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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

आठवाँ अध्याय ७४१ आठवाँ अध्याय [ इस अध्यायमें कर्मयोगके अंतर्गत ज्ञान-विज्ञानका निरूपणही हो रहा है, और पिछले अध्यायमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ, ये जो परमेश्वरके स्वरूपके विविध भेद कहे हैं, पहले उनका अर्थ बतलाकर विवेचन किया है, कि उनमें क्या तथ्य है। परंतु यह विवेचन उन शब्दोंकी केवल व्याख्या करके अर्थात् अत्यंत संक्षिप्त रीतिसे किया है, अतः यहाँपर उक्त विषयका कुछ अधिक स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है। बाह्य सृष्टिके अवलोकनसे उसके कर्ताकी कल्पना अनेक लोग अनेक रीतियोंसे किया करते हैं। १. कोई कहते हैं, कि सृष्टिके सब पदार्थ पंचमहाभूतोंकेही विकार हैं और इन पंचमहाभूतोंको छोड़ मूलमें दूसरा कोईभी तत्त्व नहीं है। २. दूसरे कई लोग यह प्रतिपादन करते हैं, कि गीताके चौथे अध्यायके वर्णनके अनुसार समस्त जगत् यज्ञसे हुआ है, इसलिये यह परमेश्वर यज्ञनारायणरूपी है और यज्ञसेही उसकी पूजा होती है। ३. और कुछ लोगोंका कहना है, कि जड़ पदार्थ स्वयं सृष्टिके व्यापार नहीं करते; किंतु उनमेंसे प्रत्येकमें कोई-न-कोई सचेतन पुरुष या देवता रहते हैं; जो कि इन व्यवहारोंको किया करते हैं, और इसीलिये हमें उन देवताओंकी आराधना करनी चाहिये। उदा- हरणार्थ, जड़ पांचभौतिक सूर्यके गोलेमें सूर्य नामका जो पुरुष है, वही प्रकाश देने वगैरेहका काम किया करता है, अतएव वही उपास्य है। ४. चौथे पक्षका कथन है, कि प्रत्येक पदार्थमें उस पदार्थसे भिन्न किसी देवताका निवास मानना ठीक नहीं है। जैसे मनुष्यके शरीरमें आत्मा है, वैसेही प्रत्येक वस्तुमें उसी वस्तुका कुछ-न-कुछ सूक्ष्म रूप अर्थात् आत्माके समान सूक्ष्म शक्ति वास करती है और वही उसका मूल और सच्चा स्वरूप है। उदाहरणार्थ, पंच स्थूल महाभूतोंमें पंच-सूक्ष्म- तन्मात्राएँ, और हाथ-पैर आदि स्थूल इंद्रियोंमें सूक्ष्म इंद्रियाँ मूलभूत रहती हैं। इसी चौथे तत्त्वपर सांख्योंका यह मतभी अवलंबित है, कि प्रत्येक मनुष्यका आत्माभी पृथक् पृथक् है और पुरुष असंख्य हैं; परंतु जान पड़ता है, कि यहाँ इस सांख्य मतका ‘अधिदेह’ वर्गमें समावेश किया गया है। उक्त चार पक्षोंकोही क्रमसे अधिभूत, अधियज्ञ, अधिदैवत और अध्यात्म कहते हैं। किसीभी शब्दके पीछे ‘अधि’ उपसर्ग रहनेसे यह अर्थ होता है - ‘तमधिकृत्य’, ‘तद्विषयक’, ‘उस संबंधका’ या ‘उसमें रहनेवाला’। इस अर्थके अनुसार अधिदैवत अनेक देवताओंमें रहनेवाला तत्त्व है। साधारणतया अध्यात्म उस शास्त्रको कहते हैं, जो यह प्रतिपादन करता है, कि सर्वत्र एकही आत्मा है। किंतु यह अर्थ सिद्धान्त पक्षका है। अर्थात् पूर्वपक्षके इस कथनकी जाँच करके, कि “अनेक वस्तुओं या मनुष्योंमेंभी अनेक आत्मा हैं”, वेदान्तशास्त्रने आत्माकी एकताके इस सिद्धान्तको निश्चित

७४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर दिया है । अतः पूर्वपक्षका जब विचार करना होता है, तब माना जाता है, कि प्रत्येक पदार्थका सूक्ष्म स्वरूप या आत्मा पृथक् पृथक् है; और यहाँपर अध्यात्म शब्दसे यही अर्थ अभिप्रेत है । महाभारतमें मनुष्यकी इंद्रियोंका उदाहरण देकर स्पष्ट कर दिया है, कि अध्यात्म, अधिदैवत और अधिभूत-दृष्टिसे एकही विवेचनके इस प्रकार भिन्न भिन्न भेद क्योंकर होते हैं ? ( मभा. शां. ३१३; अश्व. ४१ ) । महाभारतकार कहते हैं, कि मनुष्यकी इंद्रियोंका विवेचन तीन तरहसे किया जा सकता है, जैसे - अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवत । इन इंद्रियोंके द्वारा जो विषय ग्रहण किये जाते हैं - उदाहरणार्थ, हाथोंसे जो लिया जाता है, कानोंसे जो सुना जाता है, आँखोंसे जो देखा जाता है या मनसे जिसका चिंतन किया जाता है,

  • वे सब अधिभूत हैं; और हाथ-पैर आदिके ( सांख्यशास्त्रोक्त ) सूक्ष्म स्वभाव अर्थात् सूक्ष्म इंद्रियाँ, इन इंद्रियोंके अध्यात्म हैं । परंतु इन दोनों दृष्टियोंको छोड़कर अधिदैवत-दृष्टिसे विचार करनेपर - अर्थात् यह मान करके, कि हाथोंके देवता इंद्र, पैरोंके विष्णु, गुदके मित्र, उपस्थके प्रजापति, वाणीके अग्नि, आँखोंके सूर्य, कानोंके आकाश अथवा दिशा, जीभके जल, नाकके पृथ्वी, त्वचाके वायु, मनके चंद्रमा, अहंकारके बुद्धि, और बुद्धिके देवता पुरुष हैं । - कहा जाता है, कि येही देवता अपनी अपनी इंद्रियोंके व्यापार किया करते हैं; उपनिषदोंमेंभी उपासनाके लिये ब्रह्मस्वरूपके जो प्रतीक वर्णित हैं, उनमें मनको अध्यात्म और सूर्य अथवा आकाशको अधिदैवत प्रतीक कहा है ( छां. ३. १८. १ ) । अध्यात्म और अधिदैवतका यह भेद केवल उपासनाके लियेही नहीं किया गया है, बल्कि जब इस प्रश्नका निर्णय करना पडा, कि वाणी, चक्षु और श्रोत्र प्रभृति इंद्रियों एवं प्राणोंमें श्रेष्ठ कौन है ? तब उपनिषदोंमें ( बृ. १. ५. २१-२३ ; छां. १. २-३ ; कौषी. ४. १२-१३ ) एक बार वाणी, चक्षु और श्रोत्र इन सूक्ष्म इंद्रियोंको लेकर अध्यात्म दृष्टिसे विचार किया गया है, तथा दूसरी बार उन्हीं इंद्रियोंके देवता अग्नि, सूर्य और आकाशको लेकर अधिदैवत-दृष्टिसे विचार किया गया है । सारांश यह है, कि अधिदैवत, अधिभूत और अध्यात्म आदि भेद प्राचीन कालसे चले आ रहे हैं, और यह प्रश्नभी उसी जमानेका है, कि परमेश्वरके स्वरूपकी इन भिन्न भिन्न कल्पनाओंमेंसे सच्ची कौन है अथवा उसका तथ्य क्या है ? बृहदारण्यक उपनिषद्में ( बृ. ३. ७ ) याज्ञवल्क्यने उद्दालक आरुणिसे कहा है, कि सब प्राणियोंमें, सब देवताओंमें, समग्र अध्यात्ममें, सब लोगोंमें, सब यज्ञोंमें और सब देहोंमें व्याप्त होकर, उनके न समझनेपरभी, उनको नचानेवाला एक-ही परमात्मा है । उपनिषदोंका यही सिद्धान्त वेदान्त-सूत्रके अंतर्यामी अधिकरणमें है ( वे. सू. १. २. १८-२० ), और वहीं यह सिद्ध किया है, कि सबके अंतःकरणमें रहनेवाला यह तत्त्व सांख्योंकी प्रकृति या जीवात्मा नहीं है, किंतु पर- मात्मा है । इसी सिद्धान्तके अनुरोधसे भगवान् अब अर्जुनसे कहते हैं, कि मनुष्यकी देहमें, सब प्राणियोंमें ( अधिभूत ), सब यज्ञोंमें ( अधियज्ञ ), सब देवताओंमें

