कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गैनी बिना कैसे बनै, मुसलमानकी रीति ।
पीर पैगम्बर रुठिहैं खता खाहुगें मीत ॥
बह सुनकर नीरूने कहा—
नीरू कहै सुनौ रे भाई ! ऐसो करौं तो पूत गवौई ॥
एक बार घर आमिष आना । तेहि कारन सुत भया बिगाना ॥
क्या रुठे क्या खुशी हो, पीर पैगम्बर झारि ।
गौघात में ना करौं, नीरू कहै पुकारि ॥
कबीर साहबके अन्तर्धान हो जानेकी बात तो प्रथमसे ही सबपर जाहिर होगयी थी, इसलिये सब विद्वेषियों और पक्षपातियोंने मिलकर नीरूको बहकाकर उसके द्वारा गोहत्या कराना चाहा, जिससे कबीर साहब नीरूके घरसे रुष्ट होकर चले जावें; तब नीरूकी नामवरी भी जाती रहे और काजी मुलना जो कबीर साहबको अपने धर्मका निकन्दन करनेवाला समझते थे, उनका कांटा भी निकल जावे। किन्तु जब सब जुलाहों तथा काजी मुलनाओंने देखा कि, नीरू तो फन्देमें नहीं आता तब वे एक चाल चले और छलसे कहा—
जोलहन मिली छलसे कह्यो, और करू सब साज ।
नीरू तुमरे कारने, गैनी आयउ बाज ॥
उन लोगोंने अपने मनमें विचार किया कि, नीरूके अनजानमें गाय जबह करेंगे जिसको देखकर कबीर नीरूका घर त्याग देगा। उधर नीरू तो सुन्नतका सामान इकट्ठा करने लगा और इधर मुल्ला काजियोंके साथ मिलकर उसके जाति बिरादरीवालोंने, एक गाय मँगाकर चुपचाप जबह करनेका निश्चय किया। नीरू इस काण्डसे एकदम अजान रहा।
उधर सब सामान दुरस्त हो जानेपर जब नाई छुरा लेकर कबीर साहबका सुन्नत करने गया तब कबीर साहबने लंगूटी खोलकर नाईको पाँच लिंग दिखलाकर कहा, इसमेंसे तेरी जो इच्छा हो सो काट ले। यह आश्चर्य देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया। किन्तु जुलाहों तथा काजीसहित अन्य मुसलमानोंने, अवसर पाकर उसी समय जब नाई कबीर साहबका सुन्नत करने गया, गायको जबह कर दिया। यद्यपि उन दुष्टोंके इस गुप्त काण्डको किसी दूसरेने नहीं जाना, परन्तु अन्तर्यामी सर्वज्ञ कबीर साहबने इस बातको जान लिया। नाईके भाग जानेपर आप बच्चोंके साथ खेलने चले गये थे, सो खेल छोड़ कर वहाँसे दौड़े और गोहत्याके स्थानपर पहुँचकर काजीसे कहा—
हो काजी यह किन फरमाये, किनके मता तुम छुरी चलाये ॥
जिसका छीर जु पीजिये, तिसको कहिये माय ।
तिसपर छुरी चलायऊ, किन यह दिया दिढाय ॥
तब काजीने उत्तर दिया—
सुन कबीर वडन सो, होत आइ यह बात ।
गौस कुतुब औ औलिया, हजरत नबी जमात ॥
यह सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया, हे क्राजी ! और मुल्ला तथा सब मुसलमानो ! तुम किस भूलमें पड़े हो ! जरा विचार तो करो, तुम्हारा दीन थोड़े दिनोंसे चला है, जिसमें तुम इतना जोर जुल्म करके नाना प्रकारसे जीवोंको सतानेमें धर्म मानते हो; तुम गफलतमें पडकर असल मार्गसे भटक कर नर्कका मार्ग क्यों साफ कर रहो हो !
सुनो जब—
आदम आदि सुधि नहि पायी । मामा हौब्बा कहैंते आयी ॥
तब नहि होते तुरुख औ हिन्दू । मायको रुधिर पिताको बिन्दू ॥
तब नहि होते गाय कसाई । तब विसमिल किन फरमायी ॥
तब नहि रहो कुछ औ जाती । दोज्रख विहिश्त कहाँ उत्पाती ॥
मन मसलेकी खबर न जाने । मति भुलान दो दीन बखाने ॥
संजोगेकर गुण रवे, बिन जोगे गुन जाय ।
जिह्वा स्वादके करने, कीन्हे बहुत उपाय ॥
कबीर साहबकी बातको सुनकर पक्षपातसे अन्धे हुए क्राजी और मुल्ला मारे क्रोधके थरथर कांपने और कहने लगे कि, नीरूका यह लड़का महा काफिर हो गया, नबी पैगम्बर पीर औलिया सबको यह तुच्छ समझता है, आपही बड़ा ज्ञानी बनकर आया है ! और वे सब अज्ञानी थे । उनके क्रोधको देखकर नीमा और नीरू तो डरसे बहुत घबराने लगे । किन्तु कबीर साहब निभंय होकर विनय-पूर्वक क्राजीसे पूछने लगे—
केहि कारण तुम इहवां आये । यहि जगह किन तुमहि बुलाये ॥
काजीने कहा—
जोलाहन मोहि बुलायऊ, तोहरे सुन्नत काज ।
अब तुम मुसलिम होयके, रोजा करहु निमाज ॥
कलमा पढ़ौ नबीका, छोड़हु कुफुरकी बात ।
तब तुम बिहश्तहि जाहुगे बैठहु नवी जमात ॥
इतना सुनकर कबीर साहबने कहा—
द्रापरके अन्तमें श्वपच सुदर्शनको चेताना और कथां दूसरी बार कलियुगमें कबीर साहिबके पृथ्वीपर प्रकट होनेका वृत्तान्त
जिन्ह कलमा कलीमांहि पढ़ाया । कुदरत खोज उनहु नहि पाया ॥
करमत करम करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥
करमत सो जो गरभ औतरिया । करमत सो जो नामहि धरिया ॥
करमत सुन्नति और जनैऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥
पानी पवन संजोयके, रचिया ई उत्पात ॥
सून्यहि सुरत समानिया, कासो कहिये जात ॥
इतनेमें काजी और मुल्लाओंको बिगड़ते देखकर वहाँ भीड़ जम गयी और कितने पक्षपाती हिन्दू भी वहाँ इकट्ठे हो गये, । तब काजीको उसकाने और क्रोधको बढ़ानेके लिये एक हिन्दूने कहा—“क्यों जी कबीर तुमको अपने धर्मका नियम मानना और काजी और मुल्ला जो धर्मके रक्षक और उपदेशक हैं उनकी आज्ञा पर चलना चाहिये । सो काजीजीकी आज्ञानुसार सुन्नत कराकर अपने धर्ममें मिलो । देखो, हमारे यहाँभी जब बालककी जनैऊ होती है तब वह संस्कारी बनता है, जबतक जनैऊ नहीं होती तबतक उसको शूद्रके तुल्य मानते हैं । वैसेही तुम्हारे धर्मका नियम सुन्नत कराना है, उससे क्यों भागते हो !” इतना सुनकर कबीर साहबने कहा—
