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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

लोगोंका शेखतकीके पास आना शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न

कभी किसीसे पूर्णरौतिसे निवह नहीं सकता है। केवल एक नामके बदले तीनों लोकमें कोई वस्तु नहीं है जो दी जावे। गुरुही धर्मकी जड़ है जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं। निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।

कंजूसकी कभी मुक्ति नहीं होती। यह बहुत बड़ा शैतान है, जिसके मनमें घुसता है वह जीवित ही मरा जैसा है, यह एक घृणा उत्पादक लत है। इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है, समस्त पीर पैगम्बर सिद्ध साधु इसको बुरा जानत हैं। किसी प्रकारकी वन्दना सेवा मनुष्य करे पर कृपणता एक ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती हैं। कंजूस सिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।

साखी—कामी तो बहुतै तरे, क्रोधी तरे अनन्त।

लोभी जिवडा ना तरे, कहैं कबीर सिधन्त ॥

साधुओंकी सेवा बहुत बड़ी पूजा है, भक्ति मुक्तिकी देनेवाली है। जो कोई साधुओंको भोजन इत्यादि देता तथा आवश्यकताकी वस्तुओंको इकट्ठा कर देता है उसकी सारी कठिनाइयाँ और पाप दूर हो जाते हैं। साधुओंकी कृपासे सारे पदार्थ प्राप्त होते हैं, साधु सारी युक्तियाँ बतलाते तथा सभी शुभ कार्योंको सिखलाते हैं, नरकसे बचाते, खींचकर वैकुण्ठको ले जाते हैं। ज्ञान एवं मुक्तिकी सारी युक्तियाँ समझाते हैं, समस्त भ्रम और धोखेको दूर कर देते हैं, साधु सत्यपदमें लगाते हैं, साधु संसारके सारे पदार्थोंपर आज्ञा करते हैं, साधु समस्त दुःख संतापको हर लेते हैं। साधुके समस्त पातक पृथक् हो जाते हैं। साधु साहब जुदे नहीं। साधु तो अनेक हैं। परन्तु वह साधु, जो समस्त भ्रम तथा धोखेको दूर कर दे, सत्यपदमें लगावे उससे विशेष प्रेम करे। उसीकी वन्दना सेवासे हार्दिक कामना पूर्ण होगी। रोटी कपडा इत्यादि आवश्यकीय वस्तुओंको दे। मान संमान तो समस्त साधुओंका करना चाहिये। वह साधु जो अपने स्वरूपके मिलनेका मार्ग बतलावे, साधु शिरोमणि वही है। साधुओंकी सेवा तथा आज्ञाका पालन सौभाग्यके चिह्न हैं। बड़े बड़भागी हैं जो साधुओंकी संगति करते हैं। साधुओंको भोजन देनेमें बड़ा पुण्य है। जगत्में उसके समान कोई नहीं है। साधुओंको वस्त्र देनेसे समस्त दुःख मिट जाते हैं। जबतक साधुके शरीरपर वस्त्र रहता है, तबतक देनेवालेकी सारी आपत्तियाँ दूर रहती हैं। साधुकी सेवासे समस्त बन्धनोंसे मुक्ति होती है। यदि साधुकी दया न हो तो कोई, मनुष्यताकी गतिको प्राप्त न हो। साधुओंकी दयासे मनुष्यधर्म तथा संसारकी सारी विद्याएं और बुद्धि प्राप्त करता है। बहुतेक साधु ऐसे भी हैं जो सत्यपुरुषकी भक्तिसे भटकाकर कालपुरुषकी भक्तिमें लगा

देते हैं । उनकी शिक्षा और बातोंसे उन्हें पहचान लेना चाहिये । ऐसा न हो कि, उनके धोखेमें आ जावें । ऐसे साधु कालपुरुषके दूत हैं उनसे सावधान रहे । जिस साधुमें अपने गुरुका ज्ञान हो, उस साधुकी शिक्षा मर्यादा तथा सेवा अपने गुरुके समान करे । धोखा धडी देनेवाले साधु, अपनी वार्तालापसे पहचाने जाते हैं ।

सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त समस्त भक्तियाँ जाल तथा बन्धनमें डालनेवाली हैं । कालपुरुषका विष, ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिकसे लेकर सारे जीवोंमें समाया हुवा है । बिना सत्यगुरुकी दयासे कोई सत्यपदसे लग नहीं सकता, सारे शरीर और नक्षत्रोंमें कालपुरुषका जहर छिपा हुवा है । जिसको सत्यगुरु दया करके अपनी ओर खींचे वह आवे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य, जो कि यमके नीचेसे निकल सके । धर्मरायके मन्त्रने समस्त मनुष्योंकी बुद्धिको अन्धी कर रक्खा है । किसीको इस विषयका सोच नहीं कि, मैं जानबूझकर क्यों कुएँमें पडता हूँ । मेरे पुरुषा तो सब इस धोखेमें पडकर मरे, मैं इस अंधकारमय पथपर क्यों चलूँ । इनकी बुद्धि डुबकियों खारही है । इसीसे सत्यको मिथ्या तथा मिथ्याको सत्य मान रही हैं । छुटकारेको बंधन तथा बंधनको छुटकारा समझ रही है, इनकी बुद्धि तथा चित्त ठिकाने नहीं है । इनकी पाशविक बुद्धिमें मनुष्यता लेश मात्रभी नहीं है ।

काम शास्त्र और चार पुस्तकें ये सब कालपुरुषके जाल हैं, उसने इस जाल में फँसाकर सारे मनुष्योंको मार लिया है, उन्हें ऐसा धोखा दिया है कि, जितने नाम सत्य पुरुषके थे वे सब अपने नाम प्रगट किये । सत्यपुरुषके धोखेमें सब मनुष्य कालपुरुषकी वंदना करने लगे, कालपुरुषने सत्यपुरुषका नाम छिपाया, यहांतक कि, यह भेद ब्रह्मा विष्णु और शिवसे भी नहीं कहा, इस धोखेसे सारे मनुष्य इस शिकारीके शिकार हो गए । जो कोई काम शास्त्र तथा चार पुस्तकोंसे पृथक् होगा उसको सूक्ष्म वेदके ज्ञानकी प्राप्ति होगी । जिनका प्रेम पुरुष वेदसे है, वे सूक्ष्म वेदसे कैसे प्रेम कर सकते हैं ?

विष्णुको तीनों लोकोंकी सरदारी तथा अधिकार मिला है । उसीके अधीन सब हैं, निर्गुण निरञ्जन और सगुण विष्णु येही समस्त लोकोंके रचयिता एवं कर्ता धर्ता हैं, विष्णु तीनों लोकोंमें सम्यक् रूपसे उपस्थित रहते हैं । दोनों रूपसे निरञ्जन तीनों लोककी ठकुराई करता है ।

तीनों लोकों और भवसागरका ठेकादार निरञ्जन है । सहस्र असंख्य चौकड़ी युगका उसका ठेका है । इतने समयतक तो बिना पारख गुरुके कोई मुक्ति नहीं पावेगा । जब ठीकाकी सीमा बीत जायगी तब अक्षर पुरुषके राज्यका समय आवेगा । इस राज्यमें समस्त जीवोंके छुटकारेकी आशा होगी ।

प्रथम सूक्ष्मवेद ब्रह्मसृष्टिमें था। जब कालपुरुषने भरमाया, सृष्टिकी रचना की, तब उसमें की सामयिक बातोंको निकालकर पुरुषमवेद बनाया। इस पुरुषम वेद यथामति समस्त सृष्टिको उपदेश दिया। अज्ञानी लोग इस पुरुषमयानी यानी पराकृत वेदको अपने धर्मका पथ और मोक्षकी सीढ़ी समझने लगे। निरञ्जनने अपनी सन्तानको पृथ्वीपर भोजना आरंभ किया। सहस्रों ऋषि मुनि पीर पैगम्बर पृथ्वी पर आए। कालपुरुष निर्गुण तथा सगुणकी भक्ति सिखलाते चले आए। इन ऋषीश्वरोंमें सहस्रोंने अपनी अपनी नई रीति निकाली। वेदकी शिक्षाको कठिन जान दूसरा पथ बताया। बहुभी कालपुरुषके फंदेमें फँसकर मरे। किसीने बिना पारख गुरुके सत्यलोकके पथको नहीं पाया।

