ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
An exact line-by-line transcription of the Devanagari text from the image:
अजी ! जमा हुआ घृत । जमकर भी रहता घृत । या कंकण रूपमें भी पार्थ । होता सोना ही ॥ १४-३७८ इसलिये विश्वत्वका निवारण । कर फिर करना मेरा ग्रहण । ऐसा नहीं जान तू यह संपूर्ण । विश्व ही मैं हूं ॥ १४-३९० ॥ इस तादात्म्यके साथ परमात्मासे समरस होना ही भक्ति है ऐसे उन्होंने भक्तिका सार- सर्वस्व कह दिया । परमात्माको संपूर्ण रूपसे विश्वके साथ जानना ही अव्यभिचारी भक्ति है । इसमें भेद करना व्यभिचार ऐसे अव्यभिचारी भक्तिका अर्थ करते समय ज्ञानेश्वर महाराजने स्पष्ट रूपसे कहा है । अर्थात् संपूर्ण तादात्म्यके साथ विश्व-सह विश्वात्मामें लीन होना ही अव्यभिचारी भक्ति है । यदि यहां विश्व तथा विश्वात्मामें भेदका दर्शन होता है तो उसको व्यभिचार समझना ! इसके लिये अभेद चित्त होकर अपने साथ आत्माको जानना चाहिये । सोनेसे सोना जडा जानेकी भांति, तेजसे तेज-किरण प्रस्फुटित होने की भांति, भूतलसे परमाणु और हिमाचलसे हिमकण प्रस्फुटित होनेकी भांति, यह विश्व और विश्वात्मा अभिन्न है। सागर और उसकी लहरकी भांति विश्व और विश्वात्मा अभिन्न है । ऐसी एकात्मकता सर्वत्र और सतत अनुभव करना अनन्य भक्ति है। इसी बातको और अधिक स्पष्ट करते समय ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं- ज्ञानी इसको स्व संवित्ति । शैव कहते हैं इसे शक्ति । तथा हम परम भक्ति । कहते अपनी ॥ १८-११३३ ॥ वैसे ही और एक स्थान पर कहते हैं मेरे सहज प्रकाशको भक्ति कहते हैं यह अनन्य भक्ति कैसे अद्वैत भक्ति बनती है यह अनेक दृष्टांत देकर ज्ञानेश्वर महाराजने समझाया है । एक स्थान पर वे कहते हैं जैसे तरुणी अपने तारुण्यका भोग करती है वैसे भक्त परमात्माका भोग करता है । पानी जैसे अपने सर्वांगसे बिंबका चुंबन करके प्रतिबिंंबका अपनेमें भोग करता है जैसे अलंकार स्वर्णका भोग करते है जैसे चंदन सुगंधका भोग करता है जैसे चंद्र चांदनीका भोग करता है, वैसे भक्त स्वयं परमात्मा बनकर अपनेमें अपने परमात्माका भोग करता है। यह भक्ति कोई क्रिया नहीं है किंतु एक अनुभव है । ज्ञानेश्वर महाराजने इस अनुभवका वर्णन करते हुए दस प्रकरणोंका अनुभवामृत नामका स्वतंत्र ग्रंथ ही लिखा है । इस ग्रंथमें इस अनन्य भक्तिका विस्तारके साथ विवेचन किया है जो कोई ज्ञानेश्वर महाराजके ग्रंथोंका अध्ययन करेगा उसको जीवन विश्व तथा विश्वात्माकी ओर देखनेकी एक विशिष्ट दृष्टि मिलती है । क्यों कि ज्ञानेश्वर महाराज स्वतः एक श्रेष्ठ अनुभवी संत थे । उनकी भेददृष्टि मिट गयी थी । वे सर्वत्र अभेदका अद्वयानुभव करते थे । सर्वत्र विश्वात्मक देवका दर्शन करते थे, उनको सत चित् आनंद अथवा सत्यं शिवं सुंदरम् इन भिन्न भिन्न शब्दोंसे संबोधन की जानेवाली शक्ति केवल आनंदमय बन गयी थी । इस आनंदमें सबको सम्मिलित करना यह आनंद सबको वितरण करना या यह आनंद सबको मिले ऐसा करना उनका जीवन-कार्यसा बन गया था । इसीलिये उनके साहित्यमें तर्क, कल्पना, भावना, आदिके भिन्न भिन्न सभी कार्य सर्वत्र केवल सौंदर्य निर्मितीका कारण बने हैं । शास्त्र और काव्यकी सीमारेखा पोंछ गयी है मणशक्ति चिंतनशक्ति, बुद्धि शक्ति आदि सभी शक्ति एक जीव एक रूप बनकर शुद्ध वस्तुरूपके साक्षात्कार करनेके लिये संवेदन रूप बनकर वही संवेदन जीवनमें ओतप्रोत बन गया था । यही संवेदनशील हृदय शब्दका आकार बनकर प्रकट होता जाता था । तथा ज्ञानेश्वरी २०
समय समय पर उनके मुखसे "साराही संसार सुखका करूंगा मोदसे भरूँगा तीनों लोक ॥" ऐसे प्रतिज्ञा वचन उमड पडते थे । उनके हृदयकी मृदु मधुरता इतनी व्यापक थी कि इतने बडे ग्रंथमें कहीं भी दुरुक्ति नहीं, कहीं भी किसी भी सांप्रदायिक बातका आग्रह नहीं, किसी भी मतका खंडन नहीं; शुष्क विद्वत्ताका अभिनिवेश अथवा प्रदर्शन नहीं । ज्ञानेश्वरीकी प्रसाददानकी ओवियोंमें उनकी सद्भावनाकी व्यापकताका मंगलमय दर्शन होता है। वे अपने विश्वात्मकगुरुदेवसे प्रसाददान मांगते हुए कहते है " हे मेरे विश्वात्मक देव ! इस वाग्यज्ञसे संतुष्ट होकर आप मुझे यह प्रसाददान दें कि जिससे खलोंकी कुटिलताका अंत हो, उनमें सत्कर्म रतिकी आस्था हो, दुरितका अंधःकार मिटकर सर्वत्र स्वधर्म-सूर्यका उदय हो, सभी प्राणियोंको इच्छित-वर मिले; ईश्वर-निष्ठोंके समुदाय मंगलकी वर्षा करते हुए सर्वत्र संचार करें, सर्वत्र सभी सज्जनही हों! वे सब चलते कल्पतरु, बोलते अमृत निर्झर तथा चेतन चिंतामणिकी खानसे बने ! ये सज्जन अलांछित चंद्रमासे, ताप रहित सूर्यसे, सबके आप्त बने और सब आदिपुरुषमें अखंडरूपसे दत्त चित्त होकर शाश्वत सुख अनुभव करें!" इन्ही शब्दोंमें ज्ञानेश्वरी ग्रंथ समाप्त होता है। अर्थात ज्ञानेश्वरीका उगम इन्ही भावनाओंसे हुवा है। इन्ही भावना ओंके तानेबानेसे वह बुना गया है, और अंतमें इन्ही भावनाओंमें डूब गया है। इन भावनाओंके स्पर्शके बिना इस ग्रंथका मूल्यांकन करना असंभवसा है। अनुवाद और अनुवादक — तत्वज्ञानी संत और उनके तत्वज्ञानको देश-काल तथा भाषाकी मर्यादायें कभी नहीं होती यद्यपि कुछ नैसर्गिक कारणोंसे कुछ समय यह प्रवाह अवरुद्ध सा रहता है। कोई भी तत्वज्ञान हो वह आखिर किसी न किसी भाषामें कहना या लिखना पडता है। कालभेद, स्थलभेद, तथा भाषाभेदके कारण वह भाषा सबको अवगत होना शक्य नहीं होता । परिणामस्वरूप सामान्य जनता उस ज्ञानसे वंचित रहती है। इसीलिये एक भाषामें कहे गये ऐसे अनुभवी तत्वज्ञानका दूसरी भाषामें अनुवाद करना आवश्यक होता है। उपनिषद गीता आदि ग्रंथोंका ऐसे अनुवाद सभी भाषाओंमें हुए है। वैसेही ज्ञानेश्वरी एक अवतारी पुरुषद्वारा भगवतगीता पर लिखागया एक भाष्य है जिससे वह ज्ञान सबको उपल- ब्ध हो, सबको प्रिय हो, सब उसको सहज पचा सके और सारा विश्व उससे कृतकृत्य हो । यद्यपि यह सब मराठी भाषामें कहा गया है फिर भी उसका तत्वज्ञान कभी किसी भाषाके आवरणमें बँध नहीं जाता। वह सूर्यसा सर्वकष होता है। किंतु उसका सही अनुवाद होना अत्यंत आवश्यक होता है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। श्रीज्ञानेश्वरीका राष्ट्रभाषामें अनुवाद करनेका अत्यंत उपयुक्त, आवश्यक, तथा अत्यंत कठिन काम, हमारे मित्र, दे. म. श्री बाबूराव कुमठेकरने किया है। उनके कार्यका मूल्यांकन करना आसान नहीं है। क्यों कि यह कार्य वैसेही महत्त्वका है। प० पू० वै.वा. ह. भ. प. आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजी कुमठेकरजीके कार्यके विषयमें अपने एक पत्रमें लिखते हैं। "भारतको स्वातंत्र्य मिला और नेताओंने भाषिक राज्य रचनाका प्रयोग करनेका निश्चय किया किंतु इसका एक अकल्पित परिणाम यह दीखने लगा कि उससे द्वैत ही बढा । यहांतक कि नेतलोग भी यह सोचने लगे देशकी एकात्मकता टूट जायेगी ! " इस आपत्तिका सदाके लिये दूर करनेके जो अनेक उपाय हैं उनमें एक महत्त्वका उपाय राष्ट्रभाषामें भिन्न भिन्न भाषाओंके उत्कृष्ट वाङ्मयका आविष्कार करना है; और विश्वमें संत साहित्य ही एक ऐसा साहित्य है जो विश्वैक्यकी भाषा बोलता है तथा यही एक ११ —प्रस्तावना
