ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
तामस कर्ताके लक्षण—
लगने पर मैं जैसे । आगेका जलता कैसे ।
यह न जानता वैसे । अग्निस्र्फुलिंग ॥ ६३ ॥
होता मैं कैसे वधका कारण । यह न जानता शस्त्र अर्जुन ।
कालकूटको नहीं होता ज्ञान । अपने परिणामका ॥ ६४ ॥
ऐसे वह धातुक क्रिया । करता रहता धनंजय ।
उससे अपना पराया । होता घात ॥ ६५ ॥
उसको जब जो कुछ करना । क्या होता है यह नहीं देखना ।
जिसभांति बवंडरका आना । ऐसी क्रिया उसकी ॥ ६६ ॥
उसका और जिस कार्यका । संबंध नहीं होता किसीका ।
पागलसे है जैसे कर्मका । नहीं होता वैसे ॥ ६७ ॥
बैलोंके गलेमें जैसे किल्हर । इंद्रियोंमें विषय है धनुर्धर ।
लगते हैं तब उन्हें भोगकर । बिताता जीवन ॥ ६८ ॥
हंसने या रोनेका काल । नहीं जानता जैसे बाल ।
वैसे ही सदा उच्छृंखल । रहता है वह ॥ ६९ ॥
होनेसे सदा प्रकृतिके आधीन । कृत्याकृत्य स्वादसे होता उलझन ।
अपने कृत्योंसे फूलता अर्जुन । कूडेके घरसा ॥ ६७० ॥
तथा कभी किसीको देनेमें मान । ईश्वरको भी न करता नमन ।
स्तब्धतामें पर्वतको भी अर्जुन । हराता वह ॥ ७१ ॥
अति कुटिल उसका मन । छुपाये हुए सभी वर्तन ।
पण्यांगना सम जो नयन । छल-मदसे भरे ॥ ७२ ॥
अथवा मानो कपटका । बनाया ही तन उसका ।
जीना मानो द्यूत-कर्मका । घर ही रहता है ॥ ७३ ॥
यह जो उसका प्रादुर्भाव । साभिलाष भिल्लका है गांव ।
उस राह पे कभी पांडव । जाना भी नहीं ॥ ७४ ॥
७६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
(88)
दूसरोंका सुख देख कर । मानता कष्ट अपने पर ।
जैसे लवण दूधमें गिर । करता अपेय ॥ ७५ ॥
अथवा जैसे ठंडे पदार्थ । आगमें पड़ कर पार्थ :
भड़कते मानो वही मूर्त । अग्नि ही है ॥ ७६ ॥
जैसे अच्छा भला आहार । पहुंच पेटके अंदर ।
बनता मल धनुर्धर । उसी भांति ॥ ७७ ॥
बना है कभी किसीका कुशल । देखके वह जानता है शूल ।
तथा उस बताके प्रतिकूल । आता बाहर ॥ ७८ ॥
गुण लेकर जो देता दोष । अमृतका करता है विष ।
दूध पिलाता उसको विष । देता जैसे सर्प ॥ ७९ ॥
सुख मिलेगा इस लोकमें । गति मिलेगी परलोकमें ।
कर्म आता ऐसे समयमें । ऐसे समय ॥ ६८० ॥
आती है उसको अपने आप । निद्रा रखी है जैसे सुखरूप ।
दुर्व्यवहारमें अपने आप । भागती है वह ॥ ८१ ॥
जैसे द्राक्षारस या आम्र-रस । खानेमें मुख चुराता वायस ।
तथा अंधा बनाता है दिवस । जैसे उलूकको ॥ ८२ ॥
वैसे कल्याण-काल जब देखता । तब उसको है आलस आता ।
प्रमादमें है स्फुरण चढ़ता । चाहता वैसे ॥ ८३ ॥
जैसे सदैव समुद्रका उदर । वडवाग्नि रखता है भरकर ।
वैसे है वह विषाद निरंतर । रखता अपनेमें ॥ ८४ ॥
लेंड़ककी आगमें धूमावधि । या अपानमें होती है दुर्गंधि ।
इसी भांति वह जीवनावधि । विषाद करता ॥ ८५ ॥
वैसे कल्पांतके भी पार । फल प्राप्ति हो धनुर्धर ।
ऐसे रखता है व्यापार- । अभिलाषा ॥ ८६ ॥
विश्वके उस पारकी चिंता । चितमें ही करता रहता ।
किंतु हाथमें नहीं लगता । तृण भी उसके ॥ ८७ ॥
ऐसे वह लोगोंमें पार्थ । पाप-पुंज ही होता मूर्त ।
देखना ऐसे अन्याहत । कर्त्ता तामस ॥ ८८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७०
ऐसा कर्म कर्त्ता ज्ञान । इनके हैं चिन्ह तीन ।
दिखाये तुझे सुजन- । चक्रवर्ती ॥ ८९ ॥
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥
बुद्धिके तीन प्रकार—
जब अविद्याके ग्राममें । बढ़कर मोह बस्तिमें ।
तथा संदेह भूषणमें । सजके जो आती ॥ ९० ॥
आत्म-निश्चयके जो दर्शन । करनेमें सुंदर दर्पण ।
ऐसी बुद्धिका भी तुझे तीन । कहता प्रकार ॥ ९१ ॥
