कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सहवास, सहवासके बाद मौत
बोलता है बाप बाप । पपीहा पुकारता है पी कहां । पी कहें ! ! ! ! काक बोलता है क-क क अर्थात् क-ब्रह्म क अर्थात् विष्णु । एक पक्षी बोलता है मौजूद अल्लाह । एक कहती है या हबीब तू अर्थात् एक तुही है दूसरा नहीं । सतलज नदीके किनारे एक पक्षी कहा करता है “हक्क सुरंह ! हक्क सुरंह” अर्थात् हे ईश्वर ! तुम्हारा भेद किसीने नहीं पाया । एक पक्षी सत्य ! सत्य बोलता है । कागके समान चील भी सुरंह २ बोलता है । इन पक्षियोंकी नाना प्रकारकी बोलीसे उनमें भी मजहब पाया जाता है पुण्यात्मा पापी सब मालूम पड़ते हैं । त्रिखान पक्षी बोलती है या पाकजात, मुर्ग बोलता है सतगुरु तू एक । चिड़ियाको मैंने साफ बोलते सुना है वह काश्मीरके पहाड़में बोलती है, “हे साचे सतगुरु” । पंडुक बोलती हैं हक्क है । कबूतर साँस २ में हक्क २ कहता है ॥
पशु इसी प्रकार भजनमें लीन रहते हैं । पशु और मनुष्यमें कुछ भेद नहीं जिसने पारखके साथ भजन किया वही मनुष्य पदको प्राप्त हुआ । नहीं तो मनुष्यका स्वांग बन जानेसे मनुष्य नहीं हो सकता, मनुष्यता सत्य ज्ञान और पारखका ही नाम मनुष्यता है, जिसमें ये नहीं हों वह कदापि मनुष्य नहीं हो सकता ।
पशु और मनुष्योंमें बराबर ही गुण हैं, केवल तत्त्वोंकी तारतम्यतासे मनुष्य उन्नतिशील बनाया गया है, पशु किसी प्रकारसे उन्नति नहीं कर सकता । महात्माओंने विशेषकर कबीरसाहबने कहा है कि, केवल मनुष्य शरीरमेंही सत्पुरुषकी भक्ति द्वारा मुक्ति पारख प्राप्त हो सकती है । जब तक मनुष्य सत्य पदको प्राप्त कर सत्पुरुषकी भक्ति द्वारा पारख गुरुको पायकर अपने स्वरूपको नहीं पाता, तबतक कीड़े मकोड़े पशु पक्षी और मनुष्यमें कुछ भी भेद नहीं हैं एक आकृति मात्र का भेद है ।
स्थायर और जड़मोंकी एकता—सब जड़ स्थायर जंगम अपने २ परमे-श्वरके भजनमें लगे हुये हैं । यद्यपि स्थावरोंमें भजनका प्रमाण बहुत कम मिलता है । परन्तु सर्वथा ही नहीं मिलता यह नहीं कभी २ पता मिल भी जाता है । जैसा कि, कर्मोंके चिह्नका वर्णन लिखते हुये मैंने चुनार गढ़के रामनामी वृक्षका हाल लिखा है ।
प्रगट हो कि, सर्व स्थायर जंगम जीवधारी अपने ईश्वरका भजन करते हैं सबकी ओर परमात्माकी दृष्टि है । यदि कोई किसी पर अत्याचार करेगा, जिस पर अत्याचार हो वह चाहे वृक्ष हो चाहे मनुष्य, चाहे पशु हो, चाहे पक्षी, चाहे कीड़ा, मकोड़ा हो यहाँ तक कि, यदि जड़ पदार्थोंको भी व्यर्थ नष्ट करेगा
चींटियोंके पर, बच्चे बच्चोंका भोजन
आवश्यकतासे अधिक उनको बरबाद करेगा तो उस पर परमात्माका कोप होगा उसका बदला देना पड़ेगा ।
जब सब जीवधारियोंकी आत्मा समान हो है इस कारण सब एकही सिद्ध हुये । केवल तत्त्व और गुणोंकी तारतम्यता एवं उलट फेरसे विभिन्नता दिखाई पड़ती है । अपने २ कर्मोंने भिन्न २ रूप रङ्ग कर दिये हैं इससे किसीका क्या अपराध है ? यह सब कर्मोंका दोष है ।
जो भजन करेगा वह बच जायगा नहीं तो काल बली न जाने क्या कौतुक दिखायेगा इस कारण सबको भजन करना चाहिये यही बात इस मुसद्दममें भी कहते हैं ।
अरे तोता भजन बिन खाया गोता । फँसे कपेमें नाहक प्राण खोता ॥
अरे मैना पकड़ जो बाज डैना । न आवे काम तेरी मीठी बैना ॥
अरे तूती पड़ेगी शिरपै जूती । तू सारी रात गाफिल होके सूती ॥
फिरे यम दूत तेरे शर पै लुरका । भजनकरले सजनकबीर गुरुका ॥१॥
अरे बकरा तू क्या अकरा फिरे रे । कभी तलवार गरदन पर फिरेरे ॥
अरे मुर्गा तू क्या बाँगको उठावे । तेरे गल पर छुरी काजी चलावे ॥
अरे मच्छी रसातल घर बनाये । वहाँ भी जालमें धीवर फँसाये ॥
जहां जाल तहांले संगका टरका । भजन करले सजन कबीर गुरुका ॥२॥
अरे चण्डूल कीन्हा घर खजूरी । वहां भी सांप जाके पड़ तूरी ॥
अरे बन मोर क्या भूला तू सोभा । गड़े एक दिन तेरे दिलका खोबा ॥
अरे बुलबुल तू क्या भूला संगयारी । रहेगा चार दिन मौसम बहारी ॥
न जाना भेद तु उस धाम धुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥३॥
फँसेगा फन्दमें फन्दक फसावे । तुझे पिंजरेमें कैदी सो बनावे ॥
न तू रहेगा न यह पिंजरा रहेगा । कहो तू लालसे जा क्या कहेगा ॥
हुये सुमिरन बिना तेलीके बैला । फिरा दिन रात घरही बीच सैला ॥
महाराजा लखो नर नाग सुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥४॥
अरे मूसा तू क्या बिलमें है घूसा । न पावे ठौर जो हैं राम रूसा ॥
पकड़ एक दिन तुझे नोचेगी बिल्ली । करेगी सो तेरी रग सारी दिल्ली ॥
अरे गदहा हुआ बदहा जगतमें । दीन्हा चितको हरिके भगतिमें ॥
परम पुरुष बसैया सन्त उरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥५॥
तू हाथी मांस लादे बेस पाथी । पड़े कुवेंमें भागे सड़ साथी ॥
अरे घोडा पड़ेगा लाख कोडा । जिधर चाहे उधर घर बाग मोडा ॥
चींटियोंका भोजन, भोजनपर युद्ध चींटियोंके घर जंगी लड़ाई
अरे ऊँटा लदे और नाक नाथा । न छोड़ेगा अब धुनो अपना माथा ॥
शरणले हैं जो साहब तीन पुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥६॥
न विद्या वेद वाणी काम आवे । जवां शिरीं जियादातर फँसावे ॥
हुए बदमस्त विद्या रूप धनके । फिरे हंकारमें मगरूर मनके ॥
नहीं दिलपर जो धीरज रहेगा । तो हजरत वारगहमें क्या कहेगा ॥
हुई पहचान हरसे कालमुरका । भजन करले सजनकबीर गुरुका ॥७॥
तुही गुरु जगतका बन्धन कटैया । तुही सब द्वन्द फन्दाको हरैया ॥
नहीं तुझसा कोई दाया करैया । तु है वैरीको पीरी पै डरैया ॥
जो आजिज अपने पियाको भावकीजै । सो सारे अङ्गमें सो घाव कीजै ॥
उपरसे पीस करदे लोन बुरका । भजन करले सजनकबीरगुरुका ॥८॥
सप्राण स्थावरादि ।
