श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६३ माया-सृष्टिके द्वैती क्षेत्रमेंही अब हमें उतरना चाहिये। पिंड और ब्रह्मांड, दोनोंके मूलमें यदि एकही नित्य और स्वतंत्र आत्मा है, तो अब सहजही प्रश्न उत्पन्न होता है, कि पिंडके आत्माको ब्रह्मांडके आत्माकी पहचान हो जानेमें कौन-सी अड़चन रहती है ? और वह दूर कैसे हो ? इन प्रश्नोंको हल करनेके लिये नामरूपोंका विवेचन करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि वेदान्तकी दृष्टिसे सब पदार्थोंके दो वर्ग होते हैं : एक आत्मा अथवा परमात्मा; और दूसरा उसके ऊपरका नाम- रूपोंका आवरण। इसलिये नामरूपात्मक आवरणके सिवा अब अन्य कुछभी शेष नहीं रहता। वेदान्तशास्त्रका मत है, कि नामरूपोंका यह आवरण किसी जगह घना, तो किसी जगह विरल होनेके कारण दृश्य सृष्टिके पदार्थोंमें सचेतन और अचेतन; तथा सचेतनमेंभी पशु, पक्षी, मनुष्य, देव, गंधर्व और राक्षस इत्यादि भेद हो जाते हैं। यह नहीं, कि आत्मरूपी ब्रह्म किसी स्थानमें न हो - वह सभी जगह है - वह पत्थरमें है और मनुष्यमेंभी है। परंतु दीपकके एक होनेपरभी किसी लोहेके बक्समें अथवा न्यूनाधिक स्वच्छ काँचकी लालटेनमें उसके रखनेसे जिस प्रकार उसके प्रकाशमें अंतर पड़ता है, उसी प्रकार आत्मतत्त्वके सर्वत्र एकही होनेपरभी उसके ऊपरके कोश - अर्थात् नामरूपात्मक आवरणके तारतम्य भेदसे - अचेतन और सचेतन जैसे भेद हो जाया करते हैं। और तो क्या ? यही कारण है, कि सचेतनमें मनुष्यों और पशुओंमें ज्ञानसंपादन करनेकी एक समानही सामर्थ्य क्यों नहीं होती। आत्मा सर्वत्र एकही है सही; परंतु वह मूलमेंही निर्गुण और उदासीन होनेके कारण मन, बुद्धि इत्यादि नाम-रूपात्मक साधनोंके बिना स्वयं कुछभी नहीं कर सकता; और वे साधन मनुष्य-योनिको छोड़ अन्य किसीभी योनिमें उसे पूर्णतया प्राप्त नहीं होते। इसलिये मनुष्य-जन्म सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। इस श्रेष्ठ जन्ममें आनेपर आत्माके नामरूपात्मक आवरणके स्थूल और सूक्ष्म, दो भेद होते हैं। इनमेंसे स्थूल आवरण मनुष्यकी स्थूल देहही है, कि जो शुक्र, शोणित आदिसे बनी है। इस शुक्रसे आगे चलकर स्नायु, अस्थि और मज्जा; तथा शोणित अर्थात् रक्तसे त्वचा, मांस और केश उत्पन्न होते हैं - ऐसा समझकर, इन सबको वेदान्ती 'अन्नमय कोश' कहते हैं। इस स्थूल कोशको छोड़कर जब हम यह देखने लगते हैं, कि इसके अंदर क्या है ? तब क्रमशः वायुरूपी प्राण अर्थात् 'प्राणमय कोश', मन अर्थात् 'मनोमय कोश', बुद्धि अर्थात् 'ज्ञानमय कोश', और अंतमें 'आनंदमय कोश' मिलता है। आत्मा उससेभी परे है। इसलिये तैत्तिरीयोपनिषदमें अन्नमय कोशसे आगे बढ़ते बढ़ते अंतमें आनंदमय कोश बतला- कर वरुणने भृगुको आत्म-स्वरूपकी पहचान करा दी है (तै. २. १-५; ३. २-६)। इन सब कोशोंमेंसे स्थूलदेहका कोश छोड़ बाकी रहे हुए प्राणादि कोशों, सूक्ष्म इंद्रियों और पंचतन्मात्राओंको वेदान्ती 'लिंग' अथवा 'सूक्ष्म' शरीर कहते हैं। वे लोग, "एकही आत्माको भिन्न भिन्न योनियोंमें जन्म कैसे प्राप्त होता है ?" -
२६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इसकी उपपत्ति, सांख्यशास्त्रकी तरह बुद्धिके अनेक 'भाव' मानकर नहीं लगाते; किंतु इस विषयमें उनका यह सिद्धान्त है, कि यह सब कर्मविपाकका अथवा कर्मके फलोंका परिणाम है। गीतामें, वेदान्तसूत्रोंमें और उपनिषदोंमें स्पष्ट कहा है, कि यह कर्म लिंग-शरीरके आश्रयसे अर्थात् आधारसे रहा करता है; और जब आत्मा स्थूल देह छोड़कर जाने लगता है, तब यह कर्मभी लिंग-शरीरद्वारा उसके साथ जाकर उसको बार बार भिन्न भिन्न जन्म लेनेके लिये बाध्य करता है। इसलिये नाम-रूपात्मक जन्ममरणके चक्करसे मुक्त होकर नित्य परब्रह्म-रूपी होनेमें अथवा मोक्षकी प्राप्तिमें पिंडके आत्माको जो अड़चन हुआ करती है, उसका विचार करते समय लिंग-शरीर और कर्म इन दोनोंकाभी विचार करना पड़ता है। इनमेंसे लिंग-शरीरका सांख्य और वेदान्त, दोनों दृष्टियोंसे पहलेही विचार किया जा चुका है। इसलिये यहाँ फिर उसकी चर्चा नहीं की जाती। इस प्रकरणमें सिर्फ इसी बातका विवेचन किया गया है, कि जिस कर्मके कारण आत्माको ब्रह्मज्ञान न होते हुए अनेक जन्मोंके चक्करमें पड़ना होता है, उस कर्मका स्वरूप क्या है ? और उससे छूट कर आत्माको अमृतत्व प्राप्त होनेके लिये मनुष्यको इस संसारमें कैसे चलना चाहिये ? सृष्टिके आरंभकालमें मूल अव्यक्त और निर्गुण परब्रह्म जिस देशकाल आदि नाम-रूपात्मक सगुण शक्तिसे व्यक्त अर्थात् दृश्य सृष्टिरूप हुआ-सा दीख पड़ता है, उसीको वेदान्तशास्त्रमें 'माया' कहते हैं (गीता ७. २४, २५); और उसीमें कर्मकाभी समावेश होता है (बृ. १. ६. १)। इतनाही नहीं तो यहभी कहा जा सकता है, कि 'माया' और 'कर्म' दोनों समानार्थक हैं। क्योंकि पहले कुछ-न-कुछ कर्म अर्थात् व्यापार हुए बिना अव्यक्तका व्यक्त होना अथवा निर्गुणका सगुण होना संभव नहीं। इसीलिये पहले यह कह कर, कि मैं अपनी मायासे प्रकृतिमें उत्पन्न होता हूँ (गीता ४. ६); फिर आगे आठवें अध्यायमें गीतामेंही कर्मका यह लक्षण दिया है, कि "अक्षर परब्रह्मसे पंचमहाभूतादि विविध सृष्टि निर्माण होनेकी जो क्रिया है, वही कर्म है" (गीता ८. ३)। कर्म कहते हैं व्यापार अथवा क्रियाको -फिर वह मनुष्यकृत हो, सृष्टिके अन्य पदार्थोंकी क्रिया हो अथवा मूल सृष्टिके उत्पन्न होनेकीही हो - इतना व्यापक अर्थ इस जगह विवक्षित है। परंतु कर्म कोई हो; उसका परिणाम सदैव केवल इतनाही होता है, कि एक प्रकारका नामरूप बदल कर उसकी जगह दूसरा नामरूप उत्पन्न किया जाय। क्योंकि इन नामरूपोंसे आच्छादित मूल द्रव्य कभी नहीं बदलता - वह सदा एक-साही रहता है। उदा- हरणार्थ, बुननेकी क्रियासे 'सूत' यह नाम बदलकर उसी द्रव्यको 'वस्त्र' नाम मिल जाता है; और कुम्हारके व्यापारसे 'मिट्टी' नामके स्थानमें 'घट' नाम प्राप्त हो जाता है। इसलिये मायाकी व्याख्या देते समय कर्मको न लेकर नाम और रूपकोही कई बार माया कहा है। तथापि कर्मका जब स्वतंत्र विचार करना पड़ता है, तब यह कहना पड़ता है, कि कर्मस्वरूप और मायास्वरूप एकही हैं। इसलिये आरंभहीमें
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यह कह देना अधिक सुभीतेकी बात होगी, कि माया, नामरूप और कर्म, ये तीनों मूलमें एकस्वरूपीही हैं। हाँ; उसमेंभी यह विशिष्टार्थक सूक्ष्म भेद किया जा सकता है, कि माया एक सामान्य शब्द है; और उसीके दिखावेको नामरूप तथा व्यापारको कर्म कहते हैं। पर साधारणतया यह भेद दिखलानेकी आवश्यकता नहीं होती। इसीलिये इन तीनों शब्दोंका बहुधा समान अर्थमेंही प्रयोग किया जाता है। परब्रह्मके एक भागपर विनाशी मायाका जो आच्छादन (अथवा उपाधि = ऊपरका उड़ौना) हमारी आँखोंको दिखता है, उसीको सांख्यशास्त्रमें ‘त्रिगुणात्मक प्रकृति’ कहा गया है। सांख्यवादी पुरुष और प्रकृति, इन दोनों तत्त्वोंको स्वयंभू, स्वतंत्र और अनादि मानते हैं; परंतु माया, नामरूप अथवा कर्म, क्षण-क्षणमें बदलते रहते हैं। इसलिये उनको नित्य और अविकारी परब्रह्मकी योग्यताका – अर्थात् स्वयंभू और स्वतंत्र मानना न्याय-दृष्टिसे अनुचित है। क्योंकि नित्य और अनित्य, ये दोनों कल्पनाएँ परस्पर-विरुद्ध हैं; और इसलिये दोनोंका अस्तित्व एकही कालमें संभव नहीं माना जा सकता। इसलिये वेदान्तियोंने यह निश्चित किया है, कि विनाशी प्रकृति अथवा कर्मात्मक माया स्वतंत्र नहीं है; किंतु एक नित्य, सर्वव्यापी और निर्गुण परब्रह्ममेंही, मनुष्यकी दुर्बल इंद्रियोंको सगुण मायाका दिखावा दीख पड़ता है। परंतु केवल इतनाही कह देनेसे काम नहीं चल जाता, कि