कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
संसारके समस्त नियमोंको बराबर बतलाता जाता था। सांसारिक सद्भावोंके सदृश उसकी आज्ञाएँ बराबर प्रचलित हुवा करती थीं।
हज़रत ईसा।
इन पश्चिमदेशीय अनागत वक्ताओंमें हज़रत ईसा सबमें बड़े श्रेष्ठ हैं। इज्जीलमें हज़रत ईसाकी उत्पत्ति इस प्रकार लिखी है कि, मरियम नामी एक बालिका थी। वह सूरूप नामका एक पुरुषके साथ भौंगी हुई थी। उन दोनोंकी केवल भैंगनी हुई थी विवाह नहीं हुआ था अबलों स्त्री पुरुष एकत्रित नहीं हुए थे कि, जिबराईल फ़िरिस्तःमरियमके समीप आकर उससे कहने लगे कि, ए मरियम ! सलाम, तू धन्य है। तू एक पुत्र प्रसव करेगी, उसका नाम तू ईसा रखना और वह परमेश्वरका पुत्र कहलाएगा। जैसा कि, फ़िरिस्ताने कहा, बिनशादी मरियम गर्भवती हुई उससे पुत्र उत्पन्न किया। जिसका नाम ईसा हुवा।
जैसे मूसाकी हत्याके निमित्त फ़िरऊन, बादशाह उद्यत हुवा था वही घटना हज़रत ईसाके साथ हुई। हेरुदेश बादशाह आपकी हत्याके निमित्त उद्यत हुवा। परमेश्वरने अपना दूत भेजकर बालककी प्राण रक्षा किया।
देखो इज्जीलमें हज़रतने आपको परमेश्वरका पुत्र कहा है इस कारण यहूदी आपके बैरी हो गए शूलीपर चढ़ाया। बत्तीस वर्षके वयसमें आप अपनी कबसे पुनः जीवित होकर तीसरे दिवस सशरीर वैकुण्ठको गए। पश्चिम देशके समस्त महात्माओंसे आप श्रेष्ठ हैं, क्वारीके गर्भसे उत्पन्न भी हुए। स्त्री गर्भकी उत्पत्ति महाभयानक यन्त्रणा है। जो स्त्री गर्भमें आता है वह निश्चय कठिन कष्टका अनुभव करता है जो गर्भमें रहता है उसको तीन प्रकारके ताप घेरते हैं।
(१) प्रियतप वह अत्यंत प्रबल जैसे गरम भट्ठा होता है। इस अग्निसे ऐसे बच्चा जलता है कि, जैसे गरम और लाल तावा हो उसपर किसी जीवको रखदो। वह तड़पता रहे पर उसके प्राण न निकलें।
(२) राद रक्त और भ्रष्टतामें शिरसे पौवपर्यन्त भरा रहता है।
(३) हाथ पौव उसके बंधे रहते हैं वह उल्टा लटका करता है। इन तीन तापोंके कारण वह अत्यंत व्यथित रहता है दुःख पाता है। जब यह गर्भसे बहिर्गत होता है तब मूत्रमार्गसे बाहर निकलता है। निकलनेके समय वायुकी ऐसी चोट लगती है कि, जैसे तीर लगकर शरीरसे पार हो जाता है। इस कष्टसे बालक चिल्ला २ कर रोता है। इस संकीर्ण मार्गसे निकलनेके समय अत्यंत कष्ट होता है कि, उसकी देह छोटी हो जाती है चाहे परमेश्वरका पुत्र हो, चाहे
प्राचीन नियम पत्र व खरकैल नवीकी पुस्तकका सार
मनुष्यका । जो कोई गर्भमें आवेगा वो सब दुःख उठावेगा, उत्पत्ति और मृत्युके समय आपने कैसा दुःख पाया था । यह अपने वशकी बात नहीं बरन् विश्व होनेकी बात है । प्राण देनेके समय आपको कैसा दुःख जान पडा । मृत्युसे कैसे भयभीत हुए कि, पुकार कर कहा । देखो मतीकी इञ्जीलका (२७) बाब (४६) आयत (एली एली लमासतक बानी) अर्थात् तू ए मेरे परमेश्वर ! से मेरे परमेश्वर ! ! तूने मुझे क्यों छोड़ दिया (५०) आयत ईसूने बडे जोरसे चिल्लाकर प्राण त्यागे ।
फिर मरक्कसका (१४) बाब और (३३) आयत, पीटर्स याकूब योहन्नाको ईसाने साथ लिया । वह घबराने और बहुत उदास होने लगे ।
(३५) इसने थोड़े आगे जाकर पृथ्वीपर गिर प्रार्थनाकी कि, यदि होसके तो यह घडी मुझसे टल जावे ।
(३६) कहा कि, ए पिता ! तुझसे सब कुछ हो सकता है इस प्यालेको मुझसे टालदे लूकाकी इञ्जीलका (२२) बाब (४२) आयत ए, पिता ! यदि तू चाहे तो यह प्याला मुझसे टल जावे परन्तु मेरी इच्छा नहीं बरन् तेरी इच्छाके अनुसार है ।
(४३) आकाशमें उसे एक दूत दिखलाई दिया जो उसको बल देता था ।
(४४) मृत्युके कष्टसे विह्वल होकर बहुत गिड़गिड़ाकर परमेश्वरसे प्रार्थना करता था, उसका पसीना रक्तके बूंदके सदृश पृथ्वीपर गिरता था ।
उन बातों से प्रगट होता है कि, वे महाशय अपनी मृत्युसे भयभीत होते थे परन्तु मारे जानेके वश नहीं था । मृत्युके समय दूत आपको सन्तोष दे रहा था । इससे आपके मनमें बड़ा ढाढ़स था । जो कोई माताके गर्भसे उत्पन्न होता है कोई निरापराध नहीं तथा निर्दोष नहीं मारा जा सकता है । देखो पुराना अहमदनामा इस्तसनाकी पुस्तक । (१८) बाब (२०) आयत वह भविष्यद्वक्ता जो ऐसी धूण्टता करे कि, कोई बात मेरे नामसे कहे कि, जिसके कहनेकी आज्ञा मैंने नहीं दी, अथवा अन्यान्य परमेश्वरोंके नामसे कहे तो भविष्यद्वक्ता मारा जावेगा ॥
(१) सला तीन (८) बाब (६४) आपत कोई मनुष्य ऐसा नहीं जो कि, दोषी न हो । मईकी नबीकी पुस्तक (७) बाब (२) आयत बनी, आदममें कोई सत्यवादी नहीं । रोमियोंका (३) बाब (१०) आयत, कोई सत्यवादी नहीं ॥
युसायाहनबी (६४) बाब (६) आयत, हमतो सबके सब ऐसे हैं जैसे कोई घृणित पदार्थ हमारी समस्त सत्यता गन्दी धज्जीके समान है।
अयूबका (९) बाब। (२) आयत मनुष्य परमेश्वरके समक्ष किस प्रकार सत्यवादी ठहरेगा? अयूबका (२५) बाब (२) आयत परमेश्वरके समक्ष मनुष्य किस प्रकार सत्यवादी समझा जावे? वह जिसकी उत्पत्ति स्त्रीसे है यह किस प्रकार पवित्र ठहरे?
