भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

२२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| न; बुभुक्षादिनैकत्वप्रत्ययात् प्रच्यावितस्योपपत्तेर्निवृत्त्यर्थत्वात्। <br><br> न च प्रतिषिद्धसेवाप्राप्तिः; एकत्वप्रत्ययोत्पत्तेः प्रागेव प्रतिषिद्धत्वात्। न हि रात्रौ कूपे कण्टके वा पतित उदितेऽपि सवितरि पतति तस्मिन्नेव। तस्मात्सिद्धं निवृत्तकर्मा भिक्षुक एव ब्रह्मसंस्थ इति। <br><br> (तपःशब्देन परिव्राड्ग्रहणस्य प्रत्याख्यानम्) <br> यत्पुनरुक्तं सर्वेषां ज्ञानवर्जितानां पुण्यलोकतेति, सत्यमेतत्। यच्चोक्तं तपःशब्देन परिव्राडप्युक्त इति, एतदसत्; कस्मात् ? परिव्राजकस्यैव ब्रह्मसंस्थतासंभवात्। स एव ह्यवशेषित इत्यवोचाम। एकत्वविज्ञानवतोऽग्निहोत्रादिवत्तपोन्निवृत्तेश्च। भेदबुद्धि मत एव हि तपः- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि क्षुधा आदिद्वारा एकत्वप्रत्ययसे च्युत कर दिये जानेपर उसके द्वारा अनुचित कर्मोंसे निवृत्ति-के लिये उनका पालन किया जाना सम्भव है। इसके सिवा उसके द्वारा प्रतिषिद्धि कर्मोंका सेवन किया जाना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उनका प्रतिषेध तो वह एकत्वज्ञानकी उत्पत्तिसे पूर्व ही कर चुकता है। रात्रिके समय कुएँ या काँटोंमें गिर जानेवाला पुरुष सूर्योदय होनेपर भी उन्हींमें नहीं गिर जाता। अतः सिद्ध होता है कि कर्मोंसे निवृत्त हुआ भिक्षुक ही ब्रह्मनिष्ठ हो सकता है। <br><br> तथा यह जो कहा कि सम्पूर्ण ज्ञान-रहित पुरुषोंको पुण्यलोककी प्राप्ति होती है सो ठीक ही है; परंतु ऐसा जो कहा कि 'तपः' शब्दसे संन्यासी-का भी कथन है सो ठीक नहीं। ऐसा क्यों है ? क्योंकि परिव्राजककी ही ब्रह्मनिष्ठता होनी सम्भव है। और वही [पुण्यलोकको प्राप्त होनेवालों-मेंसे] बच रहा है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं, क्योंकि एकत्वविज्ञानवान्‌का तो अग्निहोत्रादिके समान तप भी निवृत्त हो ही जाता है। भेदबुद्धिमान्‌में ही तपकी |

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७


मूल संस्कृतभाष्यार्थ
कर्तव्यता स्यात् । एतेन कर्मच्छिद्रे ब्रह्मसंस्थतासामर्थ्यम्, अप्रतिषेधश्च प्रत्युक्तः । तथा ज्ञानवानेव निवृत्तकर्मा परिव्राडिति ज्ञानवैयर्थ्यं प्रत्युक्तम् ।कर्तव्यता भी रह सकती' है । इससे अन्य आश्रमवालोंको भी कर्मोंसे अवकाश मिलनेपर ब्रह्मस्थितिके सामर्थ्यका तथा उनके लिये ब्रह्मनिष्ठाके अप्रतिषेधका भी निषेध कर दिया गया । तथा ज्ञानी ही निवृत्तकर्मा परिव्राट् हो सकता है—इससे ज्ञानकी निरर्थकताका भी खण्डन कर दिया गया !
(परिव्राजके ब्रह्मसंस्थशब्दस्यारूढत्वनिरासः)<br>यत्पुनरुक्तं यववराहादिशब्दवत्परिव्राजके न रूढो ब्रह्मसंस्थशब्द इति तत्परिहृतम् । तस्यैव ब्रह्मसंस्थतासंभवान्नान्यस्येति ।तथा ऐसा जो कहा कि 'यव' और 'वराह' आदि शब्दोंके समान 'ब्रह्मसंस्थ' शब्द परिव्राजकमें रूढ नहीं है उसका भी परिहार कर दिया गया, क्योंकि उसीकी ब्रह्मनिष्ठा होनी सम्भव है, और किसीकी नहीं ।
('रूढिनिमित्तं नोपादत्ते' इति न्यायस्यानित्यत्वम्)<br>यत्पुनरुक्तं रूढशब्दा निमित्तं नोपाददत इति, तन्न, गृहस्थतक्षपरिव्राजकादिशब्ददर्शनात् । गृहस्थितिपरिव्राज्यतक्षणादिनिमित्तोपादाना अपि गृहस्थपरिव्राजकावाश्रमविशेषे विशिष्टजातिमति च तक्षेति रूढा दृश्यन्ते शब्दाः । न यत्र यत्र तानि निमित्तानि तत्र तत्रइसके सिवा वादीने जो कहा कि रूढ शब्द निमित्तको स्वीकार नहीं करता, सो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थ, तक्षा और परिव्राजकादि शब्द देखे जाते हैं । गृहमें रहना, पारिव्राज्य सब कुछ त्याग कर चला जाना और तक्षण काष्ठ छेदन आदि निमित्तोंको स्वीकार करते हुए भी 'गृहस्थ' और 'परिव्राजक' शब्द आश्रमविशेषोंमें और 'तक्षा' शब्द जातिविशेषमें रूढ देखे जाते हैं । ये गृहस्थादि शब्द जहाँ-जहाँ वे निमित्त हैं वहीं-वहीं प्रवृत्त

