भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

द्वितीय अध्याय 113 (स) सरमा-पणि संवाद (१०/१०८) (द) सूर्या सूक्त (१०/८५) (अ) पुरुरवा-उर्वशी-सम्वाद - ऋग्वेद के संवाद-सूक्तों में सर्वाधिक प्रख्यात दशम मण्डल का ९५वाँ सूक्त है। १८ ऋचाओं वाले इस सूक्त में मानव पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी का संवाद है। यह कथा रोमाञ्चक प्रेम का भव्य उदाहरण है। इसमें स्वर्गलोक की सुन्दरी उर्वशी भूतल के राजा की पत्नी बनकर निरन्तर चार वर्षों तक साथ रहती है और अन्ततः गर्भवती हो जाने पर उसका साथ त्याग कर निर्मम के सदृश चल देती है। उर्वशी के विरह में पुरुरवा व्यग्र होकर ढूँढते हुए एक दिन उसे रमणीक सरोवर में जल क्रीड़ा करते हुए खोज डालते हैं। इन्हीं विषयों पर संवाद ग्रथित है। यह अत्यन्त दुर्बोध एवं क्लिष्ट है किन्तु इसके भाव स्पष्ट हैं। पुरुरवा का कथन है— ह॒ये जाये॒ मन॑सा॒ तिष्ठ॑ घो॒रे वचा॑ंसि मि॒श्रा कृ॑णवावहै॒ नु। न नौ॒ मन्त्रा॒ अनु॑दितास ए॒ते मय॑स्कर॒न्पर॑तरे च॒नाह॑न्॥१॥ (ऋ० १०/९५/१) अर्थात् हे अश्व के तुल्य बलवति, हे पुत्रोत्पन्न करने में समर्थ स्त्रीतुल्य, अपने नायक को अपने बल पराक्रम से प्रसिद्ध करने वाली या जय दिलाने वाली ! हे घोर दुष्कर संग्राम करने वाली ! तू मन को दृढ़ करके स्थिर हो। सेना व सेनापति हम दोनों परस्पर प्रतिज्ञा वचनों को करें। क्या हम दोनों की आपस की मन्त्रणाएँ भविष्यार्थ सुख प्रदान नहीं कर सकती ? उर्वशी उत्तर देती है— किमे॒ता वा॒चा कृ॑णवा॒ तवा॒हं प्राक्र॑मिषमु॒षसा॒मग्रि॑येव। पु॒रू॒रवः॒ पुन॒रस्तं॒ परे॑हि दुरा॒पना॒ वात॑इवा॒हम॑स्मि॥२॥ (ऋ० १०/९५/२) अर्थात् उषा जिस तरह से सूर्य के आगे चलती है, इसी प्रकार सेना सर्वाग्रगामी बनकर तेरे आगे चलूँ, तो इस मन्त्रणा वाणी की क्या विशेष आवश्यकता है ? हे अनेक सैन्य दल को आज्ञा देने वाले सेनापति, प्रबल कार्यों से भवनों की भाँति सदा सबका कल्याण व रक्षा करने वाले होकर मनोयोग दें। वे जरा रहित मनुष्यों का समवाय बनाने वाले, अश्वों से वेग से जाने में समर्थ, गर्जन ध्वनि से आकाश व पृथिवी में अपने सन्देश सुनाने वाले हों। उर्वशी ने प्रेम की भिक्षा के लिये याचनारत पुरुरवा की प्रार्थना को कितनी

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

114 \qquad वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता निर्ममता से तिरस्कृत किया। यह वार्तालाप आगे चलता है। पुरूरवा अधिक नम्रतापूर्वक प्राचीन विषयों का स्मरण दिलाता है, किन्तु सब व्यर्थ जाता है। वह तड़फ उठता है— सु॒दे॒वो अ॒द्य प्रप॑ते॒दना॑वृ॒त्प॒रावतं॑ पर॒मां गन्त॒वा उ॑। अधा॒ शयी॑त॒ निर्ऋते॒रुप॑स्थे॒ऽधैनं॒ वृका॑ रभ॒सासो॑ अ॒द्युः॥ (ऋ० १०/९५/१४) अर्थात् यदि उत्तम विजीगिषु अरक्षित हो सुदूर परदेश को प्रस्थान करे और शत्रु सेना के निकट असावधान होकर प्रमाद करे तब बलवान् भेड़ियों की भाँति चोर, डाकू आदि शत्रुजन उसे नष्ट कर देते हैं। भाव यह है कि जो सेनानायक शत्रु-सेना के समक्ष असावधानी व प्रमाद बरतता है, वह प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ रहता है और शत्रुओं द्वारा किये जाने वाले विनाश का उत्तरदायी बनता है। इस बात पर उर्वशी ने पुरुरवा को जो उत्तर दिया है, वह अनादिकाल तक स्त्री जाति का भूषण सदृश रहेगा। उसका कथन है— पु॒रूर॑वो॒ मा मृथो॒ मा प्र प॑प्तो॒ मा त्वा॒ वृका॑सो॒ अशि॑वास उ क्षन्। न वै स्त्रैणा॑नि स॒ख्यानि॑ सन्ति साला॒वृका॑णां॒ हृद॑यान्ये॒ता॥१५॥ (ऋ० १०/९५/१५) अर्थात् हे अनेकों के शासक! तू मृत्यु को न पा, तेरा पतन न हो। अकल्याणकारी स्वभाव के व्यक्ति तुझको न खाएँ। तू स्मरण रख कि स्त्री आदि भोग्य पदार्थों के उद्देश्य से किए गए मैत्रीकार्य यथार्थ नहीं होते, वे तो वन के कुत्तों या भेड़ियों के हृदयों के सदृश छल व क्रूरतादि से परिपूर्ण होते हैं। सम्वादों में वह विषय उभरकर सामने आते हैं, जो सामान्यतया एक सच्चे प्रेमी तथा धोखेबाज प्रेयिसी के मध्य होते हैं। शतपथब्राह्मण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि ग्रन्थों में भी इस कथा का निरूपण है। किन्तु इसका श्रेष्ठ रूप महाकवि कालिदास के नाटक विक्रमोर्वशीय में उपलब्ध होता है। (क) यम-यमी संवाद - ऋग्वेद के दशम-मण्डल के दशम सूक्त में यम-यमी का परस्पर विलक्षण संवाद है। इसमें यमी अपने भ्राता यम को सन्तानोत्पत्ति के लिए व्यभिचारार्थ लुभाती है। वह वासना तथा कामासक्त होकर भाई का आह्वान करती है, किन्तु कोमल तथा मधुर भावना वाला भाई, बहन के इस प्रस्ताव को अस्वाभाविक कहकर ठुकरा देता है। ये सम्वाद भी दुर्गम तथा नाटकीय अधिक है। इन सम्वादों का

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 115 स्वरूप निम्नलिखित मन्त्रों से स्पष्ट हो जाता है। कामाग्नि से संतप्त यमी का कथन है— गर्भ॒ नु नौ॑ जनि॒ता दम्प॑ती क॒र्देव॒स्त्वष्टा॑ सवि॒ता वि॒श्वरू॑पः। नकि॑रस्य॒ प्र मि॑नन्ति व्र॒तानि॒ वेद॑ नावस्य पृ॑थि॒वी उत द्यौः॥५॥ (ऋ० १०/१०/५) अर्थात् जन्म देने वाला पिता, कन्या को पुरुष के हाथ में प्रदान करने वाला तेजस्वी सर्व उत्पादक विश्वात्मा गर्भ धारण हेतु हम दोनों नर-नारी को पति-पत्नी बनाता है। इसके विधानों को कोई नहीं मिटाता। हमारे इस पति-पत्नी भाव के करणीय कर्मों को भूमि एवं रवि भी जानते हैं। यमी ने अत्यन्त मार्मिक याचना की, किन्तु यम ऐसा सच्चा मनुष्य है जिसने संयम तथा निग्रह का व्रत ले रखा है। इसका कथन है— को अ॒स्य वे॑द प्रथ॒मस्याह्नः क ईं॑ ददर्श॒ क इ॒ह प्र वो॑चत्। बृ॒हन्मित्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑ क॒र्दु ब्रव आहनो॒ वीच्या॒ नॄन्॥ (ऋ० १०/१०/६) अर्थात् इस प्रथम दिवस के सम्बन्ध में किसे ज्ञात है? और इस गर्भ धारण होने न होने का मूल कारण कौन देखता है? इस विषय में कौन समर्थ वक्ता है? सर्वप्रेमी परभावना का तेज विशाल है कटाक्षों के बोलने वाली! स्त्री! मनुष्य को विवेक करके भी कौन भला, कब क्या कह सकता है? यम के बार-बार नकारात्मक उत्तर देने पर यमी अत्यधिक क्षुब्ध होती हुई यम को तृषातुर होकर पुरुषत्वहीन कह देती है— ब॒तो ब॑तासि यम॒ नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदाम। अ॒न्या किल॑ त्वां क॒क्ष्यै॑व यु॒क्तं परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम्॥ (ऋ० १०/१०/१३) अर्थात् हे पाणिग्रहण से बद्ध! दुःख है कि तू अत्यन्त क्षीण है। तेरे मन तथा हृदय के बारे में हम अनजान रहें। क्या तुझे कोई दूसरी समर्थ नारी पेड़ की बेल के तुल्य आलिङ्गन करती है? इस श्लोक में नारी पति-हृदय के भावों की परीक्षा ले रही है। इस पर यम कहता है कि तुम किसी अन्य पुरुष का आलिङ्गन करो, जो CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 116 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कामोत्तेजित हो— अन्य॒मू षु त्वं य॑म्य॒न्य उ॒ त्वां परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम्। तस्य॑ वा॒ त्वं मन॑ इ॒च्छा स वा॒ तवाधा॑ कृणुष्व सं॒विद॒ सुभ॑द्राम्॥ (ऋ० १०/१०/१४) अर्थात् हे विवाहित स्त्री ! तू दूसरे मनुष्य को पेड़ की बेल के समान आलिङ्गन न कर और अन्य पुरुष तुम्हारा आलिङ्गन न करें। तू उसके हृदय की इच्छा कर और वह तेरे हृदय की इच्छा करे। तू मङ्गलकारी उत्तम बुद्धि वाली सन्तान उत्पन्न कर। इसमें बहन भाई के वैवाहिक सम्बन्ध का भी निषेध है और यदि परस्पर सन्तानोत्पत्ति में शक्तिहीन हो तो अन्य पुरुष से सन्तान उत्पन्न करने की आज्ञा वेद में प्रतिपादित है। यम-यमी का सम्वाद शिव-पार्वती के सम्वाद का स्मरण दिलाता है। इसका विनियोग क्या हुआ ये अज्ञात है। (स) सोम-सूर्या सम्वाद - यह ऋग्वेद के दशम मण्डल का ८५वाँ सूक्त है। सूर्या सूर्य की बेटी है। इस सूक्त में इसकी 'उषा' संज्ञा है। इसकी सभी ४७ ऋचाएँ वैवाहिक विधि का संकेत करती है। इसकी अधिकांश ऋचाएँ गृह्यसूत्र के विवाह- प्रकरण में भी प्राप्त होती हैं। इसकी कुछ ऋचाओं में नववधू को उत्कृष्ट आशीष से युक्त किया गया है। यथा— इ॒ह प्रियं॑ प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यता॒मस्मिन्गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जा॒गृहि। ए॒ना पत्या॑ त॒न्वं१॑सं सृ॑जस्वाधा॒ जिब्री॑ वि॒दथ॒मा व॑दाथः॥२७॥ (ऋ० १०/८५/२७) अर्थात् हे वधू, इस गृह में तुम्हारा प्रिय भाव सन्तान से फले-फूले। इस गृह में गृहस्थ के कर्तव्यार्थ तू जागरण कर। सावधानीपूर्वक प्रबन्ध को कर। इस पति के साथ स्वशरीर को संयुक्त कर दे। पति के कार्यों में हाथ बँटा और जीर्ण हुई वृद्धि में वृद्धि कर। घर को आदेश देती रह। (द) सरमा-पणि सम्वाद - यह ऋग्वेद के दशम मण्डल का १०८वाँ सूक्त है। इसमें इन्द्र की दूती सरमा तथा पणियों का सम्वाद चलता है। वह पणियों द्वारा अपहृत इन्द्र की गौओं को वापस लौटाने को कहती है, किन्तु वे इस विषय पर बात न करके उसे लालच देते हैं। उसे अपनी बहन बनाते हैं। किन्तु सरमा उनके बहकावे में नहीं आती। पणिगण कहते हैं— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

द्वितीय अध्याय 117 इमा गाव॑: सरमे या ऐच्छ॑: परि॑ दिवो अन्ता॑न्त्सुभगे॒ पत॑न्ती। कस्त॑ एना॒ अव॑ सृजा॒दय॑र्ध्युत्यास्माक॒मायु॑धा सन्ति ति॒ग्मा।। (ऋ० १०/१०८/५) अर्थात् हे सौभाग्यशालिनी सरमे! द्युलोक के सुदूर प्रदेशों से आगमन करती हुई तुम जिन गायों की अभिलाषा करती हो, वे गायें यह हैं। इन गायों को बिना युद्ध किए भला कौन निकाल कर (छीन कर) ले जा सकता है और हमारे शस्त्र भी तीव्र हैं। उसे प्रलोभन देते हुए पणिगण आगे कहते हैं कि हे सुभग सरमा! तुम्हारी गायों को हम लोग आपस में बाँट लेंगे— ए॒वा च॒ त्वं सर॑म आज॒गन्थे प्रबा॑धिता॒ सह॑सा॒ दैव्ये॑न। स्वसा॑रं त्वा कृणवै॒ मा पुन॒र्गा अप॑ ते॒ गवां॑ सुभगे भजाम।। (ऋ० १०/१०८/९) अर्थात् हे सरमा देवों के बल से पीड़ित होती हुई ही तुम यदि यहाँ हम लोगों के बलपुर में आ गई हो तो तुमको हम अपनी बहन बना लेते हैं। तुम पुनः वापस मत जाओ। हे सौभाग्यशालिनी सरमे! हम तुम्हारे साथ गायों का बँटवारा कर लेते हैं। सरमा-पणि सम्वाद में कुल ११ मन्त्र हैं। इन मन्त्रों में १, ३, ५, ७, ९ अर्थात् विषम संख्या के मन्त्रों में पणियों का कथन है तथा २, ४, ६, ८, १०, ११ अर्थात् सम संख्या के मन्त्रों में सरमा के उत्तर हैं। भारतीय साहित्य में संवाद-सूक्तों का महत्त्व :- ऋग्वेद के सम्वाद सूक्तों के सदृश अन्य रचनाएँ भारतीय साहित्य में अनेक स्थानों पर प्राप्त होती हैं। महाभारत, पुराणों तथा विशेषकर बौद्धसाहित्य में सम्वाद प्रधान तथा कथोपकथन प्रधान अर्द्धमहाकाव्यीय तथा अर्द्धनाटकीय रचनाएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं। ये प्राचीन सम्वाद-सूक्त महाकाव्य तथा नाटक दोनों प्रकार की साहित्यिक विधाओं के उद्गम स्थल हैं। इनमें नाटकीय तत्त्वों का पूर्ण समावेश दृष्टिगोचर होता है। ऋग्वेद के अनेक सम्वाद-सूक्तों ने परवर्ती संस्कृत साहित्य की कथावस्तु के रूप में प्रचुर सामग्री प्रदान की है। इस प्रकार के सम्वाद-सूक्तों में पुरुरवा-उर्वशी सम्वाद विशेष उल्लेखनीय है। पुरुरवा तथा उर्वशी की कथा का भारतीय साहित्य में बारम्बार विभिन्न स्थानों पर प्रयोग दृष्टिगोचर होता है। कृष्ण व यजुर्वेद की काठक शाखा में बौद्धायनश्रौतसूत्र में ऋग्वेद पर सर्वानुक्रमणी पर सद्गुरुशिष्य की टीका में महाभारत के परिशिष्ट स्वरूप हरिवंशपुराण में, विष्णुपुराण