विचार प्रकट करता है। संत एक परिवार हैं। संत, फिर कहीं भी जन्म ले अथवा कभी जन्म लें वह एकही भाषा बोलता है और एक ही तत्त्व कहता है। "ऐसे संत साहित्यका हिंदी आविष्कार होकर संतोंका संदेश भारतके घर घर पहुंचकर भारतकी एकता दृढ होनेमें मदद हो इस भावनासे श्री कुमठेकरने संत साहित्य सदनका काम उठाया है।" किसी भी भाषाके काव्यका अन्य भाषामें भाषांतर करनेके लिये, वह भी समवृत्तमें, दोनों भाषाओंपर उत्तम प्रभुत्व होना आवश्यक होता है, यहां, केवल भाषाप्रभुत्वका पाथेय भी अधूरा ही होता है। यह तत्त्वज्ञानका ग्रंथ होनेसे उस शास्त्रके गूढ प्रमेयोंका आकलन होनेके लिये उसका भी पूर्ण अभ्यास करना आवश्यक है। उसके प्रति अनन्य निष्ठा, उतनी ही आत्मीयता, और कार्य सातत्यशक्तिकी आवश्यकता होती है। क्यों कि ऐसे काम सामान्य प्रयत्नोंसे सेतमेंतमें होनेवाले काम नहीं हैं। बडे बडे विद्वानोंकी भी बुद्धि कुंठित करनेवाली नौ हजार ओवियां; उनमें स्वयंप्रभ, मौलिक, निगूढ तत्त्वज्ञानके इस महान ग्रंथका भाषांतर करना आसान नहीं है। प्रत्येक शब्दोमेंसे ग्रंथका शब्दसौंदर्य, ध्वनिमाधुर्य, अर्थ गांभीर्य, तथा ग्रंथकर्ताके भावको व्यक्त करना अत्यंत कठिन कार्य है। ज्ञानेश्वरीका कथन करते समय जैसे समय स्वयं ज्ञानेश्वरमहाराज कहते हैं - उन अक्षरोंका जो है भाव । पहुंचाऊंगा आपके ठाव । कहता सुनिये ज्ञानदेव । निवृत्तिका दास ॥ १४-४१५ ॥ यह सब होनेके लिये मूल ग्रंथकारके हृदयमें प्रवेश करना पडता है, उनका अंतरंग खोजना पडता है, उनकी भावनाओंसे समरस होना पडता है, उनमें तद्रूप तन्मय होना पडता है, तभी मूल ग्रंथकारका हृदय अपने शब्दोंसे अभिव्यक्त किया जा सकता है ! इसके साथ साथ आवश्यकता है भाषाप्रभुत्वकी ! श्रीकुमठेकरका अनुवाद देखनेसे ऐसा लगता है ऊपरकी बातोंमें वे पर्याप्त यशस्वी हुये हैं। खास करके, मराठी या हिंदी दोनोंही श्रीकुमठेकरकी मातृभाषायें नहीं है। इन दोनो भाषाओंका व्याकरणशुद्ध अभ्यास करके उन्हे यह काम करना पडा है। इसके पहले भी ज्ञानेश्वरीके दो तीन अनुवाद हो चुके हैं। किंतु वे केवल भाषांतर या रूपांतरसे हैं। यह अनुवाद समवृत्तमें है। ओवीवृत्त हिंदीमें नहीं है यह मराठीका सर्वजनसुलभ अपना वृत्त है। उसमें गण मात्रदिका विशेष बंधन नहीं है। उसके साडेतीन या साडेचार चरण होते हैं। यद्यपि हिंदी भाषामें ओवी छंद नहीं है अनुवादकने हिंदीमें ओवी छंदकी रचना करके ज्ञानेश्वरी जैसे अद्वितीय ग्रंथ, समवृत्तमें हिंदीमें अनुवाद करनेकी अपनी जिद्द अत्यंत सामर्थ्यके साथ पूरी की है। साथ साथ ज्ञानेश्वरमहा- राजकी भाषा सूत्रमय है। "अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतोमुखं !" यह सूत्रका लक्षण है। सूत्रमें अक्षर थोडे और अर्थ विस्तृत होता है। ऐसे अर्थपूर्ण अक्षरोंका गिनतीके उतनेही अक्षरोंमें, वही भाव और अर्थ प्रकट करना और उसी शब्द-सौंदर्य और नाद-माधुर्यके साथ, यह आसान काम नहीं है। अनुवादक इसमें भी पर्याप्त यशस्वी हुए हैं। उनके इस यशके विषयमें महा- राष्ट्रके अत्यंत विद्वान तथा प्रसिद्ध समालोचक प्रो. न. र. फाटक अपने एक पत्रमें लिखते है " हिंदीमें ओवी छंद नहीं है। फिरभी हिंदीमें उस भाषाकी दृष्टिसे अनुकूल हो ऐसा, मराठी ओवी छंदको नया रूप देकर स्व-रचित नये वृत्तमें, ज्ञानेश्वरी जैसे प्रासादिक वेदांत काव्य ग्रंथका, मूलके समान, उतनाही सशक्त और सरल अनुवाद करके, मानो महाराष्ट्र सारस्वतका हृदय ही अन्य भाषिके भाव-जीवनसे जोडकर श्री कुमठेकरने ज्ञानेश्वरी १२
महान कार्य किया है।.......श्री कुमठेकरका किया हुवा ज्ञानेश्वरीका हिंदी अनुवाद देख कर ऐसा लगता है “ ज्ञानेश्वरी मूलमें ही हिंदीमें लिखी गयी हो !” प्रो० न०र० फाटकके इस कथनमें यत्किंचित अत्युक्ति नहीं है। इतनाही नहीं श्री कुमठेकरने अकारादि विषयानुक्रमणिका, विषयसूचि तथा अनेक परिशिष्टादि द्वारा अध्येताओंके लिये यह ग्रंथ अत्यंत सुलभ बना दिया है। ज्ञानेश्वरी अभ्यास करने जैसा ग्रंथ है । अभ्यास करनेवालोंके लिये श्री कुमठेकरने यह ग्रंथ अत्यंत सुलभ बना दिया है। विशेष कर, विशिष्ट शब्दोंके विशेष विवेचन द्वारा तथा विशिष्ट प्रकारके शब्द कोश द्वारा भी पुस्तकको सर्वांग पूंण तथा सर्वांग सुंदर बनानेमें अनुवादकने अत्यंत परिश्रम किये हैं। वस्तुतः श्री कुमठेकरका पूर्वांयुष्य सारा राजनैतिक क्षेत्रमें बीता है। यदि वे चाहते तो स्वातंत्र्योत्तर कालमें किसीके पिछ लग्गू बन कर किसी बडे अधिकारके स्थान पर विराजमान हो सकते थे। किंतु उनको इस मोहने स्पर्श भी नहीं किया। जब अन्य सब राजनैतिक क्षेत्रकी ओर धंस रहे थे ,तब उन्होने वह क्षेत्र छोडकर अपना जीवन संतकार्यमें दे दिया और अत्यंत निष्ठासे वे इस कार्यमें दत्तचित्त हैं। इसी एक बातसे उनके अंतरंगका दर्शन हो सकता है; उसकी पूर्ण कल्पना आ सकती है। महाराष्ट्रीय संतोके दिव्य अध्यात्मिक वाङ्मयका उतना ही समर्थ अनुवाद द्वारा हिंदी साहित्य संपदाको समृद्ध करके उन्होने जैसे हिंदी भाषिकोकों चिरऋणी बना रखा है वैसे ही उनका कार्य महाराष्ट्रको भी भूषण भूत है । इसमें महाराष्ट्रका महान गौरव है। हमें पूर्ण विश्वास है कि हिंदीका भावुक वाचक-वर्ग तथा महाराष्ट्रीय इसको मान्य करेंगे। श्रीकुमठेकरके इस ऋणसे मुक्त होनेका प्रयास करेंगे। श्री कुमठेकरके इस कार्यके विषयमें, दो वर्ष प्रथम वैकुंठवासी बने हुए पौर्वात्य पाश्चात्य विद्या-विभूषित, महाराष्ट्रके वारकरी संप्रदायके ज्येष्ठ श्रेष्ठ अध्वर्यु, प. पू. आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजीने प्रशस्ति पत्र देकर गौरव किया था। इस परसे श्री कुमठेकरके कार्यका महत्व समझमें आएगा। आचार्य श्री दांडेकरने इस अनुवादको देखा था। उन्होने भी इस अनुवादकी प्रशंसा की थी। वे ज्ञानेश्वरीके एक विद्वान भाष्यकार थे । यह अनुवाद कब प्रसिद्ध होगा इसकी उनको तडप थी । वास्तविक इस अनुवादकी प्रस्तावना उन्हीको लिखनी थी किंतु काल प्रवाहमें उन्हे यह शक्य नहीं हुवा। फिर भी यह अनुवादकका सुदैव ही समझना चाहिए कि आचार्य श्री दांडेकरकीं प्रशस्ति-उनको मिली। वैसेही महाराष्ट्रमें अन्य अनेक विद्वान अधिकारी पुरुष होने पर भी इस ग्रंथकी प्रस्तावना लिखनेका दायित्वपूर्ण काम मुझ जैसे सामान्य व्यक्तिको क्यों सौंपा गया यह भी मैं समझ नहीं पाया किंतु श्री. बाबुराव कुमठेकर के प्रेमाग्रहके कारण यथाशक्ति इन सर्वांगपूर्ण ग्रंथ पर प्रस्तावणारूप चार शब्द लिखे हैं। अंतमें ज्ञानेश्वर महाराजके पुनः पुनः आगे इससे। इस ग्रंथ पुण्य संपतिसे। सर्वभूत सर्व सुखसे। होना है संपूर्ण ॥ १८-१८०८ ॥ इन शब्दोंमे यह प्रस्तावना समाप्त करता हूँ ।
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कभी स्वप्नमें भी नहीं सोचा था ऐसा काम जब किसीसे सफलता पूर्वक संपन्न हो जाता है तब उसका हृदय कृतार्थतासे कैसे भर आता है इसका अनुभव अब हो रहा है। जब हृदयमें बिना ओर छोरका आनंद लहरें मार रहा होता है तब मौन रहना ही अच्छा होता है ! बिना ओरछोरके उस आनंद-सागरको भला शब्दोंके चम्मचसे कहां तक भरें और कैसे भरें ? वस्तुतः उसकी आव- श्यकता भी नहीं होनी चाहिये । किंतु जीवनमें कुछ बातें ऐसी होती हैं कि जिन्हें समयपर नहीं कहना शायद कृतघ्नता कहा जाय । इसीलिये यहां ये शब्द लिखे जा रहे हैं। कभी ज्ञानेश्वरीकी कुछ ओवियोंका सहज ही अनुवाद हो गया । वह, वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध, गुरु-जनोंको अच्छा लगा । पू० आचार्य शं. वा. दांडेकर, श्री.न्यायरत्न धुंडिराज शास्त्री विनोद, प्रा० न० र० फाटक जैसे विद्वान् गुरुजनोंने इसी ढंगसे छंदोबद्ध ज्ञानेश्वरी लिखनेकी प्रेरणा दी। पू० शं० वा० दांडेकरजीने कहा “तुमने और कुछ भी काम नहीं किया किंतु इसी ढंगसे ज्ञानेश्वरी हिंदीमें लिख दी तो हम समझेंगे तुम्हारा यह जन्म सार्थक हुआ !” और मैंने भी इसीको गुरुजनोंकी आज्ञा मान- कर अपना अधिकार अथवा अपनी योग्यताका विचार किये बिना ही ज्ञानेश्वरीके अनुवादका काम हातमें लिया । ॐ नमोजी आद्य ! लिखते हुए आदि पुरुषको प्रणाम कर कार्यका श्रीगणेशा किया । किंतु आगे ........! काम धीरे धीरे आगे रेंगता गया । जैसे जैसे काम आगे रेंगता गया शरीर सूखता गया । ऐसे भी लगा “यह काम इस शरीरसे पूरा नहीं होगा !” किंतु काम अधूरा छोडना भी असंभव था । बिना किसी कारणके दुर्बलता बढती गयी । दिन भर थकानका अनुभव होने लगा । पडा रहता तो न दिन और न रात घंटों सो जाता । नींदमें सारा दिन बीत जाता । जब जगा रहता, कुछ काममें लगता तो अपने आप खो जाता ! अर्थात् बीच बीचके कालखंडका स्मरण ही नहीं रहता । अब क्या हुआ ? मैं कहां था ? क्या करता था ? आदिका भान ही नहीं रहता । मेरे एक डॉक्टर मित्र चिकित्सा करते । दवा देते । कभी कभी सुयी भी लगाते । मैं अपनी बात उनसे ठीक कह नहीं सकता था, ऐसे महीने बीते । सालभर होने आया । इसी बीचमें एक दिन श्री. शंभु आपटे नामके एक सज्जनका परिचय हो गया। दूसरे जिस सज्जनद्वारा यह परिचय हुवा था उसने कहा था “वे योगी हैं । आध्यात्मिक साधनामं रत रहते हैं ।" आदि आदि। इस परिचयके तुरंत बाद अनुवादित ज्ञानेश्वरीके कुछ पृष्ठ देखकर उन्होंने कहा “आप ज्ञानेश्वरीका अनुवाद कर रहे हैं । किंतु यह काम आपसे पूरा नहीं हुवा तो आपको दुःखी नहीं होना चाहिए। मैं देख रहा हूं कि यह काम आपसे पूरा नहीं होगा। इसके पहले यह शरीर छूट जायेगा !” यह सुनकर मैंने हँसते हुए कहा “मेरे एक बुजुर्ग मित्र मेरे लिये सदैव कहते हैं कि तीन चार सालमें एक बार यह ऊपर जाकर यमराजका दरवाजा खटखटाता है और वह दरवाजा खोलनेके पहले ही अंदरसे चिल्लाकर कहता है “नो व्हेकन्सी !” ” “दरवाजा खोलनेके पहले ही वह क्यों चिल्लाकर कहता है ? दरवाजा खोलकर सज्जनतासे क्यों नहीं कहता !” मेरा परिचय करा देनेवाले मित्रने पूछा।
