भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

लक्ष्मीजीका कबीर साहिबको लुभानेकी इच्छासे आना और विफल मनो- रथ होकर लौट जाना सत्यलोक

काम क्रोधादिके झगड़ोंसे पृथक् कर देता है। सत्यगुरुके मिलनेका मार्ग बतलाकर अपने प्राकृतिकसे मिला देता है। चार वेद प्राकृतिक वेद कहलाते हैं। ये चारों विशेषता सांसारिक मनुष्योंके निमित्त ठहराए गए हैं। मुक्तिके अधिकारियोंके एतद्द्वारा सूक्ष्म वेदमात्र है। सूक्ष्म वेदकी शिक्षामें किसी प्रकारका अवगुण अथवा त्रुटि नहीं है वह निर्दोष तथा अवगुण रहित है दूसरेमें नहीं। यदि वेदों और पुस्तकों द्वारा किसीकी मुक्ति होजाती तो मुक्तिके अधिकारियोंके लिये सूक्ष्म वेद पृथक् न ठहराया जाता।

अध्याय ७.

विष्णु भगवान्।

कालपुरुष तीनों लोकोंरूपी भवसागरकी रचना किये; पीछे उसने अपनी स्त्री आद्या और अपने तीनों पुत्रोंको तीनों लोकोंके प्रबंधका अधिकार तथा दूसरे कार्योंके लिये नियुक्त कर दिया, इन तीनोंमें विष्णुको उच्चश्रेणीका अधिकारी नियत किया, सबसे श्रेष्ठता दी। माता-पिता दोनोंने विष्णुको आशीर्वाद दिया, श्रेष्ठता प्रदान का। विष्णुको अपने स्थानपर तीनों लोकोंका कर्ता-धर्ता नियत किया। निरञ्जन तथा आद्याने अपना प्रभाव तथा बल विष्णुमें भर दिया। जैसा कि, मैं प्रथम परिच्छेदमें लिख आया हूँ। विष्णुकी माता अपने पुत्रपर अत्यंत प्रसन्न हुई। इस कारण विष्णु इस भवसागरके कर्ता-धर्ता ठहरे। जैसे कि, चक्रवर्तीराजा समस्त देशोंके राजोंपर राज्य करता है, इसी प्रकार विष्णु तीनों लोकोंके चक्रवर्ती हुए। आपको सब स्थानोंकी उपस्थिति तथा प्रकट गुप्तका बल प्रदान किया गया। ये प्रत्येक हृदयका भेद जानने लगे। प्रगट मनुष्यके पाप पुण्यका प्रतिशोध करना यमके अधिकारमें हुवा। प्रत्येकका भाग्य नक्षत्र विष्णुके अधिकार में हुवा। नरक बैकुण्ठ तथा उसके चारों ओर विष्णुका अधिकार फैला। चार खान चौरासी लक्ष योनिके जीव विष्णुके अधिकारमें ठहरे। इन तीनों लोकका रचयिता और सन्नाट है जब जैसा चाहता है बँसा करता है समस्त अधिकार इत्यादि उसको मिला है। तीनों लोकोंका रचयिता तथा परमेश्वर यह कहलाता है। इसी परमेश्वरका पूजन तीनों लोकोंमें हो रहा है। ब्रह्मा और शिव ये दोनों उसके मंत्री हैं। यह बादशाह है। यह स्वशरीर परमेश्वर है समस्त पृथ्वी तथा आकाशके मनुष्य उसकी पूजा करते हैं। इसी परमेश्वरकी आज्ञा सभी स्थानोंमें प्रचलित है। जहाँ मनुष्योंपर कठिनाई उपस्थित होती है तो उसके निवारणार्थ इस परमेश्वरका

दश सोहंगका हाल

पधारना हुवा करता है। अनेक बार तो वे स्वतः गरुड पर आरूढ़ होकर दौड़ते हैं, तुरंत उस स्थान पर पहुँच जाते हैं। सामर्थ्यभर उस विपत्तिको दूर करते हैं, कभी २ वह जन्म लेता है। जैसे राम कृष्णके अवतार धरकर दैत्योंको मारता है। जब दैत्य बलिष्ठ होते हैं तब विष्णु देवताओंकी सैन्य लेकर इनके साथ समर करता है। सामर्थ्यभर उनको मारकर भगा देता है। मर्यादा वश पराजित होता है तो स्वयम् भाग जाता है। यही विष्णु महाराज सारे संसारको आजाएँ देते हैं। सांसारिक तथा धार्मिक ऋषीश्वरोंको समस्त मर्म सिखलाते हैं। ऋषीश्वर राजाओंको बतलाते हैं, राजालोग अपनी समस्त प्रजामें वही नियम प्रचलित करते हैं, वेद पुराण सभी इसी विष्णुको जगत्का कर्ता-धर्ता मानकर, परमेश्वर कहके प्रशंसा किया करते हैं। ब्रह्मा शिव इन्द्र इत्यादि देवता सब ऋषीश्वर इसी विष्णुके प्रभुत्वकी ओर समस्त भविष्यवक्तागण इत्यादि इसी परमेश्वरकी साक्षी देते हैं। आदम, नूर, इबराहीम, इसहाक, याकूब, मूसा, ईसा और मुम्मद इत्यादि इसी परमेश्वरकी प्रशंसा करते आए हैं। सबके पथ-प्रदर्शक येही विष्णु महाराज हैं। निर्गुण तथा सगुण दोनों रूप आपहीके हैं। सबके सब इसी दिव्यदेह ईश्वरकी वन्दना बराबर करते आते हैं। समस्त धर्मोंके रचयिता येही विष्णु महाराज हैं। शिवके धर्म पृथक् हैं। और वे भी विष्णुकी परामर्शक साथ हैं और कर्मकाण्ड तथा मीमांसा सब ब्रह्माकी ओरसे हैं। परन्तु वह सब विष्णुकी कामनाके साथ हैं। इस जगत्की समस्त कलें विष्णुके हाथमें हैं। विष्णुहीको अधिकार मिला है।

आद्या और निञ्जनके पुत्र विष्णुमहाराज तीनों लोकोंके ठाकुर एवम् अपने माता पिताकी प्रतिमूर्ति हैं। येही चक्रवर्ती महाराज एवं भवसागरके प्रबन्धक हैं, अत्यन्त बलिष्ठ तथा प्रभावशाली हैं, वैरियोंके दमन करनेके निमित्त सदैव अस्त्र शस्त्रसे सुसज्जित रहते हैं, आपका शाङ्गधनुष और खड्ग नन्दक है, गदा कौमोदकी तथा चक्र सुदर्शन हाथमें है। ये शस्त्र ऐसे भयानक हैं कि इनके अवलोकनसे ही भयके मारे दुष्टोंका प्राणान्त हो जाता है। ऐसाही चक्र सुदर्शन है कि, जिधरको छूटे उधर भस्म करदे। ऐसाही गदा कौमोदकी और नन्दक अस्त्र है कि, जिसको देखतेही वैरोंके प्राण निकल जाएँ। यह नीलवर्ण घनश्याम (मूसाका आसमानी रङ्गका खुदा) समस्त मनुष्योंपर कृपादृष्टि रखता है, अत्याचारियोंको धूलमें मिला देता है, जिनपर अत्याचार किया गया है उनको सत्व देता है। जब कभी दैत्यों और राक्षसोंकी लड़ाईमें वरदान आदिके कारण कठिनाता पड़ती है तब आपकी माता आदिश्वानी सहायता

करती है, जो कठिनाई आद्यासेभी न टले उसके निमित्त निरञ्जनकी ओरसे आज़ा होती है। जो निरञ्जनके भी बशसे परे हैं वह सत्यपुरुषके कृपाकटाक्षसे ठीक हो जाती है। जब सत्यपुरुषकी दया होती है तब समस्त कठिनाइयों निवृत्त हो जाती हैं, जैसे जगन्नाथके मन्दिर स्थिर रखनेमें इस कठिनाईको निवृत्त करना निरञ्जनके बशकी बात नहीं थी। तथा स्वयम् सत्य पुरुषने मन्दिर खड़ा किया। समुद्रको हटा दिया जब समस्त देवता तथा ऋषि मुनि इत्यादि दैत्यों और राक्षसोंसे सताये जाते हैं और दुःख पाते हैं तब समस्त देवता मिलकर ब्रह्माके पास जाते उस समय विष्णु, ब्रह्मा, शिव इन्द्रादिक देवताओंको अपने साथ लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करके उनका विनाश करते हैं, देवताओंको सुख देते हैं। सुतरां यही परमेश्वर सबका प्रतिपालक और तीनों लोकोंका प्रबन्धकर्ता है। संसारकी रक्षा करनेमें यह अपनी सारी शक्तियोंका उपयोग करता है।

