कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
४२८ कथासरित्सागर
४२८ कथासरित्सागर इति यावत्सुरपतिं ब्रवीति कमलासनः। तावत्प्रभासः प्रामुञ्चदस्त्रं पाशुपतं महत् ॥५४॥ तद्दृष्ट्वा सर्वसंहारि रौद्रमस्त्रं विजृम्भितम्। प्रमुक्तं हरिणा चक्रं सुतस्नेहात्सुदर्शनम् ॥५५॥ ततः सरूपयोरासीद्दिव्यास्त्रयोस्तयोः। अकाण्डविषमसंहारसंभ्रान्तभुवनत्रयम् ॥५६॥ अस्त्रं स्वं संहरैतस्त्वं यावत्स्वं संहराम्यहम्। इत्युक्तो हरिणा सोऽथ प्रभासः प्रत्युवाच तम् ॥५७॥ मुक्तमस्त्रं वृथा न स्यात्तत्प्रयातु पराङ्मुखः। दामोदरो रणं हित्वा ततोऽस्त्रं संहराम्यहम् ॥५८॥ इत्युक्ते तेन भगवानवादीत्तर्हि मानय। चक्रं त्वमपि मे मा भूद्वैफल्यमुभयोरपि ॥५९॥ एतच्छौरेर्वचः श्रुत्वा प्रभासः प्राह कालवित्। एवमस्तु रथं हन्तु मम चक्रमिदं तव ॥६०॥ तथेति हरिणा दामोदरे व्याव्रतिते रणात्। प्रभासः संजहारास्त्रं चक्रं चास्यापतद्रथे ॥६१॥ आरुह्यान्यं रथं सोऽथ ययौ सूर्यप्रभान्तिकम्। दामोदरोऽपि स प्रायाच्छ्रुतशर्म्मान्तिकं ततः ॥६२॥ तावच्च वासवांशात्वदृप्तस्य श्रुतशर्मणः। सूर्यप्रभस्य च द्वन्द्वयुद्धं काष्ठां परामगात् ॥६३॥ श्रुतशर्मा प्रयुङ्क्ते स्म यद्यदस्त्रं प्रयत्नतः। प्रत्यस्त्रं प्रतिहन्ति स्म तत्तत्सूर्यप्रभः क्षणात् ॥६४॥ माया या या च तेनात्र प्रयुक्ता श्रुतशर्मणा। सूर्यप्रभेण सा मास्य निहता प्रतिमायया ॥६५॥ ततो ब्रह्मास्त्रममुञ्चच्छ्रुतशर्मातिरोषतः। सूर्यप्रभाऽपि प्रामुञ्चदस्त्रं पाशुपतं हृदी ॥६६॥ तेन रौद्रमहास्त्रेण ब्रह्मास्त्रं प्रतिहत्य तत्। यापरन् दुष्प्रभावेण श्रुतशर्माभिभूयत ॥६७॥ तावदिन्द्रप्रभृतिभिर्देवासुर... गमनुतः। वज्रादीनि प्रयुक्तानि परमास्त्राण्यमर्षिभिः ॥६८॥
अष्टम लम्बक ४२९
अष्टम लम्बक ४२९ ब्रह्मा जबतक इन्द्र से इस प्रकार कह रहे थे तभी प्रभास ने महान् पाशुपतास्त्र चलाया ॥५४॥ सर्वसंहारकारी उस अस्त्र से भीषण संहार होते देखकर अपने अंश दामोदर के पुत्र स्नेह से विष्णु ने सुदर्शन चक्र चला दिया ॥५५॥ तब समान बलशाली उन दोनों दिव्यास्त्रों का सहसा विश्व के संहार का कारण तीनों लोकों को व्याकुल करनेवाला युद्ध होने लगा ॥५६॥ 'तुम अपने पाशुपत अस्त्र को हटा लो तो मैं भी अपने सुदर्शन चक्र को हटा लूँगा' विष्णु के इस प्रकार कहने पर प्रभास उनसे बोला—॥५७॥ मेरा चलाया हुआ अस्त्र व्यर्थ नहीं जायगा। दामोदर, युद्ध-भूमि छोड़कर हट जाय तो मैं अस्त्र-संहार कर सकता हूँ ॥५८॥ प्रभास के ऐसा कहने पर विष्णु ने कहा—'तो तुम भी मेरे चक्र की मान-रक्षा करो। जिससे दोनों निष्फल न हों' ॥५९॥ विष्णु का वचन सुनकर अवसर जाननेवाले प्रभास ने कहा—'ठीक है, आपका यह चक्र मेरे रथ को तोड़ दे' ॥६०॥ विष्णु भगवान् के स्वीकार करने पर दामोदर युद्ध-भूमि से लौट गया। फलतः प्रभास ने पाशुपतास्त्र को लौटा लिया और उसके रथ पर सुदर्शन चक्र गिरा ॥६१॥ तब प्रभास दूसरे रथ पर बैठकर सूर्यप्रभ के पास चला गया और उधर दामोदर भी श्रुतशर्मा के पास गया ॥६२॥ इसी बीच इन्द्र का अंश होने के कारण गर्वित श्रुतशर्मा का और सूर्यप्रभ का द्वन्द्व-युद्ध अत्यन्त भीषण अवस्था में पहुँच गया ॥६३॥ श्रुतशर्मा बड़े ही प्रयत्न से जिस अस्त्र का प्रयोग करता था सूर्यप्रभ उसी क्षण प्रति अस्त्र से उसका प्रतिकार कर देता था ॥६४॥ इसके अतिरिक्त श्रुतशर्मा ने जो-जो इन्द्रजाल की माया फैलाई, सूर्यप्रभ ने उस-उस को विरोधी माया से दूर कर दिया ॥६५॥ जब श्रुतशर्मा ने अत्यन्त क्रोध से सूर्यप्रभ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया तब सूर्यप्रभ ने भी पाशुपत अस्त्र का प्रयोग कर दिया ॥६६॥ पाशुपतास्त्र ने जब ब्रह्मास्त्र को दूर कर श्रुतशर्मा पर प्रभाव डाला तब इन्द्र आदि लोकपालों ने क्रोध करके चारों ओर से वज्र आदि अस्त्रों का सूर्यप्रभ पर प्रहार किया ॥६७-६८॥
सतु पाशुपतं तानि जित्वा सर्वायुधान्यपि। प्रज्वलन् सुतरामस्त्रं श्रुतशर्मजिघांसया ॥६९॥ ततः सूर्यप्रभं स्तुत्वा महास्त्रं तद्व्यविक्षिपत्। मा वधीः श्रुतशर्माणं बध्द्वा त्वं तं समर्पय ॥७०॥ ततः प्रसह्य निश्चेष्टः ससम्भ्रममवत्सुरैः। तज्जिगीषावधाच्चान्ये प्रेक्षकैरसुरैरपि ॥७१॥ तत्राथ वीरभद्राख्यः शम्भुना प्रेरितो गणः। आगत्यैव तदावेशमिन्द्रादिभ्योऽब्रवीदिदम् ॥७२॥ यूयं प्रेक्षितुमायातास्तद्रोधुं वः क्रमोऽत्र कः। मर्यादाभङ्गुतानाञ्चान्यदपि स्यादसञ्जसम् ॥७३॥ एतच्छ्रुत्वाब्रुवन्देवा हन्यन्ते न हताश्च नः। सर्वेषामत्र तनयास्तन्न युध्यामहे कथम् ॥७४॥ दुस्त्यजो हि सुतस्नेहस्तद्वशस्य प्रतिक्रिया। तन्निहन्तृषु कर्तव्या यथाशक्त्यत्र कोऽक्रमः ॥७५॥ इत्युक्तवत्सु देवेषु वीरभद्रे ततो गते। सुराणामसुराणां च प्रावर्त्तत महारथः ॥