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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९१ गीतामें, एवं परायेकोभी आत्मवत् मानना चाहिये” (दास. १२. १०. २२) इस रीतिसे मराठा साधु-संतोंके ग्रंथोंमें विद्यमान् है; तथा इस लोकोक्तिकाभी प्रचार है कि “आप बीती सो जग बीती।” यही नहीं; बल्कि इसकी आध्यात्मिक उपपत्तिभी हमारे प्राचीन शास्त्रकारोंने दे दी है। जब हम इस बातपर ध्यान देते हैं, कि यद्यपि नीति-धर्मका यह सर्वमान्य सूत्र वैदिक धर्मसे भिन्न अन्य धर्मोंमें दिया गया हो, तो भी इसकी उपपत्ति नहीं बतलाई गई है। और जब हम इस बातपरभी ध्यान देते हैं, कि इस सूत्रकी उपपत्ति ब्रह्मात्मैकरूप अध्यात्मज्ञानको छोड़ और दूसरे किसीसेभी ठीक ठीक नहीं लगती, तब गीताके आध्यात्मिक नीतिशास्त्रका अथवा कर्मयोगका महत्त्व पूरा पूरा व्यक्त हो जाता है। समाजमें मनुष्योंके पारस्परिक व्यवहारके विषयमें 'आत्मौपम्य'-बुद्धिका नियम इतना सुलभ, व्यापक, सुबोध और विश्वतोमुख है, कि जब एक बार यह बतला दिया, कि प्राणिमात्रमें रहनेवाले आत्माकी एकताको पहचान कर, “आत्मवत् सम-बुद्धिसे दूसरोंके साथ वर्तते जाओ”; तब फिर ऐसे पृथक् पृथक् उपदेश करनेकी जरूरतही नहीं रह जाती, कि लोगोंपर दया करो; उनकी यथाशक्ति मदद करो; उनका कल्याण करो; उन्हें अभ्युदयके मार्गमे लगाओ; उनसे प्रीति करो; उनसे ममता न छोड़ो; उनके साथ न्याय और समताका बर्ताव करो; किसीको धोखा मत दो; किसीका द्रव्यहरण अथवा हिंसा न करो; किसीसे झूठ न बोलो; अधिकांश लोगोंके अधिक कल्याण करनेकी बुद्धिको मनमें रखो; सदैव यह समझकर भाईचारेसे बर्ताव करो, कि हम सब एकही पिताकी संतान हैं। प्रत्येक मनुष्यको स्वभावसे यह सहजही मालूम रहता है, कि उसका अपना सुखदुःख और कल्याण किसमें है? और सांसारिक व्यवहार करते समय गृहस्थीकी व्यवस्थासे इस बातका अनुभवभी उसको होता रहता है, कि “आत्मा वै पुत्रनामासि।” अथवा “अर्धं भार्या शरीरस्य”का भाव समझकर अपनेही समान अपने स्त्री-पुत्रोंसेभी हमें प्रेम करना चाहिये। किंतु घरवालोंसे प्रेम करना आत्मौपम्य-बुद्धि सीखनेका पहलाही पाठ है। सदैव इसीमें न लिपटे रहकर घरवालोंके बाद इष्टमित्रों, आप्तों, गोत्रजों, ग्रामवासियों, जातिभाइयों, धर्मबंधुओं और अंतमें सब मनुष्यों अथवा प्राणिमात्रके विषयमें आत्मौपम्य-बुद्धिका उपयोग करना चाहिये। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्यको अपनी आत्मौपम्य-बुद्धि अधिका- धिक व्यापक बनाकर पहचानना चाहिये, कि जो आत्मा अपनेमें है, वही सब प्राणियोंमें है; और अंतमें इसीके अनुसार बर्तावभी करना चाहिये — यही ज्ञानकी तथा आश्रम- व्यवस्थाकी परमावधि अथवा मनुष्यमात्रके साध्यकी सीमा है। आत्मौपम्य-बुद्धिरूप सूत्रका अंतिम और व्यापक अर्थ यही है। फिर आपही आप सिद्ध हो जाता है, कि इस परमावधिकी स्थितिको प्राप्तकर लेनेकी योग्यता जिन जिन यज्ञदान आदि कर्मोंसे बढ़ती जाती है, वे सभी कर्म चित्तशुद्धिकारक, धर्म्य, अतएव गृहस्थाश्रमके कर्तव्य हैं। यह पहलेही कह चुके हैं, कि चित्तशुद्धिका ठीक ठीक अर्थ स्वार्थ-बुद्धिका

छूट जाना और ब्रह्मात्मैक्यको पहचानना है, एवं इसीलिये स्मृतिकारोंने गृहस्थाश्रमके कर्म विहित माने हैं। याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीको जो "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" आदि उपदेश किया है, उसका मर्मभी यही है। अध्यात्मज्ञानकी नींवपर रचा हुआ कर्म- योगशास्त्र सबसे कहता है, कि "आत्मा वै पुत्रनामासि" मेंही आत्माकी व्यापकताको संकुचित न करके उसकी इस स्वाभाविक व्याप्तीको पहचानो, कि "लोको वै अय- मात्मा", और इस समझसे बर्ताव किया करो, कि "उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुं- बकम्" - यह सारी पृथिवीही बड़े लोगोंकी घरगृहस्थी है; प्राणिमात्रही उनका परिवार है। हमें विश्वास है, कि इस विषयमें हमारा कर्मयोगशास्त्र अन्यान्य देशोंके पुराने अथवा नये, किसीभी कर्मयोगशास्त्रसे हारनेवाला नहीं है; यही नहीं, तो उन सबको अपने पेटमें रखकर परमेश्वरके समान 'दश अंगुल' बचा रहेगा। इसपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि आत्मौपम्य-भावसे 'वसुधैव कुटुंबकम्' रूपी वेदान्ती और व्यापक दृष्टि हो जानेपर हम सिर्फ उन सद्गुणोंकोही न खो बैठेंगे, कि जिन देशाभिमान, कुलाभिमान और धर्माभिमान आदि सद्गुणोंसे कुछ वंश अथवा राष्ट्र आजकल उन्नत अवस्थामें हैं, प्रत्युत यदि कोई हमें मारने या कष्ट देने आवेगा, तो "निर्वैरः सर्वभूतेषु” (गीता ११. ५५), गीताके इस वाक्यानुसार उसको दुष्ट-बुद्धिसे उलटकर न मारना हमारा धर्म हो जायगा (धम्मपद ३३८)। अतः दुष्टोंका प्रतिकार न होगा; और इस कारण उनके बुरे कर्मोंमें साधु-पुरुषोंकी जान जोखिममें पड़ जायेगी और दुष्टोंका दबदबा हो जानेसे पूरे समाज अथवा सारे राष्ट्रका उसमे नाशभी हो जावेगा। महाभारतमें स्पष्टही कहा है, कि "न पापे प्रनिपापः स्यात्साधुरेव सदा भवेत्” (मभा. वन. २०६. ४८) दुष्टोंके साथ दुष्ट न हो जावे; साधुतासे वर्ते, क्योंकि दुष्टतासे अथवा वैर निकालनेसे वैर कभी नष्ट नहीं होता - "न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति ।" इसके विपरीत जिसकी हम पराजय करते हैं, वह स्वभावमेही दुष्ट होनेके कारण पराजित होनेपर औरभी अधिक उपद्रव मचाता रहता है, तथा वह फिर बदला लेनेका मौका खोजता रहता है - "जयो वैरं प्रसृजति ।" अतएव महाभारतमे स्पष्ट कहा है कि, शांतिसेही दुष्टोंका निवारण कर देना चाहिये (मभा. उद्यो. ७१. ५९, ६३)। महाभारतके येही श्लोक बौद्ध ग्रंथोंमें हैं (धम्मपद ५, २०१; महावग्ग १०. २, ३); और ऐसेही ईसानेभी इसी तत्त्वका अनुवाद इस प्रकार किया है, कि "तू अपने शत्रुओंसे प्रीति कर।" (मेथ्यू. ५. ४४); और "कोई एक कनपटीमें मारे, तो तू दूसरीभी आगे कर दे" (मेथ्यू. ५. ३९; ल्यू. ६. २९)। ईसामसीहसे पहलेके चीनी तत्त्वज्ञ ला-ओ-त्सेकाभी ऐसाही कथन है; और महाराष्ट्रकी संत-मंडलीमें तो एकनाथ महाराज जैसे साधुओंके इस प्रकार आचरण करनेकी बहुतेरी कथाएँभी हैं। क्षमा अथवा शांतिकी पराकाष्ठाका उत्कर्ष दिखलानेवाले इन उदाहरणोंकी पुनीत योग्यताको घटानेका हमारा कदापि हेतु नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि सत्यसमानही यह क्षमा-धर्मभी अंतमें -