माया परतंत्र है; और निर्गुण परब्रह्ममेंही यह दृश्य दिखाई देता है। गुणपरिणामसे न सही; तोभी विवर्तवादसे निर्गुण और नित्य ब्रह्ममें विनाशी सगुण नामरूपोंका – अर्थात् मायाका दृश्य दिखना चाहे संभव हो; तथापि यहाँ एक और प्रश्न उपस्थित होता है, कि मनुष्यकी इंद्रियोंको दीखनेवाला यह सगुण दृश्य निर्गुण परब्रह्ममें पहलें पहल किस क्रमसे, कब और क्यों दीखने लगा? अथवा यही अर्थ व्यावहारिक भाषामें इस प्रकार कहा जा सकता है, कि नित्य और चिद्रूपी परमेश्वरने नामरूपात्मक, विनाशी और जड़ सृष्टि कब और क्यों उत्पन्न की? परंतु ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें जैसा कि वर्णन किया गया है, यह विषय मनुष्यकेही लिये नहीं; किंतु देवताओंके लिये और वेदोंके लियेभी अगम्य है (ऋ. १०. १२९; तै. ब्रा. २. ८. ९)। इसलिये उक्त प्रश्नका इससे अधिक और कुछ उत्तर नहीं दिया जा सकता, कि "ज्ञानदृष्टिसे निश्चित किये हुए निर्गुण पर- ब्रह्मकीही यह एक अतर्क्य लीला है” (वे. सू. २. १. ३३)। अतएव इतना मान करही आगे चलना पड़ता है, कि जबसे हम देखते आये हैं, तबसे निर्गुण ब्रह्मके साथही नामरूपात्मक विनाशी कर्म अथवा सगुण माया हमें दृग्गोचर होती आई है। इसीलिये वेदान्तसूत्रमें कहा है, कि मायात्मक कर्म अनादि है (वे. सू. २. १. ३५-३७); और भगवद्गीतामेंभी भगवानने पहले यह वर्णन करके, कि प्रकृति स्वतंत्र नहीं है – “मेरीही माया है” (गीता ७. १४); – फिर आगे कहा है, कि प्रकृति अर्थात् माया, और पुरुष, दोनों ‘अनादि’ हैं (गीता १३. १९)। इसी
२६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तरह श्रीशंकराचार्यने अपने भाष्यमें मायाका लक्षण देते हुए कहा है, कि “ सर्वज्ञ- श्वरस्याऽऽत्मभूते इवाऽविद्याकल्पिते नामरूपे तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये संसार- प्रपंचबीजभूते सर्वज्ञस्येश्वरस्य ‘माया’ ‘शक्तिः’ ‘प्रकृति’ रिति च श्रुतिस्मृत्योरभि- लप्येते ” (वे. सू. शां. भा. २. १. १४)। इसका भावार्थ यह है, कि – “ (इंद्रियोंके) अज्ञानसे मूल ब्रह्ममें कल्पित नामरूपोंकोही श्रुति और स्मृति-ग्रंथोंमें सर्वज्ञ ईश्वरकी ‘माया’, ‘शक्ति’ अथवा ‘प्रकृति’ कहते हैं। ये नामरूप सर्वज्ञ परमेश्वरके आत्म- भूत-से जान पड़ते हैं, परंतु इनके जड़ होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि ये परब्रह्मसे भिन्न हैं या अभिन्न ( तत्त्वान्यत्व ) ? और यही जड़ सृष्टि ( दृश्य )के विस्तारके मूल हैं”; और “ इस मायाके योगसेही यह सृष्टि परमेश्वर-निर्मित दीख पड़ती है; इस कारण यह माया चाहे विनाशी हो; तथापि दृश्य सृष्टिकी उत्पत्तिके लिये आवश्यक और अत्यंत उपयुक्त है; तथा इसीको उपनिषदोंमें अव्यक्त, आकाश, अक्षर इत्यादि नाम दिये गये हैं ” ( वे. सू. शां. भा. १. ४. ३)। इससे दीख पड़ेगा, कि चिन्मय ( पुरुष ) और अचेतन माया ( प्रकृति ) इन दोनों तत्त्वोंको सांख्यवादी स्वयंभू, स्वतंत्र और अनादि मानते हैं; पर मायाका अनादित्व यद्यपि वेदान्ती एक तरहसे स्वीकार करते हैं तथापि यह उन्हें मान्य नहीं, कि माया स्वयंभू और स्वतंत्र है। और इसी कारण संसारात्मक मायाका वृक्षरूपसे वर्णन करते समय गीतामें ( गीता १५. ३ ) कहा गया है, कि “ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ” – इस संसारवृक्षका रूप, अंत, आदि मूल अथवा ठौर नहीं मिलता। इसी प्रकार तीसरे अध्यायमें ऐसे जो वर्णन हैं, कि “ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ” ( गीता ३. १५ ) – ब्रह्मसे कर्म उत्पन्न हुआ; “ यज्ञः कर्मसमुद्भवः ” ( गीता ३. १४ ) – यज्ञभी तो कर्मसेही उत्पन्न होता है। अथवा “ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा ” ( गीता ३. १० ) – ब्रह्मादेवने प्रजा ( सृष्टि ) और यज्ञ ( कर्म ), दोनोंको साथही निर्माण किया; इन सबका तात्पर्यभी यही है, कि “ कर्म अथवा कर्मरूपी यज्ञ और सृष्टि अर्थात् प्रजा, ये सब साथही उत्पन्न हुए हैं। ” फिर चाहे इस सृष्टिको प्रत्यक्ष ब्रह्मादेवसे निर्मित कहो अथवा मीमांसकोंकी नाईं यह कहो, कि उस ब्रह्मादेवने नित्य वेद-शब्दोंसे उसको बनाया – दोनोंका अर्थ एकही है ( मभा. शां. २३१; मनु. १. २१ )। सारांश, दृश्य सृष्टिका निर्माण होनेके समय मूल निर्गुण ब्रह्ममें जो व्यापार दीख पड़ता है; वही कर्म है। इस व्यापारकोही नाम-रूपात्मक माया कहा गया है; और इस मूल कर्मसेही सूर्य-चंद्र आदि सृष्टिके सब पदार्थोंके व्यापार आगे परंपरासे उत्पन्न हुए हैं ( बृ. ३. ८. ९)। ज्ञानी पुरुषोंने अपनी बुद्धिसे निश्चित किया है, कि संसारके सारे व्यापारोंका मूलभूत जो यह सृष्ट्युत्पत्ति-कालका कर्म अथवा
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६७ माया है, सो ब्रह्मकीही कोई न कोई अतर्क्य लीला है, स्वतंत्र वस्तु नहीं है।* परंतु ज्ञानी पुरुषोंकी गति यहांपर कुंठित हो जाती है इसलिये इस बातका पता नहीं लगता, कि यह लीला, नामरूप अथवा मायात्मक कर्म 'कब' उत्पन्न हुआ ? अतः केवल कर्म-सृष्टिकाही विचार जब करना होता है, तब इस परतंत्र और विनाशी मायाको तथा मायाके साथही तदंगभूत कर्मकोभी वेदान्तशास्त्रमें 'अनादि' कहा करते हैं ( वे. सू. २. १. ३५)। स्मरण रहे, कि जैसा सांख्यवादी कहते हैं, उस प्रकार, अनादिका यह मतलब नहीं है, कि माया मूलमेंही परमेश्वरकी बराबरीकी, निरारंभ और स्वतंत्र है - परंतु यहाँ अनादि शब्दका यह अर्थ विवक्षित है कि वह दुर्ज्ञेयारंभ है - अर्थात् उसका आदि ( आरंभ ) मालूम नहीं होता । परंतु यद्यपि हमें इस बातका पता नहीं लगता, कि चिद्रूप ब्रह्म कर्मात्मक अर्थात् दृश्य सृष्टि-रूप कब और क्यों होने लगा ? तथापि इस मायात्मक कर्मके अगले सब व्यापारोंके नियम निश्चित हैं; और उनमेंसे बहुतेरे नियमोंको हम निश्चित रूपसे जानभी सकते हैं। आठवें प्रकरणमें सांख्यशास्त्रके अनुसार इस बातका विवेचन किया गया है, कि मूल प्रकृतिसे अर्थात् अनादि मायात्मक कर्मसेही आगे चलकर सृष्टिके नाम-रूपात्मक विविध पदार्थ किस क्रमसे निर्मित हुए; और वहीं आधुनिक आधिभौतिक शास्त्रके सिद्धान्तभी तुलनाके लिये बतलाये गये हैं। यह सच है, कि वेदान्तशास्त्र प्रकृतिको परब्रह्मकी तरह स्वयंभू नहीं मानता; परंतु प्रकृतिके अगले विस्तारका जो क्रम सांख्यशास्त्रमें कहा गया है, वही वेदान्तकोभी मान्य है; इसलिये यहाँ उसकी पुनरुक्ति नहीं की जाती। कर्मात्मक मूल प्रकृतिसे विश्वकी उत्पत्तिका जो क्रम पहले बतलाया गया है, उसमें, उन सामान्य नियमोंका कुछभी विचार नहीं हुआ, कि जिनके अनुसार मनुष्यको कर्म-फल भोगने पड़ते हैं। इसलिये अब उन नियमोंका विवेचन करना आवश्यक है। इसीको 'कर्मविपाक' कहते हैं। इस कर्मविपाकका पहला नियम यह है, कि जहाँ एक बार कर्मका आरंभ हुआ कि फिर उसका व्यापार आगे बराबर अखंड जारी रहता है; और जब ब्रह्म- हराका दिन समाप्त होनेपर सृष्टिका संहार होता है, तबभी यह कर्म बीजरूपसे बना रहता है, एवं फिर जब सृष्टिका आरंभ होने लगता है, तब उसी कर्मबीजसे फिर पूर्ववत् अंकुर फूटने लगते हैं। महाभारतका कथन है, कि :- येषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ अर्थात् "पूर्वकी सृष्टिमें प्रत्येक प्राणीने जो जो कर्म किये होंगे, ठीक वेही कर्म उसे (चाहे उसकी इच्छा हो या न हो) फिर यथापूर्व प्राप्त होते रहते हैं" (मभा.
- "What belongs to mere appearance is necessarily subordina- ted by reason to the nature of the thing in itself." Kant's Metaphy- sic of Morals ( Abbot's trans. in Kant's Theory of Ethics, p. 81 ).
