कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मारके बलपूर्वक ले लूँगा । जब कूर्मजीने निरञ्जनकी ऐसी बातें सुनी तो जान लिया कि, यह अभिमानी और घमंडी काल उत्पन्न हुआ है जो ऐसी अभिमानयुक्त बातें कर रहा है । फिर उन्होंने निरंजनसे कहा कि, तुम यहाँसे चलेजाओ, मैं तुमको कुछ न दूँगा। क्योंकि, सत्यपुरुषकी कोई आज्ञा मुझे नहीं मिली है तुम सत्यपुरुषके पास चले जाओ । कूर्मजीके यह वाक्य सुनके कालपुरुष, जिसका शरीर कूर्मजीके शरीरसे आधा था, अत्यंत क्रुद्ध हुआ । तपके कारण निरञ्जन अति बलिष्ठ होगया था, कूर्मजीको युद्धके निमित्त ललकारा और लड़ाईके लिये प्रस्तुत होगया तथा क्रोधमें बकता झकता कूर्मजीपर आन टूटा । दोनोंमें द्वंद्व युद्ध होने लगा । महाभयंकर युद्ध हुआ । निरंजन वह दाब पेश करने लगा कि, जिसमें वह सृष्टिकी रचनाका समान पाजावे । अन्तमें निरञ्जनने कूर्मजीपर अत्यंत कठिन आक्रमण किया और अपने नखोंद्वारा उनके तीन सौस काट डाले। जब कूर्मजीके तीन सिर कटे तब उनके पेटके भीतरसे रचनाकी समस्त सामग्री बहिर्गत हो गयी । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पञ्चतत्त्व, तीन गुण इत्यादि उनके पेट भण्डारसे बाहर निकल आये । सब चल तथा अचल तारे छिटक गये, पृथ्वी आकाशकी उत्पत्तिकी प्रगट हो गई और रचनाकी कुल सामग्री अव्यक्तसे व्यक्त होगयी ॥
आठवाँ प्रकरण
कूर्मजीका सत्यपुरुषके पास फरियाद करना और निरंजनको दण्ड मिलना
जब निरंजनने कूर्मजीसे ऐसी धृष्टता की, तब कूर्मजीने अपने ध्यानमें सत्यपुरुषकी सेवामें बिनती की और कहा कि, अहो सत्यपुरुष ! निरंजनने मुझसे इस प्रकारकी धृष्टता और बल प्रयोग किया है जिससे मुझे नितान्तही कष्ट पहुँचा है । जब कूर्मजीने इस प्रकार दोहाई दी तब दयालु सत्यपुरुषने ऐसा उत्तर दिया कि, यह काल निरञ्जन बड़ाही घमंडी हुआ है—यदि मैं उसे इसी समय विलोपित कर दूँ तब तो यह जो रचनाका कौतुक है सो सब नष्ट हो जावेगा। कारण यह कि, मेरे समस्त पुत्रोंकी नाल एकही धागेंमें बँधे रहनेके कारण, एकको नष्ट करते ही सब नष्ट हो जावेंगे। और मेरी समस्त रचना भी नष्ट हो जायगी । इस कारण मैं अब इसका नाश तो नहीं करता किन्तु, उसे यह दण्ड देता हूँ कि, भविष्यमें वह अब मेरे दर्शन न पा सकेगा और यह काल एक लाख जीव प्रतिदिवस खावेगा और सवालक्ष उत्पन्न करेगा । इतना सत्यपुरुषने कूर्मजीसे कहा ।
नवों प्रकरण
निरंजनका पुनः तपस्याकर बीजखेत माँगना
अब निरंजनका बूत्तान्त सुनो कि, उसने जो कूर्मजीके तीन शीश काट लिये थे उन तीनों सिरोंको खालिया और फिर शून्यमें जाके फिर एक पगसे खड़ा हो योग समाधि लगाकर भहा कठिन तपस्या करने लगा । इस प्रकार अटल तपस्या करते २ सोलहयुग बीत गये, तब पुनः सत्यपुरुषकी वाणी आयी कि, अब क्या चाहता है ? तब निरंजनने निवेदन किया कि, मुझे अब बीजखेत प्रदान कीजिये—कारण यह कि, बिना बीजखेतके उत्पत्ति नहीं हो सकती—तब सत्यपुरुषने कहा—तथास्तु ।
दसवों प्रकरण
बीजखेत, अर्थात् आदिभवानीकी उत्पत्तिका वर्णन
जब निरंजनने बीजखेतकी प्रार्थना की, तब सत्यपुरुषने एक कन्या प्रकट की । वही आगे अधाके नामसे प्रसिद्ध हुई । यह ऐसी सुन्दरी तथा हावभाववाली प्रकट हुई कि, जिसको देखतेही चित्त चञ्चल हो आसक्त हो जावे—उस मोहिनी मूर्ति तथा मनोहर रूपका बहुत कुछ विवरण स्वसंबेदमें है । जब वह आदि कुमारी उत्पन्न हुई तब सत्यपुरुषने कहा कि प्यारी बेटी ! तू निरंजनके पास जा, तेरे ऊपर सदैव मेरी दया रहेगी । तब वह कन्या निरंजनके पास आयी और जहाँ निरंजन योग समाधि लगाकर बैठा था वहाँ आकर एक पैरसे खड़ी हुई । जब निरंजनकी समाधि खुली तो अपने सामने कन्याको देखकर कहा कि, हे भवानी ! तुझको मेरे निमित्त सत्यपुरुषने उत्पन्न किया है, आओ हम तुम दोनों मिलकर तीनलोक भवसागरकी रचना करें । उस समय निरंजन कामातुर हुआ । तब अध्याने कहा कि हम तुम दोनों भाई बहिन हैं—मेरा तुम्हारा सम्बन्ध उचित नहीं है । तब निरंजनने उसे बहुत कुछ समझाया, परन्तु भवानीने नहीं माना, तब वह अत्यंत क्रोधित होकर अधाको पकड़ अपने मुँहमें रखकर निगलने लगा । निगलने के समय अध्याने सत्यपुरुष ! सत्यपुरुष !! कहकर पुकारा । इतनेमें कालपुरुष भवानीको निगलही गया । अधाको पुकार सुनकर सत्यपुरुषकी आत्से तुरन्त जोगजीतजी प्रकट हुए—और सुरतिके तीरसे कालको मारा, तब उसने उसी समय अधाको अपने मुँहके बाहर डाल दिया । जोगजीतजी उसी समय अन्तर्धान हो
गये और वह कन्या जब कालके मुँहसे बाहर आयी तब अत्यंत भयभीत हुई और कौपने लगी—फिर डरती तथा कौपती निरंजन की आज्ञामें हो गयी, और सत्यपुरुषका ध्यान उसने भुलादिया—कालपुरुषकोही पिता २ कहने लगी और निरञ्जनके साथ रहने लगी ।
ग्यारहवाँ प्रकरण
अद्या-निरंजनका वर्णन
यह आदिकुमारी भवानी कहलाती है और उसके सौन्दर्यका विवरण स्वसंबेदमें बहुत आया है । उसके शक्ति तथा प्रभुताका भी बहुत कुछ विवरण है । यही आदि भवानी तीनों लोककी महारानी है जिसके अधीन ब्रह्मा, विष्णु और शिव और समस्त ऋषिमुनि हैं, यह निरंजनके अधीन है जो कुछ धर्मरायकी आज्ञा होती है उसी कार्यको वह करती है, भयबस कदापि उसकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करती । निरञ्जनके सहवासके कारण उसमें निरञ्जनका समस्त वातें समा गयी हैं और वहभी कालरूप होगयी है यही बीज खेत है जिससे समस्त संसारकी उत्पत्ति होती है, सो महाकाल और महाकाली होगये ।