आठवाँ अध्याय ७४३ अष्टमोऽध्यायः । अर्जुन उवाच । किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच । अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥ (अधिदैवत), सब कर्मोंमें, और सब वस्तुओंके सूक्ष्म (अर्थात् अध्यात्म) स्वरूपोंमें एकही परमेश्वर समाया हुआ है, और देवता यज्ञ इत्यादि नानात्व अथवा विविध ज्ञान सच्चा नहीं है। सातवें अध्यायके अंतमें भगवानने अधिभूत आदि जिन शब्दोंका उच्चारण किया है, उनका अर्थ जाननेकी अर्जुनको इच्छा हुई, अतः वह पहले पूछता है :- ] अर्जुनने कहा :- (१) हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्मके माने क्या हैं ? अधिभूत किसे कहना चाहिये ? और अधिदैवत किसको कहते हैं ? (२) अधियज्ञ कैसा होता है ? हे मधुसूदन ! इस देहमें (अधिदेह) कौन है ? और ( मुझे यह बतलाओ, कि ) अंतकालमें इंद्रियनिग्रह करनेवाले (लोग) तुमको कैसे पहचानते हैं ? | [ ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत और अधियज्ञ शब्द पिछले अध्यायमें | आ चुके हैं; इनके सिवा अब अर्जुनने यह नया प्रश्न किया है, कि अधिदेह कौन | है ? इसपर ध्यान देनेसे आगेके उत्तरका अर्थ समझनेमें कोई अडचन न होगी । ] श्रीभगवानने कहा :- (३) (सबसे) परम अक्षर अर्थात् कभीभी नष्ट न होनेवाला तत्त्व ब्रह्म है, (और) प्रत्येक वस्तुका अपना मूल भाव (स्वभाव) अध्यात्म कहलाता है। (अक्षर-ब्रह्मसे ) भूतमात्रादि (चर-अचर ) पदार्थोंकी उत्पत्ति करने- वाला विसर्ग अर्थात् सृष्टि-व्यापार कर्म है। (४) ( उपजे हुए सब प्राणियोंकी ) क्षर अर्थात् नामरूपात्मक या नाशवान् स्थिति अधिभूत है; और ( इस पदार्थमें )

७४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जो पुरुष अर्थात् सचेतन अधिष्ठाता है, वह अधिदैवत है; हे देहधारियोंमें श्रेष्ठ ! (जिसे) अधियज्ञ (अर्थात् सब यज्ञोंका अधिपति कहते हैं, वह) मैंही इस देहमें (अधिदेह) हूँ। | [तीसरे श्लोकका 'परम' शब्द ब्रह्मका विशेषण नहीं है, किंतु अक्षरका | विशेषण है। सांख्यशास्त्रमें अव्यक्त प्रकृतिकोभी 'अक्षर' कहा है (गीता | १५. १६)। परंतु वेदान्तियोंका ब्रह्म इस अव्यक्त और अक्षर प्रकृतिकेभी | परेका है (इसी अध्यायका २० वाँ और ३१ वाँ श्लोक देखो); और इसी | कारण केवल 'अक्षर' शब्दके प्रयोगसे सांख्योंकी प्रकृति अथवा ब्रह्म, ये दोनों | अर्थ हो सकते हैं। इस संदेहको मिटानेके लिये 'अक्षर' शब्दके आगे 'परम' विशेषण | रख कर ब्रह्मकी व्याख्या की है (गीतार. प्र. ९, पृ. २०२-२०३)। हमने | 'स्वभाव' शब्दका अर्थ, ऊपर दिये हुए महाभारतके उदाहरणोंके अनुसार, किसीभी | पदार्थका 'सूक्ष्म स्वरूप' किया है। नासदीय सूक्तमें दृश्य जगतको परब्रह्मकी | विसृष्टि (विसर्ग) कहा है (गीतार. प्र. ९, पृ. २५६); और विसर्ग शब्दका | वही अर्थ यहाँ लेना चाहिये। विसर्गका अर्थ 'यज्ञका हविरुत्सर्ग' करनेकी कोई | जरूरत नहीं है। गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें (पृ. २६४) इस बातका विस्तृत | विवेचन किया गया है, कि इस दृश्य-सृष्टिकोही कर्म क्यों कहते हैं? पदार्थमात्रके | नामरूपात्मक विनाशी स्वरूपको 'क्षर' कहते हैं; और इससे परे जो अक्षर तत्त्व | है. उसको ब्रह्म समझना चाहिये। 'पुरुष' शब्दमे सूर्यका पुरुष, जलके देवता | या वरुणपुरुष इत्यादि सचेतन सूक्ष्म देहधारी देवता विवक्षित हैं और | हिरण्यगर्भ काभी उसमें समावेश होता है। यहाँ भगवानने 'अधियज्ञ' शब्दकी | व्याख्या नहीं की। क्योंकि, यज्ञके विषयमें पीछे तीसरे और चौथे अध्यायोंमें | विस्तारसहित वर्णन हो चुका है और फिर आगेभी कहा है, कि 'सब | यज्ञोंका प्रभु और भोक्ता मैंही हूँ (गीता ९. २४; ५. २९; मभा. शां. | ३४०)। इस प्रकार अध्यात्म आदिके लक्षण बतलाकर अंतमें संक्षेपसे कह | दिया है, कि इस देहमें 'अधियज्ञ' (जिसे कहते हैं) वही मैं हूँ, अर्थात् | मनुष्यदेहमें अधिदेह और अधियज्ञभी मैंही हूँ। प्रत्येक देहमें पृथक् पृथक् | आत्मा (पुरुष) मानकर सांख्यवादी कहते हैं, कि वे असंख्य हैं। परंतु | वेदान्तशास्त्रको यह मत मान्य नहीं है, उसने निश्चय किया है, कि यद्यपि | देह अनेक हैं, तथापि सबमें आत्मा एकही है (गीतार. प्र. ७, पृ. १६६)। | 'अधिदेह मैंही हूँ' इस वाक्यमें यही सिद्धान्त दर्शाया है; तोभी इस वाक्यके | 'मैंही हूँ' शब्द केवल अधियज्ञ अथवा अधिदेहकोही उद्देश्य करके प्रयुक्त | नहीं हैं; उनका संबंध अध्यात्म आदि पूर्वपदोंसेभी है। अतः समग्र अर्थ ऐसा | होता है, कि अनेक प्रकारके यज्ञ, अनेक पदार्थोंके अनेक देवता, विनाशवान् | पंचमहाभूत, पदार्थमात्रके सूक्ष्म भाग अथवा विभिन्न आत्मा, ब्रह्म, कर्म अथवा

