अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
भाषार्थसहित ॥ ३१
सर्वे चोत्तरोत्तरं परिचरेयुरार्यार्नार्ययोर्व्यतिक्षेपे कर्मणः साम्यं साम्यम् ॥ ५ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ राजा सर्वस्येष्टे ब्राह्मणवर्जं साधुकारी स्यात् साधुवादी त्रय्यामान्वीक्षिक्यां चाभिविनीतः शुचिर्जितेन्द्रियो गुणवत्सहायोऽपायसंपन्नः समः प्रजासु स्याद्धितं चासां कुर्वीत, तमुपर्य़ासीनमधस्तादुपासीरन्नन्ये ब्राह्मणेभ्यस्तेऽप्येनं मन्येरन्, वर्णानाश्रमांश्च न्यायतोऽभिरक्षेच्चलतश्चैनान्स्वधर्मे एव स्थापयेद्धर्म्मस्योऽशभाग्भवतीति विज्ञायते। ब्राह्मणं च पुरोदधीत विद्याभिजनवाग्रूपवयःशीलसंपन्नं न्यायवृत्तं तपस्विनं
सब वर्ण अपने २ से ऊपर २ वर्ण की सेवा करें जैसे साधारण मूर्ख ब्राह्मण विद्वानों की, क्षत्रिय ब्राह्मणों की, वैश्य क्षत्रियों की, और शूद्र वैश्यों की सेवा करें। क्योंकि ब्राह्मणादि और शूद्रादि का अधिक संसर्ग होने से लौट पोट हो कर दोनों के कर्म एक से ही बिगड़ेंगे हानि होगी ॥ ५ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में दशवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
ब्राह्मण को छोड़कर राजा सबका ईश्वर है। राजा अच्छे निर्दोष काम करे। सत्य और कोमल भाषण करे। तीनों वेदों की त्रयीविद्या और न्याय शास्त्र का अच्छा जानने वाला राजा हो, विनीत स्वभाव रक्खे, पवित्र रहे, जितेन्द्रिय हो, गुणवान् पुरुषों को अपना सहायक बनावे, उन्ही से सलाह सम्मति करे, दानशील हो, प्रजाओं पर समदृष्टि रक्खे, प्रजाओंका हित किया करे, ऊपर गद्दी पर बैठे ( विराजमान ) उस राजा से नीचे सब प्रजा के लोग (ब्राह्मणों को छोड़कर) बैठाकरें। ब्राह्मणलोग भी राजाका मान्य कियाकरें। वर्णों और आश्रमों की राजा न्यायधर्म से सदा रक्षा करे। यदि ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रम अपने कर्त्तव्य से च्युत होते हों तो उनको अपने२ धर्म पर ही स्थापित करे। यदि वर्ण तथा आश्रम अधर्मस्थ हो जांय तो उस अधर्म का भाग राजा को भी लगता है यह वेद में लिखा है। अच्छी वाणी, अच्छेरूप, अच्छी अवस्था और अच्छे स्वभाव वाले, जिसका बर्त्ताव आचार विचार न्यायाानुकूल धर्म युक्त हो ऐसे कुलीन तपस्वी विद्वान् ब्राह्मण
५
३२ गौतमस्मृतिः ॥
तत्प्रसूतः कर्माणि कुर्वीत, ब्रह्मप्रसूतं हि क्षत्रमृध्यते न व्यथत इति च विज्ञायते । यानि च दैवोत्पातचिन्तकाः प्रब्रूयुस्तान्याद्रियेत तदधीनमपि ह्येके, योगक्षेमं प्रतिजानते शान्तिपुण्याहस्वस्त्ययनायुष्यमङ्गलसंयुक्तान्याभ्युदयिकानि विद्वेषिणां संवलनमभिचारद्विषद्व्याधिसंयुक्तानि च शालाग्नौ कुर्याद् यथोक्तमृत्विजोऽन्यानि, तस्य व्यवहारो वेदो धर्म्मशास्त्राण्यङ्गान्यपवेदाः पुराणं देशजातिकुलधर्म्माश्चाम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणं कर्षकवणिक्पशुपालकुसीदकारवः स्वे स्वे वर्गे तेभ्यो यथाधिकारमर्थान् प्रत्यवहृत्य धर्म्मव्यवस्था न्या-
को राजा गुरु नियत करे । उसकी प्रेरणा आज्ञा वा सलाह सम्मति से राज्य के प्रबन्ध सम्बन्धी सब काम किया करे । क्योंकि वेद से यह जाना गया है कि ब्राह्मण की आज्ञा प्रेरणा से चलने वाला ही क्षत्रिय राजा बढ़ता है और दुःखी वा पीड़ित नहीं होता । और जिन बातों को दैवी उत्पातों ( शकुनों ) के चिन्तक ( जानने वाले ज्योतिषी आदि ) लोग कहें उन विचारों का भी आदर करे माने । कोई आचार्य कहते हैं कि देवोत्पात चिन्तकों के आधीन राजा रहे क्योंकि ये दैवज्ञ लोग योगक्षेम की उत्तमता होने की प्रतिज्ञा कर सक्ते हैं। उत्पात दीखने पर शान्तिकरण पुण्याहवाचन स्वस्ति वाचन, आयुष्यकारी और माङ्गल्य संयुक्त वेद शास्त्रोक्त आभ्युदयिक कामों को तथा शत्रुओं को दबाने के लिये मारणप्रयोग अथवा उनकी व्याधिरूप बना देने के काम स्थापित किये यज्ञशाला के अग्नि से करे करावे । और राजा के ऋत्विज् लोग शास्त्रोक्त अन्य काम भी शत्रुओं दबाने तथा अपने राजा की रक्षा के लिये करें । वेद, धर्मशास्त्र, वेद के छः अङ्ग, चार उपवेद, और इतिहास पुराण इन ग्रन्थों के अनुकूल राजा का व्यवहार होना चाहिये । देश धर्म, जाति धर्म, और कुल धर्म ये वेदादि शास्त्रों से विरुद्ध न होने पर प्रमाण कोटि में गिने जायेंगे । किसान, वैश्य, पशुपालक ( गोपाल जाति ) सूद लेनेवाले और सुनार लुहार आदि कारीगर इन सब को अपने२ वर्ग में स्थापित रक्खे । अर्थात् अपने कर्तव्य कर्म को छोड़कर कोई अन्य वर्ग में सम्मिलित होने की चेष्टा न करे । उन२ की योग्यता शक्ति के अनुसार धनादि पदार्थ लेकर राजा धर्म
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३३
याधिगमे तर्कोऽभ्युपायस्तेनाभ्यूह्य यथास्थानं गमयेद् विप्रतिपत्तौ त्रयीविद्यावृद्धेभ्यः प्रत्यवहृत्य निष्ठां गमयेद्यथाहास्य निःश्रेयसं भवति, ब्रह्म क्षत्रेण संपृक्तं देवपितृमनुष्यान् धारयतीति विज्ञायते, दण्डोदमनादित्याहुस्तेनादान्तान् दमयेद्वर्णाश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुःश्रुतवित्तवृत्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्ते, विष्वञ्चो विपरीता नश्यन्ति तानाचार्योपदेशो दण्डश्च पालयते तस्माद्राजाचार्यावनिन्द्यावनिन्द्यौ॥१॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
की व्यवस्था करे। न्याय की बात खोजने के लिये तर्क ही मुख्य उपाय है। उस तर्क से ऊहा करके राजा यथोचित व्यवस्था करे। यदि तर्क से भी किसी विषय का निश्चय न हो किन्तु विरोध ही सब पक्षों में दीख पड़े तो तीनों वेद सम्बन्धी अर्था विद्या में बड़े बड़े विद्वान् ब्राह्मणों के निकट जाकर व्यवस्था मांगे अर्थात् उनकी राय से फैसला कर देवे। ऐसा करने से राजा का परम कल्याण होता है। क्षत्रत्व से मिला हुआ ब्रह्मत्व-देव, पितर, और मनुष्यों को धारण करता है यह वेद से जाना गया है। दमन ( वशी ) करने अर्थ से दण्ड शब्द बना है ऐसा आचार्य लोग कहते हैं। उस दण्ड के द्वारा राजा अदान्तों (अपने आपसे बाहर होने वाले दुराचारियों) को वशीभूत करे। ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्यादि आश्रम अपने २ धर्म कर्म में तत्पर रहते हुए मरणानन्तर अपने कर्मों से स्वर्ग भोग फल का दीर्घ कालतक अनुभव करके शेष बचे पुण्य के बल से उत्तम देश, जाति कुलों में सुरूपवान्, दीर्घायुवाले, विद्यावान्, श्रीमान्, सदाचारी, बुद्धिमान् और सुख के सामान से युक्त हुए जन्म लेते हैं। सब वर्णाश्रमों से विपरीत दुराचारादि में चलने वाले नष्ट होते दुःख भोगते हैं। उनको गुरु लोगों वा आचार्यों का (धर्मशास्त्रोक्त) उपदेश और राजा का दण्ड रक्षा करता है। इससे राजा और वेद के विद्वान् साचार्यों की निन्दा कदापि न करे ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥११॥
| ३४ | गौतमस्मृतिः ॥ |
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शूद्रो द्विजातीनभिसंधायाभिहत्य च वाग्दण्डपारुण्या- भ्यामङ्गेन मोच्यो येनोपहन्यादार्यस्त्र्यभिगमने लिङ्गोद्धारः स्वप्रहरणं च गोप्ता चेद्वधोऽधिकोऽथाहास्य वेदमुपशृण्व- तस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेद आसनशयनवावपथिषु समप्रेप्सुर्दण्ड्यः शतम् ॥१॥ क्षत्रियो ब्राह्मणाक्रोशे दण्डपारुष्ये द्विगुणमध्यक्षं वैश्यो ब्रा- ह्मणस्तु क्षत्रिये पञ्चाशत्तदधं वैश्ये न शूद्रे किंचित,ब्राह्मण राजन्यवत् क्षत्रियवैश्यावष्टापाद्यं स्तेयकिल्विषं शूद्रस्य द्वि- गुणोत्तराणीतरेषां प्रतिवर्णं विदुषोऽतिक्रमे दण्डभूयस्त्वं
शूद्र पुरुष यदि ब्राह्मणादि द्विजों के निकट आके वा संकेत करके गा- ली देवै धमकावै वा लकड़ी आदि से मारे पीटे तो जिस अङ्ग से वह अपरा- ध करे राजा उसी अंग को कटवा देवे । यदि द्विजों की स्त्रियों के साथ शूद्र व्यभिचार करे तो लिङ्गेन्द्रिय को कटवा देवे और उस शूद्र का धनादि प- दार्थ छीन लेवे (जुर्माना करदे) यदि वह अपनी रक्षा करता हो तो राजा वध करा देवे । यदि समझ पूर्वक वेद को सुनता हो तो शीशा और जस्ता- पिघला कर कानों में डलवा देवे । यदि वेद का स्वयं उच्चारण करे तो शूद्र की जिह्वा कटवादेवे यदि शूद्र ने वेदों को कण्ठस्थ किया हो तो शिर कटवा के मरवा डाले । यदि आसन, शय्या (सेज, ) वाणी बोलने और मार्ग में चलने की बराबरी ब्राह्मणादि के साथ शूद्र करे तो राजा उस पर सौ रुपये दण्ड (जुर्माना) करे ॥१॥ यदि क्षत्रिय ब्राह्मण को गाली दे वा धमकावे, निन्दा करे तो दो सौ रुपये दण्ड (जुर्माना ) करे । यदि वैश्य, ब्राह्मण की निन्दादि करे तो १५०) डेढ़ सौ रू० दण्ड (जुर्माना ) करे । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय की निन्दादि करे तो ५०) रू० दण्ड, वैश्य की निन्दादि करे तो २५) रु० दण्ड देवे और शूद्र की निन्दादि करे तो कुछ भी दंड राजा न देवे । क्षत्रिय तथा वैश्य यदि शूद्र की निन्दादि करें धमकावें तो ब्राह्मण और राजा के तुल्य उन को भी कुछ दण्ड न देवे । चोरी के अपराध में जि- तना (अष्टगुणा) शूद्र को दोष लगता है तब १६ गुणा वैश्य को ३२ गुणा क्षत्रिय को और ६४ गुणा दोष ब्राह्मण को लगता है । विद्वान् का निरादर करने पर शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण इन को क्रमशः अधिक २ दंड हो-
॥ भाषार्थसहिता ॥ ३५
फलहरितधान्यशाकादाने पञ्चकृष्णलमल्पे पशुपीड़िते स्वा- मिदोषः पालसंयुक्ते तु तस्मिन् पथि क्षेत्रेऽनावृते पालक्षेत्रि कयोः पञ्च माषा गवि षडुष्ट्रे खरेऽश्वमहिष्योर्दशाजाविषु द्वौ द्वौ सर्वविनाशे शतं, शिष्टाकरणे प्रतिषिद्धसेवायां च नि- त्यं चेलपिण्डादूर्ध्वं स्वहरणङ्गवाऽन्यर्थे तृणमेधान्वीरुद्वन- स्पतीनां च पुष्पाणि स्ववदाददीत, फलानि चापरिवृता- नां कुसीदवृद्धिर्धर्म्या विंशतिः पञ्च माषकी मासं नातिसांव- त्सरीमेके चिरस्थाने द्वैगुण्यं प्रयोगस्य मुक्ताभिर्न वर्द्धते दि- त्सतोऽवरुद्धस्य च चक्रकालवृद्धिः कारिताकायिकाऽधिभो-
ना चाहिये । अर्थात शूद्र से अधिक वैश्य को और सब से अधिक दंड ब्राह्म- ण को हो । फल, हरा धान्य और शाकों के चुराने पर चार रत्ती सुवर्ण का दंड (जुर्माना) करे । पशुओं के द्वारा खेत की थोड़ी हानि हो तो पशु के मालिक का दोष होगा । यदि चरवाहा (ग्वालिया) साथ में हो तो ग्वा- लिया का दोष होगा । यदि मार्ग के पास २ खेत हो और खेत का बाड़ा न खिंचा हो तो खेत के मालिक और ग्वालिया दोनों का अपराध माना जा- यगा । यदि गौ वा बैल ने खेत को उजाड़ा हो तो पांच मासे, ऊंट से उज- ड़ा हो तो छः मासे, गधा, घोड़ा, और भैंसी ने खेत उजाड़ा हो तो दश २ मासे और भेड़ बकरियों ने खेत चर लिया हो तो दो दो मासे सुवर्ण का दंड (जुर्माना) पशु के मालिक पर होना चाहिये । यदि सब खेत बिलकुल खा लिया हो तो सौ १०० मासे सुवर्ण का राजा दंड देवे । यदि ब्राह्मणादि अपना २ शास्त्रोक्त कर्म न करें और निषिद्ध हिंसा चोरी आदि कर्म करें तो निर्वाहमात्र भोजन वस्त्र छोड़के उनका शेष धनादि हरलेना चाहिये । गौ और अग्नि की रक्षा के लिये घास, ईंधन, लता, और वनस्पतियों की फल पत्ती अपने पदार्थ के तुल्य ले आवे उस में अपराध वा चोरी नहीं है । जिस बाग बगीचे का बाड़ा न खिंचा हो उन वृक्षों के फल तोड़ लाने में भी दोष नहीं है । मूलका बीशवां हिस्सा सूद लेना धर्मानुकूल है (इस में प्रति मासं १) सैकड़ा सूद पड़ेगा) महिने २ सूद लेतो पांच मासे सुवर्ण सैकड़ा पर लेवे । अधिक नहीं । कोई आचार्य कहते हैं कि वार्षिक सूद नियत करके लिया करे। यदि ऋणी पर बहुत काल तक सूद सहित धन रहे तो जितना मूल धन दिया हो उस से द्विगुण तक सब लेवे अधिक नहीं । वृद्धियों के देते जाने पर धन का कर्जा नहीं बढ़ता है । यदि नियत सूद न चुकाता जाय किन्तु रोके
६६ गौतमस्मृतिः ॥
गाश्च कुसीदं पशूपजलोमक्षेत्रशतवाह्येषु नातिपञ्चगुणमज-
डापौगण्डधनं दशवर्षभुक्तं परैः सन्निधौ भोक्तुःश्रोत्रियप्रव्र-
जितराजन्यधर्मपुरुषैः पशुभूमिस्त्रीणामनतिभोगे रिक्थभा-
जि ऋणं प्रतिकुर्य्युः । प्रातिभाव्यवणिक्शुल्कमद्यद्यूतदण्डान्
पुत्रा नाध्याभवेयुः । निध्यं वाधियाचितावक्रीताधयो नष्टाः
सर्व्वा न निन्दिता न पुरुषापराधेन, स्तेनः प्रकीर्णकेशो मु-
सली राजानमियात् कर्म्म चक्षाणः पूतो वधमोक्षाभ्यामघ्नन्ने-
रहे तो सूद पर सूद लेने का सिलसिला चलकर चक्र वृद्धि कहाती है । ऋणी ने जो स्वयं नियत की हो कि मैंने इतना लिया उस पर इतना अधिक दूंगा यह कारिता वृद्धि है । जितने अधिक काल ऋण रहे उतने काल बराबर सूद बढ़ता ही जाय, मूल से दूना तक लने का नियम न रहे यह कालवृद्धि (कालिका) कहाती है । जिस सूद के बदले शरीर से नियत दिनों तक कोई काम कर देना ठहरे वह कायिका वृद्धि है । और जो किसी वस्तु के नियत काल तक वर्तलेने से दी जाय वह अधिकभोगा वृद्धि कहाती है । ये सब वृद्धि (सूद लेने के तरीके) निकृष्ट (बुरी) हैं । पशु (भेडा आदि के) गोम-ऊन और सैकड़ों बार ऋणी का खेत जोत लेने से पांच गुण से अधिक वृद्धि (सूद) नहीं होता । जो पुरुष बौरा (पागल) वा अज्ञान (नाबालिग) न हो किन्तु अपने होश में ठीक हो उस का खेत आदि दश वर्ष तक जिस के अधिकार में रहे आगे उसी का होजाता है । परन्तु वेदपाठी, संन्यासी, राजपुरुष और धर्मनिष्ठ पुरुष जिसके पदार्थ को दश वर्ष भी भोगे तो भी उन का नहीं होता । पशु भूमि और स्त्री का अतिभाग अर्थात् हानि न होने के निमित्त कुटुम्बी वा अन्य मेजी लोग ऋणदाता के ऋण को चुका देवें । जामिनी, वाणिज्य का कर, मद्य और द्यूत (जुआ) सम्बन्धी दण्ड पिता के अभाव में पुत्रों पर नहीं होना चाहिये । कोश का धन, मांगा हुआ, और खरीदा हुआ वस्तु ये सब जिस को सौंपे जायं उस पुरुष का अपराध न होने पर नष्ट हो जायं अर्थात् खोजावें तो जिसे मिलें वह अपराधी नहीं माना जायगा । जिस ब्राह्मण ने सुवर्ण चुराया हो वह अपने शिर के बाल खोल कर मूसल हाथ में लेके राजा के पास अपना अपराध कहता हुआ जावे । राजाके मारने वा छोड़देने से अपराध
भाषाधर्मसंहिता ॥ ३१
नस्वी राजा न शारीरो ब्राह्मणदण्डः कर्म्मवियोगविख्यापन- विवासनाङ्ककरणान्यप्रवृत्तौ प्रायश्चित्ती स चौरसमः, स- चिवो मतिपूर्वं प्रतिगृहीतोप्यधर्म्मसंयुक्ते पुरुषशक्त्यपरा- धानुबन्धविज्ञानाद्दण्डनियोगोऽनुज्ञानं वा वेदवित्समवाय- वचनाद्वेदवित्समवायवचनात् ॥ २ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
विप्रतिपत्तौ साक्षिणि मिथ्यासत्यव्यवस्था बहवः स्यु- रनिन्दिताः स्वकर्म्मसु प्रात्ययिका राज्ञां च निष्प्रीत्यनभितापा- श्चान्यतरस्मिन्नपि शूद्रा ब्राह्मणस्त्वब्राह्मणवचनादनुरो- ध्योऽनिबन्धश्चेन्नासमवेतापृष्टाः प्रब्रूयुरवचनेऽन्यथावचने च
छूट जाता है। राजा यदि न मारे तो अपराधी होता है। ब्राह्मण को मार- डालने का दण्ड नहीं होना चाहिये। इसलिये राजा को चाहिये कि उसे ब्राह्मण के वेदाध्ययनादि कामों से वियुक्त करे, महापातकी होने का विज्ञा- पन देवे, वा देश निकाले का दण्ड देवे अथवा दाग देकर सुवर्ण की चोरी का चिह्न करदेवे। यदि राजा इन में से कुछ भी न करे तो चोर के समान अ- पराधी होता है। मन्त्री को विचार पूर्वक परीक्षा करके नियत करने पर भी पीछे अधर्म संयुक्त प्रतीत हो तो पुरुष शक्ति के अपराध का परिणाम सोच कर मन्त्री को भी दण्ड देवे। अथवा वेदवेत्ताओं के सम्बन्धी वचन वा आज्ञा से उस को दण्ड न दे कर मन्त्री पद से च्युत करने की आज्ञा देवे ॥ २ ॥ यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में बारहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१२॥ किसी मामले में परस्पर विरुद्ध दोनों पक्ष प्रतीत होते हों तो झूठ सत्य का निर्णय साक्षी पर जाने। वे साक्षी लोग अपने २ धर्म कर्म में श्रद्धा विश्वास रखने वाले लोक में प्रतिष्ठित हों निन्दित न हों। राजा के साथ जिनका न प्रेम हो न डरते हों तथा वादी प्रतिवादी दोनों में किसी से जिनका विशेष मेल न हो न विरोध हो ऐसे बहुत मनुष्य साक्षी हों। किसी पक्ष में भले ही शूद्र भी साक्षी हों। ब्राह्मण से भिन्न साक्षी के वचन की अपेक्षा ब्राह्मण साक्षी के कथन का विशेष अनुरोध करे। यदि साक्षियों में परस्पर मेल हो तो पृथक् २ पूछे बिना साक्षी लोग कुछ न कहें। साक्षी लोग अदालत में कुछ भी न कहें वा मिथ्या
| ३८ | गौतमस्मृतिः ॥ |
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दोषिणः स्युः, स्वर्गः सत्यवचने विपर्यये नरकः ॥ १ ॥ अनिबन्धैरपि वक्तव्यं पीडाकृते निबन्धः प्रमत्तोक्ते च साक्षिसभ्यराजकर्तृषु दोषो धर्मतन्त्रपीडायां शपथैर्नैके सत्यकर्मणा तद्देवराजब्राह्मणसंसदि स्यादब्राह्मणानां पञ्च पश्वनृते साक्षी दश हन्ति गोऽश्वपुरुषममिषु दशगुणोत्तरान् सर्वं वा भूमौ हरणे नरको भूमिवदप्सु मैथुनसंयोगे च पशुवन्मधुसर्पिषो, गोवद्वस्त्रहिरण्यधान्यब्रह्मसु यानेष्वश्ववन्मिथ्यावचने याप्यो दण्ड्यश्च साक्षी नानृतवचने दोषो जीवनं चेत्तदधीनं नतु पापीयसो जीवनं राजा प्राड्विवाको ब्राह्मणो वा शास्त्रवित्।
कहें तो दोनों हालत में दोषी होते हैं। सत्य बोलने पर साक्षियों को स्वर्ग और मिथ्या बोलने से नरक प्राप्त होता है ॥१॥ कुछ प्राप्ति का निबन्ध न होने पर भी साक्षी ठीक देनी चाहिये। निबन्ध, पीड़ा (दुःख) करने वाला होता है। प्रमाद से मिथ्या कहने से राजसभा में अन्याय होतो साक्षी सभासद्, राजा और अधर्म करने वाला ये चारों अपराधी होते हैं। किन्ही आचार्यों का मत है कि धर्म को धक्का लगने का भय होतो शपथ (कसम) से निश्चय करे। सत्य धर्म कर्म की कसम ब्राह्मण से करावे सो देवस्थान राजसभा और ब्राह्मणों की सभा में शपथ करावे। ब्राह्मण से भिन्न साक्षियों से कहे कि-जो पुरुष पशुओं विषयक गवाही में झूठ बोलता है वह अपने कुल की पांच हत्या का दोषी होता, गौ के विषय में झूठ बोलने पर दश हत्या का दोषी, घोड़े के विषय में झूठ बोलने पर सौ हत्या का, मनुष्य के विषय में हजार हत्या का, और भूमि के विषय में झूठ बोलने पर दशहजार हत्या का दोषी होता है। अथवा भूमि विषयक झूठ में सब कुटुम्ब की हत्या का दोषी होता। भूमि के चुराने पर नरक होता और भूमि विषयक झूठ गवाही के तुल्य जल के विषय में और मैथुन संयोग के विषय में मिथ्या गवाही देने से दोष लगता है। शहद और घी के विषय में पशुओं के तुल्य, वस्त्र, सुवर्ण, अन्न, और वेद विषय में गौ के तुल्य, सवारियों (रथादि) के विषय में घोड़े के तुल्य दोष लगता है। यदि गवाह मनुष्य का मिथ्या कहना सिद्ध हो जावे तो उसे निकाल देवे और दण्ड करे। यदि उस मनुष्य की गवाही देने से ही जीविका होतो मिथ्या भाषण में भी राजदण्ड का अपराधी नहीं है। परन्तु ऐसे पापी गवाह की जीविका भी वास्तव में जीविका नहीं है। राजा (हाकिम) वकील,
भाषार्थसंहिता ॥ ३१
प्राड्विवाको मध्यो भवेत्, संवत्सरं प्रतीक्षेत प्रतिभायां धेन्व- नडुत्स्त्रीप्रजनसंयुक्तेषु शीघ्रमात्ययिके च सर्वधर्म्मेभ्यो ग- रीयः प्राड्विवाके सत्यवचनं सत्यवचनम् ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ शावमाशौचं दशरात्रमनृत्विग्दीक्षितब्रह्मचारिणां सपिण्डा- नामेकादशरात्रं क्षत्रियस्य द्वादशरात्रं वैश्यस्यार्द्धमासमे- कमासं शूद्रस्य तच्चेदन्तः पुनरापतेत्तच्छेषेण शुद्धयेरन्, रा- त्रिशेषे द्वाभ्यां प्रभाते तिसृभिर्गोब्राह्मणहतानामन्वक्षं राज- क्रोधाच्चयुद्धे प्रायोनाशकशस्त्राग्निविषोदकोद्वन्धनप्रपतनैश्चे-
और शास्त्रों का जानने वाला ब्राह्मण ये लोग किसी धनी से घूस लेकर मि-
थ्या न्याय न करें । अदालत में वकील मध्यस्थ हो । किसी स्त्री का मुकद्दमा
हो और उसका अपराधिनी होना सिद्ध न हो तो एक वर्ष तक उसकी निग-
रानी करे । गौ, बैल, स्त्री के सन्तानोत्पत्ति (व्यभिचार से हो) और अत्याचार
सम्बन्धी मुकद्दमों का शीघ्र फैसला करना अन्य सब धर्मों से श्रेष्ठ है । अदालत में
सत्य बोलने का विशेष भार वकीलपर होना चाहिये अर्थात् सत्य वक्ताओं
में प्रसिद्ध परीक्षित पुरुष वकालत करने के लिये राजनियम से नियत
होने चाहिये ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
अथ मृतक अशुद्धि का विचार दिखाते हैं। ऋत्विज्, दीक्षित (जिन ने यज्ञ में दीक्षा ली हो) और ब्रह्मचारी इन को छोड़के अन्य सामान्य मनुष्य लोग दश दिन तक मृत सूतक मानैं। अन्य सपिण्ड के लोग ग्यारह दिन, क्षत्रिय बारह दिन, वैश्य पन्द्रह दिन और एक मास तक शूद्र लोग मरण सूतक मानैं। यदि एक के मरने की शुद्धि होने से पहिले उसी कुटुम्ब का अन्य कोई मरजावे तो पहिले के साथ ही अगले की भी शुद्धि कर लेवें । यदि पहिले की शुद्धि में एक रात्रि भर बाकी हो तो दो दिन में शुद्धि करें । यदि पहिले सूतक के अन्तिम दिन प्रातःकाल द्वितीय मृत्यु हो तो तीन दिन अशुद्धि मानैं । जो पुरुष गौ- तथा ब्राह्मण ने मार डाले हों, जो गाड़ी से दब के मरे हों, जो राजाओं के क्रोध से हुए युद्ध में कट के मरे, जो प्रायः नाशक—शस्त्रों से, अग्नि में जल कर, विष खाकर, जल में डूबकर, फांसी लगा कर, वा किसी ऊंचे मकाना-
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४० | गौतमस्मृतिः ॥
चतुर्णां पिण्डनिवृत्तिः सप्तमे पञ्चमे वा, जननेप्येवं माता- पित्रोस्तन्मातुर्वा गर्भमाससमारात्रीः संसने गर्भस्य त्र्यहं वा श्रुत्वा चोर्ध्वं दशम्याः पक्षिण्यसपिण्डेयोनिसंबन्धे सहाध्या- यिनि च सब्रह्मचारिण्येकाहं श्रोत्रिये चोपसंपन्ने प्रेतोपस्प- र्शने दशरात्रमाशौचमभिसंधायचेदुक्तं वैश्यशूद्रयोरार्तवोर्वा पूर्वयोश्च त्र्यहं वाऽऽचार्यतत्पुत्रस्त्रीयाज्यशिष्येषु चैवमव- रश्चेत्पूर्वं वर्णमुपस्पृशेत् पूर्वो वाऽवरं तत्र शावोक्तमा- शौचं, पतितचाण्डालसूतिकोदक्याशवस्पृष्टितत्स्पृष्ट्युपस्प- र्शने सचैलोदकोपस्पर्शाच्छुध्येच्छवानुगमे च शुनश्च यदुपहन्यादित्येके,उदकदानं सपिण्डैः कृतचूडस्य तत्स्त्रीणां
द्धि से गिर कर अपनी इच्छा पूर्वक मरे हों उन को सातवें वा पांचवें वर्ष पिण्ड देना निवृत्त हो जाता है अर्थात् आगे उन के नाम से पिण्ड नहीं देना चाहिये । जन्म सूतक में भी इसी तरह मृतक के समान शुद्धि जानो । सन्तानोत्पत्ति में माता पिता दोनों को वा केवल माता को ही अशुद्धि लगती है । गर्भ पात होने पर जितने महीनों का गर्भ गिर जाय उतने दिन में शुद्धि करे । विदेश में दश दिन बाद सूतक जान पड़े तो तीन दिन में शुद्धि करे । यदि सपिण्ड से भिन्न कुटुम्बी वा नातेदारों का सूतक दश दिन बाद सुने तो दो दिन एक रात में शुद्धि करे । और साथ २ पढ़ने वाले वा साथ में जो ब्रह्मचारी रहा हो तथा श्रोत्रिय (वेदपाठी) के स्वर्गवास में एक दिन रात में शुद्धि करे । जान कर मुर्दा का स्पर्श करने वाला दश दिन सूतक माने । वैश्य शूद्रों का सूतक पूर्व में कहचुके हैं । रजस्वला स्त्रियां का तथा सूतकी ब्राह्मण क्षत्रियों का स्पर्श करके तीन दिन में शुद्धि करे । गुरु, गुरुपुत्र, गुरुपत्नी, यजमान और शिष्य के देहान्त में भी तीन दिन सूतक माने । सूतक में नीच वर्ण का पुरुष उत्तम वर्ण का वा उत्तम वर्ण नीच का स्पर्श करे तो मृत सूतक के समान अशुद्धि जानो । पतित (ब्रह्महत्यादि पातकी) चाण्डाल, सूतिका स्त्री, रजस्वला, मुर्दा का स्पर्श करने वाला और उस स्पर्श कर्त्ता का छूने वाला, इन पतितादि का स्पर्श करने पर सचैल स्नान करने पर शुद्ध होता है मुर्दा के संग जाने और हाथ से कुत्ते को मारने पर भी सचैल स्नान करे यह किन्ही आचार्यों का मत है । जिस का चूड़ाकर्म संस्कार हो गया हो उस के मरने
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९
चानतिभोगएके प्रदत्तानामधःशय्यासनिनो ब्रह्मचारिणः सर्वे न मार्जयेरन्न मांसं भक्षयेयुराप्रदानात्प्रथमतृतीयपञ्चमसप्तमनवमेषूदकक्रिया वाससां च त्यागः, अन्त्येत्वन्त्यानां दन्तजन्मादि मातापितृभ्यां तूष्णीं माता, बालदेशान्तरितप्रव्रजितासपिण्डानां सद्यः शौचं, राज्ञां च कार्याविरोधाद् ब्राह्मणस्य च स्वाध्यायानिवृत्यर्थं स्वाध्यायानिवृत्यर्थम् ॥१॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अथ श्राद्धममावास्यायां पितृभ्यो दद्यात्, पञ्चमीप्रभृति वापरपक्षस्य यथाश्रद्धं सर्वस्मिन्वा द्रव्यदेशब्राह्मणसन्निधाने
पर कुटुम्बी सपिण्ड के लोग जलदान करें । बिना बियाही कन्याओं को जलदान का अधिकार नहीं यह किन्हीं का मत है । कन्यादान हो जाने पर मरें तो जल दिया जाय । सूतक मानने वाले सब लोग दश दिन तक नीचे पृथिवी पर सोवें, बैठे, ब्रह्मचारी रहें, स्नान तथा मार्जनादि शुद्धि न करें, और मांस न खायें कि जब तक प्रथम, तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम दिनों में जल दान करें । और उसी दिन वस्त्रों का भी त्याग करें । शूद्रादि नीचों की शुद्धि के अन्तिम (महिने के पूरे होने पर) दिन वस्त्रों का त्याग और जलदान होना चाहिये । दांत उगने से लेकर चूड़ाकर्म तक बालक के मरने पर माता पिता दोनों या केवल माता अश्रुबिन्दु गिराने के समय मौन रहे । अन्य कुटुम्बी लोग तत्काल शुद्धि करलें । देशान्तर में सपिण्ड का बालक, संन्यासी और सात पीढ़ी से ऊपर कुटुम्बी इन सब के मरने पर तत्काल ही शीघ्र शुद्धि करलें । राजकार्यों की हानि न होने के अनुरोध से राजा को और नित्य नियम से वेदाध्यायन करने वाले ब्राह्मण को वेद अध्ययन का नियम न बिगड़ने के विचार से तत्काल शुद्धि कर लेनी चाहिये ॥ १ ॥
यह गौतमीय धर्म शास्त्र के भाषानुवाद में चौदहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१४॥
अब श्राद्ध का विचार दिखाते हैं । प्रत्येक अमावश्या को पितरों के लिये पार्वण श्राद्ध विधि से पिण्ड देने चाहिये । वा कृष्णपक्ष की पञ्चमी से लेकर श्राद्ध करे । अथवा श्राद्ध का सामान, श्राद्ध के योग्य देश (स्थान) और विद्वान् सुपात्र ब्राह्मण जब मिल जांय तभी श्रद्धानुसार सभी तिथियों में श्राद्ध करे ।
४२ गौतमस्मृतिः ॥
वा कालनियमः शक्तितः प्रकर्षे गुणसंस्कारविधिरन्नस्य नवावरान् भोजयेदयुजो यथोत्साहं वा ब्राह्मणान् श्रोत्रियान् वाग्रूपवयःशीलसंपन्नान् युवभ्यो दानं प्रथममेके पितृवन्न च तेन मित्रकर्म कुर्यात्, पुत्राभावे सपिण्डा मातृसपिण्डाः शिष्याश्च दद्युस्तदभावे ऋत्विगाचार्यो॥ तिलमाषब्रीहियवोदकदानैर्मासं पितरः प्रीणन्ति, मत्स्यहरिणरुरुशशकूर्म्मवराहमेषमांसैः संवत्सरं, गव्यपयःपायसैर्द्वादश वर्षाणि, वाध्रीणसेन मांसेन कालशाकलोहखड्गमांसैर्मधुमिश्रैश्चानन्त्यम् ॥१॥ न भोजयेत् स्तेनकलीवपतितनास्तिकतद्वृत्तिवीरहाग्रेदि-
काल का नियम और अन्न को विशेष शुद्धि सावधानी से बनाने का विचार तो विशेष कर मानना चाहिये । श्राद्ध में नौ से कम १ । ३ । ५ । ७ ऐसे विषम संख्या वालों को वा वाणी, रूप, अवस्था, और स्वभाव जिनके अच्छे हों ऐसे वेदपाठी श्रोत्रियब्राह्मणों को अपनी शक्ति उत्साह के अनुसार भोजन करावे। कोई आचार्य कहते हैं कि जो युवावस्था में मरे हों उनके नाम के ब्राह्मणों को पहिले जिमावे। जिन ब्राह्मणों का श्राद्ध में पूजन करे उनके साथ मित्रवत् बराबरी का व्यवहार कभी न करे किन्तु उनका सदा पूज्यमाना करे। जिन के कोई पुत्र न हों उन के लिये अपने सपिण्डा या माता के सपिण्डा अथवा शिष्य लोग श्राद्ध करें। यदि इन में भी कोई न हो तो ऋत्विक् वा गुरु उनका श्राद्ध करें। तिल माष ( उड़द ) धान, जौ और जल से किये श्राद्ध से एक मास तक पितर तृप्त होते, मछली, हिरण, रोज, शश ( खरगोश, ) कछुआ, भैंसा, और मेढ़ा इनके मांस से एक वर्षतक, गौ के दूध, पायस ( खीर ) और बड़े २ कानों वाले बकरे के मांस से बारह वर्षतक, उन २ ऋतु के शाक, लाल बकरा, गैंडा, इनके शहद मिले मांस के पिण्डों से अनन्त कालतक पितरों की तृप्ति होती है ॥ १ ॥ ( जिस द्विज लोगों के लिये मांस खाने का निषेध है उनके लिये मांस के पिण्ड देने का भी निषेध ही जानो । क्योंकि ( यदन्नःपुरुषोभवतितदन्नास्तस्य देवताः ) जिस २ अन्न को जो २ खाता हो वही अपने २ देवों तथा पितरों को देवे यह परम सिद्धान्त है । इस के अनुसार ( निषेध होने पर भी ) जो मांसाहारी हैं उन्हीं को युगान्तरों में भी मांस पिण्ड देने का विधान जानो । और कलिमें तो सभी के लिये मांस के पिण्डों का निषेध ही है ) चोर, नपुंसक, नास्तिक, नास्तिकता के कामों से जीविका करनेवाला, पतित, वीर पुरुष की
भाषार्थसहिता ॥ ५३
धिषूदिधिषूपतिस्त्रीग्रामयाजकाजपालोत्सृष्टाग्निमद्यपकुचर- कूटसाक्षिप्रातिहारिकानूपपतिर्यस्य च कुण्डाशी सोमविक्रय्य- गारदाही गरदावकीर्णिगणप्रेष्योऽगम्यागोमिहिंस्रपरिवित्ति- परिवेत्तृपर्याहृतपर्याधातृत्यक्तात्मदुर्बलाः कुनखिश्यावदन्त- श्वित्रिपौनर्भवकितवाजपराजप्रेष्यप्रतिरूपकशूद्रपतिनिरा- कृतिकिलासिकुसीदिवणिक्शिल्पोपजीविज्यावादित्रतालवृ- त्यगीतशीलान् पित्राचाकामेन विभक्तान् शिष्यांश्र्चैके सगोत्रांश्च ॥२॥
हत्या करनेवाला, जिसके मौजूद होते ही स्त्री ने अन्य पुरुष करलिया हो, वा जिसने अन्य की विवाहिता स्त्री को रखलिया हो, स्त्री को और गांवभर के मनुष्यों को एक साथ यज्ञ करानेवाला, भेड़ बकरी पालनेवाला, जिसने स्थापन किये अग्नि को त्यागा हो, मद्य पीनेवाला, जिसका चाल चलन अच्छा न हो, झूठ गवाही देनेवाला, जिसकी स्त्री का दूसरा जार पति हो, कूंडे में भोजन करने-वाला, यज्ञ में सोम बेचने वाला, घर में आग लगाने वाला, विष देनेवाला, ब्रह्मचारी होकर जो व्यभिचार करे, सभा का नौकर, अगम्या स्त्री से गमन कर-नेवाला, हिंसक, ज्येष्ठ भाई से पहिले जो अपना विवाह करे वा अग्निहोत्र लेवे वह, और उसका जेठा भाई, जो सब ऊंच नीचों से सब प्रकार का दान लेवे, जो सब वेश्यादि नीच स्त्रियों से भी व्यभिचार करे, जिसने अपने शरणा-गतों वा दुर्बल अनाथ पुत्रादि को त्यागा हो, जिसके नख बिगड़े हों, दांत काले हों, श्वेतकुष्ठी, जो अन्य की स्त्री में पैदा हुआ हो, ज्वारी, बकरियों का पालने वाला, राजा का नौकर, बहुरूपिया, शूद्रा स्त्री का पति, जिसका अनादर खण्डन होता हो, किलासि (एक प्रकार का कुष्ठी,) सूद लेनेवाला, पंसारी आदि की दुकान करने वाला, कारीगर, धनुषबाण चलाने-वाजे ताल बजाने-नाचने और गाने के स्वभाववाला, पिता की आज्ञा वा इच्छा के बिना जिसने विभाग (बांट) किया हो ऐसे उक्तप्रकार के चोरी आदि काम करने वाले ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन न करावे। और कोई आचार्य कहते हैं कि अपने गोत्र के लोगों और अपने शिष्यों को भी श्राद्ध में भोजन न करावे ॥२॥
४४ गौतमस्मृतिः ॥
भोजयेदूर्ध्वं त्रिभ्यो गुणवन्तम् ॥३॥ सद्यः श्राद्धी शूद्रा तल्पगस्तत्पुत्रपुरीषे मासं नयति पितॄंस्तस्मात्तदहर्ब्रह्मचारी स्यात्,श्वचण्डालपतितावेक्षणे दुष्टं तस्मात् परिश्रिते दद्यात्, तिलैर्वा विकिरेत्, पङ्क्तिपावनो वा शमयेत्, पङ्क्तिपावनाः षडङ्गविज्ज्येष्ठसामगस्त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुस्त्रिसुपर्णः पञ्चाग्निः स्नातको(मन्त्रब्राह्मणविद्) धर्म्मज्ञो ब्रह्मदेयानुसंतानइति हविःषु चैवं दुर्बलादीन् श्राद्धएवैके श्राद्धएवैके ॥ ४ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
तीनसे ऊपर पांच वा सात सुपात्रों को अथवा इतने न मिलें तो एक ही गुणवान् तपस्वी विद्वान् धर्मात्मा को भोजन करावे॥३॥ यदि श्राद्ध करने वाला उसी दिन वेश्यादि शूद्रा स्त्री से संयोग करे तो उस शूद्रा से होने वाले पुत्रों की विष्ठा में श्राद्ध कर्त्ता के पितर एक मास तक बसते हैं। इस से श्राद्धकर्ता पुरुष श्राद्ध के दिन ब्रह्मचारी रहे । कुत्ता, चाण्डाल, और पतित लोग श्राद्धान्न को देखें तो दूषित हो जाता है । इस से घेरी हुई एकान्त जगह में श्राद्ध के भोजन और पिण्डदान करे । वा श्राद्ध स्थान के सब ओर तिल विखेर देवे अथवा पङ्क्तिपावन ब्राह्मण श्राद्ध में हो तो अन्यकृत दोष को शान्त कर देगा । १-वेद के छहों अंगों को जानने पढ़ाने वाला । २-सामवेद के आरण्यक भाग को पढ़ा । ३-यजुर्वेद के अध्वर्यु कर्म का ज्ञाता याज्ञिक । ४-जो उपनिषदों में कही तीन प्रकार की मधु विद्या का विद्वान् हो । ५-ऋग्वेद सम्बन्धी होताओं के कर्म का जानने वाला याज्ञिक । ६-गार्हपत्यादि श्रौतस्मार्त्त पञ्चाग्नियों को विधिपूर्वक स्थापित करके अग्निहोत्र नित्य करने वाला । ७-ब्रह्मचर्याश्रम में पूर्ण वेदाध्ययन करके जिस ने समावर्त्तन किया हो । ८-मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग वेद को जानने वाला । ९-धर्म का मर्म जानने वाला धर्मनिष्ठ । १०-और विधिपूर्वक हुए ब्राह्म विवाह से उत्पन्न सन्तान । ये दशप्रकार के ब्राह्मण पङ्क्तिपावन कहाते हैं। देवताओं सम्बन्धी ब्रह्मभोज में भी इसी प्रकार उत्तम निकृष्ट ब्राह्मणों की परीक्षा जानी । किन्ही आचार्यों का मत है कि दुर्बलादि निषिद्ध ब्राह्मणों काश्राद्ध में ही त्याग करे किन्तु दैवकर्मों में परीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है ॥ ४ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥
भाषार्थसहिता ॥ ९५
श्रवणादि वार्षिकं प्रौष्ठपदीं वोपाकृत्याधीयीत छन्दां स्यर्ध पञ्चमासान् पञ्च दक्षिणायनं वा ब्रह्मचार्य्युत्सृष्टलोमा न मांसं भुञ्जीत द्वैमास्यो वा नियमो, नाधीयीत वायौ दिवा पांसुहरे कर्णश्राविणि नक्तं वाणभेरीमृदङ्गजगर्त्तशब्देषु च श्वशृगालगर्दभसंहादे लोहितेन्द्रधनुर्नीहारेष्वभ्रदर्शने चा- पत्तौ मूत्रित उच्चरिते निशासन्ध्योदकेषु वर्षति चैके वली- कसंतानआचार्य्यपरिवेषणे ज्योतिषोश्च भीतो यानस्थः श- यानः प्रौढपादः श्मशानग्रामान्तमहापथाशौचेषु पूतिगन्धा- न्तःशवदिताकीर्त्तिशूद्रसन्निधाने सूतके चोद्गारे ऋग्यजुषं च सामशब्दे यावदाकालिका निर्घातभूमिकम्पराहुदर्शनोल्का-
श्रावणी पौर्णमासी को वा भाद्रपद की पौर्णमासी को उपाकर्म करके साढ़ेचार महिने वा दक्षिणायन के पांच महिनों में सब बालों का मुण्डन करा के ब्रह्मचारी रहता हुआ नियम से वेदों को पढ़े। मांस न खावे। अथवा दो महिनेतक ही वेदाध्ययन का नियम करे। और निम्न लिखित समयों में वेद न पढ़े किन्तु वेदाध्ययन का अनध्याय रक्खे—दिन में आंधी (तूफान आवे) चले, रात के समय कानों में वायु का शब्द सुन पड़े, वाण, नक्कारा, मृदङ्ग, हाथी, और रोगी का चिल्लाना इन बाण आदि का शब्द होने पर, कुत्ता, शृगाल (गीदड़,) गधा, इन का शब्द होने पर, दिशाओं में लाली, इन्द्र धनुष, और कुहिरा पड़ा जबदीखे, वर्षा से भिन्न समय बादल होने पर, जब पेशाब करे वा शौच (मलवत्याग) करे तब शुद्धि करने से पहिले, रात में, दो सन्ध्याओं के समय, जल के बीच, कोई कहते हैं कि वर्षते समय भी, छप्पर (छादन) छावने उठाने के समय, जब गुरु के पास सभालगी हो, वा जब सूर्य चन्द्रमा के सब ओर घेरा खिंचा दीखे, ऐसे आंधी आदि के समय वेद का अनध्याय रक्खे। जब भय लगे, सवारी में बैठा, लेटा हुआ, और पग फैला के भी वेद को न पढ़े। श्मशान (मरघट) में, गांव नगर के समीप, जहां बहुत मनुष्य चलते हों ऐसे बड़े मार्ग के समीप, अशुद्धि के समय, जहां दुर्गन्ध अधिक हो, जिस ग्राममें मुर्दा पड़ा हो उसकी हद्द (सीमा) में, चाण्डाल तथा शूद्र के समीप, सूतक के समय, वमन करके वेद न पढ़े। सामवेद
४६ | गौतमस्मृतिः ॥
स्तनयित्नुवर्षविद्युतः प्रादुष्कृताग्निष्वनृतौ विद्युति नक्तं चापररात्रात्त्रिभागादिप्रवृत्तौ सर्वमुल्काविद्युत्सममित्येकेषाम् ॥ १ ॥ स्तनयित्नुरपराह्णेऽपि प्रदोषे सर्वं नक्तमर्द्धरात्रादहश्चेत्सज्योतिर्विषयस्थे च राज्ञि प्रेते विप्रोष्य चान्योन्येन सह संकुलोपाहितवेदसमाप्तिच्छर्द्दि श्राद्धमनुष्ययज्ञभोजनेष्वहोरात्रममावास्यायां च द्व्यहं वा कार्त्तिकी फाल्गुन्याषाढी पौर्णमासी तिस्रोऽष्टकास्त्रिरात्रमन्यामेके अभितो वार्षिकं सर्व्वैर्वर्षविद्युत्स्तनयित्नुसन्निपाते प्रस्पन्दिन्यूर्ध्वं भोजनादुत्सवे प्राधीतस्य च निशायां चतुर्मुहूर्तं नित्यमेके
की ध्वनि में ऋग्वेद यजुर्वेद को न पढ़े। जब आकाश में अकस्मात् उत्पात का शब्द हो, भूकम्प हो, जब राहु का उपद्रव दीखे, जब बड़ा उल्कापात हो, सन्ध्याओं में वा वर्षा से भिन्न काल में बादल गर्जे-मेघ वर्षे-बिजुली चमके वा रात में विद्युत् गिरे तब एक दिन रात वेद का अनध्याय करे। आधी-रात से लेके रात के तीसरे प्रहर में वेद को न पढ़े। किन्हीं आचार्यों का मत है कि उल्कापात और विद्युत् का भयंकर शब्द होने पर सभी समय अर्थात् वर्षा में भी वेद का अनध्याय करे ॥ १ ॥ यदि अपराह्न (दोपहर बाद) में वा सन्ध्या के समय बादल गर्जे तो रात्रि भर वेद न पढ़े। यदि दो पहर से पहिले गर्जे तो सन्ध्या तक न पढ़े। जिस राजा के राज्य में रहता हो उन का स्वर्गवास होने पर, विदेश में जाकर परस्पर एक दूसरे के साथ असम्भव मेज के समय, वेद समाप्ति पर, वमन के समय, श्राद्ध के भ-जन, अतिथि बन के अन्य के घर भोजन करने पर इन अवसरों में एक दिन रात वेद न पढ़े। चतुर्दशी, अमावास्या, कार्त्तिक, फाल्गुन, आषाढ़ महिनों की पौर्णमासी, (इन्हीं पौर्णमासियों में चातुर्मास्ययागों के तीन पर्व होते हैं) तीनों अष्टका श्राद्धों में तीन दिन तक, इन चतुर्दश्यादि में वेद को न पढ़े। कोई आचार्य कहते हैं कि वर्षा ऋतु के आदि अन्त में वर्षा, बिजुली की चमक और गर्जना एक साथ हों वा बूंदें पड़ती हों, भोजन के ऊपर, तथा उत्सव के समय भी वेद को न पढ़े। पढ़े हुए वेद का रात्रि के पहिले प्रहर में ही पाठ
भाषाधर्मसंहिता ॥ ४७
नगरे मानसम्प्यशुचि श्राद्धिनामाकालिकमकृतान्नश्राद्धिकसं योगेऽपि प्रतिविद्यं च यावत्स्मरन्ति यावत्स्मरन्ति ॥ २ ॥ इति गौतमीये धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ प्रशस्तानां स्वकर्मसु द्विजातीनां ब्राह्मणो भुञ्जीत, प्रति- गृह्णीयाच्चैधोदकयवसमूलफलमध्वभयाभ्युद्यतशय्यासनावस- थयानपयोदधिधानासफरिप्रियङ्गुस्रङ्मार्गशाकान्यप्रणोद्या- नि सर्वेषां पितृदेवगुरुभृत्यभरणे चान्यवृत्तिश्चेन्नान्तरेण शूद्रान्,पशुपालक्षेत्रकर्षककुलसंगतकारपितृपरिचारका भोज्या न्ना वणिक् चाशिल्पी,नित्यमभोज्यं केशकीटावपन्नं रजस्व- लाकृष्णशकुनिपदोपहतं भ्रूणघ्नावेक्षितं गवोपघातं भावदुष्टं
करे । गांव वा नगर में, तथा मनमेंग्लानि होने पर नित्य ही अनध्याय करे । श्राद्ध करनेवाला एक दिन रात वेद न पढ़े । यदि श्राद्ध सम्बन्धी कच्चा अन्न सीधा लेवे तो भी वेद का अनध्याय करे। प्रत्येक वेद में जितना२ कहा हो उ- तना अनध्याय माने ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ॥१६॥
ब्राह्मण पुरुष उन द्विजातियों के घरपर भोजन करे जो अपने२ शास्त्रोक्तकर्मों में प्रशंसा पाये हों। और ईंधन, जल, भूसा, मूल, फल' शहद, अभय, नये बने हुए तयार-खटिया, आसन, घर' सवारी, ( रथादि ) दूध, दही, भुनेजौ, मछली, ककुनी' माला, मार्ग, और हरे शाक इन पदार्थों को जो कोई प्रीति श्रद्धा से देवे तो पितर, देव और गुरुकी पूजार्थ तथा स्त्री पुत्रादि की रक्षार्थ सब के ले लेवे निषेध न करे। यदि अध्यापनादि द्वारा अन्य जीविका निर्वाह के लिये हो तो शूद्रों को छोड़कर अतिशूद्रादि से न लेवे। गोपाल, किसान, कुलका संगी, पिता का सेवक और जो कारीगरी को छोड़ के अन्य प्रकार की दुकान करता हो ऐसे शूद्रों का भी कच्चा अन्न ब्राह्मण को भक्ष्य है। जिस पकाये भोजन में बाल वा कीड़े गिर गये हों, रजस्वला स्त्री ने छू लिया हो, काले पक्षी के पग जिसमें लग गये हों, भ्रूण ( गर्भ ) हत्या करने वाले ने जिसे देखा हो, गौ वा बैलने सूंघा हो, जिसको किसी ने दूषित कहा हो वा जिस के दूषित होने में शंका हो गयी हो, जो दही को छोड़ के धरा रहने से ख-
७
४८ गौतमस्मृतिः ॥
शुक्तं केवलमदधि पुनःसिद्धं पर्युषितमशाकभक्ष्यस्नेहमांसम-
धन्युत्सृष्टपुंश्चल्यभिशस्तानपदेश्यदण्डिकतक्षकदर्यबन्धनिकार्चिकित्सकमृगयुवार्युच्छिष्टभोजिगणविद्विषाणामपाङ्क्ता-
नां प्राग्दुर्बलाद्वृथानाचमनोत्थानव्यपेतानि समासमा-
भ्यां विषमसमै पूजान्तरानर्चितं च गोश्च क्षीरमानर्दशा-
याः सतकेचाजामहिष्योश्च नित्यमाविकमपेयमौष्ट्रमेकशफं
च स्यन्दिनी यमसूसन्धिनीनां च याश्च व्यपेतवत्साः प-
ञ्चनखाश्चाशल्यकशशकश्वाविद्गोधाखड्गकच्छपाउभयतोद-
त्केशलोमैकशफकलविङ्कप्लवचक्रवाकहंसाः काककङ्कगृ-
टाय गया हो' फिर से पकाया, धरा हुआ ( बासी ), ये उक्त सब पक्वान्न अभक्ष्य हैं। परन्तु शाक, भक्षण के योग्य घी तेलादि स्नेह, मांस और मिष्टान्न ये घरे हुए भी अभक्ष्य नहीं हैं। जो अन्न किसी ने छोड़ वा फेंक दिया हो, निन्दितका, यह न ज्ञात हो कि यह किसके यहां का है, संन्यासीका, बढ़ई, कंजूस, कैदी, वैद्य, वधिक, वारी, जूठन खानेवाला, इन निन्दितादि का, चन्दे का, विद्वेषी ( शत्रुओं ) का और बिरादरी से छेके हुओं का अन्न अभक्ष्य है। अपने आश्रित या घरके रोगी आदि से पहिले भोजन न करे। जिस में से पंच महायज्ञ न हुए हों ऐसा वृथान्न, पांति में कोई भी अन्त का आचमन (ओ-ममृतापिधानमसि स्वाहा ) मन्त्र से कर ले तब वा कोई पांति में से उठ जावे तब वा जब पांति के लोग भोजन करना छोड़ देवें तब भी भोजन न करे। जहां बराबर वालों में पक्षपात से आदर की विषमता की जाय वा ऊंच नीचों का तुल्य आदर किया जाय वहां भी भोजन न करे। जहां पहिले की अपेक्षा आदर कम हो, वा आदर के साथ जहां भोजन न कराया जाय वहां भी न खावे। व्याने पर सूतक समय दश दिन के भीतर गौ भैंस तथा बकरी का दूध न खावे, भेड़ी, ऊंटनी, घोड़ी, ऋतुमती वा जिसका दूध थनों में से चूता हो, जो दो बच्चों से व्यावे, जो गर्भर्वार्तणी आदि हो और दूध देवे, जिस गौ आदि का बच्चा मरगया हो इन भेड़ी आदि का दूध न खाना चाहिये। सेही, शश (खरहा), गोधा ( गोह ), गैंठा, और कछुआ को छोड़कर बाकी पांच नखोंवाले, दोनों ओर दांतोंवाले, केशों के तुल्य बड़े २ लोमोंवाले, एक खुर वाले, कलविङ्क ( गवरापक्षी ) प्लव ( जल में तरनेवालेपक्षी ) चकवा, हंस, कौवा, कंक ( जिस के पंखों को बाण में लगाते हैं ) गीध, और श्येन पक्षी,
भाषार्थसहिता ॥ ४९
प्रश्येना जलजा रक्तपादतुण्डा ग्राम्यकुक्कुटसूकरौ धेन्वन- डुहौ चापन्नदावसन्नवृथामांसानि किसलयक्याकुलसूननिर्याास- लोहिताव्रश्चनाःश्वनिहतदारुवकबलाकाद्रुद्रुटिट्टिभमान्धातृ नक्तंचरा अभक्ष्याः ॥१॥ नभक्ष्याः प्रतुदा विकिरा जालपादा मत्स्याश्चाविकृतावध्याश्च धर्मार्थेऽव्यालहता दृष्टदोषवाक्- प्रशस्तान्यभ्युक्ष्यौपयुञ्जीतोपयुञ्जीत ॥ २ ॥
इति गौतमीये धर्मशास्त्रे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७ ॥
अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री नातिचरेद्भर्त्तारं वाक्चक्षुःकर्म्मसंय- ताऽपमिरपत्यलिप्सुर्देवराद्गुरुप्रसूतान्नर्त्तुमृतीयात्पिण्डगोत्र-
जल में पैदा हुए मछली आदि, जिनके पंजे वा चोंच लाल हों, गांव का मुरगा, गांव का सूअर, गौ, बैल, स्वयं मरे, वनके अग्नि से जलके मरे। इन सब पशुनक्षादि का मांस नहीं खाना चाहिये। यज्ञादि को छोड़ केवल खाने के लोभ से प्राप्त किया मांस भी अभक्ष्य है। पत्तों का रसादि, स्वयं सादें का मांस, वृक्षों का लाल गोंद, गोदमे से निकला गोंद, कुत्ते ने मारी शिकार, कठफोरवा (दारुवक), बगला, रोगीजीव, टिटुहिया, मान्धाता-पक्षी, और रात्रि में विचरने वाले चमगीदड़ आदि ये सब अभक्ष्य हैं ॥ १॥ जो चोंच से मार २ के जीवों को खाते, नखों से बिखेर २ के जो खाते, जिन के पग जाल के तुल्य हैं और सब मछलियां भी अभक्ष्य हैं। जिसके शरीर में विकार हो और जो अवध्य हैं उन का भी मांस न खावे। यज्ञादि धर्म के लिये जो पशुपक्षी विधिपूर्वक मारे गये हों, जिन को सांप ने न काटा हो, जिन में शास्त्र से वा प्रत्यक्ष से कोई दोष न देखा गया हो और वाणी से जो प्रशस्त हों ऐसे जीवों के मांस को देवता तथा पितरों का पूजन समर्पण करके उपयोग में लावे ॥ २ ॥
यह गौतमीय धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
धर्मविषय में स्त्री स्वतन्त्र नहीं है, वाणी, चक्षु, और हाथ पांव की चेष्टा को वशीभूत नियम बद्ध रखती हुई पति की आज्ञाका उल्लंघन न करे। पति के अभाव में सन्तान को चाहती हो तो देवर, गुरुपुत्र वा पिण्ड गोत्र ऋषि जिन के एक ही हों ऐसे पति के कुल के कोई पुरुष अथवा पति के कुल के किसी पुरुष से ऋतुकाल में वीर्यदान लेकर सन्तान उत्पन्न कर लेवे। कोई
| ५० | गौतमस्मृतिः ॥ |
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ऋषिसंबन्धिभ्यो योनिमात्रान्द्वा, नादेवरादित्येके, नातिद्वितीयं, जनयितुरपत्यं समयादन्यत्र जीवतश्च क्षेत्रे परस्मात्तस्य द्वयोर्वा रक्षणाद्भर्तुरेव नष्टे भर्तरि षाड्वार्षिकं क्षपणं श्रूयमाणेऽभिगमनं प्रव्रजिते तु निवृत्तिः प्रसङ्गात्तत्स्य द्वादशवर्षाणि ब्राह्मणस्य विद्यासंबन्धभ्रातरि चैवं ज्यायसि यवीयान्कन्याग्न्युपयमनेषु षडित्येके त्रीन्कुमार्यृतूनतीत्य स्वयं युज्येतानिन्दितेनोत्सृज्य पित्र्यानलङ्कारान् प्रदानं प्रागृतोरप्रयच्छन् दोषी प्राग्वाससः प्रतिपत्तेरित्येके द्रव्या-
आचार्य कहते हैं कि देवर से भिन्न पुरुष के साथ नियोग न करे। पति से अन्य दूसरे नियुक्त का उल्लंघन करके किसी तीसरे से स्त्री संग न करे। नियोग के नियत समय से भिन्न काल में नियुक्त के साथ स्त्री संग करे तो वह सन्तान उत्पादक नियुक्त पुरुष का होगा। और पति के जीवित रहते ही यदि अन्य किसी पुरुष से सन्तान उत्पन्न हो तो वह सन्तान उस उत्पादक का वा दोनों का माना जायगा (अर्थात् बीज के स्वत्व से उत्पादक का और क्षेत्र के स्वत्व से क्षेत्र वाले का होगा) यदि स्त्री का पति उस की रक्षा भी करे तो उसी का सन्तान होगा। किसी स्त्री का पति कहीं विदेश में चला जाय और पता न हो कि कहां गया तो छः वर्ष तक उस की बाट देखे कालक्षेप करे। यदि सुन पड़े कि अमुक ग्राम वा नगर में है तो पति के समीप स्त्री चली-जावे। यदि वह पति संन्यासी हो गया हो तो फिर उस के पास न जावे। योनि सम्बन्धी वा विद्या सम्बन्धी बड़े भाई ब्राह्मण के कहीं अज्ञात निकल जाने पर छोटा भाई कन्या के स्वीकार, अग्नि स्थापन और विवाह करने के लिये बारह वर्ष तक वा किन्हीं आचार्यों के मत से छः वर्ष तक बाट देखे। यदि ऋतुमती होने से पहिले पिता वा पितृस्थानी चाचा भ्रातादि कन्या का विवाह न करदें तो तीन बार ऋतुमती होने पश्चात् पिता के दिये आभूषणों का त्याग करके स्वयं किसी अनिन्दित सत्पात्र वर के साथ विधिपूर्वक विवाह कर लेवे । ऋतुमती होने से पहिले विवाह न करे तो पितादि को पाप दोष लगता है। और कोई आचार्य कहते हैं कि वस्त्र में दाग लगने से पहिले ही विवाह न करने पर पाप लगता है। कन्या का विवाह करने के