जो कोई किसी जीवका रक्तपात करेगा, उसे उसका प्रतिशोध अवश्य देना पड़ेगा। जो कोई किसीको दुःख दे या मांसाहारी हो वह भी निश्चयही दुख पावेगा। अपना मांस उसको खिलावेगा। किसीका प्रतिशोध कोई कदापि नहीं छोड़ेगा।

मांसाहारी और शराबीभी मुक्ति नहीं पासकेंगे। जो पुरुष मुक्तिके इच्छुक हैं, उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ तथा पवित्र रहना चाहिए।

गृहस्थके लिये अपनी स्त्रीके, छोड़ दूसरी स्त्रियोंके साथ संभोग करना महापाप है। साधुके निमित्त विवाहिता अथवा बिन विवाही किसीसे भी संभोग न करना चाहिये।

गुरुकी आज्ञाको न माननेके समान मनुष्यके दूसरा कोई महापाप नहीं है।

सत्यगुरुकी शरण सब जीवोंके लिये सुखदायी है। उसीके शरणमें समस्त पातक क्षमा होंगे। इस कलियुगमें गुरुके प्रति पूरा कर्तव्य पालन कौन कर सकता है। परन्तु सत्यपुरुषको अपने शरणकी लज्जा है। उसकी शरण आकर धर्मपर स्थिर रहो। जो धर्मविमुख हुआ वह निर्दयी तथा घातक शैतानके जालमें फँस ही गया। सत्यगुरुके शरणपर पूरा निर्भर रहे और यह समझे कि, सत्यगुरु मेरे अपराधोंको क्षमा करेंगे। मेरी ओर नहीं बरन् अपनी दयाकी ओर दृष्टिपात करेंगे क्योंकि, उसका नाम पतितपावन है।

घमंडी तथा द्वेषीको कदापि सत्यपुरुषकी भक्ति नहीं होती।

जो मनुष्य बड़ाई और उच्चश्रेणी पाकर नम्र होगा, अपना शीश नवा दिया, धन पाकर दान तथा साधुसेवाको ग्रहण किया, उनके निमित्त भक्ति मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।

वह मनुष्य जिसने ऐसा ध्यान किया कि, तुच्छ तथा सेवक हूँ। जितनी

मूर्तियों हैं, सब मेरे सत्यगुरुकी हैं । सब जीवोंमें गुरुकी कान्ति जाने तो वो मुक्ति का अधिकारी है ।

मैं अपने कार्योंका अधिकारी नहीं यही नहीं किन्तु, सत्यगुरुसे सहायता माँगता रहे कि, वह मेरी मनकामना पूर्ण करे । भले कार्योंमें सदैव उद्योग करता रहे ।

मैं नहीं जानता कि, मैं क्या हूँ मेरा परमेश्वर क्या है । इस कारण सत्यगुरु पर पूर्णतया निर्भर रहे कि, वह जब मुझको दृष्टिप्रदान करेगा, तब मैं जानूँगा ।

कालपुरुषके जितने धर्म, पृथ्वीपर प्रचलित हैं, सबमें वैष्णव धर्म श्रेष्ठ एवं सबका सरदार है । यह सतोगुणी धर्म है । इस धर्मके नियम तथा आज्ञाएँ सत्यपथकी सीढी है । सत्यपथ परम धामकी सोपान है ।

सत्यगुरु कबीरका नाम बंदीछोर है । वह सर्वाधिकारी है जिसको चाहे मुक्ति प्रदान करे । जिसको इस बातका पूर्णतया विश्वास होगया उसीका बेडा पार होगया समझो ।

सत्यपुरुष और कबीर साहबको जिसने एक जान लिया उसका बंधन टूट गया, वो कालके पञ्जेसे छूट गया । तन मन धन गुरुके अर्पण करना तो भलाईका सार है, परन्तु अपनी कमाईका दशवाँ भाग गुरुका हक है बुद्धिमान् पुरुष मुक्तिका भागी होता है ।

जो कोई मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त करने योग्य हो, उसीमें बुद्धि होती है । निर्बुद्धि सुन्दर मनुष्यभी पशु हैं । उनमें बुद्धि नहीं होती ।

पारख गुरु प्रत्येक स्थानपर उपस्थित है । परन्तु जबतक उसके पथमें अपने को मैं न्योछावर न करूँ तबतक उसका दर्शन न हो सकेगा ।

सब झूठे झूठोंके साथ मिलते हैं । जो कोई सत्य प्रेमी होगा वह झूठेके साथ कभी योग नहीं देगा ।

ये तीनों लोक विषवृक्षके ही फल हैं । प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक खान, तथा प्रत्येक मकानमें विष भरा हुवा है । विना सत्यगुरुकी भक्तिके वह नसोंसे बाहिर नहीं होता ! न किसी अन्य युक्तिसे वो पृथक् हो सकता है ।

जान बूझकर विष खाना मनुष्यता नहीं है । आप सत्य पुरुषकी भक्ति करे और दूसरोंसे करावे और करते हुआओंको देखकर प्रसन्न हो यही वंदना है ।

प्रत्येक मनुष्य विना जाने बूझे अपने २ धर्मकी ओर खींचता हुआ द्वेष करता है । परन्तु मनुष्य वही है जो कि, द्वेष रहित होकर वह धर्म ढूँढ़े, जिससे कि, उसके आवागमनका मार्ग एक बारगीही बंद होजाय ।

शेखतकीके कबीरजीपर जुल्म कबीर साहिबकी शाहसिकन्दरने नम्रता पूर्वक बन्दना की

मनुष्यके चार चक्षु हैं; परन्तु पशु चारों चक्षुओंसे अन्धे हैं। यद्यपि उनकी आंखें प्रत्यक्षमें खुली हुई हैं, तो भी वे अन्धे माने जाते हैं। इस कारण कि, वे देख कर भी घातक मार्गसे नहीं टलते। इस कारण वस्तुतः वे मनुष्यके स्वरूपमें पशु ही हैं।

पशुओंको मानवी शिक्षा अच्छी नहीं लगती। जैसे कि, चोर, डाकू, व्यभिचारी इत्यादि सत्संग तथा सत्यपथसे भागते हैं।

सत्यपुरुषके जो अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरुकी शिक्षा सुनकर ऐसे दौडकर मिलते हैं, जैसे कि लोहेसे चुम्बक चिपट जाता है और जो काल पुरुषके जीव हैं उनपर सत्यपथ की शिक्षाका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता हैं।

दान, वीरता, न्याय और धर्म इन चारों गुणोंकी शिक्षा सब लोग करते हैं। परन्तु सत्यगुरुके साथ नहीं करते इस कारण उनकी कामना पूर्ण नहीं होती।

यह कलियुग अत्यन्त कठिन समय है। इसमें मनुष्योंकी रूचि पापकी ओर तो तुरंत ही है। पुण्य से दूर भागती है ऐसी अवस्थामें सत्यगुरुके शरण बिना दूसरा कोई उपाय नहीं है।

हलालके भोजनसे हृदयकी पवित्रता होती है।

जो कोई न्यायी बादशाहके सामने पाप करेगा और अत्याचारपर कमर बांधेगा तो उसका सत्यानाश अवश्य होगा। ऐसेही जो कोई कबीरपंथमें प्रविष्ट होकर पापकी ओर चित्त लगावेगा तो उसकी दशा बड़ी दीन होगी।

जिसकी सच्ची श्रद्धा अपने गुरुपर है, उसकी बुद्धिपर पिशाचीबल काम नहीं करता, उसकी बुद्धि बदल नहीं सकती, न काल किसी प्रकारकी बाधा ही उपस्थित कर सकता है।

जो कोई अपने गुरुसे सच्ची प्रीति करेगा, उसका विश्वास अचल रहेगा, उसकी बुद्धि स्वच्छ रहेगी। बिना गुरुके मनुष्यके हाथका जलपान तक करना उचित नहीं है।

कबीरसाहबकी रेखता ।

खलक हैं रैनका सपना । समझ दिल कोई नहीं अपना ॥
कहीं है लोभकी धारा । बहा जग जात है सारा ॥
घड़ा ज्यों नीरका फूटा । पतर जैसे डारसे टूटा ॥
ऐसी निर्जनि जिदगानी । अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥
सजन परवारा सतदारा । सभी उस रोज हों न्यारा ॥
निकल जब प्राण जावेंगे । कोई नहिं काम आवेंगे ॥

