कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पढ़ाकर वेद और काँकौ किया कर । खोरिशे नापाक खा करके जिया कर॥
कुतुब ख्वानीसे अपना दिलदिया कर । किधर आदम गया है और हौआ॥ तुझे
कि जिसने तुझको यह पोशिश दिया । न उस फर्माबरी कोशिश किया है ॥
तेरी खोरिश और आदत सब छिया है । कहेगा क्या जब आवे बुलौआ ॥ तुझे
सीखा तूने जो हुशियारी जहाँकी । खबर तुझको न इसरारे निहाँकी ॥
न परवाह तुझको आजिजके ब्यौकी । पड़े सिरके ऊपर तेरे ो पौआ॥ तुझे०
तरजिअ बन्द खम्साः (गुरुसेवा) ।
बना आदमका पुतला आवे वतीसे । खबर क्या इसको है नफते आपसीसे ॥
यह घेरा चार सू शैताने लयोसे । निगहकर अपनी इल्ममें दूरबीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥
पयम्बरपीर सदहा जो गुजरते । ऋषि मुनि ओलिया सब कहते मरते ॥
न गलती अपनी पर जो ध्यान धरते । खबर जिनको न बिलकुल कालकी से ॥
हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥
हरीसे मप्स हैं बे इल्मानी । न इनको कुछ खबर घर जावेदानी ॥
हुई उनपर न मुशिद मिहरबानी । उठाले हाथ तू दुनिया वदीसे ॥
हैं सब ने अमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
खबर नहीं जो खबर दारान आलिम । कहाँसे है नुमाँया नफत जालिम ॥
जो पैदा जग बचा कोई न सालिम । खबर तू पूछ अज्ज गोशेः गुजीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
कोई दिलगीर दिलबरकी खबर दे । कि जिसके बदले आशिक अपना सिरदे ॥
हैं जिनसे बात होती है न परदे । खबरको पूछले खातिर हजीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
न जाने भेद जो बातें बनाते । न भूले साधु लुच्चोंके भुलाते ॥
न आशिक कान उनके रख लगाते । तुझे क्या काम कोई नुकतः चीसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
तू अपने रङ्गमें रंगा सदा रह । जगतसे पीठरु खुदबा खुदा रह ॥
फिराके यारके गमसे लदारह । तुझे क्या काम आजिजई व आँसे ॥
हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥
गञ्जल (चींटी) ।
ज्वलीरा क्या जमा करती है चिउँटी । तु किसके वासते धरती है चिउँटी ॥
नहीं जब तू ज्वलीरा यह कहाँ है । बिला गाहकमें क्यों मरती है चिउँटी ॥
विशेष कथन
न यह घर है तेरा घरकी न तू है । तो फिर घर किसलिये भरती है चिउँटी ॥
जब यक दिन आनकर तुझको लताडें । न तू उस रोजको डरती है चिउँटी ॥
सिखाया तूने यक दिन शह सुलेमों । आजिज बात रख रखती है चिउँटी ॥
गजल (साथ)
जर सीमसेकी जो प्यार ऐ सोंप । है तेरा वह घर वह बार ऐ सोंप ॥
आकरके खजाना पर तू बैठा । यह तेरा था दिल फ़िगार ऐ सोंप ॥
जिस दिलवरसे दिल लगाये । उस जामे तेरा क्रार ऐ सोंप ॥
जर सीम जहाविरात महबूब । उनसेही तेरा था प्यार ऐ सोंप ॥
माशूकके घर तुझे बैठाला । मिल शौकसे अपना यार ऐ सोंप ॥
कर दूर दफ़ीनः से आजिज । पावेगा तू हक्क दीदार ऐ सोंप ॥
गजल—जगतके आदमी हैं डोंगर ढोर । धरम धरधरके मारे डोंगर ढोर ॥
शमअ परवानः आदमोन कोई । हिर्स हैवान प्यारे डोंगर ढोर ॥
काल काबूमें कोई नहीं इन्साँ । मंरते खपते बिचारे डोंगर ढोर ॥
है बरी आदमी सब दुख द्रन्द । हाय तोबः पुकारे डोंगर ढोर ॥
पहन इन्सान लवास आजिज । जान घरको हमारे डोंगर ढोर ॥
तरजिय बन्द खमसः ।
यह कुल मखलूक आतशमें जले हैं । जो मरहम हाथ हसरतसे मले हैं ॥
गुनः करनेमें हरगिज नहीं टले हैं । जो रोराँ संगपर उनको तले हैं ॥
क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ॥
हरीसे दुनियवी हों ग़र्क दुनिया । गुरु और साधु जो बातें न सुनिया ॥
जो बोया तूने सोई तुझको लुभिया । न दुनिया आक़बत यमजीऊ छले हैं ॥ क०
जो सीखे होशियारी कुछ जहाँकी । कहाँ जाना था सोली रह कहाँ की ॥
न जाना भेद इसरारे निहाँकी । सो हराराते जमीं मआदिन रले हैं ॥ क०
लगे इस बाग़ सद्दा बेल व बूटे । दरखतां वे अदद हर जाय फूटे ॥
जो हो फ़लदार सो मालीसे टूटे । सो काटे जायेंगे जो न फले हैं ॥ क० ॥
सदाजो साधुगुरुको सर झुकाये । भजन सुमिरनसे अपना दिल लगाये ॥
दया दान और धरमकी राहबनाये । गुरु और संत फरमांसमे चले हैं । क० ।
हुये जो खाके मोटे मस्त मग़रूर । हमेशः साधु गुरुसे सो रहे दूर ॥
ज़र्क और बर्क पोशिश ताज सुमबूर । सोहों बलिदान मोटे ो पले हैं ॥ क० ॥
नहीं दिलमें जिनके रब्ब रहमान । न उनपर होवे हरगिज रहम सुवहान ॥
सोई आजिज पड़े चौरासीकी खान । न पावें राह सो मर मर गले हैं ॥
क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ।
मुसलमानी धर्म
गजल ।
लगे सब स्वान इस मुर्दार दुनिया । न कोई इनसान मुर्दार दुनियाँ ॥
है कूकरो शूकरो खर सियार पियारी । सो सब हँवान इस मुर्दार दुनिया ॥
जो मुर्दार लगे सो सब हैं मुर्दः । न उनमें जान न इस मुर्दार दुनिया ॥
न ईसमें कोई मजहब है न मिल्लत । सो चारो खानि इस मुर्दार दुनिया ॥
नहीं यह जिन्दगीकी जा है आजिज । यह सब समसान इस मुर्दार दुनिया ॥
कुत्ताका गजल ।
तू घर बघर भूंकता फिरता है कुत्ते । न तू हर्गिज सन्न करता है कुत्ते ॥
दिया था दान और किया था खैरात । जो नंग और भूख से मरता है कुत्ते ॥
जो दुर दुर सब करे और भूखा मारे । कहीं तेरा उदर भरता है न कुत्ते ॥
दिया नहीं फिर पावे तू कैसे । इसी से भूख दुख भरता है कुत्ते ॥
अगर आजिज बचन सुन सन्न करतू । तो फिर क्यायों भूखसे डरता है कुत्ते ॥
