छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २
| १६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
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| फलम्— | इस उपासनाका फल— |
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भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्पशुषु पञ्चविधꣳसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष पशुओंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसे पशु प्राप्त होते हैं और वह पशुधनसे सम्पन्न होता है ॥२॥
| भवन्ति हास्य पशवः, पशुमान्भवति पशुफलैश्च भोग-त्यागादिभिर्युज्यत इत्यर्थः॥२॥ | उसे पशु प्राप्त होते हैं और वह पशुमान् होता है अर्थात् वह पशुओंसे प्राप्त होनेवाले फल-भोग एवं दानादिसे युक्त होता है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
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प्राणविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना
प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयाꣳसि वा एतानि ॥ १ ॥
प्राणोंमें पाँच प्रकारके परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) गुणविशिष्ट सामकी उपासना करे। [उनमें] प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ निश्चय ही परोवरीय (उत्तरोत्तर श्रेष्ठ) हैं ॥ १ ॥
| प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत । परं परं वरीयस्त्वगुणवत्प्राणदृष्टिविशिष्टं सामोपासीतेत्यर्थः । प्राणो घ्राणं हिंकारः, उत्तरोत्तरवरीयसां प्राथम्यात् । वाक्प्रस्तावः, वाचा हि प्रस्तूयते सर्वम्, वाग्वरीयसी घ्राणात्, अप्राप्तमप्युच्यते वाचा, प्राप्तस्यैव तु गन्धस्य ग्राहकः प्राणः । | प्राणोंमें पाँच प्रकारके परोवरीय सामकी उपासना करे अर्थात् उत्तरोत्तर श्रेष्ठत्वगुणवान् प्राणदृष्टियुक्त सामकी उपासना करे। उन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ प्राणोंमें प्रथम होनेके कारण प्राण—घ्राणेन्द्रिय हिंकार है। वाणी प्रस्ताव है, क्योंकि वाणीसे ही सबका प्रस्ताव किया जाता है। वाणी प्राणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है, [क्योंकि] वाणीसे अप्राप्त वस्तुका भी निरूपण किया जाता है और प्राण केवल प्राप्त हुए गन्धका ही ग्रहण करनेवाला है। |
| १६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
| १६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| चक्षुरुद्गीथः, वाचो बहुतरविषयं प्रकाशयति चक्षुरतो वरीयो वाचः, उद्गीथः श्रेष्ठ्यात् । श्रोत्रं प्रतिहारः, प्रतिहृतत्वात्, वरीयश्चक्षुषः सर्वतः श्रवणात् । मनो निधनम्, मनसि हि निधीयन्ते पुरुषस्य भोग्यत्वेन सर्वेन्द्रियाहृता विषयाः, वरीयस्त्वं च श्रोत्रान्मनसः, सर्वेन्द्रियविषयव्यापकत्वात्, अतोन्द्रियविषयोऽपि मनसो गोचर एवेति । यथोक्तहेतुभ्यः परोवरीयांसि प्राणादीनि वा एतानि ॥ १ ॥ | चक्षु उद्गीथ है; चक्षु वाणीसे भी अधिक विषयको प्रकाशित करता है; अतः वह वाणीसे उत्कृष्ट है और उत्कृष्ट होनेके कारण ही उद्गीथ है । श्रोत्र प्रतिहार है, क्योंकि वह प्रतिहत है तथा सब ओरसे श्रवण करनेके कारण वह नेत्रकी अपेक्षा उत्कृष्ट भी है। मन निधन है क्योंकि भोग्यरूपसे पुरुषकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा लाये हुए विषय मनमें ही रखे जाते हैं, तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंमें व्यापक होनेके कारण श्रोत्रकी अपेक्षा मनकी उत्कृष्टता भी है । तात्पर्य यह है कि जो पदार्थ अन्य इन्द्रियोंकी पहुँचसे परे है वह भी मनका विषय तो है ही । उपर्युक्त हेतुओंसे ये प्राणादि उत्तरोत्तर उत्कृष्ट हैं ॥ १ ॥ |
परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ २ ॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष प्राणोंमें पाँच प्रकारके उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत लेता है । यह पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥ २ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| एतद्दृष्ट्या विशिष्टं यः परोवरीयः सामोपास्ते परोवरीयो हास्य जीवनं भवतीत्युक्तार्थम् । इति तु पञ्चविधस्य साम्न उपासनमुक्तमिति सप्तविधे वक्ष्यमाणविषये बुद्धिसमाधानार्थम् । निरपेक्षो हि पञ्चविधे वक्ष्यमाणे बुद्धिं समाधित्सति ॥ २ ॥ | जो पुरुष इस प्राणदृष्टिसे युक्त उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी उपासना करता है उसका जीवन निश्चय ही उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता है—यह अर्थ पहले (१ । ९ । २ में) कहा जा चुका है । इस प्रकार यह पाँच प्रकारके सामकी उपासना तो कह दी गयी; यह बात श्रुतिने आगे कही जानेवाली सप्तविध सामोपासनामें बुद्धिको समाहित करनेके लिये कही है, क्योंकि पञ्चविध सामोपासनामें निरपेक्ष हुआ पुरुष ही आगे कही जानेवाली उपासनामें बुद्धिको समाहित करना चाहेगा ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
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वाणीविषयक सप्तविध सामोपासना
अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधँ सामोपासीत यत्किं च वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥ १ ॥
अब सप्तविध सामकी उपासनाका प्रकरण [ आरम्भ किया जाता ] है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें जो कुछ 'हुँ' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप है वह आदि है ॥ १ ॥
| अथानन्तरं सप्तविधस्य समस्तस्य साम्न उपासनं साध्विद्मारभ्यते । वाचीति सप्तमी पूर्ववत् । वाग्दृष्टिविशिष्टं सप्तविधं सामोपासीतेत्यर्थः । यत्किञ्च वाचः शब्दस्य हुमिति यो विशेषः स हिंकारो हकारसामान्यात् । यत्प्रेति शब्दरूपं स प्रस्तावः प्रसामान्यात् । यत् आ | अब इसके पश्चात्—यह सप्तविध समस्त सामकी साधु उपासना आरम्भ की जाती है। श्रुतिमें 'वाचि' इस पदकी सप्तमी विभक्ति पूर्ववत् ('लोकेषु' आदि पदोंकी सप्तमीके समान ) समझनी चाहिये। इसका तात्पर्य यह है कि वाग्दृष्टिविशिष्ट सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये। जो कुछ वाणी अर्थात् शब्दका 'हूँ' ऐसा विशेषरूप है वह हिंकार है, क्योंकि 'हूँ' और हिंकारमें हकारकी समानता है जो कुछ 'प्र' ऐसा शब्दरूप है वह प्रस्ताव है, क्योंकि उन दोनोंमें 'प्र' शब्दका सादृश्य है । तथा जो कुछ |
खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थं १७१
| इति स आदिः, आकारसामान्यात् आदिरित्योङ्कारः, सर्वादित्वात् ॥ १ ॥ | 'आ' ऐसा शब्दरूप है वह आकारमें समता होनेके कारण आदि है । 'आदि' यह ओङ्कारका वाचक है, क्योंकि वही सबका आदि है ॥१॥ |
यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम् ॥ २ ॥
जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ है, जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव है और जो कुछ 'नि' ऐसा शब्दरूप है वह निधन है ॥ २ ॥
| यदुदिति स उद्गीथः, उत्पूर्वत्वादुद्गीथस्य । यत्प्रतीति स प्रतिहारः, प्रतिसामान्यात् । यदुपेति स उपद्रव उपोपक्रमत्वादुपद्रवस्य । यन्नीति तन्निधनम्, निशब्दसामान्यात् ॥२॥ | जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ है, क्योंकि 'उद्गीथ' शब्दके आरम्भमें 'उत्' है; जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्दस्वरूप है वह प्रतिहार है, क्योंकि उनमें 'प्रति' शब्दका सादृश्य है; जो कुछ 'उप' ऐसा शब्दरूप है वह उपद्रव है, क्योंकि उपद्रव शब्दके आरम्भमें 'उप' शब्द है तथा जो कुछ 'नि' ऐसा शब्दरूप है वह निधन है, क्योंकि 'नि' और 'निधन' में 'नि' शब्दकी समानता है ॥ २ ॥ |
