श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उ०ख०-अ०७७] * श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान * २३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जमदग्निके द्वारा इन परशुरामका प्रादुर्भाव हुआ, जो साक्षात् योगेश्वर विष्णुके समान हैं॥ ९॥ वे अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले तथा साक्षात् कामदेवके मनको भी मथ देनेवाले थे। वे माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे, उनका बल-पराक्रम अत्यन्त विख्यात था। वे देवता, ब्राह्मण, गुरु, विद्वान्, गौ आदिके पूजनमें निरत रहते थे। वेदों, वेदांगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष) तथा स्मृतियोंका स्वाध्याय वे सदा किया करते थे ॥ १०-११ ॥ वे बोलनेमें बृहस्पतिके समान, क्षमामें पृथ्वीके समान, गाम्भीर्यमें समुद्रके समान थे और माता-पिताकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर रहते थे। अनेक विद्याओंके अध्ययनके लिये अत्यन्त दृढमति होकर माता-पिताकी आज्ञा लेकर वे नैमिषारण्यमें चले आये ॥ १२-१३ ॥ उनके नैमिषारण्यमें चले जानेपर उस समय कृतवीर्यके पुत्र महान् बलशाली राजा कार्तवीर्य वहाँ आये। उनके तेजके प्रभावसे समस्त भूमण्डल सदाके लिये उनके वशीभूत हो गया था ॥ १४ ॥ भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उन राजा कार्तवीर्यके पास लक्ष्मी स्थिर रूपसे निवास करती थी। वे युद्धमें शत्रुओंका विनाश करनेवाले पाँच सौ बाणोंको एक साथ छोड़ते थे ॥ १५ ॥ उनका बल तथा पौरुष अत्यन्त विख्यात था। इन्द्रादि देवता उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। उनके पास असंख्य हाथी, रथ, घोड़े तथा पैदल सैनिक थे। युद्धके लिये प्रस्थान करते समय उनकी सेनाके द्वारा समस्त पृथ्वीमण्डल उसी प्रकार आच्छादित हो जाता था, जिस प्रकार कि वर्षाकालमें मेघमण्डलकी धाराओंद्वारा समस्त नभमण्डल आच्छादित हो जाता है ॥ १६-१७ ॥ उनके शंखनादका श्रवणकर शत्रु उसी प्रकार दसों दिशाओंमें भाग जाते, जैसे कि सिंहनादको सुनकर करोड़ों मदोन्मत्त हाथी भाग जाते हैं ॥ १८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! जब वे राजा (अपने हजार हाथोंसे) स्वेच्छापूर्वक पाँच सौ ताली बजाते, तो उसके निनादसे घोषपूर्ण समस्त ब्रह्माण्ड काँप उठता ॥ १९ ॥ एकबार वे राजा स्वेच्छापूर्वक अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर [वन-विहारको] निकले। उस समय वे नीले रंगके वस्त्र धारण किये हुए थे, उनका छत्र भी नीले रंगका था तथा उनके सैनिक भी उन्हींकी भाँति नीले वस्त्र धारण किये थे। वे वनों, नदियों, पर्वतोंको रौंदते हुए, विविध प्रकारके मृगगणोंको देखते हुए तथा कुछका शिकार करते हुए जा रहे थे। तदनन्तर सह्याद्रिके शिखरपर उन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रमको देखा। वह आश्रम उसी प्रकारका था, जैसे कि कैलासशिखरपर भगवान् शंकरका आवास- स्थान हो। राजाने अपने सेवकोंसे पूछा- 'यह उत्तम स्थान किसका है?' ॥ २०-२२ १/२ ॥ सेवक बोला- हे महाभाग! यहाँ प्रसिद्ध जमदग्नि मुनि निवास करते हैं। वे साक्षात् सूर्यके समान [तेजस्वी] हैं तथा शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं। उनके दर्शनसे करोड़ों पापराशियाँ विनष्ट हो जाती हैं। यदि आपकी इच्छा है तो वहाँ जाना चाहिये, आपको अवश्य दर्शन होंगे। आपकी कृपासे हम सभीका भी कल्याण हो जायगा ॥ २३-२४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- सेवकका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा वहाँ जानेके लिये उद्यत हो गये, उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सेनाको मना कर दिया और [चार] श्रेष्ठजनोंको साथ लेकर वे तत्क्षण ही तपोनिधि मुनिश्रेष्ठ जमदग्निके आश्रमके लिये गये ॥ २५-२६ ॥ राजाने कुशके आसनपर विराजमान उन मुनिको देखा, जो प्रज्वलित अग्निकी भाँति दिखायी दे रहे थे। राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया तथा साथमें आये सभी सैनिकों आदिने भी उन्हें प्रणाम किया ॥ २७ ॥ अनेक विशाल पर्णशालाओं, लताकुंजों तथा वृक्षोंकी छायामें वे सैनिक बैठ गये और राजा मुनिके समक्ष स्थित हो गये। कृतवीर्यके पुत्र महान् पराक्रमी राजा कार्तवीर्य चार [श्रेष्ठजनों]-से घिरे मुनिवर जमदग्निद्वारा निर्दिष्ट आसनपर बैठ गये ॥ २८-२९ ॥ मुनि जमदग्निने पाद्य, अर्घ्य तथा विष्टर (आसनके प्रतीकरूपमें कुशमुष्टि) प्रदानकर उन सभीका सत्कार किया और गायें भी प्रदान कीं तथा शिष्योंद्वारा अन्य
२३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
(बायाँ स्तम्भ) सभी सैनिकोंका स्वागत-सत्कार करवाया ॥ ३० ॥ तदनन्तर आखेटसे परिश्रान्त हुए सभी सैनिकोंने विविध सरोवरोंके अत्यन्त रमणीय, शीतल तथा निर्मल जलमें डुबकी लगाते हुए स्नान किया ॥ ३१ ॥ मुनि जमदग्निके शिष्योंद्वारा निनादित की जाती हुई वेदध्वनि, शास्त्रोंके बहुत-से शब्दों तथा चारों ओर हो रहे शास्त्रार्थके वचनोंको सुनते हुए कमलनयन राजाने उन मुनिश्रेष्ठ जमदग्निसे कहा—'आज मेरे माता-पिता धन्य हो गये हैं; आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरा ज्ञान धन्य हो गया तथा मेरी तपस्या फलीभूत हो गयी ॥ ३२-३३ ॥ आज [मेरे द्वारा लगाया गया] पुण्यरूपी वृक्ष फलित हो गया, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ। आज मेरी समस्त सम्पदा धन्य हो गयी। मेरा कुल तथा मेरी कीर्ति भी धन्य हो गयी। परब्रह्म परमात्मा जिसे कहा गया है, निश्चय ही आप वही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। आपका इस प्रकारका आतिथ्य-सत्कार देखकर मेरा मन अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया है' ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकारकी सुसंस्कृत वाणीको सुनकर वे मुनि अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये और सब कुछ जानते हुए भी मुनिवर मुस्करा उठे और उन्होंने राजासे पूछा—आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं? आपका क्या नाम है, और किस प्रयोजनसे आप यहाँ आये हैं? ॥ ३६१/२ ॥ राजा बोले—स्वधर्मका पालन करनेवाले राजाओंके लिये आप-जैसे महापुरुषोंके दर्शनके अतिरिक्त कोई दूसरा महान् प्रयोजन नहीं हो सकता। मैं राजा कृतवीर्यका पुत्र हूँ और कार्तवीर्य इस नामसे विख्यात हूँ। आपकी आज्ञा प्राप्तकर मैं अपने नगरकी ओर लौट जाऊँगा ॥ ३७-३८१/२ ॥ मुनि बोले—हे राजश्रेष्ठ! मैंने आपके महान् यशका श्रवण किया है। मुझे भी आपके दर्शनकी इच्छा थी, आज महान् पुण्यसे वह सफल भी हो गयी है। मेरी देह, आत्मा, तपस्या, ज्ञान तथा यह मेरा आश्रम आज सफल हो गया है। हे राजन्! आज आपके आगमनसे मेरी समस्त सम्पदाएँ सार्थक हो गयी हैं, आप कुछ भोजन
(दायाँ स्तम्भ) किये बिना कैसे जानेकी इच्छा करते हैं? ॥ ३९-४१ ॥ यद्यपि आपको कोई कमी नहीं है, फिर भी आपके द्वारा भोजन करनेसे लोकमें मेरी कीर्ति होगी। हे विभो! कुछ भोजन करनेके अनन्तर आप जायँ, हे प्रभो! आज आप मुझे सनाथ बनायें ॥ ४२ ॥ राजा बोले—निश्चित ही यह भोजन करनेका समय है, आपकी आज्ञासे कुछ भोजन अवश्य करना चाहिये। श्रोत्रिय ब्राह्मणोंके यहाँ यदि अन्नका अभाव हो तो माँगकर भी जल अवश्य पीना चाहिये। तथापि अपने इन असंख्य सैनिकोंको छोड़कर मैं जल भी नहीं पी सकता हूँ, फिर भोजन कैसे कर सकता हूँ? ॥ ४३-४४॥ हे ब्रह्मन्! मैं अनुमानसे यह जानता हूँ कि सभीको भोजन करानेकी शक्ति आपमें नहीं है। आपके दर्शनमात्रसे मैं कृतकृत्य हो गया हूँ और इस समय जाना चाहता हूँ॥ ४५ ॥ मुनि बोले—हे राजर्षे! आप चिन्ता न करें, मैं सम्पूर्ण सेनासहित आपको चार प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य तथा चोष्य) भोजन कराऊँगा। तपस्वियोंके लिये क्या असाध्य है? ॥ ४६ ॥ हे प्रभो! यहाँके अतिरिक्त घरमें भी जो आपकी सेना हो, उसे भी बुला लें। आप क्षणभर इस नदीके अत्यन्त रमणीय शुभ तटपर तबतक विश्राम करें, जबतक कि भोजन पक नहीं जाता, फिर आप आश्चर्य हुआ देखेंगे ॥ ४७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—मुनि जमदग्निके उन वचनोंको सुनकर अपने अन्तर्मनमें अत्यन्त आश्चर्यचकित होते हुए कृतवीर्यके पुत्र वे राजा कार्तवीर्य नदीके अत्यन्त सुन्दर तटपर चले गये। इधर जमदग्निजीने अपनी पत्नी रेणुकाको बुलाकर समस्त वृत्तान्त उसे सुनाया ॥ ४८-४९ ॥ उन दोनोंने कामधेनुको बुलाकर क्षणभर उसकी पूजा की और दोनोंने उससे प्रार्थना की कि हे धेनुके! हमारी लज्जाकी रक्षा करना। हे कल्याणि! हमने असंख्य सेनासे समन्वित राजाको भोजनके लिये निमन्त्रित किया है, अतः सेनासहित उस राजाकी रुचिके अनुसार भोजनकी व्यवस्था होनी चाहिये। आप क्षणभरमें ही वैसी व्यवस्था करें। अन्यथा सत्यकी मर्यादा नष्ट हो