तो गाओ गीत सबमिली कहो सुहागिन । जो पाया है अमरबराय सुहागिन ॥
तुम्हें हरिनामसे है काम बरनः । तू बैठ आरामसे घर ऐ सुहागिन ॥
तेरा मालिक निगह वान है । जबरदस्त तुझे कुछ अब नहीं डर ऐ सुहागिन ॥
तुझे हरदो जहाँमें खुशनसीबी । तु पाया अपना घर ऐ सुहागिन ॥
तु है जुग ग अटल तेरी सब औलादा । जमीमें और जमाँ भर ऐ सुहागिन ॥
अगर आजिज पिया का प्यार तुझको । तो यकमूदीदः दिलधर ऐ सुहागिन ॥
खसम जो मर गया है ऐ रॉड । तुझे सब दुखने घेरा है ऐ रॉड ॥
तू चक्की पीस खा दीवार परदे । जो अपने चर्खाको फेरा है ऐ रॉड ॥
तू मिहनत व मजदूरी किया कर । तुझे दिन रात झक झरा है ऐ रॉड ॥
तुझे कहाँ पलंग और कहाँ बिछौने । तुझे गमके कुए गेरा है ऐ रॉड ॥
अब आजिज कहना सुन हरिनाम जपना । तू टूटी झोपडी धरा है ऐ रॉड ॥
खसम तेरे बहुत हरफि कसबी । न हो हरगिज कभी तू साफ कसबी ॥
लदी तू सद गुनाहो से है दिन रात । पहेन दिन चार तू जर बाफ कसबी ॥
खोरिशों पोशिश हैं यह दो चार दिनको ।
हंसी और मसखरी और लाफ कसबी ॥
तेरा देरा हो दोजख आग में जब ।
न फिर हो जूर्म तेरा मुआ कसबी ॥
न आजिज व आज रख तू कान करती ।
कहेंगे तुझको लामो काफ कसबी ॥
किया करता है तू गट गू, समझा नहीं तू मजंमूं ।
दिन चारमें कहाँ तू, हरिध्यान कर कबूतर ॥
ऐसी गिरह जो मारी, ऊपरको ले उडारी ।
वह जा नहीं तुम्हारी कुछ कानकर कबूतर ॥
आकासमें चढ़ाया हम जिन्स में बढाया ।
नहीं इल्म वह पढाया, गिरी आनकर कबूतर ॥
अपनी दिखाके बाजी लोगोंको करता राजी ।
यक दिन पकड़ ले क्राजी क्या मान कर कबूतर ॥
आजिजकी बात सुनले और मनमें अपने गुणले ।
सत्तनाम सबमें चुनलें पहचान कर कबूतर ॥
सुन सतगुरुकी वैना और समझ उनकी सैना ।
दिन चारमें तु हैना, सत्तनाम बोल मैना ॥
सीखी जबाँ केती, थी अकल तुझमें जेती ।
अबतक पकी न खेती, सत नाम बोल मैना ॥
बोली अजब बोला, सर काल कर कलोल ।
तब जाब कौन टोला, सत नाम बोल मैना ॥
पढ़ पढ़ जबाँ खपना, माने बिगानः अपना ।
दिन दो तीन होवे सपना, सत नाम बोल मैना ॥
आजिज तू छोड़ पिंजर, और रिश्तः तोंड़ पिबर ।
फिर फिर न जोड़ पिंजर, सत नाम बोल मैना ॥
तू तन मन धन लगाकर अपना गुरुपूज । क्रदमपर सिर झुकाकर अपना गुरुपूज ॥
न गुरु बिन हरिको पावे तु हरगिज । तू उस फर्मा बजाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको मिहर पावेगा हरिको । सो साम्ना बनाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको छोड़ हरिको ढूँढ अहमक । जहां पावे बुलाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरु गोविन्दसे बढकर है बेशक । यही ईमान लाकर अपना गुरु पूज ॥
वचन कबीर साहबका यह आजिज । जहां होवे तू जाकर अपना गुरु पूज ॥
तु शमसे अपने रोयाकर विरिहिनी । मुंह आँसूसे तु धोया कर विरिहिनी ॥
उठें जब दर्द भारी तेरे अन्दर । कलेजा अपना टोयाकर विरिहिनी ॥
प्यारे बिन तेरा दुख कौन मेटे । तु अपनी जान खोयाकर विरिहिनी ॥
पपीहा ज्यों रटो अपना पिया पीय । मगुफ़लत ख़्वाब सोयाकर विरिहिनी ॥
लिखाकर और किया कर वस्फ उसकी । जबों अपनोको गोया कर विरिहिनी ॥
तुही तुही तुही तू देख हर रुख । तु दिल दरिया बिलाया कर विरिहिनी ॥
तुयक रुख हो नजर कर अपने आजिज । भरम दरिया डुबोयाकर विरिहिनी ॥
रोतेही शामसे सेहर आया । यार अबतक न मेरे घर आया ॥
आह व नालोंमें सारी गुजरी रात । मेरी महरू न मन मिहर आया ॥
करूँ तदबीर कौन है चारा । किस लिये उसके दिल क्रहर आया ॥
मेरी भिन्नत सुना मेरे क्रासिद । अब तलक नहीं प्यामबर आया ॥
नहीं आसूँके तार टूटेंगे । अबतो दिल दीद अपना भर आया ॥
तुही तू तूही तू नजर आवे । हमः मौजब सर बसर आया ॥
नहीं तुझसे है खाली कोई जाय । हर जगह एकसा नजर आया ॥
किस लिये वस्लसे किया महरूम । शोम बद मेरा काम कर आया ॥
हो गया सख्त क्यां तेरा दिल मोम । क्या करूँ अबतो उससे दर आया ॥
तेरा दामन न छोड़ेगा आजिज । जान लग तक मेरा अगल आया ॥
नहीं तेरा जो मुशिद मिहरवों है । तो एकही ढंग जाहिलो वेद ख्वों है ॥
अगर तिशनःसे तू होवे जो बेताब । तो साक्री हाथ प्याला हरजमाँ है ॥
अगर प्यासा नहीं तो क्या पिलावे । वह दायम दूर तुझसे बेगुमाँ है ॥
जहां चाहे तु पीय प्याले इश्क । तुझ क्या खौफ पीले दमाँ है ॥
तुझे मिलनेकी जब हो बेकरारी । तू पीव उसकी जहाँ दूढे वहाँ है ॥
दरू भी वह बेरुसे तुझको देखे । वह जाहिर और परदः निहाँ है ॥
नहीं पहचानता उसको वह तकसीर । अब उस पहचान आँख एसी कहाँ है ॥
नहीं दिलगीर माल और जानदेखुद । करशमये नाजका शेवः बुताँ है ॥
कि, तेरा आह व नाला गिरियः जारी । कशीदः दिल करे दिलबर जहाँ है ॥
कि, तू नाचीज व नालायक है आजिज । और वह बसके ऊपर शहनशाहूँ है ॥
तेरा खुशतर जमाल ऐ पाक दामन । तु खुश खुल्क और ख्याल ऐ पाक दामन ॥
सितारोंमें है जैसे बन्द रौशन । तु सब सखियोंमें लाल ऐ पाक दामन ॥
है तू जो अपने पीतमकी प्यारी । तेरा खुश वक्त हाल ऐ पाक दामन ॥
तेरे हुसनो नमक नाजो अदाके । मुकाबिल न जमाल ऐ पाक दामन ॥
फटे कपड़े व मैली गर तेरी भेस । तेरा बरतर जलाल ऐ पाक दामन ॥
इधर और उधर हरगिज तू न ताके । तेरा फजलो कमाल ऐ पाक दामन ॥
खसम अपनेकी तू फर्मा बर्दारि । मिलेंगी लागजाल ऐ पाक दामन ॥
तेरा खाविन्द हक तुझसे मिलादे । तू आजिज हो बहाल ऐ पाक दामन ॥
शक्ति धर्म
समझ कर ऐसा दूँढो वर कुमारी । सदा सुखसे रह अपने घर कुमारी ॥
जो आसेबसे तुझको बचावे । रहे बाकी न कोई डर कुमारी ॥