आठवाँ अध्याय ७४५ § § अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥ । भिन्न भिन्न मनुष्योंकी देह - इन सबमें 'मैंही हूँ', अर्थात् सबमें एकही परमेश्वर- । तत्व है। कई लोगोंका कथन है, कि यहाँ 'अधिदेह' स्वरूपका स्वतंत्र वर्णन । नहीं है, अधियज्ञकी व्याख्या करते समय अधिदेहका उसमें पर्यायसे उल्लेख हो । गया है। किंतु हमें यह अर्थ ठीक नहीं जान पड़ता। क्योंकि, न केवल गीतामेंही, । प्रत्युत उपनिषदों और वेदान्त-सूत्रोंमेंभी (बृ. ३. ७; वे. सू. १. २. २०) जहाँ । यह विषय आया है, वहाँ अधिभूत आदि स्वरूपोंके साथही शरीर आत्माकाभी । विचार किया है, और सिद्धान्त किया है, कि सर्वत्र एकही परमात्मा है। ऐसेही । गीतामें जब कि अधिदेहके विषयमें पहलेभी प्रश्न हो चुका है, तब यहाँ उसके । पृथक् उल्लेखकोही विवक्षित मानना युक्तिसंगत है। यदि यह सच है, कि सब । कुछ परब्रह्मही है, तो पहले पहल ऐसा बोध होना संभव है, कि उसके अधिभूत । आदि स्वरूपोंका वर्णन करते समय उसमें परब्रह्मकोभी शामिल कर लेनेकी कोई । जरूरत न थी। परंतु नानात्वदर्शक यह वर्णन उन लोगोंको लक्ष्य करके किया । गया है, कि जो ब्रह्म, आत्मा, देवता और यज्ञनारायण आदि अनेक भेद करके । नाना प्रकारकी उपासनाओंमें उलझे रहते हैं, अतएव पहले उन लक्षण बतलाये । गये हैं, कि जो उन लोगोंकी समझके अनुसार होते हैं, और फिर यह भेदोंके । सिद्धान्त किया गया है, कि "यह सब मैंही हूँ"। उक्त बातपर ध्यान देनेसे । कोईभी शंका नहीं रह जाती। अस्तु; इस भेदका तत्त्व बतला दिया गया, कि । उपासनाके लिये अधिभूत, अधिदैवत, अध्यात्म, अधियज्ञ और अधिदेह प्रभृति । अनेक भेद करनेपरभी यह नानात्व सच्चा नहीं है, और वास्तवमें एकही । परमेश्वर सबमें व्याप्त है। अब अर्जुनके इस अंतिम प्रश्नका उत्तर देते हैं, कि । अंतकालमें यह सर्वव्यापी भगवान् कैसे पहचाना जाता है :- ] (५) और इसमें संदेह नहीं है, कि अंतकालमें जो मेराही स्मरण करता हुआ देह त्यागता है, वह मेरे स्वरूपमें मिल जाता है। (६) अथवा हे कौन्तेय ! सदा अर्थात् जन्मभर उसमें रँगे रहनेसे मनुष्य जिस भावका स्मरण करता हुआ अंतमें शरीर त्यागता है, (आगे) उसीमें (भाव) वह जा मिलता है। । [ पाँचवें श्लोकमे मरण-समयमें परमेश्वरके स्मरण करनेकी आवश्यकता । और फल बतलाया है। परंतु संभव है, कि इससे कोई यह समझ ले, कि केवल । मरण-कालमें यह स्मरण करनेसेही काम चल जाता है, इसीलिये छठे श्लोकमें

७४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥ अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥ | यह बतलाया है, कि जो बात जन्मभर मनमें रहती है, वह मरण-कालमेंभी नहीं | छूटती, अतएव न केवल मरण-कालमेंभी प्रत्युत जन्मभरभी परमेश्वरका स्मरण | और उपासना करनेकी आवश्यकता सिद्ध हुई है ( गीतार. प्र. १०, पृ. २९० ) । | इस सिद्धान्तको मान लेनेसे आपही सिद्ध हो जाता है, कि अंतकालमें परमेश्वरको | भजनेवाले परमेश्वरको पाते हैं और देवताओंका स्मरण करनेवाले देवता- | ओंको पाते हैं ( गीता ७. २३; ८. १३; ९. २५ ) । क्योंकि छांदोग्य उपनिषदके | कथनानुसार “ यथा ऋतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति ” ( छां० | ३. १४. १) - इस लोकमें मनुष्यका जैसा ऋतु अर्थात् संकल्प होता है, मरनेपर | उसे वैसीही गति मिलती है। छांदोग्यके समान अन्य उपनिषदोंमेंभी ऐसेही | वाक्य हैं ( प्रश्न. ३. १०; मैत्र्यु. ४. ६) । परंतु गीता अब यह कहती है, कि | जन्मभर एकही भावनासे मनको रंगे बिना, अंतकालकी यातनाके समय वही | भावना स्थिर नहीं रह सकती। अतएव आमरण अर्थात् आजीवन परमेश्वरका | ध्यान करना आवश्यक है ( वे. सू. ४. १. १२ ) - इस सिद्धान्तके अनुसार | अर्जुनसे भगवान् कहते हैं, कि :- ] (७) इसलिये सर्वकाल अर्थात् सदैवही मेरा स्मरण करता रह, और युद्ध कर । मुझमें मन और बुद्धि अर्पण करनेसे ( युद्ध करनेपरभी ) मुझमेंही निःसंदेह आ मिलेगा। (८) हे पार्थ ! चित्तको दूसरी ओर न जाने देकर अभ्यासकी सहायतासे उसको स्थिर करके दिव्य परम पुरुषका ध्यान करते रहनेसे मनुष्य उसी पुरुषमें जा मिलता है । | [ जो लोग भगवद्गीतामें इस विषयका प्रतिपादन बतलाते हैं, कि संसार- | को छोड़ दो और केवल भक्तिकाही अवलंब करो, उन्हें सातवें श्लोकके सिद्धान्त- | की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये। मोक्ष तो परमेश्वरकी ज्ञानयुक्त भक्तिसे | मिलता है; और यह निर्विवाद है, कि मरण-समयमेंभी उसी भावनाको स्थिर | रहनेके लिये जन्मभर वही अभ्यास करना चाहिये । किंतु गीताका यह अभिप्राय | नहीं, कि उसके लिये कर्मोंको छोड़ देना चाहिये; इसके विरुद्ध गीताशास्त्रका | सिद्धान्त है, कि स्वधर्मके अनुसार जो कर्म प्राप्त होते जायें, भगवद्भक्तको उन | सबको निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये, और उसी सिद्धान्तको इन शब्दोंसे | व्यक्त किया है, कि “मेरा सदैव चिंतन कर; और युद्ध कर।” अस्तु; अब