जो तोहि कर्ता वरण विचारत । जन्मत तीन दंड अनुसारत ॥
जन्मत सूद्र मुये पुनि सूद्रा । किरतिम जनैऊ घाल जगदुद्रा ॥
जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मनी जाये । और राहासे काहे न आये ॥
जो ये' तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काह न सुन्नति कराये ॥
कारी पीरी दूहौ गार्ई । ताकर दूर देहु बिलगार्ई ॥
छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कबीर भजु सारंगपानी ॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण अवाक् होकर रह गया । तब काजीने कहा, देखो यह लड़का शरअसे बाहर बातें करता है इसकी बात सुननी उचित नहीं है । काजीकी इस बात पर उस लज्जित हुए ब्राह्मण और उसके साथियोंने भी जोर लगायी और सब एक मत होकर कहने लगे कि, इस लड़केके कहनेमें क्या आते हो, इसको तो पकड़ कर बांधो और सुन्नत करो । फिर क्या था ? पानीपर चढ़े हुए काजीने कई मांस हारी मुस्टेंडे मुसलमानोंको आज्ञा दिया कि, इस बालकको बांधो । देखतेही देखते थोड़ीही देरमें कबीर साहबको एक रस्सीमें बांधकर उन लोगोंने पछाड़ दिया और नाईकी खोज करने लगे । किन्तु नाई विचारा तो प्रथमही पाँच लिंग देखकर ऐसा भयभीत होकर भागा था कि
उसने पीछे फिरकर भी नहीं देखा था। अब उनको नाई मिलता तो कहोसे ! अब तो नाईके बिना काजी बहुत घबराया, चारों ओर लोग 'नाई ! नाई !' कहते दौड़ने लगे। उस समय कबीर साहबने काजीको सम्बोधन करके यह शब्द कहा—
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
अंखत बकत रहौ निसि बासर मति एको नहि जाना ॥
सकति न मानो सुनति करत ही मैं न बदोंगा भाई ॥
जो खुदाय तुब सुनति करत तो आप काटि किन आई ॥
इतना कहकर वहाँ खड़े ब्राह्मण (हिन्दुओं) की ओर दृष्टि करके घालि जनेऊ ब्राह्मण होना, मेहरी क्या पहिराया ।
वह तो जन्मकी सूर्यन पिरोसी, सो तुम क्यों खाया ॥
हिन्दु तुएक कहाँसे आया, किन यह राह चलायी ।
दिलमें खोज खोज दिलहीमें, विहिस्त कहाँ किन पायी ॥
इतना कहकर कबीर साहब उठ खड़े हुए। उनके शरीरका बन्धन सब आपही खुलकर गिर पड़ा यह देखकर लोग बहुत आश्चर्यित हुये।
फिर कबीर साहबने काजीसे कहा—
कहै कबीर सुनोहो काजी। यह सब अहै शैतानी बाजी ॥
छिः!! छिः!! क्या इसीको मुसलमानी कहते हैं ?
यहि तरीका जो मुसलिम होई। तोपै दोजख परै न कोई ॥
फिर मुस्कुराते हुए कबीर साहबने काजीसे कहा, भाई ! अबतक तो खुद तुम्हें मुसलमानीकी खबर नहीं है, तब तुम मुझे कैसे मुसलमान करने आये थे ?
तुम तो मुसलिम भये नहि भाई। कैसे मुसलिम करहू आयी ॥
यदि तुम मुसलमानीका यथार्थ मार्ग जानते हो तो मुझसे कहो
जेहि तरीक सो साहिब राजी। सो तरीक मोहि कहिय काजी ॥
मारफ़तकी मुसलमानी, कहिये हजरत मोहि ॥
पाक जात केहिविधि मिले, सो मैं पूछौं तोहि ॥
यह सुनकर काजीने कहा, हम शरआके पाबन्द हैं, हमको मारफ़तकी बातमें जवान हिलानेकाभी हुक्म नहीं है—
काजीके उत्तरको सुनकर कबीर साहबने कहा, बस इतनेही पर काजीपना करनेका अभिमान करता है ? फिर यह शब्द कहा—
जगन्नाथकी स्थापनाकी उत्थानिका
भूला वे अहमक नादाना । हरदम रामहिं ना जाना ॥ टेक ॥
बरबस आनिके गाय पछारा, गला काटि जिव आप लिया ।
जीता जिव मुर्दा करि डारा, तिसको कहत हलाल किया ॥
जाहि मांसको पाक कहत है, ताकी उत्पत्ति सुन भाई ।
रज बीरज सो मास उपाना, सोई नापाक तुम खाई ॥
अपने दोष कहत नहिं अहमक, कहत हमारे बडेन किया ।
उनकी खूब तुम्हारी गर्दन, जिन तुमको उपदेश दिया ॥
सियाही गयी सुफेदी आयी, दिल सुफेद अजहूं न हुआ ।
रोजा निमाज बांग क्या कीजै, हुजरे भीतर बैठ हुआ ॥
पण्डित वेद पुरान पढें, मुलना पढें जो कुराना ।
कहै कबीर वे नरके गये, जिन हरदम रामहिं ना जान ॥
इतना कहकर कबीर साहब मरी हुई गौके निकट गये—
बहुविधिसे काजीको समझायी । महा पाप जिव घात बतायी ॥
फिर कबीर गऊ ढिग जायी । मरी गाय तिहिं काल जियायी ॥
गऊके पीठपर हाथ फेरतेही वह जीवित होकर उठ बैठी, फिर कबीर साहब उसको लिये हुए गंगा पर गये और गंगाजलसे स्नान कराकर नगरमें स्वतंत्र फिरनेको छोड़ दिया । उस दिनसे वह गऊ कबीर साहबकी गऊके नामसे प्रसिद्ध हो गयी और सब जगह आदर पाने लगी, और कबीर साहबनेभी उस दिनसे नीरूके घरका रहना त्याग दिया । कुछ दिनोंतक तो उनको कबीर साहबका दर्शन नहीं हुआ । किन्तु जब वे कबीर साहबके विरहमें बहुत विकल हो पागलों-के समान दर दर और घाट घाट फिरने लगे तब करुणामय साहबने करुणा करके उन्हें दर्शन दिया, किन्तु उनके घर नहीं गये । बल्कि काशीके बाहर एक स्थानमें कुछ भक्तोंने कुटी बांध दी, उसीमें रहने लगे । उसी स्थानको अब कबीरचौरा कहते हैं । जहाँ बड़ा भारी मुहल्ला बसा है, और कबीर पन्थियोंका बड़ा भारी स्थान है । कबीर साहबके वहाँ रहनेपर नीमा और नीरूभी वहाँ आकर रहने लगे । उन्होंने अपना पहला घर छोड़ दिया ।
इसी प्रकारसे कबीर साहबकी बाललीला अनेक आश्चर्य और उपदेश भरी हुई है, इस छोटेसे ग्रंथमें इससे अधिक लिखनेका अवकाश नहीं है । जिनको विस्तारपूर्वक हाल जाननेकी इच्छा होवे हमारे बनाये हुए कबीर दर्शन नामक ग्रन्थका प्रथम दर्शन देखें ।
कबीर साहिबके जगन्नाथ स्थापना
बालचरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥
परचा जग अनेक परचारा । सो सब लिखित होय विस्तारा ॥
सबै विस्तार छांड़ि अब गाऊँ । रामानन्द गुरुको जस भाऊ ॥
चौवालिस्वों प्रकरण ।
बालककबीरका नीरूके घरसे अन्तर्धान होना ।
जब आप अन्तर्धान हो गये तब जोलाहा जोलाही आपको ढूंढने लगे वे दोनों चारों तरफ ढूंढते तथा रोते फिरते थे । उनको बड़ा दुःख हुआ । वे फूट फूट कर रोते तथा सबसे पूछा करते थे । समस्त नगरमें ढूंढ डाला पर आप कहीं नहीं मिले । उनको तीन दिवसोंपर्यंत भूखे प्यासे रहते बीत गये, अन्नजल कुछ भी उनके मुंहमें नहीं गया । वे अत्यंत निर्बल तथा अशक्य हो गये । जब आपने उन दोनोंको नितान्तही विह्वल पाया तब आय उनको सामने प्रगट हो गये । आपको देखतेही वे प्रसन्न होकर चरणोंपर गिर पड़े और अपने अपराधको क्षमा करवाना चाहा । कहने लगे कि, आप किधर चले गये ? हम ढूंढते २ हँरान हो गये । कबीर साहबने उत्तर दिया कि, तुमने महापाप किया कि, गऊको जबह करवाया । तब जोलाहा जोलाही अनेक सौगंधें खाने लगे कि, हमने यह कार्य नहीं करवाया बरन् हमें इस बातकी तनिक भी सुध नहीं थी—यह कार्य काजीका है । उन दोनोंने बहुत कुछ प्रार्थना तथा विनती कि, तब कबीर साहबने उन दोनोंको निर्दोष समझ लिया तब उनकै साथ गये, और रहने लगे । तबसे नीमा और नीरू सदा सचेत रहा करते थे ।
पैंतालीस्वों प्रकरण ।
बाल कबीरकी काफिरकी व्याख्या करना ।
जब आप छोटे २ बालकोंके साथ खेलते थे तब “राम राम” “गोविन्द गोविन्द” “हरि हरि” कहा करते थे, तब मुसलमान लोग सुनकर कहते थे कि, यह बालक कट्टर काफिर होगा । तब उनको कबीर साहब यह प्रत्युत्तर देते थे कि, काफिर वह होगा जो दूसरोंका माल लूटता होगा । काफिर वह होगा जो कपट भेष बनाकर संसारको ठगता होगा, काफिर वह है जो निर्दोष जीवोंका प्राण नाश करता होगा, काफिर वह होगा जो मांस खाता होगा, काफिर वह होगा जो मदिरा पान करता होगा, काफिर वह होगा जो दुराचार तथा बट-
जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त
भारी करता होगा, मैं किस प्रकार काफ़िर हूँ । उस समय आर्पने यह साखी कहा :—
साखी—गला काटकर बिसमिल करें, ते काफ़िर वेबूझ ।
औरनको काफ़िर कहें, अपनी कुफ़ न सूझ ॥
छयालीसवाँ प्रकरण ।
बाल कबीर वैष्णवके बानेमें ।
एकबार कबीर साहबने गलेमें यज्ञोपवीत डाल लिया और अपने माथेपर तिलक लगा लिया तब ब्राह्मणोंने यह देखकर कहा कि, यह तो तेरा धर्म नहीं है तूने वैष्णव वेष कैसे बनाया ? और तू राम राम गोविंद गोविंद नारायण नारायण कहता है, यह तो मेरा धर्म है तेरा धर्म नहीं । तब कबीर साहब ब्राह्मणोंको उत्तर देते कि, हम तो ताना तनते हैं जानेऊ तुम्हारा किस प्रकार हुआ और गोविन्द और राम तो हमारे हृदयमें बसते हैं, तुम्हारे कैसे हुए । तुम तो गीता पढ़ते हो, परन्तु सांसारिक धनके निमित्त सदैव धनाढ्योंके द्वार द्वार पर दौड़ते और भटकते रहते हो और हम तो गोविन्दके अतिरिक्त और किसी अन्यको जानते ही नहीं । इतना सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर होते । वहाँ आप यह शब्द कहते—
शब्द—मेरी जिह्वा विस्नू लैना नारायन हिरदे बसे गोविन्दा ।
जम द्वारे जब पूछि परे तब का करे मुकुंदा ॥ टें० ॥
हम घर सूत तनै नित ताना, कंठ जनेउ तुम्हारे ।
तुम नित बांचत गीता गायत्री, गोविन्द हिरदे हमारे ॥
हम गोरु तुम ग्वाल गुसाई, जनम जनम रखवारे ।
कबहिं न बार सो पार चलाये, तुम कैसे खसम हमारे ॥
तुम बाभन हम कासीके जुलहा, बूझो मेरा ग्याना ।
तुम खोजत नित भूपति राजे, हरि संग मेरा ध्याना ॥
सैंतालीसवाँ प्रकरण ।
बालक कबीरकी ज्ञान कथनी और गुरुकी पूछ ।
हिन्दू तथा मुसलमान दोनों आपके साथ वाद विवाद किया करते थे सब परास्त होते थे । जब साधुओंने देखा कि, यह लड़का तो बड़ा ज्ञानी है, तब वे
कृष्णका इन्द्र दमन राजाको सपना देना समुद्रके कोपका कारण
लोग पूछते कि, कबीरजी ! आपका गुरु कौन है ? उस समय तो आपका कोई गुरु नहीं था, इस प्रश्नपर आप निरुत्तर और निस्तब्ध हो कुछ न बोलते । तब साधु लोग कहते कि बिना गुरुके तुम्हारा ज्ञान किसी कामका नहीं, बिना गुरुके किसीको मुक्ति नहीं मिलेगी, तुम्हारा यह सब ज्ञान और कथनी व्यर्थ है ! जब साधु लोग कबीर साहबपर इस प्रकार कटाक्ष करने लगे तब आपने रामानन्द स्वामीको गुरु करनेका संकल्प किया, उस समय आपका वय पाँच वर्ष मात्रका था ।
गुरु करनेका वृत्तान्त । (बृ. कसौटी)
सो वृत्तान्त अब करें बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना ॥
पांच वरषके जब भये, काशीमांझ कबीर ।
गरीबदास अजब कला, ज्ञान ध्यान गुणसीर ॥
जबसे काजी कबीर साहबके बचनोंसे लज्जित होकर चला आया तबसे वह तो कभी साहबके सामने नहीं जाता । परन्तु उस दिनसे साहबकी ऐसी प्रसिद्धि हुई कि, आपकी ज्ञानपूर्ण बातोंको सुननेके लिये अनेक लोग आपके पास आने लगे ।
षटदर्शन मिलनेको आवैं । आत्मज्ञान सबकौ समझावैं ॥
सत्य पंथका कीन परचारा । हिंसा कर्म नीच निरधारा ॥
कबीरोपदेश ।
तीरथ बरत अरु मूरत पूजा । जीव हनैं ईश्वर कथ दूजा ॥
जीव घात करई जो कोई । बासा तासु नरकमें होई ॥
पाहनको पूजैं पाखण्डी । गल काटै जो सन्मुख चंड़ी ॥
बकरा मुरगा जबह जो करहीं । विस्मिल्लाः कहि धर्मकहि उच्चरहीं ॥
