भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

देवी और आसुरी संप्रदाय

तुही ऐ आग खालिक है जहाँकी । तुही महरम है इसरारे निहाँकी ॥
तुही ऐ आग सब जाँदार मामूर । तुही मालिक जमीन और आस्माँकी ॥
तुही देती है सबको खौफ अल्लाह । तु देवे फेर अकल राजदोंकी ॥
जहां आजिज न पण्डित स्वसंवेदी । तु बैठी अकल पर हर वेद ख्वाँकी ॥
जहां सत गुरु न कोई हंस उसके । वहां ऐ आग तू रह बैठ घुसके ॥५॥

यथा ।

नहीं दर्वेश सा कोई जहांमें । कि जिनको फिक्क हक्क दिल और देहों हैं ॥
जितने दुनिया सलातीन और गनी हैं । न कोई हक्क शनास इन जेरकोंमें ॥
न जिनको अपने अपने हक्कसे खबर है । सो हैवान सूरत आदम वहाँ में ॥
जिन्हें हक्कसे खबर सूर्य शहदो आलम । उनहीसे हक्क इनसानी अदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ १ ॥

जिन्हें शबो रोज अशरतमें गुजरते । न जो गुरु साधुओंका संग करते ॥
पचे निसिदिन ब आफातेन जमाना । तमअ हिसों हवस शहवतसे मरते ॥
हसद कीनः व बुगजो पुर अदावत । कभी जिकरो फिक्क हक्क दिल न धरते ॥
कुछ नहीं होश जिसको आखरतकी । सरापा सद् गुनाहोंसे लदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ २ ॥

हैं फुकरा बावशाहों आलिमोंके । सोई रहबर है मुफनसि जालिमोंके ॥
वहीं हैं जाबना बरते खुदाई । वहां बखशिन्दः हैं सब तालिमोंके ॥
वही हैवानको इनसान करते है । कायम उनसे ईमों सालिमोंके ॥
यही सुलतान यही सुलतान यही हैं । जमीं और आप्तमोंमें यह सदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ३ ॥

तु दिलमें देखले अपने दिवाने । अदमके मुल्क जब आदम समाने ॥
न तू तब है न में और है न दुनिया । न हशमत जाहका कोई कोई कारखाने ॥
फैना सब हों रहे कोई न बाकी । पलट जावेंगे जब कुछ जिस जमाने ॥
रहेंगे बाकी आशिक अल्लाह आजिज । वही बदबखत जो हक्कसे जुदा है ॥

गदा है बादशह मनअम गदा है ॥ ४ ॥

नज़म ।

तू कैसी खूब अरबी बोलता ऊंट । पकड़ लैवेगा तौभी जब तेरा घूंट ॥
जो झींगर हैं यह पण्डित सामवेदी । सो दाऊदी लहनका खूब भेदी ॥
बतक बोले अलेमानी व युनानी । रहे बाकी व तेरी भी कहानी ॥
कबूतर तीतरो बोल अरबी तुर्की । तुम्ही कह क्या खबर उस धाम धुरकी ॥

सिंहावलोकन

जो बोले संस्कृत मीठी तु मोरा । तेरा गर्दन भी धरकर काल तोरा ॥
तु अंगरेज़ी ो बोले बोल मैना । तेरा भी टूटेगा यकरोज़ डैना ॥
जो शिरीं बोल तूती फारसी है । पकड़ पिंजरेमें तुझको ड़रासी है ॥
ऐ मँढक तू सिलंगी बोल बोला । तेरे सरके ऊपर जमकर कलौला ॥
फ़रासीसी लातीनी सिख वैरा । तेरी गर्दन ऊपर भी छुरी फ़ेरा ॥
जो मेगपयी बोलयी सदहा जवानों । तुझे मारेंगे धर कहरवानों ॥
ज़ीलतसे रज़ीलत घरमें जावे । अगर सदहा जवानें सीख आवे ॥
हुआ हैवान तू इनसान मूरत । न पहचाना जो अपनी अस्ल सूरत ॥
किया था किसलिये आदमको पैदा । हुआ तू किसके ऊपर आनके शैदा ॥
तू खालिक याद कर अपना ऐ नादों । शबोरोज़ो शाम बाम दादों ॥

॥ ल-यह मान मड़क तेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।

यह भीड़ भड़क डेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ।

यह शान और शौकत इधर उधरका सैर ।

हर चार सिम्त फेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥

यह माल मुल्क जाह और हशमत व कुलाह ।

यह दुनअबी उरझेरा सो दो दिनमें गुज़रजा ॥

इससे न बड़ी नेमत है यह देह बशरकी ।

कागज़का दुनी बेरा सो दिनमें गुज़रजा ॥

सत नाम यक साहब सच पकडले आजिज़ ।

यह तेरा और मेरा दो दो दिनमें गुज़रजा ॥

छिपाया यारको ऐ शोर बखते । लखाया ग़ारको ऐ शोर बखते ॥

किया दिलने मेरे दिलबरसे परदः । जताया नाज़को ऐ शोर बखते ॥

रहे रहमां तू कर दिया बन्द । बताया मारको ऐ शोर बखते ॥

जहर धरदी हेयाते आबकर दूर । कियाबन्द कारको ऐ शोर बखते ॥

नहीं नेमत सरासर गन्दगाकी । लगा अम्बारको ये शोर बखते ॥

गया जब भूल आजिज़ ठग भूलाया । दिया दारको ऐ शोर बखते ॥

साधुसेवा जो त्याग दुनियादार । हर तरफ देख आगदुनियादार ॥

देख आतश जिधरको जावेगा । फिर किधर जावे भागदुनियादार ॥

साधुगुरु बिनकहां ठिकाना और । है पड़ा पीछे नाग दुनियादार ॥

कुछ कर सोच दिलमें ऐ नादां । अब तू उठ और जागदुनियादार ॥

तेरे दिलदीलः भी मुकदर है । मोडले अपनी बाग दुनियादार ॥
संत सेवा बिना न पावे राह । उनकी खिदमतमें लाग दुनियादार ॥
संतके जा पकड़ कदम आजिज । देख तब राग रँग दुनियादार ॥

साधु सेवा करो भला होवे । इससे तन मन जो निर्मला होवे ॥
साधु सेवा जो करे मुवारक सो । इससे दूर अपनी बला होवे ॥
संत गुरु बिन फ़तह न पावेगा । गर तेरे हाथ रह कला होवे ॥
संतकी, रोशनीसे तब कुछ देख । होवे जों रातदिन जो ढला होवे ॥
संत बिन हो न तू रहा आजिज । कौसाही गर तू दिलचला होवे ॥

मुरब्बा ।

दुनिया पड़े वनाम खुदा जो कमायेगा । गर पेटभरने अपनेसे ज्यादा तू पायेगा ॥
देनावहक जरूर तेरे हकमें आयगा । खुमस जकात भूल बनी मार खायगा ॥
हरगिजन भूल दुनिअबी खुमसजकातको । जिसने तुझको दिया उसलाय मौतको ॥
तकसीम करता है सोई हरयकके कूबतको । खुमसजकात भूल घनी मार आयगा ॥
देना तुझे जो कुछ है सो दहीके छुटेगा । गर देनेको न देवेतो घर काल कूदेगा ॥
दौलत मताअमाल सबयकरी रोज लूटेगा । खुमस जकात भूल घनी मार आयगा ॥
यह तुही शाही शहनशाह आलमी । छुटे नहीं बहुनिपान छुटेगा सो वहीँ ॥
जाहिरकी आखदेख वातिनकी भी बबी । खुसम जकात भूल घना मार खायगा ॥
खुमसबजकातदी नहीं कारूँ होहलाक । जिनको नहीं है वौफ खुदाबर तरी पाक ॥
करतेबसर रहे जिन्दगी अपनी वाक । खुमसजकात भूल घनी मार खायगा ॥
खुमः जकातजितने हैं जमीपरमुनकराँ । बेशक तू उनको जानलेकारूँ विरादराँ ॥
भड़केगायका जगज्रबरब्वेकहरमां । न खुमसजकातभूघनीमार खायगा ॥
सनतौसिपाहसाहबफिरते जहाँ तहाँ । उनके हवालेकर जो देना बहकसुबहों ॥
पीछेखजाना खासनआजिजहैशकवहाँ । खुमसजकातभूलघनीमार खायगा ॥