अयूबका (१४) बाब (१) से (५) आयतपर्यन्त मनुष्य जो स्त्रीगर्भसे उत्पन्न होता है वह अल्पकाल पर्यन्त जीवित रहता है। पूर्णतया दुःखमें है। वह पुष्पके समान निकलता और तोड़ा जाता है। वह छायाके समान जाता रहता है। नहीं ठहरता है क्या इसीपर अपनी आँखें खोलता और मुझे अपने साथ न्यायालयमें लाता है।
कौन है जो अपवित्रसे पवित्र निकाले? कोई नहीं।
अयूबका (१५) बाब (१४) आयत, मनुष्य कौन है कि, जो पवित्र होसके वह जो स्त्रीसे उत्पन्न हुवा, वह कैसे सत्यवादी ठहरे?
मरकसकी इज्जील (१०) बाब (१७) (१८) आयत। भला कोई नहीं वरन् एकभी नहीं, अर्थात् एक परमेश्वरही भला है।
मतीकी इज्जील (१९) बाब (१६) आयत। ऊपरकी बात लूकाकी इज्जील (१८) बाब (१८) वही बात।
इज्जीलका पोलूस भविष्यवक्ताका दूसरा पत्र (२) करनतियोंके (१३) बाब (४) आयतमें लिखा है कि, ईसा निर्बलताके कारण सलीबपर मारा गया।
फिर पोलूस भविष्यवक्ताका पत्र फिलपियोनको (१) बाब (१७) (१८) आयत, प्रेमवाले यह जानकर इज्जीलको सुनाते हैं कि, मैं इज्जीलको प्रमाणित करनेके निमित्त नियत हुवा हूँ। अतः क्या है? सब प्रकारसे मसीहका समाचार दिया जाता है। चाहे मक्कारी हो चाहे सत्यतासे हो। मैं इसमें अप्रसन्न नहीं हूँ वरन् प्रसन्न रहूँगा।
अट्ठारह करोड़ साठ सहस्र योजन पृथ्वीसे ऊपर आकाशमें हजरत ईसा रहते हैं। इस स्थानका नाम जिब्रूत है और वही झाँझरी द्वीप समस्त सृष्टिके सन्नाद् निरञ्जनकी राजधानी है, उसीकी सभामें चारों दूत और सिद्ध साधु उपस्थित रहते हैं।
अनिको विष्णुरूप कहना
मुसद्दस—वह आग जो पैदायशके पहले है पैदा ।
जब था नहीं कुछ शून्यमें थी हुई हवैदा ॥
उसहीके ऊपर आलम कुल होमया शैदा ।
बैजा है वही जिसने दिया था यदेबेजा ॥
सोई आग लगा याद किया खिरमने खाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
पितरसको बनाया है जो इनसोंका शिकारी ।
और सारे जो शागिर्द लगे बातसो प्यारी ॥
इस आदतसे नफसकुशीसे हुए आरी ।
बेबंदगी दीदार न हो किबरिया बारी ॥
मूसाकी शरीअंतसे किया और है चाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
हर जानिब हर मुल्कमें तलवार चलाया ।
आपसमें मरें लड़के बिन आदमको गलाया ।
बाकी न रहे कोई सभी आग जलाया ।
घर घरमें नफाक उसने ही सब दिलको हलाया ॥
मा बेटी बहिन भाईमें आग अपनी सो डाली ।
आया है ज़मींपे वही जिबरूत जलाली ॥
कह और नहीं चोर चोरानेको मैं आया ।
कातिलहूँ मैं तलवार चलानेको मैं आया ॥
हर जानिबमें आग लगानेको मैं आया ।
पहचान मुझे भेड़ चुरानेको मैं आया ॥
आ मेरे पनह आदम सबका हूँ मैं पाली ।
आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥
हर चारतरफ गुल खिला और बाग बरोमन्द ।
दुःख द्रंद नहीं मानते हरजानिब आनन्द ॥
पहचान उसे खूब वदम अपनी फरहबन्द ।
पावे न पता आजिज दूढे कोई हरचन्द ॥
तस्वीर उसीकी है यह जो बागका माली ।
आया है ज़मींपर वही जिबरूत जलाली ॥
वेद तथा पुस्तकें स्पष्ट रूपसे प्रगट करती हैं कि, यह परमेश्वर आग है। जो कोई इस अग्नि परमेश्वरका पूजन करेगा सो बिना कृपाप्राप्तिके कैसे त्राण पासकता है। इस अग्नि परमेश्वर उसके अनुगामियोंने तीनों लोकमें आग लगा रखी है। जो कोई बड़ा भाग्यशाली हो बचे। षट्दर्शनका परमेश्वर और मूसाइयोंका परमेश्वर ईसाइयों और मुहम्मदियोंका परमेश्वर यही अग्नि है। सो बिना उपदेशके सत्यगुरुके उस अग्नि परमेश्वरको कोई पहचान नहीं सकता। जिस किसीने उसे न पहचाना तथा सत्यगुरुके वचनको न माना उसपर न जाने कौसी कठिनाई हुई। पहचानना उसीका उचित तथा यथेष्ट है जो कि, उसे पहचानकर उससे भाग जावे। फिर उस ओर पैर न रखे जहाँ कि, उसको जलानेवाली आग आ घरे। यह इसी मुसद्दसका भाव है।
पाँच तत्त्व और तीन गुणों द्वारा यह तीनों लोक भवसागर बसा हुआ है। जबलें पाँच तत्त्व तीनगुणसे मनुष्य पृथक् न हो तबलो कदापि छुटकारा न होगा। जब पाँच तत्त्व और तीन गुणोंसे पृथक् होना चाहेगा तब जीवनकी आशा नहीं। इसी कारण हजरत ईसाने इज्जीलमें कहा है कि, जो जीवितही मरेगा वो सदैवके निमित्त जी जावेगा।
मती १०-३८-जो कोई सलीब उठाकर मेरे पीछे नहीं आता वह मेरे योग्य नहीं।
मरक़स १०२१ सलीब उठाकर मेरे पीछे हो ले।
लुका ९-२३ अपनी सलीब प्रतिदिवस उठाकर मेरा अनुसरण करो।
रोमियों ६-६-मनुष्यता उसके साथ सलीबपर खिंचेगी।
इस पश्चिमदेशमें दो अपूर्ववक्ता प्रतिष्ठित और सर्वप्रिय हुए। प्रथम ईसा, दूसरे मूसा। ईसा तो स्वयम् निरंजनके अवतार हुए। मूसा विष्णुके साथ वैकुण्ठमें मानेगए।
योहन नबी।