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“दरवाजा खोलते ही कुमठेकरजी अंदर घुस जायेंगे तब बाहर निकालना मुश्किल होगा न !” शंभु आपटेने कहा और भारी बना हुवा वातावरण कुछ हलका बना। किंतु मेरा और शंभु आपटेजीका संबंध बढता गया। मुझ पर उनकी बातोंका भी कुछ असर होता गया। मेरे कामकी गति धीमी होती गयी। शरीरके कष्ट बढते गये। और एक दिन ऐसे ही बातबातमें मैंने शंभु आपटेजीसे कहा “मुझे लगता है मुझे अब आपके पास आना छोड देना चाहिए। क्यों कि आपकी बातोंका मुझ पर प्रभाव पडता जाता है। ज्ञानेश्वरी लिखने बैठते समय मन साशंक होता है। मैं इसे प्रकाशित हुवा देखना चाहता हूं और माना मुझसे यह काम पूरा नहीं होगा; किंतु ज्ञानेश्वरीका समवृत्तमें अनुवाद करते करते शरीर छोडना भी कम भाग्य नहीं है!!” यह कहते समय मेरी आँखें भर आयीं। शंभु आपटेजी भी द्रवित हुए। उन्होंने कहा “ऐसी बात नहीं है। मैं भी चाहता हूं कि यह काम पूरा हो। किंतु कैसे हो? मैं यही सोचता हूँ। मैं इस काममें सहायक बनना चाहता हूँ। रोडा अटकाना नहीं चाहता !” हम दोनोंका संबंध बना रहा। बढता गया। एक दिन उन्होंने यकायक कहा “कुमठेकरजी कृपा करके तुम डाक्टरसे दवा लेना छोड दो। ऐसे ही चलने दो।” उस दिन मुझे माथेमें बडी वेदनाएँ हो रही थीं। इसीलिये मैं शंभु आपटेजीके घर गया था। उन्होंने मेरा सिर गोदमें लेकर मसाज किया। ऐसे करते समय भी वे बडे प्यारसे समझाते रहे कि तुम्हे औषधी लेना छोड देना चाहिए। मैंने डाक्टरी ट्रीटमेंट छोड दी। शंभु आपटेजी ही मेरे डाक्टर बने। मेरा उनके घरमें आना जाना बढता गया। हम दोनों न जाने क्या क्या बोलते बैठते थे। एक दिन अकस्मात मैंने ज्ञानेश्वरीका किया हुवा अनुवाद सुनाया। अनुवाद अच्छा था। सुननेवाला और सुनानेवाला मानो एक हो गये थे। समयका भान भी नहीं रहा। और ...... और मैं अत्यंत थक गया। शंभुजीकी पत्नीने काफी बना कर दी। मैं आराम कुर्सी पर पडा था। शंभुजी यकायक उठे। हाथ पैर धो आये। अगरबत्ती जलायी। एक पाट रखा। उस पर मुझे बिठाया। पांच दस मिनिट मेरे सामने आंखे मूंदकर बैठे रहे। फिर उठे। अंदर जा कर एक श्रीफल और पांच रुपये ले आये। श्रीफल तथा पांच रुपये मेरे हाथमें देकर बोले, “यह नोट संभा- लकर रखो। खर्च मत करो, बैंकमें मत रखो, अपने पास ही रखो !” और मुझे तिलक लगाया । थोडी देर मेरा माथा और गर्दन जहां दर्द होता था - सहलाते बैठे रहे। फिर अपने भाईको भेज कर टैक्सी मंगवाई और मुझे डेरे पर भेज दिया। इसके कुछ दिन बाद वे बोले “अब आप लिखिये। अब लगता है भगवान आपसे यह काम करा ही लेंगे। इतने दिन मुझे लगता था कि यह काम होना तो चाहिए किंतु कैसे पूरा होगा ?' इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नीसे मेरे लिये काफी बनानेके लिये कहा और फिर बोले “कुमठेकर ! आखिर मैंने अपनी पत्नीसे पूछा यदि मैने यह शरीर छोड दिया तो तुम कैसे निभाओगी ?” पहले वह झझाई बोली “यह कैसा प्रश्न करते हो तुम ? यह सवाल ही क्यों उठा ?” फिर मेरे आग्रह करने पर बोली “तुम जानते हो मुझे सीना आता है। अपना एक मशीन ले लूंगी। उस पर काम करूंगी। जो मिलेगा उसीसे अपना और बच्चोंका खर्चा चलाऊंगी। न किसीसे कुछ मांगूगी। न किसीका दिया हुवा कुछ लूंगी !!” “यह सुनकर मनका समाधान हुवा। दीक्षा लेते समय मैंने अपने गुरुको बचन दिया था कभी पर स्त्री और पर धनकी आशा नहीं करूंगा !” इतनेमें उनकी पत्नी काफी ले आयी। उनसे काफी लेते लेते मैंने कहा “किंतु यह प्रश्न ही क्यों पैदा हुवा ?” उनकी पत्नीने कहा- “यही इनकी आदत है !” ज्ञानेश्वरी ५
हमने काफी पी। आश्चर्य जनक रूपसे मेरा स्वास्थ्य सुधरने लगा। तेजीसे काम आगे बढा। नौ हजार ओवियोंका समवृत्तमें अनुवाद हुवा। उसकी पांडुलिपि तयार हुई। छपाई आदिके खर्चकी व्यवस्था हुई। यह सारी बातें मैंने शंभु आपटेजीसे कहीं। तब उन्होंने पूछा "ज्ञानेश्वरीका पसायदान-प्रसाददान-लिख कर पूरा हुवा ?" मैंने पढकर सुनाया। "जो चाहता था वह हो गया !" "पुस्तक मुद्रणके लिये दे रहा हूँ। कल ही बेंगलूर जा रहा हूँ?" "हिंदी छपाइके लिये बेंगलूर क्यों ?" "वहां मेरे मित्रका प्रेस है। हम दोनोंका पच्चीस सालका संबंध है। छपाई जल्दी हो जायेगी !" मुझे किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होगी। "अच्छा !" मैं बेंगलूर गया। पुस्तक छपने लगी। आखिर वहां किसी तरह साल भरमें पंद्रह अध्याय छप तो गये। मैं उसकी डमी कापी बनाकर बंबई लौटा। बंबई आते ही सीधा शंभु आपटेजीके घर गया। किंतु..... वे जहाँ अक्सर बैठते थे, उसी स्थानके पास दीवारको लगी सीनेकी मशीन बैठी थी। उसके ऊपर शंभुजीकी तसवीर टंगी थी और सिंदूरकी बिंदी जो सदैव श्रीमती आपटेजीके भालपर लगी रहती थी वह उस तसवीरके भालपर लगी थी। घरमें जहां उत्साह रहता था वहां उदासी थी। मै वहां क्षणभर बैठा रहा। उनकी धर्मपत्नी मौन और उदास मेरे सामने बैठी रही। कोई कुछ नहीं बोल पाया। वहां मेरा दम घुट रहता था। शंभुजीने मेरे हाथमें श्रीफल देते समय कहा था "तुमपर भगवानकी असीम कृपा है। कृपा करके कोई दवा मत लो। तुम अच्छे हो जाओगे।" पांच रुपयोंका नोट देते समय उन्होंने कहा था "अब इस कामके लिये कहीं न कहींसे आर्थिक सहायता मिलती जायेगी !" उन्होंने कई बार कहा था, "मैंने कई बार सोचा, तुम इतना अच्छा काम कर रहे हो। यह काम कैसे पूरा होगा ? इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?" क्षणभरमें कई बातें स्मृतिपटल पर उठ कर डूब गयीं। उदास, निःशब्द वातावरणमें दम घुट रहा था। किसी तरह मैंने कहा "अच्छा ! अब मैं जाता हूँ!" और चला आया ! आते समय मनमें अनेक बातें आयीं। किंतु मनमें उठनेवाली सभी बातें लिखनेकी आवश्यकता नहीं होती। जीवनमें होनेवाली सभी घटनाओंका अर्थ करना संभव नहीं होता। इस घटना पर कोई भाष्य किये बिना शंभुजीके लिये केवल कृतज्ञताकी अश्रु-अंजली देना ही मेरा कर्तव्य रह गया है। वैसे ही पू. आचार्य शं. वा. दांडेकर इस काममें बार बार प्रोत्साहन देने परभी "कार्य संपन्न हुवा" यह देखनेके लिये नहीं रहे। वही बात श्रीन्यायरत्न धुंडीराज विनोदकी है। किंतु प्रा. न. र. फाटकजीने इन सबकी कमी पूरी की। अनुवाद करते समय कोई बात समझमें नहीं आयी फाटकजीके पास गया। प्रकाशनके लिये कभी आर्थिक तंगी आयी। फाटकजीके पास गया। दूसरा कोई संकट सामने आया तो फाटकजीके पास गया। और, उन्होंने भी कभी निराश नहीं किया। दौडते हुए पास आनेवाले बालकको जिस भावसे मां पास लेकर उनकी बातें सुनती है, जैसे उसकी सहायता करती है वैसे उन्होने मेरी कठिनाइयोंको हल कर दिया। वह भी निष्काम भावनासे। वैसे ही श्री. स. का. पाटील, सेठ अरविंद मफतलाल, से. धरमसी मोरारजी खटाऊ, श्री. वामनराव वंदे इन्होंने जब कभी आर्थिक कठिनायी आयी, उनको मालूम हुवा, किसी न किसी तरह उसको हल कर दिया। ३ कृतज्ञताके कुछ शब्द
वस्तुतः यह अकेलेका काम नहीं, सबका काम, सबने मिलकर संपन्न किया । सबने कृतार्थताका अनुभव किया । ऐसी स्थितिमें कौन किसका आभार माने ? मुझे भी इन सबको धन्यवाद देनेका अथवा सबका आभार माननेका क्या अधिकार है ? फिर भी, जब कोई कार्य संपन्न होता है तब उसके कारणीभूत सभी मित्रोंका स्मरण होना स्वाभाविक है। यह केवल कृतज्ञताका स्मरण है ! अपने अपने कर्तव्य किये हुए साथी या सहायकोंको धन्यवाद देनकी उद्धंडता नहीं । हम सब सदैव परस्पर सहयोगसे ऐसे ही सत्कर्म रत रहें, हमारी यह परस्पर मित्रता बढती जाय; हममें प्रेम और विश्वास बढता जाय, परस्पर दायित्व भावना बढती जाय, इसलिये किया गया यह सन्मित्रोंका कृतज्ञता-स्मरण है । एक प्रकारसे यह भी इस सन्मित्र मंडलमें अपनी विशिष्टताका दर्शन कराना है ! इस लिये मैं हृदयसे सबका क्षमा प्रार्थी हूँ । वैसे ही परिशिष्ट लिखनेमें श्री. चित्राव शास्त्रीके चरित्रकोश, श्री. महादेवशास्त्रीजीके सांस्कृतिक कोश आदिका जो उपयोग हुवा इसके लिये भी उन सबका कृतज्ञ हूँ। तथा ज्ञानेश्वरीका अर्थ करनेमें श्री साखरे महाराज, आचार्य श्री. दांडेकर श्री. भिडे आदि सज्जनोंकी ज्ञानेश्वरीका जो उपयोग किया गया उनको भी कृतज्ञतापूर्वक प्रणाम करता हूँ !
