वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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द्वितीय अध्याय 93 दक्षिण में अधिक है जबकि ऋषि कण्व उत्तर भारत के निवासी थे। उनका आश्रम 'मालिनी' नदी के तट पर था। यह नदी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में 'मालन' के नाम से अब भी एक छोटी नदी के रूप में उपलब्ध है। यह शाखा उत्तर भारत में व्यास थी, इस बात का प्रमाण इसी संहिता के एक मन्त्र में उपलब्ध होता है। इस मन्त्र में कुरु तथा पञ्चालदेशीय राजाओं का उल्लेख है 'एष वः कुरवो राजा, एष पाञ्चालो राजो।' इसके पश्चात् इसका एक सुन्दर संस्करण मद्रास से प्रकाशित हुआ। श्रीमान् सातवलेकर जी ने औंध से इसका प्रकाशन किया। इस शाखा के अनुयायियों के उत्तरभारत में न मिलने के प्रमुख कारणों में एक तो यह है कि इनका सम्बन्ध पाञ्चरात्रों से है। ये पाञ्चरात्र वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित है। जब वृष्णिवंशी, कृष्ण के साथ दक्षिण चले गए, उसी समय इस शाखा के सभी अनुयायी भी वहाँ पहुँच गए। ३. कठ शाखा- यजुर्वेद की २७ शाखाओं में कठशाखा का विशिष्ट स्थान है। पुराणों में काठक लोगों को 'माध्यम' कहा गया है। अतः अनुमानतः कठानुयायी मध्यप्रदेश के निवासी थे। पतञ्जलि का इसी शाखा से सम्बन्ध था। उन्होंने महाभाष्य में लिखा है- 'ग्रामे ग्रामे काठकं कापालकं च प्रोच्यते' अर्थात् काठक तथा कापालक शाखाएँ गाँव गाँव में पढ़ी जाती थी। आजकल इस संहिता का अध्ययन करने वाले शून्य सदृश हैं। कुछ लोगों के मतानुसार काठक शैव थे तथा आज भी कश्मीर में मिलते हैं। कठ संहिता में पाँच खण्ड हैं- इठिमिका, मध्यमिका, ओरिमिका, याज्यानुवाक्या तथा अश्वमेधाद्यनुवचन। इन खण्डों को स्थानकों में विभाजित किया गया है। इस शाखा में कुल ४० स्थानक, ८४३ अनुवाक, १३ अनुवचन, ३०९१ मन्त्र तथा मन्त्र-ब्राह्मणों की कुल संख्या १८००० है। इनमें इठिमिका के १८ स्थानक हैं, जिनमें पुरोडाश, पशुबन्ध तथा राजसूयादि याज्ञिक क्रियाओं का विवेचन है। मध्यमिका के १२ स्थानकों में सावित्री तथा स्वर्गादि का विवरण है। ओरिमिका में १० स्थानक हैं, जिनमें सत्र, प्रायश्चित्ति, चातुर्मास्य, सौत्रामणियज्ञ वर्णित हैं। 'अश्वमेधाद्यनुवचन' में १३ अनुवचन प्राप्त होते हैं। काठक संहिता की एक हस्तलिखित प्रति भारत से जर्मनी पहुँच गई तथा वहीं १९१० ई० में इसका प्रकाशन हुआ। इसके सम्पादक श्री श्रोदर महोदय थे। भारत मे सन् १९४३ ई० में स्वाध्याय मण्डल की ओर से इसका एक संस्करण प्रकाशित किया गया। डा० कालेण्ड द्वारा भी कठ संहिता के एक भाग का प्रकाशन कराया जा चुका है।
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94 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता (४) कपिष्ठल-कठ संहिता- यह कृष्णयजुर्वेद की प्रसिद्ध शाखा है। चरणव्यूहानुसार चरक शाखा में 'कठाः प्राच्य कठाः' तथा 'कपिष्ठल कठाः' का निर्देश किया गया है। कपिष्ठल किसी प्राचीन प्रसिद्ध ऋषि की संज्ञा है क्योंकि इसका उल्लेख वैयाकरण पाणिनि तथा निरुक्तकार दुर्गाचार्य ने किया है। पाणिनि ने एक सूत्र में लिखा है- 'कपिष्ठलो गोत्रे' (८/३/९१) तथा दुर्गाचार्य ने लिखा है- 'अहं च कापिष्ठिलोवासिष्ठः' (निरुक्तटीका ४४)। कपिष्ठल किसी स्थान का नाम प्रतीत होता है। कपिष्ठल का अपभ्रंश कैथल नामक एक ग्राम है, जो आजकल हरियाणा नामक प्रदेश का अङ्ग है। यह ग्राम प्राचीनकाल से ही अति प्रसिद्ध रहा है। काशिकावृत्ति (८/३/९१) तथा वराहमिहिर की बृहत्संहिता (१४/४) में इस ग्राम का उल्लेख है। इसका मूल ग्रन्थ कई दृष्टि से काठक संहिता से साम्य रखता है, किन्तु इसकी स्वराङ्कन पद्धति ऋग्वेद के सदृश है। इसका विभाजन भी ऋग्वेदीय अष्टकों के समान है। इसमें आठ अष्टक एवं ६४ अध्याय थे जिसमें से आजकल केवल ६ अष्टक जीर्णशीर्ण अवस्था में उपलब्ध होते हैं। चतुर्थ अष्टक का २७वां अध्याय 'रुद्राध्याय' है। सम्प्रति इस संहिता की एक अधूरी प्रति सरस्वती भवन, वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय में सुरक्षित है। इसी की एक प्रति वेदाध्ययन के लिए यूरोप भेजी गई थी। इस प्रति के आधार पर डा० रघुवीर ने १९३२ में इसे प्रकाशित करवाया। इस पुण्य कार्य के सम्पादन के लिए डा० रघुवीर धन्यवाद के पात्र हैं। मैत्रायणी शाखा- इस शाखा की संहिता 'मैत्रायणी' गद्य पद्यात्मक है। इसमें मन्त्र तथा ब्राह्मणों का सम्मिश्रण है। सम्पूर्ण संहिता चार काण्डों में विभाजित है। प्रथम काण्ड में ११ प्रपाठक हैं, जिनमें दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, वाजपेयादि का विवेचन है। द्वितीय काण्ड में १३ प्रपाठक हैं जिनमें काम्येष्टि एवं राजसूय यज्ञों का वर्णन उपलब्ध होता है। तृतीय काण्ड में १२ प्रपाठक हैं जिनमें चिति, सौत्रामणि तथा अश्वमेध यज्ञों की चर्चा की गई है। चतुर्थ काण्ड खिल रूप में है। उसमें १४ प्रपाठक हैं, जिनमें राजसूयादि यज्ञों की सम्पूर्ण जानकारी दी गई है। इस संहिता में कुल मन्त्रों की संख्या २११४ है। इन मन्त्रों में ऋग्वेद के विविध मण्डलों के १७०१ मन्त्र हैं। इस शाखा के अनेक मन्त्र तैत्तरीय तथा काठक संहिताओं में भी प्राप्त होते हैं। इस शाखा के सम्पादक भी जर्मन के वेदज्ञ डा० श्रोदर हैं। भारत में इसका प्रकाशन १९९८ में औंध से हुआ। मैत्रायणी संहिता की एक अन्य संज्ञा भी है- 'कालाप