७६॥ सुनीथः सममश्विभ्यां प्रज्ञाचक्षुश्च सहेतुना। स्थिरबुद्धिश्च वसुभिः कालभद्रश्च वायुना ॥७७॥ प्रकम्प्योऽग्निना सिंहदंष्ट्रो निर्ऋतिना तथा। वरुणेन प्रधमनो धूमकेतुर्यमेन च ॥७८॥ महामायः स च तथा धनाधिपतिना सह। अयुध्यतास्त्रप्रत्यस्त्रैरन्योन्यैश्च समं सुरैः ॥७९॥ पर्यन्ते परमास्त्रं च यो यो यद्यत्सुरोऽक्षिपत्। तस्य तन्म हरस्तत्तदुङ्कारेण व्यनाशयत् ॥८०॥ धनदस्तूद्यतगदः साम्ना शर्वेण वारितः। भग्नास्त्राश्च सुरास्ते ते परित्यज्याहवं ययुः ॥८१॥ ततः सूर्यप्रभं शक्रः स्वयं क्रोधादयोधयत्। सरोषममुचत्तस्मिंस्तानि तान्यायुधानि च ॥८२॥ सूर्यप्रभश्च निर्धूय तदस्त्राण्यवहेलया। मार्जारिष्टनाराचैस्तेनेन्द्रमभ्यताडयत् ॥८३॥
अष्टम लम्बक ४३१
अष्टम लम्बक ४३१ किन्तु, जब पाशुपतास्त्र उन सब अस्त्रों को हटाकर धृतधर्मा को मारने के लिए प्रवृत्त हुआ तब सूर्यप्रभ ने उस अस्त्र की स्तुति करके उससे प्रार्थना की कि वह धृतधर्मा का वमन करे। उसे बाँधकर वह मुझे सौंप दे ॥६९-७०॥ यह देखकर सभी देवता क्रोध से युद्ध करने के लिए उद्यत हो गये और इधर उन्हें जीतने के लिए असुर भी तैयार हो गये ॥७१॥ उसी समय शंकर द्वारा प्रेरित वीरभद्र नामक गण उत्पन्न हुआ और उसने इन्द्र आदि देवताओं को शंकर की आज्ञा सुनाई—॥७२॥ 'तुमलोग युद्ध देखने के लिए आये हो तो युद्ध करने का यह कौन-सा तुक है। इस प्रकार, मर्यादा का भंग करने से और भी बुराई उत्पन्न होगी' ॥७३॥ यह सुनकर देवता कहने लगे कि 'इस युद्ध में हम सभी के पुत्र मारे गये और मारे जा रहे हैं। इसलिए, हमलोग क्यों न लड़ें ? ॥७४॥ पुत्र का स्नेह छोड़ा नहीं जा सकता। अतः मारनेवालों पर प्रतिक्रिया अवश्य ही करनी होगी। इसमें क्या बेतुकापन है ॥७५॥ देवताओं के इस प्रकार कहने पर और वीरभद्र के अन्तर्धान होने पर देवासुरों का भी भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ ॥७६॥ सुनीथ अश्विनीकुमारों के साथ प्रज्ञाढ्य चन्द्रमा के साथ स्थिरबुद्धि अष्ट वसुओं के साथ कालचक्र वायु के साथ प्रकम्पन अग्नि के साथ सिंहदंष्ट्र निर्ऋति के साथ प्रमथन वरुण के साथ धूमकेतु यम के साथ और महामाय धनाधिप कुबेर के साथ द्वन्द्व-युद्ध करने लगे। इसी प्रकार, अन्य असुर भी शस्त्रास्त्रों द्वारा देवताओं से युद्ध करने लगे ॥७७-७९॥ अन्त में देवता अपने जो-जो परम अस्त्र का प्रयोग करते थे शिवजी उस-उस अस्त्र को हुङ्कार मात्र से व्यर्थ कर देते थे ॥८०॥ गदा उठाये हुए अपने मित्र को शिव ने शान्तिपूर्वक मना किया। अस्त्रों के विफल हो जाने के कारण विवश देवता युद्ध से विरत हो गये ॥८१॥ तब इन्द्र क्रोध से भरकर स्वयं सूर्यप्रभ से युद्ध करने लगा और उस पर बाणों तथा अन्यान्य शस्त्रास्त्रों की वर्षा करने लगा ॥८२॥ सूर्यप्रभ ने उसकी शस्त्र-वर्षा को साधारण समझा और स्वयं शान्त रह खींचे हुए धनुष से इन्द्र को एक सौ बाणों से मारा ॥८३॥
ततः क्रुद्धः स कुलिशं जग्राह च सुराधिपः। हुङ्कारं चाकरोद्बुद्धः कुलिशं च ननाश तत् ॥८४॥ ततः पराङ्मुखे याते शक्रे नारायणः स्वयं । प्रभासं योधयामास क्रोधात्कोटीमुखैः शरैः ॥८५॥ अस्त्राण्यन्यानि चाप्यस्त्रैर्निष्कम्यो युयुधे समम्। हताश्वो विरथीभूतोऽप्यारुह्याग्यं रथं च सः ॥८६॥ तेन दैत्यारिणा सार्धं निर्विशेषमयुध्यत। ततः प्रकुपितो देवो ज्वलच्चक्रं मुमोच सः ॥८७॥ प्रभासोऽप्यभिमन्त्र्यैव दिव्यं खड्गं प्रमुक्तवान्। तयोरायुधयोर्युध्यमानयोर्वीक्ष्य धन्वराट् ॥८८॥ हीयमानं रणे खड्गं हुङ्कारं कृतवान्हरः। तेन ते खड्गचक्रे द्वे अन्तर्धानमुपेयतुः ॥८९॥ ततो ननन्दुरसुरा विषीदन्ति स्म चामराः। सूर्यप्रभे लब्धजये बद्धे च श्रुतशर्मणि ॥९०॥ संस्तुत्याराभयामासुरथ देवा वृषध्वजम्। ततस्तुष्टः सुरानिदमादिवेशाम्बिकापतिः ॥९१॥ सूर्यप्रभप्रतिज्ञातं वर्जयित्वार्थ्यतां वरः। दैव यत्ते प्रतिज्ञातं कः शक्तः कर्तुमन्यथा ॥९२॥ किं त्वस्माभिः प्रतिज्ञातं यदस्य श्रुतशर्मणः। सत्यं तदप्यस्तु विभो मा भूद्वक्षक्षयश्च नः ॥९३॥ इत्युक्त्वा विरतान्देवा भगवानसमादिशत्। संधौ कृते मवस्येतत्सन्धिधैवमिहास्तु वः ॥९४॥ सूर्यप्रभं प्रणमतु श्रुतशर्मा सहानुगः। ततस्तथा विधास्यामो यथोभयहितं भवेत् ॥९५॥ इतीदवरवचो देवाः प्रतिपद्य समेति च। सूर्यप्रभस्य विदधुः श्रुतशर्माणमानतम् ॥९६॥ ततस्तयोमिथस्त्यक्तवैरयोः कृष्ठमन्वयोः। सन्धिं देवासुराश्चक्रुः शान्तवैराः परस्परम् ॥९७॥ अथ शृण्वत्सु निर्जितेष्वसुरेषु सुरेषु च। उवाच भगवाञ्छम्भुः सूर्यप्रभमिदं वचः ॥९८॥
अष्टम लम्बक ४३१
