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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

दूसरी व्याख्या

पुत्री निरंजन लागि सिधाऊ । तुमको समरथ सदा सहाऊ ॥
तब कन्या निरंजन लग आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥

देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।

उपज्यो मोहऊ प्रेम तब, विप्रित मनमें बाढ़ि ॥

पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥

कहै कैल सुनो तुम बानी । मो कारन तुहि पुरुष उत्पानी ॥

हम तुम कीजै स्लिस्ट पसारा । तीनहि लोक सकल महिभारा ॥

तब अस्टंगी कैलसों कहाई । मोर तोर नहि होय सगाई ॥

मैं तोरि बहिनी तू मोर भाई । सो अनरीति सब दीन चलाई ॥

कहैं कैल सुनु आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥

जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निरन ठानौ ॥

तब अस्टंगी कहै बुझाई । बिन अज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥

बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अंत करि दीन्हा ॥

देखि स्वरूप कन्यहि को, मनमें रोष भराय ।

मनमें रोष भरयो जब, कन्यहिं लीन्हीं खाय ॥

लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हिये सम्हारा ॥

तब सुरति बनाते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै वहि वारा ॥

यहि प्रपंच अच्छर सब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥

कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥

पिता पिता कैल सो कहेऊ । मदन प्रचंड कैल छन भयेऊ ॥

अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥

कियो संयोग भयो त्रैवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णुकुमारा ॥

तीजे संभु विस्तुते छोटा । येक निरंजनही के ढोटा ॥

जैसे रूप निरंजनही, तैसे तीनों भाय ।

यह उत्पत है कैलकी, आगे स्लिस्ट उपाय ॥

करि परपंच सूत्र में गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥

यहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते स्वासा सुरति उठाई ॥

तेहि स्वासाते वेद कढ़ि आई । रूप निधान चारों बने भाई ॥

हाथन पोथी सुरसुर बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥

चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अच्छर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचंड भयो बरियारा । तब अच्छरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अच्छर चलै अचिन्त लगि गयऊ । महासूत्र छोडि तब दयऊ ॥
तब अचित्य अच्छर समझावा । यह अविगति गति काहु ननपावा ॥
तुम तो सुरति हमारहि भाई । कैल सुरति समरथ निर्मायी ॥
लच्छ जीव नित करै अहारा । सवा लच्छ नितप्रति विस्तारा ॥
अंसवंस मिलि एक मत कीन्हा । चारों ज्ञान विचारि तब लीन्हा ॥
तुम गति हंसरूप है भाई । वह तो कैल जीव दुखदाई ॥
तुम समरथको ध्यान लगावो । अंतर गति समरथ सुख पावो ॥
चारि ज्ञानमें निरनय कीन्हा । सो निरनय चारि अंशको दीन्हा ॥
कहे कबीर धर्मदाससों, एता सकल पसार ॥
तीन सुरतिको खेल भयो, चौथे हंस उबार ॥

धर्मदास उवाच ।

धरमदास बहुतै सुख पावा । उठि सतगुरुसो विनती लावा ॥
सांचे वचन तुम्हारी बानी । आदि अंतकी निरणय ठानी ॥
कौन है अंड कौन है अंसा । कोहै अंस कौन है वंसा ॥
कौन कैल कौन गुण धारी । कौन स्निस्ट कौन संसारी ॥
एती बात मोहि सों भाखो । और गुप्त गोये जनि राखो ॥
विन देखी सबही कहै, सुनि पाई हम कान ।
सोई अदेख तुम दिखावहु, आदि अंत परमान ॥

सतगुरु कबीर उवाच ।

सुनि सतगुरु मनमें बिहँसानै । तुमसों धर्मनि निरनय ठानै ॥
तेज अंड है अच्छर बंसा । अचित्य अंस सोहं है हंसा ॥
निरंजन कैल चारि गुन धारी । तिन स्निस्ट अविगति संचारी ॥
तेज अंड अचित्त है अंसा । ओहं अंड जोहं है हंसा ॥
सत्य अंज जोहं है अंसा । सोरह तिनके उपज्यो वंसा ॥
पालंग पचीस तासु विस्तारा । पातालपांजी तिनको बैठारा ॥
तिसरो अंड छमा बखानी । अकह अंश तिन्हकी रजधानी ॥
अकहनामते सताविसै बंसा । तिन्हके सकल और हैं अंसा ॥

वेदके प्राकट्यपर मतभेद

चौथा धीरज अंड है भाई । ताते सुक्ति अंस निरमाई ॥
वंश बयालिस तिनके कडिहारा । तिनकी सनद चलै संसारा ॥
पाँचे अंड सुमत निरमाई । अंश हिरम्भर बैठक पाई ॥
तिन्हके वंस सात परवानी । यह सब भेद लेहु पहिचानी ॥
पाँचहि अंड आठ भए अंसा । सात सुरति इक्कोत्तर बंसा ॥
चारि अंडको एक विचारा । दोए करीको भेद अपारा ॥
एक अंश कोई पार न पावै । सतगुरु निजही भेद बतावै ॥
सुरति सरूप हमही सब कीना । मान बंडाइ अंसनको दीना ॥
जब अतीत सुरत ठहरानी । सुरति समरथ घट आनि समानी ॥
दोई मछय एक आए समाई । तिन्हको नाम अच्छर ठहराई ॥
अक्षर इच्छा उपजी भावा । दूसर अंस कैल होय आवा ॥
आठवाँ अंस कालकी वानी । अच्छर घट जो आए समानी ॥
स्वासा होय बाहर कडि आई । तिन्हकी गति कोइ विरलै पाई ॥
पांच परगट तीन गुप्त पसारा । इनके अंस इग्यारह सारा ॥
चारि अंस भवतारन कीन्हा । चारि वेद निरंजन दीन्हा ॥
तीन देव स्त्रिस्टि अधिकारी । उपजनि बिनसनि दुखसुख भारी ॥
तिन चौरासी लच्छ बनावा । जीव अनेक बहुत निरमावा ॥
यह अविगति काहू नहि पावा । समरथ ऐसा खेल बनावा ॥
साखी-वेद कितेब जाने नहीं, पावे ग्यानी थाहू ।
तीन अंशलों सबही खेले, आगे अगम अथाहू ॥
इति कबीर बाणीका प्रमाण सृष्टि उत्पत्ति विषय ।