कुछ दिवसोंके उपरान्त उस कन्यापर रङ्ग रूप चढ़ा और वह युवती हुई, उसके रङ्ग रूपका वृत्तान्त जो ग्रन्थ श्वासगञ्जार तथा दूसरे ग्रन्थोंमें लिखा है, मैं क्या वर्णन करूँ बिजली उसके सामने क्या है ? जिसको स्वयं सत्यपुरुषने अपने शरीर और आप अपने हाथोंसे बनाया है उसके सौन्दर्य और रूप तथा तेजका विवरण क्या होसके । जब वह युवती हुई, तब निरञ्जन तथा अद्याका विवाह हुआ और दोनों प्रसन्नता पूर्वक आनन्दमें रहने लगे । उस सुख विलासका विवरण किससे हो ? जो अद्या तथा निरञ्जन किया करते थे । उस सुख विलास में अनन्त काल बीत गया ; तब निरञ्जनने अद्यासे कहा कि, अबतो मुझको सत्य पुरुषके लोकमें जानेकी कोई आशा नहीं है, मैं यहाँही सत्यपुरुषके समस्त लोकों और द्वीपों इत्यादिकी रचना करूँगा और तुझको भी मैं अपने साथ बल पूर्वक रक्खूँगा और हम और तुम दोनों मिलकर सदैव तीनलोक भवसागरका राज्य करेंगे और सब पर आज्ञा किया करेंगे, यहीं सदा निवास करेंगे, सत्यलोक के जाने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
तपके प्रभावसे यह कालपुरुष अत्यन्त बलिष्ठ होगया और अपने घमण्डके कारण कितनेही दोष किये, कूर्मका तीन शिर काटा तथा अद्याको निगलगया, अक्षरसे समर ठानकर उसको भी मारकर उसकी राजधानीसे भगादिया । इन
दोषोंके कारण वह अब सत्यपुरुषका दर्शन नहीं पाता है। सत्यलोकके सपीप तंक तो वह चला जाता है, परन्तु सत्यपुरुषके सम्मुख वह हो नहीं सकता, सामने जानेकी शक्ति उसमें नहीं है।
जब निरञ्जन तथा अद्या अनन्त कालतक सुख संभोग करते रहे तत्पश्चात् ऐसा हुआ कि, जो निरञ्जन कर्मजीके तीन शिर काटकर खा गया था उन तीनों शिरोंके प्रभावसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए।
बारहवाँ प्रकरण
तीनों देवोंके प्राकट्यका वर्णन
अद्या गर्भवती हुई और उससे तीन पुत्र उत्पन्न हुए। बड़ा बेटा ब्रह्मा था रजोगुणरूप हुआ, दूसरा बेटा विष्णु था जो सत्त्वगुणरूप उत्पन्न हुआ, तीसरा शिव तमोगुणरूप उत्पन्न हुआ। जिस समय यह तीनों पुत्र उत्पन्न हुए, उस समय निरञ्जन शून्यस्वरूप बनकर शून्यमें समा गया और उन पुत्रोंको पितका दर्शन नहीं मिला। उनको इस बातकी तनिक भी सुधि नहीं हुई कि, उनका पिता कौन है? निरञ्जने अद्यासे कह दिया था कि, वह उसका हाल उसके पुत्रोंसे न कहे उनके पूछने परभी वह उन्हें कदापि न बतावे। क्योंकि, वे अनेक उपाय करेंगे तथापि उसका दर्शन न पावेंगे। इस विषयमें अद्याको बारम्बार सचेत करके निरञ्जन शून्यस्वरूप होकर शून्यमें अन्तर्धान हो गया। तीनों पुत्र अपने पितासे पूर्णतया अनभिन्न रहे। तीनों भाई अत्यन्त बलिष्ठ प्रभावशाली तथा सुन्दर हुए। इन तीनों देवताओंकी उत्पत्ति मथुरापुरीमें हुई। जब ये तीनों भाई बडे हुए तथा उन्हें ज्ञान हुआ और अपने पिताको नहीं देखा; तब उन्होंने अपनी मातासे पूछा कि, "जननी! हमारे पिता कहाँ हैं, तथा कौन हैं?" तब अद्याने उत्तर दिया बेटो! मैं ही तुम्हारा पिता हूँ, तथा मैंही तुम्हारी माता हूँ, तुम्हारे तथा मेरे अतिरिक्त और दूसरा कोई नहीं; तुम्हीं मेरे पति हो और मैंही तुम्हारी पत्नी हूँ, मैंही तीनों लोककी रचने वाली हूँ, दूसरा कोई नहीं। ग्रंथ कबीर बीजकके आरंभकी रमनीमें लिखा है :-
तब ब्रह्मा पूछल महतारी। को तोर पुरुष तू काकारि नारी ॥
उत्तर-
तुम हम हम तुम और न कोई। तुमहिं मोर पुरुष हमहिं तोर जोई॥
जब माताने ऐसा उत्तर दिया कि, मैं ही तुम्हारा पिता और मैं ही तुम्हारी माता हूँ, तुम मेरे पति हो और मैंही तुम्हारी पत्नी हूँ। यह बात सुन-
कर तीनों भाई तीनोंअप्रसन्न हुए और विचार किया कि, उनकी माता मिथ्या वचनोंसे उनको बहकाती है, उसकी बातें विश्वास करनेके योग्य नहीं है। इस प्रकार तीनों भाइयोंने उसको मिथ्यावादिनी समझकर मौन धारण करलिया ।
तेरहवाँ प्रकरण
चारों वेदोंके प्राकट्यका वर्णन
जब निरञ्जनजी शून्यमें जाकर शून्य समाधि लगा बैठे तथा अपनी योग समाधिमें आत्मविस्मृति कर गये, तब आपके श्वासके मार्गसे चारों वेद निकल पड़े। निरञ्जनने जो स्वसंवेदसे सूक्ष्म बातोंको चुनकर अपने हृदयमें रक्खाथा और उसमें अपने विचारोंको भी मिला दिया था; सो चारों वेद उनके श्वाससे बाहर निकल पड़े। कबीर साहबने ग्रंथ मुहम्मद बोध तथा स्थान २ पर लिखा है कि; ये चारों वेद स्वसंवेदके त्वचा ज्ञानसे बने हैं। त्वचा अर्थात् चाम त्वचा ज्ञान अर्थात् मोटा ज्ञान निदान ये चारों वेद स्वसंवेदक मोटे (बाहरी) ज्ञानसे बने हैं, इनकी बातें उत्कृष्ट हैं सर्वोत्कृष्ट नहीं इनमें सब मोटी २ बातें हैं, अतिनिर्मल तथा अत्यंत पवित्र बातोंसे नितान्तही अनभिन्न हैं। ये चारों वेद स्वसंवेदसे इस प्रकार निकल पड़े जैसे श्वेत घृत द्वारा काला काजल प्रगट होता है—अथवा जिस प्रकार आकाशसे वृष्टिका जल स्वच्छता तथा पवित्रतासे आता है किन्तु, वह पृथ्वीपर गिरकर उसका रङ्ग ढङ्ग और ही हो जाता है और गँदला तथा अपवित्र बन जाता है, उसके गुण भिन्न २ प्रकारके होते हैं। इसी प्रकार इन चारों वेदोंने काल पुरुषके विचारोंकी संश्लिष्टताके कारण, अपने पिता सूक्ष्म वेदसे निरालाही ढङ्ग धारण कर लिया, तथा अपने पूज्य पिताके ढङ्गोंको छोड दिया। स्वसंवेद पवित्र स्वच्छ, निर्गुण तथा निष्कलंकित है। इसके चारों पुत्र जो अब ऋग्वेद—यजुर्वेद—सामवेद तथा अथर्ववेदके नामसे प्रख्यात हैं—वे निरञ्जनके संसर्गसे दूषित हो गये हैं।
चौदहवाँ प्रकरण ॥ १४ ॥
वेदकी उत्पत्ति प्रथम अक्षरपुरुषसे
कबीर साहबने कहा है (कबीरवाणी इत्यादि ग्रन्थोंमें लिखा है) कि, अक्षर पुरुषके चार अंश हैं, इन चारोंमेंसे एकने जिसका ज्ञान अल्प तथा न्यून था—उसीने यंत्र मंत्र और वेद बनाये। उसी अक्षरपुरुषके इन्हीं चारों अंशोंमें एक अंश निरञ्जन है, अतः इस वेदकी उत्पत्ति पहले अक्षरपुरुषसे है,