अष्टम लम्बक ४३१ तब देवराज इन्द्र ने क्रोध से भरकर वज्र उठाकर सूर्यप्रभ पर प्रहार किया तो शिवजी ने हुंकार कर दिया। फलतः वज्र नष्ट होगया ॥८४॥ तब इन्द्र के युद्धभूमि से चले जाने पर स्वयं नारायण क्रोध से भरकर तीक्ष्ण मुखवाले बाणों से प्रभास को कढ़ाने लगे ॥८५॥ नारायण के अस्त्रों का उत्तर विरोधी अस्त्रों से देता हुआ प्रभास अविचल भाव से छायारथ व्यक्ति के समान युद्ध करने लगा। घोड़ों के मर जाने और रथ के टूट जाने पर भी वह दूसरे रथ पर चढ़कर लड़ रहा था। तब विष्णु भगवान् ने क्रुद्ध होकर प्रभास पर जलते हुए चक्र का प्रहार किया तो तुरन्त प्रभास ने भी अभिमन्त्रित खड्ग का प्रयोग कर दिया। उन दोनों अस्त्रों (चक्र और खड्ग) को परस्पर युद्ध करते हुए और चक्र से खड्ग को धीरे-धीरे निर्बल होते हुए देख कर शंकर भगवान् ने हुंकार किया। उससे वे दोनों खड्ग और चक्र अन्तर्हित हो गये ॥८६—८९॥ तब सूर्यप्रभ के विजयी होने और श्रुतशर्मा के पकड़कर बांध लिये जाने पर असुर आनन्दित और देवता खिन्न हो गये ॥९०॥ तदनन्तर देवताओं ने स्तुति करके शंकर की आराधना की। फलतः प्रसन्न होकर गिरिजापति शंकर भगवान् ने देवताओं से यह कहा—'मैंने सूर्यप्रभ से जो प्रतिज्ञा की है उसे छोड़कर और कोई भी वर मांगो। देवताओं ने कहा—'भगवन्, आप जो प्रतिज्ञा कर चुके उसे उलटने में कौन समर्थ हो सकता है, किन्तु हम लोगों ने भी श्रुतशर्मा को जो वचन दिया है वह भी सत्य होना चाहिए। हमारे वंश का नाश नहीं होना चाहिए' ॥९१—९३॥ ऐसा कहकर चुप हुए देवताओं से भगवान् महादेव ने कहा—'परस्पर सन्धि कर लेने पर ही यह सम्भव है। पहले श्रुतशर्मा अपने अनुचरों के साथ सूर्यप्रभ को प्रणाम करे, तब मैं उस पक्ष के हित की बात कहूँगा' ॥९४—९५॥ शिवजी के ऐसा कहने पर 'ऐसा ही होगा' देवताओं ने कहा और श्रुतशर्मा को सूर्यप्रभ के आगे विनम्र कर दिया ॥९६॥ तब उन लोगों के गले मिलने पर और आपसी शत्रुता छोड़ देने पर देवताओं और असुरों ने बैर शान्त करके परस्पर मित्रता कर ली ॥९७॥ तदनन्तर, सभी सुरों और असुरों के नमते रहने पर, भगवान् शंभू ने सूर्यप्रभ से कहा—॥९८॥ ५५
कुरु दक्षिणवेद्यर्धे छत्रवासित्वमात्मनः। उत्तरस्मिंस्तु वेद्यर्धे देहि तच्छ्रुतशर्मणे ॥९९॥ प्राप्तव्यमचिरात्पुत्र त्वया हीदृक्चतुर्गुणम्। साम्राज्यं किन्नरादीनामशेषाणां द्युचारिणाम् ॥१००॥ तस्मिन्प्राप्ते च दद्यास्त्वं वेद्यर्धमपि दक्षिणम्। तत्कुञ्जरकुमाराय सविशेषपदे स्थितः ॥१०१॥ ये चात्र निहता वीराः समित्युभयपक्षयोः। उत्तिष्ठन्त्वक्षतैरङ्गैर्जीवन्तः सर्व एव ते ॥१०२॥ इत्युक्त्वान्तर्दधे शम्भुः सर्वे चोत्तस्थुरक्षताः। सुप्तप्रबुद्धा इव ते येऽत्राभूवरणे हताः ॥१०३॥ अथ सूर्यप्रभो मूर्ध्नि धृतशाम्भवशासनः। गत्वा विविक्तं विस्तीर्णं भूमिभागमरिन्दमः ॥१०४॥ उपविष्टो महास्थानं श्रुतशर्माणमागतम्। निजसिंहासनार्धे तमुपावेशितवांत्स्वयम् ॥१०५॥ तद्वयस्याः प्रभासाद्या वयस्याः श्रुतशर्मणः। दामोदराद्याश्च तयोः पार्श्वयोः समुपाविशन् ॥१०६॥ उपाविशत्सुनीथश्च मयश्चान्ये च दानवाः। आसनेषु यथार्हेषु तथा विद्याधरेश्वराः ॥१०७॥ ततस्तत्राययुः सप्तपातालपीठयोत्थिताः। प्रह्लादप्रमुखा दैत्यदानवेन्द्राः प्रहर्षतः ॥१०८॥ शक्रश्च लोकपालाविमुतो गुरुपुरस्सरः। विद्याधरः सुमेरुश्च स सुवासकुमारकः ॥१०९॥ दनुप्रभृतयः सर्वाश्चाययुः कश्यपाङ्गनाः। भूतासनविमानेन भार्याः सूर्यप्रभस्य च ॥११०॥ सर्वेष्वेपु दृष्टान्योन्यप्रीत्याचारोपवेशिषु। सिद्धिनमि सखी धन्वास्तद्वाक्यमेवमम्यधात् ॥१११॥ भो भो सुरासुरा देवी दनुर्मुष्मन्निरीक्ष्यसौ। अस्मिन्प्रीतिसमाजे यत्सीमन्तस्य सुखं च नः ॥११२॥ तद्भूतं यदि युष्माभिरनुभूतं बनाधन। तदयोयं न कस्सभ्यो विरोधो दुरादादणः ॥११३॥
अष्टम लम्बक ४३५
अष्टम लम्बक ४३५ 'तुम विद्याधरों की दक्षिण ओर की आधी वेदी पर अपना चक्रवर्ती-शासन स्थापित करो और उत्तर की आधी वेदी पर श्रुतशर्मा को चक्रवर्ती बने रहने दो। पुनः कुछ दिनों के पश्चात् इवृत पोगुला किन्नर आदि आकाशचारियों का राज्य प्राप्त करोगे। जब तुम्हारा राज्य-विस्तार हो जाय तब अपनी दक्षिणांशाधी आधी वेदी कुंजरकुमार को देना। इतना कहने के पश्चात् अन्त में शिवजी ने कहा-'इस युद्ध में उभय पक्ष के जितने वीर मरे हैं वे सब जीवित हो जायें। उनके शरीर पर एक घाव भी न रहे। ऐसा कहकर शिवजी के अन्तर्धान होने पर सभी मुर्दे ऐसे उठ गये जैसे अभी सोकर उठे हों ॥९०—१०३॥ तदनन्तर विजयी सूर्यप्रभ शिवजी की आज्ञा को शिरोधार्य करके और एकान्त में विस्तृत भूभाग में जाकर एक स्थान पर बैठ गया और सभा (दरबार) की। उस समय आये हुए श्रुतशर्मा को उसने अपने सिंहासन के आधे भाग में सहर्ष बैठाया ॥१०४-१०५॥ प्रभास आदि सूर्यप्रभ के मित्र और श्रुतशर्मा के मित्र दामोदर आदि दोनों, दोनों ओर यथास्थान बैठ गये ॥१०६॥ सुनीथ और मय आदि असुर तथा अष्टापद विद्याधर राजा समुचित आसनों पर विराजमान हो गए। तब मन्त्रि-प्रयासों के अतिरिक्त उद्धत और दैत्य-दानवगण हर्ष मनाते हुए यहाँ आये ॥१०७-१०८॥ युद्ध समाप्त हो जाने वाले सामन्तों के साथ हुए तथा सुभट सुबाहुकुमार एवं इन्दु- कम्पित-सहित भट को दोनों ओर जहाँ जहाँ अपने अपने समुचित विश्राम पर बैठकर सूर्यप्रभ की महारथ-पदवी में बनी पहुँची में अन्य अन्य आकर्षत करहस्त कण्ठ हार हार पदस्थापन में गले अन्य दृश्यों वाली सिन्दु के दरी (दर) के राक्षस से ही इस प्रकार फल-दे गुणो और मन्त्रज्ञ दैत्यों दृढ मनस्क नीते रति अन्य इन दोनों उभयपक्ष के आश्रयदाता जिन मय का आदर सत्कार ही यह इन सब का अनुग्रह पहले कीर्तिदत्त का (युद्ध) के समय में हुआ था दूर दूर तक विस्तृत उत्सव मङ्गलवर्द्धन ॥१०९-११३॥
४३६ कथासरित्सागर
४३६ कथासरित्सागर हिरण्याक्षादिभिर्मर्त्यैर्हेतुराज्याय कृत स यैः । ते गता ध्रुव एवाद्य व्यच्छस्तत्का विरोधिता ॥११४॥ निर्भरंसुखितास्तस्माद्वर्तध्वमितरेतरम् । अस्माकं येन सन्तोषः शिवं च जगतां भवेत् ॥११५॥ इति सिद्धिमताच्छ्रुत्वा भगवत्या दनोर्वचः । शक्रेण वीक्षितमुखो वृहस्पतिरुवाच ताम् ॥११६॥ नानुबन्धोऽस्ति देवानामसुरान्प्रति कश्चन । विकुर्वते न यद्येते मिथ्या देवानिमान्प्रति ॥११७॥ इत्युक्ते देवगुरुणा दानवेन्द्रो मयोऽब्रवीत् । स्याद्विकारोऽसुराणां चेत्सह्यास्तन्मुवि कथम् ॥११८॥ उच्चैःश्रवसमन्द्राय मृतसञ्जीवनं हयम् । प्रबलोऽथ शरीरं स्वं सुरेभ्यः कथमर्पयेत् ॥११९॥ त्रैलोक्यं हरये दत्त्वा विशेत्कारां कथं बलिः । अयोदेहः कथं देहं दद्याद्वा विश्वकर्मणे ॥१२०॥ अधिकं वा कियदुष्पि नित्यसम्भाविनोऽसुराः । छद्मना श्वेश बाध्यन्ते तदेषां नास्ति विक्रिया ॥१२१॥ एव मयासुरेणोक्ते सिद्धयात्रोचि तथा यथा । प्रीतिर्देवासुरादक्षत्रुमिय कण्ठग्रहोत्तरम् ॥१२२॥ तावद् भवान्या प्रहिता प्रतीहारी जयाभिधा । अत्रायात्पूजिता सर्वैः सुमेरुमवदच्च सा ॥१२३॥ देव्याहं प्रेषिता त्वां प्रत्यादिष्टं च तया तव । अस्ति ते कन्यका नाम्ना कामचूडामणिः सुता ॥१२४॥ सूर्यप्रभाय तां देहि शीघ्रं भक्ता हि सा मम । इत्युक्तो जयया प्रह्वः सुमेरुः प्रत्युवाच ताम् ॥१२५॥ यदादिशति देवी मां परमोऽनुग्रहो ह्ययम् । देवेनाप्ययमेवार्थः प्रागादिष्टो ममाभवत् ॥१२६॥ एवं सुमेरुणा प्रोक्ता प्राह सूर्यप्रभं जया । त्वयैषा सर्वभार्याणां भर्त्तव्योपरिचारिणी ॥१२७॥ सर्वास्योऽभिमतस्यान्यभ्यन्ताव्येषा भविष्यति । इत्यादिष्टं तवाप्यद्य देव्या गौर्या प्रसन्नया ॥१२८॥
अष्टम लम्बक ४१७
अष्टम लम्बक ४१७ बड़े भाई हिरण्याक्ष आदि ने स्वर्ग के लिए परस्पर विरोध किया था वे मारे गये और जब इन्द्र ही बड़ा है तो विरोध क्यों है ? इसलिए बैर रहित होकर आप लोग परस्पर भद्र व्यवहार करो जिससे कि हम लोगों को सन्तोष और तीनों लोकों का कल्याण हो ॥११४ ११५॥ सिद्धि के मुख से माता दनु के वचन सुनकर इन्द्र ने बृहस्पति की ओर देखा। तब बृहस्पति कहने लगे—'देवताओं को असुरों के प्रति कोई बैर नहीं है। इसलिए, देवता उनके प्रति कोई भी हानिकारक कार्य नहीं करते' ॥११६ ११७॥ बृहस्पति के ऐसा कहने पर दानवराज मय बोला-'यदि असुरों के मन में देवताओं के प्रति अनिष्ट-भावना होती तो नमुचि असुर, मूढों को जिलानेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़े को इन्द्र के लिए दान में कैसे दे देता और प्रवल दैत्य देवताओं को अपना शरीर कैसे दान कर देता ? बलि विष्णु को अपना शरीर दान करके कारागार में क्यों जाता और अयोदेह असुर विश्वकर्मा को अपना शरीर कैसे दे देता ॥११८—१२ ॥ और, अधिक क्या कहूँ नित्य ही देवताओं द्वारा पीड़ित असुर यदि छल-कपट द्वारा आतंकित न किये जायें तो उनके मन में कोई विकार नहीं हो' ॥१२१॥ मयासुर के इस प्रकार कहने पर सिद्धि ने कहा - 'तुम जो कहते हो, ठीक है। तदनन्तर, देवता और असुरों ने परस्पर के मित्रों से प्रेमपूर्वक मेल-मिलाप किया ॥१२२॥ इसी बीच भवानी पार्वती द्वारा भेजी गई प्रतीहारी जया भी वहीं आई। उसके आने पर सबने उसका स्वागत-सम्मान किया और वह सुमेरु से कहने लगी - 'मुझे देवी पार्वती ने भेजा है और तुम्हें यह सन्देश दिया है कि तुम्हारी कामचूड़ामणि नाम की कन्या है उसे तुम शीघ्र ही सूर्यप्रभ के लिए दे दो। वह कन्या मेरी भक्ता है। सुजया के इस प्रकार कहने पर सुमेरु ने नम्रता पूर्वक उससे कहा—॥१२३—१२५॥ 'भगवती ने मुझे जो आज्ञा दी यह मुझ पर उनका अनुग्रह है। भगवान् महादेव ने भी यह बात पहले मुझसे कही थी' ॥१२६॥ सुमेरु के इस प्रकार कहने पर जया ने सूर्यप्रभ से कहा- तुम इन (कामचूड़ामणि) को सभी रानियों में प्रधान बनाना। यह तुम्हारी सभी प्रिय पत्नियों में अधिक प्रिय होंगी। इस प्रकार स्वयं पार्वती ने तुम्हें भी आदेश दिया है ॥१२७-१ २८॥