इन सत्त्वादि गुणोंने तीन । न किये इस विश्वमें कौन ।
विषयके प्रकार अर्जुन । कह तू मुझे ॥ ९२ ॥
बिना अग्निके कोई काष्ठ । हुवा है क्या विश्वमें सृष्ट ।
वैसे दृश्य-कोटिमें स्पष्ट । नहीं है जो त्रिधा ॥ ९३ ॥
इसीलिये ये तीनों गुण । करते बुद्धिको त्रिगुण ।
वैसे धृतिको भी अर्जुन । त्रिधा किया है ॥ ९४ ॥
एक जो ऐसे दुष्ट तीन । लेकर भिन्न भिन्न लक्षण ।
इनको कहेंगे स-लक्षण । यहीं अब ॥ ९५ ॥
बुद्धि और धृतिके जहां । भाग दो किये गये यहां ।
प्रथम बुद्धिके ही यहां । कहूँगा प्रकार ॥ ९६ ॥
उत्तम मध्यम निकृष्ट । संसारमें आता जो सुभट ।
उस प्राणीकी तीन बाट । होती है यहां ॥ ९७ ॥
अकरण काम्य जो निषिद्ध । उसके मार्ग हैं ये प्रसिद्ध ।
ये हैं जो संसारमें सबाध । जीवोंको यहां ॥ ९८ ॥
बुद्धिके भेद ये तीन वैसे ही धृतिके कहे ।
गुणानुसार जो सारे कहता भिन्न भिन्न मैं ॥ २९ ॥
७७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
सात्त्विक बुद्धिके लक्षण-
तभी अधिकारसे मान लिया । तथा विधि प्रवाहसे जो आया ।
वह एक ही भला कहलाया । नित्यकर्म ॥ ९९ ॥
वही आत्म-प्राप्ति फल । दृष्टि रखके केवल ।
प्यासमें जैसा है जल । सेवन योग्य ॥ ७०० ॥
इतनेसे ही वह जो कर्म । छुडाता जन्म-भय विषम ।
तथा कर देता है सुगम । मोक्ष-सिद्धि ॥ १ ॥
ऐसे कर्मको है करता । संसार भयसे छूटता ।
करणीयत्वमें बढता । मुमुक्ष पदमें ॥ २ ॥
वहां जो बुद्धि ऐसा । बंधाती है भरोसा ।
मोक्ष रखा हुवासा । मिलेगा ही ॥ ३ ॥
इसीलिये रची जैसे निवृत्ति । तलमें आधार डाल प्रवृत्ति ।
इस कर्ममें डुबकी लगाती । इतनेमें ही ॥ ४ ॥
तृषार्थ जैसे पानीसे जीता । पूरमें नांव है तरता ।
या अंधार कूपसे छूटता । सूर्य प्रकाशसे ॥ ५ ॥
नाना पथ्यसे औषध लेता । ऐसे रोग-ग्रस्त भी बचता ।
या मछलीको पानी मिलता । तब जैसे वह ॥ ६ ॥
निश्चय-पूर्वक बचता । उसमें न होता अन्यथा ।
वैसे कर्म-प्रवृत्त होता । मिलता मोक्ष ॥ ७ ॥
कर्म रहता जो करणीय । वहां पूर्ण ज्ञान धनंजय ।
तथा रहता अकरणीय । कहा है आगे ॥ ८ ॥
क्या कर्तव्य अकर्तव्य बंध मोक्ष भयाभय ।
धरना तजना जाने वह है बुद्धि सात्त्विक ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ७७२
वह जो कर्म काम्यादिक । है संसार भय-दायक ।
अकरणीय है तू देख । कहा गया है ॥ ९ ॥
उस अकार्य कर्ममें । जन्म मरण कालमें ।
प्रवृत्ति सदा पीछेमें । भागती है ॥ ७१० ॥
जैसे आगमें नहीं घुसता । अथाह पानीमें न कूदता ।
प्रज्वलित शूल न धरता । उसी प्रकार ॥ ११ ॥
या काला नाग जो फूत्करता । उसे देख पकड़ा न जाता ।
व्याघ्र गुहामें घुसा न जाता । उसी प्रकार ॥ १२ ॥
वैसे कर्म अकरणीय । देखके होता महाभय ।
उपजाती जो असंशय । बुद्धि सात्विक ॥ १३ ॥
जैसे विष मिश्रित अन्न । देख होता मृत्युका ज्ञान ।
निषिद्ध कर्ममें भान । होता कर्मका वैसे ॥ १४ ॥
फिर जो बंध भय भरित । होता है निषिद्ध कर्म प्राप्त ।
निर्विकार जानता निवृत्त । होनेका वह ॥ १५ ॥
ऐसे ही कार्याकार्य विवेक । या प्रवृत्ति-निवृत्तिमापक ।
जैसे रत्न-पारखी परख । करता जौहरी ॥ १६ ॥
वैसे कार्याकार्य शुद्धि । जानती जो निरवधि ।
कहाती सात्त्विक बुद्धि । यह तू जान ॥ १७ ॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
राजसिक बुद्धिका लक्षण—
बगुलोके गांवमें जैसे । चलता नीरक्षीर वैसे ।
या अंधा न जानता जैसे । दिवस रात्र ॥ १८ ॥
कार्य अकार्य कैसे क्या क्या है धर्म अधर्म जो ।