ते सब पापकर्म कमाहीं । हिन्दू तुच्छ दौउ नरके जाहीं ॥
इस प्रकारके उपदेशको सुनकर हिन्दू मुसलमान दोनोंही द्वेष मानने लगे । किन्तु कबीर साहबको कुछ भय नहीं था । बल्कि जब बहुतसे बालक इकट्ठे हो जाते तब आप उनके संग खेलने लग जाते और उनसे कहते सब, 'राम, राम, गोविन्द, गोविन्द' कहो ।
एक दिन एक मुसलमानने कहा, देखो यह कबीर हिन्दू देवोंका नाम लेता है । यह बड़ा भारी काफिर होगा । यह सुनकर कबीर साहबने उससे कहा—
गला काटि बिस्मिल करैं, ते काफिर बे बूझ ।
औरनको काफिर कहैं, अपना कुफ न सूझ ॥
यह सुनकर वह मुसलमान चुप हो गया । एक दिन कबीर साहब राम, कृष्ण, गोविन्दका नाम लेते सुनकर एक हिन्दूने कहा, 'क्यों बे ! मुसलमान होकर हमारे ईश्वरका नाम लेता है ?' तब कबीर साहबने उत्तर दिया—
शब्द—भाईरे दुई जगदीश कहांतें आये कौने मति भरमाया ।
अल्लहः राम करीमा केशव हरि हजरत नाम धराया ॥
गहना एक कनक ते बनता तामें भाव न दूजा ।
कहन सुननको दुइ कर थापे इक निमाज इक पूजा ॥
वहि महादेव वही मुहम्मह ब्रह्मा आदम कहिये ।
कोइ हिन्दू कोइ तुर्क कहावे एक जमीं पर रहिये ॥
वेद किताब पढ़ें वे खुतवा वै मूलना वे पांडे ।
विगत विगतकें नाम धरावें एक मटियाके भांडे ॥
कहैं कबीर वै दूनों भूले रामैं किनहु न पाया ।
वैं खसिया वे गाय कटावैं वादे जन्म गवाँया ॥
ऐसेही अवसर पर एक दिन एक ब्राह्मणने व्यंगसे कहा कि, भाई ? तू उससे क्या पूछता है, राम नाम बिना मुक्ति किसकी हुई है ! रामनाम सब वेदोंका सार है, अल्लाह, खुदामें क्या धरा है ! इसलिये तो कबीर अल्लाह खुदा छोड़कर राम राम कहता है । इसपर कबीर साहबने उसको उत्तर दिया—
शब्द - पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
राम कहे जगत गति पावे, खांड कहै मुख मीठा ॥
पावक कहै पांव जो दहै, जल कहे तिरषा बुझायी ।
भोजन कहे भूख जो भागै, तौ दुनिया तरि जायी ॥
बरक संग सुवा हरि बोलै, हरि प्रताप नहि जानै ।
जो कबहुँ उडि जाय जंगलको, तो हरि सुरति न आनै ॥
विनु देखे विनु अरस परस, विनु नाम लियेका होई ।
धनके कहे धनिक जो होवे, निर्धन रहत न कोई ॥
सांची प्रीति विषय माया सो, हरि भगतनकी हांसी ।
कहहि कबीर एक राम भजे विनु, बाँधे जमपुर जासी ॥
जोई आकर कबीर साहबके विचारका खण्डन करना चाहता वह आपही परास्त होकर चला जाता. तब तो बिद्वेषियों मजहबियोंको बड़ी कठिनाता पड़ने लगी; क्योंकि, बालक कबीरकी अद्भुत लीला और चरित्रको देखकर
भ्रम विमोचन स्वामी रामानुजाचार्य और जगन्नाथपुरी
संसारी जीव सहजही उनकी ओर आकर्षित होते। और जो कबीर साहबके पास जाता सो आपके उपदेशको ग्रहण कर पाखण्डको छोड देता। यह देखकर विचार करते २ उन्हें और तो कोई उपाय नहीं सूझा, किन्तु उनमेंसे जब कोई कबीर साहबके निकट आता तब लोगोंकी भीड़ देखकर यह कहता, कि, भाइयो ! तुम इस दुधमुहे बालककी बातोंमें क्या लगे हो ! विचारने अबतक गुरुका भी मुख नहीं देखा है, जानते नहीं हो ? शुक्रदेव जैसे तपस्वी और त्यागी ज्ञानी महात्मा बिना गुरु किये स्वर्गमें नहीं जाने पाये। तब इस निगुरे बालककी बातोंको सुननेसे तुम्हारा क्या भला होगा ?
यह सुनकर कबीर साहबने विचार किया “यद्यपि मुझे गुरु करनेकी आवश्यकता नहीं है, तथापि भक्तिकी मर्यादा स्थापित करने और सत्य धर्मके प्रचारके लिये मैं संसारमें आया हूँ, इसलिये गुरु करना उचित है। दूसरे आजकलके सबसे बड़े गुरु स्वामी रामानन्दजी संसारी भावनाओंमें पड़कर सत्य-मार्गसे भ्रष्ट हो रहे हैं। सो वह शिष्य बनकर मेरा उपदेश तो सुनेंगेही नहीं, मैं ही उनका शिष्य बनकर उनको मार्गपर लाऊँ तो ठीक है।” किन्तु, रामानन्द स्वामी तो वर्णाश्रमके फन्देमें ऐसे पड़े थे कि, द्विजोंके सिवाय किसीका मुख भी नहीं देखते थे। फिर मुसलमान करके प्रसिद्ध बालक कबीरको वह अपना शिष्य कैसे बनाते ? इसलिये कबीर साहबने यह युक्ति निकाली। जो आगेके प्रकरणमें वर्णित है।
अङ्गतालीसवाँ प्रकरण ।
कबीरसाहबका रामानन्द स्वामी वैष्णवके पास जाना और दीक्षा देनेका निवेदन करना और स्वामीजीका दीक्षा देनेसे इनकार करना तब कबीर साहबका एक छोटा लडका होकर रामानन्दके पथमें पड़ना, स्वामीजीके खड़ाऊँकी ठोकर कबीर साहबको लगने और चेलाका संबंध बनानेका वृत्तान्त ।
कबीर साहबका जब पाँच वर्षका वय हुआ तब आपने रामानन्द स्वामीके पास समाचार भेजा कि, स्वामीजी ! मुझको दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाइये और मुझसे गुरुदक्षिणा लीजिए। यह बात सुनकर स्वामीजीने उत्तर भेजा कि, मैं शूद्रको दीक्षा नहीं देता। देखो रामानन्द और कबीर गोष्ठी ज्ञानतिलकमें—
तीसरी बार कबीर साहिबका पृथ्वीपर प्रकट होना इत्यादि
कबीर वचन ।
रामानन्द गुरुदिच्छा दीजे । गुरुदच्छिना हमसे लीजे ॥
रामानन्द वचन ।
सूद्रेके कान न लागा भाई । तीन लोकमें मोर बड़ाई ॥