४१८ कथासरित्सागर
[page header] ४१८ कथासरित्सागर
इत्युक्त्वान्तर्दधे सूर्यप्रभेणाभ्यर्थिता जया। अत्रैवाह्नि सुमेरुश्च लग्नं निश्चितवान्ध्रुवम्॥१२९॥ वेदीमकारयत्सोऽथ सप्तरत्नस्तम्भकुट्टिमाम्। युक्तां तद्रश्मिजालेन पिहितेनेव वह्निना ॥१३०॥ आनाययामास च तां कामचूडामणिं सुताम् । निपीयमानलावण्यां सोत्कैर्देवासुरैर्दृशा ॥१३१॥ उमा हिमवतो जाता जाता सेयं सुमेरुतः । इतीव तत्समानेन सौन्दर्येण समाभिताम् ॥१३२॥ ततो वेदीं समारोप्य कृतकौतुकशोभिताम्। प्रसाधितां सुमेरुस्तां ददौ सूर्यप्रभाय सः ॥१३३॥ सूर्यप्रभश्च जग्राह कामचूडामणेस्तदा। दनुप्रभृतिभिर्वेदकङ्कण पाणिपङ्कजम् ॥१३४॥ ददौ लाजविसर्गे च प्रथमे तत्क्षणागता। जया भवानीप्रहिता दिव्यां मालाममश्वरीम् ॥१३५॥ सुमेरुश्चाप्यनर्घाणि रत्नानि प्रददौ तदा। ऐरावणात्समुत्पन्नं दिव्यं च वरवारणम् ॥१३६॥ द्वितीये लाजमोक्षे च जया रत्नावलीमदात्। यया कण्ठस्थया मृत्युः क्षुत्तृष्णा च न बाधते ॥१३७॥ सुमेरुश्च ददाति स्म त्रिगुणं रत्नसञ्चयम्। उच्चैःश्रवसःप्रसूतं च हयरत्नमनुत्तमम् ॥१३८॥ लाजमोक्षे तृतीये च ददावेकावलीं जया। यौवनं क्षीयते नैव यया कण्ठावलम्बया ॥१३९॥ सुमेरुस्त्रिगुणं राशिं रत्नानां प्रचितीय च। दत्तवान्गुलिकां दिव्यां सर्वसिद्धयुपयोगिनीम् ॥१४०॥ ततो विवाहे निर्वृत्ते सुमेरुः ससुरासुरान्। विद्याधरान्देवमातॄः सर्वानैवं व्यजिज्ञपत् ॥१४१॥ भोक्तव्यमद्य युष्माभिः सर्वैरैष गृहे मम। अनुग्रहश्च कर्तव्यो बद्धो मूर्ध्नि मयाञ्जलिः ॥१४२॥ एवमभ्यर्थनां तस्य सुमेरोः सर्व एव ते। यावत्प्रेच्छन्ति तावच्च मन्दी तत्रागतोऽभवत् ॥१४३॥
सूर्यप्रभ द्वारा सम्मानिता जया इतना कहकर अन्तर्हित हो गई। सुमेरु ने भी उसी दिन शीघ्रता पूर्वक लग्न का निश्चय किया और वहीं पर उत्तुंग महामूल्य रत्नों के स्तम्भों तथा छतों से युक्त सुन्दर वेदी बनवाई। रत्नों की चमकीली लाल किरणों से मानों वेदी सब ओर से अग्नि द्वारा छाई हुई-सी लग रही थी ॥१२९-३१ ॥ वहीं उसने अपनी सुन्दरी कन्या कामचूड़ामणि को बुलवाया जिसके लावण्य को चंचल होकर देवता और असुर सभी अपने नेत्रों से पी रहे थे ॥१३२॥ उमा हिमालय से उत्पन्न हुई थी और यह सुमेरु से। मानो इसीलिए वह पार्वती के समान सुन्दरी थी ॥१३३॥ तदनन्तर, विवाह-वेश में सजी हुई कन्या को सुमेरु ने वेदी पर बैठाकर उसे सूर्यप्रभ को प्रदान कर दिया ॥१३४॥ सूर्यप्रभ ने भी तन्तु आदि के द्वारा बाँधे गये कामचूड़ामणि के हाथ को ग्रहण किया ॥१३५॥ पहले लाजा-होम के समय उसी क्षण आई हुई और पार्वती द्वारा भेजी गई जया ने मन्दरो नाम की दिव्य माला उसे प्रदान की। सुमेरु ने भी अनन्त और अमूल्य रत्न उस अवसर पर प्रदान किए और ऐरावत से उत्पन्न सुन्दर हाथी भी प्रदान किया ॥१३६-१३६॥ दूसरे लाजा-होम के समय जया ने एक रत्नों की माला भेंट की जिसके गले में रहने पर मृत्यु, भूख और प्यास का कष्ट नहीं होता था ॥१३७॥ सुमेरु ने भी पहले से अधिक धनराशि और उच्चैश्रवा से उत्पन्न घोड़े का बच्चा प्रदान किया ॥१३८॥ तीसरे लाजा-हवन के समय जया ने मोतियों की एक लड़ीवाली माला दी। जिसके गले में रहने से यौवन का क्षय नहीं होता था ॥१३९॥ और, सुमेरु ने भी तिगुनी धनराशि और सब प्रकार की सिद्धियों के उपयोग में आनेवाली एक अँगूठी दी ॥१४० ॥ इस प्रकार, विवाह-संस्कार पूर्ण होने पर सुमेरु ने सुरों असुरों विद्याधरों और दैवमाताओं से इस प्रकार निवेदन किया ॥१४१॥ आज आप लोगों को मेरे घर पर भोजन करना चाहिए और मुझ पर कृपा करनी चाहिए। मैं सिर पर अंजलि बाँधकर आप लोगों से निवेदन करता हूँ ॥१४२॥ उन सब ने जब भोजन करना न चाहा, तब शिवजी का नन्दी वहाँ आकर उपस्थित हुआ ॥१४३॥
४४० कथासरित्सागर
४४० कथासरित्सागर स तानवादीद्व्रजतानादिष्टं वस्त्रिशूलिना। गृहे सुमेरोर्भोक्तव्यमेष ह्यात्मपरिग्रहः ॥१४४॥ एतदङ्गेषु भुक्तेषु तृप्तिः स्याच्छाश्वती च वः। इति तन्वियुक्ताञ्छ्रुत्वा सर्वे तत्प्रतिपेदिरे ॥१४५॥ ततोऽत्राजग्मुरमिताः शङ्करप्रहिता गणाः। विनायकमहाकालवीरभद्राद्यधिष्ठिताः ॥१४६॥ ते च भोजनसज्जां तां वेदिं कृत्वा यथाक्रमम्। तानुप्रावेशयन्देवद्युचरासुरमानुषान् ॥१४७॥ उपाहरन्त तेभ्यश्च विद्याकल्पान्सुमेरुणा। आहाराञ्छङ्करादिष्टकामधेनूद्भवांस्तथा ॥१४८॥ एकैकस्य यथार्हं च तत्स्फुरिच्छाविधायिनः। वीरभद्रमहाकालभृङ्गिप्रभृतयः सुराः ॥१४९॥ पदे पदे च सन्तोषमिलद्वधूपरचारणम्। तथा सङ्गीतकमभूद्दिव्यस्त्रीनृत्यसुन्दरम् ॥१५०॥ आहारान्ते च सर्वेषां तेषां नन्दीश्वरादयः। ददुर्दिव्यानि माल्यानि वस्त्राण्याभरणानि च ॥१५१॥ एवं सम्मान्य देवादीन्नन्दिप्रभृतयोऽखिलाः। गणेश्वरा गणैः सर्वैः सह जग्मुर्यथागतम् ॥१५२॥ ततो देवासुरा सर्वे सार्धं तन्मातरो ययुः। श्रुतशर्मादयस्ते चाप्यामन्त्र्य स्वं स्वमास्पदम् ॥१५३॥ सूर्यप्रभः सभार्यश्च सवयस्यवधूयुतः। विमानेन ययावाद्य तत्सुमेस्तपोवनम् ॥१५४॥ प्रेषयामास हर्षं च स्ववयस्य महीभृताम्। रत्नप्रभस्य च भ्रातुराख्यातुमुदयं निजम् ॥१५५॥ दिनान्ते च स सद्रत्नपर्यङ्के साधुनिर्मितम्। कामचूडामणेर्बध्वा वासवेश्म विवेश तत् ॥१५६॥ तत्रैतां च वनाश्लेषवदानच्छत्रसञ्ज्नने। त्याजयित्वा शनैर्लज्जां नवोढासुलभां क्रमात् ॥१५७॥ अनिर्वाच्यं मवं मुग्धविदग्धमधुरं रतम्। अनास्वादितमन्यान्यं सिषेवे स तया सह॥१५८॥