२६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शां. २३१. ४८, ४९ और गीता ८. १८ तथा १९) । गीतामें (गीता ४. १७) कहा है, कि "गहना कर्मणो गतिः" - कर्मकी गति कठिन है, इतनाही नहीं; किंतु कर्मका बंधनभी बड़ा कठिन है। कर्म किसीसेभी नहीं छूट सकता । वायु कर्मसेही चलती है; सूर्य-चंद्रादिक कर्मसेही घूमा करते हैं; और ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सगुण देवताभी कर्मोंमेंही बँधे हुए हैं। फिर इंद्र आदिकोंका क्या पूछना है ? सगुणका अर्थ है नामरूपात्मक; और नामरूपात्मकका अर्थ है कर्म या कर्मका परिणाम । जब कि यही बतलाया नहीं जा सकता, कि मायात्मक कर्म आरंभमें कैसे उत्पन्न हुआ; तब यह कैसे बतलाया जावे, कि तदंगभूत मनुष्य इस कर्म-चक्रमें पहले पहल कैसे फँस गया ? परंतु किसीभी रीतिसे क्यों न हो; जब वह एक बार कर्म- बंधनमें पड़ चुका, तब फिर आगे चलकर उसकी एक नामरूपात्मक देहका नाश होनेपर कर्मके परिणामके कारण उसे इस सृष्टिमें भिन्न भिन्न रूपोंका मिलना कभी नहीं छूटता । क्योंकि आधुनिक आधिभौतिक शास्त्रकारोंनेभी अब यह निश्चित किया है,* कि कर्मशक्तिका कभीभी नाश नहीं होता; किंतु जो शक्ति आज किसी एक नामरूपसे दीख पड़ती है, वही शक्ति उस नामरूपके नाश होनेपर दूसरे नाम- रूपसे प्रकट हो जाती है। और जब कि किसी एक नामरूपके नाश होनेपर उसको भिन्न भिन्न नामरूप प्राप्त हुआही करते हैं, तब यहभी नहीं माना जा सकता, कि ये भिन्न भिन्न नामरूप निर्जीवही होंगे; अथवा ये भिन्न प्रकारके होही नहीं सकते । अध्यात्मदृष्टिसे इस नामरूपात्मक परंपराकोही जन्म-मरणका चक्र या संसार कहते हैं। और इन नामरूपोंकी आधारभूत शक्तिको समष्टिरूपसे ब्रह्म, और व्यष्टि रूपसे जीवात्मा कहा करते हैं। वस्तुतः देखनेसे यह विदित होगा, कि यह आत्मा न तो जन्म धारण करता है; और न मरताही है। अर्थात् यह नित्य अथवा स्थायी है। परंतु कर्मबंधनमें पड़ जानेके कारण एक नामरूपके नाश हो जाने पर उसीको दूसरे नामरूपोंका प्राप्त होना टल नहीं सकता । आजका कर्म कल भोगना पड़ताहै, और कलका परसों । इतनाही नहीं; किंतु इस जन्ममें जो कुछ किया
- यह बात नहीं, कि पुनर्जन्मकी इस कल्पनाको केवल हिंदुधर्मने या केवल आस्तिकवादियोनेही माना हो । यद्यपि बौद्ध लोग आत्माको नहीं मानते, तथापि वैदिक धर्ममें वर्णित पुनर्जन्मकी कल्पनाको उन्होंने अपने धर्ममें पूर्ण रीतिसे स्थान दिया है; और बीसवीं शताब्दीमें "परमेश्वर मर गया" कहनेवाले पक्के निरीश्वर- वादी जर्मन पंडित नित्शेनेभी पुनर्जन्मवादको स्वीकार किया है। उसने लिखा है, कि कर्म-शक्तिके जो हमेशा रूपांतर हुआ करते हैं, वे मर्यादित हैं; तथा काल अनंत है; इसलिये कहना पड़ता है, कि एक बार जो नामरूप हो चुके हैं, वेही फिर आगे यथापूर्व कभी न कभी अवश्य उत्पन्न होतेही हैं, और इसीसे कर्मका चक्र अर्थात् बंधन केवल आधिभौतिक दृष्टिसेही सिद्ध हो जाता है। उसने यहभी लिखा है, कि यह कल्पना और उपपत्ति मुझे अपनी स्फूर्तिसे मालूम हुई है ! Nietzsche's Eternal Recurrence (Complete Works, Engl. Trans., Vol. XVI, pp. 235-256).
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २६९ जाय, उसे अगले जन्ममें भोगना पड़ता है - इस तरह यह भवचक्र सदैव चलता रहता है। मनुस्मृति तथा महाभारतमें ( मनु. ४. १७३; मभा. आ. ८०. ३ ) तो कहा गया है, कि इन कर्मफलोंको न केवल हमें, किंतु कभी कभी हमारी नामरूपात्मक देहसे उत्पन्न हमारे लड़कों और नातियोंतककोभी भोगना पड़ता है। शांतिपर्वमें भीष्म युधिष्ठिरसे कहते हैं :- पापं कर्म कृतं किंचिद्यदि तस्मिन्न दृश्यते । नृपते तस्य पुत्रेषु पौत्रेष्वपि च नप्तृषु ॥ अर्थात् " हे राजा ! यदि किसी आदमीको उसके पाप-कर्मोंका फल मिलते हुए न दीख पड़े; उसके पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रोंतकको उसे भोगना पड़ता है" ( मभा. शां. १२९. २१ )। हम लोग प्रत्यक्ष देखा करते हैं, कि कोई कोई असाध्य रोग वंशपरंपरासे प्रचलित रहते हैं। इसी तरह कोई जन्मसेही दरिद्री होता है; और कोई वैभवपूर्ण राजकुलमें उत्पन्न होता है। इन सब बातोंकी उपपत्ति केवल कर्मवादसेही लगाई जा सकती है; और बहुतोंका मत है, कि यही कर्मवादकी सच्चाईका प्रमाण है। कर्मका यह चक्र जब एक बार आरंभ हो जाता है, तब फिर उसे परमेश्वरभी नहीं रोक सकता। यदि इस दृष्टिसे देखें, कि सारी सृष्टि परमेश्वरकी इच्छासेही चल रही है; तो कहना न होगा कि, कर्म-फलका देनेवाला परमेश्वरसे भिन्न कोई दूसरा हो नहीं सकता ( वे. सू. ३. २. ३८; कौ. ३. ८ )। और इसीलिये भगवान्ने कहा है, कि "लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्" ( गीता. ७. २२ ) - मैं जिस फलका निश्चय कर दिया करता हूँ, वही इच्छित फल मनुष्यको मिलता है। परंतु कर्म-फलको निश्चित कर देनेका काम यद्यपि ईश्वरका है, तथापि वेदान्तशास्त्रका यह सिद्धान्त है, कि ये फल हर एकके खरे-खोटे कर्मोंकी अर्थात् कर्म-अकर्मकी योग्यताके अनुरूपही निश्चित किये जाते हैं; इसीलिये परमेश्वर इस संबंधमें वस्तुतः उदासीनही है। अतः यदि मनुष्योंमें भले-बुरेका भेद हो जाता है, तो उसके लिये परमेश्वर वैषम्य ( विषम बुद्धि ) और नैर्घृण्य ( निर्दयता ) दोषोंको पात्र नहीं होता ( वे. सू. २. १. ३४ )। इसी आशयको लेकर गीतामेंभी कहा है, कि "समोऽहं सर्वभूतेषु" ( गीता ९. २९ ) अर्थात् ईश्वर सबके लिये समान है; अथवा :- नादत्ते कस्यचित् पापं न चैवं सुकृतं विभुः ॥ " परमेश्वर न तो किसीके पापको लेता है, न पुण्यको; कर्म या मायाके स्वभावका चक्र चलता रहता है; जिससे प्राणिमात्रको अपने अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं," ( गीता ५. १४, १५)। सारांश, यद्यपि मानवी बुद्धिसे इस बातका पता नहीं लगता, कि परमेश्वरकी इच्छासे संसारके कर्मका आरंभ कब हुआ और तदंगभूत मनुष्य कर्मके बंधनमें पहले पहल कैसे फँस गया ? तथापि जब हम देखते हैं, कि कर्मके आगामी परिणाम या फल केवल कर्मके नियमोंसेही उत्पन्न हुआ करते
२७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हैं; तब हम अपनी बुद्धिसे इतना तो अवश्य निश्चय कर सकते हैं, कि संसारके आरंभसे प्रत्येक प्राणी नामरूपात्मक अनादि कर्मकी कैदमें बँध-सा गया है। “कर्मणा बध्यते जन्तुः” - ऐसा जो इस प्रकरणके आरंभमेंही वचन दिया हुआ है, उसका अर्थभी यही है। इस अनादि कर्मप्रवाहके औरभी दूसरे अनेक नाम हैं, जैसे संसार, प्रकृति, माया, दृश्य सृष्टि, सृष्टिके कायदे या नियम इत्यादि। क्योंकि सृष्टिशास्त्रके नियम नामरूपोंमें होनेवाले परिवर्तनोंकेही नियम हैं। और यदि इस दृष्टिसे देखें, तो सब आधिभौतिक शास्त्र नाम-रूपात्मक मायाके प्रपंचमेंही आ जाते हैं। इस मायाके नियम तथा बंधन सुदृढ एवं सर्वव्यापी हैं। इसीलिये हेकेल जैसे आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंने - जो इस नामरूपात्मक माया अथवा दृश्य सृष्टिके मूलमें अथवा उससे परे किसी नित्य तत्त्वका अस्तित्व नहीं मानते; यह सिद्धान्त किया है, कि यह सृष्टि-चक्र मनुष्यको जिधर ढकेलता जायेगा, उधरही उसे जाना पड़ता है। इन पंडितोंका कथन है, कि प्रत्येक मनुष्यको जो ऐसा मालूम होता रहता है, कि नामरूपात्मक विनाशी स्वरूपसे मेरी मुक्ति होनी चाहिये; अथवा अमुक काम करनेसे मुझे अमृतत्व मिलेगा - यह सब केवल भ्रम है। आत्मा या परमात्मा कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं है; और अमृतत्वभी झूठ है; इतनाही नहीं, किंतु इस संसारमें कोईभी मनुष्य अपनी इच्छासे कुछ काम करनेको स्वतंत्र नहीं है। मनुष्य आज जो कुछ कार्य करता है, वह पूर्वकालमें किये गये स्वयं उसके या उसके पूर्वजोंके कर्मोंका परिणाम है, इससे उक्त कार्यका करना या न करनाभी