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उ०खं०-अ०७८] * मुनि जमदग्निद्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्यका आतिथ्य * २३३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 जायगी और संसारमें हमारा अपयश भी होगा, अतः आप जैसा ठीक समझें, वैसा करें ॥ ५०-५२ ॥ उन दोनोंके द्वारा इस प्रकार प्रार्थित की गयी कामधेनुने अपने प्रभावके द्वारा एक महान् नगरकी रचना की, जो नाना प्रकारके सुन्दर भवनोंसे सुसज्जित था। वह विविध प्रकारके रत्नमय खम्भोंसे सुशोभित था, वहाँ विविध प्रकारके सभागृह बने थे। नाना प्रकारके पुष्पों तथा लताओंसे समन्वित सुन्दर वाटिकाओं और उपवनोंसे वह सुशोभित था ॥ ५३-५४ ॥ वह नगर विविध प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे मण्डित था तथा अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनियोंसे गुंजित हो रहा था। वह स्वर्णके पात्रोंकी विविध पंक्तियोंसे सुशोभित था। चारों प्रकारके व्यंजनोंसे युक्त विविध प्रकारकी पंक्तियोंसे सुसज्जित था। वह नगर विशाल तोरणद्वारोंसे सुशोभित तथा चारों ओर परिखाके घेरेसे युक्त था ॥ ५५-५६ ॥ उस नगरके रमणीय चबूतरे अनेक दास-दासियोंसे समन्वित थे। वहाँ जहाँ-तहाँ स्थित पुरवासी जन आने- जानेवाले लोगोंको इधर-उधर हटा रहे थे और कह रहे थे कि मुनि जमदग्निकी आज्ञा है कि इससे आगे कोई न जाय ॥ ५७१/२॥ वहाँ चारों ओर असंख्य पात्रोंमें भोजन परोसा गया था। वे पात्र दीपोंके प्रकाशसे प्रकाशित हो रहे थे, उनमें विविध प्रकारके व्यंजन परोसे गये थे। पात्रोंमें सूप, खीर, पक्वान्न तथा पंचामृत रखा हुआ था, वे पात्र खाद्य, लेह्य (चाटनेयोग्य), चोष्य (चूसनेयोग्य) तथा विविध प्रकारके पेय पदार्थोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित थे। सामुद्र लवणसे युक्त पका हुआ नीबू, आम, अमृत फल, बिल्व आदि पदार्थ भी उन पात्रोंमें सजाये गये थे ॥ ५८-६०॥ श्रीकामधेनुके महान् कृपाप्रसादके प्रभावसे अन्न- पात्रोंमें पक्वान्नोंके परोस दिये जानेपर कृतवीर्यके पुत्र राजा कार्तवीर्यको उसकी सेनाके साथ भोजन करानेके लिये मुनि जमदग्निजीने उस समय अपने शिष्योंको बुलवाया ॥ ६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यान' नामक सतहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७७ ॥ अठहत्तरवाँ अध्याय मुनि जमदग्निद्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्यका आतिथ्य; कामधेनुका अद्भुत प्रभाव देखकर राजाका बलपूर्वक उसे ग्रहण करनेकी इच्छा करना ब्रह्माजी बोले- मुनि जमदग्निने अपने शिष्योंसे कहा—'तुम लोग नदीके तटपर निवास कर रहे राजा कार्तवीर्यको बुलानेके लिये शीघ्र ही वहाँ जाओ' ॥ १॥ उन शिष्यगणोंने राजाके समीप जाकर और उनके समक्ष उनका अभिवादन स्वीकारकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया और उनसे मुनिकी आज्ञा इस प्रकार निवेदित की-हे राजन्! आप अपनी सेनाके साथ सावधानीपूर्वक भोजनके लिये चलें। षड्रसोंसे समन्वित भोजनके असंख्य पात्र परोसे गये हैं ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उठकर उस राजाने अपने सभी सैनिकोंको बुलवाया और भलीभाँति स्नान करके राजा कार्तवीर्यने वहाँके लिये प्रस्थान किया ॥ ४ ॥ वहाँ राजाने मुनिके भवनको देखा तो वैसा दृश्य उसने न कभी सुना था और न देखा ही था। उस प्रकारका गृहका तोरण तीनों लोकोंमें उसे नहीं दिखायी दिया था ॥ ५ ॥ मुनि जमदग्निके संकेतकी अभिलाषा करनेवाले तथा हाथमें बेंत धारण करनेवाले द्वारपालोंने राजाको जब आगे जानेसे मना किया तो मुनिके शिष्यगणोंने द्वारपालोंको वैसा करनेसे रोका, तदनन्तर राजा भोजनालयमें गये ॥ ६ ॥ वहाँ जाकर भोजनालयके मध्यमें स्थित होकर राजाने मुनि जमदग्निकी सम्पदाको देखा, उस समय
शीर्षक (Header): २३४ | * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * | [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
राजाने अपने मनमें सोचा कि ऐसी सम्पदा तो न विष्णुजीके पास है और न ही शंकरजीके पास। संसारका पालन-पोषण करनेवाले विष्णु, संहार करनेवाले भगवान् शिव तथा इस जगत्की सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजीके पास भी ऐसी समृद्धि नहीं है। तदनन्तर मुनि जमदग्निने आगे जाकर राजाकी अनुमति प्राप्तकर सभी सैनिकोंको भोजनपात्रोंके पास पंक्तिबद्ध बैठाया और जो भोजनालयसे बाहर भोजन करनेवाले थे, उनके लिये भी भोजनपात्रोंको भिजवाया॥ ७-९॥ आसनोंपर उन सभीके बैठ जानेपर मुनि जमदग्निने राजाको बैठाया। तदनन्तर वाद्यके बजनेपर उन सभीने भोजन किया। इस प्रकारके अन्नों तथा स्वादिष्ट फल- मूलोंको उनके द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया था। वे सभी आपसमें ही इस प्रकार पूछने लगे कि 'यह क्या है? यह क्या है?'॥ १०-११॥ सब लोग आश्चर्य करने लगे कि एक पहरमें ही ऐसी सब व्यवस्था मुनिने कैसे कर दी? इच्छापूर्वक सबने भोजन किया और जब वे तृप्त हो गये तो शेष भोजन उन्होंने पात्रोंमें छोड़ दिया॥ १२॥ तदनन्तर मुनिके शिष्योंने प्रत्येक भोजनपात्रके पास हाथ-मुँह धोनेके लिये प्रक्षालनपात्र भी प्रदान किया और दाँतोंमें लगे अन्नकणोंको निकालनेके लिये सुन्दर सींक (शलाका)-भी प्रदान की। शिष्योंने अवशिष्ट अन्नको हाथी, घोड़े तथा बैलोंको प्रदान किया। तदनन्तर वे सभी बिस्तर बिछाये हुए दूसरे घरमें गये, वहाँ उन्होंने ईख, दाख, आम, कटहल तथा दाडिम आदि फलोंका सेवन किया। मुनि जमदग्निद्वारा प्रदत्त इलायची, लौंग, कपूर, खैरके चूर्ण (कत्था) एवं सुपारीसे समन्वित पानके पत्तोंको ग्रहण किया॥ १३-१५१/२॥ इसके पश्चात् मुनिने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उन सभीको यथायोग्य मूल्यवान् वस्त्र एवं आभूषण प्रदान किये। राजाको तो और भी अधिक मूल्यवान् वस्त्राभूषण प्रदान किये॥ १६१/२॥ मुनि बोले-[हे राजन्!] साक्षात् विष्णुरूपी तथा सभी प्रकारके मनोरथोंसे परिपूर्ण आप राजाके लिये
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
मुझ वनवासी मुनिके द्वारा कौन-सा भोजन देय है। मेरे वचनोंका पालन करते हुए आपने तीनों लोकोंमें मेरे यशकी अभिवृद्धि की है॥ १७-१८॥ लोकमें लोग ऐसा कहेंगे कि मुनि जमदग्निके यहाँ ससैन्य राजा कार्तवीर्यने भोजन किया। अत्यन्त पुण्यशाली व्यक्तिके लिये ही लोकमें 'साधु' शब्दका प्रयोग होता है। यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्तिके वचनानुरोधका पालन करता है, तो वह भी साधुताको प्राप्त करता है और सभी लोकोंमें अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यशको प्राप्त करता है। मेरे वचनका परिपालन करनेसे आपका महान् अरिष्ट भी दूर हो गया है॥ १९-२०१/२॥ ब्रह्माजी बोले-महर्षि जमदग्निद्वारा कही गयी इस प्रकारकी वाणीको सुनकर राजा उस समय अपने मनमें अत्यन्त विस्मयको प्राप्त हुए और उन्होंने उनसे पूछा॥ २११/२॥ राजा बोले-हे सुव्रत! यहाँ पहले तो कुछ भी मैंने नहीं देखा था, क्या यह सब मायाके प्रभावसे हुआ है अथवा तपस्याके प्रभावसे हो सका है, इसे मुझे सच- सच बतलाइये॥ २२१/२॥ मुनि बोले-हे राजन्! मैंने कभी पहले परिहासमें भी झूठ नहीं बोला है, अतः मैं आपसे सत्य कहता हूँ कि यह सब कुछ कामधेनुके द्वारा ही किया गया है॥ २३१/२॥ ब्रह्माजी बोले-हे मुने! जिसका भाग्य विपरीत हो जाता है, उसकी बुद्धि भी विपरीत हो जाती है, दुष्ट ग्रहके द्वारा बलपूर्वक अनिष्ट उत्पन्न हो जाता है। अपनी सेना तथा वाहनोंसहित भोजनसे भलीभाँति संतृप्त हो जानेपर भी राजा कार्तवीर्यने कामधेनुको ले जानेका निश्चय किया और वे मुनिसे इस प्रकार कहने लगे॥ २४-२५१/२॥ राजा बोले-मैं समझता हूँ कि शान्त चित्तवाले, कन्दमूल तथा फलका सेवन करनेवाले, मनसे ही सृष्टि तथा संहार करनेकी क्षमता रखनेवाले, प्रत्येक प्रकारकी कामनासे रहित और इन्द्रियोंको सर्वथा जीत लेनेवाले, आप-जैसे ज्ञानीजनोंके लिये इस प्रकारकी गौका कोई प्रयोजन नहीं है॥ २६-२७॥ वनमें प्राप्त वस्तुओं, फल-मूल आदिका और
उ०ख०-अ०७९ ] * जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करना * २३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
वायुमात्रका सेवन करनेवाले, मोक्षकी साधना करनेवाले और निरन्तर वेदके स्वाध्यायमें परायण रहनेवालोंको सम्पत्तिसे क्या प्रयोजन ? शास्त्रोंके अध्यापनमें निरत, धर्मशास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले और योगाभ्यासपरायण जनोंका कामधेनुसे क्या प्रयोजन है ? ॥ २८-२९ ॥ महान् पुरुषोंको प्राप्त महान् वस्तु महान् कार्यको सम्पन्न करनेके लिये ही होती है, आप-जैसे अरण्यवासीके पास यह महान् रत्नरूपी गौका विद्यमान रहना उचित नहीं प्रतीत होता ॥ ३० ॥ इसलिये हे ब्रह्मन् ! आप इस कामधेनुको प्रसन्नतापूर्वक मुझे प्रदान कर दें। आप मनमें यह निश्चय कर लीजिये कि मेरे पास रहनेपर भी यह गौ आपकी ही होगी ॥ ३१ ॥ अतः ब्रह्मन् ! मेरी उस मर्यादाकी रक्षा कीजिये, जो मैंने आपके समक्ष रखी है। अन्यथा बलशाली राजाओंके लिये संसारमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो दुर्लभ है। अपना राष्ट्र हो अथवा पराया राष्ट्र हो, राजा अपनी चतुरंगिणी सेनाके साथ अपनी मनोभिलषित वस्तु प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३२१/२ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे द्विज ! उस दुर्मति राजा कार्तवीर्यके इन वचनोंको सुनकर महामुनि जमदग्नि क्रोधसे उसी प्रकार अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे, जैसे कि अत्यधिक घीकी आहुति पड़नेपर अग्नि देदीप्यमान हो उठती है। लाल- लाल आँखोंवाले वे ब्राह्मण जमदग्नि उन राजाको अनुशासित करते हुए इस प्रकार बोले - ॥ ३३-३४१/२ ॥ मुनि बोले- हे राजन् ! मैंने तुम्हें सदाचारी, शुद्धचित्त एवं राजा होनेके कारण आदरणीय समझकर ही भोजनके लिये आमन्त्रित किया था, किंतु तुम्हारे हृदयमें बगुलेके समान जो कुटिलता व्याप्त थी, उसे मैं जान न सका। जैसे कोयल छल करके अपने बच्चेका पालन कौवेसे करवाती है, किंतु अन्तमें वह कोयलका बच्चा कौआ होकर भक्ष्य तथा अभक्ष्य सब कुछ खानेमें अनुरक्त हो जाता है, इसी प्रकार मैं भी भूलमें पड़ गया था, जो कि मैंने इस प्रकारके राजाके साथ मित्रता की। ऐसी मैत्री लोकमें न देखी गयी है, 'न सुनी गयी है और न किसीके द्वारा अनुभूत ही की गयी है ॥ ३५-३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यान' नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥
उन्यासीवाँ अध्याय जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करनेपर कार्तवीर्यका क्रुद्ध होकर अपने सैनिकोंको युद्धका आदेश देना, इधर कामधेनुद्वारा अनेक वीरोंका प्रादुर्भाव और उनके द्वारा कार्तवीर्यकी सेनाका पराभव, क्रुद्ध कार्तवीर्यद्वारा महर्षि जमदग्निका वध, रेणुकाका कार्तवीर्यको शाप देना
मुनि बोले- [हे राजन् ! ] पहले तो तुमने सज्जनोंके आचरणका अनुपालन करते हुए उपकारका भाव दिखाया, किंतु अब तुम अपने विनाशको बुलाकर कामधेनुको प्राप्त करनेकी इच्छा कर रहे हो ॥ १ ॥ हे नृप ! तुम निश्चित ही भ्रममें हो; क्योंकि जो वस्तु अप्राप्य है, उसकी तुम अभिलाषा कर रहे हो। निश्चित ही तीनों लोकोंको विनष्ट करनेसे जो पाप होता है, वह तुम्हारे सिर लगेगा ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारके वचनरूपी बाणोंसे विद्ध वह राजा प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठा, और क्रुद्ध होकर अपने मुखसे आग उगलता हुआ परम क्रुद्ध होकर उस समय मुनि जमदग्निसे कहने लगा ॥ ३१/२ ॥ राजा बोला- हे शठ ! किसीके भी मुखसे मैं कटु- वचन नहीं सुन सकता। क्या करूँ, तुम ब्राह्मण हो- ऐसा विचार करके मैं कटु वचनोंको सहन कर रहा हूँ ॥ ४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर उठकर उस राजाने अपने दूतोंको शीघ्र ही आज्ञा देते कहा- 'तुम लोग खूँटेसे बँधी हुई कामधेनुको छुड़ाकर शीघ्र ही मेरे
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२३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] पास ले आओ। उसकी आज्ञासे दूतोंने उस समय [चित्र] कामधेनुको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ५-६ ॥ [परंतु] कामधेनुकी फूत्कारमात्रसे वे दूत अपने प्राण गवाँकर स्वर्ग चले गये। अन्य राजदूतोंको उसने अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डाला। दूसरे वीर उसकी श्वासरूपी वायुके तीव्र वेगसे आकाशमें उड़ गये। उस समय उनके द्वारा सूर्यमण्डल आच्छादित हो जानेके कारण कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था ॥ ७-८ ॥ सभी दिशाएँ अन्धकारसे व्याप्त हो गयीं, आकाश भी नहीं दिखायी पड़ रहा था। पृथ्वी हिलने-डुलने लगी, प्रकम्पित होकर वृक्ष गिरने लगे ॥ ९ ॥ सभी सैनिक भयभीत होकर दशों दिशाओंमें भाग उठे। किसीने दूर स्थित होकर चाबुकके आघातसे उस कामधेनुको प्रताड़ित किया। तब वह गौ उड़-उड़कर उस सेनाके पीछे उसी प्रकार दौड़ पड़ी, जैसे कि हाथियोंके समूहपर सिंह और सर्पोंपर गरुड़ टूट पड़ता है ॥ १०-११ ॥ भागते हुए उन वीरोंमें महान् हाहाकार मच गया। तब महान् बलशाली कार्तवीर्यने उनसे कहा—'तुम लोगोंको भयभीत नहीं होना चाहिये। प्रसन्नतापूर्वक मेरे द्वारा शंखध्वनि किये जानेपर वह कामधेनु भयभीत
[दायाँ स्तम्भ] होकर अपने घर वापस लौट जायगी। उसकी सामर्थ्य ही क्या है? तुम लोग मेरे कौतुकको देखो ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर उसने अपना महान् शंख बजाया, जिसके नादसे त्रैलोक्य गूँज उठा। किंतु तब भी वह कामधेनु भयभीत नहीं हुई, तदनन्तर उन सभी राजसेवकोंने लाठियों, लोहेके डण्डोंसे बड़े वेगसे उसे पीटना प्रारम्भ किया। उसके शरीरपर जहाँ-जहाँ प्रहार हुआ उस-उस स्थलसे अनेक वीर उत्पन्न हुए, जो सभी प्रकारके शस्त्रोंसे समन्वित थे और युद्धके लिये सन्नद्ध थे। उस कामधेनुके केशोंसे शक और बर्बर प्रादुर्भूत हो गये ॥ १४-१६ ॥ इसी प्रकार उसके पैरोंसे पटच्चर जातिवाले सैनिक, विविध जातिके यवन तथा अन्य भी सभी वीर उत्पन्न हुए। ऐसे ही कामधेनुसे घोड़े, हाथी तथा रथोंपर सवार अनेक वीरोंके समूह उत्पन्न हुए, उन्होंने भी कार्तवीर्यके सैनिकोंके साथ युद्ध किया ॥ १७-१८ ॥ उनके प्रहारसे राजा कार्तवीर्यके सैनिक भूमिपर गिरने लगे। उसके अन्य सैनिक जैसे रात्रिमें पक्षी वृक्षमें छिप जाते हैं, वैसे ही कामधेनुके सैनिकोंमें मिलकर छिप गये। परस्पर आघातसे सैकड़ों पुरुष घायल होकर गिर पड़े। शस्त्रोंके द्वारा शस्त्रोंके काट दिये जानेपर कुछ वीर मल्लयुद्ध करने लगे ॥ १९-२० ॥ इस प्रकारका भीषण युद्ध छिड़ जानेपर तथा शस्त्रोंके गिर जानेपर यह नहीं पता चल पा रहा था कि कौन अपने पक्षका है और कौन पराये पक्षका ॥ २१ ॥ धूलके द्वारा सूर्यके आच्छादित हो जानेसे वे सैनिक परस्परमें ही एक-दूसरेको मारने लगे। 'मारो-मारो'- ऐसा कहते हुए महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ २२ ॥ घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंके चिंघाड़, सैनिकोंके निनाद, रथोंके नेमिकी ध्वनि, मृदंग, ताल, वेणु और भेरीके शब्दोंसे अत्यधिक कोलाहल हो उठा ॥ २३ ॥ इस प्रकार उस कामधेनुसे आविर्भूत वीरों तथा कार्तवीर्यके रथारोही, अश्वारोही, गजारोही और पैदल सैनिकोंके मध्य अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ, जो भूतों तथा राक्षसोंको भी भय प्रदान करनेवाला था ॥ २४ ॥
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उ०ख०-अ०७९ ] * जमदग्निद्वारा कामधेनुको देनेसे मना करना * २३७ वह युद्ध चील, कौवे आदि पक्षियोंके लिये सुख प्रदान करनेवाला और वीरोंकी पत्नियोंको भय प्रदान करनेवाला था। युद्धमें किसीकी जाँघें टूट गयीं और किसीके सिर कट गये। उस युद्धमें टूटे हुए खड्ग, खेटक, भाले, बाण तथा धनुषों और वीरों एवं रथारूढ़ोंकी तो गिनती ही नहीं की जा सकती थी ॥ २५-२६ ॥ उस समय राजा कार्तवीर्यके जो बचे हुए सैनिक थे, वे भागने लगे और कामधेनु गौके सैनिकोंने हँसकर उन्हें दौड़ाया, किंतु मारा नहीं। उन सैनिकोंने कार्तवीर्यके सैनिकोंकी निन्दा की और कहा- 'मुनि जमदग्निने तुम सबका क्या अनिष्ट किया था? [लगता है,] किसी जन्मान्तरीय दोषके कारण उस समय राजा कार्तवीर्यको दुर्बुद्धि पैदा हो गयी थी' ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकार अपनी सम्पूर्ण सेनाके विनष्ट हो जानेपर कृतवीर्यका पुत्र वह राजा कार्तवीर्य युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ। उसने अपने हाथोंमें पाँच सौ धनुष तथा पाँच सौ बाण धारण कर लिये ॥ २९ ॥ महान् भुजाओंवाले उस कार्तवीर्यने भूमिपर बायाँ घुटना टेककर बड़े वेगसे धनुषोंकी प्रत्यंचाओंको खींचकर कामधेनुसे उत्पन्न सेनाओंपर बाणोंकी वर्षा की ॥ ३० ॥ किंतु राजाद्वारा की गयी वह बाणोंकी वर्षा उसी प्रकार निष्फल हो गयी, जैसे कि नीतिरहित व्यक्तिका उद्यम विफल हो जाता है और जैसे वन्ध्या स्त्रीका सहवास विफल हो जाता है। उस समय उस राजश्रेष्ठ कार्तवीर्यने बार-बार उतने ही बाणोंको छोड़ा, किंतु कामधेनुसे उत्पन्न एक वीर भी घायल नहीं हुआ ॥ ३१-३२ ॥ अपने बाणोंके विफल हो जानेपर उस समय राजा अत्यन्त संतप्त हो उठा, 'मेरा सामर्थ्य कहाँ चला गया' इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह व्याकुल हो गया ॥ ३३ ॥ 'व्याकुल व्यक्तिपर प्रहार नहीं करना चाहिये'- ऐसा समझकर वे सभी सैनिक स्वर्गलोकको चले गये और कामधेनु भी प्रसन्न हो गयी तथा सोचने लगी कि तुच्छ व्यक्तिके साथ युद्ध करनेसे क्या लाभ? ॥ ३४ ॥ कामधेनुके स्वर्ग चले जानेपर वह राजा कार्तवीर्य मुनि जमदग्निके समीप गया और क्रुद्ध होकर उनसे बोला- 'हे ब्रह्मन्! मैंने तुम्हारा कपट भाव जान लिया है, जिसके हृदयमें छल-कपट हो, उसे ब्राह्मण नहीं समझना चाहिये।' ऐसा कहकर उसने एक बाणके द्वारा मुनिश्रेष्ठ जमदग्निको विद्ध कर डाला ॥ ३५-३६ ॥ उस महान् बाणके हृदयमें लगते ही मुनिने प्राण त्याग दिया। तब मुनिपत्नी रेणुकाने उस राजासे कहा- 'तुमने व्यर्थमें ही ब्रह्महत्या की है' ॥ ३७ ॥ आँखें लाल किये हुए वह राजा क्रोधके आवेशमें होकर उस रेणुकासे बोला- 'अरे मुनिकी प्रिय पत्नी! चुपचाप खड़ी रहो, नहीं तो मैं तुम्हें भी मार डालूँगा' ॥ ३८ ॥ तदनन्तर उस दुष्ट राजा कार्तवीर्यने क्रोध करते हुए इक्कीस बाणोंसे रेणुकापर भी प्रहार किया। उस समय मुनिपत्नीने अपने मनमें मुनि जमदग्निका स्मरण किया ॥ ३९ ॥ तदनन्तर रेणुकाने उस राजासे कहा- 'अरे दुष्ट चाण्डाल! तुमने यह क्या कर डाला? बिना अपराधके हम दोनोंको तुमने क्यों मारा है? तुम्हारा और तुम्हारी भुजाओंका विनाश हो जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है' ॥ ४० १/२ ॥ रेणुकाका ऐसा वचन सुनकर वह राजा वापस चला गया। वह अपने थोड़े-से बचे हुए सैनिकोंको लेकर चिन्तामग्न होते हुए अपने नगरको लौट गया। उस समय वह अपने मनमें अपनी ही निन्दा कर रहा था और मरे हुए सैनिकोंके लिये शोक कर रहा था। उत्साहहीन तथा निश्चेष्ट होकर उसने अपने भवनमें प्रवेश किया ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कार्तवीर्योपाख्यानमें' उन्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७९ ॥