जड़मोंकी तरह स्थावर और जड़ोंमें भी जीव है वे भी जीव विनाके नहीं है, यदि विचारके साथ देखा जाय तो संसारके सभी पदार्थोंमें जीव सत्ता मौजूद है । यदि यह कह दिया जाय की, सारी सृष्टिही जैव है तो कोई अत्युक्ति न होगी । पौर्वत्य, पाश्चात्य, प्राचीन और अधुनिक सभी वैज्ञानिकोंने इस बातको मुक्तकण्ठसे स्वीकार किया है एकही जीव संसारसे स्वावर जड़म जड़ और चैतन्य सब कुछ बन जाता है । यद्यपि यह बात विशेषज्ञोंसे छिपी हुई नहीं है परन्तु आज भी उन व्यक्तियोंकी संख्या अधिक है जिन्हें कि, इन बातोंमें घोर सन्देह है, इसी कारण हम यहाँ यह सिद्ध करना चाहते हैं कि, कोई भी निर्जीव नहीं है । जड़ चेतन ये सभी जीवोंके ही भेद हैं कर्म विपाकोंके अनुसार जीवही सब कुछ बनता चलता है । अब हम कुछ उनको दिखाते हैं जिनमें जीवसत्ता प्रत्यक्ष दीखती हैं ।
तारा और पालपी ।
पालपी मछलीमें प्रत्यक्षरूपसे किसी प्रकारकी जीवित शक्ति जान नहीं पड़ती, न उसके शिर तथा ओखे हैं, न श्वास लेतीही जान पड़ती है, न उसमें रक्त संचालन जान पड़ता है । केवल एक स्वच्छ डला जान पड़ता है, जिसमें थोड़ा प्राण धीरे धीरे चलता जाना जाता है, इसकी अनोखी कहानी है । यदि उसमेंसे एक टुकड़ा तोड़ा अथवा टूट जाय वह उसी जगह पानीमें पड़ा रहे तो वह भी उसी पालपीके स्वरूपका हो जाता है । इस मछलीके शरीरमें अनेक चिन्ह
चुराने और चुरानेवालोंका रंग हृष्यकी चींटियाँ
होते हैं । यदि कोई उसको काटे अथवा टुकड़ा २ करे तो जितने दाग उसकी देहमें होते हैं सब पालपीके स्वरूपकेही हो जाते हैं । इस जानवरमें यह विचित्र गुण है । उसको पेड़ पल्लवसे पृथक करना कठिन है, पालपीके अण्डेसे वृक्षकी शाखायें निकलती हैं जैसे बीजसे वृक्ष उगता है उसकी जड़ भी प्रतीत होती है ।
विद्वानोंका मत—इसमें नलके समान शाखायें होती हैं जिसके द्वारा उसको भोजन पहुँचता है, लोग इसे बहुत कालसे जीवधारी वृक्ष समझते थे । पर सन् १६९९ ई० और १७१७ ई० तक बहुत बड़े विज्ञानिकोंने निश्चय कर लिया कि, इसमें जीवनशक्ति है । प्लेटेनी और अर्संता तालीस नामक विद्वानोंने भी इसे जीवधारी ही कहा है । वह जो जीवधारी वृक्ष कर कहलाता था अब पालपी मछलीके नामसे प्रसिद्ध है । तारा नामक मछली भी इसी प्रकारकी होती है ।
एनीमोन ।
एक प्रकारका जीवधारी है, प्रायः समुद्रके किनारे पहाड़ोंके चट्टानोंके नीचे जहाँ कि, ज्वार भाटा आया करता है वहाँ पाया जाता है । यह पश्चिमी समुद्रोंके किनारे सुनहरी फूलोंके खिले हुये गुच्छोंके समान दीख पड़ता है, वहाँ वाले उसको जीवधारी फूल बोलते हैं । वह भी खिला हुआ दीख पड़ता है मानो मूरब्बाका डला जमा हुआ हो । उनमेंसे गायके दुमके समान चढाव उत्तराव बने हुये होते हैं जो उनके मुखके समान मालूम होता है प्रत्यक्षमें तो वह जड़के समान शक्तिहीन जान पड़ता है पर ऐसा खाऊ होता है कि, नदीके लहरके हटतेही मुंहको पसारकर सन्मुख आये हुये सभी कीड़े मकोड़ोंको खाकर, ज्योंका त्यों स्थिर हो जाता है । दूरबीन यन्त्रसे देखा गया है कि, उनके मुंहके निकट किसी प्रकारकी खटखटाहट होवे तो, उनके मुखसे एक प्रकारका शब्द होने लगता है मुंहके तार हिलते देख पड़ते हैं यद्यपि इस जीवधारीमें देखनेकी कोई इन्द्री नहीं जान पड़ती तो भी प्रकाशकी अधिक्यतासे बहुत घबराता है । इसमें अपनी जातिकी उन्नति करनेकी एक आश्चर्यमय शक्ति जान पड़ती है । यदि उसके शरीरको ऊपर नीचे आड़े ठाड़े किसी प्रकारसे काटा जावे तो उसके सब अंश वैसेही जानवर हो जावेंगे । उसके मुखसे जीवित बच्चे भी उत्पन्न होते हैं मुखसे निकल पासके चट्टानपर जाकर जम जाते हैं उनसे फूलकी कलियोंके समान अनगिन्ती बच्चे उत्पन्न होते हैं इसी प्रकार इस प्राणीकी उन्नति होती रहती है । इसका रङ्ग फीका, लाल तथा हरा होता है, इसका मुख किनारे पर
चींटियोंका बादशाह और मुलेमान दीमक राजा भोज और चेंटी (काशीके बकरियाकुण्डका इतिहास) पक्षी गिद्ध
जान पड़ता है। जब पूर्ण बुद्धिको प्राप्त हो जाती है तो गुलाबके फूलके समान खिला देख पड़ने लगता है।
प्राणधारी फूल।
इसी प्रकारके होते हैं इन्हींका यह भी एक प्रकार है उनमें सींग निकला होता है। इस प्रकारके फूल प्रायः पश्चिमी समुद्रोंके तटपर होते हैं।
एनथो जुआ—एक फूलका वृक्ष है, उसे भी प्राणधारी फूल कहते हैं। वह एनथो जुआ फूल भी है, जीवित स्वभाव भी रखता है। उसमें स्पर्श शक्ति जान पड़ती है। चलनशक्ति भी थोड़ी होती है, भोजन भी करता है। जो चूसता अथवा निगल जाता है उसको पचा भी लेता है। इस प्रकारसे यह फूल प्राणधारियोंकासा स्वभाव रखता है।
एनटेनिया—एक फूल होता है, प्रायः समुद्रोंके किनारे पत्थरोंके चट्टान पर पड़ा रहता है, उसकी उत्पत्ति भी चट्टानोंपर ही होती है। उसका रूप गाव-दुमाकार नलके समान होता है, जड़ गोल होती है, नलके नीचे जो पौला दीख पड़ता है वही उसका पेट है। यह प्राणधारी फूल उत्पन्न होकर अलग होता है, यह चिकना लचकदार शुद्ध साफ और प्रकाशित रहता है।
जो फिस्टस—एक जान दार फूल है यह जलमें होता है इसे प्राणधारी और फूल दोनों माना गया है, ये अनेक प्रकारके होते हैं, यह अंधेरी रातमें अपने मुखसे गंधका पदार्थ और प्रकाश प्रकट करता है जिसका प्रकाश चारों ओर फैल जाता है, उससे मल्लाहोंकी डोंगे रत्न जटित दीख पड़ती हैं। यह प्रकाश इन्हीं जानवरोंका है इनमें कितने ही छोटे तथा कितनेक बहुत बड़े होते हैं। ये पानीपर तैरते फिरते हैं कोई २ तो ऐसा जान पड़ता है कि, मानों अग्निका गोला जीवितहोकर पानीपर तैर रहा हो ये झुंडके झुंड एकही साथ तैरते फिरते हैं।
बेलिमेन्स।
एक प्रकारकी धातु अथवा पत्थरके टुकड़े होते हैं। ये प्रायः समुद्रके किनारे पेड़ रहते हैं, उनके देखनेसे बड़ा आश्चर्य होता है उनकी उत्पत्ति के विषयमें कुछ भी अनुमान नहीं हो सकता। विज्ञानिकोंकी बुद्धि भी चकमेमें पड़ी हुई है कि, उसको पत्थर धातु अथवा जानवर क्या कहा जावे। इसके विषयमें अनेक मतवाद हो रहा है, कोई पत्थर कहता है, कोई पथरीली चुम्बक बोलता है, कोई बिल्लोर सुनाता है, कोई धातु ठहराता है, कोई हड्डी बतलाता है। प्रत्यक्षमें तो एक हड्डीका टुकड़ा देख पड़ता है पर प्राणधारिये इसमें बहुत गुण जान पड़ते हैं यह जीवधारी पत्थर पानीपर तैरता है, इधरसे उधर जाकर अपना
मिश्ठी कयरु, गिद्धोंका बादशाह
