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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

टिप्पणी (नोट्स) ६४७ चूड़ाकरण में प्रतिबन्धक तत्त्व संस्कारमयूख में बताया गया है :- गर्भे मातुः कुमारस्य न कुर्याच्चौलकर्म तु । पञ्चमासादधः कुर्यादत ऊर्ध्वं न कारयेत् ॥ श्लो० १४ - 'उपनयनमित्यत्र ण्यन्तप्रयोगादुपनयनमन्यद्वारा अपि कर्त्तव्यम्' यह शूलपाणि का मत है। बृहस्पति ने विशेषता बतलाई है :- द्वितीयजन्मनः पूर्वमारभेताक्षरान् सुधीः । मौञ्जीबन्धस्ततः पश्चाद्वेदारम्भो विधीयते ॥ इस प्रसङ्ग में गौतम का मत निम्नलिखित है :- उपनयनं ब्राह्मणस्य अष्टमे नवमे पञ्चमे वा काम्यम् । राज्ञाम् - राजन् शब्द क्षत्रिय जाति का वाचक है। श्लो० १५- महाव्याहृति के विषय में मनु का कथन है :- ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ॥ त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ गौतम तथा हरदत्त के अनुसार - भूः, भुवः, स्वः, पुरुषः तथा सत्यम् ये पांच महाव्याहृतियां हैं। मूल में महाव्याहृति-पद प्रणव का भी उपलक्षण है। अत एव मनु का वचन है :- ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनोङ्कृतं सर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥ श्लो० १६- कर्णस्थः = दक्षिण कर्ण पर स्थित। अत एव कहा गया है:-पवित्रं दक्षिणे कर्णे कृत्वा विण्मूत्रमाचरेत् ॥ यह नियम भी एक-वस्त्र- युक्त होने पर पालनीय है। अन्यथा निम्नलिखित यम-वचन के अनुसार कार्य करना चाहिए :- कृत्वा यज्ञोपवीतन्तु पृष्ठतः कण्ठलम्बितम् ॥ मुख-नियम भी सम्भव होने पर अनुसरणीय है। अन्यथा निम्न-निर्दिष्ट यम-वचन का आदर करना चाहिए:- छायायामन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः । यथासुखमुखः कुर्यात् प्राण-बाध-भयेषु च ॥ श्लो० १७- मृद्भिः-संख्या-नियम मनुस्मृति में बतलाया गया है :- एका लिङ्गे गुदे तिस्रः तथैकत्र करे दश । उभयोः सप्त दातव्या मृदः शुद्धिमभीप्सता ॥

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

६४८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः एकत्र करे = वाम कर में । किन्तु यदि उपर्युक्त संख्या से शुद्धि नहीं हो सके तो संख्याधिक्य का भी अवलम्बन करना ही चाहिए । यदि तु उक्त संख्या से अल्प-संख्या के द्वारा भी शुद्धि हो जाय तब भी उपर्युक्त संख्या- नियम को अदृष्टार्थ मानना चाहिए । शौच के विषय में आश्रम का नियम मनु ने बतलाया है :— एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् । त्रिगुणं स्याद्वनस्थानां यतीनान्तु चतुर्गुणम् ॥ यह नियम दिवा-शौच-विषयक है । रात्रि-शौच आदि के विषय में दक्ष का कथन निम्नलिखित है :— यच्चोदितं दिवाशौचमर्धं रात्रौ विधीयते । आतुरस्य तदर्धं स्यात् तदर्धन्तु पथि स्मृतम् ॥ आतुर पद अरयातुर का अभिधायक है । अत एव आपस्तम्ब का भी कथन है:— आर्तः कुर्याद् यथाबलम् ॥ स्त्री-शूद्र आदि के शौच में संख्या-नियम नहीं है । अत एव देवल का वचन है:— यावता मन्यते शुद्धिं शौचं कुर्वीत तावता । प्रमाणं द्रव्य-संख्या च न शिष्टैरुपदिश्यते ॥ श्लो० १८—अन्तर्जानु— देवल का मत इस विषय में यह है:—"शिखां बद्ध्वा वसित्वा" इति । ब्राह्मेण—यह प्रधान पक्ष है । मनु ने पक्षान्तर भी बतलाये हैं:— ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्य-कालमुपस्पृशेत् । कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ॥ त्रैदशिक = दैव-तीर्थ । श्लो० २०—खानि = शिरःस्थित इन्द्रियों को । अत एव गौतम का वचन है:—"खानि चोपस्पृशेत् शीर्षण्यानि ।" मनु ने कुछ विशेष बत- लाया है :— त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विःप्रमृज्यात्ततो मुखम् । खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च ॥ आत्मानम् = हृदय को, क्यों कि श्रुति में हृदय को आत्मा का स्थान बतलाया गया है :— "हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः ।"

टिप्पणी (नोट्स) ६४६ श्लो० २५—सन्ध्यामिति—अविद्यमानार्द्धाधिकमार्त्तण्डमण्डलः स्पृष्टलक्ष्य- नक्षत्त्रगणः कालविशेषः सन्ध्या—वीरमित्रोदय । सन्ध्या का लक्षण योगि-याज्ञ- वल्क्य ने बतलाया है :— त्रयाणां चैव देवानां ब्रह्मादीनां समागमः । सन्धिः सर्वसुराणां च सन्ध्या तेन प्रकीर्तिता ॥ सन्ध्या-फल का निर्देश मनु ने किया है :— पूर्वा सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमान्तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ यहां अनध्यायादिप्रतिबन्ध नहीं है। अत एव मनु का कथन है:— वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके । नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि ॥ अग्निकार्यम्—यह उपलक्षण है :— अग्नीन्धनं भैक्षचर्यामधः शय्यां गुरोर्हितम् । आसमावर्त्तनात् कुर्यात् कृतोपनयनो द्विजः ॥ अधःशय्याम् = अखट्‌वाशयनम् , न तु स्थण्डिलशायित्वमेव—कुल्लूक- भट्ट । श्लो० २६—अभिवादयेत् इति । अभिवादन का प्रकार मनु ने बतलाया है:— व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः । सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ॥ अभिवादन-वाक्य-प्रयोग के विषय में मनु का कथन है :— अभिवादात्परं विप्रो ज्यायांसमभिवादयन् । असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत् ॥ नामधेयस्य ये के चिदभिवादं न जानते । तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात् स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥ भोः शब्दं कीर्त्तयेदन्ते स्वस्य नाम्नोऽभिवादने । और प्रत्यभिवादन-प्रकार भी मनु ने ही बतलाया है :— आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने । अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ॥ यहाँ अकार स्वरमात्र का उपलक्षक है, क्यों कि नाम में अकारान्तत्व का नियम नहीं है ।

