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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

भूत पूजे जहाँ न गुरु पूजा । हक हैं पूजे जहाँ न गुरु पूजा ॥
चारों आँखोंसे अँधसो सरे । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें हैं कुछ न अकल और न तमीज । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें भक्ति गरीबीकी कहाँ बू । कुत्र सूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
सो तो हैवान सर बसर आजिजाकाम अरुझे जहाँ न गुरु पूजा ॥

देख दुनियामें यार आग लगा । मैं जाना कि मेरा भाग लगा ॥
जलते ब्रह्मा विष्णु व शिव शंकर । सारे सिद्ध साधु नाग लगा ॥
लाख चौराशी छूट पिचकारी । तीन और पाँच खेल फाग लगा ॥
होवे मक्खन बने दही मही कैसे । जबतलक गुरु न अपनी जाग लगा ॥
रोना वाजिव है और नालःआह । अहमक आदम जो रंग राग लगा ॥
कौन पावे उसे किधर आजिज । जो न दिलजानसे अपने लाग लगा ॥

बैल पर पोथियाँ लदी देखा । राहमें उसके एक नदी देखा ॥
बोझसे मरता है वह बिचारा । सर बसर मगज् पुर खुदी देखा ॥
खा खली भूस समझ न सोच उसमें । चाल इनसानसे जुदी देखा ॥
दे डुबा बहरमें किताबोंको । करता रुह अपनेसे बदी देखा ॥
बैलसे खेत चर लिया आजिज । साधु संगतिमें सरमदी देखा ॥

आगया जब ज़मानः तारीकी । खोलदी जब धाना तारीकी ॥
हर बशर खाली रोशनीके चिराग । भर गई सारे खानःतारीकी ॥
देखहर सिम्त है न नूर कहीं । कर दिया सद महानःतारीकी ॥
फँस गये कार दुनियबी आदम । रोक रह जाहिदानः तारीकी ॥
उन्सकी तू वेगानः से आजिज । परदःमें करेगा न तारीकी ॥

जिसे मैं चाह बे नामो निशों है । कि मेरा माँह बे नामो निशों है ॥
किधर जाऊँ किधर दूँ द कहाँ है । यहाँकी राह बे नामो निशों है ॥
हैं कुलफानी जोहैं दरअकल और बहम् । वह क्रिबलें गाह बे नामो निशों है ॥
बहर जानिब गुलामों हुकमरों है । वह शाहनशाह बे नामो निशों है ॥
तअम दुनियामें सारे लगरहे हैं । वह बेपरवाह बे नामो निशों है ॥
हैं सवदरबन्द जो नाम और नामी । मेरा अल्लाह बे नामो निशों है ॥
हुआ आजिज अब आजिज यह किधर लाये ।

मेरा दिल ख्वाह बे नामो निशों है ॥

मुरब्बा ।

कहने सुननेमें जो कुछ आया है । वेद और कुत्ब खाने जो बतलाया है ॥
सिद्ध साधु पैगम्बरों जो गाया है । दुनियाका गुरु व पीर खुदा माया है ॥
ज्ञान ध्यान इलहाम वही और सलाम । मुतकलिम मुखातिब शब्द कलाम ॥
सामान हैं दुनियामें जितने नामी नाम । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
अकल और ख्याल ब्रह्मसे जो है पार । हरगिज़ न महसूस न सोदर गुफ्तार ॥
क्या जाने खबर वेखवरों शब्द सार । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥
दुनियाकी जो कुछ चाहसो दुनिया की कहिये । जानदार दुनि दरिया २ में हैं ॥
दरियाय जाँदार सगर धार है । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
आकिलाँ हलके अकल पेच कहा रह हैं कहाँ । जो बाहर अकल उसका माहिर है ॥
अकलके पार जो आजिज़ कहो सो जाहिर है कहाँ । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥

मुरब्बा फकीहोंपर ।

फखर दौलत दुनी देहों पर । चश्म बर खुद न किज्वजेहोंपर ॥
नजर ख्वाब व खुर मलीहोंपर । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
पढ़ गये वेद न भागवत गीता । कुत्ब ख्वानीमें उमरों बीता ॥
नफ्त अम्मारःने इन्हें जीता । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
बाअज और पन्द बात बकते हैं । माल बीयोंकी तरह तकते हैं ॥
गली कूचा न फिरते थकते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जिसनेकी आदमीका दिलकाला । जोहद व तकवाको दूरकर डाला ॥
टुक दम भी न याद हकतआला । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
रात दिन कारमें जो मरते हैं । हज्जो फुकरा खुशीसे करते हैं ॥
बैल हैं घास पर चरते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
गुज़रा दिन कारबारमें सारा । रात आई हुआ जो अँधियारा ॥
बादः गुलरु हैं महफिल आरा । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
शरआकी टट्टी जो धरते हैं । कुत्ब ख्वानीमें दिन गुजरते हैं ॥
टट्टी घोखे शिकार करते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
आप भटकते हैं औरको भटका । आबिन आदम अदमकी रह अटका ॥
होश न, पाँव गारमें लटका । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जानते लोग यह तो आलिम है । दर हकीकत सोरूस जालिम है ॥
सदहा गुमराह करते फिरते हैं । रोजोशव फिक्क मआश मरते है ॥
हकके खौफसे न डरते हैं । हाय अफसोस इस फकीहोंपर ॥

खुद फफीहत नजीहत औरोंको । बेल रह बर हुआ सतूरों को ॥
क्या तू आजिज सिखावे बूरोंको । हाय अ सोस इन कीहोंपर ॥
तरजीआ बन्द ।

जबाँ मेरी तु जबतक है दिहनमें । न हो गाफिल मदह मुशिदे कोहनमें ॥
गुरुका शुक्र और अहसान कर याद । रह उसबरमां बरी खिदमत चहनमें ॥
कभी अहसान शुक्र उसका तू मत भूल । कि, पहुँचे तू अमरपुरके सिहनमें ॥
गुरु सा और तेरा है न मददगार । बचाया शोर दरियाके बहनमें ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दोआसे ॥
खुदाने खुदाको दर परदः छिपाया । गुरुने खोलकर उसको दिखाया ॥
खुदाने कर दिया आलम अँधेरा । गुरुने इल्मका सूरज उगाया ॥
खुदाने हर तरफ झगड़ा पसारा । गुरुमे सुलहकुलकी रह बताया ॥
खुदाने आग आलममें भड़काई । गुरु बारा न रहमतकालें आया ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥
गुरु खिदमतसे ईमानकी करारी । उसीकी मिहर करमां फ़ज़ल बारी ॥
समझ और सोच किसने उतारा । गुनहका बोझ तेरे सिरसे आरी ॥
गुरु गोविन्दसे बढ़कर है साहेब । गुरु बिन कुल जहाँमें ग्रियः जारी ॥
अँधेरे जंगलिस्तानमें पड़ा था । बचाया होगया जब आजिज आरी ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । बकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥

शज़ल ।

दुनियवी गंदगी भरा निगुरा । प्यास और भूखसे मरा निगुरा ॥
रह न पावे जरूर हो गुमराह । कालुके फन्दमें पड़ा निगुरा ॥
जहाँ जावे उसे वहाँ ठोकर । खोरिश जमराजका खर निगुरा ॥
पशु पंछीसे ख्वार बत्तर है । सूरत इनसान गरधरा निगुरा ॥
पानी पीना रवा न हाथ उसके । जोनि चौरासीमें फिरा निगुरा ॥
बन्दगीकर न होवेसो मक्बूल । आग दोज़खमें जा गिरा निगुरा ॥
सीख सदहा ज़बान फनून उलूम । होवे हासिल न मुद्दोआ निगुरा ॥
है पशु गर बसूरत आदम । न दुम सींग चारपा निगुरा ॥
होता हैवान तो यह भला होता । सूरत आदम तू क्यों हो निगुरा ॥
हैं भले तुझसे अरजके हशरात । तू किधर जायगा बता निगुरा ॥
जंगल जग अँधेरेमें तू पड़ा । कौन मशअल तुझे दिखा निगुरा ॥
फड़ा खावे दरिन्दः जाओ जिधर । कौन तुझ दस्तगीरी आ निगुरा ॥