पन्दरहवाँ प्रकरण ॥ १५ ॥
वेदके प्रचारका ब्रह्मा
वेद यह निरञ्जनके हृदयसे निलकर, ब्रह्माके हाथमें गया और ब्रह्माद्वारा वह संसारमें आया, इस कारण वेदका प्रचार करनेवाला ब्रह्मा है दूसरा कोई नहीं । ग्रंथ कबीर बीजककी ३४ वीं रमैनीमें लिखा है —
“चार वेद ब्रह्मा निज ठाना । मुक्तिको मर्म उनहुँ नहि जाना” ॥
इसके अतिरिक्त स्वसम्बेदमें लिखा है कि, वेद प्रचारक ब्रह्मा है और कोई नहीं और वेदोंसे भी भली भांति प्रगट है —
ओं ब्रह्मा देवानां प्रथमःसम्बभूव विश्वस्य कर्ताभुवनस्य गोप्ता ॥
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥
अथर्वण वेद मण्डूक उपनिषदकी कथा १
अनुवाद । ब्रह्मा देवताओंमें सबसे पूर्व उत्पन्न हुआ जिसका नाम स्वयम्भू हुआ—वह स्वयंभू अर्थात् संसार रचयिता जिसने पर तथा अपरविद्या, अर्थात् वेदको प्रगट किया—और सबसे प्रथम परमेश्वरका बड़ा बेटा ब्रह्मा उत्पन्न हुआ (अथर्वण वेद मण्डूक्योपनिषद् ।)
“सुभूः स्वयम्भूः प्रथमोऽन्तर्महत्पर्यवे । दधेह गर्भमृत्विगं
यतो जातः प्रजापतिः ॥” यजुर्वेद अध्याय २३ मंत्र ६३ ॥”
अनुवाद — परमेश्वरने सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न किया, इस ब्रह्मासे समस्त संसार तथा वेद उत्पन्न हुए—इसी कारण ब्रह्माका नाम प्रजापति है ।
“प्रजापते न त्वदेता न्यन्यो विश्वारूपाणि परिता बभूव ॥
यत्कामास्ते जुहुमस्तत्रोऽअस्तव्यममुष्य पितासावस्य
पितावय ५ स्यामपतयोरयीणा ५ स्वाहा रुद्र यत्ते क्रिवि परन्नाम
तमिस्त् हुतमस्यमेष्टमसि स्वाहा ॥” यजुर्वेद अध्याय १० मंत्र २०) ॥
हे प्रजापते ! आपसे अन्य और कोई भी, देव इस संपूर्ण विश्वका प्रजा पालनादिकार्य तथा नानाजाताय वर्तमान भूत भविष्यत् कालविषयी गोचर प्राणियोंके सृजन पालन संहार करनेमें समर्थ नहीं है। इस कारण आपही हमारी प्रार्थना पूर्ण करनेमें समर्थ हो, जिस कामनासे आपके निमित्त हम हवन करते हैं वह कामना हमारी पूर्ण हो अर्थात् त्रिकालमें आपके समान कोई नहीं, इस कारण आपही हमारी प्रार्थना पूर्ण करनेमें समर्थ हो। यह इसका पिता, इस स्थलमें पुत्रको
पिता करके नाम ले' यह इसका पिता अर्थात् हमारा पिता पुत्रका आंतरिकभाव है सो चिरस्थायी रहे और हम अपरिमित ऐश्वर्यके स्वामी हों यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो । हे रुद्रदेव ! जो तुम्हारा प्रलयकारी दुष्टनाशक उत्कृष्ट नाम है हे हवि ! उस रुद्रनाममें तुम हुत हो तुम हमारे घरमें आहुत होते हो, इस कारण सब प्रकार हमारे उपकारी हो अर्थात् गृहदाह वज्रपात आदिसे रक्षा करो, यह आहुति भलीप्रकार गृहीत हो ।
इसके अतिरिक्त देखो मनुस्मृतिके पहले अध्यायमें स्पष्टरूपसे लिखा है कि वेद, विद्या, आदि संसारादि सब कुछ पहले ब्रह्माने बनाया ।
अब भली भाँति प्रमाणित हो चुका कि, वेदका प्रगट करनेवाला ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा के अतिरिक्त और कोई ठहर नहीं सकता ।
सोलहवाँ प्रकरण
वेदके सात करोडमंत्र
जब पहले पहल यह जीव अपने स्वरूपसे गिरा-तब सात मार्ग स्थिर हुए. वे ये हैं-१ उत्पत्ति । २ स्थिति । ३ प्रलय । ४ कर्म । ५ उपासना । ६ योग । ७ ज्ञान । प्रत्येक पर एक एक करोडमहामंत्र ठहरे, सो वे ही सात करोड महामंत्र वेद ठहरे । अतः ये वेद सात करोड महामंत्र हैं और इन मंत्रोंमें अतुलनीय बल तथा महा प्रभाव है तथा समस्त संसारकी मर्यादा इन्हीं महामंत्रों द्वारा स्थित है । ये सात करोड महामंत्र जब अपने पिता स्वसंवेदसे निलकर अव्यक्त से व्यक्त हुए, तब उनका स्वरूप तथा कर्म कुछ औरही था । स्वसंवेद जो अपार समुद्र है, उसके एक बूँदके स्वरूपमें प्रगट होकर पृथ्वीपर फैल गया । समस्त संसारका सब कुछ कामधाम कारखाना इन्हीं सात करोड महामंत्रोंपर है और इन्हीं महामंत्रों द्वारा, मनुष्य दाससे स्वामी बन जाता है और यही सात करोड मंत्र समस्त संसारके पथ प्रदर्शक ठहरे ।
सत्रहवाँ प्रकरण
वेदोंका सार
अब मैं इन वेदोंका सार वर्णन करता हूँ कि, ये कैसे और कहाँसे पहले बनाये गये । इन चारों वेदोंका नाम परसमवेद है — और इन्हींको पराकृत वेदभी कहते हैं । स्वसंवेदसे जिस प्रकार यह परमवेद निकले उसका वर्णन सुनो । प्रथम स्वसंवेद
मैं जो कबीर साहबकी कोटवाणी कहलाती है, एक भागका नाम ऋग्वेद है—इससे ऋग्वेद निकला । दूसरी कबीर साहबकी जो टकसार वाणी है उससे यजुर्वेद निकला और इस टकसार वाणीके छायासे यह यजुर्वेद हुआ । तीसरी कबीर साहबकी जो मूल ज्ञानकी वाणी है जो राग और गीतका भाग है, उसका नाम सामवेद है, उसके छायासे सामवेद बना । चौथा कबीर साहबका जो बीजक ज्ञान है—उसके एक भागका नाम अथर्वण वेद है. उसके ढङ्ग पर अथर्वण वेद बना । चारों वेदोंकी उत्पत्ति तथा आरंभ यही है । इस प्रकार स्वयंसंवेदमेंसे यह परसमवेद उत्पन्न हुए ।
अठारहवाँ प्रकरण
चार गुरुओंका वर्णन जो कबीर साहबके चले हैं ।
(ग्रन्थ सुकृति आदिभेदके अनुसार)
(देखो कबीर साहबके ग्रन्थ सुकृत आदिभेदमें लिखा है,) कबीर साहबने संसारके मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करनेके निमित्त अपने चार शिष्य प्रकट किये, सो वे पृथ्वीके चारों दिशामें नियत किये गये । प्रत्येक दिशामें एक शिष्य मानव जातिके गुरु ठहरे । सो वे चारों अपने अंशों सहित पृथ्वीपर प्रगट होकर, समस्त मनुष्यजातिको धर्म सिखलाते हैं तथा दिखलावेंगे । ये चारों गुरु समस्त मनुष्यों को कालपुरुषके हाथसे छोड़ाने वाले हैं और उन्हीं द्वारा तथा उन्हींकी सहायतासे सब मनुष्य परमधामको सिधारते हैं ।