न जान सकती स्वच्छ जान तू बुद्धि राजस ॥ ३१ ॥
७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
या जिसे फूलोंका मकरंद भाता । अथवा काठ कुरेदना सुहाता ।
न होती दोनोंमें कोई विसंगतता । भ्रमरके लिये ॥ १९ ॥
वैसे यहां कार्याकार्य । धर्माधर्मका विषय ।
न होते कोई निर्णय । आचरणसे ॥ ७२० ॥
अजी ! आंखके बिन लेते मोती । उसमें फंसनेकी सदा भीती ।
कभी सफलता भी मिलती । आश्चर्यसे ही ॥ २१ ॥
वैसे जो अकरणीय होता । सम्मुख आनेसे रह जाता ।
तभी तो करनेसे छूटता । नहीं तो दोनों एक ॥ २२ ॥
बुद्धि वह उचित अनुचित । नहीं जानती कुछ भी पार्थ ।
विवाहमें जिस भांति अक्षत । डालते हैं लोग ॥ २३ ॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥
तामसिक बुद्धिके लक्षण—
होता जो राजाका राज पथ । चोरोंको होता है विपरीत ।
उदय होते ही माने रात । राक्षस जैसे ॥ २४ ॥
पुरुष होता है जो भाग्यहीन । उसे कोयला होता गढा धन ।
ऐसे होकर भी न होता धन । उस जीवको ॥ २५ ॥
वैसे धर्ममात्र जो है केवल । उसकी बुद्धि जो है पाप मल ।
सत्यको मानती असत्य मूल । तामस बुद्धि ॥ २६ ॥
मानते सब जिसे अर्थ । उसको संपूर्ण अनर्थ ।
जो जो गुण है व्यवस्थित । उसे मानता दोष ॥ २७ ॥
अथवा मानो श्रुति जात । अनुकरण करते पार्थ ।
वह सबही विपरीत । मानती वह ॥ २८ ॥
तमसे भरके जो है धर्म माने अधर्मको
देखती उल्टा अर्थ वह है बुद्धि तामसी ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७४
इसे किसीसे न पूछकर । तामस मानना धनुर्धर ।
जिस बुद्धिको धर्मार्थ वैर । क्या करना वह ॥ २९ ॥
ऐसे ये बुद्धिके भेद । किये तुझसे विशद ।
स्वबोध कुमुद चंद्र । कहे तुझसे ॥ ७३० ॥
अब इसकी जो बुद्धि वृत्ति । सभी कर्मको आधार होती ।
कैसी वह त्रिविध धृति । कहता हूं तुझे ॥ ३१ ॥
उस धृतिके जो विभाग । तीन होते हैं यदा लिंग ।
कहता हूं उसे सुभग । सुन तू अब ॥ ३२ ॥
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
सात्त्विक धृतिके लक्षण—
उदय होते ही दिनकर । मिटता चौर्य सह अंधार ।
अथवा राजाज्ञा अव्यापार । रोकती जैसे ॥ ३३ ॥
अथवा पवनका जो वेग । चलता रहता है सवेग ।
मिटते गर्जन सह मेघ । अपने आप ॥ ३४ ॥
या अगस्तके होते दर्शन । सिंधु धारण करता मौन ।
चंद्रोदयमें कमल-वन । सिमिटते हैं ॥ ३५ ॥
जैसे मदोन्मत्त कुंजर । चलनेमें उठाके पैर ।
न रखता है भूमिपर । देखके सिंह ॥ ३६ ॥
ऐसे होते हैं जो धीर । उपजते ही अंतर ।
मनादिकके व्यापार । तजते वहीं ॥ ३७ ॥
इंद्रिय विषयक जो गांठ । आप ही छूटती है सुभट ।
घुसते मन-मायके पेट- । में दसो जन ॥ ३८ ॥
चलाती जो क्रिया सारी मन इन्द्रिय प्राणकी ।
समता स्थिरतासे जो वह है धृति सात्त्विक ॥ ३३ ॥
७७५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अधोर्ध्वकी मर्यादा तोड़कर । प्राण नवोंकी गांठ बांधकर ।
बैठा रहता है डूब कर । सुषुम्नामें ॥ ३९ ॥
संकल्प विकल्प पट । खोल होता मन प्रकट ।
बुद्धिके पीछे जा सुभट । बैठता वह ॥ ४० ॥
इस धृतिके कारण । मन प्राण और करण ।
स्वचेष्टाका संभाषण । छोड देते हैं ॥ ४१ ॥
मन प्राणादि फिर संपूर्ण । ध्यानके अंतर्गृहमें जान ।
बंद कर रखता अर्जुन । योगसे वह ॥ ४२ ॥
फिर जो परमात्मचक्रवर्ती । स्वाधीन होनेकी होती निश्चिती ।
तब तक छूट न होके धृती । बांध रखती उन्हे ॥ ४३ ॥
यहां जो वही धृती । सात्विक कहलाती ।
ऐसे जो लक्ष्मी-पति । कहता पार्थसे ॥ ४४ ॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसंगेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