आठवाँ अध्याय ७४७ § § कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ ९ ॥ प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२ ॥ ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥ । बतलाते हैं, कि परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे जन्मभर निष्काम कर्म करनेवाले कर्मयोगी । अंतकालमेंभी दिव्य परम पुरुषका चिंतन किस प्रकारसे करते हैं । ] (९) कवि अर्थात् सर्वज्ञ, पुरातन, शास्ता अणुसेभी छोटे, सबके धाता अर्थात् आधार या कर्ता, अचिंत्यस्वरूप, और अंधकारसे परेके सूर्यके समान देदीप्यमान पुरुषका स्मरण ( जो पुरुष ), करता है, वह ( मनुष्य ) उसी दिव्य परम पुरुषमें जा मिलता है। (१०) अंतकालमें ( इंद्रियनिग्रहरूप ) योगकी सामर्थ्यसे और भक्तियुक्त होकर मनको स्थिर करके और दोनों भौंहोंके बीचमें प्राणको भली भांति रखकर, (११) वेदके जाननेवाले जिसे अक्षर कहते हैं, वीतराग हो कर यति लोग जिसमें प्रवेश करते हैं और जिसकी इच्छा करके ब्रह्मचर्यव्रतका आचरण करते हैं, वह पद अर्थात् ॐकारब्रह्म तुझे संक्षेपसे बतलाता हूँ । (१२) सब ( इंद्रियरूपी ) द्वारोंका संयमकर और मनका हृदयमें निरोध करके, ( एवं ) मस्तकमें, अपना प्राण ले जाकर समाधियोगमें स्थिर होनेवाला, (१३) इस एकाक्षर ब्रह्म ॐका जप और मेरा स्मरण करता हुआ जो ( मनुष्य ) देह छोड़ कर जाता है, उसे उत्तम गति मिलती है । । [ श्लोक ९-११ में परमेश्वरके स्वरूपका जो वर्णन है, वह उपनिषदोंसे । लिया गया है । नवें श्लोकका 'अणोरणीयान्' पद और अंतका चरण श्वेताश्वतर । उपनिषदका है ( श्वे. ३. ८, ९ ), एवं ग्यारहवें श्लोकका पूर्वार्ध अर्थतः और । उत्तरार्ध शब्दशः कठ उपनिषदका है ( कठ. २. १५ ) । कठ उपनिषदमें “ तत्ते । पदं संग्रहेण ब्रवीमि ” इस चरणके आगे 'ओमित्येतत्' स्पष्ट कहा गया है, इससे । प्रकट होता है, कि ११ वें श्लोकके 'अक्षर' और 'पद' शब्दोका अर्थ ॐ । वर्णाक्षररूपी ब्रह्म अथवा ॐ शब्द लेना चाहिये; और १३ वें श्लोकसेभी प्रकट

७४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥ | होता है, कि यहाँ ॐकारोपासनाही उद्दिष्ट है (प्रश्न. ५) । तथापि यह नहीं | कह सकते, कि भगवानके मनमें 'अक्षर = अविनाशी ब्रह्म, और 'पद'= परम | स्थान, ये अर्थभी न होंगे । क्योंकि, वर्णमालाका ॐ एक अक्षर है, और इसके | सिवा यह कहा जा सकेगा, कि वह ब्रह्मके प्रतीकके नाते अविनाशीभी है | (२१ वाँ श्लोक देखो) । इसलिये ११ वें श्लोकके अनुवादमें 'अक्षर' और | 'पद' ये दुहरे अर्थवाले मूल शब्दही हमने रख लिये हैं । अब इस उपासनासे | मिलनेवाली उत्तर गतिकाह्री अधिक निरूपण करते हैं :-- ] (१४) हे पार्थ ! अनन्यभावसे सदा-सर्वदा जो मेरा नित्य स्मरण करता रहता है, उस नित्ययुक्त (कर्म-) योगीको मैं अर्थात् मेरी प्राप्ति सुलभ रीतिसे होती है। (१५) मुझमें मिल जानेपर, परमसिद्धि पाये हुए महात्मा उस पुनर्जन्मको नहीं पाते, कि जो दुःखोंका घर है और अशाश्वत है। (१६) हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकतक (स्वर्ग आदि ) जितने लोक हैं वहाँसे ( कभी न कभी इस लोकमें ) पुनरावर्तन अर्थात् लौटना (पड़ता) है। परंतु हे कौन्तेय ! मुझमें मिल जानेपर पुनर्जन्म नहीं होता । | [ सोलहवें श्लोकके 'पुनरावर्तन' शब्दका अर्थ पुण्य चुक जानेपर भूलोकमें | लौट आना है ( गीता ९. २१; मभा. वन. २६० ) । यज्ञ, देवताराधन और | वेदाध्ययन प्रभृति कर्मोंसे यद्यपि इंद्रलोक, वरुणलोक, सूर्यलोक और कदाचित् | ब्रह्मलोक प्राप्त हो जावे, तथापि पुण्यांशके समाप्त होतेही वहाँसे लौटकर फिर | इस लोकमें जन्म लेना पड़ता है ( बृ. ४. ४. ६ ) ; अथवा अंततः ब्रह्मलोकका | नाश हो जानेपर पुनर्जन्मचक्रमें तो जरूरही गिरना पड़ता है। अतएव, उक्त | १६ वें श्लोकका भावार्थ यह है, कि ऊपर लिखी हुई सब गतियाँ कम दर्जेकी हैं | और परमेश्वरके ज्ञानसेही पुनर्जन्म नष्ट होता है, इस कारण वही गति सर्वश्रेष्ठ | है ( गीता ९. २०, २१ ) । अंतमें जो कहा है, कि ब्रह्मलोककी प्राप्तिभी | अनित्य है, उसके समर्थनमें अब बतलाते हैं, कि ब्रह्मलोकसहित समस्त सृष्टिकी | उत्पत्ति और लय वारंवार कैसे होता रहता है :- ]

आठवाँ अध्याय ७४९ § § सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥ अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥ (१७) अहोरात्रको (तत्त्वतः) जाननेवाले पुरुष समझते हैं, कि (कृत, त्रेता, द्वापर और कलि, इन चारों युगोंका एक महायुग होता है, और ऐसे) हज़ार (महा-)युगोंका समय ब्रह्मदेवका एक दिन है, और (ऐसेही) हज़ार युगोंकी (उसकी) एक रात्रि है। । [ यह श्लोक इससे पहलेके युगमानका हिसाब न देकर गीतामें आया है; । और इसका अर्थ अन्यत्र बतलाये हुए हिसाबसे करना चाहिये । यह हिसाब और । गीताका यह श्लोकभी भारत (शां. २३१. ३१) और मनुस्मृतिमें (मनु. १. । ७३) है; तथा यास्कके निरुक्तमेंभी यही अर्थ वर्णित है (निरुक्त १४. ९) । । ब्रह्मदेवके दिनकोही कल्प कहते हैं। अगले श्लोकमें अव्यक्तका अर्थ सांख्य- । शास्त्रकी अव्यक्त प्रकृति है, अव्यक्तका अर्थ परब्रह्म नहीं है; क्योंकि २० वें । श्लोकमें स्पष्ट बतला दिया है, कि ब्रह्मरूपी अव्यक्त, १८ वें श्लोकमें वर्णित । अव्यक्तसे परेका और भिन्न है। गीतारहस्यके आठवें प्रकरणमें (पृ. १९४) । इसका पूरा स्पष्टीकरण है, कि अव्यक्तसे व्यक्त-सृष्टि कैसे होती है और कल्पके । कालमानका हिसाबभी वहीं लिखा है।] (१८) (ब्रह्मदेवके) दिनका आरंभ होनेपर अव्यक्तसे सब व्यक्त (पदार्थ) निर्मित होते हैं और रात्रि होनेपर उसी पूर्वोक्त अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं। (१९) हे पार्थ! भूतोंका वही समुदाय (इस प्रकार) बार बार उत्पन्न होकर अवश होता हुआ, अर्थात् इच्छा हो या न हो – रात होतेही लीन हो जाता है, और दिन होनेपर (फिर) जन्म लेता है। । [ अर्थात् पुण्यकर्मोंसे नित्य ब्रह्मलोकवास प्राप्तभी हो जाय, तोभी प्रलय- । कालमें ब्रह्मलोककाभी नाश हो जानेसे फिर नये कल्पके आरंभमें प्राणियोंका । जन्म लेना नहीं छूटता। इससे बचनेके लिये जो एकही मार्ग है, उसे अब । बतलाते हैं :- ]