शेर—यह नीर वरन घन यही बनाजो अदा।

यह खुदा है यह खुदा है यह खुदा है खुदा ॥

सुर मुनि जिसे गाते हैं कहे वेद बदीय।

यह सदा है यह सदा है यह सदा है पर सदा ॥

यही सगुण यही निर्गुण यही बेचूँ वचरा।

यह नदा है यह नदा है यह नदा है यह नदा ॥

है यह हमः मौजूद व हाज़िर नाज़िर।

न जुदा है न जुदा है न जुदा है न जुदा ॥

यही रज्जाक व कज्जाक है आयन्दः व हाल।

यह बदा है यह बदा है यह बदा है यह बदा ॥

पहचान अलग उससे हो उसपर आजिज।

यह फ़िदा है यह फ़िदा है यह फ़िदा है यह फ़िदा ॥

यह विष्णु अपने सूक्ष्म शरीरसे तो प्रत्येक वस्तुमें उपस्थित है और चारों खानके जीवोंमें घुस रहा है। ऐसेही ब्रह्मा शिव शक्ति तथा निरञ्जनको भी मानना चाहिए। जो कुछ समस्त ब्रह्माण्डमें दिखाई देता है, वह कुछ अपने शरीरमें जानना चाहिए। यह कबीर साहबका वचन है कि, विष्णु चारों खानेके जीवोंमें पूर्ण हो रहा है। विष्णुविहीन कोई स्थान नहीं है। इसीके अनुसार वह श्लोक पढ़ो कि—

जले विष्णुः स्थले विष्णुविष्णुः पर्वतमस्तके।

ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत्।

धर्म प्रचलित करनेकी कथा

अनुवाद—जलमें विष्णु, स्थलमें विष्णु, पर्वतकी चोटीपर विष्णु, अग्नि इत्यादिमें विष्णु है । इस तरह समस्त जगत् विष्णुसे पूर्ण हो रहा है ।

धर्मशास्त्रसे प्रगट है । यद्यपि ऋषीश्वरोंने देवताओंको शाप देकर दुःखी किया, तो भी वेदोंका वचन है कि, विष्णुकी दयाके बिना किसीकी मुक्ति नहीं होती जैसा कि, यह श्लोक है—

मोक्षस्तु विष्णुप्रसादमन्तरा न लभ्यते ।

विष्णुकी दया बिना किसीकी मुक्ति नहीं होता ।

इस श्लोकसे यह तात्पर्य निकलना चाहिए कि, विष्णु सत्तागुणरूप है । बिना सत्तोगुणी युक्ति ग्रहण किए किसीको मुक्ति नहीं होती ।

चारों वेद इस विष्णुकी प्रशंसा किया करते हैं । चारों प्रकारकी भक्ति इसी विष्णुकी कृपा तथा अनुग्रहसे प्राप्त होती हैं। जैसा कि, ऋग्वेदका ये मंत्र हैं—
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुविचक्रमे ॥

पृथिव्याः सप्तधामभिः ॥ ऋग्वेद १-२-७-१ ।

अनुवाद— हे देवो । विष्णु सब स्थानोंपर उपस्थित है, उस परमश्वरने समस्त जीवोंको पाप पुण्य भोगने एवं समस्त पदार्थोंके ठहरनेके लिए पृथ्वीसे लेकर नीचेके सात प्रकारके धाम यानी भुवन बनाये एवं ऊपरके भी सात भुवन बनाए इसी तरह गायत्री, आदि सात छंदोंको विद्या सहित बनाया । उन लोगोंके स्थान ईश्वर वर्तमान था । जिस बलसे समस्त लोकोंको रचा है, इसी बलसे हम लोगोंकी रक्षा करता है । इसी कारण ऐ बुद्धिमानो ! तुम लोग हमारी रक्षा करते हुए इस विष्णुकी उपासना करो । वह विष्णु कैसा है ? जिसने बड़े भारी मेदिनीमण्डलको रचा है । उसकी सदैव बंदना करो । १-२-७-१ ।

विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पश्यशे ।

इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ ऋग्वेद-१-२-७-४ ।

अनुवाद—ऐ मनुष्यो ! विष्णु व्यापक ईश्वरके कई सुंदर संसारोंकी उत्पत्ति स्थिति और विनाश कर्मोंको तुम देखो । १-२-७-४

प्रश्न—हम यह किस प्रकार जानें व्यापक विष्णुके कर्म हैं ?

उत्तर—जिससे ब्रह्मचर्य सत्यभाषण इत्यादि व्रत बनाये गये हैं ईश्वरके जिन नियमोंके अनुष्ठान करनेसे हमलोग मनुष्यके शरीरको पानेके लिये समर्थ हुए हैं ये कार्य इसीके बलसे हैं । क्योंकि, इन्द्रियोंके साथ कर्ता भोक्ता जो जीव है उसका वही एक योगमंत्र है दूसरा कोई नहीं है कारण कि, ईश्वर जीवका अन्तर्यामी है, सिवा उसके और कोई जीवका हितकारी नहीं हो सकता, इस

धर्मदासजीके ४२ वंशकी स्थिति

कारण परमेश्वर विष्णुसे सदैव प्रेम रखना चाहिए। ऋग्वेद १-२-७-४

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।

दिवीव चक्षुराततम् । । ऋग्वेद १- २-७-५ ।

अनुवाद—ऐ ज्ञाताओ और मुक्ति योग्य मनुष्यों ! विष्णुका जो श्रेष्ठ और ऊँची श्रेणीवाला सत्यलोक हैं जो सबके जानने योग्य हैं, जिसको पाकर परमानन्दको प्राप्त हो जाता है फिर वहाँसे कभी दुःखमें नहीं पड़ता । इस श्रेणीको बहादुर और धर्मात्मा और वासनाओंको दमन करनेवाले सबके भिन्न बुद्धिमान पुरुष बड़े सोचसे देखते हैं । जैसे सूर्यका प्रकाश समस्त स्थानोंमें हैं । ऐसेही परब्रह्म विष्णु समस्त स्थानोंपर उपस्थित है । परम स्वरूप परमात्मा है । उसीके संयोगसे जीव समस्त दुःखोंसे छूटता है । बिना उसके जीवको कभी सुख नहीं मिलता, इस कारण प्रत्येक रूपसे परमेश्वरसे मिलनेका उद्योग करना चाहिए ।
१-२-७-५ ।

त्वं द्वि विश्वतोमुखो विश्वतः परिभूरसि ॥

अप नः शोशुचदधम् ॥ ऋग्वेद १-७-५-६ ॥

अनुवाद—हे अग्नि परमात्मा ! आप समस्त विद्याओंमें एवं समस्त स्थानों पर उपस्थित हो । आपके अनन्त मुंह हैं । वही शक्ति जिसके बलसे समस्त जीवोंके सद्पददेश सदैव हो रहा हो वही आपका मुख है । ए दयालु ! आपकी दयासे हमारे समस्त पातक पृथक् हो जायें जिसमें हमलोग निष्पाप होकर सदैव आपकी, भक्तिप्रार्थनामें संलग्न रहें । ऋग्वेद-१-७-५-६ । ऋग्वेद ऋग्वेद-

इसी विष्णुकी प्रशंसा चारों वेद करते हैं । इसी विष्णुको चारों वेद छ शास्त्र और अठारह पुराणोंने परमेश्वर कहा है । समस्त श्रुति स्मृति इसीसे-अपनी मुक्तिकी आशा रखते हैं । समस्त ऋषि मुनि औलिया अम्बिया इसी विष्णुकी बड़ाई तथा प्रभुता प्रगट किया करते हैं । समस्त वेद तथा पुस्तकोंमें इसी विष्णुकी पूजा कही है । इस परमेश्वरके अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर इस लोकमें नहीं है ।

देवीभागवतके नवम स्कन्धके पन्द्रहवें अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुने कपट से वृन्दाके आसुरीत्वका अपहरण किया । तब उसने शाप दिया कि, तू पाषाण हो जा । देखो नवम स्कंधके चौबीसवें अध्यायमें विष्णु शालिग्राम पाषाण हो गये । और वृन्दा (तुलसी) गण्डकी नदी हुई और इस गण्डकीमें शालिग्राम रहने लगे और तुलसी उनके शीशपर चढ़ती है यही कबीर साहिबने कहा है कि—