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 95 संहिता'। आचार्य विश्वरूप के अनुसार- 'नहि मैत्रायणी शाखा काठकस्य अत्यन्त विलक्षणा' अर्थात् मैत्रायणी तथा काठक संहिता में कोई अन्तर नहीं है। दोनों समान है। तैत्तिरीय शाखा- इस शाखा की संहिता का दक्षिण के महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश में विशेष प्रचार हुआ है। तैत्तिरीय संहिता में ६ काण्ड, ४४ प्रपाठक तथा ६३१ अनुवाक हैं। इसमें मंत्रों की संख्या २१९८ है। जैसी ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी है, वैसी इस संहिता की कोई सर्वानुक्रमणी नहीं है। कृष्णयजुर्वेद की अन्य शाखाओं के सदृश इस संहिता में भी गद्य पद्य तथा ब्राह्मण का सम्मिश्रण है। इसमें भी राजसूय, वाजपेय, याजमान तथा पौरोडास आदि यज्ञों की विस्तारपूर्वक समीक्षा की गई है किन्तु इस संहिता की व्याख्याओं में द्रविण प्रभाव छाया है। तैलंग तथा द्रविण ब्राह्मण, तैत्तरीय संहिता को ही आपस्तम्ब कहते हैं। यह संहिता आदिकाल से विद्वानों के मध्य अत्यन्त समादृत रही है। इसका सम्पादन सर्वप्रथम जर्मन वेदज्ञ डॉ० वैवर द्वारा किया गया। इसका प्रकाशन अंग्रेजी मे सन् १९१४ ई० में हारवर्ड ओरियण्टल सीरीज द्वारा किया गया। अनुवादक थे- डा० कीथ। भारतवर्ष में इस संहिता पर सर्वप्रथम भास्कर मिश्र ने अपना भाष्य लिखा। यह भाष्य मैसूर संस्कृत ग्रन्थमाला से प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् आचार्य सायण ने इसका प्रामाणिक भाष्य प्रस्तुत किया। यह भाष्य भी आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है। इस शाखा की संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, श्रौतसूत्र तथा गृह्यसूत्र आदि सम्पूर्ण संहिता पूर्णतः सुरक्षित है। इसी कारण यह संहिता अपना विशिष्ट स्थान रखती है। सामवेदीय शाखाएँ- महाभाष्यकार पतञ्जलि ने सामवेद की शाखाओं के विषय में लिखा है- 'सहस्रवर्त्मा सामवेदः।' अर्थात् सामवेद एक हजार शाखाओं वाला है। शौनक ने भी अपने ग्रन्थ 'चरणव्यूह' में सामवेद की एक हजार शाखाओं का निर्देश किया है। चरणव्यूह, प्रपञ्चहृदय, जैमिनि गृह्यसूत्र एवं दिव्यावदान के अनुसार सामवेद के १३ आचार्य थे, जिनके नाम ये हैं- राणायन, सत्यमुग्र, व्यास, भागुरि, औलुण्डि, गौलमुलवि, भानुमान, औपमन्यव, काराटिमशक, गार्ग्य, वार्षगण्य, कौथुमि, शालिहोत्र एवं जैमिनि। ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्राचीन काल में उपर्युक्त सभी आचार्यों की पृथक्-पृथक् शाखाएँ उपलब्ध थीं किन्तु आजकल ऐसा नहीं है। आज तो केवल तीन शाखाएँ ही दृष्टिगोचर होती हैं। चरणव्यूह के टीकाकार महीदास ने सामवेद की केवल तीन शाखाओं की उपलब्धि होते हुए बतलाया है। वे शाखाएँ निम्नलिखित हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 96 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. राणायनीय शाखा २. कौथुमीय शाखा ३. जैमिनीय शाखा इन शाखाओं का जितना साहित्य उपलब्ध होता है, वह निम्नलिखित है— (अ) ब्राह्मण ग्रन्थ- ताण्ड्य ब्राह्मण (कौथुमीय), षडविंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण एवं जैमिनीय ब्राह्मण। (ब) आरण्यक – छान्दोग्य आरण्यक (कौथुमीय) तथा जैमिनीय आरण्यक। (स) उपनिषद् – छान्दोग्य उपनिषद् (कौथुमीय), केनोपनिषद् (जैमिनीय) एवं जैमिनीय उपनिषद्। सामवेद की तीनों शाखाओं के सूत्र ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, वे इस प्रकार हैं- राणायनीय शाखा- द्राह्यायण श्रौतसूत्र और खदिर गृह्यसूत्र। जैमिनि शाखा- जैमिनीय श्रौतसूत्र और जैमिनीय गृह्यसूत्र। कौथुम शाखा- मशक कल्पसूत्र, लाटाय्या श्रौतसूत्र तथा गोभिल गृह्यसूत्र। अब इन शाखाओं का विस्तृत परिचय निम्नलिखित है- राणायनीय शाखा- इस शाखा का प्रचार महाराष्ट्रीय भट्टों में सर्वाधिक है। इस शाखा के अनुयायियों में एक शाखा अन्य भी प्रचलित है। यह अवान्तर शाखा है। इसका नाम 'सात्यमुग्नि शाखा' है। मुनि आपिशलि ने अपने शिक्षा ग्रन्थ में इस शाखा की विशेषता का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है- 'छन्दोगान सात्यमुग्नि राणायणीयाः ह्रस्वं पठन्ति।' महाभाष्यकार पतञ्जलि भी इस बात पर सहमत है। उनका कथन है- 'न नु च भोः छन्दोगान सात्यमुग्निराराणायनीया अर्धमेकारं अर्धभोंकारञ्जन अधीयते।' अर्थात् सात्यमुग्निराराणायनीय एकार एवं ओंकार का उच्चारण ह्रस्व ही करते हैं। इस वैशिष्ट्य के ग्रीकभाषा का प्रभाव कहने वाले पाश्चात्यभाषावैज्ञानिकों को संस्कृतभाषा के विषय में ऐसे निर्देशों को देखकर अपने विचारों को बदलना पड़ा। जैमिनीय शाखा- यह हर्ष का विषय है कि जैमिनीय शाखा के संहिता, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र तथा गृह्यसूत्र सभी उपलब्ध हो चुके हैं। इसकी एक अवान्तर शाखा भी है- 'तवलकार'। केनोपनिषद् का सम्बन्ध इसी अवान्तर शाखा से है। तवलकार नाम के एक ऋषि हुए है। इन्हें जैमिनि के शिष्य के रूप में जाना जाता है। जैमिनीय ब्राह्मण का अभिधान CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 97 ही 'तवलकार ब्राह्मण' के रूप में प्रचलित है। यह संहिता नागराक्षर में लाहौर से प्रकाशित हो चुकी है। इसमें कुल १६८७ मन्त्र हैं। इनकी संख्या कौथुम शाखा के मन्त्र संख्या से १८२ कम है। जैमिनीय शाखा के सामगान कौथुम शाखा के सामग़ानों से एक हजार अधिक है। कौथुम गानों की संख्या केवल २७२२ हैं जबकि जैमिनीय गानों की संख्या ३६८१ है। कौथुमीय शाखा- इस शाखा की संहिता सर्वाधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय है। कौथुमीशाखा का विशेष प्रचार गुजरात के नागर भट्टों में है। सायणकृत भाष्य कौथुमीय शाखा पर ही उपलब्ध होता है। इस शाखा की एक अवान्तर शाखा भी प्राप्त है- 'ताण्ड्य।' वेदान्त भाष्य के एक स्थल पर आचार्य शंकर ने भी कौथुमीयसंहिता' ताण्डय' तथा 'शाट्यायिन-संहिताओं' का नामोल्लेख किया है- 'अन्येऽपि शाखिनः ताण्डिनः शाट्यायिनः। (शां०भा० ३/३) ताण्ड्य ब्राह्मण तथा छान्दोग्य उपनिषद् कौथुमीय शाखा से सम्बन्धित हैं। अथर्ववेद की शाखाएँ- पतञ्जलि ने महाभाष्य के 'पशपशाह्निक' में अथर्ववेद की नौ शाखाएँ बतलाई हैं। उन्होंने लिखा है- नवधाऽथर्वणो वेदः। श्रीमद्भागवत् एवं वायुपुराण के अनुसार कलियुग के आरम्भ में जब वेदादि को संगृहीत किया गया तो वेदव्यास ने सुमन्तु नामक शिष्य को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। इनका दूसरा नाम 'दारुण' भी है। सुमन्तु ने पुनः यह वेद अपन शिष्य कबन्ध को पढ़ाया। कबन्ध के भी दो शिष्य थे- (अ) पथ्य (ब) देवदर्श। इनमें से पथ्य के भी तीन शिष्य हुए। इन तीनों के नाम हैं- जाजलि, कुमुद और शौनक। शौनक के भी दो शिष्य थे- बभू एवं सैन्धवायन। ये नौ शाखाएँ इन्हीं नौ ऋषियों की मानी जाती है। चरणव्यूहकार भी अथर्ववेद की नौ शाखाएँ मानते हैं, किन्तु शाखाओं की संज्ञा के बारे में मत भिन्नता है। आधुनिक प्रख्यात वेदज्ञ पं० भगवत् दत्त जी के अनुसार ६ नाम प्रायः सभी समान बतलाते हैं, वे हैं- पैप्पलाद, मौद, शौनकीय, जाजल, देवदर्श तथा चारणवैद्य। अन्य तीन शाखाएँ अनुमानतः ये हो सकती है- स्तौद, जलद तथा ब्रह्मबल। वर्तमान काल में उन नौ शाखाओं में से दो शाखाएँ ही शेष हैं। शेष ६ तो नष्ट हो चुकी हैं। उपलब्ध शाखाओं का क्रमशः विवेचन प्रस्तुत है। पैप्पलाद शाखा- यह शाखा जीर्णशीर्ण रूप में शारदा लिपि में झर्जपत्र पर उल्लिखित काश्मीर में