जब रामानन्दजीने स्पष्ट उत्तर दे दिया कि, मैं दीक्षा नहीं दूंगा, तब कबीर साहब चुप चाप चले आये। स्वामीजीका यह नियम था कि, एकपहर रात रहताँ तब गंगास्नानको आया करते थे। कबीर साहबने वह समय ठीक कर लिया और जब स्वामी ी स्नान करने चले तब आप छोटे बालकका रूप धारण करके स्वामीजीके मार्गमें सीढ़ियोंपर सो गये। स्वामीजी खड़ाऊँ पहने चले आते थे। वहाँ आतेही आपकी खड़ाऊँ की ठोकर बालकके शिरमें लगी। तब बालक रोने लगा। जब लड़केको रोते देखा तब स्वामी जी खड़े हो गये, और बालकके शिरपर हाथ धरकर कहा कि, बत्स ! मत रों राम राम कहो। तब कबीर साहब शान्त हो गये और कहने लगे गुरुजी राम राम कहूँ ? स्वामीजीने कहा हों राम राम कहो, उस समयसे कबीर साहब बराबर राम राम कहने लगे और स्वामी रामानन्दजीसे गुरु शिष्यका संबंध जोड़ लिया। फिर प्रातःकाल कंठी धारण कर हाथमें तुलसीकी माला लेलिया और मस्तकपर तिलक लगाकर ठीक वैष्णव मूर्ति बना राम राम की धुन लगादी। कबीर साहबका यह रंग ढंग देखकर अनेक मनुष्य प्रश्न करने लगे, कबीर साहबजी ! आपने यह वेष्ट वैष्णवका किस कारण बनाया है ? तब वे सब लोगोंको उत्तर देने लगे कि, मैंने रामानन्द स्वामीको गुरु बनाया है। यह बात सुनतेही संन्यासी तथा वैरागियोंने स्वामीजीसे जाकर कहा कि, महाराज ! आपने ऐसी मर्यादा छोड़ दी कि, जोलाहेके पुत्रको शिष्य कर लिया, ऐसा आपको उचित नहीं था। यह बात सुनकर स्वामीजीने कहा कि, मैंने चेला नहीं किया, बुलाओ कबीरको। लोग गये और कबीर साहबको बुला लाये।
उनचासवों प्रकरण ।
स्वामी रामानन्द कबीर साहबको शिष्य स्वीकार करना ।
उस समय रामानन्द स्वामीका यह नियम था कि, वह किसीको देखते नहीं थे और कंदराके भीतर परदेमें रहा करते थे। कबीर साहबको लाकर लोगोंने परदेके बाहर खड़ा किया। परदेके भीतरसे स्वामीजी बोले कि, ऐ कबीर ! मैंने तुमको अपना चेला कब बनाया। तब कबीर साहबने उत्तर दिया
कबीर साहिबका ४ थी ५ वीं छठीं और ७ वीं बार प्रकट होने का वृत्तान्त
कि, स्वामीजी जब आप गंगा स्नान को जाते थे, और मैं पथमें पड़ा था, आपके खड़ाऊँ की ठोकर मेरे माथेमें लगी मैं रुदन करने लगा । तब आपने कहा राम राम कह; उस समयसे मैं राम राम कहने लगा । तब स्वामीजीने कहा कि, हों ! एक बालक था जिसको मेरे खड़ाऊँ की ठोकर लगी और उससे मैंने राम राम कहा था । तब कबीर साहबने कहा कि गुरुजी वह लड़का मैं ही था । स्वामी जीने कहा कि, क्या इस प्रकार कोई गुरु चेला हो सकता है ? कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वेदशास्त्रमें रामनामसे बढ़कर और दूसरा क्या है ? तब स्वामीने उत्तर दिया कि, सबसे बढ़कर यही है, इससे बढ़कर और कुछ नहीं है । कबीर साहबने कहा कि, जो नाम सबसे बढ़कर है, सो तो आपने मेरे माथेपर हाथ धरकर देही दिया, फिर गुरु और शिष्य किस प्रकार होता है । कबीर साहबने स्वामीजीको अपनी बातोंसे निरुत्तर कर दिया । तब स्वामीजी बोले कि, जिस बालकसे मैंने राम नाम कहा था वह छोटा था और तू तो बड़ा जान पड़ता है । उस समय कबीर साहब वैसाही छोटा बालक बनकर, स्वामीजीकी गुफाके भीतर घुस गये और उनके चरणोंपर गिरकर कहने लगे कि, मैं उस समय ऐसाही छोटा था न ! यह कौतुक देखकर लोगोंको अत्यंत आश्चर्य हुआ कि, देखो यह बालक कौसा छोटा हो गया । तब अनन्तानन्दजीने, जो रामानन्द-स्वामीके बड़े चेले थे, समझाया कि, गुरुजी आप कबीरको मनुष्यका बालक न समझो, यह सिद्धका अवतार है, आप इससे किसी प्रकारका भेद मत करो । उस समय से स्वामीजीने कबीर साहबसे परदा छोड़ दिया और अपने शिष्योंमें मिला लिया । स्वामीजीके जितने शिष्य थे सब कबीर साहबको गुरुके समान मानते और अत्यंत मर्यादा तथा प्रतिष्ठा किया करते थे । स्वयम् कबीर साहब भी सबसे नितान्तही नम्रता पूर्वक मिलते थे, आपके गुरु भाई आपके आज्ञा कारी थे, आपका बड़ा ध्यान रखते थे, यों स्वामी रामानन्द स्वामीके चौदहसौ चौरासी शिष्योंमें सबके सरदार कबीर साहब बने ।
फिर समय २ पर कबीर साहब और रामानन्द स्वामीमें ज्ञान और मुक्तिके विषयमें विवाद हुआ करता था । रामानन्द स्वामी तथा कबीर साहब की वार्तालाप बहुत है जिसकी इच्छा हो दूँढ कर देखलें, कबीर साहबने स्वामीजी को अनेक कौतुक दिखलाए, सो भिन्न २ ग्रंथोंमें लिखे हैं ।
कबीरसाहब और स्वामी रामानन्दजीकी गोष्ठी ।
(वृहतक० सौ०)
मुहम्मद साहिबको चेतानेका वृत्तान्त मुहम्मद साहिबके मेआराजके विषयमें मत भेद
शिष्य होनेके दूसरे दिन कबीरसाहब सबेरहीसे स्नान तिलक ध्यानमें लगे । गलेमें एक माला और जनेऊ डाल और द्वादश तिलक करके साक्षात रामानन्दियोंके समान बेष बना लिया, । वैष्णवोंकासा वेष बनाते देखकर नीमाने कहा “बेटा ! यह क्या करते हो ? किसने तुम्हारी बुद्धि ऐसी फेर दी, कि, अपने धर्म कर्मको छोड़के दूसरे धर्मवालोंकी राहपर चलते हो !” उस समय कबीरसाहबने नीमा और नीरुसे अत्यन्त नम्र भावके साथ निवेदन किया, कि, ए मात ! यह एक भ्रमही है कि, यह दीनमें तथा यह वेदीन है धर्म हमारा है यह दूसरेका है ।
सत्य पुरुष सबके लिये एक है उसका कियेसे भेद भाव नहीं है बोही सबका रचनेवाला है सिवा उसके और कोई कर्ता धर्ता और विधाता नहीं राम रहीम सब उसीके नाम हैं पीर फकीर और साधु सब अपने २ ढंगसे उसीका नाम लेते हैं ।
इस प्रकारके अनेकों उपदेशोंके बाद माता पिता दोनों शान्त हो गये आप सदाकी तरह दोवटी बुनकर बाजार में बेच दिया करते धर्म पूर्वक जो उसे मिलता उसीसे साधुसेवा कर दिया करते यदि अधिककी आवश्यकता होती हो स्वयं भगवान् पूरी करते ।