कबीरजीरके भंडारेकी कथा

निरख मतभूल तन गौरा । जगतमें जीवना थोरा ॥
तजो पर लोभ चतुराइ । रहो निस्सैंग जगमाहीं ॥
सदा जिन जान यह देही । लगाओ सत नामसे नेही ॥
कटे यम कालकी फाँसी । कहें कब्बीर अबिनासी ॥

यथा—साईकी यादमें रहना, नहीं यह जिन्द जावेगा ॥

करो उस पीव की बंदगी, तुझे यारां लखाऊंगा ।
बना है खाकका खेला, इसीमें खोज पावेगा ।
मुझ मुरशिद महर मनशाल, गो दीदार पाया है ॥
मुझीको देखले परगट, किसीसे ना छिपाया है ।
कबीरा पीर है साचा, सकलमें आप छाया है ॥

यथा—समझ दिल सोच अबकीना । मुरशिदसे पूछ नालीना ॥
कहांसे रङ्ग ये आया । न काहूँ मोहि ब्रतलाया ॥
सुरत वहि रङ्गकी प्यासी । पवरा भए हैं बनवासी ॥
न आवे हाथ वह करनी । सिधारो जाय गुरु शरनी ॥
मुझे मुरशिद मेहर करके । मुरीदी मन सिखाया है ॥
किताबें खोल दिल अन्दर । हकीकत निज बताया है ॥
कि है कोई गैबका वासी । दिखावे खेल परकासी ॥
बसावै गैबका खोरा । मिटावे भर्मका फेरा ॥
अचम्पौ देश है न्यारा । लखे कोई नामका प्यारा ॥
दिया जिन प्रेमका प्याला । सोई हैं सन्त मतवाला ॥
कि निशि दिन मोहना भूले । विरहकी झोंकमें झूले ॥
चरण कबीरको ध्यावे । इलाही ज्ञान भर पावे ॥

इतना तो मैंने सूक्ष्मवेदकी शिक्षाका निचोड़ लिख दिया है जिसमें कि, सांसारिक मनुष्योंको मालूम हो कि, सूक्ष्मवेद किसे कहते हैं ? उसमें किस प्रकार की बातें हैं ? पाठकगणोंको इस पाठसे भली भांति ज्ञान होजायगा कि, सूक्ष्म वेद किसे कहते हैं । उसमें किस प्रकारकी बातें हैं ? इस सूक्ष्म वेदकी प्रशंसा कबीर साहबने की है । सहस्रों स्थानोंपर बराबर कबीर साहब कहते जाते हैं कि, एक मनुष्य ! सूक्ष्मवेदके पाठ बिना किसीको भी अपने स्वरूपका ज्ञान न होगा । इस कारण काम शास्त्र तथा उसकी पुस्तकोंको छोड़कर सूक्ष्मवेद पढो :-

सत्यकबीर वचन ।

हैली तीरथ जाय बुलाए रे हरदम परबे नहाए ।

तीरथ कोटि अनन्त है रे गङ्ग यमुन जहाँ दुई ॥
मध्य सरस्वती बहत है रे नहाय निर्मल होवे ।
ब्रह्म अगिनके घाटमें रे आगे शिवके लिङ्ग ॥
ताहूँपे दछिना दीजिए रे बहुत सहसमुख गङ्ग ।
आगे कलालीकी हाट हरे चोखा फूल चुनन्त ॥
विन सद्गुरु पावे नहीं रे कोई साधू जन पीवन्त ।
शीश उतार धरणी धरे रे ऊपर धरले पाए ॥
ब्रह्म अगिनके घाटपे रे इस विधिपर वेनहाए ।
ऋग् यजुर साम अर्थवनां रे चारों वेदका ज्ञान ॥
उनके वहाँ कहो कौन गति रे बाँधे गॉठ अघान ।
चारों वेदको पिता हैं रे सूक्ष्म वेद सङ्गीत ॥
साहब कवीर जूक मुकद्दमे रे अविर्त ब्रह्म अतीत ।

यथा—पण्डित सतपद भजो रे भाई जाते आवागमन नशाई ॥
ज्ञान न उपजा ब्रह्म नहि चीना आप कहाँते आए ॥
एक योनिसे चार वरन भए ब्रह्मदेव कहाँ पाए ॥
बारह वेदी ब्रह्म बखानूँ स्वर ओ शक्ति समानी ।
संध्या तर्पन तहाँ करलीना जहाँ कुशा नहि पानी ॥
ऋग् यजुरज्ञानको बुद्धी साम अर्थवन सोई ।
सूक्ष्म वेदको भेद न जाने क्योकर ब्रह्मन् होई ॥
शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर भिन्न भेद कछु नाहीं ।
लख चौरासी जिया जन्तुमें बरत रहो सब ठाई ॥
नौगुण सूत सँयोग बखानूँ निरगुण गॉठ दयानी ।
तासु जनेउ कबहुँ ना टूटे दिन दिन बारह बानी ॥
कहैं कबीर गुरुब्रह्म चीन्हले जगत् जनेऊ सोई ।
पाखैंडकी गति सबहि मिटावे तब निज ब्राह्मण होई ॥

यथा—हिरवा गँवाए सास चलीं वारी धनियां ।
कौन सौतिन है कौन सुमन है कौन वेद तुम जानियाँ ॥
कौन पुरुषको ध्यान धरत हो कौन है नाम निशानियाँ ।
एही तनु ओंकार सुमन है सूक्ष्म वेद हम जानियाँ ॥
सत्य पुरुष तो ध्यान धरत हैं सत्य है नाम निशानियाँ ।

यह मत जानो हिरवा जरवा बनियाँ दूकान बिकानियाँ ॥

अलख मूलक हिरवा मोरा अगम देशते अनियाँ ।

एक है चोर सकल जगमोसे राजा रैयत रनियाँ ।

कहैं कबीर सुनो भाइ साधो अलख है नाम निशनियाँ ॥

ऋषीश्वरोंके बचन ।

रामचन्द्रका प्रश्न-ज्ञानीके सारे कार्य अज्ञानियोंके समान होते हैं । ज्ञानी किस प्रकार पहचाना जावे ? वसिष्ठ मुनिका उत्तर-हे रामचंद्र ! एक सूक्ष्मवेद है दूसरा एक पुरुषमवेद है । सूक्ष्मके द्वारा आप अपने स्वरूपको जान सकता है । दूसरी युक्तिसे नहीं जान सकता । पुरुषम वेदका चिह्न यह है कि, तप, यज्ञ, व्रत इत्यादि करे । ज्ञानीजीका चिह्न सूक्ष्म वेद है । यह वसिष्ठपुराण निर्वाण प्रकरण पूर्वाध भाग एक सौ दो सर्गमें लिखा है ।

फिर उसी ग्रंथके दो सौ उन्तीस सर्गमें लिखा है कि, हे रामचन्द्र ! जैसे सर्पके बिलको सर्पही जानता है ऐसेही ज्ञानीका चिह्न सूक्ष्म वेद है । उसी निर्वाण प्रकरणके एक सौ ग्यारहवें सर्गमें लिखा है कि, ज्ञानका लक्षण सूक्ष्म वेद है पुरुषमवेद नहीं है ।

फिर इसी ग्रंथके मुमुक्षु प्रकरणके चौथे सर्गमें लिखा है कि, हे रामचन्द्र ! जीवन्मुक्तिसे विदेहमुक्तिका भेद प्रत्यक्ष है । परन्तु तुझको मालूम नहीं हो सकता । ज्ञानीको निमित्ता नहीं है । ज्ञानीका लक्षण सूक्ष्मवेद है । मुनिजीकी विचारमाला देखो । सन्तोंकी श्रेष्ठता सूक्ष्मवेदसे भी परे है ।

इस प्रकार समस्त ऋषि मुनि और सिद्ध साधु बराबर सूक्ष्मवेदकी ही प्रशंसा करते चले आते हैं । अब मैं इसी विषयपर शिवतंत्रका प्रमाण देता हूँ ।