साखी—वृन्दाकरे शापसे, शालिग्राम औतार ।

कहे कबीर सुन पण्डिता, कह पूज होवे उधार ॥

जो वृन्दाके शापसे शालिग्रामके रूपमें अवतृत हुआ, कबीर साहिब कहते हैं कि पंडितों ! उसके पूजन से उद्धार हो जायगा ।

इस्लाममें विष्णुकी प्रधानता ।

मूसाकी प्रथम पुस्तक पैदायशका तीसरा बाब २२ आपत देखो जब आदम उत्पन्न हुआ उसने आज्ञा नहीं मानी तब आदमको बैकुण्ठसे बाहर निकाल दिया । बैकुण्ठकी वाटिकामें चमचमाती हुई आखोंवाले दूतोंका पहरा बैठा दिया कि आदम आयुवा फल खाने न पावे । खुदाबन्दने कहा कि, मनुष्य भलाई बुराइकी पहचानमें हममेंसे एकके सद्गुण हो गया । अब ऐसा न हो कि, हाथ बढ़ावे अमर फलमेंसे कुछ खावे, सदैव जीवित रहे ।

इस परमेश्वरके सद्गुण अनेक परमेश्वर हैं क्योंकि, यहाँ बहुवचन शब्द रक्खा गया है । जैसा कि पूर्वमें लिख आया है कि महा मायाके बलसे करोड़ों और अनगिनती ब्रह्मा रुद्र इन्द्र इत्यादि बुलबुलेके समान उत्पन्न होते और फिर उसीमें समाजाते हैं । सो उसकी लीला एक अगाधसागर है । ये सभी मायासे उत्पन्न हुए स्वयम् माया हैं । यह खुदाको दर्शन देता था और समस्त कार्योंसे उसको विज्ञ किया करता था ।

जैसे आदमके साथ उसी प्रकार नूहके साथ श्री यह खुदा रहता था । जब बाढ़ समाप्त हो चुकी नूह अपनी नासे बाहरआया । एवम् समस्त जीवों सहित पृथ्वीपर चरण धरा (देखो मूसाकी पहली पुस्तक) उत्पत्ति का ८ वाँ बाब २० आयत) तब नूहने खुदाबन्दके निमित्त बलिप्रदानस्थल बना समस्त पाक पक्षियों तथा समस्त पाक पशुओंमेंसे लेकर उस बलिप्रदानस्थलीपर जलाकर बलिप्रदान किया । उस समय खुदाबन्द उस सुगंधिके सृष्टनेके निमित्त आकाशसे उतरा । खुदाबन्दने अपने मनमें कहा कि, मनुष्यके निमित्त मैं अब पृथ्वीको कदापि लानत नहीं करूँगा । इस कारण कि, मनुष्यके चित्तकी वृत्ति बचपनसेही बुरी है जैसा कि, मैंने किया है, फिर कभी समस्त जीवोंको नहीं मारूँगा । बरन् जबलें पृथ्वी हैं तबलें बोना और लोना, शरदी गर्मी अगहनी और वैशाखी, दिन और रात बंद न होंगे ।

नवों बाब पहली आयत । खुदाबन्द ने नूह और उसके पुत्रोंको बर्कतदी और उन्हें कहा कि, फलो बढ़ो, पृथ्वीको भरपूर करो । खुदाबन्दने प्रण किया कि, मैं भविष्यतमें किसी जीवको बाढ़से कभी न मारूँगा, मनुष्यके अतिरिक्त समस्त

चारों गुरुकी प्रशंसा, उर्दूशेर ४२ वंशकी प्रशंसाके उर्दू शेर

जीवोंको नूहके भोजनको दिया और कहा कि, मनुष्यके रक्तका बदला लिया जावेगा, दूसरे जीवका नहीं। अपने समयका यह चिह्न दिया और नूहसे कहा। (३) आयत, मैं अपने धनुषको बदलीमें रखा है। वह मेरे तथा पृथ्वीके मध्य, प्रणका चिह्न होगा और ऐसा होगा कि, जब मैं पृथ्वीपर बादल लाऊँ तो मेरा धनुष बादलमें दिखाई देगा। (१५) मैं अपने प्रणको जो मेरे ओर तुम्हारे और प्रत्येक प्रकारके जीवोंमें है स्मरण करूँगा तूफानका जल फिर ऐसा न होगा कि सत्यानाश करे। (१६) कमान बादलमें होगी। मैं उपर वृष्टिपात करूँगा। जिसमें उस सदैवके प्रणको जो मेरे और पृथ्वीके समस्त जीवोंमें है स्मरण करूँ। (१७) निदान परमेश्वरने नूहसे कहा कि, यह उस प्रणका चिह्न है जिसको मैं अपने और पृथ्वीके समस्त जीवोंके मध्य स्थिर करता हूँ।

इसी प्रकार खुदाबन्द आदमके समान ही नूहको भी सब बतलाता रहा।

फिर देखो इसी किताबका (१८) बाब इबराहीमके साथ इसी प्रकार खुदाबन्द रहा। (१) फिर खुदाबन्द ममरीके बलूतोंमें उसे दिखलाई दिया। वह दिनके समय गरमीके दिनोंमें अपने खेमेंके द्वारपर बैठा था। (२) उसने अपनी दृष्टि उठाकर देखा। क्या देखता है कि, तीन आदमी उसके पास खड़े हैं। वह उन्हें देखकर खेमेंके द्वारसे उनसे मिलनेको भगा पृथ्वीपर्यंत उनके आगे झुकी। (३) वो बोला कि, ए खुदाबन्द ! यदि मुझपर दया है तो अपने सेवकके समीपसे न चले जाईये। (४) थोडासा पानी लाया जावे आप अपने पैर धोकर उस वृक्षके नीचे आराम कीजिये। (५) मैं थोडीसी रोटी लाता हूँ ताजा दम हो जाइये, इसके उपरान्त आगे जाइएगा। क्योंकि, आप इसीके निमित्त अपने सेवकके यहाँ आये हैं तब उन्होंने कहा कि, वैंसाही कर जैसा तूने कहा। (६) इबराहीम खेमेंमें सरःके पास दौडा गया और कहा कि, आटा लाकर शीघ्र गूँध, फुलके बना। (७) इब्राहीम पशुओंकी झुण्डकी ओर दौडा एक मोटा ताजा बकरा लाकर एक युवकको दिया, उसने उसको तैयार किया। फिर उसने घी दूध और उस बकरेको जो उसने पकवाया था लेकर उनके सामने रक्खा, आप उनके समीप वृक्षके नीचे खड़ा रहा और उन्होंने खाया।

ईसाई लोग अनुमान करते हैं कि, उन तीनों मनुष्योंमें दो फारिस्ते थे एक खुदाबन्द यहवाह जुलजलाल था।

जैसे खुदाबन्द इन साहबोंके साथ था उसी प्रकार मूसाके साथ रहा और मूसाको समस्त धर्म कर्म बतलाया। मूसाने बनी इसराईलको सब नियम सिखलाया। जिसमें बनीइसराईल इस नियम पर चले। इस नियमावालीका

नाम तौरैत पुस्तक ठहरा । वह तौरैत पहली पुस्तक है जो पश्चिमी पैगम्बरों (अनागत वक्ताओं) को मिली अनेक बेर खुदाबन्द ने मूसा से बातें की और मित्र की भाँति सब कुछ सिखलाया मूसाने खुदाबन्दको स्वच्छभुसे देखा, देखो मूसाकी दूसरी पुस्तक खिरोज चौबीस बाब ९ आयत ।

तब मूसा, हारूँ, नहब अबीद तथा सत्तर इसराईली श्रेष्ठ पुरुष ऊपर गये (१०) और उन्होंने इसराईलके परमेश्वरको देखा । उसके पैरोंके नीचे नीलमके पत्थरकी गचकारी थी, उसका स्वेच्छ शरीर आकाशके सदृश था । (१०) बनी इसराईलके अमीरोंपर उसने अपना हाथ न रक्खा उन्होंने खुदाको देखा और खाया पीया ।

यह आसमानी रङ्गका परमेश्वर समस्त संसारपर शासन करता है । उसका भेद कोई नहीं जानता । हों कोई कोई संत उस खुदाके भेदको जानते हैं वे मायाके दगासे बच जाते हैं । नहीं तो सांसारिक मनुष्योंकी क्या सामर्थ्य है जो कि, बच सकें । केवल सत्यगुरुकी दया जिसपर हो वह बच सके एवं वही पहचान सकता है ।