राजसी धृतिके लक्षण—
शरीर ही आप मान कर । स्वर्ग संसारके दोनों घर ।
भोगना चाहता पेट भर । त्रिवर्गोपायसे ॥ ४५ ॥
मनोरथके समुद्र पर । धर्मार्थकामके नांव पर ।
धैर्य-बलसे क्रिया व्यापार । करता है जो ॥ ४६ ॥
कर्मकी पूंजी जो डालना । उसका चौगुना चाहना ।
इतना सायास करना । जिसका धैर्य ॥ ४७ ॥
वह धृति है राजस । सुन तू पार्थ विशेष ।
तीसरी है जो तामस । कहता हूं अब ॥ ४८ ॥
धर्मार्थ काम सारे ही चलाती लाभ देखके ।
डुबाती फल-आशामें वह है धृति राजसी ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७६
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
तामसी धृतिके लक्षण—
सभी अधम गुणोंसे । आ जाता है रूप जिसे ।
कोयला जो कालिमासे । बनता है ॥ ४९ ॥
अजी ! प्राकृत तथा हीन । उसको भी गुणका मान ।
नाम होता है पुण्यजन । दैत्यका जैसे ॥ ७५० ॥
नवग्रहमें जो है पिंगल । उसको कहते हैं मंगल ।
वैसे तममें गुण केवल । अविचार मात्र ॥ ५१ ॥
सब दोषोंका आश्रय स्थान । तमसे सान कर अर्जुन ।
अंगांग जिस नरका मान । बनाये गये हैं ॥ ५२ ॥
आलसको पकड़ बैठता । निद्राका मानो घर ही बनता ।
पापसे जो सगा ही रहता । छूटे दुःखसे कैसे ॥ ५३ ॥
तन धनके मोहसे अर्जुन । नहीं छूटता भयका कारण ।
पत्थर न छोड़ता कडापन । उसी प्रकार ॥ ५४ ॥
पदार्थ जातमें आस रखता । इससे शोकका घर बनता ।
पापसे कभी छूट न सकता । कृतघ्न जैसे ॥ ५५ ॥
जीव-भावसे असंतोष । धरके रखा अहर्निश ।
इससे मैत्री है विशेष । विषादसे नित ॥ ५६ ॥
ल्हसुन छोडती नहीं दुर्गंधी । तथा कुपथ्यको न छोडती व्याधी ।
इसी भांति इसको मरणावधी । विषाद् न छूटता ॥ ५७ ॥
तथा तारुण्य वित्त काम । इससे बढ़ता संभ्रम ।
तमी है भयका आश्रम । बनता वह ॥ ५८ ॥
निद्रा भय न जो छोडे शोक खेद तथा मद ।
ओढती बुद्धिपे तंद्रा वह है धृति तामस ॥ ३५ ॥
७७७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आगको न छोड़ता ताप । तथा वैरको नहीं सांप ।
विश्वका वैरी है वासिप । अखंडित ॥ ५९ ॥
अथवा शरीरको काल । न भूलता कभी निर्मल ।
वैसे ही तममें अचल । रहता मद ॥ ७६० ॥
ऐसे ये पांच निद्रादिक । तामसके रहते दोष ।
इसका आधार जो एक । धृति तामस ॥ ६१ ॥
कर्म बुद्धि तथा धृतिका संबंध—
कहलाती है ऐसी धृति । जानना तामस सुमति ।
ऐसा कहता विश्व-पति । धनुर्धरसे ॥ ६२ ॥
इस प्रकार त्रिविध बुद्धि । करती कर्म निश्चय आदि ।
धृति बनाती उसकी सिद्धि । तदनंतर ॥ ६३ ॥
सूर्यादिसे दीखता पथ । चलना होता पैरोंको नित ।
किंतु चलना धैर्यसे पार्थ । होता निरंतर ॥ ६४ ॥
वैसे बुद्धि कर्मको दिखाती । इंद्रियां उसको हैं करतीं ।
करनेमें जो अपेक्षा होती । धैर्यकी सदा ॥ ६५ ॥
तब यह सब तेरे प्रति । कहा है मैंने त्रिविध धृति ।
इससे होती कर्म निष्पत्ति । होने पर तब ॥ ६६ ॥
त्रिविध कर्मके फल उत्पन्न । होने पर उसे सुख कहते जान ।
वह भी त्रिविध होता अर्जुन । कर्म परसे ॥ ६७ ॥
फल रूप यह सुख । त्रिगुणसे भिदा देख ।
मीमांसा इसकी नेक । करूंगा शुद्ध ॥ ६८ ॥
किंतु शुद्ध है वह कैसे कहूंगा । कानोंसे ग्रहण करना चाहेगा ।
कान तथा हाथका मल लगेगा । इस शुद्धताको ॥ ६९ ॥
इससे करके तू अनादर । श्रवण होता है जो बाहर ।
सुन अंतःकरण देकर । जीवभावसे ॥ ७७० ॥
ज्ञानेश्वरी ७७८
ऐसे कह करके देव । त्रिविध सुखका प्रस्ताव ।
निरूपते हैं सावयव । इस प्रकारके ॥ ७१ ॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखांतं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