सच्चे हिन्दू और मुसलमान

होता हैवान कौन लेता हिसाब । हुआ नरलेख अब चुका निगुरा ॥
खावे ठोकरं इधर उधर फिरते । नहीं कोई तुझे जता निगुरा ॥
हुआ बेहोश होश कुछ न तुझे । कोई हरगिज नहीं जता निगुरा ॥
कुचः दिलदारकी दिखावे कौन । यार अपनेसे रह चला निगुरा ॥
बेटा ब्रह्मा जो आलिम आमिल था । नाद नापाक होगया निगुरा ॥
ऐसा ज्ञानी ऋषी जो था शुक्रदेव । फेर वैकुण्ठसे दिया निगुरा ॥
बारहा यह पुकार सत् कबीर । नहीं ठिकाना नहीं ठौर जा निगुरा ॥
कँजरीके हैं यार गार घने । सत् पर हरगिज नहीं चढ़ा निगुरा ॥
बाप है कौन पूत वैस्याका । पकड़ेबह किसका कहपला निगुरा ॥
जिसका न पीर वह दस्तगीर आजिज । पावे क्या ठौर और थरा निगुरा ॥
साखी - निगुरा ब्राह्मण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार ।
देवतनसे कुत्ता भला, जो नित उठ भुँके द्वार ॥

तरजीअ बन्द ।

क्या फसीह व बलीग जिनकी जबों । चलती तेजी तब आब वस्फ सुबहाँ ॥
मन मती खुद पसन्द व खुदबी । कुत्ब और फिका वेद बानी ख्यों ॥
गली कचःमें करते हैं बाज और पन्द । आप अन्धा है मुदई उरफों ॥
बे खबर खुद खबर सुनाते हैं । करते गुमराह सादए लोहों ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःके तौरपर कर गौर ॥
हुये केती जबोंसे माहिर । इल्म दुनियामें होगया जाहिर ॥
मैं हूँ ज्ञानी व दानया दौरों । नुत्क कर गैर गर्द दिल साहिर ॥
महरबा हर चहार सूसे हो । दिल दिमाग आपसे हुआ बाहिर ॥
होश जब यह गुरूमें भूला । फौज सरपर है मौतकी काहिर ॥
आप निगुरा बनावें गुरुमुख और । इस जमानेकी तौर पर कर गौर ॥
कहते क्या खूब है हमारी राय । हमने पहचाना अकलसे ो खुदाय ॥
मेरे वहम व ख्यालको शाबास । जान अकल व गुमानसे अस्ल जाय ॥
मैं हूँ दानाये सबकते सबपर । जिसने असली बसूलका घर पाय ॥
इन ख्यालोंसे दिलपर जो आजिज । रास्ती राह सो न हर्गिज आये ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःकी तौरपर कर गौर ॥

मुसद्दस ।

निरञ्जन दिल हिर्से हैवोंसे पूरा । है जिससे खल्लकका यह सब जहूरा ॥
हुआ इल्मों अमल उसका जो दौरा । चलाया उसको दूर अज्जक़िबलेगाही ॥

हिन्दू मुसलमान ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना

जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
ऋषेश्वर तारकुदुनुनिया दिगम्बर । हुये जो बे अदद पीरो पैगम्बर ॥
खुदा आगे जलाया ऊद व अम्बर । दिया बुतलान पर जिसने गवाही ॥
हुये सदहा जो दुनियामें सलातीं । पड़े दर कैंद शहवत शयातों ॥
हजारों सानअ और मसनूआ जहाँमें । रहे खाली जो अपने दिलहलाही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हजारों कैंसरो दारा सिकन्दर । किया क़बजः जमीं दरियावबन्दर ॥
किते सिद्ध साधु और सूफी क़लन्दर । गई उनकी न अन्दरकी स्याही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
जो मूठी बांधकर दुनियामें आवे । क़रारो कौल अपना सब भुलावे ॥
पसारे हाथ खाली फेर जावे । गदा और शाहपर आवे तबाही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राहो । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हिर्स हैवाँ जब आदमको बरा । तो दिन दोपहरको देखे वह अंधेरा ॥
कहे आजिज यह तेरा है वह मेरा । बिछाया दामसब जा मिहर व माही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥

ग़ज़ल ।

बानबाने अजब लगाया बाग़ । किस्म सदहा परिन्दः बुलबुलोजान ॥
केतरेँग ढ़ंगके भरे जानदार । पर न देखा कभी कोई बेदाग़ ॥
बे अदद गुज़रे हैं अक़लो फ़हीम । कोई न दरवेश साहै आलीविभाग ॥
दुनियावी कीच फँस रहे सारे । नरहार्ई हुई न बाल फ़िराग़ ॥
कुल आलम अदमके मुल्क सभा । जिसका कोई कहीं नहीं है सुराग़ ॥
न हुकमा व शह निशां आजिज । कन्न दर्वेश पर जलाते चिराग़ ॥

तरजीआ बन्द

दुनियाभर भूल भूलैयाँ है । सब भूले अपना सपैयाँ है ॥
त्रिलोक न ढूँढे पाया है । क्योकर पड़े इस पटियाँ है ॥
निःसंग सभास्थानक साथी है । गये दूर हैं अपने जो गोइयाँ हैं ॥
पहचान नहीं सब भूल पड़े । निजरूप नहीं सब छैयाँ है ॥
सब मिट्टी पानी गारा है । यह निन्दबडी बट मारा है ॥
जो पूरब पश्चिम जाओगे । दश दिशा न ढूँढे पाओगे ॥
सब तीरथ तीरथ भरमो । सौ बार जो गंग नहाओगे ॥

सब पोथी थोथी सार नहीं । पण्डितसे वेद खोलाओगे ॥
कर योग जतन नहिं जाय रतन । सब खाली देख चिलाओगे ॥
क्योंकर मिल अपना प्यारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥

अब आन पढ़े इस जंगल हैं । आदम नहीं सब पशु दङ्गल है ॥
मन हाथी जंगल नास करे । यह मस्त महा मन मङ्गल है ॥
माने न पोथी तेरीको । क्या वेद व्याकरण पिङ्गल है ॥
वह जान कहाँ बलवान् कहाँ । बन्धे जो ज्ञानके सङ्गल है ॥
कोई संत जो मिले कढ़ारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥

कहाँ सतगुरु संत सिपाही है । निज नेत्र उसपर बाही है ॥
पकड़े चोर और गठ कटोंको । कम्मों का जङ्गल दाही है ॥
जो अगम निगमके पारा है । सो संत वहाँका राही है ॥
धरती पर धरम धराया है । धूर धाम की नोत निवाही है ॥
आजजि खुदतर और तुम्हारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥
इति ।

विविध उपदेश संग्रह

विद्याभिमानियोंको उपदेश ।

विद्याभिमानियों की बुद्धि ठिकाने न रही, उनके अन्तःकरण तर्क वितर्क और संकल्प करते रहते हैं। जबतक उनके ऐसे विचार रहेंगे तब तक वे सन्तोंके उपदेश योग्य नहीं हो सकते। वे मनुष्यकी चार अवस्थाओंपर भी विचार नहीं करते। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरिया; येही चार अवस्था, इनके व्यवहार रङ्ग ढङ्ग भिन्न भिन्न हैं, चारोंही भ्रम हैं।

जाग्रतकी सामग्री स्वप्नावस्थामें किसी काम नहीं आती, उसी प्रकार शरीरभत (कर्मकाण्ड) हकीकत (ज्ञान) तरीकत (योग) और मारफत (विज्ञान) ये सब भी वैसेही हैं। जितने पुस्तकालय हैं सब शरीरभत (कर्मकाण्ड) काही वर्णन करते हैं, जितना लिखना कहना आदिक है सब जाग्रत अवस्थाके लिये हैं। स्वप्नावस्थामें कुछ काम नहीं आते। स्वप्नावस्थामें मूर्ख और पण्डित सब एक समान होजाते हैं। जाग्रत अवस्थाका ज्ञान स्वप्नावस्थामें काम आता तो विद्वानोंमेंसे कोई भी किसी प्रकारका अपराध नहीं करता। जब कि स्वप्नावस्थामें विद्वान् और मूर्ख सब एक समानही होगये तो विद्वान् और मूर्खोंमें