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98 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उपलब्ध हुई थी। कश्मीर नरेश राजा रणवीर सिंह ने इसे डॉ० राथ को सन् १८७५ ई० में सौंप दी थी। १८९५ मे राथ साहब के देहावसान हो जाने पर यह प्रति ट्यूबिंजन विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में रख दी गई। इस प्रति की एक फोटोस्टेट कापी अमेरिका के वाल्टमोर नगर से तीन जिल्दों में प्रकाशित हुई। भारत में इसकी दो प्रतियाँ जर्मनी जाने से पूर्व ही सुरक्षित कर ली गई थीं। इनमें से एक भाण्डारकर इन्स्टीट्यूट, पूना में तथा दूसरी बम्बई रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में सुरक्षित है। प्रपञ्चहृदयकार के अनुसार 'आथर्वणिके पैप्पलाद शाखायां मन्त्री विंशति काण्डः।' तात्पर्य यह है कि पैप्पलाद शाखा में ५० काण्ड थे। महाभाष्यानुसार पैप्पलाद शाखा का प्रारम्भ 'शन्नोदेवीरभिष्टय' मन्त्र द्वारा होता है। किन्तु शौनक संहिता में इसकी स्थिति प्रथम काण्डान्तर्गत छठें सूक्त के आदि में है। इसका केवल एक 'प्रश्नोपनिषद्' प्राप्त होता है। इसमें सुकेशा तथा भारद्वाज आदि ६ ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के पिप्पलाद मुनि द्वारा दिए गए उत्तर संगृहीत है। शौनकशाखा- शौनक शाखा की संहिता की संरचना १८ काण्डों मे हुई है तथा काण्ड, प्रपाठक, अनुवाक्, सूक्त, मन्त्र, गण, पर्याय तथा अवसानों में इसका विभाजन हुआ है। बृहत् सर्वानुक्रमणिका के काल में यह शाखा १९ काण्डों वाली हो गई। आश्वलायन अनुक्रमणी के अनुसार यह शाखा २० काण्डों की है। वे २०वें काण्ड के ऋषि एवं देवता का भी निर्देश करते हैं। अथर्ववेद की उपलब्ध शौनक शाखा ही मूल संहिता है। सम्प्रति इसमें २० काण्ड, ३४ प्रपाठक, १११ अनुवाक, ६६३ वर्ग, ६३१ सूक्त तथा ५९७७ मन्त्र हैं। वायुपुराणानुसार इस शाखा की संहिता के ६०२६ मन्त्र थे। मौदशाखा- इसका उल्लेख महाभाष्य (४।१।८६) तथा शाबरभाष्य (१।२१।३०) में प्राप्त होता है। अथर्व परिशिष्ट (२।५) में मौद तथा जलद शाखा वाले पुरोहित अत्यन्त गर्हित बतलाए गए हैं। इसके अनुसार इन पुरोहितों की उपस्थिति विनाश की सूचक है। 'पुरोधा जलदो यस्य मौदो वा स्यात् कदाचन। अब्दाद् दशम्यो मासेभ्यो राष्ट्रभ्रंश सगच्छति।।' इस प्रकार का उल्लेख संभवतः अभिचार मारणादि के प्रयोग के कारण हुआ है।
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri संहिताएँ प्रथम - ऋग्वेद वैदिक मन्त्रों के संग्रहों को 'संहिता' कहा जाता है। वैदिक संहिताएँ मुख्यतः चार हैं :- ऋक् संहिता, यजुः सहिता, साम संहिता तथा अथर्व संहिता। इन चारों संहिताओं में से प्रत्येक का कुछ न कुछ निजी वैशिष्ट्य है किन्तु सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की विभिन्न रचनाओं में ऋक् संहिता अति महत्त्वपूर्ण एवं गौरवयुक्त है। विश्व के इतिहास में सभी विद्वान् एवं विचारक निर्विवाद रूप से ऋक् संहिता को प्रथम स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं। 'ऋक् संहिता' ही ऋग्वेद के नाम से प्रख्यात है। भारतीय धर्म तथा दर्शन की दृष्टि से भी ऋग्वेद की पूजनीयता सर्वत्र स्वीकार की गई है। तैत्तरीय संहिता में लिखा है कि- "यद् वै यज्ञस्य साम्ना यजुषा क्रियते शिथिलं तत्, यद् ऋचा तदृढमिति" (तै०स० ६/५/१०/३) "अर्थात् जो विधान साम और यजुः के द्वारा सम्पादित होता है, वह शिथिल है, किन्तु ऋक् के द्वार सम्पादित अनुष्ठान ही दृढ़ होता है।" पुरुषसूक्तानुसार भी ऋचाओं का प्रथम आगम हुआ- "तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस्तस्मादजायत।।" (ऋ० १०/९०/९) "अर्थात् जिस यज्ञ में सभी कुछ अर्थात् सबका आत्मरूप पुरुष आहुत कर दिया जाता है, ऐसे उस यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद उत्पन्न हुए। उससे गायत्री आदि छन्द उत्पन्न हुए, उससे यजुर्वेद उत्पन्न हुआ।" पाश्चात्य वेदज्ञों के अनुसार ऋग्वेद भाषा एवं भाव की दृष्टि से भी अन्य वेदों की अपेक्षा नितान्त प्राचीन है। यह प्राचीनतम भारतीय साहित्य अवश्य है। ऋग्वेद की भाषा से यह भी सिद्ध होता है कि इसका प्रणयन किसी एक काल की निश्चित अवधि में नहीं हुआ। इसमें अति प्राचीन तत्त्वों तथा नवीन तत्त्वों का समन्वय दृष्टिगोचर होता है। इनकी स्थिति भी हिब्रू के स्स्रोतों के समान है, जिनकी रचना एक दीर्घ काल तक की गई और उसके पश्चात् उन्हें एक ग्रन्थ के रूप में पिरो दिया गया। ऋग्वेद का निर्माण काल कितना प्राचीन है, यह अद्यावधि अनुमान का ही विषय है। विद्वानों तथा वेद प्रेमियों के इस विषय में भिन्न-भिन्न विचार हैं। भारतीय मनीषियों के अनुसार वेद CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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100 $\hspace{5cm}$ वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
अपौरुषेय हैं। प्रभु की वाणी हैं। वे पुरुषों के द्वारा लिखित नहीं है। स्वयं वेदों में ऐसे मन्त्र होते हैं, जिनमें ऋक्, यजु, साम एव अथर्व का उल्लेख है और उनको यज्ञ पुरुष परमेश्वर से प्रादुर्भूत स्वीकार किया गया है। पाश्चात्य विद्वान् मंत्रों के ऊपर लिखे हुए ऋषियों को मंत्रकर्ता मानते हैं। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ऋग्वेद सर्वप्राचीन साहित्य है। अब ऋग्वेद से तात्पर्य क्या है? ऋग्वेद का अर्थ है- ऋचाओं का वेद। तो ऋचा क्या है?' ऋचा की परिभाषा जैमिनीय सूत्रों में उपलब्ध होती है। वह इस प्रकार है— “तेषामृग् यत्रार्थवशेन पाद व्यवस्था” (२/१/३५) अर्थात् जिन मन्त्रों में अर्थवशात् पादव्यवस्था है, उन छन्दोंबद्ध मन्त्रों को 'ऋक्' कहते हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान। इस प्रकार ऋचाओं का ज्ञान ऋग्वेद शब्द से अभिहित होता है। ऋग्वेद का विभाजन ऋग्वेद का विभाजन दो प्रकार के क्रमों से किया गया है— (क) अष्टक क्रम, (ख) मण्डल क्रम (क) अष्टक क्रम :- समस्त ऋग्वेद को आठ अष्टकों में विभक्त किया गया है। प्रत्येक अष्टक में आठ- आठ अध्याय हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ऋग्वेद ६४ अध्यायों में संग्रहीत है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से प्रत्येक अध्याय को वर्ग नामक अवान्तर विभागों में बाँटा गया है। वर्ग ऋचाओं के समूह का नाम है। इन वर्गों में प्रायः ऋचाओं की संख्या निश्चित नहीं है। सामान्यतया पाँच मन्त्र मिलकर एक वर्ग का निर्माण करते हैं, लेकिन ऐसे भी वर्ग उपलब्ध होते हैं जिनमें मन्त्रों की संख्या १ से लेकर ९ मन्त्रों तक है। इस वैषम्य का कारण अज्ञात है। समस्त वर्गों की संख्या २००६ है। ऋग्वेद संहिता की वाष्कल नामक शाखा इस विभाजन क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। अधिकांश वेदज्ञों ने अष्टक विभाजन क्रम को अवैज्ञानिक तथा अप्रामाणिक माना है। (ख) मण्डल क्रम :- ऋग्वेद का द्वितीय विभाग मण्डल क्रम के नाम से जाना जाता है। शाकल शाखा इस विभाजन-क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। विद्वानों के मध्य में मण्डल क्रम पर आधारित विभाग अधिक ऐतिहासिक, वैज्ञानिक तथा प्रामाणिक माना जाता है। इसके अनुसार ऋग्वेद १० मण्डलों में विभक्त है। इसी कारण निरुक्तादि ग्रन्थों में ऋग्वेद को दाशतयी की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रत्येक मण्डल में अनेक अनुवाक् हैं। प्रत्येक
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द्वितीय अध्याय 101 अनुवाक् में अनेक सूक्त तथा उन सूक्तों में अनेक ऋचाएँ अथवा मन्त्र संग्रहीत हैं। कात्यायन ने अपनी सर्वानुक्रमणी में इन सभी मन्त्रों की संख्या की गणना करके सपरिश्रम एकत्र उल्लेख किया है। प्राचीन वेद मर्मज्ञों ने वेदों की शुद्धता के निर्वाहार्थ ऋचाओं की क्या, अक्षरों तक की गणना कर रखी है। इससे कोई भी व्यक्ति इन वेदों में स्वनिर्मित नवीन मन्त्रों को देने का दुःसाहस नहीं कर सकता। ऋग्वेद के १० मण्डलों में कुल ८५ अनुवाक् हैं। इन अनुवाकों में १०१७ सूक्त हैं। इन सूक्तों के अतिरिक्त ११ सूक्त और भी हैं, जिन्हें बालखिल्य कहा जाता है। दोनों को योग करने पर सूक्तों की कुल संख्या १०१७+११ = १०२८ हो जाती है। इन बालखिल्य सूक्तों का अधिक महत्त्व नहीं है क्योंकि इनको स्वाध्याय काल में पढ़ा जाता है। इन खिल सूक्तों का न तो पाठ उपलब्ध होता है और न ही इनके अक्षरों की गणना की जाती है। खिल का अर्थ होता है- परिशिष्ट अर्थात् अन्त में संलग्न किए गए मन्त्र। इन सूक्तों का स्थान अष्टम मण्डल में सूक्त ४९ से लेकर सूक्त ५९ तक है। इनके मन्त्रों की संख्या ८० है। इनके स्वरूप का यथार्थ ज्ञान अनुपलब्ध है। अनुवाकानुक्रमणी के ४३वें श्लोक के अनुसार ऋग्वेद के समस्त सूक्तों में निहित मन्त्रों की संख्या 10580¼ है- “ऋचां दश सहस्त्राणि ऋचां पञ्चशतानि च। ऋचामशीतिः पादश्च पारणं संप्रकीर्तितम्॥’’ (अनु० ४३) अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक सूक्त में औसतन १० मन्त्र हैं। इसी प्रकार अनुवाकानुक्रमणी के ही ४५वें श्लोक के शब्दों की संख्या के बारे में निर्देश है- “शाकल्यदृष्टेः पदलक्षमेकं सार्धं च वेदे त्रिसहस्रयुक्तम्। शतानि चाष्टौ दशकद्वयं च पदानि षट् चेति हि चर्चितानि।’’ (अनु० ४५) इस श्लोकानुसार ऋग्वेद में शब्दों की कुल संख्या १ लाख ५३ हजार ८ सौ छब्बीस है। ऋग्वेदीय ऋचाओं की संख्या :- मण्डलक्रम के विवेचन में ऋग्वेदीय ऋचाओं की संख्या 10580¼ कही गई है, इसलिए अब ऋग्वेदीय ऋचाओं की संख्या के पृथक् स्पष्टीकरण की क्या आवश्यकता ? वस्तुतः ऋग्वेद में ऋक् मन्त्रों की संख्या का निर्धारण भी एक जटिल समस्या है, विवादग्रस्त विषय है, विभिन्न पुरातन एवं नवीन वेदज्ञों ने इस समस्या को अपने अनुसार पृथक्-पृथक् ढंग से सुलझाया है। ऋचाओं की संख्या निर्धारण में
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102 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
भिन्नता के दो कारण हैं— (१) प्राचीन वैदिक विद्वानों की गणना में शाखा-भेद का होना। (२) नवीन अथवा आधुनिक विद्वानों की गणना में व्यास भ्रम। भ्रम का मुख्य कारण यह है कि ऋग्वेद में कुछ ऋचाएँ ऐसी भी है जो प्रयोग काल में द्विपदा तथा अध्ययन काल में चतुष्पदा व्यवहृत होती हैं। ऋक् सर्वानुक्रमणी में लिखा है— “द्विर्द्विपदास्त्वृचः समामनन्ति।” ऋग्वेद में कुछ ऋचाएँ ऐसी भी हैं जो सदैव द्विपदा ही रहती है, कभी भी अपने द्विपदा रूप का परित्याग नहीं करती। इन्हें नित्य द्विपदा की संज्ञा प्राप्त है। ये मात्र १७ ऋचाएँ हैं। इन्हीं नित्य-नैमित्तिक द्विपदाओं के वास्तविक रूप से अनभिज्ञ होने के कारण मैक्समूलर, मैक्डानल आदि अनेक वैदिक विद्वानों ने भी अपनी गणना में त्रुटि की है। अतः नैमित्तिक द्विपदाएँ प्रयोगकाल में १४० तथा अध्ययन काल में केवल ७० ही रह जाती हैं। मन्त्रों की बड़ी संख्या में गड़बड़ी का एक अन्य कारण भी है; कहीं-कहीं खिलमन्त्रों की गणना ऋग्वेद के मन्त्रों के साथ नहीं करते। खिलमन्त्रों की कुल संख्या ८० है। इस प्रकार ऋग्वेद की कुल ऋक् संख्या १०५५२ है किन्तु अध्ययन काल में १४० नैमित्तिक द्विपदाओं के चतुष्पदा हो जाने के कारण ऋक् संख्या १०४८२ हो जाती है। इसमें बालखिल्य मन्त्र सम्मिलित हैं।
प्राचीनतम सूक्त :- पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद के मण्डलों में प्राचीन तथा अर्वाचीन मन्त्रों का संग्रह है। प्राचीनतम सूक्त द्वितीय मण्डल से लेकर सप्तम मण्डल तक उपलब्ध होते हैं। प्रत्येक मण्डल किसी ऋषि के वंश विशेष से सम्बद्ध है। इसीलिए इन मण्डलों को वंशमण्डल (Family Book) कहते हैं। भारतीय परम्परानुसार ये ऋषि ही मन्त्रों के प्रत्यक्षकर्ता हैं। ये छह ऋषि हैं— गृत्समद द्वितीय मण्डल के, विश्वामित्र तृतीय के, चतुर्थ के वामदेव, पञ्चम के अत्रि, षष्ठ के भरद्वाज तथा सप्तम के वसिष्ठ। यही ऋषि द्वितीय से सप्तम मण्डल तक के कर्ता के रूप में मान्य हैं। अष्टम मण्डल के सूक्तों के साक्षात्कर्ता ऋषि कण्व तथा अंगिरा वंश के हैं। नवम् मण्डल में समस्त मन्त्रों का प्रतिपाद्य सोम-देवता विषयक है। सोम का एक अभिधान पवमान भी है। अतः सोम विषयक मन्त्रों के संग्रह के कारण इसे पवमान मण्डल भी कहते है। अनुमानतः द्वितीय से लेकर अष्टम मण्डल तक संग्रहीत मन्त्रों को चुनकर ग्रन्थान्त में संलग्न कर दिया गया। उसके पश्चात् ग्रन्थ के प्रारम्भ तथा अन्त में एक एक मण्डल युक्त किए गए। अतः प्रथम तथा दशम मण्डल अपेक्षाकृत नवीन हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार इन मण्डलों का संकलनकर्ता एवं विभाजनकर्ता एक ही व्यक्ति है। दशम मण्डल के ऋषि