उसकी इच्छापर कभी अवलंबित नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, किसीकी एक-आध उत्तम वस्तुको देखकर, पूर्वकर्मोंसे अथवा वंशपरंपरागत संस्कारोंसे, उसे चुरा लेनेकी बुद्धि, कई लोगोंके मनमें इच्छा न रहनेपरभी, उत्पन्न हो जाती है; और वे उस वस्तुको चुरा लेनेके लिये प्रवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् इन आधिभौतिक पंडितोंके मतका सारांश यही है, कि गीतामें जो यह तत्त्व बतलाया गया है, कि “अनिच्छन् अपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः” (गीता ३. ३६) - इच्छाके न रहनेपरभी मनुष्य पाप करता है ! वही तत्त्व सभी जगह एक समान उपयोगी है, उसके लिये एकभी अपवाद नहीं है; और उससे बचनेकाभी कोई उपाय नहीं है। इस मतके अनुसार यदि देखा जाय, तो मानना पड़ेगा कि मनुष्यकी जो बुद्धि या इच्छा आज उत्पन्न होती है, वह कलके कर्मोंका फल है; तथा कल जो बुद्धि उत्पन्न हुई थी, वह परसोंके कर्मोंका फल था; और ऐसा होते होते इस कारणपरंपराका कभी अंतही नहीं होगा; तथा यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य अपनी स्वतंत्र बुद्धिसे कभी कुछभी नहीं कर सकता - जो कुछ होता है वह सब पूर्व-कर्म अर्थात् दैवकाभी फल है। क्योंकि प्राक्तन-कर्मकोही लोग दैव कहा करते हैं। इस प्रकार यदि किसी कर्मको करने अथवा न करनेकी मुष्यको कोई स्वतंत्रताही नहीं है; तो फिर यह कहनाही व्यर्थ
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २७१
है, कि मनुष्यको अपना आचरण अमुक रीतिसे सुधार लेना चाहिये; और अमुक रीतिसे ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान प्राप्त करके अपनी बुद्धिको शुद्ध करना चाहिये। तब तो मनुष्यकी वही दशा होती है, कि जो नदीके प्रवाहमें बहती हुई लकड़ीकी हो जाती है; अर्थात् जिस ओर माया, प्रकृति, सृष्टि-क्रम या कर्मका प्रवाह उसे खींचेगा, उसी ओर उसे चुपचाप चले जाना चाहिये। फिर चाहे उसमें अधोगति हो अथवा प्रगति ! इसपर कुछ अन्य आधिभौतिक उत्क्रांतिवादियोंका कहना है, कि प्रकृतिका स्वरूप स्थिर नहीं है; और नामरूप क्षण-क्षणमें बदला करते हैं; इसलिये जिन सृष्टिनियमोंके अनुसार ये परिवर्तन होते हैं, उन्हें जानकर मनुष्यको बाह्य- सृष्टिमें ऐसा परिवर्तन कर लेना चाहिये, कि जो उसे हितकारक हो; और हम देखते हैं, कि मनुष्य इसी न्यायसे प्रत्यक्ष व्यवहारोंमें अग्नि या विद्युच्छक्तिका उपयोग अपने फायदेके लिये करता है। इसी तरह यहभी अनुभवकी बात है, कि प्रयत्नसे मनुष्यस्वभावमेंभी थोड़ा-बहुत परिवर्तन अवश्य हो जाता है। परंतु प्रस्तुत प्रश्न यह नहीं है, कि सृष्टि-रचनामें या मनुष्य-स्वभावमें परिवर्तन होता है या नहीं ? और करना चाहिये या नहीं ? हमें तो पहले यही निश्चय करना है, कि ऐसा परिवर्तन करनेकी जो बुद्धि या इच्छा मनुष्यमें उत्पन्न होती है, उसे रोकने या न रोकनेकी स्वाधीनता उसमें है या नहीं। और, आधिभौतिक शास्त्रकी दृष्टिसे इस बुद्धिका होना या न होनाही यदि “बुद्धिः कर्मानुसारिणी” के न्यायके अनुसार प्रकृति, कर्म या सृष्टिके नियमोंसे पहलेही निश्चित हुआ है, तो यही निष्पन्न होता है, कि इस आधिभौतिक शास्त्रके अनुसार किसीभी कर्मको करने या न करनेके लिये मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। इस वादको ‘वासना-स्वातंत्र्य’, ‘इच्छा-स्वातंत्र्य’ या ‘प्रवृत्ति- स्वातंत्र्य' कहते हैं। केवल कर्मविपाक अथवा केवल आधिभौतिक शास्त्रकी दृष्टिसे विचार किया जाय, तो अंतमें यही सिद्धान्त करना पड़ता है, कि मनुष्यको किसीभी प्रकारका प्रवृत्ति-स्वातंत्र्य या इच्छा-स्वातंत्र्य नहीं है और वह कर्मके अभेद्य बंधनोंसे वैसेही जकड़ा हुआ है, जैसे किसी गाड़ीका पहिया चारों तरफ़से लोहेकी पट्टीसे जकड़ दिया जाता है। परंतु इस सिद्धान्तकी सत्यताके लिये मनुष्योंके अंतःकरणका अनुभव गवाही देनेको तैयार नहीं है। प्रत्येक मनुष्य अपने अंतःकरणमें यहीं कहता है, कि यद्यपि मुझमें सूर्यका उदय पश्चिम दिशामें करा देनेकी शक्ति नहीं है, तोभी मुझमें इतनी शक्ति अवश्य है, कि मैं अपने हाथसे होनेवाले कार्योंकी भलाईबुराईका विचार करके उन्हें अपनी इच्छाके अनुसार करूँ या न करूँ; अथवा जब मेरे सामने पाप या पुण्य तथा धर्म या अधर्म दो मार्ग उपस्थित हों, तब उनमेंसे इस प्रकार किसी एकको स्वीकार कर लेनेके लिये मैं स्वतंत्र हूँ। अब यही देखना है, कि यह समझ सच है या झूठ ? यदि इस समझको झूठ कहें, तो हम देखते हैं, कि इसीके आधारपर चोरी, हत्या आदि अपराध करनेवालोंको अपराधी ठहराकर सजा दी जाती है; और यदि सच मानें तो कर्मवाद, कर्मविपाक या दृश्य सृष्टिके नियम
२७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मिथ्या प्रतीत होते हैं; आधिभौतिक शास्त्रोंमें केवल जड़ पदार्थोंकी क्रियाओंका ही विचार किया जाता है, इसलिये वहाँ यह प्रश्न उत्पन्न नहीं होता; परंतु जिस कर्म- योग-शास्त्रमें ज्ञानवान् मनुष्यके कर्तव्यका विवेचन करना होता है, उसमें यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है; और उसका उत्तर देनाभी आवश्यक है। क्योंकि एक बार यदि यही अंतिम निश्चय हो जाय, कि मनुष्यको कुछभी प्रवृत्ति-स्वातंत्र्य नहीं है; तो फिर अमुक प्रकारसे बुद्धिको शुद्ध करना चाहिये, अमुक कार्य करना चाहिये, अमुक नहीं करना चाहिये, अमुक धर्म्य है, अमुक अधर्म्य, इत्यादि विधिनिषेध-शास्त्रके सब झगड़ेभी आप-ही-आप मिट जायेंगे (वे. सू. २. ३. ३३); * और तब परंपरासे या प्रत्यक्ष रीतिसे महामाया प्रकृतिके दासत्वमें सदैव रहनाही मनुष्यका पुरुषार्थ हो जायगा। अथवा पुरुषार्थही काहेका? अपने बसकी बात हो, तो पुरुषार्थ ठीक है; परंतु जहाँ एक रत्तीभरभी अपनी सत्ता या इच्छा नहीं रह जाती, वहाँ दास्य और परतंत्रताके सिवा और होही क्या सकता है। हलमें जुते हुए बैलोंके समान सब लोगोंको प्रकृतिकी आज्ञामें रहकर, एक आधुनिक कविके कथनानुसार 'पदार्थ- धर्मोंकी शृंखलाओंसे' बँध जाना चाहिये। हमारे भारतवर्षमें कर्मवाद या दैववादसे और पश्चिमी देशोंमें पहले पहल ईसाई धर्मके भवितव्यवादसे तथा अर्वाचीन कालमें शुद्ध आधिभौतिक शास्त्रोंके सृष्टिक्रमवादसे इच्छा-स्वातंत्र्यके इस विषयकी ओर पंडितोंका ध्यान आकर्षित हो गया है; और इसकी बहुत-कुछ चर्चा हो चुकी है और आजभी हो रही है। परंतु यहाँ पर उसका वर्णन करना असंभव है, इसलिये इस प्रकरणमें यही बतलाया जायगा कि वेदान्तशास्त्र और भगवद्गीताने इस प्रश्नका क्या उत्तर दिया है। यह सच है, कि कर्म-प्रवाह अनादि है; और और जब एक बार कर्मका चक्र शुरू हो जाता है, तब परमेश्वरभी उसमें हस्तक्षेप नहीं करता। तथापि अध्यात्म- शास्त्रका यह सिद्धान्त है, कि दृश्य सृष्टि केवल नामरूप या कर्मही नहीं है; किंतु इस नामरूपात्मक आवरणके लिये आधारभूत एक आत्मरूपी, स्वतंत्र और अविनाशी ब्रह्मसृष्टि है; तथा मनुष्यके शरीरका आत्मा उस नित्य एवं स्वतंत्र परब्रह्महीका अंश है। इस सिद्धान्तकी सहायतासे प्रत्यक्षमें अनिवार्य दीखनेवाली उक्त अड़चन- सेभी छुटकारा पानेके लिये हमारे शास्त्रकारोंका निश्चित किया हुआ एक मार्ग है। परंतु इसका विचार करनेके पहले कर्मविपाक-क्रियाके शेष अंशका वर्णन पूरा कर
- वेदान्तसूत्रके इस अधिकरणको 'जीवकर्तृत्वाधिकरण' कहते हैं। उसका पहलाही सूत्र है- "कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् " अर्थात् विधिनिषेध शास्त्रमें अर्थ-तत्त्व होनेके लिये जीवको कर्ता मानना चाहिये। पाणिनीके 'स्वतंत्रः कर्ता' (पा. १. ४ ५४) सूत्रके 'कर्ता' शब्दसेही आत्मस्वातंत्र्यका बोध होता है; और इससे मालूम होता है, कि यह अधिकरण इसी विषयका है।
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २७३