बाबूराव कुमठेकर
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ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरी १ कविका संक्षिप्त परिचय— वैसे तो ज्ञानेश्वर महाराजका सारा जीवन १ चमत्कारोंसे भरा है किंतु सब चमत्कारोंका चमत्कार उनके लिखे हुए दो वेदांत ग्रंथ ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृत हैं। ये ग्रंथ उन्होंने अपनी आयुके पंद्रहवे वर्षमें लिखे हैं और जो बात शब्दोंसे नहीं व्यक्त हो सकती वह शब्द चित्रोंसे मूर्तिमान करके दिखाई है। ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतको पढते पढते अमूर्त विचारोंका स्पष्ट शब्दचित्र देखकर सहसा हृदय कह उठता है " वाल्मीकीकी प्रतिभा, व्यासकी प्रज्ञा, कृष्णकी आत्मानुभूति, शंकरका वैराग्य और बुद्धकी करुणाका समीकरण ज्ञानेश्वर महाराज हैं। सूर्यसे भी प्रखर ज्ञानके साथ चांदनीसे भी शीतल करुणाका स्पर्श होता है यहां। इसी लिये आधुनिक युगमें भी सारा महाराष्ट्र उन्हे माउली कहता है। महाराष्ट्रमें माउली शब्दका अर्थ ज्ञानेश्वर है और कोशमें माउली शब्दका अर्थ मां। महाराष्ट्रकी इस माउलीने अपने साहित्यके रूपमें मराठी भाषाभाषी जनताको कल्पवृक्षकी छायामें बिठाकर कामधेनुके दूधमें पकाया हुवा अमृतान्न खिलाया है अक्षय-पात्रमें ! इसीलिये ज्ञानेश्वर महाराजके बाद जो कोई महापुरुष महाराष्ट्रमें पैदा हुवा उसने ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरीका ऋण स्वीकार किया है। ज्ञानेश्वरीके बाद मराठी भाषामें लिखे गये प्रत्येक धर्म-ग्रंथ पर अथवा पारमार्थिक ग्रंथ पर ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतका प्रभाव देखनेको मिलता है। ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृत कोई रामकथा अथवा कृष्णकथा नहीं किंतु वेदांत-ग्रंथ है। वेदांत काव्य है। मराठी भाषामें ऐसे कई वेदांत ग्रंथ हैं, उनमेंसे कुछ ज्ञानेश्वरीके पहल भी लिखे गये थे और कुछ ज्ञानेश्वरीके बाद भी लिखे गये हैं, पर मराठी भाषाभाषी जन-मानसपर ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतका जो प्रभाव है वह और किसीका नहीं दीखता। आधुनिक विज्ञान-विद्या विभूषित होकर भी नौ हजार छंदोंका ग्रंथ कंठस्थ कर उसका नित्य-पाठ करनेवाले महाराष्ट्रीय हजारो हैं। वैसे तो लाखों लोग ज्ञानेश्वरीका नित्य-पाठ करते हैं। अपनी आयुके पंद्रहवे सालमें ऐसे ग्रंथ लिखानेवाले ज्ञानेश्वर महाराजका जन्म शा. शक ११९७ युवा नाम संवत्सर श्रावणवद्य अष्टमी रातको बारह बजे हुवा था। इसलिये सारे महाराष्ट्रकी यह मान्यतासी हो गयी है कि भगवान कृष्णने ही अपनी गीता समझानेके लिये ज्ञानेश्वरके रूपमें जन्म लिया था। ज्ञानेश्वर महाराज जिस समय करीब दस सालके थे उसी समय समाजके विद्वान लोगोंकी अशानुसार उनके माता पिताने देहान्त प्रायश्चित्त लिया था। उस समयका वर्णन करते समय ज्ञानेश्वर महाराजकी छोटी बहन मुक्ताई कहती है टिप्पणी (१) इसी लेखककी ज्ञानेश्वर और उनका साहित्य इस पुस्तकमें ज्ञानेश्वर महाराजके विषयमें संपूर्ण जानकारी दी है। ५
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तात मात जब छोड गये हमें । छोटे थे हम पांडुरंग । निवृत्ति ज्ञानेश्वर भिक्षाअनमें जाते । संभाले सोपान मेरे पास ॥ इस समय ज्ञानेश्वर महाराजके अग्रज और श्रीगुरु निवृत्तिनाथ बारह वर्षके थे । ज्ञानेश्वर महाराज दस वर्षके, सोपानदेव आठ वर्षके और छ वर्षकी मुक्ताई । आजमी सारा महाराष्ट्र जिनके स्मरणमात्रसे रोमांचित होता है, अनेक प्रकारके कष्ट सहन करके जिनके समाधि-स्थानके दर्शन करने जाता है, जिनके समाधि दिन पर और समाधि स्थानपर लाखों लोगोंका मेला लगता है उनके जन्मसे उनके माता-पिताको समाजमें अनंत यातनाएं और अपमान सहना पडा था। इतना ही नहीं इनके माता-पिता तथा इन अबोध बालकोंका मुंह देखना असगुन माना जाता था, पाप माना जाता था ! ! क्यों किः— ज्ञानेश्वर महाराजके पिता विट्ठलपंत स्वभावसे ही विरक्त थे । अपना विद्याअध्ययन होते ही वे तीर्थ-यात्राके लिये निकल पडे थे। पुरानी पोथियोंमें उनकी यात्राओंका वर्णन देखनेको मिलता है । उन्होंने करीब करीब भारतके सभी पुण्यक्षेत्रोंका दर्शन किया था। सभी पुण्य-तीर्थोंका स्नान किया था । जब विट्ठलपंत भीमाशंकर आये, भीमा नदीका उगम-स्थान देखा, तब पंढरपुरके स्मरणसे पंढरपुरके लिये चल पडे। भीमाशंकरसे पंढरपुर जाते समय रास्तेमें एक छोटासा गांव पडता है आलंदी । आलंदी इंद्रायणी नदीके किनारे पर बसा हुआ एक छोटासा गांव है । किंतु अत्यंत प्राचीन । इस गांवको पहले अलकापुर कहा जाता था । यहां एक शिवालय है । इसको सिद्धेश्वर कहते हैं। यह अत्यंत प्राचीन शिवपीठमें एक है । विठ्ठलपंत आलंदी आये । इंद्रायणीमें स्नान किया । मंदिरके सामने एक पीपलके वृक्षकी छायामें बैठकर अपना नित्य-कर्म करने लगे । मंदिरके सामनेवाले अश्वत्थकी छायामें बैठकर, स्वच्छ मंत्रोच्चारसे धर्म-कार्यमें मग्न तेजस्वी युवकको देखकर सिध्देश्वर मंदिरके पुजारी, उसी गांव और पंचक्रोशीके ग्रामाधिकारी, सिध्देश्वर पंत प्रसन्न हुए । उन्होंने आग्रहसे विठ्ठलपंतको भोजन पर बुलाया । खाते खाते रहने करनेकी जानकारी ले ली । प्रवासका उद्देश जान लिया और मन ही मन मेरी कन्या रुक्मिणीके लिये योग्य वर होनेका निश्चय कर लिया । २ स्वप्न और विवाह — उसी दिन विठ्ठलपंत तथा सिद्धेश्वरपंतको एक-सा स्वप्न हुआ और स्वप्नमें पंढरपुरके विट्ठलने रुक्मिणी और विठ्ठलपंतके विवाहका आदेश दिया । प्रातःकाल उठते ही सरल स्वभावके दोनों ब्राह्मणोंने अपने अपने स्वप्नकी बात एक दूसरेसे कही और विट्ठलपंतने कहा “मैं रामेश्वरकी यात्राका संकल्प करके रामेश्वर जा रहा हूँ, दूसरी बात, बिना मातापिताकी आज्ञाके विवाह नहीं कर सकता !” तब सिद्धेश्वरपंतने कहा आप आजकी रात यही रहिए । आजकी रातको जो आज्ञा होगी वैसे कीजिये । विठ्ठलपंत यह बात मानकर उस दिन वहां रहे और उस रातको पुनः स्वप्नमें आदेश मिला “ तू भक्ति, ज्ञान, वैराग्यका घर बना हुआ है । ये इसके उदरमें जन्म लेना चाहते हैं । इसलिये तुझे मेरी आज्ञा है तू यह विवाह कर ” दूसरे दिन विट्ठलपंतने अपना स्वप्न सिद्धेश्वरपंतसे कहा ! ज्योतिषीको बुलाकर पत्रिका दिखायी गयी । छत्तीस गुण मिलते थे । बस उसी ज्येष्ठ महीनेमें रुक्मिणीसे विठ्ठलपंतका विवाह हुआ और थोडेही दिनोंमें पंढरपुर जानेवाले वैष्णवोंके झुंड देखते ही विट्ठलपंत पंढरपुर जानेके लिये उतावले हो गये । उन्होने सिद्धेश्वरपंतसे आज्ञा मांगी और सिद्धेश्वर पंतभी अपनी पत्नी और पुत्रीके साथ विट्ठलपंतको लेकर पंढरपुरके लिये रवाना हुये । पंढरपुरमें विट्ठल दर्शन करके विट्ठलपंत अपने संकल्पनुसार अकेले ही रामेश्वर गये । ज्ञानेश्वर ३
रामेश्वर यात्रा करके वहांसे पुनः आलंदी आये और आपेगांव जाकर माता-पिताके दर्शनकी अपनी इच्छा उन्होंने सिद्धेश्वरपंतसे कही। सिद्धेश्वर पंतने भी प्रसन्नतासे दामादकी इच्छा मान ली। स्वयं पत्नी और पुत्रीको साथ लेकर दामादके साथ उनके घर जानेके लिये तैयार हो गये। वहां आपेगांवमे विट्ठलपंतके पिता गोविंदपंत और माताजी अपने पुत्रके आगमनकी प्रती- क्षामें घुल रहे थे। वे पुत्रको, वह भी पत्नीके साथ आया हुआ देखकर बडे प्रसन्न हो गये। सिद्धेश्वरपंतने वस्त्राभरणसे गोबिंदपंत और उनकी पत्नी नीरादेवीका सन्मान किया। विवाहकी सारी कथा सुनाई और दामाद और अपनी पुत्रीको उनके घर छोडकर अपने घर लौट आये। विठ्ठलपंतने सुखसे माता पिता और पत्नीके साथ कुछ दिन बिताये। वार्धक्यके कारण मातापिता वैकुंठवासी हो गये। घर प्रपंचका सारा भार विठ्ठलपंत पर आया। वह भी अपने गांवके ग्रामाधिकारी थे। किंतु वे इन सबसे उदासीन रहते थे। उनके जीवनक्रमके विषयमे पुरानी पोथियोंमें तत्कालीन संत नामदेवने लिख रखा है -
नित्य हरिकथा नाम-संकीर्तन संत दर्शन सर्वकाल॥ आषाढ कार्तिकमें पंढरीकी यात्रा विठ्ठल अकेला सुखरूप ॥