६५० याज्ञवल्क्यस्मृतिः 'गुरु' चैवाप्युपासीत' में उपासन का अर्थ प्रणाम से अतिरिक्त उपासना के लिए है, क्योंकि प्रणाम वृद्ध-प्रणाम-पूर्वक ही मनु के द्वारा बतलाया गया है :— लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽऽध्यात्मिकमेव वा । आददीत यतो ज्ञानं तत्पूर्वमभिवादयेत् ॥ श्लो० २९—दण्ड के विषय में मनु का वचन है :— ब्राह्मणो बैल्व-पालाशौ क्षत्रियो वाट-खादिरौ । पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ दण्ड का प्रमाण भी मनु ने ही बतलाया है :— केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः । ललाट-सम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ अजिन के विषय में बृहस्पति का वचन है :— कृष्णाजिनञ्चाह्मणस्य रौरवं क्षत्रियस्य तु । बस्ताजिनन्तु वैश्यस्य सर्वेषां वा गवाजिनम् ॥ बस्ताजिनम् = छाग-चर्म । यम के अनुसार "सर्वेषां रौरवाजिनम्" का सिद्धान्त है। परन्तु दोनों ही मत तत्तत् अजिन के अभाव में ग्राह्य हैं । उपवीत के विषय में मनु का मत निम्नलिखित है :— कार्पासमुपवीतं स्यात् विप्रस्योर्ध्व-वृतं त्रिवृत् । शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसूत्रजम् ॥ त्रिवृत् = तीन गुण करके । ऊर्ध्ववृतम् = दक्षिणावर्तित । यहाँ छन्दोग- परिशिष्ट में निम्नलिखित विशेष है :— ऊर्ध्वन्तु त्रिवृतं कार्यं तन्तुत्रयमथोवृतम् । त्रिवृतं चोपवीतं स्यात् तत्रैको ग्रन्थिरिष्यते ॥ अधोवृतम् = वामावर्तित । एवञ्च तीन सूत्रों को वामावर्तित करने के पश्चात् पुनः तीन बार दक्षिणावर्तित करने पर सङ्कलन में नौ सूत्र हो जाते हैं । उसके प्रत्येक त्रिक में एक ग्रन्थि होनी चाहिए । मेखलाम्—इस विषय में मनु का वचन निम्न-निर्दिष्ट है :— मौञ्जी त्रिवृत् समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला । क्षत्रियस्य तु मौर्वी ज्या वैश्यस्य शण-तान्तवी ॥ मूर्वा = एक प्रकार की लता । ज्या-पद के निर्देश से क्षत्रिय की मेखला में त्रिवृत्व का सम्बन्ध नहीं होता है, क्योंकि वैसा होने पर ज्यात्व का ही

टिप्पणी (नोट्स) ६५१ अपहार हो जायगा—ऐसा मेधातिथि तथा गोविन्दराज का मत है। अनुकल्प का भी निर्देश मनु ने किया है :— मुञ्जालाभे तु कर्त्तव्या कुशाऽश्मन्तक-बल्वजैः । त्रिवृता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ अश्मन्तक = कुश सदृश तृणविशेष । बल्वज = 'सावय'। मेखला आदि के नष्ट होने पर क्या करना चाहिए इसका नियम मनु ने ही बतलाया है :— मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् । अप्सु प्राश्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ ब्राह्मणेषु चरेद् भैक्षम्—यह मनूक्त का उपलक्षण है :— मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् । भिक्षेत भिक्षाप्रथमं या चैनं नावमानयेत् ॥ पूर्व-पूर्व के अभाव में उत्तरोत्तर पक्ष ग्राह्य है। श्लो० ३१— सत्कृत्यान्नम्—अत एव आदित्य-पुराण में कहा गया है :— अन्नं दृष्ट्वा प्रणम्यादौ प्राञ्जलिः कथयेत्ततः ॥ अस्माकं नित्यमस्त्वेतदिति भक्त्या स्तुवन्नमेत् ॥ मनु ने भी कहा है :— पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं च यच्छति । अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ श्लो० ३६—मनु का मत कुछ भिन्न है :— षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् । तदर्द्धम्पादिकं वाऽपि ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ प्रतिवेद बारह-बारह वर्ष, अथवा छः-छ वर्ष, अथवा, तीन-तीन वर्ष किंवा अध्ययन-समाप्ति-पर्यन्त ॥ श्लो० ३६—केशान्तश्चैव षोडशे—यहाँ वर्ष की गणना गर्भ-वर्ष से ही करनी चाहिए ऐसा बौधायन ने कहा है :— “स गर्भषोडशे वर्षे कर्त्तव्यः साग्निकेन, गर्भादिः संख्या वर्षाणाम्” श्लो० ३७-३८—उपनयन की चरमावधि के विषय में मनु का भी यही मत है— आषोडशाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आद्वाविंशात् क्षत्र-बन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः ॥

