वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितरं प्राह देवेन्द्रः स मातृदोषतो विभो।<br>कृन्तनं प्राप्तवान् गर्भो यदशौचा हि साभवत् ॥ ७<br>ततोऽब्रवीत् कश्यपस्तु मातृदोषः स दासताम्।<br>गतस्ततो विनिहतो दासोऽपि कुलिशेन भो ॥ ८<br>तच्छ्रुत्वा कश्यपवचः प्राह शक्रः पितामहम्।<br>विनाशं पाप्मनो ब्रूहि प्रायश्चित्तं विभो मम ॥ ९<br>ब्रह्मा प्रोवाच देवेशं वसिष्ठः कश्यपस्तथा।<br>हितं सर्वस्य जगतः शक्रस्यापि विशेषतः ॥ १०<br>शङ्खचक्रगदापाणिर्माधवः पुरुषोत्तमः।<br>तं प्रपद्यस्व शरणं स ते श्रेयो विधास्यति ॥ ११<br>सहस्राक्षोऽपि वचनं गुरूणां स निशम्य वै।<br>प्रोवाच स्वल्पकालेन कस्मिन् प्राप्यो बहूदयः।<br>तमूचुर्देवता मर्त्ये स्वल्पकाले महोदयः ॥ १२ | इन्द्रने अपने पिता कश्यपसे कहा—विभो! जननीके दोषसे वह गर्भ छिन्न हुआ था; क्योंकि वे अपवित्र हो गयी थीं। उसके बाद कश्यपने कहा—माताके दोषसे वह दासताको प्राप्त हो चुका था, उसके बाद तुमने दासको भी वज्रसे मारा। कश्यपके उस वचनको सुनकर इन्द्रने पितामहसे कहा—विभो! मुझे पापका नाश करनेवाला प्रायश्चित्त बतला दीजिये। ब्रह्मा, वसिष्ठ एवं कश्यपने देवेश (इन्द्र)-से सब जगत्के लिये—विशेषरूपसे इन्द्रके लिये हितकारी वचन कहा—तुम शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमभगवान् लक्ष्मीपति श्रीविष्णुकी शरणमें जाओ। वे तुम्हारा कल्याण करेंगे। उन सहस्राक्षने गुरुजनोंका वचन सुनकर कहा—थोड़े समयमें अधिक-से-अधिक उन्नतिकी प्राप्ति कहाँ सम्भव है? देवोंने उनसे कहा—स्वल्प समयमें महती उन्नति मर्त्यलोकमें सम्भव है॥ ७-१२॥ |
| इत्येवमुक्तः सुरराड् विरिञ्चिना<br>मरीचिपुत्रेण च कश्यपेन।<br>तथैव मित्रावरुणात्मजेन<br>वेगान्महीपृष्ठमवाप्य तस्थौ ॥ १३<br>कालिञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्य-<br>स्तथा हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः।<br>कुशस्थलात् पूर्वत एव विश्रुतो<br>वसोः पुरात् पश्चिमतौऽवतस्थे ॥ १४<br>पूर्वं गयेन नृवरेण यत्र<br>यज्ञोऽश्वमेधः शतकृत्सदक्षिणः।<br>मनुष्यमेधः शतकृत्सहस्रकृन्<br>नरेन्द्रसूनुश्च सहस्रकृद् वै ॥ १५<br>तथा पुरा दुर्जयतः सुरासुरैः<br>ख्यातो महामेध इति प्रसिद्धः।<br>यत्रास्य चक्रे भगवान् मुरारिः<br>वास्तव्यमव्यक्ततनुः खमूर्तिमत्।<br>ख्यातिं जगामाथ गदाधरेति<br>महाघवृक्षस्य शितः कुठारः ॥ १६ | ब्रह्मा, मरीचिपुत्र कश्यप एवं वसिष्ठके ऐसा कहनेपर सुरराज इन्द्र तेजीसे पृथ्वीतलपर आ गये। वे कालिञ्जर पर्वतके उत्तर, हिमाद्रिके दक्षिण, कुशस्थलके पूर्व एवं वसुपुरके पश्चिममें स्थित विख्यात पुण्य स्थानमें रहने लगे—जहाँ पहले राजा गयने दक्षिणाके साथ सौ अश्वमेधयज्ञ, ग्यारह सौ नरमेधयज्ञ तथा एक हजार राजसूययज्ञका अनुष्ठान किया था। उसी प्रकार पहले (उसने) जहाँपर सुरों एवं असुरोंसे कठिनाईसे किया जा सकनेवाला महामेध नामक प्रसिद्ध यज्ञ अनुष्ठित किया था और उसके लिये जहाँ आकाशस्वरूप अव्यक्तशरीरी मुरारि (विष्णु)-ने वहाँ निवास किया था। इसके बाद वे गदाधर नामसे प्रसिद्ध हुए, जो महान् अघरूपी वृक्षके लिये तीक्ष्ण कुठारस्वरूप हैं॥ १३-१६॥ |
| यस्मिन् द्विजेन्द्राः श्रुतिशास्त्रवर्जिताः<br>समत्वमायान्ति पितामहेन।<br>सकृत् पितॄन् यत्र च सम्प्रपूज्य<br>भक्त्या त्वनन्येन हि चेतसैव।<br>फलं महामेधमखस्य मानवा<br>लभन्त्यनन्त्यं भगवत्प्रसादात् ॥ १७<br>महानदी यत्र सुरर्षिकन्या<br>जलापदेशाद्धिमशैलमेत्य । | जहाँ वेद-शास्त्रसे रहित होनेपर भी कुलीन श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्माकी समानता प्राप्त करते हैं एवं मनोयोगसे भक्तिसहित मनुष्य एक बार भी पितरोंका पूजन करके भगवान्के अनुग्रहसे महामेध नामक यज्ञका अनन्त फल प्राप्त कर लेते हैं, वहाँ देवर्षिकी कन्या श्रेष्ठ महानदी है, जो जलरूपसे हिमालयपर प्रवहमान होकर अपने दर्शन, |
| ३७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७६ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| चक्रे जगत्पापविनष्टिमग्र्यां<br>संदर्शनप्राशनमज्जनेन ॥ १८ | पान एवं मज्जन करनेसे जगत्के पापोंको विनष्ट करती है। |
| तत्र शक्रः समभ्येत्य महानद्यास्तटेऽद्भुते।<br>आराधनाय देवस्य कृत्वाश्रममवस्थितः ॥ १९<br>प्रातःस्नायी त्वधःशायी एकभुक्तस्त्वयाचितः।<br>तपस्तेपे सहस्राक्षः स्तुवन् देवं गदाधरम् ॥ २०<br>तस्यैवं तप्यतः सम्यग्जितसर्वेन्द्रियस्य हि।<br>कामक्रोधविहीनस्य साग्रः संवत्सरो गतः ॥ २१<br>ततो गदाधरः प्रीतो वासवं प्राह नारद।<br>गच्छ प्रीतोऽस्मि भवतो मुक्तपापोऽसि साम्प्रतम् ॥ २२ | विष्णुकी आराधना करनेके लिये इन्द्र वहाँ महानदीके विचित्र तटपर गये और आश्रम बनाकर रहने लगे। वे प्रातःकाल स्नान, भूमिपर शयन एवं बिना माँगे मिले हुए पदार्थसे एक समय भोजन करते हुए गदाधारी देवकी स्तुति करते हुए तपस्या करने लगे। सर्वथा जितेन्द्रिय एवं काम-क्रोधादिसे रहित होकर इस प्रकार तपस्या करते हुए उनका एक वर्ष बीत गया। नारदजी! उसके बाद गदा धारण करनेवाले विष्णुने प्रसन्न होकर इन्द्रसे कहा—जाओ, मैं प्रसन्न हूँ; अब तुम पापसे मुक्त हो गये हो ॥ १७–२२ ॥ |
| निजं राज्यं च देवेश प्राप्स्यसे नचिरादिव।<br>यतिष्यामि तथा शक्र भावि श्रेयो यथा तव ॥ २३<br>इत्येवमुक्तोऽथ गदाधरेण<br>विसर्जितः स्नाप्य मनोहरायाम्।<br>स्नातस्य देवस्य तदैनसो नरा-<br>स्तं प्रोचुरस्माननुशासयस्व ॥ २४<br>प्रोवाच तान् भीषणकर्मकारान्<br>नाम्ना पुलिन्दान् मम पापसम्भवाः।<br>वसध्वमेवान्तरमद्रिमुख्ययो-<br>र्हिमाद्रिकालिञ्जरयोः पुलिन्दाः ॥ २५<br>इत्येवमुक्त्वा सुरराट् पुलिन्दान्<br>विमुक्तपापोऽमरसिद्धयक्षैः।<br>सम्पूज्यमानोऽनुजगाम चाश्रमं<br>मातुस्तदा धर्मनिवासमीड्यम् ॥ २६ | देवेश! (अब) तुम शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। इन्द्र! जैसे तुम्हारा आगेका श्रेय (कल्याण) होगा, वैसा ही मैं प्रयत्न करूँगा। गदाधर श्रीविष्णुने ऐसा कहनेके बाद इन्द्रको मनोहरा नदीमें स्नान कराकर बिदा कर दिया। इन्द्रके स्नान कर लेनेपर उनके पाप-पुरुषोंने उनसे कहा—हमें अनुशासित कीजिये। (इन्द्रने) उन भयंकर कर्म करनेवाले लोगोंसे कहा—मेरे पापसे उत्पन्न तुम लोग पुलिन्द कहे जाओगे। तुम लोग हिमालय एवं कालिञ्जर नामके दोनों श्रेष्ठ पर्वतोंके बीचकी भूमिमें निवास करो। पुलिन्दोंसे ऐसा कहनेके पश्चात् पापसे मुक्त हुए सुरराज देवों, सिद्धों एवं यक्षोंसे पूजित होते हुए माताके धर्मके आश्रयरूप पूज्य आश्रममें चले गये ॥ २३–२६ ॥ |
| दृष्ट्वाऽदितिं मूर्ध्नि कृताञ्जलिस्तु<br>विनम्रमौलिः समुपाजगाम।<br>प्रणम्य पादौ कमलोदराभौ<br>निवेदयामास तपस्तदात्मनः ॥ २७<br>पप्रच्छ सा कारणमीश्वरं त-<br>माघ्राय चालिङ्ग्य सहस्रदृष्ट्या।<br>स चाचचक्षे बलिना रणे जयं<br>तदात्मनो देवगणैश्च सार्धम् ॥ २८<br>श्रुत्वैव सा शोकपरप्लुताङ्गी<br>ज्ञात्वा जितं दैत्यसुतैः सुतं तम्।<br>दुःखान्विता देवमनाद्यमीड्यं<br>जगाम विष्णुं शरणं वरेण्यम् ॥ २९ | अदितिका दर्शन कर हाथ जोड़ तथा सिर झुकाकर इन्द्र उनके समीप आये एवं उनके कमलकी कान्तिवाले चरणोंमें प्रणाम करनेके बाद उन्होंने अपनी तपस्याका वर्णन किया। उन (अदिति)-ने अश्रुपूर्ण दृष्टिसे (इन्द्रको) सूँघा एवं उनको गले लगाकर (तपस्याका कारण) पूछा। इन्द्रने बलिद्वारा देवोंसहित अपने पराजित होनेका पूरा समाचार कह सुनाया। यह सुननेके बाद अपने उस पुत्रको दितिके पुत्रोंद्वारा पराजित जान शोकसे भर गयीं एवं दुःखसे दुखी होकर (अदिति) वरेण्य एवं अनादि देव विष्णुकी शरणमें गयीं ॥ २७–२९ ॥ |
| नारद उवाच<br>कस्मिन् जनित्री सुरसत्तमानां<br>स्थाने हृषीकेशमनन्तमाद्यम्।<br>चराचरस्य प्रभवं पुराण-<br>माराधयामास शुभे वद त्वम् ॥ ३० | नारदने कहा (पूछा)—(कृपया) आप यह बतलाइये कि देवोंकी माता अदितिने किस शुभ स्थानपर अनादि, अनन्त, चर और अचरके उत्पन्न करनेवाले एवं पुरातन हृषीकेशकी आराधना की ? ॥ ३० ॥ |
अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>सुरारणिः शक्रमवेक्ष्य दीनं<br>पराजितं दानवनायकेन।<br>सितेऽथ पक्षे मकरर्क्षगोऽर्के<br>घृतार्चिषः स्यादथ सप्तमेऽह्नि॥ ३१<br>दृष्ट्वैव देवं त्रिदशाधिपं तं<br>महोदये शक्रदिशारूढम्।<br>निराशना संयतवाक् सुचित्ता<br>तदोपतस्थे शरणं सुरेन्द्रम्॥ ३२ | **पुलस्त्यजी बोले—**दानव-नायकद्वारा पराजित हुए दीन बने इन्द्रको देखकर अदिति सूर्यके मकर-राशिमें स्थित हो जानेपर शुक्लपक्षकी सूर्य-सप्तमीके दिन उन सुरोंके स्वामी सूर्यदेवको महान् उदयाचलपर पूर्व दिशामें उगनेपर देखकर उपवास करती हुई वाणी एवं मनको संयत करके उन सुरेन्द्र (सूर्य)-की शरणमें गयीं॥ ३१-३२॥ |
