ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७५
सभी लोगोंने बाणका अनुगमन किया। इन सबसे युक्त महादेव और भद्रकालिकाको देखकर चक्रपाणि श्रीकृष्णने यथोचितरूपसे सम्भाषण किया। तदनन्तर बाणने शङ्खध्वनि करके पार्वतीश्वर शिवको प्रणाम किया और धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ाकर उसपर दिव्यास्त्रका संधान किया।
इस प्रकार बाणको युद्धके लिये उद्यत देखकर शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले सात्यकि उपस्थित सभी लोगोंके द्वारा मना किये जानेपर भी कवच धारण करके हर्षपूर्वक आगे बढ़े। नारद! तब बाणने उनपर मञ्छन नामक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया। वह अस्त्र अमोघ, ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यके समान प्रकाशमान तथा अत्यन्त तीखा था। फिर तो घोर युद्ध होने लगा। परस्पर बड़े-बड़े घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया गया। भयानक समर होते-होते जब भगवान् कालाग्नि नामक रुद्रके महाबली हलधर बलदेवजीको बाणासुरका वध करनेके लिये तैयार देखा, तब उन्होंने उनको रोक दिया। इसपर बलदेवजीने क्रुद्ध होकर कालाग्निरुद्रके रथ, घोड़े और सारथिका नाश कर दिया। तब कालाग्निरुद्रने कोपमें भरकर भयंकर ज्वर छोड़ा। इससे श्रीहरिके अतिरिक्त अन्य सभी यादव ज्वरसे आक्रान्त हो गये। उस ज्वरको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने वैष्णव-ज्वरकी सृष्टि की और उस रणके मुहानेपर माहेश्वर-ज्वरका विनाश करनेके लिये उसे चला दिया। फिर तो दो घड़ीतक उन दोनों ज्वरोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें उस रणाङ्गणमें वैष्णव-ज्वरसे आक्रान्त होकर माहेश्वर-ज्वर धराशायी हो गया, उसकी सारी चेष्टाएँ शान्त हो गयीं। पुनः चेतनामें आकर वह माधवकी स्तुति करने लगा।
ज्वर बोला— भक्तानुग्रहमूर्तिधारी भगवन्! आप सबके आत्मा और पूर्णपुरुष हैं; सबपर आपका समान प्रेम है, अतः जगन्नाथ! मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये।
उस ज्वरके विनीत वचनको सुनकर श्रीकृष्णने अपने वैष्णव-ज्वरको लौटा लिया। तब माहेश्वर-ज्वर भयभीत होकर रणभूमिसे भाग खड़ा हुआ।
तत्पश्चात् बाणने पुनः आकर ऐसे हजारों बाण चलाये, जो प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान तथा मन्त्रोंद्वारा पावन किये गये थे; परंतु अर्जुनने खेल-ही-खेलमें अपने बाणसमूहोंद्वारा उन्हें रोक दिया। तब बाणने
७७६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान चमकीली शक्ति चलायी, किंतु महाबली अर्जुनने उसे भी अनायास ही काट गिराया। यह देखकर बाणने पाशुपतास्त्रको, जिसकी प्रभा सैकड़ों सूर्योंके समान थी और जो अत्यन्त भयंकर, अमोघ तथा विश्वका संहार करनेवाला था, हाथमें लिया। उसे देखकर चक्रपाणिने अपने भयंकर सुदर्शनचक्रको चला दिया। उस चक्रने रणभूमिमें बाणके हजारों हाथोंको काट डाला और वह भयंकर पाशुपतास्त्र पहाड़ी सिंहकी तरह भूमिपर गिर पड़ा। तदनन्तर जो प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान, लोकमें दारुण तथा अमोघ है; वह पाशुपतास्त्र पशुपति शिवके हाथमें लौट गया। बाणके शरीर-रक्तसे वहाँ भयंकर नदी बह चली और बाण चेष्टारहित होकर भूमिपर गिर पड़ा। उस समय व्यथाके कारण उसकी चेतना नष्ट हो गयी थी। तब जगद्गुरु भगवान् महादेव वहाँ आये और बाणको उठाकर उन्होंने अपनी छातीसे लगा लिया। फिर बाणको लेकर वे वहाँ चले, जहाँ भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर
उन्होंने पद्माद्वारा समर्चित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें बाणको समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् बलिने जिस वेदोक्त स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की थी, उसी स्तोत्रद्वारा चन्द्रशेखरने शक्तियोंके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया। तब श्रीहरिने बुद्धिमान् बाणको 'मृत्युञ्जय' नामक ज्ञान प्रदान किया और उसके शरीरपर अपना कर-कमल फिराकर उसे अजर-अमर बना दिया।
तदनन्तर बाणने बलिकृत स्तोत्रद्वारा भक्तिपूर्वक श्रीहरिका स्तवन किया और उसी देवसमाजमें रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित अपनी श्रेष्ठ कन्या उषाको लाकर भक्तिसहित श्रीकृष्णको प्रदान कर दिया। फिर उसने भक्तिपूर्वक कंधे झुकाकर पाँच लाख गजराज, बीस लाख घोड़े, रत्नाभरणोंसे विभूषित एक हजार दासियाँ, सब कुछ प्रदान करनेवाली बछड़ोंसहित एक सहस्र गौएँ, करोड़ों-करोड़ों मनोहर माणिक्य, मोती, रत्न, श्रेष्ठ मणियाँ और हीरे तथा हजारों सुवर्णनिर्मित जलपात्र एवं भोजनपात्र श्रीकृष्णको दहेजमें दिये। नारद! फिर बाणने शंकरजीकी आज्ञासे सभी तरहके अग्निशुद्ध श्रेष्ठ महीन वस्त्र तथा ताम्बूल और उसकी सामग्रियोंके विविध प्रकारके हजारों श्रेष्ठ पूर्णपात्र भक्तिपूर्ण हृदयसे दहेजमें दिये। तत्पश्चात् कन्याको भी श्रीहरिके चरणकमलोंमें समर्पित करके वह ढाह मारकर रो पड़ा। इस प्रकार उसने वह कार्य सम्पन्न किया। तब श्रीकृष्ण बाणको वेदोक्त मधुर वचनोंद्वारा वरदान देकर शंकरजीकी अनुमतिसे द्वारकापुरीको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर स्वयं श्रीहरिने महात्मा बाणकी उस कन्याको नवोढ़ा (नवविवाहिता वधू) समझकर शीघ्र ही देवकी और रुक्मिणीके हाथों सौंप दिया; फिर यत्नपूर्वक मङ्गल-महोत्सव कराया, ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें बहुत-सा धन-दान किया।
(अध्याय १२०)
९५- वसुदेवजीका शंकरजीसे भव-तरणका उपाय पूछना, शंकरजीका उन्हें ज्ञानोपदेश देकर राजसूय-यज्ञ करनेका आदेश देना, वसुदेवजीद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान और यज्ञान्तमें सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनका द्वारकाको लौटना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
७७७
शृगालोपाख्यान
श्रीनारायण कहते हैं— नारद! एक समयकी बात है। श्रीकृष्ण अपने गणोंके साथ सुधर्मा-सभामें विराजमान थे। उसी समय वहाँ एक ब्राह्मणदेवता आये, जो ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। वहाँ आकर उन्होंने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका दर्शन किया और भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की। फिर वे शान्त एवं भयभीत हो विनयपूर्वक मधुर वचन बोले।
ब्राह्मणने कहा— प्रभो! वासुदेव शृगाल नामक एक मण्डलेश्वर राजाधिराज है; वह आपकी अत्यन्त निन्दा करता है और कहता है कि 'वैकुण्ठमें चतुर्भुज देवाधिदेव लक्ष्मीपति वासुदेव मैं ही हूँ। मैं ही लोकोंका विधाता और ब्रह्माका पालक हूँ। पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माने मेरी प्रार्थना की थी; इसी कारण भारतवर्षमें मेरा आगमन हुआ है। मैंने महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, मधु और कैटभको मारकर सृष्टिकी रक्षा की है। मैं ही स्वयं ब्रह्मा, मैं ही स्वयं शिव तथा मैं ही लोकोंका पालक एवं दुष्टोंका संहारक विष्णु हूँ। सभी मनुगण तथा मुनिसमुदाय मेरे अंशकलासे उत्पन्न हुए हैं। मैं स्वयं प्रकृतिसे परे निर्गुण नारायण हूँ। भद्र! अबतक मैंने तुम्हें लज्जा तथा कृपाके कारण मित्र-बुद्धिसे क्षमा कर दिया था; किंतु जो बीत गया, सो बीत गया; अब तुम मेरे साथ युद्ध करो। मैंने दूतके मुखसे सुना है कि तुम्हारा अहंकार बहुत बढ़ गया है; अतः उसका दमन करना उचित है। ऊँचे सिर उठानेवालोंको कुचल डालना राजाका परम धर्म है और इस समय मैं ही पृथ्वीका शासक हूँ। मैं स्वयं चतुर्भुजरूप धारण करके शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म लेकर सेनासहित युद्धके लिये उस द्वारकाको जाऊँगा। यदि तुम्हारी इच्छा हो तो युद्ध करो; अन्यथा मेरी शरण ग्रहण करो। यदि तुम शरणागत होकर मेरी शरणमें नहीं आ जाओगे तो मैं क्षणभरमें ही द्वारकाको भस्म कर डालूँगा। मैं अकेला ही लीलापूर्वक क्षणभरमें सेना, पुत्र, गण और बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हें जला डालनेमें समर्थ हूँ।'
मनु! यों कहकर वह ब्राह्मण मौन हो गया। उसे सुनकर सदस्योंसहित श्रीकृष्ण ठठाकर हँस पड़े। फिर उन्होंने ब्राह्मणका भलीभाँति आदर-सत्कार करके उन्हें चारों प्रकारके पदार्थ (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) भोजन कराये। शृगालके वाग्बाण उनके मनमें कसक पैदा कर रहे थे; इसलिये बड़े क्षोभसे उन्होंने वह रात बितायी। प्रातःकाल होते ही वे बड़ी उतावलीके साथ हर्षपूर्वक गणोंसहित रथपर सवार हो सहसा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ राजा शृगाल था। उनके आनेका समाचार सुनकर राजा शृगाल कृत्रिम-रूपसे चार भुजा धारण करके गणोंसहित युद्धके लिये श्रीहरिके स्थानपर आया। श्रीकृष्णने मित्र-बुद्धिसे उसकी ओर स्नेहभरी दृष्टिसे देखकर मुस्कराते हुए मधुर वचनोंद्वारा लौकिक रीतिसे उससे वार्तालाप किया। राजा शृगालने श्रीकृष्णको निमन्त्रित किया; परंतु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। तब वह श्रीकृष्णसे भयभीत हो उनके दर्शनसे दम्भको त्यागकर यों कहने लगा।
शृगाल बोला— प्रभो! आप चक्रद्वारा मेरा शिरश्छेदन करके शीघ्र ही द्वारकाको लौट जाइये, जिससे मेरा यह अनित्य एवं नश्वर पापी शरीर समाप्त हो जाय। भगवन्! जय-विजयकी तरह मैं भी आपका द्वारपाल हूँ। मेरा नाम सुभद्र है। लक्ष्मीके शापसे मैं भ्रष्ट हो गया था; अब मेरा वह समय पूरा हो गया है। सौ वर्षके बाद शापके समाप्त हो जानेपर मैं पुनः आपके भवनको जाऊँगा। सर्वज्ञ! आप तो सब कुछ जानते ही हैं;
पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन
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अतः विलम्ब मत कीजिये।
श्रीकृष्णने कहा—मित्र! पहले तुम मुझपर प्रहार करो; तत्पश्चात् मैं युद्ध करूँगा। वत्स! मैं सारा रहस्य जानता हूँ; अतः अब तुम सुखपूर्वक वैकुण्ठको जाओ। तब शृगालने माधवपर दस बाणोंसे वार किया; किंतु वे कालरूपी बाण शीघ्र ही श्रीकृष्णको प्रणाम करके आकाशमें विलीन हो गये। फिर राजा शृगालने प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान चमकीली गदा फेंकी, परंतु वह तत्काल ही श्रीकृष्णके अङ्गस्पर्शमात्रसे टूक-टूक हो गयी। तत्पश्चात् उसने परम दारुण कालरूपी खड्ग और धनुष चलाया, किंतु वह उसी क्षण श्रीकृष्णके अङ्गोंका स्पर्श होते ही छिन्न-भिन्न हो गया। इस प्रकार राजाको अस्त्रहीन देखकर कृपालु श्रीकृष्णने कहा—‘मित्र! घर जाकर खूब तीखा अस्त्र ले आओ।’
तब शृगाल बोला—प्रभो! आत्मारूपी आकाश अस्त्रद्वारा बेधा नहीं जा सकता। भला, आत्माके साथ युद्ध कैसा? पृथ्वीका उद्धार करनेमें कारणस्वरूप भगवन्! इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। नाथ! भवसागर बड़ा भयंकर है और विषय-विषसे भी अधिक दारुण हैं; अतः मेरी स्वकर्मजनित माया-मोहरूपी साँकलको छिन्न-भिन्न कर दीजिये। आप कर्मोंके ईश्वर, ब्रह्माके भी विधाता, शुभ फलोंके दाता, समस्त सम्पत्तियोंके प्रदाता, प्राक्तन कर्मोंके कारण और उनके खण्डनमें समर्थ हैं। मैं अपने इस पाञ्चभौतिक प्राकृत नश्वर देहका त्याग करके आपके ही वैकुण्ठके सातवें द्वारपर जाऊँगा; क्योंकि वही मेरा घर है।
इस प्रकारका मित्रका स्तवन और अमृतोपम वचन सुनकर कृपानिधि श्रीकृष्ण कृपापरवश हो वहीं समरभूमिमें स्नेहवश रोने लगे। श्रीकृष्णके नेत्रोंसे गिरे हुए अश्रुबिन्दुओंसे वहाँ सहसा ‘बिन्दुसर’ नामक एक दिव्य सरोवर प्रकट हो गया; जो तीर्थोंमें परम श्रेष्ठ है। उसके जलके स्पर्शमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और अपने सात जन्मोंके संचित पापोंसे छूट जाता है; इसमें जरा भी संदेह नहीं है।
इसके बाद श्रीभगवान्ने पूछा—मित्र! यदि तुम्हारा मन इतना निर्मल है तो फिर तुम्हारी ऐसी युद्ध-बुद्धि कैसे हुई और क्यों तुमने दूतके द्वारा ऐसा दारुण निष्ठुर संदेश कहलवाया?