६५२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः यद्यपि पैठीनसि का मत है—"द्वादश षोडश विंशतिश्चेत्यतीताः विरुद्ध- काला भवन्ति” तथापि यह वचन इस तथ्य का प्रतिपादन करता है कि बारह- हवें वर्ष के बीत जाने पर अनुपनीत ब्राह्मण, सोलहवें वर्ष के समाप्त हो जाने पर अनुपनीत क्षत्रिय तथा बीसवें वर्ष के अतिक्रान्त हो जाने पर अनुपनीत वैश्य कुछ पाप का भागी हो जाता है—यह वीरमित्रोदयकार का मत है । याज्ञवल्क्य ने अन्तिम अवधि का निर्देश किया है, अतः उपर्युक्त पैठीनसि से कोई विरोध नहीं पड़ता है । व्रात्यों की निन्दा मनु के द्वारा निम्न-लिखित श्लोक में की गई है— नैतैरपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् । ब्राह्मान् यौनांश्च सम्बन्धानाचरेद् ब्राह्मणः सह ॥ यहाँ ब्राह्मणपद द्विजातिमात्र का उपलक्षक है । श्लो० ३९—मौञ्जी-बन्धन रूप द्वितीय जन्म के विषय में मनु का कथन है :— तत्र यद्ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जी-बन्धनचिह्नितम् । तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ॥ मनु ने द्वितीय जन्म के अतिरिक्त तृतीय जन्म का भी निर्देश किया है—‘तृतीयं यज्ञ-दीक्षायाम्' । यहाँ यज्ञदीक्षा का अर्थ ज्योतिष्टोमादि-यज्ञ-दीक्षा है । इस तृतीय जन्म के विषय में कुल्लूकभट्ट की व्याख्या है—प्रथम- द्वितीय-तृतीयजन्मकथनञ्चेदं द्वितीयजन्म-स्तुत्यर्थम् , द्विजस्यैव यज्ञ-दीक्षाया- मधिकारात् । श्लो० ४४—अथर्वाङ्गिरसः—इसकी व्याख्या शूलपाणि ने निम्न- लिखित शब्दों में की है :—"अङ्गिरसा पृथक्कृतं सामवेदैकदेशम अभिचार- प्रधानकम्” । श्लो० ४५—नाराशंसी :—इसका अर्थ शूलपाणि ने “नारायणस्तुति- प्रकाशक ऋक्” किया है । “इदं जरा उपस्कृता” इत्यादि तीन ऋक् जो ऋग्वेद के खिल भाग में निर्दिष्ट हैं, नाराशंसी कहलाते हैं—ऐसा वीर- मित्रोदय का मत है । विद्या शब्द का अर्थ शूलपाणि के अनुसार, उपनिषद् है । श्लो० ४६—पत्न्याम् का अर्थ सवर्ण-पत्नी है, ऐसा शूलपाणि तथा वीरमित्रोदय-कार का कथन है । वैश्वानरेऽपि वा—अग्निशुश्रूषा का निरूपण बालम्भट्टी मे निम्नलिखित हारीत, शंख-लिखित तथा यम के वचन के अनुसार किया गया है :—

टिप्पणी (नोट्स) ६५३ “यज्ञियाः समिध आहृत्य सम्मार्जनोपलेपनोल्लेखनसमूहनेन्धनपर्य्यग्नि- करणपरिक्रमणोपस्थानहोमस्तोत्रनमस्कारादिभिरग्निं परिचरेन्नाग्निमधितिष्ठेन्न पद्भ्यां कर्षेन्न मुखेनोपधमेत् नापश्च अग्निं च युगपत् धारयेत् नाजीर्णभुक्को नोच्छिष्टो वा अभ्यादध्याद्विविधैर्हविर्विशेषैर्यज्ञियैः अहरहरग्निमिन्धेदामन्त्र्य गच्छेत् आगत्य निवेदयेत् तन्मनाः शरीरोपरमान्ते ब्रह्मणः सायुज्यं गच्छति”। श्लो० ५०—इस कथन से यह सङ्केत किया जाता है कि चातुराश्रम्य का विधान नित्य नहीं है अपितु ऐच्छिक । तात्पर्य यह है कि चातुराश्रम्य में व्यतिक्रम की सम्भावना नहीं है अतिक्रम तो सर्वथा सम्भव है। श्लो० ५१—वर शब्द का अर्थ गुरु का अभिमत पदार्थ ही है। अत एव मनु का भी कथन है :— क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् । धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ यह उपलक्षण-मात्र है, यथासम्भव अन्यान्य पदार्थ का भी समर्पण करना चाहिए । यही बात लघुहारीत के वचन में भी कही गई है :— एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा चानृणी भवेत् ॥ इससे स्पष्ट है कि केवल गुरु-प्रसन्नता ही गुरु-दक्षिणा है । यहाँ वेदा- ध्ययन का तात्पर्य अर्थज्ञान-पूर्वक वेदाध्ययन से है । अतएव कूर्म-पुराण में कहा गया है :— वेदं वेदौ तथा वेदान् वेदान् वा चतुरो द्विजः । अधीत्य चाधिगम्यार्थं ततः स्नायाद्यथाविधि ॥ अतएव प्रकृत याज्ञवल्क्य-श्लोक मे 'वेदम्' इस एकवचन को भी जाति- विवक्षा से ही उपयुक्त मानना चाहिए । व्रतानि—इस प्रसङ्ग में बालम्भट्टी का परिष्कार निम्नलिखित है :— “व्रतच्छेदपि आरण्यकमधीत्यैव तत् । वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा ह्युभयमेव वा । व्रतच्छेऽपि शब्दार्थमारण्याध्ययने कृते ॥ इति कारिकोक्तेः । शब्दार्थमक्षरग्रहणार्थम न त्वर्थज्ञानाऽपेक्षाऽपि, अनुष्ठानानुपयोगात् । विरक्तस्योत्तरकालं साधनचतुष्टयसम्पन्नं प्रत्युत्तरमीमांसा- प्रवृत्तेः । प्रागुक्तकर्मन्तु कर्मकाण्डार्थज्ञानपरमिति भावः ।”