आखेट खोजता है, डूबता है निकलता है अनेक प्रकारसे अपना काय्य सिद्ध करता है । सब रूप रङ्ग उसमें देख पड़ते हैं जीवित शक्ति भी जान पड़ती है ।
ऐनकेरेनेटे ।
एक धातुका टुकड़ा है देखनेमें नीलक नलकासा होता है । शाखायें फूटती हैं, उँगलियोंके समान गिरह होती है । सब शाखायें जीवित होती हैं, तारा मछली तथा मूंगा आदिकी तरह यह भी प्राण रखता है ।
मुंगिया या कोरल ।
मुंगिया पत्थर जिसे कि, अंगरेजीमें कोरल भी कहते हैं, समुद्रके तट पर टुकड़ा मिलता है समुद्रमें जीवित होता है, पानीसे मिला हुआ कठिन चट्टानोंकी तरह होता है । हिन्द महासागरको छोड़कर दूसरे गहरे समुद्रोंमें पाया जाता है । कोसोंतक लम्बी २ चट्टानके ऊपर कहीं पानी पर तैरता हुआ और कहीं पानीके अन्दर एवं कितने जीवित और कितने एक मुँदे पाये जाते हैं, पानीके अन्दरके मूंगे जीवित होते हैं, उनका रंग सफेद होता है पर जब वह बाहर निकाले जाते हैं तो लाल हो जाते हैं । टगरू जावाके मूंगे बड़ेही गुणवान् होते ।
स्पंज ।
दरियाई पदार्थ है । बहुत दिनोंसे इस बातपर वाद बिवाद हो रहा है कि, यह स्थावर जंगमोंसे कौन है ? सन् १८४८ ई० में यह सिद्ध किया गया था कि, यह स्थावर है पर कितनोंने यह निश्चय किया है कि, यह प्राणधारी है । बहुत छिद्रोंवाला लचकदार होता है । बहुतसा पानी सोखकर फिर छोड़ देता है । इसलिये वह बहुत कार्योंमें काम आता है ।
स्पंजकी पहचान—यह है कि, जितनाही हलका हो उतनाही अच्छा होता है । जिन टापुओंमें जिवकिया लोग इसको निकालते हैं वहाँ उसका रूप कुछ और ही होता है । उसके पंजे दूढ़ होते हैं वे क्रमशः बढ़ते हैं । जो यहाँ काममें लाया जाता है ये सब उसकी हड्डियाँ होती हैं ।
लाजवन्ती ।
लाजवन्ती एक पौधा है, यह भारतवर्षमें अधिकता के साथ पाया जाता है, इसमें भी प्राणधारियोंकेसे गुण पाये जाते हैं । पर स्पर्शसे यह जीवधारियोंके समान लजा जाती है इसी कारण यह लाजवन्ती कहलाता है ।
सूर्यमुखी ।
जिसको सभी भारतवासी जानते हैं । यह सूर्यके साथही साथ घूमा करता है जिधर सूर्य जाता है उधरही उसका भी मुख हो जाता है । इसी तरह
जटायु तथा सम्पाति, उकाब लगलग, व्यर्थका द्वेष
कमल और कुमोदिनी भी क्रमशः सूर्य चन्द्रमाके ऐसे प्रेमी हैं कि, उनके प्रकाशसे विकसित होते और किरण रूपी किरन मिलनेसे सिकुच जाते हैं। जैसे कोई प्रेमी अपने प्रियको देखकर आनन्द मानता है न देखने से खिन्न होता है उसी प्रकार इन दोनोंकी भी दशा है।
वृक्षके बतक ।
विटन साहिबने नेचरल डिविशनरीमें लिखा है कि, एक प्रकारके बतख होते हैं, जिन्हें अंग्रेजीमें ब्रिड्जलकूस कहा जाता है ये घास आदि चरा करते हैं ये बतकें मेरे मूलकमें सरदीके दिनोंमें आती हैं और गरमीके दिनोंमें उत्तर दिशाकी चली जाती हैं ये एक वृक्षके फल हैं। मलका एलिजेबेथेके शासन कालमें ज़रार्ड साहिब थे वे कहते हैं कि, लंकासायरमें फिल आफफोल्डर्स नामका एक छोटा सा टापू है उस जगह पुराने जहाजोंके टुकड़े एवं वृक्षके गले चूर पाये जाते हैं। वहाँ समुद्रका फेन कड़ा होकर सीपीके समान जम जाता है। रेशमी फीते जैसी कोई वस्तु एक ओरसे सीपीसे लगकर बाकी पानीमें बहती रहती है उसी फीतेसे एक पक्षी उत्पन्न होता है सीपी अपना मुह खोल देती है पहिले रेशमी तार बाहिर निकलता है पीछे पक्षी निकल आता है। पहिले पक्षीके पैर बाहिर निकलते हैं ज्यों २ पक्षी बढ़ता जाता है सीपीका मुंह चौड़ा होता जाता है क्रमशः सारे शरीरके बाहिर आजाने पर भी उसकी चोंच सीपीके भीतर रह जाती है। युवा होनेपर चोंच भी छूट जाती है यह पानीमें गिर पड़ता है पर भी निकल आते हैं इसको लंका सायरके लोग हंकल वृक्षका राजहंस कहते हैं। यह उस दरियामें बहुतायतसे होता है ऐसा सस्ता बिकता है कि, तीन २ पैसे मोल बिका करता है।
कोहड़ा ।
कोहड़ाकी छोटी २ बतियाको जो कोई उंगली दिखाता है तो वह सूख जाता है। रामायण बालकाण्डमें धनुषयज्ञके समय लक्ष्मण जीने परशुरामजीसे दृष्टान्तमें कहा था किः—“यहाँ कोहड़ बतिया कोउ नाहीं। जो तर्जनी देखत गलि जाहीं।”
पहाड़ोंकी लड़ाई ।
डाक्टर गोल्ड स्मिथ साहबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखा है कि, दो पहाड़ दूर २ अपने स्थानपर खड़े थे, ईर्षाके कारण दोनों कुपित हुए। भयंकर गर्जके साथ अपने २ स्थान छोड़कर दौड़े, महान् वेगके साथ लड़ाई करने लगे, अन्तमें जय विजय कर अपने २ स्थानको गये। जितने जीवधारी उस पहाड़ पर रहते थे सभी नष्ट हो गये।
घरेले और बनेलेकी ईर्षा
उपरोक्त वर्णन गोल्ड स्मिथ साहबकी किताब, एनीमेटेड नेचरके जिल्द (वोलूम) ६० में मैंने देखा है, जिसका जी चाहे देखले ।
सुमेरु और विन्ध्याचलकी लड़ाई ।
देवीभागवतके दशवें स्कन्धके तृतीय अध्यायसे सुमेरु विन्ध्याचल पर्वतकी कथा लिखी है । उसको देवीभागवतसे उद्धृत करके यहाँ लिखता हूँ । देवीभागवत स्कन्ध १०, अध्याय ३ में लिखा है ऋषि बोले कि, हे सूतजी ! यह विन्ध्याचल क्या है ? किस प्रकार आकाश स्पर्श करने लगा था क्यों सूर्य्यका मार्ग रोका था । किस प्रकार अगस्त्यजीने इसे जैसेका तैसा किया, यह विस्तारके साथ कहो । सूतजी बोले कि, सब पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचल पर्वत है यह अत्यन्त शोभायमान है ।
एक समय नारदजी सुमेरु पर्वतसे विचरते हुये विन्ध्याचलके निकट आये । विन्ध्याचलने बड़े सत्कारके साथ उठकर अर्घ्य दे आसन पर बैठाकर पूछा कि, हे ऋषिराज ! इस समय आप कहाँसे आये हो । आपके आनेसे मेरा मन्दिर पवित्र हो गया, आपकी जो मनोवृत्ति हो सो कहिये । इतना सुनकर नारदजीने कहा कि, मैं सुमेरुसे आता हूँ इस सर्वभोगोंके देनेवाले इन्द्र, अग्नि, वरुण यम आदि लोकपालोंके भवन हूँ । इतना कहकर नारदजीने निःश्वास लिया । इसको देख विन्ध्यने पूछा कि, महाराज ! आपके निःश्वास लेनेका क्या कारण है ? नारदजीने उत्तरमें सुमेरुकी सब शिखरोंके सहित अन्य पर्वतोंका वर्णन करते हुये अन्तमें कहा कि, जिसकी विश्वात्मा सहस्र किरण ग्रह नक्षत्रोंके साथ परिक्रमा करते हैं, यह वह सुमेरु पर्वत है । अपनेको पृथ्वीके सर्व पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिनता है । उसके मनमें अभिमान है कि, मैं सर्वमें अग्रणी हूँ, मेरे समान कोई भी नहीं है । हे विन्ध्याचल ! अभिमानियोंके ऐसे अभिमानको देखकर निःश्वास हूँ । महान् तपोबलवालों का भी ऐसा कृत्य नहीं होता जैसा कि, इसका है इतना कहकर नारदजी ब्रह्मलोक चले गये ।