प्रमाण अनुराग सागर सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका ।

धर्मदास प्रश्न ।

अब साहब मोहि देहु बताई । अगर लोक सो कहौं रहायी ॥
लोक दीप मोहि बरनि सुनावहु । तिरषावन्तको अमि पियावहु ॥
कौने द्वीप हंसको बासा । कौने द्वीप पुरुष रहि बासा ॥
भोजन कौन हंस तहँ करई । औ बानी कहँ तहँ उच्चरई ॥
कैसे पुरुष लोक रचि राखा । द्वीपहिं को कैसे अभिलाखा ॥
तीन लोक उत्पत्ति भाखो । वर्णतहु सकल गोय जनि राखो ॥
काल निरंजन केहि विधि भयऊ । कैसे षोडश सुत निर्भयऊ ॥

कैसे चार खानि विस्तारी । कैसे जीव काल बस डारी ॥
कैसे कूरम सेस उपराजा । कैसे मीनबराह्मिं साजा ॥
त्रय देवा कौने विधि भयऊ । कैसे महि अकास निरमयऊ ॥
चंद सूर कहु कैसे भयऊ । कैसे तारागन सब ठयऊ ॥
किहि विधि भइ शरीरकी रचना । भाषो साहेब उत्पत्ति बचना ॥
जाते संसय होय उछेदा । पाई भेद मन होय अखेदा ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति कहो सतगुरु, क्रिपाकरि निज दासको ॥
बचन सुधा सु परकास कीजे, नास हों जम त्रासको ॥
एक एक विलोय बरनहु, दास मोहि निज जानिकै ॥
सत्य वक्ता सद्गुरु तुम लेब निश्चय मैं मानिकै ॥ १० ॥

सोरठा—निश्चय बचन तुम्हार, मोहि अधिक प्रिय ताहिंते ।
लीला अगम अपार, धन्य भाग दरसन दीये ॥ १० ॥

कबीर बचन ।

धरमदास अधिकारी पाया । ताते मैं कहि भेद सुनाया ॥
अब तुम सुनहु आदिकी बानी । भाषों उत्पत्ति प्रलय निसानी ॥

सृष्टिके आदिमें क्या था ?

तबकी बात सुनहु धर्मदासा । जब नहिं महि पताल अकासा ॥
जब नहिं कूर्म बराह औ सेसा । जब नहिं सारद गौरि गनेसा ॥
जब नहिं हते निरंजन राया । जिनजीवन कहैं बांधि झुलाया ॥
तेतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊँ काहीं ॥
ब्रह्मा विस्नु महेशुर नहिं तहिया । सास्त्र वेद कुरान न कहिया ॥
तब सब रहे पुरुषके माहीं । ज्यों बटबूच्छ मध्य रह छाहीं ॥

छन्द—आदि उत्पत्ति सुनहु धर्मनि, कोइ न जानत ताहि हो ॥
सबहि भो विस्तार पाछे, साख देऊँ मैं काहि हो ॥
वेद चारों नाहिं जानत; सत्य पुरुष कहानियां ॥
वेदको तब मूल नाहीं, अकथकथा बखानियां ॥ ११ ॥

सोरठा—निराकारते वेद, आदि भेद जाने नहीं ॥
पंडित करत उछेद, मते वेदके जग चले ॥ ११ ॥

ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता

सृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुषकी रचना ।

सत्य पुरुष जब गुप्त रहाये । कारन करन नहीं निरमाये ॥
समपुट कमल रह गुप्त सनेहा । पुहुप माहि रह पुरुष विदेहा ॥
इच्छा कीन्ह अंस उपजाये । हंसन देख हरष बहु पाये ॥
प्रथमहि पुरुष सब्द परकासा । दीप लोक रचि कीन्ह निवासा ॥
चारि करी सिंहासन कीन्हा । तापर पुहुप दीप कर चीन्हा ॥
पुरुष कला धरि बैठे जहिया । प्रगटी अगर वासना तहिया ॥
सहस्र अठासी दीप रचि राखा । पुरुष इच्छातै सब अभिलाखा ॥
सबै द्वीप रह अगर समायी । अगर वासना बहुत सुहायी ॥

सोलह सुतका प्रगट होना ।

दूजे सब्द जु पुरुष परकासा । निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥
तीजे सब्द सु पुरुष उच्चार । ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥
टेकि चरन सम्मुख ह्वै रहेऊ । आज्ञा पुरुष दीप तिन्ह दयऊ ॥
चौथे सब्द भयो पुनि । जबहीं । विवेकनाम सुत उपजे तबहीं ॥
आप पुरुष किय दीप निवासा । पञ्चम सब्द सो तेज परकासा ॥
पँचऐ सब्द जब पुरुष उच्चार । काल निरंजन भौ अवतारा ॥
तेज अंसते काल होय आवा । ताते जीवन कहैं सन्तावा ॥
जिवरा अंस पुरुषका आहीं । आदि अंत कोई जानत नाहीं ॥
छठऐ सब्द पुरुष मुख भाषा । प्रगटे सहज नाम अभिलाषा ॥
सतऐ सब्द भयो संतोषा । दीन्हो दीप पुरुष परितोषा ॥
अठऐ सब्द पूरुष उच्चार । सुरति सुभाव दीप बैठारा ॥
नवमें सब्द अनन्द अपारा । दशऐ सब्द समा अनुसार ॥
ग्यारहें सब्द नाम निष्कामा । बारहें सब्द जलरंगी नामा ॥
तेरहें सब्द अचित्त सुत जानो । चौदहें सब्द सुत प्रम बखानो ॥
पन्द्रहें सब्द सुत दीनदयाला । सोलहें सब्द मैं धिरज रसाला ॥
सत्रहवें सब्द सुत योगसंतायन । एक नाल षोडश सुत पायन ॥
सब्दहिते भयो सुतन अकारा । सब्दहि ते लोक दीप विस्तारा ॥
अगर अमी दिय अंस अहारा । दीप दीप अंसन बैठारा ॥
अंसन सोभा कला अनंता । होत तहाँ सुख सदा वसन्ता ॥
अंसन सोभा अगम अपारा । कला अनन्तको वरने पारा ॥