तर्जियाबन्दखम्सः ।

सूझता तुमको है नहीं अन्धा । इसलिये काल कैदमें बन्धा ॥

पावेगा भेद शब्दके सन्धा । कौन कह भेद तुझ उस रब्बकी ॥

संत सूरत हैं सांच साहबकी ॥

होवे साहब वहाँ हों संत । संत बिन तु कभी न पावे कंत ॥

मुनता लीलाअपार और बेअन्त । उनकी बातें हैं कुछ जुदेढबका ॥

संत सूरत हैं साँचे साहबकी ।

हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण

सन्त महिमा अकथ सो जाने कौन । सन्त जावें जहाँ न पानी पौन ॥

निःअंगमनिःनिगम हैं साधुके भौन । आजिज वह बात और कहों तबकी॥

संत सूरत हैं सब सौंचे साहबकी ॥

यथा-ज्वरो जन व वेद बानी । है । यह गिर तारकी निशार्नी है ॥

इनसे हो जा अलग सो ज्ञानी । है मौतके तीरकी सोई गांसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ॥

गुल खिल हैं यह तीन मायारूप । डालदे आदमी अंधेरे कूप ॥

सूझे उसको न कोई साया धूप । है यह माया मायाके तीनहूँ हाँसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ।

इनको जब छोडदे सो होवे फ़क़ीर । ज़हर आलूद इनकी है तासीर॥

आजिज इनसेही मिल है पुर तक्कसीर । है सोई धर्मरायकी हँसी ॥

हैं यही तीन कालकी फांसी ॥

ग़ज़ल ।

करदिया आके अन्ध धन विद्या । कोई न मुक्ता हो पाके धन विद्या ॥

इल्मो अमलसे खबर न रही । वेखबर दिल लगाके धन विद्या ॥

जहां जाकर क्या भये दोनों । मूक उसको बनावे धन विद्या ॥

जगहमें सो नेकबख्त कहलावे । हक्कको बातिल बातवे धनन विद्या ॥

फंस मेरे कार दुनियवी दिनरात । याद हक्कको भुलावे धन विद्या ॥

तब कहाँ गुरु है और कहाँ है साधु । रहे दोजख दिखावे धन विद्या ॥

हक्को चाहे तो दोनों छोड़ आजिज । हवस दिलमें न आवे धन विद्या ॥

कारमें दुनियवी हुआ अन्धा । है तेरे वासते हुआ अन्धा ॥

डालदेवें अज़ाबमें तुझको । तब कहाँ खाला बुआ अन्धा ॥

कौन तब काम तेरे आवेगा । आके जम नाग जब छुआ अन्धा ॥

याद हकबिन जो होगया तू बैल । मोठेपर अपने धर जुआ अन्धा ॥

वेद पढ़ पढ़के क्यों हुआ नादां । मैनाही काका और तब अन्धा ॥

रहन पावें बेगैर सतगुरुके । राम क्या बोले तर सुआ अन्धा ॥

तूने उमीदकी जो समरसे । आखिर उससे उड़ा छुआ अन्धा ॥

आजिज आखिरको उस सेहो नाउमीद । देख उसमें तू था रवा अन्धा ॥

रख न उमीद बेवफा दुनिया । है यह बेसिदक़ और सफ़ा दुनिया ॥

तनको यह पालती व रूह ऊपर । करती है जोर और जफ़ा दुनिया ॥

धर्म रक्षक हिन्दू धर्मकी दुर्दशा

पहले तरगीब देकेलेवे फँसा । पीछेसे होवे फिर ख । दुनिया ॥
तेरा इनसानी बामाकर बरबाद । फेर देवेंगे यह दशा दुनिया ॥
इससे किसको है बरखोरी आजिज । पावे हरगिज न रह बका दुनिया ॥

दुनिया जो कुछ सो तेरा तन है । हेच जान इसको सोई साधन है ॥
हेच इसको जो कर तो सब कुछ हेच । फिर न दुनियाके बीच पागन है ॥
प्यार इस तनसे प्यार दुनिया है । देह दुनियाको छोड भागन है ॥
देह दुनिया नहीं तो सतगुरु देख । आखड़ा होवे तेरे आँगन है ॥
जबतलक देह दुनियासे है प्यार । तबतलक वह लगन न लागन है ॥
मारसे तुझको व्यार हो आजिज । तो मुहब्बत ये दोनों त्यागन है ॥
जो गुलामां इश्क शह आया । कुल आलमका क़िबले गह आया ॥
अर्श और फर्श सब हुये रौशन । अब मेरे घरमें मेरा मेह आया ॥
भटका फिरता था जो व्यावामें । खाके ठोकरको अपने रह आया ॥
इश्क हजरत जहां नहीं रहबर । रहमें उसके ग़ार वह छह आया ॥
इश्कसे भागजा किधर आजिज । यह अमानत जो रखने कह आया ॥

क्या हमलमें करार कर आया । उससे अब तू फिरार कर आया ॥
उसका अब तुझको नहीं कुछ होश । घेर अब अन्धकार कर आया ॥
नहीं सुनता न सूझता है कुछ । धुन्ध गर्द व गुब्बार कर आया ॥
याद अब तुझको है नहीं अपना कौल । सत्यसाहब पुकारकर आया ॥
होश करता नहीं तू ऐ बेहोश । ख्याब गुफलत खुमार कर आया ॥
होगये जीव अन्धे और बहरे । बाज़ वह हर दयार कर आया ॥
अपने बन्धनके वासते आजिज । काम तू बेशुमार कर आया ॥

जहां जाओ वहां यह नागिन है । कहरबान मिइरबान यह नागिन है ॥
सीम व ज़र वेद बानी औरत जो । भरी सारी जहां यह नागिन है ॥
जितेदुतिवाके तालिब और मतलब । ज़हर पुर दर्द यहाँ यह नागिन है ॥
काट खावें सब अहल दुनियोंको । रह बरो हमरहों यह नागिन है ॥
यही आशिक हुई वही माशूक । सब पै शहनशाह यह नागिन है ॥
लोग और वेद आजिज इसका है । साथ हरदो ज़बान यह नागिन है ॥

जगतको अन्धकार दिया उलमा । अपना घर अज्ञान भर दिया उलमा ॥
न इबादत न जोहर है तक्वा । खोल राह सक़र दिया उलमा ॥
कहां रहमान रब्ब न साध गुरु । हिर्स हैवान समर दिया उलमा ॥

हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता

अहल दुनिया दब मरे सारे । सरपर भारी हिजर दिया उलमा ॥
पेटके वासते नचे दिनरात । ख्वाब गुफलत खुमर दिया उलमा ॥
कोई न वेडार सब हुये ग्राफल । राह दिखला देहर दिया उलमा ॥
आब हैवों प्याला को कर दूर । हवस हैवों चर दिया उलमा ॥
रास्ती सूझी और न वृझ कोई । तलक्रीन शैतां सर दिया उलमा ॥