नारदजीके मुखसे सुमेरुकी प्रशंसा सुनकर विन्ध्याचलके मनमें ईर्षाकी अग्नि भड़क उठी । उसको दिनरात इस बातकी चिन्ता रहने लगी कि, क्या करूँ किस प्रकार मेरुको जयकरूँ, जबतक मेरुको जय न करूँ, तबतक मेरी कृति बल, पौरुष, कुल सबको धिक्कार है । इसी चिन्तामें रहकर अन्तमें यह विचार निश्चय किया कि, सूर्य्य नित्य मेरुकी प्रदक्षिणा करते हुये उदय होते हैं, ग्रह नक्षत्र सहित सूर्य्यकी परिक्रमा करनेसेही मेरुको अभिमान होता है । मैं अपने शृंगोंसे सूर्य्यका मार्ग रोक दूंगा, सूर्य्य रुककर मेरुकी परिक्रमा बन्द कर देंगे
लगलगोंका न्याय लगलगके राजाका न्याय
जिससे मेरुका गर्व टूट जावेगा। यह विचार कर अपने शृंगोंको यहाँतक बढ़ाया कि, सबेरा होते होते सूर्यके मार्गतक पहुँच गया।
सूर्य निकले तो मार्गको रुका हुआ देखा। रथ ठहर गया, जगतके सब व्यवहार, यज्ञ, हव्य, कव्य आदि बन्द हो गये। नर, दानव, देवता सबके सब अत्यन्त व्याकुल हो सोचने लगे कि, क्या हुआ? क्या करना चाहिये। अन्तमें सब देवता लोग ब्रह्माजीको आगेकर शिवजीके शरणमें जा अत्यन्त नम्रतापूर्वक स्तुतिकर; महेश्वरके प्रसन्न होनेपर बोले कि, विन्ध्याचल मेरुसे द्रैषकर ऊँचा हो गया है, जिससे सूर्यका मार्ग रुक गया है, सब देवता दानव मनुष्य आदि प्राणी महान दुःखी हो रहे हैं। सब प्रकारके यज्ञ आदि बन्द हैं, कालज्ञानके रुक-जानेसे सृष्टि कैसे चल सकेगी, महादेवजी देवताओंकी बात सुनकर भयभीत हो कौपते हुये, इन्द्रको आगेकर शीघ्रतासे विष्णु भगवान्के पास वैकुण्ठ पहुँचे।
वैकुण्ठमें शिव ब्रह्मा सहित सब देवते विष्णु भगवान्की स्तुति करने लगे। नाना प्रकारकी स्तुति करनेपर भगवान् प्रसन्न होकर बोले हे देवताओ! आपकी अभिलाषा पूरी होगी।
देवता बोले कि, हे देव देव! हे विष्णु महाराज! विन्ध्यपर्वत सूर्यका मार्ग रोकता है। सूर्यके प्रकाश बिना जगत्का सब कार्यबन्द है, हम लोगोंको भाग नहीं मिलता क्या करें कहो जायें? विष्णुने कहा कि, हे देवताओ! मुनि-क्षेष्ठ अगस्त्यजी वाराणसी में हैं, आप लोग उन्हींके निकट जावें, वे ही विन्ध्याचल की उद्भूतताको शांत करेंगे। उन्हींसे नम्रतापूर्वक विनयकर आप अभयदान माँगो। विष्णुके इस प्रकार कहने पर सब देवता काशीजीमें अगस्त्यमुनिके आश्रम आये। सबके सब दण्डवत् प्रणाम करके स्तुति करने लगे महान् कातर हो विनय करने लगे कि, हे स्वामी! आप प्रसन्न होजिये, हम आपकी शरण हुये हैं क्योंकि कान्तिमान दुस्तर विन्ध्यसे हम बहुत दुःखित हुये हैं। देवताओंकी नाना प्रकारकी स्तुति विनयको सुनकर, अगस्त्यजी हँसते हुये बोले कि, हे देवताओ! आप लोग सब लोकपाल महात्मा, त्रिभुवनमें सबसे क्षेष्ठ एवं निग्रह अनुग्रह करनेमें सर्व प्रकार से समर्थ हो, आप लोगोंको कोई भी कार्य कठिन नहीं है तो भी आप को जिस कार्यकी इच्छा हो वह कह डालिये।
मुनिकी ऐसी वाणी सुनकर देवता कहने लगे कि, हे मुनिराज! विन्ध्याचलने सूर्यका मार्ग रोक लिया है, जिससे त्रिलोकी नष्ट होनेको आई है। हे मुनि! अपने तपके बलसे उसकी इस उद्भूतताको शांतकर त्रिलोकीको अभयदान दीजिये, यही हमारा कार्य है।
अनुमान, राजहंस राजहंसिनीकी सावधानी
अगस्त्यब्रह्मिणे देवताओंकी प्रार्थनाको स्वीकार किया । देवता बड़े प्रसन्न हुये । अपने २ स्थानको गये । पीछे मुनि अपनी स्त्रीसे कहने लगे कि, प्रिये ! यह महान् अनर्थकारक विघ्न उपस्थित हुआ है, पुरातन मुनियोंने कहा है कि, मुमुक्षुओंको काशीवासमें विघ्न भी बहुत होते हैं । काशीमें निवास करते वही विघ्न मुझे भी उपस्थित हुआ है । इस प्रकार अपनी पत्नीसे कह गंगामें स्नान कर, सब देवताओंका दर्शन कर, स्त्रीसहित काशीसे बिदा हुये । काशीके विरहसे सन्तप्त हो बारंबार काशीका स्मरण करते, तपके बलसे अल्प कालमेंही भृंगोंको उठाये हुये विध्या पर्वतके पास पहुँच गये । अपने पास खड़े हुये मुनिको देख पर्वत कंपायमान होगया सूक्ष्म हो दण्डवत करने नीचे झुकर पृथ्वीका स्पर्श करने लगा । अगस्त्यजी भक्तिभावसे पृथ्वीमें दण्डवत करते हुए विन्ध्य पर्वतको देखकर, अति प्रसन्न हो कहने लगे कि, हे वत्स ! मैं तुम्हारे उच्च शिखरों को नहीं उलंघ सकता, इस कारण जबतक मैं न आऊँ तबतक तुम योंही स्थित रहो । पीछे उसके शिखरोंको लांघते हुवे दक्षिण दिशाको चले गये । विन्ध्याचल उसी प्रकार पड़ाही रह गया ।
गंगाजीकी कथा ।
इसी प्रकार देवीभागवतके ९ स्कन्धमें नदियोंकी बहुतसी कथा हैं । प्रथम गंगाजी गोलोकमें कृष्ण भगवान् के पास थी, एक समय राधाजी भगवान् कृष्णको गंगाजीसे बात करते देखकर क्रोधित हुई उसीके भयसे गंगाजी कृष्णजीके चरणोंमें लुप्त हो गई ।
गंगाजीके लुप्त होते ही जल सूख गया, सर्व प्राणी जलके अभावसे दुःखी होने लगे, देवताओंसहित त्रिदेवतोंने कृष्णजीके निकट जाय बहुत विनय करके कृष्णजीके चरणोंसे गंगाको प्रगट कराया, पीछे विष्णु भगवानसे विवाह हुआ । किसी कालमें ब्रह्मलोकमें किसी राजापर मोहित होनेके कारण ब्रह्माजीके शापसे पृथ्वीपर स्त्रीरूपसे जन्मले शन्तनु महाराजकी भार्या बनी ।
शन्तनु महाराजसे विवाह होनेके समय गंगाजीने वचन लिया था कि, मेरे गर्भसे जो संतान उत्पन्न होगी उसे मैं लेलूँगी । राजा भी बाचाबन्ध हो गये । पीछे सात पुत्रोंको जन्म लेतेही गंगाने गंगामें डाल दिया पर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ तो महाराजने पुत्रके लोभसे मोहमें आकर कहा कि, यह पुत्र मैं तुम्हें न दूँगा । गंगाजी पूर्व वचनके अनुसार गंगामें प्रवेश कर गई । वेही गंगाजीके आठवें पुत्र महान् प्रतापी भौमविजयी भीष्मपितामहके नामसे प्रसिद्ध हुये, जिनकी कथासे महाभारतादि इतिहास पुराण भरे पड़े हैं ।