अर्थात् समाजकी पूर्णावस्थामें – अपवादरहित और नित्यरूपसे बना रहेगा। और बहुत क्या कहें, समाजकी वर्तमान अपूर्णावस्थामेंभी अनेक अवसरोंपर देखा जाता है, कि जो काम शांतिसे हो जाता है, वह क्रोधसे नहीं होता। जब अर्जुन देखने लगा, कि दुष्ट दुर्योधनकी सहायता करनेके लिये कौन कौन योद्धा आये हैं, तब उनमें पिता- मह और गुरु जैसे पूज्य मनुष्योंपर दृष्टि पड़तेही उसके ध्यानमें यह बात आ गई, कि दुर्योधनकी दुष्टताका प्रतिकार करनेके लिये मुझे केवल कर्मही नहीं करना पड़ेगा, तो अर्थासक्त गुरुजनोंको शस्त्रोंसे मारनेका दुष्कर कामभी करना पड़ेगा, (गीता २. ५)। और इसीसे वह कहने लगा, कि यद्यपि दुर्योधन दुष्ट हो गया है, तथापि "न पापे प्रतिपापः स्यात्" वाले न्यायसे मुझेभी उसके साथ दुष्ट न हो जाना चाहिये। "यदि वे मेरी जानभी ले लें, तोभी (गीता १. ४६) मेरा 'निर्वैर' अंतःकरणसे चुपचाप बैठ रहनाही उचित है।" अर्जुनकी इस शंकाको दूर भगा देनेके लियेही गीता- शास्त्रकी प्रवृत्ति हुई है; और यही कारण है, कि गीतामें इस विषयका जैसा स्पष्टीकरण किया गया है, वैसा और किसीभी धर्मग्रंथमें नहीं पाया जाता। उदाहरणार्थ, बौद्ध और ईसाई धर्म निर्वैरत्वके तत्त्वको वैदिक धर्मके समानही स्वीकार तो करते हैं; परंतु उनके धर्म-ग्रंथोंमें यह बात स्पष्टतया कहींभी नहीं बतलाई है, कि लोकसंग्रहकी अथवा आत्मसंरक्षणकीभी चिंता न करनेवाले सर्व कर्मत्यागी संन्यासी पुरुषका व्यव- हार और बुद्धिके अनासक्त एवं निर्वैर हो जानेपरभी उसी अनासक्त और निर्वैर- बुद्धिसे सारे बर्ताव करनेवाले कर्मयोगीका व्यवहार, ये दोनों सर्वांशमें एक नहीं हो सकते। इसके विपरीत पश्चिमी नीतिशास्त्रवेत्ताओंके आगे यह समस्या है, कि ईसाने जो उपरोक्त निर्वैरत्वका उपदेश किया है, उसका जगत्की नीतिसे समुचित मेल कैसे मिलावें?* और नित्शे नामक आधुनिक जर्मन पंडितने जो अपने ग्रंथोंमें यह मत लिखा है, कि निर्वैरत्वका यह धर्म-तत्त्व गुलामीका और घातक है; एवं इसीको श्रेष्ठ माननेवाले ईसाई धर्मने यूरोप खंडको नामर्द कर डाला है। परंतु हमारे धर्म- ग्रंथोंको देखनेसे ज्ञात होगा, कि न केवल गीताको, प्रत्युत मनुकोभी यह बात पूर्णतया अवगत और संमत थी, कि संन्यास और कर्मयोग इन दोनों धर्म-मार्गोंसे इस विषयमें भेद करना चाहिये। क्योंकि मनुने यह नियम, "क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येत्" – क्रोधित होनेवालेपर फिर क्रोध न करो (मनु. ६. ४८); न गृहस्थ-धर्ममें बतलाया है; और न राज-धर्ममें; बतलाया है केवल यति-धर्ममेंही। परंतु आजकलके टीकाकार इस बातपर ध्यान नहीं देते, कि इन वचनोंमेंसे कौन वचन किस मार्गका है अथवा उसका कहाँ उपयोग करना चाहिये? उन लोगोंने संन्यास और कर्ममार्ग इन दोनों मार्गोंके परस्पर-विरोधी सिद्धांतोंको गड़बड़कर एकत्र कह डालनेकी जो प्रणाली अपनायी है, उस प्रणालीसे प्रायः कर्मयोगके सच्चे सिद्धांतोंके संबंधमें कैसे भ्रम

  • See Paulsen's System of Ethics, Book III, chap. X (Eng. Trans). and Nietzsche's Anti-Christ.

३९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उत्पन्न हो जाता है, उसका वर्णन हम पाँचवें प्रकरणमें कर चुके हैं। गीताके टीका- कारोंकी इस भ्रामक पद्धतिको छोड़ देनेसे सहजही ज्ञात हो जाता है, कि भागवत- धर्मी कर्मयोगी 'निर्वैर' शब्दका क्या अर्थ करते हैं; क्योंकि ऐसे अवसरपर दुष्टोंके साथ कर्मयोगी गृहस्थको कैसे बर्ताव करना चाहिये, उसके विषयमें परम भगवद्- भक्त प्रल्हादनेही कहा है, कि "तस्मान्नित्यं क्षमा तात पंडितैरपवादिता" (महा. वन. २८. ८) - हे तात ! इसी हेतु चतुर पुरुषोंने क्षमाके लिये सदा अपवाद बत- लाये हैं। जो कर्म हमें दुःखदायी हो, वही कर्म करके दूसरोंको दुःख न देनेका, आत्मौ- पम्य-दृष्टिका सामान्य धर्म है तो ठीक; परंतु महाभारतमें निर्णय किया गया है, कि जिस समाजमें इसी आत्मौपम्य-दृष्टिवाले सामान्य धर्मकी पड़तालके इस दूसरे धर्मके, कि हमेंभी दूसरे लोग दुःख न दें, पालनेवाले न हों, उस समाजमें किसी एकके इस धर्मको पालनेसे कोई लाभ न होगा। यह समता शब्दही दो व्यक्तियोंसे संबद्ध अर्थात् सापेक्ष है। अतएव आततायी पुरुषको मार डालनेसे जैसे अहिंसा धर्ममें बट्टा नहीं लगता, वैसेही दुष्टोंको उचित शासन कर देनेसे साधुओंकी आत्मौपम्य-बुद्धि या निर्वैरतामेंभी कुछ न्यूनता नहीं आती; बल्कि दुष्टोंके अन्यायका प्रतिकारकर दूसरोंको बचा लेनेका श्रेय अवश्य मिल जाता है। जिस परमेश्वरकी अपेक्षा किसीकीभी बुद्धि अधिक सम नहीं है; वह परमेश्वरभी जब साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका विनाश करनेके लिये समय समयपर अवतार लेकर लोकसंग्रह किया करता है (गीता ४. ७, ८), तब और पुरुषोंकी तो बातही क्या है ! यह कहना भ्रममूलक है, कि 'वसुधैव कुटुंबकम्' रूपी दृष्टि हो जानेसे अथवा फलाशा छोड़ देनेसे पात्रता-अपात्रताका अथवा योग्यता-अयोग्यताका भेदभी मिट जाना चाहिये। गीताका सिद्धान्त यह है, कि फलकी आशामें ममत्व-बुद्धि प्रधान होती है; और उसे छोड़ेबिना पाप-पुण्यसे छुटकारा नही मिलता। किंतु यदि किसी सिद्ध पुरुषको अपना स्वार्थ साधनेकी आवश्यकता न हो, तथापि यदि वह किसी अयोग्य आदमीको कोई ऐसी वस्तु ले लेने दे, कि जो उसके योग्य नहीं; तो उस सिद्ध पुरुषको अयोग्य आद- मियोंकी सहायता करनेका तथा योग्य साधुओं एवं समाजकीभी हानि करनेका पाप लगे बिना न रहेगा। कुबेरसे टक्कर लेनेवाला करोड़पति साहूकार यदि बाजारमें तरकारी लेने जावे, तो जिस प्रकार वह हरी धनियांकी गड्डी की कीमत लाख रुपये नहीं दे देता, उसी प्रकार पूर्ण साम्यावस्थामें पहुँचा हुआ पुरुष किसीकी पात्रता- अपात्रताका तारतम्य भूल नहीं जाता। उसकी बुद्धि सम तो रहती है; पर समताका यह अर्थ नहीं है, कि गायका चारा मनुष्यको और मनुष्यका भोजन गायको खिला दे। तथा भगवानने गीता (गीता १७. २०) मेंभी कहा है, कि 'दातव्य' समझकर जो सात्विक दान करना है, वहभी इसी "देशे काले च पात्रे च" अर्थात् देश, काल और पात्रताका विचारकर देना चाहिये। साधु-पुरुषोंकी साम्य-बुद्धिके वर्णनमें ज्ञानेश्वर महाराजने उन्हें पृथिवीकी उपमा दी है। इसी पृथिवीका दूसरा नाम 'सर्वसहा' है; किंतु

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९५ यह 'सर्वसहा'भी, यदि इसे कोई लात मारे, तो मारनेवालेके तलवेमें उतनेही जोरका प्रत्याघात कर अपनी समता-बुद्धि व्यक्त कर देती है। इससे भली भाँति समझा जा सकता है, कि मनमें वैर न रहनेपरभी (अर्थात् निर्वैर) प्रतिकार कैसे किया जाता है ? कर्मविपाक प्रक्रियामें कह चुके हैं, कि इसी कारणसे भगवान्भी " ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् " ( गीता ४. ११ ) – जो मुझे जैसे भजते हैं, उन्हें वैसेही फल देता हूँ – इस प्रकार व्यवहार तो करते हैं; परंतु फिरभी 'वैषम्य-नैर्घृण्य' दोषोंसे अलिप्त रहते हैं। इसी प्रकार व्यवहार अथवा कानून-कायदेमेंभी खूनी आदमीको फाँसीकी सजा देनेवाले न्यायाधीशको, कोई उसका दुश्मन नहीं कहता । अध्यात्मशास्त्रका सिद्धान्त है, कि जब किसीकी बुद्धि निष्काम होकर साम्यावस्था में पहुँच जावे, तब वह मनुष्य अपनी इच्छासे किसी दूसरेका नुकसान नहीं करता, उससे यदि किसी दूसरेका नुकसान होभी जाय, तो समझना चाहिये, कि वह दूसरेके कर्मका फल है; अथवा निष्काम बुद्धिवाला स्थितप्रज्ञ ऐसे समयपर जो काम करता है – फिर देखनेमें वह मातृ-वध या गुरु-वध-सरीखा कितनाही भयंकर क्यों न हो – उसके शुभ- अशुभ फलका बंधन अथवा लेप उसको नहीं लगता ( गीता ४. १४ ; ९. २८; १८. १७ ) । फ़ौजदारी कानूनमें आत्मसंरक्षाके जो नियम हैं वे इसी तत्त्वपर रचे गये हैं। कहते हैं, कि जब लोगोंने मनुसे राजा होनेकी प्रार्थना की, तब उन्होंने पहले यह उत्तर दिया, कि " अनाचारसे चलनेवालोंका शासन करनेके लिये राज्यको स्वीकार करके मैं पापमें नहीं पड़ना चाहता।" परंतु जब लोगोंने यह वचन दिया, कि " तमब्रुवन् प्रजाः मा भैः कर्तृनेनो गमिष्यति " (मभा. शां. ६७. २३) – डरिये नहीं, जिसका पाप उसीको लगेगा, आपको तो रक्षा करनेका पुण्यही मिलेगा; और प्रतिज्ञा की, कि " प्रजाकी रक्षा करनेमें जो खर्च लगेगा, उसे हम लोग 'कर' देकर पूरा करेंगे", तब मनुने प्रथम राजा होना स्वीकार किया । सारांश, जैसे अचेतन सृष्टिका कभीभी न बदलनेवाला यह नियम है, कि " आघातके बराबरही प्रत्याघात " हुआ करता है; वैसेही सचेतन सृष्टिमें उस नियमका यह रूपांतर है, कि " जैसेको तैसा " होना चाहिये । वे साधारण लोग, कि जिनकी बुद्धि साम्या- वस्थामें पहुँच नहीं गई है, इस कर्मविपाकके नियमके विषयमें अपनी ममत्व-बुद्धि उत्पन्न कर लेते हैं, और क्रोधसे अथवा द्वेषसे आघातकी अपेक्षा अधिक प्रत्याघात करके आघातका बदला लिया करते हैं; अथवा अपनेसे दुबले मनुष्यके साधारण या काल्प- निक अपराधके लिये प्रतिकार-बुद्धिके निमित्तसे उसको लूट कर अपना फायदा कर लेनेके लिये सदा प्रवृत्त होते हैं। किंतु साधारण मनुष्योंके समान बदला लेनेकी, दंभकी, अभिमानकी, क्रोधसे – लोभसे, या द्वेषसे दुर्बलोंको लूटनेकी अथवा टेकसे अपने अभिमान, शेखी, सत्ता और शक्तिकी प्रदर्शनी दिखलानेकी बुद्धि जिसके मनमें न रहे, उसकी शांत, निर्वैर और सम-बुद्धि वैसेही नहीं बिगड़ती है, जैसे कि अपने ऊपर गिरी हुई गेंदको सिर्फ़ पीछे लौटा देनेसे बुद्धिमें कोईभी विकार नहीं उपजता; और