इस खुदाकी ठीक तसबीर सूरत शकल सवारी इत्यादी खरकैल नबीकी पुस्तकमें देखो ।

प्राचीन नियमपत्र बखरकैल नबीकी पुस्तकका सार ।

तीसवें वर्षके चौथे महीनेकी पाँचवी तारीख को ऐसा हुआ कि, जब मैं नहर कबीरके किनारे आस्तीरोंके बीचमें था तो आकाश खुल गया मैंने खुदाबन्दका तेज देखा (२) उस महीनेके पाँचवे दिवस यानी यहपकीन बादशाहके बंदी होनेके पाँचवें वर्षमें (३) ऐसा हुआ कि, खुदाबन्दका वचन बोजीकाहनके पुत्र खरकैलको, कसदियों के देश में नहर कबीरा के किनारे पर था पहुँचा । वहाँ खुदाबन्दका हाथ उसपर था (४) मैंने दृष्टिपात किया तो क्या देखता हूँ कि, उत्तरसे एक बगूला उठा एक बड़ी घटा एक आग जिसकी लवें आपसमें लपटी जाती थीं, जिसके गिर्द प्रकाश चमकता था और उसके मध्यमें यानी उस आगमेंसे पालिश की हुई पीतलकीसी मूर्ति दिखलाई दी । (५) उसके मध्य चार जीवोंकी एक प्रतिमा दिखलाई दी । उनकी सूरत यह थी कि, वो मनुष्यसे मिलती जुलती थीं । (६) प्रत्येकके चार २ पंख थे । उनके पैर जो थे वो सीधे थे । उनके पावोंके तलुवे बछरूके पावोंके तलवेसे थे । मंजे हुए पीतलके सदृश झलकते थे । (८) उनके चारों ओर पंखोंके नीचे मनुष्यके हाथ थे । मुंह तथा पंखभी इन चारोंके थे । (९) उनके पंख आपसमें एक दूसरेसे मिले

थे, और वे चलते हुए मुड़ते नहीं थे, वरन् वे सब बराबर सीधे आगेको चले जाते जाते थे। (१०) यही उनके चेहरेकी मिलान तथा समानता, सो उन चारोंमें एक का चेहरा मनुष्यका, एकका चेहरा शेरका उनकी दाहिनी ओर एकका चेहरा बैल तथा एकका चेहरा उकाबका था। (११) उनके चेहरे यों हैं। उनके पंख ऊपरसे फैलाये हुये थे। प्रत्येकके दो पंख दूसरेके दो पंखोंसे जुटे हुए थे। दोनोंसे उनका शरीर ढका हुआ था। (१२) उनमें से प्रत्येक आगेको सीधा चला जाता था। जिधर आत्मा जाती थी वे जाते थे। वे चलते हुये फिरते न थे। (१३) रही उन जीवोंकी सूरत, सो उनकी सूरत आगके सुलगे हुये कोयलों और जलते हुये प्रदीपके सदृश थी। वह उन जीवोंके बीच इधर उधर आती जाती थी। वह अग्नि तेजमय थी। तथा उस अग्निमें से बिजली वर्हिगंत होती थी। (१४) वे जीव दौड़ जाते थे और पलट आते थे। जैसे बिजली चमक जाती है।

(१५) सो जब मैं उन जीवोंको देख रहा तो क्या देखता हूँ कि, उन जीवोंके पास एक पहिया चार मुंह वाला पृथ्वीपर है। (१६) रही इन पहियोंकी सूरत और उनकी बनावट, जो वह पत्रेकीसी दिखाई देती थी, उन चारोंका डौल एकही था। उनकी सूरत तथा बनावट ऐसी थी मानों पहिया पहिएके बीचमें था। (१७) जब वे चलते थे तो वे चारों ओर ढलते थे ढलते हुए पीछे न फिरते थे। (१८) उनका घेरा जो था सो ऐसा ऊँचा था कि, भय जान पड़ता था। इन चारोंके घेरेमें चारों ओर आँखें फिरी हुई थीं। (१९) जब वे जीव चलते थे तो पहिये उनके साथ चलते थे। जब वे जीव पृथ्वीसे उठाए जाते थे तो पहिए भी उन्हीके साथ उठाए जाते थे क्योंकि, पहिएमें जीवोंकी आत्माएँ थीं। (२२) उस प्रकाशकी सूरत जो उन जीवोंके मस्तकोंपर थी ऐसी थी जैसे डरावने बिलौर का प्रकाश होता है। वह उनके मस्तकों पर फैला हुआ था। (२३) उससे नीचे उनके समपर थे। एक दूसरेकी ओर था। प्रत्येकके दो दो थे। जिनसे उनके शरीरोंका एक रुख और दू दू पहने उनसे दूसरा रुख ढका रहता था। (२४) मैंने उनके परोका शब्द सुना मानों बहुत पानियोंका शब्द आवज्जद क्रादिर मुतलक्का शब्द है। जब वे चलते थे, ऐसे शोरकी आवाज हुई जैसे लश्करकी आवाज है। जब ठहरते थे अपने परोको लटका देते थे। इस फ़िजामेंसे जो उनके मस्तकों के ऊपर थी एक प्रकारका शब्द होता था। (२५) उस फ़िजासे ऊँचे पर जो उनके शिरोंके ऊपर था सिंहासनकी सूरत सूरत थी, उसका दिखावा नीलमके पत्थरकासा था, उस सिंहासनके समान

कबीर साहिबके १२ पंथोंका सामान्य परिचय

बस्तुपर किसी मनुष्यकीसी मर्ति उसके ऊपर दिखलाई दी । (२६) मैंने उसकी कमरसे लेकर ऊपरकी ऊँचाई पर्यन्त पालिश किए हुए पीतलका शार्ङ और अग्निस्फुलिङ्गकासा तेज उसके मध्य तथा चारों ओर देखा । उसकी कमरसे लेकर नीचेपर्यन्त मैंने अग्निकी लपटकासा तेज देखा । चारों ओर एक-प्रकारकी जगमगाहट देखी । (२७) जैसे उस कमानका स्वरूप है जो वर्षाके दिवसों में बादलमें दिखाई देता है । वैसे ही आपसे उस जगमगाहट का दिखावा था । परमेश्वरके तेजस्वरूपका यही दिखावा था । देखतेही मैं औंधे मुंह गिरा और मैंने एक ऐसा शब्द सुना जैसे कि, किसीने कहा २-बाब (१) और उसने मुझसे कहा कि, ए मनुष्य ! अपने पैरोंपर खड़ा हो कि, मैं तुझसे कुछ कहा चाहता हूँ । (२) जब उसने इस प्रकार कहा तब आत्माने मुझमें प्रवेश दिया और मुझको पैरोंपर खड़ा किया । तब मैंने उसकी सुनी कि, मुझसे बातें करता था । (३) उसने मुझसे कहा कि, ए मनुष्य ! मैं तुझे बनी, ईसराईल उन बागी झुंडोंके पास जो मुझसे फिरगए हैं भेजता हूँ, वे और उनके बाप दादे आजके दिवस पर्यन्त मुझसे विरुद्धता करते हैं । (४) कारण यह कि, वे निलंज्ज और कठोर हृदय बालक हैं जिनके पास मैं तुमको भेजता हूँ तू उनसे कह कि, खुदाबन्द यह वाद यों आज्ञा देता है ।

जब मैंने दृष्टिपात किया तो क्या देखता हूँ कि, उसका एक हाथ मेरी ओर उठा है और उसके हाथमें अनेक पुस्तकें हैं और उन पुस्तकोंमें शोककाव्य लिखा है । तब मैंने मुंह खोला और उन समस्त पुस्तकोंको खालिया । उस समय वह मुझको मधुके सद्गुण मीठी जान पड़ीं और मैंने समस्त पुस्तकोंसे अपनी आंतडियों भरलीं । तब खुदाबन्दने मुझको आज्ञा दी कि, तू मेरी आज्ञा लेकर बनी इसराईलके पास जाकर कह दे कि, विरुद्धता छोड़कर मेरी सेवा स्वीकार करो ।

यहाँपर मेरा अभिप्राय केवल इतना था कि, मूसाके खुदाका स्वरूप लोगोंपर प्रगट होवे मालूम करें कि, जो कुछ वेदमें है वही बात तौरीत तथा दूसरे नबियोंकी पुस्तकमें है इस विषयमें तनिकभी विभिन्नता नहीं ।

अग्निको विष्णुभवरूप कहना ।

“वेदके अनुसार परमेश्वर अग्निभी है और वह अग्नि विष्णु है ।”

मैं पहले लिख आया हूँ कि, सूक्ष्म वेदका कथन है कि, सत्य पुरुषने काल-पुरुषको अपने क्रोध और प्रकोपके अंशसे बनाया था । वह कालपुरुष जब सत्य-पुरुषकी अग्निके भागसे बना प्रबल हुआ है । फिर उसने अपना समस्त तेज