योहन, जकरिया भविष्यद्वक्ताका पुत्र था। हजरत ईसाका कथन है कि, योहन्नासे श्रेष्ठ और कोई अनागतवक्ता नहीं हुआ। यह योहन्ना जभी माताके गर्भमें था, उसी समय वह आन्तरिक प्रकाशसे भर गया। यह मनुष्य रातदिन ईश्वरीयभयसे रोया करता था। यहाँलॉक, रोते रोते अशुचिह्व उसके गालोंपर पड़ गए, चमड़ेपर घाव पड़ गया। यह व्यक्ति वनमें रहा करता था टीडी मधु खाया करता था, बालोंका वस्त्र पहना करता था। इस योहनके मुसलमानी धर्मकी पुस्तकोंमें नबीयहि्या कहते हैं। उसके बाबमें बहुत कुछ लिखा है। यह
भगवान् विष्णुके विषयमें कबीरसाहिबके शब्द
योहन बपत्तिसम देता फिरता था । यह मनुष्य बनमें अधिक तथा नगरमें बहुत कम रहा करता था । इसकी शिक्षा तथा उपदेश प्रभाव शाली हैं । हीरोद बादशाहने उसको बंधनमें डाल दिया था, यह बड़ा उपदेशक था, एक स्त्रीको व्यभिचारके लिये उपदेश दिया, यह स्त्री उसकी बैरिन होगई, उसीकी सटसे योहन्ना मारा गया ।
मुहम्मद साहब ।
मुसलमान लोग मुहम्मद साहबको अन्तिम अनागतवक्ता समझते हैं । ये तीनों श्रेष्ठ भविष्यद्वक्ता हैं मूसा ईसा मुहम्मद इबराहीमकी संतान हैं मुसलमानोंकी पुस्तकमें लिखा है कि, इबराहीमसे लेकर मुहम्मदपर्यन्त इस घरानेमें चालीस सहस्र अनागतवक्ता होगए । कबीरजीके सांप्रदायी कहते हैं कि, मुहम्मद महादेवका अवतार है, महादेव भूत, प्रेत, जिन, परी, राक्षस, दैत्य इत्यादिका बादशाह है । देखो तवारीखमुहम्मदीमें । जब मुहम्मदसाहबने पृथ्वीपर अपना धर्म प्रचलित किया, उस समय सहस्रों जिन परी इत्यादि आपसे आप आकर मुहम्मद साहबके शिष्य होगए । सबोंने मुहम्मदी कलमः पढ़ा । यह मुहम्मद भूत प्रेतादिकके प्राचीन गुरु हैं । सुतरां तुलसीकृत रामायण बलकाण्डमें लिखा है, कि, जब शिवजीका विवाह राजा हिमालचलके घर हुवा, तब शिवजी जब विभूति रमाए सर्प इत्यादि गलेमें डाले बैलपर सवार होकर चले, उस समय ब्रह्मा, विष्णु, कुबेर, इन्द्र, वरुण आदिक देवता बड़े ठाठके साथ बन ठनकर बरातके साथ साथ चले । उस समय विष्णु महाराज जो बड़े हँसोड हैं हँसकर बोले कि, ए भाई ! समस्त देवताओ ! अपना अपना समाज लेकर पृथक् २ चलो । यह बात सुनकर समस्त देवतागण पृथक् २ होके चले । तब शिव अकेले रह गए । उस समय शिवजीने अपना शंख फूँका उसकी ध्वनि सुनतेही सहस्रों भूत प्रेत तथा जिन इत्यादि आनकर उनके चारों ओर एकत्रित होगए । शिवकी विचित्र बरात देखकर विष्णु तथा समस्त देवतागण हँसने लगे । पथमें बड़े बणे कौतुक होते चले । इसी प्रकार मुहम्मद साहबने जब मक्का नगरके बाहर जा, एक टीलेपर खड़े होकर हाँकें लगाई, तब सहस्रों जिन और परी इत्यादि आकर मुहम्मद साहबके शिष्य हुए । विष्णुके उपरान्त महादेव समस्त देवताओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं । सांसारिक वासनाओंपर आपकी श्रेष्ठ रुचि रहती है । महादेव तथा मुहम्मदका गुण एकही है । मार काट रक्तपात विनाश करनाही आपके धर्म हैं । सृष्टिके आरम्भमें शिवजीने भक्ति चलायी, मनुष्य जातिके गुरु बने, वही अन्तिम अनागतवक्ता हुए । संस्कृतमें महादेवजीका नाम महामदमय है ।
अर्थात् अत्यंत क्रोधी वही महासद अरबीमें मुहम्मद हुवा। यह महादेव वही है जिसने सृष्टिके आरंभकालमें पूजा तथा योगमुक्ति संसारमें प्रचलित की। भविष्य-पुराणमें इन्हें एक विप्रकुमार कहा है। जो कि, एक गोलोमके दूधमें पीजानेके कारण ऐसा बनना पड़ा था।
सत्यकबीर—आदिभक्त शिव योगी केली। राखी गुप्त न जगमें फेरी ॥
सांसारिक मनुष्योंको शिवजीने पूजा पाठकी वह युक्ति न बतलाई जिसको वे स्वयम् जानते हैं इसी प्रकार मुहम्मद साहबने अपना यथार्थ भेद किसी मुसलमान को न बतलाया, छिपा रक्खा।
मुहम्मद साहब अरबमें, शंकराचार्य भारतवर्षमें ये दोनों शिवजीके अवतार हैं। इसी शिव तथा विष्णुका धर्म समस्त पृथ्वीपर प्रचलित हुवा करता है। इन्हीं दोनोंका पूजन समस्त संसारमें होता है। ब्रह्माको कोई नहीं पूजता।
कबीर साहबका कथन है कि, एक लाख अस्सी सहस्र पीर पैगम्बर और सिद्ध साधु ऋषि मुनि होगाए हैं। जिन लोगोंने आकर पृथ्वीपर मनुष्योंको उपदेश दिया उनमेंसे कुछ महाशयोंका थोड़ा विवरण मैंने लिखा है। येही सब निरञ्जनके पुत्र तथा दोनों बातोंके माननेवाले हैं। कोई कोई महाशय जैन इत्यादिके समान हैं। जो वेदको नहीं मानते वे भी निरञ्जनके पञ्जेमें हैं। बाहर जानेका किसीको भी सामर्थ्य नहीं हो सकता।