इस प्रकारसे गंगाजी नदीरूपसे देवी करके जगत् प्रसिद्ध हैं। गंगाजीके दर्शनोंकी कथा भी प्रायः प्रख्यात है।
इसी प्रकारसे देवी भागवतके उसी अध्यायमें गंडकी, सरस्वती, लक्ष्मी यमुना आदि नदियोंकी भी कथाएँ विस्तारपूर्वक लिखी हैं। जिसको देखना हो देखले।
तात्पर्य—ऐसे २ सहस्रों उदाहरण हैं जो कि, जड़ चैतन्यके आत्माकी एकता सिद्ध करते हैं। चैतन्य जड़स्वरूपमें जाता है और जड़ चैतन्य हो जाता है।
इसलामी पुस्तकें और हदीसें।
मुसलमानी पुस्तकोंमेंभी इस प्रकारका बहुत वर्णन आता है। जिनसे यह बात सुतरां सिद्ध हो जाती है।
जमीनोंकी आपसकी बातें—सफर सआदत नामक किताबमें लिखा है कि, रसूल खुदाने फरमाया कि, जमीने आपसमें बात करती हैं कि, आज मुझपर कोई मुसल्ला बिछा किसीने निमाज पढ़ा कि, नहीं।
प्यालेका आशीर्वाद—हदीस तरमजी और अविनमाजःमें लिखा है कि, मुहम्मद साहब कहते हैं कि, कोई प्यालेमें खावें उसको चाट कर साफ करे तो प्याला उसके हकमें इस्तगफार करता है। मसकात शरीफमें लिखा है कि, प्याला उसके लिये कहता है कि, अल्लाह तुझे दोजखकी आँचसे मुक्त करे जैसे कि, तूने मुझको आजाद किया है।
इन्द्रियोंकी गवाँइयाँ—लिखा है कि, कयामतके दिन सब आदमियोंको उनके फेल नामे दिये जावेंगे। पढ़े अन पढ़े सब अपने २ आमाल नामे पढ़ लेवेंगे जब गुनहगार अपना अमाल नामा पढ़ेगा तो पुकारेगा कि, यह झूठ लिखा है, मैंने इनमेंसे एक भी गुनाह नहीं किया है। खुदा उनको समझावे कि, तुमने अवश्य किया है। रोज मुनिकिर नकीर तुम्हारे गुनाहोंके लिखते थे। इस पर भी जब न मानेगा उनके शरीरके सब अंग गवाही देंगे, सब इन्द्रियाँ बोलेंगी अपने कर्मोंको प्रगट करेंगी। गुणहगार लाचारीसे मान लेवेगा, उनके गुनाहोंके अनुसार उनके माथेपर चिन्ह किया जावेगा।
सजीवमूर्तियाँ।
लात १ मनात २ गुरों नामक तीन देवियाँ बड़ी प्रतिष्ठित थीं, जिन्होंको रैश जातिवाले—अरबदेशमें (पूजते थे। मुहम्मद साहबने उनके मन्दिर और मूर्तियोंको तोड़ा तो मन्दिरमेंसे कालीर मूर्तियाँ स्त्रियोंका रूप धारण कर जीवित
मयूर, पेरू, गिनीफाउल बतख
होकर रोती हुई बाहर निकलीं जिनको २ मुहम्मद साहबने कत्ल कर डाला, मौलवी अमाउद्दीन कृत किताब तालीम मुहम्मदी देखो ।
जमीनकी जिबराईलसे बातें—अजाय बुलकिस में लिखा है कि, जब खुदाने जिबराईलको हुकुम दिया कि, जमीन परसे मिट्टी ले आओ, जिससे आदमका पुतला बनाया जावे । खुदाकी आज्ञानुसार जब जिबराईल पृथ्वीपर आकर मिट्टी लेने लगे उस समय पृथ्वी रोई कहा कि, मुझसे मिट्टी मत लो ।
बड़ी मूर्तिकी बातें—तारीख मुहम्मदी और दूसरे हदीसोंमें लिखा है कि, मुहम्मद साहबका जन्म हुआ तो पृथ्वीकी सभी मूर्तियाँ गिर पड़ीं । कुरैश जातिकी सबसे बड़ी मूर्ति तीन बार मुँहके बल गिरी लोगोंने प्रत्येक बार खड़ा किया वह बोली कि, मुहम्मदसे मैं खड़ी नहीं रह सकती ।
जिस समय मुहम्मदसाहबका जन्म हुआ उस समय कंसरा बादशाहका महल कौषा उसके चौदह कँगूरे गिर गये ।
वृक्षोंकी सलाम—मुसलमानी किताबोंमें लिखा है कि, वृक्ष दीवार स्थावर आदि सब मुहम्मद साहब को सलाम करते थे पर उसको मुहम्मद साहबके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं जानता था ।
पशुबल—नशकातमें कब्रकी कठिनताके बारेमें लिखा कि, जब कब्र गुनहगारोंको दबाती है तो पशु उनकी चिल्लाहटको सुनते हैं । खुदाने पशुओंमें मनुष्यसे भी बढ़कर ताकत दी है वेही सुन सकते हैं दूसरे नहीं सुन सकते ।
गदहावों फिरस्ते—तौरैतमें लिखा है कि, जब बलःआम गदहेपर सवार हो बनी इसराईलको शाप देने चला तो पहले गदहेनेही तलवार लिये फिरिस्तोंको देखा पीछे वे बल आमकी दृष्टिमें आये ।
पत्थर और दाऊदकी बातें—तारीख मुहम्मदी और हदीसोंमें लिखा है कि, साहिल नाम बादशाहने शर्त की थी कि, जो कोई जालूतको मारेगा उसको अपनी बेटी और आधा राज्य दूंगा ।
बनी इसराईलको खुदाने आज्ञा दी कि, दाऊदके हाथसे जालूत मारा जावेगा । दाऊद जालूतको मारने जा रहा था, रास्तेमें तीन पत्थर मिले, तीनोंने मनुष्यकी भाषामें दाऊदसे कहा कि, हे दाऊद ! हमसे जालूतको मार, तब जालूत मरेगा, दाऊदने वैसाही किया बादशाहकी बेटी तथा आधा राज्य पागया ।
कूआंका रोना—बहुरलअभवाजने लिखा है कि, यूसुफके भाइयोंने उन्हें कूयेमें डाल दिया, अरबके सौदागरने उन्हें निकाला तो कूआं यूसुफकी जुदाईमें बहुत रोया ।
नमरूह बादशाहकी बतख कौज, दोनोंकी प्रेमाधिक्यसे मृत्यु कौवा तथा कुलाग, कागोंका न्याय
रागसे कार्यं विशेष—रागके गानेसे बुझा हुआ दीपक आपसे आप प्रज्वलित हो जाता है। वर्षा होने लगती है, पत्थर मोम हो जाता है। चुंबक लोहा खींच लेता है।
सबकी बातें—एहवालूल आखरतमें लिखा है कि, क्यामतके निकट आनेपर वृक्ष दीवार आदि भी जड़ पदार्थ आपसमें बातें करके भविष्य कहेंगे।
इसी प्रकारकी हजारों बातें हैं कि, जड़ स्थावरके बात करनेके विषयमें लिखी हैं। जिससे सिद्ध होता है कि, जड़ चैतन्य है चैतन्य जड़ हैं; स्थावर जंगम हो जाता है जंगम स्थावर हो जाता है।
बिच्छूके बदले चांदी —मैंने लड़कपनमें अपने पितासे सुना था कि, एक दिन एक मनुष्य उजाड़ मैदानमें शौच फिर रहा था उस समय क्या देखता है कि, सफेद बिच्छूओंकी सेना तार लगाये चली आ रही है। सफेद बिच्छू उसने पहले कभी नहीं देखा था, इस कारण लकड़ीसे थोड़ेसे बिच्छूओंको पकड़के, गामके लोगोंको दिखानेके हेतु ले गया। घर पहुँचकर बिच्छूकी फौजका हाल सबसे कहकर, लाये हुये बिच्छूओंको लोटेसे दिखलाने लगा कि, जिससे लोगोंको विश्वास हो जावे। लोटेको उलटतेही बिच्छूके बदले सफेद २ चांदीके रुपये निकल पड़े। लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। लोभके मारे कितने लोग उस बिच्छूकी फौजको देखने गये पर पीछे पता न मिला कि, कहाँ चली गई।