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 118 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में तथा कथासरित्सागर में इस कथानक का सांकेतिक दर्शन उपलब्ध होता है। यह आख्यान ब्राह्मणग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। इस कथानक के प्रयोग का सबसे सफल प्रयास महाकवि कालिदास ने किया है। कालिदास का नाटक विक्रमोर्वशीय इसी कथानक पर आधारित है। वेदों में अति संक्षिप्त रूप में प्राप्त इस पुरूरवा उर्वशी के सम्वाद सूक्त को कविता कामिनी के विलास कालिदास ने अपनी काव्य प्रतिभा के बल पर रोचक रूप में प्रस्तुत किया है। संवाद सूक्तों के लिए इससे अधिक महत्त्व की बात अन्य क्या हो सकती है कि अनेक पाश्चात्य तथा पौरस्त्य विद्वान नाटकों की उत्पत्ति इन्हीं संवाद सूक्तों से मानते हैं। उनके अनुसार इन्हीं संवाद-सूक्तों में नाट्य के बीज अन्तर्निहित है। कालान्तर में इन्हीं बीजों के अंकुरित होने से नाट्यकला का विकास हुआ। जर्मन विद्वान् डॉ० श्रोदर के अनुसार संवाद सूक्त गायन एवं नर्तन के साथ अभिनीत किया जाते थे। ये स्वयं धार्मिक नाटक है। इनका यज्ञादि अवसरों पर गायन, नर्तन तथा वादन के साथ अभिनय किया जाता था। डॉ० हर्टल के अनुसार सम्वाद-सूक्तों में गायनार्थ एक से अधिक व्यक्ति नियोजित किये जाते थे क्योंकि एक व्यक्ति के द्वारा कथनोपकथन सम्भव नहीं। अतः ये सूक्त ही नाटकों के मूल स्रोत हैं। डॉ० कीथ का मत इसके विपरीत है। उनके अनुसार ऋग्वेद में उपलब्ध इन सम्वाद-सूक्तों का मात्र शंसज्ञ ही होता था क्योंकि ये सम्वाद-सूक्त विभिन्न प्रकार के होते हैं किन्तु पुरातत्त्व विचार है, तो किसी में ऐतिहासिक घटना वर्णित है, मूलतः इनका विषय व्यावहारिक है। डॉ० विण्डिश थोल्डन वर्ग तथा पिशेलादि विद्वानों ने इन सम्वाद सूक्तों के स्वरूप का विवेचन कुछ पृथक् ढंग से किया है। उनके अनुसार ये सम्वाद सूक्त गद्य पद्यात्मक थे जिसमें व्याख्यात्मक गद्यांश का लोप हो गया तथा ललित पद्यांश ही रह गया। इन विद्वानों ने इन्हें आख्यान की संज्ञा प्रदान की है। डॉ० विशेल का मत है कि नाटकों में गद्य पद्य दोनों का होना इन सम्वाद सूक्तों का स्पष्ट अनुकरण है। इन सम्वाद सूक्तों से तत्कालीन लोक साहित्य तथा समाज की झलक मिलने के कारण इनका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यम-यमी के सम्वाद से वैदिक काल की नैतिकता का ज्ञान होता है। पुरुरवा-उर्वशी सम्वाद में विद्याधर योनि के पात्रों का चित्रण होने से उसमें अद्भुत कथा के तत्त्वों का समावेश है। इन ऋग्वेदीय सम्वादों में अलौकिक विषयों का वर्णन, मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा के अतिरिक्त दीर्घायु, ऐश्वर्य तथा सन्तान-प्राप्ति की प्रार्थनाएँ भी विद्यमान हैं। इन आख्यानों में स्वर्ग प्राप्ति से अधिक भौतिक आवश्यकता तथा सम्पत्ति को प्राप्त करने वाली प्रार्थनाएँ हैं। इस प्रकार ऋग्वेदीय सम्वाद सूक्तों का महत्त्व बहुविध है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 119 लौकिक सूक्त :- दशममण्डल के अनेक सूक्तों में लौकिक व्यवहार से सम्बन्धित विषयों का मनोरंजक प्रतिपादन हुआ है। इन सूक्तों में अनेक सूक्तों का प्रतिपाद्य यक्ष्मा का नाश है। इसके लिये विशेष रूप से १६१वाँ तथा १६३वाँ सूक्त उल्लेखनीय है। १६२वें सूक्त में गर्भ के बाधक राक्षसों के विघ्नों के रक्षा व प्रबन्ध वर्णित हैं। यह सूक्त रक्षोहा के नाम से प्रख्यात है। ऋग्वेदीय दशममण्डलान्तर्गत १४५वें सूक्त में पत्नी द्वारा पति को प्राप्त करने का वर्णन है— इ॒मां ख॑ना॒म्योर्ष॑धिं वी॒रुधं॑ ब॒लव॑त्तमाम्। यया॑ स॒पत्नीं॑ बाध॑ते॒ यया॑ सं॒विन्द॑ते॒ पति॑म्॥१॥ (ऋ०सू० १०/१४५/१) अर्थात् मैं इस पौधे रूप अथवा विपरीतता से अवरुद्ध करने वाली अथवा विशेष की अवरोधक औषधि का खनन करती हूँ, जिससे सौत बाधा प्रदान करती है, जिससे वह पति को प्राप्त कर लेती है। इस मन्त्र में पतिकाम नारी द्वारा सपत्नी को हटाकर स्वयं अनुरूप पति पाने का वर्णन है। एक सूक्त में शत्रुओं के पलायनार्थ प्रार्थना की गई है— ऋ॒षभं मां समा॒नानां॑ स॒पत्नी॑नां विषास॒हिम्। ह॒न्तारं॒ शत्रू॑णां कृ॒धि वि॒राजं॒ गोप॑तिं ग॒वाम्॥१॥ (ऋ०१०/१६६/१) अर्थात् हे परमात्मा! मुझे एक समान आदरणीयों में श्रेष्ठ तथा शत्रुओं को विशेषतः परास्त करने में समर्थ, प्रहार करने वाले शत्रुओं का नाशक, पृथ्वियों के पृथ्वीपति तथा विशेष कान्ति सम्पन्न विभिन्न देशों का शासक बना। इस प्रकार यहाँ पर शत्रुओं को परास्त करके स्वयं शासक बनने की अभिलाषा से प्रार्थना की गई है। १०/५८ सूक्त मन आवर्तन सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। इस सम्पूर्ण सूक्त में भूमि, आकाश, सागर, उषा, पहाड़ तथा संसार भर में भ्रमण करने वाले मन को लौट आने के लिए प्रार्थना की गई है। यथा- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 120 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यत्त॑ य॒मं वै॑वस्व॒तं मनो॑ ज॒गाम॑ दू॒रकम्। त॒त्त आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसै॑ ॥१॥ (ऋ० १०/५८/१) अर्थात् हे मानस रोगी! जो तेरा यह मन अन्तरतम कल्पना से अत्यन्त दूर चला गया है, तुम्हारे उसको भी हम लोग यहाँ निवास करने तथा जीवन लाभार्थ पुनः लौटाते हैं। १०/९७ सूक्त की ओषधि सूक्त संज्ञा है। इसमें अनेक रोगों के नाश करने में समर्थ विभिन्न लाभदायक औषधियों का निरूपण हुआ है। इस मन्त्र में विभिन्न ओषधियों का स्पष्ट संकेत किया गया है- याः फ॒लिनी॒र्या अ॑फ॒ला अ॑पु॒ष्पा याश्च॑ पु॒ष्पिणी॑:। बृह॒स्पति॑प्रसूतास्ता नो॑ मुञ्चन्त्वं॒हस॑: ॥१५॥ (ऋ० १०/९७/१५) अर्थात् जो फल सम्पन्न हैं, जो फलहीन हैं, जो पुष्पहीन तथा पुष्पसम्पन्न हैं, वे रवि से एवं विद्वत्जनों द्वारा प्रदत्त अथवा निर्मित होकर हमें पापयुक्त कष्टों या दुःखों से छुटकारा प्रदान करें। अतः आयुर्वेद के दृष्टिकोण से इस सूक्त का विशेष महत्त्व है। कतिपय सूक्तों में राजनीतिक विषयक चर्चा दृष्टिगत होती है। इन सूक्तों में राजा की प्रशंसा में अनेक मन्त्र प्राप्त हैं। इनसे ज्ञात होता है कि उस युग में राजा का निर्वाचन होता था- अ॒भि त्वा॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि सोमो॑ अवीवृतत्। अ॒भि त्वा॒ विश्वा॑ भू॒तान्य॒भीव॒र्तो य॑थास॑सि ॥