७५० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥ अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ २१ ॥ पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥ (२०) किंतु इस ऊपर बतलाये हुए अव्यक्तसे परे दूसरा सनातन अव्यक्त पदार्थ है, कि जो सब भूतोंके नाश होनेपरभी नष्ट नहीं होता, (२१) जिस अव्यक्तको 'अक्षर' (भी) कहते हैं, वही परम अर्थात् उत्कृष्ट या अंतकी गति कहा जाता है; (और) जिसे पाकर फिर (जन्ममें) लौटते नहीं है, (वही) मेरा परम स्थान (भी) है। (२२) हे पार्थ ! जिसके भीतर (सब) भूत हैं और जिसने इन सबको फैलाया अथवा व्याप्तकर रखा है, वह पर अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष अनन्यभक्तिसेही प्राप्त होता है। [ बीसवाँ और इक्कीसवाँ श्लोक मिलकर एक वाक्य बना है। इनमेंसे २० वें श्लोकका 'अव्यक्त' शब्द पहले सांख्योंकी प्रकृतिको, अर्थात् १८ वें श्लोकके अव्यक्त द्रव्यको लक्ष्य करके प्रयुक्त है और आगे वही शब्द सांख्योंकी प्रकृतिसे परेके परब्रह्मके लियेभी उपयुक्त हुआ है; तथा २१ वें श्लोकमें कहा है, कि इसी दूसरे अव्यक्तको 'अक्षर'भी कहते हैं; ऐसेही अध्यायके आरंभमेंभी "अक्षरं ब्रह्म परमम्" यह वर्णन है। सारांश, 'अव्यक्त' शब्दके समानही गीतामें 'अक्षर' शब्दकाभी दो प्रकारसे उपयोग किया गया है। यह नहीं, कि सांख्योंकी प्रकृति ही अव्यक्त और अक्षर है; किंतु परमेश्वर या ब्रह्मभी, कि जो "सब भूतोंका नाश हो जानेपरभी नष्ट नहीं होता", अव्यक्त तथा अक्षर है। पंद्रहवें अध्यायमें पुरुषोत्तमके लक्षण बतलाते हुए जो यह वर्णन है, कि वह क्षर और अक्षरसे परेका है, उससे प्रकट है, कि वहांका 'अक्षर' शब्द सांख्योंकी प्रकृतिके लिये उद्दिष्ट है (गीता १५. १६-१८)। ध्यान रहे, कि 'अव्यक्त' और 'अक्षर' इन दोनों विशेषणोंका प्रयोग गीतामें कभी सांख्यांकी प्रकृतिके लिये, और कभी इस प्रकृतिसे परेके परब्रह्मके लिये किया गया है (गीतार. प्र. ९, पृ. २०२-२०३)। व्यक्त और अव्यक्तसे परे जो परब्रह्म है, उसका स्वरूप गीतारहस्यके नवे प्रकरणमें स्पष्ट कर दिया गया है। जिस स्थानमें पहुँच जानेसे मनुष्य पुनर्जन्मकी चपेटसे छूट जाता है, उस 'अक्षर-ब्रह्म'का वर्णन हो चुका, अब मरनेपर जिन्हें लौटना नहीं पड़ता (अनावृत्ति), और जिन्हें स्वर्गमें लौटकर फिर जन्म लेना पड़ता है (आवृत्ति), उनके बीचके समयका और गतिका भेद बतलाते हैं:- ]

आठवाँ अध्याय ७५१ § § यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥ अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥ शुक्लकृष्णे गती होते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥ § § नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥ (२३) हे भरतश्रेष्ठ! अब तुझे मैं वह काल बतलाता हूँ, कि जिस कालमें मरनेपर (कर्म-)योगी ( इस लोकमें जन्मनेके लिये ) लौट नहीं आते, और ( जिस कालमें मरनेपर ) लौट आते हैं । (२४) अग्नि, ज्योति, अर्थात् ज्वाल, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणके छः महीनोंमें मरे हुए ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्मको पाते हैं ( लौटकर नहीं आते ) । (२५) ( अग्नि ), धुआ, रात्रि, कृष्णपक्ष (और) दक्षिणायनके छः महीनोंमें मरा हुआ (कर्म-)योगी चंद्रके तेजमे अर्थात् चंद्रलोकमें जा कर ( पुण्यांश घटनेपर ) लौट आता है। (२६) इस प्रकार जगत्की शुक्ल और कृष्ण अर्थात् प्रकाशमय और अंधकारमय, ये दो शाश्वत गतियाँ याने स्थिर मार्ग माने जाते हैं । एक मार्गसे जानेपर लौटना नहीं पड़ता, और दूसरेसे फिर लौटना पड़ता है । | [ उपनिषदोंमें इन दोनों गतियोंको देवयान (शुक्ल) और पितृयाण | (कृष्ण), अथवा अर्चिरादि मार्ग और धूम्र-आदि मार्ग कहा है, तथा ऋग्वेदमेंभी | इन मार्गोंका उल्लेख है। मरे हुए मनुष्यकी देहको अग्निमें जला देनेपर अर्थात् | अग्निसेही इन दोनों मार्गोंका आरंभ हो जाता है, अतएव पच्चीसवें श्लोकमें | 'अग्नि' पदका पहले श्लोकसे अध्याहार कर लेना चाहिये । पच्चीसवें श्लोकका | हेतु यही बतलाना है, कि प्रथम श्लोकोंमें वर्णित मार्गमें और दूसरे मार्गमें | भेद कहाँ होता है, इसीसे 'अग्नि शब्दकी पुनरावृत्ति उसमें नही की गई । | गीतारहस्यके दसवें प्रकरणके अंतमें ( पृ. २९७-२९८ ) इस संबंधकी अधिक | बातें है । उनसे उल्लिखित श्लोकका भावार्थ खुल जावेगा । अब बतलाते | हैं, कि इन दोनों मार्गोंका तत्त्व जान लेनेसे क्या फल मिलता है :- ] (२७) हे पार्थ ! इन दोनों सृतियोंको अर्थात् मार्गोंको (तत्त्वतः) जाननेवाला

७५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ कोईभी (कर्म-) योगी मोहमें नहीं फँसता; अतएव हे अर्जुन ! तू सदासर्वदा (कर्म-) योगयुक्त हो । (२८) इसे (उक्त तत्त्वको) जान लेनेसे वेद, यज्ञ, तप और दानमें जो पुण्यफल बतलाया है, (कर्म-) योगी उस सबको छोड़ जाता है और उसके परेके आद्यस्थानको पा लेता है । [ जिस मनुष्यने देवयान और पितृयाण, इन दोनों मार्गोंके तत्त्वको जान लिया, अर्थात् यह ज्ञात कर लिया, कि देवयान-मार्गसे मोक्ष मिल जानेपर पुनर्जन्म नहीं मिलता और पितृयाण-मार्ग स्वर्गप्रद हो, तोभी मोक्षप्रद नहीं है, वह इनमेंसे अपने सच्चे कल्याणके मार्गकाही स्वीकार करेगा, मोहसे निम्न श्रेणीके मार्गको स्वीकार न करेगा - इसी बातको लक्ष्य कर पहले श्लोकमें "इन दोनों सृतियोंको अर्थात् मार्गोंको (तत्त्वतः) जाननेवाला" ये शब्द आये हैं। इन श्लोकोंका भावार्थ यों है :- कर्मयोगी जानता है, कि देवयान और पितृयाण, इन दोनों मार्गोंमेंसे कौन मार्ग कहाँ जाता है, इसीसे उनमेंसे जो मार्ग उत्तम है, उसे ही वह स्वभावत स्वीकार करता है, एवं स्वर्गके आवागमनसे बचकर उससे परेके मोक्षप्रदकी प्राप्ति कर लेता है । २७ वें श्लोकमें तदनुसार व्यवहार करनेका अर्जुनको उपदेशभी किया गया है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवाद में, अक्षरब्रह्मयोग नामक आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।