इनमेंसे अनेक महाशय सदैव निर्गुण सगुणकी श्रेष्ठता प्रगट करते आए हैं। चार प्रकारकी मुक्ति और स्वर्ग नरकके दुःख सुख बतलाते आए हैं, इनमेंसे अनेकों को सत्य पुरुषकी भक्तिकी सुध रही है। इन लोगोंको छुटकारे और बंधनका ज्ञान तनिक नहीं बहुत कुछ हुवा है। समस्त मनुष्य वेद तथा पुस्तकोंको पढ़कर मस्त हो रहे। किसीने वेद और पुस्तकोंका वास्तविक तात्पर्य नहीं समझा, बहुत लोग अपनेको वेद और पुस्तकोंके विद्वान् समझते हैं। वह यथार्थमें व्यञ्जन और स्वर से भी अनभिज्ञ हैं। सभी मनुष्य स्वबुद्ध्यानुसार तथा अपने गुरुओंके शिक्षापर मनुष्योंको पथ बतलाते हुए सुकर्म सिखलाते चले आते हैं। परन्तु यह कोई नहीं बतलाता कि, यह पथ निरापत्ति है। यद्यपि समस्त उपदेशकोंका प्रण होता है सभी अपनी २ विद्या तथा बुद्धिके अनुसार लोगोंको मुक्तिका अभिलाषी बनाते हैं। जितने सिद्ध साधु और लिया भविष्यद्वक्ता पृथ्वीपर हुए तथा अब हैं सब निरञ्जन और विष्णु भगवानको परमेश्वर तथा निराकार बनाते आए हैं, पर विना तत्त्व समझे समस्त मनुष्य भटक भटककर चौरासीके बंधनमें पड़े। इनको क्या खबर कि, यथार्थ परमेश्वरकी सच्ची राह कौन है? अथवा किसके पूजनसे आवागमन
भगवान् रामचन्द्रजी महाराज
का बंधन कटता है ? वहाँका सम्बाददाता कोई न मिला कि, आगेको समाचार देवे, जिसकी कुछ सुध और पता ठिकाना वेदमें स्पष्टरीतिसे नहीं । इसकी सूचना तो बेही साधु देंगे जो उस देशके होंगे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य है ?
ज्योतिःस्वरूपी अलख निरञ्जन प्रज्वलित प्रदीपके समान है । समस्त जीवधारी पतङ्गके सदृश हैं । यदि पतङ्गको इतनी बुद्धि और इतना ज्ञान हो कि, मैं इस प्रदीपपर गिर गिर जल मरूँगा तो व्यर्थही अपने प्यारे प्राणोंको क्यों नष्ट करे ? सब पतङ्ग अज्ञानता तथा मूर्खताके कारण जल जल कर इस ज्योतिमें अपने प्राण विसर्जित करते हैं । उन्होंने सच्चे सत्यगुरुको नहीं ढूँढ़ा । यदि वे ढूँढ़, कहना मानते तो निश्चय सदैव बंधनसे छूट जाते । सत्यगुरुका कहना न माना स्वेच्छानुसार कार्य किए इस कारण प्रदीपके पतङ्गके ढङ्ग सब जलकर भस्म हो गए । उनके गुरुओंने उन्हें धोखा धडी देकर मार लिया । भ्रांति भ्रांति के धर्म सिखलाकर समस्त संसारको मारा स्वयंभी मर गए । जिन गुरुओंने दूसरोंको सुपथसे भटकाया वे स्वयं उसी पथमें भटकते रहे । अंधकारमें पड़ गए । सांसारिक मनुष्योंका तो कुछ ठिकानाही नहीं । जिस वाक्य अथवा नामके प्रभाव से लोग अपनी मुक्ति समझते हैं वही वाक्य नाम प्रत्यक्षमें धोखा तथा कष्टके निमित्त रक्खा है । जिसको वे छुटकारा समझते हैं वही उनका बंधन है । लोग पूर्णतया अनभिज्ञ हैं कि, छुटकारा ये क्या है किस प्रकार है यदि जानते तो आपसे आप अपने ऊपर किस निमित्त आपत्ति उपस्थित करते ? इसी कारण ज्ञानके साथ उपासना करनेको विशेष महत्त्व दिया है ।
अध्याय १०.
विराट् पुरुषके पहिले अवतारवाला । सत्यपुरुष ।
विराट्पुरुषका चित्र स्थानान्तरमें बनाया गया है कि, इस विराट्पुरुषके पेटमें तीन लोक बसे हैं और इसी विराट्पुरुषको मैंने कालपुरुष, निरञ्जन, निराकार, निर्गुण, राम, अल्लाह, ओंकार इत्यादिका पहिला अवतार कहा । इस पुरुष की प्रशंसा चारों वेद समस्त पुस्तकें करती हैं । यही तीनों लोकके रचयिता तथा स्वामी हैं । यह विराट्के भी ऊपर आकाशमें बैठता है । नीचे आदिभवानी और उसके पेटके भीतर तीनों देवता, अर्थात् ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों रहते हैं । इस सत्यपदार्थको किसीने नहीं पहचाना है । जिसका प्रथमावतार यह विराट् पुरुष है उसकी प्रशंसा चारों वेद किया करते हैं । देखो ऋग्वेदमें इस संबंधको लिये हुए १६ मंत्र हैं । यजुर्वेदके ३१ अध्यायमें बाईस मंत्र हैं । सामवेदमें उसके
तेरह मंत्र हैं और अथर्वणमें सात मंत्र हैं। वेदने इसी पुरुषको परमात्मा रचयिता और समस्त संसारका राजा कहा है।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहलाक्षः सहलपात् ।
सभूमि ठं. सर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ॥ १ ॥
जो यह अनेकों शरीरोंवाला तथा अगणित ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियवाला विराट् दीख रहा है यह उसके स्वरूपसे भिन्न नहीं है। जिसके भीतर यह विराट् विलास कर रहा है वो इस जैसे शरीरोंमें नाभिसेबारह अंगुल ऊंचे हृदयमें विराजा हुवा है यद्यपि यहां खुलासा नहीं कहा है तथापि पांचवें मंत्रमें जो यह कहा है कि, "ततो विराडजायत" इससे मालूम होता है कि, विराट्का उत्पादक दूसरा ही है। अनेकों शिरपाद आदि विराट्में ही देखे जाते हैं, इस कारण यह पता चलता है कि, यहां कार्यमुखसे कारणका विचार चला है। भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी यही लिखा है कि—'आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य' यानी, यह विराट् उसका पहिला अवतार है।