उनके भिन्न पंथ, महाप्रलयकी कथा

विष्णुमें भरकर विष्णुको अपना उत्तराधिकारी एवं समस्त संसारका रचयिता ठहराया है। इस कारण यह विष्णु अग्निकी प्रतिमूर्ति है। इसीका पूजन समस्त संसारमें, हो रहा है। वही आग खुदा है, इसी आगको हिन्दू मुसलमान ईसाई यहूदी इत्यादि षट्दर्शनके लोग पूज रहे हैं। किसी प्रकार पूजें, समस्त पृथ्वी पर इसीकी पूजा है। यज्ञ हवन इत्यादि इसीके निमित्त होता है। जो कुछ बलिप्रदान अथवा महाबलिप्रदान आदि हैं हवन इत्यादि सब उसीके निमित्त होता है। वह परमेश्वर अग्नि है और अग्नि उनका मुंह है, जो कुछ उसके नामसे आगमें पड़ता है सो सब उसका भोजन है। अन्न, फल, घी, गुड़, मनुष्य और पशु सब उसके भोजन हैं। वह सबको खाता है, समस्त मनुष्य इसी आगकी पूजा करते हैं। इसका भेद बिलकुल नहीं जानते। समस्त पवित्र पुस्तकें इसी अग्निकी प्रशंसा तथा बड़ाई प्रगट करते हैं। इस अग्निकी पहचान बिना सद्-गुरुकी आज्ञाके नहीं हो सकती। जो कुछ वेद बतलाता है और ऋषीश्वर कहते हैं, वही कथन अंबियाका देखो।

खिरोजका (३) बाब (२) डुरेबके पर्वतपर मूसापर खुदाबन्द अग्निकी लपटोंमें प्रगट हुआ। देखो तौरीतमें।

खिरोज २४-१७-खुदाबन्दका जलाल दहकती

आगके सद्गुण दिखालाई देता था।

इसनसना ४-२४-तेरा परमेश्वर एक मस्म करनेवाली आग है।

तथा ४-३३-परमेश्वरकी आवाज आगमेंसे बोलते सुनी

तथा ५-४-परमेश्वरने अग्निमेंसे बातें कीं।

तथा ९-१५-समस्त पर्वत अग्निसे जल रहा था मूसा
पर्वतसे उतरा।

२ समोइल २२-९-खुदाके मुहँसे आग निकलकर खागई।

मकाशिफ़ात २०-९-खुदाके पाससे आग उतरी और उनको खागई।

विराट् पुरुष जिसकी प्रशंसा वेद करता है वही विराट् पुरुष विष्णुका अवतार है। जब अर्जुनको दिखाया तो वह डर गया था जब मूसाको दिखाया तो मसा अचेत हो गया, न देख सका। वही विराट् पुरुष ईसा है। देखो मतीकी इञ्जील (१७) बाब (१) से (९) आपत पर्यन्त पढ़े।

और छः दिवसोंके उपरान्त मसीह, पिटर्स याकूब और भाई योहन्नाको पृथक् एक ऊँचे पर्वतपर लेगया। (२) उनको सामने उसकी सूरत बदल गई। उसका मुखडा सूर्यसा चमका, उसके, वस्त्र तेजके सद्गुण श्वेत हो गये। (३)

अन्तर्धान होनेकी कथा

मूसा और अलियास उससे बातें करते उन्हें दिखाई दिए । (४) ए परमेश्वर ! हमारे निमित्त यहाँ रहना अच्छा है । यदि इच्छा हो तो हम यहाँ तीन डेरे बनावें । एक तेरे और एक मूसा और एक अलियासके निमित्त । (५) वह यह कहताही था कि एक प्रकाशमय बादलने उनपर साया कर दी, इस बादलसे एक आवाज इस विषयकी आई कि, यह मेरा प्यारा बेटा है जिससे मैं प्रसन्न हूँ । तुम उसकी सुनो (६) शिष्य यह सुनकर मुहँके बल गिरे अत्यन्त भयभीत हुए । (७) तब मसीहने इन्हें छूकर कहा कि, उठो भयभीत मत हो । (८) पीछे उन्होंने अपनी आँख उठाकर मसीहके अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा ।

वह तो हजरत ईसाने अपना प्राकृतिक स्वरूप अपने शिष्योंको दिखल-लाया था ।

प्रगट हो कि, सब वह अवतार इसी निरञ्जनके हैं । जो उसके मुख्यपुत्र कहलाते हैं । इन ऋषीश्वरों सिद्ध साधुओं पीर पैगम्बरोंको बड़ा बल होता है परन्तु इनको न तो अपने प्राकृतिक स्वरूपकी सुध रहती है । न अपना आवागमन बन्द करनेकी युक्ति मालूम है । ये सब अवतार निरञ्जनके पुत्रोंके हैं और अपने पिता विराटके स्वरूपमें हैं ।

यह विष्णु सबमें बादशाह है । इस बादशाहके पास युद्धका समस्त समान है । इसके पास पाञ्चजन्य शंख है । जब वह समरके निमित्त चढ़ता है तब पाञ्च जन्य शंख फूंक डंका बजाकर चढ़कर युद्ध करता है । वास्तवमें इसे कोई कामना नहीं । भक्तोंके उद्धार तथा संसारी जनोंके बोधके लिये ऐसा किया करता है ।

भगवान् विष्णुके विषयमें कबीर साहिबजी कहते, चले आ रहे हैं कि सत्य पुरुष विष्णु भगवान्को पकड़ो उसके सच्चे भक्तोंका मान करो झूठे गुरुआ लोगोंके फन्देसे बचो । ये किसी बिरले पुरुषको मिलते हैं, जिसे मिलते हैं वो इनकी ही कृपासे सत्य पुरुषके लोकको चला जाता है । फिर भी जीवोंकी बुद्धि अन्धी हो रही है जो इस ओर ध्यान नहीं देते ।

देखो भगवान् विष्णुके विषयके कबीर साहिबके शब्द—

शब्द ३७—हरिठग ठगत सकल जग डोला ।

गवन करत तोसों मुखहु न बोला ॥

बालापनके मीत हमारे । हमें छाड़िकस चले सकारे ।

तुम अस पुरुष हों नारि तुम्हारी ।

तुम्हरी चाल पाहनहुते भारी ।

वाटिकि देह पवनको शरीरा, हरिठग ठगतसो उरल कवीरा ॥

कबीर दासजी उन गुरुओंके लिये कहते हैं जो भगवान् के तत्त्वको न जान उनकी निन्दा स्तुतिसे अपना कार्य चलाते हैं कि, भगवान् विष्णुके नामपर नकली गुरु बिना विष्णुके सत्यरूपको जनाये ज्ञानी होनेके ठगरी करते फिरते हैं । जब यमराज आकर घेर लेता है तो भी वे वह नहीं कहते कि, हमने सत्यपुरुष विष्णुके नामपर तुमें धोखा दिया था ।

हम तुम बालापन के मित्र हैं । हमें छोड़कर पहिले ही कहाँ चल दिये । आप बिना मंत्र सिद्ध कियेही लोगोंको चेला करने चल दिये जैसे गुरु वैसेही चेला हैं आजकलके गुरु लोगोंकी चाल पत्थरसेभी ज्यादा जड़ है क्योंकि, पत्थर तो जड़ होनेके कारण सत्यपुरुष विष्णुभगवान्का चिन्तन नहीं कर सकता किन्तु ये गुरु लोग चैतन्य होकर भी विष्णुको भी नहीं पहिचानते । पृथ्वी आदिका स्थलदेह तथा प्राणादि वायु आदिका सूक्ष्म है । कबीर साहेब कहते हैं कि, ऐसे पाखण्डियोंसे डरकर जीव भगवान् विष्णुके चरणोंमें पुकार मचावे हैं कि, मेरी रक्षा हो ।