नवाँ अध्याय ७५३ नवमोऽध्यायः । श्रीभगवानुवाच । इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥ नवाँ अध्याय [ सातवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानका निरूपण यह दिखलानेके लिये किया गया है, कि कर्मयोगका आचरण करनेवाले पुरुषको परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होकर मनकी शांति अथवा मुक्त-अवस्था कैसे प्राप्त होती है ? फिर अक्षर और अव्यक्त पुरुषका स्वरूपभी बतला दिया गया है, और पिछले अध्यायमें कहा गया है, कि अंतकाल मेंभी उस स्वरूपको मनमें स्थिर रखनेके लिये पातंजलयोगसे समाधि लगाकर, अंतमें ॐकारकी उपासना की जावे । परंतु पहले तो अक्षर-ब्रह्मका ज्ञान होनाही कठिन है, और फिर उसमेंभी समाधिकी आवश्यकता होनेसे साधारण लोगोंको तो यह मार्ग छोड़ही देना पड़ेगा । इस कठिनाईपर ध्यान देकर अब भगवान् ऐसा राजमार्ग बतलाते हैं, कि जिससे सब लोगोंको परमेश्वरका ज्ञान सुलभ हो जावे । इसीको भक्तिमार्ग कहते हैं,और गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें हमने उसका विस्तारसहित विवेचन किया है। इस मार्गमें परमेश्वरका स्वरूप प्रेमगम्य और व्यक्त अर्थात् प्रत्यक्ष जाननेयोग्य रहता है; और उसी व्यक्त स्वरूपका विस्तृत निरूपण नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें अध्यायोंमें किया गया है । तथापि स्मरण रहे, कि यह भक्ति-मार्गभी स्वतंत्र नहीं है, कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें अध्यायमें जिस ज्ञान-विज्ञानका आरंभ किया गया है, उसीका यह भाग है; और इस अध्यायका आरंभभी पिछले ज्ञान-विज्ञानके अंगकी दृष्टिसेही किया गया है । ] श्रीभगवानने कहा :-- (१) अब तू दोषदर्शी नहीं है, इसलिये गुह्यसेभी गुह्य विज्ञानसहित ज्ञान तुझे बतलाता हूँ, जिसके जान लेनेसे पापसे मुक्त होगा । (२) यह (ज्ञान) समस्त गुह्योंमें राजा अर्थात् श्रेष्ठ, राजविद्या अर्थात् सब विद्याओंमें श्रेष्ठ, पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष बोध देनेवाला, आचरण करनेमें सुखकारक, अव्यक्त और धर्म्य है। गी. र. ४८

७५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥ § § मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥ न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥ यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥ (३) हे परन्तप ! इस धर्मपर श्रद्धा न रखनेवाले पुरुष मुझे नहीं पाते वे मृत्यु- युक्त संसारके मार्गमें लौट आते हैं; (अर्थात् उन्हें मोक्ष नहीं मिलता) । | [गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें (पृ. ४१३ ते ४१९) दूसरे श्लोकके | 'राजविद्या', 'राजगुह्य', और 'प्रत्यक्षावगम' पदोंके अर्थोंका विचार किया गया | है। ईश्वर-प्राप्तिके साधनोंको उपनिषदोंमें 'विद्याएँ' कहा है और ये विद्या गुप्त | रखी जाती थीं। कहा है, कि भक्ति-मार्ग अथवा व्यक्तकी उपासनारूपी विद्या | इन सब गुह्य विद्याओंमें श्रेष्ठ अथवा राजा है, इसके अतिरिक्त यह धर्म आँखोंसे | प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला और इसीसे आचरण करनेमें सुलभ है। तथापि इक्ष्वाकु | प्रभृति राजाओंकी परंपरासेही इस योगका प्रचार हुआ है (गीता ४. २), | इसलिये इस मार्गको राजाओं अर्थात् बडे आदमियोंकी विद्या - राजविद्या - | कह सकेंगे। कोईभी अर्थ क्यों न लें, प्रकट है कि अक्षर या अव्यक्त ब्रह्मके ज्ञानको | लक्ष्य करके यह वर्णन नहीं किया गया है, किंतु राजविद्या शब्दसे यहाँपर भक्ति- | मार्गही विवक्षित है। इस प्रकार आरंभमेंही इस मार्गकी प्रशंसाकर भगवान् अब | विस्तारसे उसका वर्णन करते हैं :- ] (४) मैंने अपने अव्यक्त स्वरूपसे इस समग्र जगतको फैलाया अथवा व्याप्त किया है। मुझमें सब भूत हैं, (परंतु) मैं उनमें नहीं हूँ। (५) और मुझमें सब भूतभी नहीं हैं! देखो, (यह कैसी) मेरी ईश्वरी करनी या योगसामर्थ्य है! भूतोंको उत्पन्न करनेवाला मेरा आत्मा; भूतोंका धारण करकेभी (फिर) भूतोंमें नहीं है! (६) सर्वत्र बहनेवाला महान् वायु जिस प्रकार सर्वदा आकाशमें रहता है उसी प्रकार सब भूतोंको मुझमें समझ। | [यह विरोधाभास इसलिये होता है, कि परमेश्वर निर्गुण है और सगुणभी | है (सातवें अध्यायके १२ वें श्लोककी टिप्पणी, और गीतारहस्य प्र. ९, | पृ. २०६, २०९, २१० देखो)। इस प्रकार अपने स्वरूपका आश्चर्यकारक वर्णन

नवाँ अध्याय ७५५ § § सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥ प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥ न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥ मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥ करके अर्जुनकी जिज्ञासाको जागृतकर चुकनेपर अब भगवान् फिर कुछ फेरफारसे वही वर्णन प्रसंगानुसार करते हैं, कि जो सातवें और आठवें अध्यायमें पहले किया जा चुका है - अर्थात् मुझसे व्यक्त-सृष्टि किस प्रकार होती है और मेरे व्यक्त रूप कौन-से हैं (गीता ७. ४-१८; ८. १७-२०) । 'योग' शब्दका अर्थ यद्यपि अलौकिक सामर्थ्य या युक्ति किया जाय, तथापि स्मरण रहे, कि अव्यक्तसे व्यक्त होनेके इस योग अथवा युक्तिकोही माया कहते हैं । इस विषयका प्रतिपादन गीता ७. २५ की टिप्पणीमें और रहस्यके नवें प्रकरणमें (पृ. २३८- २४१) हो चुका है । परमेश्वरको यह 'योग' अत्यंत सुलभ है, कदाचित् यह परमेश्वरका दासही है, इसलिये परमेश्वरको योगेश्वर (गीता १८. ७५) कहते हैं । अब बतलाते हैं, कि इस योगसामर्थ्यसे जगतकी उत्पत्ति और नाश कैसे हुआ करते हैं:-] (७) हे कौन्तेय ! कल्पके अंतमें सब भूत मेरी प्रकृतिमें आ मिलते हैं, और कल्पके आरंभमें (अर्थात् ब्रह्माके दिनके आरंभमें) उनको मैंही फिर निर्माण करता हूँ । (८) मैं अपनी प्रकृतिकों हाथमें लेकर, (अपने अपने कर्मोंसे बँधे हुए) भूतोंके उस समस्त समुदायको पुनः पुनः निर्माण करता हूँ, कि जो (उस) प्रकृतिके काबूमें रहनेसे अवश अर्थात् परतंत्र है । (९) (परंतु) हे धनंजय ! इस (सृष्टि- निर्माण करनेके) काममें मेरी आसक्ति नहीं है, मैं उदासीनसा रहता हूँ, इस कारण मुझे वे कर्म बंधक नहीं होते । (१०) मैं अध्यक्ष होकर प्रकृतिसे सब चराचर सृष्टि उत्पन्न करवाता हूँ । हे कौन्तेय ! इस कारण जगतका यह बनना - बिगड़ना हुआ करता है। [पिछले अध्यायमें बतला चुके हैं, कि ब्रह्मदेवके दिनका (कल्पका) आरंभ होतेही अव्यक्त प्रकृतिसे व्यक्त-सृष्टि बनने लगती है (गी. ८. १८)। यहाँ इसी बातका अधिक स्पष्टीकरण किया है, कि परमेश्वर प्रत्येकके कर्मानुसार