लेना चाहिये । “जो जस करै सो तस फल चाखा” यानी - “जैसी करनी वैसी भरनी” - यह नियम न केवल एकही व्यक्तिके लिये; किंतु कुटुंब, जाति, राष्ट्र और समस्त संसारके लियेभी उपयुक्त होता है । और चूंकि प्रत्येक मनुष्यका किसीन- किसी कुटुंब, जाति, अथवा देशमें समावेश हुआही करता है; इसलिये उसे स्वयं अपने कर्मोंके साथ-साथ कुटुंब आदिके सामाजिक कर्मोंके फलोंकोभी अंशतः भोगना पड़ता है। परंतु व्यवहारमें प्रायः एक मनुष्यके कर्मोंकाही विवेचन करनेका प्रसंग आया करता है - इसलिये कर्मविपाक-प्रक्रियामें कर्मके विभाग प्रायः एक मनुष्यकोही लक्ष्य करके किये जाते हैं । उदाहरणार्थ मनुष्यसे किये जानेवाले अशुभ कर्मोंके मनुजीने - कायिक, वाचिक और मानसिक इस प्रकार तीन भेद किये हैं । व्यभिचार, हिंसा और चोरी - इन तीनोंको कायिक; कटु, मिथ्या, ताना मारना और असंगत बोलना - इन चारोंको वाचिक; और पर-द्रव्याभिलाषा, दूसरोंका अहित-चिंतन और व्यर्थ आग्रह करना - इन तीनोंको मानसिक पाप कहते हैं । सब मिलाकर दस प्रकारके अशुभ या पापकर्म बतलाये गये हैं (मनु. १२. ५-७; महा. अनु. १३) और आगे इनके फलभी कहे गये हैं। परंतु ये भेद कुछ स्थायी नहीं हैं। क्योंकि इसी अध्यायमें सब कर्मोंके फिरभी - सात्त्विक, राजस, और तामस - तीन भेद किये गये हैं; और प्रायः भगवद्गीतामें दिये गये वर्णनके अनुसार इन तीनों प्रकारके गुणों या कर्मोंके लक्षणभी बतलाये गये हैं (गीता १४. ११-१५; १८. २३-२५; मनु. १२. ३१-३४) । परंतु कर्मविपाक-प्रकरणमें कर्मका जो सामान्यतः विभाग पाया जाता है; वह इन दोनोंसेभी भिन्न है, उसमें कर्मके संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण-ये तीन भेद किये जाते हैं। किसी मनुष्यके द्वारा इस क्षणतक किया गया जो कर्म है - चाहे वह इस जन्ममें किया गया हो या पूर्वजन्ममें - वह उसका संचित अर्थात् ‘एकत्रित’ कर्म कहा जाता है। इसी ‘संचित’का दूसरा नाम ‘अदृष्ट’ और मीमांसकोंकी भाषामें ‘अपूर्व’भी है। इन नामोंके देनेका कारण यह है, कि जिस समय कर्म या क्रिया की जाती है, उसी समयके लिये वह दृश्य रहती है और उस समयके बीत जानेपर वह क्रिया स्वरूपतः शेष नहीं रहती किंतु उसके सूक्ष्म अतएव अदृश्य अर्थात् अपूर्व और विलक्षण परिणामही बाकी रह जाते हैं (वे. सू. शां. भा. ३. २. ३९, ४०) । कुछभी हो; परंतु इसमें संदेह नहीं, कि इस क्षणतक जो जो कर्म किये गये होंगे, इन सबके परिणामोंके संग्रहकोही ‘संचित’, ‘अदृश्य’ या ‘अपूर्व’ कहते हैं। उन सब संचित कर्मोंको एकदम भोगना असंभव है। क्योंकि इनके परिणामोंसे कुछ परस्पर-विरोधी अर्थात् भले और बुरे, दोनों प्रकारके फल देनेवाले हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, कोई ‘संचित’ कर्म स्वर्गप्रद और कोई नरकप्रदभी होते हैं इसलिये इन दोनोंके फलोंको एकही समय भोगना संभव नहीं है-इन्हें एकके बाद एक भोगना पड़ता है। अतएव ‘संचित’मेंसे जितने कर्मोंके फलोंको भोगना पहले शुरू होता है, उतनेहीको ‘प्रारब्ध’ अर्थात् आरंभित ‘संचित’ गी. र. १८
२७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कहते हैं । व्यवहारमें संचितके अर्थमेंही 'प्रारब्ध' शब्दका उपयोग किया जाता है; परंतु यह भूल है । शास्त्रदृष्टिसे यही प्रकट होता है, कि 'संचितके अर्थात् भूतपूर्व कर्मोंके संग्रहके एक छोटेभेदकोही 'प्रारब्ध' कहते हैं । 'प्रारब्ध कुछ समस्त'संचित नहीं है । संचितके जितने भागके फलोंका (कार्योंका) भोगना आरंभ हो गया हो, उतनाही प्रारब्ध है, और इसी कारणसे प्रारब्धका दूसरा नाम आरब्ध-कर्म है । प्रारब्ध और संचितके अतिरिक्त कर्मका क्रियमाण नामक एक और तीसरा भेद है । 'क्रियमाण' वर्तमानकालवाचक धातुसाधित शब्द है, और उसका अर्थ है - "जो कर्म अभी हो रहा है, अथवा जो कर्म अभी किया जा रहा है ।" परंतु वर्तमान समयमें हम जो कुछ करते हैं, वह प्रारब्ध कर्मकाही (अर्थात् संचित कर्मोंमेंसे जिन कर्मोंका भोगना शुरू हो गया है, उनकाही) परिणाम है; अतएव 'क्रियमाण'को कर्मका तीसरा भेद माननेके लिये हमें कोई कारण दीख नहीं पड़ता । हाँ, यह भेद दोनोंमें अवश्य किया जा सकता है, कि प्रारब्ध कारण है और क्रियमाण उसका फल अर्थात् कार्य है । परंतु कर्म-विपाक-प्रक्रियामें इस भेदका कुछ उपयोग नहीं हो सकता । संचितमेंसे जिन कर्मोंके फलोंका भोगना अभीतक आरंभ नहीं हुआ है, उनका - अर्थात् संचितमेंसे प्रारब्धको घटा देनेपर जो कर्म बाकी रह जायें, उनका - बोध करानेके लिये किसी दूसरे शब्दकी आवश्यकता है । इसलिये वेदान्तसूत्र (वे. सू. ४. १. १५)में प्रारब्धही-को प्रारब्ध-कर्म और जो प्रारब्ध नहीं हैं, उन्हें अनारब्ध-कार्य कहा है । हमारे मतानुसार संचित कर्मोंके इस रीतिसे प्रारब्ध-कार्य और अनारब्ध-कार्य - दो भेद करनाही शास्त्रदृष्टिसे अधिक युक्तिपूर्ण मालूम होता है । इसलिये 'क्रियमाण'को धातुसाधित वर्तमानकालवाचक न समझ- कर "वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा" इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार (पा. ३. ३. १३१) भविष्यकालवाचक समझें, तो उसका अर्थ "जो आगे शीघ्रही भोगनेका है" - किया जा सकेगा; और तब 'क्रियमाण'काही अर्थ अनारब्ध-कार्य हो जायगा; एवं 'प्रारब्ध' तथा 'क्रियमाण' ये दो शब्द क्रमसे वेदान्तसूत्रके 'आरब्ध-कार्य' और 'अनारब्ध-कार्य' शब्दोंसे समानार्थक हो जायँगे । परंतु क्रियमाणका ऐसा अर्थ आजकल कोई नहीं करता; उसका अर्थ प्रचलित कर्मही लिया जाता है । इसपर यह आक्षेप है, कि ऐसा अर्थ लेनेसे प्रारब्धके फलकोही क्रियमाण कहना पड़ता है; और जो कर्म अनारब्ध-कार्य हैं, उनका बोध करानेके लिये संचित, प्रारब्ध तथा क्रियमाण, इन तीनों शब्दोंमें कोईभी शब्द पर्याप्त नहीं होता । इसके अतिरिक्त क्रियमाण शब्दके रूढार्थको छोड़ देनाभी अच्छा नहीं है । इसलिये कर्म-विपाक-प्रक्रियामें संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण कर्मके इन लौकिक भेदोंको न मानकर हमने उसके अनारब्ध- कार्य और आरब्ध-कार्यसे ये दोही वर्ग किये हैं; और येही शास्त्रदृष्टिसेभी सुभीतेके हैं । 'भोगना' क्रियाके कालकृत तीन भेद होते हैं - जो भोगा जा चुका है (भूत), जो भोगा जा रहा है (वर्तमान) और जिसे आगे भोगना है (भविष्य) । परंतु
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २७५ कर्म-विपाक-क्रियामें इस प्रकार कर्मके तीन भेद नहीं हो सकते, क्योंकि संचितमेंसे जो कर्म प्रारब्ध होकर भोगे जाने हैं, उनके फल फिरभी संचितहीमें जा मिलते हैं। इसलिये कर्म-भोगका विचार करते समय संचितके येही दो भेद हो सकते हैं - (१) वे कर्म, जिनका भोगना शुरू हो गया है अर्थात् प्रारब्ध; और (२) जिनका भोगना शुरू नहीं हुआ है अर्थात् अनारब्ध। इन दो भेदोंसे अधिक भेद करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार सब कर्मोंके फलोंका द्विविध वर्गीकरण करके उनके उपभोगके संबंधमें कर्म-विपाक-प्रक्रिया यह बतलाती है, कि संचितही कुल भोग्य है। इनमेंसे जिन कर्म-फलोंका उपभोग आरंभ होनेसे यह शरीर या जन्म मिला है, अर्थात् संचितमेंसे जो कर्म प्रारब्ध हो गये हैं; उन्हें भोगे बिना छुटकारा नहीं है - "प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः।" जब एक बार हाथसे बाण छूट जाता है, तब वह लौटकर आ नहीं सकता; अंततक चलाही जाता है; अथवा जब एक बार कुम्हारका चक्र घुमा दिया जाता है तब उसकी गतिका अंत होनेतक वह घूमताही रहता है; ठीक इसी तरह 'प्रारब्ध'कर्मोंकी - अर्थात् जिनके फलका भोग होना शुरू हो गया है, उनकीभी - अवस्था होती है। जो शुरू हो गया है, उसका अंत होनाही चाहिये, इसके सिवा दूसरी गति नहीं है। परंतु अनारब्ध-कार्य-कर्मका ऐसा हाल नहीं है - इन सब कर्मोंका ज्ञानसे पूर्णतया