३९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ऐसे प्रत्याघातस्वरूप कर्म करना उसका धर्म अर्थात् कर्तव्य हो जाता है, कि जिससे दुष्टोंका दबदबा बढ़ कर कहीं गरीबोंपर अत्याचार न होने पावे ( गीता ३. २५ ) । गीताकेरे सा उपदेशका सार यही है, कि ऐसे प्रसंगपर सम-बुद्धिसे किया हुआ घोर युद्धभी धर्म्य और श्रेयस्कर है । वैरभाव न रखकर सबसे बर्तना, दुष्टोंके साथ दुष्ट न बन जाना, क्रोध करनेवालेपर क्रुद्ध न होना आदि धर्म- तत्त्व स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीको मान्य तो हैही; परंतु संन्यासमार्गका यह मत कर्मयोग नहीं मानता, कि 'निर्वैर' शब्दका अर्थ केवल निष्क्रिय अथवा प्रतिकारशून्य है; किंतु वह निर्वैर शब्दका सिर्फ इतनाही अर्थ मानता है कि वैर अर्थात् मनकी दुष्ट बुद्धि छोड़ देनी चाहिये; और जब कि कर्म किसीके छूटने हैही नहीं, तब उसका कथन है, कि सिर्फ़ लोकसंग्रहके लिये अथवा प्रतिकारार्थ जितने कर्म आवश्यक और शक्य हों, उतने कर्म मनमें दुष्ट बुद्धिको स्थान न देकर - केवल कर्तव्य समझ - वैराग्य और निःसंग-बुद्धिसे करते रहना चाहिये ( गीता ३. १९ ) । अतः इस श्लोकमें ( गीता ११. ५५ ) सिर्फ 'निर्वैर' पदका प्रयोग न करते हुए - मत्कर्मकृन् मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ उसके पूर्व इस दूसरे महत्त्वके विशेषणकाभी प्रयोग करके - कि 'मत्कर्मकृत्' अर्थात् “ मेरे याने परमेश्वरके प्रीत्यर्थ अर्थात् परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सारे कर्म करनेवाला ”

  • भगवानने गीतामें निर्वैरत्व और निष्काम कर्मका, भक्तिकी दृष्टिसे, मेल मिला दिया है । इसीसे शांकरभाष्य तथा अन्य टीकाओंमेंभी कहा है, कि इस श्लोकमें पूरे गीता-शास्त्रका निचोड़ आ गया है । गीतामें यह कहींभी नहीं बतलाया, कि बुद्धिको निर्वैर करनेके लिये या उसके निर्वैर हो चुकने परभी, सभी प्रकारके कर्म छोड़ देने चाहिये । इस प्रकार प्रतिकारका कर्म निर्वैरत्व और परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करनेपर कर्ताको उसका कोईभी पाप या दोष तो लगताही नहीं; उलटे, प्रतिकारका काम हो चुकनेपर, जिन दुष्टोंका प्रतिकार किया गया है, उन्हींका आत्मौपम्य-दृष्टिसे कल्याण करनेकी बुद्धिभी मनसे नष्ट नहीं होनी । एक उदाहरण लीजिये; दुष्ट कर्मके कारण रावणको, निर्वैर और निष्पाप रामचंद्रने युद्धमें मार तो डाला; पर उसकी उत्तरक्रिया करनेमें जब विभीषण हिचकने लगा, तब रामचंद्रने उसको समझाया कि :- मरणांतानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥ “ ( रावणके मनका ) वैर मरणके साथ चुकही गया । हमारा ( दुष्टोंका नाश करनेका ) काम हो चुका । अब यह जैसा तेरा ( भाई ) है, वैसाही मेराभी है । इसलिये इसका अग्निसंस्कार कर” ( वाल्मीकि रा. ६. १०९. २५ ) रामायणका

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९७ यह तत्त्व भागवतमेंभी (भाग. ८. १९. १३) एक स्थानपर बतलाया गया है; और अन्यान्य पुराणोंमें जो ये कथाएँ हैं-कि भगवानने जिन दुष्टोंका संहार किया, उन्हींको फिर दयालु होकर सद्गति दे डाली - उनका रहस्यभी यही है। इन्हीं सब विचारोंको मनमें लाकर श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने कहा है, कि "उद्धतके लिये उद्धत होना चाहिये।" और महाभारतमें भीष्मने परशुरामसे कहा है :- यो यथा वर्तते यस्मिन् तस्मिन्नेवं प्रवर्तयन् । नाधर्मं समवाप्नोति न चाश्रेयश्च विन्दति ॥ "अपने साथ जो जैसा बर्ताव करता है, उसके साथ वैसेही बर्तनेसे न तो अधर्म (अनीति) होता है; और न अकल्याणभी" (महा. उद्यो. १७९. ३०)। फिर आगे चलकर शांतिपर्वके सत्यानृत अध्यायमें फिर वही उपदेश युधिष्ठिरको किया है :- यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यः तस्मिन् तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥ "अपने साथ जो जैसा बर्ताव है, उसके साथ वैसाही बर्ताव करना धर्मनीति है। मायावी पुरुषके साथ मायावीपनसे और साधु पुरुषके साथ साधुताका व्यवहार करना चाहिये" (महा. शां. १०९. २९; उद्यो. ३६. ७)। ऐसेही ऋग्वेदमें इंद्रको उसके मायावीपनका दोष न देकर उसकी स्तुतिहीकी गई है, कि- "त्वं मायाभिरनवद्य मायिनं ... वृत्रं अर्दयः ।" (ऋ. १०. १४७. २; १. ८०. ७)- हे निष्पाप इंद्र ! मायावी वृत्रको तूने मायासेही मारा है। और भारवि कविने अपने 'किरातार्जुनीय' काव्यमेंभी ऋग्वेदके तत्त्वकाही अनुवाद इस प्रकार किया है :- व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं । भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ॥ “मायावियोंके साथ जो मायावी नहीं बनते, वे नष्ट हो जाते हैं" (किरा. १. ३०)। परंतु यहाँ और एक बातपर ध्यान देना चाहिये, कि दुष्ट पुरुषका प्रतिकार यदि साधुतामे हो सकता हो, तो पहले साधुतासेही करे। क्योंकि दूसरा यदि दुष्ट हो जाय, तो उसके साथ हमेंभी दुष्ट न हो जाना चाहिये, कोई एक यदि नकटा हो जाय तो सारा गाँवका गाँव अपनी नाक नहीं कटा लेता ! और क्या कहें, यह धर्म हैभी नहीं। इस "न पापे प्रतिपापः स्यात्" सूत्रका ठीक भावार्थ यही है; और इसी कारणसे विदुरनीतिमें धृतराष्ट्रको पहले यही नीतितत्त्व बतलाया गया है, कि "न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः" - जो व्यवहार स्वयं अपने लिये प्रतिकूल मालूम हो, वैसा बर्ताव दूसरोंके साथ न करे। इसके पश्चातही विदुरने कहा है :- अक्रोधेन जयेत्क्रोधं असाधुं साधुना जयेत् । जयेत्कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥

३९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र “ ( दूसरेके ) क्रोधको ( अपनी ) शांतिसे जीते । दुष्टको साधुतासे जीते । कृपणको दानसे जीते; और अनृतको सत्यसे जीते ” ( मभा. उद्यो. ३८. ७३, ७४ ) । पाली भाषामें बौद्धोंका जो ‘धम्मपद’ नामक नीतिग्रंथ है, उसमें ‘( धम्म. २३३ ) इसी श्लोकका ज्यों का त्यों अनुवाद है :-- अक्कोधेन जिने कोधं असाधुं साधुना जिने । जिने कदरियं दानेन सच्चेनलीकवादिनम् ॥ शांतिपर्वमें युधिष्ठिरको उपदेश करते हुए भीष्मनेभी इसी नीति-तत्त्वके गौरवका वर्णन इस प्रकार किया है :- कर्म चैतदसाधूनां असाधु साधुना जयेत् । धर्मेण निधनं श्रेयो न जयः पापकर्मणा ॥ “ दुष्टकी असाधुता अर्थात् दुष्ट कर्मका साधुतासे निवारण करना चाहिये । क्योंकि पापकर्मसे प्राप्त जीतकी अपेक्षा धर्मसे अर्थात् नीतिसे मर जानाभी श्रेयस्कर है ” ( मभा. ९५. १६ ) । किंतु ऐसी साधुतासे यदि दुष्टके दुष्कर्मोंका निवारण न होता हो, अथवा साम-उपचार और मेल-जोलकी बात इन दुष्टोंको नापसंद हो, तो ‘कण्ट- केनैव कण्टकम् ’के न्यायसे जो काँटा इन पुल्टिससे बाहर न निकलता हो, उसको साधारण काँटेसे अथवा लोहेके कांटे ( सुई ) सेही बाहर निकाल डालना आवश्यक है ( दास. १९. ९. १२-३१ ) । क्योंकि, प्रत्येक समय लोकसंग्रहके लिये दुष्टोंका निग्रह करना, भगवानके समान, साधु-पुरुषोंकाभी धर्मकी दृष्टिसे पहला कर्तव्य है । ‘ साधुतासे दुष्टताको जीते ’ इस वाक्यमेंही पहले यही बात मानी गई है, कि दुष्टता- को जीत लेना अथवा उसका निवारण करना साधु-पुरुषका पहला कर्तव्य है । फिर उसकी सिद्धिके लिये बतलाया है, कि पहले किस उपायकी योजना करे । यदि साधुतासे उसका निवारण न हो सकता हो - सीधी अँगुलीसे घी न निकले - तो ‘ जैसेको तैसे ’ बन कर दुष्टताका निवारण करनेमेंसे हमें हमारे धर्म-ग्रंथकार कभीभी नहीं रोकते । वे यह कहींभी प्रतिपादन नहीं करते, कि दुष्टताके आगे साधुपुरुष अपना बलिदान खुशीसे किया करें । सदा ध्यान रहे, कि जो पुरुष अपने बुरे कामोंसे पराई गर्दनें काटनेपर उतारू हो गया, उसे यह कहनेका कोईभी नैतिकहक़ नहीं रह जाता, कि और लोग मेरे साथ साधुताका बर्ताव करें । धर्म- शास्त्रमें स्पष्ट आज्ञा है ( मनु. ८. १९, ३५१ ), कि इस प्रकार जब साधु-पुरुषोंको कोई असाधु काम लाचारीसे करना पड़े, तो उसकी जिम्मेदारी शुद्ध बुद्धिवाले साधु-पुरुषोंपर नहीं रहती, किंतु उसका जिम्मेदार वही दुष्ट पुरुष हो जाता है, कि जिसके दुष्ट कर्मोंकाही वह नतीजा है । स्वयं बुद्धने देवदत्तका जो शासन किया, उसकी उपपत्ति बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी इसी तत्त्वपर लगाई है ( मिलिंद प्र. ४. १. ३०-३४ ) । जड़ सृष्टिके व्यवहारमें ये आघात-प्रत्याघातरूपी कर्म नित्य और

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९९ बिलकुल ठीक होते हैं। परंतु मनुष्यके व्यवहार उसके इच्छाधीन हैं, और ऊपर जिस त्रैलोक्य-चिंतामणिकी माताका उल्लेख किया है, उसके दुष्टोंपर प्रयोग करनेका निश्चित विचार जिस धर्मज्ञानसे होता है, वह धर्मज्ञानभी अत्यंत सूक्ष्म है; इस कारण विशेष अवसरपर बड़े बड़े लोगभी सचमुच इस दुविधामें पड़ जाते हैं, कि जो हम करना चाहते हैं, वह योग्य है या अयोग्य ? अथवा धर्म्य है या अधर्म्य ? - “ किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ” ( गीता ४. १६ ) । ऐसे अवसर- पर कोरे विद्वान किंतु सदैव थोड़े-बहुत स्वार्थके पंजेमें फँसे हुए, पुरुषोंकी पंडिताई- पर या केवल अपने सार-असार-विचारके भरोसेपरही कोई काम न कर बैठे; बल्कि पूर्ण साम्यावस्थामें पहुँचे हुए परमावधिके साधु-पुरुषकी शुद्ध बुद्धिकीही शरणमें जा कर उसी गुरुके निर्णयको प्रमाण माने। क्योंकि निरा तार्किक पांडित्य जितना अधिक होगा, युक्तियाँभी उतनीही अधिक निकलेंगी। इसी कारण बिना शुद्धबुद्धिके कोरे पांडित्यसे ऐसे बिकट प्रश्नोंका कभी सच्चा और समाधानकारक निर्णय नहीं होने पाता; अतएव उसको शुद्ध और निष्कामबुद्धिवाला गुरुही करना चाहिये। जो शास्त्रकार अत्यंत सर्वमान्य हो चुके हैं, उनकी बुद्धि इस प्रकारकी शुद्ध रहती है, और यही कारण है, जो भगवानने अर्जुनसे कहा है - “ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ” ( गीता १६. २४ ) - कार्य-अकार्यका निर्णय करनेमें तुझे शास्त्रको प्रमाण मानना चाहिये। तथापि यह न भूल जाना चाहिये, कि कालमानके अनुसार श्वेतकेतु जैसे आगेके साधुपुरुषोंको इन शास्त्रोंमेंभी फ़र्क करनेका अधिकार प्राप्त होता रहता है। निर्वैर और शांत साधु-पुरुषोंके आचरणके संबंधमें लोगोंकी आजकल जो गैर- समझ देखी जाती है, उसका कारण यह है, कि कर्मयोगमार्ग प्रायः लुप्त हो गया है; और सारे संसारहीको त्याज्य माननेवाले संन्यास-मार्गका चारों ओर दौर-दौरा हो गया है। गीताका यह उपदेश अथवा उद्देश्यभी नहीं है, कि निर्वैर होनेसे निष्प्रतिकार- भी होना चाहिये। जिसे लोकसंग्रहकी चिंताही नहीं है, उसे जगतमें दुष्टोंकी प्रबलता फैले तो - और न फैले तो - करनाही क्या है ? उसकी जान रहे, चाहे चली जाय; सब एकही-सा है। किंतु पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए कर्मयोगी प्राणिमात्रमें आत्माकी एकताको पहचान कर यद्यपि सभीके साथ निर्वैरताका व्यवहार किया करते हैं, तथापि अनासक्त-बुद्धिसे पात्रता-अपात्रताका, सार-असार-विचार करके स्वधर्मानु- सार प्राप्त हुए कर्म करनेमें वे कभी नहीं चूकते; और कर्मयोग कहता है, कि इस रीतिसे किये हुए कर्म कर्ताकी साम्य-बुद्धिमेंभी कुछ न्यूनता नहीं आने देते। गीता- धर्म-प्रतिपादित कर्मयोगके इस तत्त्वको मान लेनेपर कुलाभिमान और देशाभिमान आदि कर्तव्य-धर्मोंकीभी कर्मयोगशास्त्रके अनुसार योग्य उपपत्ति लगाई जा सकती है। यद्यपि यह अंतिम सिद्धान्त है, कि समग्र मानव जातिका - प्राणिमात्रका - जिससे हित होता हो, वही धर्म है; तथापि परमावधिकी इस स्थितिको प्राप्त करनेके

लिये कुलाभिमान, धर्माभिमान और देशाभिमान आदि चढ़ती हुई सीढ़ियोंकी आवश्यकता तो कभीभी नष्ट होनेकी नहीं। निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये जिस प्रकार सगुणोपासना आवश्यक है, उसी प्रकार- 'वसुधैव कुटुंबकम्' - की ऐसी बुद्धि पानेके लिये कुलाभिमान, जात्याभिमान, धर्माभिमान और देशाभिमान आदिकी आवश्यकता है, एवं समाजकी प्रत्येक पीढ़ी इसी जीनेसे ऊपर चढ़ती है, इस कारण हमी जीनेको सदैवही स्थिर रखना पड़ता है। ऐसेही जब अपने आसपासके लोग अथवा अन्य राष्ट्र नीचेकी सीढ़ीपर हों, तब यदि कोई एक-आध मनुष्य अथवा राष्ट्र चाहे, कि मैं अकेलेही ऊपरकी सीढ़ीपर बना रहूँ, तो वह कदापि सिद्ध हो नहीं सकता। क्योंकि ऊपर कहाही जा चुका है, कि परस्पर व्यवहारमें 'जैसेको तैसे' न्यायसे ऊपर-ऊपरकी श्रेणीवालोंको नीचे-नीचेकी श्रेणीवाले लोगोंके अन्यायका प्रति- कार करना विशेष प्रसंगपर आवश्यक रहता है। इसमें कोई शंका नहीं कि सुधरते सुधारते जगतके सभी मनुष्योंकी स्थिति एक दिन ऐसी जरूर हो जावेगी, कि वे प्राणिमात्रमें आत्माकी एकताको पहचानने लगें। अंततः मनुष्यमात्रको ऐसी स्थिति प्राप्त कर देनेकी आशा रखना कुछ अनुचितभी नहीं है। परंतु यह न्यायतःही सिद्ध है, कि आत्मोन्नतिकी परमावधिकी यह स्थिति जबतक सबको प्राप्त हो नहीं गई है, तबतक अन्यान्य राष्ट्रों अथवा समाजोंकी स्थितिपर ध्यान देकर साधु-पुरुष अपने समाजोंको उन उन समयोंमें श्रेयस्कर देशाभिमान आदि धर्मोंकाही उपदेश देते रहें। इसके अतिरिक्त इस दूसरी बातपरभी ध्यान देना चाहिये, कि मंजिल दर मंजिल तैयार करके, इमारत बन जानेपर, जिस प्रकार नीचेके हिस्से निकाल डाले नहीं जा सकते अथवा जिस प्रकार तलवार हाथमें आ जानेसे कुदालीकी, या सूर्य होनेसे, अग्निकीभी आवश्यकता बनीही रहती है, उसी प्रकार सर्वभूतहितकी अंतिम सीमापर पहुँच जानेपरभी न केवल देशाभिमानकीही, वरन् कुलाभिमानकी- भी आवश्यकता बनी ही रहती है। क्योंकि समाजसुधारकी दृष्टिसे देखें तो कुला- भिमान जो विशेष काम करता है, वह निरे देशाभिमानसे नहीं होता; और देशाभि- मानका कार्य निरी सर्वभूतात्मैक्य-दृष्टिसे सिद्ध नहीं होता। अर्थात समाजकी पूर्णावस्थामेंभी साम्यबुद्धिकेही समान देशाभिमान और कुलाभिमान आदि धर्मोंकीभी सदैव जरूरत रहतीही है। किंतु केवल अपनेही देशके अभिमानको परम साध्य मान लेनेसे जैसे एक राष्ट्र अपने लाभके लिये दूसरे राष्ट्रका मन-माना नुकसान करनेके लिये तैयार रहता है, वैसी बात सर्वभूतहितको परम साध्य माननेसे नहीं होती। कुलाभिमान, देशाभिमान और अंतमें पूरी मनुष्य जातिके हितमें यदि विरोध आने लगे, तो साम्यबुद्धिसे परिपूर्ण नीति-धर्मका यह महत्त्वपूर्ण और विशेष कथन है, कि उच्च श्रेणीके धर्मोंकी सिद्धिके लिये निम्न श्रेणीके धर्मोंको छोड़दें। विदुरने धृतराष्ट्र- को उपदेश करते हुए कहा है, कि युद्धमें कुलका क्षय हो जावेगा, अतः दुर्योधनके हठके लिये पांडवोंको राज्यका भाग न देनेकी अपेक्षा यदि दुर्योधन न माने तो