| अदितिरुवाच<br>जयस्व दिव्याम्बुजकोशचौर<br>जयस्व संसारतरोः कुठार।<br>जयस्व पापेन्धनजातवेद-<br>स्तमौघसंरोध नमो नमस्ते॥ ३३<br>नमोऽस्तु ते भास्कर दिव्यमूर्ते<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीतिलकाय ते नमः।<br>त्वं कारणं सर्वचराचरस्य<br>नाथोऽसि मां पालय विश्वमूर्ते॥ ३४<br>त्वया जगन्नाथ जगन्मयेन<br>नाथेन शक्रो निजराज्यहानिम्।<br>अवाप्तवाञ् शत्रुपराभवं च<br>ततो भवन्तं शरणं प्रपन्ना॥ ३५<br>इत्येवमुक्त्वा सुरपूजितं सा<br>आलिख्य रक्तेन हि चन्दनेन।<br>सम्पूजयित्वा करवीरपुष्पैः<br>संधूप्य धूपैः कणमर्कभोज्यम्॥ ३६<br>निवेद्य चैवाज्ययुतं महार्ह-<br>मन्नं महेन्द्रस्य हिताय देवी।<br>स्तवेन पुण्येन च संस्तुवन्ती<br>स्थिता निराहारमथोपवासम्॥ ३७ | **अदितिने कहा—**हे दिव्य कमलकोशको अपनेमें छिपाकर रखनेवाले! आपकी जय हो। हे संसाररूपी वृक्षके कुठार! आपकी जय हो। हे पापरूपी इन्धनके लिये अग्नि! आपकी जय हो। हे अन्धकार (अज्ञान)-के समूहके विनाश करनेवाले! आपको बारम्बार नमस्कार है। हे भास्कर! हे दिव्यमूर्ते! आपको नमस्कार है। हे त्रैलोक्य-लक्ष्मीके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। आप समस्त चर और अचर जगत्के कारण तथा स्वामी हैं। हे विश्वमूर्ते! आप मेरी रक्षा कीजिये। हे जगन्नाथ! जगन्मय आप स्वामीके ही कारण इन्द्रको अपने राज्यकी हानि एवं शत्रुसे पराभवकी भी प्राप्ति हुई है। अतः मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। ऐसा कहनेके बाद रक्तचन्दनद्वारा देवोंसे पूजित सूर्यको चित्रितकर उन देवी (अदिति)-ने कनैंरके पुष्पोंसे उनका पूजन किया और धूपसे धूपित करनेके बाद महेन्द्रकी भलाईके लिये सूर्यके लिये घृतसे बने उत्तम अन्न अर्पित किया तथा निराहार रहकर पवित्र स्तोत्रोंसे स्तुति करती हुई (साधनामें) बैठी रहीं॥ ३३-३७॥ |
| ततो द्वितीयेऽह्नि कृतप्रणामा<br>स्नात्वा विधानेन च पूजयित्वा।<br>दत्त्वा द्विजेभ्यः कणकं तिलाज्यं<br>ततोऽग्रतः सा प्रयता बभूव॥ ३८<br>ततः प्रीतोऽभवद् भानुर्घृतार्चिः सूर्यमण्डलात्।<br>विनिःसृत्याग्रतः स्थित्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ ३९<br>व्रतेनानेन सुप्रीतस्तवाहं दक्षनन्दिनि।<br>प्राप्स्यसे दुर्लभं कामं मत्प्रसादान्न संशयः॥ ४०<br>राज्यं त्वत्तनयानां वै दास्ये देवि सुरारणि।<br>दानवान् ध्वंसयिष्यामि सम्भूयैवोदरे तव॥ ४१ | दूसरे दिन प्रणाम करनेके बाद विधिसे स्नान एवं पूजा करके उन्होंने ब्राह्मणोंको कणक, तिल एवं घृत प्रदान किया और उसके बाद वे और अधिक संयत रहने लगीं। इससे घृतार्चि भानु प्रसन्न हो गये। (वे) सूर्य-मण्डलसे निकले एवं अदितिके सामने खड़े होकर यह वचन बोले—दक्षनन्दिनि! तुम्हारे इस व्रतसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अतः मेरी कृपासे तुम निःसन्देह मनोवाञ्छित दुर्लभ वस्तु प्राप्त करोगी। देवि! देवजननि! मैं तुम्हारा पुत्र होकर देवपुत्रोंको राज्य दूँगा और दानवोंका नाश करूँगा॥ ३८-४१॥ |
| ३७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ |
|---|
| तद्वाक्यं वासुदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मन् सुरारणिः।<br>प्रोवाच जगतां योनिं वेपमाना पुनः पुनः॥ ४२<br><br>कथं त्वामुदरेणाहं वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरम्।<br>यस्योदरे जगत्सर्वं वसते स्थाणुजङ्गमम्॥ ४३<br><br>कस्त्वां धारयितुं नाथ शक्तस्त्रैलोक्यधार्यसि।<br>यस्य सप्तार्णवाः कुक्षौ निवसन्ति सहाद्रिभिः॥ ४४<br><br>तस्माद् यथा सुरपतिः शक्रः स्यात् सुरराडिह।<br>यथा च न मम क्लेशस्तथा कुरु जनार्दन॥ ४५<br><br>विष्णुरुवाच<br>सत्यमेतन्महाभागे दुर्धरोऽस्मि सुरासुरैः।<br>तथापि सम्भविष्यामि अहं देव्युदरे तव॥ ४६<br><br>आत्मानं भुवनान् शैलांस्त्वाञ्च देवि सकश्यपाम्।<br>धारयिष्यामि योगेन मा विषादं कृथाऽम्बिके॥ ४७<br><br>तवोदरेऽहं दाक्षेयि सम्भविष्यामि वै यदा।<br>तदा निस्तेजसो दैत्याः सम्भविष्यन्त्यसंशयम्॥ ४८<br><br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् विवेश<br>तस्याश्च भूयोऽरिगणप्रमर्दी।<br>स्वतेजसोंऽशेन विवेश देव्याः<br>तदोदरे शक्रहिताय विप्र॥ ४९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] ब्रह्मन्! वासुदेवका वह वाक्य सुनकर बार-बार काँपती हुई देवोंकी माता अदितिने संसारको उत्पन्न करनेवाले विष्णुसे कहा—जिसके (विशाल) उदरमें स्थावर-जङ्गमात्मक समस्त संसार निवास करता है, ऐसे त्रिलोकीको धारण करनेवाले आपको मैं अपने उदरमें कैसे धारण कर सकूँगी? नाथ! आप तीनों लोकोंको धारण करनेवाले हैं। जिसकी कुक्षिमें पर्वतोंके साथ सातों समुद्र अवस्थित हैं ऐसे आपको कौन धारण कर सकता है? अतः हे जनार्दन! आप वैसा ही करें जिससे इन्द्र देवताओंके स्वामी बन जायें और मुझे भी कष्ट न हो॥ ४२—४५॥<br><br>**विष्णुने कहा—**महाभागे! यह सत्य है कि मैं देवों और दैत्योंसे धृत नहीं हो सकता, फिर भी हे देवि! मैं आपके उदरसे उत्पन्न होऊँगा। देवि! स्वयंको, (चौदहों) भुवनों, पर्वतों एवं कश्यपसहित आपको भी मैं योगद्वारा धारण करूँगा। मातः! आप विषाद न करें। दक्षात्मजे! जब मैं आपके उदरमें आऊँगा तब दैत्य निस्सन्देह तेजोहीन हो जायेंगे। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] विप्र! ऐसा कहकर शत्रुओंके नाश करनेवाले भगवान् विष्णु इन्द्रकी भलाईके लिये अपने तेजके अंशमात्रसे उन देवीके उदरमें प्रविष्ट हो गये॥ ४६—४९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७६॥
सतहत्तरवाँ अध्याय
प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिको विष्णुको दुर्वचन, प्रह्लादद्वारा बलिको शाप और अनुनय करनेपर उपदेश
| पुलस्त्य उवाच<br>देवमातुः स्थिते देवे उदरे वामनाकृतौ।<br>निस्तेजसोऽसुरा जाता यथोक्तं विश्वयोनिना॥ १<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा प्रह्लादं दानवेश्वरम्।<br>बलिर्दानवशार्दूल इदं वचनमब्रवीत्॥ २ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी) संसारके उत्पन्न करनेवाले भगवान्के वचनानुसार देवमाता अदितिके गर्भमें वामनरूपमें देवके स्थित हो जानेपर असुर निस्तेज हो गये। असुरोंको निस्तेज देखकर दानवोंमें श्रेष्ठ बलिने दानवेश्वर प्रह्लादसे यह वचन कहा—॥ १-२॥ |
| अध्याय ७७ ] | प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिको विष्णुको दुर्वचन | ३७९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्याः केन जातास्तु हेतुना।<br>कथ्यतां परमज्ञोऽसि शुभाशुभविशारद॥ ३ | बलिने कहा— तात! आप यह बतलानेकी कृपा करें कि दानव किस कारणसे निस्तेज हो गये हैं? शुभ और अशुभके जाननेवाले आप महान् ज्ञानी हैं॥ ३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तत्पौत्रवचनं श्रुत्वा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः।<br>किमर्थं तेजसो हानिरिति कस्मादतीव च॥ ४<br>स ज्ञात्वा वासुदेवोत्थं भयं दैत्येष्वनुत्तमम्।<br>चिन्तयामास योगात्मा क्व विष्णुः साम्प्रतं स्थितः॥ ५<br>अधो नाभेः स पातालान् सप्त संचिन्त्य नारद।<br>नाभेरूपरि भूरादींल्लोकांश्चर्तुमियाद् वशी॥ ६<br>भूमिं स पङ्कजाकारां तन्मध्ये पङ्कजाकृतिम्।<br>मेरुं ददर्श शैलेन्द्रं शातकौम्भं महर्द्धिमत्॥ ७<br>तस्योपरि महापुर्यस्त्वष्टौ लोकपतींस्तथा।<br>तेषामुपरि वैराजीं ददृशे ब्रह्मणः पुरीम्॥ ८ | पुलस्त्यजी बोले— अपने पौत्र (बलि)-के उस वचनको सुनकर (दानवोंके) तेजकी अत्यधिक हानि क्यों और किससे हुई है—(यह जाननेके लिये) प्रह्लादने क्षणभर ध्यान किया और दैत्योंके लिये वासुदेवद्वारा उत्पन्न हुए अतुलनीय भयको जानकर उन योगात्माने यह सोचा कि इस समय विष्णु कहाँपर स्थित हैं? नारदजी! नाभिके नीचेके स्थानमें सात पातालोंका चिन्तन करनेके बाद (सातों पातालोंमें पता लगानेके बाद) सभीको अपने वशमें करनेवाले वे नाभिके ऊपर भूः आदि लोकमें देखनेके लिये (पता लगानेके लिये) पहुँचे। उन्होंने कमलके आकारकी भूमि और उसके बीच महान् समृद्धिसे सम्पन्न सुवर्णमय कमलके आकार-जैसे पर्वतश्रेष्ठ मेरुको देखा। उसके ऊपर महापुरियोंमें आठ लोक-पति तथा उनके ऊपर ब्रह्माकी वैराजपुरीको देखा॥ ४–८॥ |
| तदधस्तान्महापुण्यमाश्रमं सुरपूजितम्।<br>देवमातुः स ददृशे मृगपक्षिगणैर्वृतम्॥ ९<br>तां दृष्ट्वा देवजननीं सर्वतेजोऽधिकां मुने।<br>विवेश दानवपतिरन्वेष्टुं मधुसूदनम्॥ १०<br>स दृष्ट्वाऽङ्गजगन्नाथं माधवं वामनाकृतिम्।<br>सर्वभूतवरेण्यं तं देवमातुरथोदरे॥ ११<br>तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>सुरासुरगणैः सर्वैः सर्वतो व्याप्तविग्रहम्॥ १२<br>तेनैव क्रमयोगेन दृष्ट्वा वामनतां गतम्।<br>दैत्यतेजोहरं विष्णुं प्रकृतिस्थोऽभवत् ततः॥ १३<br>अथोवाच महाबुद्धिर्विरोचनसुतं बलिम्।<br>प्रह्लादो मधुरं वाक्यं प्रणम्य मधुसूदनम्॥ १४ | उसके नीचे उन्होंने महान् पुण्यसे युक्त देवताओंसे पूजित तथा पशु-पक्षियोंसे भरे देवमाता अदितिके आश्रमको देखा। मुने! समस्त तेजोंसे भी अधिक तेजस्विनी उस देवमाता अदितिको देखकर दानवपति प्रह्लादने मधुसूदनको ढूँढ़नेके लिये (उनके उदरमें) प्रवेश किया। उन्होंने सभी प्राणियोंमें श्रेष्ठ वामनके रूपमें उन जगत्पति माधवको देवमाताके उदरमें देखकर सारे सुरों और असुरोंसे चारों ओर व्याप्त शरीरवाले शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले उन पुण्डरीकनयन भगवान्को देखा। उसी योगके क्रममें वामनरूपको प्राप्त हुए दैत्योंके तेजको हरण करनेवाले विष्णुको जानकर वे प्रकृति-भावमें स्थित हो गये। उसके बाद मधुसूदनको प्रणाम कर महाबुद्धिमान् प्रह्लादने विरोचनपुत्र बलिसे मधुर वचन कहा॥ ९—१४॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये यतो वो भयमागतम्।<br>येन निस्तेजसो दैत्या जाता दैत्येन्द्र हेतुना॥ १५<br>भवता निर्जिता देवाः सेन्द्ररुद्रार्कपावकाः।<br>प्रयाताः शरणं देवं हरिं त्रिभुवनेश्वरम्॥ १६ | प्रह्लादने कहा— दैत्येन्द्र! आपलोगोंको जिससे भय प्राप्त हुआ है और जिस कारण दैत्यगण तेजसे रहित हो गये हैं, वह सब मैं कहता हूँ, सुनो। आपके द्वारा जीते गये इन्द्रसहित रुद्र, सूर्य तथा अग्नि आदि देवता |
| ३८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ |
|---|