छा० उ० ८—

२९८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२९८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृतहिन्दी
वर्तन्ते; प्रसिद्धयभावात् । तथेहापि ब्रह्मसंस्थशब्दो निवृत्तसर्वकर्मतत् साधनपरिव्राडेकविषयेऽत्याश्रमिणि परमहंसाख्ये वृत्त इह भवितुमर्हति, मुख्यामृतत्वफलश्रवणात् ।नहीं होते, क्योंकि ऐसी प्रसिद्धि नहीं है। इसी प्रकार यहाँ भी 'ब्रह्मसंस्थ' शब्दकी वृत्ति सम्पूर्ण कर्म और उनके साधनोंसे निवृत्त हुए एकमात्र अत्याश्रमी परमहंस परिव्राजकमें ही होनी उचित है, क्योंकि उन्हींको मुख्य अमृतत्वरूप फलकी प्राप्ति सुनी गयी है।
अतश्चेदमेवैकं वेदोक्तं पारिव्राज्यम्। न यज्ञोपवीतत्रिदण्डकमण्डल्वादिपरिग्रह इति ।अतः एकमात्र यही वेदोक्त पारिव्राज्य है। यज्ञोपवीत, त्रिदण्ड या कमण्डलु आदिका ग्रहण करना मुख्य पारिव्राज्य नहीं है।
“मुण्डोऽपरिग्रहः” (जाबा० उ० ५) “असङ्गः” इति च श्रुतिः, “अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रम्” (श्वे० उ० ६।२१) इत्यादि च श्वेताश्वतरीये । “निःस्तुतिर्निर्नमस्कारः” इत्यादिस्मृतिभ्यश्च । “तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः। तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञोऽव्यक्तलिङ्गः” इत्यादिस्मृतिभ्यश्च ।इस विषयमें “मुण्डित अपरिग्रही” और “असङ्ग” ऐसी श्रुति है; तथा “अत्याश्रमियोंको परम पवित्र [ ज्ञानका उपदेश किया ]” इस श्वेताश्वतरीय श्रुतिसे और “निःस्तुतिर्निर्नमस्कारः” इत्यादि स्मृतियोंसे एवं “अतः पारदर्शी यतिगण कर्म नहीं करते, इसलिये अलिङ्ग धर्मज्ञ और अव्यक्तलिङ्ग [होकर विचरे]” इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही बात सिद्ध होती है।

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२९


| [सांख्यबौद्धाज्ञकर्तृककर्मत्यागस्य मिथ्यात्वम्]<br><br>यत्तु सांख्यैः कर्मत्यागोऽभ्युपगम्यते, क्रियाकारकफलभेदबुद्धेः सत्यत्वाभ्युपगमात्, तन्मृषा । यच्च बौद्धैः शून्यताभ्युपगमादकर्तृत्वमभ्युपगम्यते, तदप्यसत्, तदभ्युपगन्तुः सत्त्वाभ्युपगमात् । यच्चाज्ञैरलसतयाकर्तृत्वभ्युपगमः सोऽप्यसत्कारकबुद्धेरनिवर्तितत्वात्प्रमाणेन । तस्माद्वेदान्तप्रमाणजनितैकत्वप्रत्ययवत एव कर्मनिवृत्तिलक्षणं पारिव्राज्यं ब्रह्मसंस्थत्वं चेति सिद्धम् । एतेन गृहस्थस्यैकत्वविज्ञाने सति पारिव्राज्यमर्थसिद्धम् ।<br><br>नन्वग्न्युत्सादनदोषभाक्स्यात्परिव्रजन्, “वीरहा वा एष देवानां योऽग्निमुद्वासयते” इति श्रुतेः; न, दैवोत्सादित्वादुत्सन्न | क्रिया, कारक और फलरूप भेदबुद्धिका सत्यत्व स्वीकार करनेके कारण सांख्यवादी जो कर्मत्यागको स्वीकार करते हैं, वह ठीक नहीं है । तथा बौद्धोंने जो शून्यताको स्वीकार करनेके कारण अकर्तृत्वको स्वीकार किया है वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उन्हें उसका अकर्तृत्व स्वीकार करनेवालेकी भी सत्ता माननी होगी [और बौद्ध लोग आत्माकी सत्ता स्वीकार नहीं करते] । तथा अज्ञानी लोग जो आलस्यवश अकर्तृत्व स्वीकार कर लेते हैं वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रमाणद्वारा उनकी कारकबुद्धिकी निवृत्ति नहीं होती । अतः वेदान्तप्रमाणजनित एकत्व ज्ञानवान्‌को ही कर्मनिवृत्तिरूप पारिव्राज्य और ब्रह्मनिष्ठत्व हो सकते हैं—यह सिद्ध होता है । इससे गृहस्थको भी एकत्व विज्ञान हो जानेपर पारिव्राज्य अर्थतः सिद्ध हो जाता है ।<br><br>यदि कहो कि परिव्राजक होनेसे तो वह अग्निपरित्यागरूप दोषका भागी होगा; जैसा कि “जो अग्निका त्याग करता है वह देवताओंका पुत्रघ्न होता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि विधाता- |

