भारतकोश
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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

( १५ )

त्रयोदश खण्ड
१३८. आहवनीयाग्निविद्या .... ४१४

चतुर्दश खण्ड
१३९. आचार्यका आगमन .... ४१६
१४०. आचार्य और उपकोसलका संवाद .... ४१७

पञ्चदश खण्ड
१४१. आचार्यका उपदेश—नेत्रस्थित पुरुषकी उपासना .... ४२०
१४२. ब्रह्मवेत्ताकी गति .... ४२३

षोडश खण्ड
१४३. यज्ञोपासना .... ४२८
१४४. ब्रह्माके मौनभङ्गसे यज्ञकी हानि .... ४३०
१४५. ब्रह्माके मौनपालनसे यज्ञकी प्रतिष्ठा .... ४३२

सप्तदश खण्ड
१४६. यज्ञ दोषके प्रायश्चित्तरूपसे व्याहृतियोंकी उपासना .... ४३४
१४७. विद्वान् ब्रह्माकी विशिष्टता .... ४३८

पञ्चम अध्याय

प्रथम खण्ड
१४८. ज्येष्ठश्रेष्ठादिगुणोपासना .... ४४३
१४९. इन्द्रियोंका विवाद .... ४४६
१५०. प्रजापतिका निर्णय .... ४४७
१५१. वागिन्द्रियकी परीक्षा .... ४४८
१५२. चक्षुकी परीक्षा .... ४४९
१५३. श्रोत्रकी परीक्षा .... ४४९
१५४. मनकी परीक्षा .... ४५०
१५५. प्राणकी परीक्षा और विजय .... ४५१
१५६. इन्द्रियोंद्वारा प्राणकी स्तुति .... ४५२

द्वितीय खण्ड
१५७. प्राणका अन्ननिर्देश .... ४५८
१५८. प्राणका वस्त्रनिर्देश .... ४६०
१५९. प्राणविद्याकी स्तुति .... ४६३
१६०. मन्थकर्म .... ४६४

( १६ )

तृतीय खण्ड

१६१. पाञ्चालोंकी सभामें श्वेतकेतु .... ... ४७२ १६२. प्रवाहणके प्रश्न .... .... ४७३ १६३. प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आना .... ४७५ १६४. पिता-पुत्रका प्रवाहणके पास आना .... .... ४७७ १६५. प्रवाहणका वरप्रदान ... .... ४७९

चतुर्थ खण्ड

१६६ पञ्चम प्रश्नका उत्तर .... .... ४८१ १६७. लोकरूपा अग्निविद्या .... .... ४८३

पञ्चम खण्ड

१६८. पर्जन्यरूपा अग्निविद्या .... • .... ४८७

षष्ठ खण्ड

१६९. पृथिवीरूपा अग्निविद्या .... ... ४८९

सप्तम खण्ड

१७०. पुरुषरूपा अग्निविद्या ... ... ४९१

अष्टम खण्ड

१७१. स्त्रीरूपा अग्निविद्या ... .... ४९३

नवम् खण्ड

१७२. पञ्चम आहुतिमें पुरुषत्वको प्राप्त हुए आपकी गति ... ४९६

दशम खण्ड

१७३. प्रथम प्रश्नका उत्तर ... .... ५०० १७४. तृतीय प्रश्नका उत्तर ... .... ५०९ ( देवयान और धूमयानका व्यावर्तनस्थान ) १७५. द्वितीय प्रश्नका उत्तर .... .... ५१४ ( पुनरावर्तनका क्रम ) १७६. अनुशयी जीवोंकी कर्मानुरूप गति .... .... ५२९ १७७. चतुर्थ प्रश्नका उत्तर ... .... ५३१ ( अशास्त्रीय प्रवृत्तिवालोंकी गति ) १७८. पाँच पतित .... .... ५३४ १७९. पञ्चाग्निविद्याका महत्त्व .... ... ५३५

( १७ )

एकादश खण्ड

१८०. औपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक प्रस्ताव .... ५३६
१८१. औपमन्यवादिका उद्दालकके पास आना ... .... ५३८
१८२. उद्दालकका औपमन्यवादिके सहित अश्वपतिके पास आना ... .... ५३९
१८३. अश्वपतिद्वारा मुनियोंका स्वागत ... .... ५४०
१८४. अश्वपतिके प्रति मुनियोंकी प्रार्थना ... .... ५४२
१८५. राजाके प्रति मुनियोंकी उपसत्ति .... .... ५४३