(२) मंत्र—यह समस्त परमेश्वरही संसार है जो कुछ बीत चुका वही है और जो कुछ होगा वही है। वही मोक्षका मालिक है। उसीकी कृपासे भोग भी मिल जाते हैं।
सायनाचार्य—जो कुछ भूतपूर्व था परमेश्वर था। जो कुछ अब है परमेश्वर है। इस समय भूतपूर्वकालकी शरीरें परमेश्वरही थीं। जो कुछ भविष्यत्कालमें होगा सब परमेश्वर है। वह समस्त देवताओंका देवता है। उस वस्तुसे जो लोग खाते हैं वही बढ़ रहा है। मायाके कारण वस्तुओंका स्वरूप और का और दीख पड़ता है। परन्तु प्रत्येक वस्तु परमेश्वर है। भोग मोक्ष भी उसीकी कृपासे होते हैं।
(३) मंत्र—संसारमें जो था जो है तथा जो होगा वो समस्त उसके तेजकी परछाई मात्र है। इससे पृथक् जो हम देखते हैं वही है। समस्त सृष्टि उसका एक चौथाई भाग है और शेषके तीन भाग आकाश मुक्तिस्थान सत्यलोकमें है जहां सत्य कबीर पहुँचाते हैं।
इस प्रकार समस्त मंत्रोंके साथ चारों वेद इसकी प्रशंसा बराबर करते हैं कि, तूही सबका रचयिता तथा भोजन पहुँचानेवाला है तुझसे पृथक् और दूसरा कोई नहीं है। इसीके अवतार विराट्की देहमें समस्त रचना समा रही है। इस विराट्हीके शरीरका नाम भवसागर है। वेदके किनारे पर तो विराट्पुरुष निर-ञ्जन बैठे हैं। लोकके किनारेपर आदि भवानी चौसठ लाख योगिनियोंकी सैन्य
पूरण ब्रह्म भगवान् कृष्ण
लिये राज्य कर रही है । तीनों शिकारी रज तम सत्त्व जाल लगाकर शिकार खेलते फिरते हैं । इसी विराट्के पेटमें कबीर साहब अपनी नाव लिये फिरते हैं । चारों युगसे बराबर पुकारते आते हैं कि, ए मनुष्यो मेरी नावपर सवार हो मैं तुमको पार उतारूँगा । कोई भाग्यवान दौड़कर उस नावपर सवार होता है । उसका बेडा पार होता है, समस्त मनुष्य इसी विराट्पुरुषकी पूजामें संलग्न रहते हैं । किसीको इस बातकी सुध नहीं कि, यह विराट्पुरुष कौन है । किसका अवतार है उसकी बंदनासे कौनसी श्रेणी प्राप्त होती है ! इस विराट् पुरुषका शरीर उनचास करोड़ योजनका है । उसका शरीरही यह भवसागर है । ग्रंथ कबीरवाणीमें कबीर साहब कहते हैं —
बारह पालग कूर्म शरीरा । षट् पालङ्ग देहधर्म धीरा ॥
धर्मधीरा और धर्मराय इत्यादि नाम इसी विराट्पुरुषके हैं ।
षट् अर्थात् छः पालङ्गका उनचास करोड़ योजन होता है । इतना बड़ा शरीर इस विराट्पुरुषका है । आकाश पाताल और मृत्युलोक इसके भीतर बसे हैं । चारों प्रकारकी मुक्ति इसके वशमें है जो कोई इस विराट्की आज्ञानुसार भलाईको उच्च श्रेणीपर पहुँचावे वह चारों मुक्ति संसार, धन, राज्य, और वैकुण्ठ इत्यादिका अधिकारी हो जाता है । जो कुछ विराट् पुरुषके शरीरमें है वही सब मनुष्य देहमें भी है । अतः प्रत्येक मनुष्योंका शरीर इसी विराट्पुरुषका शरीर है । यद्यपि उससे छोटी दिखाई देती है, जो कुछ विराट्में वही गुण ब्रह्माण्डके भीतर है । कुछ न्यूनाधिक नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों कच्चे हैं । जबलों यह जीव कच्चा है कच्चे के साथ प्रेम कर रहा है तबतक पक्का पथ कैसे मिल सकता है ? यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों ही झूठे हैं फिर यह झूठा जबलों झूठेसे प्रेम करता है तबलों सच्चेके साथ प्रेम कैसे उत्पन्न हो ? पर इसे भी सत्य पुरुषही समझ प्रेम किया जाय तो यह भी सत्यपुरुषकी ओर ही बढ़ाता है ।
इस विराट्पुरुषने अपना तेज प्रताप और गुण आदि भवानोंको दिए, विष्णुको दिये, राम और कृष्णको दिये और ईसाको भी दिये । सुतरां देवी भागवत में देखो ।
जब महामायाने अपना विराट् स्वरूप देवताओंको दिखलाया तब समस्त देवते औंधे मुँह गिर पड़े ।
शरीर और विराट्की एकता ।
रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना विराट्रूप दिखलाया । देखो रायमंणमें लिखा है कि, जब कागभुशुण्ड अयोध्यामें गये तब रामचन्द्र छोटे बालक थे, दूध
भात खाते फिरते खेलते थे। कागभुशुण्ड रामचन्द्रके जूठे चावल जहाँ गिरते चुन कर खालिया करते थे। रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना कौतुक दिखलाया। जब हंसकर अपना मुँह खोला तब कागभुशुण्ड रामचन्द्रके मुखमार्गसे पेटमें चले गये। उस पेटके भीतर चिरकालपर्यन्त घूमते रहे। जो कुछ बाहर दिखाई देता है। वही सब कौतुक भीतर दिखलाई दिया। तीनों लोकका कौतुक रामचन्द्र भगवान् के पेटके भीतर देखा। जब रामचन्द्रने खाँसा फिर पेटके बाहर निकल पड़ा। जब कागभुशुण्ड पेटके बाहर निकल पड़े तब रामचन्द्रको फिर देखा तो उसी प्रकार छोटे बालकके स्वरूपमें आँगनमें खेलरहे हैं दूधभात खाते फिरते हैं। रामचन्द्रके पेटमें कागभुशुण्डको सहस्रों वर्ष बीते तो भी एक पलभरसे विशेष नहीं था। ऐसाही कृष्णचन्द्रने जब छोटे बालक थे, बालकोंका यह नियम है कि, मिट्टी खाते हैं, जब यशोदाने यह देखा कि, कृष्ण छोटा बालक है, मिट्टी खारहा है। तब यशोदा मारने चलीं कि, तू मिट्टी न खा मना किया। तब कृष्णने अपना मुँह खोलकर दिखलाया कि, देख माँ ! मैंने मिट्टी नहीं खाई। जब कृष्णजीने मुँह खोला तब यशोदाने कृष्णके मुँहके भीतर तीनों लोकोंका कौतुक देखा। समस्त रचना पृथ्वीं आकाश सूर्य चन्द्र नक्षत्रादि सभी दिखाई दिये। यह कौतुक देखकर यशोदा अत्यंत अश्चर्यान्वित हुई कि, मेरे पुत्रके पेटमें यह कैसा आश्चर्यभय कौतुक दिखाई देता है।