वेद और किताबोंके मूलका वर्णन

सब सुत करें पुरुषको ध्याना । अभी अहार सदा सुख माना ॥
याही विधि सोलह सुत भयऊ । धरमदास तुम चित धरि लेऊ ॥
छन्द-दीप करीको अनंत सोभा, नाहि बनत सो बने ॥
अमित कला अपार अद्भुत, सुतन सोभाको गने ॥
पुरुषके उजियारसे सुन, सबै दीप अंजोर हो ॥
सत पुरुष रोम प्रकाश एकहि, चन्द सूर करोर हो ॥
सोरठा-सतपुर आनंदधाम, सोग मोह दुख तहैं नहीं ॥
हंसनको विसराम, पुरुष दरस अँचवन सुधा ॥ १२ ॥

निरञ्जनकी तपस्या और मानसरोवर तथा सूनकी प्राप्ति ।

यहि विधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥
जुग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढपुरुषचित्त दीन्हा ॥
सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हरषित होय चीन्हा ॥

पुरुष वचन-निरञ्जनप्रति ।

पुरुष अवाज उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥
निरञ्जन वचन ।

कहैं धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहैं बैठों जायी ॥
आज्ञा किये जाहु सुत तहवों । मानसरोवर दीप है जहवों ॥
चले धरम तब मानसरोवर । बहुतहरषचित्त करत कलोहर ॥
मानसरोवर आये जहिया । भय आनन्द धरम पुनि तहिया ॥
बहुरि ध्यान पुरुषको कीन्हा । सत्तर जुग सेवा चित दीन्हा ॥
यक पगु ठाढे सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥

पुरुषवचन-सहजप्रति ।

विकस्यो पुहुप उठयो जब बानी । बोलत वचन उठयो अघरानी ॥
जाहु सहज तुम धरमके पास । अब कस ध्यान कीन्ह परगासा ॥
सेवा बहु कीन्हा धर्मराऊ । दियो ठौर वहि जहाँ रहाऊ ॥
तीन लोक तब पलमें दीन्हा । लिखि सेवकाइ दया आस कीन्हा ॥
तीन लोक कर पायो राजू । भयो आनन्द धरम मन गाजू ॥
जब का चाहे पूछो जाई । जो कछु कहै सो देउ सुनाई ॥

सहजका निरञ्जनके पास जाना ।

चले सहज तब सीस नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥
कहे सहज सुन भ्राता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥

वेदोंकी आज्ञा माननीय है

अब का मांगहु सो कह मोही । पुरुष आवाज दीन्ह वह तोही ॥

निरञ्जनवचन-सहजप्रति ।

अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिन्ती जाई ॥
इतना ठाँव न मोहि सुहाई । अब मोहि बकसि देहु ठकुराई ॥
मोरे चित अस भौ अनुरागा । देऊ देश मोहि करहु सभागा ।
कै मोहि देहु लोक अधिकारा । कै मोहि देहु देस यक न्यारा ॥

सहज वचन-सत्यपुरुषप्रति ।

चले सहज सुनि धर्मके बाता । जाय पुरुषसो कहे विख्याता ॥
जो कछु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥

पुरुषवचन-सहजप्रति ।

छन्द

सुन्यो सहजके वचन, जबहीं पुरुष बैन उच्चारेऊ ॥
धरमसे सनतुष्ट हैं हम, वचन मम हिय धारे ॥
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू ॥
करहु रचना जाय तहँवा, सहज वचन सुनावहू ॥ १३ ॥

सोरठा

जाहु सहज तुम वेग, अस कहि आवो धरमसो ॥
दियो सून्यकर थेग, रचना रचहु बनाइके ॥ १६ ॥

निरञ्जनको सृष्टिरचनाका साज मिलनेका वृत्तान्त ।

सहजवचन-निरञ्जन प्रति ।

आय सहज तब वचन सुनावा । सत्य पुरुष जस कहि समुझावा ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सुनतहि वचन धर्म हरषाना । कछुक हरष कछु बिसमय आना ॥

निरंजन वचन-सहज प्रति ।

कहे धर्म सुनु सहज पियारा । कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू । जानु न भेद करों किमि काजू ॥
गम्य अगम्य मोहि नहिं आयी । करो दया सो युक्ति बतायी ॥
विन्ती करौ पुरुषसों मोरी । अहो भ्रात बलिहारी तोरी ॥
किहि विधि रचूं नौखंड बनाई । हे भ्राता सो आज्ञा पाई ॥
मो कहँ देहु साज प्रभु सोई । जाते रचना जगतकी होई ॥

ब्रह्माका वेद पाठ और पिताकी जिज्ञासा

सहजका लोकको जाना ।

तबही सहज लोक पगुधारा । कीन्ह दंडवत बारम्बारा ॥

पुरुषवचन—सहज प्रति ।

अहो सहज कस इहवाँ आऊ । सो हमसों तुम सन्द सुनाऊ ॥

कबीर बचन—धर्मदास प्रति ।

कह्या सहज तव धर्मकी वाता । जो कछु धर्म कही विख्याता ॥

धर्मराय जस विन्ती लायी । तैसे सहज सुनायउ जायी ॥

पुरुषकी आज्ञा सहजसे ।

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा । सुनो सहज तुम वचन हमारा ॥

कूर्म उदर आहि सब साजा । सो ले धरम करे निज काजा ॥

विनती करे कूम सो जायी । माँगि लेइ तेहि माथ नवायी ॥

सहजका धर्मरायके निकट जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना ।

गये सहज पुनि धर्मके पास । आज्ञा पुरुष कीन्ह परगासा ॥

विनती करो कूर्मसो जाई । माँगि लेहु तेहि सीस नवाई ॥

जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं क्रिपा बहुत तब पावहु ॥

निरंजनका कूर्मके पास साज लेनेको जाना ।

चलिभो धरम हरष तब बाढो । मनहि कीन जुमान अतिगाढो ॥

जाय कूर्मके सन्मुख भयऊ । दंड परनाम एक नहि क्रियऊ ॥

अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई । तपत न तनिको अति सितलाई ॥

करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाला ॥

बारह पालँग कूर्म सरीरा । छै पालँग धरम बलवीरा ॥

धावे चहुँ दिस रहै रिसाई । किहि विधि लीजे उत्पति भाई ॥

कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा । जाय कूर्मसे सन्मुख भीरा ॥

कीन्हो काल सीस नख घाता । दरते निकसे पवन अघाता ॥

तीन सीसक तीनहु अंसा । ब्रह्मा विस्नु महेशुर बंसा ॥

पाँच तत्त्व धरती आकासा । चंद सूर उडगन रहिवासा ॥

निसरचो नीर अगिन ससि सूर । निसरचो नभ ढाकन महि थूर ॥

मीन सेष बराह महि थम्भन । पुनि पिरथीको भयो अरम्भन ॥

छीना सीस कूर्मको जबहीं । चले परसेव ठाँव पुनि तबहीं ॥

जबही परसेव बुंद जल दीन्हा । उंचास कोट प्रिथ्वीको कीन्हा ॥

गायत्रीका प्रकट होना

च्छीर ताय जस परत मलाई । अस जलपर प्रिथ्वी ठहराई ॥
बारह दंत रहु महिकर सूला । पवन प्रचंड मही अस्थूला ॥
अंड सरूप अकासको जानो । ताके बीच प्रिथ्वी अनुमानो ॥
कूर्म उदर सुत कूर्म उत्पानो । तापर सेस बराहको थानो ॥
सेस तीस या प्रिथ्वी जानो । ताके हेठ कूर्म बरियानो ॥
किरतम कूर्म अंडके माँही । कूर्म अंस सो भिन्न रहाही ॥
आदि कूर्म रह लोक मंझारा । तिन पुनि पुरुष ध्यान अनुसारा ॥

कूर्म बचन—सत्पुरुष प्रति ।

निरंकार कीन्हो बरियाया । काल कला धरि मोपहैं आया ॥
उदर विदार कीन्ह उन मोरा । आज्ञा जानि कीन्ह नहि थोरा ॥

पुरुष बचन—कूर्म प्रति ।

पुरुष अवाज कीन्ह तेहि बारा । छोटा बन्धु वह आहि तुम्हारा ॥
आहि यही बडनका रीती । औगुन ठावैं करहि वह प्रीती ॥

कबीरबचन—धर्म प्रति ।

पुरुषबचन सुनि कूर्मअनन्दा । अमी सरूप सो आनन्दकन्दा ॥
पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निरञ्जन । जुग अनेक किये सेवा संजन ॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई । करि रचना बैठे पछताई ॥
धर्म राय तब कीन्ह विचारा । कहवालो त्रयपुर विस्तारा ॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हों पाताला । विनाबीज किमिकीजे क्याला ॥
कौन भांति कस करब उपाई । किहि विधि रचों शरीर बनाई ॥
कर सेवा माँगो पुनि सोई । तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥
करि विचार अस हठ तिन धारा । लाग्यो करने पुरुष विचारा ॥
एक पाँव तब सेवा कियेऊ । चौसठ जुगलो ठाढे रहेऊ ॥

बहुरि पुरुषका सहजको निरञ्जनके निकट भेजना ।

छन्द—दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सु सेवाके भये ॥

बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब जाँचत नये ॥

जाहु सहज निरंजन पहैं, देउ जो कुछ मांगई ॥

कराहच बना पुरुष बचना, छल मता तब त्यागई ॥ १४ ॥

सहजका निरञ्जनके निकट पहुँचना ।

सोरठा—सहज चले सिर नाय, जबहि पुरुष आज्ञा कियो ।

तहैंवां पहुँचे जाय, जहाँ निरंजन ठाढरह ॥ १४ ॥

ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावतीकी कथा

देखत सहज धर्म हरपाना । सेवा बस पुरुष तब जाना ॥

सहजवचन ।

कहै सहज सुनु धर्मराया । केहि कारन अब सेवा लाया ॥

निरञ्जनवचन ।

धर्म कहे तब सीस नयायी । देहु ठौर जहँ बैठौं जायी ॥

सहजवचन

तब सहज अस भाषे लीन्हा । सुनहु धर्म तोहि पुरुष सब दीन्हा ॥

कूर्म उदर सो जो कछु आवा । सो तोहि देन पुरुष फरमावा ॥

तीनों लोक राज तोहि दीन्हा । रचना रचहु होहु जनि भीना ॥

निरञ्जनवचन ।

तबै निरंजन विनती लायी । कैसे रचना रचूँ बनायी ॥

पुरुषहि कहौ जोरि युग पानी । मैं सेवक दुतिया नहि जानी ॥

पुरुष सो विनती करो हमारा । दीजे खेत बीज निज सारा ॥

मैं सेवक दुतिया नहि जानू । ध्यान पुरुषको निसिदिन आनू ॥

पुरुषहि कहो जाइ यह बानी । देहु बीज अम्बर सहिदानी ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सहज कह्यो पुनि पुरुषहि जाई । जस कछु कह्यो निरंजनराई ॥

गयो सहज निज दीप सुखासन । जबहि पुरुष दीन्हें अनुशासन ॥

सेवा वश सतपुरुष दयाला । गुण औगुण नहिंचित्ति किरपाला ॥

अद्याको उत्पत्ति ।

इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा । अष्टंगी कन्या उपचारा ॥

अष्ट बाहु कन्या होय आई । बायें अंग सो ठाढ़ रहाई ॥

अद्यावचन ।

माथ नाइ पुरुष सो कहई । अहो पुरुष आज्ञा कस अहई ॥

पुरुषवचन अद्या प्रति । सत्यपुरुषको अद्याको मूलबीज देना ।

तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरमके पासा ॥

देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्पत्ति वारी ॥

कबीरवचन-धर्मदास ।

दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सोहँग जीव कर होई ॥

जीव सोहँगम दूसर नाहीं । जीव सो अंस पुरुषको आही ॥
सकती पुनि तीन पुरुष उत्पाना । चेतनि उलंघनि अभया जाना, ॥
छन्द-पुरुष सेवावश भये तब अष्टंगहि दीन्ह हो ॥
मानसरोवर जाहु कहिया देहु धर्महि चीन्ह हो ॥
अष्टंगी कन्या हती जेहि रूप शोभा अति बनी ॥
जाहु कन्या मानसरवर करहु रचना अति घनी ॥ १५ ॥