द्वादश खण्ड

१८६. अश्वपति और औपमन्यवका संवाद ... ... ५४५

त्रयोदश खण्ड

१८७. अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद ... .... ५४९

चतुर्दश खण्ड

१८८. अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद ... .... ५५१

पञ्चदश खण्ड

१८९. अश्वपति और जनका संवाद .... ... ५५३

षोडश खण्ड

१९०. अश्वपति और बुडिलका संवाद ... — ५५५

सप्तदश खण्ड

१९१. अश्वपति और उद्दालकका संवाद ... ... ५५७

अष्टादश खण्ड

१९२. अश्वपतिका उपदेश—वैश्वानरकी समस्तोपासनाका फल .... ५५९
१९३. वैश्वानरका साङ्गोपाङ्ग स्वरूप ... ... ५६१

एकोनविंश खण्ड

१९४. भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये ‘प्राणाय स्वाहा’ इस पहली आहुतिका वर्णन .... ... ५६३

विंश खण्ड

१९५. ‘व्यानाय स्वाहा’ इस दूसरी आहुतिका वर्णन ... .... ५६५

एकविंश खण्ड

१९६. ‘अपानाय स्वाहा’ इस तीसरी आहुतिका वर्णन .... ... ५६६

( १८ )

द्वाविंश खण्ड

१९७. 'समानाय स्वाहा' इस चौथी आहुतिका वर्णन ... ५६७

त्रयोविंश खण्ड

१९८. 'उदानाय स्वाहा' इस पाँचवीं आहुतिका वर्णन ... ... ५६८

चतुर्विंश खण्ड

१९९. अविद्वान्‌के हवनका स्वरूप ... ... ५६९
२००. विद्वान्‌के हवनका फल .... .... ५६९

षष्ठ अध्याय

प्रथम खण्ड

२०१. आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुके प्रति उपदेश ... .... ५७३

द्वितीय खण्ड

२०२. अन्य पक्षके खण्डनपूर्वक जगत्‌की सद्‌रूपताका समर्थन ... ५८२

तृतीय खण्ड

२०३. सृष्टिका क्रम .... .... ... ६०४

चतुर्थ खण्ड

२०४. एकके ज्ञानसे सबका ज्ञान ... ... ६१३.

पञ्चम खण्ड

२०५. अन्न आदिके त्रिविध परिणाम ... .... ६२३

षष्ठ खण्ड

२०६. अन्न आदिका सूक्ष्म भाग ही मन आदि होता है ... .. ६२९

सप्तम खण्ड

२०८. षोडशकलाविशिष्ट पुरुषका उपदेश ... .... ६३२

अष्टम खण्ड

२०७. सुषुप्तिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश ... .... ६४०

नवम खण्ड

२०९. सुषुप्तिमें 'सत्' की प्राप्तिका ज्ञान न होनेमें मधुमक्खियोंका दृष्टान्त ... .... .... ६६३

दशम खण्ड

२१०. नदीके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... ... ६६८

एकादश खण्ड

२११. वृक्षके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... .... ६७१

द्वादश खण्ड

२१२. न्यग्रोधफलके दृष्टान्तद्वारा उपदेश ... ... ६७६

( १९ )

त्रयोदश खण्ड
२१३. लवणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश ... .... ६८०
चतुर्दश खण्ड
२१४. अन्यत्रसे लाये हुए पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश ... ... ६८५
पञ्चदश खण्ड
२१५. मुमूर्षु पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... ... ६९४
षोडश खण्ड
२१६. चोरके तप्त परशुग्रहणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश .... ... ६९८

सप्तम अध्याय

प्रथम खण्ड
२१७. नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश ... ... ७१०
द्वितीय खण्ड
२१८. नामकी अपेक्षा वाक्‌की महत्ता ... ... ७२१
तृतीय खण्ड
२१९. वाक्‌की अपेक्षा मनकी श्रेष्ठता ... .... ७२४
चतुर्थ खण्ड
२२०. मनसे संकल्पकी श्रेष्ठता ... ... ७२७
पञ्चम खण्ड
२२१. संकल्पकी अपेक्षा चित्तकी प्रधानता .... ... ७३४
षष्ठ खण्ड
२२२. चित्तकी अपेक्षा ध्यानका महत्त्व ... .... ७३८
सप्तम खण्ड
२२३. ध्यानसे विज्ञानकी महत्ता .... .... ७४२
अष्टम खण्ड
२२४. विज्ञानसे बलकी श्रेष्ठता ... ... ७४५
नवम खण्ड
२२५. बलकी अपेक्षा अन्नकी प्रधानता .... .... ७४९
दशम खण्ड
२२६. अन्नकी अपेक्षा जलका महत्त्व .... .... ७५२
एकादश खण्ड
२२७. जलकी अपेक्षा तेजकी प्रधानता ... .... ७५५
द्वादश खण्ड
२२८. तेजसे आकाशकी प्रधानता .... .... ७५८

( २० )

त्रयोदश खण्ड
२२९. आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्त्व .... ... ७६१
चतुर्दश खण्ड
२३०. स्मरणसे आशाकी महत्ता .... ... ७६४
पञ्चदश खण्ड
२३१. आशासे प्राणका प्राधान्य .... ... ७६७
षोडश खण्ड
२३२. सत्य ही जानने योग्य है .... ... ७७४
सप्तदश खण्ड
२३३. विज्ञान ही जानने योग्य है ... ... ७७६
अष्टादश खण्ड
२३४. मति ही जानने योग्य है .... .... ७७९
एकोनविंश खण्ड
२३५. श्रद्धा ही जानने योग्य है .... ..- ७८०
विंश खण्ड
२३६. निष्ठा ही जानने योग्य है .... .... ७८१
एकविंश खण्ड
२३७. कृति ही जानने योग्य है ... .... ७८२
द्वाविंश खण्ड
२३८. सुख ही जानने योग्य है .... ... ७८३
त्रयोविंश खण्ड
२३९. भूमा ही जानने योग्य है ... .... ७८५
चतुर्विंश खण्ड
२४०. भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन ... .... ७८६
पञ्चविंश खण्ड
२४१. सर्वत्र भूमा ही है .... ... ७९३
षड्विंश खण्ड
२४२. इस प्रकार जाननेवालेके लिये फलका उपदेश .... ... ७९८

अष्टम अध्याय

प्रथम खण्ड
२४३. दहर-पुण्डरीकमें ब्रह्मकी उपासना ... .... ८०३
२४४. पुण्यकर्मफलोंका अनित्यत्व .... .... ८१९

( २१ )

द्वितीय खण्ड २४५. दहर-ब्रह्मकी उपासनाका फल ... ... ८२१

तृतीय खण्ड २४६. असत्यसे आवृत्त सत्यकी उपासना और नामाक्षरोपासना .... ८२६

चतुर्थ खण्ड २४७. सेतुरूप आत्माकी उपासना .... ... ८३६

पञ्चम खण्ड २४८. यज्ञादिमें ब्रह्मचर्यादिदृष्टि .... .... ८४२

षष्ठ खण्ड २४९. हृदयनाडी और सूर्यरश्मिरूप मार्गकी उपासना ... .... ८५४

सप्तम खण्ड २५०. आत्मतत्त्वका अनुसंधान करनेके लिये इन्द्र और विरोचनका प्रजापतिके पास जाना ... .... ८६५

अष्टम खण्ड २५१. इन्द्र तथा विरोचनका जलके शिकोरेमें अपना प्रतिबिम्ब देखना .... ८७६

नवम खण्ड २५२. इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना ... ... ८८७

दशम खण्ड २५३. इन्द्रके प्रति स्वप्नपुरुषका उपदेश ... .... ८९४

एकादश खण्ड २५४. सुषुप्त पुरुषका उपदेश ... .... ९०१

द्वादश खण्ड २५५. मर्त्यशरीर आदिका उपदेश .... ... ९०६

त्रयोदश खण्ड २५६. ‘श्यामाच्छबलम्’ इस मन्त्रका उपदेश ... .... ९३७

चतुर्दश खण्ड २५७. कारणरूपसे आकाशसंज्ञक ब्रह्मका उपदेश ... ... ९३९

पञ्चदश खण्ड २५८. आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और फलका वर्णन ... ... ९४३

केशाः कञ्जालिकासाभाः
शमब्जाम्बुनगौकसः ।
विविगोपतयो दद्युः
करकारिपिनाकिनः ॥

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भाष्यकार भगवान् शङ्कर

तत्सद्ब्रह्मणे नमः

छान्दोग्योपनिषद्

मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित

सच्चिदानन्दसान्द्राय सर्वातीताय साक्षिणे ।
नमः श्रीदेशिकेन्द्राय शिवायाशिवघातिने ॥

शान्तिपाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

मेरे [हाथ-पाँव आदि] अङ्ग सब प्रकारसे पुष्ट हों, वाणी, प्राण, नेत्र और श्रोत्र पुष्ट हों तथा सम्पूर्ण इन्द्रियाँ बल प्राप्त करें । उपनिषदमें प्रतिपादित ब्रह्म ही सब कुछ है । मैं ब्रह्मका निराकरण (त्याग) न करूँ और ब्रह्म मेरा निराकरण न करे। इस प्रकार हमारा अनिराकरण (निरन्तर मिलन) हो, अनिराकरण हो । उपनिषदोंमें जो शम आदि धर्म कहे गये हैं वे ब्रह्मरूप आत्मामें निरन्तर रमण करनेवाले मुझमें सदा बने रहें, वे मुझमें सदा बने रहें । आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापकी शान्ति हो ।

प्रथम अध्याय

प्रथम अध्याय


प्रथम खण्ड

सम्बन्ध-भाष्य

संस्कृतहिन्दी
ओमित्येतदक्षरमित्याद्यष्टाध्यायी छान्दोग्योपनिषत् । तस्याः संक्षेपतोऽर्थजिज्ञासुभ्य ऋजुविवरणमल्पग्रन्थमिदमारभ्यते ।<br><br>तत्र सम्बन्धः—समस्तं कर्माधिगतं प्राणादिदेवताविज्ञानसहितमर्चिरादिमार्गेण ब्रह्मप्रतिपत्तिकारणम् । (प्रयोजनम्) केवलं च धूमादिमार्गेण चन्द्रलोकप्रतिपत्तिकारणम् । स्वभावप्रवृत्तानां च मार्गद्वयपरिभ्रष्टानां कष्टाधोगतिरुक्ता ।'ओमित्येतदक्षरम्' इत्यादि मन्त्रसे आरम्भ होनेवाला यह आठ अध्यायोंका ग्रन्थ छान्दोग्य उपनिषद् है। उसका अर्थ जाननेकी इच्छावालोंके लिये इस छोटे-से ग्रन्थके रूपमें उसकी सरल व्याख्या संक्षेपसे आरम्भ की जाती है।<br><br>वहाँ [कर्मकाण्डके साथ] इसका सम्बन्ध इस प्रकार है—[विहित और निषिद्ध रूपसे] जाने हुए समस्त कर्मका प्राणादि देवताओंके विज्ञानपूर्वक अनुष्ठान करनेपर वह अर्चि आदि (देवयान) मार्गके द्वारा ब्रह्मलोककी प्राप्तिका कारण होता है तथा केवल (उपासनारहित) कर्म धूमादि मार्गसे चन्द्रलोककी प्राप्तिका हेतु होता है। जो इन दोनों मार्गोंसे पतित एवं स्वभावानुसार प्रवृत्त होनेवाले होते हैं उनकी कष्टमयी अधोगति बतलायी गयी है।

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ २७


शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
न चोभयोर्मार्गयोरन्यतर-<br>स्मिन्नपि मार्ग आत्यन्तिकी<br>पुरुषार्थसिद्धिरित्यतः कर्मनिर-<br>पेक्षमद्वैतात्मविज्ञानं संसार-<br>गतित्रयहेतूपमर्देन वक्तव्यमित्यु-<br>पनिषदारभ्यते ।इन दोनों मार्गोंमेंसे किसी भी एक मार्गपर रहनेसे आत्यन्तिक पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। अतः संसार-की [उपर्युक्त] त्रिविध गतियोंके हेतु-भूत कर्मका निराकरण करते हुए कर्मकी अपेक्षासे रहित अद्वैत-आत्म-ज्ञानका प्रतिपादन करना है; इसी उद्देश्यसे इस उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है।
न चाद्वैतात्मविज्ञानादन्यत्रा-<br>ज्ञानस्यैव त्यान्तिकी निःश्रेय-<br>मोक्षसाधनत्वम् सम्प्राप्तिः । वक्ष्यति<br>हि—"अथ येऽन्यथातो विदुरन्य-<br>राजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति ।"<br>(छा० उ० ७ । २५ । २)<br>विपर्यये च "स स्वराड्भवति"<br>(छा० उ० ७।२५।२) इति ।अद्वैतात्मविज्ञानके बिना और किसी प्रकार आत्यन्तिक कल्याणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जैसा कि आगे कहेंगे भी—"जो लोग इस (अद्वैतात्मज्ञान) से विपरीत जानते हैं, वे अन्यराज (अनात्माके अधीन) होते और क्षीण होनेवाले लोकोंमें जाते हैं।" किंतु इससे विपरीत आत्म-ज्ञान होनेपर [श्रुति कहती है कि] "वह स्वराट् होता है।"
तथा द्वैतविषयानृताभिसंधस्य<br>बन्धनं तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे<br>बन्धदाहभावः संसारदुःखप्राप्ति-<br>श्चेत्युक्त्वाद्वैतात्मसत्याभिसंध-इस प्रकार तपे हुए परशुको ग्रहण करनेसे चोरके जलने और बन्धनमें पड़नेके समान द्वैतविषय-रूप मिथ्यामें अभिनिवेश रखनेवाले पुरुषका बन्धन होता है तथा उसे सांसारिक दुःखोंकी प्राप्ति होती है—यह बतलाकर श्रुति

२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

२८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १

स्यात्तस्करस्येव तप्तपरशुग्रहणे बन्धदाहाभावः संसारदुःखनि- वृत्तिर्मोक्षश्चेति ।अद्वैत आत्मारूप परम सत्यमें प्रतीति रखनेवाले पुरुषको, जो पुरुष चोर नहीं है उसके तप्त परशु ग्रहण करनेपर दाह और बन्धन न होनेके समान, संसार-दुःखकी निवृत्ति और मोक्षकी प्राप्ति बतलावेगी ।
कर्मसमुच्चय-निराकरणम् <br> अत एव न कर्मसहभावि- अद्वैतात्मदर्शनम् । क्रियाकारकफलभे- दोपमर्देन "सन्...एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) इत्येवमादिवाक्य- जनितस्य बाधकप्रत्ययानुप- पत्तेः । कर्मविधिप्रत्यय इति चेत् ? न, कर्तृभोक्तृस्वभाव- विज्ञानवतस्तज्जनितकर्मफलरा- गद्वेषादिदोषवतश्च कर्मविधा- नात् ।इसीसे [अर्थात् कर्म और ज्ञान दोनों विरुद्ध फलवाले हैं-ऐसा निश्चय होनेके कारण ही] अद्वैतात्म-दर्शन कर्मके साथ होनेवाला नहीं है । क्योंकि क्रिया, कारक और फलरूप भेदका बाध करके "सत् [ब्रह्म] एक और अद्वितीय है" "यह सब आत्मा ही है" इत्यादि प्रकारके वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले अद्वैत आत्मज्ञानका कोई बाधक प्रत्यय होना सम्भव नहीं है । यदि कहो कि कर्मविधिविषयक ज्ञान ही [उसका बाधक] है तो ऐसा होना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि जो अपनेको स्वभावसे ही कर्त्ता-भोक्त्तारूप जानता है और उससे होनेवाले कर्मफलमें रागद्वेषरूप दोषोंसे युक्त है, उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है ।
अधिगतसकलवेदार्थस्य कर्म- विधानादद्वैतज्ञानवतोऽपि कर्मे- ति चेत् ?शङ्का—जो सम्पूर्ण वेदार्थको जानने-वाला है उसीके लिये कर्मका विधान किया गया है; इसलिये अद्वैतात्मज्ञानी-को भी तो कर्म करना ही चाहिये ?

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
न; कर्माधिकृतविषयस्य कर्तृभोक्त्रादिज्ञानस्य स्वाभाविकस्य “सत्...एकमेवाद्वितीयम्” 'आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यनेनोपमर्दितत्वात् । तस्मादविद्यादिदोषवत एव कर्माणि विधीयन्ते नाद्वैतज्ञानवतः । अत एव हि वक्ष्यति—“सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति” (छा० उ० २।२३।१) इति ।<br><br>(प्रकरणप्रतिपाद्यनिरूपणम्)<br>तत्रैतस्मिन्नद्वैतविद्याप्रकरणेऽभ्युदयसाधनान्युपासनान्युच्यन्ते । कैवल्यसंनिकृष्टफलानि चाद्वैतादीषद्विकृतब्रह्मविषयाणि मनोमयःप्राणशरीर इत्यादीनि, कर्मसमृद्धिफलानि च कर्माङ्गसम्बन्धीनि । रहस्यसामान्यान्मनोवृत्तिसामान्याच्च; यथाऽद्वैतज्ञानं**समाधान—**नहीं, क्योंकि कर्मके अधिकारीसे सम्बन्ध रखनेवाला कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि रूप स्वाभाविक विज्ञान “सत [ ब्रह्म ] एक और अद्वितीय है” “यह सब आत्मा ही है” इत्यादि वाक्योंसे बाधित हो जाता है । इसलिये कर्मोंका विधान अविद्यादि दोषवान् पुरुषके लिये ही किया गया है, अद्वैतात्मज्ञानीके लिये नहीं किया गया । इसीलिये श्रुति आगे कहेगी—“ये सब [कर्मकाण्डी] पुण्यलोकोंको प्राप्त होते हैं तथा ब्रह्मनिष्ठ [परमहंस] अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त होता है ।”<br><br>वहाँ इस अद्वैतविद्याविषयक प्रकरणमें अभ्युदयकी साधनभूता उपासनाएँ बतलायी जाती हैं, जिनका फल कैवल्यमोक्षका समीपवर्ती है और जो अद्वैतब्रह्मकी अपेक्षा 'मनोमयः प्राणशरीरः' इत्यादि वाक्योंके अनुसार कुछ विकारको प्राप्त हुए ब्रह्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं । वे उपासनाएँ कर्माङ्गसे सम्बद्ध हैं और कर्मफलकी समृद्धि ही उनका फल है । क्योंकि रहस्यमें [ अर्थात् उपनिषद् शब्दसे ज्ञातव्य होनेमें ] तथा मनोवृत्तिरूप होनेमें उन (आत्मज्ञान और उपासनाओं) में समानता है [इसीसे वे उपासनाएँ आत्मविद्याके प्रकरणमें रक्खी गयी हैं] । जिस

३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| मनोवृत्तिमात्रं तथान्यान्यप्युपासनानि मनोवृत्तिरूपाणीत्यस्ति हि सामान्यम्। कस्तर्ह्यद्वैतज्ञानस्योपासनानां च विशेषः? उच्यते— | प्रकार अद्वैतज्ञान मनोवृत्तिमात्र है उसी प्रकार अन्य उपासनाएँ भी मनोवृत्तिरूप ही हैं--यही उन दोनोंकी समानता है। तो फिर अद्वैतज्ञान और उपासनाओंमें अन्तर क्या है? सो बतलाया जाता है— | | ज्ञानोपासनयोर्विशेषः<br>स्वाभाविकस्यात्मन्यक्रियेऽध्यारोपितस्य कर्त्रादिकारकक्रियाफलभेदविज्ञानस्य निवर्तकमद्वैतविज्ञानम्, रज्ज्वादाविव सर्पाद्यध्यारोपलक्षणज्ञानस्य रज्ज्वादिस्वरूपनिश्चयः प्रकाशनिमित्तः। उपासनं तु यथाशास्त्रसमर्थितं किञ्चिदालम्बनमुपादाय तस्मिन् समानचित्तवृत्तिसंतानकरणं तद्विलक्षणप्रत्ययानन्तरितमिति विशेषः। | अद्वैतात्मज्ञान अक्रिय आत्मामें स्वभावसे ही आरोपित कर्ता आदि कारक, क्रिया और फलके भेदज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला है, जिस प्रकार कि प्रकाशके कारण होनेवाला रज्जु आदिके स्वरूपका निश्चय रज्जु आदिमें आरोपित सर्पादिके ज्ञानको निवृत्त कर देता है। किंतु उपासना तो किसी शास्त्रोक्त आलम्बनको ग्रहण कर उसमें विजातीय प्रतीतिसे अव्यवहित सदृश चित्तवृत्तिका प्रवाह करना है—यही इन दोनोंमें अन्तर है। | | तान्येतान्युपासनानि सत्त्वशुद्धिकरत्वेन वस्तुतत्त्वावभासकत्वादद्वैतज्ञानोपकारकाण्यालम्बनविषयत्वात्सुसाध्यानि चेति पूर्वमुपन्यस्यन्ते। तत्र कर्माङ्गा- | वे ये उपासनाएँ चित्तशुद्धि करनेवाली होनेसे वस्तुतत्त्वकी प्रकाशिका होनेके कारण अद्वैतज्ञानमें उपकारिणी हैं तथा आलम्बनयुक्त होनेके कारण सुगमतासे सम्पन्न की जा सकती हैं—इसीलिये इनका पहले निरूपण किया जाता है। वहाँ [ साधारण पुरुषोंमें ] |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१


सस्य दृढीभूतत्वात्कर्मपरित्यागेनोपासन एव दुःखं चेतःसमर्पणं कर्तुमिति कर्माङ्गविषयमेव तावदादावुपासनमुपन्यस्यते—कर्माभ्यासकी दृढ़ता होनेके कारण कर्मका परित्याग करके उपासनामें ही चित्तको लगाना अत्यन्त कठिन है। इसीसे सबसे पहले कर्माङ्ग-सम्बन्धिनी उपासनाका ही उल्लेख किया जाता है—

उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥

ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिये । 'ॐ' ऐसा [उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता] उद्गान ( उच्चस्वरसे सामगान ) करता है । उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमित्येतदक्षरं परमात्मनोऽभिधानं नेदिष्ठम् । तस्मिन्हि प्रयुज्यमाने स प्रसीदति प्रियनामग्रहण इव लोकः । तदिहेतिपरं प्रयुक्तमभिधायकत्वाद्व्यावर्तितं शब्दस्वरूपमात्रं प्रतीयते । तथा चार्चादिवत्परस्यात्मनःउद्गीथशब्दवाच्य 'ॐ' इस अक्षरकी उपासना करे—'ॐ' यह अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती ( प्रियतम ) नाम है । उसका प्रयोग (उच्चारण) किया जानेपर वह प्रसन्न होता है, जिस प्रकार कि साधारण लोग अपना प्रिय नाम उच्चारण करनेपर प्रसन्न होते हैं । वह ओंकार यहाँ ( इस मन्त्रमें ) इतिपरक ( जिसके आगे 'इति' शब्द है; ऐसा ) प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् परमात्माका अभिधायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा व्यावर्तित ( पृथक् निर्दिष्ट ) होकर वह केवल शब्दस्वरूपसे प्रतीत होता है और इस प्रकार वह मूर्ति

३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| प्रतीकं सम्पद्यते। एवं नामत्वेन प्रतीकत्वेन च परमात्मोपासनसाधनं श्रेष्ठमिति सर्ववेदान्तेष्ववगतम्। जपकर्मस्वाध्यायाद्यन्तेषु च बहुशः प्रयोगात्प्रसिद्धमस्य श्रैष्ठ्यम्। <br><br> अतस्तदेतदक्षरं वर्णात्मकमुद्गीथभक्त्यवयवत्वादुद्गीथशब्दवाच्यमुपासीत। कर्माङ्गावयवभूत ॐकारे परमात्मप्रतीके दृढामैकाग्र्यलक्षणां मतिं संतनुयात्। स्वयमेव श्रुतिरोङ्कारस्योद्गीथशब्दवाच्यत्वे हेतुमाह—ओमिति ह्युद्गायति। ओमित्यारभ्य हि यस्मादुद्गायत्यत उद्गीथ ओङ्कार इत्यर्थः। | आदिके समान परमात्माका प्रतीक ही सिद्ध होता है। इस तरह नाम और प्रतीकरूपसे वह परमात्माकी उपासनाका उत्तम साधन है—ऐसा सम्पूर्ण वेदान्त-ग्रन्थोंमें विदित है। जप, कर्म और स्वाध्यायके आदि एवं अन्तमें इसका बहुधा प्रयोग होनेके कारण ❁ इसकी श्रेष्ठता प्रसिद्ध है। <br><br> अतः वह यह वर्णरूप अक्षर उद्गीथभक्तिका अवयव होनेके कारण 'उद्गीथ' शब्दवाच्य है, इसकी उपासना करे। अर्थात् [ उद्गीथ- ] कर्मके अङ्गभूत और परमात्माके प्रतीकस्वरूप ओंकारमें सुदृढ़ एकाग्रतारूप बुद्धिको अविच्छिन्न भावसे संयुक्त करे। ओंकारके 'उद्गीथ' शब्दवाच्य होनेमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है—'ॐ' ऐसा कहकर उद्गान करता है—क्योंकि उद्गाता 'ॐ' इस अक्षरसे आरम्भ करके उद्गान करता है, इसलिये ओंकार उद्गीथ है। |

❁ जैसा कि भगवान्‌ने भी कहा है—
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ ( गीता १७ । २४ )
'इसलिये वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।'

† सामवेदीय स्तोत्रविशेषका नाम 'उद्गीथभक्ति' है। ओंकार उसका अंश है। इसलिये इसे उद्गीथ कहा गया है।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


| तस्योपव्याख्यानम्—तस्याक्षरस्योपव्याख्यानमेवमुपासनमेवंविभूतयेवंफलमित्यादिकथनमुपव्याख्यानम्, प्रवर्तत इति वाक्यशेषः ॥ १ ॥ | [ यहाँ ] उसका उपव्याख्यान आरम्भ किया जाता है—उस अक्षरकी सम्यग् व्याख्या की जाती है । 'इस प्रकार उसकी उपासना होती है, यह उसकी विभूति है और यह फल है,' इत्यादि प्रकारका जो कथन है, उसे उपव्याख्यान कहते हैं । यहाँ 'प्रवर्तते' ( आरम्भ किया जाता है ) यह क्रियापद वाक्यशेष है ॥ १ ॥ |


उद्गीथका रसतमत्व

एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसः ।
अपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो
वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २॥

इन [ चराचर ] प्राणियोंका पृथिवी रस ( उत्पत्ति, स्थिति और लयका स्थान ) है । पृथिवीका रस जल है, जलका रस ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुरुष है, पुरुषका रस वाक् है, वाक्‌का रस ऋक् है, ऋक्‌का रस साम है और सामका रस उद्गीथ है ॥ २ ॥


| एषां चराचराणां भूतानां पृथिवी रसो गतिः परायणमवष्टम्भः । पृथिव्या आपो रसोऽप्सु हि ओता च प्रोता च पृथिवी, अतस्ता रसः पृथिव्याः । अपामोषधयो रसः, अप्परिणामत्वादोषधीनाम् । तासां पुरुषो रसः, अन्नपरिणामत्वात्पुरुषस्य । | इन चराचर भूतोंका पृथिवी रस–गति–परायण अर्थात् आश्रय है । पृथिवीका रस आप् (जल) है, क्योंकि पृथिवी जलमें ही ओतप्रोत है; इसलिये वह पृथिवीका रस है । जलका रस ओषधियाँ हैं, क्योंकि ओषधियाँ जलका ही परिणाम हैं । उन ( ओषधियों ) का रस पुरुष है, क्योंकि पुरुष ( नरदेह ) अन्नका ही परिणाम है । |

३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| तस्यापि पुरुषस्य वाग्रसः, पुरुषावयवाना हि वाक्सारिष्ठा, अतो वाक् पुरुषस्य रस उच्यते। <br><br> तस्या अपि वाच ऋग्रसः सारतरा। ऋचः साम रसः सारतरम्। तस्यापि साम्न उद्गीथः प्रकृतत्वादोंकारः सारतरः ॥२॥ <br><br> एवम्— | उस पुरुषका भी रस वाक् है। पुरुषके अवयवोंमें वाक् ही सबसे अधिक सार वस्तु है, इसलिये वाक् पुरुषका रस कही जाती है। उस वाणीका भी उससे अधिक सारभूत ऋक् ही रस है, ऋक्का रस साम है जो उससे भी अधिक सारतर वस्तु है तथा उस सामका भी रस उद्गीथ (ॐकार) है। यहाँ उद्गीथ शब्दसे ओंकार ही लेना चाहिये; क्योंकि उसीका प्रकरण है, यह सामसे भी सारतर है ॥ २ ॥ <br><br> इस प्रकार — |

स एष रसानाँ२ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो यदुद्गीथः ॥ ३ ॥

यह जो उद्गीथ है वह सम्पूर्ण रसोंमें रसतम, उत्कृष्ट, परमात्माका प्रतीक होने योग्य और पृथिवी [आदि रसोंमें] आठवाँ है ॥ ३ ॥

| स एष उद्गीथाख्य ॐकारो भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामतिशयेन रसो रसतमः परमः परमात्मप्रतीकत्वात्। परार्ध्यः-अर्धं स्थानं परं च तदर्धं च परार्धं तदर्हतीति परार्ध्यः परमात्मस्थानार्हः परमात्मवदुपास्यत्वादित्यभिप्रायः। अष्टमः पृथिव्यादिरससंख्यायां यदुद्गीथो य उद्गीथः ॥ ३ ॥ | वह यह उद्गीथसंज्ञक ओंकार भूत आदिके उत्तरोत्तर रसोंमें अतिशय रस अर्थात् रसतम है, परमात्माका प्रतीक होनेके कारण परम (उत्कृष्ट) है, परार्ध्य है--अर्ध कहते हैं स्थानको जो पर होते हुए अर्ध भी हो उसका नाम परार्ध है, उसके योग्य होनेसे यह परार्ध्य है; तात्पर्य यह है कि परमात्माके समान उपासनीय होनेके कारण यह परमात्माका आलम्बन होने योग्य है। तथा यह जो उद्गीथ है पृथिवी आदि रसोंकी गणनामें आठवाँ है॥३॥ |