तीन प्रकारके सुखका विवेचन—
कहूंगा सुखत्रय संज्ञा । ऐसी की है मैंने प्रतिज्ञा ।
कहता हूं सुन तू प्राज्ञ । इस समय ॥ ७२ ॥
जीव करता जब आत्मालिंगन । तब अनुभव करता अर्जुन ।
उस प्रकारका कराता मैं दर्शन । तुझको अब ॥ ७३ ॥
किंतु मात्राके नापसे जैसे । दिव्यौषधियां लेते हैं वैसे ।
या रांगेको रस भावनासे । बनाते हैं चांदी ॥ ७४ ॥
अथवा जैसे नूनका नीर । करना हो तो दो चार बार ।
देने पड़ते उसको मार । पानीके जैसे ॥ ७५ ॥
वैसे प्राप्त सुख लेशसे । जीवको भावना देनेसे ।
नासता है भावाभ्याससे । जीवका दुःख ॥ ७६ ॥
ऐसा जो आत्म-सुख । हुआ यहां त्रिगुणात्मक ।
वह भी कहता हूं देख । उसका रूप ॥ ७७ ॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
सात्विक सुखका लक्षण—
जैसे चंदनकी जड़ । सर्पसे रहता अड़ ।
या निधानका किवाड । पिशाचके हाथमें ॥ ७८ ॥
कहता सुन तू पार्थ सुख तीन प्रकारके ।
अभ्याससे रमाता जो दिखाता अंत दुःखका ॥ ३६ ॥
आदि जो विषसा तीता अंतमें अमृतोपम ।
आत्मामें शुद्ध बुद्धीको मिलता सुख सात्विक ॥ ३७ ॥
७७९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
या स्वर्गके सुंदर भोग । रोक रखते हैं जो याग ।
अथवा दुःखके प्रसंग । बालत्वमें जैसे ॥ ७९ ॥
होनेमें जैसे दीपकी सिद्धि । कठिनाई घूमकी है आदि ।
अथवा होती है दिव्योोषधि । जीभको दुःखद ॥ ७८० ॥
इस प्रकार सुन अर्जुन । जिस सुखका उगम-स्थान ।
यम दम आदिके कारण । होता है विषम ॥ ८१ ॥
करना सभी स्नेहका दमन । वैराग्य उत्पन्न होता अर्जुन ।
स्वर्ग संसार सीमाका बंधन । रहता है दूर ॥ ८२ ॥
विवेक श्रवणका अति त्रास । तथा व्रताचरण है कर्कश ।
करते हैं बुद्धि आदिका नाश । रात्रिदिवस ॥ ८३ ॥
मुखसे सुषुम्नाके । ढेर प्राणायामके ।
पडते हैं ढेर ढेरके । निगलना तब ॥ ८४ ॥
जैसे चक्रवाकके विरहमें होता । या शिशुको स्तनसे छुडानेमें होता ।
भूखेको थालीसे उठानेमें जो होता । उससे अधिक दुःख ॥ ८५ ॥
माताके सामनेसे बालक । छीनता है काल जब एक ।
अथवा छूटता है उदक । मीनसे जब ॥ ८६ ॥
वैसे विषयोंका घर है पार्थ । तजनेमें इंद्रियोंको युगांत ।
होता तब धीर सहता नित । वैराग्यशाली ॥ ८७ ॥
ऐसे जिस सुखका प्रारंभ । दिखाता है काठिण्यका क्षोभ ।
फिर होता क्षीराब्धिमें लाभ । अमृतसा अंतमें ॥ ८८ ॥
प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य शंभुने गला ।
तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ८९ ॥
चुभता अगसे भी तीखा । कच्चापन हरे द्राक्षका ।
पक्तामें जैसे उसका । माधुर्य रहता ॥ ७९० ॥
इस वैराग्यादिका भी वैसा । सुपक्व आत्म-प्रकाशमें वैसा ।
वैराग्य सह होता हे नाशसा । अविद्याजातका ॥ ९१ ॥
तब जैसे गंगा सागरमें । बुद्धि विलीन होती आत्मामें ।
अद्वयानंदकी अपनेमें । खुलती खान ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८०
ऐसे स्वानुभव विश्राम। वैराग्य-मूलका परिणाम ।
उस सुखको सात्विक नाम । दिया गया है ॥ ९३ ॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥
राजस सुखके लक्षण-
मिलती जब विषय इंद्रियां । छूता है जो सुख उस समय ।
दोनों किनारोंको हे धनंजय । उफानमें आकर ॥ ९४ ॥
अधिकारी आते जब गांव । होता है जब जैसा उत्सव ।
अथवा ऋण लेके विवाह । विस्तार होता ॥ ९५ ॥
या रोगीकी जीभमें जैसे । केला-बूरा भाता है वैसे ।
बचनाग पहले जैसे । लगता मीठा ॥ ९६ ॥
प्रवास-चौर्यके पहले मित्र । या हाट बातका कलत्र ।
होते उनके विनोद विचित्र । उसी प्रकार ॥ ९७ ॥