जब कोई सन्त महात्मा आपके घर आवे तो उनके भोजन बनानेके लिये चौका लगवाते । कोरे वरतन मंगवाकर विशुद्ध भोजनका सामान तयार करके देते अपनेसे जो भी कुछ हो सकती उतनी उसकी सेवा चाकरी करते । यहाँतक कि, इस कामसे उनकी परमस्नेह रखनेवाली माता भी इस कृत्यके करते करते अकुता जाती थी पर कबीर साहिबके प्रेम तथा उनकी आकर्षण शक्तिके आगे सब नतमस्तक ही रहते थे । माताका भी साहस नहीं होता था कि, वो कबीरके कथनको न माने माता का अकुलाना इसी इस शब्दमें आया है ।
शब्द — हमारे कुलकोने राम कह्यो ॥
सुनो घोरनियौ सुनो जिठनियौ, अचरज एक भयो ।
सात सूत या मुंडिया खोये मुंडियौ क्यों न मेरा ।
माय तुरकिनी बाप जुलाहा बेटा भक्त भये ॥
जबकी माला लई इन पूते तबते सुख न भये ।
नित उठ कोरी गागर मांगत लीपत जन्म गये ॥
पकज शत मुंडिया और सुवे कबीरा कहांते भये ।
रोय रोय कहत कबीरकी माता बेटा मरन गये ॥
हँसि हँसि कहत कबीरकी भँना भैया अमर भये ।
कहँहि धर्मदास सुनो भाई साधो कबीरा साहिब भये ॥
भाव—हमारे वंशमें 'राम' किसने कहा है ए देवरानी ज़िठानियों ! सुनो, एक बड़े अचरजकी बात है वा मुड़ियाने सातसूत खोये हैं फिर भी यह मेरा नहीं है मा तुरकिकी बापु जुलाहो किन्तु बेटा भक्त बन रहे हैं । जबसे इसने कंठी माला हाथमें लीं हैं उस दिनसे, मुझे कुछ भी सुख नहीं हुआ । सौ कमलकी कलियाँ कबीरको जन्मावें यह कबीर हुआ कहाँसे हैं कबीरकी माँ रो २ कर कहती है कि, ऐसा कबीर मरा भी नहीं यह सुन कबीरकी बहिन कहती है कि कबीर तो सत्य पुरुषका पथप्रदर्शक है । धर्मदासजी कहते हैं कि, ए साधुओ ! सुनो ! कबीरजी साहिब हुए हैं । एक दिन किसीने आपसे कह दिया कि, आपका घर बड़ी बुरी जगहमें है । इस पर आपने उत्तर दिया कि—
कबीरा तेरा झोंपड़ा गलकटियोंके पास ।
जेकरेंगे सो भरेंगे तुम क्यों हुए उदास ।
भाव—ए कबीर ! तेरा झोपड़ा कसाइयोंके पास है पर जो करेंगे वो भोगेंगे तुम क्यों उदास होते हो ? आपका निजी परिवार कमाल कमाली और लोईका था ये तीनों आपको स्वामीजी कहते थे । पं. हरदेवके साथ कमालीका गान्धर्व विवाह कर दिया था । अन्ततक नीमा नीरूको इनका बोध नहीं हुआ था जहाँतक कि, माताने मसाल हाथमें लेकर इनके विरुद्ध सिकायत की थी । अन्तमें इन्होंने गुरुचरणोंको ही अपना शरण बनाया तथा गुरुका सन्निधिमें अधिक समय लगाने लगे ।
कबीर दासजीके बड़े भंडारेके बाद नीमा और नीरू तो कालवश हो गये आप घरका त्याग करके सत्यपुरुषके सन्देश सुनाने आदिमें समय बिताने लगे । जब भगवान् रामानन्दजी भगवान्की मानसिक पूजा करते थे उस समय सब शिष्य लोग अपने २ नित्य नियमोंमें लग जाया करते थे यदि देर हो जाती थी तो प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बैठे रहते थे पीछे नित्य नियमसे उठनेपर सब दर्शस्पर्श करके अपनी २ कुटियोंमें चले जाते थे ।
इसी प्रकार एकदिन रामानन्दजी स्वामी मानसिक ध्यानमें मग्न थे । उस समय ठाकुरकी माला छोटी हो गयी । तब स्वामीजीको बड़ी चिंता हुई कि, अब ठाकुरके गलेमें इसे कैसे पहनाऊँ । तब कबीर साहब स्वामीजीके मनकी बात जानकर बोले कि, स्वामीजी मालाकी गॉठ खोलकर ठाकुरको माला पहनाओ । स्वामी रामानन्दजीने ऐसाही किया । इस प्रकारके अनेक कौतुकोंको
देखकर स्वामीजीकी इच्छा हुई कि, जानना चाहिए यह कबीर कौन है जो ऐसे २ कौतुक किया करता है इस कारण स्वामीजीने ठाकुरका ध्यान किया तब ध्यानमें दिखाई दिया कि, 'ठाकुरके सिंहासनपर जो ठाकुर की मूर्ति है उसके शिरके ऊपर कबीर साहबका सिंहासन रक्खा हुवा है । जब कबीर साहबकी ऐसी बड़ाई और इतना प्रताप दृष्टिगोचर हुवा तबसे स्वामीजी कबीर साहबकी बड़ी मर्यादा करने लगे अनेक बार स्वामीजी कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते थे । रामानन्द तो कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते और कबीरसाहब अपने गुरुके गुण गाया करते थे ।
उस समय गोरखनाथ योगी जो बड़ाही बलिष्ठ सिद्ध था वह प्रायः रामानन्द स्वामीसे आकर वाद विवाद किया करता था, एकबार उसका सामना कबीर साहबसे हुआ । कबीर साहबका गोरखनाथके साथ बड़ाही वाद विवाद हुआ । दोनोंही ओरसे अनेक कौतुक दिखलाई दिए । जो लोगोमें प्रसिद्ध हैं । अन्तमें गोरखनाथ परास्त हुआ । और अपनी सेली और टोपी कबीर साहबके चरणोंपर चढ़ा दंडवत् प्रणाम करके एक ओरको चलता बना ।
अध्याय ॥ ४ ॥
सिकन्दर लोदी बादशाहका काशीमें आना कबीर साहबका वहाँ बुलाया जाना उनके दर्शनसे बादशाहके शरीरकी जलन दूर होना सुलतानका उनपर विश्वास लाना—
सम्बत् १५४५ विक्रमीमें बहलूलका पुत्र सिकंदर लोदी काशी नगरमें पहुँचा, बादशाहके शरीरमें जलनका रोग था । वह भी ऐसा कि, उससे उसका शरीर रात दिन जला करता था । उस रोगसे उसे तनिक भी चैन नहीं मिलता था । तब लोगोसे उसने पूछा कि, इस नगरमें कोई ऐसा भी है जो मुझे इस रोगसे मुक्त कर सके ? तब वे लोग जो कबीर साहबसे द्रष्ट रखते थे बोले कि, यहाँ कबीर नामक एक फकीर है । यदि वह आवे तो श्रीमान् आरोग्य हो सकते हैं (ऐसा कहनेका उनका तात्पर्य यह था, इस बहानेसे कबीरको बादशाहके सामने बुलवाकर मरवा डालें, जब लोगोंने बादशाहसे ऐसा कहा तब बादशाह ने आज्ञादी कि, तुरन्त कबीर साहबको बुला लाओ विलम्ब होने न पावे । शाही आज्ञा पातेही भूत्यगण दौड़े और कबीर साहबसे आकर कहा कि, आपको बादशाह बुलाते हैं शीघ्र चलो । कबीर साहब बादशाहके सामने आए । बादशाह आपका दर्शन पातेही उसी समय रोगमुक्त होगया । शरीर ठंडा हो गया, बड़ा सुख पाया । तब बादशाह सिंहासनसे उठ खड़ा हुवा । बड़ी प्रतिष्ठाके साथ