६५४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लो० ५२—लक्षणाम्—बाह्य लक्षण के विषय में मनु का कथन है :— अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् । तनुरोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत्स्त्रियम् ॥ आभ्यन्तर लक्षणों का वर्णन आश्वलायन ने इस प्रकार किया है :— दुर्विज्ञेयानि लक्षणान्यष्टौ पिण्डान् कृत्वा 'ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञे ऋते सत्य- म्प्रतिष्ठितं यदिदं कुमार्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यतां यत्सत्यं तद् दृश्यताम्' इति पिण्डानभिमन्त्र्य कुमारीं ब्रूयादेषामेकं गृहाणेति। क्षेत्राच्चेदुभयतः सस्याद्- गृह्णीयात् अन्नवत्यस्याः प्रजा भविष्यति इति विद्यात्, गोष्ठात् पशुमती, वेदि-पुरीषात् ब्रह्मवर्चस्विनी, अविदासिनो हृदात् सर्वसम्पन्ना, देवनात् कितविनी, ईरिणादधन्या, श्मशानात् पतिघ्नी” ( आ० गृ० सू० १।५।४-६ ) उभयतः सस्य क्षेत्र आदि वाक्योक्त आठ स्थानों से मिट्टी लेकर आठ ही पिण्ड बनाना चाहिए । उन पिण्डों को 'ऋतमग्रे प्रथमम्' आदि मन्त्र से अभिमन्त्रित कर कन्या को यथेच्छ किसी पिण्ड का स्पर्श करने के लिए कहना चाहिए । प्रत्येक पिण्ड के स्पर्श का फल उपर्युक्त समझना चाहिए । उभयतः सस्य क्षेत्र का अर्थ है जिस क्षेत्र में वर्ष में दो बार उपज होती है । वेदिपुरीषम् = अपकर्म में बनाई हुई वेदी । अविदासी हृद = सर्वदा जलयुक्त हृद; देवन = जुआ खेलने का स्थान; द्विप्रव्राजिनी = अनेक पुरुष से सम्पर्क करने वाली; ईरिण = जहाँ बीज में अङ्कुर न होता हो ऐसी नमकीन भूमि । यह परीक्षा कुल-परीक्षा के बाद करनी चाहिए । कुल-परीक्षा के विषय में मनु का कथन है :— महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः । स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् । क्षयामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥ हीनक्रिय = जातकर्मादि संस्कारशून्य; निष्पुरुष = पुरुषहीन, स्त्रीमात्रा- वशेष; निश्छन्दः = वेदाध्ययनशून्य; रोमश = दीर्घरोम-सम्पन्न; अर्शस = 'अर्श' रोगग्रस्त; क्षय = राजयक्ष्मा; आमयावि = मन्दाग्निरोग; अपस्मार = रोग विशेष ( Epilepsy ); श्वित्र = श्वेत-कुष्ठ । स्वयं याज्ञवल्क्य भी इसका वर्णन आगे—"स्फीतादपि न सञ्चारि-रोग- दोषसमन्वितात्" ( श्लो० ५४ ) में करेंगे । श्लो० ५३—अरोगिणीम्—यह मनूक्त दोषों का उपलक्षण है । मनुस्मृति में निम्नलिखित प्रकार की कन्या त्याज्य मानी गई है :—

टिप्पणी (नोट्स) ६५५ नोद्वहेत् कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् । नालोमिकां नातिलोमां न वाचालां न पिङ्गलाम् ॥ नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् । न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥ एष च प्रतिषेधः न भार्यास्वाभावफलकः किन्तु शास्त्रातिक्रमप्रायश्चित्त- मात्रम् - ऐसा कुल्लूक भट्ट का मत है । भ्रातृमतीम्-इसकी व्याख्या मनुस्मृति में ही मिलती है:- यस्यास्तु न भवेद्भ्राता न विज्ञायेत वा पिता । नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया ॥ वह कन्या जिसके भावी पुत्र को उस कन्या का पिता स्व-पुत्राभाव होने के कारण अपने श्राद्धाधिकारी के रूप में मनोनीत कर लेता है-पुत्रिका कहलाती है:- अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् । यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ॥ असमानार्षगोत्रजाम् - यहां कुछ विशेष विवरण शूलपाणि ने दिया है- पितुः पितुः स्वसुः पुत्राः पितुर्मातुः स्वसुः सुताः । पितुर्मातुलपुत्राश्च विज्ञेयाः पितृबान्धवाः ॥ मातुः मातुः स्वसुः पुत्रा मातृ मातुः स्वसुः (पितृष्वसुः) सुताः ॥ मातुर्मातुल-पुत्राश्च विज्ञेया मातृ-बान्धवाः । श्लो० ५५-परीक्षितः पुंस्त्वे - इस विषय में शूलपाणि ने देवल के दो वचन उद्धृत किए हैं :- रेतोऽस्य प्लवते नाप्सु ह्लादि मूत्रं च फेनिलम् । पुमान् स्याल्लक्षणैरेतैर्विपरीतं नपुंसकम् ॥ न मूत्रं फेनिलं यस्य विष्ठा चाप्सु निमज्जति । मेढ्रोन्मादशुक्राभ्यां हीनः क्लीबः स उच्यते ॥ परन्तु प्रथम श्लोक के प्रथम पाद में जो वर्णन है वह निम्नलिखित नारद- वचन से विपरीत है- "यस्याप्सु प्लवते वीर्यं ह्लादि मूत्रं च फेनिलम् । पुमान् स्याल्लक्षणैरेतै र्विपरीतस्तु षण्ढकः ॥ श्लो० ५८-एकविंशतिम्-इस प्रसङ्ग में मनु का वचन यह है :- दश पूर्वांन्परान् वंश्यान् आत्मानं चैकविंशतिम् ॥

६५६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः ब्राह्मविवाह का परिष्कृत लक्षण वीरमित्रोदय में इस प्रकार दिया गया है— “निरुपाधिककन्यादानपूर्वकः सवर्णपरिणयो ब्राह्मो विवाहः । उपाध्ययश्च- ऋत्विक्स्वद्रव्यग्रहणसमयबन्धादयः” । श्लो० ५९—ऋत्विजे—दक्षिणासु दीयमानासु कन्यादानम्—ऐसा शूल- पाणि का परिष्कार है । गोद्वयम्—यह उपलक्षण है । अत एव मनु ने कहा है:— एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः । कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ श्लो० ६०—धर्ममिति—अत्र धर्मशब्दः अर्थकामयोरप्युपलक्षणम् स्मृ- त्यन्तरानुरोधात्—यह बालम्भट्टीकार का मत है । श्लो० ६१—युद्धहरणात्—अत एव मनु का कथन है— हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात् । प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥ कन्यकाच्छलात्—इसका स्पष्टीकरण मनु में हुआ है :— सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति । स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ इन अष्टविध विवाहों के विषय में जात्यनुकूल व्यवस्था का निर्देश मनु ने इस प्रकार किया है :— षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान् । विट्शूद्रयोस्तु तानेव विद्याद्धर्म्यानराक्षसान् ॥ ब्राह्मण के लिए ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर एवं गान्धर्व; क्षत्रिय के लिए, आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा पैशाच; वैश्य एवं शूद्र के लिए आसुर, गान्धर्व और पैशाच विवाह धर्म्य हैं । विशेष विवरण के लिए निम्न-लिखित मनु-वचन द्रष्टव्य है :— चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान् प्रशस्तान् कवयो विदुः । राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ॥ इत्यादि ॥ श्लो० ६२—क्षत्रिया शरम् = ब्राह्मणवरहस्तधृत शर । प्रतोद = वर- हस्तस्थ यष्टि । शूद्रा के विषय में मनु का कथन है— वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्ट-वेदने ॥ किन्तु स्वयं याज्ञवल्क्य ने शूद्रा के विषय में कुछ नहीं कहा है, कारण शूद्रा-ग्रहण ब्राह्मण के लिए याज्ञवल्क्य का कथमपि सम्मत नहीं है— यदुच्यते द्विजातीनां शूद्राद्दारोपसंग्रहः । नैतन्मम मतं यस्मात्तत्रायं जायते स्वयम् ॥ या० स्मृ० १।५६॥