७५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ § § महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥ सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ | उसे भला-बुरा जन्म देता है, अतएव वह स्वयं इन कर्मोंमें अलिप्त है। शास्त्रीय | प्रतिपादनमें ये सभी तत्त्व एकही स्थानमें बतला दिये जाने; परंतु गीताकी पद्धति | संवादात्मक है, इस कारण प्रसंगके अनुसार एकही विषय, थोड़ा-सा यहाँ और | थोड़ा-सा वहाँ, इस प्रकार वर्णित है। कुछ लोगोंकी दलील है, कि दसवें | श्लोकके 'जगद्विपरिवर्तते' पद विवर्तवादको सूचित करते हैं। परंतु "जगतका | बननाबिगड़ना हुआ करता है" अर्थात् "व्यक्तका अव्यक्त और फिर अव्यक्तका | व्यक्त होता रहता है," हम नहीं समझते, कि इसकी अपेक्षा 'विपरिवर्तते' पदका | कुछ अधिक अर्थ हो सकता है, और शांकरभाष्यमेंभी कोई विशेष अर्थ नहीं | बतलाया गया है। गीतारहस्यके दसवें प्रकरणमें विवेचन किया गया है, कि | मनुष्य कर्ममें अवश कैसे होता है :- ] (११) मूढ़ लोग मेरे उस परम स्वरूपको नहीं जानते, कि जो सब भूतोंका महान् ईश्वर है। मनुष्यकी देह धारण करनेसे (वे मुझ) मानव-तनुधारी ..... कर, मेरी अवहेलना करते हैं। (१२) उनकी आशाएँ व्यर्थ, कर्म फिजूल, ज्ञान निरर्थक और चित्त भ्रष्ट हैं और वे मोहात्मक राक्षसी तथा आसुरी स्वभावका आश्रय किये रहते हैं। [ यह आसुरी पुरुषका वर्णन है। अब दैवी स्वभावका वर्णन करते हैं :- ] (१३) परंतु हे पार्थ ! दैवी प्रकृतिका आश्रय करनेवाले महात्मा लोग सब भूतोंके अव्यय आदिस्थान मुझको पहचान कर अनन्यभावसे मेरा भजन करते हैं; (१४) और यत्नशील, दृढ़व्रत एवं नित्य योगयुक्त होकर सदा मेरा कीर्तनकर और वंदना करते हुए भक्तिसे मेरी उपासना किया करते हैं। (१५) ऐसेही और

नवां अध्याय ७५७ § § अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ॥ वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ कुछ लोग एकत्वसे अर्थात् अभेदभावमे, पृथक्त्वमे अर्थात् भेदभावमे, या अनेक भांतिके ज्ञानयज्ञसे यजनकर सर्वतोमुख मेरी उपासना किया करते हैं। | [ संसारमें पाये जानेवाले दैवी और राक्षसी स्वभावोंके पुरुषोंका यहाँ | जो संक्षिप्त वर्णन है, उसका विस्तार आगे सोलहवें अध्यायमे किया गया है। | पहले बतलाही चुके हैं, कि ज्ञान-यज्ञका अर्थ "परमेश्वरके स्वरूपका ज्ञानसेही | आकलन करके, उसके द्वारा सिद्धि प्राप्त कर लेना है" (गीता ४. ३३ की | टिप्पणी देखो)। किंतु परमेश्वरका यह ज्ञानभी द्वैत-अद्वैत आदि भेदोंसे अनेक | प्रकारका हो सकता है, इस कारण ज्ञानयज्ञभी भिन्न भिन्न प्रकारोंसे हो सकते | हैं इस प्रकार यद्यपि ज्ञानयज्ञ अनेक हों, तोभी पन्द्रहवें श्लोकका तात्पर्य यह है, | कि परमेश्वरके विश्वतोमुख होनेके कारण ये सब यज्ञ उसे ही पहुँचते हैं। | 'एकत्वसे', 'पृथक्त्व' आदि पदोंसे प्रकट है, कि द्वैत-अद्वैतसे, विशिष्टाद्वैत आदि | संप्रदाय यद्यपि अर्वाचीन हैं, तथापि ये कल्पनाएँ प्राचीन हैं। इस श्लोकमें | परमेश्वरका जो एकत्व और पृथक्त्व बतलाया गया है, उसीका अब अधिक | निरूपण कर बतलाते हैं, कि पृथक्त्वमें एकत्व क्या है :- ] (१६) क्रतु अर्थात् श्रौतयज्ञ मैं हूँ, यज्ञ अर्थात् स्मार्तयज्ञ मैं हूँ, स्वधा अर्थात् श्राद्धमें पितरोंको अर्पण किया हुआ अन्न मैं हूँ, औषध अर्थात् वनस्पतिसे (यज्ञके अर्थ) उत्पन्न हुआ अन्न मैं हूँ, (यज्ञमे हवन करतेसमय पढ़े जानेवाले) मन्त्र मैं हूँ, घृत, मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और (अग्निमे छोड़ी हुई) आहुति मैंही हूँ। | [ मूलमें क्रतु और यज्ञ, दोनों शब्द समानार्थकही हैं। परंतु जिस प्रकार | 'यज्ञ' शब्दका अर्थ आगे व्यापक हो गया और देवपूजा, वैश्वदेव, अतिथि-सत्कार, | प्राणायाम एवं जप इत्यादि कर्मोंकोभी 'यज्ञ'ही कहने लगे (गीता ४. २३- | ३०), उस प्रकार 'क्रतु' शब्दका अर्थ बढ़ने नहीं पाया। श्रौत-धर्ममें अश्वमेध | आदि जिन यज्ञोंके लिये यह शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका वही अर्थ आगेभी स्थिर | रहा है। अतएव शांकरभाष्यमे कहा है, कि इस स्थलपर 'क्रतु' शब्दसे 'श्रौत', | यज्ञ और 'यज्ञ' शब्दसे 'स्मार्त' यज्ञ समझना चाहिये; और ऊपर हमने यही अर्थ | किया है। क्योंकि ऐसा भेद न करें, तो 'क्रतु' और 'यज्ञ' शब्द समानार्थक होकर | इस श्लोकमें उनकी अकारण द्विरुक्ति करनेका दोष लगता है।] (१७) इस जगतका पिता, माता, धाता, '(आधार), पितामह (बाबा) मैं हूँ, जो