खुलक इनसानसे सब हुये महरूम । राह बतला दिये हरदिया उलमा ॥
अपने खालिकको छोडकर बतला । उन्स जोरु व जर दिया उलमा ॥
होके आदम न पावे सीधी राह । शर सद हरबशर दिया उलमा ॥
दी छिया रास्ती और खोल दरोग । राह उमीद व डर दिया उलमा ॥
कुत्ब और किससा और शरआशीरी । सबक करे व फर दिया उलमा ॥
हर बरारको सो मांगना सिखलाये । भीख रह दर बदर दिया उलमा ॥
सारे टिडी हुये उड़े आस्मां । सबको परवाज पर दिया उलमा ॥
वहां जाकर करार पावे । कौन । जाने चौरासी धर दिया उलमा ॥
कीच कसरत खबर न वहदतकी । मौज मेल मकर दिया उलमा ॥
गोता खावे हजार निकले किधर । वहरमें सद चक्र दिया उलमा ॥
पेटके काममें पचे परपंच । फिक्क व फाका फुक्क दिया उलमा ॥
ऐश व अशरतमें फँस गये आदम । ख्याबखोरिस व जहर दिया उलमा ॥
आजिज अब क्या तू आह व नालःकरे । डाल खौफ़ व खतर दिया उलमा ॥

पार जावेंगे आलिम आमिल । राह दिखावेंगे आलिम आमिल ॥
सुखरु सोई हैं दरदो जहां । दुख न पावेंगे आलिम आमिल ॥
आफ़्ररीं सद है उनको और शावास । रह लगावेंगे आलिम आमिल ॥
आप किसती चढ़े चढ़ावें और । फिर न आवेंगे आलिम आमिल ॥
आलिम आमिलकी खूबी यह आजिज । मत सिखावेंगे आलिम आमिल ॥

लिया मायाने खा चतुर व चिकनिया । गये दोजख समा चतुर व चिकनिया ॥
मिली उनको सतगुरु दस्तगीरी । रहे तारीक्या चतुर व चिकनिया ॥
न उनपर साधु गुरुकी मिहरबानी । अँधेर दिल छुटा चतुर चिकनिया ॥
वह घर आजिज फिरातन सादः लौहों । वहां कोई न जा चतुर चिकनिया ॥
भजन भगवान कर मीत प्यारे । लगा शैतान है ऐ मीत प्यारे ॥
है दिनमें काम सब जौर व सोच । कहाँ रहमान है ऐ मीत प्यारे ॥
तो जल्दी सोच जप हरी नामसे लग । यह तन इनसान है ऐ मीत प्यारे ॥

मुसलमानोंके अत्याचार

कहां फिर पावे तू यह आदमी देह । हुआ हैवान जब ऐ मीत प्यारे ॥
किधर दौलत किधर दुनिया यह जावे । कहां इरकान है ऐ मीत प्यारे ॥
नहीं मैं तू नहीं संसार आजिज । हुआ जब ज्ञान है ऐ मीत प्यारे ॥

जग डुबाते हैं पण्डितो मुल्ला । मत सिखाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
चण्डी हनुमान भैरौ पूजा कबर । रह भुलाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जबह व खून कल्ल व कुरबानी । गल काटे हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अबिन आदम पड़े ब बहरे अमीक । धर दबाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
अपने लोभ और अपने मतलबको । दिल डोलाते हैं पण्डितो जो मुल्ला ॥
आदमी सो नहीं जो डंगर ढोर । पशु चराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
जुल्म और जब और नाहक खून । सो कराते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
रास्ती दुश्मनी और दोस्त दरोग । हक छिपाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
दोस्त हक क्यों हों दुश्मने दर्वेश । लोग भाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां मारनेको दरियामें । जाल पाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
मच्छियां फँसती हैं नहीं आदम । धर फँसाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
ढोल मृदङ्ग झांझ व मजीरा । टमटमाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥
आजिज यह जगमें जाहिरा डग दूत । मार खाते हैं पण्डितो मुल्ला ॥

यथा

खबर उस यारकी कहिये फकीहो । अकलके पारकी कहिये फकीहो ॥
जहां पहुंच न विद्या वेद वाणी । वह न गुफातारकी कहिये फकीहो ॥
कहां है जिन्दगी दारु कहां मौत । वह मुहरा मारकी कहिये फकीहो ॥
हुआ हँकारसे आलम हवैदा । वहना हँकारकी कहिये फकीहो ॥
वह साहब सारेका जो वरतरी है । बड़े सर्कारकी कहिये फकीहो ॥
जहांपर अकल कुलकी अकल गुम है । रह उस दर्बारकी कहिये फकीहो ॥
अलख जिसको कहे सब सिद्धि साधू । कुनह इसरारकी कहिये फकीहो ॥
जहां नाकारा हैं सब कारबारी । वहांके कारके कहिये फकीहो ॥
शरीअत न वहां न मारफत है । वह शब्द सारकी कहिये फकीहो ॥
यह सब संसार जो दर गुप्तगू है । वह बे संसारकी कहिये फकीहो ॥
हैं सदहा खालिको मखलूक जिससे । कुछ उस कर्तार की कहिये फकीहो ॥
जहोंसे आत्मोंमें गुल खिले सब । ढब उस गुलजारकी कहिये फकीहो ॥
बना जो बागबौ और बाग सदहा । वह कुल मुख्तारकी कहिये फकीहो ॥

हिन्दुओंकी दृढ़ता, हकीकत राय

कौनसीराह व रहबर क्या सबारी । सिफत रहवारकी कहिये फ़कीहो ॥
किधर यूसफ मेरा हैं कहाँ जलीखा । वह नौ तिफसारकी कहिये फ़कीहो ॥
हुआ जिस सोचमें आजिज यह आजिज । अब उस निकायकी कहिये कीहो ॥

मुरब्बा ।

खुद ज़लो कमाल पर हैं नाजा । दिलपर है मुनतिक एतराज़ों ॥
पढ़ कुत्ब जो फरहान और शादों । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
कहते हैं जो फिलसिफे जमानः । जाने नहीं नामका निशानः ॥
जाहिद न बशकल जाहिदानः । दानादुनी हक जूहूर नादों ॥
बिन सतगुरु सारे बेखबर हैं । सब खाम ख्याल उनके सिर हैं ॥
वेद वकुत्ब उनके रहापर हैं । दानादुनी हक हुज़ूर नादों ॥
जी रूह नहीं हैं बद बानी । क्या कहसकें राहे जावेदानी ॥
बनाते जो कुछ सो सब है फानी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
पुर होगया दिल जे वह्य बातिल । मनमस्तहो याद हकसे गाफ़िल ॥
हरगिज न सूझे राह साहिल । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
मामूर व मक़ न फितनः रोबाह । भूले हैं पढ़ अस्ल अपनीकी राह ॥
क्या खूब है अकल कहिये वाह वाह । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
करते है दावा जो हक शतासी । दुनियासे हैं खुशदिल उदासी ॥
अनगैब है जो काल फांसी । दाना दुनी हक हुजू नादों ॥
इन बेखरों मत खबर कह । जो चढ़ते न साधु सैतकी रह ॥
जावें वह जिधर सो देखें सो छः । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥
गर पूछो कहाँ वह हक पियाँजी । बतलाते यहाँ है और वहाँजी ॥
क्यों करसकें आजिज वह ब्याँजी । दाना दुनी हक हुज़ूर नादों ॥