हया और शरम तेरी रख रख जहाँमें । वही भर्तार अपना कर कुमारी ॥
यह तीनों लोक है भरपूर नारी । है सबमें एकता एक नर कुमारी ॥
उसी नरको तू पहचाने जो आजिज । वही है एक तेरा वर कुमारी ॥
तु क्या बैठ लगाकर ध्यान बगला । तू अन्दरसे कपटकी खान बगला ॥
तेरे नजदीक मच्छी कोई न आवे । जो उनमें अकल हो पहचान बगला ॥
दशाकी हाट यह तूने जो खोला । न आवे कोई तेरी दूकान बगला ॥
खबर जिसने न गुरुसे अपने पाया । फँसेंगे सो तेरे जाल आन बगला ॥
खबरदारोंको आजिज क्यों फँसावे । फँसेंगे आनकर वे ज्ञान बगला ॥
तरकीब बन्द ।
हुई यह आग सत पुरुषसे पैदा । हुआ जिसपर है कुल आलम यह शैदा ॥
उसीसे तीन गुन और पांच तत्त्व है । उसीसे चौदहो प्झन्दी हवैदा ॥
है उसका कारखाना कुल जहाँमें । उसीसे खलकको की पीस मैदा ॥
सभी सुरनर मुनीश्वर उसको पूजें । यही गुरु सिख है रोगी व बँदा ॥
जहां सत पुरुषकी भगती न पावे । वहां ऐ आग तू डेरा बनावै ॥ १ ॥
उसी आतशसे पैदाइश वका है । उसीसे फेर कुल आलम फन्ना है ॥
उसी आतशकी पूजा कुल जमींमें । उसी आतशको देखो जा बजा है ॥
उसे पूजे फिरिश्ते आसमोंमें । उसीको देख कुल अर्जों समों है ॥
उसीका कारखाना सब नमूदार । वही ब्रह्माण्ड और पिण्डो बना है ॥
जहां गुरु साधुकी सेवा न होवे । वहां तू आग इल्मो अकल खोवे ॥ २ ॥
जलाया उस आगने सारा जमानः । ठगे सबको किया सदहा बहानः ॥
ठगे ब्रह्मा व विष्णु शिव भवानी । ठगे सिद्ध साधु पैगम्बर जमानः ॥
ठगे सब औलिया पीरों फ़क़ीरों । ठगे सब अस्ल दुनिया मुजरिमानः ॥
ठगे चौरासी लाख जानदार सारे । पड़ सब जालमें मुर्गी ब दानः ॥
जहां तू देख होवे साधु निन्दा । वहां ऐ आग हैं सब तेरे बन्दः ॥ ३ ॥
जहां मयनोशी व शहवत परस्ती । जहां क्रस्साब खाना और बस्ती ॥
जहांपर गोशत ख्वारी, किन्न कीनः । जहां बेखबरी बेहोशी व मस्ती ॥
हैं जो कोई झूठ जुल्मो जब्र आदी । तेरी खातिर हैं उनकी जान सस्ती ॥
हैं जो तहक़ीर करते साधु गुरुकी । उन्हीको दीन दुनियामें पस्ती ॥
जहां गुरु साधुमें हो जाय खाली । वहां ऐ आग तूने आग डाली ॥ ४ ॥
देवी और आसुरी संप्रदाय
तुही ऐ आग खालिक है जहाँकी । तुही महरम है इसरारे निहाँकी ॥
तुही ऐ आग सब जाँदार मामूर । तुही मालिक जमीन और आस्माँकी ॥
तुही देती है सबको खौफ अल्लाह । तु देवे फेर अकल राजदोंकी ॥
जहां आजिज न पण्डित स्वसंवेदी । तु बैठी अकल पर हर वेद ख्वाँकी ॥
जहां सत गुरु न कोई हंस उसके । वहां ऐ आग तू रह बैठ घुसके ॥५॥
यथा ।
नहीं दर्वेश सा कोई जहांमें । कि जिनको फिक्क हक्क दिल और देहों हैं ॥
जितने दुनिया सलातीन और गनी हैं । न कोई हक्क शनास इन जेरकोंमें ॥
न जिनको अपने अपने हक्कसे खबर है । सो हैवान सूरत आदम वहाँ में ॥
जिन्हें हक्कसे खबर सूर्य शहदो आलम । उनहीसे हक्क इनसानी अदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ १ ॥
जिन्हें शबो रोज अशरतमें गुजरते । न जो गुरु साधुओंका संग करते ॥
पचे निसिदिन ब आफातेन जमाना । तमअ हिसों हवस शहवतसे मरते ॥
हसद कीनः व बुगजो पुर अदावत । कभी जिकरो फिक्क हक्क दिल न धरते ॥
कुछ नहीं होश जिसको आखरतकी । सरापा सद् गुनाहोंसे लदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ २ ॥
हैं फुकरा बावशाहों आलिमोंके । सोई रहबर है मुफनसि जालिमोंके ॥
वहीं हैं जाबना बरते खुदाई । वहां बखशिन्दः हैं सब तालिमोंके ॥
वही हैवानको इनसान करते है । कायम उनसे ईमों सालिमोंके ॥
यही सुलतान यही सुलतान यही हैं । जमीं और आप्तमोंमें यह सदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ३ ॥
तु दिलमें देखले अपने दिवाने । अदमके मुल्क जब आदम समाने ॥
न तू तब है न में और है न दुनिया । न हशमत जाहका कोई कोई कारखाने ॥
फैना सब हों रहे कोई न बाकी । पलट जावेंगे जब कुछ जिस जमाने ॥
रहेंगे बाकी आशिक अल्लाह आजिज । वही बदबखत जो हक्कसे जुदा है ॥
गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ४ ॥
नज़म ।
तू कैसी खूब अरबी बोलता ऊंट । पकड़ लैवेगा तौभी जब तेरा घूंट ॥
जो झींगर हैं यह पण्डित सामवेदी । सो दाऊदी लहनका खूब भेदी ॥
बतक बोले अलेमानी व युनानी । रहे बाकी व तेरी भी कहानी ॥
कबूतर तीतरो बोल अरबी तुर्की । तुम्ही कह क्या खबर उस धाम धुरकी ॥
सिंहावलोकन
जो बोले संस्कृत मीठी तु मोरा । तेरा गर्दन भी धरकर काल तोरा ॥
तु अंगरेज़ी ो बोले बोल मैना । तेरा भी टूटेगा यकरोज़ डैना ॥
जो शिरीं बोल तूती फारसी है । पकड़ पिंजरेमें तुझको ड़रासी है ॥
ऐ मँढक तू सिलंगी बोल बोला । तेरे सरके ऊपर जमकर कलौला ॥
फ़रासीसी लातीनी सिख वैरा । तेरी गर्दन ऊपर भी छुरी फ़ेरा ॥
जो मेगपयी बोलयी सदहा जवानों । तुझे मारेंगे धर कहरवानों ॥
ज़ीलतसे रज़ीलत घरमें जावे । अगर सदहा जवानें सीख आवे ॥
हुआ हैवान तू इनसान मूरत । न पहचाना जो अपनी अस्ल सूरत ॥
किया था किसलिये आदमको पैदा । हुआ तू किसके ऊपर आनके शैदा ॥
तू खालिक याद कर अपना ऐ नादों । शबोरोज़ो शाम बाम दादों ॥
॥ ल-यह मान मड़क तेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।
यह भीड़ भड़क डेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।
यह शान और शौकत इधर उधरका सैर ।
हर चार सिम्त फेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥
यह माल मुल्क जाह और हशमत व कुलाह ।