इसपर शृगालने कहा—नाथ! मैंने तुम्हारे प्रति ऐसे निष्ठुर वाक्योंका प्रयोग किया, तभी तो तुम क्रोधपूर्वक यहाँ आये। नहीं तो, स्वप्नमें भी तुम्हारे दर्शन दुर्लभ हैं। यों कहते-कहते उसने योगावलम्बन करके प्राकृत पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग कर दिया और वह श्रीकृष्णके देखते-देखते ही विमानपर सवार होकर दिव्य धामको चला गया। उस समय शृगालके शरीरसे सात ताड़-जितनी लंबी एक महान् ज्योति निकली और वह ब्रह्माजी तथा लक्ष्मीजीके द्वारा पूजित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणाम करके चली गयी।
तब अपने साथियोंके सहित श्रीमान् कृष्ण इस अद्भुत चरित्रको देखकर प्रफुल्लमुख हो द्वारकाकी ओर चल दिये। द्वारका पहुँचकर उन्होंने पहले माता-पिताको प्रणाम किया। तदनन्तर रुक्मिणीके महलमें जाकर पुष्पशय्यापर शयन किया।
(अध्याय १२१)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७९
गणेशके अग्रपूज्यत्व-वर्णनके प्रसङ्गमें राधाद्वारा गणेशकी अग्रपूजाका कथन
नारदजीने पूछा— मुने! पुराणोंमें जो गणेश-पूजनका दुर्लभ आख्यान वर्णित है, उसे मैंने सामान्यतया ब्रह्माके मुखसे संक्षेपमें सुना है। अब आपसे समस्त पूजनीयोंमें प्रधान गणपतिकी महिमा विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है; क्योंकि आप योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं। पूर्वकालमें स्वर्गवासियोंने सिद्धाश्रममें राधा-माधवकी महापूजा की थी; उसी राधाने सौ वर्षके बीतनेपर जब श्रीदामाका शाप निवृत्त हुआ; तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सुरेन्द्रों, नागराज शेष और अन्यान्य बड़े-बड़े नागों, भूतलपर बहुत-से बलशाली नरेशों और असुरों, अन्यान्य महाबली गन्धर्वों तथा राक्षसोंके रहते हुए सर्वप्रथम गणेशकी पूजा कैसे की? महाभाग! यह वृत्तान्त मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन करनेकी कृपा करें।
श्रीनारायण बोले— नारद! तीनों लोकोंमें पुण्यवती होनेके कारण पृथ्वी धन्य एवं मान्य है। उस पृथ्वीपर भारतवर्ष कर्मोंका शुभ फल देनेवाला है। उस पुण्यक्षेत्र भारतमें सिद्धाश्रम नामक एक महान् पुण्यमय शुभ क्षेत्र है; जो धन्य, यशस्य, पूज्य और मोक्ष-प्रदाता है। भगवान् सनत्कुमार वहीं सिद्ध हुए थे। स्वयं ब्रह्माने भी वहीं तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की थी। योगीन्द्र, मुनीन्द्र, कपिल आदि सिद्धेन्द्र और शतक्रतु महेन्द्र वहीं तप करके सिद्धिके भागी हुए हैं। इसी कारण उसे सिद्धाश्रम कहते हैं। वह सभीके लिये दुर्लभ है। मुने! वहाँ गणेश नित्य निवास करते हैं। वहाँ गणेशकी अमूल्य रत्नोंकी बनी हुई एक सुन्दर प्रतिमा है; जिसकी वैशाखी पूर्णिमाके दिन सभी देवता, नाग, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र, योगीन्द्र और सनकादि महर्षि पूजा करते हैं। उस अवसरपर वहाँ पार्वतीके साथ कल्याणकारी शम्भु, गणोंसहित कार्तिकेय और स्वयं प्रजापति ब्रह्मा पधारे। प्रधान-प्रधान नागोंके साथ शेषनाग भी तुरंत ही वहाँ आ पहुँचे। फिर सभी देवता, मनु और मुनिगण भी वहाँ आये। सभी नरेश प्रसन्नमनसे गणेशकी पूजा करनेके लिये वहाँ उपस्थित हुए। द्वारकावासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णका भी वहाँ शुभागमन हुआ तथा गोकुलवासियोंके साथ नन्द भी पधारे। तदनन्तर सुरसिका, रासेश्वरी और श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिदेवता सुन्दरी राधा भी सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर गोलोकवासिनी गोपी-सखियोंके साथ पधारीं। वहाँ सुन्दर दाँतोंवाली राधाने भलीभाँति स्नान करके शुद्ध हो धुली हुई साड़ी और कंचुकी धारण की। फिर भुवनपावनी कान्ता राधाने अपने चरणकमलोंका अच्छी तरह प्रक्षालन किया। तत्पश्चात् वे निराहार रहकर इन्द्रियोंको काबूमें करके मणिमण्डपमें गयीं। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी कामनासे उत्तम संकल्पका विधान करके भक्तिपूर्वक गङ्गाजलसे गणेशको स्नान कराया। इसके बाद जो चारों वेदों, वसु और लोकोंकी माता, ज्ञानियोंकी परा जननी एवं बुद्धिरूपा हैं; वे भगवती राधा श्वेत पुष्प लेकर सामवेदोक्त प्रकारसे अपने पुत्रभूत गणेशका यों ध्यान करने लगीं।
‘जो खर्व (छोटे कदवाले), लम्बोदर (तोंदवाले), स्थूलकाय, ब्रह्मतेजसे उद्भासित, हाथीके-से मुखवाले, अग्निसरीखे कान्तिमान्, एकदन्त और असीम हैं; जो सिद्धों, योगियों और ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवेन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र, मुनिगण तथा संतलोग जिनका ध्यान करते हैं; जो ऐश्वर्यशाली, सनातन, ब्रह्मस्वरूप, परम मङ्गल, मङ्गलके स्थान, सम्पूर्ण विघ्नोंको हरनेवाले, शान्त, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, कर्मयोगियोंके लिये भवसागरमें मायारूपी जहाजके कर्णधारस्वरूप शरणागत-दीन-दुःखीकी रक्षामें तत्पर, ध्यानरूप साधना
| ७८० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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करनेयोग्य, भक्तोंके स्वामी और भक्तवत्सल हैं; उन गणेशका ध्यान करना चाहिये।'
इस प्रकार ध्यान करके सती राधाने उस पुष्पको अपने मस्तकपर रखकर पुनः सर्वाङ्गोंको शुद्ध करनेवाला वेदोक्त न्यास किया। तत्पश्चात् उसी शुभदायक ध्यानद्वारा पुनः ध्यान करके राधाने उन लम्बोदरके चरणकमलमें पुष्पाञ्जलि समर्पित की। फिर गोलोकवासिनी स्वयं श्रीराधिकाजीने सुगन्धित सुशीतल तीर्थजल, दूर्वा, चावल, श्वेत पुष्प, सुगन्धित चन्दनयुक्त अर्घ्य, पारिजात-पुष्पोंकी माला, कस्तूरी-केसरयुक्त चन्दन, सुगन्धित शुक्ल पुष्प, सुगन्धयुक्त उत्तम धूप,घृत-दीपक, सुस्वादु रमणीय नैवेद्य, चतुर्विध अन्न, सुपक्व, फल, भाँति-भाँतिके लड्डू, रमणीय सुस्वादु पिष्टक, विविध प्रकारके व्यञ्जन, अमूल्य रत्ननिर्मित सिंहासन, सुन्दर दो वस्त्र, मधुपर्क, सुवासित सुशीतल पवित्र तीर्थजल, ताम्बूल, अमूल्य श्वेत चँवर, मणि-मुक्ता-हीरासे सुसज्जित सुन्दर सूक्ष्मवस्त्रद्वारा सुशोभित शय्या, सवत्सा कामधेनु गौ और पुष्पाञ्जलि अर्पण करके अत्यन्त श्रद्धाके साथ षोडशोपचार समर्पित किया। फिर कालिन्दीकुलवासिनी राधाने 'ॐ गं गौं गणपतये विघ्नविनाशिने स्वाहा' गणेशके इस षोडशाक्षर-मन्त्रका, जो श्रेष्ठ कल्पतरुके समान है, एक हजार जप किया। इसके बाद वे भक्तिवश कंधा नीचा करके नेत्रोंमें आँसू भरकर पुलकित शरीरसे परम भक्तिके साथ इस स्तोत्रद्वारा स्तवन करने लगीं।
श्रीराधिकाने कहा—जो परम धाम, परब्रह्म, परेश, परमेश्वर, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर और अनन्त हैं; प्रधान-प्रधान सुर और असुर जिनका स्तवन करते हैं; जो देवरूपी कमलके लिये सूर्य और मङ्गलोंके आश्रय-स्थान हैं; उन परात्पर गणेशकी मैं स्तुति करती हूँ। यह उत्तम स्तोत्र महान् पुण्यमय तथा विघ्न और शोकको हरनेवाला है। जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण विघ्नोंसे विमुक्त हो जाता है। (अध्याय १२२)
गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका श्रृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! सती राधाने गणेशकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करके स्तुति की और सर्वाङ्गोंमें पहनने योग्य बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण प्रदान किये। राधाद्वारा किये गये पूजन और पूजा-सामग्रीको देखकर तथा स्तवन सुनकर शान्तस्वरूप गणेश शान्तस्वभाववाली त्रिलोकजननी राधासे मधुर वचन बोले।
श्रीगणेशने कहा—जगन्मातः! तुम्हारी यह
९७- श्रीकृष्णका राधाके साथ विभिन्न स्थलोंमें विहार करके पुनः गोकुलमें जाना, वहाँ उनका स्वागत-सत्कार, यशोदाका राधासहित श्रीकृष्णको महलमें ले जाना और मङ्गल-महोत्सव करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८१