गज़ल ।

मरेगा भूख दुखमारा तू ऐ सूम । न पावे अपना जब चारा तूरे सूम ॥
फिर दर दर भूखा मुँह पसारे । जो धन अपना जुये हारा तूऐ सूम ॥
दिया कुछ न व सेवा साधु गुरुकी । उठा इफ़लासका भारा तूऐ सूम ॥
बिहिश्ती हों न हरगिज बखीलों । किया बर्बाद धन सारा तूऐ सूम ॥
जुहद तकबान आबकाम आजिज हो जब इमसाक बधन प्यारा तूऐ सूम ॥
होवे बेशक तू सरफ़राज सखी । गिरह दिल की होवे बाज सखी ॥
हकका महबूब और तू फ़रजन्दा । उसके आगे है तेरा नाज सखी ॥

भूत पूजे जहाँ न गुरु पूजा । हक हैं पूजे जहाँ न गुरु पूजा ॥
चारों आँखोंसे अँधसो सरे । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें हैं कुछ न अकल और न तमीज । क्या सो बूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
उनमें भक्ति गरीबीकी कहाँ बू । कुत्र सूझे जहाँ न गुरु पूजा ॥
सो तो हैवान सर बसर आजिजाकाम अरुझे जहाँ न गुरु पूजा ॥

देख दुनियामें यार आग लगा । मैं जाना कि मेरा भाग लगा ॥
जलते ब्रह्मा विष्णु व शिव शंकर । सारे सिद्ध साधु नाग लगा ॥
लाख चौराशी छूट पिचकारी । तीन और पाँच खेल फाग लगा ॥
होवे मक्खन बने दही मही कैसे । जबतलक गुरु न अपनी जाग लगा ॥
रोना वाजिव है और नालःआह । अहमक आदम जो रंग राग लगा ॥
कौन पावे उसे किधर आजिज । जो न दिलजानसे अपने लाग लगा ॥

बैल पर पोथियाँ लदी देखा । राहमें उसके एक नदी देखा ॥
बोझसे मरता है वह बिचारा । सर बसर मगज् पुर खुदी देखा ॥
खा खली भूस समझ न सोच उसमें । चाल इनसानसे जुदी देखा ॥
दे डुबा बहरमें किताबोंको । करता रुह अपनेसे बदी देखा ॥
बैलसे खेत चर लिया आजिज । साधु संगतिमें सरमदी देखा ॥

आगया जब ज़मानः तारीकी । खोलदी जब धाना तारीकी ॥
हर बशर खाली रोशनीके चिराग । भर गई सारे खानःतारीकी ॥
देखहर सिम्त है न नूर कहीं । कर दिया सद महानःतारीकी ॥
फँस गये कार दुनियबी आदम । रोक रह जाहिदानः तारीकी ॥
उन्सकी तू वेगानः से आजिज । परदःमें करेगा न तारीकी ॥

जिसे मैं चाह बे नामो निशों है । कि मेरा माँह बे नामो निशों है ॥
किधर जाऊँ किधर दूँ द कहाँ है । यहाँकी राह बे नामो निशों है ॥
हैं कुलफानी जोहैं दरअकल और बहम् । वह क्रिबलें गाह बे नामो निशों है ॥
बहर जानिब गुलामों हुकमरों है । वह शाहनशाह बे नामो निशों है ॥
तअम दुनियामें सारे लगरहे हैं । वह बेपरवाह बे नामो निशों है ॥
हैं सवदरबन्द जो नाम और नामी । मेरा अल्लाह बे नामो निशों है ॥
हुआ आजिज अब आजिज यह किधर लाये ।

मेरा दिल ख्वाह बे नामो निशों है ॥

मुरब्बा ।

कहने सुननेमें जो कुछ आया है । वेद और कुत्ब खाने जो बतलाया है ॥
सिद्ध साधु पैगम्बरों जो गाया है । दुनियाका गुरु व पीर खुदा माया है ॥
ज्ञान ध्यान इलहाम वही और सलाम । मुतकलिम मुखातिब शब्द कलाम ॥
सामान हैं दुनियामें जितने नामी नाम । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
अकल और ख्याल ब्रह्मसे जो है पार । हरगिज़ न महसूस न सोदर गुफ्तार ॥
क्या जाने खबर वेखवरों शब्द सार । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥
दुनियाकी जो कुछ चाहसो दुनिया की कहिये । जानदार दुनि दरिया २ में हैं ॥
दरियाय जाँदार सगर धार है । दुनियाका गुरु पीर खुदा माया है ॥
आकिलाँ हलके अकल पेच कहा रह हैं कहाँ । जो बाहर अकल उसका माहिर है ॥
अकलके पार जो आजिज़ कहो सो जाहिर है कहाँ । दुनियाका गुरुपीर खुदा माया है ॥

मुरब्बा फकीहोंपर ।

फखर दौलत दुनी देहों पर । चश्म बर खुद न किज्वजेहोंपर ॥
नजर ख्वाब व खुर मलीहोंपर । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
पढ़ गये वेद न भागवत गीता । कुत्ब ख्वानीमें उमरों बीता ॥
नफ्त अम्मारःने इन्हें जीता । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
बाअज और पन्द बात बकते हैं । माल बीयोंकी तरह तकते हैं ॥
गली कूचा न फिरते थकते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जिसनेकी आदमीका दिलकाला । जोहद व तकवाको दूरकर डाला ॥
टुक दम भी न याद हकतआला । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
रात दिन कारमें जो मरते हैं । हज्जो फुकरा खुशीसे करते हैं ॥
बैल हैं घास पर चरते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
गुज़रा दिन कारबारमें सारा । रात आई हुआ जो अँधियारा ॥
बादः गुलरु हैं महफिल आरा । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
शरआकी टट्टी जो धरते हैं । कुत्ब ख्वानीमें दिन गुजरते हैं ॥
टट्टी घोखे शिकार करते हैं । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
आप भटकते हैं औरको भटका । आबिन आदम अदमकी रह अटका ॥
होश न, पाँव गारमें लटका । हाय अफसोस इन फकीहोंपर ॥
जानते लोग यह तो आलिम है । दर हकीकत सोरूस जालिम है ॥
सदहा गुमराह करते फिरते हैं । रोजोशव फिक्क मआश मरते है ॥
हकके खौफसे न डरते हैं । हाय अफसोस इस फकीहोंपर ॥

खुद फफीहत नजीहत औरोंको । बेल रह बर हुआ सतूरों को ॥
क्या तू आजिज सिखावे बूरोंको । हाय अ सोस इन कीहोंपर ॥
तरजीआ बन्द ।

जबाँ मेरी तु जबतक है दिहनमें । न हो गाफिल मदह मुशिदे कोहनमें ॥
गुरुका शुक्र और अहसान कर याद । रह उसबरमां बरी खिदमत चहनमें ॥
कभी अहसान शुक्र उसका तू मत भूल । कि, पहुँचे तू अमरपुरके सिहनमें ॥
गुरु सा और तेरा है न मददगार । बचाया शोर दरियाके बहनमें ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दोआसे ॥
खुदाने खुदाको दर परदः छिपाया । गुरुने खोलकर उसको दिखाया ॥
खुदाने कर दिया आलम अँधेरा । गुरुने इल्मका सूरज उगाया ॥
खुदाने हर तरफ झगड़ा पसारा । गुरुमे सुलहकुलकी रह बताया ॥
खुदाने आग आलममें भड़काई । गुरु बारा न रहमतकालें आया ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । फकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥
गुरु खिदमतसे ईमानकी करारी । उसीकी मिहर करमां फ़ज़ल बारी ॥
समझ और सोच किसने उतारा । गुनहका बोझ तेरे सिरसे आरी ॥
गुरु गोविन्दसे बढ़कर है साहेब । गुरु बिन कुल जहाँमें ग्रियः जारी ॥
अँधेरे जंगलिस्तानमें पड़ा था । बचाया होगया जब आजिज आरी ॥
मिला तू अपने असली मुद्दोआसे । बकत मिहर और गुरुजीकी दुआसे ॥