यह दुनअबी उरझेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥
इससे न बड़ी नेमत है यह देह बशरकी ।
कागज़का दुनी बेरा सो दिनमें गुज़रजा ॥
सत नाम यक साहब सच पकडले आजिज़ ।
यह तेरा और मेरा दो दो दिनमें गुज़रजा ॥
छिपाया यारको ऐ शोर बखते । लखाया ग़ारको ऐ शोर बखते ॥
किया दिलने मेरे दिलबरसे परदः । जताया नाज़को ऐ शोर बखते ॥
रहे रहमां तू कर दिया बन्द । बताया मारको ऐ शोर बखते ॥
जहर धरदी हेयाते आबकर दूर । कियाबन्द कारको ऐ शोर बखते ॥
नहीं नेमत सरासर गन्दगाकी । लगा अम्बारको ये शोर बखते ॥
गया जब भूल आजिज़ ठग भूलाया । दिया दारको ऐ शोर बखते ॥
साधुसेवा जो त्याग दुनियादार । हर तरफ देख आगदुनियादार ॥
देख आतश जिधरको जावेगा । फिर किधर जावे भागदुनियादार ॥
साधुगुरु बिनकहां ठिकाना और । है पड़ा पीछे नाग दुनियादार ॥
कुछ कर सोच दिलमें ऐ नादां । अब तू उठ और जागदुनियादार ॥
तेरे दिलदीलः भी मुकदर है । मोडले अपनी बाग दुनियादार ॥
संत सेवा बिना न पावे राह । उनकी खिदमतमें लाग दुनियादार ॥
संतके जा पकड़ कदम आजिज । देख तब राग रँग दुनियादार ॥
साधु सेवा करो भला होवे । इससे तन मन जो निर्मला होवे ॥
साधु सेवा जो करे मुवारक सो । इससे दूर अपनी बला होवे ॥
संत गुरु बिन फ़तह न पावेगा । गर तेरे हाथ रह कला होवे ॥
संतकी, रोशनीसे तब कुछ देख । होवे जों रातदिन जो ढला होवे ॥
संत बिन हो न तू रहा आजिज । कौसाही गर तू दिलचला होवे ॥
मुरब्बा ।
दुनिया पड़े वनाम खुदा जो कमायेगा । गर पेटभरने अपनेसे ज्यादा तू पायेगा ॥
देनावहक जरूर तेरे हकमें आयगा । खुमस जकात भूल बनी मार खायगा ॥
हरगिजन भूल दुनिअबी खुमसजकातको । जिसने तुझको दिया उसलाय मौतको ॥
तकसीम करता है सोई हरयकके कूबतको । खुमसजकात भूल घनी मार आयगा ॥
देना तुझे जो कुछ है सो दहीके छुटेगा । गर देनेको न देवेतो घर काल कूदेगा ॥
दौलत मताअमाल सबयकरी रोज लूटेगा । खुमस जकात भूल घनी मार आयगा ॥
यह तुही शाही शहनशाह आलमी । छुटे नहीं बहुनिपान छुटेगा सो वहीँ ॥
जाहिरकी आखदेख वातिनकी भी बबी । खुसम जकात भूल घना मार खायगा ॥
खुमसबजकातदी नहीं कारूँ होहलाक । जिनको नहीं है वौफ खुदाबर तरी पाक ॥
करतेबसर रहे जिन्दगी अपनी वाक । खुमसजकात भूल घनी मार खायगा ॥
खुमः जकातजितने हैं जमीपरमुनकराँ । बेशक तू उनको जानलेकारूँ विरादराँ ॥
भड़केगायका जगज्रबरब्वेकहरमां । न खुमसजकातभूघनीमार खायगा ॥
सनतौसिपाहसाहबफिरते जहाँ तहाँ । उनके हवालेकर जो देना बहकसुबहों ॥
पीछेखजाना खासनआजिजहैशकवहाँ । खुमसजकातभूलघनीमार खायगा ॥
तर्जियाबन्दखम्सः ।
सूझता तुमको है नहीं अन्धा । इसलिये काल कैदमें बन्धा ॥
पावेगा भेद शब्दके सन्धा । कौन कह भेद तुझ उस रब्बकी ॥
संत सूरत हैं सांच साहबकी ॥
होवे साहब वहाँ हों संत । संत बिन तु कभी न पावे कंत ॥
मुनता लीलाअपार और बेअन्त । उनकी बातें हैं कुछ जुदेढबका ॥
संत सूरत हैं साँचे साहबकी ।
हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण
सन्त महिमा अकथ सो जाने कौन । सन्त जावें जहाँ न पानी पौन ॥
निःअंगमनिःनिगम हैं साधुके भौन । आजिज वह बात और कहों तबकी॥
संत सूरत हैं सब सौंचे साहबकी ॥
यथा-ज्वरो जन व वेद बानी । है । यह गिर तारकी निशार्नी है ॥
इनसे हो जा अलग सो ज्ञानी । है मौतके तीरकी सोई गांसी ॥
हैं यही तीन कालकी फांसी ॥
गुल खिल हैं यह तीन मायारूप । डालदे आदमी अंधेरे कूप ॥
सूझे उसको न कोई साया धूप । है यह माया मायाके तीनहूँ हाँसी ॥
हैं यही तीन कालकी फांसी ।
इनको जब छोडदे सो होवे फ़क़ीर । ज़हर आलूद इनकी है तासीर॥
आजिज इनसेही मिल है पुर तक्कसीर । है सोई धर्मरायकी हँसी ॥
हैं यही तीन कालकी फांसी ॥
ग़ज़ल ।
करदिया आके अन्ध धन विद्या । कोई न मुक्ता हो पाके धन विद्या ॥
इल्मो अमलसे खबर न रही । वेखबर दिल लगाके धन विद्या ॥
जहां जाकर क्या भये दोनों । मूक उसको बनावे धन विद्या ॥
जगहमें सो नेकबख्त कहलावे । हक्कको बातिल बातवे धनन विद्या ॥
फंस मेरे कार दुनियवी दिनरात । याद हक्कको भुलावे धन विद्या ॥
तब कहाँ गुरु है और कहाँ है साधु । रहे दोजख दिखावे धन विद्या ॥
हक्को चाहे तो दोनों छोड़ आजिज । हवस दिलमें न आवे धन विद्या ॥
कारमें दुनियवी हुआ अन्धा । है तेरे वासते हुआ अन्धा ॥
डालदेवें अज़ाबमें तुझको । तब कहाँ खाला बुआ अन्धा ॥
कौन तब काम तेरे आवेगा । आके जम नाग जब छुआ अन्धा ॥
याद हकबिन जो होगया तू बैल । मोठेपर अपने धर जुआ अन्धा ॥
वेद पढ़ पढ़के क्यों हुआ नादां । मैनाही काका और तब अन्धा ॥
रहन पावें बेगैर सतगुरुके । राम क्या बोले तर सुआ अन्धा ॥
तूने उमीदकी जो समरसे । आखिर उससे उड़ा छुआ अन्धा ॥
आजिज आखिरको उस सेहो नाउमीद । देख उसमें तू था रवा अन्धा ॥
रख न उमीद बेवफा दुनिया । है यह बेसिदक़ और सफ़ा दुनिया ॥
तनको यह पालती व रूह ऊपर । करती है जोर और जफ़ा दुनिया ॥
धर्म रक्षक हिन्दू धर्मकी दुर्दशा
पहले तरगीब देकेलेवे फँसा । पीछेसे होवे फिर ख । दुनिया ॥
तेरा इनसानी बामाकर बरबाद । फेर देवेंगे यह दशा दुनिया ॥
इससे किसको है बरखोरी आजिज । पावे हरगिज न रह बका दुनिया ॥
दुनिया जो कुछ सो तेरा तन है । हेच जान इसको सोई साधन है ॥
हेच इसको जो कर तो सब कुछ हेच । फिर न दुनियाके बीच पागन है ॥
प्यार इस तनसे प्यार दुनिया है । देह दुनियाको छोड भागन है ॥