पूजा लोगोंको शिक्षा देनेके लिये है। शुभे! तुम तो स्वयं ब्रह्मस्वरूपा और श्रीकृष्णके वक्षः-स्थलपर वास करनेवाली हो। ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवगण, सनकादि मुनिवर, जीवन्मुक्त भक्त और कपिल आदि सिद्धशिरोमणि, जिनके अनुपम एवं परम दुर्लभ चरणकमलका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन श्रीकृष्णके प्राणोंकी तुम अधिदेवी तथा उनके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर परम प्रियतमा हो। श्रीकृष्णके दक्षिणाङ्गसे माधव हैं और वामाङ्गसे राधा प्रादुर्भूत हुई हैं। जगज्जननी महालक्ष्मी तुम्हारे वामाङ्गसे प्रकट हुई हैं। तुम सबके निवासभूत वसुको जन्म देनेवाली, परमेश्वरी, वेदों और लोकोंकी ईश्वरी मूलप्रकृति हो। मातः! इस सृष्टिमें जितनी प्राकृतिक नारियाँ हैं; वे सभी तुम्हारी विभूतियाँ हैं। सारे विश्व कार्यरूप हैं और तुम उनकी कारणरूपा हो। प्रलयकालमें जब ब्रह्माका तिरोभाव हो जाता है; वह श्रीहरिका एक निमेष कहलाता है। उस समय जो बुद्धिमान् योगी पहले राधा, फिर परात्पर कृष्ण अर्थात् राधा-कृष्णका सम्यक् उच्चारण करता है; वह अनायास ही गोलोकमें चला जाता है। इससे व्यतिक्रम करनेपर वह महापापी निश्चय ही ब्रह्महत्याके पापका भागी होता है। तुम लोकोंकी माता और परमात्मा श्रीहरि पिता हैं; परंतु माता पितासे भी बढ़कर श्रेष्ठ, पूज्य, वन्दनीय और परात्पर होती है। इस पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें यदि कोई मन्दमति पुरुष सबके कारणस्वरूप श्रीकृष्ण अथवा किसी अन्य देवताका भजन करता है और राधिकाकी निन्दा करता है तो वह इस लोकमें दुःख-शोकका भागी होता है और उसका वंशच्छेद हो जाता है तथा परलोकमें सूर्य और चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त वह घोर नरकमें पचता रहता है। ज्ञानका उद्गीरण करने अर्थात् उगलनेके कारण गुरु कहा जाता है; वह ज्ञान मन्त्र-तन्त्रसे प्राप्त होता है; वह मन्त्र और वह तन्त्र तुम दोनोंकी भक्ति है। जब जीव प्रत्येक जन्ममें देवोंके मन्त्रका सेवन करता है तो उसे दुर्गाके परम दुर्लभ चरणकमलमें भक्ति प्राप्त हो जाती है। जब वह लोकोंके कारणस्वरूप शम्भुके मन्त्रका आश्रय ग्रहण करता है, तब तुम दोनों (राधा-कृष्ण)-के अत्यन्त दुर्लभ चरणकमलको प्राप्त कर लेता है। जिस पुण्यवान् पुरुषको तुम दोनोंके दुष्प्राप्य चरणकमलकी प्राप्ति हो जाती है, वह दैववश क्षणार्थ अथवा उसके षोडशांश कालके लिये भी उसका त्याग नहीं करता। जो मानव इस पुण्यक्षेत्र भारतमें किसी वैष्णवसे तुम दोनोंके मन्त्र, स्तोत्र अथवा कर्ममूलका उच्छेद करनेवाले कवचको ग्रहण करके परमभक्तिके साथ उसका जप करता है; वह अपने साथ-साथ अपनी सहस्रों पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। जो मनुष्य विधिपूर्वक वस्त्र, अलंकार और चन्दनद्वारा गुरुका भलीभाँति पूजन करके तुम्हारे कवचको धारण करता है, वह निश्चय ही विष्णु-तुल्य हो जाता है। मात्रः! तुमने जो कुछ वस्तु मुझे समर्पित की है, उस सबको सार्थक कर डालो अर्थात् अब मेरी प्रसन्नताके लिये उसे ब्राह्मणको दे दो। तब मैं उसका भोग लगाऊँगा; क्योंकि देवताको देने योग्य जो दान अथवा दक्षिणा होती है, वह सब यदि ब्राह्मणको दे दी जाय तो वह अनन्त हो जाती है। राधे! ब्राह्मणोंका मुख ही देवताओंका प्रधान मुख है; क्योंकि ब्राह्मण जिस पदार्थको खाते हैं, वही देवताओंको मिलता है*। मुने! तब सती राधिकाने वह सारा पदार्थ ब्राह्मणोंको खिला दिया; इससे गणेश तत्काल ही प्रसन्न हो गये।
* ब्राह्मणानां मुखं राधे देवानां मुखमुख्यकम्। विप्रभुक्तं च यद् द्रव्यं प्राप्नुवन्त्येव देवताः॥
(१२२।२३)
९८- श्रीकृष्णद्वारा नन्दको ज्ञानोपदेश और राधा-कलावती आदि गोपियोंका गोलोक-गमन
७८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इसी समय ब्रह्मा, शिव और शेषनाग आदि देवता देवश्रेष्ठ गणेशका पूजन करनेके लिये उस वट-वृक्षके नीचे आये। तब एक शिवदूत वहाँ जाकर उन देवताओं तथा देवियोंसे यों कहने लगा।
रक्षक (शिवदूत)-ने कहा— देवगण! वृषभानुसुता राधाने मुझे हटाकर शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिवाचन करके सर्वप्रथम गणेशकी पूजा की है। पूजनमें ऐसा कहा जाता है कि जो सर्वप्रथम पूजन करता है, वह अनन्त फलका भागी होता है और मध्यमें पूजा करनेवालेको मध्यम तथा अन्तमें पूजनेवालेको स्वल्प पुण्य प्राप्त होता है। ऐसा दशामें बहुत-से देवशिरोमणियों, मुनिवरों और देवाङ्गनाओंके रहते हुए उस राधाने गोपियोंके साथ देवश्रेष्ठ गणेशकी पूजा की है।
दूतकी बात सुनकर सभी देवताओं, मुनियों मनुओं और राजाओंका समुदाय तथा देवाङ्गनाएँ हँसने लगीं। वहाँ जो रुक्मिणी आदि महिलाएँ तथा देवियाँ थीं, उन्हें महान् विस्मय हुआ। तत्पश्चात् सावित्री, सरस्वती, परमेश्वरी पार्वती, रोहिणी, सती-संज्ञक स्वाहा आदि देवाङ्गनाएँ तथा सभी पतिव्रता मुनिपत्नियां वहाँ आयीं। फिर सभी देवताओं, मुनियों, मनुओं तथा मनुष्योंका दल, गणसहित श्रीकृष्ण तथा अन्याय जो वहाँ उपस्थित थे, उन सभी लोगोंने हर्षपूर्वक पदार्पण किया। तत्पश्चात् उन सबने शुभ मुहूर्तमें बलवान् और दुर्बलके क्रमसे पृथक्-पृथक् विविध द्रव्योंद्वारा गणेशकी पूजा की। इस प्रकार पूजन करके वे सभी सुखासनपर विराजमान हुए। इसी समय पार्वती परम हर्षके साथ राधाके स्थानपर गयीं। पार्वतीको आयी हुई देखकर राधा उतावलीके साथ अपने आसनसे उठ खड़ी हुईं और हर्षमग्न हो उनसे सादर यथायोग्य कुशल-समाचार पूछने लगीं। तत्पश्चात् परस्पर आलिङ्गन और स्नेह-प्रदर्शन किया गया। तब दुर्गा राधाको अपनी छातीसे लगाकर मधुर वचन बोलीं।
पार्वतीने कहा— राधे! मैं तुमसे क्या कुशल-प्रश्न करूँ; क्योंकि तुम तो स्वयं ही मङ्गलोंकी आश्रय-स्थान हो। श्रीदामाके शापसे मुक्त हो जानेपर अब तुम्हारी विरहज्वाला भी शान्त ही हो गयी। जैसे मेरे मन-प्राण तुममें वास करते हैं; वैसे ही तुम्हारे मुझमें लगे रहते हैं। इस प्रकार शक्ति और पुरुषकी भाँति हम दोनोंमें कोई भेद नहीं है। जो मेरे भक्त होकर तुम्हारी और तुम्हारे भक्त होकर मेरी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके स्थितिकालपर्यन्त कुम्भीपाकमें पचते रहते हैं। जो नराधम राधा और माधवमें भेद-भाव करते हैं, उनका वंश नष्ट हो जाता है और वे चिरकालतक नरकमें यातना भोगते हैं*। इसके बाद साठ हजार वर्षोंतक वे विष्ठाके कीड़े होते हैं, फिर अपनी सौ पीढ़ियोंसहित सूकरकी योनिमें उत्पन्न होते हैं। सर्वपूज्य पुत्र गणेश्वरकी तुमने ही सर्वप्रथम पूजा की है; मैं वैसा नहीं कर पायी हूँ। यह गणेश जैसे तुम्हारा है, वैसे ही मेरा भी है। देवि! दुग्ध और उसकी धवलताके समान राधा और माधवमें जीवनपर्यन्त कभी विच्छेद नहीं होगा। पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें स्थित इस महातीर्थ सिद्धाश्रममें विघ्नविनाशक गणेशकी भलीभाँति पूजा करके तुम बिना किसी विघ्न-बाधाके गोविन्दको प्राप्त करो। तुम रसिका-रासेश्वरी हो और श्रीकृष्ण रसिकशिरोमणि हैं; अतः तुम नायिकाका रसिक नायकके साथ समागम गुणकारी होगा। सती राधे! सौ वर्षके बाद तुम श्रीदामाके शापसे मुक्त
* ये त्वां निन्दन्ति मद्भक्तास्त्वद्भक्ताश्चापि मामपि। कुम्भीपाके च पच्यन्ते यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
राधामधवयोर्भेदं ये कुर्वन्ति नराधमाः। वंशहानिर्भवेत्तेषां पच्यन्ते नरके चिरम्॥
(१२२। ४४-४५)
९९- श्रीकृष्णके गोलोक-गमनका वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
७८३
हुई हो; अतः आज मेरे वरदानसे तुम श्रीकृष्णके साथ मिलो! सुन्दरि! मेरी दुर्लभ आज्ञा मानकर तुम अपना उत्तम शृङ्गार करो।
तब पार्वतीकी आज्ञासे प्यारी सखियाँ राधाका शृङ्गार करनेमें जुट गयीं। उन्होंने ईश्वरी राधाको रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया। फिर तो सखी रत्नमालाने सामनेसे आकर राधाके गलेमें रत्नोंकी माला पहना दी और उनके दाहिने हाथमें मनोहर क्रीड़ा-कमल रख दिया। पद्ममुखीने उनके दोनों चरणकमलोंको महावरसे सुशोभित किया। सुन्दरी गोपीने चन्दनयुक्त सिन्दूरकी परम रुचिर बेंदीसे सीमन्तके अधोभाग—ललाटको सुशोभित किया। सती मालतीने मालतीकी मालाओंसे विभूषित करके ऐसी मनभावनी रमणीय कबरी गूँथकर तैयार की जो मुनियोंके भी मनको मोहे लेती थी। फिर कपोलोंपर कस्तूरी और कुंकुममिश्रित चन्दनसे सुन्दर पत्रभङ्गीकी रचना की। मालावतीने राधाको सुन्दर चम्पाके पुष्पोंकी मनोहर गन्धवाली माला और खिली हुई नवमल्लिका प्रदान की। रति-कार्योंमें रसका ज्ञान रखनेवाली गोपीने परम श्रेष्ठ नायिका राधाको रत्नाभरणोंसे विभूषित करके रति-रसके लिये उत्सुक बनाया। सती ललिताने उनके शरत्कालीन कमल-दलके समान विशाल नेत्रोंको काजलसे आँजकर सुहावनी साड़ी पहननेको दी और महेन्द्रद्वारा दिये गये पारिजातके सुगन्धित पुष्पको उनके हाथमें दिया। सती गोपिका सुशीलाने पतिके पास जाकर किस प्रकार सुशील एवं मधुर यथोचित वचन कहना चाहिये—ऐसी नीतियुक्त शिक्षा दी। राधाकी माता कलावतीने विपत्तिकालमें विस्मृत हुई स्त्रियोंकी षोडश कलाओंका स्मरण कराया। बहिन सुधामूखीने शृङ्गार-विषयसम्बन्धी अमृतोपम वचनकी ओर ध्यान आकर्षित किया। कमलाने शीघ्र ही कमल और चम्पाके चन्दनचर्चित पत्तेपर कोमल रति-शय्या सजायी। स्वयं सती चम्पावतीने चम्पाके सुन्दर पुष्पको चन्दनसे अनुलिप्त करके श्रीकृष्णके लिये दोनेमें सजाकर रखा। फिर उसने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये केलि-कदम्बोंका पुष्प, मनोहर स्तवक (गुलदस्ता) और कदम्ब-पुष्पोंकी माला तैयार की। कृष्णप्रियाने श्रीकृष्णके लिये कपूर आदिसे सुवासित श्रेष्ठ एवं रुचिर पान तथा सुगन्धित जल उपस्थित किया। इसी समय देवताओं तथा मुनियोंने देखा कि जल-स्थलसहित सारा आश्रम गोरोचनके समान उद्भासित हो रहा है। उस समय तीनों लोकोंमें वास करनेवाले सभी लोगोंने राधिकाके दर्शन किये।