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१७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान्वाचि सप्तविधँसामोपास्ते ॥३॥
जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करता है उसे वाणी, जो कुछ वाणीका दोह (सार) है उसे देती है तथा वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न और उसका भोक्ता होता है ॥३॥
| दुग्धेऽस्मा इत्याद्युक्तार्थम् ॥३॥ | 'दुग्धेऽस्मै' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पहले (१।३।७ में) कहा जा चुका है ॥ ३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
नवम खण्ड
आदित्यविषयिणी सात प्रकारकी सामोपासना
अथ खल्वमुमादित्यंसप्तविधꣳसामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥
अब उस आदित्यके रूपमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिए। आदित्य सर्वदा सम है, इसलिये वह साम है। मेरे प्रति, मेरे प्रति ऐसा अनुभूत होनेके कारण वह सबके प्रति सम है, इसलिये साम है ॥१॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अवयवमात्रे साम्न्यादित्यदृष्टिः पञ्चविधेषूक्ता प्रथमे चाध्याये । अथेदानीं खल्वमुमादित्यं समस्ते साम्न्यवयवविभागशोऽध्यस्य सप्तविधं सामोपासीत । कथं पुनः सामत्वमादित्यस्य ? इत्युच्यते— <br><br> उद्गीथत्वे हेतुवदादित्यस्य सामत्वे हेतुः । कोऽसौ ? सर्वदा समो वृद्धिक्षयाभावात्तेन हेतुना सामादित्यो मां प्रति मां प्रतीति | पञ्चविध सामोपासनाओंके प्रसङ्गमें तथा प्रथम अध्यायमें केवल अवयवमात्र साममें आदित्यदृष्टि बतलायी गयी है। उसके बाद अब यह बताया जाता है कि उस आदित्यको समस्त साममें उसके अवयवविभागके अनुसार आरोपित कर सप्तविध सामकी उपासना करे । तो फिर आदित्यकी सामरूपता किस प्रकार है ? यह बतलाया जाता है— <br><br> आदित्यके उद्गीथरूप होनेमें जिस प्रकार हेतु है उसी प्रकार उसके सामरूप होनेमें भी है। वह हेतु क्या है ? वृद्धि और क्षयका अभाव होनेके कारण आदित्य सर्वदा सम है इसी कारणसे वह साम है। वह 'मेरे प्रति, मेरे प्रति' इस प्रकार |
१७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तुल्यां बुद्धिमुत्पादयति; अतः सर्वेण समोऽतः साम समत्वादित्यर्थः।<br><br>उद्गीथभक्तिसामान्यवचनादेव लोकादिषूक्तसामान्याद्धिंकारादित्वं गम्य इति हिंकारादित्वे कारणं नोक्तम्। सामत्वे पुनः सवितुरनुक्तं कारणं न सुबोधमिति समत्वमुक्तम् ॥ १ ॥ | सबमें समान बुद्धि उत्पन्न करता है, [ क्योंकि उसे सभी प्राणी अपने-अपने सम्मुख देखते हैं ] इसलिये वह सबके साथ समान है; अतः इस समताके कारण वह साम है।<br><br>उद्गीथभक्तिमें समानता बतलानेसे ही [ अर्थात् उद्गीथके साथ आदित्यका ऊर्ध्वत्वमें सादृश्य है—ऐसा जो श्रुतिने कहा है उसके अनुसार ही ] लोकादिमें भी [ सामावयवोंके साथ ] सादृश्य बतलाये जानेसे उनका हिंकारादिरूप होना ज्ञात होता है—इसीसे [ श्रुतिमें आदित्यावयवोंके ] हिंकारादिरूप होनेमें कारण नहीं बतलाया गया था।* किंतु आदित्यकी सामरूपतामें न बतलाया गया कारण सुगमतासे नहीं जाना जा सकता इसलिये उसके सम्बन्धमें समत्वरूप कारण बतलाया गया है ॥ १ ॥ |
तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिं कुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥२॥
उस आदित्यमें ये सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने। जो उस आदित्यके उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है