वैसे जो विषयेंद्रियोंका मिलन । करता जीवके सुखमें पोषण ।
फिर जैसे चट्टानको रत्न मान । मरता हंस जैसे ॥ ९८ ॥
वैसे खर्चके सारा उत्पन्न । मिटता जीवन संपन्न ।
क्षीण होता सुकृतका धन । जीवका सारा ॥ ९९ ॥
तथा जब सब भोग मिटता । तब वह मात्र स्वप्नसा होता ।
फिर केवल मात्र जो रहता । हानिका भार ॥ ८०० ॥
विपत्ति है ऐसे जो सुख । ऐहिक परिणाम देख ।
परमें बनके जो विष । उलटता है ॥ १ ॥
करनेसे लाड़ विषयोंके । जला करके खेत धर्मके ।
भोग किये नाना उत्सवके । विषयोंसे वहां ॥ २ ॥
पहला लगता मीठा अंतमें विष मारक ।
विषय योगसे पाती इंद्रियां सुख राजस ॥ ३८ ॥
७८१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
पातकोंमें तब आता बल । नरकमें देते हैं वे खल ।
उस सुखने किया है छल । अंतमें ऐसे ॥ ३ ॥
बछनाग विष है मधुर । किंतु अंतमें मारक क्रूर ।
वैसे पहले होता मधुर । अंतमें कटु ॥ ४ ॥
यह सुख निःसंदेह पार्थ । रजो गुणसे बना है सार्थ ।
इसीलिये न छूना सुखार्थ । इसका अंग ॥ ५ ॥
यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
तामसिक सुखके लक्षण—
करके अपेयका पान । तथा अखाद्यका भोजन ।
और पर-स्त्री-सन्निधान । देता है जो सुख ॥ ६ ॥
या दूसरोंका कर संहार । और कर परस्वापहार ।
होता है सुखका अवतार । भाटोंके मुखसे ॥ ७ ॥
आलस्यमें होता जिसका पोषण । या निद्रामें होते हैं अनुभव जान ।
जिसका आद्यंत भुलाता अर्जुन । अपने पथको ॥ ८ ॥
जो कुछ है वह पार्थ । तामस मान यथार्थ ।
इसमें सुखकी बात । असंभाव्य ॥ ९ ॥
मूलमें कर्मके तीन प्रकार । इससे सुख भी तीन प्रकार ।
यह सब तुझे शास्त्रानुसार । कह दिया मैंने ॥ ८१० ॥
कर्ता कर्म तथा कर्म-फल । यह त्रिपुटि एक केवल ।
इसके बिना न सूक्ष्म-स्थूल । कुछ भी यहां ॥ ११ ॥
तथा यह जो त्रिपुटि । तीनों गुणोंमें किरीटी ।
बुनी गयी है जो पर्टी । तंतु समान ॥ १२ ॥
निद्रा प्रमाद आलस्य आत्माको घेरके सदा ।
आदि औ' अंतमें जो है भुलाता सुख तामस ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८२
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
प्रकृतिके ये गुण सर्वव्यापी और सबको बंधनकारक हैं—
तभी जो प्रकृतिसे प्रकट होता । तथा सत्वादिकसे नहीं बंधता ।
स्वर्ग या मृत्यु लोकमें नहीं होता । ऐसा कुछ भी कहीं ॥ १३ ॥
उनके बिना कहीं कंबल । मृत्तिका बिन कर्दम गोल ।
अथवा जल बिन कल्लोल । होता है क्या ॥ १४ ॥
वैसे कहीं गुणके बिन । नहीं है सृष्टिकी रचना ।
ऐसे नहीं हुवा अर्जुन । प्राणिजातमें ॥ १५ ॥
इसीलिये यह सकल । तीन गुणोंसे है केवल ।
बनाया गया है अखिल । ऐसे जान ॥ १६ ॥
गुणोंसे देवोंके तीन प्रकार । तथा लोकके भी तीन आकार ।
गुणोंसे समाजको दिये चार । व्यापार वर्णके ॥ १७ ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
वर्ण-व्यवस्थाका आधार भी तीन गुण ही है—
वही जो चार वर्ण । पूछेगा तू कौन कौन ।
वहां जो मुख्य ब्राह्मण । आधार ही है ॥ १८ ॥
यहां जो क्षत्रिय वैश्य दोन । मानमें ब्राह्मणोंके समान ।
योग्य हैं वे वैदिक विधान । करनेमें जो ॥ १९ ॥
शूद्रका है चतुर्थ वर्ण । वेदसे नाता नहीं जान ।
तभी त्रिवर्णके आधीन । उसकी वृत्ति ॥ ८२० ॥
पृथ्वी पर यहां या तो देवोंमें स्वर्गमें कहीं ।
प्रकृतिके गुणोंमेंसे कोई भी छूटता नहीं ॥ ४० ॥
ब्राह्मणादिक वर्णोंका किया कर्म विभाजन ।
गुण है जिसके जैसे उनके अनुसारही ॥ ४१ ॥
७८३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.