पहिले गुरु-लोकमें सुकृत अंश, कहिये और भवसागरमें गोसाई धर्म-दासजी कहिये, इनके बयालीस वंश हैं. उत्तरकी ओर गुरु ठहराये गये । ऋग्वेद जम्बूद्वीप, भारतखंड, गढ़बांधो नगरमें प्रकट हुए । उनको कोटज्ञानकी वाणी दिया, उस वाणीके अनुसार उन्होंने पन्थ चलाया और सत्यपुरुषकी भक्तिका प्रचार किया ।
दूसरे गुरु-लोकमें अक्षय अंश कहिये और भवसागरमें गोसाई चतुर्भुज-दासजी कहिये । ये अपने वंशों सहित दक्षिणदेशमें प्रकट होंगे और उनका यजुर्वेद है और नगरद्वीप करनाटकमें प्रकट होकर और कबीर साहबकी टकसार वाणी लेकर, अपने धर्मका प्रचार करेंगे और मनुष्योंका मुक्ति करावेंगे ।
तीसरे गुरु-लोकमें जोहङ्ग अंश कहलाते हैं, भवसागरमें राय बंकेजी आपका नाम है और उनके सोलह अंश हैं पूर्वदेशमें सामवेद लेकर दरभंगा नगरमें आप प्रकट होंगे, मूलज्ञानकी वाणी लेकर अपना धर्मोपदेश करेंगे ।
चौथे गुरु-गोसाई सहतेजीजी पृथ्वीपर आपका नाम है, और लोकमें हिरस्सर अंश कहते हैं, उनका अथर्वण वेद है आप पश्चिमदेश शालमल्लीद्वीप और मानपुर नगरमें प्रकट होवेंगे और बीजक ज्ञानके अनुसार उनका पंथ चलेगा।
उन्नीसवाँ प्रकरण
स्वसम्बेदका वर्णन
कबीर साहबने जो अपने इन चार चेलोंको चार वेद दिया और उन लोगोंने उनके अनुसार पन्थ चलाये, सो उन चारों वेदोंकी वह सूत्रत अलग है। ये चारों वेद तो स्वसंबेदके समान स्वच्छ तथा पवित्र हैं और उनके निर्माणकर्त्ता स्वयम् कबीर साहब हैं और दूसरे किसीका विचार उसके साथ संयुक्त नहीं है। इसमें केवल कबीर साहबकी वाणी है। और अन्याय पूर्वोक्त वेद निरञ्जनके विचारोंके साथ मिलगये हैं-अतः वे चारों वेद कबीर धर्मसे पृथक् कर दिये गये, उनका अनुसरण कोई कबीरपंथी नहीं करता है।
बीसवाँ प्रकरण
वेदरक्षक वेदव्यास
चार गुरुओंको चार वेद सत्यगुरुने दिये, वे निष्कलंक तथा पवित्र हैं, उनमें किसी प्रकारका धोखा नहीं और वे चारों वेद निर्मल हैं और जो चारों वेद निरंजन द्वारा मिलौनी करके बने हैं, वेही समस्त संसारमें प्रचलित हैं और उन्हींकी आज्ञा मनुष्य जाति मानती चली आई है।
सांसारिक मनुष्य इन वेदोंकी यथार्थताको न जानकर कालपुरुषके जालमें फँस गये। ये वेद भी तो गुप्त हो चुके थे. कि, उनपर बड़ी २ कठिनाइयाँ पड़ीं और महान २ आपत्तियाँ आयीं तथापि वर्तमान वेदके उद्धारक व्यासजी हुए जिन्होंने स्थान २ से वेद मंत्रोंको एकत्रित करके एक लाख श्रुतियाँ बटोरी, इन एक लाख श्रुतियोंमें अस्सी हजार तो कर्मकाण्डकी श्रुतियाँ हैं और सोलह सहस्र उपासना तथा चार सहस्र ज्ञान काण्डकी हैं। ये लाख श्रुतियाँ हुईं। सो व्यासजीकी कृपासे ये लाख श्रुतियाँ कुछ दिवसोंतक प्रचलित रहीं हिंदुओंके राज्य तथा शासन कालमें इनका प्रचार अधिक था। इन लाख श्लोकोंके घटते २ अब वर्तमान कालमें बहुत थोडे और नाम मात्रको रह गये हैं. वेदोंमें इतनी बाधाएँ पड़ीं कि, जिससे ये विलोपित हो जाते-पर कुछ मंत्र जो अब बचे खुचे हैं उनमें भी पतित मनुष्य
बाधा डालना चाहते हैं—और उनकी व्याख्या दूसरे स्वरूपमें करके संसारको भटकाते और उनको धोखा देकर अंधे कुएँमें डालते हैं।
इक्षीसवों प्रकरण
कबीर साहबकी चार-वाणी और चारों वेदोंका वर्णन।
ग्रन्थोंसे यह प्रमाणित होता है कि, जो कबीर साहबकी कोटज्ञानकी वाणी है, उसका नाम ऋग्वेद है, और टकसारज्ञानकी वाणीका नाम यजुर्वेद है, और मूलज्ञानकी वाणीका नाम सामवेद है तथा बीजक ज्ञानकी वाणीका नाम अथर्वण वेद है। ये चारों वेद अत्यंत स्वच्छ थे पर इनमें निरञ्जनने अपना विचार मिला करके इनको दूषित कर दिया अब जब ये दूषित वेद संसारमें प्रचलित हुए तब स्वसंवेदकी शिक्षा इन चारोंसे पृथक् हो गयी और जो —
चार ज्ञान—
कहे गए उनको ऐसा समझना न चाहिये कि, जैसे कबीर बीजक अब जो एक छोटासा ग्रंथ है—इतनाही समस्त बीजक है—सो बात कदापि नहीं। न मालूम कितना बीजक ज्ञान है उसे चुनकर यह बीजक ग्रंथ कबीर साहबने इस कलियुगके मनुष्योंको दिया है। इसी प्रकार उस सत्यगुरुके ज्ञानोंकी वाणियोंकी कोई सीमा तथा अन्त नहीं। बीजक ज्ञानके समुद्रसे एक बूँद निकालकर हम लोगोंको दिया है, सब ज्ञानोंपर अगणित ग्रंथ हैं, उनकी गणना कौन कर सकता है। जब जिस कालमें मनुष्यमें जैसा सामर्थ्य अधिकार तथा बल देखा वैसा प्रदान किया। निदान इस कलियुगके जीवोंमें इतनेही बलको विशेष माना तथा विशेषकी आवश्यकता नहीं देखा। अब इस—
वेदके विषयमें—
यह निवेदन है कि, वेदके ज्ञातागण अपने मनमें सोचे और समझें और ईर्षा तथा द्वेष छोड़कर विचार करें कि, वेदका पिता ओम् है और ओमकी माता कुण्डलिनी शक्ति है। और यह—
कुण्डलिनी
महा माया जो नाभिके नीचे रहती है सो सोंपकी सूरतकी है और उसके मुँहसे संपर्क फूँफकारके सवृश जो शब्द निकलता है, उसीसे मन जीवन पाता है; सो उसकी बही फूँफकार ओँकार है—यह सोंपिनी जो कुण्डल मारकर बँठी है यही मनकी ताजगी तथा जीवन का कारण है—और यह मनही कालपुरुष निरञ्जन है और इसीको बड़ा ब्रह्मा कहते हैं, सो इस मन अर्थात् ॐ की माता कुण्डलिनी
शक्ति है और कुण्डलिनीका पिता वह है जो अवाङ्मनसगोचर है सो कुण्डलिनी प्रत्यक्ष दिखाई देती है कि, एक सांपिन है और सांपिनका विष वासना अर्थात् प्रत्येक प्रकारकी मानसिक कामनायें हैं—यह विष जिस मनमें समाता है वह मृत्यु को प्राप्त होता है तथा उसका आवागमन कदापि बन्द नहीं होता । जो विष घातक कुण्डलिनीमें है—वही हलाहल प्राणनाशक ॐ में है । ॐ तथा कुण्डलिनी केवल कहनेहीको दो हैं, पर वस्तुतः ये एकही हैं । और जो विष ओम् में है वही वेदोंमें है—सर्पसे विषही उत्पन्न होता है, कभी अमृत नहीं निकलता । यह सिद्धांत है—जब वेदकी उत्पत्ति विषसे है तब फिर वेद विष से पृथक् किसी प्रकार हो नहीं सकता । बीजसे जो वृक्ष उत्पन्न हुआ उसकी जड़, डाली, पत्ते, फल फूल इत्यादिमें वही घातक विष समाया हुआ है । ऐसी अवस्थामें वेद तथा किताबोंकी आज्ञापार चलनेवाले वासनाके विषसे कैसे बच सकते हैं । कुण्डलिनी तथा उसके विषसे जो कुछ उत्पन्न हो सो सब विशैला है । इस कुण्डलिनीने स्त्री और पुरुष होकर समस्त संसारको उत्पन्न किया है । सत्यकवीरने बीजककी रमैनीमें लिखा है —
अन्तरजोत शब्द एक नारी । हरिब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥
तेहि त्रियाभगलिङ्ग अनन्ता । तेउ न जाने आदिउ अन्ता ॥
यहाँ पर सोचना और समझना चाहिये कि, वाणीरूप माया है, वही स्त्री रूप है और इसीसे ब्रह्मा विष्णु शिव और सब कुछ उत्पन्न हुए जिस स्त्रीसे सब कुछ उत्पन्न हुआ, वह विषैली नागिन है और इसी नागिनका विष तीनों लोक तथा वेदोंमें पैठ रहा है । वही विष समस्त जगत्में भरा हुआ है, कोई स्थान खाली नहीं है ।
जिस समय ये चारों वेद धर्मरायकी श्वासके मार्गसे निकल पड़े सब उन्होंने निरञ्जनकी सूरत न देखा था और न जाना और न पहुँचाना कि, अलख निरञ्जन कौसा है, उसकी मूर्ति कौसी है ? पर चारों वेद स्वरूप धारण करके अलख निरञ्जन की स्तुति करने लगे—कि, आप अलख अगोचर हो, आप ज्योतिस्वरूप निरञ्जन हो, आपकी प्रशंसा नहीं की जा सकती, आप सर्वगुण सम्पन्न हो और आप समस्त संसारके स्वामी हो आपकी महिमा तथा श्रेष्ठताको वेद नहीं जान सकते, आप समझ तथा बुद्धिके परे हो इस प्रकार अनन्तकाल पर्यन्त ये चारों वेद निरञ्जनकी स्तुति करते रहे । तदुपरान्त निरञ्जनकी आज्ञा हुई और कहा कि, हे वेदो ! तुम सब जाकर समुद्रमें छिप रहो । तब निरञ्जनकी आज्ञानुसार वे चारों जाकर सागरमें छिप गये ।
बाईसवाँ प्रकरण
वेद तब और अब
सृष्टिकी उत्पत्तिके पूर्व ये चारों वेद प्रगट हुए, उस समय लिखना पढ़ना प्रचलित नहीं था । यह कुछ कहा नहीं जा सकता कि, जब ये वेद प्रगट हुए तब इनका क्या और कैसा स्वरूप था ? कारण यह कि जितने ग्रंथ स्वसम्बेदके इस दासने देखे उनमें केवल इतनाही लिखा, देखा कि, कैलके श्वास से ये चारों वेद उत्पन्न हुए और ज्योतिस्वरूप निरञ्जनकी स्तुति करते रहे । वहाँ पर वेदोंके रूपका कोई विवरण नहीं देखा । ये वेद उत्पत्तिके दिवससे लेकर आज दिन पर्यन्त संसारमें प्रचलित हैं । पर यह संभव नहीं है कि, वेदोंकी वैसीही सूरत रही हो । 'पूर्वकालमें मनुष्यकी स्मरणशक्ति ऐसी प्रबल तथा तीक्ष्ण होती थी कि, एक वेर जो बात गुरुसे चेला सुनलेता था उसी समय उसको कंठस्थ कर लेता था और कदापि भूलता नहीं था और यदि, कहीं किसी शब्द या अक्षरका भ्रम हो तो गुरु अथवा आपसमें पूछ लेता था और शुद्धकरके याद कर लेता था । इन वेदपाठियों को जीवन भरमें वेद भूलता नहीं था और इन वेदोंको लोग जबानी पढ़ा पढ़ाया करते थे । वेदका नाम श्रुति है और संस्कृतमें श्रुति नाम कानका तथा कानसे सुननेका है अर्थात् श्रुति वह है जो सुनी गयी वेद को उत्पत्तिकालके आरंभसे उस समय तक कि, जब तक याद मनुष्योंकी स्मरण शक्तिमें पूर्णतया निर्बलता न आगयी, वे मुखस्थ करते तथा पढ़ते पढ़ाते चले आये । जिनको समस्त वेद कंठस्थ रहता था, वह श्रुतिकेवली अथवा श्रुतिकैवल्यज्ञानी कहलाता था । और वेद द्वारा लोग तीनों कालकी बातोंको जान सकते थे तथा श्रुति केवली सब कुछ बतला सकता था और श्रुतिज्ञान द्वारा कुल बातोंका उत्तर देकर लोगोंको सन्तुष्ट करता था ।
तदुपरान्त क्रमशः मनुष्यकी स्मरण शक्तिमें निर्बलता आतीगयी, और इस बातका भय हुआ कि, स्मरणशक्तिकी निर्बलताके कारण वेद कहीं एकबारही विलोपित न हो जावें । तब वेदव्यासजीने कृपा करके, उनको लिखा और अपने ढंग तथा अपनी विचारानुसार उसको निर्माण करके चार वेदोंके नामसे संसारमें प्रसिद्ध किया । उस समयसे आजपर्यन्त व्यासजीकी कृपासे काम चलता है । जब तक हिन्दुओंका राज्य तथा तब तक वेदोंका बड़ा प्रचार था, पर म्लेच्छों (मुसल मानों) के शासनकालमें इनकी कुछभी मर्यादा नहीं रही और वेदका बड़ा भाग जाता रहा अब बहुत थोड़ा रह गया है । अब जितना बचा खुचा रह गया है उतनेही से कार्य चलता है ।
इसके आरंभ कालसे अर्थात् जब ये वेद कंठस्थ रहते थे, स्मरण शक्तिकी निर्बलतावश उनमें थोड़ी बहुत अशुद्धियाँ रही जाती थीं, तदुपरान्त लिखावटमें भूल तथा त्रुटियाँ होती रहीं । अब वर्तमानकालके मनुष्योंको तनिकभी मालूम नहीं है कि, प्रथम वेद कितना था और अब कितना है । कहीं तो न्यून दृष्टिगोचर होता है तथा लोग जानते हैं कि, वेद इतनाही है । यदि कहीं विशेष प्रगट होजाता है तो लोक कहते हैं कि, वेदका यह भाग छिपा हुआ था अब प्रगट हो गया है । इस प्रकार इस विषयका उचितरूपसे पता नहीं चलता कि, वेद कहाँ २ तथा कितना छिप रहे हैं । पहले ये वेद गद्यमें थे परन्तु अब पद्यमें हो गये हैं । और लेखकोंकी अशुद्धियोंके कारण अब वेदोंकी सूरतमें विभिन्नता आगयी है इन वेदोंमें इनके अत्यंत प्राचीन होनेके कारण अनेक स्थानोंमें गडबड है और अत्यंत गडबड तथा संदेहमय होनेके कारण वेदविज्ञोंको इसकी प्राचीनतामें संदेह होता है और वर्तमानके वेदज्ञ लोग इसको नवीन समझते हैं ।
चीनी तथा योरोपियन लोगोंका विश्वास है कि, वेदको बने केवल ढाई सहस्र वर्ष बीते । किसीका कथन है कि, वेद तीन सहस्र वर्षसे बने हैं, कोई कहता है कि, ये वेद साठे तीन सहस्र वर्षसे आगेके ठहर नहीं सकते हैं । कारण यह कि, ऋषियों तथा इसके लेखकोंने वर्तमान कालके वेदोंमें ऐसी संदेह युक्त वात्ताओंको संयुक्त कर दिया है, जिससे उनकी प्राचीनतामें संदेह होता है । इसके अतिरिक्त लोग कुछ बातें अपनी ओरसे मिलाते और कुछ वेदोंसे निकालते चले आये हैं कि, जिससे वेदके प्राचीनकालमें अनेक शंकायें उपस्थित होती हैं । इसमें बड़ी मिलावट हो गयी और ब्राह्मणों, ऋषियों ने इसको ऐसा अंधकारमें डाला कि, वेद मन्त्र तनिक भी शुद्ध न रहे तथा सम्यकरूपसे अशुद्ध होगये और वेदमंत्रोंका प्रभाव उनमेंसे निकल गया ।
वेद वक्ताओंने बड़ा झगडा मचाया और यथार्थ वेदके विरुद्ध उन नासमझों ने वेदका ऐसा अर्थ लगाया कि, मनुष्य जाति और भी अंधकारमें पड़ गयी, जिससे उनका निकलना, भागना तथा छुटकारा असंभव हो गया । ये वेदपाठीगण जिन्होंने न तो तप किया न स्वसंवेदको देखा, वे क्या जाने कि, वेदका तत्त्व क्या है ? उनकी मूर्खता जिस ओरको खींचती है उसी ओर वे उसका तात्पर्य तथा अर्थ लगाते हैं तथा कुछ मूर्ख उनसे मिलकर उनको इस बात पर और भी उभारते हैं और कहते हैं, कि हां महाराज ! हां स्वामी जी ! जो अर्थ आपने किया वही उचित तथा यथेष्ट है दूसरा अर्थ नहीं, इस कारण इस वेदमें बहुत कुछ इधर उधर हो
गया और वेदके मतलबको सब अपनी अपनी ओर खींचते हैं यह भी मालूम नहीं होता है कि, वर्तमान कालके वेद प्राचीन कालके वेदोंके कौनसे भाग हैं ? और कौनसी शाखासे हैं ? कितने लोग कितनोंको खंडन करते तथा कितनोंको स्वीकार करते हैं । सो यह सब मन मानेकी बात है । जिसका चाहो खंडन करो जिसको चाहो स्वीकार करलो, अपनी इच्छापर बात रही । कोई किसीका स्वामी तथा किसीका कोई अधीन नहीं है । इन वेदोंके अदल बदल जानेके कारण इनके मन्त्रोंमें अब तनिकभी शक्ति नहीं रह गयी है ।
तेईसवाँ प्रकरण
वेदमंत्रोंकी शक्तिका वर्णन ।
पहले वेदके मन्त्रोंमें ऐसा प्रभाव था कि, उनके बलसे लोग देवताओंको अपने पास बुलाते और वेतमंत्र पढ़कर लकड़ी पर पानी छिड़कनेसे आग धधक उठती तथा कुएँका जल ऊपर चढ़ आता था । मोहन, मारण, उच्चचाटन आकर्षण और स्तंभन इत्यादि सब बल वेद मंत्रोंमें थे । ऋषि मुनिगण जब यज्ञ करते थे तो वेदमंत्रों द्वारा सब देवताओंको यज्ञस्थानमें बुलातेथे । इन वेदमंत्रोंका वर्णन मैं क्या करूँ ? इन्हीं द्वारा ऋषि मुनिगण साक्षात् परमेश्वर होनेका दावा करते थे तथा इन्हींकी सहायता द्वारा सब पापोंका नाश करते थे, और राजा इन्द्रको भी अपना चेरा बनातेथे । यदि चार वेदके मंत्र शुद्धतासे किसी को याद हों, तो उसका कौतुक लोगोंको दिखाई दे सकता है ।
वेद मंत्रकी शक्तिपर दृष्टान्त कुन्ती और दुर्वासा ।
एक बार राजा कुन्तके गृहमें दुर्वासा ऋषि पधारे । राजा कुन्तने अपनी पुत्री कुन्तीका उनकी सेवाके निमित्त नियुक्त किया । कुन्तीने दुर्वासाजीकी अत्यंत सेवा तथा सत्कार किया । तब दुर्वासाऋषिका चित्त अत्यंत हर्षित हुआ और उन्होंने कुमारी कुन्तीको एक मंत्र सिखला दिया और समझा दिया कि, जब उसपर कोई विपत्ति उपस्थित हो तब वह उस मंत्र द्वारा जिस देवताको चाहे बुलाले और उनके द्वारा अपना कार्य करालेवे । इतनी बात कहकर दुर्वासाजी तो चले गये और कुमारी कुन्तीने उस मंत्रको कंठस्थ करलिया और जब २ उसको आवश्यकता हुई तब २ सूर्य, धर्म, इन्द्र, पवन, अश्विनीकुमार इत्यादि देवताओंको अपने समीप बुलाकर अपना काम किया ।
जब अश्वमेध गोमेधयज्ञ इत्यादि होतेथे इन्हीं वेदमन्त्रों द्वारा सब देवता यज्ञमें उपस्थित होते थे । अब वे वेद मंत्र कहाँ गये ? हाँ इस समयभी वे मंत्र किसी
ऋषि मुनिके हृदयमें अवश्य होंगे—पर वे ऋषि मुनि कलियुगके मनुष्योंको अब दर्शन नहीं देते। यदि दर्शन देवें तो उनको कोई पहचान नहीं सकता है। वे उन लोगोंको कुछ बतलाते भी नहीं हैं, जो उसके अधिकारी नहीं हैं। वे ऋषि मुनि अबभी पृथ्वी पर हैं कहीं दूर नहीं गये हैं, पर कलियुगके मनुष्य ही उहूँड तथा पापिष्ठी हैं; इस कारण वे उनसे दूर भागते हैं, और अपनेको उन लोगोंपर कदापि प्रगट नहीं करते हैं, यही कारण है कि वर्तमान कालके मनुष्योंसे वे घृणा करते हैं और उनको सुशिक्षित नहीं समझते (मैं यह बात नहीं कह सकता कि, ये प्रचलित वेद—वेद नहीं, अथवा आद्योपान्त अशुद्ध हैं। मेरा कहना केवल यह है कि, इनमें कुछ बातें हैं तथा कुछ नहीं हैं। इस बातके प्रमाणमें एक उदाहरण देता हूँ, और वह यह है—
वेदकी श्रेष्ठतामें दूसरा दृष्टान्त।
“मैंने अपने बाल्यावस्थामें अपने पितासे सुना था कि, राज्य बेतिया में, जो नेपाल राज्यके समीप है, राजाके कुछ मजदूर भूमि खोद रहे थे। जब वे खोदते २ भूभागके विशेष नीचे गये तब उन्हें एक द्वार दिखलायी दिया। उसका समाचार राजाको दिया गया। राजा स्वयम् उस स्थान पर आये और द्वारके खोलनेकी आज्ञा दी। लोगोंने द्वार खोला तो देखाकि, एक कोठरीमें एक मनुष्य आसनमारे बैठा है। उसकी ऊँचाई चौड़ाई मोटाई इतनी अधिक थी कि वह वर्तमान कालका मनुष्य बोध नहीं होता था। उसके शिरके बाल भूमिके चारों ओर चक्रबांधकर छतरीके समान गिरे हुए थे और उसके सामने कपडेसे ढँका हुआ एक कमंडल धरा था। यह दृश्य देखकर राजाको जान पड़ा कि यह कोई ऋषि है, जो अखंड समाधि लगाकर बैठा हुआ है। तब राजाने वेदपाठी पण्डितों को बुलवाया और उनको वेदध्वनि करनेकी आज्ञादी। जब पण्डितोंने वेद पढ़ना आरंभ किया तब, उनकी समाधि खुल गयी और उन्होंने कहा “कौन देदको अशुद्ध पढ़ता है? क्या कलिकाल तो नहीं आ गया कि, वेद अशुद्ध होगये?” तब लोगोंने उत्तर दिया कि, हाँ महाराज! अब कलियुग है इस पर उस ऋषिने कहा कि, यहाँसे गङ्गाजी कितने अन्तर पर हैं। लोगोंने उत्तर दिया कि। साठ कोसके अन्तरपर हैं। फिर उस ऋषिने पूछा कि, गंगा जल कैसा है? लोगोंने कहा कि, जैसे सब जलहैं। तब उसने अपना कमण्डल लोगोंको दिखलाया और कहा कि, जब गंगा इस स्थानपरथी, तबमें ठीक गंगाके किनारे पर बैठाथा और उस समय गंगाजल ऐसा था। इसपर लोगोंने ऋषिजीके कमण्डलका जल देखा, तो वह स्वच्छ दुग्धके भाँति श्वेत था। तब उस ऋषिने कहा कि, अब तुम लोग मेरे पाससे
चले जाओ और मेरे द्वारको पूर्ववत् बूढता पूर्वक बंद करदो, मैं कलियुगके मनुष्योंका दर्शन नहीं करूँगा । तब राजाने आज्ञा दिया कि, इस द्वारको पहलेही की तरह बंदकर दो, तथा कोईभी किसी प्रकारकी बाधा न देवे । यह राजाज्ञा तुरन्तही मानी जाकर कार्यमें परिणत कर दीगयी । इस प्रकार वेदमें बड़ा गडबड हुआ ।
इसी प्रकार जो किताब जितने प्राचीन हैं—उनमें उतनीही गडबडीभी हैं । तौरत तथा इज्जीलमें मुसलमान लोग विशेष गडबड बतलाते—और भली भाँति साबित करते हैं स्वर्गवासी मास्टर रामचन्द्र देहलवी सितारे हिन्दने तथा अन्यान्य पादरियोंने कुरानमें गडबडके बारेमें बहुत कुछ लिखा है और एजाज कुरान नामक पुस्तकमें पूर्वोक्त सितारे हिन्द महोदयने बूढ़ प्रमाणों द्वारा प्रमाणित किया है और सियानतुलइनसान नामक किताबमें हाफिजने इज्जलिके गडबडके बारेमें बहुत कुछ लिखा है । डाक्टर वजीरख़ाँनेभी लिखा है—इन सब किताबोंमें गडबड होते २ उनकी असली अवस्था नहीं रही सबसे गडबड तथा अशुद्धियाँ हैं ।
स्वसंवेदकी शुद्धता ।
पर स्वसंवेदमें यह बात हो नहीं सकती. कारण यह कि, कबीर साहब स्वसंवेदके रचयिता प्रत्येक समय, प्रत्येक काल तथा प्रत्येक स्थानमें उपस्थित रहते हैं । जो कोई किसी प्रकारका परिवर्तन करे, तो उसको काटकर पुनः ग्रंथोंको शुद्ध करके मनुष्य जातिको सत्यपथ पर लगाते हैं । किन्तु और समस्त सम्प्रदायिक ग्रंथोंमें गडबड हुआ करता है ।
चौवीसवाँ प्रकरण
संसारके लौकिक पारलौकिक सब धर्मोंका मूल वेद ।
यद्यपि लौकिक पारलौकिक मर्यादाको बना रखनेके समस्त ज्ञान देनेवाले उपर्युक्त चार वेदही हैं । जो देशकालानुसार किसी न किसी रूपमें सर्वत्र प्रचलित रहकर, संसारकी स्थितिको संभाले रहते है । यही अविनाशी वेद संसारके समस्त ज्ञान विज्ञानके मूल भंडार हैं । संसारके समस्त धर्म और नीति इसीसे निकलते हैं । सदासे सबका यही आधार है, वही संसारका सर्वस्व है । किन्तु संसार के अज्ञानी अल्पज्ञ जीव इस बातको न जाननेके कारण, परस्पर विभिन्नताको देखते और एक एक पक्षको पकड़कर लड़ते झगड़ते रहते हैं । यदि वे यह जान जाते और विचार करके निश्चय करलेते कि, देशकालके अनुसार वेदके एक-एक अंश अथवा फरमानको लेले कर संसारके सर्व धर्म, पंथ मजहब इसीसे निकले हैं तो, वे परस्पर वैमनस्यके शिकार कदापि नहीं होते ।
वास्तवमें वेदका कोई अंश किसीने लिया कोई अंश किसीने; जैसे यज्ञ इत्यादिका अंश ब्राह्मणोंको मिला, जिसके द्वारा वे अश्वमेध गोमेध इत्यादि यज्ञ करते हैं। वेदका दूसरा अंश जैनियोंको मिला जिसके द्वारा वे दया पालते हैं और सब जीवों की रक्षा करते हैं। वेदका तीसरा अंश मीमांसकोंको मिला जिसके द्वारा वे कर्म कांडको ठीक मानते हैं। वेदका चौथा अंश योगियोंको मिला, जिससे वे लोग योग समाधिको ठीक मानकर उसीसे अपनी मुक्ति जानते हैं। वेदका पाँचवाँ अंश वैरागियोंको मिला, जिससे वे ठाकुरकी उपासनामें लगे। छठे अंशको पाकर वेदान्ती एक अद्वैत ब्रह्मसे लगे। सातवें वेदका एक अंश बौद्धोंको मिला जिससे वे बुद्धके धर्मको ठीक मानते हैं। आठवें वेदकाही एक अंश मूसाइयोंको मिला, जिससे वे अपने धर्ममें लगे। नवें वेदकाही एक अंश ईसाइयोंको मिला कि जिससे वे अपने पथ पर हैं। दसवें वेदका एक अंश मोहम्मदियोंको मिला जिससे वे अपने मजहब पर आरूढ़ हुए।
इस प्रकार जितने ग्रंथ किताब, जो वेदके अनुकूल या प्रतिकूल दिखाई देते हैं अथवा जिसको लोग अबतक जानतेभी नहीं, सो सब वेदकेही अनुसार हैं कारण यह कि वेदके मंत्रोंके अर्थ सब अपने २ बुद्धियानुसार करते हैं और उनसे अपना तात्पर्य निकालकर अपना काम करते हैं। सो यह समस्तधर्म वेदके अनुसार हैं। इन्हीं वेदकी सहायतासे सब मनुष्य अपना २ काम करते हैं। किन्तु काल पुरुषने धोखे तथा दुष्टतासे सबको ऐसा भुला रखा है कि, सबके सब घोर निद्रामें अचेत पड़े हुए हैं, वेदमंत्रोंमें ऐसा रहस्य है कि, उनके यथार्थ तात्पर्यको कोई जान नहीं सकता। सब अपने ढङ्ग पर अर्थ लगाते हैं। एक २ अक्षरके सौसी अर्थ हैं भी; जिससे एक २ मंत्रोंके अनेक अर्थ किये जा सकते हैं। इसी कारण कुछ ठीक अर्थ जान नहीं पड़ता। इसी धोखेमें डालकर कालपुरुषने मनुष्योंको अपने जालमें फँसा मारा।
चौवीसवें प्रकरणसे अनुसन्धान
अनुवादकका भ्रमविमोचनी विवेचन।
कबीरमन्शूरका यह चौवीसवाँ प्रकरण अथवा यों कहिये कि, कबीरमन्शूर के पहले भागका यह पहला अध्याय, साधारण पढ़े लिखे कबीरपंथी और अन्य सम्प्रदायवालोंको बहुत खटकता है। उनका कहना है, इसमें वेदकी निन्दा की गयी है; किन्तु उनका यह विचार केवल भ्रममात्र है। यदि वे इसे विचारपूर्वक पढ़ें और ध्यानपूर्वक इसपर सोचें तो, उन्हें ज्ञात होजायगा कि, स्वामी परमा-
नन्दजीने वेदकी कहीं भी निन्दा नहीं की है । उलटा वह वेदको लौकिक पार-लौकिक सुखोंका मार्गदर्शक बतलाते हैं । वेदमंत्रोंकी सिद्धिशक्तिको बड़े जोरोंके साथ प्रामाणित करते हैं । समयके फेरसे वेदोंमें गडबड होनेपर शोक प्रगट करते हैं । संसारके सबसे पुराना धर्मग्रन्थ वेदोंकोही मानते हैं । निराकार निरञ्जन परमात्मा परमेश्वरसे उनका प्राकट्य मानते हैं; इतना करनेपरभी अनसमझ लोग उन्हें वेदनिंदक कहते हैं ।
इसके आगे पीछेके प्रकरणोंको अवलोकन करनेसे पाठकोंको स्वतः ज्ञात हो जायगा । फिर इतना होते हुए भी लोगोंको यह लेख खटकते क्यों हैं ?
इसका उत्तर इसके अतिरिक्त दूसरा क्या हो सकता है कि, प्रथम वेदकी इतनी प्रशंसा करके भी स्वामीपरमानन्दजीका लेख दूसरोंको इसलिये खटकता है कि, स्वामी परमानन्दजी जिस मासिक भूमिकापर बैठकर ग्रन्थ लिख रहे हैं. वह साम्प्रदायिक भूमिका है । आप पक्के कबीरपंथी हैं और जिस प्रकार और पंथवाले साम्प्रदायिक दृष्टिसे अपने मतोंको सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं, उसी प्रकार आपभी अपने पंथ और ग्रन्थोंकी श्रेष्ठता प्रमाणित कर, अपने ग्रन्थोंके पाठकोंकी, कबीर और कबीरपंथकी यथार्थ श्रेष्ठता स्वीकार कराना चाहते हैं । इसलिये जो यथार्थ भी आपके कलमसे निकलता है, वह दूसरे साम्प्रदायिक रंगमें डूबे हुएओंको निन्दासा भासता है । दूसरे जो लोग इसे निन्दा समझते हैं वे भी स्वतः विचार शून्य, सुनी सुनाई बातोंके आधारसे मिथ्या पक्षपात पूर्ण होते हैं । जिन्होंने कभी वेद शास्त्रोंका अवलोकन नहीं किया; बरन अधूरे विद्या और ज्ञानवालोंकी लिखी साम्प्रदायिक पुस्तकोंको पढकर अपना विचार बांध लिया है, जिनमें उदारता और दीर्घ दृष्टिका अभाव और मत मतांतरके मिथ्या विश्वासकाही जमाव है, वे विचारें यदि स्वामी परमानन्दजीके लेखोंपर अविचारी दृष्टि डालकर, उन्हें निन्दक समझ लें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ।
यदि यह ग्रन्थसाम्प्रदायिक ढंगपर न लिखकर साधारण रीति पर लिखा गया होता, तो मेरे विचारसे कभीभी किसीको इसके विषयमें मुँह खोलनेकी हिम्मतही नहीं होती । क्योंकि, वेदके विषयमें स्वामी परमानन्दजीने जो कुछ कबीरमन्शूरमें लिखा है, वह एक प्रकारसे उपनिषद् और गीताके आशयको अपनी भाषामें लिख कर; उसे कबीरपंथी रंगसे रंग दिया है ।
पाठक ! आइये मैं आपको बतलाऊँ कि, किसप्रकारसे स्वामी परमानन्दजीने वेदके विषयमें उपनिषद् और गीताका अनुकरण किया है । पहले स्वामीजीके वाक्योंको देखिये । आप कहते हैं —
“चारों वेद लौकिक पारलौकिक (स्वर्ग आदि) ज्ञानोंके भंडार हैं, इनके उपदेशोंको सुनकर उनके ऊपर चलनेवाला मनुष्य लोकमें सुखी रहता और लोकमें स्वर्गीयोंको सुखोंको पाता है, फिर कर्मके क्षीण होने पर संसारमें जन्म लेता है। यह परसम्बेद अर्थात् संसारकी मर्यादा बना रखने और उसकी बृद्धिका सच्चा कानून है। फिर आप इसी चौवीसवेंही प्रकरणमें लिखते हैं। यही अविनाशी वेद संसारके समस्त ज्ञानके मूल भंडार हैं” इत्यादि। देखो २४ वां प्रकरण पृष्ठ. ४३।
अब मैं आपके सिद्धान्तको उपनिषत् गीताके प्रमाणसे मिलाकर पाठकोंको बतलाता हूँ—
पहले उपनिषत्को लीजिये देखिये वह क्या कहती है—
मुंडक उपनिषत् प्रथम मुंडक.
मंत्र ३ शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिबहुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन् भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥
शब्दार्थ—प्रसिद्ध महागृहस्थ शौनकने विधिपूर्वक अङ्गिराके निकट आकरके प्रश्न किया “हे भगवन् ! किसको जान लेनेसे सर्वका ज्ञान हो जाता है ॥ ३ ॥
विवेचन—शुकने ऋषिके पुत्र शौनकने भारद्वाज ऋषिके शिष्य महर्षि अङ्गिराकी सेवामें विधिपूर्वक अर्थात् भेंटादि लेकर प्राप्त हुआ और समय देखकर उनसे प्रश्न किया कि, हे भगवन् ! वह क्या है ? जिसके जानलेनेसे सब कुछ जानने में आता है।
शौनकके उपर्युक्त प्रश्नको सुनकर अङ्गिरा ऋषिने उत्तर दिया—मुंडक उपनिषत् मुंडक प्रथमका मंत्र ४ ॥—
तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥
उसपर शौनक ऋषि बोले—दो विद्या जानने योग्य है, उसे ब्रह्मविद् ज्ञानी परा और अपरा कहते हैं अर्थात् जब शौनकने प्रश्न किया तब अङ्गिरा ऋषिने कहा—हे शौनक ! ब्रह्म (वेद) के जाननेवाले तत्वदर्शी महात्मा लोग दो प्रकारकी विद्या बतलाते हैं—उनमें एक परा कहलाती है और दूसरी अपरा। उसमेंसे अङ्गिरा ऋषि पहिले अपरा विद्याको बतलाते फिर पराको ॥ ४ ॥
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥
उसमें—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण,
निरुक्त, छन्द और ज्योतिष अपरा विद्या है—और जिसके द्वारा अक्षर (ब्रह्म) की प्राप्ति होती है वह पराविद्या है ॥ ५ ॥
विवेचन—इन दोनों प्रकारकी विद्या बतलाकर अङ्गिराऋषिने शौनकको बतलाया कि—अपने अंगो सहित चारों वेद अपरा अर्थात् इस पार अर्थात् संसारकी विद्या है—इससे अङ्गिराऋषिने साफ २ कहदिया कि, अपने अंगों—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपरा विद्या है, तो उससे निकले हुए अथवा उसके आधारसे बने हुए जितने शास्त्र पोथी और ग्रन्थ संसारमें हैं और होंगे वे सब अपरा विद्याकेही अन्तर्गत हैं और होंगे ।
परा विद्या तो केवल उसी नामका है जिससे अक्षर अर्थात् कभी न नाश होनेवाला जाना जाता है। इसका आशय यह है कि, उपर्युक्त वेदादिकों द्वारा अक्षर अविनाशी वस्तुकी प्राप्ति नहीं होसकती बरन क्षर और नाशमान् जो लोक परलोक आदि रूप संसार है, उसी की प्राप्ति वृद्धि आदि होसकती है । इसीसे इसे अपरा अर्थात् इसपारकी, नीचेकी अथवा प्राकृतिक, मायिक, संसारिकविद्या कहा । संसारमें रहनेवालोंको, सांसारिक उन्नति चाहने और परलोक जो स्वर्गीदि लोक हैं उनकी कामनावालोंको वेदों द्वारा अवश्य लौकिक पारलौकिक सर्व सुखोंकी प्राप्ति होती है । इसमें कोई सन्देह नहीं है । ऐसे इच्छानुसार सर्व सिद्धि देनेवाले वेदों और उनके मूल प्रणव (ओंकार) की प्रशंसा और बड़ाईमें परमानन्दजीने—कबीर भानुप्रकाश, कबीरमन्शूर, कबीरकौमुदी, तालीम कबीरकलियुग आदि सर्व ग्रन्थोंमें, पत्रोंके पत्र, अध्यायोंके अध्याय लिखा है हाँ । जहाँ परा विद्या की बात आती है, उसे आप स्वसम्बेदका नाम देते हैं और इन वेदादिकोंको परसम्बेदका नाम देकर, आप उपनिषत्के समानही साफ शब्दोंमें बतलाते हैं कि पराविद्या (स्वसम्बेद) की प्राप्ति सच्चे सद्गुरुकी कृपा बिना कदापि नहीं हो सकती चाहे कोई कितनाभी वेद शास्त्रादि पारंगत हो जावे किन्तु, सद्गुरुकी कृपा द्वारा स्वसम्बेदको जाने बिना काल (मन) के जालोंसे छुटकारा कदापि नहीं पा सकता ॥
इसी प्रकार उपनिषत्में बहुत स्थानोंमें इस विषयपर प्रकाश डाला गया है अब गीतामें क्या कहते हैं पाठक उसेभी देखलें —
देखो श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय—३
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्दो नित्यसत्त्वस्थो नियोगक्षेम आत्मवान् ॥ ४५ ॥