सोरठा-चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे ॥

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नायके ॥ १५ ॥

यह सब दीन्हे आदि कुमारी । मान सरोवर चलि भइ नारी ॥
ततछिन पुरुष सहज टेरावा । धावत सहज पुरुष पहिं आवा ॥

पुरुषवचन सहजप्रति ।

जाइ सहज धरम यह कहहूँ । दीन्ही वस्तु जस तुम चहहूँ ॥
मूल बीज तुम पहुँ पठवावा । करहु स्लिष्टि जस तुम मन भावा ॥
मान सरोवर जाइ रहाहूँ । तहँते होइ हैं स्लिष्टि उराहूँ ॥

पुनि सहजका निरञ्जनके ढिग जाना ।

चले सहज तहवाँ तब आये । धर्म धार जहँ ठाढ रहाये ॥
कहेउ सु वचन पुरुषको जबहीं । धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥

निरञ्जनका मानसरोवरमें अच्छाको पाकर मोहवश हो उसे निगल
जाना और सत्पुरुषका शाप पाना ।

पुरुष वचन सुन तबहीं गाजा । मान सरोवर आन विराजा ॥
आवत कामिनि देख्यो जबहीं । धरमराय मन हरण्यो तबहीं ॥
कला उभय अष्टंगी केरी । धरमराय तिहिं दिदकै हेरी ॥
कला उदोत अंत कछु नाहीं । काल मगन हँ निरखे ताही ॥
निरखत धरम सुभयो अधीरा । अंग अंग सब निरखसरीरा ॥
धरमराय कन्या कह ग्रासा । काल स्वभाव सुनो धर्मदासा ॥
कीनो ग्राह काल अन्याई । तब कन्या चित विस्मय आई ॥
ततछन कन्या कीन्ह पुकारा । काल निरंजन कीन्ह अहारा ॥
तबही धर्म सहज लग आई । सहज सून्य तब लीन्ह छुड़ाई ॥
पुरुष ध्यान कूर्म अनुसारा । मोसनकाल कीन्ह अधिकारा ॥
तीन शीश मम भच्छन कीन्हो । हो सत्पुरुष दया भल चीन्हो ॥
यही चरित्र पुरुष भल जानी । दीन्ह सापसों कहीं बखानी ॥

निरंजनका आद्याको शाप देना

पुरुषका शाप निरंजन प्रति ।

लच्छ जीव नित प्राप्त करहू । सवा लच्छ नित प्रति विस्तरहू ॥
छन्द-पुनि कीन्ह पुरुष तिवान किमि मेटि डारो काल हो ॥

कठिन काल कराल जीवन बहुत करइ बिहाल हो ॥

यहि मेटत मुहि अब ना बने नाल । इक सुत षोडसा ॥

एक मेटत सबै मिटिहैं वचन डोल अडोलसा ॥ १६ ॥

सोरठा-डोले वचन हमार, जो अब मेटों धरमको ।

वचन करौं प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहै ॥ १६ ॥

सत्पुरुषका योगीतजीको निरञ्जनके पास उसे मानसरोवरसे
निकाल देनेकी आज्ञा देकर भोजना ।

जोगजीत कहैं पुरुष बुलावा । धर्म चरित सब कहि समुझावा ॥

सत्पुरुषवचन-योगजीत प्रति ।

जोगजीत तुम बेगि सिधारो । धर्मरायको मारि निकारो ॥

मानसरोवर रहन न पावै । अब यहि देस काल नहि आवै ॥

जाके रहे धरम वहि देसा । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेसा ॥

धर्मके उदर माहि है नारी । तासो कहो निज शब्द सम्हारी ॥

उदर फारिकै बाहर आवै । कूर्म उदर विदारि फल पावै ॥

धरमरायसे कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हरी होई ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

जोग जीत चल भे सिर नाई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥

जोगजीत कहैं देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥

निरञ्जनवचन-योगजीत प्रति ।

पूछा काल कौन तुम आहू । कौन काज तुम यहाँ सिधाहू ॥

योगजीतवचन-निरंजन प्रति ।

जोगजीत अस कहे पुकारी । अहो धरम तुम प्राप्त नाारी ॥

आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारों तोही ॥

जोग जीतवचन-अद्या प्रति ।

जोगजीत कन्या सो कहिया । नारि काहे उदरमहँ रहिया ॥

उदर फारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तेहि ठाहर ॥

विष्णुका पिताके दर्शन राज्य पाना आदि विष्णुको पिताका दर्शन होना

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

सुनिके धर्म क्रोध उर जरेऊ । जोगजीत सो सन्मुख भिरेऊ ॥
जोग जीत तब किन्हे ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना ॥
पुरुष आज्ञा भई तोह काला । मारहु माँझ लिलार कराला ॥
जोगजीत पुनि तँसो कीन्हा । जस आज्ञापुरुष तेहि दीन्हा ॥
छन्द-गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोकते न्यारहो ॥
भयो त्रासित पुरुष ढरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो ॥
निकसि कन्या उदरते पुनि, देख धर्महि अति डरी ॥
अब नाहि देखों देस वह, कहो कौन विधि कहैंवां परी ॥ १७ ॥
सोरठा-कामिनि रही सकाय, त्रासित काल डर अधिक ॥
रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खडी ॥ १७ ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।

कहे धर्म सुनु आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥
पुरुष रचा तोहि हमरे काजा । इकमति होय करहु उपराजा ॥
हम हैं पुरुष तुमहिं हौ नारी । अब जनिडरपो त्रास हमारी ॥

अद्यावचन-निरञ्जन प्रति ।

कहे कन्या कस बोलहु बानी । भ्राता जेठ प्रथम हम जानी ॥
कन्या कहै सुनो हो ताता । ऐसी विधि जनि बोलहु बाता ॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । तँ उदर मांझु लियो डारी ॥
जेठ बंधु प्रथमहिके नाता । अब तो अहो हमारे ताता ॥
निरमल द्विष्ट अब चितवहु मोही । नहिंतो पाप होय अब तोही ॥
मंद द्विस्टिन चितवहु मोही । नातो पाप होय अब तोही ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति

कहे निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी ॥
पाप पुन्य डर हम नहिं डरता । पाप पुन्यके हमहीं करता ॥
पाप पुन्य हमहींसे होई । लेखा हमार न लेवे कोई ॥
पाप पुन्य हम करंब पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥
ताते तोहि कहों समुझाई । सीख हमार लो सीस चढाई ॥
पुरुष दीन तोहि हम कहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

विहैंसी कन्या सुन अस बाता । इक मति होय दोइ रंगराता ॥

शिवका शाप और वर पाना

रहस वचन बोली म्निदु बानी । नारि नीच बुधि रति विधि ठानी ॥
रहस वचन सुनि धरम हरषाना । भोग करनको मनमें आना ॥

छन्द-भग नहिं कन्याके हूती, अस चरित कीन्ह निरंजना ।

नख घात किये भगद्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना ॥

नखरेष शोनिता चला, तिहूँको सब खास आरंभनी ।

आदि उत्पति सुनुहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी ॥

त्रिबार कीन्ही रति तवैं, भये ब्रह्मा विस्तु महेस हो ।

जेठे विधि विस्तु लघु तिहि, तीजे सम्भू सेषहो ॥ १८ ॥

सोरठा-उत्पति आदि प्रकास, यह विधि तेहि प्रसंग भो ॥

कीन्हो भोगविलास इक मति कन्या काल ह्वै ॥ १८ ॥

भवसागरकी रचना ।

तेहि पीछे ऐसा भो लेखा । धर्मदास तुम करो विवेखा ॥

निरञ्जनवचन-अद्या प्रति ।

अगिन पवन जल मही अकासा । कूर्म उदरते भयो परगासा ॥

पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा । गुन तीनो सीसनसो कीन्हा ॥

यहि विधि भये तत्व गुन तीनो । धर्मराय तब रचना कीनो ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

गुन तत सम कर देविहि दीन्हा । आपन अंस उत्पन कीन्हा ॥

बुन्द तीन कन्या भग डारा । ता सँग तीनो अंस सुधारा ॥

पाँच तत्व गुण तीनो दीन्हा । यहि विधि जगकी रचना कीन्हा ॥

प्रथम बुन्दते ब्रह्मा भयऊ । रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ ॥

दूजो बुन्द बिस्तु जो भयऊ । सतगुण पंच तत्व तिन पयऊ ॥

तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्व तेहि साने ॥

पंच तत्व गुण तीन खमीरा । तीनों जनको रच्यो सरीरा ॥

ताते फिरि फिरि परलय होई । आदि भेद जाने नहिं कोई ॥

कहै धर्म कामिनि सुन बानी । जो मैं कहूँ लेहु सो मानी ॥

जीव बीज आहै तुव पास । सोले रचना करहु प्रगासा ॥

कहै निरंजन पुनि सुनु रानी । अब अस करहु आदिभवानी ॥

तीनो सुत सौप तोहि दीना । अब हम पुरुष सेव चित लीन्हा ॥

राज करहु तुम लै तिहुँ बारा । भेद न कहियो काहु हमारा ॥

कर्मका बदला

मोर दरस तिहुँ सुत नहिं पैहँ । जो मुहि खोजत जन्म सिरैहँ ॥
ऐसो मता दिढेहो जानी । पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी ॥
त्रय सुत जबहिं होहि बुधिवाना । सिधु मथन दे पठहु निदाना ॥

कबीरबचन धर्मदास प्रति ।

छन्द-कहेउ बहुत बुझाय देविहि गुप्त भये तब औहिहो ॥
सून्य गुफहि निवास कीन्हों भेद लह को ताहि हो ॥
वह गुप्त भा पुनि संग सबके मनै निरंजन जानिये ॥
मन पुरुष भेद उच्छेद देवे आपु परगट आनिके ॥
सोरठा-जीव भये मति हीन, परसि अगम सो कालको ।
जनम जनम भय खीन, मुरुचा करम अकर्मको ॥ १९ ॥
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगायके ।
आप चलावै चाल, कस्ट देइ पुनि जीवको ॥ २० ॥

सिन्धुमथन और चौदह रत्न उत्पत्तिकी कथा ।

त्रय बालक जब भये सयाने । पठये जननी सिधु मथाने ॥
बालक मातै खेल खिलारी । सिन्धुमथन नहिं गयेउ खरारी ॥
तेहि अंतर इक भयो तमासा । सो चरित बूझो धर्मदासा ॥
धान्यो योग निरंजन राई । पवन अरंभ कीन्ह बहुताई ॥
यागो पवन रहित पुनि जबहीं । निसरे उवेद स्वास संग तबहीं ॥
स्वास संग आयेउ सो वेदा । विरला जन कोई जाने भेदा ॥
अस्तुति कीन्ह वेद पुनि ताहां । आज्ञा का मोहि निरगुन नाहां ॥
कह्यो जाय कर सिधु निवासा । जेहि भेंटे जैहौ तिहि पास ॥
उठी अवाज रूप नहिं देखा । जोति अगम दिखलावत भेखा ॥
चलेउ वेद पुनि तेज अपाने । तेज अन्न पुनि विष संधाने ॥
चले वेद तहँवा को जाई । जहँवा सिधु रचा धर्मराई ॥
पहुँचे वेद तब सिन्धु मँझारा । धर्मराय तब युक्ति विचारा ॥
गुप्त ध्यान देबिहिं समुझावा । सिन्धु मथन कहँ कस विलमावा ॥
पठवहु बेगि सिन्धु त्रय वारा । दिठकै सोचहु बचन हमारा ॥
बहुरि आप पुनि सिन्धु समाना । देवी कीन्ह मथन अनुमाना ॥
तिहुँ बालक को कहा समुझायी । आसिष दे पुनि तहाँ पठायी ॥
पैहो वस्तु सिन्धुके माहीं । जाहु बेगि तीनों सुत ताहीं ॥
चलिभौ ब्रह्मा मान सिखाही । दोइ लहुरा पुनि पाछे जाई ॥

विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना माया सृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त

छन्द-त्रय सुत बाल खेलत चले ज्यों सुभग बाल मरालहो ।
एक गहि छोडत मही पुनि एक कर, गहि चलत लटपट चालहो ॥
छनहिं धावत छन अस्थिर खड़े छनभुजहिं गर लावहीं ।
तेहि समयकी सोभा भली नहिं देवता कहैं गावहीं ॥