देह दुनिया नहीं तो सतगुरु देख । आखड़ा होवे तेरे आँगन है ॥
जबतलक देह दुनियासे है प्यार । तबतलक वह लगन न लागन है ॥
मारसे तुझको व्यार हो आजिज । तो मुहब्बत ये दोनों त्यागन है ॥
जो गुलामां इश्क शह आया । कुल आलमका क़िबले गह आया ॥
अर्श और फर्श सब हुये रौशन । अब मेरे घरमें मेरा मेह आया ॥
भटका फिरता था जो व्यावामें । खाके ठोकरको अपने रह आया ॥
इश्क हजरत जहां नहीं रहबर । रहमें उसके ग़ार वह छह आया ॥
इश्कसे भागजा किधर आजिज । यह अमानत जो रखने कह आया ॥
क्या हमलमें करार कर आया । उससे अब तू फिरार कर आया ॥
उसका अब तुझको नहीं कुछ होश । घेर अब अन्धकार कर आया ॥
नहीं सुनता न सूझता है कुछ । धुन्ध गर्द व गुब्बार कर आया ॥
याद अब तुझको है नहीं अपना कौल । सत्यसाहब पुकारकर आया ॥
होश करता नहीं तू ऐ बेहोश । ख्याब गुफलत खुमार कर आया ॥
होगये जीव अन्धे और बहरे । बाज़ वह हर दयार कर आया ॥
अपने बन्धनके वासते आजिज । काम तू बेशुमार कर आया ॥
जहां जाओ वहां यह नागिन है । कहरबान मिइरबान यह नागिन है ॥
सीम व ज़र वेद बानी औरत जो । भरी सारी जहां यह नागिन है ॥
जितेदुतिवाके तालिब और मतलब । ज़हर पुर दर्द यहाँ यह नागिन है ॥
काट खावें सब अहल दुनियोंको । रह बरो हमरहों यह नागिन है ॥
यही आशिक हुई वही माशूक । सब पै शहनशाह यह नागिन है ॥
लोग और वेद आजिज इसका है । साथ हरदो ज़बान यह नागिन है ॥
जगतको अन्धकार दिया उलमा । अपना घर अज्ञान भर दिया उलमा ॥
न इबादत न जोहर है तक्वा । खोल राह सक़र दिया उलमा ॥
कहां रहमान रब्ब न साध गुरु । हिर्स हैवान समर दिया उलमा ॥
हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता
अहल दुनिया दब मरे सारे । सरपर भारी हिजर दिया उलमा ॥
पेटके वासते नचे दिनरात । ख्वाब गुफलत खुमर दिया उलमा ॥
कोई न वेडार सब हुये ग्राफल । राह दिखला देहर दिया उलमा ॥
आब हैवों प्याला को कर दूर । हवस हैवों चर दिया उलमा ॥
रास्ती सूझी और न वृझ कोई । तलक्रीन शैतां सर दिया उलमा ॥
खुलक इनसानसे सब हुये महरूम । राह बतला दिये हरदिया उलमा ॥
अपने खालिकको छोडकर बतला । उन्स जोरु व जर दिया उलमा ॥
होके आदम न पावे सीधी राह । शर सद हरबशर दिया उलमा ॥
दी छिया रास्ती और खोल दरोग । राह उमीद व डर दिया उलमा ॥
कुत्ब और किससा और शरआशीरी । सबक करे व फर दिया उलमा ॥
हर बरारको सो मांगना सिखलाये । भीख रह दर बदर दिया उलमा ॥
सारे टिडी हुये उड़े आस्मां । सबको परवाज पर दिया उलमा ॥
वहां जाकर करार पावे । कौन । जाने चौरासी धर दिया उलमा ॥
कीच कसरत खबर न वहदतकी । मौज मेल मकर दिया उलमा ॥
गोता खावे हजार निकले किधर । वहरमें सद चक्र दिया उलमा ॥
पेटके काममें पचे परपंच । फिक्क व फाका फुक्क दिया उलमा ॥
ऐश व अशरतमें फँस गये आदम । ख्याबखोरिस व जहर दिया उलमा ॥
आजिज अब क्या तू आह व नालःकरे । डाल खौफ़ व खतर दिया उलमा ॥
पार जावेंगे आलिम आमिल । राह दिखावेंगे आलिम आमिल ॥
सुखरु सोई हैं दरदो जहां । दुख न पावेंगे आलिम आमिल ॥
आफ़्ररीं सद है उनको और शावास । रह लगावेंगे आलिम आमिल ॥
आप किसती चढ़े चढ़ावें और । फिर न आवेंगे आलिम आमिल ॥
आलिम आमिलकी खूबी यह आजिज । मत सिखावेंगे आलिम आमिल ॥
लिया मायाने खा चतुर व चिकनिया । गये दोजख समा चतुर व चिकनिया ॥
मिली उनको सतगुरु दस्तगीरी । रहे तारीक्या चतुर व चिकनिया ॥
न उनपर साधु गुरुकी मिहरबानी । अँधेर दिल छुटा चतुर चिकनिया ॥
वह घर आजिज फिरातन सादः लौहों । वहां कोई न जा चतुर चिकनिया ॥
भजन भगवान कर मीत प्यारे । लगा शैतान है ऐ मीत प्यारे ॥
है दिनमें काम सब जौर व सोच । कहाँ रहमान है ऐ मीत प्यारे ॥
तो जल्दी सोच जप हरी नामसे लग । यह तन इनसान है ऐ मीत प्यारे ॥
मुसलमानोंके अत्याचार
कहां फिर पावे तू यह आदमी देह । हुआ हैवान जब ऐ मीत प्यारे ॥
किधर दौलत किधर दुनिया यह जावे । कहां इरकान है ऐ मीत प्यारे ॥
नहीं मैं तू नहीं संसार आजिज । हुआ जब ज्ञान है ऐ मीत प्यारे ॥
जग डुबाते हैं पण्डितो मुल्ला । मत सिखाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
चण्डी हनुमान भैरौ पूजा कबर । रह भुलाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जबह व खून कल्ल व कुरबानी । गल काटे हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अबिन आदम पड़े ब बहरे अमीक । धर दबाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अपने लोभ और अपने मतलबको । दिल डोलाते हैं पण्डितो जो मुल्ला ॥
आदमी सो नहीं जो डंगर ढोर । पशु चराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जुल्म और जब और नाहक खून । सो कराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
रास्ती दुश्मनी और दोस्त दरोग । हक छिपाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
दोस्त हक क्यों हों दुश्मने दर्वेश । लोग भाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां मारनेको दरियामें । जाल पाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां फँसती हैं नहीं आदम । धर फँसाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
ढोल मृदङ्ग झांझ व मजीरा । टमटमाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
आजिज यह जगमें जाहिरा डग दूत । मार खाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