ऐसाही अर्जुनको कृष्णजीने जब अपना विराट् स्वरूप दिखलाया तब अर्जुन औंधे मुँह गिरकर कहने लगे कि, ए कृष्ण ! मुझसे तुम्हारा यह स्वरूप देखा नहीं जाता, मैं भयभीत तथा कम्पित हूँ। तब फिर कृष्णने अपना यथार्थ स्वरूप दिखलाया। वह महाकालका स्वरूप छिपा लिया।
पश्चिमके महात्माओंको विराट् दर्शन।
फिर विष्णुने मूसाको अपना विराट्स्वरूप दिखलाया।
तूर नामक पर्वतपर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! दर्शन दे। तब आज्ञा हुई कि, तू देख न सकेंगा। फिर मूसाने निवेदन किया कि, ऐ परमेश्वर ! तू मुझे तू दर्शन दे उस समय वहाँ विराट् रूप उत्पन्न हुवा। जिसे देखकर मूसा औंधे मुँह गिर पड़े। उसको देख नहीं सके। फिर जब कृपा दृष्टि हुई तब मनुष्यके स्वरूप में आसमानी रङ्गके परमेश्वरने मूसाहारुं इत्यादिको दर्शन दिया। वे दर्शन पाकर परम आनन्दित हुए।
इसी प्रकार खरकैलनबीको नदी किनारेके तटपर विराट्पुरुषने दर्शनर दिया। देखतेही खरकैल औंधे मुँह गिर पड़े अचेत हो गये। फिर जब परमेश्वरकी
विष्णुके उपकार
कृपादृष्टि हुई तब परमेश्वरने अपना मानुषिक स्वरूप दिखलाया । तब खरकैलने देखा और वार्तालाप किया ।
ऐसाही ईसाने अपना विराट् रूप पोटर्स योहन्ना और याकूबको दिखलाया । जब मसीहने अपना तेज प्रगट किया । वह स्वरूप जो नितान्तही तेजमय और सूर्य के आकाशके सदृश जगमगाता था ऐसा स्वरूप जब दिखाई दिया तब पोटर्स, योहन्ना और याकूब मुँहके बल गिर पड़े । ईसूका वह तेज देख नहीं सके । फिर जब दया हुई तब ईसाने अपना पहिला स्वरूप प्रगट किया । उससे आपके शिष्यगण प्रसन्न हो गये ।
इस प्रकार जिस किसीको विराट्पुरुषका पूर्णतया ज्ञान हो गया वह स्वयम् विराट् स्वरूप हो गया । पिता और पुत्र सब एकही स्वरूप हैं । विद्या और कार्य के दोषसे ऊँचे नीचे भूतय तथा स्वासी बने हैं । जो पिता है सो पुत्र है और जो पुत्र है सो पिता है । जब पिता पुत्र मर गया तब आपही आप हैं ।
विराट्की उपासना ।
इस विराट्को साधुलोग शून्यमें देखते हैं । जब उसकी साधना करते हैं, तब समीप चला आता है तथा वार्तालाप करता है । तीनों कालका समाचार देता है । विराट्पुरुष साधनेसे सिद्ध कहलाता है । गुप्तबातोंको प्रगट करता है, परन्तु जब साधनेमें बाधा न उपस्थित हो तब कार्य पूर्ण हो ।
इस विराट्पुरुषसे सब कुछ उत्पन्न हुवा हैं । चार खानचौरासी लाख योनिके जीव सब इसी पुरुषने बनाए हैं । वेदपुस्तकें और समस्त साधन इसीसे हुये हैं । इस विराट् देहके सब जीव कीड़े हैं । समस्त साधन और सब सांसारिक तथा धार्मिक पदार्थ उसके शरीरके मल हैं सब उसके निर्मित किये हुए हैं । भला उसके शरीरके कीड़ोंमेंसे किसको सामर्थ्य है कि, उसको अधीन करके उसके मस्तकपर लात धर कर पार चला जावे । किसी ऋषि मुनि सिद्ध साधु और पीर पंजम्बरमें यह बल नहीं कि, इसके आगे हो जावे । उसपर श्रेष्ठता पावे । सबके सब उसके सेवक उसका भोजन हैं । यदि वह सत्यगुरु हाथ न पकड़े तो किसीको सत्यपुरुषका घर न मिले, चार स्थानसे बाहर कोई न जासके । मच्छर और मक्खीमें यह सामर्थ्य कहाँ है कि, उड़कर सातवें आकाशपर जो बैठे ? कदापि नहीं । चौरासी लाख योनिसे तो वही पार करे कि, जो स्वयम् उससे पार जानेका सामर्थ्य रखता हो । जो माली वाटिका लगाता है उसकी वाटिकामें जितने वृक्ष पौधे इत्यादि हैं उनमें मालीसे बढ़कर किसीमें विशेषता नहीं है । एक मिट्टीसे कुम्हार सहस्रों प्रकारके
८ अध्याय प्राचीन भक्त
वर्तन और मूर्त बनाता है। कुम्हारसे बढ़कर कोई वर्तन अथवा मूर्त नहीं हो सकती। कारणसे कार्य बढ़कर नहीं हो सकता है।
अतः इस विराट् पुरुषने समस्त संसारको बनाया है। उससे बढ़कर उसकी सृष्टि कदापि नहीं हो सकती। इस कारण समस्त ऋषि मुनि सिद्ध साधु इत्यादि सर्वे उसकी गुलामी किया करते हैं, तथा प्रशंसा किया करते हैं।
सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त।
सहस्रशीर्षापुरुषःसहस्राक्षःसहस्रपात् ॥ सभूमि ठं. सर्वतःस्पृत्वात्यतिष्ठद्-