सिद्धावस्था और व्यवहार ४०१ ( अपना लड़का भलेही हो ) - उसे अकेलेको छोड़ देनाही उचित है; और इस समर्थनमें यह श्लोक कहा है :- त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ “ कुलके ( बचावके ) लिये एक व्यक्तिको, गांवके लिये कुलको, और पूरे लोक- समूहके लिये गाँवको, एवं आत्माके लिये पृथिवीको छोड़ दें ” ( मभा. आदि. ११५. ३६; मभा ६१. ११ ) । इस श्लोकके पहले तीन चरणोंका तात्पर्य वही है, कि जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है; और चौथे चरणमें आत्मरक्षाका तत्त्व बतलाया गया है । 'आत्म' शब्द सामान्य सर्वनाम है, इससे यह आत्मरक्षाका तत्त्व जैसे एक व्यक्तिको उपयुक्त होता है, वैसेही एकत्रित लोकसमूहको, जातिको, देशको अथवा राष्ट्रकोभी उपयुक्त होता है; और कुलके लिये एक पुरुषको, ग्रामके लिये कुलको, एवं देशके लिये ग्रामको छोड़ देनेकी क्रमशः चढ़ती हुई इस प्राचीन प्रणालीपर जब हम ध्यान देते हैं, तब स्पष्ट दीख पड़ता है, कि 'आत्म' शब्दका अर्थ इन सबकी अपेक्षा इस स्थलपर अधिक महत्त्वका है । फिरभी कुछ स्वार्थी या शास्त्र न जानने- वाले लोग इस चरणका कभी कभी विपरीत अर्थात् निरा स्वार्थ-प्रधान अर्थ किया करते हैं । अतएव यहाँ कह देना चाहिये, कि आत्मरक्षाका यह तत्त्व स्वार्थपरायणता नहीं है । क्योंकि जिन शास्त्रकारोंने निरे स्वार्थसाधु चार्वाक-पंथको राक्षसी बतलाया है ( गीता अ. १६ ), संभव नहीं है, कि वेही स्वार्थके लिये किसीसेभी जगत्‌को डुबानेके लिये कहें । ऊपरके श्लोकमें 'अर्थे' शब्दका अर्थ सिर्फ़ स्वार्थ-प्रधान नहीं है किंतु “ संकट आनेपर उसके निवारणार्थ ” ऐसा करना चाहिये; और कोशकारोंनेभी यही अर्थ किया है । स्वार्थपरायणता और आत्मरक्षामें बड़ा भारी अंतर है । कामो- पभोगकी इच्छा अथवा लोभसे अपना स्वार्थ साधनेके लिये दुनियाका नुकसान करना स्वार्थपरायणता है । यह अमानुषी और नीच है । उक्त श्लोकके प्रथम तीन चरणोंमें कहा है, कि एकके हितकी अपेक्षा अनेकोंके हितपर सदैव ध्यान देना चाहिये । तथापि प्राणिमात्रमें एकही आत्मा रहनेके कारण प्रत्येक मनुष्यको इस जगत्में सुख- से रहनेका एकही-सा नैसर्गिक अधिकार है । और इस सर्वमान्य महत्त्वके नैसर्गिक स्वत्वकी ओर दुर्लक्ष्य कर जगत्‌के किसीभी एक व्यक्तिकी या समाजकी हानि करनेका अधिकार, दूसरे किसी व्यक्ति या समाजको नीतिकी दृष्टिसे कदापि प्राप्त नहीं हो सकता - फिर चाहे वह समाज बल और संख्यामें कितनाही बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो ! अथवा उसके पास छीना-झपटी करनेके साधन दूसरोंसे अधिक क्यों न हो ! यदि कोई इस युक्तिका अवलंबन करे, कि एककी अपेक्षा अथवा थोडोंकी अपेक्षा बहुतोंका हित अधिक योग्यताका है। और इस युक्तिसे, संख्यामें अधिक बढ़े हुए समाजके स्वार्थी बर्तावका समर्थन करे, तो वह युक्तिवाद केवल राक्षसी समझा जावेगा । इस गी. र. २६

४०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

प्रकार दूसरे लोग यदि अन्यायसे वर्तने लगें, तो बहुतेरोंके तो क्या, सारी पृथ्वीके हितकी अपेक्षाभी आत्मरक्षा अर्थात् अपने बचावका नैतिक अधिकार औरभी अधिक सबल हो जाता है; यही उक्त चौथे चरणका भावार्थ है और पहले तीन चरणोंमें जिस अर्थका वर्णन है, उसके लिये महत्त्वपूर्ण अपवादके नाते उसे साथही बतला दिया है। इसके सिवा यहभी देखना चाहिये, कि यदि हम स्वयं जीवित रहेंगे, तो लोककल्याण कर सकेंगे। अतएव लोकहितकी दृष्टिसे विचार करें, तोभी विश्वामित्र- के समान यही कहना पड़ता है, कि "जीवन् धर्ममवाप्नुयात्" – जीयेंगे तो धर्म करेंगे; अथवा कालिदासके अनुसार यही कहना पड़ता है, कि "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" (कुमा. ५. ३३) – शरीरही सब धर्मोंका मूलभूत साधन है; या मनुके कथनानुसार कहना पड़ता है, कि "आत्मानं सततं रक्षेत्" - स्वयं अपनी रक्षा सदासर्वदा करनी चाहिये । यद्यपि आत्मरक्षाका अधिकार सारे जगतके हितकी अपेक्षा इस प्रकार श्रेष्ठ है, तथापि दूसरे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि कई अवसरों- पर कुलके लिये, देशके लिये, धर्मके लिये अथवा परोपकारके लिये स्वयं अपनीही इच्छासे साधु लोग अपनी जानपर खेल जाते हैं। उक्त श्लोकके पहले तीन चरणोंमें यही तत्त्व वर्णित है। ऐसे प्रसंगपर मनुष्य आत्मरक्षाके अपने श्रेष्ठ स्वत्वपरभी स्वेच्छासे पानी फेर दिया करता है, अतः ऐसे कामकी नैतिक योग्यताभी सबसे श्रेष्ठ समझी जाती है। तथापि इस बातका अचूक निश्चय कर देनेके लिये, कि ऐसे अवसर कब उत्पन्न होते हैं, निरा पांडित्य या तर्कशक्ति पूर्ण समर्थ नहीं है। इसलिये धृतराष्ट्रके उल्लिखित कथानकसे यह बात प्रकट होती है, कि विचार करनेवाले मनुष्यका अंतःकरण पहलेसेही शुद्ध और सम रहना चाहिये। महाभारतमेंही कहा है, कि धृतराष्ट्रकी बुद्धि इतनी मंद न थी, कि वे विदुरके उपदेशको समझ न सकें, परंतु पुत्रप्रेम उनकी बुद्धिको सम होने कहाँ देता था ? कुबेरको जिस प्रकार लाख रुपयेकी कभी कमी नहीं पड़ती, उसी प्रकार जिसकी बुद्धि एक बार सम हो चुकी, उसे कुलात्मैक्य, देशात्मैक्य या धर्मात्मैक्य आदि निम्न श्रेणीकी एकताओंका कभी तोटा पड़ताही नहीं है। ब्रह्मात्मैक्यमें इन सबका अंतर्भाव हो जाता है। फिर देश- धर्म, कुलधर्म आदि संकुचित धर्मोंका अथवा सर्वभूतहितके व्यापक धर्मका – अर्थात् इनमेंसे जिस-जिसकी स्थितिके अनुसार, अथवा आत्मरक्षाके निमित्त जिस समयमें जिसे जो धर्म श्रेयस्कर हो, उसको उसी धर्मका – उपदेश करके जगतके धारण- पोषणका काम साधु लोग करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि मानव जातिकी वर्तमान स्थितिमें देशाभिमानही मुख्य सद्गुण हो गया है; और सुधरे हुए राष्ट्रभी इन विचारों और तैयारियोंमें अपने ज्ञानका, कुशलताका और द्रव्यका उपयोग किया करते हैं, कि पास-पड़ोसके शत्रुदेशीय बहुत-से लोगोंको प्रसंग पड़नेपर थोड़ेही समय हम क्यों कर जानसे मार सकेंगे। किंतु स्पेन्सर और कोंट प्रभृति पंडितोंने अपने ग्रंथोंमें स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि केवल इसी एक कारणसे देशाभिमानकोही नीतिकी