अष्टम लम्बक ४४१
अष्टम लम्बक ४४१ वह प्रणाम करते हुए उन सब से कहने लगा-'शिवजी ने आप लोगों को आदेश दिया है कि आप लोगों को सुमेरु के घर पर भोजन करना ही चाहिए, क्योंकि वह हमारा आत्मीय व्यक्ति है ।।१४४।। उसके तृप्त होने पर आप लोगों को शाश्वत तृप्ति होगी। नन्दी के मुख से यह सुनकर सबने भोजन करना स्वीकार किया ।।१४५।। तदनन्तर विनायक, महाकाल और वीरभद्र की प्रमुखता में अनन्त गण वहाँ आ गये ।।१४६।। उन सबों ने भोजन तैयार करके देव, दैत्य, विद्याधर और मनुष्य एवं अतिथियों को सम्मान-सहित क्रम से बैठाया ।।१४७।। और सुमेरु द्वारा विद्या-बल से तैयार किये गये तथा शिवजी के आदेश से कामधेनु द्वारा उत्पन्न किये गये विविध प्रकार के भोजन उनके सामने परोसे गये ।।१४८।। और, एक-एक अतिथि के लिए उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार सेवा के निमित्त वीरभद्र, महाकाल, भृङ्गी प्रभृति देवता संलग्न हो गये ।।१४९।। बीच-बीच में प्रेम और सन्तोष से मिलते हुए आकाशचारियों के चारणों के गान और विद्याधरियों के नृत्य उनका मनोरंजन करते रहे ।।१५०।। भोजन के अनन्तर नन्दीश्वर आदि गणों ने उन्हें दिव्य मालाएँ, वस्त्र और आभूषण आदि प्रदान किये ।।१५१।। तब नन्दी आदि गणों ने सभी देवताओं का सम्मान किया। वे सभी अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर जहाँ से आये थे, वहीं लौट गये ।।१५२।। और सभी असुर तथा विद्याधर भी सूर्यप्रभ से आज्ञा पाकर अपने-अपने स्थानों को गये ।।१५३।। सूर्यप्रभ भी अपने मित्रों तथा नववधू के साथ सुमेरु के प्राचीन आश्रम में लौट आया ।।१५४।। तदनन्तर, उसने अपने मित्र दृढ़ को राजाओं तथा अपने भाई रत्नप्रभ के पास अपनी स्थिति का समाचार देने के लिए भेजा ।।१५५।। और, सायंकाल के अनन्तर वह सूर्यप्रभ सुन्दर रत्नों के पर्यङ्क से सजे हुए और सुन्दर बने हुए कामचूड़ामणि के वास भवन में प्रविष्ट हुआ ।।१५६।। वहाँ पर गाढ़ आलिङ्गन, चुम्बन और मर्दन आदि से उसकी नई-नई लज्जा को क्रमशः दूर कराकर उस नवोढ़ा काम-कला-वित् के साथ अनिर्वचनीय नवीन तथा दूसरी पत्नियों से अनास्वादित आनन्द-उपभोग में उसने रात्रि व्यतीत की ।।१५७-१५८।। ५६
इदानीं बहिरन्यासां निवेशो हृदयेऽस्तु मे। अन्तः पुनस्त्ववैकस्या इति तां चान्वरञ्जयत् ॥१५९॥ ततो रतान्तसुप्तस्य प्रियाश्लेषसुखावहा। शनैः समाप्तिमगमन्निशा निद्रा च तस्य सा ॥१६०॥ प्रभाते च स उत्थाय गत्वा सूर्यप्रभस्ततः। आद्यास्ता रञ्जयामास निजभार्याः सह स्थिताः ॥१६१॥ तास्तं नववधूरक्तं यावत्परिहसन्ति च। सनर्मवक्रमधुरस्निग्धमुग्धैर्वचःक्रमैः ॥१६२॥ द्वाःस्थेनावेदितस्तावदागत्य प्रणिपत्य च। विद्याधरः सुषेणाख्यः कृतिनः स व्यजिज्ञपत् ॥१६३॥ देव त्रिकूटनाथाद्यैः सर्वैर्विद्याधरेश्वरैः। प्रेषितोऽस्मीहैवं च देव विज्ञापयन्ति ते ॥१६४॥ ऋष्यमाद्रौ तृतीयेऽह्नि ह्यभिषेकः शुभस्तव। संपाद्यतां तत्सर्वेषामुद्यमोऽत्र विधीयताम् ॥१६५॥ तच्छ्रुत्वा प्रत्यवोचत्तं दूतं सूर्यप्रभस्तदा। गच्छ त्रिकूटाधिपतिप्रभृतीन्ब्रूहि मद्गिरा ॥१६६॥ भवन्त एव कुर्वन्तु समारम्भं वदन्तु च। आत्मनश्च परं सज्जा वयमत्र स्थिताः पुनः ॥१६७॥ संपादनं तु सर्वेषां करिष्यामो यथायथम्। इत्यात्तप्रतिसन्देशः सुषेणः स ततो ययौ ॥१६८॥ सूर्यप्रभोऽपि चैकैकं प्रभासप्रभृतीन्सखीन्। देवानां याज्ञवल्क्यादिमुनीनां भूभृतां तथा ॥१६९॥ विद्याधरासुराणां च विससर्ज पृथक्पृथक्। निमन्त्रणाय सर्वेषां स्वाभिषेकमहोत्सवे ॥१७०॥ स्वयं जगाम चैकाकी कैलासं पर्वतोत्तमम्। हरस्य चाम्बिकायाश्च निमन्त्रणकृतोद्यमः ॥१७१॥ आरोहंश्च तमद्राक्षीच्छुभ्रभूतिसितं गिरिम्। सेव्यं श्वर्षिसिद्धानां द्वितीयमिव शङ्करम् ॥१७२॥ मर्यादधिश्वमार्गश्च दुरारोहं छत परम्। स तं पश्यन्ददर्शाथ वैद्रुमं द्वारमेकतः ॥१७३॥
मध्यम लम्बक ४४३