शज़ल ।

दुनियवी गंदगी भरा निगुरा । प्यास और भूखसे मरा निगुरा ॥
रह न पावे जरूर हो गुमराह । कालुके फन्दमें पड़ा निगुरा ॥
जहाँ जावे उसे वहाँ ठोकर । खोरिश जमराजका खर निगुरा ॥
पशु पंछीसे ख्वार बत्तर है । सूरत इनसान गरधरा निगुरा ॥
पानी पीना रवा न हाथ उसके । जोनि चौरासीमें फिरा निगुरा ॥
बन्दगीकर न होवेसो मक्बूल । आग दोज़खमें जा गिरा निगुरा ॥
सीख सदहा ज़बान फनून उलूम । होवे हासिल न मुद्दोआ निगुरा ॥
है पशु गर बसूरत आदम । न दुम सींग चारपा निगुरा ॥
होता हैवान तो यह भला होता । सूरत आदम तू क्यों हो निगुरा ॥
हैं भले तुझसे अरजके हशरात । तू किधर जायगा बता निगुरा ॥
जंगल जग अँधेरेमें तू पड़ा । कौन मशअल तुझे दिखा निगुरा ॥
फड़ा खावे दरिन्दः जाओ जिधर । कौन तुझ दस्तगीरी आ निगुरा ॥

सच्चे हिन्दू और मुसलमान

होता हैवान कौन लेता हिसाब । हुआ नरलेख अब चुका निगुरा ॥
खावे ठोकरं इधर उधर फिरते । नहीं कोई तुझे जता निगुरा ॥
हुआ बेहोश होश कुछ न तुझे । कोई हरगिज नहीं जता निगुरा ॥
कुचः दिलदारकी दिखावे कौन । यार अपनेसे रह चला निगुरा ॥
बेटा ब्रह्मा जो आलिम आमिल था । नाद नापाक होगया निगुरा ॥
ऐसा ज्ञानी ऋषी जो था शुक्रदेव । फेर वैकुण्ठसे दिया निगुरा ॥
बारहा यह पुकार सत् कबीर । नहीं ठिकाना नहीं ठौर जा निगुरा ॥
कँजरीके हैं यार गार घने । सत् पर हरगिज नहीं चढ़ा निगुरा ॥
बाप है कौन पूत वैस्याका । पकड़ेबह किसका कहपला निगुरा ॥
जिसका न पीर वह दस्तगीर आजिज । पावे क्या ठौर और थरा निगुरा ॥
साखी - निगुरा ब्राह्मण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार ।
देवतनसे कुत्ता भला, जो नित उठ भुँके द्वार ॥

तरजीअ बन्द ।

क्या फसीह व बलीग जिनकी जबों । चलती तेजी तब आब वस्फ सुबहाँ ॥
मन मती खुद पसन्द व खुदबी । कुत्ब और फिका वेद बानी ख्यों ॥
गली कचःमें करते हैं बाज और पन्द । आप अन्धा है मुदई उरफों ॥
बे खबर खुद खबर सुनाते हैं । करते गुमराह सादए लोहों ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःके तौरपर कर गौर ॥
हुये केती जबोंसे माहिर । इल्म दुनियामें होगया जाहिर ॥
मैं हूँ ज्ञानी व दानया दौरों । नुत्क कर गैर गर्द दिल साहिर ॥
महरबा हर चहार सूसे हो । दिल दिमाग आपसे हुआ बाहिर ॥
होश जब यह गुरूमें भूला । फौज सरपर है मौतकी काहिर ॥
आप निगुरा बनावें गुरुमुख और । इस जमानेकी तौर पर कर गौर ॥
कहते क्या खूब है हमारी राय । हमने पहचाना अकलसे ो खुदाय ॥
मेरे वहम व ख्यालको शाबास । जान अकल व गुमानसे अस्ल जाय ॥
मैं हूँ दानाये सबकते सबपर । जिसने असली बसूलका घर पाय ॥
इन ख्यालोंसे दिलपर जो आजिज । रास्ती राह सो न हर्गिज आये ॥
आप निगुरा बनावे गुरुमुख और । इस जमानःकी तौरपर कर गौर ॥

मुसद्दस ।

निरञ्जन दिल हिर्से हैवोंसे पूरा । है जिससे खल्लकका यह सब जहूरा ॥
हुआ इल्मों अमल उसका जो दौरा । चलाया उसको दूर अज्जक़िबलेगाही ॥

हिन्दू मुसलमान ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना

जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
ऋषेश्वर तारकुदुनुनिया दिगम्बर । हुये जो बे अदद पीरो पैगम्बर ॥
खुदा आगे जलाया ऊद व अम्बर । दिया बुतलान पर जिसने गवाही ॥
हुये सदहा जो दुनियामें सलातीं । पड़े दर कैंद शहवत शयातों ॥
हजारों सानअ और मसनूआ जहाँमें । रहे खाली जो अपने दिलहलाही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हजारों कैंसरो दारा सिकन्दर । किया क़बजः जमीं दरियावबन्दर ॥
किते सिद्ध साधु और सूफी क़लन्दर । गई उनकी न अन्दरकी स्याही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
जो मूठी बांधकर दुनियामें आवे । क़रारो कौल अपना सब भुलावे ॥
पसारे हाथ खाली फेर जावे । गदा और शाहपर आवे तबाही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राहो । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हिर्स हैवाँ जब आदमको बरा । तो दिन दोपहरको देखे वह अंधेरा ॥
कहे आजिज यह तेरा है वह मेरा । बिछाया दामसब जा मिहर व माही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥

ग़ज़ल ।

बानबाने अजब लगाया बाग़ । किस्म सदहा परिन्दः बुलबुलोजान ॥
केतरेँग ढ़ंगके भरे जानदार । पर न देखा कभी कोई बेदाग़ ॥
बे अदद गुज़रे हैं अक़लो फ़हीम । कोई न दरवेश साहै आलीविभाग ॥
दुनियावी कीच फँस रहे सारे । नरहार्ई हुई न बाल फ़िराग़ ॥
कुल आलम अदमके मुल्क सभा । जिसका कोई कहीं नहीं है सुराग़ ॥
न हुकमा व शह निशां आजिज । कन्न दर्वेश पर जलाते चिराग़ ॥

तरजीआ बन्द

दुनियाभर भूल भूलैयाँ है । सब भूले अपना सपैयाँ है ॥
त्रिलोक न ढूँढे पाया है । क्योकर पड़े इस पटियाँ है ॥
निःसंग सभास्थानक साथी है । गये दूर हैं अपने जो गोइयाँ हैं ॥
पहचान नहीं सब भूल पड़े । निजरूप नहीं सब छैयाँ है ॥
सब मिट्टी पानी गारा है । यह निन्दबडी बट मारा है ॥
जो पूरब पश्चिम जाओगे । दश दिशा न ढूँढे पाओगे ॥
सब तीरथ तीरथ भरमो । सौ बार जो गंग नहाओगे ॥

सब पोथी थोथी सार नहीं । पण्डितसे वेद खोलाओगे ॥
कर योग जतन नहिं जाय रतन । सब खाली देख चिलाओगे ॥
क्योंकर मिल अपना प्यारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥

अब आन पढ़े इस जंगल हैं । आदम नहीं सब पशु दङ्गल है ॥
मन हाथी जंगल नास करे । यह मस्त महा मन मङ्गल है ॥
माने न पोथी तेरीको । क्या वेद व्याकरण पिङ्गल है ॥
वह जान कहाँ बलवान् कहाँ । बन्धे जो ज्ञानके सङ्गल है ॥
कोई संत जो मिले कढ़ारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥

कहाँ सतगुरु संत सिपाही है । निज नेत्र उसपर बाही है ॥
पकड़े चोर और गठ कटोंको । कम्मों का जङ्गल दाही है ॥
जो अगम निगमके पारा है । सो संत वहाँका राही है ॥
धरती पर धरम धराया है । धूर धाम की नोत निवाही है ॥
आजजि खुदतर और तुम्हारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥
इति ।

विविध उपदेश संग्रह

विद्याभिमानियोंको उपदेश ।

विद्याभिमानियों की बुद्धि ठिकाने न रही, उनके अन्तःकरण तर्क वितर्क और संकल्प करते रहते हैं। जबतक उनके ऐसे विचार रहेंगे तब तक वे सन्तोंके उपदेश योग्य नहीं हो सकते। वे मनुष्यकी चार अवस्थाओंपर भी विचार नहीं करते। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरिया; येही चार अवस्था, इनके व्यवहार रङ्ग ढङ्ग भिन्न भिन्न हैं, चारोंही भ्रम हैं।

जाग्रतकी सामग्री स्वप्नावस्थामें किसी काम नहीं आती, उसी प्रकार शरीरभत (कर्मकाण्ड) हकीकत (ज्ञान) तरीकत (योग) और मारफत (विज्ञान) ये सब भी वैसेही हैं। जितने पुस्तकालय हैं सब शरीरभत (कर्मकाण्ड) काही वर्णन करते हैं, जितना लिखना कहना आदिक है सब जाग्रत अवस्थाके लिये हैं। स्वप्नावस्थामें कुछ काम नहीं आते। स्वप्नावस्थामें मूर्ख और पण्डित सब एक समान होजाते हैं। जाग्रत अवस्थाका ज्ञान स्वप्नावस्थामें काम आता तो विद्वानोंमेंसे कोई भी किसी प्रकारका अपराध नहीं करता। जब कि स्वप्नावस्थामें विद्वान् और मूर्ख सब एक समानही होगये तो विद्वान् और मूर्खोंमें

उदारता और वीरता

कुछ विशेषता नहीं हुई । विद्वानभी मूर्खोंके समान वेही कर्म करते हैं उनके पुस्तकालय कोई काम नहीं आते । यह मनुष्यकी दूसरी अवस्था है, जब कि, दूसरीही अवस्था में विद्या और कला कौशल तुच्छ हो गये जब उनकी कुल विद्या कला कौशल केवल जाग्रतके लियेही हो तो जाग्रतकी अतिरिक्त अवस्थाओंके लिये कौनसी विद्या और बुद्धिमानी आवश्यक है, उनमें तो जाग्रतकी कोई सामग्री नहीं होती । सुषुप्तिसे आगे तुरीयातीत अवस्थाओंमें कौन पुस्तक वेद किताब और मार्ग बतलाती है । इन बातोंका भेद विद्याभिमानी बिचारे क्या जाने, उनको इस बातकी सुधिभी नहीं हो सकती । स्वयं सत्य विचार और अभ्यास भक्ति तो हो ही नहीं सकती, वे सन्त सेवा जानतेही नहीं बरन् सन्तोंसे ईर्षा करते हैं कि, देखो हम लोग इतना परिश्रम करके दिनरात उसीमें लगे रहनेपर अपनी रोटी प्राप्त करते हैं पर फकीर बिना परिश्रम केही हूष्ट पुष्ट बने रहते हैं, ऐसे विचार करनेवाले बिलकुल अन्धे और बुद्धिहीन हैं । उनमें तनिक भी विचार नहीं कि, जीवधारियोंको कौन भोजन देता है ? उन्हें कौन वस्त्र पहनाता है ? कितने जीवधारी पशु पक्षी ऐसे वस्त्र पहनते हैं कि, मनुष्योंको स्वप्नमेंभी नहीं प्राप्त हो सकते । भलाजी, जो पापियोंका पोषण करता है वह अपने मुख्य शिष्योंको किस प्रकार भूल सकता है ? विद्याभिमानी लोगोंका इन बातोंके ऊपर ध्यान न देनेसे उनकी बुद्धि अन्धकारमय होगयी ।

ज्ञानकी सात भूमिका हैं, उनमें केवल तीन भूमिकातक वेद और किताब हैं, शेषकी भूमिकाओंमें वेद और किताबोंकी आवश्यकता नहीं इसी कारण सन्तोंके अतिरिक्त शेष भूमिकाकी बातें विद्याभिमानी नहीं जान सकते । उन अवस्थाओंका भेद सत्यगुरुकी भक्ति और सेवाकर कृपापात्र बननेसे प्राप्त हो सकता है । यदि पुस्तकोंसेही ये बातें प्राप्त होती तो संसारके बड़े २ विद्वान, राजे, महाराजे फकीर क्यों बन जाते ? विद्याभिमानियोंकी बुद्धि और विवेक सीमाबद्ध है । सच्चे सन्त ज्ञान और विवेकके भण्डार हैं उनकी बुद्धि अपार है यदि पुस्तकोंकेही पढ़नेसे ईश्वरीय भेदकी बातें जानी जाती तो सन्तोंके उपदेशकी आवश्यकताही न होती । इस कारण मनुष्यको उचित है कि, पारलौकिक ज्ञान की प्राप्तिके लिये सच्चे सन्तोंकी शरणकोही ग्रहण करें, सांसारिक विषयमें विद्वानोंकी आवश्यकता है ।

नवकोश और पांच अहङ्कारोंका भी वर्णन कर आया है कि, इस जीवने नौकोशोंमें अपना घर बनाया, पुस्तकादि कला, कौशल सब प्रथम कोशके सम्बन्धी हैं । सब अवस्थाओं और कोशोंकी सुधि, सच्चे विचारवान् ज्ञानी

साधुओंकी स्थिति

सन्तोंकोही है। विद्याभिमानी लोग बिलकुल बेसुध हैं। ये सब बातें भजन और विचारके साथ सम्बन्ध रखते हैं। पांच अहङ्कार और छः प्रकारके देहके गुप्त भेदोंकी सुधि अभिमानियों और नास्तिकोंको नहीं मिल सकती, कौन ऐसा सांसारिक है ? जो अद्वैतकी बात जानता है, क्योंकि, सांसारिक सब लोग तो भेदकी बातेंही करते हैं।

सच्चे सन्त ज्ञानी निष्काम लोग जब भेदकी बातें समझते हैं तो विद्याभिमानी लोग उनसे कहते हैं कि, कुछ आँखसे दिखलाओ तभी इन बातोंपर विश्वास हो। वे बातें इस प्रकार हैं जैसे कि, कोई जन्मका अन्धा कहे कि, सूर्य और चन्द्रमा नहीं है, यद्यपि सूर्य और चन्द्रका देखना आँखका काम है आँख ही उसके नहीं है तो किस प्रकार देख सकेगा ? इसी प्रकार जो विद्याभिमानी लोग शुद्ध विचार और विवेकसे शून्य हैं वे ईश्वरी गुप्त भेदोंको किस प्रकार जान सकेंगे ? यह तो विचारवान् विवेकी शुद्ध और सरल हृदयके सन्तोंकाही भाग है। यही कारण है कि, सच्चे सन्तों और विद्याभिमानियोंमें, सर्वदासे विरोध चला आता है, विद्याभिमानियोंकी सङ्गति, भजन छुड़ा देती है। सब सन्तोंका इस बातपर एक मत है कि, प्राकृतिक विद्याभिमानी मनुष्योंसे अलग रहो। अतएव हजरत मसीह फरमाते हैं कि, मरकसकी इञ्जील १२ बाब २८ आयत—फकी हों (कर्मकाण्डके उपदेश करनेवालों) से हुशियार रहो, जो कि, लम्बे जामें पहनकर बाजारोंमें सलामोंकोइबादत् खानोंमें उच्च आसन और ज्याफतोंमें सबसे ऊँची जगहोंको चाहते हैं।