३॥ (ऋ० १०/१७४/३) अर्थात् हे महाराज! सूर्य देवता एवं चन्द्र देवता आपको आगे बढ़ावें अर्थात् नैसर्गिक शक्तियाँ आपके अनुकूल हों। समस्त प्राणिवर्ग तथा सभी प्राकृतिक पदार्थ तुम्हें आगे बढ़ावें, विजयी बनावें, जिस प्रकार से तुम विजय प्राप्त करों। इस प्रकार हम देखते हैं कि आजकल जिस समाज शास्त्र (Sociology) की सर्वत्र धूम है, चर्चा है, उसका ऋग्वेद में स्पष्ट दिग्दर्शन है। इस वैदिक बन्धुभाव की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट नहीं होता। वैदिक समाजवाद वस्तुतः मानवतावाद है, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 121 जिसमें एक क्षण, एक वर्ष, एक जीवन नहीं बल्कि विशाल जीवन तथा समग्र समाज पर दृष्टि है। वैदिक सामाजिक विज्ञान दृष्टि को संकुचित नहीं अपितु विशाल बनाता है। दार्शनिक सूक्त :- ऋग्वेद में कतिपय दार्शनिकसूक्त भी प्राप्त होते हैं, जिनमें दार्शनिक विचारों का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है। इन सूक्तों में आत्मा-परमात्मा, सुख-दुःख, सृष्टि की उत्पत्ति एवं ब्रह्मादि विषयों के सम्बन्ध में वैदिक ऋषियों के विचारों का स्पष्टीकरण है। अतः ये सूक्त अपनी दार्शनिक गम्भीरता तथा नूतन कल्पना के कारण विख्यात हैं। इस प्रकार के प्रमुख सूक्त निम्नलिखित हैं- (अ) नासदीय सूक्त (१०/१२९) (ब) पुरुष सूक्त (१०/९०) (स) हिरण्यगर्भ सूक्त (१०/१२१) (द) वाक्सूक्त (१०/१४५) पुरुषसूक्त को सर्वेश्वरवाद का स्थापक कहा जा सकता है। यह सूक्त अत्यन्त महनीय, गम्भीर तथा अन्यतम है। इसमें पुरुष के आध्यात्मिक स्वरूप का भव्य निदर्शन है। पुरुष के सम्बन्ध में सर्वाधिक विलक्षण बात तो यह है- पु॒रुष॑ ए॒वेदं सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भव्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥२॥ (ऋ० १०/९०/२) अर्थात् यह समस्त दृश्यमान वर्तमान विश्व पुरुष ही है। भूतकालीन तथा भविष्यकालीन विश्व भी पुरुष ही है और वह पुरुष देवों का या अमरत्व का स्वामी है, जो पुरुष अन्न अर्थात् प्राणियों के भोग्य पदार्थों के कारण बढ़ता है। यह वेदों में वर्णित सर्वेश्वरवाद का सिद्धान्त पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार आर्यों के प्रौढ़ तत्त्वचिन्तन का द्योतक है। ऋग्वेद में एक संसार के नियामक की कल्पना की गई है, जिसे सामान्यतया हिरण्यगर्भ, प्रजापति तथा पुरुष की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। इस सूक्त का द्रष्टाऋषि वस्तुतः निर्णय नहीं कर पाता कि किस देव का हवि से पूजन किया जाये। हिर॑ण्यग॒र्भः सम॑वर्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ आसीत्। स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ (ऋ० १०/१२१/१) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 122 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् परमात्मा का वह हिरण्यमयगर्भ रूप सर्वप्रथम अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से भी पूर्व उत्पन्न हुआ था। उत्पन्न होते ही वह समस्त प्राणिवर्ग का एकमात्र स्वामी हो गया। वह पृथ्वी तथा द्युलोक को धारण किये हुए हैं। हम हवि के द्वारा ऐसे किस देव का पूजन करें? उक्त समस्त सूक्तों में दर्शन प्राप्त होता है, किन्तु दर्शन की पराकाष्ठा की उपलब्धि नासदीय सूक्त में होती है। इसमें ऋषि इस संसरणशील विश्व के मूल पर विचार करता है और वहाँ न पहुँचकर न प्रकाश को पाता है और न अन्धकार की सत्ता का दर्शन करता है और न अभाव का। इस सूक्त का मन्त्रद्रष्टऋषि जगत् की प्रारम्भिक स्थिति का वर्णन करता हुआ कहता है— न मृत्यु॑रासीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒ अह॑ आसीत्प्रके॒तः। आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒ तदेकं॒ तस्मा॑द्धा॒न्यन्न परः किंच॒नास॑।। (ऋ० १०/१२९/२) अर्थात् "उस प्रलय काल में मृत्यु का अभाव था तथा अमृत का भी अभाव था। दिन का एवं रात्रि का ज्ञान भी नहीं था। वह ब्रह्मतत्त्व प्राण से युक्त, अपनी क्रिया से रहित तथा माया के साथ अविभाजित रूप में विद्यमान था। उस माया सहित ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं था और उससे परे भी कुछ नहीं था।" उपर्युक्त सूक्तों में निहित दर्शन स्वच्छ, विशद तथा स्पष्ट है। इसे समझना सुकर है, अधिक कठिन नहीं। ऋग्वेदीय प्रहेलिकाएँ :- ऋग्वेद के प्रथम मण्डलान्तर्गत १६४वें सूक्त में ऋग्वेदीय प्रहेलिकाओं के दर्शन होते हैं। इसके मन्त्रों में निगूढ़स्थित दर्शन का तो आभास लेना भी दुष्कर है। यह अस्यवामीय सूक्त कहकर पुकारा जाता है क्योंकि इस सूक्त का आरम्भ 'अस्य वामस्य पलितस्य होतुः' इन शब्दों के साथ होता हैं। ये रचनाएँ अधिकतर दुर्ज्ञेय तथा दुर्बोध्य हैं। यथा— स॒प्त यु॑ञ्जन्ति॒ रथ॒मेक॑चक्र॒मेको॒ अश्वो॑ वहति स॒प्तना॑मा। त्रि॒नाभि॑ च॒क्रम॒जर॒मन॑र्वं॒ यत्रेमा विश्वा॒ भुव॑नाधि॒ तस्थुः॑।। (ऋ० १/१६४/२) अर्थात् जहाँ एक समस्त कलाओं के भ्रमणार्थ जिसमें चक्कर है, उस विमानादि यान को सप्तनामों वाला एक अश्व तथा सात अश्व तथा अश्व के सात विभिन्न रूप CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