सिद्धावस्था और व्यवहार ४०३ दृष्टिसे मानवजातिका परम साध्य मान नहीं सकते; और जो आक्षेप इन लोगोंके प्रतिपादित तत्त्वपर हो नहीं सकता, वही आक्षेप, हम नहीं समझते, कि अध्यात्म- दृष्टया प्राप्त सर्वभूतात्मैक्यरूप तत्त्वपरही कैसे हो सकता है ? छोटे बच्चेके कपडे उसके शरीरकेही अनुसार - बहुत हुआ तो जरा ढीले अर्थात् बाढ़के लिये गुंजाइश रख कर - जैसे ब्योंताने पड़ते हैं, वैसेही सर्वभूतात्मैक्य बुद्धिकीभी बात है। समाज हो या व्यक्ति, सर्वभूतात्मैक्य बुद्धिमे उसके आगे जो साध्य रखना है, वह उसके अधिकारके अनुरूप अथवा उसकी अपेक्षा जरा-सा और आगेका होगा; तभी वह उसको श्रेयस्कर हो सकता है; उसकी सामर्थ्यकी अपेक्षा बहुत अच्छी बात उसको एकदम करनेके लिये बतलाई जाय, तो उससे उसका कल्याण कभी नहीं हो सकता । परब्रह्मकी कोई सीमा न होनेपरभी उपनिषदोंमें उसकी उपासनाकी क्रम-क्रमसे बढ़ती हुई सीढ़ियाँ बतलानेका यही कारण है; और जिस समाजमें सभी स्थितप्रज्ञ हों, वहाँ क्षात्र-धर्मकी जरूरत न भी हो, तोभी जगतके अन्यान्य समाजोंकी तत्कालीन स्थितिपर ध्यान दे करके " आत्मानं सततं रक्षेत् "के ढंगपर हमारे धर्मशास्त्रकी चातुर्वर्ण्य व्यवस्थामें क्षात्र-धर्मका संग्रह किया गया है । यूनानके प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता प्लेटोने अपने ग्रंथमें जिस समाज-व्यवस्थाको अत्यंत उत्तम बतलाया है, उसमेंभी निरंतरके अभ्याससे युद्धकलामें प्रवीण वर्गको समाजरक्षकके नाते प्रमुखता दी है । इससे स्पष्टही दीख पड़ेगा कि तत्त्वज्ञानी लोग परमावधिकी शुद्ध और उच्च स्थितिके विचारोंमेंही डूब क्यों न रहा करें; परंतु वे तत्कालीन अपूर्ण समाज व्यवस्थाका विचार करनेसेभी कभी नहीं चूकते । ऊपरकी सब बातोंका इस प्रकार विचार करनेसे ज्ञानी पुरुषके संबंधमें यह सिद्ध होता है, कि वह ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे अपनी बुद्धिको निर्विषय, शांत और प्राणि- मात्रमें निर्वैर तथा सम रखे और इस स्थितिको पा जानेसे सामान्य अज्ञानी लोगोंसे उकतावे नहीं अथवा स्वयं सारे संसारी कामोंका त्याग कर याने कर्म-संन्यास आश्रमको स्वीकार करके इन लोगोंकी बुद्धिको न बिगाड़े । परंतु देश-काल और परिस्थितिके अनुसार जिन्हें जो योग्य हो, उसीका उन्हें उपदेश देवे; अपने निष्काम कर्तव्य- आचरणसे सद्व्यवहारका अधिकारानुसार प्रत्यक्ष आदर्श दिखला कर, सबको धीरे धीरे यथासंभव शांतिसे किंतु उत्साहपूर्वक उन्नतिके मार्गमें लगावे; बस, यही ज्ञानी पुरुषका सच्चा धर्म है । समय-समयपर अवतार ले कर भगवानभी यही काम किया करते हैं; और ज्ञानी पुरुषकोभी यही आदर्श मान, फलपर ध्यान न देते हुए, इस जगतका अपना कर्तव्य शुद्ध अर्थात् निष्काम बुद्धिसे सदैव यथाशक्ति करते रहना चाहिये । सारे गीताशास्त्रका सारांश यही है, कि इस प्रकारके कर्तव्य-पालनमें यदि मृत्युभी आ जावे, तो बड़े आनंदसे उसे स्वीकार कर लेना चाहिये ( गीता ३. ३५ ); अपने कर्तव्य अर्थात् धर्मको न छोड़ना चाहिये । इसेही लोकसंग्रह अथवा कर्मयोग कहते हैं । न केवल वेदान्तही, वरन् उसके आधारपर साथ-ही-साथ कर्म-

४०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अकर्मका ऊपर लिखा हुआ ज्ञानभी जब गीतामें बतलाया गया, तभी तो पहले युद्ध छोड़कर भीख मांगनेकी तैयारी करनेवाला अर्जुन आगे चलकर स्वधर्मके अनुसार भयानक युद्ध करनेके लिये – सिर्फ इसीलिये नहीं, कि भगवान् कहते हैं, वरन् अपनी इच्छासे – प्रवृत्त हो गया । स्थितप्रज्ञकी साम्य-बुद्धिका यही तत्त्व, कि जिसका अर्जुनको उपदेश हुआ है, कर्मयोगशास्त्रका मूल आधार है । अतः उसीको प्रमाण मान, उसके आधारसे हमने बतलाया है, कि पराकाष्ठाकी नीतिमत्ताकी उपपत्ति क्योंकर लगती है । हमने इस प्रकरणमे कर्मयोगशास्त्रकी इन मोटी-मोटी बातोंका संक्षिप्त निरूपण किया है, कि आत्मौपम्य-दृष्टिसे समाजमें परस्पर एक- दूसरेके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये; 'जैसेको तैंसे' वाले न्यायसे अथवा पात्रता- अपात्रताके कारण पराकाष्ठाके नीतिधर्ममें कौन-से भेद होते हैं; अथवा अपूर्णा- वस्थाके समाजमें बर्तनेवाले साधुपुरुषकोभी अपवादात्मक नीतिधर्म कैसे स्वीकार करने पडते है । इन्हीं युक्तियोंका उपयोग न्याय, परोपकार, दान, दया, अहिंसा, सत्य और अस्तेय आदि नित्य धर्मोंके विषयमें किया जा सकता है । आजकलकी अपूर्ण समाज-व्यवस्थामें यह दिखलानेके लिये, कि प्रसंगके अनुसार इन नीति-धर्मोंमें कहाँ और कौन-सा फ़र्क करना ठीक होगा, यदि इन धर्मोंमेंसे प्रत्येकपर एक एक स्वतंत्र ग्रंथ लिखा जाय, तोभी यह विषय समाप्त न होगा; और यह भगवद्गीताका मुख्य उद्देश्यभी नहीं है । इस ग्रंथके दूसरेही प्रकरणमें हम इसका दिग्दर्शन कर चुके हैं, कि अहिंसा और सत्य, सत्य और आत्मरक्षा, आत्मरक्षा और शांति आदिमें पर- स्पर विरोध होकर विशेष प्रसंगपर कर्तव्य-अकर्तव्यका संदेह कैसे उत्पन्न हो जाता है । यह निर्विवाद है, कि ऐसे अवसरपर साधुपुरुष “नीतिधर्म, लोकयात्रा-व्यवहार, स्वार्थ और सर्वभूतहित” आदि बातोंका तारतम्य-विचार करके फिर कार्य-अकार्यका निर्णय किया करते हैं; और महाभारतमें श्येनने शिबि राजाको यह बात स्पष्टही बतला दी है । सिज्विक नामक अंग्रेज ग्रंथकारने अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें इसी अर्थका विस्तारसहित वर्णन अनेक उदाहरण लेकर किया है । किंतु कुछ पश्चिमी पंडित इतनेहीसे यह जो अनुमान करते हैं, कि स्वार्थ और परार्थके सार-असारका विचार करनाही नीति-निर्णयका तत्त्व है; उसे हमारे शास्त्रकारोंने कभी मान्य नहीं किया है। क्योंकि हमारे शास्त्रकारोंका कथन है, कि यह सार-असारका विचार अनेक वार इतना सूक्ष्म और अनैकांतिक अर्थात् अनेक अनुमान निष्पन्न कर देनेवाला होता है, कि यदि यह साम्य-बुद्धि – “जैसा मैं, वैसा दूसरा”- पहलेसेही मनमें सोलहों आने जमी हुई न हो, तो कोरे तार्किक सार-असारके विचारसे कर्तव्य-अकर्तव्यका सदैव अचूक निर्णय होना संभव नहीं है; और फिर ऐसी घटना हो जानेकीभी संभावना रहती है; जैसे कि “मोर नाचता है, इसलिये मोरनीभी नाचने लगती है ?” अर्थात् “देखादेखी साधै जोग, छीजै काया, बाढ़ै रोग” इस लोकोक्तिके अनुसार ढोंग फैल सकेगा; और समाजकी हानि होगी । मिल प्रभृति उपयुक्ततावादी पश्चिमी नीति-

सिद्धावस्था और व्यवहार ४०५ शास्त्रज्ञोंके उपपादनमें यही तो मुख्य अपूर्णता है। गरुड झपटकर अपने पंजेमे मेमनेको आकाशमें उठा ले गया, इसलिये उसकी देखादेखी यदि कौवाभी ऐसाही करने लगे, तो धोखा खाये बिना न रहेगा। इसीलिये गीता कहती है, कि साधु-पुरुषोंकी बाहरी युक्तियोंपरही अवलंबित मत रहो। अंतःकरणमें सदैव जागृत रहनेवाली साम्य- बुद्धिकीही अंतमें शरण लेनी चाहिये। क्योंकि कर्मयोगशास्त्रकी सच्ची जड़ साम्य- बुद्धिही है। अर्वाचीन आधिभौतिक पंडितोंमेंसे कोई स्वार्थको, तो कोई परार्थ अर्थात् "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" को नीतिका मूल तत्त्व बतलाते हैं। परंतु हम चौथे प्रकरणमें यह दिखला चुके हैं, कि कर्मके केवल बाहरी परिणामोंको उपयोगी होनेवाले इन तत्त्वोंसे सर्वत्र निर्वाह नही होता; इसका विचारभी अवश्य करना पड़ता है, कि कर्ताकी बुद्धि कहाँ तक शुद्ध है। कर्मके बाह्य परिणामोंके सार-असारका विचार करना चतुराईका और दूरदर्शिताका लक्षण है सही; परंतु दूरदर्शिता और नीति, ये शब्द समानार्थक नहीं हैं। इसीसे हमारे शास्त्रकार कहते हैं, कि निरे वाह्य कर्मके सार-असार विचारकी इस कोरी व्यापारी क्रियामें सद्बर्तावका सच्चा बीज नहीं है; किंतु साम्यबुद्धिरूप परमार्थही नीतिका मूल आधार है। मनुष्यकी अर्थात् जीवात्माकी पूर्णावस्थाका योग्य विचार करें, तोभी उक्त सिद्धान्तही करना पड़ता है। लोभसे एक-दूसरेको लूटनेमें बहुतेरे आदमी होशियार होते हैं परंतु इस बातके जाननेयोग्य कोरे ब्रह्मज्ञानकोही- कि यह होशियारी, अथवा अधिकांश लोगोंके अधिक सुख, काहेमें हैं- इस जगतमें प्रत्येक मनुष्यका परम साध्य कोईभी नही कहता। जिसका मन या अंतःकरण शुद्ध है, वही पुरुष उत्तम कहलाने योग्य है। और तो क्या; यहभी कह सकते हैं, कि जिसका अंतःकरण निर्मल, निर्वैर और शुद्ध नहीं है, वह यदि बाह्य कर्मोंके हिसाबी तारतम्यमें फँसकर तदनुसार बर्ते, तो उस पुरुषके ढोंगी बन जानेकी संभावना है (गीता ३. ६)। परंतु कर्मयोगशास्त्रम साम्य-बुद्धिको प्रमाण मान लेनेसे यह दोष नहीं रहता। साम्य-बुद्धिको प्रमाण मान लेनेसे कहना पड़ता है, कि कठिन समस्या आनेपर धर्म-अधर्मका निर्णय करानेके लिये ज्ञानी साधु-पुरुषोंकीही शरणमें जाना चाहिये, कोई और उपाय नहीं। कोई भयंकर रोग होनेपर जिस प्रकार बिना वैद्यकी सहायताके उसका निदान और उसकी चिकित्सा नहीं हो सकती, उसी प्रकार धर्म-अधर्म-निर्णयके विकट प्रसंगपर यदि कई सामान्य मनुष्य सत्पुरुषोंकी मदद न ले; और यह अभिमान रखे, कि मैं "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" वाले एकही साधनमे धर्म-अधर्मका अचूक निर्णय आपही कर लूंगा, तो उसका यह अभिमान व्यर्थ होगा। साम्य-बुद्धिको बढ़ाते रहनेका अभ्यास प्रत्येक मनुष्यको करना चाहिये और इस क्रमसे संसारभरके मनुष्यकी बुद्धि जब पूर्ण साम्यावस्था में पहुँच जावेगी, तभी मत्ययुगकी प्राप्ति होगी; तथा मनुष्य-जातिका परम साध्य प्राप्त होगा अथवा पूर्णावस्था सबको प्राप्त हो जावेगी। कार्य-अकार्य-शास्त्रकी प्रवृत्तिभी इसी लिये हुई है; और इसी कारण उसकी इमारत-

४०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कोभी साम्य-बुद्धिकीही नींवपर खड़ा करना चाहिये । परंतु इतनी दूर न जाकर आगे पंद्रहवें प्रकरणमें की गयो तुलनात्मक परीक्षासे स्पष्ट मालूम हो जायगा, कि यदि नीतितत्त्वोंका केवल लौकिक कसौटीकी दृष्टिसेही विचार करें, तोभी गीताका साम्य-बुद्धिवाला पक्षही पाश्चात्त्य आधिभौतिक या आधिदैवत पंथकी अपेक्षा अधिक योग्यताका और मार्मिक सिद्ध होता है। परंतु गीताके तात्पर्यके निरूपणका जो एक महत्त्वपूर्ण भाग अभी शेष है, उसेही पहले पूराकर लेते हैं।

तेरहवाँ प्रकरण भक्तिमार्ग सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ *

  • गीता १८. ६६ अबतक अध्यात्म-दृष्टिसे इन बातोंका विचार किया गया है, कि देहमें बनी सर्वभूतात्मैक्यरूपी निष्काम बुद्धिही कर्मयोगकी और मोक्षकीभी जड़ है । यह शुद्ध बुद्धि ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे प्राप्त होती है; और इसी शुद्ध बुद्धिसे प्रत्येक मनुष्यको जन्मभर स्वधर्मानुसार प्राप्त हुए अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करना चाहिये । परंतु इतनेहीसे भगवद्गीताके प्रतिपाद्य विषयका विवेचन पूरा नहीं होता । यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि ब्रह्मात्मैक्यज्ञानही केवल सत्य और अंतिम साध्य है, तथा "उसके समान इस संसारमें दूसरी कोईभी वस्तु पवित्र नहीं है" (गीता ४. ३८) ; तथापि अबतक उसके विषयमें जो विचार किया गया; और उसकी सहायतासे साम्य-बुद्धि प्राप्त करनेका जो मार्ग बतलाया गया है, वह सब बुद्धिगम्य है । इसलिये सामान्य जनोंकी शंका है, कि उस विषयको पूरी तरहसे समझनेके लिये प्रत्येक मनुष्यकी बुद्धि इतनी तीव्र कैसे हो सकती है; और यदि किसी मनुष्यकी बुद्धि तीव्र न हो, तो क्या उसको ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे हाथ धो बैठना चाहिये ? सच कहा जाय, तो यह शंकाभी कुछ अनुचित नहीं दीख पड़ती । यदि कोई कोकहे - "जब कि बड़े बड़े ज्ञानी पुरुषभी विनाशी नामरूपात्मक मायासे आच्छादित तुम्हारे उस अमृतस्वरूपी परब्रह्मका वर्णन करते समय 'नेति नेति' कह कर चुप हो जाते हैं, तब हमारे समान साधारण जनोंकी समझमें वह कैसे आवे ? इसलिये हमें कोई ऐसा सरल उपाय या मार्ग बतलाओ, जिससे तुम्हारा वह गहन ब्रह्मज्ञान हमारी अल्प ग्रहणशक्तिके समझमें आ जावे; " - तो इसमें उसका क्या दोष है ? गीता और कठोपनिषद्में (गीता २. २९; क. २. ७) कहा है, कि आश्चर्यचकित होकर आत्मा (ब्रह्म) का वर्णन करनेवाले तथा सुननेवाले बहुत हैं, तोभी किसीको उसका ज्ञान नहीं होता । श्रुतिग्रंथोंमें इस विषयपर एक बोधदायक कथाभी है । उसमें यह वर्णन है, कि जब बाष्कलिने बाह्वसे कहा - "हे महाराज ! मुझे कृपाकर बतलाइये, कि ब्रह्म किसे
  • "सब प्रकारके धर्मोंको याने परमेश्वरप्राप्तिके साधनोंको छोड़ केवल मेरीही शरणमें आ । मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा; डर मत।" इस श्लोकके अर्थका विवेचन इस प्रकरणके अंतमें किया है ।

४०८ गीतारहस्य और कर्मयोगशास्त्र कहते हैं; ' तब बाह्व् कुछभी नहीं बोले। बाष्कलिने फिर वही प्रश्न किया, तोभी बाह्व् चुपही रहे। जब ऐसाही चार-पांच बार हुआ, तब अंतमें बाह्व्ने बाष्कलिसे कहा - "अरे ! मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर तभीसे दे रहा हूँ; परंतु तेरी समझमें नहीं आया - मैं क्या करूँ ? ब्रह्मस्वरूप किसी प्रकार बतलाया नहीं जा सकता, इसलिये शांत होना अर्थात् चुप रहनाही सच्चा ब्रह्मलक्षण है। समझा?" (वे. सू. शां. भा. ३. २. १७)। सारांश, जिस दृश्य-सृष्टि-विलक्षण, अनिर्वाच्य और अचिंत्य परब्रह्म- का यह वर्णन है - कि वह मुँह बंद कर बतलाया जा सकता है, आँखोंसे दिखाई न देनेपर उसे देख सकते हैं और समझमें न आनेपर वह ज्ञात होने लगता है (केन. २. ११) - उसको साधारण बुद्धिके मनुष्य कैसे पहचान सकेंगे और उसके द्वारा साम्यावस्था प्राप्त होकर उनको सद्गति कैसे मिलेगी? जब परमेश्वर-स्वरूपका अनुभवात्मक और यथार्थ ज्ञान ऐसा होवे, कि सब चराचर सृष्टिमें एक आत्मा प्रतीत होने लगे, तभी मनुष्यकी पूरी उन्नति होगी; और ऐसी उन्नति कर लेनेके लिये तीव्र बुद्धिके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्गही न हो, तो संसारके लाखों-करोड़ों मनुष्योंको ब्रह्मप्राप्तिकी आशा छोड़ चुपचाप बैठे रहना होगा। क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्योंकी संख्या हमेशा कमही रहती है। यदि यह कहें कि बुद्धिमान् लोगोंके कथनपर विश्वास रखनेसे हमारा काम चल जायगा; तो उनमेंभी कई मतभेद दिखाई देते हैं; और यदि यह कहें, कि विश्वास रखनेसे काम चल जाता है, तो यह बात आप-ही-आप सिद्ध हो जाती है, कि इस गहन ज्ञानकी प्राप्तिके लिये "विश्वास अथवा श्रद्धा रखना" भी, बुद्धिके अतिरिक्त दूसरा मार्ग है। सच पूछो तो यही दीख पड़ेगा, कि ज्ञानकी पूर्ति अथवा फलद्रूपता श्रद्धाके बिना नहीं होती। यह कहना, कि सब ज्ञान केवल बुद्धिहीसे प्राप्त होता है, उसके लिये किसी अन्य मनोवृत्तिकी सहायता आवश्यक नहीं, उन पंडितोंका वृथाभिमान है, जिनकी बुद्धि केवल तर्कप्रधान शास्त्रोंका जन्म भर अध्ययन करनेसे कर्कश हो गई है। उदाहरणके लिये यह सिद्धान्त लीजिये, कि कल सबेरे फिर सूर्योदय होगा। हम लोग इस सिद्धान्तके ज्ञानको अत्यंत निश्चित मानते हैं। क्यों? उत्तर यही है, कि हमने और हमारे पूर्वजोंने इस क्रमको हमेशा अखंडित देखा है। परंतु कुछ अधिक विचार करनेसे मालूम होगा, कि "हमने अथवा हमारे पूर्वजोंने जबतक प्रतिदिन सबेरे सूर्यको निकलते देखा है", इसीसे यह बात कल सबेरे सूर्योदय होनेका कारण नहीं हो सकती; अथवा प्रतिदिन हमारे देखनेके लिये या हमारे देखनेनेही कुछ सूर्योदय नहीं होता; यथार्थमें सूर्योदय होनेके कुछ औरही कारण हैं। अच्छा; अब यदि "हमारा सूर्यको प्रतिदिन देखना" कल सूर्योदय होनेका कारण नहीं है, तो इसके लिये क्या प्रमाण है, कि कल सूर्योदय होगा? दीर्घ कालतक किसी वस्तुका क्रम एक सा अबाधित दीख पडनेपर यह मान लेनाभी एक प्रकार विश्वास या श्रद्धाही तो है न, कि वह क्रम आगेभी वैसाही नित्य चलता रहेगा? यद्यपि हम उसको एक बहुत बड़ा प्रतिष्ठित नाम - 'अनुमान'