| स तेषामभयं दत्त्वा शक्रादीनां जगद्गुरुः।<br>अवतीर्णो महाबाहुरदित्या जठरे हरिः॥ १७<br><br>हृतानि वस्तेन बले तेजांसीति मतिर्मम।<br>नालं तमो विषहितुं स्थातुं सूर्योदयं बले॥ १८ | त्रिभुवनके स्वामी देव हरिकी शरणमें गये। वे लोकगुरु महाबाहु हरि इन्द्र आदि देवताओंको अभय देकर अदितिके उदरमें अवतीर्ण हुए हैं। बले! मेरा ऐसा विचार है कि उन्होंने तुम लोगोंके तेजको हरण कर लिया है। बले! (जैसे कि) सूर्योदयके होते ही अन्धकार ठहर नहीं सकता है॥ १५–१८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>प्रह्लादवचनं श्रुत्वा क्रोधप्रस्फुरिताधरः।<br>प्रह्लादमाहाथ बलिर्भाविकर्मप्रचोदितः॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— प्रह्लादके वचनको सुनकर क्रोधसे ओठ फड़कड़ाते हुए बलिने होनहारसे प्रेरित होकर प्रह्लादसे कहा॥ १९॥ | | बलिरुवाच<br>तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्।<br>सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः॥ २०<br>सहस्रशो यैरमराः सेन्द्ररुद्राग्निमारुताः।<br>निर्जित्य त्याजिताः स्वर्गं भग्नदर्पा रणाजिरे॥ २१<br>ये सूर्यस्थाद् वेगाच्चक्रं कृष्टं महाजवम्।<br>स विप्रचित्तिर्बलवान् मम सैन्यपुरस्सरः॥ २२<br>अयःशङ्कुः शिवः शम्भुरसिलोमा विलोमकृत्।<br>त्रिशिरा मकराक्षश्च वृषपर्वा नतेक्षणः॥ २३<br>एते चान्ये च बलिनो नानायुधविशारदाः।<br>येषामेकैकशो विष्णुः कलां नार्हति षोडशीम्॥ २४ | बलिने कहा— तात! ये हरि कौन हैं जिनके कारण हमें भय प्राप्त हुआ है? हमारे पास वासुदेवसे अधिक बलवान् सैकड़ों दैत्य हैं। उन लोगोंने इन्द्रसहित रुद्र, अग्नि तथा वायु आदि हजारों देवोंको युद्धमें जीतकर उनके अहंकारको नष्ट किया एवं उन्हें स्वर्गसे खदेड़ दिया। वह बलशाली विप्रचित्ति मेरी सेनाका अगुआ है, जिसने धावा बोलकर सूर्यके रथसे महान् तीव्रगामी चक्रको खींच लिया था। अयःशङ्कु, शिव, शम्भु, असिलोमा, विलोमकृत्, त्रिशिरा, मकराक्ष, वृषपर्वा एवं नतेक्षण—ये तथा अन्य बहुत-से भाँति-भाँतिके आयुधोंको चलानेमें निपुण बलवान् (दैत्य मेरे सहायक हैं,) जिनमें हर एककी सोलहवीं कलाके भी समान विष्णु नहीं हैं॥ २०–२४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादः क्रोधमूर्च्छितः।<br>धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्॥ २५<br>धिक् त्वां पापसमाचारं दुष्टबुद्धिं सुबालिशम्।<br>हरिं निन्दयतो जिह्वा कथं न पतिता तव॥ २६<br>शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्धे निन्दनीयश्च साधुभिः।<br>यत् त्रैलोक्यगुरुं विष्णुमभिनिन्दसि दुर्मते॥ २७<br>शोच्यश्चास्मि न संदेहो येन जातः पिता तव।<br>यस्य त्वं कर्कशः पुत्रो जातो देवावमान्यकः॥ २८ | पुलस्त्यने कहा— पौत्रके इस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए उन प्रह्लादने विष्णुकी निन्दा करनेवाले बलिसे कहा—पापकर्मा दुष्टबुद्धि तुम मूर्खको धिक्कार है। विष्णुकी निन्दा करते हुए तुम्हारी जीभ क्यों नहीं गिर गयी? दुर्बुद्धे! दुर्मते! तुम शोक करने लायक और सज्जनोंद्वारा निन्दा किये जाने योग्य हो। क्योंकि तुम तीनों लोकोंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो। निस्सन्देह मैं भी शोक किये जाने लायक हूँ, जिसने तुम्हारे उस पिताको जन्म दिया, जिससे तुम देवताओंकी निन्दा करनेवाले तथा उग्र पुत्र हुए॥ २५–२८॥ | | भवान् किल विजानाति तथा चामी महासुराः।<br>यथा नान्यः प्रियः कश्चिन्मम तस्माज्जनार्दनात्॥ २९<br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>सर्वेश्वरेश्वरं देवं कथं निन्दितवानसि॥ ३०<br>गुरुः पूज्यस्तव पिता पूज्यस्तस्याप्यहं गुरुः।<br>ममापि पूज्यो भगवान् गुरुर्लोकगुरुर्हरिः॥ ३१ | निश्चय ही तुम और ये महासुर भी जानते हैं कि जनार्दनसे अधिक दूसरा कोई मेरा प्रिय नहीं है। विष्णु मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, यह जानते हुए भी तुमने सर्वेश्वरेश्वर देवकी निन्दा किस प्रकार की? तुम्हारे पिता (तुम्हारे लिये) गुरु एवं पूजनीय हैं। उनका भी गुरु तथा पूजनीय मैं हूँ। लोकगुरु भगवान् विष्णु मेरे भी |
| अध्याय ७७ ] | प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन | ३८१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गुरोर्गुरुगुरुर्मूढ पूज्यः पूज्यतमस्तव।<br>पूज्यं निन्दयते पाप कथं न पतितोऽस्यधः॥ ३२ | पूजनीय और गुरु हैं। मूढ़ पापिन्! गुरुके भी गुरु तुम्हारे लिये पूज्य एवं पूज्यतम हैं। तुम पूजनीयकी निन्दा करते हो, इसलिये तुम नीचे क्यों नहीं गिर गये॥ २९—३२॥ |
| शोचनीया दुराचारा दानवामी कृतास्त्वया।<br>येषां त्वं कर्कशो राजा वासुदेवस्य निन्दकः॥ ३३<br>यस्मात् पूज्योऽर्चनीयश्च भवता निन्दितो हरिः।<br>तस्मात् पापसमाचार राज्यनाशमवाप्नुहि॥ ३४<br>यथा नान्यत् प्रियतरं विद्यते मम केशवात्।<br>मनसा कर्मणा वाचा राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ३५<br>यथा न तस्मादपरं व्यतिरिक्तं हि विद्यते।<br>चतुर्दशसु लोकेषु राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ३६<br>सर्वेषामपि भूतानां नान्यल्लोके परायणम्।<br>यथा तथाऽनुपश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ३७ | तुमने दुराचरण करनेवाले इन दानवोंको शोचनीय बना दिया। क्योंकि वासुदेवकी निन्दा करनेवाले कठोर-स्वभावके तुम इनके राजा हो। हे पापका आचरण करनेवाले! यतः तुमने पूजनीय एवं अर्चनीय विष्णुकी निन्दा की है, अतः तुम्हारे राज्यका विनाश होगा। क्योंकि मन, कर्म एवं वाणीसे मेरा केशवसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है, अतः राज्यसे भ्रष्ट होकर तुम अधःपतित हो जाओ। क्योंकि चौदहों लोकोंमें उनसे भिन्न दूसरा कोई नहीं है, अतः राज्य-भ्रष्ट होकर तुम पतित हो जाओ; क्योंकि संसारमें सभी भूतोंका (वासुदेवके अतिरिक्त) दूसरा कोई आधार नहीं है, अतः मैं तुम्हें राज्यच्युत हुआ देखूँ॥ ३३—३७॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुच्चारिते वाक्ये बलिः सत्वरितस्तदा।<br>अवतीर्यासनाद् ब्रह्मन् कृताञ्जलिपुटो बली॥ ३८<br>शिरसा प्रणिपत्याह प्रसादं यातु मे गुरुः।<br>कृतापराधानपि हि क्षमन्ति गुरवः शिशून्॥ ३९<br>तत्साधु यदहं शप्तो भवता दानवेश्वर।<br>न बिभेमि परेभ्योऽहं न च राज्यपरिक्षयात्॥ ४०<br>नैव दुःखं मम विभो यदहं राज्यविच्युतः।<br>दुःखं कृतापराधत्वाद् भवतो मे महत्तरम्॥ ४१<br>तत् क्षम्यतां तात ममापराधो<br>बालोऽस्म्यनाथोऽस्मि सुदुर्मतिश्च।<br>कृतेऽपि दोषे गुरवः शिशूनां<br>क्षमन्ति दैन्यं समुपागतानाम्॥ ४२ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! इस प्रकार कहे जानेपर बलशाली बलि शीघ्र ही आसनसे नीचे उतरा और हाथ जोड़कर उसने सिरसे झुककर प्रणाम कर कहा—गुरो! मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों। बड़े लोग अपराध करनेपर भी बालकोंको क्षमा करते हैं। दानवेश्वर! आपका मुझे शाप देना ठीक है। मैं शत्रुओंसे तथा राज्यके विनाश होनेसे भयभीत नहीं हूँ। विभो! मुझे राज्यसे भ्रष्ट हो जानेका कष्ट भी नहीं है, परंतु आपका अपराध करनेका मुझे सबसे अधिक दुःख है। इसलिये तात! आप मेरे अपराधको क्षमा करें। मैं एक अनाथ दुर्बुद्धि शिशु हूँ। गुरुजन दोष करनेपर भी आर्त बने हुए बालकोंको क्षमा कर देते हैं॥ ३८–४२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>स एवमुक्तो वचनं महात्मा<br>विमुक्तमोहो हरिपादभक्तः।<br>चिरं विचिन्त्याद्भुतमेतदित्थ-<br>मुवाच पौत्रं मधुरं वचोऽथ॥ ४३ | (फिर) पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारके वचन कहनेपर विष्णुके चरणोंमें श्रद्धा रखनेवाले ज्ञानी महात्मा (प्रह्लाद)-ने बहुत देरतक विचारकर पौत्रसे इस प्रकार अद्भुत एवं मधुर यह वचन कहा॥ ४३॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>तात मोहेन मे ज्ञानं विवेकश्च तिरस्कृतः।<br>येन सर्वगतं विष्णुं जानंस्त्वां शप्तवानहम्॥ ४४<br>नूनमेतेन भाव्यं वै भवतो येन दानव।<br>ममाविशन्महाबाहो विवेकप्रतिषेधकः॥ ४५ | प्रह्लादने कहा— तात! अज्ञानने मेरे ज्ञान एवं विवेकको ढक दिया था। इसीसे विष्णुको सर्वव्यापी जानते हुए भी मैंने तुम्हें शाप दे दिया। दानव! निश्चय ही तुम्हारी इस प्रकारकी होनहार थी। इसीसे विवेकका प्रतिबन्धक—विषय-वासनारूप अज्ञान मुझमें प्रवेश कर |
| ३८२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ | | :--- | :--- |