उदारता और वीरता

कुछ विशेषता नहीं हुई । विद्वानभी मूर्खोंके समान वेही कर्म करते हैं उनके पुस्तकालय कोई काम नहीं आते । यह मनुष्यकी दूसरी अवस्था है, जब कि, दूसरीही अवस्था में विद्या और कला कौशल तुच्छ हो गये जब उनकी कुल विद्या कला कौशल केवल जाग्रतके लियेही हो तो जाग्रतकी अतिरिक्त अवस्थाओंके लिये कौनसी विद्या और बुद्धिमानी आवश्यक है, उनमें तो जाग्रतकी कोई सामग्री नहीं होती । सुषुप्तिसे आगे तुरीयातीत अवस्थाओंमें कौन पुस्तक वेद किताब और मार्ग बतलाती है । इन बातोंका भेद विद्याभिमानी बिचारे क्या जाने, उनको इस बातकी सुधिभी नहीं हो सकती । स्वयं सत्य विचार और अभ्यास भक्ति तो हो ही नहीं सकती, वे सन्त सेवा जानतेही नहीं बरन् सन्तोंसे ईर्षा करते हैं कि, देखो हम लोग इतना परिश्रम करके दिनरात उसीमें लगे रहनेपर अपनी रोटी प्राप्त करते हैं पर फकीर बिना परिश्रम केही हूष्ट पुष्ट बने रहते हैं, ऐसे विचार करनेवाले बिलकुल अन्धे और बुद्धिहीन हैं । उनमें तनिक भी विचार नहीं कि, जीवधारियोंको कौन भोजन देता है ? उन्हें कौन वस्त्र पहनाता है ? कितने जीवधारी पशु पक्षी ऐसे वस्त्र पहनते हैं कि, मनुष्योंको स्वप्नमेंभी नहीं प्राप्त हो सकते । भलाजी, जो पापियोंका पोषण करता है वह अपने मुख्य शिष्योंको किस प्रकार भूल सकता है ? विद्याभिमानी लोगोंका इन बातोंके ऊपर ध्यान न देनेसे उनकी बुद्धि अन्धकारमय होगयी ।

ज्ञानकी सात भूमिका हैं, उनमें केवल तीन भूमिकातक वेद और किताब हैं, शेषकी भूमिकाओंमें वेद और किताबोंकी आवश्यकता नहीं इसी कारण सन्तोंके अतिरिक्त शेष भूमिकाकी बातें विद्याभिमानी नहीं जान सकते । उन अवस्थाओंका भेद सत्यगुरुकी भक्ति और सेवाकर कृपापात्र बननेसे प्राप्त हो सकता है । यदि पुस्तकोंसेही ये बातें प्राप्त होती तो संसारके बड़े २ विद्वान, राजे, महाराजे फकीर क्यों बन जाते ? विद्याभिमानियोंकी बुद्धि और विवेक सीमाबद्ध है । सच्चे सन्त ज्ञान और विवेकके भण्डार हैं उनकी बुद्धि अपार है यदि पुस्तकोंकेही पढ़नेसे ईश्वरीय भेदकी बातें जानी जाती तो सन्तोंके उपदेशकी आवश्यकताही न होती । इस कारण मनुष्यको उचित है कि, पारलौकिक ज्ञान की प्राप्तिके लिये सच्चे सन्तोंकी शरणकोही ग्रहण करें, सांसारिक विषयमें विद्वानोंकी आवश्यकता है ।

नवकोश और पांच अहङ्कारोंका भी वर्णन कर आया है कि, इस जीवने नौकोशोंमें अपना घर बनाया, पुस्तकादि कला, कौशल सब प्रथम कोशके सम्बन्धी हैं । सब अवस्थाओं और कोशोंकी सुधि, सच्चे विचारवान् ज्ञानी

साधुओंकी स्थिति

सन्तोंकोही है। विद्याभिमानी लोग बिलकुल बेसुध हैं। ये सब बातें भजन और विचारके साथ सम्बन्ध रखते हैं। पांच अहङ्कार और छः प्रकारके देहके गुप्त भेदोंकी सुधि अभिमानियों और नास्तिकोंको नहीं मिल सकती, कौन ऐसा सांसारिक है ? जो अद्वैतकी बात जानता है, क्योंकि, सांसारिक सब लोग तो भेदकी बातेंही करते हैं।

सच्चे सन्त ज्ञानी निष्काम लोग जब भेदकी बातें समझते हैं तो विद्याभिमानी लोग उनसे कहते हैं कि, कुछ आँखसे दिखलाओ तभी इन बातोंपर विश्वास हो। वे बातें इस प्रकार हैं जैसे कि, कोई जन्मका अन्धा कहे कि, सूर्य और चन्द्रमा नहीं है, यद्यपि सूर्य और चन्द्रका देखना आँखका काम है आँख ही उसके नहीं है तो किस प्रकार देख सकेगा ? इसी प्रकार जो विद्याभिमानी लोग शुद्ध विचार और विवेकसे शून्य हैं वे ईश्वरी गुप्त भेदोंको किस प्रकार जान सकेंगे ? यह तो विचारवान् विवेकी शुद्ध और सरल हृदयके सन्तोंकाही भाग है। यही कारण है कि, सच्चे सन्तों और विद्याभिमानियोंमें, सर्वदासे विरोध चला आता है, विद्याभिमानियोंकी सङ्गति, भजन छुड़ा देती है। सब सन्तोंका इस बातपर एक मत है कि, प्राकृतिक विद्याभिमानी मनुष्योंसे अलग रहो। अतएव हजरत मसीह फरमाते हैं कि, मरकसकी इञ्जील १२ बाब २८ आयत—फकी हों (कर्मकाण्डके उपदेश करनेवालों) से हुशियार रहो, जो कि, लम्बे जामें पहनकर बाजारोंमें सलामोंकोइबादत् खानोंमें उच्च आसन और ज्याफतोंमें सबसे ऊँची जगहोंको चाहते हैं।

जीवधारी अपने मुंहसे खाते हैं उनके सब अङ्गोंमें रस पहुँचता है, यदि वे नाक, कान आदि किसी दूसरी इन्द्रियोंसे खावें तो नहीं खा सकते, वरन् अस्वस्थ हो जायेंगे इसी प्रकार सच्चे सन्त और सत्यगुरुकी सेवा आज्ञाकारितासे भुक्ति मुक्ति और ज्ञान आदिककी प्राप्ति होती है। यह गुण विद्याभिमानियोंमें नहीं है। क्योंकि, वे तो अपनी बुद्धिके अहङ्कारमें ऐसे डूबे होते हैं कि, उन्हें तो सत्य असत्यका यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता, यही विचार कर सन्तोंने, उनको उपदेश देना छोड़ दिया है इसी विषयपर कबीर साहिबने कहा है कि—

इल्म पढ़ाकर अमल न कीता । सीखा बहुतक हिल्ला ॥
उमरांवाके मजलिस बैठें । लुकमें खॉय सकिल्ला ॥
चिकनी बातें बहुत बनावें । आन हूदीस दलिल्ला ॥
बगला हंसके रूप बनाये । कुल ईमान बिलिल्ला ॥

२३ अ० गजलोंसे उपदेश(इसमें कवित्तमय अनेक उपदेश हैं )

अकल असर सब शगल किया है । शिकम किया है मिल्ला ॥
कहैं कबीर यह मसलें पढ़कर । मान बिगाने लिल्ला ॥