टिप्पणी (नोट्स) ६५७ श्लो० ६४—कन्या कुर्यात् स्वयंवरम्—यह अधिकार तीन ऋतुकाल के अतिक्रमण के बाद ही होता, ऐसा विष्णु का कथन है— ऋतुत्रयमतीत्यैव कन्या कुर्यात् स्वयंवरम् । ऋतुत्रये व्यतीते तु प्रभुः कन्या स्वयंवरे ॥ परन्तु यदि पिता आदि के जीवित रहने पर भी कन्या का अभिभावक प्रमादादि के कारण उचित समय पर कन्यादान नहीं करे, वैसी स्थिति में बौधायन का सिद्धान्त निम्न-लिखित है— त्रीणि वर्षाण्यृतुमती कांक्षेत पितृशासनम् । ततश्चतुर्थे वर्षे तु विन्देत सदृशं पतिम् ॥ अविद्यमाने सदृशे गुणहीनमपि श्रयेत् ॥ इस प्रसङ्ग में नारद का निम्न-निर्दिष्ट वचन भी ध्येय है— यदा तु नैव कश्चित् स्यात् कन्या राजानमाव्रजेत् । अनुज्ञया वरं तस्य परीक्ष्य वरयेत् स्वयम् ॥ श्लो० ६५—सकृत्प्रदीयते कन्या—यही मनु का भी मत है— सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ श्लो० ६६—यदि वर भी अपना दोष पहले स्पष्ट नहीं कर देता है तो उसे भी दण्ड मिलना चाहिए । वर-दण्ड की व्यवस्था नारद के अनुसार निम्न-लिखित है— गूह्यित्वाऽऽत्मनो दोषान् विन्दन्नन्ययमर्हति । वरस्य दत्त-नाशश्च भवेत् स्त्री च निवर्त्तते ॥ अन्यय = दण्ड । कहीं-कहीं द्वितीय पाद में “विन्दते द्विगुणो दमः” पाठान्तर है । श्लो० ६८-६९—यहाँ मनुस्मृति में विधवा के लिए विशेष बतलाया गया है— विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि । एकमुत्पादयेत्पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ श्लो० ७०--याज्ञवल्क्य का यह कथन सवर्ण-व्यभिचारिणी के लिए है । हीनवर्ण-व्यभिचारिणी के लिए बृहस्पति ने निम्नलिखित व्यवस्था की है— हीनवर्णोपभुक्ता या त्याज्या वध्या च सा भवेत् ॥

६५८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लो० ७१—इस प्रसंग में बृहस्पति का वचन अवधेय है— रोमोद्गवे शशी भुङ्क्ते गन्धर्वः कुचदर्शने । अनलस्तु रजोयोगे स्त्रियो भुङ्क्ते तु नान्यथा ॥ श्लो० ७३—यहाँ द्वितीय विवाह की अवधि का निरूपण मनु ने इस प्रकार किया है— बन्ध्याऽष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृत-प्रजा । एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ अप्रियवादिनी के साथ अपुत्रा का अध्याहार करना आवश्यक है । श्लो० ७९—युग्मासु संविशेत्—युग्मरात्रिगमन से पुत्र होता है—ऐसा मनु का कथन है :— युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु । तस्माद् युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्त्तवे स्त्रियम् ॥ आद्याश्चतस्रस्तु वर्जयेत्—यद्यपि शंख ने पति के लिए चतुर्थ दिन में ही पत्नी की शुद्धि मानी है— शुद्धा भर्तुश्चतुर्थेऽह्नि अशुद्धा दैवपित्र्ययोः । तथापि यह शुद्धि सेवा के लिए न कि सम्भोग के लिए भी । अतएव मनु का भी कथन है— “तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दिताः” । श्लो० ८९—यह नियम सवर्णा स्त्री के विषय में है । अत एव मनु का कथन है— एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् । दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् । अत एव निम्नलिखित वचन को असवर्णा स्त्री के विषय में समझना चाहिए— यो दहेदग्निहोत्रेण स्वेन भार्यां कथञ्चन । स स्त्री सम्पद्यते तेन भार्या चास्य पुमान् भवेत् ॥ श्लो० ९१—पारशवोऽपि वा—पारशव की व्युत्पत्ति मनु ने निम्न निर्दिष्ट पद्य में की है— यं ब्राह्मणस्तु शूद्रायां कामादुत्पादयेत् सुतम् । स पारयन्नेव शवस्तस्मात् पारशवः स्मृतः ॥

टिप्पणी (नोट्स) ६५६ धारयन् = जीवन् । यद्यप्ययं पितृपकारार्थं श्राद्धादि करोत्येव तथाप्य- सम्पूर्णोपकारकत्वात् 'शव' व्यपदेशः- कुल्लूक भट्ट । इन सबों की जीविका का निर्देश मनु ने दशवें अध्याय में विशदरूप में किया है । श्लो० ९५-रथकारः प्रजायते - बौधायन के कथनानुसार वैश्य से शूद्रा में उत्पन्न सुत रथकार कहलाता है - "वैश्याच्छूद्रायां रथकारः" । अतः रथ- कार शब्द को अनेकार्थक मानना चाहिए - ऐसा शूलपाणि का मत है । श्लो० ९८-इस कार्य के समय के विषय में दक्ष का कथन है - उषः काले तु सम्प्राप्ते शौचं कृत्वा यथार्थवत् ततः स्नानं प्रकुर्वीत दन्तधावन-पूर्वकम् । श्लो० १०१ - विद्यां चाध्यात्मिकीम् = उपनिषदम् । श्लो० १०२-पञ्चमहायज्ञ के अनुष्ठान का फल भी मनु ने बत- लाया है - पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः । कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन् ॥ तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थं महर्षिभिः । पञ्च क्लृप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम् ॥ यहाँ कुल्लूकभट्ट की टिप्पणी है- प्रत्यहमित्यभिधानात् प्रतिदिनं तत्पा- पक्षयस्यापेक्षितत्वात् सन्ध्यावन्दनादिवन्नित्यत्वमपि न विरुध्यते । पञ्च महायज्ञों के नामान्तर भी मनुस्मृति में दिये गये हैं- अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च । ब्राह्मं हुतं प्राशितं च पञ्चयज्ञान् प्रचक्षते ॥ जपोऽहुतो हुतो होमः प्रहुतो भौतिको बलिः । ब्राह्मं हुतं द्विजाग्र्यार्चा प्राशितं पितृतर्पणम् ॥ श्लो० १०५-सम्भोज्य - इससे बाल आदि का भोजन अतिथि से पूर्व ही कराना चाहिए- ऐसा सिद्ध होता है । अत एव मनु ने कहा है :- सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीः स्त्रियः । अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ श्लो० १०६ - उपरिष्टात् = पूर्वम् , अधस्तात् = पश्चात् । श्लो० १०७ - अतिथि की परिभाषा मनु ने की है- एकरात्रं तु निवसन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः । अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ ४२ या०