द्वितीय अध्याय 123 अथवा शीघ्रगामी वायु या अग्नि पहुँचाता है। अथवा जहाँ सात कलों के गृह युक्त होते हैं या जहाँ ये समस्त लोक लोकान्तर अधिष्ठित होते हैं, वहाँ प्राकृत प्रसिद्ध घोड़ों से रहित और जीर्णता से रहित तीन जिसमें बन्धन हैं, उस एक चक्कर को शिल्पी जन स्थापित करें। इसी प्रकार प्रहेलिकाओं के सम्भावित विभिन्न उत्तरों की अनेक परिकल्पनाएँ की गई है। कुछ ऋचाएँ ऐसी भी प्राप्त होती हैं जिनका अर्थ विंटरनिट्ज़ के मतानुसार कथमपि स्पष्ट हो जाय, यह असम्भव ही है। इस प्रकार की दुरूह ऋचाओं में से दो ऋचाएँ उदाहरण स्वरूप निम्नलिखित है— १. ति॒स्रो मा॒तॄंस्त्रीन्पि॒तॄन्बिभ्र॒देक॑ ऊ॒र्ध्वस्त॑स्थौ॒ नेमव॑ ग्लापयन्ति। मन्त्रय॑न्ते दि॒वो अ॒मुष्य॑ पृ॒ष्ठे वि॑श्व॒विदं॒ वाच॑मवि॒श्वमि॑न्वाम्॥ (ऋ० १/१६४/१०) २. द्यौर्मे॑ पि॒ता ज॑नि॒ता नाभि॒रत्र॒ बन्धु॑र्मे मा॒ता पृ॑थि॒वी म॒हीयम्। उ॒त्ता॒नयो॑श्च॒म्वो॒३र्योनि॑र॒न्तरत्रा॑ पि॒ता दु॑हि॒तुर्गर्भ॒माधा॑त्॥ (ऋ० १/१६४/३३) इसी प्रकार सारा सूक्त पहेलियों का पुलिन्दा है, अटकलों का भण्डार है, सम्भावनाओं की पिटारी है तथा परतम दर्शन का कूजा है। इन मन्त्रों की सर्वमान्य प्रामाणिक व्याख्या न हो पाई है तथा न ही आगे कभी होने की सम्भावना ही है। ये प्रहेलिकात्मक समस्याएँ पुरातन काल में अत्यधिक लोकप्रिय थी। इनका क्वचित् यज्ञादि के अवसर पर विधि के रूप में प्रयोग हुआ है। इस प्रकार की प्रहेलिकाएँ यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में भी उपलब्ध होती हैं किन्तु उन प्रहेलिकाओं में विषय तथा उद्देश्य का पार्थक्य स्पष्ट परिलक्षित होता है। धर्मरहित काव्य :- ऋग्वेद में धर्महीन काव्य अनेक स्थलों पर धार्मिक तथा याज्ञिक कविताओं के साथ मिल गया है किन्तु किसी-किसी सूक्त का प्रयोग आद्योपान्त धर्महीन विषय को लेकर ही हुआ है। इस प्रकार का एक सूक्त दशम मण्डल में उपलब्ध होता है। यह ३४वाँ सूक्त है, इसमें द्यूत की महिमा का गुणगान है। भोग, विलास तथा शक्ति के उदय में जुआँ पनप उठता है। इस सूक्त में जुएँ का फड़कता चित्रण है। इन ऋचाओं में स्वाभाविकता की मार्मिक अभिव्यंजना है, भावों की कलात्मकता का निखार है। इस सूक्त का संक्षिप्त विषय इस प्रकार है—

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 124 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता जुआरी जुएँ के दाँव पर अपनी पत्नी तक को रखकर दाँव हार जाता है। अतः वह जुएँ के नशे में अन्धा होकर बच्चों की प्रिय, मित्रार्थ, कल्याणकारी तथा स्वयं के लिये शरणदाता पत्नी को घर से निकाल देता है। हारे हुए जुआरी का कोई भी साथ नहीं देता। सास उसे तिरस्कृत कर देती है तथा पुत्री बहिष्कृत कर देती है। उसे कोई भिक्षा भी नहीं देता। जुए में हार जाने पर अन्य लोग उसकी पत्नी का उपभोग करते हैं। माता-पिता, भगिनी-भ्राता उसे अपना रक्त स्वीकार नहीं करते। वह जुएँ न खेलने का निश्चय करता है, किन्तु मित्रगण व्यङ्ग्य बाणों का प्रहार करते हैं। वस्तुतः पासों में विचित्र आकर्षण है। न चाहने पर भी जुआरी इनके समीप पहुँच जाता है। ये अत्यन्त बलवान् हैं। राजा तथा रंक समान रूप से इनके वशीभूत हैं। ये गिरते तो नीचे हैं परन्तु फुदकते ऊपर हैं। ये अंगारों के सदृश है, अतः शीतल होते हुए भी हृदय को विदग्ध करते हैं। जुआरी की पत्नी पीड़ित होकर सोती रहती है। माता बेबस रहती है, ऐस परिस्थिति में जुआरी ऋण हेतु दूसरों के समाने हाथ फैलाता है। दूसरों की सजी- धजी पत्नियों तथा घर की शोभा को देखकर जुआरी को ग्लानि तथा ईर्ष्या होती है। अन्ततः द्यूतकार निम्नलिखित मन्त्र में अपनी मुक्ति हेतु अक्ष की प्रार्थना करता है तथा सविता के आज्ञानुसार द्यूत-त्याग की कामना करता है— अ॒क्षैर्मा दीव्यः॑ कृ॒षिमित्कृ॑षस्व वि॒त्ते र॑मस्व ब॒हु मन्य॑मानः। तत्र॒ गावः॑ कितव॒ तत्र॑ जा॒या तन्मे॒ वि च॑ष्टे सवि॒तायम॒र्यः॥१३॥ (ऋ० १०/३४/१३) अर्थात् हे कितव! तू पासों से मत खेल, अपितु खेती का काम किया कर, परिश्रम से भूमि में कृषि कर तथा उसी को अत्यधिक समझता हुआ प्राप्त सम्पत्ति में आन्दोपलब्धि कर। हे कितव! उसी कार्य में तेरी गौएँ तथा पत्नी को गृहसुख प्राप्त होता है। यह सबका प्रेरक जगदीश मुझ उपासक को उसी का उपदेश करने को कहता है। अभिचार विधान :- कतिपय वैवाहिक आशीर्वादात्मक वचन अभिचार-विधानों में ग्रन्थित हैं। इन अभिचार सम्बन्धी मन्त्रों में भावी पति को हानि पहुँचाने वाले तथा भूतापसारक विधियों द्वारा भूतों से नव-वधू की रक्षा करने वाले नुस्खों का विवेचन है। समग्र ऋग्वेद में लगभग तीस अभिचार सूक्त प्राप्त होते हैं। इन अभिचार सम्बन्धी मन्त्रों में व्याधियों के उपशमनाथं, गर्भ रक्षार्थ, कुदृष्टियों, अपशकुनों तथा दुःस्वप्नों के प्रभाव के समाप्ति हेतु, शत्रुओं के विनाशार्थ विधियों तथा प्रार्थनाओं का संग्रह है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 125 निम्नलिखित मन्त्र में पति को पुरुषत्व-सम्पन्न तथा उत्तम सन्तान को उत्पन्न करने में समर्थ होने के लिए कामना की गई है- इ॒मां त्वमि॑न्द्र मीढ्वः सु॒पुत्रां सु॒भगां॑ कृणु। दशा॑स्यां पु॒त्राना धे॑हि॒ पति॑मेकाद॒शं कृ॑धि॥४५॥ (ऋ० १०/८५/४५) अर्थात् हे ऐश्वर्य एवं धन सम्पन्न पति! तू वीर्य सिंचन में पूर्ण समर्थ हो। अतः इस स्त्री को धन से सौभाग्यवती तथा वीर्य से उत्तम सन्तान वाली कर। इसमें दस पुत्रों को धारण करा। ग्यारहवाँ पति इन सबको सकुशल रखे, हे भगवन्, तुमसे यही विनती है। ऋग्वेद के सप्तम मण्डल का १०३वाँ सूक्त मण्डूकों के वर्णन से युक्त है, जिसमें मण्डूकों तथा ब्रह्म में साम्य प्रदर्शित किया गया है। वर्षा ऋतु में मण्डूक भी अपनी ऐश्वर्य वृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं- गोमा॑यु॒रदा॑द॒जमा॑यु॒रदा॒त्पृश्नि॑रदा॒द्धरि॑तो॒ नो॒ वसू॑नि। गवां॑ म॒ण्डूका॒ दद॑तः श॒तानि॑ सहस्रसा॒वे प्र ति॑रन्त॒ आयु॑:॥ (ऋ० ७/१०३/१०) अर्थात् रम्य शब्दों वाले वर्षाकालोद्भव जन्तु तथा प्रकृत्यनुसारी शब्दों वाले, विचित्र वर्णों वाले, हारतवां वाले- ये सभी अपनी रचना से हमको शिक्षा दें। अपनी शिक्षा से विद्यारूपी चमत्कार की वृद्धि करने वाले सैकड़ों प्रकार की शिक्षा हमको दें और परमात्मा ऐश्वर्य तथा आयु की वृद्धि करें और सहस्रसाव (जिसमें अनन्त प्रकार की औषधियाँ होती हैं), वह वर्षाकाल में परमात्मा हमको उपर्युक्त प्रकार के प्राणधारियों से अनन्त प्रकार का शिक्षा लाभ कराएँ तथा हमारे ऐश्वर्य तथा आयु की वृद्धि करें। उपर्युक्त ऐश्वर्यवृद्धि के निमित्त की गई प्रार्थना का भाव अत्यन्त मार्मिक तथा स्पष्ट है। यज्ञ संस्था :- आर्य संस्कृति में यज्ञ की प्रधानता है। वेद इस जगत् के मूल में यज्ञ की भावना को स्वीकार करते हैं। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त से ज्ञात होता है कि उसके रचनाकाल तक यज्ञ संस्था पूर्णरूपेण विकसित हो चुकी थी। प्रजापति ही इस विश्वरूपी यज्ञ का याजक, होता, अध्वर्यु तथा पुरोहित है। यही नहीं, इस यज्ञ में उसने स्वयं को भी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