७५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥ कुछ पवित्र या जो कुछ ज्ञेय है, वह और ॐकार, ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेदभी मैं हूँ, (१८) (सबकी) गति, (सबका) पोषक, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सखा, उत्पत्ति, प्रलय, स्थिति, निधान और अव्यय बीजभी मैं हूँ। (१९) हे अर्जुन ! मैं उष्णता देता हूँ, मैं पानीको रोकता और बरसाता हूँ; अमृत और मृत्यु, (ऐसेही) सत् और असत्‌भी मैं हूँ। [ परमेश्वरके स्वरूपका ऐसाही वर्णन फिर विस्तारसहित १०, ११ और १२, अध्यायोंमें है। तथापि वहाँ केवल विभूति न बतलाकर यह विशेषता दिखलाई है, कि परमेश्वरका और जगतके भूतोंका संबंध माँ-बाप, मित्र इत्यादिके समान है, इन दो स्थानोंके वर्णनोंमें यही भेद है। ध्यान रहे, कि पानीको बरसाने और रोकनेमेंसे एक क्रिया चाहे हमारी दृष्टिसे फायदेकी और नुकसानकी हो, तथापि तात्त्विक दृष्टिसे दोनोंको परमेश्वरही करता है। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर भगवानने पहले (गीता ७. १२) कहा है, कि सात्त्विक, राजस और तामस, ये सब पदार्थ मैंही उत्पन्न करता हूँ; और आगे चौदहवें अध्यायमे इस बातका विस्तारसहित वर्णन किया है, कि गुणत्रय- विभागसे सृष्टिमें नानात्व कैसे उत्पन्न होता है। इस दृष्टिसे देखनेपर कैसे १९ वें श्लोकके सत् और असत् पदोंका क्रमसे ‘भला’ और ‘बुरा’ कैसे अर्थ किया जा सकेगा; और आगे गीतामें (गीता १३. २६-२८) एक बार ऐसा अर्थ कियाभी गया है परंतु जान पड़ता है, कि इन शब्दोंके, सत् = अविनाशी और असत् = विनाशी या नाशवान्, ये जो सामान्य अर्थ हैं, (गीता २. १६), वही इस स्थानमें अभीष्ट होंगे; और 'मृत्यु और अमृत' के समान 'सत् और असत्' ये द्वंद्वात्मक शब्द ऋग्वेदके नासदीय सूक्तसे सूझ पड़े होंगे। तथापि दोनोंमें यह भेद है, कि नासदीय सूक्तमें ‘सत्' शब्दका उपयोग दृश्यसृष्टिके लिये किया गया है और गीता 'सत्' शब्दका उपयोग परब्रह्मके लिये करती है, एवं दृश्य-सृष्टिको असत् कहती है (गीतार. प्र. ९, पृ. २४५-२४७)। किंतु इस प्रकार परिभाषाका यदि भेद हो, तोभी ‘सत्’ और ‘असत्’ इन दोनों शब्दोंकी एक साथ योजनासे प्रकट हो जाता है, कि उनमें दृश्य-सृष्टि और परब्रह्म इन दोनोंकाभी एकत्र समावेश होता है। अतः उक्त वर्णनसे यह भावार्थभी निकाला जा सकेगा, कि परिभाषाके भेद किसीकोभी 'सत्' और 'असत्' कहा जाय;

नवाँ अध्याय ७५९ § § त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥२०॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥ अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ [ किंतु यह दिखलानेके लिये, कि दोनों परमेश्वरकेही रूप हैं, भगवानने 'सत्' और | 'असत्' शब्दोंकी व्याख्या न देकर सिर्फ यह वर्णन कर दिया है, कि 'सत्' और | 'असत्' मैंही हूँ ( गीता ११. ३७ ; १३. १२ ) । इस प्रकार यद्यपि परमेश्वरके | रूप अनेक हों, तथापि अब बतलाते हैं, कि उनकी एकत्वसे उपासना करने | और अनेकत्वसे उपासना करनेमें क्या भेद है :- ] (२०) जो त्रैविद्य अर्थात् ऋक्, यजु और साम इन तीन वेदोंके कर्म करने- वाले, सोम पीनेवाले अर्थात् सोमयाजी, तथा निष्पाप (पुरुष) यज्ञसे मेरी पूजा करके स्वर्गलोक-प्राप्तिकी इच्छा करते हैं, वे इंद्रके पुण्यलोकमें पहुँचकर स्वर्गमें देवताओंके अनेक दिव्य भोग भोगते हैं । (२१) और उस विशाल स्वर्गलोकका उपभोग करके पुण्यका क्षय हो जानेपर, वे ( फिर जन्म लेकर ) मृत्युलोकमें आते हैं। इस प्रकार त्रयी-धर्म अर्थात् तीनों वेदोंके यज्ञयाग आदि श्रौत-धर्मके पालनेवाले और काम्य उपभोगकी इच्छा करनेवाले लोगोंको ( स्वर्गका ) आवागमन प्राप्त होता है। | [ यह सिद्धान्त पहले कई वार आ चुका है, कि यज्ञयाग आदि धर्मसे | या नाना प्रकारके देवताओंकी आराधनासे कुछ समयतक स्वर्गवास मिल जाय , | तोभी पुण्यांश चूक जानेपर फिर जन्म लेकरके भूर्लोकमें आना पड़ता है ( गीता | २. ४२-४४ ; ४. ३४ ; ६. ४१ ; ७. २३ ; ८. १६, २५ ) । परंतु मोक्षमें वह | झंझट नहीं है; वह नित्य है, अर्थात् एक बार परमेश्वरको पा लेनेपर फिर | जन्म-मरणके चक्करमें नहीं आना पडता । महाभारतमें ( वन. २६० ) स्वर्ग- | सुखका जो वर्णन है, वहभी ऐसाही है। परंतु यज्ञयाग आदिसेही पर्जन्य प्रवृत्तिकी | उत्पत्ति होती है, अतएव शंका होती है, कि उनको छोड़ देनेसे इस जगतका | योगक्षेम अर्थात् निर्वाह कैसे होगा ? ( गीता २. ४५ की टिप्पणी ; गीतार. | प्र. १०, पृ. २९४ ) इसलिये अब ऊपरके श्लोकोंसे मिला करही उसका उत्तर | देते हैं :- ] (२२) जो अनन्यनिष्ठ लोग मेरा चिंतनकर मुझे भजते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंका योगक्षेम मैं किया करता हूँ ।

७६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥ [ न मिली हुई वस्तुका मिलना योग है, और मिली हुई वस्तुकी रक्षा करना क्षेम है; शाश्वतकोशमेंभी (श्लोक १००, २९२) योगक्षेमकी ऐसीही व्याख्या है, और उसका गूढ़ अर्थ 'सांसारिक नित्य निर्वाह' है। गीतारहस्यके बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३८४-३८५) इसका विचार किया गया है, कि कर्मयोग-मार्गमें इस श्लोकका क्या अर्थ होता है; इसी प्रकार नारायणीय धर्ममेंभी (मभा. शां. ३४८. ७२) कहा है, कि- मनीषिणो हि ये केचित् यतयो मोक्षधर्मिणः । तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ॥ वहां यह वर्णन है, कि ये पुरुष एकान्तभक्त हों, तोभी प्रवृत्ति-मार्गके हैं, अर्थात् निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेवाले हैं। अब बतलाते हैं, कि परमेश्वरकी बहुत्वसे सेवा करनेवालोंकी अंतमें कौन गति होती है:- ] (२३) हे कौन्तेय ! श्रद्धायुक्त होकर अन्य देवताओंके भक्त बन करके जो लोग यजन करते हैं, वेभी विधिपूर्वक न हों, तोभी (पर्यायमे) मेराही यजन करते हैं; (२४) क्योंकि सब यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी मैंही हूँ। किंतु वे तत्त्वतः मुझे नहीं जानते इसलिये वे गिर जाया करते हैं। [ गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें (पृ ४०२-४०६) यह विवेचन है, कि इन दोनों श्लोकोंके सिद्धान्तका महत्त्व क्या है। वैदिक धर्ममें यह तत्त्व बहुत पुराने समयसे चला आ रहा है, कि कोईभी देवता हो, वह भगवानकाही एक स्वरूप है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेदमेंही कहा है, कि "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः"। (ऋ. १. १६४. ४६) - परमेश्वर एक है, परंतु पंडित लोग उसको अग्नि, यम, मातरिश्वा (वायु) कहा करते हैं; और इसके अनुसारही आगेके अध्यायमे परमेश्वरके एक होनेपरभी उसकीही अनेक विभूतियोंका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार महाभारतके अंतर्गत नारा- यणीयोपाख्यानमें चार प्रकारके भक्तोंमें कर्म करनेवाले एकांतिक भक्तको श्रेष्ठ (गीता ७. १९ की टिप्पणी) बतलाकर कहा है :- ब्रह्माणं शितिकण्ठं च याश्चान्या देवताः स्मृताः । प्रबुद्धचर्याः सेवन्तो मामेवैष्यन्ति यत्परम् ॥