ऐसी स्थितिमें पुनः पुनः विठ्ठलपंतके मनमें संन्यास लेनेकी बात आने लगी। वह अपनी पत्नीसे वही वही बात कहने लगा। रुक्मिणीने यह बात अपने पितासे कही। सिद्धेश्वरपंतने पुत्रीसे "बिना संतानके संन्यास न लेनेकी बात कहलवाई" कुछ दिन ऐसे ही बीते। विठ्ठलपंत पुनः अपनी पुरानी बात दुहराने लगे। वे बार बार कहते "मुझे संन्यास लेनेकी इच्छा हुई है। तू अपनी आज्ञा दे!" बार बार यही यही बात सुनकर रुक्मिणीने कभी असावधानीसे कह दिया "जाइये" बस यही अपनी पत्नीकी आज्ञा मान कर विठ्ठलपंत चल दिये। वे सीधा काशी गये। यहां पत्नी विठ्ठलपंतकी राह देखते देखते थक गयी। उसने सारी बात सिद्धेश्वरपंतसे कही। पिता आकर लडकीको अपने घर ले गये। वहां जाते ही रुक्मिणीदेवीने अश्वत्थ प्रदक्षिणादि अपने व्रतनियम प्रारंभ कर दिये।
३ संन्यास और संसार- काशी जाकर विठ्ठलपंतने किसी श्रीपादस्वामीसे संन्यास लेलिया और चैतन्याश्रमके नामसे वहीं गुरुके साथ रहने लगे। ऐसे ही कुछ काल बीता। चैतन्याश्रम शास्त्राध्ययन और ब्रह्म-चिंतनमें लीन रहने लगा। इस बीचमें श्रीपाद स्वामीने रामेश्वर - यात्राकी सोची। आश्रमका सारा दायित्व चैतन्याश्रम पर सौंप करके श्रीपादस्वामी रामेश्वर-यात्राके लिये रवाना हो गये। रामेश्वर यात्रामें प्रवास करते करते श्रीपादस्वामी आलंदी आये। आलंदीमें उसी प्राचीन- तम सिद्धेश्वर मंदिरमें उतरे। वहांका वही अश्वत्थ। रुक्मिणीदेवी नियमसे उस अश्वत्थकी परि- क्रमा करती थी। परिक्रमा करके अश्वत्थको प्रणाम करते समय सहज ही उन्होंने श्रीपादस्वामीको भी प्रणाम किया और, "पुत्रवती भव" स्वामीजीने आशीर्वाद दिया। स्वामीजीका आशीर्वाद सुन कर उस दुःखमें भी रुक्मिणीदेवीको हंसी आयी। स्वामीजीने कारण पूछा और देवीजीने सारी बात स्वामीजीसे कह डाली। देवीजीकी बातें सुनकर स्वामीजीको लगा हो या न हो, संभवतः चैतन्याश्रम ही इस दुखियाका पति है। सिद्धेश्वर पंतसे भी स्वामीजीकी बातें हुईं। स्वामीजीने कहा "आप अपनी पुत्रीको लेकर मेरे साथ काशी चलें। मैं विठ्ठलपंतसे आपकी भेंट करा देता हूँ। इतना ही नहीं पत्नीका स्वीकार करनेको कहूंगा!" श्रीपादस्वामी, सिद्धेश्वरपंत और रुक्मिणीदेवीको साथ लेकर काशी गये। पिता-पुत्रीकी अलग रहनेकी व्यवस्था करके स्वामीजी आप आश्रम गये। आश्रममें जाते ही स्वामीजीने चैतन्या-
९ ज्ञानेश्वर
श्रमको बुलाकर पूछा "तुम्हारे घरमें कौन कौन हैं ?" प्रश्न सुनकर चैतन्याश्रम सहमसे गये । उन्होंने सोचा, गुरु श्रीपाद स्वामीका रामेश्वरकेलिये जाकर बीच यात्रासे लौटने और आते ही चैतन्या- श्रमको बुलाकर ऐसा प्रश्न पूछनेमें हो न हो कुछ रहस्य अवश्य है ! चैतन्याश्रमने भी सारी सच्ची घटना गुरु श्रीपादस्वामीसे निवेदन करके "पत्नीकी आज्ञा लेकर आया था।" कहते हुए श्री चरणोंमें प्रणाम किया । श्रीपाद स्वामीने शिष्यको उठाया, और अपने पिताके साथ काशी आयी हुई रुक्मिणी- देवीकी भेंट कराके कहा "इसका स्वीकार करो । निषिद्ध कर्म मानकर मनमें इसका भय न करो । पर- मेश्वर तुम्हारे साथ है। अपने गांवमें जाओ और सुखरूप स्वधर्म मानकर गृहस्था श्रमका पालन करो !" अपने गुरु पर संशयातीत श्रद्धा ही चैतन्याश्रमका पाथेय था । गुरु-आज्ञा ही उनके लिये शास्त्र था । दूसरा मार्ग वह नहीं जानते थे। इसलिये गुरु आज्ञाको उन्होंने शिर आंखों पर चढ़ालिया । गेरूवे वस्त्र उतारे । गृहस्थाश्रमका चोगा पहना । पत्नीके साथ अपने गांवमें आये । संन्यास छोड़कर गृहस्थाश्रम स्वीकार करना लोक-रूढ़ी तथा धार्मिक परंपराके विरुद्ध था । लोक-निंदा स्वाभाविक थी । यह एक महा-पाप था । धर्म-भीरु ब्राह्मण-समाजने उनको बहिष्कृत किया । विठ्ठलपंतने गांवके बाहर एक झोपड़ी बांधी । एकांतमें ब्रह्म-चिंतनमें जीवन बिताने लगे । ऐसे बारह वर्ष बीते । यह काल उनके लिये अत्यंत क्लेश-कारक था । यह बारह वर्षकी तपस्या आगे आनेवाले महापुरुषोंके निर्माणकी तपस्या थी । स्वर्गको भी तुच्छ माननेवाले योग-भ्रष्ट आत्मा सहज सेंत-मेंतमें अवतरित नहीं होते । बारह वर्षकी ऐसी तपस्या पूरी होनेके बाद शा. श. ११९५ में श्रीमुखसंवत्सर माघबद्य प्रतिपदा सोमवारके दिवस सूर्योदयके समय श्रीनिवृत्तिनाथका जन्म हुवा । इसके दो वर्ष बाद शा. श. ११९७ युवा संवत्सर श्रावण वद्य अष्टमी-कृष्णाष्टमी गुरुवारकी मध्यरात्रीके समय श्रीज्ञानदेवका जन्म हुवा । शा. श. ११९९ ईश्वरसंवत्सर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा रविवार प्रहर रातमें श्रीसोपानदेवका जन्म हुवा और शा. श. १२०१ प्रमाथी संवत्सर आश्विन शुक्ल १ शुक्रवार मध्यान्हमें श्रीमुक्ताईका जन्म हुवा । उपरोक्त जन्मतिथियां स्पष्ट होने पर भी निर्विवाद नहीं है । सामान्य नियमानुसार इस बातमें भी विद्वानोंमें मतभेद है । कुछ विद्वानोंने श्रीनिवृत्तिनाथ शा. श. ११९०, श्रीज्ञानदेव शा. श. ११९३ श्रीसोपानदेव शा. श. ११९६, श्रीमुक्ताई शा. श. ११९९ ऐसा जन्मकाल दिया है । दोनों ओरके विद्वानोंने अपने मत-प्रतिपादनमें पर्याप्त आधार दिये हैं और अंतमें यह भी कह दिया है कि इन दो कालके विषयमें एकवाक्यता करनेका प्रयत्न करना व्यर्थ है । शायद इन दो मेंसे कोई एक सच होगा या दोनों गलत होंगे ! अस्तु, प्रत्येक भाषाके साहित्यमें, प्रत्येक महत्वके प्रश्न पर, विद्वानोंके ऐसे निर्णय होते ही हैं, नहीं तो भला वह विद्वत्ता किस बातकी ? विद्वान भले ही किसी निर्णय पर पहुंचे । विठ्ठलपंतके ये चार संतान हुए थे इस बातमें तो किसीको कोई संदेह नहीं ! इन चारोंको ही महाराष्ट्रने आदर्श- पुरुष मानकर अक्षरशः सिर पर लिया । उनके महानिर्वाणके सात सौ वर्ष बाद भी आज उनकी समा- धियोंपर मेले लगते हैं, और लाखों लोग वहां जाते हैं । किंतु उन्ही बालकोंका बचपन अत्यंत करुणा- जनक स्थितिमें बीता । इनके जन्मके बाद माता-पिताको अनन्वित हाल सहने पड़े । किसीभी महान व्यक्तिको अपनी परंपराको तोड़कर नयी परंपरा निर्माण करते समय जो दुःख कष्ट उठाने पडते हैं, जो अपमान सहने पडते हैं, वे सब विठ्ठलपंतको सहने पडे ही। साथ ही साथ, इन अबोध बाल- कोंके भावी जीवनके विषयमें सोचकर उन्हे जो वेदनाएं हुई होंगी, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती; क्यों कि जैसे संन्यास छोड़कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करने वालेका मुखावलोकन अथवा दर्शन पाप हे असगुन है, वही बात संन्यासीके लडकोंकी थी ! उनके नसीबमें भी माता पिताके ज्ञानेश्वरी ८
संचितकर्मके रूपमें वे सब दुःख, क्लेश, अपमान, बहिष्कार आदि स्वाभाविक था। ऐसे वातावरणमें वे बालक बड रहे थे। संभव है कि उन बालकोंको बाहर जितना डांट फटकार पडा, उससे अधिक घरमें प्रेमवात्सल्य तथा सहानुभूति मिली हो ! घरमें भारतीय वाङ्मयका गहरे प्रभाव भी पडे हों। रामायण और महाभारतके कहानियोंसे उनके मन बुद्धि खिली हो ! साथ साथ तीर्थयात्राके प्रेमी विठ्ठलपंतके साथ कुछ यात्राएँ भी हुई हो। किंतु विठ्ठलपंतके मनमें सदैव इन बालकोंका विचार रहा होगा ! इनका जनेऊ कैसे हो ? समाजमें इनका क्या स्थान है ? समाजसे होनेवाले बहिष्कार तिरस्कारसे इन बालकोंको बचानेके लिये तथा समाजमें उनको उचित स्थान दिलानेके लिये माता- पिताका तडपना स्वाभाविक है। इस लिये उन्होंने अत्यंत बचपनसे अपने ही बालकोंका विद्याध्ययन भी किया होगा। ४ तपश्चर्या और ब्रह्मदीक्षा- ऐसी स्थितिमें विठ्ठलपंत अपनी पत्नी और पुत्रोंको साथ लेकर त्र्यंबकेश्वर गये। त्र्यंबकेश्वर महाराष्ट्रका एक पुण्य-क्षेत्र है। परमपावनी गोदावरीका उगमस्थान, वहां ब्रह्मगिरि- पर्वत है। पवित्र पर्वत ब्रह्मगिरि, देह- दंडनसे पापक्षालनकनके विचारसे विठ्ठलपंत रातके समय उस ब्रह्मगिरीकी परिक्रमा करने लगे। ऐसे ही समय एक दिन अकस्मात शेर आनेसे परिवार अस्त व्यस्त हो भागने लगा। शेरसे बचनेके लिये भागने वाले निवृत्ति, गुहामें समाधिस्थ गहिनीनाथकी गोदमें जा पडे। गहिनी नाथ और निवृत्ति, अनेक पीढियोंका संबध । विठ्ठलपंतके दादा त्र्यंबकपंतको स्वयं गोरखनाथने