नाश किया जा सकता है। प्रारब्ध-कार्य और अनारब्ध-कार्यमें जो यह महत्त्वपूर्ण भेद है, उसके कारण ज्ञानी पुरुषको ज्ञान होनेके बादभी नैसर्गिक रीतिसे मृत्यु होनेतक - अर्थात् जन्मके साथही प्रारब्ध हुए कर्मोंका अंत होनेतक - शांतिके साथ राह देखनी पड़ती है। ऐसा न करके यदि वह हठसे देहत्याग करे, तो ज्ञानसे उसके अनारब्ध-कर्मोंका क्षय हो जानेपरभी उसके हठसे देहारंभक प्रारब्ध-कर्मोंका भोग अपूर्ण रह जायगा, जिन्हें भोगनेके लिये उसे फिरभी जन्म लेना पड़ेगा; एवं उसके मोक्षमेंभी बाधा आ जायगी - यह वेदान्त और सांख्य, दोनो शास्त्रोंका निर्णय है (वे. सू. ४. १. १३-१५; तथा सां. का. ६७)। उक्त बाधाके सिवा हठसे आत्महत्या करना एक नया ही कर्म हो जायगा; और उसके फल भोगनेके लिये नया जन्म लेनेकी फिरभी आवश्यकता होगी। इससे साफ़ जाहिर होता है, कि कर्मशास्त्रकी दृष्टिसेभी आत्महत्या करना मूर्खताही है। कर्मफल-भोगकी दृष्टिसे कर्मके भेदोंका वर्णन हो चुका। अब इसका विचार किया जायगा, कि कर्मबंधनसे छुटकारा कैसे अर्थात् किस युक्तिसे हो सकता है? पहली युक्ति कर्मवादियोंकी है। ऊपर बतलाया जा चुका है, कि अनारब्ध-कार्यभविष्यमें भुगते जानेवाले संचित कर्मोंको कहते हैं - फिर इन कर्मोंको चाहे इसी जन्ममें भोगना पड़े या उसके लिये औरभी दूसरे जन्म लेने पड़ें। परंतु इस अर्थकी ओर ध्यान न दे कर कुछ मीमांसकोंने कर्मबंधनसे मुक्त होकर मोक्ष पानेका अपने मतानुसार सहज मार्ग ढूंढ निकाला है। तीसरे प्रकरणमें कहे अनुसार, मीमांसकोंकी दृष्टिसे समस्त कर्मोंके नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध ऐसे चार भेद होते हैं। इनमेंसे संध्या
आदि नित्यकर्मोंको न करनेसे पाप लगता है; और नैमित्तिक कर्म तभी करने पड़ते ह, कि जब उनके लिये कोई निमित्त उपस्थित हो। इसलिये मीमांसकोंका कहना है, कि इन दोनों कर्मोंको करनाही चाहिये । बाकी रहे काम्य और निषिद्ध कर्म । इनमेंसे निषिद्ध कर्म करनेसे पाप लगता है, इसलिये नहीं करने चाहिये; और काम्य कर्मोंको करनेसे उसके फलोंको भोगनेके लिये फिरभी जन्म लेना पड़ता है, इसलिये उन्हेंभी नहीं करना चाहिये । इस प्रकार भिन्न भिन्न कर्मोंके परिणामोंके तारतम्यका विचार करके यदि मनुष्य कुछ कर्मोंको छोड़ दे और कुछ कर्मोंको शास्त्रोक्त रीतिसे करता रहे, तो वह आप-ही-आप मुक्त हो जायगा । क्योंकि इस जन्ममें प्रारब्ध कर्मोंका उपभोग कर लेने-से, उनका अंत हो जाता है - और इस जन्ममें सब नित्य- नैमित्तिक कर्मोंको करते रहनेसे तथा निषिद्ध कर्मोंसे बचते रहनेसे नरकमें नहीं जाना पड़ता; एवं काम्य कर्मोंको छोड़ देनेसे स्वर्ग आदि सुखोंके भोगनेकीभी आवश्यकता नहीं रहती । और जब इहलोक, नरक और स्वर्ग, ये तीनों गतियाँ इस प्रकार छूट जाती है, तब आत्माके लिये मोक्षके सिवा कोई दूसरी गतिही नहीं रह जाती । इस वादको 'कर्ममुक्ति' या 'नैष्कर्म्य-सिद्धि' कहते हैं । कर्म करनेपरभी जो न करनेके समान हो अर्थात् जब किसी कर्मके पाप-पुण्यका बंधन कर्ताको नहीं हो सकता, तब उस स्थितिको 'नैष्कर्म्य' कहते हैं। परंतु वेदांतशास्त्रमें निश्चय किया गया है, कि मीमांसकोंकी उक्त युक्तिसे यह 'नैष्कर्म्य' पूर्ण रीतिसे नहीं सध सकता (वे. सू. शां. भा. ४. ३ १४) ; और इसी अभिप्रायसे गीताभी कहती है. कि "कर्म न करनेसे नैष्कर्म्य नहीं होता; और छोड़ देनेसे सिद्धिभी नहीं मिलती" (गीता. ३. ४) । धर्मशास्त्रोंमें कहा गया है, कि पहले तो सब निषिद्ध कर्मोंका त्याग करनाही असंभव है और यदि कोई निषिद्ध कर्म हो जाता है, तो केवल नैमित्तिक प्रायश्चित्तसे उसके सब दोषोंका नाशभी नहीं होता । अच्छा; यदि मान लें, कि उक्त बात संभव है, तोभी मीमांसकोंके इस कथनमेंही सत्यांश नहीं दीख पड़ता, कि "प्रारब्ध कर्मोंको भोगनेसे तथा इस जन्ममें किये जानेवाले कर्मोंको उक्त युक्तिके अनुसार करने या न करने सब 'संचित' कर्मोंका संग्रह समाप्त हो जाता है" क्योंकि दो 'संचित' कर्मोंके फल परस्पर-विरोधी - उदाहरणार्थ, एकका फल स्वर्ग-सुख तथा दूसरेका फल नरक- यातना - हों, तो उन्हें एकही समयमें और एकही स्थलमें भोगना असंभव है। इस- लिये इसी जन्ममें 'प्रारब्ध' हुए कर्मोंसे तथा इसी जन्ममें किये जानेवाले कर्मोंसे सब संचित' कर्मोंके फलोंका भोगना पूरा नहीं हो सकता । महाभारतमें पराशरगीतामें कहा है:- कदाचित्सुकृतं तात कूटस्थमिव तिष्ठति । मज्जमानस्य संसारे यावद्दुःखाहिमुच्यते ॥ "कभी कभी मनुष्यके सांसारिक दुःखोंसे छूटनेतक उसका पूर्वकालमें किया गया पुण्य (उसे अपना फल देनेकी राह देखता हुआ) चुपचाप बैठा रहता है"
( मभा. शां. २९०. १७ ) ; और यही संचित पाप-कर्मोंकोभी लागू है। इस प्रकार संचित कर्मोपभोग एकही जन्ममें चुक जाता; किंतु संचित कर्मोंका एक भाग अर्थात् अनारब्ध-कार्य हमेशा बचाही रहता है, और इस जन्मके सब कर्मोंको यदि उपर्युक्त युक्तिसे करते रहें, तोभी बचे हुये अनारब्ध-कार्य संचितोंको भोगनेके लिये पुनः जन्म लेनाही पड़ता है। इसीलिये वेदान्तका सिद्धान्त है, कि मीमांसकोंकी उपर्युक्त सरल मोक्ष-युक्ति खोटी तथा भ्रांतिमूलक है। कर्मबंधनसे छूटनेका यह मार्ग किसीभी उपनिषदमें नहीं बतलाया गया है। यह केवल तर्कके आधारसे स्थापित किया गया है; परंतु यह तर्कभी अंततक नहीं टिकता । सारांश, कर्मके द्वारा कर्मसे छुटकारा पानेकी आशा रखना वैसेही व्यर्थ है जैसे एक अंधा दूसरे अंधेको रास्ता दिखलाकर पारकर दे ! अच्छा; अब यदि मीमांसकोंकी इस युक्तिको मंजूर न करें; और कर्मके बंधनोंसे छुटकारा पानेके लिये सब कर्मोंको आग्रहपूर्वक छोड़कर निरुद्योगी बन बैठें, तोभी काम नहीं चल सकता; क्योंकि अनारब्ध-कर्मोंके फलोंका भोगना तो बाकीही रहता है; और इसके साथ कर्म छोड़नेका आग्रह तथा चुपचाप बैठे रहना दोनों तामस कर्म हो जाते हैं; एवं इन तामस कर्मोंके फलोंको भोगनेके लिये फिरभी जन्म लेनाही पड़ता है ( गीता १८. ७, ८ ) । इसके सिवा गीतामें अनेक स्थलोंपर यहभी बतलाया गया है, कि जबतक शरीर है, तबतक श्वासोच्छ्वास, सोना, बैठना इत्यादि कर्म होतेही रहते हैं। इस लिये सब कर्मोंको छोड़ देनेका आग्रहभी व्यर्थही है- यथार्थमें इस संसारमें कोई क्षणभरके लियेभी कर्म करना छोड़ नहीं सकता ( गीता ३. ५; १८. ११ ) । कर्म चाहे भला हो या बुरा, परंतु उसका फल भोगनेके लिये मनुष्यको एक न एक जन्म लेकर हमेशा तैयार रहना चाहिये। कर्म अनादि है, और उसके अखंड व्यापारमें परमेश्वरभी हस्तक्षेप नहीं करता । सब कर्मोंको छोड़ देना संभव नहीं है, और मीमांसकोंके कथनानुसार कुछ कर्मोंको करनेसे और कुछ कर्मोंको छोड़ देनेसेभी कर्मबंधनसे छुटकारा नहीं मिल सकता - इत्यादि बातोंके सिद्ध हो जानेपर [यह पहला प्रश्न फिरभी उत्पन्न होता है, कि कर्मात्मक नामरूपके विनाशी चक्रमे छूट जाने एवं उसके मूलमें रहनेवाले अमृत तथा अविनाशी तत्त्वमें मिल जानेकी मनुष्यको जो स्वाभाविक इच्छा होती है, उसकी तृप्ति करनेका कौनसा मार्ग है ? वेद और स्मृतिग्रंथोंमें यज्ञयाग आदि पारलौकिक कल्याणके अनेक साधनोंका वर्णन है, परंतु मोक्षशास्त्रकी दृष्टिसे ये सब कनिष्ठ श्रेणीके हैं। क्योंकि यज्ञयाग आदि पुण्यकर्मोंके द्वारा स्वर्गप्राप्ति हो जाती है, परंतु जब उन पुण्य-कर्मोंके फलोंका अंतहो जाता है तब - चाहे दीर्घकालमेंही क्यों न हो- कभी न कभी इस कर्मभूमिमें फिर लौट कर आनाही पड़ता है ( मभा. वन. २५९, २६०; गीता ८. २५, ९. २० ) । इससे स्पष्ट हो जाता है, कि कर्मके पंजेसे बिलकुल छूटकर अमृतत्वमें मिल जानेका और जन्म-मरणकी झंझटको सदाके लिये दूर कर देनेका यह सच्चा मार्ग नहीं है। इस