कबीर साहबको अपने बराबर बिठालिया ॥ यह कौतुक देखकर वैरियोंके दाँत खट्टे हो गए, जिह्वा बंद हो गई । उस समय ब्राह्मण और काजी जो कबीर साहबसे द्वेष रखते थे बादशाहसे फरियाद करने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है । हिन्दू तथा मुसलमान दोनों दीनोंके विरुद्ध है, अपनेको परमेश्वर कहता है । प्रत्यक्षमें पुकारता फिरता है कि, मैं समस्त संसारका रचयिता हूँ सदैव कुफ़्ही बकता रहता है । ये बातें सुनकर बादशाहने पूछा कि, ऐ कबीर ! क्या यह बात सत्य है कि, आप अपनेको परमेश्वर कहते हो ? देखो गरीबदासजीकी वाणीमें (कबीरचरित्र बोध पृ.३३)
गरीबदास वचन ।
शाह सिकन्दर बोलता, कह कबीर तू कौन ।
गरीबदास गुज़रै नहीं, कैसे बैठा मौन ॥
उत्तर कबीर साहबका ।
हम ही अलख अल्लाह हैं, कुतुब गौस गुरु पीर ।
गरीबदास मालिक धनी, हमरो नाम कबीर ॥
मैं कबीर सर्वज्ञ हूँ, सकल हमारी जात ।
गरीबदास पिंडदानमें, युगन युगन सँग साथ ॥
शाह सिकंदर देखकर, बहुत भए मिसकीन ।
गरीबदास गति शेरकी, थरकीं दोनों दीन ॥
जब कबीर साहबने प्रत्यक्षमें इस बातको कहा एवं सर्व साधारणके सामने शाही इजलासमें अपनेको परमेश्वर होनेका दावा किया । खुल्लेमखुल्ला कहा कि, मैं समस्त सृष्टिका रचयिता हूँ । तब बादशाहने एक गाय मँगवाई और अपने सामने हलाल करवाकर कबीर साहबसे कहा कि, यदि आप परमेश्वर हों तो इस गायको जिला दीजिये ।
गरीबदास वचन ।
गऊ पकड़ बिसमिल करे, दरगह खंड वजूद ।
गरीबदास उस गऊका, पिए जोलाहा दूध ॥
चुटकी तारी थाप दे, गऊ जिलाई वेग ।
गरीबदास दूहन लगे, दूध भरी है देग ॥
शाहने गायको हलाल करवा कबीर साहबसे कहा कि, इसे जीवित करिये तब कबीर साहबने उस गायके थापी दी तथा चुटकी मारी—उसी समय वह गाय उठ खड़ी हुई । उसका सब घाव तथा दर्द मिट गया । उसके स्तन दूधसे भर
खुदा साकार
गये । उसके दुग्धसे बरतन भर गए । उस दुग्धको पान करके लोग अत्यंत हर्षित हुए । शाह सिकंदर तथा उसके सभासदगण इस कौतुकको देखकर अत्यंत आश्चर्यान्वित हुए । बादशाहको विशेष विश्वास हुआ ।
शेखतकीका क्रोध ।
जब शाह सिकन्दरके पीर शेखतकीने देखा कि, अब तो शाह सिकन्दरने कबीर साहब पर बहुत विश्वास किया है और उनकी अत्यंत प्रतिष्ठा तथा मर्यादा करता है तब वह जल मरा । कारण यह कि, वह बड़ाही द्वेषी तथा ईर्षा करनेवाला था । उसने बादशाहसे कहा कि, ऐ सिकंदर ! आपने जोलाहेसे प्रेम तथा मुझसे अलगाव किया है । तब बादशाहने कहा कि, ऐ गुरुजी ! आप तो मेरे पीर हो वह एक दरवेश (साधु) है । आपने आज्ञा दी थी कि, गुरु तथा फकीर स्वयम् परमेश्वर हैं । आप और कबीर एकही हैं । मैं जलनकी बीमारीसे मर रहा था मेरे जाते हुए प्राण उसने रख लिए—मैंने उसके प्रसादसे घातक रोगसे आरोग्य लाभ किया है ।
लोगोंका शेखतकीके पास आना ।
जब बादशाहने ऐसा कहा तब शेखतकी चुपचाप अपने डेरेंको चले गए । शेखजी अपने डेरेंमें बैठे थे वे लोग जो कबीर साहबसे शत्रुता रखते थे शेखजीके पास आकर इकट्ठे हुए । ब्राह्मण तथा मुल्ला सब मिलकर कहने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है । हिन्दू तथा मुसलमान दोनोंकी निन्दा करता है । हम लोग गुरु तथा देवताके नामपर जो बलिप्रदान करते हैं अथवा कुरबानीके नामपर गऊ बकरी और मुरगा चढ़ाते हैं । इस कारण यह हम लोगोंको कसाई कहता है । इस कबीरको समस्त काशीवासी मानते हैं । हमारी कोई बात नहीं पूछता यदि यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जाय तो हमारी छतियोंपरका भारी बोझा टल जावे । जब शेखतकीने ब्राह्मणों तथा मुसलमानोंसे ऐसा सुना तब अत्यंत प्रसन्न हो कहने लगे कि, जोलाहेसे और मुझसे तो पहलेहीसे वैर हो रहा है । अब तुमलोग इस बातपर उद्यत हो तो मैं अब निश्चय कबीर साहबका वध करूंगा कदापि जीवित न छोड़ूंगा । मेरा नाम शेखतकी है । मैं बादशाह सिकंदरका पीर हूँ । देखूँ तो वह मेरे हाथसे किस प्रकार बचता है, कैसा फक्कड़ कबीर है । मैं चाहूँ तो उसको नदीमें डुबवाऊँ—चाहूँ तो अग्निये दहन करदूँ—चाहूँ तो दीवारमें चून दूँ—चाहूँ तो टुकड़े २ काटकर कौमा करूँ—यदि चाहूँ तो बठुवेमें चुरा डालूँ । यदि चाहूँ तो तोपके सामने रखकर उड़ाऊँ । चाहूँ तो कुएँमें बंद कर दूँ और चाहूँ तो हाथीसे चखा डालूँ ।
मुहम्मद साहिबका जलाली खुदा मुहम्मद बोधका संक्षेपसार
यह बात सुनकर काजी तथा पण्डितगण अतिप्रसन्न हो प्रशंसा करने लगे कि, आप क्यों न ऐसे हों बाहवा ! आपसे सब कुछ होगा अब आप कृपा करें कि, यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जावे ।
शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न ।