सोरठा-गये सिन्धुके पास, भये ठाढ तीनों जने ।
जुगति मथन परकास, एक एकको निरखहीं ॥ २१ ॥

प्रथम बार सिन्धुमंथन ।

तीनों कीन्ह मथन तब जाई । तीन वस्तु तीनों जन पाई ॥
ब्रह्मा वैद तेज तेहि छोटा । लहुरा तासु मिले विष खोटा ॥
भेटी वस्तु त्रय तीनों भाई । चलि भये हर्ष कहत जहैं माई ॥
मातापहैं आये त्रय बारा । निज २ वस्तु प्रगट अनुसारा ॥
माता आज्ञा कीन्ह प्रकासा । राखु वस्तु तुम निज २ पास ॥

द्वितीय बार सिन्धुमंथन ।

पुनि तुम मथहु सिन्धु कहैं जाई । जो जिहि मिले लेहु सो भाई ॥
कीन्ह चरित अस आदि भवानी । कन्या तीन कीन्ह उत्पानी ॥
कन्या तीन उत्पान्यो जबहीं । अंस वारि महैं नायो सबहीं ॥
पठयो सिधुमाहिं पुनि ताहीं । त्रय सुत मरम सो जानत नाहीं ॥
पुनि तिन मथन सिधुको, कीन्हा । भेंटयो कन्या हर्षित ह्वै लीन्हा ॥
कन्या तीनहु लीन्हे साथ । आ जननी कहैं नायउ माथा ॥
सब माताके आगे कीन्हा । माता बाँटि तिन्हन कहैं दीन्हा ॥
माता कहे सुनहु सुत मोरा । यह तो काज भये सब तोरा ॥
एक एक बाँटि तीनहुको दीन्हा । करहु भोग अस आज्ञा कीन्हा ॥
सावित्री ब्रह्मा तुम लेऊ । है लक्ष्मी विष्णु कहैं देऊ ॥
पारवती शंकर कहैं दीन्ही । ऐसी माता आज्ञा कीन्ही ॥
तीनउ जन लीन्ही सिर नार्ई । दीन्ह अद्या जस भाग लगाई ॥
पाई कामिनी भये अनंदा । जस चकोर पाये निश्चिचंदा ॥
काम वसी भए तीनों भाई । देव दैत दोनों उपजाई ॥
धरमदास परखो यह बाता । नारी भयी हती सो माता ॥

तृतीय बार सिन्धुमंथन ।

माता बहुरि कहे समझायी । अब फिर सिंधु मथो तुम जाई ॥

माया सृष्टिका विवरण वंकुण्डकावृत्तान्त

जो जेहि मिलै लेहु सो जाई । अब जनि करो विलंब तुम भाई ॥
त्रय सुत चले तब माथ निवायी । जो कछु कहेउ करब हम जायी ॥
मथ्यो सिंधु कछु विलंब न कीन्हा । निकसे चौदह रतन सो लीन्हा ॥
चौदह रतनकी निकसी खानी । ले माता पहुँ पहुँचे आनी ॥
तीनहु बन्धु हरषित हँ लीन्हा । विस्नुसुधा पायउ हर विष दीन्हा ॥

अद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी आज्ञा देना और
सब मिलकर पांच खानकी उत्पत्ति करना ।

पुनि माता अस वचन उचारा । रचहु सृष्टि तुम तीनों वारा ॥
अंडज उत्पत्ति कीन्हीं माता । पिंडज ब्रह्मा कर उत्पाता ॥
ऊषमजखानि विस्नु व्यवहारा । सिव अस्थावर कीन्ह पसारा ॥
चौरासी लाख योइन कीन्हा । आधा जल आधा थल दीन्हा ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । दोय तत्त्व ऊषमज परमाना ॥
तीन तत्त्व अंडज निरमायी । चार तत्त्व पिंडज उपजायी ॥
पाँच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहि माहिँ सवोंरा ॥

ब्रह्माका वेद पढकर निराकारका पता पाना ।

ब्रह्मा वेद पढन तब लागा । पढत वेद तब भा अनुरागा ॥
कहे वेद पुरुष इक आही । निराकार जेहि रूप न छांही ॥
सून्यमाहिँ वह जोत दिखावे । चितवत देह द्विष्टि नहिं आवे ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला । तेहि मत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥
चतुरानन कहि विस्नु बुझावा । आहि पुरुष मोहि वेद लखावा ॥
पुनि ब्रह्मा सिवसों अस कहई । वेद मथन पुरुष एक अहई ॥
अहै पुरुष इक वेद बतावा । वेद कहे हम भेद न पावा ॥

ब्रह्माका मातासे पिताका पता पूछना ।

कबीरबचन धर्मदास प्रति ।

तब ब्रह्मा माता पहुँ आवा । करिपरनाम तिहि टेके पाँवा ॥

ब्रह्माबचन अद्या प्रति ।

हे माता मोहि वेद लखावे । सिरजनहार और बतलावे ॥
छन्द-ब्रह्मा कहे जननी सुनो कहहु कहा कंत तुम्हार है ॥
कीजै कुपा जनि मोहि दुरावो कहाँ पिता हमार है ॥

बहापुरी कौलास और अमरावती अदन आदिका वृत्तान्त

अद्यावचन ब्रह्मप्रति ।

कहे जननि सुनहु ब्रह्मा कोउ नहि जनक तुम्हार हो ॥

हमहि ते भई सबे उत्पति हमहि सब कीन सम्हार हो ॥ २१ ॥

ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।

सोरठा-ब्रह्मा कहते पुकार, सुनु जननी तैं चित्त दे ॥

कहत वेद निरुवार, पुरुष एक सो गुप्त है ॥ २२ ॥

अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।

कहे अद्या सुन ब्रह्मकुमारा । मोसे नहीं स्रष्टा न्यारा ॥

स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुन्दर हम निरमाई ॥

ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।

माना वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथम गुप्त तुम कस रख लीन्हा ॥

जबै वेद मुहि कहे बुझाई । अलख निरञ्जन पुरुष बनाई ॥

अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम काहे न किया विचारा ॥

जो तुम वेद आप कथि राखा । तो कस तुम अलख निरंजन भाखा ॥

आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम भाई ॥

अब मोसन छल जनि करहू । सौंचे सौंच सब कहि उच्चरहू ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