ऐसा कहते हैं कि, जब धन लबारिस हो जाता है सौ वर्षतक उसका कोई स्वामी नहीं होता, तो वह पृथ्वीमें गड़े २ एकही जगह रहनेसे घबराता है वहांसे दूसरी जगह चला जाता है। या तो बिच्छूके रूपमें बाहरसे नाना प्रकारके स्वरूपसे पृथ्वीके भीतरसे एक जगहसे दूसरी जगह चला जाता है। जिस समय अपने स्थानको छोड़ता है उस समय बड़ा भारी शब्द होता है पृथ्वी कांपती है। जिस मनुष्यने जो दश बीस पा लिया था, उसमें उसका उतनाही भाग था, शेषके जिसका भाग होगा वह पावेगा।
जगदीशका समभाव ।
सब जीवधारियोंपर परमात्माकी समान दयादृष्टि है वह सबको एक दृष्टीसे देखता है जो जीव जिस अवस्थामें होता है वह उसी अवस्थामें उसकी रक्षा करता है वह न्यायी दयालु और भक्त वत्सल है उसकी ऊंचे नीचे सभी लोकोंपर एकही दृष्टि है। जिस लोकमें जैसा देह चाहिये वो उन्हें वैसाही देह देता है। यदि स्वर्गस्थ जीवोंको पृथिवी पर लाया जाय तो उनके देह यहाँके
खरगोशको शिकार कुत्तेसे मित्रता, मानुषी वाक् चोर बगुला मुर्ग
प्राकृतिक उपचारोंको न सह सकेंगे । अपने अपने चोलामें सुखी—सब जीवधारियोंको अपना २ चोला प्यारा लगता है । कोई नहीं चाहता कि, मेरा शरीर नष्ट हो जाय यहाँतक कि, विष्ठाके कीड़ेको भी अपना शरीर प्यारा लगता है वह भी मरना नहीं चाहता । उदाहरण—एकवार नारद महाराजने विष्णु भगवान्से पूछा कि, आपने जीवोंमें उत्तम मध्यम और अधम भेद क्यों किया है ? आप तो दयालु हैं, आपको सबको सम भावसे सुख देना चाहिये । यह सुन भगवान्ने उत्तर दिया कि, मैं स्वतः किसीको सुख दुःख नहीं देता किन्तु जीवोंकी इच्छाके अनुसार वैसीही व्यवस्था कर देता हूँ यदि कोई भी दुःखमें हो तो पूछ लो नारदजी उसी जीवोंको देखते हुए भूमिपर आये कीचके गढ़ढेमें सूकरको पड़ा देखकर उससे कहने लगे कि, तू क्यों कष्ट पा रहा है ? स्वर्ग चल, नारदजीने उसके सामने स्वर्गके सुखोंका वर्णन किया । उसने पूछा कि, वहाँ कीचड़ है वा नहीं ? क्योंकि मुझे यह कीचड़ अत्यन्त प्यारी है यह पूछकर फिर भी सूकरने कहा कि, स्वर्गमें विष्ठा है कि नहीं ? (क्योंकि, शूकर विष्ठा खाता है) नारदजीने कहा ये सब पदार्थ वहाँ कहाँ ? यह बात सुनकर शूकरने कहा कि, मैं तुम्हारे स्वर्गमें नहीं जाना चाहता, मैं यहाँही रहूँगा तुम्हारा स्वर्ग तुम्हारे लिये सदा रहो । इस विषयपर महात्माओंका एक दोहा भी है कि—
कलयुगी संत चले वैकुण्ठको, चढ़े पालकी माहिं ।
वीच राहसे फिर आयै, वहाँ भंग तमाखूँ नाहिं ॥
जो जीवधारी जिस दशामें हैं, उसी हालतमें उसकी रक्षा करनेवाला भगवान् उसके साथ मैं है, वहाँ उसकी कठिनाताको दूर करता है तथा उसी अवस्थामें उसको सुख पहुँचाता है ।
बालककी रक्षा—हिन्दुस्थानका सिपाही रास्तेमें चला जाता था, उसकी स्त्री गर्भवती थी, उसने मार्गमेंही पुत्र प्रसव किया, आप मर गई । जीवित पुत्रको देखकर सिपाही चिन्ता करने लगा कि, इस पुत्रको मैं किस प्रकार पालूंगा ? जब उसे कोई उपाय न सूझा तो गड़हा खोदकर अपनी मृतक स्त्रीको लेटा दिया उसकी छातीपर बच्चेको रख इधर उधरसे बूझोंकी डालियाँ और काँटे वगैरः लेकर उस गड़हे पर इस प्रकारसे रख दिया कि, जिसमें लड़केको किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचे । पीछे अपनी नौकरीको चला गया । कुछ दिनोंके बाद छुट्टी लेकर वह अपने घर जाने लगा, उसी रास्तेसे आया, वहाँ जाकर देखा तो बच्चा बाहर खेल रहा है । गड़हेके अन्दर देखा तो उसकी स्त्रीका सर्व अङ्ग तो गल गया था पर स्तन उसी प्रकार रहे वह बच्चा उन्हें ही चूसता करता था, बच्चेने मनुष्य-
मुरगावी, उल्लू, कारभो रेण्ट
को आते देखा, तो डरकर गड़हेमें भाग गया। इस मनुष्यने उस बच्चेको गोदमें उठा लिया। बच्चा रोने व चिल्लाने लगा। सिपाहीने मिठाई वगैरः खिलाकर उसको बहुत धीरज दिया उसे लेकर अपने घर आया। धन्य है सर्वशक्तिमान् सर्व रक्षक दयालु परमात्माको जो इस प्रकार रक्षा करता है।
बनी इसराईलकी रक्षा—इस बातमें कोई आश्चर्य न करे। बाइबुलमें लिखा है कि, बनी इसराईल चालीस वर्षतक जड़लोंमें फिरते रहे, उनके पाँवके न जूते टूटे और न कपड़े फटे उनके बच्चे उत्पन्न होते थे पेटसे ही जामा पहरे निकलते थे ज्यों वे बड़े होते थे, त्यों त्यों उनका जामा भी बढ़ता जाता था। आकाशसे उनके लिये भोजन उत्तरता था, खुदा उनके साथ रहता था उनकी रक्षा किया करता एवं वही उनकी आवश्यकताको पूरा किया करता था।
कीड़ेकी रक्षा—तीन चार वर्ष हुए। एक सिकख पहाड़पर चला गया, वहां उसके पास रसोई बनानेको कोई बरतन न था। वह एक झरना पर गया, एक पत्थर पर आटा गूंधा, एक पत्थरका तावा बनाया, दो पत्थर जोड़कर चूल्हा बनाया रोटी पकाने लगा। पत्थर आगसे गरम हो गया पर दो अंगुल गरम नहीं हुआ, इसी प्रकार नित्य होने लगा। पत्थरका जो भाग गरम नहीं होता, उतने भागमें रोटी भी कच्ची रह जाती। सिकख आश्चर्यमें था कि, क्या कारण है कि, समस्त पत्थर गरम होता है पर इतना भाग गरम नहीं होता। संयोगसे एक दिन वह तावावाला पत्थर टूट गया उसमें जितनी जगह ठंडी रह जाती थी उसमें से एक कीड़ा निकल पड़ा। देखो परमात्माकी कृपालुता, किस प्रकारसे उस कीड़ेकी पालना करते हुए उसकी जान बचा दी।
मंजारीके बच्चे—हिरण्यकश्यप दैत्य अपने पुत्र प्रह्लादको मारनेके विचारमें था। प्रह्लादने कौतुक देखा था कि, एक कुम्हार अपने आवामेंसे बरतनोंको निकाल रहा है बरतन निकालते निकालते एक जगह देखा कि, बरतन ज्योंके त्यों कच्चे रह गये, उनमें तनिक भी आँच नहीं लगी उन बरतनोंको हटाने पर नीचे बिल्लीके कई बच्चे निकले। यह बात इस प्रकार हुई थी कि, जब कुम्हार बरतनोंका आवा लगा रहा था उसी समय बिल्ली आई बच्चा देकर कहीं बाहर चली गई, इतनेहीमें कुम्हारने अज्ञानतासे आवामें आग लगा दी।
यह घटना देखकर प्रह्लादको पूरा निश्चय हो गया कि, जिस प्रकार सर्वरक्षक प्रभुने बिल्लीके बच्चोंकी जान बचाई है वही मेरी भी रक्षा करेगा। परमात्माने मनुष्यको हाथ पाँव दिये हैं जिससे वह अपना काम करे, परिश्रमसे पेट भरे, वस्त्र पहने आवश्यकताओंको पूरा करे, किसी दूसरेका आसरा न करे।
चमगीदड, रक्त पीनेवाली
जबतक यह माताके गर्भमें रहता है इसके हाथ पाँव बंधे रहते हैं अपनेसे खाना पीना नहीं जानता, ऐसी विवशताकी दशामें विश्वम्भर उसकी नाभीमें एक नल लगाकर, उसीके द्वारा इसको भोजन देकर उसकी रक्षा करता है । गर्भसे बाहर होनेके पहले माताके स्तनोंमें दूध भर देता है, उसके लिये अत्यन्त प्रेमी और सच्चे सेवक उपस्थित कर देता है जो उसकी पूर्ण अवस्थामें पहुँचने तक इसके लिये अपना प्राण भी निछावर करनेको तैयार रहते हैं ।
मनुष्यको तो प्रभुने हाथ पैर दिये, पशुओंको स्वयं वस्त्र पहनाया तथा उनके भोजनका प्रबन्ध किया । मनुष्यका शरीर वस्त्रोंसे ढकता है तो अन्य जीवधारियोंके शरीर उनके बाल, पर और दुमोंमें ढक देता है कोई जड़ली जीवधारी भोजन और वस्त्रके मोहताज नहीं होते, जो जीवधारी जिस अवस्थामें है, प्रभु उनका पालन उसी अवस्थामें करता है ।
तुलना—शारीरिक सुख और विषयवासना इन्द्रसे लेकर मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े मकोड़े सबमें समान है । सब अपने भोजन छाजन और विषय भोगके ग्रहण करनेमें एकही प्रकारके हैं । सुख दुःखमें एकही समान हैं बल्कि अमीरसे गरीब अधिक सुखमें हैं, क्योंकि, संसारी वैभव जितनाही होता है उसको उतनाही चिन्ता, रोग, शोक बढ़ता है, गरीबोंको उतनाही कम होता है । निश्चिन्तता अथवा थोड़ी चिन्तामें विशेष सुख है । बहुत धनवान्, बहुत चिन्ता, शोच और भयमें पड़ा रहता है, गरीब दो रोटी खाकर बेफिक्र सो जाता है । इन्द्र जैसे इन्द्राणीसे प्रसन्न होता है, उसी प्रकार शूकर अपनी शूकरीके साथ सुखको प्राप्त होता है, इन्द्रको जैसे शूकरीसे घृणा है, वैसेही शूकरको इन्द्राणीसे भी भय है । पशुओंके राजा, मनुष्योंके राजासे किसी बातमें घटे नहीं होते ।
मनुष्यसे बन्दर—सब जीवधारी अपनी २ योनिमें उसी प्रकार सुखी हैं जैसे कि, मनुष्य अपने शरीरमें सुखी होता है । बन्दरोंके वर्णनमें लिखा जा चुका है कि, एक बाबर्ची बन्दरोंके साथ रहनेसे बन्दर बन गया । उसीके बशमें अफ्रीकाके सब बन्दर हैं । उसकी स्त्रीने बहुत कहा पर वह उसके साथ न रहा, बन्दरोंके साथही रहना अच्छा लगा ।
वस्त्रादि भोग—चिलमैन सोंप, रेशमी कीड़ा और गिरगिट आदि विविधि प्रकारके रङ्ग बदला करते हैं । उनके सामने मनुष्यकी क्या बात है चटकीले वस्त्र और उत्तम भोजन विशेष प्राप्तिसे भजनमें बाधा पड़ती है । भजनके लिये साधारण अन्न वस्त्रही उत्तम है । पक्षियोंके शरीर पर परमात्माने ऐसा वस्त्र पहनाया है कि, उसके आगे मनुष्यके उत्तम २ बहुमूल्य रेशमी वस्त्र भी तुच्छ
गायनाकी चमगीदड़ी
हैं। पक्षियोंके चमड़े नर्म हैं उनके लिये कर्ताने ऐसे वस्त्र बनाये हैं कि, जिससे उनको सर्दी और गर्मी कुछ न लगे। दो प्रकारके पक्ष बनाये हैं, एक नर्म जो नीचेके चमड़ेको बचाते हैं ऊपरके सर्दी गर्मी आदिकको रोकते हैं। पशुओंके चमड़े कठोर बनाये गये हैं उसके ऊपर कोश भी बनाये हैं। सब जीवधारियोंको उसकी अवस्थाके योग्य सब कुछ प्रदान किया है। पानीके जीवधारियोंको वस्त्रकी विशेष आवश्यकता नहीं। क्योंकि, वे अपने शरीरको जलमें छिपा लेते हैं। उनमें ऐसी शक्ति दी है कि, वे जब चाहें पानीके तहमें चले जायें अथवा ऊपर आ जायें। जलके जीवधारियोंको नाज और फल आदिककी कुछ आवश्यकता नहीं, कोई २ मछली इतने बच्चे देती हैं कि, जिससे हजारों मछलियोंका पोषण होता है। काडनाम एक मछली है जो एकही बार इतने अण्डा देती है कि, जितने पृथ्वीपर मनुष्य हैं। जब वह अण्डा देती है तो सबको पानीपर फेंक देती है, वे पानी पर तैरते फिरते हैं। सूर्यकी गरमीसे पककर बच्चे निकलते हैं पानी पीकर बड़े होते हैं, फिर एक दूसरेका भक्षण बन जाते हैं, इसी प्रकार इन मछलियोंकी उत्पत्ति बहुतायसे होती है। जैसे बिहिश्चितयोंके पास बहुत हरे हैं। उसी प्रकार मुर्गोंके पास बहुतसी मुर्गियाँ हैं, सेर आध सेर अनाजमें आदमीका पेट भरता है। सत्तर अथवा उससे भी अधिक दस्तरखॉन हो, वे सब बेफायदा हैं, जितनी विषयकी अधिकता है उतनीही अधिक खराबी है, बिहिश्चितके सब सुख मूर्खोंके लिये हैं, बुद्धिमान् बिहिस्त (स्वर्ग) को कभी अच्छा न समझेगा।
परमात्माकी दृष्टि—जीवधारियोंपर समान है, जिसको वह रक्षा करना चाहता है उसको कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। अतएव सन् १८७८ ई० में तहसील मुक्तेश्वर जिला फिरोजपुरके कानूनी नामक गाँवमें ईंटों का बड़ा भारी आवा लगा था, जब ईंट पककर ठण्डी होगई तो उठाई जाने लगीं। उस समय उनमेंसे एक चूहा निकल कर भागा, जितनी दूरतक वह चूहा रहा था उसके चारों तरफ पाँच सात ईंट कच्ची रह गई थी। इसी गाँवमें एक मरतबे लोग चूना पका रहे थे, चूना पककर ठण्डा हो गया बाहर निकालने लगे एक दोहाथकी लकड़ी ज्योंकी त्यों साबित निकली, उसमें आँचका एक भी चिन्ह न था, लोगोंने आश्चर्यके साथ सावधानी पूर्वक लकड़ीको चीरा। उनमेंसे डेढ़ हाथ लंबी एक गोर निकलकर भाग गई।
उसकी शक्ति।
वो सर्व शक्तिमान् है जो चाहे सो करे वो जंगमको स्थावर और स्थावरको
फाखता या पण्डुक कबूतर प्लेनीका मत
जंगम कर सकता है वो स्थावरोंको जंगमोंकेसे गुण देता है सब उसके हाथ है वो मनुष्यको पशु तथा पशुको मनुष्य बना सकता है ।
पहाड़से ऊँटिनी—कुरानमें लिखा है कि, किसी जातिके लोगोंने साले-दनबीकी सिद्धि देखनी चाही नबीने उनसे कहा कि, खुदा चाहे तो पहाड़से ऊँटिनी पैदा कर दे, उसी समय पहाड़से ऊँटिनी उत्पन्न हुई उसी समय उसने बच्चे दिये । होते ही वे बराबरके हो गये ये सब बाबुलके पास बहुत दिनों तक चरते फिरे थे ।
यह अपनी शक्तिमात्रसे सबकी रक्षा कर सकता है, उसकी शक्तिका कोई ठिकाना नहीं है उसी शक्तिसे सबकी समभावसे रक्षा करता है ।