126 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

स्वाहा करके अपने शरीर के विभिन्न अंगों से विराट् सर्ग की रचना की है— तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः संभृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शून्ताँश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्यान् ग्राम्याश्च॒ ये।। (ऋ० १०/९०/८) अर्थात् जिस यज्ञ में समस्त या सबका आत्मरूपपुरुष स्वाहा कर दिया जाता है, इस प्रकार उस यज्ञ से दही से युक्त घी उत्पन्न हुआ तथा उसने वायु या अन्तरिक्ष में भ्रमणशील पशु अर्थात् पक्षी, वनों में निवास करने वाले हिरणादि पशु एवं जो ग्राम निवासी अश्व, गौ आदि पशु हैं, वे भी बनाए गए। वेद के अनुसार– इमं यज्ञं वित्तं विश्वकर्मणा। तथा स्विष्टिंनस्तां कृण्वद्विश्वकर्मा। अर्थात् विश्वकर्मा ही इस यज्ञ का विस्तारक है। वही हमारी दुरिष्टियों को स्विष्टियों में परिवर्तित कर सकता है। शारीरिक यज्ञ में मन–यजमान, चक्षु–होता, प्राण–उद्गाता, श्रवण–अध्वर्यु तथा वाणी–ब्रह्मा है। इन सभी में आग्नेय तत्त्व विद्यमान है। यज्ञ में आग्नेयता का प्राधान्य है। जहाँ अग्नि नहीं है, वहाँ यज्ञ भी सम्भव नहीं है। अग्नि तथा यज्ञ का अविनाभाव सम्बन्ध है। अग्नि नहीं है, तो दिव्यता भी सम्भव नहीं। देवत्व अग्नि पर आश्रित है। इस प्रकार विश्व में व शरीर में सदैव यज्ञ चलता रहता है। ऋग्वेद काल में यज्ञ को सर्वोच्च महत्ता प्रतिपादित हुई है। जाति-प्रथा : ऋग्वेद में पुरुषसूक्त को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी जाति-प्रथा का विवेचन उपलब्ध नहीं होता। इस सूक्त में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र, इन चारों वर्णों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। यद्यपि यह सूक्त परवर्ती रचना स्वीकार किया जाता है, इसमें चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति का इस प्रकार उल्लेख हुआ है— ब्राह्म॒णो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद् बा॒हू रा॑ज॒न्यः॑ कृ॒तः। ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्यः॑ प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत।।१२।। (ऋ० १०/९०/१२) अर्थात् इस पुरुष का मुख ब्राह्मण हुआ अर्थात् इसके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए। भुजाओं को क्षत्रिय बनाया गया अथवा क्षत्रिय इसकी भुजाओं से उत्पन्न हुए। इसकी जाँघें वैश्य बने अर्थात् जाँघों से वैश्यों की उत्पत्ति हुई तथा इसके चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 127 वस्तुतः प्रत्येक मनुष्य चारों वर्णों से युक्त होता है। यह शौच काल में शूद्र, स्नानान्तर अध्ययन काल में ब्राह्मण, पीड़ितों के रक्षा काल में क्षत्रिय तथा कृषिकर्म काल में वैश्य होता है। अतः एक ही मनुष्य पृथक् कालों में पृथक्-पृथक् वर्ण वाला होता है। वैदिक काल में जातियों का विभाजन अत्यन्त वैज्ञानिक तथा उत्कृष्ट स्वीकार किया गया था किन्तु वर्तमान काल में यह सामाजिक कुष्ठ रोग का रूप धारण कर चुका है। ऋग्वेद-काल में मानवीय चरित्र : अनेक ऋग्वेदीय मन्त्रों से स्पष्ट है कि उस काल में मनुष्य का विकास क्रम सांस्कृतिक था। आर्य जाति ने मानव के आध्यात्मिक निर्माणार्थ जिन संस्कारों की कल्पना की, उनकी आधारशिला अतीव सुदृढ़ एवं गहरी है। संस्कार जन्मोपरान्त नहीं, अपितु उसके बहुत पहले से ही आरम्भ हो जाते हैं। इस प्रकार के संस्कारों की कुल संख्या १६ है, वे हैं- (१) गर्भाधान, (२) पुंसवन, (३) सीमन्तोन्नयन, (४) जातकर्म, (५) नामकरण, (६) निष्क्रमण, (७) अन्नप्राशन, (८) चूड़ाकर्म (९) कर्ण वेध, (१०) उपनयन, (११) वेदारम्भ, (१२) समावर्तन, (१३) विवाह, (१४) वानप्रस्थ, (१५) सन्यास आश्रम (१६) अन्त्येष्टि। ऋग्वैदिककाल में योग के अष्टाङ्गमार्ग का वेदज्ञ तथा सामान्यजन भी परिपालन करते थे। ये आठ मार्ग हैं- (१) यम, (२) नियम, (३) आसन, (४) प्राणायाम, (५) धारणा (६) प्रत्याहार (७) ध्यान, (८) समाधि। यम में वर्णित अस्तेय के पालन का आदेश ऋग्वेद के निम्नलिखित मंत्र में देखा जा सकता है- यो॒ नो॒ रसं॑ दिप्स॑ति पि॒त्वो अ॒ग्ने यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ यस्त॒नूना॑म्। रि॒पुः स्ते॒नः स्ते॒य॒कृद्द्भ्र॒मैतु॒ नि ष ही॑यतां त॒न्वा३॒ तना॑ च।। (ऋ० ७/१०४/१०) अर्थात् तेजः स्वरूप परमात्मा ! जो राक्षस हमारे अन्न के रस को विनष्ट करना चाहता है तथा जो घोड़ों के और जो गायों के एवं जो हमारे शरीर के रस अर्थात् बल को नष्ट करना चाहता है, वह अहिताभिलाषी चोर तथा छिपकर वार करने वाला नाश को प्राप्त हो और वह दुष्ट अपने शरीर से तथा दुष्कर्मी सन्तानों से नष्ट हो जाये। पाश्चात्य विद्वान् विन्टरनिट्ज के अनुसार प्राचीन भारतीय-समाज अत्यन्त उद्दण्ड तथा चरित्रहीन था। उनका कथन है कि 'हम किसी भी प्रकार प्राचीन भारतवर्ष की चारित्रिक दशा के लिए कोई अत्यन्त उज्ज्वल धारणा नहीं बना सकते क्योंकि हमें ऋग्वेद के सूक्तों में व्यभिचार, अगम्य-गमन, सतीत्व-नाश, वैवाहिक विश्वास, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 128 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गर्भपात करने की प्रवृत्ति, प्रतारणा, छल-छिद्र, कपट, चोरी और डकैती के प्रमाण उपलब्ध होते हैं। तथापि ये सब वस्तुएँ ऋग्वेद की परम प्राचीनता के सम्बन्ध में कुछ विरोध नहीं करती। ऋग्वेद में मनोविज्ञान तथा परामनोविज्ञान- ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में मनोविज्ञान का स्पष्ट अंकुरण दृष्टव्य है। ऋ० (१०/५३/६) मनुर्भव, मननशील बनने का आदेश देता है। कतिपय मन्त्रों में मन को भद्र बनाने की प्रेरणा दी गई है। यथा- भद्रं नो अपि॑ वातय॒ मनो॒ दक्ष॑मु॒त क्रतु॑म्। अधा॑ ते स॒ख्ये अन्ध॑सो॒ वि वो॒ मदे॒ रण्गावो॒ न यव॑से विव॑क्षसे ।।