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द्वितीय अध्याय 103 क्षुद्रसूक्त तथा महासूक्त कहलाते हैं। षड्गुरुशिष्यानुसार नासदीय सूक्त के पूर्व के सूक्त महासूक्त तथा नासदीय सूक्त के अनन्तर उपलब्ध सूक्त क्षुद्रसूक्त के रूप में मान्य हैं। सूक्तों के नाम पर ही ऋषियों का नाम इसलिए पड़ गया क्योंकि ऋषि ही सूक्तद्रष्टा हैं। तत्रत्यादि ऋषियों ने द्वितीय मण्डल से नवम मण्डल तक को मध्यम का अभिधान प्रदान किया है क्योंकि वे मध्य में विद्यमान हैं। अनुक्रमणिका में प्रथम मण्डल, नवम मण्डल तथा दशम मण्डल सूक्तों के ऋषियों के साथ रमणियों के भी नाम उपलब्ध होते है। वस्तुतः रचनात्मक रूप में इन नामों की अनुक्रमणिका का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। अतः वैदिक सूक्तों के वास्तविक प्रणेता अज्ञात हैं। विषय वस्तु :- विश्व की सर्वप्राचीन रचना ऋग्वेद की विषयवस्तु अत्यन्त ही व्यापक है। यह धार्मिक स्त्रोतों की एक विशाल राशि है। भारोपीय भाषापरिवार में ऋग्वेद का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि ऋग्वेद शब्द का तात्पर्य है— ऋचाओं का ज्ञान। ऋग्वेद में हमें दो प्रकार के मन्त्र मिलते हैं, एक तो वे हैं जो कि यज्ञों एवं देवस्तुतियों के प्रयोग में आते हैं। दूसरे वे हैं जो ब्रह्मविद्या, धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक विषयों पर प्रकाश डालते हैं। ऋग्वेद में यज्ञों का महत्त्व, देवताओं की उपासना आदि विषयों का विशद विवेचन हुआ है। इसमें सृष्टि रचना, दार्शनिक विचार, पशु-पक्षी आदि से सम्बद्ध भी कुछ मन्त्र मिलते हैं। इसमें कुछ संवाद सूक्त भी हैं। प्रायः मन्त्र देवस्तुति परक ही हैं परन्तु कुछ सूक्त ऐसे भी हैं जो किसी देवता से सम्बन्धित नहीं हैं। उनका सम्बन्ध मानव जीवन तथा व्यावहारिक पक्ष से है। निरुक्तकार ने वैदिक देवताओं का विश्लेषण करके उन्हें क्रमशः पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा द्युलोक से सम्बन्धित होने के कारण तीन प्रकार का बतलाया है। अग्नि, सोम, पृथ्वी आदि देवता पृथ्वी स्थानीय हैं। इन्द्र, वायु, रुद्र आदि देवता अन्तरिक्ष स्थानीय हैं। वरुण, सूर्य, उषस् आदि देवता द्युस्थानीय हैं। इन देवताओं को भी चार भागों में विभक्त किया गया है— (१) प्राकृतिक शक्तिरूप देवता— सूर्य, इन्द्र, पूषा, सविता आदि, (२) गृहदेवता— अग्नि, सोम आदि, (३) कल्पनाजन्य देवता— श्रद्धा, मन्यु आदि, (४) गौण देवता— गन्धर्व, अप्सरा आदि।
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 104 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ऋग्वेद में इन देवताओं की शक्ति, प्रभुता एवं ऐश्वर्य के विषय में विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है। इसमें देवताओं का चित्रण विविध आयुधों एवं वाहनों के साथ हुआ है। कहीं कहीं एकेश्वरवाद की भावना झलक रही है। ऋग्वेद में हमें अनेक देवताओं की स्तुति मिलती है। ऋग्वेदीय देवताओं में तीन देवता अपनी विशिष्टता के कारण विशेष प्रसिद्ध हैं। वे हैं— अग्नि, इन्द्र तथा वरुण। अग्नि के लिए सर्वाधिक ऋचाएँ उपलब्ध होती हैं। इन्द्र की स्तुति भी ऋग्वेद में पर्याप्त की गई है। इन्द्र से सम्बन्धित लगभग २५ सूक्त हैं। इन्द्र विजय प्रदान करने वाला है, इसलिये इसका निरूपण सर्वाधिक तेजस्वी तथा वीररस सम्पन्न मन्त्रों के द्वारा हुआ हैं। तृतीय अति प्रसिद्ध देव वरुण है। यह प्राणियों की हृदयस्थ भावनाओं का ज्ञाता है। यह प्राणियों को उनके कर्मानुसार दण्ड तथा पारितोषिक वितरित करता है। इसका चित्रण कर्मफलदाता परमेश्वर के रूप में किया गया है। अतः इसके लिए स्निग्ध तथा उदात्त ऋचाएँ प्रयुक्त हुई हैं। देवियों में उषा को अत्यन्त ही सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है। सर्वाधिक कवित्वपूर्ण एवं ललित ऋचाएँ ऊषा देवी के विषय में ही मिलती हैं। इनके अतिरिक्त जिन देवताओं की स्तुति में ऋचाएँ प्राप्त होती हैं, वे हैं— सूर्य, द्यौ, सविता, विष्णु, पूषन्, अश्विनौ, अग्नि, पर्जन्य, उषा, सोम, यम आदि। सोम का भी ऋग्वेद में पर्याप्त स्तवन हुआ है। ऋग्वेद में यम देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। द्युलोक के देवताओं में द्यौ की सर्वाधिक प्रतिष्ठा है। विष्णु की स्तुति त्रिविक्रम के रूप में की गई है। विष्णु को तीनों लोकों में व्याप्त बतलाया गया है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ऋग्वेद का मुख्य विवेच्य विषय देवताओं की स्तुति ही है। इन देवों का विशेष वर्णन वैदिक देवतावाद नामक अध्याय में किया गया है। दशम मण्डल की अर्वाचीनता :- जैसा कि पहले कहा जा चुका है दशम मण्डल अन्य मण्डलों की तुलना में नवीन माना जाता है। प्राचीनतम सूक्तों का बाहुल्य द्वितीय से सप्तम मण्डल तक प्राप्त होता है। कौन सा सूक्त अथवा मण्डल प्राचीन है और कौन सा नवीन है? इस समस्या का निश्चित समाधान सम्भव नहीं। फिर भी विद्वानों ने विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर दशम मण्डल की अर्वाचीनता को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, जो कि निम्नलिखित है— (क) भाषा पर आधृत विभिन्नता : एक मन्त्र अथवा सूक्त भाषाभेद के कारण अन्य सूक्तों से भिन्न हो, यह संभव है, किन्तु यहं अनिवार्य नहीं कि यही भाषाभेद उस मन्त्र की प्राचीनता अथवा नवीनता CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 105 का निर्णायक है। सूक्तों की भाषा केवल कालभेद से ही भिन्न नहीं होती बल्कि सूक्तों के प्रादुर्भाव तथा उद्देश्य के कारण भी भाषा में भिन्नता के आदर्श विद्यमान रहते हैं। ऋग्वेदिय प्राचीनतम सूक्तों में शब्दों में रेफ का प्रयोग अधिक मिलता है। इसके विपरीत अर्वाचीन सूक्तों में रेफ के प्रयोग का लोप सा होने लगा तथा रेफ के स्थान पर लकार के प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ गई। यथा— प्राचीन