जीवधारी अपने मुंहसे खाते हैं उनके सब अङ्गोंमें रस पहुँचता है, यदि वे नाक, कान आदि किसी दूसरी इन्द्रियोंसे खावें तो नहीं खा सकते, वरन् अस्वस्थ हो जायेंगे इसी प्रकार सच्चे सन्त और सत्यगुरुकी सेवा आज्ञाकारितासे भुक्ति मुक्ति और ज्ञान आदिककी प्राप्ति होती है। यह गुण विद्याभिमानियोंमें नहीं है। क्योंकि, वे तो अपनी बुद्धिके अहङ्कारमें ऐसे डूबे होते हैं कि, उन्हें तो सत्य असत्यका यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता, यही विचार कर सन्तोंने, उनको उपदेश देना छोड़ दिया है इसी विषयपर कबीर साहिबने कहा है कि—

इल्म पढ़ाकर अमल न कीता । सीखा बहुतक हिल्ला ॥
उमरांवाके मजलिस बैठें । लुकमें खॉय सकिल्ला ॥
चिकनी बातें बहुत बनावें । आन हूदीस दलिल्ला ॥
बगला हंसके रूप बनाये । कुल ईमान बिलिल्ला ॥

२३ अ० गजलोंसे उपदेश(इसमें कवित्तमय अनेक उपदेश हैं )

अकल असर सब शगल किया है । शिकम किया है मिल्ला ॥
कहैं कबीर यह मसलें पढ़कर । मान बिगाने लिल्ला ॥

बुष्ट स्वभावको विद्याभिमानियोंने वर्तमान कालके लोगोंको ऐसा कठिन हृदय और कुमार्गी बना दिया है कि, संसारसे भक्ति और भजन उठ गया । विद्याभिमानियोंसे सद्गुरुकी सेवा बहुत कठिन है । वे बुष्ट सन्तोंके शत्रु हैं । उन्होंने समस्त संसारको भ्रष्ट कर दिया है । समस्त संसारमें अज्ञानता फैल गई है । सबके अन्तःकरण अशुद्ध हो गये हैं । न्यायी राजा और शासक लोग सर्वदा इस बातका ध्यान रखते हैं कि, सन्तों साधुओं और भक्तोंकी सेवा शुश्रूषा होती रहे कि, जिससे संसारमें ईश्वरका भय और भक्ति स्थिर रहे सन्तोंकी कृपादृष्टिसे लोक परलोक सुधरता है । सांसारिक शास्त्रोंके जाननेवाले अथवा सांसारिक विद्याओंके ज्ञाता तो सांसारिक व्यवहारकी बातोंमें सहायक हो सकते हैं, पारलौकिक उपदेशमें उनका कहना और सुनना तुच्छ है, बरन् उनकी धर्मव्याख्या सुनकर भी मनुष्य अज्ञानी होकर धर्मविरुद्ध काम करता है ।

मनुष्य वही है जो इस बातपर सोच विचार करेकि जिसको सांसारिक मनुष्य पूजते और अपना ईश्वर समझते हैं वह तो छल और कपटसे भरा हुआ है, वह सदा मनुष्योंसे कपट और धोखा करता चला आता है, ऐसे छली कपटीको अपना मुक्तिदाता मित्र समझते हैं । जिसको लोग पूजते हैं वह संसारमेंही बन्धन करनेवाली माया है ।

देखो योहन्नाकी इञ्जील ८ बाब १ आयत—हजरत ईसा स्पष्ट कहते हैं कि, चोर नहीं आता चुराने और कत्तल करनेको, मैं आया हूँ । हजरत तो हाँक मारकर कहते हैं कि, मैं चुराने और कत्तल कराने आया हूँ । फिर मत्तीकी इञ्जील १० बाब ३२ आयत—यह मत समझो कि, मैं पृथ्वीपर सुलह करवाने आया हूँ, बरन् तलवार चलवाने आया हूँ । इसमें हजरतका क्या अपराध है, उन्होंने तो स्पष्ट कह दिया, यदि यह बात ईसाइयोंके समझमें न आवे तो किसका अपराध ?

मूसाके खुदाने उससे साफ कह दिया था कि, मैंने कनआके बत्तीस बादशाहोंको मार लिया । मूसासे उन सभीोंको नष्ट करवा दिया । मुसलमानोंको किसने लड़ाई और जेहाद सिखलाया ? जिस खुदाने समस्त संसारको बाँध लिया उसी खुदाकी पूजा सब करते । जो उपरोक्त बातोंपर सोचे और विचार करे वही मनुष्य भक्तिका अधिकारी है ।

सब मनुष्य एकही अच्युत परमात्माकी भक्तिका दावा रखते हैं। चाहे वह भूतही पूजते हों वा ईश्वरकी भक्ति करते हों। यदि किसीसे कहो कि, तू बुत्तपरस्त है, सच्चे अच्युत परमात्माकी भक्ति नहीं जानता, तो इस बातपर अवश्यही क्रोधित होया। हठसे कहेगा कि, मैं एकही परमात्माकी पूजा करता हूँ। इस बातके लिये प्रथम हिन्दूजातिकी ओर ध्यान देना चाहिये, जिसको प्रथम ईश्वरने वेद प्रदान किया उसके अनुसार ये चलने लगे। यद्यपि वेदके आशयको समझना बहुत कठिन है पर सब मतावलम्बियोंने अपने विचारानुसार मन्त्रोंके अर्थ किये, उसीपर सन्तोष करके बैठ रहे। अपनेको कृतार्थ समझ लिया। यह किसीको सुधि नहीं रही कि, वेदके अमुक मन्त्रका क्या अर्थ है? उसका यथार्थ आशय क्या है? जैसा जिस धर्मके आचार्योंने अर्थ किया, उनके अनुयायी उसीके अनुसार अनुकरण करते आये। अपने आचार्योंसे बढ़कर न किसीकी बुद्धि होती है, न प्रयत्न करके वह अपनी बुद्धिको फैलानाही चाहता है, क्योंकि, पक्षपातमें पड़कर हठ और दुराग्रहसे अपने आचार्यकोही सर्व शिरोमणि, सर्व गुणविद्या और ज्ञाननिधान जानता है, यदि उसको सारासार विचारणीय बुद्धि हो तो भ्रमकी ओर ध्यान न दे जो ऐसे पक्षपाती हैं उनको सत्यमार्ग भी बतलाओ, वह सत्य जान भी ले तो भी दुराग्रहसे उसे स्वीकार न करेंगे, बरन् उसी असत्यको पुष्ट और सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ती और प्रमाण लाते हैं। ऐसे मनुष्य नरपशु कहाते हैं।