बुष्ट स्वभावको विद्याभिमानियोंने वर्तमान कालके लोगोंको ऐसा कठिन हृदय और कुमार्गी बना दिया है कि, संसारसे भक्ति और भजन उठ गया । विद्याभिमानियोंसे सद्गुरुकी सेवा बहुत कठिन है । वे बुष्ट सन्तोंके शत्रु हैं । उन्होंने समस्त संसारको भ्रष्ट कर दिया है । समस्त संसारमें अज्ञानता फैल गई है । सबके अन्तःकरण अशुद्ध हो गये हैं । न्यायी राजा और शासक लोग सर्वदा इस बातका ध्यान रखते हैं कि, सन्तों साधुओं और भक्तोंकी सेवा शुश्रूषा होती रहे कि, जिससे संसारमें ईश्वरका भय और भक्ति स्थिर रहे सन्तोंकी कृपादृष्टिसे लोक परलोक सुधरता है । सांसारिक शास्त्रोंके जाननेवाले अथवा सांसारिक विद्याओंके ज्ञाता तो सांसारिक व्यवहारकी बातोंमें सहायक हो सकते हैं, पारलौकिक उपदेशमें उनका कहना और सुनना तुच्छ है, बरन् उनकी धर्मव्याख्या सुनकर भी मनुष्य अज्ञानी होकर धर्मविरुद्ध काम करता है ।

मनुष्य वही है जो इस बातपर सोच विचार करेकि जिसको सांसारिक मनुष्य पूजते और अपना ईश्वर समझते हैं वह तो छल और कपटसे भरा हुआ है, वह सदा मनुष्योंसे कपट और धोखा करता चला आता है, ऐसे छली कपटीको अपना मुक्तिदाता मित्र समझते हैं । जिसको लोग पूजते हैं वह संसारमेंही बन्धन करनेवाली माया है ।

देखो योहन्नाकी इञ्जील ८ बाब १ आयत—हजरत ईसा स्पष्ट कहते हैं कि, चोर नहीं आता चुराने और कत्तल करनेको, मैं आया हूँ । हजरत तो हाँक मारकर कहते हैं कि, मैं चुराने और कत्तल कराने आया हूँ । फिर मत्तीकी इञ्जील १० बाब ३२ आयत—यह मत समझो कि, मैं पृथ्वीपर सुलह करवाने आया हूँ, बरन् तलवार चलवाने आया हूँ । इसमें हजरतका क्या अपराध है, उन्होंने तो स्पष्ट कह दिया, यदि यह बात ईसाइयोंके समझमें न आवे तो किसका अपराध ?

मूसाके खुदाने उससे साफ कह दिया था कि, मैंने कनआके बत्तीस बादशाहोंको मार लिया । मूसासे उन सभीोंको नष्ट करवा दिया । मुसलमानोंको किसने लड़ाई और जेहाद सिखलाया ? जिस खुदाने समस्त संसारको बाँध लिया उसी खुदाकी पूजा सब करते । जो उपरोक्त बातोंपर सोचे और विचार करे वही मनुष्य भक्तिका अधिकारी है ।

सब मनुष्य एकही अच्युत परमात्माकी भक्तिका दावा रखते हैं। चाहे वह भूतही पूजते हों वा ईश्वरकी भक्ति करते हों। यदि किसीसे कहो कि, तू बुत्तपरस्त है, सच्चे अच्युत परमात्माकी भक्ति नहीं जानता, तो इस बातपर अवश्यही क्रोधित होया। हठसे कहेगा कि, मैं एकही परमात्माकी पूजा करता हूँ। इस बातके लिये प्रथम हिन्दूजातिकी ओर ध्यान देना चाहिये, जिसको प्रथम ईश्वरने वेद प्रदान किया उसके अनुसार ये चलने लगे। यद्यपि वेदके आशयको समझना बहुत कठिन है पर सब मतावलम्बियोंने अपने विचारानुसार मन्त्रोंके अर्थ किये, उसीपर सन्तोष करके बैठ रहे। अपनेको कृतार्थ समझ लिया। यह किसीको सुधि नहीं रही कि, वेदके अमुक मन्त्रका क्या अर्थ है? उसका यथार्थ आशय क्या है? जैसा जिस धर्मके आचार्योंने अर्थ किया, उनके अनुयायी उसीके अनुसार अनुकरण करते आये। अपने आचार्योंसे बढ़कर न किसीकी बुद्धि होती है, न प्रयत्न करके वह अपनी बुद्धिको फैलानाही चाहता है, क्योंकि, पक्षपातमें पड़कर हठ और दुराग्रहसे अपने आचार्यकोही सर्व शिरोमणि, सर्व गुणविद्या और ज्ञाननिधान जानता है, यदि उसको सारासार विचारणीय बुद्धि हो तो भ्रमकी ओर ध्यान न दे जो ऐसे पक्षपाती हैं उनको सत्यमार्ग भी बतलाओ, वह सत्य जान भी ले तो भी दुराग्रहसे उसे स्वीकार न करेंगे, बरन् उसी असत्यको पुष्ट और सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ती और प्रमाण लाते हैं। ऐसे मनुष्य नरपशु कहाते हैं।

सबसे प्रतिष्ठित और बड़े ब्रह्मा हैं उनको भी अद्वैत परमात्माकी बिलकुल सुधि नहीं है, यदि वो जानते तो दुःख सुखमें क्यों पड़े रहते? दूसरे सिद्ध हैं यदि वह अद्वैत परमात्माको जानते तो ऐसे छल कपट क्यों करते? दूसरोंको भी नष्ट करके आप क्यों नष्ट होते? तीसरे बड़े वेदपाठी शिव हैं, यदि उनको भी एक परमात्माका ज्ञान होता तो इतनी योग युक्ति करनेपर भी क्यों कामके वश होते? जितने ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधु, सन्त, महन्त, इन्द्रियोंके वशमें विषय वासनाके बन्धनमें सांसारिक अभिलाषाओंके घेरमें पड़े हुये हैं, वे सब मायाके पुजारी हैं। अद्वैत परमात्माकी पूजा करके फिर कोई शारिरक कामनाओंमें बन्द नहीं होता, जितने लोग वेद अथवा किसी दूसरे आचार्यके पक्षपात में पड़े हुये हैं, सारासारका विचार नहीं करते, वे बन्धनमेंही रहेंगे, कभी मोक्षको प्राप्त नहीं होंगे; जैसे यारतके अनेक धर्मावलम्बीपक्षपातमें पड़कर सत्य परमात्माको भूल बैठे हैं वैसेही पश्चिम देशके सब अम्बिया, औलिया पीर और पैगम्बर परमात्माकी पूजासे अज्ञात हैं।

इस पिण्ड और ब्रह्माण्डमें जो कुछ दृष्टि आता है सब माया है, माया पुरुष केवल कबीर है, उसको जो पहचाने अपना पति बनावे वही सोहागिन हो । जिस स्त्रीने उस पुरुषको न पहचाना, उसको अपना पति न बनाया वह सफल काम न होगी । स्त्रीके साथ जो स्त्रीका विवाह हो तो उसकी आशा पूरी कैसे हो सकती है ?

उपरोक्त चार पशु मेरी बातोंको नहीं समझ सकते । न इसके ऊपर विचारकर सकते हैं क्योंकि, उनको यथार्थ विचार और विवेक नहीं पशुबुद्धि है । वे देखनेही के मनुष्य हैं नहीं तो यथार्थमें पशु हैं, जिसको परमात्माने विवेक और मानुषिक बुद्धि दी है वे अज्ञानताके कामसे अवश्य अलग रहेंगे, पाशुबिक वासनाओंसे अवश्य वञ्चित रहेंगे । पशुओं, कञ्जरों और पामरोंके लिये लिये मेरा उपदेश दोधारा तलवार है । मुमुक्षुओंके लिये अमृत है ।

कितनेही लोग कहते हैं कि, कबीर साहबका नाम वेद और पुराणोंमें नहीं है, यदि वेद और पुराणमें होता तो हम कबीर साहबको मानते । इसी वास्ते कई एक मन्त्र वेदोंको कबीर साहबके विषयमें लिखा है, नहीं तो उसके लिखनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी । सहस्रों ऋषि मुनि, जो सर्वदा एक समानही रहते हैं, जिनका कभी नाश नहीं होता, उनके ज्ञान और विद्याके प्रकाशमें सब तुच्छ हैं । वे सब ऋषि, मुनि, कागभूसुण्ड, कुष्ठम ऋषि और लोमश ऋषिके समान कबीर साहबकी स्तुतिमें लगे रहते हैं । फिर उनकी विद्याके सम्मुख दुसरोँकी विद्या कैसे ठहर सकती है । सूर्यके सामने जिस प्रकार दीपकका प्रकाश कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार ऋषि मुनियोंके ज्ञानके सामने किताबोंका ज्ञान तुच्छ है ।