उपदेश दिया था। गहिनीनाथ गोरखनाथके पट्ट शिष्य। निवृत्तिनाथके दादा गोविंदपंत और दादी नीरादेवीको गहनीनाथने उपदेश दिया था। जिसका परदादा गुरुबंधु और दादा शिष्य, और पिता ? गहिनीनाथके अनुग्रहसेही उनके माता पिताकी वृद्धावस्थामें हुई संतान था ! शायद गहिनीनाथने अनुभव किया होगा कि नाथपरंपराका पुण्य - फलही मेरे सम्मुख आ खडा है। गहिनीनाथने उस बालकको पास लेकर सिरपर हाथ रखा। दीक्षाके रूपमें नाथसंप्रदायका सारसर्वस्व उसको दे डाला !! बाघके भयसे गुहामें गये हुए निवृत्तिनाथ संपूर्ण निर्भय होकर गुहासे बाहर आये। गुहामें वे कितने दिन रहे इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। निवृत्तिनाथ घर आये और उन्होंने अपने सभी भाइयोंको “अपने जैसे ही किया है तत्काल !” वाली कहावत सच कर बताई ! किंतु विठ्ठलपंतकी दृष्टिसे निवृत्तिनाथ उपनयनके लिये योग्य था। गांवके ब्राह्मण, विठ्ठलपंत और इन बालकोंका मुखा- वलोकन भी पाप समझते थे। ऐसी हालतमें बालकोंका जनेउ कैसे हो ? आखिर अपने बालकोंके अभ्युदय निःश्रेयसके लिये विठ्ठलपंत ब्राह्मणोंकी शरण गये। बिना इसके दूसरा चारा ही नहीं था। ब्रह्म सभा बैठी। शास्त्रोंकी पोथियां खुलीं। किंतु धर्म-ग्रंथोंमें ऐसा कोई आधार नहीं मिला अथवा ऐसा कोइ प्रायश्चित्त नहीं मिला जिससे “संन्याससे गृहस्थाश्रममें आये हुए व्यक्तिका अथवा संन्यासीके लडकोंका शुद्धिकरण हो !” इसके पहले यदि ऐसी कोई घटना हुई होती तो शास्त्रोंमें ऐसा उल्लेख होता। शास्त्रकारोंने सामाजिक अभ्युदयको ध्यानमें रखकर वर्णाश्रम व्यवस्था बनाई। मनुष्यकी संपूर्ण शक्ति- यांका समाजके हितमें पूर्ण उपयोग हो इसलिये वानप्रस्थ और संन्यासकी व्यवस्था की। यदि किसीमें तीव्र वैराग्य उदय हुआ है तो, वह कुछ पहले चतुर्थाश्रम ले सकता है किंतु तीव्र वैराग्यसे चतुर्थाश्र- ममें गया हुआ मनुष्य भला संन्याससे गृहस्थ क्यों बनेगा ? इसके पहले कभी ऐसी समस्या पैदा ही नहीं हुई होगी ! अंतमें शास्त्रमें जिस महापापका कोई प्रायश्चित ही नहीं उसके लिये देहांत प्रायश्चित ही है ! पाप हुवा निश्चित। नहीं होनी चाहिये थी और अब तक नहीं हुई थी, ऐसी बात हुई है। विठ्ठलपंतको पश्चाताप हुवा है। वह प्रायश्चित्त चाहता है। शास्त्र कोई प्रायश्चित्त नहीं कहते। ९ ज्ञानेश्वर
तब देहांत प्रायश्चित्त ही है ! ब्राह्मणोंने विठ्ठलपंतसे कहा "शास्त्रमें आप तथा आपके परिवारको शुद्ध करलेनेका कोई प्रायश्चित्त नहीं है। इसके लिये देहांत प्रायश्चित्त एक मात्र प्रायश्चित्त है। अब आप विचार करके जो योग्य है सो कीजिये !" विठ्ठलपंत जन्मतः विरक्त । संन्यास लिया था तब संसारकी ममता टूट चुकी थी। संन्यास छोड़ा तब संन्यस्तका अहंकार भी समाप्त हुआ। केवल कर्तव्य-रूप जीवन बिता रहे थे। यदि उनके देहत्यागसे संतानका भला होता है, उनको अभ्युदय और निःश्रेयसका अधिकार मिलता है, तब वे कहां पीछे हटनेवाले थे ? उन्होंने ब्रह्मसभाको वंदन कर कहा " त्रिवेणीमें शरीर त्याग करके मैं यह प्रायश्चित्त लूँगा" ! और "पीछे मुड़कर देखनेके पहले" चल पड़े । उनकी धर्म-पत्नी उनकी छायाकी भांति उनके पीछे थी ही। विठ्ठलपंत शरीर त्यागके लिये आलंदीसे प्रयागराज तक चलते गये ! भारतके महापुरुषोंने भारतकी भावात्मक एकताकी नींव ऐसे डाली है ! ! शास्त्रज्ञोंने विठ्ठलपंतको देहांत प्रायश्चित्त कहा। पिताके विषयमें शास्त्रोंका यह कठोर निर्णय सुनकर भी ज्ञानेश्वर महाराज लिखते हैं - शास्त्र कहता यदि कुछ तजना । राज्य-सुख-भोग तृण मानना । विष लेने कहता तो ना कहना । शब्द विरुद्ध ॥ १६-४६० ॥ यहां महापुरुषोंके हृदयकी गहराई दीखती है। उनकी महानताका दर्शन होता है। ज्ञानेश्वरी एक मौलिक चिंतन है किंतु मौलिकताके नशेमें कहीं भी निष्ठा हीनता नहीं दीखती। परंपरापर आघात नहीं। वैचा- रिक कटुता नहीं। सदैव सर्वत्र उदार, विचार सभी प्रकारकी निष्ठाका पालन । यह ज्ञानेश्वरीकी विशेषता है। ५ जीवन समर्पण हुवा किंतु समस्या वैसी ही रही - माता पिताने त्रिवेणीमें देहार्पण किया किंतु संन्यासीके पुत्रोंकी सामाजिक अथवा धार्मिक समस्या वैसे ही बनी रही। ब्रह्मसभाके सम्मुख विठ्ठलपंतका जो प्रश्न था "इन लडकोंका क्या होगा ?" यह प्रश्न ही रहा। केवल प्रश्न कर्ता बदला ! पहले विठ्ठलपंतने ब्राह्मणसभासे यह प्रश्न पूछा था अब निवृत्तिनाथने पूछा ब्राह्मणोंने कहा "आप पैठण जाइये। पैठणसे शुद्धी-पत्र लाइये। तब हम आपका स्वीकार करेंगे। हमारे पास आपके प्रश्नका उत्तर नहीं है।" इस पर निवृत्तिनाथ विरक्त हुए। "देहाश्रित वर्णाश्रम विहित कर्मबंधनके फंदेमें फसनेकी हमें कोई आवश्यकता नहीं " निवृत्तिनाथने कहा। सोपान देवको भी "ब्राह्मणोंद्वारा पावन होनेकी आवश्यकता " प्रतीत नहीं हुई। किंतु ज्ञानदेव, इससे सहमत नहीं थे। उनका कहना था "स्वरूप लीन स्थितिमें इसकी आवश्यकता नहीं यह स्वीकार। किंतु विधिबाह्य आचरण दूषण है यह वेदका मत। कुल धर्म पावन है, यह शास्त्रवचन । संतोंको इसका पालन करना ही चहिये। यदि वही समा- जके पथप्रदर्शक, शास्त्रविरुद्ध चले तो लोगोंके सम्मुख कौनसा आदर्श होगा ? इसलिये इसका विचार आवश्यक है।" सबने ज्ञानदेवकी बात स्वीकार की। ये दस बारह वर्षके बालक पैठणके विद्वान ब्राह्मणोंसे न्याय मांगने निकले । बारह वर्षके निवृत्तिनाथ, दस वर्षके ज्ञानदेव, आठ वर्षके सोपान और छ वर्षकी मुक्ताई !! आलंदीसे पैठण। पैठणके विद्वान ब्राह्मण-सभाके सम्मुख निवृत्तिनाथने आलंदीके विद्वानोंका पत्र रखा। अपनी सारी बात कही । "संन्यासीका संतान" इस शब्दसे ही "माता पिता तथा उनके संतान दोनों कुल-भ्रष्ट है। उनको किसी प्रकारका कोई प्रायश्चित्त नहीं है ! !" ब्राह्मण सभाने यह निर्णय दिया । ज्ञानेश्वरी १०
“ किंतु हमारी गति क्या ?” निवृत्तिनाथका प्रश्न स्पष्ट था । इसका कोई उत्तर नहीं दे सकते । किंतु उत्तर न देना भी अल्पताका द्योतक है ? विद्वान इस अल्पताको कैसे स्वीकार करेंगे ? यदि किसी प्रश्नपर निरुत्तर रहे तो विद्वत्ता किस बातकी ? निरुपाय होकर विद्वानोंने कहा “शास्त्र सम्मत ऐसा एक ही उपाय है, परमात्माकी अनन्य भक्ति करना ! प्राणिमात्रसे नम्र होकर व्याकुल भावसे भजन करना । ब्राह्मण और चांडालमें भेद न करते हुए सबको प्रणाम करना ! ” सुनकर सबको संतोष हुआ । सबने प्रसन्न मनसे कहा ‘ हमको यह स्वीकार है !! ” ६ प्रवृत्ति चक्रप्रवर्तन- किंतु बात यहीं नहीं रुकी । ब्राह्मणसभाके बाद, वहीं कुछ लोगोंने, निवृत्ति ज्ञानदेवादि के नाम पर कुछ निंदा नालस्ती की । ज्ञानदेवकी सहज कही हुई बातको लेकर निवृत्ति ज्ञानदेवको चुनौति दी गयी और वहां ज्ञानदेवकी योग-सिद्धियोंके अनेक चमत्कार दिखाये । इससे पैठणके विद्वान लोग आश्चर्य चकित हो गये । इन छोटे छोटे बालकोंके नेत्र दीपक योगसामर्थ्यसे ब्राह्मणसभा हतबुद्ध हो गयी । हम यहां किस लिए एकत्र हुए थे यह भी सब भूल गये । ब्राह्मण सभाके सम्मुख जो प्रश्न था वैसे ही रहा और अनजानमें सभा विसर्जन भी हो गयी । इस घटनाके बाद, निवृत्ति ज्ञानदेवादि कुछ काल पैठणमें रहे । पैठणमें वे कुछ काल अध्यात्म- ग्रंथोंका अवलोकन करते, दोपहरको प्रवचन होता और रातको भजन, कीर्तन । इसके बाद, उस कालका महान विद्वान, पंडित बोपदेवने शुद्धिपत्र लिखा । “ये स्वर्गीय देव- त्रयका अवतार रूप हैं । इनको कौन और क्या शुद्धिपत्र दें ?” इससे निवृत्ति-ज्ञानदेवकी कीर्तिसुगंध चारों ओर फैल गयी । इन बालकोंने पैठण छोडा । चारों ओरसे इन्हें बुलावा आने लगा । पहले संन्यासीकी संतान कह कर अवमान होता था अब इसी बात पर सम्मान होने लगा । लोक-मानस सदैव झूलेकी भांति रहा है । वे चारों भाई बहन पैठनसे चले । जैसे पैठनमें ब्राह्मण-सभाने जो कुल-धर्म कहा था “सबको समान मान कर परमेश्वरकी अनन्य भक्ति ” यही एक व्यवसाय था । बिना इसके दूसरा कोई कार्य नहीं था । परमात्म भक्तिका कार्य करते करते इनका संचार प्रारंभ हुआ । ऐसा प्रवास करते करते वे प्रवरानदीके किनारे पर