जब ब्रह्मा यहि विधि हठ ठाना । तब अद्या मन कीन्ह तिवाना ॥

केहि विधि यहि कहूँ समझाई । विधि नहि मानत मोर बडाई ॥

जो यहि कहौं निरंजन बाता । कंहि विधि समझे यह विख्याता ॥

प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दरश काहू नहि पाई ॥

अबै जो यही अलख लखावो । कौनी विधि ताको दिखलाओं ॥

अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।

अस विचारि पुनि ब्रह्मो समझावा । अलख निरंजन नहि दरस दिखावा ॥

ब्रह्मावचन अद्या प्रति ।

ब्रह्मा कहे मोहि ठोर बताओ । आगा पीछा जनि तुम लाओ ॥

मैं नहि मानो तुम्हरी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥

प्रथम तुम मुहि दीन भुलावा । अब तुम कहो न दरस दिखावा ॥

तासु दरस न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥

छंद-दरस दिखाय तत्काल दीजे मोहि न भरोस तुम्हार हो ॥

संशय निवार यहिकाल दीजे कीजे न विलम्ब लगार हो ॥

अदन क्या है निरंजनने सत्य लोककी नकलपर अपने लोक बनाये

अद्यावचन ब्रह्मा प्रति ।

कहे जननी सुनो ब्रह्मा कहों तोसों सत्तही ॥
सात स्वर्ग है माथ ताको चरन पताल सप्तही ॥ २२ ॥

ब्रह्माका पिताके खोजको जाना ।

सोरठा-लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहिं दरसकी ॥

जाय नवाओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइकै ॥ २३ ॥

जननी गुन्यो वचन चितमाहीं । मोरि कही यह मानति नाहीं ॥

या कहैं वेद दीन्ह उपदेशा । पै दरस ते नहिं पावे भेसा ॥

कह अष्टंगि सुनो रे वारा । अलख निरंजन पिता तुम्हारा ॥

तासु दरश नहिं पैहौ पूता । यह मैं वचन कहैं निज गूता ॥

ब्रह्मा सुनि व्याकुल ह्वै धावा । परसन सीस ध्यान हिय लावा ॥

ब्रह्मा चले जननि सिर नाई । सीस परसि आवों तोहि ठाई ॥

तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिगायी । उत्तर दिशा बेगि चलि जायी ॥

आज्ञा माँगि विस्नु चले बाला । पिता दरशको चले पताला ॥

इत उत चितय महस न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥

तेहि सिव मन अस चित अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥

यहि विधि बहुत दिवस चलियऊ । माता सोच पुत्र कह कियऊ ॥

विष्णुका पिताके खोजसे लौटकर पिताके चरण तक न पहुंचनेका

बूतान्त अद्यासे कहना ।

प्रथम विस्नु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥

भेटचो नाहि मोहि पगु ताता । विष ज्वाला स्यामल भौ गाता ॥

व्याकुल भयउ तबै फिरि आवा । पिता पगु दरस मैं नहिं पावा ॥

सुनि हरषित भई आदिकुमारी । लीन्ह विस्नु कहैं निकट दुलारी ॥

चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥

धर्मदासवचन कबीर प्रति ।

कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्माकी रीती ॥

पिता सीस तिन पर छन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पगु दीन्हा ॥

छन्द-गयऊ ब्रह्मा सीस परसन, कथा ता दिनकी कहो ॥

भयो द्विस्टि मेराव कि नहिं, तासु दरसन तिन लहो ॥

यह बरनन सब कहो सतगुर, एक एक विलोयके ॥

निज दास जानि परगास कीजे, धरहु निज जनि गौयके ॥ २३ ॥

तीनों पुत्रोंकी कृतघ्नता आद्याकी पूजाका प्रचार

सोरठा-प्रभु हम हैं तुव दास, जनम किरतारथ मोर करि ॥
करहु वचन परगास, तेहि पीछे जो चरित भौ ॥ २४ ॥

पिताकी खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा ।

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

धरमदास मुहि अति प्रिय अहूहू । कहो सँदेस परखि दूढ गहूहू ॥
चलत ब्रह्मा तब बार न लावा । पिता दरसकहूँ अति मन भावा ॥
तेहि स्थान पहुँचिगै जाई । नहिं तहूँ रबि ससि सून्य रहाई ॥
बहु विधि अस्तुति करे बनायी । ज्योति प्रभाव ध्यान तहूँ लाई ॥
ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहिं पायो ब्रह्मा दरश पितायी ॥
सून्य ध्यान जुग चार गमावा । पिता दरस अजहूँ नहिं पावा ॥

ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता ।

ब्रह्मा तात दरस नहिं पाई । सून्य ध्यानमहूँ जुग बहु जाई ॥
माता चित करत मन माहौं । जेठ पुत्र ब्रह्मा रहू काहौं ॥
किहि विधि रचना रचहुँ बनाई । ब्रह्मा आवे कौन उपाई ॥

गायत्री उत्पत्ति ।

उबटि सरीर मैल गहि काढी । पुत्री रूप कीन्ह रचि ठाढी ॥
शक्ति अंश निज ताहि मिलावा । नाम गायत्री ताहि धरावा ॥
गायत्री मातहिं सिर नाई । चरन चूमि निज सीस चढाई ॥

गायत्रीवचन अद्या प्रति ।

गावत्री विनवै कर जोरी । सुनु जननी 'इक विनती मोरी ॥
कौन काज मो कहूँ निरमाई । कहो वचन लेउँ सीस चढाई ॥

अद्यावचन गायत्री प्रति ।

कहे आद्या पुत्री सुनु बाता । ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥
पिता दरशकहूँ गयो अकासा । आनौ ताहि वचन परगासा ॥
दरश तातकर वह नहिं पावे । खोजत खोजत जन्म गमावे ॥
जौने विधिते इहवौं आई । करो जाय तुम तौन उपाई ॥

गायत्रीका ब्रह्माके खोजमें जाना । कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

चलि गायत्री मारग आई । जननीवचन प्रीति चित लाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी । जननी बचन ध्यान उर धारी ॥