जिस देश, जिस धर्म, जिस जाति, जिस मण्डलीमें सच्चे साधु और सच्चे गुरुकी सेवा, प्रतिष्ठा और आज्ञाकारिता नहीं हैं उसमें ज्ञान, भक्ति और सत्यजीवन भी नहीं है । वहाँके लोग मृतक हैं, जहाँ सन्त नहीं रहते जिस घरमें सन्त और अभ्यागतोंका सम्मान नहीं होता, उस घरमें भूत, प्रेत रहते हैं । जिस धन धान्यमें साधु गुरुका भाग नहीं वह अशुद्ध है, वह नष्ट हो जावेगा । जो देह साधु और गुरुकी सेवा नहीं करती वह नरकमें जावेगी । जो सुन्दरी सच्चे साधु और गुरुओंके उपदेशको नहीं सुनती बरन् उनसे परदा करती हैं, वह शूकरी और कूकरी होकर नङ्गी फिरा करेगी । जिस विद्या और बड़ाईको सन्त और गुरुका स्वत्व न दिया जावे वह नीचदशाको प्राप्त करावेगी । सब प्रकारकी

भलाई साधु गुरुकी सेवाके आधारपर है, जहां साधु और गुरु नहीं वहां कुछ भी नहीं।

जो कोई कबीर धर्मकी शुद्धता और सत्यताका ज्ञाता बनना चाहता है, वो धर्मदास साहबके पुत्र चूडामण्णिदास साहबके स्थानापन्न महन्त और संत, जो विद्वान् सब भेदोंके जाननेवाले और स्वयम् उसके ऊपर चलनेवाले हों उनसे पूछलें। जो कोई धर्मदास साहबके धर्मको जाननेवाले, माननेवाले और उसके ऊपर चलनेवाले उसी गद्दीके सन्त महन्त होंगे उन्हींसे पूछनेका अधिकार होगा। नाममात्रके मूर्ख कबीर पन्थियोंसे पूछनेसे भेद न मिलेगा। क्योंकि, बहुत लोग अपनेको कबीर पन्थी बतलाते हैं पर यथार्थमें वे कबीरपन्थी नहीं हैं गुरु मुखता उनमें नहीं, मुखसे अपनेको कबीर पन्थी कहते हैं, पर कबीरसाहबकी आज्ञा और वाणीका आदर नहीं करते जो कोई केवल नामसेही अपनेको कबीरपन्थी कहने वालेके वचनों पर विश्वास करेगा, वह अवश्य धोखेमें पड़ेगा। इस कारण सोच बिचार कर विवेकद्वारा सत्सङ्ग करना उत्तम बात है। एवं दूसरे जो निष्पक्ष विद्वान् हों वे भी बता सकेंगे।

ईश्वर प्रेमियोंके उपदेश

जो लोग परमात्मासे प्रेम करते हैं, वे सब सामग्री और सुखोंको तुच्छ जानते हैं, उनकी समस्त सांसारिक वासनाएँ निवृत्त हो जाती हैं, किसी प्रकारकी कामना शेष नहीं रह जाती। संसारमें सबसे उत्तम राज्यसुख और राज्य माना जाता है, पर ईश्वरके सच्चे प्रेमी विरक्त पुरुष तीनलोकके राज्यको तुच्छ जानते हैं।

दृष्टान्त एक विरक्त किसी बनमें रहता था वह ईश्वरके प्रेममें मग्न संसारसे उदास, भक्तिमें रत था। एक दिन एक बादशाह उसी बनके मार्गसे कहीं जा रहा था। उसने महात्माको बैठा हुआ देखा। उनकी दरिद्रता और बाहरी हीनावस्था देखकर बादशाहने कहा—महाराज ! आप शहरमें चलो, वहाँ आपकी सेवा और भक्ति भली प्रकार होगी। विरक्तने कहा कि, संसार और संसारके सब सुख अति तुच्छ और मिथ्या हैं। बादशाहने कहा कि, संसारके सुखके तुल्य कोई भी सुख नहीं, आपने उसका आनन्द नहीं भोगा है इसी कारण उसका प्रतिवाद करते हो। संतने बहुत प्रकार समझाया पर बादशाहने एक बातभी न मानी, अपनी ही कहता रहा। संत चुप हो गये बादशाह अपने राज-महलको गया।

एक समय बादशाहका पेट फूल गया, अपानवायु बन्द हो गई, अत्यन्त दुःखी हुआ बल्कि मृत्युके पास पहुँच गया । वैद्योंने बहुत औषधि की पर कुछ भी लाभ न हुआ । उसी समय उपरोक्त बनवासी विरक्त महात्मा भी आ पहुँचे । बादशाहने देखतेही दुःख भरी दृष्टिसे संतको नमस्कार किया । संतने कहा कि, ऐ बादशाह ! यदि तू इस समय अच्छा हो जावे तो उसके बदले मुझे क्या दे ? बादशाहने कहा कि, मैं करोड़ों रुपये देसक्ता हूँ । संत ने कहा कि, तेरी जानके सम्मुख ये करोड़ों रुपये कोई बात नहीं । बादशाहने कहा कि, मैं आधा राज्य दे दूंगा । संतने कहा कि, यदि तू अपनी समस्त बादशाहत देदे उसका दानपत्र लिखदे तो मैं तुम्हारा जान बचा दूंगा । बादशाहने विचार किया कि, क्या हुआ, यदि राज्य नहीं रहा तो क्या ? जीवन तो रहेगा । यह निश्चयकर कारबारियोंको आज्ञा दी कि, कागज लाकर दस्तावेज लिखो । दस्तावेज लिखा गया, बादशाहने हस्ताक्षर करके संतको दे दिया । संतने बादशाहके पेटपर हाथ फेरा, उसी समय अपान वायु निकली, बादशाह अच्छा हो गया । पश्चात् संतने कहा कि, यद्यपि अब तुझे बादशाहतसे कुछ सम्बन्ध नहीं रहा, क्योंकि, वो अब मेरी हो गई है । तो भी मैं इस तुच्छ राज्यको लेकर क्या करूँगा । इसपर तो अज्ञानी लोगही अभिमान किया करते हैं । इतना कहकर संत चले गये ।

ऐसे सहस्रों ही दृष्टान्त है कि, संतोंने तीनों लोकके राज्योंको तुच्छ समझकर त्याग दिये हैं क्योंकि, सांसारिक वैभव जितना बढ़ता है उतनाही भजनमें विघ्न होता है ।

भारत वर्षकी धार्मिकावस्था ।

पूर्वमें भारतवर्षमें रीति थी कि, प्रथम अपनी सन्तानको धर्मके साधारण नियमोंको सिखलाते थे, पीछे व्यवहारकी रीति बतलाते थे, जिसके कारण सबके अन्तःकरणमें धर्मकी आस्था बनी रहती थी । सब कोई धर्मकी अपेक्षा त्रिलोकीको तुच्छ जानते थे । वर्तमान कालमें प्रथमही अंग्रेजी फ़ारसी आदि व्यावहारिक भाषा तथा व्यावहारिक विद्या सिखाते हैं । पहलेसे अन्तःकरणमें धर्मका बीज तथा धर्मका ज्ञान न होनेसे लोग धर्मविमुख हो जाते हैं । जिनके अन्तःकरणमें धर्मकी आस्थाही नहीं वे गुरु संतोंकी सेवा भक्ति क्या करेंगे ? ऐसे धर्मकी आस्थासे हीन पुरुषोंकी आयु परिश्रमी पशुके समान व्यतीत होती है । वे आपको बुद्धिमान् ज्ञानी समझते हैं पर बुद्धिकी तो उनके पास गंधतक नहीं आती, मिथ्या धृष्टता और निलंजितामें अपनी आयु व्यतीत करते हैं ।