बसे नेवासा गांवमें आये । वहां ज्ञानदेवके गीताप्रवचनोंको लिख लेनेवाला सच्चिदानंद बाबा मिला । वहां शिवालयमें ज्ञानदेव प्रवचन करते और सच्चिदानंद बाबा उनको लिख लेते ! ऐसे शा. श. १२१२ में ज्ञानेश्वरी ग्रंथ तैयार हुआ । ज्ञानदेवकी वाणी सच्चिदानंद बाबाने लिपि-बद्ध की; ग्रंथ तैयार हुआ । संभवतः सच्चिदानंद बाबाने कृतार्थताका अनुभव करके समय देखकर—जब श्रीगुरु निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेवादि साथ बैठे थे तब-लिपि बद्ध वह ग्रंथ श्रीगुरुके सम्मुख रख कर प्रणाम करते हुए कहा “यह भावार्थ-दीपिका तैयार हो गयी है ।” इस पर श्रीगुरु निवृत्तिनाथने इस ग्रंथकी ओर आंख उठाकर देखनेके पहले ही कहा “मुकुंदराजका परमार्थसार विशुद्ध ग्रंथ है । उसमें अपने अनुभवके अलावा और कोई आधार नहीं है !” सच्चिदानंद बाबाने ग्रंथ उठालिया । ज्ञानदेवने इस बातको “केवल अपने अनुभवके आधार पर ग्रंथ लिखनेकी आज्ञा ” समझा और “अनुभवामृत” लिखा । अनुभवामृत ज्ञानेश्वर महाराजका अपना मौलिक ग्रंथ है । उसको किसीका आधार नहीं है । किंतु जन्म भर पढने पर भी उस छोटेसे ग्रंथका अभ्यास नहीं हो पाता । जितनी बार पढते हैं उतनी बार एक न एक नया अर्थ झलकता है । यह ग्रंथ चिंतनशील साधकको नित्य नया आनंद ११ ज्ञानेश्वर
और नया मार्गदर्शन देता है । इस ग्रंथ पर महाराष्ट्रके ४३ विद्वान, साधु संतोने, भाष्य लिखा है, फिर भी इसका अभ्यास करना रहा ही है !! कुछ विद्वान लोगोंका कहना है "नाथसंप्रदायका सारा तत्वज्ञान और अंतिम अनुभव इस ग्रंथमें देखनेको मिलता है।" कुछ विद्वान कहते हैं "इसमें आधुनिक विज्ञानके बीज देखनेको मिलते हैं।" इसके बाद जैसे कमलकी सुगंधसे भ्रमर खींचे जाते हैं वैसे महाराष्ट्रके संतजन ज्ञानदेवकी ओर खींचे जाने लगे । नामदेव परिवार, गोरा कुंभार, नरहरी सोनार, विसोबा खेचर, सावता माली, सेना नाई, बंका महार, जनाबाई, भागू महारीण, ब्राह्मणसे चांडालतक सारे स्त्रीपुरुष संत-जन निवृत्ति-ज्ञानदेवके चारों ओर सूर्य-किरणकी भांति एकत्र हुए ! और ज्ञानदेवकी कीर्ति सुगंध तापी तीरपर योग-साधनामें लीन चांगदेव तक पहुंच गयी ! वे अपनी योग-शक्तिके बल बूते पर प्रचंड शक्तियोंके स्वामी बने हुए थे । उन्होंने ज्ञानदेवके दिखाये हुए योग-चमत्कार सुने ! जो भैंसेके मुखसे वेद कहलाये ! ऐसे ये नये योगी कौन ? उन्होने ज्ञानदेवको पत्र लिखा । ज्ञानदेवने पत्रका उत्तर लिखा । ६५ छंद, ओबियां । उसको 'चांगदेव' पासष्टी कहते हैं । यह पढ़ कर चांगदेव चमत्कृत हो गये । इसकी भावानुभूति उनकी शक्तिके परेकी बात थी । उनकी जिज्ञासा बढ़ी । वे अपनी योगशक्तिका संपूर्ण परिचय देते हुए ज्ञानदेवसे मिलने आये । ज्ञानदेवने वैसे ही उनका स्वागत किया । चांगदेव दिखाना चाहते थे बुद्धिके बल बूते पर मैंने समग्र जीवसृष्टि पर स्वामित्व पाया है और श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी प्रेरणासे ज्ञानदेवने दिखाया भावुकके लिये निर्जीव ऐसा कुछ भी नहीं । मनुष्य अपनी भावशक्तिसे निर्जीवको भी सजीव बना सकता है । जीवसृष्टि पर स्वामित्व पाये हुए चांगदेव, निर्जीव सजीव यह भेद मिटाये हुए ज्ञानदेवकी शरण आये ! ज्ञानदेवने मुक्ताईके द्वारा चांगदेवको आत्मानुभव कराया । ७ तीर्थयात्रा और महा-यात्रा- नामदेव पंढरपुरका पगला । उसका सारा विश्व पंढरपुरमें । विठ्ठल उसका सर्वस्व । जो कोई मिला पंढरपुर ले चलो । वे निवृत्ति ज्ञानदेवको भी पंढरपुर लाये । पंढरपुरका अर्थ भजन कीर्तन ! वहां दिन रात भजन कीर्तन चलता रहता है । और ज्ञानदेव "हरिनाममें नित्यतृप्त !" पंढरपुरमें कुछ काल रहनेके बाद तीर्थयात्राकी बात सूझी । उनको तो समाजको मार्ग-दर्शन करना था अथवा अपने आनंदसे विश्व भरना था ! ज्ञानदेवने नामदेवको साथ बुलाया । नामदेव कहता है "मेरा प्राण पंढरपुरकी देहरीसे अटका है !" विश्वके अणुअणुमें आत्मदर्शन करने वाले ज्ञानदेव और विठ्ठलके अलावा सब कुछ सूना कहनेवाले नामदेव ! नामदेवको विठ्ठल वियोग असह्य ! अंतमें इसी विठ्ठलकी आज्ञासे नामदेव ज्ञानदेवके साथ यात्रामें गये । यह यात्रा छ साल तक चली । ज्ञानदेव नामदेवादिकी यह यात्रा बहता हुवा अमृत प्रवाह है । पंढरपुर, नाशिक, सह्याद्रीका सातपुडा पार करके, गुजरातका सोमनाथ, द्वारका, प्रभास, उज्जैन, प्रयाग, काशी, अयोध्या, गया, मथुरा, वृंदावन करके छ सालके बाद पुनः पंढरपुर आये । यहां ज्ञानदेवका जीवन कार्य समाप्त हुआ । पानेका सब कुछ कबके पा चुके थे, अब करनेका सब कुछ कर चुके । तब भला शरीर धारणाकी क्या आवश्यकता ? उन्होने श्रीगुरु निवृत्तिनाथ तथा पंढरीनाथसे चिर-समाधीकी आज्ञा मांगी । ज्ञानदेवने इंद्रायणीके किनारे आलंदीमें, माता जिस अश्वत्थकी परिक्रमा करती थी उस स्वर्ण अश्वत्थकी छायामें, पिताके श्रीगुरुने जहां बैठकर माताको "पुत्रवती भव" का आशीर्वाद दिया था वहां, उस अजानवल्लीके पास गुहामें समाधि-स्थान निश्चित किया । श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी आज्ञा लेकर कार्तिक वद्य त्रयोदशीका दिवस समाधि दिवस निश्चित किया गया । कार्तिक शुद्ध देवोत्थान एकादशीको पंढरपुर आयेहुए सारे संतजन एकादशीके उत्सव समाप्त करके ज्ञानेश्वरी १२
ताल तंबोरा मृदंगके साथ, धर्म-पताका कंधोंपर लिये हुए, पंढरपुरसे आलंदी आये। आलंदीका इंद्रायणी नदी किनारा 'राम कृष्ण हरि" से गूंजने लगा। "श्रीहरि विठ्ठल जय हरि विठ्ठल" के जय घोष आकाशसे भिड़ने लगे। सारे संत सज्जन इंद्रायणीके किनारे अश्रुभरी आंखोंसे "उस काल" की प्रतीक्षा करने लगे। क्षण क्षण युगसा लगता था। अंतमें समय आया। ज्ञानदेव उठे। शांत, धीर, गंभीर, नयना- भिराम, स्फुरद्रूपी युवक, धीरे धीरे कदम बढाकर अपने अग्रज, श्रीगुरु, जिनकी कृपासे शब्दोंसे कही नहीं जा सकनेवाली बात शब्दचित्रोंसे सुननेवालोंकी आंखोंके सम्मुख प्रत्यक्ष ला रखी, ऐसी गुरु-माउली श्रीनिवृत्तिनाथके चरणोंमें झुककर चरणपर मस्तक रखा चरण वंदना की। अंतिम चरण-वंदना ! अखंड चरण वंदना ! सागरकी भांति, सदैव अपनी सहज साम्यावस्थामें स्थिर गंभीर मर्यादामें रहनेवाले श्रीगुरु निवृत्तिनाथने भी, इस समय चंद्र देखकर उछलनेवाले सागरकी भांति, गुरु शिष्यकी सारी सीमाओंको तोडकर, ज्ञानदेवको, अपने छोटे भाईको, अपने एकमात्र शिष्यको, उठाकर गले लगाया। बाल संवारे, मोक्ष सिंहासनकी महायात्रामें निकले हुए इस यात्रीके अंग अंग स्पर्श करके गुरु-स्पर्श कवचसे अजय किया ! अमर किया ! सोपान और मुक्ताईने अपने अग्रज और श्रीगुरुके चरणस्पर्श किये। "तुम्हे भी यह सुख मिलेगा एक दिन।" ज्ञानदेवने उन्हे आशीर्वाद दिया। आश्वासन दिया। श्रीगुरु निवृत्तिनाथ अपने एक मात्र प्रिय शिष्य, अपने ब्रह्मानुभवका सर्वस्व-धरोहर, ज्ञानदेवको समाधिके सुखासन तक ले गये। वह सुखासन प्रातःकालसे नामदेवके पुत्रोंने लीप पोत कर शुद्ध किया था। महाराष्ट्रके संतोंने उस पर कोमल तृणांकुर बिछाकर सजाया था। प्रत्येक संतने अपना अपना तुलसी पत्र रखा था। महाराष्ट्रके सभी संतोंके सद्भाव, श्रद्धा, आशीर्वादसे, शाश्वत सुखके लिये सजाया गया वह "संजीविनी समाधि" का अखंड दीर्घ समाधीका सुखासन, उस पर श्रीगुरु निवृत्ति नाथने अपने शिष्यको बिठाया। ज्ञानदेव उस समधिके सुखासन पर बैठे। श्रीगुरुनिवृत्तिनाथकी चरण-वंदना कर ज्ञानदेवने एक सौ एक छंदोंका संत वंदन किया। सारा संत समाज सांस रोक कर अपने आराध्यदेवका अंतिम वंदन स्वीकार कर रहा था आंखें अश्रु सुमनांजली अर्पण कर रही थीं। वंदन समाप्त हुवा। ज्ञानदेवकी धीर गंभीर वाणी गूंज उठी। अजी ! ध्यानसे चित दीजिए ! सबसुखका पात्र बनिए ! प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये ! प्रकट बात ॥ ज्ञानेश्वरीका नौवा अध्याय। राज-विद्या, राजगुह्य- ईश्वर-समर्पणयोग, जीवन साधनका सार सर्वस्व। ज्ञानदेव वह गाने लगे। सारे संत समाजको दिया गया उस योगेश्वरका यह अंतिम संदेश। संत जन अपने कोटि कोटि रोमकूपोंके कान बनकर वह सुनने लगे। आंखें अश्रु सुमनोंकी माला गुंथने लगीं, प्राण अकुलाकर तडपने लगे। मन, बुद्धि, भाव, चित्त, अंतःकरण, सारा वातनामय सा अनुभव होने लगा। अजी देना अवधान। चढना आनंद सिंहासन । झाली दैवाने माला श्रवण- । इंद्रियको आज ॥ नौवा अध्याय पूर्ण हुवा। श्रीगुरुनिवृत्ति नाथने, जिनकी कृपासे ज्ञानदेवका शरीर भी इतना दिव्य हो गया था कि "जिसे मृत्यु भी छूनेफा साहस नहीं कर सकती थी" समाधिद्वार पर पत्थर रख कर उसे सर्वदाके लिये बंद कर दिया। और अब तक रुकी हुई संतवाणी कल्पांतके पानीकी भांति आकाशको चीर कर ब्रह्ममें लीन हो गयी। पुंडलीक वरद पांडुरंग हरि विठ्ठल !!! १३ ज्ञानेश्वर