शांगुलम् ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१॥ मंत्र १ ॥ नारायण ऋषिः निचूदाव्य-
नुष्ठन्दः पुरुषो देवता। सब लोगोमें व्यापक जो प्रधान सत्य पुरुष नारायण
सर्वात्मा होनेसे अनन्त शिर और पाँववाला, व्यष्टि समष्टि सबमें व्यापकर नामिसे
दश अंगुल परिमित हृदयदेशको अतिक्रमण कर अन्तर्यामी रूपसेस्थित हुवा।
पुरुषऽएवेदठं.सर्वयद्भूतं यच्चभाव्यम् ॥ उतामृतत्वस्येशानोयदत्रे नातिरोहति ॥
यजुर्वेद अध्याय ३१ ॥ मंत्र २ ॥ यह जो अतीत ब्रह्मसंकल्प जगत् है जो
भविष्यत् ब्रह्मसंकल्प जगत् है। जो जगत् बीज अन्न परिणामसे वृक्ष नर पशु
आदिकरूपको प्राप्त होता है वह मोक्षका स्वामी महानारायणही है क्योंकि,
उससे भिन्न कोई भी नहीं है। एतावानस्य महिमातोज्यायय्यांश्चपुरुषः ॥
पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतन्दिवि ॥ य० अ० ३१ ॥ मंत्र ३ ॥ इस
महानारायणकी विभूति इतनीही है ऐसा नहीं बल्कि यह नहीं चित्
आत्मा महानारायणका इस संसारसे अतिशय करके अधिक है इस कारण समस्त
ब्रह्माण्ड इस महानारायणका चौथा अंश है। सत्यलोकमें इस त्रिपातकास्वरूप
बिनाशरहित है जिस कारणसे अनन्त सत्य पुरुष परब्रह्मही अपने भागमें अपनी
ज्योतियोंमें महानारायणरूप हुवा। त्रिपादूर्ध्वऽउदैत्यूरुषःपादोस्येहाभवत्पुनः ॥
तत्रोविष्वङ् व्याक्रामत्साशनानशनने। अभि ॥ य० अ० ३१ मं० ४ ॥
यह त्रिपातमहानारायण प्रथम ब्रह्माण्डसे ऊपर उत्कर्षतासे स्थित हुवा
फिर इस महानारायणका चतुर्थीश संसार विषे व्याप्त हुवा मायाप्रवेशके अनन्तर
देव तिर्यक आदिरूपोंकरके अनेक प्रकारका हुवा चेतन (प्राणीमात्र) और
अचेतन (पर्वत नदी आदि) को देखकर उनमें व्याप्त हुआ तथा जड़ चेतन सबमें
घुस गया। ततो विराडजायत विराजोअऽधिपुरुषः ॥ स जातोऽअत्यरिच्यत
पश्चादभूमिमध्येपुरः ॥ यजुर्वेद अध्याय ३१ मंत्र ५ ॥ पश्चात् उस महानारा-
यणसे ब्रह्माण्डदेह तथा उस देहको अधिकरणकरके उसका अभिमानो विराट्
पुरुष अतिश्रेष्ठ उत्पन्न हुवा। वह विराट् पुरुष प्रथम भूमिको रचता भया
तिसके अनंतर देव मनुष्य आदिकोंके शरीरोंको बनाया ॥ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः
सम्भूतंपृषदाज्यम ॥ पशूस्तौश्चक्रेवायव्यानारण्याग्राम्याश्चये ॥ य० अ० ३१
मंत्र ६ ॥ महानारायणसे दधिभिश्च आज्य (घृत) अथवा प्राण संपादन किये तैसे
ही वह महानारायण वायु अथवा प्राण हैं देवता जिनके ऐसे जो हरिण आदिक
वनपशु हैं अथवा आरण्यकांडसंबंधी इंद्रियें हैं तिनको और ग्राममें होनेवाले अश्व-
आदिक पशु अथवा प्रवृत्तिमार्गसंबंधी इंद्रियोंको उत्पन्न करते भये ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऽऋचःसामानि जज्ञिरे ॥ छन्दाऽऽसिजज्ञिरेतस्माद्यजुस्तस्मा-
दजायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र ७ ॥ पश्चात् उस यज्ञपुरुष (महानारायण)
से साम (सामवेद) उत्पन्न हुवा उसके पीछे महानारायणसे छंद उत्पन्न हुए
उसके अनंतर महानारायणसे यजुष् (यजुर्वेद) उत्पन्न हुआ ॥ तस्मादशवाऽअ-
जायन्तयेकेचोभयादतः ॥ गावोहजज्ञिरेतस्मात्तस्माज्जाताऽअजावयः ॥ य०
अ० ३१ मंत्र ८ ॥ अश्व और अश्वोंसे अतिरिक्त जोगर्दभ आदिक और
खर्रचर हैं वे सब उत्पन्न हुए जो ऊपर नीचे दातोंवाले पशु हैं वे भी उत्पन्न हुए ।
तिस महानारायणसे गौवें उत्पन्न हुई बकरों व भेड़ भी उसी से उत्पन्न हुई ॥
तंयजम्बर्हिषिप्रौक्षन्पुरुषज्जातमग्रतः ॥ तेनदेवाऽअयजन्तसाध्याऋषयश्चये ॥
य० अ० ३१ मंत्र ९ ॥ जो साध्य देवता व सनकादिक ऋषि हैं वे सृष्टिसे
पूर्व उत्पन्न हुए उस यज्ञके साधनभूत विराट्पुरुषको अपने लोकमें प्रोक्षणआदि
संस्कारों करके संस्कृत किया और उस विराट्पुरुषरूप पशुद्वारा मानस योग
निष्पादन (सिद्ध) किया ॥ यत्पुरुषव्यदधुःकतिधाव्यकल्पयन् ॥ मुखडिकमस्या-
सीत्किम्बाहू किमूरूपादाऽउच्यते ॥ य० अ० ३१ मंत्र १० ॥ प्रश्न-महानारा-
यणसे प्रेरित हुए महत् अहंकार आदिसे विराट्पुरुषको उत्पन्न किया उस
समयसे कितने प्रकारोंसे अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की इस विराट्पुरुषके मुख
क्या हुवा ? बाहु क्या हुए, तथा ऊरू (जंवा) क्या हुए और पाद (पावें)
क्या था ॥ ब्राह्मणोऽस्यामुखमासीद्वाहुराजन्यः कृतः ॥ ऊरूतदस्यायद्वैशः
पद्मच ॐशूद्रोऽअजायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र ११ ॥ उत्तर-इस विराट्पुरुषके
मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुवा, भुजाओंसे क्षत्रिय उत्पन्न हुवा, ऊरू (जंघाओं) से
वैश्य उत्पन्न हुवा, पावोंसे शूद्र उत्पन्न हुवा ॥ चन्द्रमामनसोजातश्चक्षोऽसूर्योऽ-