| तस्माद् राज्यम्प्रति विभो न ज्वरं कर्तुमर्हसि।<br>अवश्यं भाविनो ह्यर्था न विनश्यन्ति कर्हिचित्॥ ४६<br>पुत्रमित्रकलत्रार्थे राज्यभोगधनाय च।<br>आगमे निर्गमे प्राज्ञो न विषादं समाचरेत्॥ ४७<br>यथा यथा समायान्ति पूर्वक Check कर्मविधानतः।<br>सुखदुःखानि दैत्येन्द्र नरस्तानी सहेत् तथा॥ ४८<br><br>आपदामागमं दृष्ट्वा न विषण्णो भवेद् वशी।<br>सम्पदं च सुविस्तीर्णां प्राप्य नोऽधृतिमान् भवेत्॥ ४९<br><br>धनक्षये न मुह्यन्ति न हृष्यन्ति धनागमे।<br>धीराः कार्येषु च सदा भवन्ति पुरुषोत्तमाः॥ ५०<br><br>एवं विदित्वा दैत्येन्द्र न विषादं कथंचन।<br>कर्तुमर्हसि विद्वांस्त्वं पण्डितो नावसीदति॥ ५१<br>तथाऽन्यच्च महाबाहो हितं शृणु महार्थकम्।<br>भवतोऽथ तथाऽन्येषां श्रुत्वा तच्च समाचर॥ ५२<br>शरण्यं शरणं गच्छ तमेव पुरुषोत्तमम्।<br>स ते त्राता भयादस्माद् दानवेन्द्र भविष्यति॥ ५३<br>ये संश्रिता हरिमन्तनादिमध्यं<br>विष्णुं चराचरगुरुं हरिमीशितारम्।<br>संसारगर्तपतितस्य करावलम्बं<br>नूनं न ते भुवि नरा ज्वरिनो भवन्ति॥ ५४<br>तन्मना दानवश्रेष्ठ तद्भक्तश्च भवाधुना।<br>स एष भवतः श्रेयो विधास्यति जनार्दनः॥ ५५<br>अहं च पापोपशमार्थमीश-<br>माराध्य यास्ये प्रतितीर्थयात्राम्।<br>विमुक्तपापश्च ततो गमिष्ये<br>यत्राच्युतो लोकपतिर्नृसिंहः॥ ५६ | गया था। इसलिये विभो ! राज्यके लिये कष्ट मत करो। अवश्यम्भावी विषय कभी भी विनष्ट नहीं होते। बुद्धिमान् व्यक्तिको पुत्र, मित्र, पत्नी, राज्यभोग और धनके आने तथा जानेपर चिन्तित नहीं होना चाहिये॥ ४४–४७॥<br><br>दैत्येन्द्र ! पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके विधानसे जैसे-जैसे सुख और दुःख आते हैं, मनुष्यको उसी प्रकार उनको सहन कर लेना चाहिये। संयम करनेवाले व्यक्तिको आपत्तियोंका आगमन देखकर पीड़ित नहीं होना चाहिये एवं अत्यन्त अधिक सम्पत्तिको देखकर धीरता नहीं खो देनी चाहिये। उत्तम पुरुष धनके नष्ट होनेपर चिन्ता एवं धनकी प्राप्ति होनेपर हर्ष नहीं करते। वे कर्तव्य कर्मके प्रति सदा धीर बने रहते हैं। दैत्येन्द्र ! इस प्रकार जानकर तुम्हें किसी प्रकारका शोक नहीं करना चाहिये; तुम विद्वान् हो! विद्वान् व्यक्ति दुःखी नहीं होते॥ ४८–५१॥<br><br>महाबाहो! तुम अपने लिये तथा अन्योंके लिये महान् अर्थपूर्ण एवं कल्याणकर (वचन) सुनो और सुनकर वैसा ही करो। दानवेन्द्र ! तुम उन्हीं शरणागतकी रक्षा करनेवाले पुरुषोत्तमकी शरणमें जाओ। वे ही इस भयसे तुम्हारी रक्षा करेंगे। आदि, मध्य और अन्तसे हीन, चर और अचरके गुरु, संसाररूपी गर्तमें गिरे हुओंके लिये हाथका आश्रय देनेवाले एवं सबके नियन्ता हरि विष्णुकी शरणमें जानेवाले मनुष्य निश्चय ही संसारमें संतप्त नहीं होते। दानवश्रेष्ठ! अब तुम अपना मन उन्हींमें लगाकर उनके भक्त बनो। वे जनार्दन ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। मैं भी पापके विनाशके लिये ईश्वरकी आराधनाकर तीर्थयात्रा करने जाऊँगा और पापसे विमुक्त होकर मैं वहाँ जाऊँगा, जहाँ लोकपति अच्युत नृसिंह हैं॥ ५२–५६॥ | | <center>पुलस्त्य उवाच</center><br>इत्येवमाश्वास्य बलिं महात्मा<br>संस्मृत्य योगाधिपतिं च विष्णुम्।<br>आमन्त्र्य सर्वान् दनुयूथपालान्<br>जगाम कर्तुं त्वथ तीर्थयात्राम्॥ ५७ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार बलिको आश्वासन देनेके बाद महात्मा (प्रह्लाद)-ने योगके अधिपति विष्णुका स्मरण किया और दानवसमूहोंके पालकोंसे अनुमति लेकर तीर्थयात्रा करने चले गये॥ ५७॥ |
<center>॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७७ ॥</center>अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव [ ३८३
अठहत्तरवाँ अध्याय
प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान, वामनका प्रादुर्भाव और उनके लिये दान देनेका धुन्धुका निश्चय, वामनका त्रिविक्रम होना और धुन्धुका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>कानि तीर्थानि विप्रेन्द्र प्रह्लादोऽनुजगाम ह।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां मे सम्यगाख्यातुमर्हसि॥ १ | नारदने कहा (पूछा)— श्रेष्ठ विप्र! प्रह्लाद (क्रमशः) किन-किन तीर्थोंमें गये। कृपया आप मुझसे प्रह्लादकी तीर्थयात्राका भलीभाँति वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि पापपङ्कप्रणाशिनीम्।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां ते शुद्धपुण्यप्रदायिनीम्॥ २<br>संत्यज्य मेरुं कनकाचलेन्द्रं<br>तीर्थं जगामामरसंघजुष्टम्।<br>ख्यातं पृथिव्यां शुभदं हि मानसं<br>यत्र स्थितो मत्स्यवपुः सुरेशः॥ ३<br>तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः।<br>सम्पूज्य च जगन्नाथमच्युतं श्रुतिभिर्युतम्॥ ४<br>उपोष्य भूयः सम्पूज्य देवर्षिपितृमानवान्।<br>जगाम कच्छपं द्रष्टुं कौशिक्यां पापनाशनम्॥ ५<br>तस्यां स्नात्वा महानद्यां सम्पूज्य च जगत्पतिम्।<br>समुपोष्य शुचिर्भूत्वा दत्त्वा विप्रेषु दक्षिणाम्॥ ६<br>नमस्कृत्य जगन्नाथमथो कूर्मवपुर्धरम्।<br>ततो जगाम कृष्णाख्यं द्रष्टुं वाजिमुखं प्रभुम्।<br>तत्र देवह्रदे स्नात्वा तर्पयित्वा पितॄन् सुरान्॥ ७<br>सम्पूज्य हयशीर्षं च जगाम गजसाह्वयम्।<br>तत्र देवं जगन्नाथं गोविन्दं चक्रपाणिनम्॥ ८<br>स्नात्वा सम्पूज्य विधिवज्जगाम यमुनां नदीम्।<br>तस्यां स्नातः शुचिर्भूत्वा संतर्प्यर्षिसुरान् पितॄन्।<br>ददर्श देवदेवेशं लोकनाथं त्रिविक्रमम्॥ ९ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं आपसे पापरूपी कीचड़को नष्ट करनेवाली एवं पवित्र पुण्यको देनेवाली प्रह्लादकी तीर्थयात्राको कहता हूँ। सुवर्णमय श्रेष्ठ मेरु पर्वतको छोड़कर वे (सबसे पहले) देवोंसे सेवित (और) पृथ्वीमें प्रसिद्ध कल्याणदायी मानसतीर्थमें गये, जहाँ मत्स्यशरीरधारी (मत्स्यावतारी) देवाधिदेव निवास करते हैं। उस उत्तम तीर्थमें स्नान और पितृ-देव-तर्पण कर उन्होंने वेद-मन्त्रोंसे अच्युत भगवान् विश्वेशका पूजन किया। फिर वहाँ उपवास रहकर देवों, ऋषियों, पितरों और मनुष्योंकी (यथायोग्य) पूजा कर कौशिकीमें (अवस्थित) पापका नाश करनेवाले भगवान् कच्छपका दर्शन करने गये। उस महानदीमें स्नान करनेके बाद उन्होंने जगत्स्वामी भगवान्की पूजा की और उपवास (व्रत) करके पवित्र होकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दी। उसके बाद कच्छपावतार जगन्नाथ भगवान्को नमस्कार कर वे वहाँसे कृष्ण नामके अश्वमुख भगवान्का दर्शन करने चले गये। वहाँ उन्होंने देवह्रदमें स्नानकर देवों एवं पितरोंका तर्पण किया और हयग्रीव भगवान्का अर्चन कर वे हस्तिनापुर चले गये। वहाँ स्नान करनेके बाद चक्रपाणि विश्वपति गोविन्ददेवकी विधिसे पूजा करनेके बाद वे यमुना नदीके पास पहुँच गये। उसमें स्नान करके पवित्र होकर उन्होंने ऋषियों, पितरों और देवोंका तर्पण किया तथा देवोंके देव जगन्नाथ त्रिविक्रम (वामन भगवान्)-का दर्शन किया॥ २—९॥ |
| नारद उवाच<br>साम्प्रतं भगवान् विष्णुस्त्रैलोक्याक्रमणं वपुः।<br>करिष्यति जगत्स्वामी बलेर्बन्धनमीश्वरः॥ १० | नारदजीने पूछा— इस समय जगत्स्वामी भगवान् विष्णु तीनों लोकोंको आक्रान्त करनेवाला (विशालतम्) देह धारण करेंगे और बलिको बाँधेंगे तो वे भगवान् |
| ३८४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
|---|
| तत्कथं पूर्वकालेऽपि विभुरासीत् त्रिविक्रमः।<br>कस्य वा बन्धनं विष्णुः कृतवांस्तच्च मे वद ॥ ११ | विष्णु पहले समयमें भी कैसे त्रिविक्रम हुए थे और (उस समय) उन्होंने किसका बन्धन किया था—यह मुझे बतलाइये ॥ १०-११॥ |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच | **पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! वे त्रिविक्रम भगवान् |
| श्रूयतां कथयिष्यामि योऽयं प्रोक्तस्त्रिविक्रमः।<br>यस्मिन् काले सम्बभूव यं च वञ्चितवानसौ ॥ १२ | कौन हैं, कब हुए और उन्होंने किसको ठगा ? यह सब जो आपने पूछा है उसे मैं कहता हूँ; आप सुनिये—दनुके |
| आसीद् धुन्धुरिति ख्यातः कश्यपस्यौरसः सुतः।<br>दनुगर्भसमुद्भूतो महाबलपराक्रमः ॥ १३ | गर्भसे उत्पन्न अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी धुन्धु नामसे प्रसिद्ध कश्यपका एक औरस पुत्र था। नारदजी! |
| स समाराध्य वरदं ब्रह्माणं तपसाऽसुरः।<br>अवध्यत्वं सुरैः सेन्द्रैः प्रार्थयत् स तु नारद ॥ १४ | उस दैत्यने तपस्यासे वरदानी ब्रह्माकी आराधना करके उनसे इन्द्र आदि देवताओंसे (अपनेको) अवध्य होनेकी याचना की। (उसकी) तपस्यासे प्रसन्न होकर |
| तद् वरं तस्य च प्रादात् तपसा पङ्कजोद्भवः।<br>परितुष्टः स च बली निर्जगाम त्रिविष्टपम् ॥ १५ | कमल-योनि ब्रह्माजीने उसे वह (वाञ्छित) वर दे दिया। उसके बाद वह बलवान् धुन्धु स्वर्गमें चला गया। |
| चतुर्थस्य कलेरादौ जित्वा देवान् सवासवान्।<br>धुन्धुः शक्रत्वमकरोद्धिरण्यकशिपौ सति ॥ १६ | चतुर्थ कलियुगके आदिमें हिरण्यकशिपुके वर्तमान रहते समय धुन्धु इन्द्रसहित देवोंको जीतकर स्वयं इन्द्र बन गया। |
| तस्मिन् काले स बलवान् हिरण्यकशिपुस्ततः।<br>चचार मन्दरगिरौ दैत्यं धुन्धुं समाश्रितः ॥ १७ | उस समय धुन्धुका आश्रय लेकर बलवान् दैत्य हिरण्यकशिपु मन्दरपर्वतपर (स्वच्छन्दतासे) विचरण कर रहा था। |
| ततोऽसुरा यथा कामं विहरन्ति त्रिविष्टपे।<br>ब्रह्मलोके च त्रिदशाः संस्थिता दुःखसंयुताः ॥ १८ | दैत्यगण भी स्वच्छन्दतासे स्वर्गमें विचरण करने लगे। (इससे) सभी देवता दुखी होकर ब्रह्मलोकमें जाकर रहने लगे ॥ १२–१८ ॥ |
| ततोऽमरान् ब्रह्मसदो निवासिनः<br>श्रुत्वाऽथ धुन्धुर्दितिजानुवाच।<br>व्रजाम दैत्या वयमग्रजस्य<br>सदो विजेतुं त्रिदशान् सशक्रान् ॥ १९ | तब देवताओंका ब्रह्मलोकमें रहना सुनकर धुन्धुने दैत्योंसे कहा—दैत्यो! इन्द्रसहित देवोंको जीतनेके लिये हमलोग (अब) ब्रह्मलोक चलें। धुन्धुका वचन सुनकर |
| ते धुन्धुवाक्यं तु निशम्य दैत्याः<br>प्रोचुर्न नो विद्यति लोकपाल।<br>गतिर्यया याम पितामहाजिरं<br>सुदुर्गमोऽयं परतो हि मार्गः ॥ २० | उन दैत्योंने कहा—लोकपाल! हमलोगोंमें वह गति नहीं है, जिससे पितामह (ब्रह्मा)-के लोकमें जा सकें। (वहाँका) मार्ग बहुत दूर एवं बीहड़ है। |
| इतः सहस्रैर्बहुयोजनाख्यै-<br>र्लोको महर्नाम महर्षिजुष्टः।<br>येषां हि दृष्ट्याऽर्पणचोदितेन<br>दह्यन्ति दैत्याः सहसेक्षितेन ॥ २१ | यहाँसे हजारों योजन दूर महर्षियोंसे सेवित 'मह' नामका लोक है। उन ऋषियोंकी सहसा दृष्टि पड़ते ही समस्त दैत्य जल जाते हैं। |
| ततोऽपरो योजनकोटिना वै<br>लोको जनो नाम वसन्ति यत्र।<br>गोमातरोऽस्मासु विनाशकारि<br>यासां रजोऽपीह महासुरेन्द्र ॥ २२ | उससे भी आगे कोटि योजन दूर 'जन' नामक एक लोक है जहाँ गोमाताएँ रहती हैं! महासुरेन्द्र! उनकी धूलि भी हमलोगोंका विनाश कर सकती है। |
| ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>षड्भिस्तपो नाम तपस्विजुष्टः।<br>तिष्ठन्ति यत्रासुर साध्यवर्या<br>येषां हि निःश्वासमरुत् त्वसह्यः ॥ २३ | उसके बाद छः करोड़ योजनकी दूरीपर तपस्वियोंसे भरा 'तप' लोक है। असुरराज! वहाँ श्रेष्ठ साध्यगण रहते हैं। उनका निःश्वास-वायु असहनीय है ॥ १९–२३ ॥ |
अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>त्रिंशद्भिरादित्यसहस्रदीप्तिः ।<br>सत्याभिधानो भगवन्निवासो<br>वरप्रदोऽभूद् भवतो हि योऽसौ ॥ २४<br>यस्य वेदध्वनिं श्रुत्वा विकसन्ति सुरादयः ।<br>संकोचमसुरा यान्ति ये च तेषां सधर्मिणः ॥ २५<br>तस्मान्मा त्वं महाबाहो मतिमेतां समादधः ।<br>वैराजभुवनं धुन्धो दुरारोहं सदा नृभिः ॥ २६<br>तेषां वचनमाकर्ण्य धुन्धुः प्रोवाच दानवान् ।<br>गन्तुकामः स सदनं ब्रह्मणो जेतुमीश्वरान् ॥ २७ | उसके बाद तीस करोड़ योजनकी दूरीपर हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त 'सत्य'नामका लोक है। वह लोक उन्हीं भगवान्का निवास-स्थल है, जिन्होंने आपको वर दिया था। जिनकी वेदध्वनि सुनकर देवता आदि विकसित हो जाते हैं तथा दैत्य और उनके समान धर्मवाले संकुचित (म्लान) हो जाते हैं। अतः महाबाहु धुन्धो! आप ऐसी बुद्धि न करें; क्योंकि ब्रह्मलोक मनुष्यों (एवं दैत्यों)-के लिये सदैव अगम्य है। उनकी बात सुनकर (भी) देवोंको जीतनेके लिये ब्रह्मलोक जानेकी इच्छावाले धुन्धुने दानवोंसे (फिर) कहा— ॥ २४-२७ ॥ |
| कथं तु कर्मणा केन गम्यते दानवर्षभाः ।<br>कथं तत्र सहस्राक्षः सम्प्राप्तः सह दैवतैः ॥ २८<br>ते धुन्धुना दानवेन्द्राः पृष्टाः प्रोचुर्वचोऽधिपम् ।<br>कर्म तन्न वयं विद्मः शुक्रस्तद् वेत्त्यसंशयम् ॥ २९<br>दैत्यानां वचनं श्रुत्वा धुन्धुर्दैत्यपुरोहितम् ।<br>पप्रच्छ शुक्रं किं कर्म कृत्वा ब्रह्मस्रदोगतिः ॥ ३०<br>ततोऽस्मै कथयामास दैत्याचार्यः कलिप्रिय ।<br>शक्रस्य चरितं श्रीमान् पुरा वृत्ररिपोः किल ॥ ३१<br>शक्रः शतं तु पुण्यानां क्रतूनामयजत् पुरा ।<br>दैत्येन्द्र वाजिमेधानां तेन ब्रह्मसदो गतः ॥ ३२ | दानवश्रेष्ठो! वहाँ कैसे और किस कर्मसे जाया जा सकता है ? इन्द्र देवोंके साथ वहाँ कैसे पहुँचे ? धुन्धुके पूछनेपर उन श्रेष्ठ दानवोंने कहा—हमलोग उस कर्मको तो नहीं जानते, किंतु शुक्राचार्य उसको निःसंदेह जानते हैं। दैत्योंका वचन सुनकर धुन्धुने दैत्योंके पुरोहित शुक्राचार्यजीसे पूछा—(आचार्यजी!) किस कर्मको करनेसे ब्रह्मलोकमें जाया जा सकता है? (पुलस्त्यजी कहते हैं—) कलिप्रिय! उसके बाद दैत्योंके गुरु श्रीमान् शुक्राचार्यने उससे वृत्रशत्रु इन्द्रका चरित कहा। उन्होंने कहा—दैत्येन्द्र! पहले समयमें इन्द्रने सौ पवित्र अश्वमेध-यज्ञ किये थे। इसीसे वे ब्रह्मलोक गये ॥ २८-३२ ॥ |
| तद्वाक्यं दानवपतिः श्रुत्वा शुक्रस्य वीर्यवान् ।<br>यष्टुं तुरगमेधानां चकार मतिमुत्तमाम् ॥<br>अथामन्त्र्यासुरगुरुं दानवांश्चाप्यनुत्तमान् ॥ ३३<br>प्रोवाच यक्ष्येऽहं यज्ञैरश्वमेधैः सदक्षिणैः ।<br>तदागच्छध्वमवनीं गच्छामो वसुधाधिपान् ॥ ३४<br>विजित्य हयमेधान् वै यथाकामगुणान्वितान् ।<br>आहूयन्तां च निधयस्त्वाज्ञाप्यन्तां च गुह्यकाः ॥ ३५<br>आमन्त्र्यन्तां च ऋषयः प्रयामो देविकातटम् ।<br>सा हि पुण्या सरिच्छ्रेष्ठा सर्वसिद्धिकरी शुभा ।<br>स्थानं प्राचीनमासाद्य वाजिमेधान् यजामहे ॥ ३६ | शुक्राचार्यके उस वाक्यको सुनकर बलवान् दानवपतिने अश्वमेधयज्ञ करनेकी उत्कट इच्छा की। उसके बाद दैत्योंके गुरुको और अच्छे दैत्योंको बुलाकर उसने कहा—मैं दक्षिणासहित अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा। इसलिये आओ, हमलोग पृथ्वीपर चलें और राजाओंको जीतकर इच्छानुकूल सामग्री एवं विधिसे पूर्ण अश्वमेधोंका अनुष्ठान करें। निधियोंको बुलाओ एवं गुह्यकोंको आदेश दे दो और ऋषियोंको आमन्त्रित करो। हमलोग देविकाके तटपर चलें। वह पुनीत उत्तम नदी कल्याणदायिनी तथा सर्वसिद्धिकारिणी है। उस प्राचीन स्थानपर पहुँचकर हम अश्वमेधयज्ञ करेंगे ॥ ३३-३६ ॥ |
| इत्थं सुरारेर्वचनं निशम्यासुरयाजकः ।<br>बाढमित्यब्रवीद्धुन्धो निधयः संदिदेश सः ॥ ३७ | देवोंके शत्रु धुन्धुके उस वचनको सुनकर दैत्योंके यज्ञ करानेवाले शुक्राचार्यने 'ठीक है'—ऐसा कहा और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने निधियोंको आदेश दे दिया। उसके |
| ३८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
|---|
| ततो धुन्धुर्दैविकायाः प्राचीने पापनाशने ।<br>भार्गवेन्द्रेण शुक्रेण वाजिमेधाय दीक्षितः ॥ ३८<br><br>सदस्या ऋत्विजश्चापि तत्रासन् भार्गवा द्विजाः ।<br>शुक्रस्यानुमते ब्रह्मन् शुक्रशिष्याश्च पण्डिताः ॥ ३९<br><br>यज्ञभागभुजस्तत्र स्वर्भानुप्रमुखा मुने ।<br>कृताश्चासुरनाथेन शुक्रस्यानुमतेऽसुराः ॥ ४०<br><br>ततः प्रवृत्तो यज्ञस्तु समुत्सृष्टस्तथा हयः ।<br>हयस्यानुययौ श्रीमानसिलोमा महासुरः ॥ ४१ | बाद भार्गवश्रेष्ठ शुक्राचार्यने पापोंका नाश करनेवाले देविकाके प्राचीन तटपर अश्वमेधयज्ञके (अनुष्ठानके) लिये धुन्धुको दीक्षित किया। ब्रह्मन्! शुक्राचार्यकी अनुमतिसे उनके शिष्य तथा भार्गव-गोत्रीय विद्वान् ब्राह्मण उस यज्ञमें सदस्य एवं ऋत्विक् बने। मुने! शुक्राचार्यकी अनुमतिसे दैत्यस्वामीने स्वर्भानु आदि असुरोंको (देवोंके स्थानपर) यज्ञभागका रक्षक और भोक्ता बनाया। उसके बाद यज्ञ आरम्भ हुआ और (दिग्विजय-सूचक) अश्व छोड़ा गया। असिलोमा नामका विराट् दैत्य घोड़ेके पीछे (उसकी रक्षाके लिये) चला॥ ३७–४१॥ | | ततोऽग्निधूमेन मही सशैला<br>व्याप्ता दिशः खं विदिशश्च पूर्णाः ।<br>तेनोग्रगन्धेन दिवस्पृशेन<br>मरुद्ववौ ब्रह्मलोके महर्षे ॥ ४२<br><br>तं गन्धमाघ्राय सुरा विषण्णा<br>जानन्त धुन्धुं हयमेधदीक्षितम् ।<br>ततः शरण्यं शरणं जनार्दनं<br>जग्मुः सशक्रा जगतः परायणम् ॥ ४३<br><br>प्रणम्य वरदं देवं पद्मनाभं जनार्दनम् ।<br>प्रोचुः सर्वे सुरगणा भयगद्गदया गिरा ॥ ४४<br><br>भगवन् देवदेवेश चराचरपरायण ।<br>विज्ञप्तिः श्रूयतां विष्णो सुराणामार्तिनाशन ॥ ४५ | महर्षे! उसके बाद यज्ञके धुएँसे पहाड़ोंके साथ पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ और विदिशाएँ भर गयीं। आकाशमें फैले उस उत्कट सुगन्धवाले धुएँसे मिली हुई वायु ब्रह्मलोकमें बहने लगी। उस गन्धको सूँघकर देवगण उदास हो गये। उन्हें यह पता चल गया कि धुन्धुने अश्वमेधकी दीक्षा ग्रहण की है (और यज्ञानुष्ठान कर रहा है)। उसके बाद वे इन्द्रसहित संसारके आश्रय और शरण देनेवाले भगवान् जनार्दनकी शरणमें गये। कमलनालको धारण करनेवाले वरदानी जनार्दन देवको प्रणाम कर सभी देवोंने भयसे विकल वाणीमें कहा—देवोंके दुःखको दूर करनेवाले तथा चर और अचरके कल्याण करनेमें नित्य उद्यत रहनेवाले देवाधिदेव विष्णो! आप हमारा निवेदन सुनें—॥ ४२–४५॥ | | धुन्धुनामासुरपतिर्बलवान् वरबृंहितः ।<br>सर्वान् सुरान् विनिर्जित्य त्रैलोक्यमहरद् बलिः ॥ ४६<br><br>ऋते पिनाकिनो देवात् त्राताऽस्मान् न यतो हरे ।<br>अतो विवृद्धिगमगद् यथा व्याधिरुपेक्षितः ॥ ४७<br><br>साम्प्रतं ब्रह्मलोकस्थानपि जेतुं समुद्यतः ।<br>शुक्रस्य मतमास्थाय सोऽश्वमेधाय दीक्षितः ॥ ४८<br><br>शतं क्रतूनामिष्ट्वासौ ब्रह्मलोकं महासुरः ।<br>आरोढुमिच्छति वशी विजेतुं त्रिदशानपि ॥ ४९ | धुन्धु नामका बलवान् दैत्यपति शंकरसे वर प्राप्त कर लेनेके कारण बढ़ गया है। उस बलवान्ने सभी देवोंको पराजितकर (उनसे) त्रिलोकी (-के अधिकार)-को छीन लिया है। हरे! पिनाक धारण करनेवाले शंकरके सिवा हम देवोंका कोई रक्षक न होनेसे वह असुर उपेक्षित रोगकी तरह (बहुत) बढ़ गया है। इस समय वह ब्रह्मलोकमें शरण लिये हुए रहनेपर भी हमलोगोंको (फिर) जीतनेके लिये तैयार होकर शुक्राचार्यके मतके अनुसार अश्वमेधयज्ञमें दीक्षित हो गया है। वह दैत्य (धुन्धु) सौ अश्वमेधयज्ञ करके देवताओंपर विजय पानेके लिये ब्रह्मलोकमें आक्रमण करना चाहता है। |
| अध्याय ७८ ] | प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव | ३८७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मादकालहीनं तु चिन्तयस्व जगद्गुरो।<br>उपायं मखविध्वंसे येन स्याम सुनिर्वृताः॥ ५० | इसलिये जगद्गुरो! आप उसके यज्ञको विध्वस्त करनेका उपाय बिना समय बिताये (तत्काल) सोचें, जिससे हमलोग निश्चिन्त हो सकें॥ ४६-५०॥ |
| श्रुत्वा सुराणां वचनं भगवान् मधुसूदनः।<br>दत्त्वाऽभयं महाबाहुः प्रेषयामास साम्प्रतम्।<br>विसृज्य देवताः सर्वा ज्ञात्वाऽजेयं महासुरम्॥ ५१<br>बन्धनाय मतिं चक्रे धुन्धोर्धर्मध्वजस्य वै।<br>ततः कृत्वा स भगवान् वामनं रूपमीश्वरः॥ ५२<br>देहं त्यक्त्वा निरालम्बं काष्ठवद् देविकाजले।<br>क्षणान्मज्जंस्तथोन्मज्जन्मुक्तकेशो यदृच्छया॥ ५३<br>दृष्टोऽथ दैत्यपतिना दैत्यैश्चान्यैस्तथर्षिभिः।<br>ततः कर्म परित्यज्य यज्ञियं ब्राह्मणोत्तमाः॥ ५४<br>समुत्तारयितुं विप्राद्रावन्त समाकुलाः।<br>सदस्या यजमानश्च ऋत्विजोऽथ महौजसः॥ ५५<br>निमज्जमानमुज्जह्नुः सर्वे ते वामनं द्विजम्।<br>समुत्तार्य प्रसन्नास्ते प्रप्रच्छुः सर्व एव हि।<br>किमर्थं पतितोऽसीह केनाक्षिप्तोऽसि नो वद॥ ५६ | सभी देवताओंको अभयदान देकर उन महाबाहुने उन देवताओंको लौटा दिया और उस महान् धर्मध्वजी (धर्मके नामपर पाखण्ड रचनेवाले) दैत्य धुन्धुको अजेय समझकर उन्होंने (श्रीहरिने) उसे बाँधनेका विचार किया। उसके बाद भगवान् विष्णुने बौनाका रूप धर लिया और देविका नदीके जलमें (अपनी) देहको लकड़ीकी तरह निरालम्ब छोड़ दिया। खुले हुए केशोंवाले वे क्षणमात्रमें अपने-आप डूबने-उतराने लगे। उसके बाद दैत्यपतिने तथा अन्य दैत्यों एवं ऋषियोंने उन्हें देखा। उसके बाद व्याकुल होकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञके सभी काम छोड़कर उस ब्राह्मणको निकालनेके लिये दौड़े। सभी सदस्य, यजमान एवं अति तेजस्वी ऋत्विजोंने डूबते हुए बौनाके आकारवाले ब्राह्मणको (नदीके जलसे बाहर) निकाला और उससे पूछा— हमें यह बतलाओ कि तुम यहाँ क्यों गिरे अथवा तुम्हें किसने फेंका?॥ ५१-५६॥ |