शिवतंत्रका प्रमाण ।

मम पञ्चमुखेभ्यश्च पंचाम्नाया विनिर्गताः पूर्वश्च पश्चिमश्चैव दक्षि-

णश्चोत्तरस्तथा ॥ उर्द्धाम्नायाश्च पंचैते मोक्षमार्गाः प्रकीर्तिताः ॥

आम्नाया बहवः सन्ति ऊर्द्धाम्नायात् नोत्तमः ।

अनुवाद-ब्रह्मा कहता है कि, मेरे पाँच मुँहसे पाँच वेद निकले । पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण और ऊपरके । उन पाँचोंने मुक्तिमार्ग दिखलाया । वेद तो अनेक हैं पर ऊपरके मुँहवाले वेदके समान और दूसरा कोई नहीं है ।

अब चारों वेदको तो अनेक मनुष्य पढ़ते हैं परन्तु सूक्ष्म वेदका पढ़ने वाला कोई विरलाही पुरुष होगा । क्योंकि, अन्य शास्त्रोंकी शिक्षासे मनुष्य काम क्रोधादि के प्रपञ्चोंसे निवृत्त हो नहीं सकता । परन्तु सूक्ष्मवेदका पाठ सब कामनाओं तथा

लक्ष्मीजीका कबीर साहिबको लुभानेकी इच्छासे आना और विफल मनो- रथ होकर लौट जाना सत्यलोक

काम क्रोधादिके झगड़ोंसे पृथक् कर देता है। सत्यगुरुके मिलनेका मार्ग बतलाकर अपने प्राकृतिकसे मिला देता है। चार वेद प्राकृतिक वेद कहलाते हैं। ये चारों विशेषता सांसारिक मनुष्योंके निमित्त ठहराए गए हैं। मुक्तिके अधिकारियोंके एतद्द्वारा सूक्ष्म वेदमात्र है। सूक्ष्म वेदकी शिक्षामें किसी प्रकारका अवगुण अथवा त्रुटि नहीं है वह निर्दोष तथा अवगुण रहित है दूसरेमें नहीं। यदि वेदों और पुस्तकों द्वारा किसीकी मुक्ति होजाती तो मुक्तिके अधिकारियोंके लिये सूक्ष्म वेद पृथक् न ठहराया जाता।

अध्याय ७.

विष्णु भगवान्।

कालपुरुष तीनों लोकोंरूपी भवसागरकी रचना किये; पीछे उसने अपनी स्त्री आद्या और अपने तीनों पुत्रोंको तीनों लोकोंके प्रबंधका अधिकार तथा दूसरे कार्योंके लिये नियुक्त कर दिया, इन तीनोंमें विष्णुको उच्चश्रेणीका अधिकारी नियत किया, सबसे श्रेष्ठता दी। माता-पिता दोनोंने विष्णुको आशीर्वाद दिया, श्रेष्ठता प्रदान का। विष्णुको अपने स्थानपर तीनों लोकोंका कर्ता-धर्ता नियत किया। निरञ्जन तथा आद्याने अपना प्रभाव तथा बल विष्णुमें भर दिया। जैसा कि, मैं प्रथम परिच्छेदमें लिख आया हूँ। विष्णुकी माता अपने पुत्रपर अत्यंत प्रसन्न हुई। इस कारण विष्णु इस भवसागरके कर्ता-धर्ता ठहरे। जैसे कि, चक्रवर्तीराजा समस्त देशोंके राजोंपर राज्य करता है, इसी प्रकार विष्णु तीनों लोकोंके चक्रवर्ती हुए। आपको सब स्थानोंकी उपस्थिति तथा प्रकट गुप्तका बल प्रदान किया गया। ये प्रत्येक हृदयका भेद जानने लगे। प्रगट मनुष्यके पाप पुण्यका प्रतिशोध करना यमके अधिकारमें हुवा। प्रत्येकका भाग्य नक्षत्र विष्णुके अधिकार में हुवा। नरक बैकुण्ठ तथा उसके चारों ओर विष्णुका अधिकार फैला। चार खान चौरासी लक्ष योनिके जीव विष्णुके अधिकारमें ठहरे। इन तीनों लोकका रचयिता और सन्नाट है जब जैसा चाहता है बँसा करता है समस्त अधिकार इत्यादि उसको मिला है। तीनों लोकोंका रचयिता तथा परमेश्वर यह कहलाता है। इसी परमेश्वरका पूजन तीनों लोकोंमें हो रहा है। ब्रह्मा और शिव ये दोनों उसके मंत्री हैं। यह बादशाह है। यह स्वशरीर परमेश्वर है समस्त पृथ्वी तथा आकाशके मनुष्य उसकी पूजा करते हैं। इसी परमेश्वरकी आज्ञा सभी स्थानोंमें प्रचलित है। जहाँ मनुष्योंपर कठिनाई उपस्थित होती है तो उसके निवारणार्थ इस परमेश्वरका

दश सोहंगका हाल

पधारना हुवा करता है। अनेक बार तो वे स्वतः गरुड पर आरूढ़ होकर दौड़ते हैं, तुरंत उस स्थान पर पहुँच जाते हैं। सामर्थ्यभर उस विपत्तिको दूर करते हैं, कभी २ वह जन्म लेता है। जैसे राम कृष्णके अवतार धरकर दैत्योंको मारता है। जब दैत्य बलिष्ठ होते हैं तब विष्णु देवताओंकी सैन्य लेकर इनके साथ समर करता है। सामर्थ्यभर उनको मारकर भगा देता है। मर्यादा वश पराजित होता है तो स्वयम् भाग जाता है। यही विष्णु महाराज सारे संसारको आजाएँ देते हैं। सांसारिक तथा धार्मिक ऋषीश्वरोंको समस्त मर्म सिखलाते हैं। ऋषीश्वर राजाओंको बतलाते हैं, राजालोग अपनी समस्त प्रजामें वही नियम प्रचलित करते हैं, वेद पुराण सभी इसी विष्णुको जगत्का कर्ता-धर्ता मानकर, परमेश्वर कहके प्रशंसा किया करते हैं। ब्रह्मा शिव इन्द्र इत्यादि देवता सब ऋषीश्वर इसी विष्णुके प्रभुत्वकी ओर समस्त भविष्यवक्तागण इत्यादि इसी परमेश्वरकी साक्षी देते हैं। आदम, नूर, इबराहीम, इसहाक, याकूब, मूसा, ईसा और मुम्मद इत्यादि इसी परमेश्वरकी प्रशंसा करते आए हैं। सबके पथ-प्रदर्शक येही विष्णु महाराज हैं। निर्गुण तथा सगुण दोनों रूप आपहीके हैं। सबके सब इसी दिव्यदेह ईश्वरकी वन्दना बराबर करते आते हैं। समस्त धर्मोंके रचयिता येही विष्णु महाराज हैं। शिवके धर्म पृथक् हैं। और वे भी विष्णुकी परामर्शक साथ हैं और कर्मकाण्ड तथा मीमांसा सब ब्रह्माकी ओरसे हैं। परन्तु वह सब विष्णुकी कामनाके साथ हैं। इस जगत्की समस्त कलें विष्णुके हाथमें हैं। विष्णुहीको अधिकार मिला है।

आद्या और निञ्जनके पुत्र विष्णुमहाराज तीनों लोकोंके ठाकुर एवम् अपने माता पिताकी प्रतिमूर्ति हैं। येही चक्रवर्ती महाराज एवं भवसागरके प्रबन्धक हैं, अत्यन्त बलिष्ठ तथा प्रभावशाली हैं, वैरियोंके दमन करनेके निमित्त सदैव अस्त्र शस्त्रसे सुसज्जित रहते हैं, आपका शाङ्गधनुष और खड्ग नन्दक है, गदा कौमोदकी तथा चक्र सुदर्शन हाथमें है। ये शस्त्र ऐसे भयानक हैं कि इनके अवलोकनसे ही भयके मारे दुष्टोंका प्राणान्त हो जाता है। ऐसाही चक्र सुदर्शन है कि, जिधरको छूटे उधर भस्म करदे। ऐसाही गदा कौमोदकी और नन्दक अस्त्र है कि, जिसको देखतेही वैरोंके प्राण निकल जाएँ। यह नीलवर्ण घनश्याम (मूसाका आसमानी रङ्गका खुदा) समस्त मनुष्योंपर कृपादृष्टि रखता है, अत्याचारियोंको धूलमें मिला देता है, जिनपर अत्याचार किया गया है उनको सत्व देता है। जब कभी दैत्यों और राक्षसोंकी लड़ाईमें वरदान आदिके कारण कठिनाता पड़ती है तब आपकी माता आदिश्वानी सहायता