परधर्म और विद्यामें श्रद्धा रखनेसे हानि।

फारसीके पढ़नेमें यह भी रीति है कि, प्रथम बिसमिल्लाह पढ़ाते हैं पर अंगरेजी पढ़नेमें तो बसभिल्लाही नदारद है।

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जिस विद्या अथवा व्यवहारमें प्रथम ईश्वरका नाम न लिया जावे उस विद्या और व्यवहारसे अंतःकरणमें अन्धकार फैलता है। आजकल अंग्रेजी राज्यमें कोई भी ऐसा नहीं वर्तमानके विद्या जाननेवालोंमें जो ईश्वरका नाम लेकर कोई पुस्तक अथवा काम आरम्भ करता हो। आजकल किसी पुस्तकके माथा (होर्डिंग) पर कभी भी ईश्वरका नाम नहीं लिखा जाता यही कारण है कि, ईश्वर नाम विहीन पुस्तकोंसे किसीको ज्ञान नहीं प्राप्त होता। म्लेच्छ विद्या पढ़नेसे सबकी बुद्धि भ्रष्ट होगई। प्रथमसेही आजकलकी अवस्थाको जानकर सन्तोंने पहिलेहीसे भविष्यत् कथन कर दिया है कि, कलियुगमें लोगोंकी सत्य बुद्धि नष्ट हो जावेगी।

नानक शाह वचन।

“क्षत्रियोंने धरम छोडे म्लेच्छ भाषा गही सृष्टि सब एक बरन हुई।”

उचित कर्तव्य।

इस लिये उचित है कि, प्रथम धर्मकी शिक्षा देकर तब दूसरा कुछ सिखावें, प्रथम परमेश्वरका नाम लें पीछे, किसी कामको आरम्भ करें।

कितने लोग ऐसे कहा करते हैं कि, जिन सन्तोंका वर्णन शास्त्रों और ग्रन्थोंमें लिखा है, वैसे संत अब कहाँ हैं? पर यह नहीं समझते कि, संत और ईश्वरका कभी अभाव नहीं होता। जब कोई विशेष कारण उपस्थित होता है तो सन्त प्रगट होते हैं अपना काम करके गुप्त हो जाते हैं।

कथा—एक राजा बड़ा अभिमानी था, अपनेसे सबको तुच्छ समझता था। एक दिन आखेटको चला। अच्छे २ घोड़े और उत्तम २ वस्त्र मँगवाकर पहने कुछ सेना साथ लेकर रवाना हुआ। चलते २ एक मंदानमें पहुँचा। वहाँ मंले कपडे पहने हुये एक दरिद्री मनुष्य मिला प्रणाम करके दुःखीरूप मनुष्यने कहा कि, यदि आज्ञा दो तो कुछ विनय किया चाहता हूँ राजाने आज्ञा दी। उसने कहा कि, मैं केवल तुम्हारेही कानमें कहूँगा। राजाने इस बातको भी स्वीकार किया। जब उपरोक्त मनुष्यने राजाके कानमें आकर कहा कि, मैं यमदूत हूँ तुम्हारा प्राण निकालने आया हूँ। इतना सुनते ही तो राजाका चेहरा पीला पड़ गया। यमदूतसे कहा कि, मुझे अपने परिवारोंसे तो मिललने दो।

(उस यमदूत) ने कहा कि, अब यह बात नहीं हो सकती । राजाने कहा कि, घोड़ेसे उतरने दो । उसने यह भी स्वीकार नहीं किया राजा घोड़े परही मर गया । सब अहंकार धूलमें मिल गया । यह संसारी वैभव मनुष्यको अन्धा बना देता है ।

यही दशा शद्वाह बादशाह की हुई थी । उसने बारह वर्षमें स्वर्ग बनवाया पर जब उसे देखने चला तबही यमदूत मिला उसके साथियोंके साथ उसे पाताल भेज दिया ।

जो लोग नमरुद और फिरऊनके समान ईश्वर विमुख हैं उनको कभी चेत नहीं होता । लाखों प्रकारकी युक्ति की जावें । नानाप्रकारकी सिद्धियाँ और भय उपजानेवाली लीला दिखाई जावें पर वे नहीं समझते, जहाँ सांसारिक वैभव होता है उसकी अधिकता पाकर मनुष्य अवश्य ही अन्धा हो जाता है ।

कँसा धर्म स्वीकार करना चाहिये ।

जो कोई किसी (मजहब) को स्वीकार करना चाहे उसे उचित है कि, प्रथम छः बातोंको विचार करले, भली प्रकार परीक्षा कर पीछे स्वीकार करे । वे छः बातें ये हैं ।

१ गुरु, २ आचार्य, ३ शास्त्र, ४ देव, ५ नाम और ६ धाम ?

जैसे १ गुरु पारख, २ आचार्य कबीर साहब, ३ शास्त्र स्वसंवेद, ४ देव सत्त पुरुष, ५ नाम शब्दसार अथवा मुक्तिकाद्वार शब्दसार, ६ धाम सत्यलोक । जो कोई उपरोक्त विषयोंके बिना विचारे किसी धर्मको स्वीकार करेगा वह अवश्य बन्धनमें पड़ेगा ।

यह सारा संसार माया है, स्वामी सेवक सब माया है । अकली और नकली सब माया है जो कुछ कहा और सुना जाता है । सब माया है, मायाकी ही आटेमें ब्रह्म है । जैसे माताकी ओटमें पिता छिपा है, माताको सब देखते हैं पर पिताको कोई नहीं देखता, माताने आपको प्रगट किया, पिताको गुप्त रक्खा । यह देह छःधातुओं से बनता है जिसमेंसे तीन धातु चर्म, मांस, लोह, माताका अंश हैं शेष तीन अस्थि (हाड) गूद (मज्जा) विन्द (वीर्य) पिताका अंश है । जो कोई पिता से मिलना चाहता है उसको चाहिये कि, अन्तःकरणसे माताका स्नेह निकाले । तात्पर्य यह कि, जब-चर्म, मांस, रक्त परसे दृष्टि उठावेगा तब हाड और गूद विन्दको देखेगा । दोनोंसे जो कोई भिन्न हो सो अद्वैत अनुपमका दर्शन पावे । सब मनुष्य माया और ब्रह्मके ध्यानमें लगे हैं, इसी प्रकार मायाके बन्धनसे बाहर नहीं जा सकते । वेद, किताब, शरअ, शास्त्र सब मायामें ही है, इनके पार होना कठिन है ।

पांच तत्व और तीनों गुणोंसे यह शरीर बना है। चौदह इन्द्रियां भी पांच तीनकेही विचार हैं। जितने कहनेवाले हैं, सब इन्होंके भोतर बात कर सकते हैं। जब पूछा जाता है कि, जिसके आश्रय ये सब खड़े हैं, जो सबकी आधार है उसका क्या रूप है? क्यों जितने नाम रूप हैं वो सब माया है। तीनलोक भव-सागर माया सृष्टि है। जो मायासे पार होना चाहता हो संसार अर्थात् मायाके किसी पदार्थमें भी आसक्त हो तो उसे सत्यकी कुछ भी सुधि नहीं, ऐसा जानना चाहिये केवल गुरुही उस अद्वैतकी सुधि बता सकता है दूसरा कोई नहीं बता सकता।