६६० याज्ञवल्क्यस्मृतिः सायमपि—अतिथि को सायंकाल में भोजन नहीं देने पर पाप का निदर्शन विष्णुपुराण में किया गया है— दिवाऽतिथौ तु विमुखे गते यत्पातकं नृप । तदेवाष्ट-गुणं प्रोक्तं सूर्योढे विमुखे गते ॥ यदि ब्राह्मण के गृह में क्षत्रिय आदि उपस्थित हों तो उनके विषय में मनु के निम्नलिखित वचन ध्येय हैं :— न ब्राह्मणस्य त्वतिथिर्गृहे राजन्य उच्यते । वैश्यशूद्रौ सखा चैव ज्ञातयो गुरुरेव च ॥ यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत् । भुक्तवत्सु च विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत् ॥ वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ । भोजयेत्सह भृत्यैस्तानानुशंस्यं प्रयोजयन् ॥ इतरानपि सख्यादीन् सम्प्रीत्या गृहमागतान् । प्रकुर्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥ श्लो० ११०—अर्ध्याः—अर्घ्यपद मधुपर्क का उपलक्षक है । अत एव मनु का कथन है— राजर्त्विक्-स्नातक-गुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् । अर्हयेन्मधुपर्केण परिसम्वत्सरात्पुनः ॥ परिसम्वत्सरात् = सम्वत्सर बीतने के बाद । ऋत्विजः—यह पद पूज्यमात्र का उपलक्षण है। एवञ्च तात्पर्य यह है कि एक वर्ष के बीतने के बाद स्ना- तक आदि का मधुपर्क से पूजन करना चाहिये । यदि सम्वत्सर-मध्य में ही यज्ञ उपस्थित हो तो सम्वत्सर-मध्य में भी वे सम्मानाहं हैं । परन्तु यदि सम्वत्सर के बीच कोई यज्ञ नहीं उपस्थित हो तो सम्वत्सर के बीत जाने के बाद यज्ञ उपस्थित हो या नहीं हो, उनका सम्मान अवश्य हीं करना चाहिये । यहाँ मनु ने राजा तथा स्नातक के पूजन में विशेष बतलाया है कि यदि सम्वत्सर-मध्य में यज्ञ की उपस्थिति नहीं होती है, तो सम्वत्सर के बीत जाने पर भी राजा तथा स्नातक की पूजा यज्ञ में ही करनी चाहिए न कि केवल सम्वत्सर के अतिक्रमण से ही— राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ । मधुपर्केण सम्पूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥ अतः राजा तथा स्नातक का यज्ञ में और शेष का सम्वत्सर-मध्य में यज्ञ- काल में, सम्वत्सर के बीतने पर यज्ञाऽयज्ञा-साधारण पूजन करना चाहिए ।

टिप्पणी (नोट्स) ६६१ श्लो० ११२—अति-भोजनम्—अत एव मनु ने कहा है— अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चाति-भोजनम् । अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात् तत्परिवर्जयेत् ॥ श्लो० ११३—आसीमान्तम्—यहाँ अपरार्कव्याख्या में तीन प्रकार की सीमा बतलाई गई है—सीमा त्रिविधा—वास्तु-सीमा, ग्राम-सीमा, क्षेत्र-सीमा च; सा चानुवजनीयगुणापेक्षया व्यवस्थापनीया। श्लो० ११६—वार्धके—मनु का कथन है—शूद्रोपि दशमीं गतः । ९० वर्ष की अवस्था के बाद शूद्र भी प्रतिष्ठित होता है। परन्तु गौतम ने ८० वर्ष को ही परमावधि मानी है । श्लो० १२७—कुशूलेति—द्वादशदिनोचित-धान्याधारा कोषी कुशूलः, षडिनोचित-धान्याधारा कुम्भी—शूलपाणिः । श्लो० १३९—प्रेतधूमम्—बालम्भट्टीकार ने प्रेतधूम का अर्थ बालातप किया है। इन्होंने अपने मत के समर्थन में निम्न लिखित मनु के वचन को ध्यान में रक्खा था—ऐसा प्रतीत होता है— बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथाऽऽसनम् । परन्तु यहाँ बालातप एवम् प्रेतधूम मे उद्देश्य-विधेय-भाव की कल्पना करना अमूलक है। यहाँ तो बालातप एवं प्रेतधूम दोनो हीं स्वतन्त्र पदार्थ हैं जिनको मनु ने वर्ज्य माना है। अतः प्रेतधूम का अर्थ दह्यमान-शव-धूम हीं करना चाहिए । श्लो० १४०—न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात्—इस प्रसङ्ग में मनु के निम्न- लिखित वचनों को देखना चाहिए— यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्त्तिनः । स पर्यायेण यातीमान् नरकानेक-विंशतिम् ॥ तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ । नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च ॥ सञ्जीवनं महावीचिं तपनं संप्रतापनम् । संघातं च सकाकोलं कुड्मलं प्रतिमूर्तकम् ॥ लोहशङ्कुमृषीजं च पन्थानं शाल्मलिंनदीम् । असिपत्रवनं चैव लोहदारकमेव च ॥ एतद्विदन्तो विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकांक्षिणः ॥