शब्द ३८—हरि विनु मर्म बिगुर विन गन्दा ।

जहूँ जहूँ गयो अपन पाँ खोये, तेहि फन्दे बहु फन्दा ॥ १ ॥

योगी कहे योग है नीको, द्वितिया और न भाई ।

चुण्डित मुण्डित मौन जटा धरि, तिनहुँ कहाँ सिधि पाई ॥ २ ॥

ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता, ये जो कहहिं बड हमहीं ।

जहूँ ते उपजे तहूँहि समाने, छूटि गये सब तबहीं ॥ ३ ॥

बाँये दहिने तजो विकारै, निजुकै हरिपद गहिया ।

कह कबीर गूगे गुर खाया पूछेसो का कहिया ॥ ४ ॥

गन्दा—मलिन बुद्धिवाला, विन—पक्षीजीव—हरि—विष्णुभगवान्के, बिहु—बिना, बिगुर—बिगड़ गया । अपनेपे-अपने आत्मतत्वको, खोये-खोकर, जहूँ जहूँ—जिस जिस जगह गयो—पहुँचा, बहूँही, तेहि—उसे, बहुत—बहुतसे, फन्दा—झगड़े पड़े । अथवा जहाँ जहाँ गया अपने भजन ध्यान ही खोये और बिना विष्णुकी कृपाके संसारी बन्धनोंमेंही बँधा । योगी कहते हैं कि, योगही अच्छा है । योगके मुकाबिलेमें दूसरा कुछ नहीं है । उन्होंने तप किये शिर मुड़ाये मौन रहे जटाएँ राखीं पर क्या सिद्धि प्राप्त की, येही क्यों, ज्ञानी शूर कवि और दाता ये भी कहते हैं कि, हमही बड़े हैं जिस गर्भसे उपजे थे फिर उसी गर्भमें जन्म लेने चले गये । उनके सब मत रखेही रह गये । वाम और दक्षिण दोनों विकारोंको छोड़ दो, भगवान् विष्णुकी शरणको अपनी मानकर ग्रहण करो । जिससे कल्याण हो

कबीर साहिब कहते हैं कि, गुडखाया हुआ गूंगा स्वाद नहीं बता सकता, खाली इसारेसे ही कह सकता है।

शब्द ३९—ऐसो हरिसों जगत लरतु है, पंडुर कतहूँ गरुड धरतु है ॥ १ ॥

मूस बिलासी कँसे हेतू, जम्बुक करके हरिसों खेतू ॥ २ ॥

अचरज यक देखा संसारा, सोनहा खेद कुंजर असवारा ॥ ३ ॥

कह कबीर सुनों सन्तो भाई, यह सन्धि कोई विरले पाइ ॥ ४ ॥

ऐसे भगवान् दयालु जो अनायासही मुमुक्षु जीवोंके रक्षक हैं। पाप जीव इनसेभी विरोध किये बिना नहीं मानते। व्यर्थकी निन्दा करते हैं। क्या पीला सोंप गरुडको खालेना चाहता है ? जो विष्णुकी निन्दा करके अपना महत्त्व प्रकट करते हैं, वे सीधे सीधे पुरुषोंको बहकाकर ऐसे हजम करना चाहते हैं जैसे बिल्ली मूसेको खालेना चाहे। पर ये सब बातें इसी तरह हैं जैसे कि, श्यार शेरसे लड़नेका इरादा करे। श्रीविष्णु रहित जीवोंको वे क्या उमराह कर सकते हैं। हमने एक बड़ा आश्चर्य देखा कि, कुत्ते हाथीपर चढ़कर उसे चलाना चाहते हैं। यानी ऐसी बँसी गप्योंसे विष्णु भक्तोंको भक्तिसे डिगाना चाहते हैं। कबीर साहिब कहे हैं कि, किसी विरलेको विष्णुका साक्षात्कार हुआ है जिससे सत्य लोककी प्राप्ति हो जाती है ॥

भगवान् रामचन्द्रजी महाराज ।

मनु और शतरूपाका विवरण रामायणमें कहा है। कि, इन दोनोंने बड़ी तपस्याकी है। अस्सी सहस्र वर्षपर्यन्त प्रार्थना करते रहे, इसके उपरान्त ब्रह्मा इनके सामने गए। परन्तु मनुके पीछे खड़े होकर कहने लगे कि ए, राजा वर माँग। तब मनुने कहा कि, तुम मेरे सामने आओ। तब ब्रह्माने कहा कि, ए राजा ? तेरे प्रतापके कारण मैं तेरे सामने नहीं आ सकता हूँ। तब राजाने कहा कि, यदि तुमसे मेरे सामने आया नहीं जाता तो मैं तुमसे क्या माँगूँ ? फिर शिवजी आए वे भी ब्रह्माहीके सद्गुण पलट गए। पीछे विष्णु आए और कहा कि, राजा तू माँग क्या चाहता है। तब मनुने अपने नेत्र खोलकर देखा तो विष्णु महाराज शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि लिए सामने खड़े हैं। तब राजाने कहा कि, तुम्हारे सद्गुण मेरा पुत्र उत्पन्न हो। तब विष्णुने कहा कि, मेरे सद्गुण दूसरा कौन है मैं स्वयम् तेरा पुत्र होऊँगा और कुछ माँग। तब राजाने कहा कि, दूसरा वरदान यह दो कि, मैं आपसे जुदा होकर जीवित न रहूँ, भगवान् विष्णुने 'एव मस्तु' कह दिया। वेही मनु और शतरूपा राजा दशरथ और महारानी कौशलया हुए। भगवान्ने जो वरदान दिया था उसके अनुसार उनके घरमें भगवान् रामका

५ अ० कबीर पन्थके धार्मिक नियम

अवतार हुआ। यद्यपि वहाँ कौशल्यका वर पाना अतिही सुगम था तो भी उन्होंने वात्सल्य भक्तिसे प्रेरित होकर भगवान् को पुत्र बनने काही वर माँगा क्योंकि, बिना अपने ध्येयके आगे विश्वके साक्षाज्यको, नरककी भयंकरका तपत साधन समझते हैं। येही भगवान् रामचन्द्रजी महाराज कबीर जी साहिबके परम इष्ट थे। स्वामी रामानन्दजीसे ये ही दो अक्षर कानमें पड़नेके बाद मंत्रका रूप आपसे पूछा तो आपने परिस्फुट शब्दोंमें समझाते हुए कह दिया कि, 'राम न कह्यो खुदाई' ऐ मुसलमानों! तुम रामका महत्त्व नहीं समझ सकते, किन्तु तुमभी भूलके साथ इस खुदा शब्दसे भी रामको ही याद कर रहे हो।

इसी बातको शब्द चारमें कह दिया है कि—'हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहिमाना। आपसमें दोउ लरि लरि मूये, मर्म कोई नहि जाना' हिन्दू कहते हैं कि, हमें राम प्यारा है तथा तुरक रहमानका प्यारा बताते हैं। दोनों आपसमें लड २ कर मर गये पर मर्मका पता न चला कि, रामको ही वो दयालु कहकर याद कर रहे हैं। इन्होंने और भी कितनी ही स्थलोंपर भगवान् रामका गुण गाया है जिसमें से कुछ एक यहीं उद्धृत करते हैं।

शब्द १३—राम तेरी माया दुन्दि मचावे ॥

गति मति वाकी समझि परे नहिं, सुरनर मुनिहिं नचावे ॥ १ ॥

कबीर साहिब कहते हैं कि, हे राम! तेरी माया ऊधम मचा रही है। या मैं तू का भेद कर रही है यदि यह न हो, तो मैं तू का भेद न रहे। उसकी चाल तथा ज्ञान विचार जाने नहीं जाते यह सुर नर मुनि सबको नचा रही है।

शब्द ८—वे रघुनाथ एकके सुमिरै जो सुमिरै सो अन्धा ॥ ७ ॥

बिना एक सत्यपुरुष रघुनाथके सुमिरन किये जो किसी दूसरेका स्मरण करता है वो अन्धा है भगवान् रामको छोड़कर किसीका भी स्मरण न करना चाहिये।

१—दो शब्द—प्रायःभमें कबीर मंशूरका अर्थ कबीर साहिबकी ज्योतिर्या कहा गया है। इस कारण इस ग्रन्थमें कबीर दर्शन या उससे सम्बन्ध रखनेवाले एवम् उसके परिपोषक विषयोंका ही संग्रह होना चाहिये। कबीर साहिबका जीवन चरित्र भक्तभालमें है। सनातन धर्मों उन्हें इस कराल कलिकालके भक्तोंमें एक उच्च कोटिका मानते हैं। इस नातेसे वे भी उनपर उतनीही श्रद्धा रखते हैं जितनी कि, उनके सम्प्रदायके लोग उनपर रखते हैं वे परम भक्त थे। इस कारण उनका महत्त्व ईश्वरसे भी अधिक वर्णन किया जाय तो सनातनियोंकी तो आनन्दकी ही बात है। क्योंकि उनके यहाँ तो "दासानुदासो भवितास्मि भूयः" का अधिक महत्त्व है।