यथा
खबर उस यारकी कहिये फकीहो । अकलके पारकी कहिये फकीहो ॥
जहां पहुंच न विद्या वेद वाणी । वह न गुफातारकी कहिये फकीहो ॥
कहां है जिन्दगी दारु कहां मौत । वह मुहरा मारकी कहिये फकीहो ॥
हुआ हँकारसे आलम हवैदा । वहना हँकारकी कहिये फकीहो ॥
वह साहब सारेका जो वरतरी है । बड़े सर्कारकी कहिये फकीहो ॥
जहांपर अकल कुलकी अकल गुम है । रह उस दर्बारकी कहिये फकीहो ॥
अलख जिसको कहे सब सिद्धि साधू । कुनह इसरारकी कहिये फकीहो ॥
जहां नाकारा हैं सब कारबारी । वहांके कारके कहिये फकीहो ॥
शरीअत न वहां न मारफत है । वह शब्द सारकी कहिये फकीहो ॥
यह सब संसार जो दर गुप्तगू है । वह बे संसारकी कहिये फकीहो ॥
हैं सदहा खालिको मखलूक जिससे । कुछ उस कर्तार की कहिये फकीहो ॥
जहोंसे आत्मोंमें गुल खिले सब । ढब उस गुलजारकी कहिये फकीहो ॥
बना जो बागबौ और बाग सदहा । वह कुल मुख्तारकी कहिये फकीहो ॥
हिन्दुओंकी दृढ़ता, हकीकत राय
कौनसीराह व रहबर क्या सबारी । सिफत रहवारकी कहिये फ़कीहो ॥
किधर यूसफ मेरा हैं कहाँ जलीखा । वह नौ तिफसारकी कहिये फ़कीहो ॥
हुआ जिस सोचमें आजिज यह आजिज । अब उस निकायकी कहिये कीहो ॥
मुरब्बा ।
खुद ज़लो कमाल पर हैं नाजा । दिलपर है मुनतिक एतराज़ों ॥
पढ़ कुत्ब जो फरहान और शादों । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
कहते हैं जो फिलसिफे जमानः । जाने नहीं नामका निशानः ॥
जाहिद न बशकल जाहिदानः । दानादुनी हक जूहूर नादों ॥
बिन सतगुरु सारे बेखबर हैं । सब खाम ख्याल उनके सिर हैं ॥
वेद वकुत्ब उनके रहापर हैं । दानादुनी हक हुज़ूर नादों ॥
जी रूह नहीं हैं बद बानी । क्या कहसकें राहे जावेदानी ॥
बनाते जो कुछ सो सब है फानी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
पुर होगया दिल जे वह्य बातिल । मनमस्तहो याद हकसे गाफ़िल ॥
हरगिज न सूझे राह साहिल । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
मामूर व मक़ न फितनः रोबाह । भूले हैं पढ़ अस्ल अपनीकी राह ॥
क्या खूब है अकल कहिये वाह वाह । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
करते है दावा जो हक शतासी । दुनियासे हैं खुशदिल उदासी ॥
अनगैब है जो काल फांसी । दाना दुनी हक हुजू नादों ॥
इन बेखरों मत खबर कह । जो चढ़ते न साधु सैतकी रह ॥
जावें वह जिधर सो देखें सो छः । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
गर पूछो कहाँ वह हक पियाँजी । बतलाते यहाँ है और वहाँजी ॥
क्यों करसकें आजिज वह ब्याँजी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
गज़ल ।
मरेगा भूख दुखमारा तू ऐ सूम । न पावे अपना जब चारा तूरे सूम ॥
फिर दर दर भूखा मुँह पसारे । जो धन अपना जुये हारा तूऐ सूम ॥
दिया कुछ न व सेवा साधु गुरुकी । उठा इफ़लासका भारा तूऐ सूम ॥
बिहिश्ती हों न हरगिज बखीलों । किया बर्बाद धन सारा तूऐ सूम ॥
जुहद तकबान आबकाम आजिज हो जब इमसाक बधन प्यारा तूऐ सूम ॥
होवे बेशक तू सरफ़राज सखी । गिरह दिल की होवे बाज सखी ॥
हकका महबूब और तू फ़रजन्दा । उसके आगे है तेरा नाज सखी ॥
भूत पूजे जहाँ न गुरु पूजा । हक हैं पूजे जहाँ न गुरु पूजा ॥
चारों आँखोंसे अँधसो सरे । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें हैं कुछ न अकल और न तमीज । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें भक्ति गरीबीकी कहाँ बू । कुत्र सूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
सो तो हैवान सर बसर आजिजाकाम अरुझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
देख दुनियामें यार आग लगा । मैं जाना कि मेरा भाग लगा ॥
जलते ब्रह्मा विष्णु व शिव शंकर । सारे सिद्ध साधु नाग लगा ॥
लाख चौराशी छूट पिचकारी । तीन और पाँच खेल फाग लगा ॥
होवे मक्खन बने दही मही कैसे । जबतलक गुरु न अपनी जाग लगा ॥
रोना वाजिव है और नालःआह । अहमक आदम जो रंग राग लगा ॥
कौन पावे उसे किधर आजिज । जो न दिलजानसे अपने लाग लगा ॥
बैल पर पोथियाँ लदी देखा । राहमें उसके एक नदी देखा ॥
बोझसे मरता है वह बिचारा । सर बसर मगज् पुर खुदी देखा ॥
खा खली भूस समझ न सोच उसमें । चाल इनसानसे जुदी देखा ॥
दे डुबा बहरमें किताबोंको । करता रुह अपनेसे बदी देखा ॥
बैलसे खेत चर लिया आजिज । साधु संगतिमें सरमदी देखा ॥
आगया जब ज़मानः तारीकी । खोलदी जब धाना तारीकी ॥
हर बशर खाली रोशनीके चिराग । भर गई सारे खानःतारीकी ॥
देखहर सिम्त है न नूर कहीं । कर दिया सद महानःतारीकी ॥
फँस गये कार दुनियबी आदम । रोक रह जाहिदानः तारीकी ॥
उन्सकी तू वेगानः से आजिज । परदःमें करेगा न तारीकी ॥
जिसे मैं चाह बे नामो निशों है । कि मेरा माँह बे नामो निशों है ॥
किधर जाऊँ किधर दूँ द कहाँ है । यहाँकी राह बे नामो निशों है ॥
हैं कुलफानी जोहैं दरअकल और बहम् । वह क्रिबलें गाह बे नामो निशों है ॥
बहर जानिब गुलामों हुकमरों है । वह शाहनशाह बे नामो निशों है ॥
तअम दुनियामें सारे लगरहे हैं । वह बेपरवाह बे नामो निशों है ॥
हैं सवदरबन्द जो नाम और नामी । मेरा अल्लाह बे नामो निशों है ॥
हुआ आजिज अब आजिज यह किधर लाये ।
मेरा दिल ख्वाह बे नामो निशों है ॥
मुरब्बा ।
कहने सुननेमें जो कुछ आया है । वेद और कुत्ब खाने जो बतलाया है ॥
सिद्ध साधु पैगम्बरों जो गाया है । दुनियाका गुरु व पीर खुदा माया है ॥