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अस्सीवाँ अध्याय
२३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अस्सीवाँ अध्याय माता रेणुकाके स्मरण करनेपर परशुरामका आगमन, माताद्वारा सारा वृत्तान्त जानकर परशुरामका दुखी होना और माताद्वारा प्राप्त इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियविहीन बनानेकी आज्ञाको स्वीकार करना, परशुरामद्वारा माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार करना
ब्रह्माजी बोले—राजा कार्तवीर्यके चले जानेपर मुनिपत्नी रेणुका शोकग्रस्त तथा अत्यन्त विह्वल हो उठी। इस युद्धके उपस्थित होनेपर वे मेरे पुत्र कहाँ चले गये— ऐसा वह कहने लगी॥ १॥ पतिके मृत्युप्राप्त हो जानेपर बाणोंसे आबद्ध मैं इस समय क्या करूँ? मेरा अत्यन्त क्रोधी वह प्रिय पुत्र परशुराम भी न जाने कहाँ चला गया?॥ २॥ उसे देख लेनेपर ही मेरे प्राण देवलोकको जायेंगे। तदनन्तर स्मरणमात्र करनेसे ही उस समय परशुराम माताके पास उपस्थित हो गये॥ ३॥ उन्होंने माताको बाणसमूहोंसे बँधा हुआ तथा पिताको मृत-अवस्थामें देखा, जिन्हें दुष्ट कार्तवीर्यने हृदयमें कठोर बाण मारकर आहत कर दिया था॥ ४॥ परशुराम उस समय मूर्च्छासे उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़े, जैसे कि आँधीके द्वारा वृक्ष भूमिपर गिरा दिया जाता है। वे अत्यन्त दुखी होकर अपने माता-पिताके लिये विलाप करने लगे॥ ५॥ परशुराम बोले—आज सभी ओर मुझे अन्धकार दिखायी पड़ रहा है। आज मेरे लिये दसों दिशाएँ शून्य- सी हो गयी हैं। जिस प्रकार पृथ्वी सुमेरुपर्वतसे रहित हो जाती है, और जिस प्रकार अमरावतीपुरी देवराज इन्द्रसे रहित हो जाती है, वैसे ही पिताके बिना मेरे लिये आज यह आश्रम सुशोभित नहीं हो रहा है। जिस प्रकार तीनों लोक गंगाके बिना शून्य हो जाते हैं, वैसे ही यह आश्रम-मण्डली भी सूनी-सूनी-सी हो गयी है॥ ६-७॥ माता रेणुकाके बिना यह आश्रम-मण्डली शोभित नहीं हो रही है। अब देवताओंका भय दूर चला गया है और सभी मुनिगण अनाथ हो गये हैं। देवताओंको यह भय था कि ये जमदग्नि तपस्याके प्रभावसे न जाने हमारा क्या ग्रहण कर लेंगे॥ ८॥
इस प्रकारसे उन्होंने बहुत विलाप किया। वे परशुराम उसी प्रकार चेष्टाहीन हो गये, जैसे कि मछली जलके बिना हो जाती है। तदनन्तर रोते हुए वे पुनः माताके समीप चले आये और माताकी गर्दनको गोदमें रख करके उसके शरीरसे बाणोंको निकालने लगे॥ ९-१०॥ माताके दुखसे दुखित हो परशुराम पुनः रुदन करने लगे। तीनों लोकोंको भस्म कर देनेकी क्षमता रखनेवाली मेरी माता आज उस दुष्टके बाणोंसे पीड़ित होकर भूमिपर पड़ी हुई है। [हे मातः!] कुछ समय पूर्वकी बात है, मेरे खेलनेके लिये जानेपर तुम क्षणभर भी मेरा विस्मरण नहीं करती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जानेको उद्यत हो? हे शोभने! तुम मुझे दुग्ध तथा अनेकों वस्त्र, अन्न प्रदान करती थी, सुन्दर-सुन्दर फल- मूलोंको देती थी, आज वही तुम मुझे छोड़कर कहाँ जा रही हो? माता-पितासे हीन मेरे जीवनको आज धिक्कार है!॥ ११-१४॥ ब्रह्माजी बोले—पुत्रके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर माता रेणुका अत्यन्त दुःखमें भर गयीं, उन्होंने पुत्रके आँसू पोंछकर बहुत व्याकुल होते हुए कहा॥ १५॥ [हे पुत्र!] मैं तुम्हारे निकट ही रहूँगी, अतः तुम शोक न करो। अब तुम पूर्वमें घटी हुई घटनाको सुनो। कुछ समय पहलेकी बात है कि कृतवीर्यका पुत्र राजा कार्तवीर्य मध्याह्नकालमें अपनी सेनाके साथ इस आश्रम- मण्डलमें आया। तुम्हारे पिताने उसका बहुत स्वागत- सत्कार किया और सेनासहित उसे भलीभाँति भोजन कराया॥ १६-१७॥ कामधेनुके कृपा-प्रसादसे वैसी व्यवस्था देखकर भोजन करनेके अनन्तर राजाने मुनिसे कामधेनुकी याचना की। मुनिके मौन रहनेपर उसने क्रोध करके कामधेनुको बन्धनसे मुक्त कर दिया॥ १८॥
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उ०ख०-अ०८१ ] * परशुरामका माता-पिताका दाह-संस्कार करना * २३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सैनिकोंद्वारा स्पर्श हो जानेमात्रसे उस धेनुने अत्यन्त | करना चाहिये। चूँकि उसने मेरी देहमें इक्कीस बाण बलशाली चतुरंगिणी सेनाको उत्पन्न किया। तदनन्तर | मारे हैं, अतः तुम भी इक्कीस बार इस पृथ्वीको राजाके सैनिकोंके साथ कामधेनुके द्वारा उत्पन्न सैनिकोंका | क्षत्रियोंसे विहीन बना दो। हे पुत्र! तुमको मैं एक महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १९ ॥ | बात और कहती हूँ, तुम मेरी आज्ञाका पालन करते घायल होकर राजाके वे सैनिक जब भाग उठे तो | हुए अवश्य करो ॥ २३-२४ ॥ स्वयं राजा कार्तवीर्य युद्धके लिये आ डटा। उसने पाँच- | तुम ऐसे स्थानपर हम दोनोंका और्ध्वदैहिक संस्कार पाँच सौ बाणोंको कई बार छोड़ा ॥ २० ॥ | करो, जहाँपर किसीका दाहसंस्कार न हुआ हो। उसके जब वह भी पराजित हो गया तो वह घरकी | बाद तुम सर्वज्ञ मुनिश्रेष्ठ दत्तात्रेयजीको बुलाकर उनसे ओर लौट चला। कामधेनु भी स्वर्गको चली गयी। | त्रयोदशाहपर्यन्त हम दोनोंके और्ध्वदैहिक कर्म कराओ। पुनः आकर उस दुष्टने एक बाणसे तुम्हारे पिताके | उन दत्तात्रेयमुनिके समान कोई वक्ता नहीं है, तभी हम वक्षःस्थलपर प्रहार करके उन्हें मार डाला और इक्कीस | दोनों सद्गतिको प्राप्त करेंगे ॥ २५-२६ ॥ बाणोंद्वारा मुझ निरपराधको विद्ध करके वह दुष्ट | इतना कहकर रेणुका अपने शरीरको छोड़कर दुर्गम वापस चला गया ॥ २१-२२ ॥ | [परम] धामको प्राप्त हुईं। तब महामना परशुरामने इसलिये आज तुम्हें उस दुष्टका शीघ्र ही विनाश | माताकी आज्ञाके अनुसार ही सभी कर्मोंको किया ॥ २७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परशुरामोपाख्यानमें' अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८० ॥ इक्यासीवाँ अध्याय परशुरामका माता-पिताका दाह-संस्कार करके महर्षि दत्तात्रेयजीको आमन्त्रित करने उनके आश्रमपर जाना और अपने आगमनका प्रयोजन बताना, तदनन्तर दोनोंका वापस आश्रमपर आना, दत्तात्रेयजीके निर्देशानुसार परशुरामद्वारा त्रयोदशाहपर्यन्त अपने माता-पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न करना और पिता-माताकी सद्गति ब्रह्माजी बोले-परशुरामजीने मुण्डन कराकर | परशुरामजीने उन मुनिश्रेष्ठके पास जाकर उन्हें प्रणाम भलीभाँति विधि-विधानसे स्नान किया, तदनन्तर उन्होंने | किया। परशुरामजी आधे पहरतक हाथ जोड़े हुए उनके ब्राह्मणोंके कथनानुसार उत्थान श्राद्ध* (मृतिस्थानपर किया | समक्ष स्थित रहे। सर्वज्ञ मुनि दत्तात्रेयने उनके आगमनके जानेवाला श्राद्ध) किया। तत्पश्चात् विश्रामस्थानपर किये | प्रयोजनको भलीभाँति जान लेनेपर भी परशुरामजीको जानेवाले श्राद्धसे लेकर चितादाहतकके सभी श्राद्धोंको | अपने समीप बुलाकर कहा- 'यद्यपि मैं तुम्हारे आगमनका किया और मन्त्रपूर्वक दोनोंको मुखाग्नि दी। तदनन्तर शीघ्र | प्रयोजन जान चुका हूँ, तथापि मैं पूछता हूँ, कि तुम किस ही वे दत्तात्रेयमुनिके पास गये ॥ १-२ ॥ | कारणसे यहाँ आये हो ?' ॥ ३-५ ॥ ध्यानपूर्वक उन्होंने देखा कि दत्तात्रेयजी कुत्सित | ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर परशुरामजीने प्रारम्भसे वेश धारण करके शिष्योंके साथ बैठे हैं, उन्होंने हाथमें | लेकर अन्ततकका सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें स्पष्टरूपसे बता कुत्तेको पकड़ रखा है, वे मलिन तथा कृशकाय हैं, तब | दिया ॥ ५ १/२ ॥
- 'मृतस्योत्क्रान्तिसमयात् षट्पिण्डान् क्रमशो ददेत्'-पिण्डदानके छः स्थान इस प्रकार हैं-१-मृतस्थान, २-द्वारदेश, ३-चत्वर (चौराहा), ४- विश्रामस्थान, ५-काष्ठचयन तथा ६-अस्थिसंचयन। मृतस्थाने तथा द्वारे चत्वरे तार्क्ष्य कारणात् ॥ विश्रामे काष्ठचयने तथा सञ्चयने च षट् । (ग० पु०, प्रेतखण्ड १५ । ३०-३१)
२४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उ०ख०-अ०८२] * परशुरामजीको माता रेणुकाद्वारा कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना * २४१
पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर आ गयीं। यदि परशुरामजीके द्वारा द्वादशाहके बाद अर्थात् सपिण्डीकरणके बाद उनका आवाहन किया गया होता, तो वे सम्पूर्ण अवयवोंसे सुशोभित होकर उपस्थित होतीं। माता उनसे बोलीं—हे वत्स! मुझे किस कारणसे बुलाया, प्रयोजन बतलाओ ? पुत्रस्नेहके वशीभूत हो उनके स्तनोंसे दूध टपकने लगा। उन्होंने उन्हें गले लगाया ॥ २४-२५१/२॥ छठे दिन मुनि दत्तात्रेयजी पुनः वहाँ आये और उन्होंने उस अवस्थामें अर्थात् अपूर्ण गात्रवाली उन रेणुकाको देखा तो वे परशुरामसे बोले—'तुमने दशगात्रके बीचमें ही अपनी माताको क्यों बुलाया, ये असम्पूर्ण गात्रवाली होकर आ गयी हैं ॥ २६-२७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! यदि सपिण्डीकरण श्राद्ध अर्थात् द्वादशाहके बाद बुलाया होता तो तुम्हारे स्नेहके वशीभूत हो ये रेणुका पूर्ण शरीरवाली होकर आतीं' ॥ २८ ॥ परशुराम बोले—हे ब्रह्मन्! मैंने भयभीत होकर बालभावसे स्वभाववश 'हे मातः' इस प्रकारसे पुकारा था, तब हे मुनिश्रेष्ठ ! मैंने इन्हें इस अवस्थामें देखा ॥ २९ ॥ परशुरामजीने एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग किया तथा बारहवें दिन माता-पिता दोनोंका सपिण्डीकरण श्राद्ध किया। तदनन्तर दूसरे दिन अर्थात् त्रयोदशाह श्राद्धको पाथेय अर्थात् वर्षाशन प्रदानकर ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराया और ब्राह्मणोंको यथायोग्य अनेक प्रकारके दान प्रदान किये ॥ ३०-३१ ॥ उनके पिता जमदग्नि (श्राद्धसे संतृप्त होकर) दिव्य देह धारणकर ब्रह्मलोकको गये और माता रेणुका उसी रूपमें पृथ्वीपर अनेक स्थानोंपर स्थित हो गयीं ॥ ३२ ॥ जो लोग श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं, वे उन लोगोंके सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण कर देती हैं। हे मुनिश्रेष्ठ ! इन रेणुकाजीका विशेष माहात्म्य स्कन्दपुराणमें विस्तारपूर्वक कहा गया है। अत्यन्त विस्तारके भयसे उसे मैंने यहाँ नहीं बतलाया ॥ ३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें रामोपाख्यानमें इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥
बयासीवाँ अध्याय
परशुरामजीद्वारा पूछे जानेपर माता रेणुकाद्वारा उन्हें कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना, परशुरामद्वारा महादेवजीकी आराधनासे उन्हें गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश प्राप्त होना, मन्त्रजपसे गणेशजीका उन्हें दर्शन देना, गणेशजीका उन्हें अपना परशु प्रदान करना और परशुराम नामकी प्रसिद्धि, परशुरामद्वारा कार्तवीर्यका वध तथा इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियविहीन बनाना
व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] परशुरामजीने बालक होते हुए भी हजार हाथोंवाले तथा बहुत विशाल सेनावाले कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्यके साथ अकेले ही कैसे युद्ध किया और उस महापराक्रमशालीपर कैसे विजय प्राप्त की, उसे आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, परशुरामजीने अपनी माता रेणुकासे पूछा—॥ २ ॥ परशुराम बोले—हे मातः! जिस कार्तवीर्यके डरसे इन्द्र आदि देवता भी भयभीत होकर काँप उठते हैं, जिसके पास असंख्य मात्रामें चतुरंगिणी सेना है, उसपर मैं किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकूँगा, आप मुझे वह उपाय विस्तारपूर्वक बतलाइये। मैं किस प्रकार इक्कीस बार इस धराको क्षत्रियहीन बना सकूँगा, उसे भी बतलाइये। आपके कृपा-प्रसादसे निश्चित ही मेरी विजय होगी और सभी लोकोंमें मेरी अतुलनीय कीर्तिका विस्तार होगा ॥ ३-५ ॥ माता बोली—हे पुत्र! तुम्हारी विजय अवश्य होगी, तुम भगवान् शंकरकी आराधना करो। उन महादेवजीके सन्तुष्ट हो जानेपर सभी मनोकामनाओंकी पूर्ति हो जायगी ॥ ६ ॥
२४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
माताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उनके चरणोंमें प्रणामकर तथा उनका आशीर्वाद ग्रहणकर परशुराम कैलासपर्वतपर चले गये ॥ ७ ॥ वहाँ उन्होंने महादेवजीका दर्शन किया, जो रत्नमय सिंहासनके ऊपर विराजमान थे। परशुरामजीने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति की ॥ ८ ॥ परशुराम बोले—हे देवदेवेश ! हे गौरीपति ! हे शम्भो ! आपको नमस्कार है। विश्वकी सृष्टि करनेवाले आपको नमस्कार है, विश्वका पालन-पोषण करनेवाले आपको नमस्कार है। विश्वका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। विश्वमूर्त्तिरूप आपको नमस्कार है, विश्वके आश्रयरूप आपको नमस्कार है। चन्द्रमाको अपने मस्तकपर धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ९ ॥ निर्गुण स्वरूप तथा विशुद्ध ज्ञानके कारणरूप आपको नमस्कार है। निराकार, साकार एवं सनातन रूप आपको नमस्कार है। वेद, वेदान्त आदि शास्त्रोंके लिये भी वर्णनातीत आपको नमस्कार है, अव्यक्त-व्यक्तात्मा तथा सत्स्वरूप आपको नमस्कार है ॥ १० ॥ सत्त्वादि तीन गुणोंके बोधक एवं त्रिगुणातीत आपको नमस्कार है। प्रपंचको जाननेवाले तथा प्रपंचरहित आप शिवको नमस्कार है* ॥ ११ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे की गयी स्तुतिको सुनकर भगवान् महेश्वर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये और परशुरामको सम्बोधित करके बोले—'मैं तुम्हारे वचनरूपी अमृतसे संतृप्त हो गया हूँ। तुम अपने मनमें जो-जो भी कामना मुझसे रखते हो, उसके लिये मुझसे वर माँगो। हे द्विज ! मैं तुम्हें जानता हूँ, तुम महर्षि जमदग्नि और रेणुकाके पुत्र हो ॥ १२-१३ ॥ परशुराम बोले—हे प्रभो! कामधेनुको प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले दुष्ट कार्तवीर्यने क्रुद्ध होकर बिना अपराधके ही मेरे पिता जमदग्निको मार डाला, इतना ही नहीं; उसने सेनासहित [अपनेको] मेरे पिताके द्वारा भोजन प्राप्त कराये जानेपर भी इक्कीस बाणोंके द्वारा मेरी माता रेणुकाको चारों ओरसे बींध डाला ॥ १४-१५ ॥ माताने मुझे आज्ञा दी है कि उस दुष्ट राजाका वध कर डालो। मैं आपकी शरणमें आया हूँ, उसके वधका उपाय बतानेकी कृपा करें। ताकि उसी उपायके द्वारा मैं इस पृथिवीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे हीन बना सकूँ ॥ १६ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार परशुरामजीकी बातोंका रहस्य समझकर भगवान् महादेव उनसे बोले— ॥ १७ ॥ उन्होंने ध्यानपूर्वक देखकर सुखपूर्वक किया जानेवाला विजयका उपाय बताया और गणेशजीको प्रसन्न करनेवाले छः अक्षरोंवाले मन्त्रका उपदेश उन्हें दिया। साथ ही यह भी कहा कि इस षडक्षर मन्त्रका प्रयत्नपूर्वक एक लाखकी संख्यामें जप करो। उसके दशांश संख्यासे हवन करो ॥ १८-१९ ॥ हवनके दशांशसे तर्पण तथा उसके भी दशांश संख्यामें (सौ) ब्राह्मणोंको भोजन कराओ। ब्राह्मणोंकी सेवासे गणेशजी तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हो जायेंगे और देवदेव गजानन पृथ्वीपर तुम्हारे सभी कार्य पूर्ण कर देंगे। भगवान् शंकरके इन वचनोंको सुनकर उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके और उनकी आज्ञा प्राप्तकर वे परशुरामजी इस पृथिवीमें इधर-उधर घूमने लगे। उन्होंने कृष्णा नदीके उत्तरी क्षेत्रमें एक श्रेष्ठ स्थानको देखा ॥ २०-२२ ॥ वह अनेक प्रकारके वृक्षों एवं लतामण्डपोंसे सुशोभित हो रहा था और साधना करनेवालोंको उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला था। उन भगवान् शंकरके द्वारा जैसा कहा गया था, उसीके अनुसार परशुरामजीने वहाँ अनुष्ठान किया ॥ २३ ॥ उन्होंने अपनी दसों इन्द्रियों तथा मनकी वृत्तिको भगवान् गजाननमें स्थिर करके पैरके एक अँगूठेमें खड़ा रहकर उस (षडक्षर) महामन्त्रका (एक लाखकी संख्यामें) जप किया। उसके दशांश संख्यामें क्रमशः
- राम उवाच नमो देवदेवेश गौरीश शम्भो नमो विश्वकर्त्रे नमो विश्वभर्त्रे। नमो विश्वहर्त्रे नमो विश्वमूर्ते नमो विश्वधाम्ने नमश्चन्द्रधाम्ने ॥ नमो निर्गुणायामलग्यानहेतो निराकारसाकारनित्याय तेऽस्तु। नमो वेदवेदान्तशास्त्रातिगाय नमोऽव्यक्तव्यक्तात्मने सत्स्वरूप ॥ गुणत्रयप्रबोधाय गुणातीताय ते नमः। नमः प्रपञ्चविदुषे प्रपञ्चरहिताय ते ॥
उ०ख०-अ०८२ ] * परशुरामजीको माता रेणुकाद्वारा कार्तवीर्य-विजयका उपाय बतलाना * २४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
हवन, उसके दशांश संख्यामें तर्पण तथा उसके भी दशांश संख्यामें ब्राह्मणोंको भोजन कराया ॥ २४-२५ ॥ तब प्रसन्न होकर भगवान् गजानन प्रकट हो गये। वे चार भुजावाले थे, उनका शरीर विशाल था, वे महामायावी तथा अत्यन्त सुन्दर थे ॥ २६ ॥ उन्होंने नागका यज्ञोपवीत धारण किया था, विविध प्रकारके अलंकारोंसे वे विभूषित थे, उन्होंने मस्तकपर मुकुट तथा कानोंमें कुण्डल धारण कर रखे थे। उनका सुन्दर गण्डस्थल अत्यन्त देदीप्यमान और मुखमण्डल प्रकाशमान हो रहा था ॥ २७ ॥ मोती तथा मूँगेकी मालाओंसे उनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था। उनकी अत्यन्त विशाल भुजाएँ थीं। वे अपने चारों हाथोंमें परशु, कमल, दाँत तथा मोदकोंको धारण किये हुए थे ॥ २८ ॥ वे स्वामी भगवान् गणेश अपनी सूँड़में कमल पुष्पको धारणकर स्वेच्छापूर्वक सूँड़से घुमा रहे थे। वे अपनी आभासे सभी दिशाओं तथा विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। परशुरामजीने जब सहसा उन्हें देखा तो उनके तेजसे अभिभूत होकर अपनी दोनों आँखें बन्द कर लीं। तदुपरान्त उन द्विज परशुरामने गणेशजीकी स्तुति करनी प्रारम्भ की ॥ २९-३० ॥ परशुरामजी बोले—हजारों सूर्योंके समान आभावाले हे जगदीश्वर ! आपको नमस्कार है। हे सभी विद्याओंके स्वामी ! आप सभी प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ३१ ॥ विघ्नोंके स्वामी तथा विघ्नोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है, आप सभीका प्रिय करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। भक्तोंके प्रिय तथा ज्ञानस्वरूप भगवान् गणेशको नमस्कार है। विश्वकी संरचना करनेवाले और उसका पालन करनेवाले आपको नमस्कार है। मेरी तपस्याके विनाशक महाविघ्नका आप निवारण करें ॥ ३२-३३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारकी स्तुतिको सुन करके सौम्य तेजवाले भगवान् गणेशने अपने उत्कट तेजसे व्याकुल हुए उन परशुरामजीसे कहा— ॥ ३४१/२ ॥