* क्योंकि लोकादिके हिंकारादिरूप होनेमें जो-जो कारण हैं, वे ही आदित्यावयवोंके सम्बन्धमें भी समझे जा सकते हैं।
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※
उसके पशु अनुगत हैं, इससे वे हिंकार करते हैं। अतः वे ही इस आदित्यरूप सामके हिंकारभाजन हैं ॥ २ ॥
| तस्मिन्नादित्येऽवयवविभागश इमानि वक्ष्यमाणानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तान्यनुगतान्यादित्यमुपजीव्यत्वेनेति विद्यात् । कथम् ? तस्यादित्यस्य यत्पुरोदयाद्धर्मरूपम्, स हिंकारो भक्तिस्तत्रेदं सामान्यं यत्तस्य हिंकारभक्तिरूपम् । | उस आदित्यमें ये आगे बतलाये जानेवाले समस्त भूत अवयवविभागानुसार उसके उपजीव्य रूपसे अन्वायत्त — अनुगत हैं—ऐसा जाने । वे किस प्रकार अनुगत हैं ? [ यह बतलाते हैं—] उस आदित्यका उदयसे पहले जो धर्मरूप ( धर्मानुष्ठानका प्रेरक स्वरूप) है वह हिंकारभक्ति है। उस धर्मरूपमें यही सादृश्य है कि वह उस ( आदित्यसंज्ञक साम ) का हिंकारभक्तिरूप है । | | तदस्यादित्यस्य साम्नः पशवो गवाद्योऽन्वायत्ता अनुगतास्तद्भक्तिरूपमुपजीवन्तीत्यर्थः । यस्मादेवं तस्मात्ते हिंकुर्वन्ति पशवः प्रागुदयात् । तस्माद्धिंकारभाजिनो ह्येतस्यादित्याख्यस्य साम्नः तद्भक्तिभजनशीलत्वाद्वि त एवं वर्तन्ते ॥ २ ॥ | उस इस आदित्यरूप सामके गौ आदि पशु अन्वायत्त—अनुगत हैं; अर्थात् उस हिंकारभक्तिरूपसे उसमें उपजीवी हैं । क्योंकि ऐसा है इसीलिये वे पशु सूर्योदयसे पूर्व हिंकार-शब्द करते हैं । अतः वे इस आदित्यसंज्ञक सामके हिंकारपात्र हैं । उस हिंकारभक्तिके सेवनमें तत्पर रहनेसे ही वे इस प्रकार बर्ताव करते हैं [ अर्थात् सूर्योदयसे पूर्व हिंकार करते हैं ] ॥ २ ॥ |
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अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः प्रशꣳसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥
| १७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
| १७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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तथा सूर्यके पहले-पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्रस्ताव है । उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं, अतः वे प्रस्तुति [प्रत्यक्षस्तुति] और प्रशंसा [ परोक्षस्तुति ] की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे इस सामकी प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं ॥ ३ ॥
| अथ यत्प्रथमोदिते सवितृ- <br><br> रूपं तदस्यादित्याख्यस्य साम्नः <br><br> प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वा- <br><br> यत्ताः पूर्ववत् । तस्मात्ते प्रस्तुतिं <br><br> प्रशंसां कामयन्ते। यस्मात्प्रस्ता- <br><br> वभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥ | तथा सूर्यके पहले-पहल उदित होनेपर जो उसका रूप होता है वह इस आदित्यसंज्ञक सामका प्रस्ताव है; पूर्ववत् [ अर्थात् पशुओं-के समान ] उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं । इसीसे वे प्रस्तुति और प्रशंसाकी इच्छा करते हैं, क्योंकि वे इस सामके प्रस्तावका भजन करनेवाले हैं ॥ ३ ॥ |
अथ यत्सङ्गववेलायाँ१स आदिस्तदस्य वयाँ१स्य-<br>न्वायत्तानि तस्मात्तान्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यादायात्मानं<br>परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् आदित्यका जो रूप सङ्गववेलामें ( सूर्योदयके तीन मुहूर्त्त पश्चात् कालमें ) रहता है वह आदि है । उसके उस रूपके अनुगत पक्षिगण हैं; क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन करनेवाले हैं, इसलिये वे अन्तरिक्षमें अपनेको निराधाररूपसे सब ओर ले जाते हैं ॥ ४ ॥