| तेषामाकर्ण्य वचनं कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>प्राह धुन्धुपुरोगांस्ताञ्छ्रूयतामत्र कारणम्॥ ५७<br>ब्राह्मणो गुणवानासीत् प्रभास इति विश्रुतः।<br>सर्वशास्त्रार्थवित् प्राज्ञो गोत्रतश्चापि वारुणः॥ ५८<br>तस्य पुत्रद्वयं जातं मन्दप्रज्ञं सुदुःखितम्।<br>तत्र ज्येष्ठो मम भ्राता कनीयानपरस्त्वहम्॥ ५९<br>नेत्रभास इति ख्यातो ज्येष्ठो भ्राता ममासुर।<br>मम नाम पिता चक्रे गतिभासेति कौतुकात्॥ ६० | उसने उनके वचनको सुनकर बार-बार काँपते हुए धुन्धु आदिसे कहा—आपलोग इसका कारण सुनें। वरुण-गोत्रमें उत्पन्न प्रभास नामके एक ब्राह्मण थे। वे सभी शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले और बुद्धिमान् थे। उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए। वे दोनों ही अल्पबुद्धि और अत्यन्त दुःखग्रस्त थे। उनमें मेरा भाई बड़ा और मैं छोटा हूँ। अये दैत्य! मेरा बड़ा भाई 'नेत्रभास' नामसे प्रसिद्ध है। मेरे पिताने कौतूहलवश मेरा नाम 'गतिभास' रख दिया॥ ५७-६०॥ |
| रम्यश्चावसथो धुन्धो शुभ्रश्चासीत् पितुर्मम।<br>त्रिविष्टपगुणैर्युक्तश्चारुरूपो महासुर॥ ६१<br>ततः कालेन महता आवयोः स पिता मृतः।<br>तस्यौर्ध्वदेहिकं कृत्वा गृहमावां समागतौ॥ ६२<br>ततो मयोक्तः स भ्राता विभजाम गृहं वयम्।<br>तेनोक्तो नैव भवतो विद्यते भाग इत्यहम्॥ ६३<br>कुब्जवामनखञ्जानां क्लीबानां श्वित्रिणामपि।<br>उन्मत्तानां तथान्धानां धनभागो न विद्यते॥ ६४ | महासुर धुन्धो! मेरे पिताका निवास-स्थान सुन्दर, आनन्ददायक, स्वर्गीय गुणोंसे युक्त एवं मनोहर था। उसके बाद बहुत दिनोंके पश्चात् हम दोनोंके पिता स्वर्ग चले गये। उनकी दाह-संस्कारादि-श्राद्धक्रिया करके हम दोनों भाई घर आ गये। उसके बाद मैंने (अपने उन) बड़े भाईसे कहा—हम दोनों आपसमें घरका बँटवारा कर लें। उसने मुझसे कहा—तुम्हारा हिस्सा नहीं है; क्योंकि कुबड़े, बौने, लँगड़े, हिजड़े, चरकवाले, पागल और अन्धोंका धनमें हिस्सा नहीं होता है। उन्हें केवल सोने |
| ३८८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| शय्यासनस्थानमात्रं स्वेच्छयान्नभुजक्रिया।<br>एतावद् दीयते तेभ्यो नार्थभागहरा हि ते॥ ६५ | भरका स्थान तथा अपनी इच्छाके अनुसार अन्नभोगका अधिकार दिया जाता है। वे सम्पत्तिके भागी—अधिकारी नहीं होते॥ ६१—६५॥ |
| एवमुक्ते मया सोक्तः किमर्थं पैतृकाद् गृहात्।<br>धनार्धभागमर्हामि नाहं न्यायेन केन वै॥ ६६<br>इत्युक्तवति वाक्येऽसौ भ्राता मे कोपसंयुतः।<br>समुत्क्षिप्याक्षिपन्नद्यामस्यां मामिति कारणात्॥ ६७<br>ममास्यां निम्नगायां तु मध्येन प्लवतो गतः।<br>कालः संवत्सराख्यस्तु युष्माभिरिह चोद्धृतः॥ ६८<br>के भवन्तोऽत्र सम्प्राप्ताः सस्नेहा बान्धवा इव।<br>कोऽयं च शक्रप्रतिमो दीक्षितो यो महाभुजः॥ ६९<br>तन्मे सर्वं समाख्यातं याथातथ्यं तपोधनाः।<br>महर्द्धिसंयुता यूयं सानुकम्पाश्च मे भृशम्॥ ७० | ऐसा कहनेपर मैंने उससे कहा कि अपने पिताके घरके धनके आधे हिस्सेका अधिकारी मैं किस न्यायसे और क्यों नहीं हूँ? ऐसा अभिप्राय-पूर्ण वाक्य कहनेपर क्रोधमें आकर मेरे भाईने मुझे उठाकर इस नदीमें फेंक दिया। मुझे इस नदीमें तैरते हुए एक वर्षका समय बीत गया। (अब) आपलोगोंने यहाँ मेरा उद्धार किया है। प्रेमी बान्धवोंके समान यहाँ उपस्थित आपलोग कौन हैं तथा यज्ञके लिये दीक्षित इन्द्रके समान ये महाबलशाली कौन हैं? तपोधनो! आपलोग यह सब ठीक-ठीक मुझे बतलाइये। आपलोग महान् ऐश्वर्यशाली और मेरे ऊपर अत्यन्त अनुग्रह करनेवाले हैं॥ ६६—७०॥ |
| तद् वामनवचः श्रुत्वा भार्गवा द्विजसत्तमाः।<br>प्रोचुर्वयं द्विजा ब्रह्मन् गोत्रतश्चापि भार्गवाः॥ ७१<br>असावपि महातेजा धुन्धुर्नाम महासुरः।<br>दाता भोक्ता विभक्ता च दीक्षितो यज्ञकर्मणि॥ ७२<br>इत्येवमुक्त्वा देवेशं वामनं भार्गवास्ततः।<br>प्रोचुर्दैत्यपतिं सर्वे वामनार्थकरं वचः॥ ७३<br>दीयतामस्य दैत्येन्द्र सर्वोपस्करसंयुतम्।<br>श्रीमदावसथं दास्यो रत्नानि विविधानि च॥ ७४<br>इति द्विजानां वचनं श्रुत्वा दैत्यपतिर्वचः।<br>प्राह द्विजेन्द्र ते दद्मि यावदिच्छसि वै धनम्॥ ७५ | वामनके उस वचनको सुनकर भार्गवकुलके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने कहा—ब्रह्मन्! हमलोग भार्गव गोत्रवाले ब्राह्मण हैं। ये अति तेजस्वी दाता, भोक्ता और विभक्ता धुन्धु नामके महान् असुर हैं। ये यज्ञकर्ममें दीक्षित हुए हैं। देवेश वामनसे ऐसा कहकर सभी भार्गव-गोत्रीय (ब्राह्मणोंने) असुरस्वामी धुन्धुसे वामनके प्रयोजनको सिद्ध करनेवाला वचन कहा—दैत्येन्द्र! आप इन्हें सम्पूर्ण साज-सज्जासे पूर्ण सम्पत्तिसे सम्पन्न घर, दासियाँ और विविध प्रकारके रत्न (आदि) प्रदान करें। ब्राह्मणोंके उस वचनको सुनकर असुरराज धुन्धुने यह वचन कहा—द्विजेन्द्र! मैं आपको आपकी इच्छाके अनुकूल धन दूँगा॥ ७१—७५॥ |
| दास्ये गृहं हिरण्यं च वाजिनः स्यन्दनान् गजान्।<br>प्रयच्छाम्यद्य भवतो व्रियतामीप्सितं विभो॥ ७६<br>तद्वाक्यं दानवपतेः श्रुत्वा देवोऽथ वामनः।<br>प्राहासुरपतिं धुन्धुं स्वार्थसिद्धिकरं वचः॥ ७७<br>सोदरेणापि हि भ्रात्रा ह्रियन्ते यस्य सम्पदः।<br>तस्याक्षमस्य यद्दत्तं किमन्यो न हरिष्यति॥ ७८ | विभो! आप अपने अभीष्ट पदार्थकी माँग करें। मैं आज आपको घर, सोना, घोड़े, रथ एवं हाथी प्रदान करूँगा। दैत्य-स्वामीके उस वाक्यको सुनकर (विप्ररूप धारण करनेवाले) भगवान् वामनने दानवपति धुन्धुसे अपने स्वार्थको साधनेवाला वचन कहा—सहोदर भाईने जिसकी (पैतृक) सम्पत्तिको ले लिया उस असमर्थको जो कुछ मिलेगा उसे क्या कोई दूसरा नहीं छीन लेगा? |
अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दासीदासांश्च भृत्यांश्च गृहं रत्ने परिच्छदम्।<br>समर्थेषु द्विजेन्द्रेषु प्रयच्छस्व महाभुज॥ ७९<br>मम प्रमाणमालोक्य मामकं च पदत्रयम्।<br>सम्प्रयच्छस्व दैत्येन्द्र नाधिकं रक्षितुं क्षमः॥ ८० | महाबाहो! आप दिये हुएकी रक्षा करनेमें समर्थ श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दासी, दास, नौकर, घर, रत्न और अच्छे वस्त्र दें। दैत्येन्द्र! मुझे तो मेरा परिमाण देखकर (केवल) तीन पग (भूमि) ही दे दें। (इससे) अधिककी रक्षा करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ७९-८०॥ |
| इत्येवमुक्ते वचने महात्मना<br>विहस्य दैत्याधिपतिः स ऋत्विजः।<br>प्रादाद् द्विजेन्द्राय पदत्रयं तदा<br>यदा स नान्यं प्रगृहाण किंचित्॥ ८१<br>क्रमत्रयं तावदवेक्ष्य दत्तं<br>महासुरेन्द्रेण विभुर्यशस्वी।<br>चक्रे ततो लङ्घयितुं त्रिलोकीं<br>त्रिविक्रमं रूपमनन्तशक्तिः॥ ८२<br>कृत्वा च रूपं दितिजांश्च हत्वा<br>प्रणम्य चर्षीन् प्रथमक्रमेण।<br>महीं महीध्रैः सहितां सहार्णवां<br>जहार रत्नाकरपत्तनैर्युताम्॥ ८३ | उन (विप्र वामन) महात्माके ऐसा वचन कहनेपर, जब उन्होंने और कुछ ग्रहण नहीं किया तब ऋत्विजोंसहित दानवपतिने हँसकर उन द्विजेन्द्रको तीन पग (भूमि) प्रदान कर दी। महान् असुरेन्द्रद्वारा तीन पग भूमि प्रदान की हुई देखकर अनन्त शक्तिवाले यशस्वी एवं विभु वामन भगवान्ने तीनों लोकोंको नाप लेनेके लिये त्रिविक्रम (विराट्) रूप धारण कर लिया। (विशाल) रूप धर लेनेके बाद उन्होंने दैत्योंका वध कर ऋषियोंको प्रणाम किया और प्रथम पादन्यासमें ही पर्वत, सागर, रत्नोंकी खान एवं नगरोंसे युक्त पृथ्वीको नापकर ले लिया॥ ८१-८३॥ |
| भुवं सनाकं त्रिदशाधिवासं<br>सोमार्कऋक्षैरभिमण्डितं नभः।<br>देवो द्वितीयेन जहार वेगात्<br>क्रमेण देवप्रियमीप्सुरीश्वरः॥ ८४<br>क्रमं तृतीयं न यदाऽस्य पूरितं<br>तदाऽतिकोपाद् दनुपुङ्गवस्य।<br>पपात पृष्ठे भगवांस्त्रिविक्रमो<br>मेरुप्रमाणेण तु विग्रहेण॥ ८५<br>पतता वासुदेवेन दानवोपरि नारद।<br>त्रिंशद्योजनसाहस्त्री भूमेर्गर्ता दृढीकृता॥ ८६ | देवताओंका प्रिय करनेकी इच्छावाले भगवान् वामनदेवने द्वितीय पगसे तुरंत ही देवताओंके निवास—स्वर्गके साथ ही भुवर्लोक, चन्द्र, सूर्य एवं नक्षत्रोंसे मण्डित आकाशको भी ग्रहण कर लिया। उनका तृतीय पादक्रम जब पूरा नहीं हुआ तो अत्यन्त क्रोधसे भगवान् त्रिविक्रम मेरुके समान शरीरसे दानवश्रेष्ठकी पीठपर गिर पड़े। नारदजी! वासुदेवके दानवके ऊपर गिरनेसे भूमिमें हजार योजनका सुदृढ़ गड्ढा बन गया॥ ८४-८६॥ |
| ततो दैत्यं समुत्पाट्य तस्यां प्रक्षिप्य वेगतः।<br>अवर्षत् सिकतावृष्ट्या तां गर्तामपूरयत्॥ ८७<br>ततः स्वर्गं सहस्राक्षो वासुदेवप्रसादतः।<br>सुराश्च सर्वे त्रैलोक्यमवापुर्निरुपद्रवाः॥ ८८<br>भगवानपि दैत्येन्द्रं प्रक्षिप्य सिकतार्णवे।<br>कालिन्द्या रूपमाधाय तत्रैवान्तरधीयत॥ ८९<br>एवं पुरा विष्णुरभूच्च वामनो<br>धुन्धुं विजेतुं च त्रिविक्रमोऽभूत्।<br>यस्मिन् स दैत्येन्द्रसुतो जगाम<br>महाश्रमे पुण्ययुतो महर्षे॥ ९० | उसके बाद उन्होंने दैत्यको उठाकर जोरसे उसमें फेंक दिया और बालुकी बरसासे उस गड्ढेको भर दिया। उसके बाद वासुदेवकी कृपासे इन्द्रने स्वर्ग पा लिया और उपद्रवोंसे रहित सम्पूर्ण देवोंको त्रिलोकीकी प्राप्ति हो गयी। कालिन्दी भी अपना स्वरूप धारणकर वहीं अन्तर्हित हो गयी। प्राचीन कालमें इस प्रकार धुन्धुको जीतनेके लिये विष्णु भगवान् वामन तथा (उसके बाद) त्रिविक्रम बने। महर्षि नारदजी! वह पुण्यात्मा दैत्येन्द्रपुत्र प्रह्लाद (तीर्थयात्राके प्रसङ्गमें) उसी आश्रममें गया॥ ८७-९०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७८॥
| ३९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७९ |
