर या जंगम, किसीभी वस्तुका निर्माण क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे होता है। (२७) सब भूतोंमें एक-सा रहनेवाला, और सब भूतोंका नाश हो जानेपरभी जिसका नाश नहीं होता, ऐसे परमेश्वरको जिसने देख लिया, कहना होगा, कि उसीने ( सच्चे तत्त्वको) पहचाना। (२८) ईश्वरको सर्वत्र एक-सा व्याप्त समझकर ( जो पुरुष ) अपने आपकाही घात नहीं करता, अर्थात् अपने आप अच्छे मार्गमें लग जाता है, उस कारणसे वह उत्तम गतिही पाता है। | [ २७ वें श्लोकमें परमेश्वरका जो लक्षण बतलाया है, वह पीछे गीताके | ८. २० वें श्लोकमें आ चुका है, और उसका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके नवें | प्रकरणमें किया गया है, ( गीतार. प्र. ९, पृ. २१९, २५७ ) । ऐसेही २८ वें | श्लोकमें फिर वही बात कही है, जो पीछे ( गीता ६. ५-७ ) कही जा चुकी | है, कि आत्मा अपना बंधु है, और वही अपना शत्रु है। इस प्रकार २६, २७ | और २८ वें श्लोकोंमें सब प्राणियोंके विषयमें साम्य-बुद्धिरूप भावका वर्णन कर | चुकनेपर बतलाते हैं, कि इसके जान लेनेसे क्या होता है :- ]
८१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्त्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥ § § अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ § § क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ (२९) जिसने यह जान लिया, कि (सब) कर्म सब प्रकारसे केवल प्रकृति- सेही किये जाते हैं, और आत्मा अकर्ता है, अर्थात् कुछभी नहीं करता, कहना चाहिये कि उसने (सच्चे तत्त्वको) पहचान लिया । (३०) जब सब भूतोंका पृथक्त्व अर्थात् नानात्व एकतासे (दीखने लगे), और इस (एकता) सेही (सब) विस्तार दीखने लगे, तब ब्रह्म प्राप्त होता है। । [ अब बतलाते हैं, कि आत्मा निर्गुण, अलिप्त और अक्रिय कैसे है :- ] (३१) हे कौंतेय ! अनादि और निर्गुण होनेके कारण यह अव्यक्त परमात्मा शरीरमें रह करभी कुछ करता-धरता नहीं है, और उसे (किसीभी कर्मका) लेप अर्थात् बंधन नहीं लगता । (३२) जैसे आकाश चारों ओर भरा हुआ है, परंतु सूक्ष्म होनेके कारण उसे (किसीकाभी) लेप नहीं लगता, वैसेही देहमें सर्वत्र रहने- परभी आत्माको (किसीकाभी) लेप नहीं लगता । (३३) हे भारत ! जैसे अकेला सूर्य इस सारे जगतको प्रकाशित करता है, वैसेही क्षेत्रज्ञ सब क्षेत्रको अर्थात् शरीरको प्रकाशित करता है । (३४) इस प्रकार ज्ञान-चक्षुसे अर्थात् ज्ञानरूप नेत्रसे, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको, एवं सब भूतोंकी (मूल) प्रकृतिके मोक्षको, जो जानते हैं, वे परब्रह्मको पाते हैं।
तेरहवाँ अध्याय ८१३ [ यह पूरे प्रकरणका उपसंहार है। 'भूतप्रकृतिमोक्ष' शब्दका अर्थ हमने सांख्यशास्त्रके सिद्धान्तानुसार किया है। सांख्योंका सिद्धान्त यह है, कि मोक्षका मिलना या न मिलना आत्माकी अवस्थाएँ नहीं हैं, क्योंकि वह तो सदैव अकर्ता और असंग है। परंतु प्रकृतिके गुणोंके संगसे वह अपनेमें कर्तृत्वका आरोप किया करता है, इसलिये जब उसका यह अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब उसके साथ लगी हुई प्रकृति छूट जाती है, अर्थात् उसीका मोक्ष हो जाता है, और इसके पश्चात् उसका पुरुषके आगे नाचना बंद हो जाता है। अतएव सांख्य-मतवाले प्रतिपादन किया करते हैं, कि तात्त्विक दृष्टिसे बंध और मोक्ष, ये दोनों अवस्थाएँ प्रकृतिकीही हैं (सांख्यकारिका ६२; गीतारहस्य प्र. ७, पृ. १६५-१६६ ) हमें जान पड़ता है, कि सांख्यके ऊपर लिखे हुए सिद्धान्तके अनुसारही इस श्लोकमें 'प्रकृतिका मोक्ष' ये शब्द आये हैं। परंतु कुछ लोग इन शब्दोंका यह अर्थभी लगाते हैं, कि “भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षः" - पंचमहाभूतोंसे और प्रकृतिसे अर्थात् मायात्मक कर्मोंसे आत्माका मोक्ष होता है। नवें, ग्यारहवें और तेरहवें अध्यायके ज्ञान-विज्ञान निरूपण का भेद ध्यान देनेयोग्य है, कि यह क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ-विवेक ज्ञान-चक्षुसे विदित होनेवाला है (गीता १३. ३४)। तो नवें अध्यायकी राजविद्या प्रत्यक्ष अर्थात् चर्मचक्षुसे ज्ञात होनेवाली है (गीता ९. २), और विश्वरूप-दर्शन परम भगवद्भक्तकोभी केवल दिव्य-चक्षुसेही होनेवाला है (गीता ११. ८) । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्मविद्या- न्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, प्रकृति-पुरुष-विवेक अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
८१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चतुर्दशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥ चौदहवाँ अध्याय [ तेहरवें अध्यायमें क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार एक बार वेदान्तकी दृष्टिसे और दूसरी बार सांख्यकी दृष्टिसे बतलाया है, एवं उसीमें प्रतिपादन किया है, कि सब कर्तृत्व प्रकृतिकाही है, पुरुष अर्थात् क्षेत्रज्ञ उदासीन रहता है । परंतु इस बातका विवेचन अब तक नहीं हुआ, कि प्रकृतिका यह कर्तृत्व क्यों कर चला करता है ? अतएव इस अध्यायमें बतलाते हैं, कि एकही प्रकृतिसे विविध सृष्टि, विशेषतः सजीव सृष्टि, कैसे उत्पन्न होती है ? केवल मानवी सृष्टिकाही विचार करें, तो यह विषय क्षेत्रसंबंधी अर्थात् शरीरका होता है, इसलिये उसका समावेश क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें हो सकता है । परंतु जब स्थावर सृष्टिभी त्रिगुणात्मक प्रकृतिकाही फैलाव है, तब प्रकृतिके गुणभेदका यह विवेचन क्षर-अक्षर-विचारकाभी भाग हो सकता है । अत- एव 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार' इस संकुचित नामको छोड़कर सातवें अध्यायमें जिस ज्ञान- विज्ञानके बतलानेका आरंभ किया था, उसी ज्ञान-विज्ञानको अधिक स्पष्ट रीतिसे फिरभी बतलानेका आरंभ भगवानने अब इस अध्यायमें किया है । सांख्यशास्त्रकी दृष्टिसे इस विषयका विस्तृत निरूपण गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें किया गया है । त्रिगुणके विस्तारका यह वर्णन अनुगीता और मनुस्मृतिके बारहवें अध्यायमेंभी है । ] श्रीभगवानने कहा :- (१) और फिर सब ज्ञानोंसे उत्तम ज्ञान बतलाता हूँ, कि जिसको जानकर सब मुनि इस लोकसे परम सिद्धि पा गये हैं। (२) इस ज्ञानका आश्रय करके मुझसे एकरूपता पाये हुए लोग सृष्टिके उत्पत्ति-कालमेंभी नहीं जन्मते और प्रलय-कालमेंभी व्यथा नहीं पाते; ( अर्थात् जन्म-मरणसे एकदम छुटकारा पा जाते हैं । ) | [ यह हुई प्रस्तावना । अब पहले बतलाते हैं, कि प्रकृति मेराही स्वरूप | है; फिर सांख्योंके द्वैतको अलगकर, वेदान्तशास्त्रके अनुकूल यह निरूपण करते | हैं, कि प्रकृतिके सत्व, रज और तम, इन तीन गुणोंसे सृष्टिके नाना प्रकारके | व्यक्त पदार्थ किस प्रकार निर्मित होते हैं :- ]
चौदहवाँ अध्याय ८१५ § § मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥ § § सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥ (३) हे भारत ! महद्ब्रह्म अर्थात् प्रकृति मेरीही योनि है और मैं उसमें गर्भ रखता हूँ; फिर उससे समस्त भूत उत्पन्न होने लगते हैं। (४) हे कौंतेय । (पशुपक्षी आदि) सब योनियोंमें जो जो मूर्तियाँ जन्मती हैं, उनकी योनि महत् ब्रह्म है और मैं बीजदाता पिता हूँ । (५) हे महाबाहु ! प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सत्त्व, रज और तम गुण देहमें रहनेवाले अव्यय अर्थात् निर्विकार आत्माको देहमें बाँध लेते हैं। (६) हे निष्पाप अर्जुन ! इन गुणोंमेंसे निर्मलताके कारण प्रकाश डालनेवाला और निर्दोष सत्त्वगुण सुख और ज्ञानके साथसे (प्राणीको) बाँधता है। (७) रजोगुणका स्वभाव रागात्मक है और उससे तृष्णा और आसक्तिकी उत्पत्ति होती है। हे कौंतेय ! वह प्राणीको कर्म करनेके (प्रवृत्तिरूप) संगसे बाँध डालता है। (८) किंतु तमोगुण अज्ञानसे उपजता है और वह सब प्राणियोंको मोहमें डालता है। हे भारत ! वह प्रमाद, आलस्य, और निद्रासे (प्राणी)को बाँध लेता है। (९) सत्त्वगुण सुखमें, और रजोगुण कर्ममें, आसक्ति उत्पन्न करता है। परंतु हे भारत! तमोगुण ज्ञानको ढँक- कर प्रमाद अर्थात् कर्तव्यमूढतामें, या कर्तव्यके विस्मरणमें, आसक्ति उत्पन्न करता है। | [ सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणोंके ये पृथक् लक्षण बतलाये गये | हैं। किंतु ये गुण कभीभी पृथक् पृथक् नहीं रहते, तीनों सदैव एकत्र रहा करते हैं।