२७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र झंझटको सदाके लिये दूर करनेका अर्थात् मोक्षप्राप्तिका अध्यात्मशास्त्र कथनानुसार 'ज्ञान'ही एक सच्चा मार्ग है। 'ज्ञान' शब्दका अर्थ व्यवहार-ज्ञान या नाम-रूपात्मक सृष्टिशास्त्रका ज्ञान नहीं है, किंतु यहाँ उसका अर्थ ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान है। इसीको 'विद्या'भी कहते हैं, और इस प्रकरणके आरंभमें “कर्मणा बध्यते जंतुः विद्यया तु प्रमुच्यते” - कर्मसेही प्राणी बाँधा जाता है, और विद्यासे उसका छुटकारा होता है - यह जो वचन दिया गया है, उसमें 'विद्या'का अर्थ 'ज्ञान'ही विवक्षित है, गीतामें भगवानने अर्जुनसे कहा है, कि :- ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन “ज्ञानरूप अग्निसे सब कर्म भस्म हो जाते हैं” (गीता ४. ३७)। और दोन स्थलोंपर महाभारतमेंभी कहा गया है, कि :- बीजान्यग्न्युपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः । ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः ॥ “भूना हुआ बीज जैसे उग नहीं सकता, वैसेही जब ज्ञानसे (कर्मके) क्लेश दग्ध हो जाते हैं, तब वे आत्माको पुनः प्राप्त नहीं होते” (मभा. वन. १९९. १०६, १०७; शां. २११. १७)। उपनिषदोंमेंभी इसी प्रकार ज्ञानकी महत्ता बतलानेवाले अनेक वचन हैं। जैसे - “य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति।” (बृ. १. ४. १०) - जो यह जानता है, कि मैंही ब्रह्म हूँ, वही अमृत ब्रह्म होता है। जिस प्रकार कमलपत्रमें पानी चिपक नहीं सकता, उसी प्रकार जिसे ब्रह्मज्ञान हो गया है, उसे कर्म दूषित नहीं कर सकते (छां. ४. १४. ३)। ब्रह्म जाननेवालेको मोक्ष मिलता है (तै. २. १)। जिसे यह मालूम हो चुका है, कि सब कुछ आत्ममय है, उसे पाप नहीं लग सकता (बृ. ४. ४. २३)। “ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः” (श्वे. ५. १३; ६. १३) - परमेश्वरका ज्ञान होनेपर सब पाशोंसे मुक्त हो जाता है। “क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे” (मु. २. २. ८) परब्रह्मका ज्ञान होनेपर सब कर्मोंका क्षय हो जाता है। “विद्ययामृतमश्नुते” (ईशा. ११. मैत्र्यु. ७. ९) - विद्यासे अमृतत्व मिलता है। “तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय” (श्वे. ३. ८) - परमेश्वरको जान लेनेसे अमरत्व मिलता है; इसको छोड़ मोक्षप्राप्तिका दूसरा मार्ग नहीं है। और शास्त्रदृष्टिसे विचार करने- परभी यही सिद्धान्त दृढ होता है। क्योंकि दृश्य सृष्टिमें जो कुछ है, वह सब यद्यपि कर्ममय है, तथापि इस सृष्टिके आधारभूत परब्रह्मकीही वह सब लीला है; इसलिये यह स्पष्ट है, कि कोईभी कर्म परब्रह्मको बाधा नहीं दे सकते - अर्थात् सब कर्मोंको करकेभी परब्रह्म अलिप्तही रहता है। इस प्रकरणके आरंभमें बतलाया जा चुका है, कि अध्यात्मशास्त्रके अनुसार इस संसारके सब पदार्थोंके कर्म (माया) और ब्रह्म, ये दोही वर्ग होते हैं। इससे यही प्रकट होता है, कि इनमेंसे किसी एकवर्गसे अर्थात् कर्मसे छुटकारा पानेकी इच्छा हो, तो मनुष्यको दूसरे वर्गमें अर्थात् ब्रह्मस्वरूपमें
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प्रवेश करना चाहिये, इसके सिवा और दूसरा मार्ग नहीं है। क्योंकि जब सब पदार्थोंके केवल दोही वर्ग होते हैं, तब कर्मसे मुक्त अवस्था सिवा ब्रह्मस्वरूपके और कोई शेष नहीं रह जाती। परंतु ब्रह्मस्वरूपकी इस अवस्थाको प्राप्त करनेके लिये स्पष्ट रूपसे यह जान लेना चाहिये, कि ब्रह्मका स्वरूप क्या है ? नहीं तो करने चलेंगे एक और होगा कुछ दूसराही । "विनायकं प्रकुर्वाणो रचयामास वानरम् " - मूर्ति तो गणेशकी बनानी थी; परंतु ( वह न बन कर ) बन गई बंदरकी ! ठीक यही दशा होगी। इसलिये अध्यात्मशास्त्रके युक्तिवादसेभी यही सिद्ध होता है, कि ब्रह्मस्वरूपका ज्ञान ( अर्थात् ब्रह्मात्मैक्यका तथा ब्रह्मकी अलिप्तताका ज्ञान ) प्राप्त करके उसे मृत्युपर्यंत स्थिर रखनाही कर्मपाशसे मुक्त होनेका सच्चा मार्ग है। गीतामें भगवान्नेभी यही कहा है, कि "कर्मोंमें मेरी कुछभी आसक्ति नहीं है; इसलिये मुझे कर्मकी बाधा नहीं होती; और जो इस तत्त्वको समझ जाता है, वह कर्मपाशसे मुक्त हो जाता है। " ( गीता ४. १४ तथा १३. २३ ) । स्मरण रहे, कि यहाँ 'ज्ञान'का अर्थ केवल शाब्दिक ज्ञान या केवल मानसिक क्रिया नहीं है; किंतु वेदान्तसूत्रके शांकरभाष्यके आरंभहीमें कहे अनुसार हर समय और प्रत्येक स्थानमें उसका अर्थ " पहले मान- सिक ज्ञान होनेपर और फिर इंद्रियोंपर जय प्राप्तकर लेनेपर ब्रह्मभूत होनेकी अवस्था या ब्राह्मी स्थितिही है। " पिछले प्रकरणके अंतमें ज्ञानके संबंधमें अध्यात्म- शास्त्रका यही सिद्धान्त बतलाया गया है और महाभारतमेंभी जनकने सुलभासे कहा है, कि "ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् " - ज्ञान अर्थात् मानसिक क्रिया- रूपी ज्ञान हो जानेपर मनुष्य यत्न करता है; और यत्नके इस मार्गसेही अंतमें उसे महत्त्व ( परमेश्वर ) प्राप्त हो जाता है ( शां. ३२०. ३० ) । अध्यात्मशास्त्र इतनाही बतला सकता है, कि मोक्षप्राप्तिके लिये किस मार्गसे और कहाँ जाना चाहिये - इससे अधिक वह और कुछ नहीं बतला सकता। शास्त्रसे ये बातें जानकर प्रत्येक मनुष्यको शास्त्रोक्त मार्गपर स्वयंही चलना चाहिये । और उस मार्गमें जो काँटे या बाधाएँ हों, उन्हें निकालकर अपना रास्ता खुद साफ़कर लेना चाहिये; एवं उसी मार्गपर चलते हुए स्वयं; अपने प्रयत्नसेही अंतमें ध्येयवस्तुकी प्राप्ति कर लेनी चाहिये। परंतु यह प्रयत्नभी पातंजलयोग, अध्यात्मविचार, भक्ति, कर्मफलत्याग इत्यादि अनेक प्रकारसे किया जा सकता है ( गीता १२. ८-१२ ), और इस कारण मनुष्य बहुधा उलझनमें फँस जाता है। इसीलिये गीतामें पहले निष्काम कर्मयोगका मुख्य मार्ग बतलाया गया है, और उसकी सिद्धिके लिये छठें अध्यायमें यम-नियम- आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधिरूप अंगभूत साधनोंकाभी वर्णन किया गया है, तथा सातवें अध्यायसे आगे यह बतलाया है, कि कर्मयोगका आचरण करते रहनेसेही परमेश्वरका ज्ञान अध्यात्मविचार-द्वारा अथवा ( इससेभी सुलभ रीतिसे ) भक्तिमार्ग-द्वारा हो जाता है ( गीता १८. ५६ ) ।
२८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर्मबंधनसे छुटकारा पानेके लिये कर्म छोड़ देना कोई उचित मार्ग नहीं है; किंतु ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे बुद्धिको शुद्ध रखके परमेश्वरके समान आचरण करते रहनेसेही अंतमें मोक्ष मिलता है। कर्मको छोड़ देना भ्रम है, क्योंकि कर्म किसीसे छूट नहीं सकता - इत्यादि बातें यद्यपि अब निर्विवाद सिद्ध हो गई हैं, तथापि यह पहला प्रश्न फिरभी उठता है, कि इस मार्गमें सफलता पानेके लिये आवश्यक ज्ञानप्राप्तिका जो प्रयत्न करना पड़ता है, वह मनुष्यके वसकी बात है ? अथवा नामरूप कर्मात्मक प्रकृति जिधर खींचे, उधरही उसे चले जाना चाहिये ? गीतामें भगवान् कहते हैं, कि “ प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति । ” ( गीता ३. ३३ ) - निग्रहसे क्या होगा; प्राणिमात्र अपनी अपनी प्रकृतिके अनुसारही चलते हैं। “ मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ” - तेरा निश्चय व्यर्थ है; जिधर तू न चाहेगा, उधर तेरी प्रकृति तुझे खींच लेगी ( गीता १८. ५९; २. ६० ) ; और मनुजी कहते हैं, कि “ बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ” ( मनु. २. २१५ ) - विद्वानोंकोभी इंद्रियाँ अपने वशमें कर लेती हैं। कर्म-विपाक-प्रक्रियाकाभी निष्कर्ष यही है। क्योंकि जब ऐसा मान लिया जाय, कि मनुष्यके मनकी सब प्रेरणाएँ पूर्वकर्मोंसेही उत्पन्न होती हैं, तब तो यही अनुमान करना पड़ता है, कि उसे एक कर्मसे दूसरे कर्ममे अर्थात् सदैव भवचक्रमेंही रहना चाहिये। अधिक क्या कहें ? कर्मसे छुटकारा पानेकी प्रेरणा और कर्म, दोनों बातें