यह बात सुनकर शेखजी बादशाहके पास जाकर कहा कि, ऐ सुलतान ! तू मेरा कहना मान ले । इस जोलाहेके प्राणघातकी आज्ञा देवे । इसने बड़ा कुफ्र मचाया है । यदि तू इसको मरवा न डालेगा तो मैं तुझको शाप बूंगा जिससे तेरी सम्पत्ति तथा तेरे प्राणका विनाश हो जावेगा ।
शेखतकीके कबीरजीपर जुल्म ।
यह बात सुनकर शेखजीको बादशाहने समझाया कि, ऐ पीरजी ! आपने तो मुझसे कई बार कहा था कि, पीर फकीर स्वयम् परमेश्वर हैं । तब आप क्योंकर कबीर साहबके प्राणघातके निमित्त आग्रह करते हैं । उन्होंने तो आपकी कोई क्षतिही नहीं की है फिर आपने क्यों ऐसा कुफ्र मचाया है ।
कबीर सागर न. ७ पृ. ६७ बोध सागर ।
कहो कबीरके मारन ताई । कुछ न हमारो यहाँ बसाई ॥
पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥
साखी ।
जो वह होते रैयत, तो हम करते जोर ।
वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥
तुमहूँ कही समझाय, पीर फकीर अल्लाह ।
अब तुम कहते मारने, यह न होय हम पाह ॥
रमैनी ।
अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥
इन कुछ तुमरो नाहि बिगारा । काहे तुमने कुफ्र पसारा ॥
बुजुर्ग सब नेकी फरमावे । जोर जुल्म कुछ ताहि न भावे ॥
साखी ।
कहा हमारा कीजिए, छोड़ दीजिए रार ।
सुलह कुल्ह दे बैठिए, अल्ला ओर निहार ॥
कहे तकी सुलतान सुन, तुझे नहीं कुछ दुःख ।
जो मैं कहूँ सो मानिए, कर मेरो सन्तोष ॥
कहे सिकन्दर पीर सुन, मेरो शिर वरु लेहु ।
फक्कड़ कबीर न मारिए, यह माँगे मोहि देहुं ॥
रमैनी ।
सुन्ते ही तकी क्रोध प्रजारा । शिरसे ताज जमींपर मारा ॥
निपट विकल देखो तेही भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥
कहैं कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको वचन प्रमाना ॥
साखी ।
पीर कहे सो करो तुम, हमें नहीं कुछ त्रास ।
हमहूं कहें सत नाम बल, कहें कबीर सुदास ॥
रमैनी ।
कहै सिकन्दर सुनोजी पीरा । मन मानैं सा करो कबीरा ॥
साखी ।
डारो मार कबीरको, हम नहि मानैं ऊन ।
ताका कबहु न भलाहो, जो करे फक्कड़का खून ॥
रमैनी ।
शेख तकी तब कहे रिसाई । है कोई बाँध कबीरा भाई ।
साखी ।
शेख तकी आपै उठ, काजी पण्डित झार ।
बाँध बाँध सब कोई कहै, कोइ न करे गोहार ॥
बाँह बाँध पग बाँधके, बोर गङ्गजल नीर ।
नहि संशय निश्चिन्त होइ, निभंयदास कबीर ॥
गङ्गजलपर आसन, बंद परे खहराय ।
जिन कबीर सत नामबल, निभंय मङ्गल गाय ॥
शाह सिकंदर देखही, औ ढाढ़े सब लोग ।
धन्य कबीर सब कोई कहै, शेख तकी भा सोग ॥
रमैनी ।
शेखतकी तब मीजें हाथा । सूखे मुँह नहि आवै बाता ॥
साखी ।
शाह सिकन्दर जोर कर, कहै सुनो तुम पीर ।
किसको बाँध डुबाव है, निभंयदास कबीर ॥
(देखो ग्रंथ कबीरसागरनं. ११ कबीरचरित्रबोध तथा दूसरे ग्रन्थोंमें) तब शेखने कहा, मैं जानता हूँ कि, कबीरने जादू किया है इस कारण वह नहीं डूबा है। यदि अबकी बार मैं कबीरको पाजाऊँ तो अग्निमें जलादूँ—यदि वह अग्निसे बच जावेगा तो मैं उसको परमेश्वरका सत्य अंश समझूंगा। उसी समय कबीर साहब गङ्गासे बाहर निकल शाहसिकंदरके निकट गये आपके देखतेही शाह उठ खड़ा हुआ और अत्यंत मान संप्रभम सहित कबीर साहबको अपने बराबर आसनपर बैठा लिया। यह देखके पूर्वोक्त शेख अत्यंत क्रुद्ध हुआ। उसके नेत्र रक्तवर्णके होगये, कहा कि ए, कबीर ! तूने जादू किया है इस कारणही जलमें नहीं डूबा। तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ शेखजी ! जैसे आप कहो बादशाह बोला कि, आप मुझे कबीरके मारनेके लिये कहते हैं पर इसमें मेरा कुछ वश नहीं है क्योंकि, पीर और फकीर परमात्माकी जात हैं वहां मेरा जोर नहीं पहुंच सकता। यदि वो रैयत (प्रजा) होते तो मैं जोरभी करता वो लापरभा फकीर है वहां जोर करना शोभा नहीं देता। आप ही तो यह समझकर कहा करते थे कि, पीर और फकीर परमात्मा हैं अब आप इस फकीर कबीरको मारनेके लिये कहते हैं यह मुझसे नहीं हो सकता। आप और वो एकही तो हैं यह अपने मनसे विचारो उसने तो आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा है। आप उसपर क्यों गजब करना चाहते हो, बड़े लोग नेकी बताया करते हैं, उन्हें जोरो जुल्म नहीं अच्छे लगते। आप मेरी बात मानलें लड़ाई छोड़ दें परमात्माकी ओर देखकर मेल करलें। यह सुन तकी बोला कि, ए सुलतान ! तुमें कोई दुःख न होगा मैं कहूं सो मानकर मेरा सन्तोष कर। यह सुन सिकन्दर बोला कि, चाहे मेरा शिर लेलीजिये पर फक्कड़ कबीरको न मारो, मैं यह मांगता हूँ मुझे देदीजिये। यह सुन तकौने क्रोधमें आ आपने ताजको जमीपर दे मारा। कबीर दासजी कहते हैं कि, जब हमने शाहको व्याकुल देखा तो कह दिया कि, ए सुलतान ! अब पीरका कहा करें हमें इसमें कुछ भी त्रास नहीं है मैं इसी तरह कह रहा हूँ यह भी बात नहीं है किन्तु सत्य नाम (श्रीराम नामके बलपर) कहता हूँ क्योंकि, मैं भी उसका ही दास हूँ। यह सुन बादशाहने कह दिया कि, जो चाहे सो कबीरका करलो, आप मार डालों हम कुछ भी बुरा न मानेंगे पर जो साधुको मारता है उसका भला नहीं होता। क्रोधमें आकर शेखतकीने कह दिया कि, कोई है जो कबीरको बांधे। आप शेखतकी उठ खड़े हुए तथा सभी काजी पंडितभी बांध २ कहने लगे। किसीनेभी नहीं कहा कि, देखो विचारो। हाथ पैर बांधकर गंगाजीमें बार दिया, पर, कबीरजीको इसमें कोई संशय नहीं हुआ। आप गंगाजलके ऊपर आसनबांधे दीखे