दे दिया करते हैं; तोभी यह ध्यानमें रखना चाहिये, कि वह अनुमान बुद्धिगम्य कार्यकारणात्मक नहीं है; किंतु उसका मूल-स्वरूप श्रद्धात्मकही है। मन्नूको शक्कर मीठी लगती है; इसलिये छत्तूकोभी वह मीठी लगेगी- यह जो निश्चय हम लोग किया करते हैं; वहभी वस्तुतः इसी नमूनेका है। क्योकि जब कोई कहता है, कि मुझे शक्कर मीठी लगती है, तब इस ज्ञानका अनुभव उसकी बुद्धिको प्रत्यक्ष रूपसे होता है सही; परंतु इससेभी आगे बढ़कर जब हम यह सकते हैं, कि शक्कर सब मनुष्योंको मीठी लगती है, तब बुद्धिको श्रद्धाकी सहायता दिये विना काम नहीं चल सकता। रेखागणित या भूमितिशास्त्रका सिद्धान्त है, कि ऐसी दो रेखाएँ हो सकती हैं, जो चाहे जितनी बढ़ाई जावें; तोभी आपसमें नहीं मिलती। कहना नहीं होगा, कि इस तत्त्वको अपने ध्यानमें लानेके लिये हमको अपने प्रत्यक्ष अनुभवकेभी परे केवल श्रद्धाहीकी सहा- यतासे चलना पड़ता है। इसके सिवा यहभी ध्यानमें रखना चाहिये, कि संसारके सब व्यवहार श्रद्धा, प्रेम आदि नैसर्गिक मनोवृत्तियोंसेही चलते हैं; इन वृत्तियोंको रोकनेके सिवा बुद्धि दूसरा कोई कार्य नहीं करती। और जब बुद्धि किसी बातकी भलाई या बुराईका निश्चय कर लेती है, तब आगे उस निश्चयको अमलमें लानेका काम मनके द्वारा अर्थात् मनोवृत्तिके द्वाराही हुआ करता है। इस बातकी चर्चा पहले 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचारमें' हो चुकी है। सारांश यह है, कि बुद्धिगम्य ज्ञानकी पूर्ति होनेके लिये और आगे बुद्धिसे नीचे उतरकर आचरण तथा कृतिमें उसकी फलरूपता होनेके लियेही इस ज्ञानको हमेशा, श्रद्धा, दया, वात्सल्य, कर्तव्य-प्रेम इत्यादि अन्य नैसर्गिक मनोवृत्तियोंकी आवश्यकता होती है; और जो ज्ञान इन मनोवृत्तियोंको शुद्ध तथा जागृत नहीं करता, और जिस ज्ञानको उनकी सहायता अपेक्षित नहीं होती, उसे सूखा, कर्कश, अधूरा, बाँझ या कच्चा ज्ञान समझना चाहिये। जैसे बिना बारूदके केवल गोलीसे बंदूक नहीं चलती, वैसेही प्रेम, श्रद्धा आदि मनोवृत्तियोंकी सहायताके बिना केवल बुद्धिगम्य ज्ञान किसीको तार नहीं सकता, यह सिद्धान्त हमारे प्राचीन ऋषियोंको भली भाँति मालूम था। उदाहरणके लिये छांदोग्योपनिषद्मे वर्णित यह कथा लीजिये (छां. ६. १२):- एक दिन श्वेतकेतुके पिताने यह सिद्धकर दिखानेके, लिये कि अव्यक्त और सूक्ष्म परब्रह्मही सब दृश्य जगतका मूल-कारण है; श्वेतकेतुसे कहा, कि बरगदका एक फल ले आओ, और देखो, कि उसके भीतर क्या है। श्वेतकेतुने वैसाही किया, उस फलको तोड़कर देखा और कहा- "इसके भीतर छोटे छोटे बहुतसे बीज या दाने हैं।" उसके पिताने फिर कहा, कि "उन बीजोंमेंसे एक बीज ले लो; उसे तोड़कर देखो और बतलाओ, कि उसके भीतर क्या है?" श्वेतकेतुने एक बीज ले लिया; उसे तोड़- कर देखा और कहा कि "इसके भीतर तो कुछ नहीं है।" तब पिताने कहा, "अरे! यह जो तुम 'कुछ नहीं' कहते हो, उसीसे यह बरगदका बहुत बड़ा वृक्ष हुआ है," और अंतमें यह उपदेश दिया, कि 'श्रद्धत्स्व' इसका विश्वास कर अर्थात् इस कल्पनाको केवल बुद्धिमें रख। मुँहसेही 'हाँ' मत कहा; किंतु उसकेभी आगे चल याने इस

४१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तत्त्वको अपने हृदयमें अच्छी तरह जमने दे; और आचरण या कृतिमें दिखाई देने दे। सारांश, यदि यह निश्चयात्मक ज्ञान होनेके लियेभी अंतमें श्रद्धाकी आवश्यकता है, कि सूर्यका उदय कल सबेरे होगा, तो यहभी निर्विवाद सिद्ध है, कि इस बातको पूर्णतया जान लेनेके लिये-कि सारी सृष्टिका मूल तत्त्व अनादि, अनंत, सर्वकर्तृ, सर्वज्ञ, स्वतंत्र और चैतन्यरूप है-पहले हम लोगोंको यथाशक्ति, बुद्धिरूपी बटोहीका अवलंबन करना चाहिये; परंतु उसके अनुरोधसे आगे कुछ दूर तो अवश्यही श्रद्धा तथा प्रेमकी पगडंडीसेही जाना चाहिये, देखिये, मैं जिसे माँ कहकर ईश्वरके समान वंद्य और पूज्य मानता हूँ, उसीही अन्य लोग एक सामान्य स्त्री समझते हैं; या नैयायिकोंके शास्त्रीय शब्दाडंबरके अनुसार "गर्भधारण-प्रसवादिस्त्रीत्वसामान्यावच्छेदकाव- च्छिन्नव्यक्तिविशेषः समझते हैं।" इस एक छोटेसे व्यावहारिक उदाहरणसे यह बात किसीकेभी ध्यानमें सहज आ सकती है, कि जब केवल तर्कशास्त्रके सहारे प्राप्त किया गया ज्ञान, श्रद्धा और प्रेमके साँचेमें ढाला जाता है, तब उसमें कैसा अंतर हो जाता है। इसी कारणसे गीतामें (गीता ६. ४७) कहा है, कि कर्मयोगियोंमेंभी श्रद्धावान् श्रेष्ठ है; और ऐसाही सिद्धांत जैसे पहले कह चुकेभी हैं-अध्यात्मशास्त्रमें कहा गया है, कि इंद्रियातीत होनेके कारण जिन पदार्थोंका चिंतन करते नहीं बनता, उनके स्वरूपका निर्णय केवल तर्कसे नहीं करना चाहिये-"अचिंत्याः खलु ये भावाः न तांस्तर्केण चिंतयेत् ।" यदि यही एक अड़चन हो, कि साधारण मनुष्योंके लिये निर्गुण परब्रह्मका ज्ञान होना कठिन है, तो बुद्धिमान पुरुषोंमें मतभेद होनेपरभी श्रद्धा या विश्वाससे उसका निवारण किया जा सकता है। कारण यह है, कि इन पुरुषोंमें जो अधिक विश्वसनीय होंगे, उन्हींके वचनोंपर विश्वास रखनेसे हमारा काम बन जावेगा (गीता १३. २५)। तर्कशास्त्रमें इस उपायको 'आप्तवचनप्रमाण' कहते हैं। 'आप्त'का अर्थ विश्वसनीय पुरुष है। जगतके व्यवहारपर दृष्टि डालनेसे यही दिखाई देगा कि, हजारों लोग आप्त-वाक्यपर विश्वास रखकरही अपना व्यवहार चलाते हैं। दो पंचे दसके बदले सात क्यों नहीं होते ? अथवा एकपर एक लिखनेसे दो नहीं होते; ग्यारह क्यों होते हैं; इस विषयकी उपपत्ति या कारण बतलानेवाले पुरुष बहुतही कम मिलते हैं। तोभी इन सिद्धांतोंको सत्य मानकरही जगतका व्यवहार चल रहा है। ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे, जिन्हें इस बातका प्रत्यक्ष ज्ञान है, कि हिमालयकी ऊँचाई पाँच मील है या दस मील। परंतु जब कोई यह प्रश्न पूछता है, कि हिमालयकी ऊँचाई कितनी है, तब भूगोलकी पुस्तकमें पढ़ी हुई, 'तेईस हजार फीट' संख्या हम तुरंतही बतला देते हैं। फिर यदि इसी प्रकार कोई पूछे, कि 'ब्रह्म कैसा है' तो यह उत्तर देनेमें क्या हानि है, कि वह 'निर्गुण' है। वह सचमुचही निर्गुण है या नहीं, इस बातकी पूरी जाँचकर उसके साधक-बाधक प्रमाणोंकी मीमांसा करनेके लिये सामान्य लोगोंमें बुद्धिकी तीव्रता भलेही न हो; परंतु श्रद्धा या विश्वास कुछ ऐसा मनोधर्म नहीं है,