सबसे प्रतिष्ठित और बड़े ब्रह्मा हैं उनको भी अद्वैत परमात्माकी बिलकुल सुधि नहीं है, यदि वो जानते तो दुःख सुखमें क्यों पड़े रहते? दूसरे सिद्ध हैं यदि वह अद्वैत परमात्माको जानते तो ऐसे छल कपट क्यों करते? दूसरोंको भी नष्ट करके आप क्यों नष्ट होते? तीसरे बड़े वेदपाठी शिव हैं, यदि उनको भी एक परमात्माका ज्ञान होता तो इतनी योग युक्ति करनेपर भी क्यों कामके वश होते? जितने ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधु, सन्त, महन्त, इन्द्रियोंके वशमें विषय वासनाके बन्धनमें सांसारिक अभिलाषाओंके घेरमें पड़े हुये हैं, वे सब मायाके पुजारी हैं। अद्वैत परमात्माकी पूजा करके फिर कोई शारिरक कामनाओंमें बन्द नहीं होता, जितने लोग वेद अथवा किसी दूसरे आचार्यके पक्षपात में पड़े हुये हैं, सारासारका विचार नहीं करते, वे बन्धनमेंही रहेंगे, कभी मोक्षको प्राप्त नहीं होंगे; जैसे यारतके अनेक धर्मावलम्बीपक्षपातमें पड़कर सत्य परमात्माको भूल बैठे हैं वैसेही पश्चिम देशके सब अम्बिया, औलिया पीर और पैगम्बर परमात्माकी पूजासे अज्ञात हैं।

इस पिण्ड और ब्रह्माण्डमें जो कुछ दृष्टि आता है सब माया है, माया पुरुष केवल कबीर है, उसको जो पहचाने अपना पति बनावे वही सोहागिन हो । जिस स्त्रीने उस पुरुषको न पहचाना, उसको अपना पति न बनाया वह सफल काम न होगी । स्त्रीके साथ जो स्त्रीका विवाह हो तो उसकी आशा पूरी कैसे हो सकती है ?

उपरोक्त चार पशु मेरी बातोंको नहीं समझ सकते । न इसके ऊपर विचारकर सकते हैं क्योंकि, उनको यथार्थ विचार और विवेक नहीं पशुबुद्धि है । वे देखनेही के मनुष्य हैं नहीं तो यथार्थमें पशु हैं, जिसको परमात्माने विवेक और मानुषिक बुद्धि दी है वे अज्ञानताके कामसे अवश्य अलग रहेंगे, पाशुबिक वासनाओंसे अवश्य वञ्चित रहेंगे । पशुओं, कञ्जरों और पामरोंके लिये लिये मेरा उपदेश दोधारा तलवार है । मुमुक्षुओंके लिये अमृत है ।

कितनेही लोग कहते हैं कि, कबीर साहबका नाम वेद और पुराणोंमें नहीं है, यदि वेद और पुराणमें होता तो हम कबीर साहबको मानते । इसी वास्ते कई एक मन्त्र वेदोंको कबीर साहबके विषयमें लिखा है, नहीं तो उसके लिखनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी । सहस्रों ऋषि मुनि, जो सर्वदा एक समानही रहते हैं, जिनका कभी नाश नहीं होता, उनके ज्ञान और विद्याके प्रकाशमें सब तुच्छ हैं । वे सब ऋषि, मुनि, कागभूसुण्ड, कुष्ठम ऋषि और लोमश ऋषिके समान कबीर साहबकी स्तुतिमें लगे रहते हैं । फिर उनकी विद्याके सम्मुख दुसरोँकी विद्या कैसे ठहर सकती है । सूर्यके सामने जिस प्रकार दीपकका प्रकाश कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार ऋषि मुनियोंके ज्ञानके सामने किताबोंका ज्ञान तुच्छ है ।

जिस देश, जिस धर्म, जिस जाति, जिस मण्डलीमें सच्चे साधु और सच्चे गुरुकी सेवा, प्रतिष्ठा और आज्ञाकारिता नहीं हैं उसमें ज्ञान, भक्ति और सत्यजीवन भी नहीं है । वहाँके लोग मृतक हैं, जहाँ सन्त नहीं रहते जिस घरमें सन्त और अभ्यागतोंका सम्मान नहीं होता, उस घरमें भूत, प्रेत रहते हैं । जिस धन धान्यमें साधु गुरुका भाग नहीं वह अशुद्ध है, वह नष्ट हो जावेगा । जो देह साधु और गुरुकी सेवा नहीं करती वह नरकमें जावेगी । जो सुन्दरी सच्चे साधु और गुरुओंके उपदेशको नहीं सुनती बरन् उनसे परदा करती हैं, वह शूकरी और कूकरी होकर नङ्गी फिरा करेगी । जिस विद्या और बड़ाईको सन्त और गुरुका स्वत्व न दिया जावे वह नीचदशाको प्राप्त करावेगी । सब प्रकारकी

भलाई साधु गुरुकी सेवाके आधारपर है, जहां साधु और गुरु नहीं वहां कुछ भी नहीं।

जो कोई कबीर धर्मकी शुद्धता और सत्यताका ज्ञाता बनना चाहता है, वो धर्मदास साहबके पुत्र चूडामण्णिदास साहबके स्थानापन्न महन्त और संत, जो विद्वान् सब भेदोंके जाननेवाले और स्वयम् उसके ऊपर चलनेवाले हों उनसे पूछलें। जो कोई धर्मदास साहबके धर्मको जाननेवाले, माननेवाले और उसके ऊपर चलनेवाले उसी गद्दीके सन्त महन्त होंगे उन्हींसे पूछनेका अधिकार होगा। नाममात्रके मूर्ख कबीर पन्थियोंसे पूछनेसे भेद न मिलेगा। क्योंकि, बहुत लोग अपनेको कबीर पन्थी बतलाते हैं पर यथार्थमें वे कबीरपन्थी नहीं हैं गुरु मुखता उनमें नहीं, मुखसे अपनेको कबीर पन्थी कहते हैं, पर कबीरसाहबकी आज्ञा और वाणीका आदर नहीं करते जो कोई केवल नामसेही अपनेको कबीरपन्थी कहने वालेके वचनों पर विश्वास करेगा, वह अवश्य धोखेमें पड़ेगा। इस कारण सोच बिचार कर विवेकद्वारा सत्सङ्ग करना उत्तम बात है। एवं दूसरे जो निष्पक्ष विद्वान् हों वे भी बता सकेंगे।

ईश्वर प्रेमियोंके उपदेश

जो लोग परमात्मासे प्रेम करते हैं, वे सब सामग्री और सुखोंको तुच्छ जानते हैं, उनकी समस्त सांसारिक वासनाएँ निवृत्त हो जाती हैं, किसी प्रकारकी कामना शेष नहीं रह जाती। संसारमें सबसे उत्तम राज्यसुख और राज्य माना जाता है, पर ईश्वरके सच्चे प्रेमी विरक्त पुरुष तीनलोकके राज्यको तुच्छ जानते हैं।

दृष्टान्त एक विरक्त किसी बनमें रहता था वह ईश्वरके प्रेममें मग्न संसारसे उदास, भक्तिमें रत था। एक दिन एक बादशाह उसी बनके मार्गसे कहीं जा रहा था। उसने महात्माको बैठा हुआ देखा। उनकी दरिद्रता और बाहरी हीनावस्था देखकर बादशाहने कहा—महाराज ! आप शहरमें चलो, वहाँ आपकी सेवा और भक्ति भली प्रकार होगी। विरक्तने कहा कि, संसार और संसारके सब सुख अति तुच्छ और मिथ्या हैं। बादशाहने कहा कि, संसारके सुखके तुल्य कोई भी सुख नहीं, आपने उसका आनन्द नहीं भोगा है इसी कारण उसका प्रतिवाद करते हो। संतने बहुत प्रकार समझाया पर बादशाहने एक बातभी न मानी, अपनी ही कहता रहा। संत चुप हो गये बादशाह अपने राज-महलको गया।