वृत्तिका निकट संबंध । ब्राह्मणादिसे होता सिद्ध ।
उससे शूद्र जो प्रसिद्ध । हुवा चौथा ॥ २१ ॥
जैसे फूलोंके साथ ही साथ । सूत्रकी गंध लेते श्रीमंत ।
द्विज संग शूद्रको भी पार्थ । स्वीकारते वेद ॥ २२ ॥
ऐसी है अजी पार्था । चातुर्वर्ण्य व्यवस्था ।
दिखाऊं कर्म पथ । इसका मैं ॥ २३ ॥
जिन गुणोंसे ये वर्ण हैं चार । जन्म-मृत्यू कैंचीसे छूटकर ।
ईश्वरके निकट धनुर्धर । पहुंचेंगे ही ॥ २४ ॥
जिस आत्म-प्रकृतिने यहां । सत्वा दिक गुणोंमें है जहां ।
लोगोंको ये चार कर्म यहां । बांट दिये हैं ॥ २५ ॥
पिताने बांटा जैसे जो संचित धन । सूर्यने राहीको पथ दिखाया जान ।
या उनके कर्म सेवकोंको अर्जुन । दिखाये हैं स्वामीने ॥ २६ ॥
इस भांति प्रवृत्तिने गुण । फैलाकर किये चार वर्ण ।
कर्म रूपसे जान अर्जुन । किया विस्तार ॥ २७ ॥
यहां तू सत्व-गुणसे जान । कम अधिक मिश्रण बन ।
हुवा इन दोनोंका नियोजन । ब्राह्मण क्षत्रिय ॥ २८ ॥
तथा है जो रज सात्विक । उससे रचे वैश्य लोक ।
रज तम मिलाके देख । हुए शूद्र ॥ २९ ॥
ऐसा एकही प्राणि वृंद । किया चतुवर्ण भेद ।
सुन वह गुण प्रबुद्ध । पांडुकुमार ॥ ८३० ॥
किया आप रखा जो जैसे । दीप-ज्योत दिखाती जैसे ।
गुण भिन्न कर्म भी वैसे । दिखाते शास्त्र ॥ ३१ ॥
वैसे अब कौन कौन । वर्ण विहित लक्षण ।
कहता कर श्रवण । सौभाग्य निधि तू ॥ ३२ ॥
सर्वेंद्रियोंकी सभी प्रवृत्तियां । अपने हाथमें ले धनंजया ।
बुद्धि मिलती है आत्मासे प्रिया । पतिव्रता जैसे ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८४
शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥
ब्राह्मणोंका स्वभाव धर्म—
बुद्धिका जो ऐसे उपराम । इसके साथ जान तू राम ।
यह गुणोंका है उपक्रम । जिन कर्मोंमें ॥ ३४ ॥
बाह्य इंद्रियोंका यह जो झुंड । होता है धर्म-विरुद्ध उदंड ।
तब रोक लेता जो विधि-दंड । वही है दम ॥ ३५ ॥
करता जो शममें सहाय । वह गुण दम धनंजय ।
यह दूसरे गुणका कार्य । ब्रह्मकर्ममें ॥ ३६ ॥
जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत ।
वैसे ईश्वरकी बात । चितमें रखना ॥ ३७ ॥
इसका नाम है तप । तीसरे गुणका रूप ।
वैसे शौच भी निष्पाप । द्विविध यहां ॥ ३८ ॥
भावशुद्धिसे भरा हुवा मन । विहित कर्मसे भूषित तन ।
ऐसे जिसका सबाह्य जीवन । सजा हुवा है ॥ ३९ ॥
इसका नाम शौच है पार्था । ब्राह्मण-कर्मका गुण चौथा ।
तथा पृथ्वीके भांति सर्वथा । सभी सहना ॥ ८४० ॥
इसका नाम पांडव । गुण है कहा पांचवा ।
स्वरमें जैसे सुहाव । पंचम स्वर ॥ ४१ ॥
तथा टेडेमेडे किनारोंसे । सरल बहती गंगा जैसे ।
अथवा टेडे ईखमें जैसे । रहता रस सरल ॥ ४२ ॥
विश्वमें जीवोंके विषयमें । सरलतासे बरतनेमें ।
दीखता गुण जो कर्ममें । आर्जव है छटा ॥ ४३ ॥
तप शांति क्षमा श्रद्धा ज्ञान विज्ञान निग्रह ।
ऋजुता और पावित्र्य ब्रह्मकर्म स्वभावसे ॥ ४२ ॥
(४७) ७८५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जिस भांति माली संपन्न । जड़को सींचता अर्जुन ।
फलमें उसका दर्शन । करता है फिर ॥ ४४ ॥
वैसे शास्त्रानुसार आचरण । कर करना ईश्वर दर्शन ।
यही एक निश्चय अर्जुन । करना ज्ञान है ॥ ४५ ॥
ब्राह्मण कर्ममें ज्ञान । सातवा गुण है जान ।
विज्ञानका रूप सुन । कहता अब ॥ ४६ ॥
अंतःकरण शुद्धिके समय । शास्त्रका ध्यान बलसे विलय ।
ईश्वर तत्वमें होना निश्चय । बुद्धिका जान ॥ ४७ ॥
वास्तविक यह विज्ञान । आठवा है जो गुणरत्न ।
तथा आस्तिक्य भी सुन । गुण है नौवा ॥ ४८ ॥
राज-मुद्रा जिसके पास होती । जनता उसीको है मान देती ।
सच्छात्रोंसे जो भी स्वीकार होती । उसी राहको ॥ ४९ ॥
अति आदरसे जो मानता । उसीको मैं आस्तिक्य कहता ।
उसे नौवा गुण मैं कहता । इस स्थानपे ॥ ८५० ॥