जिनके शरीरकी कान्ति श्वेत चम्पकके समान परम मनोहर एवं अनुपम है; जो ऊर्ध्वरेता मुनियोंके भी मनोंको मोहमें डाल देती हैं; जो सुन्दर केशोंवाली, सुन्दरी, षोडशवर्षीया और वटवृक्षके नीचे मण्डलमें वास करनेवाली हैं; जिनका मुख करोड़ों चन्द्रमाओंकी छबिको छीने लेता है; जो सदा मुस्कराती रहती हैं, जिनके दाँत बड़े सुन्दर हैं; जिनके शरत्कालीन कमलके समान विशाल नेत्र कज्जलसे सुशोभित रहते हैं; जो महालक्ष्मी, बीजरूपा, परमाद्या, सनातनी और परमात्मस्वरूप श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठातृदेवता हैं; परमात्माकी प्राप्तिके लिये जिनकी स्तुति-पूजा की जाती है; जो परा, ब्रह्मस्वरूपा निर्लिप्ता, नित्यरूपा, निर्गुणा, विश्वके अनुरोधसे प्रकृति, भक्तानुग्रहमूर्ति, सत्यस्वरूपा, शुद्ध, पवित्र, पतित-पावनी, उत्तम तीर्थोंको पावन करनेवाली, सत्कीर्तिसम्पन्ना, ब्रह्माकी भी विधाती, महाप्रिया, महती, महाविष्णुकी माता, रासेश्वरकी स्वामिनी, सुन्दरी नायिका, रसिकेश्वरी, अग्निशुद्ध वस्त्र धारण करनेवाली, स्वेच्छारूपा और मङ्गलकी आलय हैं; सात गोपियाँ श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी निरन्तर सेवा करती रहती हैं, चार प्यारी सखियाँ जिनके चरणकमलकी सेवामें तत्पर रहती हैं, अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण जिनकी
| ७८४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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शोभा बढ़ा रहे हैं, दोनों मनोहर कुण्डलोंसे जिनके कर्ण और कपोल उद्भासित हो रहे हैं और जिनकी सुन्दर नासिकामें गजमुक्ता लटक रही है, जो गरुड़की चोंचका उपहास करनेवाली है; जिनका शरीर कुंकुम-कस्तूरीमिश्रित सुस्निग्ध चन्दनसे चर्चित है, जिनके कपोल सुन्दर और अङ्ग कोमल हैं; जो कामुकी, गजराजकी-सी चालवाली, कमनीया एवं सुन्दरी नायिका, कामदेवके अस्त्रकी विजयस्वरूपा, कामकी कामनाका लय करनेवाली तथा श्रेष्ठ हैं; जिनके हाथमें प्रफुल्ल क्रीड़ा-कमल, पारिजातका पुष्प और अमूल्य रत्नजटित स्वच्छ दर्पण शोभा पाते हैं; जो नाना प्रकारके रत्नोंकी विचित्रतासे युक्त रत्नसिंहासनपर विराजमान होती हैं, जो परमात्मा श्रीकृष्णके पद्माद्वारा समर्चित मङ्गलस्वरूप चरणकमलका अपने हृदयकमलमें ध्यान करती रहती हैं तथा मन-वचन-कर्मसे स्वप्न अथवा जाग्रत् कालमें श्रीकृष्णकी प्रीति और प्रेम-सौभाग्यका नित्य नूतन रूपमें स्मरण करती रहती हैं; जो प्रगाढ़भावानुरक्त, शुद्धभक्त, पतिव्रता, धन्या, मान्या, गौरवार्णा, निरन्तर श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर वास करनेवाली, प्रियाओं तथा प्रिय भक्तोंमें परम प्रिय, प्रियवादिनी, श्रीकृष्णके वामाङ्गसे आविर्भूत, गुण और रूपमें अभिन्न, गोलोकमें वास करनेवाली, देवाधिदेवी, सबके ऊपर विराजमान, गोपीश्वरी, गुप्तिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिरूपिणी, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, सद्भक्तोंद्वारा वन्दित और पुण्यक्षेत्र भारतमें वृषभानु-नन्दिनीके रूपमें प्रकट हुई हैं; उन राधाकी मैं वन्दना करता हूँ। जो ध्यानपरायण मानव समाधि-अवस्थामें ध्याननिष्ठ हो राधाका ध्यान करते हैं; वे इस लोकमें तो जीवन्मुक्त हैं ही, परलोकमें श्रीकृष्णके पार्षद होते हैं। तदनन्तर लोकोंके विधाता स्वयं ब्रह्माने ब्रह्माओंकी जननी परमेश्वरी राधाको देखकर सर्वप्रथम स्तुति करना आरम्भ किया।
ब्रह्मा बोले—परमेश्वरि! मेरा चित्त तुम्हारे पादपद्मके मधुर मधुमें लुब्ध हो गया था; अतः उस मधुव्रतके लोभसे प्रेरित होकर मैंने पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें स्थित पुष्करतीर्थमें जाकर साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या की; तथापि तुम्हारा अभीष्ट चरणकमल मुझे प्राप्त नहीं हुआ। यहाँतक कि मुझे स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं हुआ। तब उस समय यों आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मन्! वाराहकल्पमें भारतवर्षमें वृन्दावन नामक पुण्यवनमें स्थित 'सिद्धाश्रम' में तुम्हें गणेशके चरणकमलका दर्शन होगा। तुम तो विषयी हो, अतः तुम्हें राधा-माधवकी दासता कहाँसे प्राप्त होगी? इसलिये महाभाग! तुम उससे निवृत्त हो जाओ; क्योंकि वह परम दुर्लभ है।' यों सुनकर मेरा मन टूट गया और मैं उस तपस्यासे विरत हो गया। पर उस तपस्याके फलस्वरूप मेरा वह मनोरथ आज परिपूर्ण हो गया।
श्रीमहादेवजीने कहा—देवि! ब्रह्मा आदि देवता, मुनिगण, मनु, सिद्ध, संत और योगीलोग ध्याननिष्ठ हो जिनके चरणकमलका, जो पद्माद्वारा कमल-पुष्पोंसे समर्चित एवं अत्यन्त दुर्लभ है, निरन्तर ध्यान करते रहते हैं; परंतु स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं कर पाते, तुम उन्हींके वक्षः-स्थलपर वास करनेवाली हो।
अनन्त बोले—सुव्रते! वेद, वेदमाता, पुराण, मैं (शेषनाग), सरस्वती और संतगण तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं।
नारद! इस प्रकार वहाँ जितने देव, देवी तथा अन्यान्य मुनि,मनु आदि आये थे, उन सबने विनम्रभावसे राधाका स्तवन किया। यह देखकर रुक्मिणी आदि महिलाओंका मुख लज्जासे झुक गया। उन्होंने अपने शोकोच्छ्वाससे रत्नदर्पणको मलिन कर दिया। निराहारा कृशोदरी सत्यभामा तो मृतक-तुल्य हो गयी, उसके मनका सारा गर्व गल गया।
(अध्याय १२३)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८५
वसुदेवजीका शंकरजीसे भव-तरणका उपाय पूछना, शंकरजीका उन्हें ज्ञानोपदेश देकर राजसूय-यज्ञ करनेका आदेश देना, वसुदेवजीद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान और यज्ञान्तमें सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनका द्वारकाको लौटना
नारदजीने पूछा—विभो! गणेशपूजन और राधास्तोत्रसे बढ़कर वहाँ कौन-सी रहस्यमयी घटना घटित हुई; उसका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
श्रीभगवान् बोले—नारद! गणेशपूजन-तीर्थमें जितने देवता, मुनि और योगीन्द्र पधारे हुए थे; वे सभी वटवृक्षके नीचे समासीन थे। उनमेंसे शम्भु, ब्रह्मा, शेषनाग और श्रेष्ठ मुनियोंसे वसुदेव और देवकीने परमादरपूर्वक यों प्रश्न किया—'हे महाभाग! आपलोग दीनोंके बन्धु हैं; अतः शीघ्र ही बताइये कि हम दीनोंके लिये इस भवसागरसे पार करनेवाला कौन-सा उत्तम साधन है? आपलोग भवसागरसे पार करनेवाली नौकाके नाविक हैं; क्योंकि न तो तीर्थ ही केवल जलमय हैं और न देवगण ही केवल मिट्टी और पत्थरकी मूर्तिमात्र होते हैं। जितने यज्ञ, पुण्य, व्रत-उपवास, तप, अनेकविध दान, विप्रों और देवताओंकी अर्चनाएँ हैं; ये सभी चिरकालमें कर्ताको पावन बनाती हैं; परंतु वैष्णवजन दर्शनसे ही पवित्र कर देते हैं। विष्णुभक्त संतोंके पावन चरणकमलोंकी रजके स्पर्शमात्रसे वसुन्धरा तत्काल ही पावन हो जाती है और तीर्थ, समुद्र तथा पर्वत भी पवित्र हो जाते हैं। देवगण भी उन वैष्णवोंके पातकरूपी ईंधनका विनाश कर देनेवाले दर्शनकी अभिलाषा करते हैं। जैसे दूध, दही और रस परम स्वादिष्ट होते हैं; उसी प्रकार ज्ञान परमानन्ददायक होता है। उस ज्ञानको जो ज्ञानीके साहचर्यसे नहीं समझ पाता, वह अज्ञानी है। ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु भगवन्! जैसे मैं श्रीकृष्णका पिता और चिरकालका सङ्गी हूँ; उसी तरह देवकी भी उनकी माता है। वसुदेवजीकी बात सुनकर स्वयं भगवान् शंकर, जो चारों वेदोंके भी जनक एवं गुरु हैं, हँस पड़े और इस प्रकार बोले।'
श्रीमहादेवजीने कहा—अहो! ज्ञानियोंके संनिकट रहना भी उनके अनादरका ही कारण होता है; जैसे गङ्गाके जलसे पवित्र हुए लोग भी (गङ्गाका अनादर करके) सिद्धिके लिये अन्य तीर्थोंमें जाते हैं। वासुदेवके पिता ये वसुदेव स्वयं पण्डित हैं और अपने पिता वसुस्वरूप ज्ञानी कश्यपके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। इनकी श्रीकृष्णमें पुत्र-बुद्धि है; इसीलिये ये श्रीकृष्णके अङ्गभूत हमलोगोंसे ज्ञान पूछ रहे हैं।
तदनन्तर श्रीमहादेवजीने सर्वकारणकारण भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन करके कहा—'यदुवंशी वसुदेव! सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही सबके मूलरूप हैं; अतः राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें अपने पुत्र श्रीकृष्णकी, जो यज्ञके कारण एवं यज्ञेश हैं, समर्चन करो; फिर विधिपूर्वक दक्षिणा देकर भवसागरसे पार हो जाओ।'
मुने! शिवजीका कथन सुनकर जितेन्द्रिय वसुदेवजीने सामग्री जुटाकर शुभ मुहूर्तमें राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें साक्षात् यज्ञेश और दक्षिणासहित ये यज्ञ वर्तमान थे; अतः देवताओंने साक्षात् प्रकट होकर वसुदेवजीके हव्यको ग्रहण किया। तदनन्तर जब वसुदेवजी पूर्णाहूति दे चुके; तब श्रीकृष्णकी आज्ञासे भगवान् सनत्कुमारने उनसे सर्वस्व दक्षिणामें देनेके लिये कहा। तब जिनके नेत्र और मुख प्रफुल्लित थे; उन वसुदेवजीने श्रीसनत्कुमारजीके आदेशानुसार ब्राह्मणोंको सर्वस्व दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिया और ब्राह्मणोंके शुभ मुखोंद्वारा देवताओंको तृप्त
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किया। तत्पश्चात् देवगण और मुनिसमुदाय उस रातमें अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ सुखपूर्वक रहे और प्रातःकाल होनेपर वे सभी श्रीकृष्णकी अनुमतिसे अपने-अपने स्थानको चले गये। तब सभी यदुवंशी भी रुक्मिणीकी दृष्टि पड़नेसे अमूल्य रत्नोंसे परिपूर्ण एवं श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारकाको प्रस्थान कर गये।
(अध्याय १२४)
राधा और श्रीकृष्णका पुनः मिलाप, राधाके पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन
**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इस प्रकार माधवने यादवों, देवों, मुनियों तथा अन्यान्य व्यक्तियों और देवियोंके साथ गणेश-पूजनका कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् वे अपने एक अंशसे रुक्मिणी आदि देवियोंके साथ रमणीय द्वारकापुरीको चले गये; किंतु स्वयं साक्षात्रूपसे सिद्धाश्रममें ही ठहर गये। वहाँ वे गोलोकवासी गोप-सखाओं, नन्द तथा माता यशोदा-गोपीके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करके पुनः माता, पिता, गोकुलवासी गोपों तथा बन्धुवर्गोंसे नीतियुक्त यथोचित वचन बोले।
**श्रीभगवान्ने कहा—**पिताजी! अब अपने व्रजको लौट जाओ। परम श्रेष्ठ यशस्विनी माता यशोदे! तुम भी उत्तम गोकुलको जाओ और वहाँ आयुके शेष कालपर्यन्त भोगोंका उपभोग करो। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण माता-पिताकी आज्ञा ले राधिकाके स्थानको चले गये तथा नन्दजी गोकुलको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्णने मुस्कराती हुई सुन्दरी राधाको देखा। उनकी तरुणता नित्य स्थिर रहनेवाली थी, जिससे उनकी अवस्था द्वादश वर्षकी थी। मोतियोंका हार उनकी शोभा बढ़ा रहा था; वे रत्ननिर्मित ऊँचे आसनपर विराजमान थीं। उस समय मुस्कराती हुई असंख्य गोपियाँ हाथोंमें बेंत लिये उन्हें घेरे हुए थीं।
उधर प्राणवल्लभा राधाने भी दूरसे ही श्रीकृष्णको आते देखा। उनका परम सौन्दर्यशाली सुन्दर बालक-वेष था। वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। उनके शरीरकी कान्ति नवीन मेघके समान श्याम थी; वे रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए थे; उनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त था; रत्नोंके आभूषण उन्हें सुशोभित कर रहे थे; उनकी शिखामें मयूर-पिच्छ शोभा दे रहा था; वे मालतीकी मालासे विभूषित थे; उनका प्रसन्नमुख मन्द हास्यकी छटा बिखेर रहा था; वे साक्षात् भक्तानुग्रहमूर्ति थे तथा मनोहर प्रफुल्ल क्रीड़ाकमल लिये हुए थे; उनके एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें सुप्रशस्त दर्पण शोभा पा रहा था। उन्हें देखकर राधा तुरंत ही गोपियोंके साथ उठ खड़ी हुईं और परम भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरको सादर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं।
**राधिका बोलीं—**नाथ! तुम्हारे मुखचन्द्रको देखकर आज मेरा जन्म लेना सार्थक और जीवन धन्य हो गया तथा मेरे नेत्र और मन परम प्रसन्न हो गये। पाँचों प्राण स्नेहार्द्र और आत्मा हर्षविभोर हो गया; दुर्लभ बन्धुदर्शन दोनों (द्रष्टा और दृश्य)-के हर्षका कारण होता है। विरहाग्निसे जली हुई मैं शोकसागरमें डूब रही थी। तुमने अपनी पीयूषवर्षिणी दृष्टिसे मेरी ओर निहारकर मुझे भलीभाँति अभिषिक्त कर दिया; जिससे मेरा ताप जाता रहा। तुम्हारे साथ रहनेपर मैं शिवा, शिवप्रदा, शिवबीजा और
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
७८७
शिवस्वरूपा हूँ; किंतु तुमसे वियुक्त हो जानेपर मैं अदृष्ट हो जाती हूँ और मेरी सारी चेष्टाएँ नष्ट हो जाती हैं। तुम्हारे समीप स्थित रहनेपर देह शोभासम्पन्न, पवित्र और सर्वशक्तिस्वरूप दीखता है; परंतु तुम्हारे चले जानेपर वह शवरूप हो जाता है। नाथ! स्त्री-पुरुषका सामान्य वियोग भी अत्यन्त दारुण होता है। यहाँ तो परमात्माके वियोगसे पाँचों प्राण शक्तियोंके सहित ही निकल जाते हैं।
यों कहकर देवी राधिकाने परमात्मा श्रीकृष्णको अपने आसनपर बैठाया और हर्षपूर्वक उनके चरणोंकी पूजा की। तत्पश्चात् शोभाशाली श्रीकृष्ण राधाके साथ रत्नसिंहासनपर विराजमान हुए। उस समय गोपियाँ निरन्तर श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रही थीं। चन्दनाने श्रीहरिके शरीरमें सुगन्धित चन्दनका अनुलेप किया। मुस्कराती हुई रत्नमालाने श्रीहरिके गलेमें रत्नमाला पहनायी। सती पद्मावतीने पद्माद्वारा कमल-पुष्पोंसे समर्चित चरणकमलमें जल, दूब, पुष्प और चन्दनयुक्त अर्घ्य प्रदान किया। मालतीने श्रीहरिकी चूड़ाको मालतीकी मालासे सुशोभित किया। सती पार्वतीने चम्पाके पुष्पका पुटक समर्पित किया। पारिजाताने हर्षमग्न हो श्रीहरिको पारिजात-पुष्प, कपूरयुक्त ताम्बूल और सुवासित शीतल जल निवेदित किया। कदम्बमालाने कदम्ब-पुष्पोंकी शुभ माला, प्रफुल्लित क्रीड़ा-कमल और अमूल्य रत्नदर्पण समर्पित किया। सुकोमला कमलाने पूर्वकालमें वरुणद्वारा दिये हुए दोनों सुन्दर वस्त्रोंको श्रीहरिके हाथमें ही रख दिया। सुन्दरी वधूने साक्षात् श्रीहरिको गोरोचनकी-सी आभावाले एवं मधुर मधुसे परिपूर्ण मधुपत्र दिया। सुधामुखीने भक्तिपूर्वक अमृतसे लबालब भरा हुआ अमृतपात्र प्रदान किया। किसी दूसरी गोपीने प्रफुल्लित मालती-पुष्पोंके मालाजालसे विभूषित एवं चन्दनचर्चित पुष्पशय्या तैयार की। वह शय्या एक ऐसे परम मनोहर भवनमें सजायी गयी थी, जिसका निर्माण बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे हुआ था; श्रेष्ठ मणि, मोती, माणिक्य और हीरोंके हार जिसकी विशेष शोभा बढ़ा रहे थे; कस्तूरी और कुंकुमयुक्त वायु जिसे सुगन्धित बना रही थी; जलते हुए सैकड़ों रत्नदीपोंसे जो उद्दीप्त हो रहा था और नाना प्रकारकी वस्तुओंसे समन्वित धूपोंद्वारा जो निरन्तर धूपित रहता था। वहाँ रतिकरी शय्याका निर्माण करके गोपियाँ हँसती हुई चली गयीं। तब एकान्तमें मनको आकर्षित करनेवाली उस परम रमणीय शय्याको देखकर राधा-माधव उसपर विराजमान हुए। उस समय सती राधाने माधवके गलेमें माला पहनायी, मुखमें सुवासित ताम्बूलका बीड़ा दिया; फिर श्यामसुन्दरके वक्षःस्थलपर कस्तूरी-कुंकुमयुक्त चन्दनका अनुलेप किया, उनकी शिखामें चम्पाका सुन्दर पुष्प लगाया, हाथमें सहस्रदलयुक्त क्रीड़ा-कमल दिया और उनके हाथसे मुरली छीनकर उसमें रत्नदर्पण पकड़ा दिया तथा उनके आगे पारिजातका खिला हुआ रुचिर पुष्प रख दिया। तत्पश्चात् जो शान्तिमूर्ति, कमनीय और नायिकाके मनको हर लेनेवाले हैं तथा मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे; उन प्रियतम श्रीकृष्णसे राधा एकान्तमें मुस्कराती हुई मधुर वचन बोलीं।
**श्रीराधिकाने कहा—**नाथ! जो स्वयं मङ्गलोंका भण्डार, सम्पूर्ण मङ्गलोंका कारण, मङ्गलरूप तथा मङ्गलोंका प्रदाता है, उसके विषयमें कुशल-मङ्गलका प्रश्न करना तो निष्फल ही है; तथापि इस समय कुशल पूछना समयानुसार उचित है; क्योंकि लौकिक व्यवहार वेदोंसे भी बली माना जाता है। इसलिये रुक्मिणीकान्त! सत्यभामाके प्राणपति! इस समय
१००- नारायणके आदेशसे नारदका विवाहके लिये उद्यत हो ब्रह्मलोकमें जाना, ब्रह्माका दल-बलके साथ राजा सृंजयके पास आना, सृंजय-कन्या और नारदका विवाह, सनत्कुमारद्वारा नारदको श्रीकृष्ण-मन्त्रोपदेश, महादेवजीका उन्हें श्रीकृष्णका ध्यान और जप-विधि बतलाना, तपके अन्तमें नारदका शरीर त्यागकर श्रीहरिके पादपद्ममें लीन होना
७८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कुशल तो है न ? तदनन्तर श्रीराधाने भगवान् श्रीकृष्णसे उनके स्वरूप तथा अवतार-लीलाके सम्बन्धमें प्रश्न किया।
तब श्रीकृष्ण बोले—राधे! जिसे सुनकर मूर्ख हलवाहा भी तत्काल ही पण्डित हो जाता है, उस सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञानका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो। राधे! मैं स्वभावसे ही सब लोकोंका स्वामी हूँ, फिर रुक्मिणी आदि महिलाओंकी तो बात ही क्या है। मैं कार्य-कारणरूपसे पृथक्-पृथक् व्यक्त होता हूँ। मैं स्वयं ज्योतिर्मय हूँ, समस्त विश्वोंका एकमात्र आत्मा हूँ और तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्यास हूँ। गोलोकमें मैं स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्णरूपसे वर्तमान रहता हूँ और रमणीय क्षेत्र गोकुलके 'वृन्दावन' नामक वनमें मैं ही राधापति हूँ। उस समय मैं द्विभुज होकर गोपवेषमें शिशुरूपसे क्रीड़ा करता हूँ; ग्वाले, गोपियाँ और गौएँ ही मेरी सहायक होती हैं। वैकुण्ठमें मैं चतुर्भुजरूपसे रहता हूँ; वहाँ मैं ही लक्ष्मी और सरस्वतीका प्रियतम हूँ और सदा शान्तरूपसे वास करता हूँ। इस प्रकार मैं सनातन परमेश्वर ही दो रूपोंमें विभक्त हूँ। भूतलपर, श्वेतद्वीप और क्षीरसागरमें मानसी, सिन्धुकन्या और मर्त्यलक्ष्मीके जो पति हैं, वह भी मैं ही हूँ और वहाँ भी मैं चतुर्भुजरूपसे ही रहता हूँ। मैं स्वयं नारायण ऋषि हूँ और धर्मवक्ता, धर्मिष्ठ तथा धर्म-मार्गके प्रवर्तक सनातन धर्म नर हैं। धर्मिष्ठा तथा पतिव्रता शान्ति लक्ष्मीस्वरूपा है और इस पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें मैं उसका पति हूँ। मैं ही सिद्धेश्वर, सिद्धियोंके दाता और साक्षात् कपिल हूँ। सुन्दरि! इस प्रकार व्यक्तिभेदसे मैं नाना रूप धारण करता हूँ। चतुर्भुजरूपधारी मैं ही सदा द्वारकामें रुक्मिणीका स्वामी होता हूँ, क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही सत्यभामाके शुभ भवनमें वास करता हूँ तथा अन्यान्य रानियोंके महलोंमें मैं ही पृथक्-पृथक् शरीर धारण करके क्रीड़ा करता हूँ। मैं नारायण ऋषि ही इस अर्जुनका सारथि हूँ। अर्जुन नर-ऋषि है, धर्मका पुत्र है, बलवान् है और मेरे अंशसे भूतलपर उत्पन्न हुआ है। उसने पुष्करक्षेत्रमें सारथि-कार्यके लिये तपस्याद्वारा मेरी आराधना की है।
राधे! जैसे तुम गोलोकमें राधिकादेवी हो, उसी तरह गोकुलमें भी हो। तुम्हीं वैकुण्ठमें महालक्ष्मी और सरस्वती हो। क्षीरोदशायीकी प्रियतमा मर्त्यलक्ष्मी तुम्हीं हो। धर्मकी पुत्रवधू लक्ष्मीस्वरूपिणी शान्तिके रूपमें तुम्हीं वर्तमान हो। भारतवर्षमें कपिलकी प्यारी पत्नी सती भारती तुम्हारा ही नाम है। तुम्हीं मिथिलामें सीता नामसे विख्यात हो। सती द्रौपदी तुम्हारी ही छाया है। द्वारकामें महालक्ष्मीके अंशसे प्रकट हुई सती रुक्मिणीके रूपमें तुम्हीं वास करती हो। पाँचों पाण्डवोंकी पत्नी द्रौपदी तुम्हारी कला है। तुम्हीं रामकी पत्नी सीता हो; रावणने तुम्हारा ही अपहरण किया था। सति! जैसे तुम अपनी छाया और कलासे नाना रूपोंमें प्रकट हो, वैसे ही मैं भी अपने अंश और कलासे अनेक रूपोंमें व्यक्त हूँ। मैं ही परिपूर्णतम परात्पर परमात्मा हूँ। सती राधे! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह सारा आध्यात्मिक ज्ञान बता दिया। परमेश्वरि! अब तुम मेरे सारे अपराधोंको क्षमा कर दो। श्रीकृष्णका कथन सुनकर राधिका तथा सभी गोपिकाओंको महान् हर्ष हुआ। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्णको प्रणाम करने लगीं। (अध्याय १२५)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८९
श्रीकृष्णका राधाके साथ विभिन्न स्थलोंमें विहार करके पुनः गोकुलमें जाना, वहाँ उनका स्वागत-सत्कार, यशोदाका राधसहित श्रीकृष्णको महलमें ले जाना और मङ्गल-महोत्सव करना
तदनन्तर राधिकाने कहा—महाभाग! अब पुण्यमय वृन्दावनमें स्थित रासमण्डलको चलिये; वहाँ मैं आपके साथ जलमें तथा स्थलपर क्रीड़ा करूँगी। पुनः मलयपर्वत और सुन्दर मणिमन्दिरको चलूँगी। इनके अतिरिक्त जो दूसरे रहस्यमय स्थान हैं, जिन्हें मैंने जन्मसे लेकर आजतक सुना ही नहीं है; उन-उन स्थानोंमें भी आपके साथ चलूँगी—ऐसी मेरी उत्कृष्ट लालसा है।
यों परस्पर वार्तालाप करते ही वह मङ्गलमयी रात्रि व्यतीत हो गयी। अरुणोदय बेला आ पहुँची तथापि सती राधाने माधवको छोड़ना नहीं चाहा। तब श्रीकृष्णने युक्तिपूर्वक प्रेमभरे वचनोंसे राधाको समझाया। तदनन्तर शरत्कालीन कमलके-से विशाल नेत्रोंवाले श्रीहरि प्रातःकृत्य समाप्त करके राधा तथा गोपियोंके साथ एक ऐसे रथपर सवार हुए, जो गोलोकसे आया था। वह मनोहर तथा मनके समान वेगशाली रथ एक योजन लंबा-चौड़ा था, उसमें सहस्रों पहिये लगे थे, बहुमूल्य मणियोंके बने हुए तीन सौ करोड़ चमकीले गृहोंसे वह सुशोभित था, तीन करोड़ मणिस्तम्भों और रत्नोंकी झालरोंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी; मुक्ता, माणिक्य और उत्तम हीरेके हारोंसे वह परम सुहावना लग रहा था; वह नाना प्रकारकी विचित्र चित्रकारियों, श्वेत चँवर और दर्पणों, अग्निशुद्ध चमकीले वस्त्रों और मालासमूहोंसे विभूषित था; उसमें रत्नोंकी बनी हुई पुष्पचन्दनचर्चित अनेकों शय्याएँ शोभा दे रही थीं, समान रूप और वेशवाली लाखों गोपियोंसे वह समावृत था और उसे एक हजार घोड़े खींच रहे थे। उस रथसे भगवान् पुनः वृन्दावनमें गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने रात्रिके समय जलस्थलपर विहार किया और राधिकाको वहाँके सभी पदार्थोंका इस रूपमें दिखलाया, मानो सभी नवीन प्रकट हुए हों।
पुनः सुन्दर शृङ्गार करके वनों और उपवनोंमें, विस्यन्दक, सुरसन, माहेन्द्र और नन्दनवनमें, सुमेरुकी चोटी तथा रमणीय गन्धमादन पर्वतपर, सुन्दर-सुन्दर पर्वत, कन्दरा और वनमें, अत्यन्त गुप्त पुष्पोद्यानोंमें, प्रत्येक नदियों और नदोंके जलमें, समुद्रके तटपर, पारिजात-वृक्षोंके मनोहर वनमें सुभद्र, पुष्पभद्र और नारायण सरोवरपर, पवनके आवासस्थान तथा देवताओंकी निवासभूमि मलय पर्वतपर, त्रिकूट, भद्रकूट, पञ्चकूट और सुकूटपर, देवोंकी स्वर्णमयी कमनीय भूमिपर, प्रत्येक समुद्रपर तथा मनोहर द्वीपमें, श्रेष्ठ स्वर्गलोकमें, पुण्यमय रुचिर चन्द्रसरोवरपर और मुनियोंके आश्रमोंके आस-पास उन्होंने राधाके साथ विहार किया। पुनः शीघ्र ही पुण्यप्रद जम्बूद्वीपमें आकर द्वारका तथा रैवतक पर्वतको दिखलाया। फिर गोप और गो-समूहसे व्याप्त गोकुलमें आये। वहाँ भाण्डीरवटको देखकर वे पुण्यमय वृन्दावनमें गये।
श्रीकृष्णका आगमन सुनकर नन्द, यशोदा और बूढ़े गोप तथा गोपियोंकी आकुलता जाती रही और उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू छलक आये। फिर तो उन्होंने गजराज, नटी, नट, नर्तक, पति-पुत्रवती साध्वी ब्राह्मणी और ब्राह्मणोंको आगे करके उनका उसी प्रकार स्वागत किया, जैसे देवगण अग्निका करते हैं। तब माधव नन्द तथा माता यशोदाको देखकर राधाके साथ बालकृष्ण-रूपमें उनके निकट आये। फिर मधुसूदन हँसकर माताकी गोदमें जा बैठे। तब यशोदासहित नन्द उनका मुख-कमल चूमने लगे और स्नेहवश छातीसे लगाकर नेत्रोंके अश्रुजलसे उन्हें सींचने
१०१- पुराणोंके लक्षण और उनकी श्लोक-संख्याका निरूपण, ब्रह्मवैवर्तपुराणके पठन-श्रवणके माहात्म्यका वर्णन करके सूतजीका सिद्धाश्रमको प्रयाण
७९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण लगे। उधर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण यशोदाका स्तनपान करनेमें जुट गये। उस समय सभी लोगोंने श्रीकृष्णको उसी रूपमें देखा, जिस रूपमें वे मथुरा गये थे। उनके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी, वे रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे, उनकी ग्यारह वर्षकी किशोर अवस्था थी, पीताम्बर उनकी शोभा बढ़ा रहा था, शिखामें मयूरपिच्छकी निराली छटा थी और वे मालतीकी मालाओंसे सुसज्जित थे। तत्पश्चात् यशोदा राधासहित माधवको महलके भीतर लिवा ले गयीं। वहाँ उन्होंने माङ्गलिक कार्य सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको भोजन कराया और गोपियोंका उसी प्रकार पूजन किया जैसे लोग मुनियोंका करते हैं। फिर आनन्दमग्न हो ब्राह्मणोंको मणि, रत्न, मूँगा, उत्तम सुवर्ण, मोती, माणिक्य, हीरा, गजरत्न, गोरत्न, मनोहर अश्वरत्न, धान्य, फसल लगी हुई खेती और वस्त्र दान किये। राधाके साथ माधवको अपूर्व वस्तुका दर्शन कराया। नारद ! फिर गोपियोंको भी आदरपूर्वक मिष्टान्नका भोजन कराया, दुन्दुभियाँ बजवायीं, मङ्गल कराया और देवगणोंको आनन्दपूर्वक मनोहर पदार्थोंका भोग समर्पित किया। (अध्याय १२६) श्रीकृष्णद्वारा नन्दको ज्ञानोपदेश और राधा-कलावती आदि गोपियोंका गोलोक-गमन श्रीनारायण कहते हैं— नारद! जहाँ पहले ब्राह्मणपत्नियोंने श्रीकृष्णको अन्न दिया था; उस भाण्डीर-वटकी छायामें श्रीकृष्ण स्वयं विराजमान हुए और वहीं समस्त गोपोंको बुलवा भेजा। श्रीहरिके वामभागमें राधिकादेवी, दक्षिणभागमें यशोदासहित नन्द, नन्दके दाहिने वृषभानु और वृषभानुके बायें कलावती तथा अन्यान्य गोप, गोपी, भाई-बन्धु तथा मित्रोंने आसन ग्रहण किया। तब गोविन्दने उन सबसे समयोचित यथार्थ वचन कहा। श्रीभगवान् बोले- नन्द ! इस समय जो समयोचित, सत्य, परमार्थ और परलोकमें सुखदायक है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सभी पदार्थ बिजलीकी चमक, जलके ऊपर की हुई रेखा और पानीके बुलबुलेके समान भ्रमरूप ही हैं- ऐसा जानो। मैंने मथुरामें तुम्हें सब कुछ बतला दिया था, कुछ भी उठा नहीं रखा था। उसी प्रकार कदलीवनमें राधिकाने यशोदाको समझाया था। वही परम सत्य भ्रमरूपी अन्धकारका विनाश करनेके लिये दीपक है; इसलिये तुम मिथ्या मायाको छोड़कर उसी परम पदका स्मरण करो। वह पद जन्म-मृत्यु-जरा- व्याधिका विनाशक, महान् हर्षदायक, शोक- संतापका निवारक और कर्ममूलका उच्छेदक है। मुझ परम ब्रह्म सनातन भगवान्का बारंबार ध्यान करके तुम उस परम पदको प्राप्त करो। अब कर्मकी जड़ काट देनेवाले कलियुगका आगमन संनिकट है; अतः तुम शीघ्र ही गोकुलवासियोंके साथ गोलोकको चले जाओ। तदनन्तर भगवान्ने कलियुगके धर्म तथा लक्षणोंका वर्णन किया। विप्रवर ! इसी बीच वहाँ व्रजमें लोगोंने सहसा गोलोकसे आये हुए एक मनोहर रथको देखा। वह रथ चार योजन विस्तृत और पाँच योजन ऊँचा था; बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे उसका निर्माण हुआ था। वह शुद्ध स्फटिकके समान उद्भासित हो रहा था; विकसित पारिजात- पुष्पोंकी मालाओंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी; वह कौस्तुभमणयोंके आभूषणोंसे विभूषित था; उसके ऊपर अमूल्य रत्नकलश चमक रहा था; उसमें हीरेके हार लटक रहे थे; वह सहस्रों
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९१ करोड़ मनोहर मन्दिरोंसे व्याप्त था; उसमें दो हजार पहिये लगे थे और दो हजार घोड़े उसका भार वहन कर रहे थे तथा उसपर सूक्ष्म वस्त्रका आवरण पड़ा हुआ था एवं वह करोड़ों गोपियोंसे समावृत था। नारद ! राधा और धन्यवादकी पात्र कलावती देवीका जन्म किसीके गर्भसे नहीं हुआ था। यहाँतक कि गोलोकसे जितनी गोपियाँ आयी थीं; वे सभी अयोनिजा थीं। उसके रूपमें श्रुतिपत्नियां ही अपने शरीरसे प्रकट हुई थीं। वे सभी श्रीकृष्णकी आज्ञासे अपने नश्वर शरीरका त्याग करके उस रथपर सवार हो उत्तम गोलोकको चली गयीं। साथ ही राधा भी गोकुलवासियोंके साथ गोलोकको प्रस्थित हुईं। ब्रह्मन् ! मार्गमें उन्हें विरजा नदीका मनोहर तट दीख पड़ा, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था। उसे पार करके वे शतशृङ्ग पर्वतपर गयीं। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकारके मणिसमूहोंसे व्याप्त सुसज्जित रासमण्डलको देखा। उससे कुछ दूर आगे जानेपर पुण्यमय वृन्दावन मिला। आगे बढ़नेपर अक्षयवट दिखायी दिया, उसकी करोड़ों शाखाएँ चारों ओर फैली हुई थीं। वह सौ योजन विस्तारवाला और तीन सौ योजन ऊँचा था और लाल रंगके बड़े-बड़े फलसमूह उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके नीचे मनोहर वृन्दा हजारों-करोड़ों गोपियोंके साथ विराजमान थीं। उसे देखकर राधा तुरंत ही रथसे उतरकर आदरसहित मुस्कराती हुई उसके निकट गयीं। वृन्दाने राधाको नमस्कार किया। तत्पश्चात् रासेश्वरी राधासे वार्तालाप करके वह उन्हें अपने महलके भीतर लिवा ले गयी। वहाँ वृन्दाने राधाको हीरेके हारोंसे समन्वित एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया और स्वयं उनकी चरणसेवामें जुट गयी। सात सखियाँ श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं। इतनेमें परमेश्वरी राधाको देखनेके लिये सभी गोपियाँ वहाँ आ पहुँचीं। तब राधाने नन्द आदिके लिये पृथक्-पृथक् आवासस्थानकी व्यवस्था की। तदनन्तर परमानन्दरूपा गोपिका राधा परमानन्दपूर्वक सबके साथ अपने परम रुचिर भवनको प्रस्थित हुईं। (अध्याय १२७) श्रीकृष्णके गोलोक-गमनका वर्णन श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! परिपूर्णतम प्रभु भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ तत्काल ही गोकुलवासियोंके सालोक्य मोक्षको देखकर भाण्डीरवनमें वटवृक्षके नीचे पाँच गोपोंके साथ ठहर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सारा गोकुल तथा गो-समुदाय व्याकुल है। रक्षकोंके न रहनेसे वृन्दावन शून्य तथा अस्त- व्यस्त हो गया है। तब उन कृपासागरको दया आ गयी। फिर तो, उन्होंने योगधारणाद्वारा अमृतकी वर्षा करके वृन्दावनको मनोहर, सुरम्य और गोपों तथा गोपियोंसे परिपूर्ण कर दिया। साथ ही गोकुलवासी गोपोंको ढाढस भी बँधाया। तत्पश्चात् वे हितकर नीतियुक्त दुर्लभ मधुर वचन बोले। श्रीभगवान्ने कहा- हे गोपगण ! हे बन्धो ! तुमलोग सुखका उपभोग करते हुए शान्तिपूर्वक यहाँ वास करो; क्योंकि प्रियाके साथ विहार, सुरम्य रासमण्डल और वृन्दावन नामक पुण्यवनमें श्रीकृष्णका निरन्तर निवास तबतक रहेगा, जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी स्थिति रहेगी। तत्पश्चात् लोकोंके विधाता ब्रह्मा भी भाण्डीरवनमें आये। उनके पीछे स्वयं शेष, धर्म, भवानीके साथ स्वयं शंकर, सूर्य, महेन्द्र, चन्द्र, अग्नि, कुबेर, वरुण, पवन, यम, ईशान आदि देव, आठों वसु, सभी ग्रह, रुद्र, मुनि तथा मनु- ये सभी शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँचे, जहाँ सामर्थ्यशाली भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। तब स्वयं ब्रह्माने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया और यों कहा। ब्रह्मा बोले- भगवन्! आप परिपूर्णतम ब्रह्मस्वरूप, नित्य विग्रहधारी, ज्योतिःस्वरूप,
७९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
परमब्रह्म और प्रकृतिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। परमात्मन् ! आप परम निर्लिप्त, निराकार, ध्यानके लिये साकार, स्वेच्छामय और परमधाम हैं; आपको प्रणाम है। सर्वेश ! आप सम्पूर्ण कार्यस्वरूपोंके स्वामी, कारणोंके कारण और ब्रह्मा, शिव, शेष आदि देवोंके अधिपति हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। परात्पर! आप सरस्वती, पद्मा, पार्वती, सावित्री और राधाके स्वामी हैं; रासेश्वर ! आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। सृष्टिरूप ! आप सबके आदिभूत, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सबके पालक और संहारक हैं; आपको नमस्कार प्राप्त हो। हे नाथ ! आपके चरणकमलकी रजसे वसुन्धरा पावन तथा धन्य हुई हैं; आपके परमपद चले जानेपर यह शून्य हो जायगी। इसपर क्रीड़ा करते आपके एक सौ पचीस वर्ष बीत गये। अब आप इस विरहातुरा रोती हुई पृथ्वीको छोड़कर अपने धामको पधार रहे हैं।
**श्रीमहादेवजीने कहा—**विभो ! आप ब्रह्माकी प्रार्थनासे भूतलपर अवतीर्ण हो पृथ्वीका भार हरण करके अपने पदको जा रहे हैं। आपके चरणोंसे अङ्कित हुई भूमि तुरंत ही पावन और तीनों लोकोंमें धन्य हो गयी। आपके चरणकमलका साक्षात् दर्शन करके हमलोग और मुनिगण धन्य हो गये। जो ऊर्ध्वरेता मुनियोंके लिये ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य और निष्पाप हैं; वे ही परमेश्वर इस समय भूतलपर हमलोगोंके दृष्टिगोचर हुए हैं। जिनके रोमकूपोंमें विश्वोंका निवास है, उन सर्वनिवास प्रभुको वासु कहते हैं, उन वासु-स्वरूप महाविष्णुके जो देव हैं, वे भूतलपर 'वासुदेव' नामसे विख्यात हैं। जिनके अनुपम एवं परम दुर्लभ पादपद्म सिद्धेन्द्रोंके चिरकालतक तपस्या करनेपर उपलब्ध होते हैं; वे ही आज सब लोगोंके नेत्रोंके विषय हुए हैं।
**अनन्त बोले—**नाथ ! ऐश्वर्यशाली अनन्त तो आप ही हैं, मैं नहीं हूँ। मैं तो आपका कलांश हूँ। विश्वके एकमात्र आधार उस क्षुद्र कूर्मकी पीठपर मैं उसी तरह दिखायी देता हूँ, जैसे हाथीके ऊपर मच्छर। ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक असंख्यौं शेष और कूर्म हैं तथा विश्व भी असंख्य हैं। उन सबके स्वामी स्वयं आप हैं। नाथ! हमलोगोंका ऐसा सुदिन कहाँ होगा कि स्वप्नमें भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, वे ही ईश्वर समस्त जीवोंके दृष्टिगोचर हो रहे हैं। नाथ! आपने ही वसुन्धराको पावन बनाया है। अब शोकसागरमें डूबती एवं रोती हुई उस पृथ्वीको अनाथ करके आप गोलोक पधार रहे हैं।
**देवताओंने कहा—**भगवन् ! देवगण तथा ब्रह्मा और ईशान आदि देवता जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं; उनका स्तवन भला, हमलोग क्या कर सकते हैं; अतः आपको नमस्कार है।
मुने ! इतना कहकर वे सभी देवता हर्षमग्न हो द्वारकावासी भगवान्का दर्शन करनेके लिये शीघ्र ही द्वारकापुरीको प्रयाण कर गये। उनमें जितने ग्वाले थे, वे सभी उत्तम गोलोकको चले गये। पृथ्वी भयभीत हो काँपने लगी। सातों समुद्र मर्यादारहित हो गये। ब्रह्मशापसे द्वारकाकी शोभा नष्ट हो गयी। तब राधिकापति श्रीकृष्ण उसे त्यागकर कदम्बमूलस्थित मूर्तिमें समा गये। उन सभी यदुवंशियोंका एरकायुद्धमें विनाश हो गया तथा उनकी पत्नियाँ चितामें जलकर अपने-अपने पतियोंकी अनुगामिनी बन गयीं। अर्जुनने हस्तिनापुर जाकर यह समाचार युधिष्ठिरसे कह सुनाया। तब राजा युधिष्ठिर भी पत्नी तथा भाइयोंके साथ स्वर्गको चले गये।
तदनन्तर जो परम आत्मबलसे सम्पन्न, देवाधिदेव, नारायण, प्रभु, श्यामसुन्दर, किशोर अवस्थावाले और रत्ननिर्मित आभूषणोंसे सुशोभित थे; अग्निशुद्ध वस्त्र जिनका परिधान था; वनमाला जिनकी शोभा बढ़ा रही थी; जो अत्यन्त सुन्दर, शान्त और मनोहर थे; जिनके पद्मा आदिद्वारा
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
७९३
वन्दित चरणकमलमें व्याधद्वारा छोड़ा हुआ अस्त्र चुभा हुआ था; उन लक्ष्मीकान्त परमेश्वरको कदम्बके नीचे स्थित देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और फिर उनकी स्तुति की। तब श्रीकृष्णने उन ब्रह्मा आदि देवोंकी ओर मुस्कराते हुए देखकर उन्हें अभयदान दिया। पृथ्वी प्रेमविह्वल हो रो रही थी; उसे पूर्णरूपसे आश्वासन दिया और व्याधको अपने उत्तम परम पदको भेज दिया। तत्पश्चात् बलदेवजीका परम अद्भुत तेज शेषनागमें, प्रद्युम्नका कामदेवमें और अनिरुद्धका ब्रह्मामें प्रविष्ट हो गया। नारद! देवी रुक्मिणी, जो अयोनिजा तथा साक्षात् महालक्ष्मी थीं; अपने उसी शरीरसे वैकुण्ठको चली गयीं। कमलालया सत्यभामा पृथ्वीमें तथा स्वयं जाम्बवतीदेवी जगज्जननी पार्वतीमें प्रवेश कर गयीं। इस प्रकार भूतलपर जो-जो देवियाँ जिन-जिनके अंशसे प्रकट हुई थीं; वे सभी पृथक्-पृथक् अपने अंशीमें विलीन हो गयीं। साम्बका अत्यन्त निराला तेज स्कन्दमें, वसुदेव कश्यपमें और देवकी अदितिमें समा गयीं। विकसित मुख और नेत्रोंवाले समुद्रने रुक्मिणीके महलको छोड़कर शेष सारी द्वारकापुरीको अपने अंदर समेट लिया। इसके बाद क्षीरसागरने आकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका स्तवन किया। उस समय उनके वियोगके कारण उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये और वह व्याकुल होकर रोने लगा। मुने! तत्पश्चात् गङ्गा, सरस्वती, पद्मावती, यमुना, गोदावरी, स्वर्णरेखा, कावेरी, नर्मदा, शरावती, बाहुदा और पुण्यदायिनी कृतमाला—ये सभी सरिताएँ भी वहाँ आ पहुँचीं और सभीने परमेश्वर श्रीकृष्णको नमस्कार किया। उनमें जह्नुतनया गङ्गादेवी विरह-वेदनासे कातर तथा अत्यन्त दीन हो रही थीं। उनके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये थे। वे रोती हुई परमेश्वर श्रीकृष्णसे बोलीं।
**भागीरथीने कहा—**नाथ! रमणश्रेष्ठ! आप तो उत्तम गोलोकको पधार रहे हैं; किंतु इस कलियुगमें हमलोगोंकी क्या गति होगी?
**तब श्रीभगवान् बोले—**जाह्नवि! पापीलोग तुम्हारे जलमें स्नान करनेसे तुम्हें जिन पापोंको देंगे; वे सभी मेरे मन्त्रकी उपासना करनेवाले वैष्णवके स्पर्श, दर्शन और स्नानसे तत्काल ही भस्म हो जायँगे। जहाँ हरि-नाम-संकीर्तन और पुराणोंकी कथा होगी; वहाँ तुम इन सरिताओंके साथ जाकर सावधानतया श्रवण करोगी। उस पुराण-श्रवण तथा हरि-नाम-संकीर्तनसे ब्रह्महत्या आदि महापातक जलकर राख हो जाते हैं। वे ही पाप वैष्णवके आलिङ्गनसे भी दग्ध हो जाते हैं। जैसे अग्नि सूखी लकड़ी और घास-फूसको जला डालती है; उसी प्रकार जगत्में वैष्णवलोग पापियोंके पापोंको भी नष्ट कर देते हैं। गङ्गे! भूतलपर जितने पुण्यमय तीर्थ हैं; वे सभी मेरे भक्तोंके पावन शरीरोंमें सदा निवास करते हैं। मेरे भक्तोंकी चरण-रजसे वसुन्धरा तत्काल पावन हो जाती है, तीर्थ पवित्र हो जाते हैं तथा जगत् शुद्ध हो जाता है। जो ब्राह्मण मेरे मन्त्रके उपासक हैं, मुझे अर्पित करनेके बाद मेरा प्रसाद भोजन करते हैं और नित्य मेरे ही ध्यानमें तल्लीन रहते हैं; वे मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके स्पर्शमात्रसे वायु और अग्नि पवित्र हो जाते हैं। मेरे भक्तोंके चले जानेपर सभी वर्ण एक हो जायँगे और मेरे भक्तोंसे शून्य हुई पृथ्वीपर कलियुगका पूरा साम्राज्य हो जायगा।
इसी अवसरपर वहाँ श्रीकृष्णके शरीरसे एक चार-भुजाधारी पुरुष प्रकट हुआ। उसकी प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंको लज्जित कर रही थी। वह श्रीवत्स-चिह्नसे विभूषित था और उसके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे। वह एक सुन्दर रथपर सवार होकर क्षीरसागरको चला गया। तब स्वयं मूर्तिमती सिन्धुकन्या भी उनके पीछे चली गयीं। जगत्के पालनकर्ता
७९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण विष्णुके श्वेतद्वीप चले जानेपर श्रीकृष्णके मनसे उत्पन्न हुई मनोहरा मर्त्यलक्ष्मीने भी उनका अनुगमन किया। इस प्रकार उस शुद्ध सत्त्वस्वरूपके दो रूप हो गये। उनमें दक्षिणाङ्ग हो भुजाधारी गोप-बालकके रूपमें प्रकट हुआ। वह नूतन जलधरके समान श्याम और पीताम्बरसे शोभित था; उसके मुखसे सुन्दर वंशी लगी हुई थी; नेत्र कमलके समान विशाल थे; वह शोभासम्पन्न तथा मन्द मुस्कानसे युक्त था। वह सौ करोड़ चन्द्रमाओंके समान सौन्दर्यशाली, सौ करोड़ कामदेवोंकी-सी प्रभावाला, परमानन्दस्वरूप, परिपूर्णतम, प्रभु, परमधाम, परब्रह्मस्वरूप, निर्गुण, सबका परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, अविनाशी शरीरवाला, प्रकृतिसे पर और ऐश्वर्यशाली ईश्वर था। योगीलोग जिसे सनातन ज्योतिरूप जानते हैं और उस ज्योतिके भीतर जिसके नित्य रूपको भक्तिके सहारे समझ पाते हैं। विचक्षण वेद जिसे सत्य, नित्य और आद्य बतलाते हैं, सभी देवता जिसे स्वेच्छामय परम प्रभु कहते हैं, सारे सिद्धशिरोमणि तथा मुनिवर जिसे सर्वरूप कहकर पुकारते हैं, योगिराज शंकर जिसका नाम अनिर्वचनीय रखते हैं, स्वयं ब्रह्मा जिसे कारणके कारणरूपसे प्रख्यात करते हैं और शेषनाग जिस नौ प्रकारके रूप धारण करनेवाले ईश्वरको अनन्त कहते हैं; छः प्रकारके धर्म ही उनके छः रूप हैं, फिर एक रूप वैष्णवोंका, एक रूप वेदोंका और एक रूप पुराणोंका है; इसीलिये वे नौ प्रकारके कहे जाते हैं। जो मत शंकरका है, उसी मतका आश्रय ले न्यायशास्त्र जिसे अनिर्वचनीय रूपसे निरूपण करता है, दीर्घदर्शी वैशेषिक जिसे नित्य बतलाते हैं; सांख्य उन देवको सनातन ज्योतिरूप, मेरा अंशभूत वेदान्त सर्वरूप और सर्वकारण, पतञ्जलिमनानुयायी अनन्त, वेदगण सत्यस्वरूप, पुराण स्वेच्छामय और भक्तगण नित्यविग्रह कहते हैं; वे ही ये गोलोकनाथ श्रीकृष्ण गोकुलमें वृन्दावन नामक पुण्यवनमें गोपवेश धारण करके नन्दके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। ये राधाके प्राणपति हैं। ये ही वैकुण्ठमें चार-भुजाधारी महालक्ष्मीपति स्वयं भगवान् नारायण हैं; जिनका नाम मुक्ति-प्राप्तिका कारण है। नारद ! जो मनुष्य एक बार भी 'नारायण' नामका उच्चारण कर लेता है; वह तीन सौ कल्पोंतक गङ्गा आदि सभी तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेता है। तदनन्तर जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं; जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न शोभा देता है; मणिश्रेष्ठ कौस्तुभ और वनमालासे जो सुशोभित होते हैं; वेद जिनकी स्तुति करते हैं; वे भगवान् नारायण सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षदोंके साथ विमानद्वारा अपने स्थान वैकुण्ठको चले गये। उन वैकुण्ठनाथके चले जानेपर राधाके स्वामी स्वयं श्रीकृष्णने अपनी वंशी बजायी, जिसका सुरीला शब्द त्रिलोकीको मोहमें डालनेवाला था। नारद! उस शब्दको सुनते ही पार्वतीके अतिरिक्त सभी देवतागण और मुनिगण मूर्च्छित हो गये और उनकी चेतना लुप्त हो गयी। तब जो भगवती विष्णुमाया, सर्वरूपा, सनातनी, परब्रह्मस्वरूपा, परमात्मस्वरूपिणी सगुणा, निर्गुणा, परा और स्वेच्छामयी हैं; वे सती-साध्वी देवी पार्वती सनातन भगवन् श्रीकृष्णसे बोलीं। पार्वतीने कहा - प्रभो ! गोलोकस्थित रासमण्डलमें मैं ही अपने एक राधिकारूपसे रहती हूँ। इस समय गोलोक रासशून्य हो गया है; अतः आप मुक्ता और माणिक्यसे विभूषित रथपर आरूढ़ हो वहाँ जाइये और उसे परिपूर्ण कीजिये। आपके वक्षःस्थलपर वास करनेवाली परिपूर्णतमा देवी मैं ही हूँ। आपकी आज्ञासे वैकुण्ठमें वास करनेवाली महालक्ष्मी मैं ही हूँ। वहीं श्रीहरिके वामभागमें स्थित रहनेवाली सरस्वती भी मैं ही हूँ। मैं आपकी आज्ञासे आपके मनसे उत्पन्न हुई सिन्धुकन्या हूँ। ब्रह्माके संनिकट रहनेवाली अपनी