गौत्र मण्डलों में जल वाचक सलिल शब्द को सरिर के रूप में प्रयोग किया गया है जबकि दशम मण्डल में सलिल का ही प्रयोग हुआ है। प्राचीन तथा अर्वाचीन सूक्तों की भाषा में व्याकरण सम्बन्धी भिन्नताएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं। प्राचीन सूक्तों में पुल्लिंग अकारान्त शब्दों में प्रथमा द्विवचन के प्रत्यय के रूप में आ का प्रयोग अधिक हुआ है। जैसे— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया (ऋग्वेद १/१६१)। इसके विपरीत दशम मण्डल में पुल्लिंग, अकारान्त, प्रथमा, द्विवचन के प्रत्यय के रूप में औ का प्रयोग मिलता है। यथा— “मा वामेतौमा परेतौरिषाम्” (ऋ० १०/१७८/२), “सूर्याचन्द्रमसौधाता” (१०/१९०/३)। प्राचीन सूक्तों में क्रियार्थक क्रिया को प्रकट करने के लिए तवै, से, असे, अध्यै आदि प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं। यथा— कर्तवै, जीवसे, अवसे आदि, किन्तु दशम मण्डल में इन सबके स्थान पर मात्र तुम् के प्रयोग का आधिक्य है। यथा— कर्तुम्, जीवितुम्, अवितुम् आदि। (ख) छन्दों पर आधृत भिन्नता : भाषा के अनन्तर वैदिक सूक्तों का रचनाकाल मुख्यतः छन्दों की भिन्नता द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। वेदों में दो प्रकार के छन्द उपलब्ध होते हैं। प्रथम तो वे जो शास्त्रीय संस्कृत कविता के छन्दों से कोई साम्य नहीं रखते हैं। दूसरे वे जो शास्त्रीय संस्कृत कविता के छन्दों से साम्य रखते हैं। इस प्रकार के छन्द पूर्णतया वैदिक छन्दों की अपेक्षा अधिक ताल एवं लययुक्त होते हैं। प्राचीनतम सूक्तों में छन्दोगत विन्यास मुख्य रूप से वर्णों की संख्या पर आधारित था, किन्तु अर्वाचीन सूक्तों में प्राप्य मन्त्रों में लघु गुरु के विन्यास का भी विशेष आग्रह दृष्टिगत होता है। इससे वैदिक छन्दों के पठन-पाठन में शास्त्रीय संस्कृत के छन्दों के समान आनन्द आने लगा। छन्दों के उच्चारण में स्वर तथा लय का महत्त्व बढ़ गया। यथा— पुरुष सूक्त का अनुष्टुप् प्राचीन अनुष्टुप् न होकर वैदिक अनुष्टुप् के सदृश है। (ग) देवों पर आधृत भिन्नता : दशम मण्डल में ऐसे अनेक नवीन देवताओं का निरूपण प्राप्त होता है, जिनका
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106 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्राचीन मण्डलों में नामोल्लेख तक नहीं किया गया है। इस मण्डल में निरूपित देवों के स्वरूप में भी नवीनता है। प्राचीन कहे जाने वाले सूक्तों में उपलब्ध वरुण के स्वरूप में तथा दशम मण्डल में उपलब्ध वरुण के स्वरूप में स्पष्ट अन्तर दृष्टिगोचर होता है। पूर्वसूक्तों में वरुण समस्त विश्व के नियन्ता एवं सर्वशक्ति सम्पन्न देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं जबकि इस मण्डल में उन्हें मात्र जल का अधिपति ही वर्णित किया गया है। नूतन देवगण मानस प्रवृत्तियों के प्रतिनिधि के सदृश चित्रित किए गए हैं। यथा- श्रद्धा (ऋग्वेद १०/१५१) का अत्यन्त उत्कृष्ट वर्णन यहाँ प्राप्त होता है- श्र॒द्धया॒ग्निः समि॑ध्यते श्र॒द्धया॑ हूयते ह॒विः। श्र॒द्धां भग॑स्य मू॒र्धनि॒ वच॑सा वेदयामसि॥१॥ (ऋ० १०/१५१/१) अर्थात् श्रद्धा के द्वारा गार्हपत्यादि अग्नि-त्रय को प्रज्ज्वलित किया जाता है। श्रद्धा के द्वारा पुरोडाशादि हवियों को आहुत किया जाता है। भाव यह है कि यज्ञ करते हुए श्रद्धा से अग्नि प्रज्ज्वलित करनी चाहिए, श्रद्धा से आहुतियों को आहुत करना चाहिए। श्रद्धा के साथ यज्ञ करने पर यजमान प्रमुख ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।“ इसी प्रकार गाय के लिए सूक्त (१०/१६९) अरण्यानी (अरण्य की देवी) तथा ज्ञान के लिए सूक्त (१०/७१) प्रयुक्त हुए हैं। ज्ञानसूक्त में ही कहा गया है कि वैदिक संहिता में चारों ऋत्विजों (होता, उद्गाता, ब्रह्मा एवं अध्वर्यु) के विशिष्ट कर्मों के लिए आवश्यक मन्त्रों का संग्रह है- ऋचां त्वः पोष॑मास्ते पुपु॒ष्वान्गा॑य॒त्रं त्वो॑ गायति॒ शक्व॑रीषु। ब्र॒ह्मा त्वो॒ वद॑ति जातवि॒द्यां य॒ज्ञस्य॒ मात्रां॒ वि मि॑मीत उ त्वः॥ (ऋ० १०/७१/११) “अर्थात् कोई विद्वान् वेद मन्त्रों के पोषण को पुष्ट करता हुआ रहता है। कोई शक्वरी नामक ऋचाओं में गाने योग्य मन्त्रों (साम) को गाता है। कोई यज्ञ का ब्रह्मा या अथर्ववेद का ज्ञाता शिल्प-विद्या को कहता है और कोई यज्ञ की विधि को विशेष रीति से बतलाता है।“ (घ) दार्शनिक तथ्यों में भिन्नता : दशम मण्डल में अनेक ऐसे सूक्त उपलब्ध होते हैं जिनमें दार्शनिक तत्त्वों का समुचित विवेचन है। इन सूक्तों में ऐसे अनेक मन्त्र दृष्टिगत होते है जिनमें आर्यों के दार्शनिक चिन्तनों की गूढ़ता तथा विकास द्योतित होता है। आर्यजनों के चिन्तन का
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 107 यही विकास दार्शनिक भिन्नता का जनक है। इस प्रकार के सूक्तों में नासदीयसूक्त तथा पुरुष सूक्त का विशेष महत्त्व है। पश्चिमी वेदज्ञों ने इस विकास को बहुदेववाद एकदेववाद—सर्वेश्वरवाद के रूप में उत्तरोत्तर विकसित बतलाया है। सर्वेश्वर-वाद का तो पुरुष सूक्त में स्पष्ट निदर्शन है। इस प्रकार दशम मण्डल का वंश मण्डल से पार्थक्य स्वयं सिद्ध है। (च) विषय की नवीनता : दशममण्डल में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विषयों से ग्रथित अनेक सूक्त प्राप्त होते हैं। कुछ सूक्तों में विवाह तथा श्राद्ध विषयों से सम्बद्ध मन्त्र हैं। जैसे— ऋग्वेद के १०/८५ सूक्त में उषा तथा सोम का विवाह वर्णित है। इस सूक्त में तत्कालीन सामाजिक दशा का सुन्दर निदर्शन है। इस सूक्त में पति-पत्नी को साथ रहने तथा सन्तानोत्पत्ति की शिक्षा दी गई है— इ॒ह प्रि॒यं प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन्गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जा॒गृहि। ए॒ना पत्या॑ त॒न्वं१॒॑सं सृ॑जस्वाधा जि॒व्री वि॒दथ॒मा व॑दाथः॥ (ऋ० १०/८५/२७) "अर्थात् हे वधू! इस घर में तेरा प्रियभाव सन्तान से फले फूले। इस घर में गृहस्थ के कर्तव्य के लिए जागती रह। सावधानी से पति के प्रबन्ध को कर। इस पति के साथ अपने शरीर को मिला दे। पति के कार्यों में हाथ बँटा और जीर्ण हुई वृद्धि को घर में आज्ञा देती रह।" इसी सूक्त में पतिगृह में आगमन करने पर पत्नी को कल्याण युक्त, पतिप्रिया तथा वीर प्रसविनी होने की कामना की गई है। यह कामना सर्वोत्कृष्ट तथा गौरवशाली है। यह उत्तम प्रभाव की उत्पादिका है— अघो॑रचक्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒रसू॑र्देवका॑मा स्यो॒ना शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥ (ऋ० १०/८५/४४) "अर्थात् हे वधू! कठोर नेत्र वाली नहीं, किन्तु शीलयुक्त नेत्र वाली, पति को हनन करने वाली अर्थात् कष्ट देने वाली नहीं, किन्तु सुख पहुँचाने वाली प्राप्त हों। घर के पशुओं के लिए कल्याणकारिणी प्रसन्नमन सुन्दर शक्तियुक्त हों। वीर सन्तान उत्पन्न करने वाली, घर में देवर, जेठ आदि के प्रति अच्छी भावना वाली तथा देव भावना वाली, दैवीवृत्ति वाली, हमारे द्विपद और चतुष्पद के लिए शुभकारिणी हों।" CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 108 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता दशम मण्डल के कुछ सूक्तों में ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिनमें मृत्यु के पश्चात् शव संस्कार के क्रिया कर्म का विवेचन किया गया है। इन मन्त्रों से शव को भूमि में गाड़ने का संकेत प्राप्त होता है। अत्यन्त मनोहर उपमा के द्वारा इस विषय का निरूपण हुआ है- 'माता पुत्रं यथा सिचाऽभ्येनं भूमं ऊर्णुहि।' "अर्थात् जिस प्रकार माता अपने पुत्र को वस्त्र से ढक देती है, हे भूमि! तुम भी इस शव को उसी प्रकार स्वयं ढक लो।" इसी मण्डल में विभिन्न पितरों के अत्यन्त मार्मिक संकेत प्राप्त होते हैं। शव से यमलोक पहुँचने पर पितरों की संगति करने को कहा गया है। यथा- सं ग॑च्छस्व पि॒तृभिः॒ सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ प॒रमे व्यो॑मन्। हि॒त्वायां॑व॒द्यं पुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छस्व त॒न्वा॑ सु॒वर्चा॑ः॥ (ऋ० १०/१४/८) 'अर्थात् हे पुरुष एवं हे स्त्री! तू पालन करने वाले माता, पिता, गुरुजनों से सत्संग कर। नियन्ता जन से और सर्व उत्कृष्ट आकाश तुल्य रक्षा स्थान परमात्मा के अधीन रह कर यज्ञदानादि साधनों से सर्वदा युक्त रहे। निन्दनीय कार्य को त्याग कर बार-बार गृह को प्राप्त हो और तेजस्वी बनकर सन्तान उत्पन्न करने वाली स्त्री तथा कुलवर्धक पुत्रादि से संगति का लाभ प्राप्त कर।' इस प्रकार उपर्युक्त विभिन्न दृष्टिकोणों से मनन किए जाने पर यह सिद्ध होता है कि दशममण्डल वंशमण्डल की अपेक्षा अर्वाचीन है। दशम मण्डल की अर्वाचीनता के समर्थन में अन्य विद्वानों के मत- अनेक पाश्चात्य तथा पौरस्त्य वेदज्ञों ने दशम मण्डल को अर्वाचीन माना है। उनके अनुसार सम्पूर्ण ऋग्वेद एक ही काल में नहीं लिखा गया। कुछ प्रमुख विद्वानों की इस सम्बन्ध में उक्तियाँ निम्नलिखित हैं- (अ) गॆटे का मत- गॆटे ने अपनी पुस्तक 'Lectures on Ṛgveda' में द्वितीय से सप्तम मण्डल पर्यन्त तक मन्त्रों को वंश-मण्डल कहा है। प्रत्येक मण्डल के मन्त्रद्रष्टा एक ही ऋषि अथवा उसके वंशज हैं। उनके अनुसार- 'They are homogeneous in character and arrangement.' CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 109 (ब) ओल्डेन वर्ग का मत- इनका मत है कि वंशमण्डल की रचना के अनन्तर प्रथम तथा दशम मण्डल संलग्न किये गये। इन मण्डलों की भाषा, व्याकरण, छन्द, भाव तथा विवेच्य विषय अन्य मण्डलों की तुलना में नितान्त भिन्न तथा विकसित है। ओल्डेन वर्ग महोदय ने स्वयं कहा है- 'When we have once admitted the fact that the tenth maṇḍala of the Ṛgveda have gathered up the many periods and the original composition of the hymns was probably the work of several centuries, than we can distinguish earlier from later hymns.' (स) सुकठणकर का मत- इनका भी यही मत है कि ऋग्वेद की ऋचाओं में हम सरलता से प्राचीन तथा अर्वाचीन ऋचाओं को छांट सकते हैं क्योंकि इनकी रचना में शताब्दियों का अन्तर है। उनके अनुसार- The form in which the Saṁhitā of the Ṛgveda has comedown to us clearly shows the different hymns were composed long before. They were brought together and systematically arranged that the different portions of saṁhitā represent chronologically different stages flowed from various indications of language vocabulary, style grammar, matter and lastly ideas. The tenth maṇḍala is indeed the aggregate of supplementary hymns clearly showing their familiarity with the first nine. दशम मण्डल की अर्वाचीनता के विरोध में विद्वानों के मत- अधिकांश विद्वानों ने दशम मण्डल को अन्य मण्डलों की अपेक्षा नवीन स्वीकार किया है, किन्तु कुछ विद्वान् इस पौर्वापर्य को नहीं मानते। उनके अनुसार सम्पूर्ण ऋक्संहिता की रचना समकालिक है। इनमें पण्डित सत्यव्रत सामश्रमी तथा डॉ० कपिल देव द्विवेदी आदि प्रमुख हैं। इनके मत निम्नलिखित हैं- (क) पण्डित सत्यव्रत सामश्रमी का मत- पण्डित जी का कथन है कि ऋग्वेद के अष्टक क्रम में तो मण्डलों का नामोल्लेख तक नहीं दिखलाई पड़ता, इसलिए दशम मण्डल की रचना को अनन्तरकालीन कहना उचित नहीं है। उन्होंने अपने विचारों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 110 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
“...............दशममण्डलस्यऋक् परिशिष्ट रूपत्वं कल्पयितुं तैः भाषापार्थक्यप्रदर्शनादि स्वीकृत दशम मण्डलस्य भाषा मन्त्रार्थ गततात्पर्याणि पृथगेवेति.........किमंत्रब्रूमो वयम्? अस्मच्छुतिषुहि दशममण्डलस्य मण्डलान्तराणाञ्च भाषा एकविधैवोपलभ्यते, अस्मद्बुद्धिषु च तथैकविधमेव तात्पर्यमिति न जानीमहे केषां बुद्धिमालिन्यं केषां वा श्रवणोन्द्रिय दुष्टत्वं केषां वा हठकारित्वमिति।” वस्तुतः सामश्रमी जी का तर्क विचारणीय तथा सम्माननीय है। (ख) डॉ० कपिलदेव द्विवेदी का मत- श्री द्विवेदी जी भी मण्डलों के इस पृथकतावादी सिद्धान्त से सहमत नहीं है। इनका अभिमत है- “वास्तविकता की दृष्टि से विचार किया जाए तो पाश्चात्य विचारों में काफी थोथापन है। .....