| अथ यत्सङ्गववेलायां गवां <br><br> रश्मीनां सङ्गमनं सङ्गमो यस्यां <br><br> वेलायां गवां वा वत्सैः सा सङ्ग- | तत्पश्चात् सङ्गववेलामें—जिस वेलामें गो यानी सूर्यकिरणोंका सङ्गम होता है अथवा जिसमें गौओंका बछड़ोंसे सङ्गम होता है उसे सङ्गववेला |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७
| बवेला तस्मिन्काले यत्सावित्रं रूपं स आदिर्भक्तिविशेष ओङ्कारस्तदस्य वयांसि पक्षिणोऽन्वायत्तानि ।<br><br>यत एवं तस्मात्तानि वयांस्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यनालम्बनान्यात्मानमादायात्मानमेवालम्बनत्वेन गृहीत्वा परिपतन्ति गच्छन्त्यत आकारसामान्यादादिभक्तिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥ | कहते हैं, उस कालमें सूर्यदेवका जो रूप होता है वह आदि—भक्तिविशेष ओङ्कार है । उसके उस रूपके अनुगामी पक्षिगण हैं ।<br><br>क्योंकि ऐसा है इसलिये वे पक्षिगण आकाशमें अनारम्बण—बिना आश्रयके ही अपनेको आलम्बनरूपसे ग्रहण कर सब ओर जाते हैं । अतः [ 'आदायात्मानं परिपतन्ति' इसके आरम्भमें ] आकाररूप सादृश्य होनेके कारण वे इस सामकी आदि-संज्ञक भक्तिके भागी हैं ॥ ४ ॥ |
अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥
तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका रूप होता है वह उद्गीथ है । इसके उस रूपके देवतालोग अनुगत हैं । इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी हैं ॥ ५ ॥
| अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिन ऋजुमध्यन्दिन इत्यर्थः । स उद्गीथभक्तिस्तदस्य देवा अन्वा- | तथा अब जो सम्प्रति मध्यन्दिनमें अर्थात् ठीक मध्याह्नमें [ आदित्यका रूप होता ] है वह उद्गीथभक्ति है; उसके उस रूपके अनुगामी देवता- |
१७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २
| १७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
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| यत्ताः, द्योतनातिशयात्तत्काले। तस्मात्ते सत्तमा विशिष्टतमाः प्राजापत्यानां प्रजापत्यपत्यानामूद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥५॥ | लोग हैं, क्योंकि उस समय वे अत्यन्त प्रकाशशील होते हैं। इसीसे वे प्राजापत्योंमें—प्रजापतिके पुत्रोंमें सत्तम-विशिष्टतम होते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी हैं ॥५॥ |
अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात्प्रागपराह्णात्स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥
तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नके पूर्व होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ हैं। इसीसे वे प्रतिहृत (ऊपरकी ओर आकृष्ट) किये जानेपर नीचे नहीं गिरते, क्योंकि वे इस सामकी प्रतिहारभक्तिके पात्र हैं ॥ ६ ॥
| अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात्प्रागपराह्नाद्यद्रूपं सवितुः स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्ताः। अतस्ते सवितुः प्रतिहारभक्तिरूपेणोर्ध्वं प्रतिहृताः सन्तो नावपद्यन्ते नाधः पतन्ति तद्द्वारे सत्यपीत्यर्थः। यतः प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नो गर्भाः ॥ ६ ॥ | तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नसे पूर्व होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ हैं। अतः वे सूर्यकी प्रतिहारभक्तिरूपसे ऊपरकी ओर प्रतिहृत (आकृष्ट) होनेके कारण, पतनके द्वारपर रहते हुए भी, अवपन्न नहीं होते—नीचे नहीं गिरते, क्योंकि गर्भ इस सामकी प्रतिहारभक्तिके भागी हैं ॥ ६ ॥ |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९
अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तद-
स्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षꣳश्व-
भ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥
तथा आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु हैं। इसीसे वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग जाते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं ॥ ७ ॥
| अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्याः पशवोऽन्वायत्ताः । तस्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा भीताः कक्षमरण्यं श्वभ्रं भयशून्यमित्युपद्रवन्त्युपगच्छन्ति; दृष्ट्रोपद्रावणादुपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥७॥ | तथा आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तके पूर्व होता है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु हैं। इसीसे वे पुरुषको देखकर भयभीत हो कक्ष—वनमें अथवा भयशून्य गुहामें भाग जाते हैं। इस प्रकार देखकर भागनेके कारण वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं ॥७॥ |
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अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वा-
यत्तास्तस्मान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न
एवं खल्वमुमादित्यꣳसप्तविधꣳसामोपास्ते ॥ ८ ॥
तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन है। उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं; इसीसे [श्राद्धकालमें] उन्हें [पितृ-पितामह आदिरूपसे दर्भपर] स्थापित करते हैं, क्योंकि वे पितृ-गण निश्चय ही इस सामकी निधनभक्तिके पात्र हैं। इसी प्रकार इस आदित्यरूप सप्तविध सामकी उपासना करते हैं ॥ ८ ॥
१८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अथ यत्प्रथमास्तमितेऽदर्शनं जिगमिषति सवितरि तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्तान्निदधति पितृपितामहप्रपितामहरूपेण दर्भेषु निक्षिपन्ति तांस्तदर्थं पिण्डान्वा स्थापयन्ति । निधनसंबन्धान्निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्नः पितरः। एवमवयवशः सप्तधा विभक्तं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते यस्तस्य तदापत्तिः फलमिति वाक्यशेषः ॥ ८ ॥ | तथा सूर्यास्तसे पूर्व अर्थात् सूर्य जब अदृश्य होना चाहता है उस समय उसका जो रूप है वह निधन है। उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं। इसीसे उन्हें निहित करते हैं अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामहरूपसे उन्हें दर्भोंपर स्थापित करते हैं अथवा उनके उद्देश्यसे पिण्ड रखते हैं । इस प्रकार निधनका सम्बन्ध होनेके कारण वे पितृगण इस सामकी निधनभक्तिके पात्र हैं । इस प्रकार अवयवरूपसे सात भागोंमें विभक्त हुए इस आदित्यरूप सप्तविध सामकी जो उपासना करता है उसे आदित्यरूपताकी प्राप्ति होनारूप फल मिलता है—यह वाक्यशेष है ॥८॥ |
<br>इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना
| मृत्युरादित्यः अहोरात्रादि-कालेन जगतः प्रमापयितृत्वा-त्तस्यातितरणायेदं सामोपासन-मुपदिश्यते— | दिवस और रात्रि आदि कालके द्वारा जगत्का प्रमापयिता [ अर्थात् वधकर्ता ] होनेके कारण आदित्य मृत्यु है, उसे पार करनेके लिये इस सामोपासनाका उपदेश किया जाता है— |
अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधꣳसामो-
पासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं
तत्समम् ॥ १ ॥