करती है, जो कठिनाई आद्यासेभी न टले उसके निमित्त निरञ्जनकी ओरसे आज़ा होती है। जो निरञ्जनके भी बशसे परे हैं वह सत्यपुरुषके कृपाकटाक्षसे ठीक हो जाती है। जब सत्यपुरुषकी दया होती है तब समस्त कठिनाइयों निवृत्त हो जाती हैं, जैसे जगन्नाथके मन्दिर स्थिर रखनेमें इस कठिनाईको निवृत्त करना निरञ्जनके बशकी बात नहीं थी। तथा स्वयम् सत्य पुरुषने मन्दिर खड़ा किया। समुद्रको हटा दिया जब समस्त देवता तथा ऋषि मुनि इत्यादि दैत्यों और राक्षसोंसे सताये जाते हैं और दुःख पाते हैं तब समस्त देवता मिलकर ब्रह्माके पास जाते उस समय विष्णु, ब्रह्मा, शिव इन्द्रादिक देवताओंको अपने साथ लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करके उनका विनाश करते हैं, देवताओंको सुख देते हैं। सुतरां यही परमेश्वर सबका प्रतिपालक और तीनों लोकोंका प्रबन्धकर्ता है। संसारकी रक्षा करनेमें यह अपनी सारी शक्तियोंका उपयोग करता है।

शेर—यह नीर वरन घन यही बनाजो अदा।

यह खुदा है यह खुदा है यह खुदा है खुदा ॥

सुर मुनि जिसे गाते हैं कहे वेद बदीय।

यह सदा है यह सदा है यह सदा है पर सदा ॥

यही सगुण यही निर्गुण यही बेचूँ वचरा।

यह नदा है यह नदा है यह नदा है यह नदा ॥

है यह हमः मौजूद व हाज़िर नाज़िर।

न जुदा है न जुदा है न जुदा है न जुदा ॥

यही रज्जाक व कज्जाक है आयन्दः व हाल।

यह बदा है यह बदा है यह बदा है यह बदा ॥

पहचान अलग उससे हो उसपर आजिज।

यह फ़िदा है यह फ़िदा है यह फ़िदा है यह फ़िदा ॥

यह विष्णु अपने सूक्ष्म शरीरसे तो प्रत्येक वस्तुमें उपस्थित है और चारों खानके जीवोंमें घुस रहा है। ऐसेही ब्रह्मा शिव शक्ति तथा निरञ्जनको भी मानना चाहिए। जो कुछ समस्त ब्रह्माण्डमें दिखाई देता है, वह कुछ अपने शरीरमें जानना चाहिए। यह कबीर साहबका वचन है कि, विष्णु चारों खानेके जीवोंमें पूर्ण हो रहा है। विष्णुविहीन कोई स्थान नहीं है। इसीके अनुसार वह श्लोक पढ़ो कि—

जले विष्णुः स्थले विष्णुविष्णुः पर्वतमस्तके।

ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत्।

धर्म प्रचलित करनेकी कथा

अनुवाद—जलमें विष्णु, स्थलमें विष्णु, पर्वतकी चोटीपर विष्णु, अग्नि इत्यादिमें विष्णु है । इस तरह समस्त जगत् विष्णुसे पूर्ण हो रहा है ।

धर्मशास्त्रसे प्रगट है । यद्यपि ऋषीश्वरोंने देवताओंको शाप देकर दुःखी किया, तो भी वेदोंका वचन है कि, विष्णुकी दयाके बिना किसीकी मुक्ति नहीं होती जैसा कि, यह श्लोक है—

मोक्षस्तु विष्णुप्रसादमन्तरा न लभ्यते ।

विष्णुकी दया बिना किसीकी मुक्ति नहीं होता ।

इस श्लोकसे यह तात्पर्य निकलना चाहिए कि, विष्णु सत्तागुणरूप है । बिना सत्तोगुणी युक्ति ग्रहण किए किसीको मुक्ति नहीं होती ।

चारों वेद इस विष्णुकी प्रशंसा किया करते हैं । चारों प्रकारकी भक्ति इसी विष्णुकी कृपा तथा अनुग्रहसे प्राप्त होती हैं। जैसा कि, ऋग्वेदका ये मंत्र हैं—
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुविचक्रमे ॥

पृथिव्याः सप्तधामभिः ॥ ऋग्वेद १-२-७-१ ।

अनुवाद— हे देवो । विष्णु सब स्थानोंपर उपस्थित है, उस परमश्वरने समस्त जीवोंको पाप पुण्य भोगने एवं समस्त पदार्थोंके ठहरनेके लिए पृथ्वीसे लेकर नीचेके सात प्रकारके धाम यानी भुवन बनाये एवं ऊपरके भी सात भुवन बनाए इसी तरह गायत्री, आदि सात छंदोंको विद्या सहित बनाया । उन लोगोंके स्थान ईश्वर वर्तमान था । जिस बलसे समस्त लोकोंको रचा है, इसी बलसे हम लोगोंकी रक्षा करता है । इसी कारण ऐ बुद्धिमानो ! तुम लोग हमारी रक्षा करते हुए इस विष्णुकी उपासना करो । वह विष्णु कैसा है ? जिसने बड़े भारी मेदिनीमण्डलको रचा है । उसकी सदैव बंदना करो । १-२-७-१ ।

विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पश्यशे ।

इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ ऋग्वेद-१-२-७-४ ।

अनुवाद—ऐ मनुष्यो ! विष्णु व्यापक ईश्वरके कई सुंदर संसारोंकी उत्पत्ति स्थिति और विनाश कर्मोंको तुम देखो । १-२-७-४

प्रश्न—हम यह किस प्रकार जानें व्यापक विष्णुके कर्म हैं ?

उत्तर—जिससे ब्रह्मचर्य सत्यभाषण इत्यादि व्रत बनाये गये हैं ईश्वरके जिन नियमोंके अनुष्ठान करनेसे हमलोग मनुष्यके शरीरको पानेके लिये समर्थ हुए हैं ये कार्य इसीके बलसे हैं । क्योंकि, इन्द्रियोंके साथ कर्ता भोक्ता जो जीव है उसका वही एक योगमंत्र है दूसरा कोई नहीं है कारण कि, ईश्वर जीवका अन्तर्यामी है, सिवा उसके और कोई जीवका हितकारी नहीं हो सकता, इस

धर्मदासजीके ४२ वंशकी स्थिति

कारण परमेश्वर विष्णुसे सदैव प्रेम रखना चाहिए। ऋग्वेद १-२-७-४

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।

दिवीव चक्षुराततम् । । ऋग्वेद १- २-७-५ ।

अनुवाद—ऐ ज्ञाताओ और मुक्ति योग्य मनुष्यों ! विष्णुका जो श्रेष्ठ और ऊँची श्रेणीवाला सत्यलोक हैं जो सबके जानने योग्य हैं, जिसको पाकर परमानन्दको प्राप्त हो जाता है फिर वहाँसे कभी दुःखमें नहीं पड़ता । इस श्रेणीको बहादुर और धर्मात्मा और वासनाओंको दमन करनेवाले सबके भिन्न बुद्धिमान पुरुष बड़े सोचसे देखते हैं । जैसे सूर्यका प्रकाश समस्त स्थानोंमें हैं । ऐसेही परब्रह्म विष्णु समस्त स्थानोंपर उपस्थित है । परम स्वरूप परमात्मा है । उसीके संयोगसे जीव समस्त दुःखोंसे छूटता है । बिना उसके जीवको कभी सुख नहीं मिलता, इस कारण प्रत्येक रूपसे परमेश्वरसे मिलनेका उद्योग करना चाहिए ।
१-२-७-५ ।

त्वं द्वि विश्वतोमुखो विश्वतः परिभूरसि ॥

अप नः शोशुचदधम् ॥ ऋग्वेद १-७-५-६ ॥

अनुवाद—हे अग्नि परमात्मा ! आप समस्त विद्याओंमें एवं समस्त स्थानों पर उपस्थित हो । आपके अनन्त मुंह हैं । वही शक्ति जिसके बलसे समस्त जीवोंके सद्पददेश सदैव हो रहा हो वही आपका मुख है । ए दयालु ! आपकी दयासे हमारे समस्त पातक पृथक् हो जायें जिसमें हमलोग निष्पाप होकर सदैव आपकी, भक्तिप्रार्थनामें संलग्न रहें । ऋग्वेद-१-७-५-६ । ऋग्वेद ऋग्वेद-

इसी विष्णुकी प्रशंसा चारों वेद करते हैं । इसी विष्णुको चारों वेद छ शास्त्र और अठारह पुराणोंने परमेश्वर कहा है । समस्त श्रुति स्मृति इसीसे-अपनी मुक्तिकी आशा रखते हैं । समस्त ऋषि मुनि औलिया अम्बिया इसी विष्णुकी बड़ाई तथा प्रभुता प्रगट किया करते हैं । समस्त वेद तथा पुस्तकोंमें इसी विष्णुकी पूजा कही है । इस परमेश्वरके अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर इस लोकमें नहीं है ।

देवीभागवतके नवम स्कन्धके पन्द्रहवें अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुने कपट से वृन्दाके आसुरीत्वका अपहरण किया । तब उसने शाप दिया कि, तू पाषाण हो जा । देखो नवम स्कंधके चौबीसवें अध्यायमें विष्णु शालिग्राम पाषाण हो गये । और वृन्दा (तुलसी) गण्डकी नदी हुई और इस गण्डकीमें शालिग्राम रहने लगे और तुलसी उनके शीशपर चढ़ती है यही कबीर साहिबने कहा है कि—

साखी—वृन्दाकरे शापसे, शालिग्राम औतार ।

कहे कबीर सुन पण्डिता, कह पूज होवे उधार ॥

जो वृन्दाके शापसे शालिग्रामके रूपमें अवतृत हुआ, कबीर साहिब कहते हैं कि पंडितों ! उसके पूजन से उद्धार हो जायगा ।

इस्लाममें विष्णुकी प्रधानता ।

मूसाकी प्रथम पुस्तक पैदायशका तीसरा बाब २२ आपत देखो जब आदम उत्पन्न हुआ उसने आज्ञा नहीं मानी तब आदमको बैकुण्ठसे बाहर निकाल दिया । बैकुण्ठकी वाटिकामें चमचमाती हुई आखोंवाले दूतोंका पहरा बैठा दिया कि आदम आयुवा फल खाने न पावे । खुदाबन्दने कहा कि, मनुष्य भलाई बुराइकी पहचानमें हममेंसे एकके सद्गुण हो गया । अब ऐसा न हो कि, हाथ बढ़ावे अमर फलमेंसे कुछ खावे, सदैव जीवित रहे ।

इस परमेश्वरके सद्गुण अनेक परमेश्वर हैं क्योंकि, यहाँ बहुवचन शब्द रक्खा गया है । जैसा कि पूर्वमें लिख आया है कि महा मायाके बलसे करोड़ों और अनगिनती ब्रह्मा रुद्र इन्द्र इत्यादि बुलबुलेके समान उत्पन्न होते और फिर उसीमें समाजाते हैं । सो उसकी लीला एक अगाधसागर है । ये सभी मायासे उत्पन्न हुए स्वयम् माया हैं । यह खुदाको दर्शन देता था और समस्त कार्योंसे उसको विज्ञ किया करता था ।

जैसे आदमके साथ उसी प्रकार नूहके साथ श्री यह खुदा रहता था । जब बाढ़ समाप्त हो चुकी नूह अपनी नासे बाहरआया । एवम् समस्त जीवों सहित पृथ्वीपर चरण धरा (देखो मूसाकी पहली पुस्तक) उत्पत्ति का ८ वाँ बाब २० आयत) तब नूहने खुदाबन्दके निमित्त बलिप्रदानस्थल बना समस्त पाक पक्षियों तथा समस्त पाक पशुओंमेंसे लेकर उस बलिप्रदानस्थलीपर जलाकर बलिप्रदान किया । उस समय खुदाबन्द उस सुगंधिके सृष्टनेके निमित्त आकाशसे उतरा । खुदाबन्दने अपने मनमें कहा कि, मनुष्यके निमित्त मैं अब पृथ्वीको कदापि लानत नहीं करूँगा । इस कारण कि, मनुष्यके चित्तकी वृत्ति बचपनसेही बुरी है जैसा कि, मैंने किया है, फिर कभी समस्त जीवोंको नहीं मारूँगा । बरन् जबलें पृथ्वी हैं तबलें बोना और लोना, शरदी गर्मी अगहनी और वैशाखी, दिन और रात बंद न होंगे ।

नवों बाब पहली आयत । खुदाबन्द ने नूह और उसके पुत्रोंको बर्कतदी और उन्हें कहा कि, फलो बढ़ो, पृथ्वीको भरपूर करो । खुदाबन्दने प्रण किया कि, मैं भविष्यतमें किसी जीवको बाढ़से कभी न मारूँगा, मनुष्यके अतिरिक्त समस्त

चारों गुरुकी प्रशंसा, उर्दूशेर ४२ वंशकी प्रशंसाके उर्दू शेर

जीवोंको नूहके भोजनको दिया और कहा कि, मनुष्यके रक्तका बदला लिया जावेगा, दूसरे जीवका नहीं। अपने समयका यह चिह्न दिया और नूहसे कहा। (३) आयत, मैं अपने धनुषको बदलीमें रखा है। वह मेरे तथा पृथ्वीके मध्य, प्रणका चिह्न होगा और ऐसा होगा कि, जब मैं पृथ्वीपर बादल लाऊँ तो मेरा धनुष बादलमें दिखाई देगा। (१५) मैं अपने प्रणको जो मेरे ओर तुम्हारे और प्रत्येक प्रकारके जीवोंमें है स्मरण करूँगा तूफानका जल फिर ऐसा न होगा कि सत्यानाश करे। (१६) कमान बादलमें होगी। मैं उपर वृष्टिपात करूँगा। जिसमें उस सदैवके प्रणको जो मेरे और पृथ्वीके समस्त जीवोंमें है स्मरण करूँ। (१७) निदान परमेश्वरने नूहसे कहा कि, यह उस प्रणका चिह्न है जिसको मैं अपने और पृथ्वीके समस्त जीवोंके मध्य स्थिर करता हूँ।

इसी प्रकार खुदाबन्द आदमके समान ही नूहको भी सब बतलाता रहा।

फिर देखो इसी किताबका (१८) बाब इबराहीमके साथ इसी प्रकार खुदाबन्द रहा। (१) फिर खुदाबन्द ममरीके बलूतोंमें उसे दिखलाई दिया। वह दिनके समय गरमीके दिनोंमें अपने खेमेंके द्वारपर बैठा था। (२) उसने अपनी दृष्टि उठाकर देखा। क्या देखता है कि, तीन आदमी उसके पास खड़े हैं। वह उन्हें देखकर खेमेंके द्वारसे उनसे मिलनेको भगा पृथ्वीपर्यंत उनके आगे झुकी। (३) वो बोला कि, ए खुदाबन्द ! यदि मुझपर दया है तो अपने सेवकके समीपसे न चले जाईये। (४) थोडासा पानी लाया जावे आप अपने पैर धोकर उस वृक्षके नीचे आराम कीजिये। (५) मैं थोडीसी रोटी लाता हूँ ताजा दम हो जाइये, इसके उपरान्त आगे जाइएगा। क्योंकि, आप इसीके निमित्त अपने सेवकके यहाँ आये हैं तब उन्होंने कहा कि, वैंसाही कर जैसा तूने कहा। (६) इबराहीम खेमेंमें सरःके पास दौडा गया और कहा कि, आटा लाकर शीघ्र गूँध, फुलके बना। (७) इब्राहीम पशुओंकी झुण्डकी ओर दौडा एक मोटा ताजा बकरा लाकर एक युवकको दिया, उसने उसको तैयार किया। फिर उसने घी दूध और उस बकरेको जो उसने पकवाया था लेकर उनके सामने रक्खा, आप उनके समीप वृक्षके नीचे खड़ा रहा और उन्होंने खाया।

ईसाई लोग अनुमान करते हैं कि, उन तीनों मनुष्योंमें दो फारिस्ते थे एक खुदाबन्द यहवाह जुलजलाल था।

जैसे खुदाबन्द इन साहबोंके साथ था उसी प्रकार मूसाके साथ रहा और मूसाको समस्त धर्म कर्म बतलाया। मूसाने बनी इसराईलको सब नियम सिखलाया। जिसमें बनीइसराईल इस नियम पर चले। इस नियमावालीका