१६२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लो० १४१—इस प्रसङ्ग में मनु का कथन अधिक स्पष्ट है :— न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात् अराजन्यप्रसूतितः । सूनाचक्रध्वजवतां वेशेनेव च जीवताम् ॥ दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः । दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः ॥ दशसूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः । तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥ श्लो० १४६—अमावाश्या आदि में अध्ययन के दुष्परिणाम का वर्णन मनुस्मृति में इस प्रकार किया गया है : अमावास्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी । ब्रह्माष्टकापौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ ब्रह्म = वेद को । श्लो० १५४—आचारमाचरेत्—इस प्रसङ्ग में मनु के वचन को ध्यान में रखना चाहिए— आचाराल्लभतेह्यायुः आचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ श्लो० १५५—पुत्रं शिष्यं च ताडयेत्—यह ताडन केवल अनुशासन के लिए करना चाहिए । अत एव मनु ने कहा हैः— शिक्षार्थं ताडयेत्तु तौ ॥ ब्राह्मण की निन्दा का फल मनुस्मृति में बतलाया गया है— ब्राह्मणायावगूर्येव द्विजातिर्वधकाम्यया । शतं वर्षाणि तामिस्रे नरके परिवर्तते ॥ ताडयित्वा तृणेनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम् । एकविंशतिमाजातीः पापयोनिषु जायते ॥ इत्यादि ! श्लो० १५७-५८—इन लोगों से विवाद नहीं करने पर इन लोगों के अधीनस्थ लोकों पर विजय मिलती है । इन लोगों के वशीभूत लोकों का विवरण मनु मे निम्नलिखित प्रकार से पाया जाता हैः— आचार्यो ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः ।

टिप्पणी (नोट्स) ६६३ अतिथिस्त्विन्द्रलोकेशो देवलोकस्य चर्त्विजः ॥ जामयोऽप्सरसां लोके वैश्वदेवस्य बान्धवाः । सम्बन्धिनो ह्यपां लोके पृथिव्यां मातृमातुलौ ॥ आकाशेशास्तुविज्ञेयाः बालवृद्धकृशातुराः । भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ॥ छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् । तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेताऽसञ्ज्वरः सदा ॥ जामयः = विद्यमानभर्तृकाः भगिनीस्नुषाद्याः; बान्धवाः = पितृमातृपक्षाः जनाः; सम्बन्धिनः = जामातृश्यालकादयः; कृशः = कृशधनः; संभ्रितः = भाभितः इत्यर्थः । श्लो० १५९—मुनि ने परकीय जलाशय आदि में स्नान का प्रतिषेध किया है— परकीय-निपानेषु न स्नायाच्च कदाचन । निपान-कर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥ अंशेन = चतुर्थांशेन । इसका प्रायश्चित्त भी व्यासने बतलाया है— अन्यैः खानिताः कूपाः तड़ागा वाप्य एव च । एषु स्नात्वा च पीत्वा च प्राजापत्येन शुध्यति ॥ इसी मे विशेष व्यवस्था बतलाने के लिए याज्ञवल्क्य ने—पञ्च पिण्डान- नुद्धृत्य न स्नायात् पर वारिणि—कहा है । इसका तात्पर्य यह है कि यदि स्नानार्थ अकृत्रिम नदी आदि की उपलब्धि नहीं होती हो तो परकीय निपान में भी पाँच पिण्ड का उद्धरण कर स्नान करना चाहिए । अत एव विष्णु का वचन है—"पर-निपानेषु न स्नानमाचरेत् आचरेद्वा पञ्च पिण्डानुद्धृत्य आपदि" इति । सर्वार्थमुत्सृष्टेषु परकीयस्वाभावादनुद्धरणेऽपि न दोषः—ऐसा हेमाद्रि का मत है । स्नायानन्दी-देव०—अत एव मनु का भी मत है— नदीषु देवखातेषु तड़ागेषु सरःसु च । स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्त-प्रस्रवणेषु च ॥ श्लो० १६०—इस विषय में मनु ने पाप का निर्देश किया है— यानशय्यासनमभ्यस्य कूपोद्यान-गृहाणि च । अदत्तान्युपभुञ्जान एनसः स्यात्तुरीयभाक् ॥ अदत्तानीति स्वाम्यभावः अनुमत्यभावश्च विवक्षितः—ऐसा शूलपाणि का मत है ।

६६४ | याज्ञवल्क्यस्मृतिः अग्निहीनस्य-श्रौत-स्मार्त्ताग्न्यधिकारहीनस्य शूद्रस्य अविधिनोत्सृष्टा- न्नेद्विजस्यापि । श्लो० १६१-कदर्य्यति-कदर्य की परिभाषा नारद ने इस तरह की है- आत्मानं धर्मकृत्यञ्च पुत्रदारांश्च पीडयन् । लोभाद्यः प्रचिनोत्यर्थान् स कदर्य इति स्मृतः ॥ बद्धः-निगडबद्धः । अत एव मनु का कथन है-बद्धस्य निगडस्य च । निगडस्येति तृतीयार्थे षष्ठी-कुल्लूकभट्ट । रङ्गावतारी-नटगायकव्यति- रिक्तस्य रङ्गावतरणजीविनः-कुल्लूकभट्ट, मेधातिथि । वार्धुष्यः-यस्तु निन्देत परं जीवं प्रशंसत्यात्मनो गुणान् । स वै वार्धुषिको नामः-विष्णुः समर्घ पण्यमुद्धृत्य महार्घ यः प्रयच्छति । स वै वार्धुषिको नाम यश्च वृद्धया प्रयोजयेत्-यम । श्लो० १६२-एषामन्नं न भोक्तव्यम्-इन सबों के अन्न-भक्षण मे दोष मनुस्मृति मे बतलाया गया है- य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्त्तिताः । तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ तेषां त्वगस्थि-रोम्णां भक्षणेन यः दोषःएव तेषामन्नभक्षणेऽपि-कुल्लूकभट्ट । श्लो० १६६-अर्धसीरिणः-कार्षिकाः । ये शब्द सापेक्ष शब्द हैं । अत एव जो जिसकी कृषि करता हो उसी का अन्न उस व्यक्ति मात्र के लिए भोज्य है। इसी तरह दास गोपाल आदि के विषय मे भी समझना चाहिए । यश्चात्मानं निवेदयेत्-निवेदन का प्रकार मनु ने बतलाया है- यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशं च चिकीर्षितम् । यथा चोपचरेदेनं तथाऽऽत्मानं निवेदयेत् ॥ श्लो० १७०-सन्धिनी-ऋतुमती वृषमिच्छती गौः । या गर्भिणी सति दुग्धे सा सन्धिनी-हरदत्त । अनिर्दशा-यह अजा तथा महिषी का भी उपलक्षण है । अत एव यम का कथन है- अनिर्दशाहं गोक्षीरमाजं माहिषमेव च ॥ श्लो० १७५-मत्स्यांश्च कामतः-मत्स्य-भक्षण की निन्दा मनुस्मृति में की गई है :- यो यस्य मांसमश्नाति स तन्मांसाद उच्यते । मत्स्यादः सर्वमांसादः तस्मान्मत्स्यान् विवर्जयेत् ॥