|---|
उन्नासीवाँ अध्याय
पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट तथा परस्पर वृत्तान्तका कहना एवं श्रवण-द्वादशीका माहात्म्य, गयामें श्राद्ध करनेसे प्रेत-योनिसे मुक्ति और पुरूरवाको सुरूपकी प्राप्ति
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
|---|---|
| कालिन्दीसलिले स्नात्वा पूजयित्वा त्रिविक्रमम्।<br>उपोष्या रजनीमेकां लिङ्गभेदं गिरिं ययौ॥ १<br><br>तत्र स्नात्वा च विमले भवं दृष्ट्वा च भक्तितः।<br>उपोष्या रजनीमेकां तीर्थं केदारमाव्रजत्॥ २<br><br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य चेशानं माधवं चाप्यभेदतः।<br>उषित्वा वासरान् सप्त कुब्जाम्रं प्रजगाम ह॥ ३<br><br>ततः सुतीर्थे स्नात्वा च सोपवासी जितेन्द्रियः।<br>हृषीकेशं समभ्यर्च्य ययौ बदरिकाश्रमम्॥ ४ | यमुनाजलमें स्नानकर प्रह्लादने त्रिविक्रम भगवान्की पूजा की। एक रात उपवास करनेके बाद (फिर) वे लिङ्गभेद नामक पर्वतपर चले गये। वहाँ विमल जलमें स्नानकर उन्होंने भक्तिसे भगवान् शंकरका दर्शन किया; एवं वहाँ भी एक रात निवासकर केदार नामके तीर्थमें गये। वहाँ स्नान करनेके बाद (उन्होंने) अभेदबुद्धिसे शिव एवं विष्णुका पूजन किया, (वहाँ) सात दिनोंतक रहकर कुब्जाम्रमें चले गये। उसके बाद उस सुन्दर तीर्थमें स्नानकर उपवास करनेवाले इन्द्रियजयी (प्रह्लाद) हृषीकेशका अर्चनकर बदरिकाश्रम चले गये॥ १–४॥ |
| तत्रोष्य नारायणमर्च्य भक्त्या<br>स्नात्वाऽथ विद्वान् स सरस्वतीजले।<br>वराहतीर्थे गरुडासनं स<br>दृष्ट्वाऽथ सम्पूज्य सुभक्तिमांश्च॥ ५<br><br>भद्रकर्णे ततो गत्वा जयेशं शशिशेखरम्।<br>दृष्ट्वा सम्पूज्य च शिवं विपाशामभितो ययौ॥ ६<br><br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य देवदेवं द्विजप्रियम्।<br>उपवासी इरावत्यां ददर्श परमेश्वरम्॥ ७<br><br>यमाराध्य द्विजश्रेष्ठ शाकले वै पुरूरवाः।<br>समवाप परं रूपमैश्वर्यं च सुदुर्लभम्॥ ८<br><br>कुष्ठरोगाभिभूतश्च यं समाराध्य वै भृगुः।<br>आरोग्यमतुलं प्राप सन्तानमपि चाक्षयम्॥ ९ | वहाँ रहते हुए सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन विद्वान् (प्रह्लादजी)-ने नारायणका पूजन किया। फिर अत्यन्त भक्तिके साथ उन्होंने वराहतीर्थमें गरुडासन विष्णुका दर्शन और पूजन किया। वहाँसे भद्रकर्णमें पहुँचकर जयेश शशिशेखर शिवका दर्शन तथा पूजन करके बादमें विपाशाकी ओर चले गये। उस विपाशामें स्नानके बाद द्विजप्रिय देवाधिदेवका अर्चन कर (प्रह्लाद) उपवास करते हुए इरावतीकी ओर चले गये। द्विजोत्तम! (उन्होंने) वहाँ उन भगवान्का दर्शन किया, जिनकी शाकलमें आराधना करनेसे (पहले) पुरूरवाको उत्तम रूप एवं सुदुर्लभ ऐश्वर्य प्राप्त हुआ था। कुष्ठरोगसे अभिभूत भृगुने उन परमेश्वरकी आराधना करके अतुलनीय नीरोगता और अक्षय सन्तान प्राप्त की थी॥ ५–९॥ |
| नारद उवाच<br>कथं पुरूरवा विष्णुमाराध्य द्विजसत्तम।<br>विरूपत्वं समुत्सृज्य रूपं प्राप श्रिया सह॥ १० | नारदने पूछा— द्विजोत्तम! पुरूरवाने विष्णुकी आराधना करनेके बाद विरूपताको छोड़कर ऐश्वर्यके साथ सुदुर्लभ सुन्दर रूप कैसे प्राप्त किया?॥ १०॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>पूर्वं त्रेतायुगस्यादौ यथावृत्तं तपोधन॥ ११ | पुलस्त्यजी बोले— तपोधन! सुनिये; मैं प्राचीन कालमें त्रेतायुगके आदिमें घटित, पापको नष्ट करनेवाली कथा |
अध्याय ७९ ] पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिक्की भेंट [ ३९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मद्रदेश इति ख्यातो देशो वै ब्रह्मणः सुत।<br>शाकलं नाम नगरं ख्यातं स्थानीयमुत्तमम्॥ १२<br>तस्मिन् विपणिवृत्तिस्थः सुधर्माख्योऽभवद् वणिक्।<br>धनाढ्यो गुणवान् भोगी नानाशास्त्रविशारदः॥ १३<br>स त्वेकदा निजाद् राष्ट्रात् सुराष्ट्रं गन्तुमुद्यतः।<br>सार्थेन महता युक्तो नानाविपणपण्यवान्॥ १४<br>गच्छतः पथि तस्याथ मरुभूमौ कलिप्रिय।<br>अभवद् दस्युतो रात्रौ अवस्कन्दोऽतिदुःसहः॥ १५ | कहता हूँ। ब्रह्मपुत्र! प्रसिद्ध मद्रदेशमें शाकल नामसे प्रसिद्ध उत्तम नगर है। वहाँ सुधर्मा नामका एक धनी, गुणशाली, भोगी एवं नाना शास्त्रोंमें निपुण व्यापारी रहता था। एक समय वह अपने देशसे सुराष्ट्र जानेको तैयार हुआ। कलिप्रिय! अनेक बेंची जानेवाली वस्तुओंसे युक्त व्यापारियोंके भारी समुदायके साथ जाते समय मार्गमें मरुभूमिमें रातमें (उसके ऊपर) डाकुओंका अत्यन्त उग्र असहनीय आक्रमण हुआ॥ ११—१५॥ |
| ततः स हृतसर्वस्वो वणिग्दुःखसमन्वितः।<br>असहायो मरौ तस्मिंश्चचारोन्मत्तवद् वशी॥ १६<br>चरता तदरण्यं वै दुःखान्क्रान्तेन नारद।<br>आत्मा इव शमीवृक्षो मरावासादितः शुभः॥ १७<br>तं मृगैः पक्षिभिश्चैवं हीनं दृष्ट्वा शमीतरुम्।<br>श्रान्तः क्षुत्तृत्परीतात्मा तस्याधः समुपाविशत्॥ १८<br>सुप्तश्चापि सुविश्रान्तो मध्याह्ने पुनरुत्थितः।<br>सम्पश्यदथायान्तं प्रेतं प्रेतशतैर्वृतम्॥ १९ | उसके बाद सब कुछ लुट जानेसे दुखी हुआ वह असहाय वणिक् मरुभूमिमें पागलकी भाँति इधर-उधर घूमने लगा। नारदजी! दुःखसे ग्रसित होकर उस वनमें घूमते हुए उसे मरुभूमिमें अपने जनके समान एक सुन्दर शमीका वृक्ष मिला। थका तथा भूख-प्याससे अभिभूत हुआ वह वणिक् उस शमीवृक्षको पशु-पक्षियोंसे रहित देखकर उसके नीचे बैठ गया और सो गया तथा पूर्ण विश्राम कर दोपहरको जगा। उसके बाद उसने सैकड़ों प्रेतोंसे घिरे एक प्रेतको आते हुए देखा॥ १६—१९॥ |
| उद्वाह्यन्तमथान्येन प्रेतेन प्रेतनायकम्।<br>पिण्डाशिभिश्च पुरतो धावद्भी रूक्षविग्रहैः॥ २०<br>अथाजगाम प्रेतोऽसौ पर्यटित्वा वनानि च।<br>उपागम्य शमीमूले वणिक्पुत्रं ददर्श सः॥ २१<br>स्वागतेनाभिवाद्यैनं समाभाष्य परस्परम्।<br>सुखोपविष्टश्छायायां पृष्टाकुशलमाप्तवान्॥ २२<br>ततः प्रेताधिपतिना पृष्टः स तु वणिक्सखः।<br>कुत आगम्यते ब्रूहि क्व साधो वा गमिष्यसि॥ २३ | प्रेतनायकको एक दूसरा प्रेत ढो रहा था और आगे रूखे शरीरवाले प्रेत दौड़ रहे थे। वनोंमें घूमनेके बाद वह प्रेत लौट रहा था। शमीवृक्षके नीचे आकर उसने वणिक्पुत्रको देखा। स्वागतके साथ उसे अभिवादन किया। फिर (दोनोंने) परस्पर वार्तालाप किया। इसके बाद वह प्रेत छायामें सुखपूर्वक बैठ गया और उसने उससे कुशल पूछी और जानी। उसके बाद प्रेताधिपतिने वणिक्-बन्धुसे पूछा—साधो! यह बतलाओ कि तुम कहाँसे आ रहे हो और कहाँ जाओगे?॥ २०—२३॥ |
| कथं चेदं महारण्यं मृगपक्षिविवर्जितम्।<br>समापन्नोऽसि भद्रं ते सर्वमाख्यातुमर्हसि॥ २४<br><br>एवं प्रेताधिपतिना वणिक् पृष्टः समासतः।<br>सर्वमाख्यातवान् ब्रह्मन् स्वदेशधनविच्युतिम्॥ २५<br><br>तस्य श्रुत्वा स वृत्तान्तं तस्य दुःखेन दुःखितः।<br>वणिक्पुत्रं ततः प्राह प्रेतपालः स्वबन्धुवत्॥ २६<br><br>एवं गतेऽपि मा शोकं कर्तुमर्हसि सुव्रत।<br>भूयोऽप्यर्थाः भविष्यन्ति यदि भाग्यबलं तव॥ २७ | तुम्हारा कल्याण हो। मुझे यह बताओ कि पशु एवं पक्षियोंसे रहित इस बड़े जंगलमें तुम कैसे आये?<br>(पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! प्रेतराजके इस प्रकार पूछनेपर वणिक्ने थोड़ेमें उसे अपने देशका एवं धन-नाशका पूरा विवरण कह सुनाया। उसका पूरा वृत्तान्त सुन लेनेके बाद उसके दुःखसे दुखी होकर प्रेतपालने अपने बन्धुके समान (उसे मानते हुए) उस वणिक्-पुत्रसे कहा—सुव्रत! ऐसा होनेपर भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। यदि तुम्हारा भाग्य प्रबल होगा तो धन फिर हो जायगा॥ २४—२७॥ |
३१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भाग्यक्षयेऽर्थाः क्षीयन्ते भवन्त्यभ्युदये पुनः।<br>क्षीणस्यास्य शरीरस्य चिन्तया नोदयो भवेत्॥ २८<br><br>इत्युच्चार्य समाहूय स्वान् भृत्यान् वाक्यमब्रवीत्।<br>अद्यातिथिरयं पूज्यः सदैव स्वजनो मम॥ २९<br><br>अस्मिन् दृष्टे वणिक्पुत्रे यथा स्वजनदर्शनम्।<br>अस्मिन् समागते प्रेताः प्रीतिर्जाता ममातुला॥ ३०<br><br>एवं हि वदतस्तस्य मृत्पात्रं सुदृढं नवम्।<br>दध्योदनेन सम्पूर्णमाजगाम यथेप्सितम्॥ ३१<br><br>तथा नवा च सुदृढा सम्पूर्णा परमाम्भसा।<br>वारिधानी च सम्प्राप्ता प्रेतानामग्रतः स्थिता॥ ३२ | (देखो,) भाग्यके क्षय होनेपर धनोंका क्षय हो जाता है और फिर भाग्योदय हो जानेपर पुनः धन प्राप्त हो जाते हैं। चिन्तासे क्षीण हुए शरीरका उत्थान (वृद्धि) नहीं होता। ऐसा कहकर उसने अपने सेवकोंको बुलाया और उनसे कहा—मेरे अपने जनके समान इस अतिथिका सब प्रकारसे सत्कार करो। प्रेतो! स्वजनदर्शनके समान ही मुझे इस वणिक्पुत्रका दर्शन हुआ है। इसके मिलनेसे मुझे अत्यधिक प्रीति प्राप्त हुई है। उसके ऐसा कहनेपर इच्छाभर (भोजन-योग्य) दही और भातसे भरा अत्यन्त दृढ़ एक नया मिट्टीका पात्र आ गया। इसी प्रकार निर्मल शीतल जलसे भरा एक पानीका पात्र भी उन प्रेतोंके सामने उपस्थित हो गया॥ २८—३२॥ |
| तमागतं ससलिलमन्नं वीक्ष्य महामतिः।<br>प्राहोत्तिष्ठ वणिक्पुत्र त्वमाह्निकमुपाचर॥ ३३<br><br>ततस्तु वारिधान्यास्तौ सलिलेन विधानतः।<br>कृताह्निकावुभौ जातौ वणिक् प्रेतपतिस्तथा॥ ३४<br><br>ततो वणिक्सुतायादौ दध्योदनमथेच्छया।<br>दत्त्वा तेभ्यश्च सर्वेभ्यः प्रेतेभ्यो व्यददात् ततः॥ ३५<br><br>भुक्तवत्सु च सर्वेषु कामतोऽम्भसि सेविते।<br>अनन्तरं स बुभुजे प्रेतपालो वराशनम्॥ ३६ | उस अन्न एवं जलको प्रस्तुत हुए देखकर महामति प्रेतने कहा—वणिक्पुत्र! तुम उठो एवं दैनिक (नित्य) कृत्य करो। उसके बाद वणिक् एवं प्रेतपति—दोनोंने घड़ेके जलसे विधिपूर्वक नित्य-क्रिया सम्पन्न की। उसके बाद (प्रेतपतिने) पहले वणिक्पुत्रको पर्याप्त दही और भात दिया और तब उन प्रेतोंको दिया। सभीके इच्छाभर भोजन एवं जलपान करनेके बाद प्रेतनायकने उत्तम भोजन किया॥ ३३—३६॥ |