नाम तौरैत पुस्तक ठहरा । वह तौरैत पहली पुस्तक है जो पश्चिमी पैगम्बरों (अनागत वक्ताओं) को मिली अनेक बेर खुदाबन्द ने मूसा से बातें की और मित्र की भाँति सब कुछ सिखलाया मूसाने खुदाबन्दको स्वच्छभुसे देखा, देखो मूसाकी दूसरी पुस्तक खिरोज चौबीस बाब ९ आयत ।

तब मूसा, हारूँ, नहब अबीद तथा सत्तर इसराईली श्रेष्ठ पुरुष ऊपर गये (१०) और उन्होंने इसराईलके परमेश्वरको देखा । उसके पैरोंके नीचे नीलमके पत्थरकी गचकारी थी, उसका स्वेच्छ शरीर आकाशके सदृश था । (१०) बनी इसराईलके अमीरोंपर उसने अपना हाथ न रक्खा उन्होंने खुदाको देखा और खाया पीया ।

यह आसमानी रङ्गका परमेश्वर समस्त संसारपर शासन करता है । उसका भेद कोई नहीं जानता । हों कोई कोई संत उस खुदाके भेदको जानते हैं वे मायाके दगासे बच जाते हैं । नहीं तो सांसारिक मनुष्योंकी क्या सामर्थ्य है जो कि, बच सकें । केवल सत्यगुरुकी दया जिसपर हो वह बच सके एवं वही पहचान सकता है ।

इस खुदाकी ठीक तसबीर सूरत शकल सवारी इत्यादी खरकैल नबीकी पुस्तकमें देखो ।

प्राचीन नियमपत्र बखरकैल नबीकी पुस्तकका सार ।

तीसवें वर्षके चौथे महीनेकी पाँचवी तारीख को ऐसा हुआ कि, जब मैं नहर कबीरके किनारे आस्तीरोंके बीचमें था तो आकाश खुल गया मैंने खुदाबन्दका तेज देखा (२) उस महीनेके पाँचवे दिवस यानी यहपकीन बादशाहके बंदी होनेके पाँचवें वर्षमें (३) ऐसा हुआ कि, खुदाबन्दका वचन बोजीकाहनके पुत्र खरकैलको, कसदियों के देश में नहर कबीरा के किनारे पर था पहुँचा । वहाँ खुदाबन्दका हाथ उसपर था (४) मैंने दृष्टिपात किया तो क्या देखता हूँ कि, उत्तरसे एक बगूला उठा एक बड़ी घटा एक आग जिसकी लवें आपसमें लपटी जाती थीं, जिसके गिर्द प्रकाश चमकता था और उसके मध्यमें यानी उस आगमेंसे पालिश की हुई पीतलकीसी मूर्ति दिखलाई दी । (५) उसके मध्य चार जीवोंकी एक प्रतिमा दिखलाई दी । उनकी सूरत यह थी कि, वो मनुष्यसे मिलती जुलती थीं । (६) प्रत्येकके चार २ पंख थे । उनके पैर जो थे वो सीधे थे । उनके पावोंके तलुवे बछरूके पावोंके तलवेसे थे । मंजे हुए पीतलके सदृश झलकते थे । (८) उनके चारों ओर पंखोंके नीचे मनुष्यके हाथ थे । मुंह तथा पंखभी इन चारोंके थे । (९) उनके पंख आपसमें एक दूसरेसे मिले

थे, और वे चलते हुए मुड़ते नहीं थे, वरन् वे सब बराबर सीधे आगेको चले जाते जाते थे। (१०) यही उनके चेहरेकी मिलान तथा समानता, सो उन चारोंमें एक का चेहरा मनुष्यका, एकका चेहरा शेरका उनकी दाहिनी ओर एकका चेहरा बैल तथा एकका चेहरा उकाबका था। (११) उनके चेहरे यों हैं। उनके पंख ऊपरसे फैलाये हुये थे। प्रत्येकके दो पंख दूसरेके दो पंखोंसे जुटे हुए थे। दोनोंसे उनका शरीर ढका हुआ था। (१२) उनमें से प्रत्येक आगेको सीधा चला जाता था। जिधर आत्मा जाती थी वे जाते थे। वे चलते हुये फिरते न थे। (१३) रही उन जीवोंकी सूरत, सो उनकी सूरत आगके सुलगे हुये कोयलों और जलते हुये प्रदीपके सदृश थी। वह उन जीवोंके बीच इधर उधर आती जाती थी। वह अग्नि तेजमय थी। तथा उस अग्निमें से बिजली वर्हिगंत होती थी। (१४) वे जीव दौड़ जाते थे और पलट आते थे। जैसे बिजली चमक जाती है।

(१५) सो जब मैं उन जीवोंको देख रहा तो क्या देखता हूँ कि, उन जीवोंके पास एक पहिया चार मुंह वाला पृथ्वीपर है। (१६) रही इन पहियोंकी सूरत और उनकी बनावट, जो वह पत्रेकीसी दिखाई देती थी, उन चारोंका डौल एकही था। उनकी सूरत तथा बनावट ऐसी थी मानों पहिया पहिएके बीचमें था। (१७) जब वे चलते थे तो वे चारों ओर ढलते थे ढलते हुए पीछे न फिरते थे। (१८) उनका घेरा जो था सो ऐसा ऊँचा था कि, भय जान पड़ता था। इन चारोंके घेरेमें चारों ओर आँखें फिरी हुई थीं। (१९) जब वे जीव चलते थे तो पहिये उनके साथ चलते थे। जब वे जीव पृथ्वीसे उठाए जाते थे तो पहिए भी उन्हीके साथ उठाए जाते थे क्योंकि, पहिएमें जीवोंकी आत्माएँ थीं। (२२) उस प्रकाशकी सूरत जो उन जीवोंके मस्तकोंपर थी ऐसी थी जैसे डरावने बिलौर का प्रकाश होता है। वह उनके मस्तकों पर फैला हुआ था। (२३) उससे नीचे उनके समपर थे। एक दूसरेकी ओर था। प्रत्येकके दो दो थे। जिनसे उनके शरीरोंका एक रुख और दू दू पहने उनसे दूसरा रुख ढका रहता था। (२४) मैंने उनके परोका शब्द सुना मानों बहुत पानियोंका शब्द आवज्जद क्रादिर मुतलक्का शब्द है। जब वे चलते थे, ऐसे शोरकी आवाज हुई जैसे लश्करकी आवाज है। जब ठहरते थे अपने परोको लटका देते थे। इस फ़िजामेंसे जो उनके मस्तकों के ऊपर थी एक प्रकारका शब्द होता था। (२५) उस फ़िजासे ऊँचे पर जो उनके शिरोंके ऊपर था सिंहासनकी सूरत सूरत थी, उसका दिखावा नीलमके पत्थरकासा था, उस सिंहासनके समान

कबीर साहिबके १२ पंथोंका सामान्य परिचय

बस्तुपर किसी मनुष्यकीसी मर्ति उसके ऊपर दिखलाई दी । (२६) मैंने उसकी कमरसे लेकर ऊपरकी ऊँचाई पर्यन्त पालिश किए हुए पीतलका शार्ङ और अग्निस्फुलिङ्गकासा तेज उसके मध्य तथा चारों ओर देखा । उसकी कमरसे लेकर नीचेपर्यन्त मैंने अग्निकी लपटकासा तेज देखा । चारों ओर एक-प्रकारकी जगमगाहट देखी । (२७) जैसे उस कमानका स्वरूप है जो वर्षाके दिवसों में बादलमें दिखाई देता है । वैसे ही आपसे उस जगमगाहट का दिखावा था । परमेश्वरके तेजस्वरूपका यही दिखावा था । देखतेही मैं औंधे मुंह गिरा और मैंने एक ऐसा शब्द सुना जैसे कि, किसीने कहा २-बाब (१) और उसने मुझसे कहा कि, ए मनुष्य ! अपने पैरोंपर खड़ा हो कि, मैं तुझसे कुछ कहा चाहता हूँ । (२) जब उसने इस प्रकार कहा तब आत्माने मुझमें प्रवेश दिया और मुझको पैरोंपर खड़ा किया । तब मैंने उसकी सुनी कि, मुझसे बातें करता था । (३) उसने मुझसे कहा कि, ए मनुष्य ! मैं तुझे बनी, ईसराईल उन बागी झुंडोंके पास जो मुझसे फिरगए हैं भेजता हूँ, वे और उनके बाप दादे आजके दिवस पर्यन्त मुझसे विरुद्धता करते हैं । (४) कारण यह कि, वे निलंज्ज और कठोर हृदय बालक हैं जिनके पास मैं तुमको भेजता हूँ तू उनसे कह कि, खुदाबन्द यह वाद यों आज्ञा देता है ।