२३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| एव हि स एकत्वदर्शने जाते "अपागादग्नेरग्नित्वम्" इति श्रुतेः। अतो न दोषभाग्गृहस्थः परिव्रजन्निति ॥ १ ॥ | द्वारा उच्छिन्न कर दिया जानेके कारण वह अग्नि एकत्वदर्शन होनेपर स्वतः ही त्यक्त हो जाता है, जैसा कि "अग्निका अग्नित्व निवृत्त हो गया" ऐसी श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः परिव्राजक होनेसे गृहस्थ दोषका भागी नहीं होता ॥ १ ॥ |


त्रयीविद्या और व्याहृतियोंकी उत्पत्ति

यत्संस्थोऽमृतत्वमेति तन्निरूपणार्थमाह—जिसमें स्थित हुआ पुरुष अमृतत्व प्राप्त कर लेता है उसका निरूपण करनेके लिये श्रुति कहती है—

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या संप्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २ ॥

प्रजापतिने लोकोंके उद्देश्यसे ध्यानरूप तप किया। उन अभितप्त लोकोंसे त्रयी विद्याकी उत्पत्ति हुई तथा उस अभितप्त त्रयी विद्यासे 'भूः, भुवः और स्वः' ये अक्षर उत्पन्न हुए ॥ २ ॥

प्रजापतिर्विराट् कश्यपो वा। लोकानुद्दिश्य तेषु सारजिघृक्षयाभ्यतपदभितापं कृतवान्ध्यानं तपः कृतवानित्यर्थः। तेभ्योऽभितप्तेभ्यः सारभूता त्रयी विद्या संप्रास्रवत्प्रजापतेर्मनसि प्रत्यभा-प्रजापति अर्थात् विराट् या कश्यपजीने लोकोंके उद्देश्यसे—उनमेंसे सार ग्रहण करनेकी इच्छासे अभिताप किया अर्थात् ध्यानरूप तप किया। इस प्रकार अभितप्त हुए उन भूतोंसे उनकी सारभूता त्रयीविद्या प्रादुर्भूत हुई; तात्पर्य यह कि प्रजापतिके मनमें त्रयीविद्याका

खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१

| दित्यर्थः । तामभ्यतपत्, पूर्ववत् । तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति व्याहृतयः ॥ २ ॥ | प्रतिभान हुआ । प्रजापतिने पूर्ववत् उसके उद्देश्यसे भी तप किया । उस अभितप्त त्रयीविद्यासे भूः, भुवः और स्वः—ये व्याहृतिरूप अक्षर उत्पन्न हुए ॥ २ ॥ |

—: ० :—

ओंकारकी उत्पत्ति

तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोङ्कारेण सर्वा वाक्संतृण्णोङ्कार एवेदꣳसर्वमोङ्कार एवेदꣳसर्वम् ॥ ३ ॥

[ फिर प्रजापतिने ] उन अक्षरोंका आलोचन किया । उन आलोचित अक्षरोंसे ओङ्कार उत्पन्न हुआ । जिस प्रकार शङ्कुओं (नसों) द्वारा सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओङ्कारसे सम्पूर्ण वाक् व्याप्त है । ओङ्कार ही यह सब कुछ है—ओङ्कार ही यह सब कुछ है ॥ ३ ॥

| तान्यक्षराण्‍यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्ब्रह्म कीदृशम् ? इत्याह—तद्यथा शङ्कुना पर्णनालेन सर्वाणि पर्णानि पत्रावयवजातानि संतृण्णानि विद्धानि व्याप्तानीत्यर्थः । एवमोङ्कारेण ब्रह्मणा परमात्मनः प्रतीकभूतेन सर्वा वाक्शब्दजातं | [ फिर उसने ] उन अक्षरोंकी आलोचना की । उन आलोचित अक्षरोंसे ओङ्कार उत्पन्न हुआ । वह [ ओङ्काररूप ] ब्रह्म कैसा है इसपर श्रुति कहती है—जिस प्रकार शङ्कु—पत्तेकी नसोंसे सम्पूर्ण पत्ते—पत्तोंके अवयवसमूह अनुविद्ध अर्थात् व्याप्त रहते हैं, इसी प्रकार परमात्माके प्रतीकभूत ओङ्काररूप ब्रह्मद्वारा |

२३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२३२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| संतृण्णा । “अकारो वै सर्वा वाक्” इत्यादिश्रुतेः । | सम्पूर्ण वाक्—शब्दसमूह व्याप्त है, जैसा कि "अकार ही सम्पूर्ण वाक् है"इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। | | परमात्मविकारश्च नामधेयमात्रमित्यत ॐकार एवेदँ सर्वमिति । द्विरभ्यास आदरार्थः । लोकादिनिष्पादनकथनमोङ्कारस्तुत्यर्थमिति ॥३॥ | जितना नामधेयमात्र है सब परमात्माका ही विकार है। अतः यह सब ओङ्कार ही है। द्विरुक्ति आदरके लिये है। तथा लोकादिको प्राप्त कराना आदि जो कहा गया है वह ओंकारकी स्तुतिके लिये है॥३॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥

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चतुर्विंश खण्ड

— : ❀ : —

सामोपासनप्रसङ्गेन कर्मगुणभूतत्वान्निवर्स्योङ्कारं परमात्मप्रतीकत्वादमृतत्वहेतुत्वेन महीकृत्य प्रकृतस्यैव यज्ञस्याङ्गभूतानि सामहोममन्त्रोत्थानान्युपदिदिक्षन्नाह—सामोपासनाके प्रसङ्गसे कर्मका गुणभूत (अङ्ग) हो जानेके कारण अब ओङ्कारको [उपासनाकाण्डसे] निवृत्त कर वह परमात्माका प्रतीक होनेके कारण अमृतत्वका साधन है— इस प्रकार उसे महान् बताकर प्रकरण-प्राप्त यज्ञके ही अङ्गभूत साम, होम, मन्त्र और उत्थानोंका उपदेश करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है—

सवनोंके अधिकारी देवता

ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातःसवनꣳरुद्राणां माध्यन्दिनꣳसवनमादित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम् ॥ १ ॥

ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःसवन वसुओंका है, मध्याह्नसवन् रुद्रोंका है तथा तृतीय सवन आदित्य और विश्वेदेवोंका है ॥ १ ॥

ब्रह्मवादिनो वदन्ति यत्प्रातःसवनं प्रसिद्धं तद्वसूनाम् । तैश्च प्रातःसवनसंबद्धोऽयं लोको वशीकृतः सवनेशानैः । तथा रुद्रै-ब्रह्मवादी लोग कहते हैं कि जो प्रातःसवन प्रसिद्ध है वह वसुओंका है । उन सवनके अधीश्वरोंद्वारा यह प्रातःसवनसम्बन्धी लोक अपने वशीभूत किया हुआ है । तथा मध्याह्नसवनके अधीश्वर रुद्रोंद्वारा

२३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| माध्यन्दिनसवनेशानैरन्तरिक्ष-<br><br>लोकः । आदित्यैश्च विश्वैर्देवैश्च<br><br>तृतीयसवनेशानैस्तृतीयो लोको<br><br>वशीकृतः । इति यजमानस्य<br><br>लोकोऽन्यःपरिशिष्टो न विद्यते । १॥ | अन्तरिक्षलोक और तृतीय सवन-<br><br>के स्वामी आदित्यों एवं विश्वेदेवों-<br><br>द्वारा तृतीय लोक अपने अधीन<br><br>किया हुआ है । इस प्रकार यजमान-<br><br>के लिये इनके अधिकारसे बचा<br><br>हुआ कोई दूसरा लोक नहीं है ॥१॥ |

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साम आदिको जाननेवाला ही यज्ञ कर सकता है

क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात् ॥ २ ॥

तो फिर यजमानका लोक कहाँ है ? जो यजमान उस लोकको नहीं जानता वह किस प्रकार यज्ञानुष्ठान करेगा ? अतः उसे जाननेवाला ही यज्ञ करेगा ॥ २ ॥

| अतः क्व तर्हि यजमानस्य<br><br>लोको यदर्थं यजते । न क्वचि-<br><br>ल्लोकोऽस्तीत्यभिप्रायः।"लोकाय<br><br>वै यजते यो यजते" इति श्रुतेः;<br><br>लोकाभावे च स यो यजमानस्तं<br><br>लोकस्वीकरणोपायं सामहोम-<br><br>मन्त्रोत्थानलक्षणं न विद्यान्न<br><br>विजानीयात्सोऽज्ञः कथं कुर्या-<br><br>द्यज्ञम् । न कथञ्चन तस्य कर्तृत्व-<br><br>मुपपद्यत इत्यर्थः । | अतः यजमानका वह लोक कहाँ<br><br>है जिसके लिये वह यज्ञानुष्ठान<br><br>करता है ? तात्पर्य यह है कि वह<br><br>लोक कहीं नहीं है । किंतु "जो भी<br><br>यज्ञ करता है वह पुण्यलोकके ही<br><br>लिये करता है" ऐसी श्रुति होनेके<br><br>कारण जो यजमान लोकका अभाव<br><br>होनेसे साम, होम, मन्त्र और<br><br>उत्थानरूप लोकस्वीकृतिके उपायको<br><br>नहीं जानता वह अज्ञानी किस प्रकार<br><br>यज्ञानुष्ठान कर सकता है ? तात्पर्य<br><br>यह है कि उसका कर्तृत्व किसी<br><br>प्रकार सम्भव नहीं है । |

खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २३५

| सामादिविज्ञानस्तुतिपरत्वा- <br> न्नाविदुषः कर्तृत्वं कर्ममात्रविदः <br> प्रतिषिध्यते । स्तुतये च सामा- <br> दिविज्ञानस्याविद्वत्कर्तृत्वप्रतिषे- <br> धाय चेति हि भिद्येत वाक्यम् । <br> आद्ये चौषस्त्ये काण्डेऽविदु- <br> षोऽपि कर्मास्तीति हेतुमवो- <br> चाम । अथैतद्वक्ष्यमाणं सामा- <br> द्युपायं विद्वान् कुर्यात् ॥ २ ॥ | [ यह वाक्य ] सामादिविज्ञानकी <br> स्तुति करनेवाला है, अतः इसके <br> द्वारा केवल कर्ममात्रके ज्ञाता अज्ञानी- <br> के कर्तृत्वका प्रतिषेध नहीं किया <br> जाता। '[यह वाक्य] सामादिविज्ञान- <br> की स्तुतिके लिये है और अविद्वान्के <br> कर्म-कर्तृत्वका प्रतिषेध करनेके लिये <br> भी है' यदि ऐसा माना जाय तो <br> वाक्य भेद हो जायगा; क्योंकि प्रथम <br> अध्यायके औषस्त्यकाण्डमें (दशम <br> खण्डमें) कर्म अविद्वान्के भी लिये <br> है—ऐसा हमने [कर्मानुष्ठानमें] हेतु <br> बतलाया है। अतः आगे बतलाये <br> जानेवाले सामादि उपायोंको जानने- <br> वाला होकर ही कर्म करे ॥ २ ॥ |


प्रातःसवनमें वसुदेवतासम्बन्धी सामगान

| किं तद्वेद्यम् ? इत्याह— | वह उसका ज्ञातव्य साम क्या <br> है ? सो श्रुति बतलाती है— |

पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्यो- <br> दङ्मुख उपविश्य स वासवँसामाभिगायति ॥ ३ ॥

प्रातरनुवाकका आरम्भ करनेसे पूर्व वह (यजमान) गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वसुदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ३ ॥

२३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२३६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| पुरा पूर्वं प्रातरनुवाकस्य शस्त्रस्य प्रारम्भाज्जघनेन गार्हपत्यस्य पश्चादुदङ्मुखः संन्नुपविश्य स वासवं वसुदैवत्यं सामाभिगायति ॥ ३ ॥ | प्रातरनुवाकसे पूर्व अर्थात् प्रातःकालमें पढ़े जाने योग्य 'शस्त्र'* नामक स्तोत्रपाठसे पूर्व गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वह यजमान वासव—वसुदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ३ ॥ |


लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३ ३ पश्येम त्वा वयँरा ३ ३ ३ ३ ३ हु ३ म्आ ३ ३ ज्या ३ यो ३ आ ३ २ १ १ १ इति ॥४॥

[ हे अग्ने ! ] तुम इस लोकका द्वार खोल दो; जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर लें ॥ ४ ॥

| लोकद्वारमस्य पृथिवीलोकस्य प्राप्तये द्वारमपावृणु हेऽग्ने तेन द्वारेण पश्येम त्वा त्वां राज्यायेति ॥ ४ ॥ | हे अग्ने ! तुम लोकद्वार—इस पृथिवीलोककी प्राप्तिके लिये, इसका द्वार खोल दो। उस द्वारसे हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन करें ॥४॥ |

— : ० : —

अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥५॥

तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—पृथिवीमें रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम [ पृथिवी ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥


* जिन ऋक्-मन्त्रोंका गान नहीं किया जाता उन्हें 'शस्त्र' कहते हैं और जिन शस्त्रोंका प्रातःकाल पाठ किया जाता है उनका नाम 'प्रातरनुवाक' है।

खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २३७


| अथानन्तरं जुहोत्यनेन मन्त्रेण नमोऽग्नये प्रह्वीभूतास्तुभ्यं वयं पृथिवीक्षिते पृथिवीनिवासाय लोकक्षिते पृथिवीलोकनिवासायेत्यर्थः । लोकं मे मह्यं यजमानाय विन्द लभस्व । एष वै मम यजमानस्य लोक एता गन्तास्मि ॥ ५ ॥ | इसके पश्चात् वह इस मन्त्रद्वारा हवन करता है—अग्निदेवको नमस्कार है। हम पृथ्वीमें रहनेवाले और पृथ्वीलोकनिवासी तुम्हारे प्रति विनम्र होते हैं। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥ |


अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै । वसवः प्रातःसवनँ संप्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥

इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके अनन्तर [पुण्यलोकको प्राप्त होऊँगा] 'स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है, और 'परिघ (अर्गला—अड़ंगे) को नष्ट करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। वसुगण उसे प्रातःसवन प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥


| अत्रास्मिँल्लोके यजमानोऽहमायुषः परस्तादूर्ध्वं मृतः सन्नित्यर्थः, स्वाहेति जुहोति । अपजह्यपनय परिघं लोकद्वारार्गलमित्येतं मन्त्रमुक्त्वोत्तिष्ठति । एवमेतैर्वसुभ्यः प्रातःसवनसंबद्धो लोको निष्क्रीतः स्यात्तत्तस्ते | यहाँ—इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेपर—आयुके पीछे अर्थात् मरनेपर [पुण्यलोक प्राप्त करूँगा] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है। 'तुम परिघ यानी लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—इस मन्त्रको कहकर उत्थान करता है। इस प्रकार इन [साम, मन्त्र, होम और उत्थान] के द्वारा वसुओंसे प्रातःसवनसे सम्बद्ध लोक मोल |

२३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| प्रातःसवनं वसवो यजमानाय सम्प्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥ | ले लिया जाता है । तब वे वसुगण यजमानको प्रातःसवन प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥ |

मध्याह्नसवनमें रुद्रसम्बन्धी सामगान

पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रँसामाभि गायति ॥ ७ ॥

मध्याह्नसवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान दक्षिणाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ७ ॥

| तथाग्नीध्रीयस्य दक्षिणाग्नेर्जघनेनोदङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति यजमानो रुद्रदैवत्यं वैराज्याय ॥ ७ ॥ | तथा आग्नीध्रीय यानी दक्षिणाग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर यजमान वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ७ ॥ |

—: ० :—

लो३कद्वारमपावा३र्णू ३३ पश्येम त्वा वयं वैरा ३ ३ ३ ३ ३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३ २ १ १ १ इति ॥ ८ ॥

[ हे वायो ! ] तुम अन्तरिक्षलोकका द्वार खोल दो, जिससे कि वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये हम तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥ ८ ॥

अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥ ९ ॥

खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९


तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—अन्तरिक्षमें रहनेवाले अन्तरिक्षलोकनिवासी वायुदेवको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम [ अन्तरिक्ष ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ९ ॥

अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनँ सवनँ सम्प्रयच्छन्ति ॥ १० ॥

यहाँ यजमान, 'मैं आयु समाप्त होनेपर [ अन्तरिक्षलोक प्राप्त करूँगा ] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। रुद्रगण उसे मध्याह्नसवन प्रदान करते हैं ॥ १० ॥

अन्तरिक्षित् इत्यादि समानम् ॥ ८-१० ॥'अन्तरिक्षक्षिते' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ [ पाँचवें और छठे मन्त्रके ] समान है ॥ ८-१० ॥

—: ० :—

तृतीय सवनमें आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान

पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यँ स वैश्वदेवँसामाभिगायति ॥ ११ ॥

तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान आहवनीयाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है १ १

तथाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यदैवत्यमादित्यं वैश्वदेवं च सामाभिगायति क्रमेण स्वाराज्याय साम्राज्याय ॥ ११ ॥तथा आहवनीयाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर वह स्वाराज्य और साम्राज्यप्राप्तिके लिये क्रमशः आदित्यदेवतासम्बन्धी तथा विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है ॥११॥

२४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २

२४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

लो३ कद्वारमपावा३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ-
स्वारा ३३३३३ हु३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ
३२१११ इति ॥ १२ ॥ आदित्यमथ वैश्वदेवं लो-
३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ साम्रा ३ ३
३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११
इति ॥ १३ ॥

लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम स्वाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। यह आदित्यसम्बन्धी साम है; अब विश्वेदेवसम्बन्धी साम कहते हैं—लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥ १२-१३ ॥

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अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—स्वर्गमें रहनेवाले द्युलोकनिवासी आदित्योंको और विश्वेदेवोंको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ ॥ १४ ॥

एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥१५॥

यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान 'आयु समाप्त होनेपर [मैं इसे प्राप्त करूँगा] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—ऐसा कहकर उत्थान करता है ॥ १५ ॥

खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१


| दिविक्षिद्भ्य इत्येवमादि समानमन्यत् । विन्दतापहतेति बहुवचनमात्रं विशेषः । याजमानं त्वेतत् । एतास्म्यत्र यजमान इत्यादिलिङ्गात् ॥ १४-१५ ॥ | ‘दिविक्षिद्भ्यः’ इत्यादि शेष सब अर्थ पहलेके ही समान है। ‘विन्दत, अपहत’ इन क्रियाओंमें बहुवचन होना ही पूर्वकी अपेक्षा विशेष है। ये मन्त्र यजमान-सम्बन्धी हैं, क्योंकि ‘मैं यजमान इस लोकको प्राप्त करनेवाला हूँ’ इत्यादि लिङ्गसे यह स्पष्ट होता है ॥ १४-१५ ॥ |

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तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनँ सम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ १६ ॥

उस (यजमान) को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा (यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ १६ ॥

| एष ह वै यजमान एवंविद् यथोक्तस्य सामादेर्विद्वान्यज्ञस्य मात्रां यज्ञयाथात्म्यं वेद यथोक्तम्। य एवं वेद य एवं वेदेति द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ १६ ॥ | एवंवित्—इस प्रकार पूर्वोक्त सामादिको जाननेवाला यह यजमान निश्चय ही यज्ञकी मात्रा—यज्ञके पूर्वोक्त यथार्थ स्वरूपको जानता है। ‘य एवं वेद य एवं वेद’ यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १६ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥

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इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्यविवरणे
द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ २ ॥

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तृतीय अध्याय

तृतीय अध्याय

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प्रथम खण्ड

मधुविद्या

प्रकरण-सम्बन्धः (संस्कृत)हिन्दी-अनुवाद
ॐ असौ वा आदित्य इत्याद्यध्यायारम्भे सम्बन्धः। अतीतानन्तराध्यायान्त उक्तं यज्ञस्य मात्रां वेदेति यज्ञविषयाणि च सामहोममन्त्रोत्थानानि विशिष्टफलप्राप्तये यज्ञाङ्गभूतान्युपदिष्टानि । सर्वयज्ञानां च कार्यनिर्वृत्तिरूपः सविता महत्या श्रिया दीप्यते । स एष सर्वप्राणिकर्मफलभूतः प्रत्यक्षं सर्वैरुपजीव्यते । अतो यज्ञव्यपदेशानन्तरं तत्कार्यभूतसवितृविषयमुपासनं सर्वपुरुषा-'ॐ असौ वा आदित्यः' इत्यादि अध्यायके आरम्भमें पूर्वोत्तर ग्रन्थका सम्बन्ध [ बतलाया जाता है ]। अव्यवहितपूर्व अध्यायके अन्तमें यह बतलाया गया है कि 'वह यज्ञके यथार्थ स्वरूपको जान जाता है। तथा उसी अध्यायमें विशिष्ट फलकी प्राप्तिके लिये यज्ञके अङ्गभूत यज्ञ-सम्बन्धी साम, होम, मन्त्र और उत्थानोंका भी उपदेश किया गया है। [ इनके द्वारा ] सम्पूर्ण यज्ञोंका कार्यनिष्पत्तिरूप [ अर्थात् सम्पूर्ण यज्ञसाधनोंका फलस्वरूप ] सूर्य महती श्रीसे दीप्त हो जाता है। वह यह सूर्यदेव सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंका फलस्वरूप है; अतः समस्त जीव प्रत्यक्ष ही इसके आश्रयसे जीवन धारण करते हैं। अतः अब यज्ञका निरूपण करनेके पश्चात् मैं उसके फलस्वरूप सूर्यकी उपासना-

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३


र्थेभ्यः श्रेष्ठतमफलं विधास्यामी-<br><br>त्येवमारभते श्रुतिः—का, जो सम्पूर्ण पुरुषार्थोंसे श्रेष्ठतम फलवाली है, विधान करूँगी—इस उद्देश्यसे श्रुति आरम्भ करती है—

आदित्यादिमें मधु आदि-दृष्टि

ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवँशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥

ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है। द्युलोक ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमें रहनेवाले ] मक्खियोंके बच्चे हैं ॥ १ ॥

| असौ वा आदित्यो देवम-<br><br>ध्वित्यादि । देवानां मोदना-<br><br>न्मध्विव मध्वसावादित्यः ।<br><br>वस्वादीनां च मोदनहेतुत्वं वक्ष्यति सर्वयज्ञफलरूपत्वादादि-<br><br>त्यस्य । | ‘असौ वा आदित्यो देवमधु’ इत्यादि। देवताओंको प्रसन्न करने-वाला होनेसे वह आदित्य मधुके समान मानो मधु है। वसु आदिको प्रसन्न करनेमें उसकी हेतुताका श्रुति आगे ( ३।६।१ में ) प्रतिपादन करेगी, क्योंकि वह आदित्य सम्पूर्ण यज्ञोंका फलरूप है। | | कथं मधुत्वम् ? इत्याह—तस्य<br><br>मधुनो द्यौरेव भ्रामरस्येव मधु-<br><br>नस्तिरश्चीनश्चासौ वंशश्चेति तिर-<br><br>श्चीनवंशः। तिर्यग्गतेव हि द्यौर्ल-<br><br>क्ष्यते । अन्तरिक्षं च मध्वपूपो | इसका मधुत्व किस प्रकार है ! यह श्रुति बतलाती है—मधुकरके मधुके समान इस मधुका द्युलोक ही तिरछा बाँस है। जो तिरश्चीन (तिरछा) हो और वंश ( बाँस ) हो उसे तिरश्चीनवंश (तिरछा बाँस) कहते हैं; क्योंकि द्युलोक तिरछा ही दिखायी देता है। तथा अन्तरिक्ष मधुका छत्ता है, वह द्युलोकरूप बाँसमें लगकर |

२४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

२४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| द्युवंशे लग्नः सँल्लम्बत इवातो मध्वपूपसामान्यादन्तरिक्षं मध्वपूपो मधुनः सवितुराश्रयत्वाच्च।<br><br>मरीचयो रश्मयो रश्मिस्था आपो भौमाः सवित्राकृष्टाः “एता वा आपः स्वराजो यन्मरीचयः” इति हि विज्ञायन्ते। ता अन्तरिक्षमध्वपूपस्थरश्म्यन्तर्गतत्वाद भ्रमरबीजभूताः पुत्रा इव हिता लक्ष्यन्त इति पुत्रा इव पुत्रा मध्वपूपनाड्यन्तर्गता हि भ्रमरपुत्राः ॥ १ ॥ | मानो लटकता है, अतः मधुके छत्तेके समान होनेके कारण तथा मधुरूप सूर्यका आश्रय होनेसे भी अन्तरिक्ष-लोक ही मधुका छत्ता है।<br><br>मरीचि—किरणें अर्थात् सूर्यद्वारा खींचा हुआ उसकी किरणोंमें स्थित पार्थिव जल—जिसका कि “स्वराट् (स्वयं प्रकाश सूर्य) की जो किरणें हैं वे निश्चय ही जल हैं” इस श्रुतिद्वारा ज्ञान होता है, वह अन्तरिक्षरूप शहदके छत्तेमें स्थित किरणोंके अन्तर्गत होनेके कारण मधुकरोंके बीजभूत पुत्रों (मधुमक्खियोंके बच्चों) के समान उनमें निहित दिखायी देता है। अतः वह सूर्यरश्मिस्थ जल भ्रमरपुत्रोंके समान पुत्ररूप है, क्योंकि छत्तेके छिद्रोंमें ही भ्रमरपुत्र रहा करते हैं ॥ १ ॥ |


आदित्यकी पूर्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः। ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः॥ २ ॥ एतमृग्वेदम्-अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्ना-द्यँरसोऽजायत ॥ ३ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५


उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणें हैं, वे ही इस (अन्तरिक्ष-रूप छत्ते) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र हैं। ऋक् ही मधुकर हैं, ऋग्वेद ही पुष्प हैं, वे सोम आदि अमृत ही जल हैं। उन इन ऋक् [रूप मधुकरों] ने ही इस ऋग्वेदका अभिताप किया। उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥

| तस्य सवितुर्मध्वाश्रयस्य मधुनो ये प्राञ्चः प्राच्यां दिशि-गता रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यः प्रागञ्चनान्मधुनो नाड्यो मधु-नाड्य इव मध्वाधारच्छिद्रा-णीत्यर्थः । <br><br> तत्र ऋच एव मधुकृतो लोहितरूपं सवित्राश्रयं मधु कुर्वन्तीति मधुकृतो भ्रमरा इव । यतो रसानादाय मधु कुर्वन्ति तत्पुष्पमिव पुष्पमृ-ग्वेद एव । <br><br> तत्र ऋग्ब्राह्मणसमुदायस्यर्त्वे-दाख्यत्वाच्छब्दमात्राच्च भोग्य-रूपरसनिस्त्रावासंभवादृग्वेदशब्दे-नात्र ऋग्वेदविहितं कर्म । ततो हि कर्मफलभूतमधुरसनिस्त्राव-संभवात् । मधुकरैरिव पुष्प- | मधुके आश्रयभूत उस सूर्यरूप मधुकी जो पूर्वदिशागत किरणें हैं वे ही पूर्वकी ओर जानेके कारण इसकी पूर्व मधुनाडियाँ हैं। मधुकी नाडियोंके समान मधुनाडियाँ हैं अर्थात् वे मधुके आधारभूत छिद्र हैं। <br><br> तहाँ ऋचाएँ ही मधुकर हैं, वे सूर्यमें रहनेवाला लोहितरूप मधु उत्पन्न करती हैं, अतः भ्रमरोंके समान वे ही मधुकर हैं। जिससे रसोंको ग्रहण करके वे मधु करती हैं वह ऋग्वेद ही पुष्पके समान पुष्प है। <br><br> किंतु यहाँ ऋग्ब्राह्मणसमुदायका ही नाम ऋग्वेद है और केवल शब्द-से ही भोग्यरूप रसका निकलना असम्भव है; अतः 'ऋग्वेद' शब्दसे यहाँ ऋग्वेदविहित कर्म अभिप्रेत है, क्योंकि उसीसे कर्मफलभूत मधुरूप रसका निकलना सम्भव है। मधुकरोंके समान उस पुष्प |