| प्रकामवृप्ते प्रेते च वारिधान्योदनं तथा।<br>अन्तर्धानमगाद् ब्रह्मन् वणिक्पुत्रस्य पश्यतः॥ ३७<br><br>ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा स मतिमान् वणिक्।<br>पप्रच्छ तं प्रेतपालं कौतूहलमना वशी॥ ३८<br><br>अरण्ये निर्जने साधो कुतोऽन्नस्य समुद्भवः।<br>कुतश्च वारिधानीयं सम्पूर्णा परमाम्भसा॥ ३९<br><br>तथामी तव ये भृत्यास्त्वत्तस्ते वर्णतः कृशाः।<br>भवानपि च तेजस्वी किंचित्पुष्टवपुः शुभः॥ ४०<br><br>शुक्लवस्त्रपरीधानो बहूनां परिपालकः।<br>सर्वमेतन्ममाचक्ष्व को भवान् का शमी त्वियम्॥ ४१ | (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) ब्रह्मन्! प्रेतके भलीभाँति तृप्त हो जानेपर वणिक्पुत्रके देखते-ही-देखते जलपात्र और ओदन आँखोंसे ओझल हो गये। तब उस अत्यन्त ही आश्चर्यजनक दृश्यको देखकर उस बुद्धिमान् संयमी वणिक्ने उत्सुकतापूर्वक उस प्रेतपतिसे पूछा—साधो! इस निर्जन वनमें अन्न एवं उत्तम जलसे भरा घड़ा कहाँसे आ गया? अपेक्षाकृत तुम्हारे वर्णकी दृष्टिसे दुबले ये तुम्हारे भृत्य कौन हैं? कुछ हृष्ट-पुष्ट शरीरवाले सुन्दर, तेजसे सम्पन्न और शुक्लवस्त्रधारी (हमारे-जैसे) बहुतोंकी परिरक्षा करनेवाले आप भी कौन हैं? आप मुझे यह सम्पूर्ण विवरण बतलाएँ कि आप कौन हैं एवं यह शमीवृक्ष कौन है?॥ ३७—४१॥ |
| इत्थं वणिक्सुतवचः श्रुत्वासौ प्रेतनायकः।<br>शशंस सर्वमस्याद्यं यथावृत्तं पुरातनम्॥ ४२<br><br>अहमासं पुरा विप्रः शाकले नगरोत्तमे।<br>सोमशर्मेति विख्यातो बहुलागर्भसम्भवः॥ ४३ | वणिक्पुत्रके ऐसे वचनको सुनकर उस प्रेतनायकने उससे सारे पुराने वृत्तान्तको कहा। (उसने कहा—) प्राचीन कालमें उत्तम शाकल नामके श्रेष्ठ नगरमें बहुलाके गर्भसे उत्पन्न हुआ मैं सोमशर्मा—इस नामसे |
| अध्याय ७९ ] | पुरूरवाको रूपकी प्राप्ति और उसी सन्दर्भमें प्रेत और वणिककी भेंट | ३९३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ममास्ति च वणिक् श्रीमान् प्रातिवेश्यो महाधनः।<br>स तु सोमश्रवा नाम विष्णुभक्तो महायशाः॥ ४४<br><br>सोऽहं कदर्यो मूढात्मा धनेऽपि सति दुर्मतिः।<br>न ददामि द्विजातिभ्यो न चाश्नाम्यन्नमुत्तमम्॥ ४५ | प्रसिद्ध ब्राह्मण था। मेरा एक पड़ोसी बहुत धनवान्, लक्ष्मीवान् वणिक् था, जिसका नाम था सोमश्रवा। वह महान् यशस्वी और विष्णुका भक्त था। मैं कृपण एवं दुर्मति था। अतः धन होते हुए भी न तो ब्राह्मणोंको दान करता था और न अच्छे अन्नका भोजन ही करता था॥ ४२–४५॥ |
| प्रमादाद् यदि भुञ्जामि दधिक्षीरघृतान्वितम्।<br>ततो रात्रौ नृभिर्घोरैस्ताड्यते मम विग्रहः॥ ४६<br><br>प्रातर्भवति मे घोरा मृत्युतुल्या विषूचिका।<br>न च कश्चिन्ममाभ्यासे तत्र तिष्ठति बान्धवः॥ ४७<br><br>कथं कथमपि प्राणा मया सम्प्रति धारिताः।<br>एवमेतादृशः पापी निवसाम्यतिनिर्घृणः॥ ४८<br><br>सौवीरतिलपिण्याकसक्तुशाकादिभोजनैः ।<br>क्षपयामि कदन्नाद्यैरात्मानं कालयापनैः॥ ४९ | यदि मैं कभी भूलसे दही, दूध एवं घीसे युक्त पदार्थ भोजन कर लेता था तो रात्रिमें भयङ्कर मनुष्य मेरे शरीरको पीड़ित करते थे। प्रातःकाल मुझे मरणके समान (कष्ट देनेवाली) भयङ्कर विषूचिका (हैजा) हो जाया करती थी। उस समय मेरे पास कोई भी बन्धु नहीं रहता था। मैं किसी-किसी प्रकार अपने प्राणोंको धारण करता था। इस प्रकार मैं अति निर्लज्ज पापयुक्त जीवन बिताता रहा। बेर, तिलपिण्याक, सत्तू, शाकादि एवं बुरे अन्नों (मोटे अन्न—) कोदो, साँवा आदिको खाकर समय बिताते हुए मैं स्वयंको दुर्बल कर रहा था॥ ४६–४९॥ |
| एवं तत्रासतो मह्यं महान् कालोऽभ्यगादथ।<br>श्रवणद्वादशी नाम मासि भाद्रपदेऽभवत्॥ ५०<br><br>ततो नागरिको लोको गतः स्नातुं हि सङ्गमम्।<br>इरावत्या नड्वलाया ब्रह्मक्षत्रपुरस्सरः॥ ५१<br><br>प्रातिवेश्यप्रसङ्गेन तत्राप्यनुगतोऽस्म्यहम्।<br>कृतोपवासः शुचिमानेकादश्यां यतव्रतः॥ ५२<br><br>ततः सङ्गमतोयेन वारिधानीं दृढां नवाम्।<br>सम्पूर्णां वस्तुसंवीतां छत्रोपानहसंयुताम्॥ ५३<br><br>मृत्पात्रमपि मिष्टस्य पूर्णं दध्योदनस्य ह।<br>प्रदत्तं ब्राह्मणेन्द्राय शुचये ज्ञानधर्मिणे॥ ५४ | मुझे वहाँ इस ढंगसे रहते हुए बहुत समय बीत गया। (एक बार) भाद्रपदमासमें श्रवणद्वादशीकी तिथि आयी। तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि नागरिक लोग इरावती और नड्वला नदियोंके संगममें स्नान करनेके लिये गये। पड़ोसी होनेके कारण मैं भी उनके पीछे-पीछे चला गया। एकादशीके दिन मैंने व्रत रहकर पवित्रतासे उपवास किया। उसके बाद मैंने अनेक वस्तुओं—छाता, जूता और साथ ही सङ्गमके जलसे भरा नवीन दृढ़ जलपात्र एवं मिष्टान्न, दधि तथा ओदनसे पूर्ण मिट्टीका पात्र ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रदान किया॥ ५०–५४॥ |
| तदेव जीवतो दत्तं मया दानं वणिक्सुत।<br>वर्षाणां सप्ततीनां वै नान्यद् दत्तं हि किंचन॥ ५५<br><br>मृतः प्रेतत्वमापन्नो दत्त्वा प्रेतान्नमेव हि।<br>अमी चादत्तदानास्तु मदन्नेनोपजीविनः॥ ५६<br><br>एतत्ते कारणं प्रोक्तं यत्तदन्नं मयाम्भसा।<br>दत्तं तदिदमायाति मध्याह्नेऽपि दिने दिने॥ ५७<br><br>यावन्नाहं च भुञ्जामि न तावत् क्षयमेति वै।<br>मयि भुक्ते च पीते च सर्वमन्तर्हितं भवेत्॥ ५८ | वणिक्पुत्र! मैंने अपने सत्तर वर्षोंके (पूरे) जीवनमें (केवल) वही दान दिया था। इसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं दान किया। प्रेतान्न दान करके मृत्युके बाद मैं प्रेत हो गया। मेरे अन्नसे जीवन धारण करनेवाले इन लोगोंने भी दान कभी नहीं किया है। मैंने तुम्हें वह कारण बतलाया जिससे मेरे द्वारा दिये गये अन्न-जल प्रतिदिन दोपहरके समय (मेरे समीप) आ जाते हैं। जबतक मैं नहीं खाता, तबतक उनका क्षय नहीं होता। मेरे खाने और पीनेके बाद सभी कुछ अदृश्य हो जाता है॥ ५५–५८॥ |
| ३९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यच्छातातपत्रमददं सोऽयं जातः शमीतरुः।<br>उपानद्युगले दत्ते प्रेतो मे वाहनोऽभवत्॥ ५९<br><br>इयं तवोक्ता धर्मज्ञ मया कीनाशतात्मनः।<br>श्रवणद्वादशीपुण्यं तवोक्तं पुण्यवर्धनम्॥ ६०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने वणिक्पुत्रोऽब्रवीद् वचः।<br>यन्मया तात कर्त्तव्यं तदनुज्ञातुमर्हसि॥ ६१<br><br>तत् तस्य वचनं श्रुत्वा वणिक्पुत्रस्य नारद।<br>प्रेतपालो वचः प्राह स्वार्थसिद्धिकरं ततः॥ ६२ | मैंने जो छाताका दान किया था, वही इस शमीवृक्षके रूपमें उत्पन्न हुआ है। एक जोड़ा जूताका दान करनेसे प्रेत मेरा वाहन बना है। धर्मज्ञ! अपने प्रेतत्व-प्राप्तिका यह समस्त विवरण मैंने तुमसे कह सुनाया तथा परम पवित्र और पुण्यको बढ़ानेवाली श्रवणद्वादशीका भी वर्णन कर दिया। प्रेतके ऐसा कहनेपर वणिक्पुत्रने कहा—तात! मुझे जो करना हो उसकी आज्ञा दें। (पुलस्त्यजी कहते हैं कि) नारदजी! वणिक्पुत्रका वह वचन सुनकर प्रेतपति अपनी स्वार्थसिद्धिकी बात कहने लगा—॥ ५९—६२॥ |
| यत् त्वया तात कर्त्तव्यं मद्धितार्थं महामते।<br>कथयिष्यामि तत् सम्यक् तव श्रेयस्करं मम॥ ६३<br><br>गयायां तीर्थजुष्टायां स्नात्वा शौचसमन्वितः।<br>मम नाम समुद्दिश्य पिण्डनिर्वपणं कुरु॥ ६४<br><br>तत्र पिण्डप्रदानेन प्रेतभावादहं सखे।<br>मुक्तस्तु सर्वदातॄणां यास्यामि सहलोकताम्॥ ६५<br><br>यथेयं द्वादशी पुण्या मासि प्रौष्ठपदे सिता।<br>बुधश्रवणसंयुक्ता साऽतिश्रेयस्करी स्मृता॥ ६६ | महामते! मेरे हितके लिये तुम्हें करने योग्य कर्म मैं बतलाता हूँ। उसे अच्छी तरह सम्पन्न कर लेनेसे तुम्हारा और मेरा (दोनोंका) कल्याण होगा। (देखो,) गया-तीर्थमें (जाकर और) स्नानसे पवित्र होकर मेरे नाम (उद्देश्य)-से तुम पिण्डदान करो। सखे! वहाँ पिण्डदान करनेसे मैं प्रेतभावसे मुक्त होकर सर्वस्व दान करनेवालोंको मिलनेवाले लोकको प्राप्त कर लूँगा। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी बुधवार एवं श्रवण नक्षत्रसे युक्त पुण्य बढ़ानेवाली अत्यन्त माङ्गलिक यह द्वादशी (तिथि) कही गयी है॥ ६३—६६॥ |
| इत्येवमुक्त्वा वणिजं प्रेतराजोऽनुगैःसह।<br>स्वनामानि यथान्यायं सम्यगाख्यातवाञ्छुचिः॥ ६७<br><br>प्रेतस्कन्धे समारोप्य त्याजितो मरुमण्डलम्।<br>रम्येऽथ शूरसेनाख्ये देशे प्राप्तः स वै वणिक्॥ ६८<br><br>स्वकर्मधर्मयोगेन धनमुच्चावचं बहु।<br>उपार्जयित्वा प्रययौ गयाशीर्षमनुत्तमम्॥ ६९<br><br>पिण्डनिर्वपणं तत्र प्रेतानामनुपूर्वशः।<br>चकार स्वपितॄणां च दायादानामनन्तरम्॥ ७० | वणिक्से ऐसा कहकर प्रेतराजने अपने अनुचरोंसहित पवित्रतापूर्वक यथोचित क्रमसे अपने (पितरोंके) नामोंको बताया। उसे प्रेतके कन्धेपर चढ़ाकर मरु-भूमिसे बाहर छोड़ दिया गया। इस प्रकार वह वणिक् शूरसेन नामके सुन्दर देशमें पहुँच गया। अपने कर्म तथा धर्मसे उसने अधिक मात्रामें उत्कृष्ट एवं हीन धन उपार्जित कर लिया। उसके बाद वह उत्तम गयाशीर्ष नामके तीर्थमें गया। वहाँ क्रमशः प्रेतोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करनेके बाद उसने अपने पितरों एवं दायादोंको भी पिण्डदान किया॥ ६७-७०॥ |
| आत्मनश्च महाबुद्धिर्महाबोध्यं तिलैर्विना।<br>पिण्डनिर्वपणं चक्रे तथान्यानपि गोत्रजान्॥ ७१<br><br>एवं प्रदत्तेष्वथ वै पिण्डेषु प्रेतभावतः।<br>विमुक्तास्ते द्विज प्रेता ब्रह्मलोकं ततो गताः॥ ७२ | उस महाबुद्धि (वणिक्)-ने अपने लिये तिलसे रहित महाबोध्य नामका पिण्डदान किया। उसके बाद अन्य गोत्रोंमें उत्पन्न हुओंके उद्देश्यसे भी पिण्डदान किया। द्विज! इस प्रकार पिण्डदान करनेपर वे प्रेत प्रेत-योनिसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको चले गये। |