संसारके सभी लोग उन्मत्तोंके समान कर्म करते हैं स्वप्न और जाग्रतमें विशेष भेद नहीं। संसारमें फँसा हुआ मनुष्य अचेत होता है उसके जितने कम होते हैं सभी अचेतताके होते हैं। यदि इनकी बुद्धि ठीक होती तो उन्मत्तोंकेसे कर्म क्यों करे? जहाँ बुद्धिको भ्रमही नहीं हो सकता उसको अनुमानकर निश्चय करना मूर्खता नहीं तो दूसरा क्या है? सब ऋषि, मुनि, महात्मा, तत्वज्ञ, विद्वान, ज्ञानी आदि सर्वदासे कहते आये हैं कि ईश्वरीय भेदमें बुद्धि कुछ काम नहीं कर सकती। जो बुद्धि और इन्द्रियोंकी पहुँच वहाँतक बतलावे वह विक्षिप्त है। समस्त इन्द्रियोंमें बुद्धि सबसे श्रेष्ठ है। यदि बुद्धिही वहाँ नहीं पहुँच सकती तो दूसरीइन्द्रियों कैसे पहुँच सकती हैं? जब बुद्धि सत्यतक नहीं पहुँच सकती फिर उसका निश्चय असत्यही हुआ। जिसने असत्यको स्वीकार कर सत्पुरुषकी भक्तिको छोड़ दिया वह मनुष्य नहीं, यही क्या मनुष्यत्वका उसमें लेश भी नहीं है।

साखी—कबीर तिनका जन्म अकार जो, विन भक्ति मरि जाँय।

मुरगीकेसे वचा ज्यों, फिरसी जगके माहिं ॥

जितने लोग और किताबोंके ऊपर भरोसा रखते हैं, उनको प्रकाशका मार्ग मिलना कठिन है। क्योंकि, किताबादि उन्हीं लोगोके लिये हैं जिनको ज्ञानका का कुछ भी प्रकाश नहीं।

बीजककी रमैनी।

बंधको दर्पण वेद पुराना। दर्वी कहाँ महारस जाना ॥

जस खर चन्दन लादे भारा। परिमल वास न जान गँवारा ॥

कहै कबीर खोजा असमाना। सो न मिला जेहि जाय अभिमाना॥

वेदके टीकाकारोंमें किता झगडा पडा है। कोई कुछ कोई कुछ कहता है। किसीको यथार्थकी सुधि नहीं है जिससे शुद्ध और सत्य टीका करे। इसी कारण कबीरसाहब कहते हैं—

अंधको दर्पण वेद पुराणा

संसारको लोग जो वेद पुराण पढ़ते हैं उनका पढ़ना अन्धोंकी आरसीके समान है । जैसे अन्धोंको आरसी दिखलानेसे कोई लाभ नहीं होता, वह अपना न तो मुँह देख सकता है, न उससे कुछ आनन्द प्राप्तकर सकता है । यदि अंधा दर्पण हाथमें लेकर उसका अभिमान करे कि, मेरे पास दर्पण है, तो उसका ऐसा अभिमान देखकर आँखवाले लोग हँसते हुए मूर्ख जानते हैं । ऐसेही अशुद्ध अन्तः-करणवाले अज्ञानी पुरुषोंका वेद पढ़ना है । ऐसे लोग वेदपाठसे कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते, मिथ्या अभिमान करते हैं । जैसे अन्धा हाथोंसे टटोलकर पदार्थको छू सकता है पर उसके स्वरूपके आनन्दको नहीं प्राप्त कर सकता । उसी प्रकार अशुद्धान्तःकरणवाला यदि वेदको पाठकर जावे तो भी उससे कुछ पा नहीं लेता न वेदके यथार्थ आशय और गुणको ही जान सकता है ।

दर्बी कहाँ महारस जाना ।

इसी प्रकार दर्बी अर्थात् कड़छी जो कि दाल, चावल, हलुआ, शाक आदि सर्व व्यञ्जनमें फिरती पर उसको उनके स्वादका कुछ भी ज्ञान नहीं

जस खर-गंवारा ।

ऐसेही यदि गदहेके ऊपर चन्दनका भार लाद दिया जावे तो उस चन्दनकी सुगन्धि और गुणसे उसको कुछ लाभ नहीं होता ऐसाही अशुद्धान्तःकरण, मनुष्यत्व, गुणशून्य, पुरुष कड़छीके समान सब वेदोंका दिन रात अभ्यास करता रहे अथवा गदहेके समान वेद पाठके अभिमानका बोझ उठाये फिरे तो उसको कुछ लाभ नहीं हो सकता

कहै कबीरअभिमाना

कबी साहब कहते हैं कि, आकाशको खोजता फिरता है पर वह मिलता जिसका कि अभिमान नष्ट हुआ हो ।

परमात्मा जिसको स्वयम् मार्ग दिखावे वही उससे मिले उसको पहचाने जिससे अभिमान दूर हो । यह गुण तो केवल सत्यगुरुमेंही है, जिसके कि मिलनेसे शाह सिकन्दर लोदी जैसे अभिमानी धर्म द्वेषीका सब अहंकार नष्ट हो गया, सत्यगुरुके चरणोंका रज बन गया । कबीर प्रसङ्गमें गरीब दासजीकी वाणी देखो—

“चरण धोइ पिये सिकन्दर सिताब । तुम्ही अशंमका तुही है किताब ॥”

ब्राह्मणका कत्तल — सिकन्दर लोदी इतना बड़ा धर्मद्वेषी धर्माभिमानी पुरुष था कि, एलफिन्स्टन नामक इतिहास लेखक अङ्गरेज अपने इन्डियन् हिस्ट्रीमें एक हाल इस प्रकार लिखता कि एक समय मुसलमान लोग किसी स्थानपर

मुहम्मदी धर्मकी प्रशंसा कर रहे थे, उस समय एक ब्राह्मण कह उठा कि, हिन्दू धर्म (आर्य धर्म) इस्लाम धर्मसे कम नहीं बरन् तुल्य है। उसकी इतनीही बातपर काजी और मुल्ताओंने शाह सिकन्दरके निकट जाकर नालिश की। सिकन्दरने तत्कालही ब्राह्मणके बधकी आज्ञा दी। जिस समय ब्राह्मणका बध होने लगा दयालू मुसलमान फकीरने कहा कि, निरपराध प्रजापर अत्याचार न करना चाहिये। इस बातपर फकीरके ऊपर बादशाह बहुत क्रोधित हुआ, ब्राह्मणको कतल करवा दिया। फकीरसे कहा कि, बुतपरस्तकी सिफारिश मत किया कर।

गुरुपदके योग्य — धन्य है उस सच्चे सद्गुरु जिसके मिलनेसे ऐसा धर्म-द्वेषी मनुष्य नम्र हो गया, उसकी कठोरता नष्ट होगई। सब श्रेष्ठता और प्रशंसा उसी सद्गुरुसे है मनुष्यके अभिमानको नष्ट करके अधीनता और नम्रता प्राप्त करानेवाला दूसरा कोई नहीं। उसीकी शिक्षासे सब गुरुपदके योग्य होते हैं।

ईश्वरार्पण दान — संसारी पुरुषोंको उचित है कि, अपनी कमाईमेंसे कुछ अंश दानपुण्यमें खर्च करे तथा संत और गुरुकी सेवामें अर्पण करे जो ऐसा नहीं करता है वह कारूनके समान नर्कका भागी होता है।

जिस प्रकार प्रजा राज्यका कर न चुकावे तो वह अवश्य राजाके कोधानल का ईंधन बनेगी कारागारका कण्ट सहेगी इसी प्रकार जो ईश्वरार्पण दान पुण्य नहीं करता वह अवश्य ईश्वरका अपराधी हो नर्कका भागी बनता है। जिस प्रकार राज्यके सिपाही कर वसूल करनेके लिये प्रजाके पास जाते हैं उसी प्रकार साधु, संत, दुःखी, लाचार; ईश्वरके सेवक मनुष्योंसे ईश्वरी कर लेने आते हैं। राज्यके सेवकोंको प्रजाप्रतिष्ठाके साथ अधीनतासे कर दे देती है तो सुखपूर्वक अपना व्यवहार चला सकती है नहीं तो अड़चन होगी। उसी प्रकार ईश्वरी सेवक संत और साधु जब गृहस्थोंके निकट जावें तो उन्हें उचित है कि, उनको सत्कार पूर्वक अपनी शक्ति अनुसार जो कुछ ईश्वरार्पण देना हो सो दे, यदि ऐसा न करेगा तो ईश्वरी कोपका अधिकारी होगा।


१ कारूनका हाल—मुसलमानी किताबोंमें लिखा है कि, उसके पास इतना धन था कि चालीस गज लम्बी, चालीस गज चौड़ी एवं इतनीही ऊँची, चालीस कोठनिर्या उसके खजानेकी कुञ्जियोंसे भरी हुई थीं, पर वह ऐसा कृपण था कि, कभी भी एक पैसा किसीको नहीं देता था। मूस़ा पैगम्बरने उसे बहुत उपदेश किया पर उसने कुछ भी न सुना। अन्तमें वह अपने द्रव्योंको शिरपर लिये हुये पातालमें धँसने लगा। ऐसा कहते हैं कि, वह वैसाही अव तक पृथ्वीमें धसता चला जाता है। क्यामतके रोज पातालमें गिरेगा उसके द्रव्योंके शब्दसे संसारभरमें लोग चकित होंगे। चाहे जैसी असम्भव और दंतकथा हो पर उसका सार यही है कि, कृपण पुरुषको आदि अन्त और मध्यमें सर्वदा दुःखही रहता है उसका जीवन कभी सुखसे नहीं बीतता, चिंता भय और शोक तो उसके सदाकेही साथी हैं।

कबीर साहब कहते हैं कि, संसार ठगोंको अपना ईश्वर जानकर पूजता है । उसके परिणाममें जन्म जन्म दुःख पाते हैं, जिस प्रकार बकरा कसाईसे प्रीति कर उसके निकट जाता है, उसका शिर काटा जाता है । यदि उसे इस बातका ज्ञान होता कि, यह तो मेरा अधिक है तो क्यों पास जाता ? उससे क्यों प्रीति करता, बरन् उससे वो पृथक् होकर भाग जाता गला कटानेसे बड़िचत रहता ।

कबीर साहब और हंस कबीर चारों युगोंसे समझाते चले आते हैं । पर प्राकृतिक संसारी जीव ऐसे अज्ञानान्ध हो रहे हैं कि, उसपर ध्यान नहीं देते । बारम्बार उसीसे प्रीति करते हैं जो कि, अपने जालमें फँसाकर मार लेता है । मनुष्य और पशुका विवेक ।

मनुष्यको विचार करना चाहिये कि, मनुष्य और पशुमें किस बातका भेद है । शारीरिक व्यवहारमें सब समान हैं । लौकिक पारलौकिक सब सामग्री दोनों की एकसी प्राप्त हैं । यदि भेद है तो इतनाही कि, मनुष्यको वह ज्ञान प्राप्त हो सकता है, जिससे मुक्ति हो सकती है, क्योंकि मुक्तिका कारण ज्ञान मनुष्य शरीर में ही प्राप्त हो सकता है, प्रकृतिने केवल मनुष्य शरीरकोही वो श्रेष्ठता दी है जिससे कि, सारशब्दको प्राप्तकर सत्यपदको प्राप्त हो ।

सांसारिक धन वैभवके लिये लड़ना, झगड़ना, मरना, मारना, जीत हार पाना सब पशु धर्म हैं । विषय वासनाकी अपेक्षा करके एक चक्रवर्ती राजा व महान् दुःखी दरिद्री पुरुष दोनों तुल्य हैं । एक राजा अथवा जाति दूसरेसे लड़ते, भला बुरा कहते और द्वेष करते हैं वो सब पशु बुद्धिसेही करते हैं, क्योंकि, ये गुण पशुओं में देखे जाते हैं ।

जंगली घोड़ोंका झुण्ड और उनके चरनेके खेत अलग अलग होते हैं यदि एक झुण्डका कोई घोड़ा दूसरे झुण्डमें आजाय तो परस्पर घोर युद्ध करते हैं । इसी प्रकार बन्दरोंमें भी है कि, जब एक झुण्डके बन्दरको अथवा उनके किसी पदार्थको दूसरे झुण्डके बन्दर कुछ दुःख देते अथवा कुछ लेलेते हैं तो दोनों मण्डलियोंमें तुमूल युद्ध होता है ।

बटेरोंके पकड़नेवाले अपने पालक बटेरको लेजाकर ऐसे खेतोंमें बाँध देता है जहाँ बहुतसे बटेर हों, उसके चारों ओर दूरतक जाल फैला देता है । जब वह पालक बटेर शब्द करता है तो उसके शब्दको सुनकर उस खेतके रहनेवाले जंगली बटेर दौड़कर उसे मारने आते हैं क्योंकि, उनको इस बातपर क्रोध आता है कि, हमारी जागीरमें यह दूसरा बटेर क्यों आया । उसके निकट जाते २ सबके सब जालमें फँस जाते हैं । इसी प्रकार जो मनुष्य परस्पर राग द्वेष करके

नाशमान पदार्थों के लिये लड़ा करते हैं वे पशु पक्षीसे न्यून नहीं, उनमें मनुष्यता की गंध भी नहीं होती ।

मनुष्य वही है जो पशुधर्मसे रहित शुद्ध मनुष्यधर्मको धारण करने वाला हो । जिस प्रकार चिड़ीमार पक्षियोंको पकड़ २ कर मारता खाता है, उसी प्रकार काल पुरुष सर्व जीवोंको विषयवासनामें फँसाकर मार डालता है ।

मनुष्यको परमत्माने सब जीवधारियोंमें श्रेष्ठ इस कारण बनाया है कि, ये सब जीवधारियोंकी यथार्थ अवस्थाको जानकर यथाशक्ति उनकी रक्षा करे उनसे उनकी शक्ति अनुसार काम ले । इस कारण श्रेष्ठ नहीं बनाया कि, उनको मार मार कर खावे । पिछले अध्यायोंमें भली प्रकार युक्ति और प्रमाणोंद्वारा सिद्ध कर आया हूँ कि, एकही आत्मा सब जीवधारियोंमें व्यापक है, केवल उनको कर्मोंने उनको भिन्न २ रूपोंमें प्रकट किया है । मनुष्यका मुख्य भोजन अंकुरज पदार्थ है बरन् उसमें भी विचार करके अपने लाभदायक पदार्थोंकोही ग्रहण करनेकी आज्ञा है ।

कुरान्में तो ईमान (धर्म) का सार दया बतलाया फिर अन्याय और अत्याचार बतलाना पिशाचोंकी धोखेबाज़ी है ।

यजुर्वेदमें विराट् पुरुषकी व्याख्यामें स्पष्ट लिखा है कि, सब जीवधारी विराट् पुरुषके अस्थि, मांस और चर्म हैं, अंकुरज केश और नख हैं । देखो केश और नखके काटनेसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता बरन् मांस और हड्डीको काटो तो कष्ट होता है । जो मांस चर्म और अस्थि निकालेगा वह विराट् पुरुषका शत्रु है । सारे मांसाहारी और हिंसक ईश्वरके शत्रु और सदाचारविनाशक हैं वे अवश्य नरकको जायेंगे ।

धर्मोंके इष्टदेव—संसारमें जितने धर्म प्रचलित हैं सबके नियामक ब्रह्मा विष्णु और महेश येही तीन देव हैं । कोई किसी धर्मको क्यों न ग्रहण करे इन तीन देवोंके शासनसे बहिर्गत नहीं होसकता । ईसाईयोंने बड़े परिश्रम और व्ययसे इन तीनों देवोंके औगुणोंको लिखा है उनकी निन्दा करके हिन्दुओंके खिझानेकी किसी युक्तिको भी शेष नहीं रखा है पर उनको यह नहीं मालूम कि उनने कभी इस बातका विचार नहीं किया है कि, आदमका खुदा इन तीनों देवोंसे श्रेष्ठ नहीं था । इबराहीमको जो तीन फिरिश्तः मिले थे वे कौन ? कैसे थे ? वे तीन फिरिश्ते जिन्होंने मुहम्मद साहबका पेट चाक करके शैतानी रक्त निकाला था वे कौन थे ? यदि वे विचार करें तो जान पड़ेगा कि, ब्रह्मादि तीन देवताओंसे भी छोटे थे जितने धर्मवाले हैं सब परस्पर राग द्वेष करके एक दूसरेके इष्टोंकी निन्दा