१।। (ऋ० १०/२५/१) अर्थात् हे परमात्मा, हमें कल्याणकारी मन प्रदान करो। सुखदायी बल तथा कर्म सामर्थ्य, ये दो जिस प्रकार पशुगण चारे की इच्छा करते हुए, उसे पाकर हर्षित होते हैं, उसी प्रकार जीवगण तेरे मित्रभाव में रहकर विभिन्न प्रकार से अन्न तथा कर्मफल प्राप्त कर आनन्द प्राप्त करते हैं। हे मनुष्यों! वह महान् परमात्मा आपके समस्त आनन्द का दाता है। भद्रं मन॑ः कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये येना॑ स॒मत्सु॑ सास॒हः। अव॑ स्थि॒रा त॑नुहि॒ भूरि॑ शर्धतां॒ वने॑मां ते अ॒भिष्टि॑भिः।। (ऋ० ८/१९/२०) अर्थात् हे सर्वगत प्रभु ! महायुद्ध में भी हमारे मन को मङ्गल सम्पन्न करो, जिस मन से विश्व में आप सभी विघ्नों को शान्त करते हैं। हे परमेश्वर ! महादुष्ट व जगत् के कण्टकजनों के सुदृढ़ अनेक नगर हो तो भी उन्हें भूमि में मिला दे, जिससे हम उपासक आपके द्वारा प्रदत्त अभिलषित मनोरथों से सम्पन्न हों। ऋग्वेद की ऋचा (६/९/६) तथा (८/२२/१६) में मन के वेग का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार अनेक ऋग्वेदीय ऋचाओं में परामनोविज्ञान के भी दर्शन होते हैं। यथा— (४/२/१), (८/६८/६), (१०/८२/५)। इस प्रकार ऋग्वेद मनोविज्ञान तथा परामनोविज्ञान की बहुमूल्य सामग्री प्रदान कर रहा है। ऋग्वेद में काव्य सौन्दर्य- ऋग्वेद में केवल आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषयों का ही विवेचन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 129 नहीं हुआ है अपितु इसमें काव्यकला के कमनीय उपकरणों से ग्रथित, प्रमुख अलंकारों, व्यञ्जनाओं तथा ध्वनियों से अनुप्राणित परिनिष्ठित गीतों का संयोजन भी है। ऋग्वेद में हमें विविध काव्यकलाकलित ललितभावों के दर्शन होते हैं जो कि सहृदयों को आनन्द से आप्यायित कर देने में पूर्ण सक्षम हैं। जिस प्रसङ्ग में काव्यात्मक विधा प्रस्तुत की गई है वहाँ पूर्ण ललितकला संयोजित कर दी गई है। कोमलकान्तपदावली, सरस रक्त विलास, मधुरमाधुर्यलास, प्रसादगुण की प्रसन्नता सहृदयों के हृदयों को सहसा ही आकृष्ट कर लेती है। आचार्य बलदेव उपाध्याय जी का इस सम्बन्ध में कथन है— “उनके रूपों का भव्यवर्णन कवि की कला का विलास है, तो उनके भीतर सुकुमार प्रार्थना के अवसर पर कोमल भावों, हार्दिक भावनाओं की रुचिर अभिव्यञ्जना है। उषा विषयक मन्त्रों में सौन्दर्याधिक्य है, तो इन्द्र विषयक मन्त्रों में तेजस्विता का प्राचुर्य है। अग्नि के रूपवर्णन में स्वभावोक्ति का आश्रय है, तो वरुण की स्तुति के मन्त्रों में हृदयगत कोमलभावों की मधुर अभिव्यक्ति है। इस प्रकार वेद के मन्त्रों में काव्यगत गुणों का पर्याप्त दर्शन होना काव्य जगत् की कोई आकस्मिक घटना नहीं है। तन्मयता तथा अनन्यता का यह विशद् परिचायक चिह्न है— भावों की सरल सहज अभिव्यक्ति निःसन्देह वेदों में इसका विशाल साम्राज्य है।” ऋग्वेद में काव्य गुणों के कतिपय विशेषताओं का विवेचन प्रस्तुत है— रस-संयोजन- ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर शृङ्गार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है। देवी उषा का वर्णन एक मानवी सुन्दरी के रूप में इस प्रकार किया गया है— कन्ये॑व त॒न्वा॒३॑ शाश॑दानाँ॒ एषि॑ देवि देव॒मिय॑क्षमाणम्। संस्मय॑माना यु॒वतिः पु॒रस्ता॑दा॒विर्वक्षां॑सि कृणुषे वि॒भाती॑॥ अर्थात् हे प्रकाशवती उषा! तुम कमनीय कन्या की तरह अत्यन्त आकर्षणमयी बनकर अभीष्टफलदाता सूर्य के समीप जाती हो तथा उनके समक्षस्मितवदना युवती की तरह अपने वक्ष को आवरण रहित करती हो। एक अन्य काव्यसौन्दर्यपित उद्धरण का आनन्द लीजिये— अधि॒ पेशां॑सि वपते नृ॒तूरि॒वापो॑र्णुते॒ वक्ष॑ उ॒स्रेव॑ ब॒र्जह॑म्। ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृण्व॒ती गावो॒ न व्र॒जं व्यु॑षा आ॑र्व॒तमः॑॥४॥ (ऋ० १/९२/४) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 130 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् नर्तकी के सदृश मोहक परिधान में सुसज्जित उषा अपने वक्षस्थल को खोल रही है, ऐसे जैसे एक गरड़े रड़ की गाय दोहनकला में अपने स्तन को। जिस प्रकार गायें शीघ्र ही वज्र की ओर प्रस्थान करती है, उसी प्रकार उषा भी पूर्व दिशा में जाकर अखिल विश्व को अपनी ज्योति से आलोकित कर देती है। एक ही मन्त्र में शृङ्गार के समस्त उपकरणः पेशल मञ्जुल नर्तकी की झिलमिलाती बोली, कनकावदात ऊँचा नीचा अनार भरा वक्षस्थल, फिर प्रेक्षक जगत् की ओर उसकी हास्य वृष्टि, फिर अन्धकार तथा प्रकाश की आँखमिचौली, कितना मोहक वर्णन है ? इसी प्रकार हमें क्वचित् मन्त्रों में वीर रस के दर्शन होते हैं। इन्द्र की स्तुतियों में वीररस की पूर्णता दर्शनीय है। यथा- यस्मान्न॒ ऋते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते। यो विश्व॑स्य प्रतिमानं॑ ब॒भूव॒ यो अं॒च्यु॒तच्युत्स जना॑स॒ इन्द्र॑ः॥ अर्थात् जिन इन्द्र देवता की कृपा के बिना मनुष्य विजय नहीं प्राप्त कर सकता है। योद्धा लोग अपनी सुरक्षा के लिए जिसका आह्वान करते हैं, जो विश्व में सर्वश्रेष्ठ है, वह अवयवों को भी व्यक्त कर देने वाला है। ऋग्वेद के सोम-सूर्या, यम-यमी, पुरुरवा-उर्वशी आदि के सूक्तों में हमें शृङ्गार रस की व्यञ्जना के दर्शन होते हैं। पुरुरवा-उर्वशी के प्रणयप्रसङ्ग में पुरुरवा की उक्तियों से विप्रलम्भ शृङ्गार अभिव्यक्त होता है। यथा- इषु॒र्न श्रिय॑ इषुधे॒रस॒ना गो॒षाः श॑त॒सा न रंहि॑ः। अवी॑रे॒ क्रतौ॒ वि द॑विद्युतन्नो॒रा न मा॒युं चि॑तयन्त॒ धुन॑यः॥३॥ (ऋ० १०/९५/३) अर्थात् तरकस से तीर समान सेनापति राज्यलक्ष्मी के लिए शत्रु दल पर आ गिरे। वह भूमि का भोक्ता या दाता तथा सैकड़ों सुखों का प्रदाता तथा वेगवान हो। वीरों रहित युद्ध कार्यों में वह नहीं चमकता तथा महान् अन्तरिक्ष के तुल्य विस्तृत रणाङ्गण में शत्रुओं को कँपा देने वाले वीर सेनाजन वायुओं के तुल्य गर्जन करें तथा सेनाएँ सेनापति शब्द को समझें। इसी प्रकार कहीं कहीं हास्य रस को भी प्रस्तुत किया गया है। मण्डूक सूक्त में मण्डूकों की तुलना ब्राह्मणों से की गई है। वे टर्र-टर्र द्वारा पारस्परिक अभिनन्दन करते हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 131 यदे॑षाम॒न्यो अ॒न्यस्य॒ वाचं॒ शाक्त॒स्ये॑व॒ वद॑ति॒ शिक्ष॑माणः। सर्वं॒ तदे॑षां स॒मृधे॑व॒पर्व॒ यत्सु॒वाचो॒ वद॑थनाध्य॒प्सु।। (ऋ० ७/१०३/५) अर्थात् जो कि एक शिक्षा प्राप्त करने वाला जलीय जन्तु शक्तिमान् अर्थात् शिक्षा को प्राप्त हुए की तरह अन्य जल जन्तु से शब्द को सीख लेता है, वैसे ही तब, इन शब्दों को सम्पूर्ण अविकल अङ्गों वाले होकर जलों के मध्य में जो सुन्दर वाणी है उसको बोलो। अलंकार विधान- ऋग्वेद में हमें अलङ्कारों का सुन्दर प्रयोग मिलता है। ऋषि कवियों ने प्रमुख रूप से सादृश्यमूलक उपमा एवं रूपक अलङ्कार का प्रयोग किया है। उदाहरणार्थ उपमा अलङ्कार से युक्त मन्त्र प्रस्तुत है- अ॒भ्रा॒तेव॑ पुं॒स ए॑ति प्रती॒ची ग॑र्तारु॒गिव॒ सन॑ये॒ धना॑नाम्। जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑ उ॒षा ह॒स्रेव॒ नि रि॑णीते॒ अप्स॑ः।। अर्थात् भ्रातृरहित स्त्री जिस प्रकार पिता आदि के समक्ष गमन करती है। गर्तभर्तका जिस प्रकार धन प्राप्ति के लिये घर आती है। उसी प्रकार उषा भी वैसा ही करती है। जिस प्रकार पत्नी पति की अभिलाषिणी होकर सुन्दर वस्त्रों को पहनकर हास्य के द्वारा अपनी दन्तावली प्रकाशित करती है उसी प्रकार उषा भी व्यवहार करती है। उपमा का एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है- परा॒ हि मे॒ विम॑न्यवः॒ पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये। वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑।। अर्थात् जिस प्रकार चिड़िया अपने घोसलों की ओर दौड़ती है, उसी प्रकार हमारी क्रोध से रहित चिन्ताएँ भी धन को प्राप्त करने के लिए दौड़ रही हैं। राहुल जी ने गृत्समद के एक सूक्त (२/३६/१०८) की प्रत्येक पंक्ति में उपमा बतलाते हुए इस प्रकार लिखा है- 'अश्विद्वय पत्थर की तरह....... शत्रु को बाधा दो, गिद्ध की तरह निधियुक्त वृक्ष को प्राप्त करो। ब्रह्मा की तरह यज्ञ में उक्थ गाने वाले हो, दूत की तरह बहुतों के लिए पुकारने के लिए पुकारने लायक हो।' 'इस सूक्त में और उपमाएँ दी गई हैं। रथी, अजा, स्त्री, दम्पति, सींग, शफ, चक्रवाक, नाव, युग, नाभि, उपधि, प्रदि, खान, खल, वर्ग, बात, नदी, नदय, पाद, ओष्ठ, स्तन, नासा, कर्ण, पृथ्वी, शान, तलवार, सात त्रिष्टुप ऋचाओं के भीतर इतनी उपमाएँ दी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

132 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गई हैं और सबके साथ, इव का प्रयोग है। (१) विश्वामित्र ने अपने सुन्दर काव्य नदीसूक्त (३/३५) में व्यास और सतलज की उपमाएँ वस्तुओं से दी हैं— अश्व, गौ, रथी, वत्स, योषा (माँ) तथा मर्य (पति)।' न के साथ भी उपमा ऋग्वेद में आती है जिसका प्रयोग पीछे नहीं होता। इसी प्रकार ऋग्वेदीय उपमा के सम्बन्ध में आचार्य बलदेव उपाध्याय जी का कहना है— ‘‘अलंकारों की रानी उपमा देवी का नितान्त भव्य, मनोरम तथा हृदयावर्जक रूप इन मन्त्रों में देखने को मिलता है। तथ्य तो यह है कि उपमा का काव्य संसार में प्रथम अवतार उतना ही प्राचीन है जितना स्वयं कविता का आविर्भाव। आनन्द से सिक्त हृदय कवि की वाणी उपमा के द्वारा अपने को विभूषित करने में कोमल उल्लास तथा मधुमय आनन्द का बोध करती है।’’ च॒त्वारि॒ शृङ्गा॒ त्रयो॑ अस्य॒ पादा॒ द्वे शीर्षे स॒प्त हस्ता॑सो अस्य। त्रिर्धा ब॒द्धो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति म॒हो दे॒वो मर्त्याँ आ वि॑वेश।। (ऋ० ४/५८/३) अर्थात् हे मानवों! जो बड़ा सेव्य तथा सम्माननीय स्वप्रकाशस्वरूप तथा सर्वसुखप्रदाता मरणधर्मा मनुष्यादि को सब प्रकार से व्याप्त होता है तथा जो सुखवर्षक तीन— श्रद्धा, पुरुषार्थ एवं योगाभ्यास से बद्ध निरन्तर उपदेयता है, इस धर्म से युक्त नित्य और नैमित्तिक परमेश्वर के बोध के दो— उन्नति और मोक्ष रूप शिरस्थापन्न तीन (कर्म, उपासना तथा ज्ञान रूप) चलने योग्य चरण तथा चार वेद शृंगों के समान आप लोगों द्वारा ज्ञातव्य है और इस धर्म व्यवहार के पञ्च ज्ञानेन्द्रियों या पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, मन व आत्मा ये सात हाथों के समान वर्तमान है तथा उक्त प्रकार से बद्ध व्यवहार भी ज्ञातव्य है। रूपक-व्यतिरेक अलङ्कारयुक्त मन्त्र भी कितना सहज है— द्वा सु॑प॒र्णा स॒युजा॒ सखा॑या समा॒नं वृ॒क्षं परि॑ षस्वजाते। तयो॑र॒न्यः पिप्प॑लं स्वा॒द्वत्त्यन॑श्नन्न॒न्यो अ॒भि चा॑कशीति।। (ऋ० १/१६४/२०) अर्थात् हे मानवों! जो सुन्दर पंखों वाले, समान सम्बन्ध रखने वाले, मित्र तुल्य वर्तमान-पखेरू एक जो काटा जाता इस वृक्ष का आश्रय ग्रहण करते हैं, उनमें से एक उस पेड़ के परिपक्व फल रसावादुपन से भक्षण करता है तथा अन्य न भक्षण करता हुआ सभी ओर देखता है।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar