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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

किताबोंकी तो वहाँतक पहुँचही नहीं, कबीर गुरु तथा स्वसंबेदके अतिरिक्त सत्यलोकका कोई हाल नहीं जानता, फिर आपको और किस गुरु तथा शास्त्रके अनुसार सत्यलोकका नाका प्राप्त हुआ ? उनका कथन है कि, सत्यपुरुषका दर्शन पाया, वह तेजपुञ्ज था उसके एक बालके तेजमें करोड़ों सूर्य और चन्द्र छिप जाते थे । सो इस सत्यपुरुषका दर्शन करानेवाले कौन गुरु हैं ?

फिर ३९४ पृष्ठमें लिखा है कि, एक पद्म पालङ्ग सत्यलोकका घेरा है । एक पालङ्गकी गिनती ऐसे करते हैं कि, यह तीन लोक एक पालङ्ग है । यह बनावट सरासर कबीर साहबके विरुद्ध है । कबीर साहबका कथन है कि, ये तीनों लोक छः पालंगके फैलावमें हैं, एक पालंगमें कदापि नहीं है । हजरतको पालंगकी भी हद्द मालूम नहीं । यदि कबीर साहबके ग्रन्थको देखकर पूरी नकल उतारते तो भी ठीक होता, अटकल पच्छु जो याद आया सो लिखते गये । कुछ शुद्धाशुद्धका भी ध्यान नहीं रखा । यदि पालंगका हिसाब अशुद्ध ठहरा तो सत्यलोकके फैलावका वर्णन झूठ है । जो कुछ उसने लिखा है तो सब कृत्रिम है जैसे गुरु हैं वैसेही शिष्य लोग हैं उनके विचारोंमें ये बात नहीं उपस्थित हुई कि, बिना गुरुके अगमका समाचार कौन कह सकेगा ? यह बही जाने ।

पहलेही उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि, मुक्तिके लिये १-गुरु, २-नाम ३-सत्सङ्ग ; इन तीन वस्तुओंकी आवश्यकता है । भलाजी ? जो स्वयम् निगुरा होगा, उसके मतानुयायी किस तरह गुरुमुख हो सकेंगे ! हाँ यह तो ठीक है कि, आमके वृक्षसे आम, कटहलके वृक्षसे कटहल, अमृतके वृक्षसे अमृत, विष वृक्षसे विषही फल लगेगा । अतः जो स्वयम् निगुरा होगा उसके अनुयायी भी निगुरे ही होंगे । हाँ शिष्य तो अपनेको गुरुमुख मानेंगे परन्तु निगुरेके उपदेशसे कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती ।

इस पन्थमें बहुत थोड़े लोग हैं । इसकी विशेष उन्नति नहीं हुई है । राधास्वामीके मतानुयायी लोग कबीर साहबके ग्रंथ पढ़ते हैं । तथा उनकी लिखावट कबीर साहबके अनुसार है । जहाँ उन्होंने कबीर साहबके विरुद्ध अपनी बनावट की है वो स्पष्ट जान पड़ती है । उनके ग्रंथोंमें सब बातें स्वसंबदकी हैं पर कबीर गुरुसे विमुख हैं । राधास्वामी अपनी उपदेश पुस्तकके दूसरे भागमें स्वयं लिखते हैं कि, ब्रह्माको जब कबीर साहबने समझाया तब उसको सत्यपुरुषके खोजनेका उत्साह हुआ पर काल पुरुषने भ्रमित कर दिया फिर जीवमें क्या सामर्थ्य है जो कि, सत्यगुरुकी दया बिना सत्यपुरुषके दर्शनको पा सके ।

इसपर मुझको यह कहना पड़ता है कि, जिस अवस्थामें ब्रह्मा ऐसे जानी

हस्तावलंबिनी कंजरी

जिन्हें साक्षात् बुद्धि स्वरूप कहते हैं जिनकी कि, सन्तान सब मनुष्य हैं। सब ज्ञान उन्हींसे प्रगट हुआ है जब उन्हींको काल पुरुषने बहकादिया कि, सत्यपुरुष का दर्शन न पावें, तो क्या कालको यह सामर्थ्य न थी कि, राधास्वामीको बहका दे कि, तू अपने गुरुसे विमुख हो जा, जिससे तेरे साथ तेरे शिष्यगण भी मेरे जाल में फँस फँसकर जन्म मरण पावें।

यह राधास्वामी अपने ग्रंथमें अपनेको ही सत्यपुरुष मानते हैं। भलाजी ! यदि वे स्वयम् सत्यपुरुष थे तो पन्द्रह वर्षतक किसका भजन करते रहे, बिना गुरु के नाम किसने बतलाया ? किसने अभ्यास करना सिखाया ? उनके जितने लेख हैं, वे सब कबीर साहबके ग्रंथोंकी नकलें हैं, सिवाय इसको और कुछ नहीं; हां ! कहीं उनकी बनावट भी मिली हुई हैं। सत्यनाम तथा सार शब्दका उपदेश कबीर साहबके बिना और किसने दिया, अन्य कौन है कि, जो सत्यपुरुषकी भक्तिका समाचार देसके ? क्योंकि कबीर साहबको छोड़कर बाकी सब अनभिज्ञ हैं।

सत्यपुरुषके पुत्रोंमें सबसे पहला पुत्र निरञ्जन है। जिसने अपने आपको सत्यपुरुष बना, सत्यपुरुषका नाम छिपाया। इसके पीछे और भी बहुत हो गये हैं। वर्तमान कालमें विमुखोंमें प्रसिद्ध गुरुविमुख राधास्वामी जी महाराज हैं।

राय शालिग्राम' साहब राधास्वामीके शिष्य थे जो इस समय अपने स्वर्गवासी गुरुके स्थानापत्र हैं उन्होंने "सैर आलम् फिजा" नामक पुस्तकमें इस प्रकार लिखा है कि, मैं लाहृत स्थानपर पहुँचा, वहाँकी सब शोभा देखी, अदली कबीर मेरी आत्माको उस स्थानपर लेगये फिर गुरुकी आज्ञासे आगे चलते चलते सत्य लोकका नाका मिला। यह "सैर आलम् फिजा" राय शालिग्राम कृत संसारकी सैरका वृत्तान्त मैंने हस्तलिखितपुस्तकके रूपमें देखा था। उसमें तो इतनाही पता मिला। अस्तु, इतना भी धन्य है कि गुरुसे सर्वथा विमुख होनेपर भी चेला कृतज्ञ होकर इतना तो स्वीकार करता है। इस प्रकार कालपुरुषने सबकी बुद्धिपर आवरण डाल दिया है जिससे सब मनुष्य सत्यगुरुसे विमुख होकर कालके जालमें फँस गये हैं।

ये राधास्वामीजी सब गुरुविमुखोंसे बहुत बड़े हैं कारण कि, इन्होंने स्वयम् ही गुरुसे विमुखता की है। सबमें प्रथम श्रेणी निरञ्जनकी है कि, उसने सत्य पुरुषका नाम छिपाकर अपनेको स्वयम् ही सत्यपुरुष करके प्रगट किया, इसके अतिरिक्त जितने विमुख मनुष्य हैं। सभी निरञ्जनकी चालके और उसीके रूप

के हैं। सब विमुखों तथा अकृतज्ञोंका एक ही ढङ्ग है। सब अपने नाम तथा प्रभुता के इच्छुक हैं। कबीर साहबने धर्मदाससे कहा है कि, हे धर्मदास ! यदि तू मुझ को चाहता है तो तू अपनी मान बड़ाईको त्याग दे, इस संसारसे कोई सम्बन्ध मत रख। धर्मदासने वैसाही किया, जिससे वो सत्यगुरुका स्थानापन्न हो गया। उनके वंशको सत्यगुरुने गुरुवाई प्रदान की।

जितने गुरुविमुख तथा अकृतज्ञ हैं उनका छुटकारा होना जरा असम्भव है। आदिसे अन्ततक कभी भी गुरुकी अकृतज्ञता करेगा तो फिर कालके बंधनमें निश्चय ही पड़ेगा। उसकी कदापि मुक्ति न होगी, न कोई उसकी सहायता ही करेगा। यही बात इस साखीमें लिखी हुई है कि—

साखी—गुरु सीढीते ऊतरे, शब्द विहूना होय।

ताको काल घसीटि है, राखि सकै नहिं कोय ॥

इस कारण गुरुका धन्यवाद और स्तुति सदैव करना चाहिये। क्योंकि, गुरुको छोडते ही सार रहित होजाता है, इसी बातकी विस्तारके साथ इस नमन में कहते हैं—

हम'लके बीचमें झूला^१^। हुआ जब ताप'का शूल^२^ ॥
जले ज्यों^३^ घासका पूला^४^। गुरुका शुक्र^५^ क्यों भूला ॥
हमल मादर^६^में जब सोया। पडा दुःख दर्दसे रोया ॥
वहाँकी अव'ल क्यों खोया। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
वहाँ गुरुसे किया वादा^७^। सो भूला पापसे लादा ॥
यहाँ माँ वाप और दादा। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
य'हाँ दर हाथियाँ डोलें। जवा^८^नौ पर्वतां तौलें ॥
न उन^९^के नामको बोलें। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
किया दावा खुदा^१०^ई का। अमल हल्मो जुदाईका ॥
खबर बिन बे अदाईका। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
रहे महरूम^११^ सो सबसे। भुला एहसान गुरु जबसे ॥
त'नासुखमें पडा तबसे। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
गुरुका आसरा करके। सरेआजिज गुरु चरणधरके ॥
गुन^१२^ह बख'शो मेहर^१३^करके। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥

१ पेट, २ घबडाकर हला, ३ जठराकी तापिस, ४ दर्द, ५ जैसे, ६ पूली, ७ मिहरबानी, ८ माता, ९ जान, १० इकरार, ११ इस लोकमें, १२ जीभसे, १३ भगवान्के, १४ ईश्वर होनेका, १५ जुदा, १६ आवागमन, १७ अपराध, १८ मुआफ करो, १९ दया।

भक्त मीराबाई

गुरुको कृतज्ञोंकी प्रशंसा जिस प्रकार स्वयम् कबीर साहब तथा सब ऋषि मुनि करते आये हैं उसी प्रकार गुरुको अकृतज्ञोंकी दुर्दशा का भी वर्णन किया है । इस विषयमें एक उदाहरण देता हूँ कि, किसी समय एक भङ्गिन गोमांसको मदिरा में पका, गन्दे बरतनमें रख शूकर के रक्तसे रंगे हुए वस्त्रसे ढँककर लिये जाती थी ? उससे किसीने पूछा कि, ऐ भङ्गिन ! तू क्या लिये जाती है ? उसने उत्तर दिया कि, गोमांस मदिरामें पका हुआ है, उसको शूकरके रक्तसे रंगे कपड़ेसे इस भयसे ढांके लिये जाती हूँ कि, कदाचित् किसी गुरुविमुखकी दृष्टि न पड़ जावे । इस पर उसकी दृष्टि पड़नेसे मांस अपवित्र होकर भस्म होजावेगा । अकृतज्ञ गुरुविमुख शास्त्रोंमें ऐसाही पतित समझा जाता है कि, ऐसी अपवित्र वस्तुको भी उसकी नजर लग जाय ।

कबीर साहबने रामानन्दस्वामीसे कहा कि—“गुरु मेटे सो आहि चँडारा । भरमें योनि अनन्त अपारा” कितने लोग तो ऐसे हैं कि, पहले बड़ी आधीनताके साथ विनीतभावसे गुरुकी सेवा कर अपना काम निकाल लेते हैं पीछे गुरुकी बात भी नहीं पूछते । गुरुको नामपर धूल डालकर संसारमें अपनी श्रेष्ठता और यश प्रकाशित करते हैं । ऐसे शिष्योंके विषयमें सन्देह है कि, उनसे गुरु अपित अमूल्य पदार्थ कहीं छीन न लिया जाय जिससे वे खालीके खाली रह जायें । यह कथन कबीर साहबका है कि, गुरुका उपकार कभी भी न भूलना चाहिये । यदि गुरुकी कृतज्ञता स्वीकार न करेगा तो अन्तःकरण अशुद्ध हो जावेगा । गुरुकी अकृतज्ञता तथा गुरुविमुख होनेका फल अन्तर वा बाहर सब प्रकारसे प्रगट होगा । गुरु विमुखोंकी बड़ी दुर्दशाएं होती हैं ।

घीसाजी

अभी कुछ दिनोंसे एक घीसा पन्थ भी चला है । कबीरपन्थसे निकला हुआ सुनते हैं । इनका विशेष विवरण अभीतक मेरे पास नहीं पहुँचा है । इस कारण नाममात्र लिख दिया है । यह पन्थ कहीं दिल्लीके समीप सुना जाता भी है । इसके बहुतसे साधु तथा गृहस्थ अनुयायी हैं । मुझ दीनकी जिह्वा तथा लेखनी में इतनी सामर्थ्य नहीं है कि, कबीर साहबके हंसोंकी प्रशंसा व बड़ाई कह अथवा लिख सकें पर जो कुछ होसका है विशुद्ध श्रद्धासे किया है । कबीर साहबके अनन्त हंस हैं, उनके अनन्तही पन्थ हैं, करोड़ों असी ब्रह्माण्ड हैं, जिसमें हंस कबीर ईश्वरीय शासन कर रहे हैं, वे सब सत्यगुरुके आज्ञाकारी हैं । किसीकी सामर्थ्य नहीं कि, साहबसे विमुखता कर सके । जो कोई साहबकी आज्ञाके विरुद्ध कार्य करता है वो तत्कालही ऐसा दण्ड पाता है कि, फिर कभी उसे कुछ करनेका साहस नहीं हो ।

अध्याय १६.

आद्या और निरंजनपर जीत

आद्या और कबीर

जितने अभिमानी और अहंकारी हैं उन सबमें बढ़कर आद्या तथा निरंजन हैं। आद्याका दूसरा नाम आदिभवानी है। इसे कोई कोई विज्ञान प्रकृति कहकर भी याद करते हैं, जब ये बहुत अभिमानमें आयीं एवं सत्यपुरुषको भुलाकर निरंजनके साथ प्रसन्नता पूर्वक रहने लगीं, संसारमें विशेष अन्धेर होने लगा तो सत्यपुरुषकी आज्ञा हुई कि, हे ज्ञानीजी ! तुम जाकर आद्याको समझाओ। क्योंकि, वह बहुत अभिमानी भी होगई है, एवं बहुत जीव हत्या करती हैं। इस बातपर ज्ञानीजी सत्य पुरुषको नमस्कार करके चल दिये और प्रकृतिको जीत कर दिखा दिया। यह प्रकरण अम्बुसागरके नवम तरंगमें लिखा है कि—कबीर साहिब धर्म-वासजीको सुनाते है कि, मुझे सत्यपुरुषने आज्ञा दी कि, आद्या जीबोको सत्ता रही है इस कारण तुम आद्याके पास जाकर आद्याको समझा दो। सत्यपुरुषकी आज्ञाके अनुसार कबीर साहब आद्याके धामपर गये। द्वार पर खड़े होकर द्वारपालोंसे कहा कि, आदिभवानी से मेरा आनेका समाचार कहो। द्वारपालोंने आद्याको समाचार दिया, उसने कबीर साहबको अपने दरबारमें बुलाया। जब साहब भीतर गये तब आद्याने पूछा कि, आप कौन हो कहाँसे आये हो ? तब कबीर साहब ने उत्तर दिया कि, मैं सत्यलोकसे आया हूँ और सत्यपुरुषने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, क्योंकि, संसारमें तुमने बड़ा अत्याचार तथा अन्धेर मचा रखा है। जब (दुर्गापूजा) दशहरा आता है तब भैंसा बकरा आदि कटवाती हो भांति भांति के फन्दे लगाकर मनुष्यको तुमने बन्धनमें डाल दिया है। तेरे फंदेमें फँसकर सब जीव मरते और दुःख पाते हैं। मूर्ख तथा बुद्धिहीन मनुष्य सत्यगुरुक शब्दको न मानकर तेरी फाँसीमें पड़ते हैं। तू सत्यगुरुकी चोर है। मैं तुझको बांधकर एक पलमें रसातल भेज दूँगा, यह सुनकर देवी कहने लगी कि—

चौ०—कह देवी तू कैसे बोले। शक्ति हमारी घर घर डोले॥
पुरुष तुम्हार में नहिं डरऊँ। तीनों लोक पाँव तर धरऊँ॥
तुमको मारूँ चाँपू हेठा। तीन लोक पसरी मम डेठा॥
ब्रह्मा विष्णु हाथ सब मोरे। शिव सनकादिकके बल तोरे॥
चौसठ लाख कामिनी होई। मेरे सङ्ग विचर सब सोई॥
तुम्हरे हंस कहाँ चलि आवा। केहि कारनतोहिपुरुष पठावा॥

शाहसिकन्दर लोधीकी दीक्षा

नाम गुमान करो शठहारा । हमरे चित डर नाहिं तुम्हारा ॥
हाथ खप्पर मम भुजा अनन्ता । अपने वश कीन्हें भगवन्ता ॥
हम पर धनी और नहिं आना । तीन लोक मम नाम बखाना ॥
तुम कह गर्व करो रे भाई । कहो तो लोक मैं देउँ खँसाई ॥
तुरतहि रूप अनेकन धारुँ । लोक तुम्हार रसातल डारुँ ॥

शठिहार वचन

कह शठहार सुनो हो माया । कहा तोर मति गई भुलाया ॥
जादिन आदि अन्त नहिं जोती । ता दिन कहो कहाँ तुम होती ॥
पुरुष अकार कहो जिन जानी । शब्द डोर तोहि बाँधो तानी ॥
कामिनि तोहि करौं जर छारी । सकल हंसको लेउँ उबारी ॥
आदि पुरुषको तू कस मेटै । छोड़ै पुरुष काल उर भेटै ॥
अस जनि जानो सकल हमारा । देव आप होइहो जरि छारां ॥
हम तो सत्यलोक ते आवा । देवी तुम्हारो ज्ञान हिरावा ॥
पुरुष कीन्ह तोहि तब तुम भयऊ । तीनों लोक बखश तोहि दयऊ ॥
तुम जानी मैं आपन कीन्हा । पुरुष नामते नहिं चित दीन्हा ॥
अलख निरञ्जन देवी राता । विधि हरिहर कहै करिहैं बाता ॥
महा प्रलय आवैं जेहि बारा । तब जरबर होई है सब छारा ॥
तीन लोक परलय तर जाई । तब तुम आद्या कहाँ रहाई ॥
उनसे तू कर कौन गुमाना । जाकर चले जगतमैं पाना ॥
आदि पुरुष तुमरो है ताता । आद्या भयो निरञ्जन भ्राता ॥
ताहि तातको छोड़ेउ संगा । भ्राता जार कीन्ह अरधङ्गा ॥
ताहि रङ्गत गयी भुलाई । छोड़यो पुरुष जार मन लाई ॥
निशिवासर कीन्ह्यो यह नेहा । कामरूप कामिनि मत येहा ॥
तुच्छ बद्धि नारी तुम बाना । यही चाल जगनारि समाना ॥

देवी वचन

यह सुनि माया बहुत लजाई । धरि सिंहासन तब बँठाई ॥
बचन हमार सुनो शठिहारा । नाम जपे सो हंस उबारा ॥
हमतो पुत्री पुरुष की आहू । शब्द डोरि हंसन ले जाहू ॥
जो कोई नाम तुम्हार सुनाई । शीश हमार पावैं दे जाई ॥
चौसठ युग हम सेवा कीन्हा । पृथिवी बखश मोहि प्रभु दीन्हा ॥
तीन लोक मैं मर्दो माना । किमि हंसा कर लोक पयाना ॥

कमालजी

शठिहार वचन

कह शठिहार सुनो तुम वाता । सकल जीव तुम कीन्हो घाता ॥
जो कोई जीव हमारा होई । ताके निकट जाहु जिन कोई ॥
जा घट शब्द हमार समावे । ताघट काल निकट नहिं आवे ॥

देवी वचन

तात वचन लीन्हे शठिहारा । को मेटे यह वचन अपारा ॥
हट करि वचन मेटि में डारा । तो हम होब लोकसे न्यारा ॥
जीव जो पुरुष नाम ते राता । ताहि हंस नहिं बोलब वाता ॥
एक तुम्हार पान जो पाई । देवी देव देख शिर नाई ॥
भीतर करनी बहुत गुमाना । ताकर जीव करब हम हाना ॥
गुरुसे मन चित अन्तर राखा । साधु सन्तसे डुरमति भाखा ॥
सो जिव हमरे खपर पराई । बार बार चौरासी जाई ॥
नाम तुम्हार कोई नहिं जाना । सकल जीव हमही लपटाना ॥
मुक्ति युक्ति सब भाखत प्रानी । मुक्ति नाम परवाना जानी ॥
मो कहैं और न जानौ दूजा । निशिदिनहम चित तुम्हरो पूजा ॥
सार नाम जिन पाय तुम्हारा । सो तो पहुँच पुरुष दरबारा ॥
ताहि जीव हम रोकब सोई । द्रोही पुरुष केर जो होई ॥

शठिहार वचन

विश्वायुग यह चरचा कीन्हा । पान रतन जीवन को दीन्हा ॥
तुरी बराबर नरियर जाना । चार हाथ लम्बा रह पाना ॥
दुई हाथकी रही चकराई । ऐसे युग हम पान चलाई ॥
बीस लाख युग अयुरबलभाखा । वर्ष सहस्र मानुष तन राखा ॥
अरसठ हाथ ऊँचाई होई । ऐसे नर सकलो तब सोई ॥
सात सहस्र पाये जिव दाना । सत्य शब्द निश्चय कर माना ॥
पुरुष दरश ते जिवन कराई । देवी वचन कहा समुझाई ॥

छन्द— यह चरित्र कर शठिहार तत छिन, पुरुषको दर्शन लहे ।

कीन्ह माया वाद बहु विधि, चरण तुम निश्चय गहे ॥

विश्वयुगमें जाइके हम, हंस कीन्ह उबार हो ।

जीव सातसहस्र खाय बीडा, आय लोक मँझार हो ॥

इस ऊपरके कहे प्रकरणसे पाठक महोदयोंको यह बात सुतरां विदित होगई होगी कि, कबीर साहिबने प्रकृतिपर किस प्रकार विजय पाई थी ? अब

जगत्के अभिमानो यानी निरंजन पर किस प्रकार उन्होंने विजयडंका बजाया
था यही बात अब यहां विस्तारके साथ लिखते हैं —

निरञ्जन गोष्ठाका संक्षेप

चौ०—अलख निरंजन निर्गुण राई । तीन लोक जिहिं फिरी दुह्राई ॥
सातद्वीप पृथिवी नौ खण्डा । सप्त पताल इकीस ब्रह्मण्डा ॥
सहज शून्यमें कीन्ह ठिकाना । कालनिरंजन सबने माना ॥
ब्रह्मा विष्णु और सब देवा । सब मिलि करें कालकी सेवा ॥
चित्र गुप्त धर्म बरियारा । लिखनी लिखे सकल संसारा ॥
लख चौरासी चारों खानी । लिखनी लिखें सकल सब जानी ॥
पशु पंछी जल थल बिस्तारा । बन पर्वत जल जीव बिचारा ॥
काल निरञ्जन सबपर छाया । पुरुष नामको चिन्ह मिटाया ॥
सत्तर युग ऐसे चल गयऊ । पुरुष संदेश सूचित तेहि दियऊ ॥

पुरुष वचन

तबहीं पुरुष ज्ञानीसे कहेऊ । धर्मराय अति परबल भयऊ ॥
यह तो अंश भया बरियारा । तीन लोक जिव करे अहारा ॥
ताहि गारिके देहु ढह्राई । जगजीवन कहैं लेहु छुड़ाई ॥

ज्ञानी वचन

साखी—करि प्रणाम ज्ञानी चले, करत हंसको काज ।
जो वह काल न मानि है, तुमहिं पुरुषको लाज ॥

चौ०—मानसरोवर जब ज्ञानी आये । काल निकट तब छेंके धाये ॥
काल कठिन गरजै बहुबारा । मस्तक साठ सुण्ड बरियारा ॥
सत्तर योजना गरजै दन्ता । परलय कीन्हें कोटि अनन्ता ॥
कान जो एक आँख चौरासी । और मुख आठहाथ लियफाँसी ॥
छत्तिस नाभि ताहि पुनि जाने । बोले वचन बहुत इतराने ॥
तीन दन्त पाछे कहैं फेरी । यहि विधि तीन लोक करजेरी ॥
एक दन्त पाताल चलावा । तहाँ जाय वासुकि कहैं खावा ॥
दूजो दन्त पृथ्वी चल आई । देव ऋषी जग देत सुखाई ॥
तीजा दन्त गयो आकाशा । चाँद सूर्य खायो कैलाशा ॥
वेद पढत ब्रह्मा तेहि ठाई । ध्यान करत शङ्कर तब खाई ॥
लीन्हयो खाय विष्णुको धाई । सकल खाय पुनि धूल उड़ाई ॥
गरजै दन्त अग्नि सम थाई । तीन लोक खाये दुनियाई ॥

गरीब दास

ज्ञानी देखा दृष्टि पसारी । यहि ते नहीं बचे संसारी ॥
ज्ञानी बोले शब्द परचाई । तुही काल खाये दुनियाई ॥

निरञ्जन बचन

साखी—जाव ज्ञानी घर आपने, मानो बचन हमार ।
तीन लोक मोहि पुरुष दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥

ज्ञानी बचन

चौ०—ज्ञानी बोले शब्द अपारा । मोकहैं पुरुष दीन टकसारा ॥

साखी—हम पठये हैं पुरुष को, करें हंसको काज ।

काल मारि संधार हूँ, दीन सकल मोहि राज ॥

चौ०—मारूँ काल शब्दके झारा । टूटै दन्त कबीर पसारा ॥

निरञ्जन बचन

तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छोड़ाये ज्ञानी ॥

जगके माँहि कीन हम बासा । पशु पछी सबमें मम आसा ॥

तीनसो साठ पेट हम लाई । ताते सकल सृष्टि अरुझाई ॥

जेहि दिनते सो पेट लगाई । दिनदिन अरुझे सरुझि नहिं जाई ॥

तापर काम क्रोध हम डारा । तृष्णा सकल जीव हम मारा ॥

इनमें जीव बँधे सब झारी । कैसे हँसने लेहु उबारी ॥

ता ऊपर कीन्हचों यक काजा । पुण्य पाप हम थापै राजा ॥

शुभ अरु अशुभ दोइ दलसाजा । ऐसै अलख निरञ्जन राजा ॥

ज्ञानी बचन

सत्य शब्द हम बोलें बानी । बचन हमार छूटिहैं प्रानी ॥

गहे शब्द मम मन चित लाई । भजे काल जिव लेब बचाई ॥

काल बचन ।

तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥

तीनसौ साठ क्षेत्र अरुझाई । कैसे जीव लेहो मुकताई ॥

गङ्गा यमुना सरस्वती जानी । पुष्कर गोदावरि छौछक्का मानी ॥

बदरी केदार द्वारिका ठयऊ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लयऊ ॥

मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगरनाथ बैठे यमध्यानी ॥

सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आहि यमथाना ॥

हिङ्गलाज जैसे जिव सोई । कालिका नगरकोटमें होई ॥

गढ़ गिरिनार दत्तको थाना । ताहि घेर यम बैठ निदाना ॥

कमरू मांहि कमक्षा जानी । नीमक्षार मिश्री यम खानी ॥
नगर अयोध्या राम हैं राजा । कहहि दैतें बांधे सब साजा ॥
यही पैठ जग जीव भुलाई । केहि विधि जीव लेहु मुक्ताई ॥

ज्ञानी वचन

तब ज्ञानी बोले अस बानी । यमते जीव छोड़ैहौं आनी ॥
पुरुष नाम कहूँ समझाई । यम राजा तब छोड़ि पराई ॥
घाट बाट बैठे अरु झेरा । हमरे शब्दते होय निबेरा ॥
सुनुरे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सन्धि हंसा घर जाई ॥

निरञ्जन वचन

केहि ज्ञानी देहु अधिकारा । हमसे नहि छूटे यम जारा ॥
पाँच पचीस तीन गुण आई । पहले सकल शरीर बनाई ॥
तामें पाप पुण्यका बासा । मन बैठे ले हमरो फाँसा ॥
जहाँ तहाँ सब जग भरमावे । ज्ञान सन्धि कछु रहन न पावे ॥
एक शब्दके केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फाँसा ॥

ज्ञानी वचन

बोले ज्ञानी वचन विचारी । छूटे चौरासीकी धारी ॥
छूटे पाँच तीस गुण तीनी । ऐसो शब्द पुरुष मोहि दीनी ॥

निरञ्जन वचन

हो ज्ञानी क्या करो बड़ाई । हमते नहीं छूटि जिव जाई ॥
इतने युग हम तुम नहि पेखा । ज्ञानी हंस न एको देखा ॥
क्या तुम करो क्या शब्द तुम्हारा । तीनलोक परलय करि डारा ॥
साधु सन्त हम देखा रीता । परलय परे सकल जग जीता ॥
करम रेख बांधे सब साधू । सुरनर मुनी सकल जग बाँधू ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं काल अन्याई । शब्द बिना तैं खाइ चबाई ॥
अब कैसे कहिये बटमारा । पुरुष शब्द दीना टकसारा ॥
जग जीवनको लेउँ उवारी । करम रेख तोरौं धरि न्यारी ॥
तीन सौ पाँच और गुण तीनी । तेहिंते हंसा लेइहौं छीनी ॥
पाँच जनैकी मेटूं आसा । पुरुष शब्द भाषूं विश्वासा ॥
शुभ अरु अशुभको करूँ निबेरा । मेटूं काल सकल अरुझेरा ॥

निरञ्जन वचन

निर्गुन काल तो बोले बानी । अरुझे जीव सकल यमखानी ॥
कैसेके तुम शब्द पसारो । कौन विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल है धरनी । कैसे पहुँचे पुरुषकी शरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकारा । कैसे पहुँचे पुरुष दुवारा ॥
क्रोधी जीव प्रीति अभिमानी । धरे सो जन्म नरककी खानी ॥
लोभी होय सर्व विकारा । माटी भस्ने जीव अधिकारा ॥
लोभी जन्म शूकर औतारा । कैसे पावे मुक्ती द्वारा ॥
विषया विष सब विषकी खानी । यह सब है जनमकी सहिदानी ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं सुनो बरियारा । हमतो कीन सकल निर्धारि ॥
जो कोइ प्राणी होय हमारा । काम क्रोधते रहे निनारा ॥
तृष्णा लोभ सब देइ बहाई । विषय जन्म तब दूर पराई ॥
उनको ध्यान शब्द अधिकारा । काम क्रोध सब होत निनारा ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत यम करे बडाई ॥
उनपर यमकी परे न छाहीं । ताते हंस लोकको जाहीं ॥

निरञ्जन वचन

कहैं निरञ्जन सुनोहो ज्ञानी । कथिहौं ज्ञान तुम्हारी बानी ॥
जगत महात्म सबै बताई । नाम तुम्हारे पन्थ चलाई ॥
जगके जीव सभी भरमाऊँ । ज्ञानवन्तको करम दूढाऊँ ॥
मारि जीवको करूँ अहारा । कथूँ ज्ञान तुम्हरे टकसारा ॥
ज्ञान हमार रहे तन छाई । ते सब जीव काल धरि खाई ॥
कैसे जैहैं लोक तुम्हारे । ज्ञान सन्धिमें मूँदूँ द्वारे ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी कहैं सुनौ बरियारा । हमरे हंस होई हैं न्यारा ॥
नाम जपै औ सुरति लगाई । मैल करम लागे नहिं भाई ॥

निरञ्जन वचन

ज्ञानी मोरा पिरियल ज्ञाना । वेद कितेब भरम हम साना ॥
यह विधि जगके जीव भुलाई । जरा मरण सब वन्द्य बँधाई ॥
सूतक पातक वेद विचारा । पूछे वेद तब करैं सँभारा ॥
एकादशी मुक्तिकी माई । यो युक्ति करिबे अधिकाई ॥

ज्ञानी बचन

सुनुहो काल ज्ञानकी सन्धी । छोडे जीव सकलकी फन्दी ॥
जब निज हंसा बीरा पावै । योग युक्ति तब सबै नसावै ॥
वेद कितेबकी छोडो आशा । हंसा करें शब्द विश्वासा ॥
योग यज्ञ तप होईहै छारा । अमृत नाम सदा रखवारा ॥
शब्द हमारे छूटे फन्दा । पहुँचे लोक मिटे यम द्वन्दा ॥
आवागमन बहुरि ना होई । काल फन्द तजि न्यारा सोई ॥

निरञ्जन बचन

ज्ञानी कहो मर्म सोई भाई । मेरो फन्द तोरको जाई ॥
कर्म जञ्जीर धांबि संसारा । योनी हम जञ्जाल पसारा ॥
तीन लोक योनी उत्तरि हैं । आवागमन फेरि फिरि परि हैं ॥
सिद्ध साधु और बड बड ज्ञानी । बाँधि बाँधि कीन्हा पिसमानी ॥
कर्म रेखते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥

ज्ञानी बचन

ज्ञानी कहें सुनु काल पसारा । करिहैं दूर जञ्जीर तुम्हारा ॥
हंसन लेइहैं तुरत उबारी । पुरुष शब्द दीना मोहिं मारी ॥
खण्ड खण्ड तोरूँ तोरवाना । मारूँ काल करूँ पिसमाना ॥
पुरुष अंश नौतम है अंशा । तेजमें प्रकट कहावै वंशा ॥
तिन्हके शरण हंस जो जाई । काटि कर्म सब देहिं बहाई ॥

निरञ्जन बचन

मान्यो ज्ञानी बचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुरुष घरबारा ॥
चौदह काल काल यम मेरा । घाट वाट घेरें सब घेरा ॥
सुरनर मुनि आवें वहि घाटा । दश औतार जाँय वहि वाटा ॥
दुष्ट जगाती बड सरदारा । विना जगात न होइ कोई पारा ॥
भव जल नदी घाट नहिं थाहूँ । उत्तरन काज किये सब काहूँ ॥

ज्ञानी बचन

वंश छाप जो पावें प्राणी । ताको नहिं रोके दूग दानी ॥
शब्द सार दे हंस बहोरी । तेहि चढ़ि जाय काल मुख तोरी ॥

निरञ्जन बचन

हो ज्ञानी क्या करो बडाई । तमके काल निरञ्जन राई ॥
पौंव पताल शीश आकाशा । सोलह योजन अग्नि प्रकाशा ॥

नौबाब विजलीखां, रविदास

गरजै काल महा विकरारा । सत्रह लक्षलों पाँव पसारा ॥
लपक जीभ यम टूटे तारा । यह बिजली चमकै अधिकारा ॥
ओंठ भयावन दन्त अतिबाढा । मध्य घेर ज्ञानीको डाढा ॥
हमरो पौरुख हम बरियारा । तुम ज्ञानी क्या करो हमारा ॥

ज्ञानी बचन

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा । पकडे दन्त मुण्ड घुमेरा ॥
मान्यो शब्द पाय कर पेले । तोन्यो सुण्ड समुन्दर मेले ॥
पुरुष स्वरूप तबहीं पुनि धारा । योनि स्वरूप काल औतारा ॥

निरञ्जन बचन

भया अधीन काल करचोरी । तुम सत्पुरुष हम अंश तुम्हारी ॥
तुमसे बाल बुद्धि हम धारा । तुम जीवनके तारन हारा ॥
तुम सत्पुरुष दीन्ह मोहि राजू । अरु मोहि दीन्ह सकल सुख साजू ॥
अब लगि साहब हम नहि चीन्हां । सत्यपुरुष तुम दर्शन दीन्हा ॥
दोउ कर जोरि चरणचित लावा । धन्य भाग्य हम दर्शन पावा ॥
अब मोहि साहब देव बताई । पाऊं चिह्न वंश मुकताई ॥

ज्ञानी बचन

साखी—जो निज मेरा पाइ है, आवे लोक हमार ।
ताको खूट तु मत गहो, सुनो काल बट मार ॥

निरञ्जन बचन

चौ०—हे साहब एक विनती मोरा । वेंरा पायकरहु कछु औरा ॥
ज्ञान कथे अन्ते चित सासा । आवागमनको राख्यो आसा ॥

ज्ञानी बचन

सुनो निरञ्जन बचन हमारा । नहीं हंस वह जीव तुम्हारा ॥

काल बचन

कहे काल तुम भली निकारी । सन्धि देख हम क्रोध उतारी ॥
कीन्ह दण्डवत् और प्रणामा । सुन्न शिखर कीन्ह्यो विश्रामा ॥

ज्ञानी बचन

धर्मदास तब मनमें आई । गाहुर देशमें धारा पाई ॥
सतयुग सत्यनाम मम नाऊ । देही धरि मैं मनुष कहाऊँ ॥
प्रथमैं सतयुग लागा भाई । नूप हीचन्द दे तहाँको राई ॥
तहँवा जाय शब्द गोहराई । जो चीन्हें तेहि लोक पठाई ॥

इससे पाठकोंको अच्छी तरह मालूम हो गया होगा कि, सत्य पुरुष ही कबीर हैं । सद्गुरुके मुखसे निकले हुए वाक्योंको अच्छी तरह समझो उसके बिना दूसरा कोई भी उसे परास्त नहीं कर सकता ।

यहाँपर इस विषयके लिखनेसे मेरा यही अभिप्राय है कि, पाठकगणोंको विदित हो कि, यह वही कबीर साहब हैं जिनके सम्मुख निरञ्जन तथा आद्याका गर्व चूर्ण हो गया । फिर दूसरा कौन है एवं उसमें क्या सामर्थ्य तथा बल है जो इनकी समता कर सकता है, इस कबीरके सम्मुख किसका गर्व रह सकता है, ये दोनों बड़े बलिष्ठ तथा प्रभावशाली थे परन्तु कबीर साहबके चरणोंपर गिरकर आधीन हुए । ऐसे कबीर साहबको जो "मनुष्य" जाने यह उसकी भूल है क्योंकि वे मनुष्य नहीं हैं । सत्यपुरुष हैं स्वयम् मालिक धनी हैं । यह अन्धा जीव उनको पहचानता नहीं, इसी कारण भवसागरमें पड़कर गोते खाया करता है । जो मनुष्य होगा वह अवश्यही विचार करेगा कि, आद्या तथा निरञ्जन जैसे सर्वशक्तिमान् संसारके सिर्जनहार जिसके चरणोंपर गिरकर नम्रता करें वह "मनुष्य" कैसे ठहर सकता है ? वह तो निस्संदेह स्वयम् सत्यपुरुषका प्यारा भक्त है जिसे सत्य-पुरुषने अपनी समता दे रखी है; दूसरा कोई नहीं है ।

वेही कबीर साहब पृथिवीपर आकर मनुष्योंको उपदेश करते हैं । फिर जो कोई उससे विमुख हुआ उसका कहाँ ठिकाना रहा ? वह निश्चयही आद्या तथा निरञ्जनके आधीन होगा । जो स्वयम् विमुख होगा उसका तो यह दण्ड है । जो स्वयम् विमुख नहीं है पीछेसे उसके अनुयायीही विमुख हुए हैं तो वे आचार्य्य निपराध ठहरेंगे, केवल उनके अनुयायीही दण्ड पावेंगे । इस लिये उन्हें भी भिन्न पन्थमें रहकर भी सच्चे गुरुकी भवितसे विमुख न होना चाहिये । नाम मालामें भी यही विषय आया है उसको भी यहीं उद्धृत करते हैं —

नाममालाका संक्षेप

कबीर-कथा रसाल' कहीं कछु वाणी । जो बूझे सोई ब्रह्मज्ञानी ॥
यह गुरु गम' सन्त कोई लेखे । प्रकट ज्ञान तब तत्त्व परेखे' ॥
अनुभवादि कछु कहूं वखानी* । सुनिये सद्गुरु गमकी' वाणी ॥
अनन्त कोटि युग एक चलि गयेऊ । अचल अमान' तत्त्वमें रहेऊ ॥
साठ कोटि युग और जो बीता । सृष्टि करन तब इच्छा कीता* ॥
वह तो पुरुष अचल बेअन्ता । बिन गुरु दया न भज भगवन्ता ॥
कोटि कथै कछु कथन न पावै । जब लगि नहिं गुरु गम वतलावै ॥

साखी पद कोटिन बहु वाणी । पुरुष एकको सुमिरौ प्राणी ॥
ज्ञान सुरति औ शब्द अपारा । यह सब दिया तब किया पसारा ।
अचल पुरुष सुमिरे जो कोई । जीवितमुक्ति^१^ तासुकी होई ॥
साखी पद बोले बहु वाणी । आदिनाम कोई विरला जानी ॥

साखी—कहैं कबीर निज नाम विनु, मिथ्या जन्म गवौंय ।

निर्भय मुक्ति निःअक्षर^२^, गुरु विनु कबहुँ न पाय ॥

चौ०—अगम अगोचर अति व्यवहारा । कहन सुननसे होवैं पारा ।

यह धन राखि जीवकी नौई । करो बणिज टोटा कछु नाहीं ॥

यह पूँजी है अगम अपारा । खरचै खाय बडे विस्तारा ॥

यह धन मिले जब भाग बडेरा । धन सञ्चित गाँहक भितेरा ॥

साखी—पूँजी मेरा नाम है, जाते सदा निहाल ।

कहैं कबीर जो पुरुष बल, चोरी करै न काल ॥

चौ०—जो जो जिव निज नामहि जाना । भये मुक्त सो पुरुष समाना ॥

सोई जीव हंसका लेखा । अक्षर में निःअक्षर देखा ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मदास दास के दासा । सद्गुरु मेटो मेरी आसा ॥

नाम निःअक्षर केहि उत्पाना^४^ । अकथ कथा तब कैसै जाना ॥

सत्यगुरु वचन

कह कबीर सुन धर्मनि बानी । अकथ कथा तोहि कहूँ बखानी ॥

तब नहि लोक वेद वस्तारा । तब नहि कूरम नहि संसारा ॥

नहि तब धरणी अमर सुमेरु । नहि तब हते जो इन्द्र कुबेरु ॥

तब नहि सृष्टी सकल पसारा । आप आप थे अकह निनारा ॥

सकल सृष्टि उत्पति कछु नाहीं । तब सब रहे अकहके माहीं ॥

होते आप तब शब्द न सवाला । इच्छा भई तब कीन्ह उँजाला^५^ ॥

इच्छाते अनहद^६^ धुनि बानी । सुरति सम्हार सृष्टि उत्पानी ॥

इच्छा अनुभव शब्द उपाना । सुरति^७^ निरति ता मांहि समाना ॥

तबते अच्छर भेद बिचारा । साखी शब्द कीन संसारा ॥

अकह अचल पुरुष तेहि आपू । नहीं तहां दुःख सन्तापू ॥

सबका मूल वाहि सो लागा । उलटसमाय होई बड़ भागा ॥

निर्भय हो सो करे गुरवाई । गुप्त मता में कहूँ समझाई ॥

१ जीवनमुक्ति, २ रामनाम, ३ अक्षर रहित, ४ उत्पन्न किया, ५ प्रकाश, ६ पराध्वनि या दशमध्वनि, ७ अजपा जापभी ।

साखी-सुरति निरति ले खेलई, रहि सूरति लवलीन ।
कहैं कबीर ते सुरतिसे, निश्चय पुरुषहि चीन्ह ॥
सुरति सँभारे काज है, राखो सुरति सँभार ।
सुरति सँभारे मुक्ति है, जाय पुरुष दरबार ॥
जाके दिल अनुराग' है, पावेगा जन सोय ॥
बिन अनुराग न पावई, कोटि करे जो कोय ॥
बल मेरे यक नामके, सात द्वीप नौखण्ड ॥
यम डरपै भय मानै, गाजि रहा ब्रह्मण्ड ॥

चौ०- सार शब्द जब आवे हाथा । सकल काल तब नावै माथा ॥
नाम अमर मलयागिरि भाई । पीयत विष अमृत होइ जाई ॥
निसि दिन रह मलयागिरिसंगा । विष नहिं लागे तिनके अङ्गा ॥
साखी-काल फिरै सर साधिकै, करमें गहे कमान ॥
कहैं कबीर निज नाम गहि, छोड मान अपमान ॥

चौ०- कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । शब्द बाण है हमरे पास ॥
काहि डरो डर देहैं छुड़ाई । काल डरे सुनि नाम दुहाई ॥
जब हम रहे अकहके माहीं । केहि बोधौ दूसर कोई नाहीं ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । होहु निशङ्क मेटि यम आसा ॥
भयो परकाश गुरु भेद बतावा । जीव बोधिके लोक पठावा ॥
जबते अमर पुरुषको चीन्हा । तबते काल भयो आधीना ॥
साखी-राह पाय जनि, छाडहू, काल रहा शर सांधि ॥

सुरति सँभारे चेतहू, परे न यमका बाध ॥
आदि नाम निज पु रुषको, सुनत तजै अभिमान ॥
कहैं कबीर सुन सन्तहो, तजो नरककी खान ॥

चौ०- कासे कहूँ कहा नहिं जाहीं । मेरी गति' कोई चीन्हत नाहीं ॥
यहां वहां पावैं दोउ ठाऊँ । सत्य कबीर कलिमें मोर नाऊँ ॥
जो था तब कलिमें हम सोई । नाम धरैं भूलै नर लोई ॥

साखी-कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय ।
आदि नाम जपि गुप्तही, बूझै बिरला कोय ॥

चौ०- मुक्ति न होवै नाचे गाये । मुक्ति न होवै मूदङ्ग बजाये ॥
मुक्ति न होवे साखि पद बोले । मुक्ति न होये तीरथ डोले ॥

गुप्त जाप जानें जब कोई । कहैं कबीर मुक्ति भल होई ॥
कथा कीरतन गदगद वाणी । मुक्ति न होय बिना सहिदानी ॥
केता कहूँ कहा नहि जाई । नाम गहे सो पुरुष मिलाई ॥
सार शब्द परवाना दइहैं । जीव छोडाय कालते लइहैं ॥

साखी—जैसे फण पति मंत्र लखि, फणको रहे सकोरि ।

तैसे नाम कबीर लखि, काल रहे मुख मोरि ॥

जो जन होइहैं जौहरी, सो धन लेई बिलगाय ॥

सोहं सोहं जपि मुये, मिथ्या जन्म गँवाय ॥

साखी पद संसारमें कहन सुननको दीन ।

जाको चीठी मूलकी, सोले साधन कीन ॥

चौ०—कोटि यतन कर जिव समझावे । भाग बिना सो नाम न पावे ॥

गुरुकी सन्धि सन्त तेहि पासा । सो नहि परे कालके फाँसा ॥

आदि पुरुष अपना कर जाना । सोई भक्ति अन्तरगत ठाना ॥

तुमको दीनी भगति अपारा । नाम अजर तुम जपो हमारा ॥

जो नहि बूझे कहा न करई । मुक्ति न होय नरकमें परई ॥

श्रवणनमें कह दीन्हा नाऊँ । ताहि बोलहू अपने ठाऊँ ॥

नाम सुनै औ मोंको जाने । यमराजा तेहि देखि डेराने ॥

मेरो नाम अमर है भारी । ताहि नामको राखु सँभारी ॥

तजि अभिमान मिलै जो आई । ताको दीजै नाम दूढाई ॥

सब तजि रहनि रहे ठहराई । और तजे सब लोक बढाई ॥

ताको दीजे वस्तु अपारा । कह कबीर सुनु शब्द हमारा ॥

गलित गरीबी रहन सम्हारे । तन धन मन सन्तनपर वारे ॥

लोक लाज कुल तेज बढाई । तब पग परस भरम मिटि जाई ॥

बिन विश्वासन भगति प्रकासा । प्रीति बिना नहि दुबिया नासा ॥

गुरुते शिष्य करे चतुराई । सेवाहीन नरकमें जाई ॥

वारै तन मन औ धन धाना । सोई सन्त मेरे मन माना ॥

कहैं लगि कहूँ वार नहि पारा । नाम गहे सो सन्त हमारा ॥

आदि नाम है शरकी गौसी । लागै बान पडा रह जासी ॥

जब लगि भक्ति अङ्ग नहि आवै । सार शब्दसो कैसे पावै ॥

सत्यनाम श्रवन धुनि होखे । जो मतवाला ताको पोखे ॥

साखी—सुरति समावे नाममें, जगते रहे उद्दास ॥

कहैं कबीर गुरुचरण (में), दूढ राखै विश्वास ॥

चौ०—जगमें जेते हैं विश्वासी । माया आहि ताहिकी दासी ॥

जाके दिल विश्वास न आवे । भक्ति अङ्ग सो कैसे पावे ॥

जो जिव मायासे मन लावे । गहे काल मुख बात न आवे ॥

साखी—गुरुकी, शब्द साधुकी पूंजी, वनिज करे जो कोय ॥

कहैं कबीर सवाई बढे, हानि कबहुँ ना होय ॥

चौ०—जाको है गुरुको विश्वासा । निश्चय जाय पुरुषके पास ॥

कहैं कबीर मिलै विश्वासी । बिन विश्वास है यमकी फांसी ॥

सोहं कोहं आये संदेशा । सो गुरु दीन्हो मोहिं उपदेशा ॥

ताको मर्म जान जो पावे । सो तो नहिं भवसागर आवे ॥

गुरुको शब्द जीव दूढ धरई । सोई सन्त भवसागर तरई ॥

होई न दास धरै अभिमाना । ताहि न दीजै अनुभव ज्ञान ॥

नाम मालमें परिचय आने । सकल सन्तमें सद्गुरु जाने ॥

साखी—पुरुष सबनते न्यार है, और सबनके माहिं ।

ज्ञान दृष्टि करि देखहूँ, साखी पदमें नाहि ॥

साखी पदमें सो पढें, पुरुष बसे तेहि पार ॥

पोथी वाणी भेष बहु, सो सबहिन ते न्यार ॥

गुरु पूरा सुख शूरा, बाग मोडि रण पैठ ।

सत्य सुकृतको चीन्हके, एक तख्त चढ़ि बैठ ॥

सुकृतआदिभेदसे ग्रन्थ ।

चौ०—चले ज्ञानी समरथ शिर नाये । मकर तार होय तिरबेनी आये ॥

जहाँ काल बैठा अन्याई । ज्ञानी बेगि तहाँ चलि आई ॥

देखि काल बहुतै दुख पावा । उठि ज्ञानीके सन्मुख धावा ॥

कौन अंश तुमहो बटपारा । हमरे झांझरिमें पग धारा ॥

ज्ञानी वचन

कहैं ज्ञानी जनि जाव भुलाई । सोहं पुरुष सन्धि हम लाई ॥

समरथ हुकुम मान तुम भाई । नहिं तो बांध तोहिं ले जाई ॥

अब जनि भूलो मूर्ख गँवारा । छिनमें करूँ तोर संहारा ॥

यह सुनि काल उठा रिसियाई । विकल रूप होइ सन्मुखधार्ई ॥

बारह बाण काल ले आई । ज्ञानी शब्दसे लीन्ह बचाई ॥

रहन-सहन

ज्ञानी विषहर वान सँभारा । तबहीं मौझ झँझरी मारा ॥

झँझरी फूट चूर हो जाई । तबहिँ काल उठि चला पराई ॥

कबीर साहब झँझरी द्वीपको गये और कालपुरुषको तीन लोककी सेवा प्रदान की । पर जब वह अभिमानी होकर आज्ञा न मानने लगा तो सत्यगुरुने उसको मारकर पातालको भगा दिया । इसके पीछे उसकी नम्रता विनयकी ओर देखा तो फिर उसको राज्य प्रदान कर दिया ।

अब यहां सोचने और समझनेकी बात है कि, जिसके आज्ञाकारी सेवक आज्ञा तथा निरंजन ठहरे वह कैसे “मनुष्य” हो सकता है ? बही कबीर सर्व शक्तिमान् सबका शासक है । अनन्त ब्रह्माण्ड उसके शासनमें हैं । यह स्वसंवेदका वचन है और स्वसंवेदके जाननेवाले सब ऋषीश्वर इस बातमें सहमत होते चले आये हैं । जिन पर सत्यगुरुकी पूरी कृपा हुई है उन सबका एकही कथन है जब तक यह विश्वास भलीभाँति मनमें स्थान न पाजाय तबतक मनुष्यकी मुक्तिमें सन्देह रहेगा, कबीर साहिब बराबर कहते चले आ रहे हैं कि, मैं प्रकृति तथा अखिल ब्रह्माण्डोंके अभिमानियोंका विजेता हूँ, मेरा उपदेश मानकर अपना कल्याण करलौ ।

शरण

यह शब्द संस्कृतका है । इसका हिन्दी और संस्कृत दोनोंमें समभावसे प्रयोग होता है । कहीं २ इसका ‘सरन’ अपभ्रंश करके भी प्रयोग करते हैं । संस्कृत के व्याकरणके अनुसार ‘शू’ से ल्युट् प्रत्यय करनेसे उक्त शब्द बनता है जिसका रक्षक अर्थ होता है । वह भी ऐसा कि जिसकी रक्षाकी जानेवाली है वो सिवा उसके अपना दूसरा कुछ उपाय ही नहीं समझता । इसे सभी संप्रदायोंने स्वीकार किया है । श्रीसंप्रदायके पल्लव इस कबीरपन्थने भी इसे मुख्य माना है । सिवा शरणा गतिके जीवके पास दूसरा कोई उपाय नहीं जिससे वो भवसागरसे त्राण पासके, इसी कारण कबीर साहिब सदासे यही कहते चले आरहे हैं कि, बिना शरण हुए कोई भी जीव, कालसे नहीं बच सकता पर कालने सबकी बुद्धि पर ताला लगा दिया है जिससे सत्यपुरुष की सच्ची सुरत नहीं लगा सकते, किसी कविने कहा है कि—

(नीम कीट जस नीमहि प्यारा । विषको अमृत कहे गमारा ॥

विशका कीड़ा विषमें ही राजी रहता है उसका वही जीवन है वो बिना विषके जिन्दा नहीं रहता । यही हिसाब जीवोंका भी है ।

साखी—कालको जीव माने नहीं, कोटि न कहूँ बुझाय ।

मैं खींची सत लोकको, बाँधा यमपुर जाय ॥

कबीर साहब हांक् मार मार कर कहते हैं कि, ऐ मनुष्यो ! तुम मेरी शरण में आओ और कहीं विश्वास नहीं है । सत्य कबीर वचन शरण अंगकी साखियों :-

साखी-धरमराय दरबारमें, देई कबीर तिलाक ।

भूले चूके हंसकी, मत कोई रोको चाक ॥

कबीर शरणमें आयके, कहा मुक्तिको रोय ।

प्रेम पिछोरे ओढ़के, सुख मन्दिरमें सोय ॥

बोले पुरुष कबीरसे, धरमराय कर जोर ।

तुम्हरे हंस न चम्पिहौं, दोहाई लाख कडोरा ॥

कबीर-जो जाकी शरणें गहे, ताको ताकी लाज ॥

उलट मीन जल चढ़त है, बह्यो जात गजराज ॥

इस प्रकार कबीर साहब बहुत कहते चले गये हैं और शरणागतका गुण बराबर प्रगट करते गये हैं धर्मरायसे प्रतिज्ञा हो चुकी है कि, जो मेरा नाम ले तुम उसको कदापि न रोकना । यदि रोकोगे तो दण्ड पाओगे । सुतरां ग्रन्थ अम्बुसागरमें लिखा है कि, कबीर पन्थियोंमेंसे कितनेही मनुष्योंने भूलसे पाप किया । उन पापोंके कारण उन्हें यमराजने पकड़ लिया परन्तु कबीर साहबने दूतोंको दण्ड दिया अपने हंसोंको छुड़ा लिया ।

शरणागतके धर्म

शरणागतका यही धर्म है कि, जो कोई जिसकी शरणमें हो उसके शरणके नियमोंपर पूर्ण रीतिसे चले । शरणके नियमोंमें तो पूर्णतया प्रेम आवश्यक है । जैसे मछली पानीसे इतना प्रेम करती है कि, पानीसे न्यारी होतेही मर जाती है । अपने प्यारके शरणको ऐसीही दृढ़तासे पकड़े कि, छूटने न पावे । केवल शरणका ही भरोसा रखे, दूसरी ओर तनिकभी ध्यान न दे । यदि कोई दूसरे प्रकार करे तो शरणागति छूट जायगी किसी देवी देवताकी ओर ध्यानही न दे, जबसे जीव सत्य गुरुकी शरणमें आवे तबसे कदापि दूसरी ओर न झुके । केवल सत्यगुरुकीही शरण द्वारा जीवकी मुक्ति होती है । धर्मदासजीने कबीर साहबसे पूछा कि, हे सत्य-गुरु ! मैं किसको जप कर पार उतरूँ ? तब कबीर साहब ने जोरसे पुकार कर कहा कि -

शरण मोर गहि उतरो पारा । बार बार मैं यही पुकारा ॥

मुखसे कहो कबीर कबीरू । तबही मिटै कालकी पीरू ॥

जो कोई सत्यगुरुके शरणमें है । वह उस प्रकार बिनती करे जैसा कि,