ज्ञान ध्यान इलहाम वही और सलाम । मुतकलिम मुखातिब शब्द कलाम ॥
सामान हैं दुनियामें जितने नामी नाम । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
अकल और ख्याल ब्रह्मसे जो है पार । हरगिज़ न महसूस न सोदर गुफ्तार ॥
क्या जाने खबर वेखवरों शब्द सार । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥
दुनियाकी जो कुछ चाहसो दुनिया की कहिये । जानदार दुनि दरिया २ में हैं ॥
दरियाय जाँदार सगर धार है । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
आकिलाँ हलके अकल पेच कहा रह हैं कहाँ । जो बाहर अकल उसका माहिर है ॥
अकलके पार जो आजिज़ कहो सो जाहिर है कहाँ । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥
मुरब्बा फकीहोंपर ।
फखर दौलत दुनी देहों पर । चश्म बर खुद न किज्वजेहोंपर ॥
नजर ख्वाब व खुर मलीहोंपर । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
पढ़ गये वेद न भागवत गीता । कुत्ब ख्वानीमें उमरों बीता ॥
नफ्त अम्मारःने इन्हें जीता । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
बाअज और पन्द बात बकते हैं । माल बीयोंकी तरह तकते हैं ॥
गली कूचा न फिरते थकते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जिसनेकी आदमीका दिलकाला । जोहद व तकवाको दूरकर डाला ॥
टुक दम भी न याद हकतआला । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
रात दिन कारमें जो मरते हैं । हज्जो फुकरा खुशीसे करते हैं ॥
बैल हैं घास पर चरते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
गुज़रा दिन कारबारमें सारा । रात आई हुआ जो अँधियारा ॥
बादः गुलरु हैं महफिल आरा । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
शरआकी टट्टी जो धरते हैं । कुत्ब ख्वानीमें दिन गुजरते हैं ॥
टट्टी घोखे शिकार करते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
आप भटकते हैं औरको भटका । आबिन आदम अदमकी रह अटका ॥
होश न, पाँव गारमें लटका । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जानते लोग यह तो आलिम है । दर हकीकत सोरूस जालिम है ॥
सदहा गुमराह करते फिरते हैं । रोजोशव फिक्क मआश मरते है ॥
हकके खौफसे न डरते हैं । हाय अफसोस इस फकीहोंपर ॥
खुद फफीहत नजीहत औरोंको । बेल रह बर हुआ सतूरों को ॥
क्या तू आजिज सिखावे बूरोंको । हाय अ सोस इन कीहोंपर ॥
तरजीआ बन्द ।
जबाँ मेरी तु जबतक है दिहनमें । न हो गाफिल मदह मुशिदे कोहनमें ॥
गुरुका शुक्र और अहसान कर याद । रह उसबरमां बरी खिदमत चहनमें ॥
कभी अहसान शुक्र उसका तू मत भूल । कि, पहुँचे तू अमरपुरके सिहनमें ॥
गुरु सा और तेरा है न मददगार । बचाया शोर दरियाके बहनमें ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दोआसे ॥
खुदाने खुदाको दर परदः छिपाया । गुरुने खोलकर उसको दिखाया ॥
खुदाने कर दिया आलम अँधेरा । गुरुने इल्मका सूरज उगाया ॥
खुदाने हर तरफ झगड़ा पसारा । गुरुमे सुलहकुलकी रह बताया ॥
खुदाने आग आलममें भड़काई । गुरु बारा न रहमतकालें आया ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥
गुरु खिदमतसे ईमानकी करारी । उसीकी मिहर करमां फ़ज़ल बारी ॥
समझ और सोच किसने उतारा । गुनहका बोझ तेरे सिरसे आरी ॥
गुरु गोविन्दसे बढ़कर है साहेब । गुरु बिन कुल जहाँमें ग्रियः जारी ॥
अँधेरे जंगलिस्तानमें पड़ा था । बचाया होगया जब आजिज आरी ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । बकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥
शज़ल ।
दुनियवी गंदगी भरा निगुरा । प्यास और भूखसे मरा निगुरा ॥
रह न पावे जरूर हो गुमराह । कालुके फन्दमें पड़ा निगुरा ॥
जहाँ जावे उसे वहाँ ठोकर । खोरिश जमराजका खर निगुरा ॥
पशु पंछीसे ख्वार बत्तर है । सूरत इनसान गरधरा निगुरा ॥
पानी पीना रवा न हाथ उसके । जोनि चौरासीमें फिरा निगुरा ॥
बन्दगीकर न होवेसो मक्बूल । आग दोज़खमें जा गिरा निगुरा ॥
सीख सदहा ज़बान फनून उलूम । होवे हासिल न मुद्दोआ निगुरा ॥
है पशु गर बसूरत आदम । न दुम सींग चारपा निगुरा ॥
होता हैवान तो यह भला होता । सूरत आदम तू क्यों हो निगुरा ॥
हैं भले तुझसे अरजके हशरात । तू किधर जायगा बता निगुरा ॥
जंगल जग अँधेरेमें तू पड़ा । कौन मशअल तुझे दिखा निगुरा ॥
फड़ा खावे दरिन्दः जाओ जिधर । कौन तुझ दस्तगीरी आ निगुरा ॥
सच्चे हिन्दू और मुसलमान
होता हैवान कौन लेता हिसाब । हुआ नरलेख अब चुका निगुरा ॥
खावे ठोकरं इधर उधर फिरते । नहीं कोई तुझे जता निगुरा ॥
हुआ बेहोश होश कुछ न तुझे । कोई हरगिज नहीं जता निगुरा ॥
कुचः दिलदारकी दिखावे कौन । यार अपनेसे रह चला निगुरा ॥
बेटा ब्रह्मा जो आलिम आमिल था । नाद नापाक होगया निगुरा ॥
ऐसा ज्ञानी ऋषी जो था शुक्रदेव । फेर वैकुण्ठसे दिया निगुरा ॥
बारहा यह पुकार सत् कबीर । नहीं ठिकाना नहीं ठौर जा निगुरा ॥
कँजरीके हैं यार गार घने । सत् पर हरगिज नहीं चढ़ा निगुरा ॥
बाप है कौन पूत वैस्याका । पकड़ेबह किसका कहपला निगुरा ॥
जिसका न पीर वह दस्तगीर आजिज । पावे क्या ठौर और थरा निगुरा ॥
साखी - निगुरा ब्राह्मण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार ।
देवतनसे कुत्ता भला, जो नित उठ भुँके द्वार ॥
तरजीअ बन्द ।