जब मैंने दृष्टिपात किया तो क्या देखता हूँ कि, उसका एक हाथ मेरी ओर उठा है और उसके हाथमें अनेक पुस्तकें हैं और उन पुस्तकोंमें शोककाव्य लिखा है । तब मैंने मुंह खोला और उन समस्त पुस्तकोंको खालिया । उस समय वह मुझको मधुके सद्गुण मीठी जान पड़ीं और मैंने समस्त पुस्तकोंसे अपनी आंतडियों भरलीं । तब खुदाबन्दने मुझको आज्ञा दी कि, तू मेरी आज्ञा लेकर बनी इसराईलके पास जाकर कह दे कि, विरुद्धता छोड़कर मेरी सेवा स्वीकार करो ।

यहाँपर मेरा अभिप्राय केवल इतना था कि, मूसाके खुदाका स्वरूप लोगोंपर प्रगट होवे मालूम करें कि, जो कुछ वेदमें है वही बात तौरीत तथा दूसरे नबियोंकी पुस्तकमें है इस विषयमें तनिकभी विभिन्नता नहीं ।

अग्निको विष्णुभवरूप कहना ।

“वेदके अनुसार परमेश्वर अग्निभी है और वह अग्नि विष्णु है ।”

मैं पहले लिख आया हूँ कि, सूक्ष्म वेदका कथन है कि, सत्य पुरुषने काल-पुरुषको अपने क्रोध और प्रकोपके अंशसे बनाया था । वह कालपुरुष जब सत्य-पुरुषकी अग्निके भागसे बना प्रबल हुआ है । फिर उसने अपना समस्त तेज

उनके भिन्न पंथ, महाप्रलयकी कथा

विष्णुमें भरकर विष्णुको अपना उत्तराधिकारी एवं समस्त संसारका रचयिता ठहराया है। इस कारण यह विष्णु अग्निकी प्रतिमूर्ति है। इसीका पूजन समस्त संसारमें, हो रहा है। वही आग खुदा है, इसी आगको हिन्दू मुसलमान ईसाई यहूदी इत्यादि षट्दर्शनके लोग पूज रहे हैं। किसी प्रकार पूजें, समस्त पृथ्वी पर इसीकी पूजा है। यज्ञ हवन इत्यादि इसीके निमित्त होता है। जो कुछ बलिप्रदान अथवा महाबलिप्रदान आदि हैं हवन इत्यादि सब उसीके निमित्त होता है। वह परमेश्वर अग्नि है और अग्नि उनका मुंह है, जो कुछ उसके नामसे आगमें पड़ता है सो सब उसका भोजन है। अन्न, फल, घी, गुड़, मनुष्य और पशु सब उसके भोजन हैं। वह सबको खाता है, समस्त मनुष्य इसी आगकी पूजा करते हैं। इसका भेद बिलकुल नहीं जानते। समस्त पवित्र पुस्तकें इसी अग्निकी प्रशंसा तथा बड़ाई प्रगट करते हैं। इस अग्निकी पहचान बिना सद्-गुरुकी आज्ञाके नहीं हो सकती। जो कुछ वेद बतलाता है और ऋषीश्वर कहते हैं, वही कथन अंबियाका देखो।

खिरोजका (३) बाब (२) डुरेबके पर्वतपर मूसापर खुदाबन्द अग्निकी लपटोंमें प्रगट हुआ। देखो तौरीतमें।

खिरोज २४-१७-खुदाबन्दका जलाल दहकती

आगके सद्गुण दिखालाई देता था।

इसनसना ४-२४-तेरा परमेश्वर एक मस्म करनेवाली आग है।

तथा ४-३३-परमेश्वरकी आवाज आगमेंसे बोलते सुनी

तथा ५-४-परमेश्वरने अग्निमेंसे बातें कीं।

तथा ९-१५-समस्त पर्वत अग्निसे जल रहा था मूसा
पर्वतसे उतरा।

२ समोइल २२-९-खुदाके मुहँसे आग निकलकर खागई।

मकाशिफ़ात २०-९-खुदाके पाससे आग उतरी और उनको खागई।

विराट् पुरुष जिसकी प्रशंसा वेद करता है वही विराट् पुरुष विष्णुका अवतार है। जब अर्जुनको दिखाया तो वह डर गया था जब मूसाको दिखाया तो मसा अचेत हो गया, न देख सका। वही विराट् पुरुष ईसा है। देखो मतीकी इञ्जील (१७) बाब (१) से (९) आपत पर्यन्त पढ़े।

और छः दिवसोंके उपरान्त मसीह, पिटर्स याकूब और भाई योहन्नाको पृथक् एक ऊँचे पर्वतपर लेगया। (२) उनको सामने उसकी सूरत बदल गई। उसका मुखडा सूर्यसा चमका, उसके, वस्त्र तेजके सद्गुण श्वेत हो गये। (३)

अन्तर्धान होनेकी कथा

मूसा और अलियास उससे बातें करते उन्हें दिखाई दिए । (४) ए परमेश्वर ! हमारे निमित्त यहाँ रहना अच्छा है । यदि इच्छा हो तो हम यहाँ तीन डेरे बनावें । एक तेरे और एक मूसा और एक अलियासके निमित्त । (५) वह यह कहताही था कि एक प्रकाशमय बादलने उनपर साया कर दी, इस बादलसे एक आवाज इस विषयकी आई कि, यह मेरा प्यारा बेटा है जिससे मैं प्रसन्न हूँ । तुम उसकी सुनो (६) शिष्य यह सुनकर मुहँके बल गिरे अत्यन्त भयभीत हुए । (७) तब मसीहने इन्हें छूकर कहा कि, उठो भयभीत मत हो । (८) पीछे उन्होंने अपनी आँख उठाकर मसीहके अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा ।

वह तो हजरत ईसाने अपना प्राकृतिक स्वरूप अपने शिष्योंको दिखल-लाया था ।

प्रगट हो कि, सब वह अवतार इसी निरञ्जनके हैं । जो उसके मुख्यपुत्र कहलाते हैं । इन ऋषीश्वरों सिद्ध साधुओं पीर पैगम्बरोंको बड़ा बल होता है परन्तु इनको न तो अपने प्राकृतिक स्वरूपकी सुध रहती है । न अपना आवागमन बन्द करनेकी युक्ति मालूम है । ये सब अवतार निरञ्जनके पुत्रोंके हैं और अपने पिता विराटके स्वरूपमें हैं ।

यह विष्णु सबमें बादशाह है । इस बादशाहके पास युद्धका समस्त समान है । इसके पास पाञ्चजन्य शंख है । जब वह समरके निमित्त चढ़ता है तब पाञ्च जन्य शंख फूंक डंका बजाकर चढ़कर युद्ध करता है । वास्तवमें इसे कोई कामना नहीं । भक्तोंके उद्धार तथा संसारी जनोंके बोधके लिये ऐसा किया करता है ।

भगवान् विष्णुके विषयमें कबीर साहिबजी कहते, चले आ रहे हैं कि सत्य पुरुष विष्णु भगवान्को पकड़ो उसके सच्चे भक्तोंका मान करो झूठे गुरुआ लोगोंके फन्देसे बचो । ये किसी बिरले पुरुषको मिलते हैं, जिसे मिलते हैं वो इनकी ही कृपासे सत्य पुरुषके लोकको चला जाता है । फिर भी जीवोंकी बुद्धि अन्धी हो रही है जो इस ओर ध्यान नहीं देते ।

देखो भगवान् विष्णुके विषयके कबीर साहिबके शब्द—

शब्द ३७—हरिठग ठगत सकल जग डोला ।

गवन करत तोसों मुखहु न बोला ॥

बालापनके मीत हमारे । हमें छाड़िकस चले सकारे ।

तुम अस पुरुष हों नारि तुम्हारी ।