परस्पर-विरुद्ध हैं। और यदि यह सत्य है तो यह आपत्ति आ पड़ती है, कि ज्ञान प्राप्त करनेके लिये कोईभी मनुष्य स्वतंत्र नहीं है। इस विषयका विचार अध्यात्मशास्त्रमें इस प्रकार किया गया है, कि नामरूपात्मक सारी दृश्य सृष्टिका आधारभूत जो तत्त्व है, वही मनुष्यकी जड़ देहमेंभी आत्मरूपसे निवास करता है; इससे मनुष्यके कृत्योंका विचार देह और आत्मा, दोनोंकी दृष्टिसे करना चाहिये। इनमेंसे आत्मस्वरूपी ब्रह्म मूलमें केवल एकही होनेके कारण कभीभी परतंत्र नहीं हो सकता। क्योंकि किसी एक वस्तुको दूसरेकी अधीनतामें होनेके लिये एकसे अधिक - कम-से-कम दो - वस्तुओंका होना नितान्त आवश्यक है। यहाँ नाम-रूपात्मक कर्मही वह दूसरी वस्तु है। परंतु यह कर्म अनित्य है; और मूलमें वह परब्रह्मकीही लीला है, जिससे निर्विवाद सिद्ध होता है, कि यद्यपि उसने परब्रह्मके एक अंशको आच्छादित कर लिया है, तथापि वह परब्रह्मको अपना दास कभीभी बना नहीं सकता। इसके अतिरिक्त यह पहलेही बतलाया जा चुका है, जो आत्मा कर्मसृष्टिके व्यापारोंका एकीकरण करके सृष्टिज्ञान उत्पन्न करता है, उसे कर्म- सृष्टिसे भिन्न अर्थात् ब्रह्मसृष्टिकाही होना चाहिये। इससे सिद्ध होता है, कि परब्रह्म और वस्तुतः उसीका अंश जो शारीर आत्मा, दोनों मूलतः स्वतंत्र अर्थात् कर्मात्मक प्रकृतिकी सत्तासे मुक्त हैं। इनमेंसे परमात्माके विषयमें मनुष्यको इससे अधिक ज्ञान नहीं हो सकता, कि वह अनंत, सर्वव्यापी, नित्य शुद्ध और मुक्त है। परंतु इस परमात्माहीके अंशरूप जीवात्माकी बात भिन्न है। यद्यपि वह मूलमें शुद्ध, मुक्त-
कर्मविपाक और आत्मस्वातंत्र्य २८१ स्वभाव, निर्गुण तथा अकर्ता है, तथापि शरीर और बुद्धि आदि इंद्रियोंके बंधनमें फँसा होनेके कारण वह मनुष्यके मनमें जो स्फूर्ति उत्पन्न करता है, उसका प्रत्यक्षा- नुभवरूपी ज्ञान हमें हो सकता है। भाफ़का उदाहरण लीजिये। जब वह खुली जगहमें रहती है तब उसका कुछ बल नहीं होता; परंतु वह जब किसी बर्तनमें बंद कर दी जाती है, तब उसका दबाव उसी बर्तनपर जोरसे होता हुआ दीख पड़ने लगता है; ठीक इसी तरह जब परमात्माकाही अंशभूत जीव (गीता १५.७) अनादि पूर्वकमार्जित जड़ देह तथा इंद्रियोंके बंधनोंसे बद्ध हो जाता है, तब इस बद्धावस्थासे उसको मुक्त करनेके लिये (अर्थात् मोक्षानुकूल) कर्म करनेकी प्रवृत्ति देहेंद्रियोंमें होने लगती है; और इसीको व्यावहारिक दृष्टिसे 'आत्माकी स्वतंत्र प्रवृत्ति' कहते हैं। 'व्यावहारिक दृष्टिसे' कहनेका कारण यह है, कि शुद्ध मुक्तावस्थामें या 'तात्त्विक दृष्टिसे' आत्मा इच्छारहित तथा अकर्ता है और सब कर्तृत्व केवल प्रकृतिका है (गीता १३. २९; वे. सू. शां. भा. २. ३. ४०)। परंतु वेदान्ती लोग सांख्यमतकी भांति यह नहीं मानते, कि प्रकृतिही स्वयं मोक्षानुकूल कर्म किया करती है; क्योंकि ऐसा मान लेनेसे यह कहना पड़ेगा, कि जड़ प्रकृति अपने अंधेपनसे अज्ञानियोंकोभी मुक्त कर सकती है। और यहभी नहीं कहा जा सकता, कि जो आत्मा मूलहीमें अकर्ता है, वह स्वतंत्र रीतिसे- अर्थात् बिना किसी निमित्तके- अपने नैसर्गिक गुणोंसेही प्रवर्तक हो जाता है। इसलिये आत्म-स्वातंत्र्यके उक्त सिद्धान्तको वेदान्तशास्त्रमें इस प्रकार बतलाना पड़ता है, कि आत्मा यद्यपि मूलमें अकर्ता है, तथापि बंधनोंके निमित्तसे वह उतनेहीके लिये दिखाऊ प्रेरक बन जाता है; और जब यह आगंतुक प्रेरकता उसमें एक बार किसीभी निमित्तसे आ जाती है, तब वह कर्मके नियमोंसे भिन्न अर्थात् स्वतंत्रही रहती है। 'स्वतंत्र'का अर्थ निर्निमित्तक नहीं है; और आत्मा अपनी मूल शुद्धावस्थामें कर्ताभी नहीं रहता। परंतु बार बार इस लंबीचौड़ी कर्मकथाको बतलाते न रहकर इसीको संक्षेपमें आत्माकी स्वतंत्र प्रवृत्ति या प्रेरणा कहनेकी परिपाठी हो गई है। बंधनमें पड़नेके कारण आत्माके द्वारा इंद्रियोंको मिलनेवाली इस स्वतंत्र प्रेरणामें और बाह्यसृष्टि- के पदार्थोंके संयोगसे इंद्रियोंमें उत्पन्न होनेवाली प्रेरणामें बहुत भिन्नता है। खाना, पीना, चैन करना-ये सब इंद्रियोंकी प्रेरणाएँ हैं; और आत्माकी प्रेरणा मोक्षा- नुकूल कर्म करनेके लिये हुआ करती है। पहली प्रेरणा केवल बाह्य अर्थात् कर्म- सृष्टिकी है। परंतु दूसरी प्रेरणा आत्माकी अर्थात् ब्रह्मसृष्टिकी है। और ये दोनों प्रेरणाएँ प्रायः परस्स्पर-विरोधी हैं, जिससे इनके झगड़ेमेंही मनुष्यकी सब आयु बीत जाती है। इनके झगड़ेके समय जब मनमें संदेह उत्पन्न होता है, तब कर्मसृष्टिकी प्रेरणाको न मानकर (भाग. ११. १०. ४) यदि मनुष्य शुद्धात्माकी स्वतंत्र प्रेरणाके अनुसार चलने लगे- और इसीको सच्चा आत्मज्ञान या आत्मनिष्ठा कहते हैं- तो इसके सब व्यवहार स्वभावतः मोक्षानुकूलही होंगे। और अंतमें :-
२८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र विशुद्धधर्मा शुद्धेन बुद्धेन च स बुद्धिमान् ॥ विमलात्मा च भवति समेत्य विमलात्मना ॥ स्वतंत्रश्च स्वतंत्रेण स्वतंत्रत्वमवाप्नुते । “वह जीवात्मा या शारीर आत्मा - जो मूलमें स्वतंत्र है - ऐसे परमात्मामें मिल जाता है, जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध, निर्मल और स्वतंत्र है” (मभा. शां. ३०८. २७ -३०) । ऊपर जो कहा गया है, कि ज्ञानसे मोक्ष मिलता है. उसका यही अर्थ है। इसके विपरीत जब जड़ देहेंद्रियोंके प्राकृत धर्मकी - अर्थात् कर्मसृष्टिकी प्रेरणाकी - प्रबलता हो जाती है, तब मनुष्यकी अधोगति होती है। शरीरमें बँधे हुए जीवात्मामें, देहेंद्रियोंमें मोक्षानुकूल कर्म करनेकी तथा ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे मोक्ष प्राप्तकर लेनेकी, जो यह स्वतंत्र शक्ति है, उसकी ओर ध्यान देकरही भगवानने अर्जुनको आत्म-स्वातंत्र्य अर्थात् स्वावलंबनके तत्त्वका उपदेश किया है, कि :- उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ “ मनुष्यको चाहिये, कि वह अपना उद्धार आपही करे। निराशासे वह अपनी अवनति आपही न करे। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य स्वयं अपना बंधु (हितकारी) है; और स्वयं अपना शत्रु (नाशकर्ता) है” (गीता ६.५); और इसी हेतुसे योगवासिष्ठमें (यो. २. सर्ग ४-८) दैवका निराकरण करके पौरुषके महत्त्वका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। जो मनुष्य इस तत्त्वको पहचान कर आचरण किया करता है, कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है, उसके इसी आचरणको सदा- चरण या मोक्षानुकूल आचरण कहते हैं। और बद्ध जीवात्माकाभी यही स्वतंत्र धर्म है, कि ऐसे आचरणकी ओर देहेंद्रियोंको प्रवृत्त किया करे। इसी धर्मके कारण दुराचारी मनुष्यका अंतःकरणभी सदाचरणहीका पक्ष लिया करता है, जिससे उसे अपने किये हुए दुष्कर्मोंका पश्चात्ताप होता है। आधिदैवत पक्षके पंडित इसे सदसद्विवेक-बुद्धिरूपी देवताकी स्वतंत्र स्फूर्ति कहते हैं। परंतु तात्त्विक दृष्टिसे विचार करने पर विदित होता है, कि बुद्धींद्रिय जड़ प्रकृतिकीका विकार होनेके कारण स्वयं अपनीही प्रेरणासे कर्मके नियम-बंधनोंसे मुक्त नहीं हो सकती, यह प्रेरणा उसे कर्मसृष्टिके बाहरके आत्मासे प्राप्त होती है। इसी प्रकार पश्चिमी पंडितोंका 'इच्छा-स्वातंत्र्य' शब्दभी वेदान्तकी दृष्टिसे ठीक नहीं है ! क्योंकि इच्छा मनका धर्म है और आठवें प्रकरणमें कहा जा चुका है, कि बुद्धि तथा उसके साथ साथ मनभी कर्मात्मक जड़ प्रकृतिके असंवेद्य विकार हैं। इसलिये ये दोनों स्वयंही कर्मके बंधनसे छूट नहीं सकते । अतएव वेदान्तशास्त्रका निश्चय है, कि सच्चा स्वातंत्र्य न तो बुद्धिका है और न मनका-वह केवल आत्माका है। यह स्वातंत्र्य न तो कोई आत्माको देता है और न कोई उससे इसे छीनभी सकता है
- स्वतंत्र परमात्माका अंशरूप जीवात्मा जब उपाधिके बंधनमें पड़ जाता है, तब