उन्होंने परकालीन अंश बताकर बात समाप्त कर दी है, परन्तु कहीं भी उसका स्पष्ट और पुष्टकाल निर्धारण नहीं किया। भाषा, व्याकरण आदि का जो तर्क उपस्थित किया जाता है, वह बहुत लचर है और परीक्षा निकष पर खरा नहीं उतरता। दशममण्डल वस्तुतः ऋग्वेद का नवनीत है। इसमें पुरातन सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं भावात्मक महत्त्व के प्रतिपादक सूक्त विशेष रूप से संग्रहीत है। वस्तुतः ऋग्वेद में पूर्वकालीन और परकालीन संग्रह जैसा कोई भेद नहीं है।” डॉ० कपिल देव जी द्विवेदी के अनुसार ऋग्वेद के संग्रह में प्रयुक्त सिद्धान्तों का विवेचन निम्नलिखित हैं- १. ऋषि परिवारों से सम्बन्धित मंत्रों को प्रधानता प्रदान की जाये। २. जहाँ पर उपर्युक्त सिद्धान्त न प्रयोग किया जा सके वहाँ विषय की समानता को मुख्यता दी जाए। ३. सोम से सम्बन्धित मंत्र सर्वाधिक है, अतः उन्हें एक स्थान पर रखा जाये। ४. जो मन्त्र ऋषिक्रम अथवा विषयक्रम में ग्रथित न किये जा सकें, उन्हें अलग ग्रन्थान्त में रखा जाये। इन विपरीत विचारों के दृष्टिगत होने पर अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सम्प्रति यह समस्या जटिल एवं विवादास्पद है, इसलिए इस विषय पर गम्भीर अध्ययन, मनन तथा पुनर्विचार की अत्यधिक आवश्यकता है। दानस्तुति- ऋग्वेद में कतिपय सूक्त तथा मन्त्र ऐसे मिलते हैं, जिन्हें दानस्तुति कहा जाता है। इन सूक्तों में धार्मिक तथा धर्महीन काव्य के मध्यम मार्ग का अवलम्बन किया गया
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द्वितीय अध्याय 111 है। इन दान स्तुतियों के स्वरूप एवं तात्पर्य के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। आधुनिक विद्वान् इन सूक्तों को किसी पुरातन राजा के विशाल दान से तृप्त ऋषि द्वारा दाता की स्तुति स्वीकार करता है। परन्तु भारतीय वेदज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार वेद में कहीं भी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है, अतः इनमें किसी व्यक्ति विशेष की दान महिमा का स्तुत्य वर्णन कहना उचित नहीं प्रतीत होता है। इस प्रकार के सूक्तों की संख्या के बारे में विद्वान् किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच सके हैं। कुछ विद्वान् इस प्रकार के सूक्तों की संख्या चालीस के लगभग बतलाते हैं। कात्यायन ने अपनी ऋक्सर्वानुक्रमणी में मात्र २२ सूक्तों में ही दान स्तुतियों का उल्लेख किया है किन्तु आधुनिक वेदज्ञों ने अत्यन्त परिश्रम करके ६८ सूक्तों में दानस्तुतियों का अन्वेषण कर डाला है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का १२६वाँ सूक्त दानस्तुति कहा जा सकता है। इन सूक्तों को विनय सूक्त अथवा याज्ञिक गीत भी कहा जा सकता है क्योंकि इनमें यज्ञ के रक्षक की विनती की गई है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में एक सूक्त में दान की महिमा का दिव्य प्रतिपादन हुआ है। इसके छठे मन्त्र के अनुसार स्वार्थ के लिये व्यय किया गया धन पाप का हेतु है- मोघमन्नं॒ विन्द॑ते॒ अप्र॑चेताः स॒त्यं ब्र॑वीमि व॒ध इत्स तस्य॑। नार्य॒मणं॒ पुष्य॑ति॒ नो सखा॑यं॒ केव॑लाघो भवति केवला॒दी।। (ऋ० १०/११७/६) "अर्थात् अनुदार चित्त वाला व्यक्ति अन्न-धन को व्यर्थ पाता है, उसका धन निरर्थक है। मैं सत्य कहता हूँ उसकी यह मृत्यु ही है। कंजूस को सैकड़ों खतरे लगे रहते हैं। वह नियामक ईश्वर को तृप्त करता है यज्ञ उपासना के द्वारा। न दान द्वारा मित्र को पुष्ट करता है। केवल अपने भोगों की पूर्ति करने वाला केवल पाप रूप होता है। भाव यह है कि केवल अपने भोग विलास में धन लगाना पाप है, यह मानव जीवन नहीं मृत्यु है।" इसी सूक्त के चौथे मन्त्र में मित्र को दान दिये जाने की अनिवार्यता का उत्तम प्रतिपादन हुआ है- 'न स सखा यो न ददा॑ति॒ सख्यै॑ सचा॒भुवे॒ सच॑मानाय पि॒त्वः। अपा॑स्मात् प्रेया॒न् न तदो॒कों अ॑स्ति पृ॒णन्त॑मन्यमरणं चिदिच्छेत्।।' (ऋग्वेद १०/११७/४)
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 112 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अर्थात् जो साथ रहने वाले, सेवा करने वाले मित्र के लिये अन्न नहीं देता है, वह सच्चा मित्र नहीं है। इससे दूर रहो। वह आश्रय नहीं है, उचित सहारा नहीं है। पालन करने वाले अन्य विरोधी के पास भी जाना चाहिये।' सम्वाद-सूक्त- ऋग्वेद में जिस प्रकार दार्शनिक सूक्त, उपनिषदों के दार्शनिक विवेचन से सम्बद्ध है, उसी प्रकार उसके कुछ सूक्त महाकाव्यों एवं नाटकों से सम्बन्ध रखने वाले हैं। इन सूक्तों में कथोपकथन की मुख्यता है तथा ये सूक्त संवादात्मक स्वरूप में कथा एवं आख्यायिकाओं के अंश हैं, इसीलिए इनको संवाद-सूक्त का नाम दिया गया है। इन सूक्तों की संख्या लगभग बीस है, जिनमें से प्रमुख ये हैं- इन्द्र वरुण सम्वाद (४/२२), यम यमी संवाद (१०/१०), वरुण-अग्नि संवाद (१०/५१), देवगण-अग्नि संवाद (१०/५२), इन्द्र-इन्द्राणी संवाद (१०/४६), उर्वशी-पुरुरवा संवाद (१०/९५), सोम सूर्या संवाद (१०/८५), सरमा-पणि संवाद (१०/१०८) आदि। इनके स्वरूप के विषय में पाश्चात्य वेदज्ञों में गहरी विप्रतिपत्ति है। वेदों तथा वैदिक साहित्य के अध्येता पाश्चात्य विद्वानों मैक्समूलर तथा ओल्डेन बर्ग के अनुसार ऋग्वेदीय संवाद सूक्तों के आधार पर ही नाट्य की उत्पत्ति हुई है। डॉ० ओल्डेनबर्ग ने ऋग्वेदीय सम्वादसूक्तों को आख्यान की संज्ञा प्रदान की है। इनके अनुसार ऋग्वेद के आख्यान मूलतः गद्य पद्य मिश्रित थे। गद्य भाग अपनी नीरसता के कारण समास हो गया, जबकि पद्य भाग ने अपनी सरसता एवं रोचकता के कारण अस्तित्व बनाये रखा। इसके विपरीत डॉ० हर्टल, श्री श्रोदर एवं डॉ० सिल्वा लेवी ने इन्हें नाटकों का अवशिष्टांश कहा है। उनके अनुसार ये धार्मिक अवसरों में अभिनीत धार्मिक नाट्य अभिनय है। तृतीय मत डॉ० विन्टरनिट्ज का है। इनके अनुसार ये सम्वाद छन्दोबद्ध प्राचीन वीर काव्य हैं तथा इनमें वर्णनात्मक एवं नाटकीय तत्त्वों का निरूपण हुआ है। विन्टरनिट्ज ने इन्हीं से अवान्तरकाल में एक ओर महाकाव्य तथा दूसरी ओर नाटकों के उत्पत्ति की सम्भावना व्यक्त की है। इन सम्वाद सूक्तों में वैदिक संस्कृति, समाज, धर्म तथा दर्शन के संकेत प्राप्त होते हैं। इनमें काव्य तत्त्व तथा सामाजिक व्यवहारिकता दोनों का उत्कृष्ट निदर्शन उपलब्ध होता है। ऋग्वेदीय सम्वाद-सूक्तों में चार सूक्तों का विशेष महत्त्व है। ये निम्नलिखित हैं- (अ) पुरुरवा-उर्वशी-सम्वाद (१०/९५) (क) यम यमी संवाद (१०/१०) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar