देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० २ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८१ |
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| एवं जाता वरा पुत्री मत्स्यगन्धा वरानना।<br>पुत्रीव पाल्यमाना सा दाशगेहे व्यवर्धत ॥ ४७ | इस प्रकार सुन्दर मुखवाली उस कन्या मत्स्य-गन्धाका जन्म हुआ। दाशके घरमें पुत्रीकी भाँति पालन-पोषणकी जाती हुई वह कन्या बढ़ने लगी ॥ ४७ ॥ |
| मत्स्यगन्धा तदा जाता किशोरी चातिसुप्रभा।<br>तस्य कार्याणि कुर्वाणा वासवी चातिसुप्रभा ॥ ४८ | जब वह मत्स्यगन्धा किशोरावस्थाको प्राप्त हुई, तब उसका सौन्दर्य और भी बढ़ गया। वह परम सुन्दरी वसुकन्या निषादराजके कार्योंको करती हुई रहने लगी ॥ ४८ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे मत्स्यगन्धोत्पत्तिवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
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अथ द्वितीयोऽध्यायः
व्यासजीकी उत्पत्ति और उनका तपस्याके लिये जाना
</div>| सूत उवाच | |
|---|---|
| एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन् पाराशरो मुनिः।<br>आजगाम महातेजाः कालिन्द्यास्तटमुत्तमम् ॥ १ | **सूतजी बोले—**एक बार तीर्थयात्रा करते हुए महान् तेजस्वी पराशरमुनि यमुनानदीके उत्तम तटपर आये और उन धर्मात्माने भोजन करते हुए निषादसे कहा—मुझको नावसे यमुनाके पार पहुँचा दो ॥ १-२ ॥ |
| निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा।<br>प्रापयस्व परं पारं कालिन्द्या उडुपेन माम्॥ २ | |
| दाशः श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं कुर्वाणो भोजनं तटे।<br>उवाच तां सुतां बालां मत्स्यगन्धां मनोरमाम् ॥ ३ | मुनिका वचन सुनकर यमुनाके तटपर भोजन करते हुए उस निषादने अपनी सुन्दर युवा पुत्री मत्स्यगन्धासे कहा—‘हे सुन्दर मुसकानवाली पुत्रि! तुम इन मुनिको नावमें बैठाकर पार उतार दो; क्योंकि ये धर्मात्मा तपस्वी उस पार जानेके इच्छुक हैं’ ॥ ३-४ ॥ |
| उडुपेन मुनिं बाले परं पारं नयस्व ह।<br>गन्तुकामोऽस्ति धर्मात्मा तापसोऽयं शुचिस्मिते ॥ ४ | |
| इत्युक्ता सा तदा पित्रा मत्स्यगन्धाथ वासवी।<br>उडुपे मुनिमासीनं संवाहयति भामिनी ॥ ५ | पिताके ऐसा कहनेपर वह सुन्दर वासवी मत्स्यगन्धा मुनिको नावमें बैठाकर खेने लगी। यमुनानदीके जलपर नावसे चलते समय दैवयोगसे प्रारब्धानुसार मुनि पराशर उस सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याको देखकर आसक्त हो गये ॥ ५-६ ॥ |
| व्रजन् सूर्यसुतातोये भावित्वाद्दैवयोगतः।<br>कामार्तस्तु मुनिर्जातो दृष्ट्वा तां चारुलोचनाम् ॥ ६ | |
| ग्रहीतुकामः स मुनिर्दृष्ट्वा व्यञ्जितयौवनाम्।<br>दक्षिणेन करेणैनामस्पृशद्दक्षिणे करे ॥ ७ | प्रस्फुटित यौवनवाली उस कन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छावाले मुनिराजने अपनी दाहिनी भुजासे उसकी दाहिनी भुजाका स्पर्श किया ॥ ७ ॥ |
| तमुवाचासितापाङ्गी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>कुलस्य सदृशं वः किं श्रुतस्य तपसश्च किम् ॥ ८ | इसपर उस असितापांगीने मुसकराकर कहा—क्या आपका यह कृत्य आपके कुल, तपस्या तथा वेदज्ञानके अनुरूप है ? हे धर्मज्ञ! आप वसिष्ठजीके वंशज हैं और कुल तथा शीलसे युक्त हैं फिर भी कामदेवसे पीड़ित होकर आप क्या करना चाहते हैं ? ॥ ८-९ ॥ |
| त्वं वै वसिष्ठदायादः कुलशीलसमन्वितः।<br>किं चिकीर्षसि धर्मज्ञ मन्मथेन प्रपीडितः॥ ९ |
| १८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम।<br>तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः॥ १० | हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर मनुष्यजन्म दुर्लभ है। उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म लेना तो मैं विशेषरूपसे दुर्लभ मानती हूँ॥ १०॥ |
| कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन<br>द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च।<br>अनार्यभावं कथमागतोऽसि<br>विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम्॥ ११<br>मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे<br>शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम्।<br>समीपं समायासि कामातुरस्त्वं<br>कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम्॥ १२ | हे विप्रेन्द्र! आप कुलसे, शीलसे तथा वेदाध्ययनसे एक धर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं? मुझ मत्स्यगन्धाको देखकर आप अनाचारयुक्त विचारवाले कैसे हो गये? हे अमोघ बुद्धिवाले ब्राह्मण! मेरे शरीरमें स्थित किस विशेषताको देखकर आप मेरा हाथ पकड़नेके लिये कामासक्त होकर मेरी ओर चले आ रहे हैं? क्या आपको अपने धर्मका ज्ञान नहीं है?॥ ११-१२॥ |
| अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-<br>ञ्जले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा।<br>मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं<br>न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम्॥ १३ | अहो, ये मन्दबुद्धि ब्राह्मण इस जलमें मुझे पकड़नेको आतुर हो रहे हैं। मेरा स्पर्श करके कामबाणसे आहत इनका मन व्याकुल हो उठा है। इस समय कोई भी इन्हें रोकनेमें समर्थ नहीं है॥ १३॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम्।<br>धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै॥ १४ | ऐसा सोचकर उस निषादकन्याने महामुनि पराशरसे कहा—हे महाभाग! आप धैर्य धारण करें; मैं अभी आपको उस पार ले चलती हूँ॥ १४॥ |
| सूत उवाच<br>पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम्।<br>करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः॥ १५ | सूतजी बोले—मुनि पराशर उसका हितकारी वचन सुनकर उसका हाथ छोड़ करके वहीं स्थित हो गये और उस पार पहुँच गये॥ १५॥ |
| मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनिः कामातुरस्तदा।<br>वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरःस्थितम्॥ १६<br>दुर्गन्धांहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे।<br>समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः॥ १७ | तदनन्तर पराशरमुनिने मत्स्यगन्धाको पकड़ लिया। तब भयसे काँपती हुई वह कन्या सम्मुखस्थित मुनिसे कहने लगी—हे मुनिवर! मैं दुर्गन्धवाली हूँ, मुझसे क्या आपको घृणा नहीं हो रही है? समान रूपवालोंके बीच ही परस्पर सम्बन्ध आनन्ददायक होता है॥ १६-१७॥ |
| इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी।<br>कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना॥ १८ | मत्स्यगन्धाके ऐसा कहते ही पराशरमुनिने क्षण-मात्रमें अपने तपोबलसे उस भामिनी कन्याको सुमुखी, रूपवती तथा योजनगन्धा बना दिया॥ १८॥ |
| मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम्।<br>जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः॥ १९<br>ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः॥ २० | उसे कस्तूरीकी सुगन्धिवाली मनोहर स्त्री बनाकर कामातुर मुनिराजने अपने दाहिने हाथसे उसे पकड़ लिया। तब सत्यवती नामवाली उस सुन्दरीने संयोगकी कामनावाले मुनिसे कहा—हे मुने! तटपर स्थित मेरे पिता तथा सभी लोग यहाँ हमें देख रहे हैं॥ १९-२०॥ |
| पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः।<br>प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्भवति यामिनी॥ २१ | हे मुनिश्रेष्ठ! यह भीषण पशुवत् व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता। जबतक रात नहीं हो जाती, तबतक प्रतीक्षा कीजिये॥ २१॥ |
| अ० २ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि।<br>दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः॥ २२<br><br>कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः॥ २३<br><br>नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै।<br>नीहारे च समुत्पन्ने ततेऽतितमसा युते॥ २४<br><br>कामिनीं तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः।<br>कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः॥ २५<br><br>अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति।<br>पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्द्वाव्यहम्॥ २६<br><br>त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत्। | मनुष्यके लिये कामसंसर्ग रातमें ही विहित है, दिनमें नहीं। दिनमें संसर्ग करनेसे महान् दोष होता है और बहुत-से लोग उसे देख भी लेते हैं॥ २२॥<br><br>हे महाबुद्धे! अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें, लोकनिन्दा अत्यन्त कष्टकर होती है। सत्यवतीका कहा गया युक्तिसंगत वचन सुनकर उदार बुद्धिवाले पराशरमुनिने अपने पुण्यबलसे तत्क्षण कुहरा उत्पन्न कर दिया। उस कुहरेके उत्पन्न हो जानेपर अत्यन्त अन्धकारमय नदीतटपर उस कामिनीने पराशरमुनिसे मधुर वाणीमें यह वचन कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैं अभी कन्या हूँ और आप मेरे साथ संसर्ग करके चले जायँगे। हे ब्रह्मन्! आप अमोघ वीर्यवाले हैं, ऐसी स्थितिमें मेरी क्या गति होगी? यदि मैं गर्भधारण कर लूँगी तो पिताको क्या उत्तर दूँगी? हे ब्रह्मन्! मेरे साथ संसर्ग करके आप चले जायँगे तब मैं क्या करूँगी, उसे बताइये?॥ २३—२६ १/२॥ |
| पराशर उवाच<br>कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि॥ २७<br><br>वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि। | पराशर बोले— हे प्रिये! आज मुझे प्रसन्न करके भी तुम कन्या ही बनी रहोगी। हे भामिनि! हे भीरु! तुम जो वर चाहती हो, उसे माँग लो॥ २७ १/२॥ |
| सत्यवत्युवाच<br>यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद॥ २८<br><br>कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम।<br>पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्भुतवीर्यवान्॥ २९<br><br>गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम्। | सत्यवती बोली— हे मानद! आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मेरे माता-पिता लोकमें इसे न जान सकें। साथ ही हे विप्रवर! आप ऐसा करें, जिससे मेरा कन्याव्रत नष्ट न हो और जो पुत्र उत्पन्न हो, वह आपहीके समान अपूर्व ओजस्वी हो, मेरी यह सुगन्ध सदा बनी रहे और मेरा यौवन नित नूतन बना रहे॥ २८–२९ १/२॥ |
| पराशर उवाच<br>शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्णवंशसम्भवः शुचिः॥ ३०<br><br>भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि।<br>केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि॥ ३१<br><br>कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने।<br>दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम्॥ ३२<br><br>दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम्।<br>तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम्॥ ३३<br><br>दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम्।<br>पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने॥ ३४<br><br>वेदविद्भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये। | पराशर बोले— हे सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा पुत्र पवित्र तथा भगवान् विष्णुके अंशसे अवतीर्ण होगा। हे सुन्दरि! वह तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। मैं तुम्हारे ऊपर किसी कारणविशेषसे ही कामासक्त हुआ हूँ। हे सुमुखि! मुझे ऐसा मोह पूर्वमें कभी नहीं हुआ। अप्सराओंके रूपको देखकर भी मैं सदा धैर्य धारण किये रहा। दैवयोगसे ही तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार कामके वशीभूत हुआ हूँ। इस विषयमें तुम कोई विशेष कारण ही समझो, दैवका अतिक्रमण अत्यन्त कठिन है, अन्यथा अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार क्यों मोहित होता! हे वरानने! तुम्हारा पुत्र पुराणोंका रचयिता, वेदोंका विभाग करनेवाला तथा तीनों लोकोंमें विख्यात होगा॥ ३०—३४ १/२॥ |
| १८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तां वशं यातां भुक्त्वा स मुनिसत्तमः ॥ ३५<br>जगाम तरसा स्नात्वा कालिन्दीसलिले मुनिः।<br>सापि सत्यवती जाता सद्यो गर्भवती सती ॥ ३६ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर अपने वशमें आयी हुई उस कन्याके साथ संसर्ग करके मुनिश्रेष्ठ पराशर तत्काल यमुनानदीमें स्नानकर वहाँसे शीघ्र चले गये। वह साध्वी सत्यवती भी तत्काल गर्भवती हो गयी॥ ३५-३६॥ | | सुषुवे यमुनाद्वीपे पुत्रं काममिवापरम्।<br>जातमात्रस्तु तेजस्वी तामुवाच स्वमातरम् ॥ ३७<br><br>तपस्येव मनः कृत्वा विविशे चातिवीर्यवान्।<br>गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥ ३८<br><br>तपः कर्तुं महाभागे दर्शयिष्यामि वै स्मृतः।<br>मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिदनुत्तमम् ॥ ३९<br><br>स्मर्त्तव्योऽहं तदा शीघ्रमागमिष्यामि भामिनि।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि त्यक्त्वा चिन्तां सुखं वस ॥ ४० | [यथासमय] सत्यवतीने यमुनाजीके द्वीपमें दूसरे कामदेवके तुल्य एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। उत्पन्न होते ही उस तेजवान् पुत्रने अपनी मातासे कहा—हे माता! मनमें तपस्याका निश्चय करके ही अत्यन्त तेजस्वी मैं गर्भमें प्रविष्ट हुआ था। हे महाभागे! अब आप अपनी इच्छानुसार कहीं भी चली जायँ और मैं भी यहाँसे तप करनेके लिये जा रहा हूँ। हे माता! आपके स्मरण करनेपर मैं अवश्य ही दर्शन दूँगा। हे माता! जब कोई उत्तम कार्य आ पड़े तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा, मैं शीघ्र ही उपस्थित हो जाऊँगा। हे भामिनि! आपका कल्याण हो, अब मैं चलूँगा। आप चिन्ता छोड़कर सुखपूर्वक रहिये॥ ३७—४०॥ | | इत्युक्त्वा निर्ययौ व्यासः सापि पित्रन्तिकं गता।<br>द्वीपे न्यस्तस्तया बालस्तस्माद् द्वैपायनोऽभवत् ॥ ४१ | ऐसा कहकर व्यासजी चले गये और वह सत्यवती भी अपने पिताके पास चली गयी। सत्यवतीने बालकको यमुनाद्वीपमें जन्म दिया था। अतः वह बालक 'द्वैपायन' नामसे विख्यात हुआ॥ ४१॥ | | जातमात्रो जगामाशु वृद्धिं विष्ण्वंशयोगतः।<br>तीर्थे तीर्थे कृतस्नानश्चचार तप उत्तमम् ॥ ४२ | विष्णुभगवान्के अंशावतार होनेके कारण वह बालक उत्पन्न होते ही शीघ्र बड़ा हो गया तथा अनेक तीर्थोंमें स्नान करता हुआ उत्तम तप करने लगा॥ ४२॥ | | एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात्।<br>चकार वेदशाखाश्च प्राप्तं ज्ञात्वा कलेर्युगम् ॥ ४३<br><br>वेदविस्तारकरणाद्व्यासनामाभवन्मुनिः।<br>पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमृत्तमम् ॥ ४४<br><br>शिष्यानध्यापयामास वेदान्कृत्वा विभागशः।<br>सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ॥ ४५<br><br>असितं देवलं चैव शुकं चैव स्वमात्मजम्। | इस प्रकार पराशरमुनिके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन उत्पन्न हुए और उन्होंने ही कलि-युगको आया जानकर वेदोंको अनेक शाखाओंमें विभक्त किया, वेदोंका विस्तार करनेके कारण ही उन मुनिका नाम 'व्यास' पड़ गया। उन्होंने ही विभिन्न पुराणसंहिताओं तथा श्रेष्ठ महाभारतकी रचना की। उन्होंने ही वेदोंके अनेक विभाग करके उसे अपने शिष्यों—सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, असित, देवल और अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया॥ ४३—४५ १/२॥ |
अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८५
अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८५
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| एतच्च कथितं सर्वं कारणं मुनिसत्तमाः ॥ ४६<br><br>सत्यवत्याः सुतस्यापि समुत्पत्तिस्तथा शुभा।<br>संशयोऽत्र न कर्तव्यः सम्भवे मुनिसत्तमाः ॥ ४७<br><br>महतां चरिते चैव गुणा ग्राह्या मुनेरिति।<br>कारणाच्च समुत्पत्तिः सत्यवत्या झषोदरे ॥ ४८<br><br>पराशरेण संयोगः पुनः शन्तनुना तथा।<br>अन्यथा तु मुनेश्चित्तं कथं कामाकुलं भवेत् ॥ ४९<br><br>अनार्यजुष्टं धर्मज्ञः कृतवान्स कथं मुनिः।<br>सकारणेयमुत्पत्तिः कथिताश्चर्यकारिणी ॥ ५०<br><br>श्रुत्वा पापाच्च निर्मुक्तो नरो भवति सर्वथा।<br>य एतच्छुभमाख्यानं शृणोति श्रुतिमान्नरः ॥ ५१<br>न दुर्गतिमवाप्नोति सुखी भवति सर्वदा ॥ ५२ | हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने यह सब उत्पत्तिका कारण आपलोगोंसे बता दिया, साथ ही सत्यवतीके पुत्र व्यासजीकी पवित्र उत्पत्तिका वर्णन कर दिया है। हे श्रेष्ठ मुनिगण! व्यासजीकी इस उत्पत्तिके विषयमें आपलोगोंको सन्देह नहीं करना चाहिये। महापुरुषोंके चरितसे केवल गुण ही ग्रहण करना चाहिये। किसी विशेष कारणसे ही मुनि व्यासका तथा मछलीके उदरसे सत्यवतीका जन्म, पराशरमुनिके साथ उनका संयोग और फिर राजा शन्तनुके साथ उनका विवाह हुआ। अन्यथा मुनि पराशरका चित्त कामासक्त ही क्यों होता ? और धर्मके ज्ञाता वे महामुनि पराशर अनार्य लोगोंद्वारा आचरित किया जानेवाला ऐसा कृत्य क्यों करते ! किसी विशेष कारणसे युक्त तथा आश्चर्यकारिणी यह उत्पत्ति मैंने बता दी, जिसे सुनकर मनुष्य निश्चितरूपसे पापसे मुक्त हो जाता है। जो श्रुतिपरायण मनुष्य इस शुभ आख्यानको सुनता है; वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है तथा सर्वदा सुखी रहता है॥ ४६—५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
व्यासजन्मवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
राजा शन्तनु, गंगा और भीष्मके पूर्वजन्मकी कथा
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| उत्पत्तिस्तु त्वया प्रोक्ता व्यासस्यामिततेजसः।<br>सत्यवत्यास्तथा सूत विस्तरेण त्वयानघ ॥ १<br><br>तथाप्येकस्तु सन्देहश्चित्तेऽस्माकं तु संस्थितः।<br>न निवर्तति धर्मज्ञ कथितेन त्वयानघ ॥ २ | हे सूतजी! हे अनघ! यद्यपि आपने परम तेजस्वी व्यास तथा सत्यवतीके जन्मकी कथा विस्तारपूर्वक कही तथापि हमलोगोंके चित्तमें एक बड़ी भारी शंका बनी हुई है। हे धर्मज्ञ! हे अनघ! वह शंका आपके कहनेपर भी दूर नहीं हो रही है ॥ १-२॥ |
| माता व्यासस्य या प्रोक्ता नाम्ना सत्यवती शुभा।<br>सा कथं नृपतिं प्राप्ता शन्तनुं धर्मवित्तमम् ॥ ३<br><br>निषादपुत्रीं स कथं वृतवान्नृपतिः स्वयम्।<br>धर्मिष्ठः पौरवो राजा कुलहीनामसंवृताम् ॥ ४ | व्यासजीकी कल्याणमयी माता जो सत्यवती नामसे जानी जाती थीं, वे धर्मात्मा राजा शन्तनुको कैसे प्राप्त हुईं? कुल तथा आचरणसे हीन उस निषादकन्याका पुरुकुलमें उत्पन्न उन धर्मात्मा राजाने स्वयं कैसे वरण कर लिया? ॥ ३-४॥ |
| शन्तनोः प्रथमा पत्नी का ह्यभूत्कथयाधुना।<br>भीष्मः पुत्रोऽथ मेधावी वसोरांशः कथं पुनः ॥ ५ | आप कृपा करके हमलोगोंको यह भी बतलाइये कि राजा शन्तनुकी पहली पत्नी कौन थी? वसुके अंशसे उत्पन्न मेधावी भीष्म उनके पुत्र कैसे हुए? ॥ ५॥ |
| १८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वया प्रोक्तं पुरा सूत राजा चित्राङ्गदः कृतः।<br>सत्यवत्याः सुतो वीरो भीष्मेणामिततेजसा॥ ६<br>चित्राङ्गदे हते वीरे कृतस्तदनुजस्तथा।<br>विचित्रवीर्यनामासौ सत्यवत्याः सुतो नृपः॥ ७ | हे सूतजी! आप यह पहले ही कह चुके हैं कि सत्यवतीके वीर पुत्र चित्रांगदको अमित तेजवाले भीष्मने राजा बनाया था और वीर चित्रांगदके मारे जानेपर उसके अनुज तथा सत्यवतीके पुत्र विचित्रवीर्यको उन्होंने राजा बनाया॥ ६-७॥ |
| ज्येष्ठे भीष्मे स्थिते पूर्वं धर्मिष्ठे रूपवत्यपि।<br>कृतवान्स कथं राज्यं स्थापितस्तेन जानता॥ ८ | रूपसम्पन्न तथा ज्येष्ठ पुत्र धर्मात्मा भीष्मके रहते हुए विचित्रवीर्यने राज्य कैसे किया और सब कुछ जानते हुए भी भीष्मने उन्हें राज्यपर कैसे स्थापित किया ?॥ ८॥ |
| मृते विचित्रवीर्ये तु सत्यवत्यतिदुःखिता।<br>वध्वभ्यां गोलकौ पुत्रौ जनयामास सा कथम्॥ ९ | विचित्रवीर्यके मरनेपर अत्यन्त दुःखित माता सत्यवतीने अपनी दोनों पुत्रवधुओंसे दो गोलक पुत्र कैसे उत्पन्न कराये ?॥ ९॥ |
| कथं राज्यं न भीष्माय ददौ सा वरवर्णिनी।<br>न कृतस्तु कथं तेन वीरेण दारसंग्रहः॥ १० | उन सुन्दरी सत्यवतीने उस समय ज्येष्ठ पुत्र भीष्मको राजा क्यों नहीं बनाया और उन पराक्रमी भीष्मने अपना विवाह क्यों नहीं किया ?॥ १०॥ |
| अधर्मस्तु कृतः कस्माद्व्यासेनामिततेजसा।<br>ज्येष्ठेन भ्रातृभार्यायां पुत्रावुत्पादिताविति॥ ११ | अमित तेजस्वी बड़े भाई व्यासजीने ऐसा अधर्म क्यों किया जो कि उन्होंने नियोगद्वारा दो पुत्र उत्पन्न किये ?॥ ११॥ |
| पुराणकर्ता धर्मात्मा स कथं कृतवान्मुनिः।<br>सेवनं परदाराणां भ्रातुश्चैव विशेषतः॥ १२<br>जुगुप्सितमिदं कर्म स कथं कृतवान्मुनिः।<br>शिष्टाचारः कथं सूत वेदानुमितिकारकः॥ १३ | पुराणोंके रचयिता व्यासमुनिने धर्मज्ञ होते हुए भी ऐसा कार्य क्यों किया; हे सूतजी! क्या यही वेदोंसे अनुमोदित शिष्टाचार है ?॥ १२-१३॥ |
| व्यासशिष्योऽसि मेधाविन् सन्देहं छेत्तुमर्हसि।<br>श्रोतुकामा वयं सर्वे धर्मक्षेत्रे कृतक्षणाः॥ १४ | हे मेधाविन्! आप व्यासजीके शिष्य हैं, इसलिये आप हमारी इन सभी शंकाओंका समाधान करनेमें समर्थ हैं। हम सभी इस धर्मक्षेत्रमें इन प्रश्नोंके उत्तर सुननेको उत्सुक हो रहे हैं॥ १४॥ |
| सूत उवाच<br>इक्ष्वाकुवंशप्रभवो महाभिष इति स्मृतः।<br>सत्यवाग्धर्मशीलश्च चक्रवर्ती नृपोत्तमः॥ १५ | सूतजी बोले— [हे मुनियो!] इक्ष्वाकुकुलमें महाभिष नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा और चक्रवर्ती राजा उत्पन्न हुए—ऐसा कहा जाता है॥ १५॥ |
| अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतेन च।<br>तोषयामास देवेन्द्रं स्वर्गं प्राप महामतिः॥ १६ | उन बुद्धिमान् राजाने हजारों अश्वमेध तथा सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करके इन्द्रको सन्तुष्ट किया और स्वर्ग प्राप्त किया था॥ १६॥ |
| एकदा ब्रह्मसदनं गतो राजा महाभिषः।<br>सुराः सर्वे समाजग्मुः सेवनार्थं प्रजापतिम्॥ १७<br>गङ्गा महानदी तत्र संस्थिता सेवितुं विभुम्।<br>तस्या वासः समुद्भूतं मारुतेन तरस्विना॥ १८<br>अधोमुखाः सुराः सर्वे न विलोक्यैव तां स्थिताः।<br>राजा महाभिषस्तां तु निःशङ्कः समपश्यत॥ १९ | एक बार राजा महाभिष ब्रह्मलोक गये। वहाँ प्रजापतिकी सेवाके लिये सभी देवता आये हुए थे। उस समय देवनदी गंगाजी भी ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थीं। उस समय तीव्रगामी पवनने उनका वस्त्र उड़ा दिया। सभी देवता अपना सिर नीचा किये उन्हें बिना देखे खड़े रहे, किंतु राजा महाभिष निःशंक भावसे उनकी ओर देखते रह गये॥ १७-१९॥ |
अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८७
अ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सापि तं प्रेमसंयुक्तं नृपं ज्ञातवती नदी।<br>दृष्ट्वा तौ प्रेमसंयुक्तौ निर्लज्जौ काममोहितौ ॥ २०<br>ब्रह्मा चुकोप तौ तूर्णं शशाप च रुषान्वितः।<br>मर्त्यलोकेषु भूपाल जन्म प्राप्य पुनर्दिवम् ॥ २१<br>पुण्येन महताविष्टस्त्वमवाप्स्यसि सर्वथा।<br>गङ्गां तथोक्तवान्ब्रह्मा वीक्ष्य प्रेमवतीं नृपे ॥ २२ | उन गंगानदीने भी राजाको अपनेपर प्रेमासक्त जाना। उन दोनोंको इस प्रकार मुग्ध देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हो गये और कोपाविष्ट होकर शीघ्र ही उन दोनोंको शाप दे दिया—हे राजन्! मनुष्यलोकमें तुम्हारा जन्म होगा। वहाँ जब तुम अधिक पुण्य एकत्र कर लोगे, तब पुनः स्वर्गलोकमें आओगे। गंगाको महाभिष-राजापर प्रेमासक्त जानकर ब्रह्माजीने उन्हें [गंगाको] भी उसी प्रकार शाप दे दिया॥ २०—२२॥ |
| विमनस्कौ तु तौ तूर्णं निःसृतौ ब्रह्मणोऽन्तिकात्।<br>स नृपांश्चिन्तयित्वाथ भूलोके धर्मतत्परान् ॥ २३<br>प्रतीपं चिन्तयामास पितरं पुरुवंशजम्।<br>एतस्मिन्समये चाष्टौ वसवः स्त्रीसमन्विताः ॥ २४<br>वसिष्ठस्याश्रमं प्राप्ता रममाणा यदृच्छया।<br>पृथ्वादीनां वसूनां च मध्ये कोऽपि वसूत्तमः ॥ २५<br>द्यौर्नामा तस्य भार्याथ नन्दिनीं गां ददर्श ह।<br>दृष्ट्वा पतिं सा पप्रच्छ कस्येयं धेनुरुत्तमा ॥ २६ | इस प्रकार वे दोनों दुःखी मनसे ब्रह्माजीके पाससे शीघ्र ही चले गये। राजा अपने मनमें सोचने लगे कि इस मृत्युलोकमें कौन ऐसे राजा हैं, जो धर्मपरायण हैं। ऐसा विचारकर उन्होंने पुरुवंशीय महाराज 'प्रतीप' को ही पिता बनानेका निश्चय कर लिया। इसी बीच आठों वसु अपनी-अपनी स्त्रीके साथ विहार करते हुए स्वेच्छाया महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर आ पहुँचे। उन पृथु आदि वसुओंमें 'द्यौ' नामक एक श्रेष्ठ वसु थे। उनकी पत्नीने 'नन्दिनी' गौको देखकर अपने पतिसे पूछा कि यह सुन्दर गाय किसकी है?॥ २३—२६॥ |
| द्यौस्तामाह वसिष्ठस्य गौरियं शृणु सुन्दरि।<br>दुग्धमस्याः पिबेद्यस्तु नारी वा पुरुषोऽथ वा ॥ २७<br>अयुतायुर्भवेन्नूनं सदैवागतयौवनः।<br>तच्छ्रुत्वा सुन्दरी प्राह मृत्युलोकेऽस्ति मे सखी ॥ २८<br>उशीनरस्य राजर्षेः पुत्री परमशोभना।<br>तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां पयस्विनीम् ॥ २९<br>आनयस्वाश्रमं श्रेष्ठं नन्दिनीं कामदां शुभाम्।<br>यावदस्याः पयः पीत्वा सखी मम सदैव हि ॥ ३०<br>मानुषेषु भवेदेका जरारोगविवर्जिता।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या द्यौर्जहार च नन्दिनीम् ॥ ३१<br>अवमन्य मुनिं दान्तं पृथ्वाद्यैः सहितोऽनघः। | द्यौने उससे कहा—हे सुन्दरि! सुनो, यह महर्षि वसिष्ठजीकी गाय है। इस गायका दूध स्त्री या पुरुष जो कोई भी पीता है, उसकी आयु दस हजार वर्षकी हो जाती है और उसका यौवन सर्वदा बना रहता है। यह सुनकर उस सुन्दरी स्त्रीने कहा—मृत्युलोकमें मेरी एक सखी है। मेरी वह सखी राजर्षि उशीनरकी परम सुन्दरी कन्या है। हे महाभाग! उसके लिये अत्यन्त सुन्दर तथा सब प्रकारकी कामनाओंको देनेवाली इस गायको बछड़े-सहित अपने आश्रममें ले चलिये। जब मेरी सखी इसका दूध पीयेगी तब वह निर्जरा एवं रोगरहित होकर मनुष्योंमें एकमात्र अद्वितीय बन जायगी। उसका वचन सुनकर द्यौ नामके वसुने 'पृथु' आदि अष्टवसुओंके साथ जितेन्द्रिय मुनिका अपमान करके नन्दिनीका अपहरण कर लिया॥ २७—३१ १/२॥ |
| हृतायामथ नन्दिन्यां वसिष्ठस्तु महातपाः ॥ ३२<br>आजगामाश्रमपदं फलान्यादाय सत्वरः।<br>नापश्यत यदा धेनुं सवत्सां स्वाश्रमे मुनिः ॥ ३३ | नन्दिनीका हरण हो जानेपर महातपस्वी वसिष्ठ फल लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम आ गये। जब मुनिने अपने आश्रममें बछड़ेसहित नन्दिनीगायको नहीं देखा तब वे तेजस्वी वनों एवं गुफाओंमें उसे ढूँढ़ने |
| १८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |
| मृगयामास तेजस्वी गहरेषु वनेष्वपि।<br>नासादिता यदा धेनुश्चुकोपातिशयं मुनिः॥ ३४<br><br>वारुणिश्चापि विज्ञाय ध्यानेन वसुभिर्हृताम्।<br>वसुभिर्मे हृता धेनुर्यस्मान्मामवमन्य वै॥ ३५<br><br>तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः।<br>एवं शशाप धर्मात्मा वसूंस्तान्वारुणिः स्वयम्॥ ३६<br><br>श्रुत्वा विमनसः सर्वे प्रययुर्दुःखिताश्च ते।<br>शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः॥ ३७<br><br>प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः शरणं गताः।<br>मुनिस्तानाह धर्मात्मा वसून्दीनान्पुरःस्थितान्॥ ३८<br><br>अनुसंवत्सरं सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ।<br>येनेयं विहृता धेनुर्नन्दिनी मम वत्सला॥ ३९<br><br>तस्माद् द्यौर्मानुषे देहे दीर्घकालं वसिष्यति।<br>ते शप्ताः पथि गच्छन्तीं गङ्गां दृष्ट्वा सरिद्वराम्॥ ४०<br><br>ऊचुस्तां प्रणताः सर्वे शप्तां चिन्तातुरां नदीम्।<br>भविष्यामो वयं देवि कथं देवाः सुधाशनाः॥ ४१<br><br>मानुषाणां च जठरे चिन्तेयं महती हि नः।<br>तस्मात्त्वं मानुषी भूत्वा जनयास्मान्सरिद्वरे॥ ४२<br><br>शन्तनुर्नाम राजर्षिस्तस्य भार्या भवानघे।<br>जाताञ्जाताञ्जले चास्मान्निःक्षिपस्व सुरापगे॥ ४३<br><br>एवं शापविनिर्मोक्षो भविता नात्र संशयः।<br>तथेत्युक्ताश्च ते सर्वे जग्मुर्लोकं स्वकं पुनः॥ ४४<br><br>गङ्गापि निर्गता देवी चिन्त्यमाना पुनः पुनः।<br>महाभिषो नृपो जातः प्रतीपस्य सुतस्तदा॥ ४५<br><br>शन्तनुर्नाम राजर्षिर्धर्मात्मा सत्यसङ्गरः।<br>प्रतीपस्तु स्तुतिं चक्रे सूर्यस्यामिततेजसः॥ ४६<br><br>तदा च सलिलात्तस्मान्निःसृता वरवर्णिनी।<br>दक्षिणं शालसंकाशमूरूं भेजे शुभानना॥ ४७ | लगे, जब वह गाय नहीं मिली तब वरुणपुत्र मुनि वसिष्ठजी ध्यानयोगसे उसे वसुओंके द्वारा हरी गयी जानकर अत्यन्त कुपित हुए। वसुओंने मेरी अवमानना करके मेरी गौ चुरा ली है। वे सभी मानवयोनिमें जन्म ग्रहण करेंगे, इसमें सन्देह नहीं है। इस प्रकार धर्मात्मा वसिष्ठजीने उन वसुओंको शाप दिया॥ ३२—३६॥<br><br>यह सुनकर वे सभी वसु खिन्नमनस्क और दुःखित हो गये और वहाँसे चल दिये। हमें शाप दे दिया गया है—यह जानकर वे ऋषि वसिष्ठके पास पहुँचे और उन्हें प्रसन्न करते हुए वे सभी वसु उनके शरणागत हो गये। तब धर्मात्मा मुनि वसिष्ठजीने उन सामने खड़े वसुओंको देखकर कहा—तुमलोगोंमेंसे [सात वसु] एक-एक वर्षके अन्तरालसे ही शापसे मुक्त हो जायँगे; परंतु जिसने मेरी प्रिय वत्सला नन्दिनीका अपहरण किया है, वह 'द्यौ' नामक वसु मनुष्य-शरीरमें ही बहुत दिनोंतक रहेगा॥ ३७—३९ ½॥<br><br>उन अभिशप्त वसुओंने मार्गमें जाती हुई नदियोंमें उत्तम गङ्गाजीको देखकर उन अभिशस्त तथा चिन्तातुर गङ्गाजीसे प्रणामपूर्वक कहा—हे देवि! अमृत पीनेवाले हम देवता मानवकुक्षिसे कैसे उत्पन्न होंगे, यह हमें महान् चिन्ता है, अतः हे नदियोंमें श्रेष्ठ! आप ही मानुषी बनकर हमलोगोंको जन्म दें। पृथ्वीपर शन्तनु नामक एक राजर्षि हैं, हे अनघे! आप उन्हींकी भार्या बन जायँ और हे सुरापगे! हमें क्रमशः जन्म लेनेपर आप जलमें छोड़ती जायँ। आपके ऐसा करनेसे हमलोग भी शापसे मुक्त हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है। गङ्गाजीने जब उनसे 'तथास्तु' कह दिया तब वे सब वसु अपने-अपने लोकको चले गये और गङ्गाजी भी बार-बार विचार करती हुई वहाँसे चली गयीं॥ ४०—४४ ½॥<br><br>उस समय राजा महाभिषने राजा प्रतीपके पुत्रके रूपमें जन्म लिया। उन्हींका नाम शन्तनु पड़ा, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा राजर्षि हुए। महाराज प्रतीपने परम तेजस्वी भगवान् सूर्यकी आराधना की। उस समय जलमेंसे एक परम सुन्दर स्त्री निकल पड़ी और वह सुमुखी आकर तुरंत ही महाराजके शाल वृक्षके समान विशाल दाहिने जंघेपर विराजमान हो गयी। |
| अ० ३ ] | द्वितीय स्कन्ध | १८९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अङ्के स्थितां स्त्रियं चाह मा पृष्ट्वा किं वरानने।<br>ममोरावास्थितासि त्वं किमर्थं दक्षिणे शुभे॥ ४८ | अंकमें बैठी हुई उस स्त्रीसे राजाने पूछा—'हे वरानने ! तुम मुझसे बिना पूछे ही मेरे शुभ दाहिने जंघेपर क्यों बैठ गयी?'॥ ४७-४८॥ |
| सा तमाह वरारोहा यदर्थं राजसत्तम।<br>स्थितास्म्यङ्के कुरुश्रेष्ठ कामयानां भजस्व माम्॥ ४९ | उस सुन्दरीने उनसे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ ! हे कुरुश्रेष्ठ ! मैं जिस कामनासे आपके अंकमें बैठी हूँ, उस कामनावाली मुझे आप स्वीकार करें'॥ ४९॥ |
| तामवोचत्तथो राजा रूपयौवनशालिनीम्।<br>नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनीम्॥ ५० | उस रूपयौवनसम्पन्ना सुन्दरीसे राजाने कहा—'मैं किसी सुन्दरी परस्त्रीको कामकी इच्छासे नहीं स्वीकार करता'॥ ५०॥ |
| स्थिता दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्य च भामिनि।<br>अपत्यानां स्नुषाणां च स्थानं विद्धि शुचिस्मिते॥ ५१<br><br>स्नुषा मे भव कल्याणि जाते पुत्रेऽतिवाञ्छिते।<br>भविष्यति च मे पुत्रस्तव पुण्यान्न संशयः॥ ५२ | हे भामिनि ! हे शुचिस्मिते ! तुम मेरे दाहिने जंघेपर प्रेमपूर्वक आकर बैठ गयी हो, उसे तुम पुत्रों तथा पुत्रवधुओंका स्थान समझो। अतः हे कल्याणि ! मेरे मनोवांछित पुत्रके उत्पन्न होनेपर तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ। तुम्हारे पुण्यसे मुझे पुत्र हो जायगा, इसमें संशय नहीं है॥ ५१-५२॥ |
| तथेत्युक्त्वा गता सा वै कामिनी दिव्यदर्शना।<br>राजा चापि गृहं प्राप्तश्चिन्तयंस्तां स्त्रियं पुनः॥ ५३ | वह दिव्य दर्शनवाली कामिनी 'तथास्तु' कहकर चली गयी और उस स्त्रीके विषयमें सोचते हुए राजा प्रतीप भी अपने घर चले गये॥ ५३॥ |
| ततः कालेन कियता जाते पुत्रे वयस्विनि।<br>वनं जिगमिषू राजा पुत्रं वृत्तान्तमूचिवान्॥ ५४ | समय बीतनेपर पुत्रके युवा होनेपर वन जानेकी इच्छावाले राजाने अपने पुत्रको वह समस्त पूर्व वृत्तान्त कह सुनाया॥ ५४॥ |
| वृत्तान्तं कथयित्वा तु पुनरूचे निजं सुतम्।<br>यदि प्रयाति सा बाला त्वां वने चारुहासिनी॥ ५५<br><br>कामयाना वरारोहा तां भजेथा मनोरमाम्।<br>न प्रष्टव्या त्वया कासि मन्नियोगान्नराधिप॥ ५६<br><br>धर्मपत्नीं च तां कृत्वा भविता त्वं सुखी किल। | सारी बात बताकर राजाने अपने पुत्रसे कहा—'यदि वह सुन्दरी बाला तुम्हें कभी वनमें मिले और अपनी अभिलाषा प्रकट करे तो उस मनोरमाको स्वीकार कर लेना तथा उससे मत पूछना कि तुम कौन हो? यह मेरी आज्ञा है, उसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर तुम सुखी रहोगे'॥ ५५-५६ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>एवं सन्दिश्य तं पुत्रं भूपतिः प्रीतमानसः॥ ५७<br><br>दत्त्वा राज्यश्रियं सर्वां वनं राजा विवेश ह।<br>तत्रापि च तपस्तप्त्वा समाराध्य पराम्बिकाम्॥ ५८<br><br>जगाम स्वर्गं राजासौ देहं त्यक्त्वा स्वतेजसा।<br>राज्यं प्राप महातेजाः शान्तनुः सार्वभौमिकम्॥ ५९<br><br>प्रजां वै पालयामास धर्मदण्डो महीपतिः॥ ६० | सूतजी बोले—इस प्रकार अपने पुत्रको आदेश देकर महाराज प्रतीप प्रसन्नताके साथ उन्हें सारा राज्य-वैभव सौंपकर वनको चले गये। वहाँ जाकर वे तप करके तथा आदिशक्ति भगवती जगदम्बिकाकी आराधना करके अपने तेजसे शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये। महातेजस्वी राजा शान्तनुने सार्वभौम राज्य प्राप्त किया और वे धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करने लगे॥ ५७-६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे
प्रतीपसकाशाच्छन्तनुजन्मवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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अथ चतुर्थोऽध्यायः
| १९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
अथ चतुर्थोऽध्यायः
गंगाजीद्वारा राजा शन्तनुका पतिरूपमें वरण, सात पुत्रोंका जन्म तथा गंगाका उन्हें अपने जलमें प्रवाहित करना, आठवें पुत्रके रूपमें भीष्मका जन्म तथा उनकी शिक्षा-दीक्षा
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सूत उवाच<br>प्रतीपेऽथ दिवं याते शन्तनुः सत्यविक्रमः।<br>बभूव मृगयाशीलो निघ्नन्व्याघ्रान्मृगान्नृपः॥ १ | सूतजी बोले—प्रतीपके स्वर्ग चले जानेपर सत्यपराक्रमी राजा शन्तनु व्याघ्र तथा मृगोंको मारते हुए मृगयामें तत्पर हो गये॥ १॥ |
| स कदाचिद्वने घोरे गङ्गातीरे चरन्नृपः।<br>ददर्श मृगशावाक्षीं सुन्दरीं चारुभूषणाम्॥ २ | किसी समय गंगाके किनारे घने वनमें विचरण करते हुए राजाने मृगके बच्चे-जैसी आँखोंवाली तथा सुन्दर आभूषणोंसे युक्त एक सुन्दर स्त्रीको देखा॥ २॥ |
| दृष्ट्वा तां नृपतिर्मग्नः पित्रोक्तेयं वरानना।<br>रूपयौवनसम्पन्ना साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा॥ ३ | उसे देखकर राजा शन्तनु हर्षित हो गये और सोचने लगे कि साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूप-यौवनसे सम्पन्न यह स्त्री वही है, जिसके विषयमें पिताजीने मुझे बताया था॥ ३॥ |
| पिबन्मुखाम्बुजं तस्या न तृप्तिमगमन्नृपः।<br>हृष्टरोमाभवत्तत्र व्याप्तचित्त इवानघः॥ ४ | उसके मुखकमलका पान करते हुए राजा तृप्त नहीं हुए। हर्षातिरेकसे उन निष्पाप राजाको रोमांच हो गया और उनका चित्त उस स्त्रीमें रम गया॥ ४॥ |
| महाभिषं सापि मत्वा प्रेमयुक्ता बभूव ह।<br>किञ्चिन्मन्दस्मितं कृत्वा तस्थावग्रे नृपस्य च॥ ५<br><br>वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं राजा प्रीतमना भृशम्।<br>उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वयन् श्लक्ष्णया गिरा॥ ६ | वह स्त्री भी उन्हें राजा महाभिष जानकर प्रेमासक्त हो गयी। वह मन्द-मन्द मुसकराती हुई राजाके सामने खड़ी हो गयी। उस सुन्दरीको देखकर राजा अत्यन्त प्रेमविवश हो गये तथा कोमल वाणीसे उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वचन कहने लगे॥ ५-६॥ |
| देवी वा त्वं च वामोरु मानुषी वा वरानने।<br>गन्धर्वी वाथ यक्षी वा नागकन्याप्सरापि वा॥ ७<br><br>यासि कासि वरारोहे भार्या मे भव सुन्दरि।<br>प्रेमयुक्तस्मितैव त्वं धर्मपत्नी भवाद्य मे॥ ८ | हे वामोरु! हे सुमुखि! तुम कोई देवी, मानुषी, गन्धर्वी, यक्षी, नागकन्या अथवा अप्सरा तो नहीं हो। हे वरारोहे! तुम जो कोई भी हो, मेरी भार्या बन जाओ। हे सुन्दरि! तुम प्रेमपूर्वक मुसकरा रही हो; अब मेरी धर्मपत्नी बन जाओ॥ ७-८॥ |
| सूत उवाच<br>राजा तां नाभिजानाति गङ्गेयमिति निश्चितम्।<br>महाभिषं समुत्पन्नं नृपं जानाति जाह्नवी॥ ९<br><br>पूर्वप्रेमसमायोगाच्छ्रुत्वा वाचं नृपस्य ताम्।<br>उवाच नारी राजानं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ १० | सूतजी बोले—राजा शन्तनु तो निश्चितरूपसे नहीं जान सके कि ये वे ही गंगा हैं, किंतु गंगाने उन्हें पहचान लिया कि ये शन्तनुके रूपमें उत्पन्न वही राजा महाभिष हैं। पूर्वकालीन प्रेमवश राजा शन्तनुके उस वचनको सुनकर उस स्त्रीने मन्द मुसकान करके यह वचन कहा॥ ९-१०॥ |
| स्त्र्युवाच<br>जानामि त्वां नृपश्रेष्ठ प्रतीपतनयं शुभम्।<br>का न वाञ्छति चार्वङ्गी भावित्वात्सदृशं पतिम्॥ ११ | स्त्री बोली—हे नृपश्रेष्ठ! मैं यह जानती हूँ कि आप महाराज प्रतीपके योग्य पुत्र हैं। अतः भला कौन ऐसी स्त्री होगी, जो संयोगवश अपने अनुरूप पुरुषको पाकर भी उसे पतिरूपमें स्वीकार न करेगी॥ ११॥ |
अ० ४] द्वितीय स्कन्ध १९१
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाग्बन्धेन नृपश्रेष्ठ वरिष्यामि पतिं किल।<br>शृणु मे समयं राजन् वृणोमि त्वां नृपोत्तम॥ १२ | हे नृपश्रेष्ठ! वचनबद्ध करके ही मैं आपको अपना पति स्वीकार करूँगी। हे राजन्! हे नृपोत्तम! अब आप मेरी शर्त सुनिये, जिससे मैं आपका वरण कर सकूँ॥ १२॥ |
| यच्च कुर्यामहं कार्यं शुभं वा यदि वाशुभम्।<br>न निषेध्या त्वया राजन्न वक्तव्यं तथाप्रियम्॥ १३<br><br>यदा च त्वं नृपश्रेष्ठ न करिष्यसि मे वचः।<br>तदा मुक्त्वा गमिष्यामि यथेष्टदेशं मारिष॥ १४ | हे राजन्! मैं भला-बुरा जो भी कार्य करूँ, आप मुझे मना नहीं करेंगे तथा न कोई अप्रिय बात ही कहेंगे। जिस समय आप मेरा यह वचन नहीं मानेंगे, उसी समय हे मान्य नृपश्रेष्ठ! मैं आपको त्यागकर जहाँ चाहूँगी, उस जगह चली जाऊँगी॥ १३-१४॥ |
| स्मृत्वा जन्म वसूनां सा प्रार्थनापूर्वकं हृदि।<br>महाभिषस्य प्रेमाथ विचिन्त्यैव च जाह्नवी॥ १५<br><br>तथेत्युक्ताथ सा देवी चकार नृपतिं पतिम्।<br>एवं वृता नृपेणाथ गङ्गा मानुषरूपिणी॥ १६<br><br>नृपस्य मन्दिरं प्राप्ता सुभगा वरवर्णिनी।<br>नृपतिस्तां समासाद्य चिक्रीडोपवने शुभे॥ १७ | उस समय प्रार्थनापूर्वक वसुओंके जन्म ग्रहण करनेका स्मरण करके तथा महाभिषकके पूर्वकालीन प्रेमको अपने मनमें सोच करके गंगाजीने राजा शन्तनुके 'तथास्तु' कहनेपर उन्हें अपना पति बनाना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार मानवीरूप धारण करनेवाली रूपवती तथा सुन्दर वर्णवाली गंगा महाराज शन्तनुकी पत्नी बनकर राजभवनमें पहुँच गयीं। राजा शन्तनु उन्हें पाकर सुन्दर उपवनमें विहार करने लगे॥ १५-१७॥ |
| सापि तं रमयामास भावज्ञा वै वराङ्गना।<br>न बुबोध नृपः क्रीडनातान्वर्षगणानथ॥ १८<br><br>स तया मृगशावाक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>सा सर्वगुणसम्पन्ना सोऽपि कामविचक्षणः॥ १९<br><br>रेमाते मन्दिरे दिव्ये रमानारायणाविव।<br>एवं गच्छति काले सा दधार नृपतेस्तदा॥ २० | भावोंको जाननेवाली वे सुन्दरी गंगा भी राजा शन्तनुके साथ विहार करने लगीं। उनके साथ महाराज शन्तनुको क्रीडा करते अनेक वर्ष बीत गये, पर उन्हें समय बीतनेका बोध ही न हुआ। वे उन मृगलोचनाके साथ उसी प्रकार विहार करते थे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। सर्वगुणसम्पन्ना गंगा तथा चतुर शन्तनु भी दिव्य भवनमें लक्ष्मी तथा नारायणकी भाँति विहार करने लगे॥ १८-१९ ½॥ |
| गर्भं गङ्गा वसुं पुत्रं सुषुवे चारुलोचना।<br>जातमात्रं सुतं वारि चिक्षेपैवं द्वितीयके॥ २१<br><br>तृतीयेऽथ चतुर्थेऽथ पञ्चमे षष्ठ एव च।<br>सप्तमे वा हते पुत्रे राजा चिन्तापरोऽभवत्॥ २२ | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गंगाजीने महाराज शन्तनुसे गर्भ धारण किया और यथासमय उन सुनयनीने एक वसुको पुत्ररूपमें जन्म दिया। उन्होंने उस बालकको उत्पन्न होते ही तत्काल जलमें फेंक दिया। इस प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें तथा सातवें पुत्रके मारे जानेपर राजा शन्तनुको बड़ी चिन्ता हुई॥ २०-२२॥ |
| किं करोम्यद्य वंशो मे कथं स्यात्सुस्थिरो भुवि।<br>सप्त पुत्रा हता नूनमनया पापरूपया॥ २३ | [उन्होंने सोचा—] अब मैं क्या करूँ? मेरा वंश इस पृथ्वीपर सुस्थिर कैसे होगा? इस पापिनीने मेरे सात पुत्र मार डाले। यदि इसे रोकता हूँ तो |
| १९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवारयामि यदि मां त्यक्त्वा यास्यति सर्वथा।<br>अष्टमोऽयं सुसम्प्राप्तो गर्भो मे मनसीप्सितः॥ २४<br><br>न वारयामि चेदद्य सर्वथेयं जले क्षिपेत्।<br>भविता वा न वा चाग्रे संशयोऽयं ममाद्भुतः॥ २५<br><br>सम्भवेऽपि च दुष्टेयं रक्षेद्यद्वा न रक्षयेत्।<br>एवं संशयिते कार्ये किं कर्तव्यं मयाधुना॥ २६ | यह मुझे त्यागकर चली जायगी। मेरा अभिलषित आठवाँ गर्भ भी इसे प्राप्त हो गया है। यदि अब भी मैं इसे रोकता नहीं हूँ तो यह इसे भी जलमें फेंक देगी। यह भी मुझे महान् सन्देह है कि भविष्यमें कोई और सन्तति होगी अथवा नहीं। यदि उत्पन्न हो भी तो पता नहीं कि यह दुष्टा उसकी रक्षा करेगी अथवा नहीं? इस संशयकी स्थितिमें मैं अब क्या करूँ?॥ २३–२६॥ |
| वंशस्य रक्षणार्थं हि यत्नः कार्यः परो मया।<br>ततः काले यदा जातः पुत्रोऽयमष्टमो वसुः॥ २७<br><br>मुनेर्येन हृता धेनुर्नन्दिनी स्त्रीजितेन हि।<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः पुत्रं तामुवाच पतन्पदे॥ २८ | वंशकी रक्षाके लिये मुझे कोई दूसरा यत्न करना ही होगा। तदनन्तर यथासमय जब वह आठवाँ 'द्यौ' नामक वसु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ, जिसने अपनी स्त्रीके वशीभूत होकर वसिष्ठकी नन्दिनी गौका हरण कर लिया था, तब उस पुत्रको देखकर राजा शान्तनु गंगाजीके पैरोंपर गिरते हुए कहने लगे॥ २७-२८॥ |
| दासोऽस्मि तव तन्वङ्गि प्रार्थयामि शुचिस्मिते।<br>पुत्रमेकं पुषाम्येनं देहि जीवितमद्य मे॥ २९ | हे तन्वंगि! मैं तुम्हारा दास हूँ। हे शुचिस्मिते! मैं प्रार्थना करता हूँ। मैं इस पुत्रको पालना चाहता हूँ, अतः इसे जीवित ही मुझे दे दो॥ २९॥ |
| हिंसिताः सप्त पुत्रा मे करभोरु त्वया शुभाः।<br>अष्टमं रक्ष सुश्रोणि पतामि तव पादयोः॥ ३० | हे करभोरु! तुमने मेरे सात सुन्दर पुत्रोंको मार डाला, किंतु इस आठवें पुत्रकी रक्षा करो। हे सुश्रोणि! मैं तुम्हारे पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ३०॥ |
| अन्यद्वै प्रार्थितं तेऽद्य ददाम्यथ च दुर्लभम्।<br>वंशो मे रक्षणीयोऽद्य त्वया परमशोभने॥ ३१ | हे परम रूपवती! इसके बदले तुम मुझसे जो माँगोगी, मैं वह दुर्लभ वस्तु भी तुम्हें दूँगा। अब तुम मेरे वंशकी रक्षा करो॥ ३१॥ |
| अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे वेदविदो विदुः।<br>तस्मादद्य वरारोहे प्रार्थयाम्यष्टमं सुतम्॥ ३२ | वेदविद् विद्वानोंने कहा है कि पुत्रहीन मनुष्यकी स्वर्गमें भी गति नहीं होती। इसी कारण हे सुन्दरि! अब मैं इस आठवें पुत्रके लिये याचना करता हूँ॥ ३२॥ |
| इत्युक्तापि गृहीत्वा तं यदा गन्तुं समुत्सुका।<br>तदातिकुपतो राजा तामुवाचातिदुःखितः॥ ३३<br><br>पापिष्ठे किं करोम्यद्य निरयान्न बिभेषि किम्।<br>कासि पापकराणां त्वं पुत्री पापरता सदा॥ ३४<br><br>यथेच्छं गच्छ वा तिष्ठ पुत्रो मे स्थीयतामिह।<br>किं करोमि त्वया पापे वंशान्तकरयानया॥ ३५ | राजा शान्तनुके ऐसा कहनेपर भी जब गंगा उस पुत्रको लेकर जानेको उद्यत हुईं, तब उन्होंने अत्यन्त कुपित एवं दुःखित होकर उनसे कहा—'हे पापिनि! अब मैं क्या करूँ? क्या तुम नरकसे भी नहीं डरती? तुम कौन हो? लगता है कि तुम पापियोंकी पुत्री हो, तभी तो तुम सदा पापकर्ममें लगी रहती हो, अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ या रहो, किंतु यह पुत्र यहीं रहेगा। हे पापिनि! अपने वंशका अन्त करनेवाली ऐसी तुम्हें रखकर भी मैं क्या करूँगा?'॥ ३३–३५॥ |
| अ० ४ ] | द्वितीय स्कन्ध | १९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं वदति भूपाले सा गृहीत्वा सुतं शिशुम्।<br>गच्छन्ती वचनं कोपसंयुता तमुवाच ह॥ ३६<br><br>पुत्रकामा सुतं त्वेनं पालयामि वने गता।<br>समयो मे गमिष्यामि वचनं ह्यन्यथाकृतम्॥ ३७<br><br>गङ्गां मां वै विजानीहि देवकार्यार्थमागताम्।<br>वसवस्तु पुरा शप्ता वसिष्ठेन महात्मना॥ ३८<br><br>व्रजन्तु मानुषीं योनिं स्थितां चिन्तातुरास्तु माम्।<br>दृष्ट्वेदं प्रार्थयामासुर्जननी नो भवानघे॥ ३९<br><br>तेभ्यो दत्त्वा वरं जाता पत्नी ते नृपसत्तम।<br>देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं जानीहि सम्भवो मम॥ ४० | राजाके ऐसा कहनेपर उस नवजात शिशुको लेकर जाती हुई गंगाने क्रोधपूर्वक उनसे कहा—पुत्रकी कामनावाली मैं भी इस पुत्रको वनमें ले जाकर पालूंगी। शर्तके अनुसार अब मैं चली जाऊँगी; क्योंकि आपने अपना वचन तोड़ा है। [हे राजन्!] मुझे आप गंगा जानिये; देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेके लिये ही मैं यहाँ आयी थी। महात्मा वसिष्ठने प्राचीन कालमें आठों वसुओंको शाप दिया था कि तुम सब मनुष्ययोनिमें जाकर जन्म लो। तब चिन्तासे व्याकुल होकर आठों वसु मुझे वहाँ स्थित देखकर कहने लगे—हे अनघे! आप हमारी माता बनें। अतः हे नृपश्रेष्ठ! उन्हें वरदान देकर मैं आपकी पत्नी बन गयी। आप ऐसा समझ लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही मेरा जन्म हुआ है॥ ३६—४०॥ |
| सप्त ते वसवः पुत्रा मुक्ताः शापाद्बृहैस्तु ते।<br>कियन्तं कालमेकोऽयं तव पुत्रो भविष्यति॥ ४१<br><br>गङ्गादत्तमिमं पुत्रं गृहाण शन्तनो स्वयम्।<br>वसुं देवं विदित्वैनं सुखं भुंक्ष्व सुतोद्भवम्॥ ४२<br><br>गाङ्गेयोऽयं महाभाग भविष्यति बलाधिकः।<br>अद्य तत्र नयाम्येनं यत्र त्वं वै मया वृतः॥ ४३ | वे सातों वसु तो आपके पुत्र बनकर ऋषिके शापसे विमुक्त हो गये। यह आठवाँ वसु कुछ समयतक आपके पुत्ररूपमें विद्यमान रहेगा। अतः हे महाराज शन्तनु! मुझ गंगाके द्वारा दिये हुए पुत्रको आप स्वीकार कीजिये। इसे आठवाँ वसु जानते हुए आप पुत्र-सुखका भोग करें; क्योंकि हे महाभाग! यह 'गांगेय' बड़ा ही बलवान् होगा। अब इसे मैं वहीं ले जा रहीं हूँ, जहाँ मैंने आपका पतिरूपसे वरण किया था॥ ४१—४३॥ |
| दास्यामि यौवनप्राप्तं पालयित्वा महीपते।<br>न मातुरहितः पुत्रो जीवेन्न च सुखी भवेत्॥ ४४ | हे राजन्! इसे पालकर इसके युवा होनेपर मैं पुनः आपको दे दूँगी; क्योंकि मातृहीन बालक न जी पाता है और न सुखी रहता है॥ ४४॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा तं गृहीत्वा च बालकम्।<br>राजा चातीव दुःखार्तः संस्थितो निजमन्दिरे॥ ४५ | ऐसा कहकर उस बालकको लेकर गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। राजा भी अत्यन्त दुःखित होकर अपने राजभवनमें रहने लगे॥ ४५॥ |
| भार्याविरहजं दुःखं तथा पुत्रस्य चाद्भुतम्।<br>सर्वदा चिन्तयन्नास्ते राज्यं कुर्वन्महीपतिः॥ ४६ | महाराज शन्तनु स्त्री तथा पुत्रके वियोगजन्य महान् कष्टका सदा अनुभव करते हुए भी किसी प्रकार राज्यकार्य सँभालने लगे॥ ४६॥ |
| एवं गच्छति कालेऽथ नृपतिर्मृगयां गतः।<br>निघ्नन्मृगगणान्बाणैर्महिषान्सूकरानपि ॥ ४७<br><br>गङ्गातीरमनुप्राप्तः स राजा शन्तनुस्तदा।<br>नदीं स्तोकजलां दृष्ट्वा विस्मितः स महीपतिः॥ ४८ | कुछ समय बीतनेपर महाराज आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ अनेक प्रकारके मृगगणों, भैंसों तथा सूकरोंको अपने बाणोंसे मारते हुए वे गंगाजीके तटपर जा पहुँचे। उस नदीमें बहुत थोड़ा जल देखकर वे राजा शन्तनु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४७-४८॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 A
| १९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्रापश्यत्कुमारं तं मुञ्चन्तं विशिखान्बहून्।<br>आकृष्य च महाचापं क्रीडन्तं सरितस्तटे ॥ ४९<br><br>तं वीक्ष्य विस्मितो राजा न स्म जानाति किञ्चन।<br>नोपलेभे स्मृतिं भूपः पुत्रोऽयं मम वा न वा॥ ५० | उन्होंने वहाँ नदीके किनारे खेलते हुए एक बालकको महान् धनुषको खींचकर बहुतसे बाणोंको छोड़ते हुए देखा। उसे देखकर राजा शन्तनु बड़े विस्मित हुए और कुछ भी नहीं जान पाये। उन्हें यह भी स्मरण न हो पाया कि यह मेरा पुत्र है या नहीं॥ ४९-५०॥ |
| दृष्ट्वाप्यमानुषं कर्म बाणेषु लघुहस्तताम्।<br>विद्यां वाप्रतिमां रूपं तस्य वै स्मरसन्निभम् ॥ ५१<br><br>पप्रच्छ विस्मितो राजा कस्य पुत्रोऽसि चानघ।<br>नोवाच किञ्चिद्वीरोऽसौ मुञ्चञ्छिलीमुखानथ ॥ ५२<br><br>अन्तर्धानं गतः सोऽथ राजा चिन्तातुरोऽभवत्।<br>कोऽयं मम सुतो बालः किं करोमि व्रजामि कम् ॥ ५३ | उस बालकके अतिमानवीय कृत्य, बाण चलानेके हस्तलाघव, असाधारण विद्या और कामदेवके समान सुन्दर रूपको देखकर अत्यन्त विस्मित राजाने उससे पूछा—‘हे निर्दोष बालक! तुम किसके पुत्र हो?’ किंतु उस वीर बालकने कोई उत्तर नहीं दिया और वह बाण चलाता हुआ अन्तर्धान हो गया। तब राजा शन्तनु चिन्तित होकर यह सोचने लगे कि कहीं यह मेरा ही पुत्र तो नहीं है? अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ?॥ ५१—५३॥ |
| गङ्गां तुष्टाव भूपालः स्थितस्तत्र समाहितः।<br>दर्शनं सा ददौ चाथ चारुरूपा यथा पुरा ॥ ५४ | जब उन्होंने वहीं खड़े होकर समाहितचित्तसे गंगाजीकी स्तुति की तब गंगाजीने प्रसन्न होकर पहलेके ही समान एक रूपवती स्त्रीके रूपमें उन्हें दर्शन दिया॥ ५४॥ |
| दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं बभाषे नृपतिः स्वयम्।<br>कोऽयं गङ्गे गतो बालो मम त्वं दर्शयाधुना ॥ ५५ | सर्वांगसुन्दरी गंगाजीको देखकर राजा शन्तनु बोले—हे गंगे! यह बालक कौन था और कहाँ चला गया? आप उसे मुझको दिखा दीजिये॥ ५५॥ |
| गङ्गोवाच<br>पुत्रोऽयं तव राजेन्द्र रक्षितश्चाष्टमो वसुः।<br>ददामि तव हस्ते तु गाङ्गेयोऽयं महातपाः॥ ५६ | गंगाजी बोलीं—हे राजेन्द्र! यह आपका ही पुत्र आठवाँ वसु है, जिसे मैंने पाला है। इस महातपस्वी गांगेयको मैं आपको सौंपती हूँ॥ ५६॥ |
| कीर्तिकर्ता कुलस्यास्य भविता तव सुव्रत।<br>पाठितस्त्वखिलान्वेदान्धनुर्वेदं च शाश्वतम् ॥ ५७ | हे सुव्रत! यह बालक आपके इस कुलकी कीर्तिको बढ़ानेवाला होगा। इसे सभी वेदशास्त्र एवं शाश्वत धनुर्वेदकी शिक्षा दी गयी है॥ ५७॥ |
| वसिष्ठस्याश्रमे दिव्ये संस्थितोऽयं सुतस्तव।<br>सर्वविद्याविधानज्ञः सर्वार्थकुशलः शुचिः॥ ५८ | आपका यह पुत्र वसिष्ठजीके दिव्य आश्रममें रहा है और सब विद्याओंमें पारंगत, कार्यकुशल एवं सदाचारी है॥ ५८॥ |
| यद्वेद जामदग्न्योऽसौ तद्वेदायं सुतस्तव।<br>गृहाण गच्छ राजेन्द्र सुखी भव नराधिप ॥ ५९ | जिस विद्याको जमदग्निपुत्र परशुराम जानते हैं, उसे आपका यह पुत्र जानता है। हे राजेन्द्र! हे नराधिप! आप इसे ग्रहण कीजिये, जाइये और सुखपूर्वक रहिये॥ ५९॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा दत्त्वा पुत्रं नृपाय वै।<br>नृपतिस्तु मुदा युक्तो बभूवातिसुखान्वितः ॥ ६० | ऐसा कहकर तथा वह पुत्र राजाको देकर गंगाजी अन्तर्धान हो गयीं। उसे पाकर राजा शन्तनु बहुत आनन्दित और सुखी हुए॥ ६०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 B
| अ० ५ ] | द्वितीय स्कन्ध | १९५ |
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| समालिङ्ग्य सुतं राजा समाघ्राय च मस्तकम्।<br>समारोप्य रथे पुत्रं स्वपुरं स प्रचक्रमे॥ ६१ | राजा शन्तनु पुत्रका आलिंगन करके तथा उसका मस्तक सूँघकर और उसे अपने रथपर बैठाकर अपने नगरकी ओर चल पड़े॥ ६१॥ |
| गत्वा गजाह्वयं राजा चकारोत्सवमुत्तमम्।<br>दैवज्ञं च समाहूय पप्रच्छ च शुभं दिनम्॥ ६२ | राजाने हस्तिनापुर जाकर महान् उत्सव किया और दैवज्ञको बुलाकर शुभ मुहूर्त पूछा॥ ६२॥ |
| समाहूय प्रजाः सर्वाः सचिवान्सर्वशः शुभान्।<br>यौवराज्येऽथ गाङ्गेयं स्थापयामास पार्थिवः॥ ६३ | राजा शन्तनुने सब प्रजाजनों तथा सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंको बुलाकर गंगापुत्रको युवराज पदपर बैठा दिया॥ ६३॥ |
| कृत्वा तं युवराजानं पुत्रं सर्वगुणान्वितम्।<br>सुखमास स धर्मात्मा न सस्मार च जाह्नवीम्॥ ६४ | उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको युवराज बनाकर वे धर्मात्मा शन्तनु सुखपूर्वक रहने लगे। अब उन्हें गंगाजीकी भी सुधि नहीं रही॥ ६४॥ |
| सूत उवाच<br>एतद्वः कथितं सर्वं कारणं वसुशापजम्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिं जाह्नव्याः सम्भवं तथा॥ ६५ | सूतजी बोले— इस प्रकार मैंने आप सबको वसुओंके शापका कारण, गंगाके प्राकट्य तथा भीष्मकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कह दिया॥ ६५॥ |
| गङ्गावतरणं पुण्यं वसूनां सम्भवं तथा।<br>यः शृणोति नरः पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥ ६६ | जो मनुष्य गंगावतरण तथा वसुओंके उद्भवकी इस पवित्र कथाको सुनता है, वह सब प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६६॥ |
| पुण्यं पवित्रमाख्यानं कथितं मुनिसत्तमाः।<br>यथा मया श्रुतं व्यासात्पुराणं वेदसम्मितम्॥ ६७ | हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने यह पवित्र, पुण्यदायक तथा वेद-सम्मत पौराणिक आख्यान जैसा व्यासजीके मुखारविन्दसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया॥ ६७॥ |
| श्रीमद्भागवतं पुण्यं नानाख्यानकथान्वितम्।<br>द्वैपायनमुखोद्भूतं पञ्चलक्षणसंयुतम्॥ ६८ | द्वैपायन व्यासजीके मुखसे निःसृत यह श्रीमद्देवी-भागवतमहापुराण बड़ा ही पवित्र, अनेकानेक कथाओंसे परिपूर्ण तथा सर्ग-प्रतिसर्ग आदि पाँच पुराण-लक्षणोंसे युक्त है॥ ६८॥ |
| शृण्वतां सर्वपापघ्नं शुभदं सुखदं तथा।<br>इतिहासमिमं पुण्यं कीर्तितं मुनिसत्तमाः॥ ६९ | हे मुनिश्रेष्ठो! सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले, कल्याणकारी, सुखदायक तथा पुण्यप्रद इस इतिहासका मैंने आपलोगोंसे वर्णन कर दिया॥ ६९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
मत्स्यगन्धा (सत्यवती)-को देखकर राजा शन्तनुका मोहित होना, भीष्मद्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा करना और शन्तनुका सत्यवतीसे विवाह
| ऋषय ऊचुः<br>वसूनां सम्भवः सूत कथितः शापकारणात्।<br>गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिः कथिता लोमहर्षणे॥ १ | ऋषिगण बोले— हे लोमहर्षणतनय सूतजी! आपने शापवश अष्टवसुओंके जन्म तथा गंगाजीकी उत्पत्तिका वर्णन किया। हे धर्मज्ञ! व्यासजीकी सत्यवती |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—7 C
| १९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| माता व्यासस्य धर्मज्ञ नाम्ना सत्यवती सती।<br>कथं शन्तनुना प्राप्ता भार्या गन्धवती शुभा॥ २<br>तन्ममाचक्ष्व विस्तारं दाशपुत्री कथं वृता।<br>राज्ञा धर्मवरिष्ठेन संशयं छिन्धि सुव्रत॥ ३ | नामकी साध्वी माता जो पवित्र गन्धवाली थीं, वे राजा शन्तनुको पत्नीरूपसे कैसे प्राप्त हुईं? यह हमें विस्तारके साथ बताइये। महान् धर्मनिष्ठ राजा शन्तनुने निषादपुत्रीके साथ विवाह क्यों किया? हे सुव्रत! यह बताकर आप हमारे सन्देहका निवारण कीजिये॥ १-३॥ | | सूत उवाच<br>शन्तनुर्नाम राजर्षिर्मृगयानिरतः सदा।<br>वनं जगाम निघ्नन्वौ मृगांश्च महिषान् रुरून्॥ ४ | सूतजी बोले— राजर्षि शन्तनु सदा आखेट करनेमें तत्पर रहते थे। वे वनमें जाकर मृग, महिष तथा रुरुमृगोंका वध किया करते थे॥ ४॥ | | चत्वार्येव तु वर्षाणि पुत्रेण सह भूपतिः।<br>रममाणः सुखं प्राप कुमारेण यथा हरः॥ ५ | राजा शन्तनु केवल चार वर्षतक भीष्मके साथ उसी प्रकार सुखसे रहे, जिस प्रकार भगवान् शंकर कार्तिकेयके साथ आनन्दपूर्वक रहते थे॥ ५॥ | | एकदा विक्षिपन्बाणान्विनिघ्नन्खड्गसूकरान्।<br>स कदाचिद्वनं प्राप्तः कालिन्दीं सरितां वराम्॥ ६ | एक बार वे महाराज शन्तनु वनमें बाण छोड़ते हुए बहुतसे गैंडों तथा सूकरोंका वध करते हुए किसी समय नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाके किनारे जा पहुँचे॥ ६॥ | | महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम्।<br>तस्य प्रभवमन्विच्छन्सञ्चचार वनं तदा॥ ७ | राजाने वहाँपर कहींसे आती हुई उत्तम गन्धको सूँघा। तब उस सुगन्धिके उद्गमका पता लगानेके लिये वे वनमें विचरने लगे॥ ७॥ | | न मन्दारस्य गन्धोऽयं मृगनाभिमदस्य न।<br>चम्पकस्य न मालत्या न केतक्या मनोहरः॥ ८ | वे बड़े असमंजसमें पड़ गये कि यह मनोहर सुगन्धि न मन्दारपुष्पकी है, न कस्तूरीकी है, न मालतीकी है, न चम्पाकी है और न तो केतकीकी ही है!॥ ८॥ | | न चानुभूतपूर्वोऽयं वाति गन्धवहः शुभः।<br>कुतोऽयमेति वायुर्वै मम घ्राणविमोहनः॥ ९ | मैंने ऐसी अनुपम सुगन्धिका पूर्वमें कभी नहीं अनुभव किया था। [इस दिव्य सुगन्धिको लेकर] सुन्दर वायु बह रही है। मेरी घ्राणेन्द्रियको मुग्ध कर देनेवाली यह वायु कहाँसे आ रही है?॥ ९॥ | | इति सञ्चिन्त्यमानोऽसौ बभ्राम वनमण्डलम्।<br>मोहितो गन्धलोभेन शन्तनुः पवनानुगः॥ १० | इस प्रकार सोचते-विचारते राजा शन्तनु गन्धके लोभसे मोहित सुगन्धित वायुका अनुसरण करते हुए वनप्रदेशमें विचरण करने लगे॥ १०॥ | | स ददर्श नदीतीरे संस्थितां चारुदर्शनाम्।<br>शृङ्गाररहितां कान्तां सुस्थितां मलिनाम्बराम्॥ ११ | उन्होंने यमुनानदीके तटपर बैठी हुई एक दिव्यदर्शनवाली स्त्रीको देखा, जो मलिन वस्त्र धारण करने और शृंगार न करनेपर भी मनोहर दीख रही थी॥ ११॥ | | दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मितः स महीपतिः।<br>अस्या देहस्य गन्धोऽयमिति सञ्जातनिश्चयः॥ १२ | उस श्याम नयनोंवाली स्त्रीको देखकर राजा आश्चर्यमें पड़ गये और उन्हें इस बातका विश्वास हो गया कि यह सुगन्धि इसी स्त्रीके शरीरकी है॥ १२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 7 D
अ० ५] द्वितीय स्कन्ध १९७
अ० ५] द्वितीय स्कन्ध १९७
| तदद्भुतं रूपमतीव सुन्दरं<br>तथैव गन्धोऽखिललोकसम्मतः।<br>वयश्च तादृङ् नवयौवनं शुभं<br>दृष्ट्वैव राजा किल विस्मितोऽभवत्॥१३ | उसका अद्भुत एवं अतिशय सुन्दर रूप, सब प्राणियोंका मन स्वाभाविक रूपसे अपनी ओर आकर्षित करनेवाली सुगन्धि, उसकी अवस्था तथा उसका वैसा शुभ नवयौवन देखकर राजा शान्तनुको महान् विस्मय हुआ॥१३॥ |
|---|---|
| केयं कुतो वा समुपागताधुना<br>देवाङ्गना वा किमु मानुषी वा।<br>गन्धर्वपुत्री किल नागकन्या<br>जाने कथं गन्धवतीं नु कामिनीम्॥१४ | यह कौन है और इस समय यह कहाँसे आयी है? यह कोई देवांगना है या मानवी स्त्री, यह कोई गन्धर्वकन्या अथवा नागकन्या है? मैं इस सुगन्धा कामिनीके विषयमें कैसे जानकारी प्राप्त करूँ?॥१४॥ |
| सञ्चिन्त्य चैवं मनसा नृपोऽसौ<br>न निश्चयं प्राप यदा ततः स्वयम्।<br>गङ्गां स्मरन्कामवशं गतोऽथ<br>पप्रच्छ कान्तां तटसंस्थितां च॥१५<br>कासि प्रिये कस्य सुतासि कस्मा-<br>दिह स्थिता त्वं विजने वरोरु।<br>एकाकिनी किं वद चारुनेत्रे<br>विवाहिता वा न विवाहितासि॥१६ | इस प्रकार विचार करके भी वे राजा जब कुछ निश्चय नहीं कर सके, तब तत्क्षण गंगाजीका स्मरण करते हुए वे कामके वशीभूत हो गये और तटपर बैठी हुई उस सुन्दरीसे उन्होंने पूछा—हे प्रिये! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? हे वरोरु! तुम इस निर्जन वनमें क्यों बैठी हो? हे सुनयने! क्या तुम अकेली ही हो? तुम विवाहिता हो या कुमारी; यह बताओ॥१५-१६॥ |
| सञ्जातकामोऽहमरालनेत्रे<br>त्वां वीक्ष्य कान्तां च मनोरमां च।<br>ब्रूहि प्रिये यासि चिकीर्षसि त्वं<br>किं चेति सर्वं मम विस्तरेण॥१७ | हे अरालनेत्रे! तुम जैसी मनोरमा स्त्रीको देखकर मैं कामातुर हो गया हूँ। हे प्रिये! विस्तारपूर्वक मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो?॥१७॥ |
| इत्येवमुक्ता सुदती नृपेण<br>प्रोवाच तं सस्मितमम्बुजेक्षणा।<br>दाशस्य पुत्रीं त्वमवेहि राजन्<br>कन्यां पितुः शासनसंस्थितां च॥१८ | महाराज शान्तनुके वचन सुनकर वह सुन्दर दाँतोंवाली तथा कमलके समान नयनोंवाली स्त्री मुसकराकर बोली—हे राजन्! आप मुझे निषादकन्या और अपने पिताकी आज्ञामें रहनेवाली कन्या समझें॥१८॥ |
| तरीमिमां धर्मनिमित्तमेव<br>संवाहयामीह जले नृपेन्द्र।<br>पिता गृहे मेऽद्य गतोऽस्ति कामं<br>सत्यं ब्रवीम्यर्थपते तवाग्रे॥१९ | हे नृपेन्द्र! मैं अपने धर्मका अनुसरण करती हुई जलमें यह नौका चलाती हूँ। हे अर्थपते! पिताजी अभी ही घर गये हैं। आपके सम्मुख यह बातें मैंने सत्य कही हैं॥१९॥ |
| इत्येवमुक्त्वा विरराम बाला<br>कामातुरस्तां नृपतिर्बभाषे।<br>कुरुप्रवीरं कुरु मां पतिं त्वं<br>वृथा न गच्छेन्ननु यौवनं ते॥२० | यह कहकर वह निषादकन्या मौन हो गयी। तब कामसे पीड़ित महाराज शान्तनुने उससे कहा—मुझ कुरुवंशी वीरको तुम अपना पति बना लो, जिससे तुम्हारा यौवन व्यर्थ न जाय॥२०॥ |
| न चास्ति पत्नी मम वै द्वितीया<br>त्वं धर्मपत्नी भव मे मृगाक्षि।<br>दासोऽस्मि तेऽहं वशगः सदैव<br>मनोभवस्तापयति प्रिये माम्॥२१ | मेरी कोई दूसरी पत्नी नहीं है। अतः हे मृगनयनी! तुम मेरी धर्मपत्नी बन जाओ। हे प्रिये! मैं सर्वदाके लिये तुम्हारा वशवर्ती दास बन जाऊँगा। मुझे कामदेव पीड़ित कर रहा है॥२१॥ |
| १९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| गता प्रिया मां परिहृत्य कान्ता<br>नान्या वृताहं विधुरोऽस्मि कान्ते।<br>त्वां वीक्ष्य सर्वावयवातिरम्यां<br>मनो हि जातं विवशं मदीयम्॥ २२ | मेरी प्रियतमा मुझे छोड़कर चली गयी है, तबसे मैंने अपना दूसरा विवाह नहीं किया। हे कान्ते! मैं इस समय विधुर हूँ। तुम जैसी सर्वांगसुन्दरीको देखकर मेरा मन अपने वशमें नहीं रह गया है॥ २२॥ | | श्रुत्वामृतास्वादरसं नृपस्य<br>वचोऽतिरम्यं खलु दाशकन्या।<br>उवाच तं सात्त्विकभावयुक्ता<br>कृत्वातिधैर्यं नृपतिं सुगन्धा॥ २३<br>यदात्थ राजन् मयि तत्तथैव<br>मन्येऽहमेतत्तु यथा वचस्ते।<br>नास्मि स्वतन्त्रा त्वमवेहि कामं<br>दाता पिता मेऽर्थय तं त्वमाशु॥ २४ | राजाकी अमृतरसके समान मधुर तथा मनोहारी बात सुनकर वह दाशकन्या सुगन्धा सात्त्विक भावसे युक्त होकर धैर्य धारण करके राजासे बोली—हे राजन्! आपने मुझसे जो कुछ कहा, वह यथार्थ है; किंतु आप अच्छी तरह जान लीजिये कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। मेरे पिताजी ही मुझे दे सकते हैं। अतएव आप उन्हींसे मेरे लिये याचना कीजिये॥ २३-२४॥ | | न स्वैरिणीहास्म्यपि दाशपुत्री<br>पितुर्वशेऽहं सततं चरामि।<br>स चेद्ददाति प्रथितः पिता मे<br>गृहाण पाणिं वशगास्मि तेऽहम्॥ २५ | मैं एक निषादकी कन्या होती हुई भी स्वेच्छाचारिणी नहीं हूँ। मैं सदा पिताके वशमें रहती हुई सब काम करती हूँ। यदि मेरे पिताजी मुझे आपको देना स्वीकार कर लें तब आप मेरा पाणिग्रहण कर लीजिये और मैं सदाके लिये आपके अधीन हो जाऊँगी॥ २५॥ | | मनोभवस्त्वां नृप किं दुनोति<br>यथा पुनर्मां नवयौवनां च।<br>दुनोति तत्रापि हि रक्षणीया<br>धृतिः कुलाचारपरम्परासु॥ २६ | हे राजन्! परस्पर आसक्त होनेपर भी कुलकी मर्यादा तथा परम्पराके अनुसार धैर्य धारण करना चाहिये॥ २६॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्या नृपतिः काममोहितः।<br>गतो दाशपतेर्गेहं तस्या याचनहेतवे॥ २७ | **सूतजी बोले—**उस सुगन्धाकी यह बात सुनकर कामातुर राजा उसे माँगनेके लिये निषादराजके घर गये॥ २७॥ | | दृष्ट्वा नृपतिमायान्तं दाशोऽतिविस्मयं गतः।<br>प्रणामं नृपतेः कृत्वा कृताञ्जलिरभाषत॥ २८ | इस प्रकार महाराज शन्तनुको अपने घर आया देखकर निषादराजको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर वह बोला—॥ २८॥ | | दाश उवाच<br>दासोऽस्मि तव भूपाल कृतार्थोऽहं तवागमे।<br>आज्ञां देहि महाराज यदर्थमिह चागमः॥ २९ | **निषादने कहा—**हे राजन्! मैं आपका दास हूँ। आपके आगमनसे मैं कृतकृत्य हो गया। हे महाराज! आप जिस कार्यके लिये आये हों, मुझे आज्ञा दीजिये॥ २९॥ | | राजोवाच<br>धर्मपत्नीं करिष्यामि सुतामेतां तवानघ।<br>त्वया चेद्दीयते मह्यं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३० | **राजा बोले—**हे अनघ! यदि आप अपनी यह कन्या मुझे प्रदान कर दें तो मैं इसे अपनी धर्मपत्नी बना लूँगा; यह मैं सत्य कह रहा हूँ॥ ३०॥ | | दाश उवाच<br>कन्यारत्नं मदीयं चेद्यत्त्वं प्रार्थयसे नृप।<br>दातव्यं तु प्रदास्यामि न त्वदेयं कदाचन॥ ३१<br>तस्याः पुत्रो महाराज त्वदन्ते पृथिवीपतिः।<br>सर्वथा चाभिषेक्तव्यो नान्यः पुत्रस्तवेति वै॥ ३२ | **निषादने कहा—**हे महाराज! यदि आप मेरे इस कन्यारत्नके लिये प्रार्थना कर रहे हैं तो मैं अवश्य दूँगा; क्योंकि देनेयोग्य वस्तु तो कभी अदेय नहीं होती है; किंतु हे महाराज! आपके बाद इस कन्याका पुत्र ही राजाके रूपमें अभिषिक्त होना चाहिये, आपका दूसरा पुत्र नहीं॥ ३१-३२॥ |
अ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १९९
अ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १९९
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| श्रुत्वा वाक्यं तु दाशस्य राजा चिन्तातुरोऽभवत्।<br>गाङ्गेयं मनसा कृत्वा नोवाच नृपतिस्तदा॥ ३३ | निषादकी बात सुनकर राजा शन्तनु चिन्तित हो उठे। उस समय मनमें भीष्मका स्मरण करके राजा कुछ भी उत्तर न दे सके॥ ३३॥ |
| कामातुरो गृहं प्राप्तश्चिन्ताविष्टो महीपतिः।<br>न सस्नौ बुभुजे नाथ न सुष्वाप गृहं गतः॥ ३४ | तब कामातुर तथा चिन्तित राजा राजमहलमें चले गये। उन्होंने घर जानेपर न स्नान किया, न भोजन किया और न शयन ही किया॥ ३४॥ |
| चिन्तातुरं तु तं दृष्ट्वा पुत्रो देवव्रतस्तदा।<br>गत्वापृच्छन्महीपालं तदसन्तोषकारणम्॥ ३५<br>दुर्जयः कोऽस्ति शत्रुस्ते करोमि वशगं तव।<br>का चिन्ता नृपशार्दूल सत्यं वद नृपोत्तम॥ ३६ | तब उन्हें चिन्तित देखकर पुत्र देवव्रत राजाके पास जाकर उनकी इस चिन्ताका कारण पूछने लगे—हे नृपश्रेष्ठ! कौन-सा ऐसा शत्रु है जिसको आप जीत न सके; मैं उसे आपके अधीन कर दूँ। हे नृपोत्तम! आपकी क्या चिन्ता है, मुझे सही-सही बताइये॥ ३५-३६॥ |
| किं तेन जातेन सुतेन राजन्<br>दुःखं न जानाति न नाशयेद्यः।<br>ऋणं ग्रहीतुं समुपागतोऽसौ<br>प्राग्जन्मजं नात्र विचारणास्ति॥ ३७ | हे राजन्! भला उस उत्पन्न हुए पुत्रसे क्या लाभ? जो पैदा होकर अपने पिताका दुःख न समझे तथा उसको दूर करनेका उपाय न कर सके। ऐसा कुपुत्र तो पूर्वजन्मके किसी ऋणको वापस लेनेके लिये यहाँ आता है; इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ३७॥ |
| विमुच्य राज्यं रघुनन्दनोऽपि<br>ताताज्ञया दाशरथिस्तु रामः।<br>वनं गतो लक्ष्मणजानकीभ्यां<br>सहैव शैलं किल चित्रकूटम्॥ ३८ | दशरथके पुत्र रामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञासे राज्य त्यागकर लक्ष्मण और सीताके साथ वनमें चले गये तथा चित्रकूटपर्वतपर निवास करने लगे॥ ३८॥ |
| सुतो हरिश्चन्द्रनृपस्य राजन्<br>यो रोहितश्चेति प्रसिद्धनामा।<br>क्रीतोऽथ पित्रा विपणोद्यतश्च<br>दासार्पितो विप्रगृहे तु नूनम्॥ ३९ | इसी प्रकार हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्रका पुत्र जो रोहित नामसे प्रसिद्ध था, अपने पिताके इच्छानुसार बिकनेके लिये तत्पर हो गया और खरीदा हुआ वह बालक ब्राह्मणके घरमें सेवकका कार्य करने लगा॥ ३९॥ |
| तथाजिगर्तस्य सुतो वरिष्ठो<br>नाम्ना शुनःशेप इति प्रसिद्धः।<br>क्रीतस्तु पित्राप्यथ यूपबद्धः<br>सम्मोचितो गाधिसुतेन पश्चात्॥ ४० | 'अजीगर्त' ब्राह्मणका एक श्रेष्ठ पुत्र था, जो शुनःशेप नामसे प्रसिद्ध था। खरीद लिये जानेपर वह पिताके द्वारा यूपमें बाँध दिया गया, जिसे बादमें विश्वामित्रने छुड़ाया था॥ ४०॥ |
| पित्राज्ञया जामदग्न्येन पूर्वं<br>छिन्नं शिरो मातुरिति प्रसिद्धम्।<br>अकार्यमप्याचरितं च तेन<br>गुरोरनुज्ञा च गरीयसी कृता॥ ४१ | पूर्वकालमें पिताकी आज्ञासे ही परशुरामने अपनी माताका सिर काट दिया था, ऐसा लोकमें प्रसिद्ध है। इस अनुचित कर्मको करके भी उन्होंने पिताकी आज्ञाका महत्त्व बढ़ाया था॥ ४१॥ |
| इदं शरीरं तव भूपते न<br>क्षमोऽस्मि नूनं वद किं करोम्यहम्।<br>न शोचनीयं मयि वर्तमाने-<br>ऽप्यसाध्यमर्थं प्रतिपादयाम्यदः॥ ४२ | हे पृथ्वीपते! यह मेरा शरीर आपका ही है। यद्यपि मैं समर्थ नहीं हूँ; फिर भी आप कहिये मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मेरे रहते आपको किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये। मैं आपका असाध्य कार्य भी तत्काल पूरा करूँगा॥ ४२॥ |
| २०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| प्रब्रूहि राजंस्तव कास्ति चिन्ता निवारयाम्यद्य धनुर्गृहीत्वा।<br>देहेन मे चेच्चरितार्थता वा भवत्वमोघा भवतश्चिकीर्षा॥ ४३<br>धिक् तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थं क्षमोऽपि सन् प्रतिपादयेन्न।<br>जातेन किं तेन सुतेन कामं पितुर्न चिन्तां हि समुद्धरेद्यः॥ ४४ | हे राजन्! आप बताइये कि आपको किस बातकी चिन्ता है? मैं अभी धनुष लेकर उसका निवारण कर दूँगा। यदि मेरे इस शरीरसे भी आपका कार्य सिद्ध हो सके तो मैं आपकी अभिलाषा पूर्ण करनेको तत्पर हूँ। उस पुत्रको धिक्कार है, जो समर्थ होकर भी अपने पिताकी इच्छाको पूर्ण नहीं करता। जिस पुत्रके द्वारा पिताकी चिन्ता दूर न हुई, उस पुत्रका जन्म लेनेका क्या प्रयोजन ?॥ ४३-४४॥ |
| सूत उवाच<br>निशम्येति वचस्तस्य पुत्रस्य शन्तनुर्नृपः।<br>लज्जमानस्तु मनसा तमाह त्वरितं सुतम्॥ ४५ | सूतजी बोले—अपने पुत्र गांगेयका वचन सुनकर महाराज शन्तनु मनमें लज्जित होते हुए उससे शीघ्र ही कहने लगे॥ ४५॥ |
| राजोवाच<br>चिन्ता मे महती पुत्र यस्त्वमेकोऽसि मे सुतः।<br>शूरोऽतिबलवान्मानी संग्रामेष्वपराङ्मुखः॥ ४६<br>एकापत्यस्य मे तात वृथेदं जीवितं किल।<br>मृते त्वयि मृधे क्वापि किं करोमि निराश्रयः॥ ४७<br>एषा मे महती चिन्ता तेनाद्य दुःखितोऽस्म्यहम्।<br>नान्या चिन्तास्ति मे पुत्र यां तवाग्रे वदाम्यहम्॥ ४८ | राजा बोले—हे पुत्र! मुझे यही महान् चिन्ता है कि तुम मेरे इकलौते पुत्र हो। यद्यपि तुम बलवान्, स्वाभिमानी, रणस्थलमें पीठ न दिखानेवाले साहसी पुत्र हो तथापि केवल एक पुत्र होनेके कारण मुझ पिताका जीवन व्यर्थ है; क्योंकि यदि कहीं किसी समरमें तुम्हें अमरगति प्राप्त हो गयी तो मैं असहाय होकर क्या कर सकूँगा ? यही मुझे सबसे बड़ी चिन्ता लगी है; इसी कारण मैं आजकल दुःखित रहता हूँ। हे पुत्र! इसके अतिरिक्त मुझे दूसरी कोई चिन्ता नहीं है, जिसे मैं तुम्हारे सामने कहूँ॥ ४६-४८॥ |
| सूत उवाच<br>तदाकर्ण्याथ गाङ्गेयो मन्त्रिवृद्धानपृच्छत।<br>न मां वदति भूपालो लज्जयाद्य परिप्लुतः॥ ४९ | सूतजी बोले—यह सुनकर गांगेयने वृद्ध मन्त्रियोंसे पूछा कि लज्जासे परिपूर्ण महाराज मुझे कुछ बता नहीं रहे हैं॥ ४९॥ |
| वित्त वार्तां नृपस्याद्य पृष्ट्वा यूयं विनिश्चयात्।<br>सत्यं ब्रुवन्तु मां सर्वं तत्करोमि निराकुलः॥ ५० | आपलोग राजाकी भावना जानकर सही एवं निश्चित कारण मुझे बताइये; मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे सम्पन्न करूँगा॥ ५०॥ |
| तच्छ्रुत्वा ते नृपं गत्वा संविज्ञाय च कारणम्।<br>शशंसुर्विदितार्थैस्तु गाङ्गेयस्तदचिन्तयत्॥ ५१<br>सहितस्तैर्जगामाशु दाशस्य सदनं तदा।<br>प्रेमपूर्वमुवाचेदं विनम्रो जाह्नवीसुतः॥ ५२ | यह सुनकर मन्त्रिगण राजाके पास गये और सब कारण सही-सही जानकर उन्होंने युवराज गांगेयसे आकर कह दिया। तब उनका अभिप्राय जानकर गांगेय विचार करने लगे। मन्त्रियोंके साथ गंगापुत्र देवव्रत उस निषादके घर शीघ्र गये और प्रेमके साथ विनम्र होकर यह कहने लगे॥ ५१-५२॥ |
| गाङ्गेय उवाच<br>पित्रे देहि सुतां तेऽद्य प्रार्थयामि सुमध्यमाम्।<br>माता मेऽस्तु सुतेयं ते दासोऽस्म्यस्याः परन्तप॥ ५३ | गांगेय बोले—हे परन्तप! आप अपनी सुन्दरी कन्या मेरे पिताजीके लिये प्रदान कर दें—यही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आपकी ये कन्या मेरी माता हों और मैं इनका सेवक रहूँगा॥ ५३॥ |