क्या फसीह व बलीग जिनकी जबों । चलती तेजी तब आब वस्फ सुबहाँ ॥
मन मती खुद पसन्द व खुदबी । कुत्ब और फिका वेद बानी ख्यों ॥
गली कचःमें करते हैं बाज और पन्द । आप अन्धा है मुदई उरफों ॥
बे खबर खुद खबर सुनाते हैं । करते गुमराह सादए लोहों ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःके तौरपर कर गौर ॥
हुये केती जबोंसे माहिर । इल्म दुनियामें होगया जाहिर ॥
मैं हूँ ज्ञानी व दानया दौरों । नुत्क कर गैर गर्द दिल साहिर ॥
महरबा हर चहार सूसे हो । दिल दिमाग आपसे हुआ बाहिर ॥
होश जब यह गुरूमें भूला । फौज सरपर है मौतकी काहिर ॥
आप निगुरा बनावें गुरुमुख और । इस जमानेकी तौर पर कर गौर ॥
कहते क्या खूब है हमारी राय । हमने पहचाना अकलसे ो खुदाय ॥
मेरे वहम व ख्यालको शाबास । जान अकल व गुमानसे अस्ल जाय ॥
मैं हूँ दानाये सबकते सबपर । जिसने असली बसूलका घर पाय ॥
इन ख्यालोंसे दिलपर जो आजिज । रास्ती राह सो न हर्गिज आये ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःकी तौरपर कर गौर ॥
मुसद्दस ।
निरञ्जन दिल हिर्से हैवोंसे पूरा । है जिससे खल्लकका यह सब जहूरा ॥
हुआ इल्मों अमल उसका जो दौरा । चलाया उसको दूर अज्जक़िबलेगाही ॥
हिन्दू मुसलमान ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना
जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
ऋषेश्वर तारकुदुनुनिया दिगम्बर । हुये जो बे अदद पीरो पैगम्बर ॥
खुदा आगे जलाया ऊद व अम्बर । दिया बुतलान पर जिसने गवाही ॥
हुये सदहा जो दुनियामें सलातीं । पड़े दर कैंद शहवत शयातों ॥
हजारों सानअ और मसनूआ जहाँमें । रहे खाली जो अपने दिलहलाही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हजारों कैंसरो दारा सिकन्दर । किया क़बजः जमीं दरियावबन्दर ॥
किते सिद्ध साधु और सूफी क़लन्दर । गई उनकी न अन्दरकी स्याही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
जो मूठी बांधकर दुनियामें आवे । क़रारो कौल अपना सब भुलावे ॥
पसारे हाथ खाली फेर जावे । गदा और शाहपर आवे तबाही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राहो । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हिर्स हैवाँ जब आदमको बरा । तो दिन दोपहरको देखे वह अंधेरा ॥
कहे आजिज यह तेरा है वह मेरा । बिछाया दामसब जा मिहर व माही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
ग़ज़ल ।
बानबाने अजब लगाया बाग़ । किस्म सदहा परिन्दः बुलबुलोजान ॥
केतरेँग ढ़ंगके भरे जानदार । पर न देखा कभी कोई बेदाग़ ॥
बे अदद गुज़रे हैं अक़लो फ़हीम । कोई न दरवेश साहै आलीविभाग ॥
दुनियावी कीच फँस रहे सारे । नरहार्ई हुई न बाल फ़िराग़ ॥
कुल आलम अदमके मुल्क सभा । जिसका कोई कहीं नहीं है सुराग़ ॥
न हुकमा व शह निशां आजिज । कन्न दर्वेश पर जलाते चिराग़ ॥
तरजीआ बन्द
दुनियाभर भूल भूलैयाँ है । सब भूले अपना सपैयाँ है ॥
त्रिलोक न ढूँढे पाया है । क्योकर पड़े इस पटियाँ है ॥
निःसंग सभास्थानक साथी है । गये दूर हैं अपने जो गोइयाँ हैं ॥
पहचान नहीं सब भूल पड़े । निजरूप नहीं सब छैयाँ है ॥
सब मिट्टी पानी गारा है । यह निन्दबडी बट मारा है ॥
जो पूरब पश्चिम जाओगे । दश दिशा न ढूँढे पाओगे ॥
सब तीरथ तीरथ भरमो । सौ बार जो गंग नहाओगे ॥
सब पोथी थोथी सार नहीं । पण्डितसे वेद खोलाओगे ॥
कर योग जतन नहिं जाय रतन । सब खाली देख चिलाओगे ॥
क्योंकर मिल अपना प्यारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥
अब आन पढ़े इस जंगल हैं । आदम नहीं सब पशु दङ्गल है ॥
मन हाथी जंगल नास करे । यह मस्त महा मन मङ्गल है ॥
माने न पोथी तेरीको । क्या वेद व्याकरण पिङ्गल है ॥
वह जान कहाँ बलवान् कहाँ । बन्धे जो ज्ञानके सङ्गल है ॥
कोई संत जो मिले कढ़ारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥
कहाँ सतगुरु संत सिपाही है । निज नेत्र उसपर बाही है ॥
पकड़े चोर और गठ कटोंको । कम्मों का जङ्गल दाही है ॥
जो अगम निगमके पारा है । सो संत वहाँका राही है ॥
धरती पर धरम धराया है । धूर धाम की नोत निवाही है ॥
आजजि खुदतर और तुम्हारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥
इति ।
विविध उपदेश संग्रह
विद्याभिमानियोंको उपदेश ।
विद्याभिमानियों की बुद्धि ठिकाने न रही, उनके अन्तःकरण तर्क वितर्क और संकल्प करते रहते हैं। जबतक उनके ऐसे विचार रहेंगे तब तक वे सन्तोंके उपदेश योग्य नहीं हो सकते। वे मनुष्यकी चार अवस्थाओंपर भी विचार नहीं करते। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरिया; येही चार अवस्था, इनके व्यवहार रङ्ग ढङ्ग भिन्न भिन्न हैं, चारोंही भ्रम हैं।
जाग्रतकी सामग्री स्वप्नावस्थामें किसी काम नहीं आती, उसी प्रकार शरीरभत (कर्मकाण्ड) हकीकत (ज्ञान) तरीकत (योग) और मारफत (विज्ञान) ये सब भी वैसेही हैं। जितने पुस्तकालय हैं सब शरीरभत (कर्मकाण्ड) काही वर्णन करते हैं, जितना लिखना कहना आदिक है सब जाग्रत अवस्थाके लिये हैं। स्वप्नावस्थामें कुछ काम नहीं आते। स्वप्नावस्थामें मूर्ख और पण्डित सब एक समान होजाते हैं। जाग्रत अवस्थाका ज्ञान स्वप्नावस्थामें काम आता तो विद्वानोंमेंसे कोई भी किसी प्रकारका अपराध नहीं करता। जब कि स्वप्नावस्थामें विद्वान् और मूर्ख सब एक समानही होगये तो विद्वान् और मूर्खोंमें