अब [ यह बतलाया जाता है कि ] समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करे। 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है ॥ १ ॥
| अथ खल्वनन्तरमादित्य-मृत्युविषयसामोपासनस्यात्मसं-मितं स्वावयवतुल्यतया मितं परमात्मतुल्यतया वा संमित-मतिमृत्यु मृत्युजयहेतुत्वात् । | अब निश्चय ही आदित्यरूप मृत्यु-के विषयभूत सामकी उपासनाके पश्चात् आत्मसंमित—अपने अवयवों ( सामावयवों ) की तुल्यताद्वारा परिमिति अथवा परमात्मसदृशताके कारण ज्ञात, जो मृत्युको जीतनेका हेतु होनेके कारण अतिमृत्यु है, [ उस सप्तविध सामकी उपासना |
१८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| यथा प्रथमेऽध्याय उद्गीथभक्ति-<br>नामाक्षराण्युद्गीथ इत्युपास्यत्वे-<br>नोक्तानि, तथेह साम्नः सप्त-<br>विधभक्तिनामाक्षराणि समाहृत्य<br>त्रिभिस्त्रिभिः समतया सामत्वं<br>परिकल्प्योपास्यत्वेनोच्यन्ते ।<br><br>तदुपासनेन मृत्युगोचराक्षर-<br>संख्यासामान्येन तं मृत्युं प्राप्य<br>तदतिरिक्ताक्षरेण तस्यादित्यस्य<br>मृत्योरतिक्रमणायैव संक्रमणं<br>कल्पयति । अतिमृत्यु सप्तविधं<br>सामोपासीत मृत्युमतिक्रान्त-<br>मतिरिक्ताक्षरसंख्ययेत्यतिमृत्यु<br>साम । तस्य प्रथमभक्तिनामा-<br>क्षराणि हिङ्कार इत्येतत्त्र्यक्षरं<br>भक्तिनाम । प्रस्ताव इति च | करे—यह बतलाया जाता है ] जिस<br>प्रकार प्रथम अध्यायमें उद्गीथभक्ति<br>के नामके अक्षर 'उद्गीथ हैं' इस<br>प्रकार उपास्यरूपसे बतलाये गये हैं,<br>उसी प्रकार यहाँ सामकी सात<br>प्रकारकी भक्तियोंके नामोंके अक्षरोंको<br>एकत्रित कर तीन-तीन अक्षरोंद्वारा<br>समत्व होनेके कारण उनके सामत्व-<br>की कल्पना कर उन्हें उपास्यरूपसे<br>बतलाया जाता है ।<br><br>मृत्युके विषयभूत अक्षरोंकी संख्या<br>[जो इक्कीस है उस] की सदृशताके<br>कारण उन अक्षरोंकी उपासना करनेसे<br>मृत्यु (आदित्य) को प्राप्तकर उनसे<br>अतिरिक्त अक्षरद्वारा उस आदित्यरूप<br>मृत्युके अतिक्रमणके लिये ही श्रुति<br>[ उपासकके ] संक्रमणकी कल्पना<br>करती है* [ श्रुतिमें जो कहा है<br>कि ] अतिमृत्यु सप्तविध सामकी<br>उपासना करे सो अतिरिक्त अक्षर-<br>संख्या (बाईसवीं) के द्वारा मृत्युका<br>अतिक्रमण करनेके कारण साम<br>अतिमृत्यु है । उस सामकी प्रथम<br>भक्तिके नामाक्षर 'हिंकार' हैं, यह<br>भक्तिनाम तीन अक्षरोंवाला है; तथा |
* यह बात आगे पाँचवें मन्त्रमें स्पष्ट कर दी गयी है।
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ १८३
| भक्तेस्त्र्यक्षरमेव नाम तत्पूर्वेण समम् ॥ १ ॥ | ‘प्रस्ताव’ यह प्रस्तावभक्तिका नाम भी तीन अक्षरोंवाला ही है, अतः यह पहले नामके समान है ॥ १ ॥ |
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आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥
‘आदि’ यह दो अक्षरोंवाला नाम है और ‘प्रतिहार’ यह चार अक्षरोंवाला नाम है। इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे समान हो जाते हैं ॥ २ ॥
| आदिरिति द्व्यक्षरं सप्तविधस्य साम्नः संख्यापूरण ओङ्कार आदिरित्युच्यते । प्रतिहार इति चतुरक्षरम् । तत इहैकक्षरमवच्छिद्याक्षरयोः प्रक्षिप्यते । तेन तत्सममेव भवति ॥ २ ॥ | ‘आदि’ यह दो अक्षरोंवाला है। सात प्रकारके सामकी संख्याको पूर्ण करनेमें ओङ्कार ‘आदि’ इस नामसे कहा जाता है। तथा ‘प्रतिहार’ चार अक्षरोंवाला नाम है। यहाँ उसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिके दो अक्षरोंमें मिला दिया जाता है। इससे वह उसके समान ही हो जाता है ॥ २ ॥ |
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उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥
‘उद्गीथ’ यह तीन अक्षरोंका और ‘उपद्रव’ यह चार अक्षरोंका नाम है। ये दोनों तीन-तीन अक्षरोंमें तो समान हैं; किंतु एक अक्षर बच रहता है। अतः [ ‘अक्षर’ होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेसे तो वह [ एक ] भी उनके समान ही है ॥ ३ ॥
१८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यतेऽतिरिच्यते। तेन वैषम्ये प्राप्ते साम्नः समत्वकरणायाह तदेकमपि सदक्षरमिति त्र्यक्षरमेव भवति। अतस्तत्समम् ॥ ३ ॥ | 'उद्गीथ' यह नाम तीन अक्षरोंवाला है और 'उपद्रव' यह चार अक्षरोंवाला। तीन-तीन अक्षरोंसे ये समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है यानी बढ़ता है। उसके कारण इनमें विषमता प्राप्त होनेपर सामका समत्व करनेके लिये श्रुति कहती है कि वह एक होनेपर भी 'अक्षर' है, इसलिये वह नाम भी तीन अक्षरोंवाला ही है। अतः उन्हींके समान है ॥ ३ ॥ |
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
'निधन' यह नाम तीन अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस अक्षर हैं ॥ ४ ॥
| निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति। एवं त्र्यक्षरसमतया सामत्वं संपाद्य यथाप्राप्तान्येवाक्षराणि संख्यायन्ते। तानि ह वा एतानि सप्तभक्तिनामाक्षराणि द्वाविंशतिः ॥ ४ ॥ | 'निधन' यह तीन अक्षरोंवाला नाम है, अतः यह उनके समान ही है। इस प्रकार तीन अक्षरोंमें समानता होनेके कारण उनका सामत्व सम्पादित कर इस प्रकार प्राप्त हुए अक्षरोंकी गणना की जाती है—निश्चय ही वे ये सात भक्तियोंके नामाक्षर बाईस हैं ॥ ४ ॥ |
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
एकविंशत्यादित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥
इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोकं प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोकसे वह आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है । बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं शोकरहित लोकको जीत लेता है ॥ ५ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्रैकविंशत्यक्षरसंख्ययादित्यमाप्नोति मृत्युम् । यस्मादेकविंश इतोऽस्माल्लोकादसावादित्यः संख्यया । "द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एक विँशः" इति श्रुतेः । अतिशिष्टेन द्वाविंशेनाक्षरेण परं मृत्योरादित्याज्जयत्याप्नोतीत्यर्थः । यच्च तदादित्यात्परं किं तत् ? नाकं कमिति सुखं तस्य प्रतिषेधोऽकं तन्न भवतीति नाकं कमेवेत्यर्थः, अमृत्युविषयत्वात् । विशोकं च तद्विगतशोकं मानसदुःखरहितमित्यर्थः । तदाप्नोतीति ॥ ५ ॥ | वहाँ वह इक्कीस अक्षर-संख्याके द्वारा तो आदित्यलोकरूप मृत्युको प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोककी अपेक्षा वह आदित्यलोक संख्यामें इक्कीसवाँ है। जैसा कि "बारह महीने, पाँच ऋतुएँ, तीन ये लोक और इक्कीसवाँ वह आदित्यलोक', इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है। बचे हुए बाईसवें अक्षरद्वारा वह मृत्यु यानी आदित्यलोकसे परे उत्कृष्ट लोकको जीत लेता यानी प्राप्त कर लेता है। उस आदित्यलोकसे जो परे है वह क्या है ? वह नाक है—क सुखको कहते हैं उसका प्रतिषेधक अक है, वह जिसमें न हो उसे नाक कहते हैं; अर्थात् मृत्युका विषय न होनेके कारण वह क (सुख) ही है। तथा वह विशोक—शोकरहित अर्थात् मानसिक दुःखसे हीन है। उसी (लोक) को वह प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥ |
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| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| उक्तस्यैव पिण्डितार्थमाह— | श्रुति ऊपर कही हुई बातका ही सारांश कहती है— |