श्लो० १७६—इस श्लोक में कथित लशुन तथा गृञ्जन पलाण्डु के

टिप्पणी (नोट्स) ६६५ मत्स्य के सर्वमांसभक्षक होने के कारण मत्स्यादः सर्वमांसादः कहा गया है । श्लो० १७६—इस श्लोक में कथित लशुन तथा गृञ्जन पलाण्डु के ही भेद हैं— लशुनो दीर्घपत्रश्च पिच्छगन्धो महौषधम् । तरुण्डश्च पलाण्डुश्च नरलङ्कः पराकिका । गृञ्जनो यवनेष्टश्च पलाण्डोर्दश जातयः ॥ श्लो० १७७–भक्ष्याः पञ्चनखाः—यहाँ मनु ने यद्यपि खड्ग का भी निर्देश किया है तथापि वह श्राद्धविषयक है—ऐसा शूलपाणि का मत है । सेधा = स च श्वभक्षको व्याघ्रविशेषः—अपरार्क । गोधा = बल्लीसद्मः प्राणि-विशेषः—अपरार्क । श्लो० २१२—सर्वधर्ममयं ब्रह्म—अतएव मनु का भी मत है— सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते । श्लो० २१५—अयाचिताहृतम्—मनु का भी निर्देश है— आहृतामभ्युद्यताम् भिक्षाम् पुरस्तादप्रचोदिताम् । मेने प्रजापतिर्ग्राह्याम् अपि दुष्कृतकर्मणः ॥ श्लो० २१६—सर्वतः—देव आदि के अर्चन के लिए ही न कि आत्म- पालन के निमित्त भी । अतएव मनुस्मृति में कहा गया है :— गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन् अर्चिष्यन्देवतातिथीन् । सर्वतः प्रतिगृह्णीयात् न तु तृप्येत् स्वयं ततः । आत्मवृत्त्यर्थमेव च—मनुस्मृति में आत्मवृत्ति के लिए केवल साधुजन के अन्न का ही प्रतिग्रह विहित माना गया है— गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वा तैर्गृहे वसन् । आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ॥ श्लो० २१७–१८ = व्यतीपातः— श्रवणाश्विधनिष्ठऽऽर्द्रानागदैवतमस्तके । यद्यमा रविबारेण व्यतीपातः स उच्यते ॥ गजच्छाया— योगो मघात्रयोदश्यां कुञ्जरच्छायसंज्ञितः । भवेन्मघायां संस्थे च शशिन्यर्के करे स्थिते ॥ ( ब्रह्मपुराण ) करे = हस्तनक्षत्र मे । श्राद्धम्—“अथैतन्मनुः श्राद्धं कर्म प्रोवाच प्रजा निः- श्रेयसार्थं तत्र पितरो देवता ब्राह्मणाश्चाहवनीयार्थे” इस आपस्तम्ब के वचन के

६६६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः अनुसार पितृगण के उद्देश्य से द्रव्य के उत्सर्ग से ब्राह्मण के द्वारा उस द्रव्य के स्वीकार तक का कर्म श्राद्ध-पद-वाच्य है । देवश्राद्ध आदि पदों में श्राद्ध शब्द गौण है—यह कल्पतरु का मत है । श्लो० २२१—पञ्चाग्निः—पाँच अग्नियों के नाम ये हैं :— पवनः पावनश्चैता यस्य पञ्चाग्नयो गृहे । सायं प्रातः प्रदीव्यन्ते स विप्रः पंक्ति-पावनः ॥ ( हारीत ) पवनः = आवसथ्याग्निः; पावनः = सभ्याग्निः । त्रेता = आहवनीय गार्हपत्य तथा दक्षिणाग्नि । श्लो० २२२—रोगी = दीर्घरोगी—अपराकं । श्लो० २२४—इससे अतिरिक्त निन्द्य पुरुषों का विवरण मनुस्मृति के तृतीयाध्याय में देखना चाहिए । श्लो० २२५—निमन्त्रणम् = अप्रत्याख्येयो नियोगः निमन्त्रणम्— अपरार्कं । संयतैर्भाव्यम्—इस विषय में मनु का कथन यह है— निमन्त्रितो द्विजः पित्र्ये नियतात्मा भवेत्सदा । न च छन्दांस्यधीयीत यस्य श्राद्धं च तद्भवेत् ॥ निमन्त्रितान्हि पितरः उपतिष्ठन्ति तान्द्विजान् । वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते ॥ इत्यादि । श्लो० २३६—अभ्यनुज्ञातः—ब्राह्मणों के द्वारा अभ्यनुज्ञात । अतएव मनु का कथन है— अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह । अनुज्ञासामर्थ्याच्च प्रार्थनाऽपि पूर्वं कर्त्तव्या, सा च स्वगृह्यानुसारेण करवाणि, करिष्ये इत्यादिका । अनुज्ञा अपि ‘ओम्’ इत्येवं रूपा ‘कुरुष्व’ इति वा—( कुल्लूक भट्ट ) । यदि अग्नि का अभाव हो ( अग्न्याभावश्च अनुपनीतस्य सम्भवति, उप- नीतस्य समावृत्तस्य च पाणिग्रहणात्पूर्वम् , मृतभार्यस्य वा ) तो ब्राह्मण के हाथ में ही समर्पण करना चाहिए— अग्न्याभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् । यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥ ( मनु ) तथा कात्यायन का भी कथन है :— पित्र्ये यः पंक्तिमूर्द्धन्यः तस्य पाणावनग्निकः । हुत्वा मन्त्रवदन्येषां तूष्णीं मन्त्रेषुनिः क्षिपेत् ॥