इस महोत्सवके एक ही महिनेमें मार्गशीर्ष वद्य त्रयोदशीको आलंदीके पास सासवडमें श्री सोपानदेवने भी वही शाश्वत सुख पाया। सोपानदेवकी इस मोक्ष-तिथिके पांच महिने बाद वैशाख बद्य द्वादशीको तापी नदीके किनारे पर बिजली कडकी और मुक्ताई खो गयी। स शरीर समाधि। और ठीक एक महिने बाद, वह आदर्श श्रीगुरु निवृत्ति नाथ, अपने शिष्यको तथा उनके शिष्योंको भी, अंतिम स्थान तक मार्गदर्शन करके, वहां पहुंचने तक उनको अपना संरक्षण देकर, आगे आगे लडखडाते चलनेवाले अबोध बालक पर अपनी प्रेम दृष्टिकी छाया करके पीछे चलनेवाली ममता मयी मांके भांति, वे जहांसे आये वहां पहुंचाकर, उन्होंने "ज्यों की त्यों धरि दीन्ही चदरियां" यह देख कर कृतार्थ भावसे, त्र्यंबकेश्वरमें महा-लीन हो गये। तब नामदेवका हृदय अकुलाकर गा उठा अस्त हुवा भानु पढा है अंधार। गये निवृत्तिनाथ योगेश्वर ॥ और विठ्ठलका वह एकाकी सुभट, नामदेव, सारे भारत वर्षमें विठ्ठल-नाम गूंज उठे इस महान संकल्पसे, पंढरपुरसे पंजाब तक, भजन गाते गाते चले और अंतिम क्षणमें पंढरपुरमें आकर सपरिवार विठ्ठल चरणोंमें लीन हो गये ।
८ ज्ञानेश्वर चरित्रके कुछ विवाद प्रश्न- ज्ञानेश्वरके विषयमें इतना लिखनेके बाद उनके जीवनके विषयमें अब तक जो वाद- विवाद चले हैं उसका कुछ उल्लेख करना भी आवश्यक है, नहीं तो वह अधूराही रहेगा। ज्ञानेश्वरके जन्म-स्थानके विषयमें भी महाराष्ट्रके विद्वानोंमें एक वाद है। ज्ञानेश्वरका जन्म कहां हुवा था ? आपेगांव या आलंदी ? कुछ विद्वान लिखते हैं कि “आपेगांवमें ज्ञानेश्वरादि चार बंधुओंका जन्म हुवा" तो कुछ विद्वानोंका मत है कि "इन बंधुओंका जन्म आलंदीमें" हुवा। निवृतीनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव तथा मुक्ताईके साहित्यमें इस विषयमें कुछ भी उल्लेख नहीं है। तथा समकालीन संत नामदेव, जिन्होंने निवृत्ति ज्ञानदेवके विषयमें ही नहीं उनके माता पिताके विषयमें भी बहुत कुछ कहा है; किंतु उसमें कहीं भी इसके विषयमें कुछ भी उल्लेख नहीं है; किंतु विद्वान लोग उस समयकी परिस्थितिका विचार करके "अपने मतसें" निर्णय करते हैं कि "उनका जन्म आपेगांवमें हुवा अथवा आलंदीमें हुवा !" साथ साथ वे समकालीन संत वचनोंका ऐसा आधार लेते हैं कि जनसामान्यको उन्हीका कहना सच लगे ! किंतु आलंदीमें आज भी ज्ञान- देवके नानाके घरकी जगह और उनका जन्म-स्थान दिखाया जाता है। और एक जगह ऐसी दिखाई जाती है कि जहां श्रीविठ्ठलपंतकी झोपडी थी और वे वहां अपने पुत्रपुत्रीके साथ रहते थे। उस स्थानको सिद्धबेट कहा जाता है।
वैसे ही, उनके जन्मस्थानकी तरह जन्म दिनका भी एक वाद है। उनका जन्म दिन (१) निवृत्तिनाथ श. श. १११५ श्रीमुखसंवत्सर, माघवद्य १ सोमवार प्रातः काल (२) ज्ञानदेव शा. श. १११७ युवा संवत्सर श्रावण वद्य ८ गुरुवार मध्यरात्र, (३) सोपानदेव शा. श. १११९ ईश्वर संवत्सर कार्तिक शुद्ध १५ रविवार प्रहर रात्र, (४) मुक्ताई शा. श. १२०१ प्रमाथी संवत्सर आश्विनशुद्ध १ शुक्रवार मध्यान्ह है अथवा (१) निवृत्तिनाथ शा. श. १११० (२) ज्ञानदेव शा. श. १११३ श्रावण व ८ मध्यरात्र. (३) सोपानदेव शा. श. १११६ और (४) मुक्ताई शा. श. १११९ है ! इस विषयमें भी विद्वानोंमें मतभेद है।
ज्ञानेश्वरी २४
इसके साथही साथ निवृत्ति ज्ञानदेवादिके पिता श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षा-गुरुके विषयमें भी एक वाद है। निवृत्ति ज्ञानदेवके समकालीन संत नामदेव श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षा-गुरुके विषयमें कहते हैं "श्रीपाद गुरु !" यह नाम तीन चार स्थान पर आया है। नाथ संप्रदायके दूसरे एक संत- ज्ञानेश्व- तरकालीन निलोबा कहते हैं "नृसिंहाश्रम" ने विठ्ठलपंतको दीक्षा देकर "चैतन्याश्रम" बनाया। संत नामदेव भी विठ्ठलपंतका संन्यासाश्रमका नाम "चैतन्याश्रम" कहते हैं। किंतु भारतीय अर्वाचीन कोशमें श्री र. भा. गोडबोले कहते हैं कबीरदासके गुरु श्री रामानंद श्रीविठ्ठलपंतके दीक्षागुरु थे ! इस पर अनेक विद्वानोंके कथनका विचार करने पर ऐसा लगता है कि ज्ञानदेवका जन्म कबीरदासके जन्मसे सामान्यतया १२५ वर्ष प्रथम हुवा था। श्री विठ्ठलपंतकी संन्यासदीक्षा इससे ३० वर्ष प्रथम हुई थी। इस दृष्टिसे विचार किया जाय तो कबीरकी दीक्षाके समय श्री रामानंद करीब १८० वर्षके रहे होंगे जो संभव नहीं दीखता। साथ साथ ज्ञानदेव और रामानंदके तत्त्वज्ञानका भी कहीं कोई संबंध नहीं है। महाराष्ट्रके विद्वानोंने अनेक दृष्टिसे विचार विनिमय करके इस बातको अस्वीकार कर दिया है! ऐसे करते समय महाराष्ट्रके विद्वानोंने, सर्वश्री हरिऔध, मिश्रबंधु, श्यामसुंदरदास, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामकुमार वर्मा, पुरुषोत्त- मदास श्रीवास्तव आदि हिन्दी विद्वानोंके पर्याप्त उद्धरण दिये है और रामानंद और ज्ञानेश्वरके कालके अंतरके साथ ज्ञानदेवको विठ्ठलपंतसे रामानंद संप्रदायके सिद्धांतोंका जरा भी बोध न होनेकी बात भी कही है।
इसके अलावा और एक वाद है, और वह है ज्ञानदेव अथवा ज्ञानेश्वर एक ही व्यक्ति है या दो भिन्न व्यक्ति ! इस पर विद्वानोंने खूब लिखा है। इसमें योगी ज्ञानेश्वर और भक्त ज्ञानेश्वर ऐसा भेद भी किया है। इस पर परस्पर विरोधी ऐसा इतना अधिक लेखन हुवा है कि उसका उल्लेख करना भी कठिन है। उसमें दिये गये कई उदाहरण केवल विद्वानोंको ही शोभा देते हैं। साथ साथ ज्ञानेश्वरीमें कहीं भी विठ्ठलका नाम निर्देश न होनेका भी एक कारण है, क्यों कि ज्ञानदेवके अभंगोंमें सर्वत्र विठ्ठल है। किंतु नाथ संप्रदाय स्वयं योग और भक्तिका सुंदर समन्वय है और भक्त ज्ञानदेवके अभंगोंमें योगके अनेक रहस्य कहे गये हैं जिसके बीज ज्ञानेश्वरी और अनुभवामृतमें हैं। पू. विनोबाजीने “ज्ञानदेवाचे अभंग” इस पुस्तकमें लिखा है "ज्ञानदेवके इन अभंगोंके अध्ययनके बिना उनके योगका पूर्ण बोध होना संभव नहीं !” वस्तुतः योग और भक्ति परस्पर भिन्न है यह कल्पना ही अज्ञानजन्य है। योगी ज्ञानेश्वरकी ज्ञानेश्वरीमेंसे कई स्थान पर भक्तिका पवित्र झरना फूट पडता है तो भक्त ज्ञानेश्वरके अभंगों- मेंसे योगके अनेक रहस्य खुलते हैं ज्ञानेश्वरीमें जिस गवाक्षका पर्दा नहीं उठा है। किंतु विद्वान लोगोंकी तर्क शक्तीकी मोहिनी इतनी प्रबल है कि वह व्यास पीठपर एक ज्ञानेश्वरकी घोषणा करनेवालोंको भी खानगी बातोंमें “अभंग, ज्ञानेश्वरी लिखनेवाले ज्ञानदेवके नहीं हो सकते" कहनेके लिये ललचाती है।
अस्तु, इसके साथ ही साथ ज्ञानेश्वरी नेवासामें लिखी गयी या आपेगांवमें ? ऐसा भी एक वाद है किंतु ज्ञानेश्वरी की अंतिम ओवियोंमें जो ज्ञानेश्वरीका स्थल काल कहती है उस ओवीका एक एक शब्द लेकर, उसके साथ ही साथ नेवासा क्षेत्र महात्म्यके महालया महात्म्यके श्लोकोंको दिखाकर विद्वानोंने ज्ञानेश्वरीका जन्मस्थान नेवासा होनेका सिद्ध किया है। साथ ही साथ सैकडो वर्षोंसे वहांके एक शिवालयमें एक खंभा था जिसके पास बैठकर ज्ञानेश्वर ज्ञानेश्वरी कहते थे। आगे मुसलमानोंने उस जगह पर अपना स्वामित्व स्थापन किया और वहाँ नमाज पढने लगे। परिणाम स्वरूप शांतता भंग होनेकी नौबत आयी । १९१७ में उस सम- यके जिलाधीशने वह जगह सरकार जमा की। न्यायालयमें मुकदमा चला। अपील हुआ और अंतमें
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