गणेशजी बोले—हे राम! मेरे षडक्षर मन्त्रका जप करते हुए तुम रात-दिन जिसका ध्यान करते हो, वही मैं वर देनेके लिये इस समय प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम अपने मनमें जिस-जिस मनोरथकी इच्छा करते हो, मुझसे तुम वह वर माँग लो ॥ ३५-३६ ॥ मैं ही अनेक ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और पालन तथा संहार करनेवाला हूँ, सभी ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण और राजर्षि मेरे यथार्थ स्वरूपको नहीं जानते हैं, वही आज मैं तुम्हें दृष्टिगोचर हुआ हूँ ॥ ३७१/२ ॥ परशुराम बोले—जो अप्रमेय, सम्पूर्ण विश्वके आश्रय एवं सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। जो न तो वेदोंके द्वारा, न तपस्यासे, न यज्ञोंके द्वारा, न व्रतोंके अनुष्ठानसे, न दानसे और न योग-साधनाद्वारा लोगोंको दिखायी देते हैं, उन्ही आप विघ्नविनाशकका आज मुझे दर्शन हुआ है। हे देव ! अब मुझे दूसरे वरसे क्या प्रयोजन ! आप मुझे अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ ३८-४० ॥ गणेशजी बोले—हे द्विजश्रेष्ठ राम! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति होगी, मेरे द्वारा वरदानोंका प्रलोभन दिये जानेपर भी तुम्हारी बुद्धि किंचित् भी विचलित नहीं हुई। तुम मेरे इस परशुको ग्रहण करो, यह सभी शत्रुओंका विनाश करनेवाला है, आजसे तीनों लोकोंमें तुम्हारा 'परशुराम' यह नाम ख्यातिका प्राप्त करेगा ॥ ४१-४२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उन परशुरामको वर प्रदानकर तथा अपना परशु (खड्ग) देकर भगवान् गजानन लोगोंके देखते-देखते उसी समय अन्तर्धान हो गये ॥ ४३ ॥ तदनन्तर परशुरामजीने ब्राह्मणों तथा वेद-वेदांग और शास्त्रोंके जाननेवाले विद्वानोंके द्वारा अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् महागणपतिकी स्थापना, प्रतिष्ठा की। उन्होंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और विविध प्रकारके दान दिये। उन्होंने रत्नोंके खम्भोंसे समन्वित एक दृढ़ मन्दिर बनवाया। उन गजाननकी पूजा, परिक्रमा तथा प्रणाम करके वे परशुराम अत्यन्त प्रसन्न मन होकर अपने घरको गये ॥ ४४-४६ ॥
२४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तदनन्तर परशुरामजीने [कार्तवीर्यके समीप जाकर] काट डाला ॥ ४७ ॥ बड़े ही उच्च स्वरमें पृथ्वीपति कार्तवीर्यको ललकारा इक्कीस बार उन्होंने इस धरतीको क्षत्रियोंसे विहीन बना दिया और यज्ञमें दक्षिणासहित सम्पूर्ण पृथ्वीका ब्राह्मणोंको दान कर दिया ॥ ४८ ॥ तदनन्तर लोगोंने अन्य सभी देवोंसे बढ़ा-चढ़ा उनका दृढ़ पराक्रम देखकर उन परशुरामजीको भगवान् विष्णु समझकर उनकी पूजा की ॥ ४९ ॥ [ व्यासजी बोले-] हे ब्रह्मन् ! हे पुत्र ! इस प्रकारसे मैंने भगवान् गणेशकी विविध महिमा संक्षेपमें तुम्हें बतायी। हे मुनीश्वर ! उनकी सम्पूर्ण महिमाका वर्णन करनेमें सहस्र मुखवाले शेष भी समर्थ नहीं हैं। इस पृथ्वीपर जो इस [गणेशपुराणके]-के उपासनाखण्डका श्रवण करता है, वह अपने समस्त मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें गणेशजीके धामको प्राप्त करता है और वहाँ वह प्रलयपर्यन्त इच्छानुसार आनन्दित होता और युद्धमें उस राजा सहस्रबाहुकी हजार भुजाओंको है॥ ५०-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परशुरामवरदानप्राप्तिवर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥ तिरासीवाँ अध्याय तारकासुरका आख्यान, ब्रह्माजीसे वरप्राप्त तारकासुरका अत्याचार, देवोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवती उमाका प्रकट होकर तारकासुरके वधका उपाय बताना, देवताओंद्वारा कामदेवका आवाहन, कामदेवका शिवको विचलित करनेके लिये प्रस्थान मुनि बोले-हे लोकेश! परशुरामजीने किस गयी, अतः वे उस मयूरेश्वर नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुए। स्थानपर परम अद्भुत तप किया था, उसे मुझे बतानेकी वहाँ परशुरामजीने गणेशजीका अनुष्ठान किया था और कृपा करें। कथा सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही उनसे 'परशु' नामक अस्त्रको प्राप्त किया था॥ ४॥ है॥ १॥ तदनन्तर वे राम 'परशुराम' इस नामसे तीनों ब्रह्माजी बोले-चारों युगोंमें मयूरेश्वर नामसे जो लोकोंमें प्रसिद्ध हुए। हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं उस इतिहासको स्थान प्रसिद्ध है और जहाँ देवेश गणपति मयूरपर आरूढ़ बताता हूँ, आप श्रवण करें ॥ ५ ॥ होकर अवतीर्ण हुए थे, वहाँ उन्होंने कमलासुर नामक तारक नामका एक दैत्य हुआ, जो महान् बल एवं महान् दैत्यका वध किया था। चूँकि वे मयूरपर आरूढ़ पराक्रमसे सम्पन्न था। उसने हजार दिव्य वर्षोंतक होकर प्रकट हुए थे, इसलिये उनका मयूरेश्वर यह नाम अत्यन्त कठोर तपस्या की ॥ ६ ॥ प्रसिद्ध हुआ ॥ २-३ ॥ हे द्विज ! तब प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने उसे सभीसे लोकमें देवताओं तथा मुनियोंद्वारा उनकी स्तुति की अभयप्राप्तिका वरदान दिया और कहा - 'देवर्षि, यक्ष,
उ०ख०-अ०८३] * तारकासुरका आख्यान * २४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गन्धर्व, नाग तथा राक्षस आदि किसीके भी हाथों तथा उनके शस्त्रोंसे तुम्हारी किसी प्रकार भी कहीं भी मृत्यु नहीं होगी, जब कार्तिकेय प्रकट होंगे, तब तुम्हारा मरण होगा। 'हे मुने! ब्रह्माजीका ऐसा वचन सुनकर बल तथा गर्वमें भरा हुआ वह तारकासुर तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले लोगोंको अत्यन्त पीड़ित करने लगा ॥७-९॥ उसने वेदोंके स्वाध्यायमें परायण, तप तथा अनुष्ठान करनेवाले एवं अग्निहोत्र करनेवाले और स्वधर्माचरण करनेवाले अन्य ब्राह्मणोंको भी कारागारमें डाल दिया ॥ १० ॥ सभी राजाओं तथा नागोंको अपने अधीनकर वह स्वर्गमें चला गया। [उससे भयभीत] इन्द्र आदि सभी देवता हिमालयकी गुफाओंमें छिप गये ॥ ११॥ उसके भयसे कहीं भी यज्ञ तथा पूजा आदि कार्य नहीं होते थे। वह कहता था—'मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही देवता हूँ, मैं ही ब्राह्मण हूँ, मैं ही कुलदेवता हूँ। मैं ही नमस्कार करनेयोग्य हूँ, मेरी ही पूजा करनी चाहिये, मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा संसारमें (बड़ा) नहीं है। जो मेरे अलावा कहीं भी और किसी दूसरेको प्रणाम करेगा अथवा उसकी पूजा करेगा, वह मेरे द्वारा दण्डनीय और ताडनीय होगा अथवा वह यमलोक चला जायगा।' इस प्रकारकी आज्ञा उसने अपने दूतोंद्वारा लोकोंमें प्रसिद्ध करवायी ॥ १२-१४॥ तभीसे सब लोग धर्म-कर्मसे हीन तथा सज्जनोंसे रहित हो गये। वे शास्त्रोंके स्वाध्यायसे रहित, वषट्कार तथा यज्ञ एवं दानसे रहित हो गये ॥ १५॥ लोगोंके कुल-धर्म उच्छिन्न हो गये, वे अपने आचारसे हीन हो गये और दुष्ट बन गये। मुनिजन तथा सभी साधु वृत्तिवाले लोगोंने पर्वतोंकी गुफाओंमें शरण ले ली। वे सभी मुनिजन भगवान् शिवसे प्रार्थना करने लगे कि हे शम्भो! आपने इस दैत्यको इतना बढ़ावा क्यों दिया है, अब हम आपकी शरणको छोड़ और किस जगदीश्वरकी शरणमें जायँ ? ॥ १६-१७ ॥ हे विभो! आप ही जगत्की सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले हैं। वह दैत्य अभिमानमें चूर होकर हम लोगोंको उसी प्रकार जला रहा है, जैसे दावाग्नि वनको जला डालती है ॥ १८ ॥ यदि आपकी संहार करनेकी ही इच्छा है, तो स्वयं संसारका संहार कर डालें, यदि ऐसा नहीं है तो उस सर्वपीडाकारी तारकासुरका आज विनाश करें ॥ १९॥ इस प्रकारकी प्रार्थनाकर वे सभी मुनिगण दुष्कर श्रेष्ठ तप करने लगे। वे पत्तोंका भक्षण करके, वायुका सेवन करके, निराहार रहकर तथा केवल जल ही पीकर तपस्या करने लगे। इस प्रकार मुनिजन उससे अज्ञात स्थानमें छिपकर तपस्यामें निरत थे। इधर उस दैत्यराज तारकासुरने देवराज इन्द्रके ऐन्द्रपदको ग्रहण कर लिया और वह ब्रह्माजीको प्रताडित करने लगा ॥ २०-२१ ॥ हे मुने ! तदनन्तर विष्णु निद्रास्थित होनेके लिये क्षीरसागरमें चले गये। भगवान् शंकर भी कैलास पर्वतको छोड़कर किसी दूसरी गुफामें चले गये ॥ २२ ॥ दिशाओंके दिक्पालों तथा दिग्गजोंने भी विविध गुफाओंका आश्रय लिया। उन सभीके स्थानोंपर दैत्यराज तारकासुरने अपने दैत्योंको नियुक्त कर दिया ॥ २३ ॥ वह निश्चल होकर इस पृथ्वीपर प्रजाओंको शासित करने लगा। जब वह अपने स्वभाववश गर्जना करने लगता था, तब स्वर्गलोक भी काँप उठता था ॥ २४॥ तब इन्द्रादि देवता पर्वतकी गुफामें जाकर पार्वतीपति भगवान् शंकरकी प्रसन्नतापूर्वक गम्भीर वाणीमें स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥
२४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] देवता बोले— हे प्रभो! आप पृथ्वी, आकाश, वायु, तेज, जल, सूर्य, चन्द्र तथा यजमानरूपमें स्थित हैं। हे शंकर! आप ही अपनी इच्छासे इस चराचर जगत्की सृष्टि करते हैं, आप ही इसका पालन-पोषण करते हैं और आप ही इस सब कुछका संहार भी करते हैं॥ २६॥ हे प्रभो! आप तो दूसरेके दुःखका निवारण करनेवाले हैं, फिर आपके लिये आज अपनी कीर्तिको दूसरेके हाथोंमें सौंपना उचित नहीं है। अतः आप तारकासुरका विनाश करें अथवा अत्यन्त दुखित चित्तवाले और आपकी सेवामें संलग्न मनवाले सभी मुनियों तथा देवोंका विनाश करें॥ २७॥ हे गिरीश! आपको छोड़कर हम अन्य किसकी शरण ग्रहण करें? हे महेश्वर! हे भगवन्! हम किसका भजन करें? पापोंका नाश करनेवाले हे पार्वतीपति! किससे हम अपनी व्यथा कहें? हे अखिलेश्वर! आपको छोड़कर कौन हमारी रक्षा करनेमें समर्थ है?॥ २८॥ ब्रह्माजी बोले— जब वे इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी बीच उन्हें यह आकाशवाणी सुनायी दी— 'हे देवो! जब शंकरजीका पुत्र होगा, तभी इस तारकासुरका विनाश होगा, इसके लिये आप लोग प्रयत्न करें।' आकाशवाणी सुनकर सभी देवता अत्यन्त हर्षमें भर गये और इन्द्र आदि वे देवता कैलासपर भगवान् शंकरजीके स्थानपर गये। किंतु वहाँ उन्होंने भगवान् शंकरको नहीं देखा। वहाँ देवताओंने अपने समक्ष मूलप्रकृतिस्वरूपा भगवती उमाका दर्शन किया। सभी देवताओंने उनसे निवेदन किया कि हे तारके! आप तारक मन्त्र प्रणवका ज्ञान प्रदान करनेवाली हैं। आप तीनों लोकोंको पीड़ा पहुँचानेवाले दुष्ट तारकासुरद्वारा अपने स्थानसे च्युत कर दिये गये मुनियों तथा देवताओंकी रक्षा करें और हे मात:! जैसे उसका विनाश हो सके, उस उपायका आप चिन्तन करें॥ २९-३३॥ हे शर्वाणि! आप तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली हैं, आप देवमाताको हम प्रणाम करते हैं। हे त्रिपुरस्वरूपा! हे परात्परकलारूपा! आप ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा स्तुत होनेवाली हैं। आपका यथार्थ स्वरूप वेदोंद्वारा भी अज्ञेय है। हे शंकरप्रिये! आप जगत्का कल्याण करें। हे
[दायाँ स्तम्भ] अनघे! आप अपनी इच्छासे अपना सुन्दर स्वरूप धारण करनेवाली हैं, असुरोंका संहार करनेवाली हैं और इस विश्वकी आदिकारणभूता हैं॥ ३४॥ ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे प्रार्थित वे जगन्माता भगवती पार्वती उन देवताओंसे बोलीं— 'आकाशवाणीको मैंने जान लिया है, वे शंकर निश्चित ही कल्याण करेंगे। जहाँपर वे भगवान् शंकर स्थित हैं, मेरे साथ ही आप सभी वहाँ चलें। वे भगवान् शंकर उत्तम नियमोंका पालन करते हुए परम तप कर रहे हैं'॥ ३५-३६॥ सभी देवताओंसे इस प्रकार कहकर उन पार्वतींने भिल्लिका वेश धारण किया, जिससे कि उसे देखकर वे परम योगी शिव कामके बाणोंके वशीभूत हो जायँ। उनका वह रमणीय स्वरूप देखकर उस समय कुछ देवता भी कामविह्वल हो गये। उन सर्वांगसुन्दरीको देखकर उर्वशी, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति आदि अप्सराएँ तथा कामपत्नी रति भी लज्जित हो रही थीं। हे ब्रह्मन्! हे व्यासजी! तदनन्तर सभी देवता और वे गिरिपुत्री पार्वती उस समय भगवान् शिवके पास पहुँचे॥ ३७-३९॥ उन सभी देवताओंने स्थाणुभूत उन स्थाणु शिवका दर्शन किया। उनके नेत्र ध्यानावस्थामें निश्चल थे। वे मनसे परब्रह्मका ध्यान और जप कर रहे थे, वे सभी प्रकारके संग्रहोंसे रहित थे, भिल्लीका वेश धारण की हुई उन पार्वतींने भी उन त्रिलोचन शिवका दर्शन किया। तदनन्तर देवी उमाने सभी देवताओंसे सुखपूर्वक किया जानेवाला उपाय बताया॥ ४०-४१॥ [और कहा— हे देवो!] ये सदाशिव देहके भानसे रहित होकर तपस्यामें एकनिष्ठ होकर बैठे हैं, अतः इनको देहका भान करानेके लिये आपलोग कामदेवसे प्रार्थना करें। ये एकनिष्ठ सदाशिव जब उस कामके बाणसे विद्ध होंगे, तो इनका देहभाव जाग्रत् हो जायगा और तब तुम्हारा कार्य हो जायगा॥ ४२-४३॥ तदनन्तर सभी देवताओंने उत्कट कामदेवका स्मरण किया। उस कामदेवके उपस्थित हो जानेपर अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये निश्चययुक्त बुद्धिवाले देवताओंने उसे अपना प्रयोजन बतलाया। दूसरे देवताओंने अपना कार्य सम्पन्न करनेके लिये कामदेवकी प्रार्थना करते हुए कहा— ॥ ४४१/२ ॥
उ०ख०-अ०८४ ] * कामदेवद्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकरको विचलित करना * २४७ आप इस चराचर जगत्के सभी प्राणियोंमें व्याप्त हैं। आपसे ही यह सृष्टि उत्पन्न होती है और यह सारा जगत् आपसे व्याप्त है, सभी पुरुष तथा स्त्रियाँ आपके द्वारा ही बलवान् बना दिये जाते हैं। आपके बिना यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक जगत् निःसार है। अतः आपको हम सभीका महान् कार्य अवश्य करना चाहिये ॥ ४५-४७ ॥ कामदेव बोला—मैं यद्यपि [इन महायोगीको विह्वल करके मानो] अग्निमें ही प्रवेश करने जा रहा हूँ, तथापि आपके अनुग्रहसे मैं देहके विनष्ट होनेतक आपलोगोंका कार्य अवश्य करूँगा ॥ ४८ ॥ हे देवो! यद्यपि पुष्प ही मेरा धनुष है, भ्रमर ही धनुषकी प्रत्यंचा है, स्त्रियोंका कटाक्ष ही बाण है और वसन्तऋतु ही मेरा सहयोगी है, तथापि मैं भगवान् शंकरसहित सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर लूँगा ॥ ४९१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेके प्रयोजनसे तथा भगवान् शंकरको कामके वशीभूत करनेके लिये वह कामदेव वहाँ गया, जहाँ भगवान् शंकर स्थित थे ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तारकासुरोत्पत्तिकथन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८३ ॥ चौरासीवाँ अध्याय कामदेवद्वारा समाधिस्थ भगवान् शंकरको विचलित करना, उनकी नेत्राग्निसे कामका दग्ध होना, पार्वतीद्वारा शंकरकी स्तुति तथा शिव-पार्वतीका कैलासगमन ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर कामदेव देवताओंके कार्यको सफल बनानेके लिये निकल पड़े और उन्होंने भगवान् शंकरका वह स्थान देखा, जो अनेक प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे सुशोभित था, सिंहों तथा शार्दूलोंसे सेवित था और पक्षियों तथा हिंसक पशुओंसे समन्वित था। तब कामदेवने उसी समय क्षणभरमें वहाँ एक मायामय उपवनकी संरचना की ॥ १-२ ॥ उस उपवनमें अनेक सरोवर थे, जो अमृतोपम जलसे परिपूर्ण थे। वहाँ अनेक वृक्ष तथा पुष्प थे, जिनकी सुगन्ध दो कोसतक व्याप्त थी। वहाँ भली-भाँति पके हुए जामुन, आम तथा बेरके फलवाले वृक्ष थे। उसी प्रकार उस उपवनमें केला, कटहल, नारियल, खर्जूर, इलायची, लौंग तथा मिरचके अनेकों प्रकारके वृक्ष थे। भगवान् शिवके द्वारा [इससे पूर्व] ग्रहण न की जानेवाली वह पुष्पोंकी सुगन्ध (कामदेवके प्रभावसे) उनके नासापुटोंमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ३-५ ॥ उषाकाल होनेपर भगवान् शिवने कामदेवके द्वारा मायासे निर्मित उस अद्भुत उपवनको देखा, जो चन्द्रमाकी चाँदनीसे अत्यन्त मनोहर प्रतीत हो रहा था और अनेक फलों तथा पुष्पोंसे समन्वित था ॥ ६ ॥ उसी समय कामदेवने त्रिशूली भगवान् शंकरके मनको अपने कामबाणोंसे विद्ध कर डाला। [कामदेवद्वारा मायासे निर्मित उस वाटिकाको देखकर] भगवान् शिवने मन-ही-मन अपनी अशोकवाटिकाको धिक्कारा ॥ ७ ॥ उसी समय भगवान् शिवका देहभाव जाग्रत् हो गया, तब वे इसका कारण सोचने लगे कि किसने मेरी तपस्यामें विघ्न उपस्थित किया और इस सुन्दर उपवनकी रचना किसने की? क्रोधसे शिवके नेत्र लाल हो उठे,
२४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- उनकी भौंहें तन गयीं और वे बोले- 'मृत्युके समीप | शास्त्रोंका स्वाध्याय होता है और न यज्ञादिकी आहुतियाँ पहुँचे हुए किस दुष्टने अकस्मात् इस उपवनकी रचना | ही पड़ती हैं। सभी देवता अपने-अपने स्थानोंसे च्युत हो कर डाली है।' कामदेव भयसे संत्रस्त होकर छिप गया, | गये हैं। हे अनघ ! उन सभी देवताओंने आपको तपस्यामें किसीके लिये दृश्य नहीं हुआ। उसने उस समय इन्द्रादि | लीन देखकर आपको देहभावकी प्राप्ति करानेके लिये देवताओंका स्मरण किया, किंतु स्मरण किये जानेपर भी | शीघ्र ही कामदेवको बुलाकर आपके पास भेजा, किंतु वे देवता वहाँ नहीं आये ॥ ८-१० ॥ | वह आप श्रेष्ठ व्यक्तिके प्रति किये गये अपराधके कारण सभी देवता कार्यकी सफलताको देखनेके लिये अपने- | भस्म हो गया है ॥ १५-१७ ॥ अपने विमानोंमें आरूढ़ हो गये थे। उसी समय भगवान् | हे देव! इस समय आप हमारी रक्षा करें। हम सब शिवने कामदेवको देखा, जो अत्यन्त लघु एवं कृश | आपकी शरणमें आये हैं। आप शरणमें आये हुएकी रक्षा शरीरवाला हो गया था। तब उन्होंने कामदेवको भस्म करनेके | करनेवाले हैं-इस रूपमें आप तीनों लोकोंमें विख्यात लिये अपने तीसरे नेत्रको खोला। उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी, | हैं। हे महादेव ! हे करुणाकर ! हे शंकर ! आपकी शरण स्वर्ग तथा पाताल भी कम्पित हो उठा ॥ ११-१२॥ | ग्रहण करनेकी इच्छा रखनेवाले दीन देवताओंके अपराधको 'इस कामदेवको मत मारिये' - ऐसा जबतक देवता | आप क्षमा करें ॥ १८-१९॥ कह ही रहे थे कि उनके नेत्रसे उत्पन्न अग्निने उसी बीच | ब्रह्माजी बोले- हे मुने ! अपने चरणोंमें सिर रखी कामदेवको भस्म कर डाला। अब वह केवल भस्ममात्र | हुई उन भिल्लीरूपा पार्वतीके इस प्रकारके वचनोंको ही शेष रह गया था। तदनन्तर तीनों लोकोंके कल्याणकी | सुनकर भगवान् शंकरने अपनी नेत्राग्निको शान्त कर कामनासे भिल्लीरूप धारण की हुई देवी पार्वतीने दोनों | लिया और प्रसन्नमुख होकर वे कहने लगे-उठो-उठो, हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और बड़े ही | आज तुमने मेरे चरणोंमें गिरकर अपने वचनोंके द्वारा तथा आदरपूर्वक उनसे प्रार्थना की ॥ १३-१४॥ | अपने स्नेहके द्वारा देवताओंकी रक्षा की है ॥ २०-२१ ॥ हे शंकर ! तीनों लोकोंको जला देनेवाली इस | तदनन्तर उन भिल्लीरूपा पार्वतीका सहसा अग्निको आप शान्त करें। ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्तकर | आलिंगनकर भगवान् शंकरने उन्हें अपनी गोदमें ले लिया दैत्य तारक अत्यन्त बलशाली हो गया है। उसने तीनों | और वे उन्हें लेकर अपने वृषभमें आरूढ़ होकर लोकोंको आक्रान्त कर डाला है। अब न तो कहीं वेदादि | कैलासकी ओर चले गये ॥ २२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कामदहन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥
पचासीवाँ अध्याय भगवान् शिव-पार्वतीका क्रीडा-विहार, देवताओंकी प्रार्थनापर अग्निदेवका भिक्षुकरूपमें उनके समीप जाकर भिक्षाकी याचना करना, माता पार्वतीका भिक्षाके रूपमें उन्हें शिवतेज प्रदान करना, अग्निदेवद्वारा उस तेजको गंगामें प्रवाहित करना, छः कृत्तिकाओंद्वारा शिवतेजका धारण और षण्मुखका प्रादुर्भाव
ब्रह्माजी बोले- भगवान् शिवके आलिंगनके | मध्यमें गयीं, किंतु वहाँ भी उन्हें शान्ति नहीं मिली। प्रभावसे भिल्लीरूपा वे पार्वती कामाग्निसे उद्दीप्त हो | स्थलपर भी उन्हें निद्रा नहीं आती थी ॥ १-२ ॥ उठीं और जैसे मछली जलरहित स्थानमें छटपटाती है, | कपूर तथा चन्दन (-जैसे शीतल पदार्थ) भी उन्हें वैसे ही उन्हें भी कहीं भी सुखकी प्राप्ति नहीं हो रही | अधिक ताप प्रदान कर रहे थे। कोई भी शीतल पदार्थ थी। अपने शरीरमें शीतल उशीरका लेप करके वे जलके | उन्हें सन्तोष नहीं प्रदान कर पा रहा था ॥ ३ ॥
उ०ख०-अ०८५ ] * भगवान् शिव-पार्वतीका क्रीडा-विहार * २४९ इसी प्रकार बहुत समय बीत जानेपर वे अस्थि और चर्ममात्र शरीरवाली हो गयी थीं। तदनन्तर भगवान् शंकरके पास जाकर गिरिजाने यह वचन कहा- ॥४॥ हे देव! आप मेरे विषयमें कुछ भी नहीं सोच रहे हैं कि मैं किस अवस्थाको प्राप्त हो गयी हूँ। अहो! बड़े आश्चर्यकी बात है कि दग्ध हुआ भी वह कामदेव मुझे अत्यन्त पीड़ा पहुँचा रहा है ॥ ५ ॥ मैंने उसे शान्त करनेके नानाविध उपाय किये, किंतु वह शान्त नहीं हुआ। हे मेरे स्वामिन् ! जिस उपायके द्वारा शान्ति प्राप्त हो, आप वह उपाय करें ॥ ६॥ अपनी प्रियाका हित करनेवाले भगवान् शंकरने इस प्रकारके वचनोंको सुनकर एकान्त स्थानमें उनका हाथ पकड़कर उन्हें शय्यापर बैठाया। कामदेवके द्वारा वशीभूत किये गये शंकरने उनके साथ यथेष्ट रमण किया। कामदेवने मृत्युको प्राप्त करके भी देवताओंके द्वारा कहे गये महान् कार्यको सम्पादित कर दिया ॥ ७-८॥ [ऐसा करके उसने] 'कामदेव अतुलनीय धनुर्धर है' इस प्रसिद्धिको पा लिया। क्रीडाविलासमें निमग्न उन उमा-महेश्वरके साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ९ ॥ अपने-अपने स्थानोंसे च्युत हुए देवता तथा मुनिगण कामदेवके ऐसे प्रयत्नको सुनकर पुनः कैलासपर्वतपर आये और वहाँ भगवान् शिवको क्रीडामें निमग्न जानकर वे चिन्ताके कारण व्याकुल चित्तवाले हो गये एवं मौन होकर वहाँ स्थित हो गये। तारकासुरसे भयभीत होकर वे पुनः गुफामें चले गये ॥ १०-११ ॥ इस तारकासुरका वध कब होगा, कब हम अपने स्थानोंमें जायँगे और कब भगवान् शंकर हमारे दुःखका विनाश करेंगे- इसी चिन्तासागरमें जब वे ब्रह्मा आदि देवता निमग्न थे, उसी समय देवगुरु बृहस्पतिजी उनसे बोले- 'हे अनघो! आप लोग मेरे वचनको सुनें ॥ १२-१३ ॥ आप लोग अग्निदेवको अन्य रूप धारण कराकर शिवके पास भेजें, वे शीघ्र ही शंकरको प्रबोधित करेंगे, इससे आपका कार्य बन जायगा। तब देवताओंने अग्निदेवको बुलाया और विविध प्रकारकी स्तुतियोंसे उनका स्तवन किया ॥ १४१/२ ॥ देवता बोले- हे ब्रह्मन् ! आपसे ही समस्त यज्ञक्रियाएँ और सभी संस्कार सम्पन्न होते हैं। आप ही जलके कारणभूत हैं, आप देवताओंके मुख हैं, आप गार्हपत्य आदि नामोंसे अग्निहोत्रके प्रणेता हैं। हे ईश! आप ही नित्यप्रति [बड़वानलरूपसे] समुद्रकी महान् जलराशिका पान किया करते हैं। आप ही मनुष्योंके जठरदेशमें जठराग्नि नामसे षड्रसोंका पाचन करते हैं॥ १५-१७॥ आप ही सभी जीवोंकी हड्डियोंके प्रत्येक जोड़ोंमें स्थित होकर उन्हें संचालित करते हैं, आपसे रहित होनेपर जीव 'प्रेत' इस संज्ञाको प्राप्त करता है और आपके द्वारा ही मृत शरीरका दाह किया जाता है ॥ १८ ॥ हे देवेश ! प्रत्येक प्राणियोंके प्राण धारण करनेमें आप ही हेतुभूत हैं। आप अग्निके बिना तथा जलके बिना कहीं भी अन्नको पकाया नहीं जा सकता ॥ १९ ॥ आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही रुद्र हैं और आप ही अनेक रूप धारण करनेवाले सूर्यदेवके रूपमें उत्पन्न होते हैं। हे जगदीश्वर ! आप ही क्रोधके मूलकारण हैं ॥ २० ॥ जहाँ-जहाँ भी तेज दिखलायी पड़ता है, वह सब आपका ही रूप है। अतः तीनों लोकोंका उपकार करनेवाले हे अग्निदेव ! आपसे आज हम देवता प्रार्थना करते हैं* ॥ २१ ॥ हे विभो ! उस तारकासुरने अपने आक्रमणद्वारा
- देवा ऊचुः त्वत्तो यज्ञक्रिया ब्रह्मन् संस्काः सर्व एव हि॥ अपां त्वमसि हेतुश्च देवानां मुखमेव च। अग्निहोत्रप्रणेता त्वं गार्हपत्यादिनामभिः ॥ त्वमेव पिबसीशाब्धिवारि नित्यं महत्तरम्। त्वमेव पचसे नृणां जठरे षड्रसानपि ॥ त्वमेव सर्वजन्तूनां सन्धी सन्धी विचेष्टसे । त्वया त्यक्तं प्रेतसंज्ञां लभते दह्यते त्वया ॥ हेतुस्त्वमसि देवेश जन्तूनां प्राणधारणे । त्वयाद्भिश्च विना चान्नं पक्तुं शक्यं न च क्वचित् ॥ त्वमेव ब्रह्मा रुद्रश्च सूर्यश्चानेकरूपधृक् । त्वमेव जायसे मूलं क्रोधस्य जगदीश्वर ॥ यत्र यत्र भवेत्तेजस्तत्तद्रूपं तवैव च । अतस्त्वां प्रार्थयामोऽद्य त्रिलोक्या उपकारक ॥
२५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया है। आप उस | लिये वहाँपर आयीं ॥ ३११/२ ॥ आकाशवाणीको जानते ही हैं और कामदेवकी जो दुर्गति | तदनन्तर अग्निने यह समझकर गंगाजीके शीतल हुई है, वह भी आपको ज्ञात है ॥ २२ ॥ | जलमें उस तेजको डाल दिया कि ये गंगाजी यदि चिरकालसे क्रीडामें निमग्न भगवान् शंकर और | भगवान् शिवकी प्रिया होकर जलरूपमें स्थित हैं, तो ये पार्वतीको आप उद्बुद्ध करें। आप अपना दूसरा रूप | निश्चित ही इस वीर्यरूप तेजको धारण करनेमें समर्थ धारणकर वहाँ जाकर भिक्षाकी याचना करें। ऐसा | होंगी ॥ ३२१/२ ॥ करनेसे सम्पूर्ण जगत्का तथा हमारा भी कल्याण | तदनन्तर स्नानके लिये आयी हुई उन छः स्त्रियोंने होगा ॥ २३१/२ ॥ | उस शिववीर्यके छः भागकर पृथक्-पृथक् उसे ग्रहण ब्रह्माजी बोले-देवताओंका ऐसा वचन सुनकर | कर लिया। वे अग्निदेव उसी क्षण अन्तर्धान हो गये और वे अग्निदेव काषाय वस्त्र धारण करके ब्राह्मणका रूप | दूर पहुँच जानेपर उनके शरीरका शूल भी दूर हो बनाकर उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् शंकर एवं | गया ॥ ३३-३४ ॥ पार्वती क्रीडामें निमग्न थे। उन्होंने बाहर ही स्थित होकर | स्नानके अनन्तर वे स्त्रियाँ वस्त्र धारणकर अपने- 'भिक्षा दीजिये'-इस प्रकारसे तीन बार बड़े ही ऊँचे | अपने घर चली गयीं। उनके पतियोंने देखा कि उनकी स्वरमें कहा। उन दोनोंने वह ध्वनि सुन ली। तदनन्तर | पत्नियोंका मुखमण्डल अत्यन्त प्रकाशमान हो रहा है। उन अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर वे दोनों आपसमें कहने | मुनीश्वरोंने ज्ञानदृष्टिसे यह जान लिया कि ये गर्भावस्थाको लगे कि वस्त्र धारण कर लो। यह कौन है, जो यहाँ | प्राप्त हो गयी हैं। उन्होंने उन्हें गृहसे बाहर कर दिया और आ गया है, भिक्षामें इसे कौन-सी वस्तु दी जाय-इस | अपना मुख न दिखलानेको कहा ॥ ३५-३६ ॥ प्रकार वे विचार करने लगे ॥ २४-२७॥ | तब वे पुनः एकत्र होकर सरकण्डोंसे सुशोभित भगवान् शंकरके तेजको धारण करनेमें असमर्थ | गंगाजीके तटपर पहुँचीं और उन्होंने अपने-अपने गर्भको देवी उमाने उस तेजको अपनी अंजलिमें धारण किया | उन सरकण्डोंमें त्याग दिया। तदनन्तर स्नान करके पवित्र और भवितव्यताको भलीभाँति समझते हुए उन्होंने वह | होकर वे अपने घरोंको गयीं ॥ ३७ ॥ तेज उन भिक्षुक अग्निदेवको समर्पित कर दिया ॥ २८ ॥ | अपने-अपने गर्भका परित्यागकर जब वे छहों अग्निदेवने विचार किया कि इस तेजको यदि मैं | स्त्रियाँ वापस चली गयीं, तो छः मुखों तथा बारह भूमिपर गिरा देता हूँ, तो यह चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण | हाथोंवाला एक बालक वहाँ प्रादुर्भूत हो गया ॥ ३८ ॥ त्रिलोकीको दग्ध कर डालेगा, अतः उन्होंने भगवान् | उसके हुंकारमात्रसे ग्रह-नक्षत्र एवं तारे आकाशसे शंकरके उस तेजको उन दोनोंके शापसे भयभीत होकर | पृथ्वीपर गिरने लगे। सम्पूर्ण धरती, शेषनाग तथा स्वयं पी लिया। इसके फलस्वरूप वे अग्निदेव गर्भवान् | पाताललोक काँप उठा। वृक्ष उखड़ने लगे, सूर्य बादलोंसे हो गये, उन्हें अत्यन्त लज्जा तथा संताप हो उठा। वे | आच्छादित हो गये। इसी समय दिव्य दृष्टिवाले देवर्षि अग्नि जहाँ-जहाँ भी जाते, कहीं भी उन्हें शान्ति प्राप्त | नारद वहाँ आ उपस्थित हुए ॥ ३९-४० ॥ नहीं हुई ॥ २९-३० ॥ | नारदजी भगवान् शंकरका दर्शन करने जा रहे थे, तुला राशिमें भगवान् सूर्यके संक्रमण करनेपर एक | मार्गमें उन्होंने उस बालकको देखा। वह बालक अत्यन्त दिन उषाकालमें ही उठकर वे अग्निदेव गंगामें स्नान | दीप्तिमान्, महान् बलशाली तथा अपने तेजके कारण करनेके लिये गये। स्नानसे पूर्व वे जबतक शौच आदि | दुर्दर्शनीय था ॥ ४१ ॥ क्रियाओंसे निवृत्त हुए, उसी बीच छः स्त्रियाँ भी | ध्यान लगाकर उस बालकके विषयमें सब कुछ श्रद्धाभक्तिके साथ कार्तिकमासमें गंगाजीमें स्नान करनेके | जानकर वे नारद मौन होकर कैलासपर्वतपर चले आये