ईश्वरके दास होनेसे पहले ईश्वरके दासोंमें अपना नाम लिखाना सबसे उत्तम मानते हैं। इस कारण उनका महत्त्व वर्णन तो सुखका ही कारण होगा किन्तु जो बात उनके वचनों तथा उनके मान्य साम्प्रदायिक ग्रन्थोंसे बिल्कुल विभिन्न हो उस बातको उनके प्रकाशमें मिश्रित करना सर्वथा अनुचित प्रतीत होता है।

शब्द १४—रामरा संशय गाठिन छूटे । ताते पकरि २ यम लूटे ॥ १ ॥

जो राम के उपासक नहीं हैं उनकी संशय की गांठ नहीं छूटती इस कारण सबको यह पकड़ २ कर लूटता है । इन दोनों शब्दोंसे कबीर साहिबने स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया है कि, रामको छोड़ दूसरेका स्मरण करना अन्धोंका काम है, बिना उसका स्मरण किये संशयकी गांठ नहीं छूटती । हृदयकी कुन्डी नहीं खुलती रामका अनुभव या यथार्थ ज्ञान क्यों नहीं होती । इस पर कबीर साहेब कहते हैं कि—

स्मृति वेद पुराण पढ़ै सब, अनभव भाव न दरशै ।

लोहो हिरण्य होय धों कौसे, जो नहिं पारस परसै ॥

चाहे वेद स्मृति पुराण एवम् अनेक तरहके सम्प्रदायिक पोथा पढलो पर बिना अविचल प्रेम दृढ़ विश्वास और सच्चे गुरु रामका अनुभव हो नहीं सकता । वो सीताके लिये बन २ फिरनेवाला रावणका संहारक ही दीखेगा । पर जब पारसरूप गुरु मिल जायेंगे तो परसकर लोहे को पारसकर सोना बना लेंगे ।

उसी रामने सुप्रीवकी सख्य भक्तिके वश हो उसके बडे भाई बालिपर छलसे प्रहारकरके अपने बनाये कर्म नियमको, भी मर्यादा पुरुषोत्तमने अटल दिया कि, ए अंगद ! तू बापके बदलेके लिये उतावला न हो मैं तेरे बापका बदला स्वयं चुकाऊंगा । हुआ भी ऐसा ही । कृष्णावतारमें मर्यादा पुरुषोत्तमने कर्मफलकी मर्यादाको अनिवार्य दिखलाते हुए बालिके हाथके तीर से ही इच्छामय लीलाविग्रहका संवरण किया । भिलनी केवल निषादराज राक्षसराज और गीधराज आदि अनन्तोंको अपनाकर अपना नित्यधाम दिया जिसके रहनेवाले भगवानकी आज्ञासे संसारमें लोक कल्याणके लिये आकर भी निर्द्वन्द्व रहते हैं जैसे वहाँ अनुभव करते थे वैसाही यहाँ पर भी करते रहते हैं । श्रीकबीर साहेब बडे भी अपनानेवाले आप थे, कबीर साहिबमें जो भी कुछ कबीरपंथा था वो सब आपकी कृपाकाही फल था ।

पूर्णब्रह्म भगवान् कृष्ण ।

अब हम भगवान् कृष्णचन्द्रजीके कुछ वात्सल्य पूर्ण गुणोंको सुनाना चाहते हैं जो कि, अवतार लेकर एक भक्तिको देखते हैं, दूसरे वहाँ कुछ भी भेद भाव नहीं होते । कश्यप ऋषिके दिति अदिति नामकी दो स्त्रियाँ थीं । अदितिसे राजा इन्द्र उत्पन्न हुआ । वह देवतोंका बड़ा बलिष्ठ राजा हुवा । तब दितिने कश्यपजीसे निवेदन किया कि महाराज ! मेरे ऊपर भी दया करो कि, मेरा

भी इन्द्रके समान बलिष्ठ तथा प्रतापी पुत्र उत्पन्न हो तब कश्यपजीने कहा कि, तूभले कार्य कर तो तेरा पुत्र भी वैंसाही होगा और दिति भी सुकर्म करने लगी। तब दिति गर्भवती हुई जब उसको गर्भ रहा तब दितिका चेहरा तेजमय हो गया। यह स्वरूप देखकर अदितिने ईर्षा की और अपने पुत्रसे कहा कि, ए पुत्र। तेरा बैरी दितिके गर्भसे उत्पन्न हुवा चाहता है जो तुमसे सामना करेगा। तब इन्द्रने कहा कि, माता ! तू कोई चिंता न कर, मैं भली भाँति युक्ति करूँगा, तब इन्द्र एक छोटा अस्त्र लेकर और बहुत छोटा रूप धारण करके अपने योगबलसे दितिके पेटमें पैंठ गया, उस गर्भके बालकके सात टुकड़े किए और फिर उन सातमें भी और सात २ टुकड़े किए। जब उस बच्चेको दुःख हुआ तब रोने लगा। तब इन्द्रने कहा कि, ए भाई ! तुम मत रोओ, तुम सब उनचास मरुत् हो गए। जब दितिको मालूम हुवा कि, आदितिके कहनेसे इन्द्रने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया और मेरे गर्भके पुत्रके उनचास टुकड़े किए, तब उसने अदितिको शाप दिया कि, जैसे तेरे पुत्रने मेरे पुत्रको मारा काटा है उसी प्रकार तेरे पुत्रोंका भी विनाश हो और तू बंधनमें पड़े। जैसे बंधन तथा गर्भमें मेरे बच्चेको मारा तैसे बंधनमें तेरे बच्चे मारे जावें। वही अदिति देवकी हुई और कश्यप ऋषि वसुदेव हुए।

उन्हींके घर जब कि, पृथ्वीने जाकर पुकार किया कि, मेरे ऊपर पापी राक्षस और अनेक दैत्य इत्यादि होगए हैं मैं दुःखी हूँ। इस कारण इनके मारनेके निमित्त कृष्णावतार हुवा। समस्त राक्षसों तथा दैत्योंका विनाश किया। इसी प्रकार विष्णु अवतार पृथ्वीपर हुवा करता है और अवतार धरकर राक्षसोंका नाश करते हैं।

इन्होंने मुमुक्षुजनोंके कल्याणके लिये गीता जैसे शास्त्रका निर्माण किया जिसके छोटेसे रहस्यकी चिनगारियोंके सोले, मात्र ही सारे संप्रदायके रहस्य हैं। कबीर साहिबने इस गीता काही अनुवाद उग्रगीताके नामसे करके धर्मदासजी को सुनाया है। सौलभ्य गुण, जितना इस अवतारमें मिलता है उतना किसीभी में नहीं मिलता। उग्र गीतामें कहा है कि —सर्वव्यापक मैं हों भाई, मोहि बिन दूजा और न कोई” मैं सर्वव्यापक सत्य पुरुष हूँ, मैं ही एक हूँ मेरे बिना और कोई नहीं है। ये ही सत्य लोकके अधिपति हैं, राम आदि इन्हीके अनन्त नाम हैं, हंस कबीर इन्हींके लोकसे आते जाते हैं।

क्या इस रहस्यसे ईसाई अनभिज्ञ हैं ? अथवा मुहम्मद साहबके ग्रन्थोंका वृत्तान्त मुसलमान लोग नहीं जानते हैं ? सब जानते हैं। परन्तु इस मनुष्यके

मनमें विचार और चिन्ता नहीं है कि, उसपर विचार करके यथार्थ अवस्था से विज्ञ हो । न उनके मनमें दूढ़नेकी अभिलाषाही है ॥

विष्णुके उपकार ।

कितने मनुष्य ऐसा कहते हैं कि, हम तो विष्णुको परमेश्वर कदापि न मानेंगे और न उसकी कृतज्ञता स्वीकार करेंगे । भला विचारना चाहिए कि, यदि चूहा कहे कि, मैं शेर बबरसे सामना करूँगा उसकी कृतज्ञता न करूँगा । भला यह संभव है कि, चूहा शेर बबरसे विरुद्धता कर सके । ऐसेही ये मूर्ख मनुष्योंके ध्यान हैं कि, हम विष्णुकी आज्ञासे बाहर चरण रक्खेंगे । यह बात सर्वतोभावसे असंभव है कि, कोई मनुष्य मायाकी सेवासँ बाहर जासके । हों वह मनुष्य जो साधुगुरुकी सेवामें तन मन धन अर्पण करेगा वह विष्णुके वात्सल्यभावसे बंधनसे निकलेगा । जितने तनुपोषक और सांसारिक कांक्षासे भरे हैं कोई किसी धर्मका क्यों न हो सदैव विष्णुका सेवक रहेगा । क्योंकि, जितने धर्म पृथ्वीपर हैं वे सब बन्धनके कारण हैं कबीर साहबके शरण बिना अन्तमें समस्त जीवोंको विष्णुकी मायाके ग्रहमें प्रविष्ट कराते हैं । इस ब्रह्माण्डको चीरकर पार जानेकी किसीमें सामर्थ्य तथा बल नहीं जो कोई कुछ पावेगा सो सत्तगुरुकी सहायतासे पावेगा । दूसरी कोई युक्ति नहीं । सबके सब वेद और पुस्तकोंके बंधनमें पड़े हैं । केवल गुरुमुख पार उतरेंगे, मनमुख सब डूब मरेंगे । गुरुमुखके निमित्त भक्ति मुक्ति प्रस्तुत हैं । मनमुखके निमित्त सदैव का बंधन प्रस्तुत है । इस बातको समस्त संत महंत सदैवसे पुकारते चले आते हैं । गुरुमुखके निमित्त दोनों संसारमें विभ्राम है । समस्त ऋषि सिद्धि गुरुमुखके चरे हैं ।