मध्यम लम्बक ४४३ सूर्यप्रभ ने कामचूड़ामणि से कहा- अब अन्य स्त्रियों का स्थान हृदय के बाहर रहेगा किन्तु हृदय के भीतर तो केवल तुम्हारा ही स्थान है। इस प्रकार की बातें करते हुए सूर्यप्रभ ने उसे प्रसन्न किया ॥१५९॥ तदनन्तर प्रिया के आलिंगन से सुख देनेवाली उसकी नींद और रात्रि दोनों साथ ही समाप्त हुईं ॥१६०॥ प्रातःकाल उठकर सूर्यप्रभ ने आकर एक साथ बैठी हुई पहले की स्त्रियों से मिलकर वार्तालाप आदि से उन्हें प्रसन्न किया ॥१६१॥ वे रानियाँ व्यंग्योक्तियों चुटकियों तथा हास्यपूर्ण वचनों से नववधू के प्रति अनुरक्त सूर्यप्रभ को जब विविध प्रकार से बना रही थीं, इतने में ही द्वारपाल द्वारा आकर और प्रणाम करके सूर्यप्रभ सूचित किया गया और सुषेण नाम के विद्याधर ने सफल हुए सूर्यप्रभ से कहा- 'महाराज त्रिकूटनाथ आदि सभी विद्याधर-राजाओं ने मुझे आपके समीप भेजा है। वे लोग आपसे निवेदन करते हैं-॥१६२-१६४॥ 'कि आज से तीसरे दिन ऋषभ पर्वत पर आपका अभिषेक शुभ है। इसकी सबको सूचना दीजिए और उसके लिए तैयारी कीजिए' ॥१६५॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ ने दूत से कहा-'जाओ त्रिकूटदेवों को मेरी ओर से कहो कि इस उत्सव का आयोजन आप लोग ही करें। और, लोगों को भी आप ही सूचित करें। हम स्वयं तैयार होकर बैठे हैं॥१६६-१६७॥ यथावकाश हम भी सबको सूचित करेंगे ही। इस प्रकार, प्रतिसन्देश लेकर दूत सुषेण चला गया ॥१६८॥ सूर्यप्रभ ने भी प्रभास आदि एक-एक मित्र को देवताओं को याज्ञवल्क्य मुनि को राजाओं को विद्याधरों को और असुरों को पृथक्-पृथक् सूचना देकर अपने अभिषेक-महोत्सव में निमन्त्रित कराया ॥१६९-७०॥ और, स्वयं अकेला शिव और पार्वती को निमन्त्रण देने के लिए कैलास पर्वत पर गया ॥१७१॥ सूर्यप्रभ ने देव ऋषि सिद्ध आदि से सेवित उस कैलाश पर्वत पर जाते हुए दूसरे शंकर के समान स्वच्छ और शुभ कैलासपति को देखा ॥१७२॥ आधे से अधिक चढ़ने पर उसने पर्वत के शिखर पर जाना कठिन समझा और सामने ही एक ओर विद्रुम मणि से बने हुए द्वार को देखा ॥१७३॥
४४४ कथासरित्सागर
४४४ कथासरित्सागर यदा प्रवेशं नैवात्र सिद्धिमानप्यवाप सः। तदैकाग्रेण मनसा स्तौति स्म शशिशेखरम्॥१७४॥ ततस्तद्द्वारमुद्घाट्य पुमान्गजमुखोऽब्रवीत्। एहि प्रविश तुष्टस्ते हेरम्बो भगवानिति॥१७५॥ ततः सूर्यप्रभस्तत्र प्रविश्यान्तं सविस्मयः। उपविष्टे महाभोगे ज्योतिरत्नसिंहासने॥१७६॥ द्वादशादित्यसंकाशमेकदंष्ट्रं गजाननम्। लम्बोदरं त्रिनेत्रं च ज्वलत्परशुमुद्गरम्॥१७७॥ विनायकं परिवृतं नानाप्राणिमुखैर्गणैः। ददर्श च ववन्दे च पादयोः प्रणिपत्य तम्॥१७८॥ सोऽपि तं विघ्नजित्प्रीतः पृष्ट्वागमनकारणम्। आरोहानेन मार्गेणेत्यवोचत्स्निग्धया गिरा॥१७९॥ ततः सूर्यप्रभः सोऽन्यामारूढः पञ्चयोजनीम्। पद्मरागमयं द्वारमपश्यदपरं महत्॥१८०॥ अनवाप्तप्रवेशश्च तत्रापि स पिनाकिनम्। देवं नामसहस्रेण तुष्टावानन्यमानसः॥१८१॥ ततः कुमारपुत्रेण स्वयं द्वारं विवृत्य तत्। उक्तात्मना विधातास्यनान्तः प्रावेश्यतात्र सः॥१८२॥ प्रविष्टश्च ददर्शात्र स्कन्दं ज्वालामहद्युतिम्। युक्तं शाखविशाखाद्यैः सदृशैः पञ्चभिः सुतैः॥१८३॥ स जातमात्रप्रतीवृष्टप्रहृष्टिशिशुग्रहैः। वृतं तं कोटिसंख्याकैर्गजैश्चेश्वरजानतैः॥१८४॥ सेनापि परितुष्टेन पृष्ट्वा कारणमागमे। तस्यारोहणमार्गोऽत्र व्यादिष्टः सरलात्मना॥१८५॥ एवं क्रमेण चान्यानि रत्नद्वाराणि पञ्च सः। सभैरवमहाकालवीरभद्रैः स नन्दिना॥१८६॥ भृङ्गिणा चामुरैः साकं निरुद्धानि यथाक्रमम्। अतीत्य प्राप पृष्ठेऽग्रे स्फाटिकं द्वारमुत्तमम्॥१८७॥ ततः स्तुवन्देवदेवं रुद्रेणैकेन सादरम्। प्रवेशितस्तदद्राक्षीच्छम्भोः स्वर्गाधिकं पदम्॥१८८॥
अष्टम लम्बक ४४५
अष्टम लम्बक ४४५ जब सिद्धि-सम्पन्न सूर्यप्रभ भी द्वार में प्रवेश नहीं प्राप्त कर सका तो वह एकाग्र चित्त से शिवजी की स्तुति करने लगा ॥१७४॥ तब द्वार को खोलकर हाथी के मुखवाले एक पुरुष ने उससे कहा—'आओ प्रवेश करो। तुम पर भगवान् हेरम्ब प्रसन्न हैं'॥१७५॥ उस द्वार में प्रवेश करते हुए आश्चर्य-चकित सूर्यप्रभ ने अति विस्तृत ज्योतिर्मय शिला पर बैठे हुए, बारह सूर्यों के समान चमकते हुए, एक दंतवाले लम्बे पेटवाले और तीन नेत्रोंवाले गणेशजी को देखा जिनके हाथ में परशु, कुल्हाड़ा और गदा चमक रहे थे ॥१७६-१७७॥ वे विनायक भिन्न-भिन्न मुखोंवाले गणेशों से घिरे हुए थे। सूर्यप्रभ ने उन्हें देखा और उनके चरणों में नम्र होकर प्रणाम किया ॥१७८॥ विनायक ने भी सूर्यप्रभ से आने का कारण पूछा और स्नेहपूर्ण वाणी से कहा कि 'इस मार्ग से चढ़ो। सूर्यप्रभ उनके बताये हुए मार्ग से पाँच योजन (बीस कोस) और ऊपर चढ़ गया तथा उसने पद्मराग मणि के दूसरे बड़े द्वार को देखा। वहाँ भी उसने प्रवेश न पा सकने के कारण एकाग्रचित होकर और अनन्य भाव से पिनाकपाणि महादेव की शिवसहस्रनाम से स्तुति की ॥१७९-१८१॥ स्वामी कार्तिक के विशाख नामक पुत्र ने स्वयं द्वार खोला और अपना परिचय देकर उसे भीतर प्रवेश कराया। भीतर जाकर उसने अग्नि की स्वाहा के समान दमकते हुए विशाख शाख आदि पाँच पुत्रों से युक्त उत्पन्न होते ही नम्र दुष्ट ग्रहों तथा बालग्रहों से चरणों पर प्रणाम करते हुए करोड़ों गणेशों से सेवित कुमार स्वामी को देखा ॥१८२-१८४॥ उन्होंने सूर्यप्रभ से आने का कारण पूछकर उसे ऊपर चढ़ने का मार्ग बता दिया ॥१८५॥ इसी प्रकार महाकाल वीरभद्र नन्दी और भृंगी गणों से रक्षित अन्य पाँच रत्नों के द्वार को पार करते हुए स्फटिक मणि के विशाल द्वार को उसने देखा ॥१८६-१८७॥ वहाँ पर देवदेव महादेव की स्तुति करते हुए उसे एकादश रुद्रों में से एक रुद्र ने द्वार खोलकर आदर के साथ भीतर प्रवेश कराया और उसने स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर शिवधाम का दर्शन किया ॥१८८॥
४४६ कथासरित्सागर
४४६ कथासरित्सागर विष्वग्गन्धवहुद्धात सदापुष्पफलद्रुमम्। गन्धर्वरूपसङ्गीतमप्सरोनृत्तोत्सवम् ॥१८९॥ तमेकदेशे स्फटिकमयसिंहासने स्थितम्। त्रिलोचनं शूलपाणिं स्वच्छस्फटिकसन्निभम् ॥१९०॥ बद्धपिङ्गटाजूटं चारुचन्द्रार्धशेखरम्। पार्श्वस्थया गिरिजया भगवत्योपसेवितम् ॥१९१॥ सूर्यप्रभः स सानन्दं पश्यति स्म महेश्वरम्। उपेत्य चापतत्तस्य सप्रतीकस्य पादयोः ॥१९२॥ ततः पृष्ठे करं दत्त्वा समुत्थाप्योपवेश्य च। किमर्थमागतोऽसीति पप्रच्छ भगवान्हरः ॥१९३॥ प्रत्यासन्नोऽभिषेको मे सन्निधानं तदर्हथ। प्रभोस्तत्रेति तं सूर्यप्रभः प्रत्यब्रवीच्च सः ॥१९४॥ ततः शम्भुरुवाचेममियान्क्लिष्टोऽसि तद्धि किम्। सन्निधानाय किं पुत्र तत एवास्मि न स्मृतः ॥१९५॥ तवस्तु सन्निधास्याहमित्युक्त्वा भक्तवत्सलः। सोऽन्तिकस्थितमाहूय गणमेकं समादिशत् ॥१९६॥ गच्छैतमभिषेकार्थमृषभं पर्वतं नय। महाभिषेकस्थानं हि तद्देशां चक्रवर्तिनाम् ॥१९७॥ इत्यादिष्टो भगवता स तं सूर्यप्रभं गणः। प्रदक्षिणीकृतेशामनुत्सङ्गे व्रजतोऽग्रहीत् ॥१९८॥ नीत्वा संस्थापयामास तस्मिन्नृषभपर्वते। स्वसिद्ध्या रत्नशृङ्गेनैव ययौ चादर्शनं ततः ॥१९९॥ सूर्यप्रभस्य चात्रस्थाः समाययुः स्ववयस्यकाः। कामचूडामणिमुखा भार्या विद्याधराधिपाः ॥२००॥ सेन्द्राश्च देवा असुराः समयाता महर्षयः। श्रुतधर्मा सुमेरुश्च स सुवासकुमारकः ॥२०१॥ सूर्यप्रभश्च सर्वांस्तान्यथोचितममानयत्। उक्तप्रहादिवृतान्तमभ्यनन्दंश्च तेऽपि तम् ॥२०२॥ अथ विविधौषधिसहितं नवीनवान्भोधिदीर्घसम्भूतम्। मणिकनकमयैः कुम्भैः स्वयमानिन्युर्जलं प्रभासाद्याः ॥२०३॥
अष्टम लम्बक ४४७
अष्टम लम्बक ४४७ जिस धाम में दिव्य पुरुषों के झुंड वृक्षों पर झूल रहे थे और वृक्ष पुष्पों से लदे हुए थे। वहाँ गन्धर्व गान कर रहे थे और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं॥१८६॥ वहीं एक ओर सूर्यप्रभ ने स्फटिक के सिंहासन पर बैठे हुए, तीन नेत्रोंवाले हाथ में शूल लिये हुए, चमकते हुए स्फटिक के समान स्वच्छ पीली जटाओं को बाँधे हुए, सुन्दर अर्धचन्द्र से शोभित मस्तक वाले और पार्श्व में बैठी हुई भगवती गौरी से शोभित महादेव को देखा उनके समीप जाकर गौरी और शंकर के चरणों में वह नतमस्तक हुआ ॥ १८९-१९१॥ तब पीठ को हाथ से थपथपाकर और उठाकर बैठाये गये सूर्यप्रभ से शिवजी ने पूछा— 'किसलिए आये हो ? ॥१९२॥ सूर्यप्रभ ने कहा—'प्रभो मेरा अभिषेक शीघ्र ही होनेवाला है। अतः, आपके वहाँ पधारने की प्रार्थना है॥१९३॥ तब शिवजी ने उससे कहा—'बेटे, तो तुमने इतना कष्ट क्यों उठाया? मुझे आने के लिए यहीं स्मरण क्यों नहीं कर लिया ?॥१९४॥ तो ठीक है, मैं आऊँगा ऐसा कहकर भक्तवत्सल भगवान् ने पास बैठे हुए एक गण को बुलाकर कहा—'जाओ इसे (सूर्यप्रभ को) अभिषेक के लिए ऋषभ पर्वत पर ले जाओ। वह ऋषभ पर्वत विद्याधर चक्रवर्तियों का अभिषेक-स्थान है। भगवान् से आज्ञापित गण ने प्रदक्षिणा और प्रणाम किये हुए सूर्यप्रभ को नम्रता-पूर्वक गोद में उठा लिया और उसे ले जाकर ऋषभ पर्वत पर बैठा दिया। अपनी सिद्धि के प्रभाव से वह उसी क्षण वहाँ से अदृश्य हो गया ॥१९५—१९९॥ सूर्यप्रभ जब ऋषभ पर्वत पर ही था तब उसके सभी मित्र मन्त्री कामचूड़ामणि आदि सभी पत्नियां सभी विद्याधरों के राजा इन्द्र-सहित सभी देवता मय आदि सभी असुर, याज्ञवल्क्य आदि सभी ऋषिगण तथा श्रुतदेव और सुबाहुकुमार आदि वहाँ एकत्र हुए। सूर्यप्रभ ने भी सभी का स्वागत करके उनका यथोचित सम्मान किया और शिवजी के निमन्त्रण का वृत्तान्त सुनकर सभी को प्रसन्न किया। उन सब ने भी उसे इस बात पर बधाई दी ॥२००-२०२॥ तब सूर्यप्रभ के प्रभास आदि मन्त्री मित्र मणियों और सोने के विविध कलशों में नाना प्रकार की ओषधियों से युक्त समस्त नदियों, नदों, समुद्रों और तीर्थों का जल ले स्वयं जाकर लाय ॥२०३॥