ऐसे शमदमादिक । गुण हैं नौ निर्दोष ।
कर्म जान स्वाभाविक । ब्राह्मणके ये ॥ ५१ ॥
यह नौ गुण-रत्नाकर । या नवरत्नोंका है हार ।
प्रकाशको जैसे भास्कर । धारण करता ॥ ५२ ॥
या चंपक पुष्पसे चंपा पूजता । या चांदनीसे ही चंद्र उजलता ।
अथवा चंदन निजको चर्चिता । सौरभसे अपने ॥ ५३ ॥
नौ गुणोंका जड़ावू भूषण । धारण करता जो ब्राह्मण ।
कभी न छोड़ता तन मन । ब्राह्मणका उसे ॥ ५४ ॥
अब क्षत्रियको जो उचित । कर्म कहता तुझे निश्चित ।
बुद्धि सह तू देकर चित्त । सुन तू अब ॥ ५५ ॥
क्षत्रियोंका स्वभाव-धर्म—
तेजमें कभी किसीका भानु । सहाय न चाहता अर्जुन ।
शिकारीमें सिंह कभी न- । चाहता सहाय ॥ ५६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८६
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
ऐसे जो स्वाभाविक सशक्त । सहाय बिन उद्भट पार्थ ।
ऐसे श्रेष्ठ शौर्य विकसित । गुण है प्रथम ॥ ५७ ॥
तथा जैसे सूर्यका प्रताप । कोटि नक्षत्र करता लोप ।
किंतु उनसे न होता लोप । चंद्र सह भी वे हो तो ॥ ५८ ॥
ऐसे प्रौढ गुणमें पार्थ । विश्वको करता विस्मित ।
किंतु आप न विचलित । होता है कभी ॥ ५९ ॥
ऐसा प्रगल्भ रूप जो तेज । क्षात्र-धर्मका गुण है दूजा ।
इसी भांति धैर्य है सहज । गुण तीसरा ॥ ८६० ॥
टूट पडा भी यदि आकाश । बुद्धिकी आंखें कभी मानुस ।
मिटता नहीं है स-साहस । वही है धैर्य ॥ ६१ ॥
तथा पानी कितना ही गहरा होता । कमल ऊपर आकर ही खिलता ।
या आकाश किसीसे नहीं हारता । ऊंचाईमें कभी ॥ ६२ ॥
कैसी ही विवश अवस्था । जीवनमें पाकर पार्था ।
न छेदती प्रज्ञा सर्वथा । स्थिर बुद्धिकी ॥ ६३ ॥
ऐसी दक्षता है जो चोख । यह है चौथा गुण देख ।
तथा जूझ जो अलौकिक । गुण पांचवा ॥ ६४ ॥
जैसे सूर्यमुखीका पुष्पक । सदा सूर्यकी ओर उन्मुख ।
वैसे वह शत्रुके सन्मुख । होता है सदा ॥ ६५ ॥
यत्न-पूर्वक गर्भिणी जैसे । टालती है पुरुषको वैसे ।
समरमें पीठ दिखानेसे । बचता रहता ॥ ६६ ॥
क्षत्रियोंका यह आचार । पांचवा गुणेंद्र धनुर्धर ।
पुरुषार्थीके सिरपर । भक्ति है जैसे ॥ ६७ ॥
शौर्य धैर्य प्रजा रक्षा युद्धमें अपलायन ।
दातृत्व दक्षता तेज क्षात्र-धर्म स्वभावसे ॥ ४३ ॥
७८७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
लगे हुए अपने फल फूल । देनेमें वृक्ष उदार सरल ।
अथवा देता जैसा परिमल । कमलवन ॥ ६८ ॥
जितना जो चाहता उतना । चंद्रका उसे चांदनी देना ।
वैसे चाहनेवालेको देना । इच्छानुसार ॥ ६९ ॥
ऐसा अपरमित दान । जहां है छटा गुण रत्न ।
तथा आज्ञाका एक स्थान । होता है सदा ॥ ८७० ॥
करके अवयवोंका पोषण । उनसे सेवा लेता अनुदिन ।
ऐसे करके प्रजानुरंजन । भोगना प्रजासुख ॥ ७१ ॥
उसका नाम है ईश्वर-भाव । सब सामर्थ्यका है वही ठाव ।
सब गुणोंमें यह महाराव । क्षत्रियोंके ॥ ७२ ॥
ऐसे हैं शौर्यादि सात गुण । जिससे हैं विशेष भूषण ।
सप्त ऋषीसे शोभता गगन । वैसे ही है यह ॥ ७३ ॥
सात गुणोंसे जो विचित्र । विश्वमें है कर्म पवित्र ।
यह जान सहज क्षात्र- । धर्म है क्षत्रियोंका ॥ ७४ ॥
ऐसे क्षत्रिय नहीं है नर । स्वत्व-स्वर्णका मेरु डोंगर ।
तमी है स्वर्गके वे आधार । गुण है सात ॥ ७५ ॥
अथवा जो सात गुणार्णव । घेरे हैं पृथ्वि सह वैभव ।
भोगता है क्षत्रिय पांडव । इस प्रकार ॥ ७६ ॥
अथवा है इस गुण-प्रवाहसे । क्रिया-गंगा उसके अंगमें जैसे ।
मिलके जगमें महा सागरसे । शोभती है ॥ ७७ ॥
किंतु यह रहने दे देख । शौर्यादिक जो हैं गुणात्मक ।
सात कर्म हैं जो स्वाभाविक । क्षत्रिय जनके ॥ ७८ ॥
अब जो वैश्यको उचित । गुण कहता जो निश्चित ।
उनको सुन अब पार्थ । ध्यान पूर्वक ॥ ७९ ॥
वैश्य तथा शूद्रोंका कर्म—
भूमि बीज और हल । इसका लेकर बल ।
जोड़ना लाभ अतुल । जिनका काम ॥ ८८० ॥
ज्ञानेश्वरी ७८८