मुखम्मस तरजीयबन्द ।

सरापा जीव करमोंसे लदा है । तमन्ना दीनवीमें पुर सदा है ॥

बहरदो एकसो शाहो गदा है । कहाँ दर ख्वाव विहमुक्ती पदा है ॥

यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।

है जैसी रूह वैसे ही फ़रिश्ते । बंधे सब जीव हैं आमालरिश्ते ॥

कुदूरत और आलायश आगश्तः । न कर होश इब्र आदम कालकुशतः ॥

यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।

यह कहने ही को हैं सब आदमेजाद । कियाशहवातने अकल उनकी बरबाद ॥

तअस्सुबमें हुए हैवान दिलशाद । यही सब जीवके बंधनकी बुनियाद ॥

यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।

न सद्गुरु बिन वसह तदबीर छूटे । न अमाला कारिश्नः उसके टूटे ॥

जपो तपज्ञान ध्यान उसका सो लूटे । जिघर जावैं उधर धर कालकूटे ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

फिकरमें सब लगे खुद खावसुखरकी । न खिदमत और नपरस्तिशसाधुगुरुकी ॥
खबर क्योकर मिले उस धामधुरकी । फँसे सब फंदमें ठगजीव बुरकी ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

न तन मन धनसे हो जबसे निरासा । रहेगा तबतलक यह काल फाँसा ॥
करो जप तप महलमें होवे वासा । हवस जब तर्क हो मुक्ति हो पासा ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

हवस है दीनवी दिलमें यह जवतक । न पावै रस्तगारी जीव तब तक ॥
सभी आमाल इसके जाल अवतक । न हरगिज पहुँचे घरलासा नीरव तक ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

तअस्सुब छोड़कर कर अकलओ होश । यगानः मिल बेगानः कर फ़रामोश ॥
नसाएह पन्द सुन अज्ज सन्त करगोश । मदद गुरु साधु चल तु पार नौ कोश ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

जिधर जावे उमर जीवका मरण है । हरण दुःखद्वंद्व सतगुरुकी शरण है ॥
वही मुकता वही तारनतरन है । वह आजिज जीवकापोशन बेहतरन है ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

इसका भाव वही है जिसका कि, निरूपण कर चुके हैं । उसीके सारको लेकर इस कवितामें कहा है कि दोनोंका एकही रूप है सत्य पुरुषसे भिन्न नहीं ।

अध्याय ८.

ब्रह्माजीकी कथा ।

यह ब्रह्मा समस्त संसारका रचयिता कहलाता है । इस ब्रह्मासे समस्त संसार है । यह रजोगुण अर्थात् प्रवृत्तिकी प्रतिमूर्ति हैं । बुद्धिरूप ब्रह्मा है । इससे समरत वेद और विद्या संसारमें प्रचलित हैं । इस ब्रह्माका स्थान लिङ्ग छः पत्तोंके कमल सो अधिष्ठान चक्रमें है । यह ब्रह्मा प्रवृत्तिकी कामनाको


यहाँ साहबके सांप्रदायिक कबीर ग्रन्थोंका सम्बन्ध छोड़कर ब्रह्मा और शिवजीपर देवी भागवतके धामक आधारपर लोग स्वतंत्र ही लिख पढ रहे हैं । यद्यपि यों यह ऐसे स्थलोंमें आवश्यक है । उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी । परन्तु मनुष्यकी अनन्त भावनाएँ होती हैं । न जाने किस भावनासे लिख दिया करते हैं । यह उनका ही अन्तःकरण जानता होगा । हम ऐसे विषयोंका कितनी ही बार सार्वजनिक समन्वय दिखा चुके हैं । जिन्हें ऐसे प्रकरणोंके रहस्यकी जिज्ञासा हो वो हमारे तिभिरभास्कर आदि ग्रन्थोंको देख लें । यहाँ दिखाना नहीं चाहते । अच्छा होता यदि इन कहानियोंके स्थानपर भक्ति ज्ञान वा स्वयं वेदकी इन्हींके विषयकी बातें होतीं ।

कबीरसाहिबके लोक तथा हंसोंकी कथा

उठाता है। स्वयम् काम कामना भी कहा जा सकता है। इस ब्रह्माका ज्ञान विहारी वह स्वयम् संसारी है। वह स्वयम् अपने कार्योंका अधिकारी नहीं है जो कुछ वह करता है विवश होकर करता है और वह करता है और अपने कार्योंसे डरता फिरता है। जब दैत्योंकी तपस्या पूरी होती है तब उनके सामने जाता है। उनको वरदान देता है उस ब्रह्माके वरदानसे दैत्य प्रबल होकर समस्त देवताओंको ब्रह्मा सहित मारकर भगा देते हैं। ब्रह्मा भी देवोंके साथ भागता तथा दुःख पाता फिरता है। उसका कोई वश नहीं चलता है। यदि यह ब्रह्मा अधिकारी होता तो दैत्योंको क्यों वरदान देता। परन्तु वह विवश होकर वरदान दे दिया करता है। यह ब्रह्मा संसार बढ़ानेकी कामनाओंमें डूबा रहता है। यह ब्रह्मा इतना दुःख पाता है तो भी दैत्योंको वरदान देनेको भागाही जाता है, उसका कुछ वश नहीं। यह जीव आपसे आप अपने कर्मोंका फल भोगता है। उनको रोकनेवाला कोई नहीं। वेदका प्रचार संसारमें ब्रह्माने किया परन्तु वेदके यथार्थ तात्पर्यको वह भी नहीं समझ सका, यदि ब्रह्मा वेदके यथार्थ तात्पर्यको समझता तो निश्चय वेदकी सच्ची शिक्षा देता। यदि इस ब्रह्मामें एकताकी विद्या होती अथवा एकका ज्ञान होता तो महामायाका ध्यान करके अपनी कठिनाइयोंको क्यों सरल किया चाहता। यह ब्रह्मा समस्त सांसारिक रीतोंका सिखलानेवाला है। इस ब्रह्माका हृदय सांसारिक कामनाओंसे भरा हुआ है। अपनी कामनाओंसे खिंचा हुआ बारम्बार जन्म मरणके दुःख कष्टमें फँसा रहता है यह ब्रह्मा इस जगत्के सोचमें पड़ा रहता है। ब्रह्माकी संतान ब्राह्मण हैं। शास्त्र और धर्म-कर्मका प्रचार करता रहता है। यह ब्रह्मदेव मुक्तिका उपदेश देनेवाला कहलाता है। इसीकी शिक्षासे सब जानी तथा ध्यानी होते हैं।

विद्या अविद्या आदि यथेष्टोंका रचयिता ब्रह्मा है। सब ऋषि मुनि इससे उत्पन्न होकर धार्मिक चलन सिखलाते हैं। समस्त सांसारिक पुरुष इसीपर चलते हैं।

देवीभागवतके तीसरे स्कंध की २-३-७ अध्यायमें लिखा है कि, सबसे पूर्व पानी था, दूसरा कुछ नहीं था। अब यहाँ नारदजी अपने पिता ब्रह्मासे पूछते हैं कि, ए पिता ! इस संसारकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, मधु तथा कंटभ दो दैत्य विष्णुके कानके मेलसे उत्पन्न हुए। वे जलपर रहा करते, जलही पर उन लोगोंने बड़ी तपस्या की, अत्यंत बलिष्ठ हुए। जब मैं उत्पन्न हुआ तो मैंने अपने आसनके नीचे कमल देखा। मैं इस कमलपर बैठता था कि, दोनों दैत्य दिखलाई दिए, मैं उनको देखकर भयभीत हुआ। उन