उपसंहार—अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उसमें अनन्त प्रकार की उत्पत्ति है, उत्पत्तिके अनन्त प्रकारके रूप और स्वभाव हैं उसका हाल किसीको मालूम नहीं। केवल ब्रह्मज्ञानी लोग जानते हैं, दूसरा कोई नहीं जान सकता । केवल ब्रह्मज्ञानी वहाँ पहुँच सकते हैं ब्रह्मज्ञानीही एक पलमें करोड़ों योजन उड़ जाते हैं, अपनी सामर्थ्यसे दूसरे को भी अपने साथ ले जा सकते हैं । ब्रह्मज्ञानी जिसकी सहायता करते हैं उसका काम पूरा कर देते हैं । ब्रह्मज्ञानी सब कौतुक देख दिखला सकते हैं जैसा कि, नानकसाहब भिन्न २ लोकों द्वीपों ब्रह्माण्डों और पृथिवीको सँर करते फिरते थे, उस समय एक ऐसे स्थानपर पहुँचे जहाँ केवल स्त्रियाँही स्त्रियाँ थीं कोई पुरुष, न था। उनकी उत्पत्ति आश्चर्य रीतिसे है । यह बात नानकसाहबके सफरनामे में कहीं लिखी हुई हैं । ज्ञानीलोग बड़े उड़नेवाले हैं, जहाँ चाहें वहाँ उड़कर चले जावें पर कोई २ ऐसे सुकर्मों भी संसारमें हैं जिनमें उड़नेकी सामर्थ्य नहीं ईश्वरकी कृपा उनको आसमान पर ले जाती है, जैसे कबीर साहब मुहम्मद साहबको ले गये। वाइबुलमें लिखा है कि, एक अरेशा नामक पुरुष शरीर सहित आसमान पर उठाया गया हजरत ईसा भी देहसहित आसमान पर गये, ऐसे सहस्रों पुरुष, परमात्माकी कृपासे देहसमेत ही जहाँ चाहे वहाँ जा सकते हैं ।
राजा युधिष्ठिर भी देह सहित धर्मलोक गये । यह कथा महाभारत आदिमें प्रसिद्ध है, कबीरपन्थके उपग्रीता नामक ग्रन्थमेंभी लिखी है ।
यह तो पुरानी बातें हुई, अब आजकलकी बात सुनो, १८९७ ई० में फरीदकोटमें गेंदाराम नाम का एक अन्धा ब्राह्मण रहता था । तब मैं भी भ्रमण करता हुआ फरीदकोट आकर ठहरा, वह सत्संग का बड़ा अभिलाषी था, मेरे पास नित्य आया करता था ठाकुरजीकी पूजा बड़े प्रेमसे किया करता था । वो अन्धा होनेपर भी अच्छा पंडित था, उसके पास अनेकों विद्यार्थी पढ़ते थे । वो
हुद हुदपर कुरान, कप्तान वाउन जर्मनी और फ्रांसके कबूतर मैना
जाति स्मर था. अपने अन्धे होनेके बारेमें कहा करता कि, मैं दक्षिण भारतमें एक अच्छी रियासतका दीवान था राजाको राजनीतिकी शिक्षा देता था, बिना राजा-जाके कोई काम न करता था। एक दिन एक बलात्कारका अपराधी आया-राजाके पूछने पर मैंने कहा कि, उसे आँखोंसे अन्धा कर दो. वो पापी अन्धाकर दिया गया. उसी दिनसे मैं अन्धा हो गया हूँ क्योंकि, ऐसा दण्ड अनुचित था।
एक बार वो तीन दिनतक गायब रहा चौथे दिन प्रकट होनेपर उसने कहा कि, मुझे विष्णुके पारषद विष्णुलोक को लिये जाते थे मैंने पूछा कि, कहाँ लिये जाते, हो तो उत्तर मिला कि, वैकुण्ठ लिये जाते हैं, मैंने अपने घरवालोंसे मिलनेकी इच्छा प्रगट की दूतोंने मुझे सवासन जानकर लौटा दिया।
इस घटनाके बाद वो ब्राह्मण तीन माह और जीवित रहा पीछे वैकुण्ठ चला गया।
इस प्रकरणके लिखनेका मेरा यही अभिप्राय है कि, जो लोग पशु पक्षी आदिको अर्किचित्कर मानते हुये अपने मनुष्य होनेपर इतराते हैं। वे जान लें कि. जो बातें उनमें हैं वो जानवरोंमें भी पाई जाती है। सबमें इश्वरीय बातें समान हैं जो काम मनुष्य देहसे करते हैं वेही काम पशु पशुतनसे कर लेते हैं आकृतियाँ जुदी २ हैं बस्तु एकही है सबमें आत्मा है तथा परमात्माकी दृष्टिमें सब समान हैं।
दूसरा मेरा यह भी प्रयोजन है कि, जो लोग आवागमनको न मानकर अनेकों पापोंमें लगे हुये हैं, वे जानलें कि, वे कर्मवश हैं जैसे कम्मेंने मानवीशरीर प्रस्तुत कर दिया है उसी तरह कीड़ा मकोड़ा भी बना देगा इसमें कयामत आदिकी आवश्यकता नहीं है केवल कर्मही कारण है. यदि लोगोंने मेरे लेखसे लाभ उठाया तो मैं मेरे भ्रमको सफल होऊँगा जो अपनेको आवागमनके फन्देसे बचावेगा वही श्रेष्ठ है नहीं तो आवागमनके फन्देमें फसे रहनेवाले सभी समान हैं।
अध्याय २०.
अथ आदि मंगल।
दोहा— प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ॥
दूजा केहि विधि ऊपजा, पूछत हौं गुरु सोइ ॥ १ ॥
आदि मंगलका अर्थ।
धर्मदासजी कबीर साहिबसे पूछते हैं कि, प्रथमै-चैतन्याकाशमें पड़े हुये साहिबके लोकके प्रकाश स्वरूप जो समष्टि जीव हैं। उनके संसारी बननेके
चोर मैना, रोम सेन साहिब तोता
पहिले, आप-सभोंके गुरु, समरथ-सर्वेश्वर सत्य पुरुष ही रहे-थे । सत्य पुरुष अथवा उसके पूर्वोक्त प्रकाशके सिवा, दूजा-दूसरा, कोई-कोई, न-नहीं, रहा-था । दूजा पूर्वोक्त समष्टि जीव, केहि-किस, विधि-तरहसे, ऊपजा-संसारी हुआ । गुरु-हे गुरुजी महाराज ! सोइ-वही, मैं पूछत हूँ-पूछता हूँ ।
यानी सत्यपुरुष भगवान् रामका लोक और वहांके पार्श्व आदि निवासी भगवान् रामही हैं उनसे भिन्न नहीं हैं, उनके लोकका जो प्रकाश चैतन्याकाशमें है वही समष्टि जीव है । यह किसी तरह भिन्न तथा व किसी तरह एक है । धर्मदासजीका कबीर साहिबसे यही प्रश्न है कि, भगवान्का ऐसा प्रकाश यह जीव संसारी कैसे होगया यह मुझे बताइये । वेदान्तकी दृष्टिसे तात्पर्य-सृष्टि रचनाके पहिले एक अद्वितीय सत्यपुरुषही था ये सब जीव उपकरण रहित पड़े थे, नामरूपात्मक जगत् नहीं था यह संसार कैसे उत्पन्न हुआ मैं आपसे यही पूछता हूँ ॥ १ ॥
तब सतगुरु मुख बोलिया, सुकृत सुनो सुजान ॥
आदि अन्तकी परिचै, तोसों कहौं बखान ॥ २ ॥
तब-शिष्यका प्रश्न सुनकर, सतगुरु-सच्चे गुरु कबीर साहिब मुख-मुंहसे, बोलिया-बोले कि, सुजान-ऐ परम बुद्धिमान्, सुकृत-संस्कारी-जीव धर्मदास, सुनो-सुन लो । मैं तोसों-तुमसे, आदि-संसारी नाना जीव होनेसे पहिलेकी और अन्तकी, सबसे पीछेकी, पारचै-परखी हुई बात, कहौं-कहता हूँ ।
कबीर साहिबने धर्मदासजीका प्रश्न सुनकर बताना आरम्भ किया कि, आदिमें क्या था और कैसे संसारी हुआ किस तरह इसका उद्धार हो सकता है यह सब मैं तुम्हें सुनाये देता हूँ तुम सावधानीके साथ सुन लो ॥ १ ॥
प्रथम सुरति समरथ कियो, घटमें सहज उचार ॥
ताते जामन दीनिया, सात करी विस्तार ॥ ३ ॥
समरथ—भगवान् रामचन्द्रजीने, प्रथम-पहिले, समष्टि जीवको अचेत पड़ा देखकर उनके कल्याणके लिये, घटमें-जीवके भीतर, सुरति-चैतन्यताका, सहज-अपने आपही, उच्चार-संचार, कियो-कर दिया, ताते इस सुरतिके कारणही, जामन-जीवपना जमानेवाली वस्तु, दीनिया-दे दी, इसके बाद जीवने, सात-इच्छा आदिक सातका, विस्तार-फैलाव, करी-दिया ।
अपने अंशरूप जीवोंकी दशा देखकर उनके उद्धारके लिये भगवान्ने उन्हें चैतन्यता दे दी साधन तो उद्धारका था पर इसने अपनेको संसारका पथिक