अजायत ॥ श्रोत्राद्वायुश्चप्रणश्चमुखादग्निर जायत ॥ य० अ० ३१ मंत्र १२ ॥
और विराट्पुरुषके मनसे चंद्रमा उत्पन्न हुवा, नेत्रोंसे सूर्य उत्पन्न हुवा, कानोंसे
वायु और प्राण उत्पन्न हुए, मुखसे अग्नि उत्पन्न हुवा ॥ नाभ्याऽआसीदन्त-
रिक्ष ॐशीर्षागोऽधौः समवर्तत ॥ पद्मचाम्भूमिदिशः श्रोत्रात्तथालोकां ॥ २ ॥
ऽकल्पयन् ॥ य० अ० ३१ मं० १३ ॥ इस विराट्पुरुषकी नाभिके सकाशसे अंतरिक्ष (आकाश) उत्पन्न हुवा, शिरसे स्वर्ग उत्पन्न हुवा पावोंसे पृथ्वी उत्पन्न हुई कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुई तथा इसी तरह विराट्पुरुषके शरीरसे भूआदिक लोक उत्पन्न हुए ॥ यत्पुरुषेणहविषादेवायज्ञमतन्वत ॥ वसन्तोऽस्यासीदाज्यंग्रीष्मऽद्वैतः शरद्द्वैतः ॥ य० अ० ३१ मंत्र ॥ १४ ॥ जिस कालमें विद्वानोंने विराट्देहरूप हवि (हवनकरनेका अन्न) करके ज्ञानयज्ञको विस्तारित किया तब इस ज्ञानयज्ञके लिये वसंत ऋतु घृत हुवा ग्रीष्म ऋतु हवन करनेके समिधाएँ हुवा । तैसेही शरद ऋतु हवि (होमकरनेका अन्न हुवा) ॥ सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्तसमिधःकृताः ॥ देवायद्यज्ञन्तवाना अवधन्तपुरुषम्पशुम् ॥ य० अ० ३१ मंत्र १५ ॥ जिस कालमें विद्वानोंने ज्ञानयज्ञको किया उस समय विराट्पुरुषरूप पशुको बांधा अर्थात् भाव करते भये उस कालमें १२ महीने ५ ऋतुएँ ३ लोक १ यह आदिःय ऐसे २१ अथवा गायत्री आदि ७ अतिजगती आदि ७ कृत्य आदिक ७ ऐसे २१ छंद ये संपूर्ण समिध (होमकरनेकी लकड़ियाँ हुई । यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानिधर्मार्णिप्रथमान्यासन् ॥ तेहनाकम्भहिमानः सचंतयत्रपूर्वसाध्याःसन्तिदेवाः ॥ य० अ० ३१ ॥ मंत्र १६ ॥ और वे विद्वानोंने विराट्रूप, हविसंबंधी ज्ञानयज्ञकरके यज्ञपुरुष महानारायणका पूजन किवा । महानारायणपूजनसंबंधी वे धर्म मुख्य जहाँ प्रथम साध्य देवता स्थित हैं उस महानारायण सत्यलोकको महानारायणके भक्त महात्मा प्राप्त हुये ॥
यह सोलह मंत्र आवश्यक माने जाकर यजुर्वेदसे उद्धृत किये गये हैं । मेरा विशेष तात्पर्य यह कि, सांसारिक मनुष्योंको मालूम होवे कि, वे लोग किसका पूजन करते हैं ? तात्पर्य यह कि, वे सच्चे परमेश्वरकी पूजन करते हैं, अथवा झूठे परमेश्वरकी । जो कोई सच्चे परमेश्वरकी पूजन करता है, वह सच्चा होजाता है । सो वे लोग जाने कि, यह समस्त सृष्टि विराट्पुरुषद्वारा है । उत्पत्ति स्थिति तथा विनाश सब उसीके गुण हैं । यह विराट्पुरुष समस्त रचना करता है । उसकी और अक्षर पुरुष जो लाहृत स्थानमें रहता है उसकी प्रेरणा भी होती है । जो सत्य पुरुष सबका स्वामी है, उसके आज्ञाकारी सब हैं । यहाँ वेदमें इसी सत्यपुरुषका प्रकरण दिखाया गया है । तथा विराट्का भी आया है । जो भवसागर है उसका रचयिता तथा राजा यह विराट्पुरुष अलख निरंजन है । सांसारिक मनुष्य लड़ते और झगड़ते हैं, इसको निराकार कहते हैं, न जाने सत्य कहते हैं, अथवा मिथ्या कहते हैं । जिसका उनचास करोड योजनाका शरीर हो वह निराकार कैसे कहलावे, जिससे समस्त गुण उत्पन्न होते हैं, सदैव उसके साथ रहते हैं, वह निर्गुण कैसे
कहलावे ? जितनी पूजा पाठ योग मुक्ति आदि हैं, सब इस विराटपुरुषही द्वारा उत्पन्न हुई हैं। सो सब खिलाड़ीका खेल है, सब लोग इस खिलाड़ीके खेलमें लग रहे हैं, खिलाड़ी को पहचान नहीं सकते कि, यह कौन है जो समस्त संसारको नचा रहा है ? जिसने इस खिलाड़ीको पहचान लिया, उसके खेलके भेदको जान लिया, फिर जादूगरका जादू और मंत्रादि इसपर फलित नहीं होता। उस जादूगर का जादू तबहीतक फलीभूत होता है जबतक यह भेदको नहीं जानता है। उसके जाननेकी बही रीति है जो वेदने बताई है।
जितने वेदपाठी हैं वे वेदके अर्थको अपनी अपनी बुद्ध्यानुसार करते हैं। कितने मनुष्योंने मिथ्याको सत्य प्रमाणित करनेका उद्योग भी किया है तथा अर्ब भी करते हैं। तो भी मिथ्या सत्यसे श्रेष्ठ माना नहीं जा सकता। जब हंसोंके सामने आवेगा तब दूधका दूध और पानीका पानी पृथक् होजावेगा। जो कोई अग्निको जल जानकर उससे नहावेगा तो वह निश्चय भस्म होजावेगा, वह अग्नि तो अपना स्वभाव कदापि नहीं छोड़ेगी। जो कोई विषको अमृतफल जानकर खावेगा वह निश्चय मर जावेगा, इसी प्रकार जो कोई अपने सुकर्मोंपरही भरोसा रखे सत्य-गुरुके करग्रहणके निमित्त उत्सुक न हो, उनको न मिले तो वह इस अंधकारमय समुद्रके पार कदापि न हो सकेगा, पर जब अच्छे कर्मोंका फल यहाँ तक उदय होगा कि, पारखी गुरु मिल जायगा तो सब बन्धनोंसे छूटकर सत्यलोक चला जायेगा।
इस विराटपुरुषके एक हाथमें वेद है और दूसरे हाथमें राजदंड है और तीन लोकके समस्त जीवोंका राजा है। सबको अधीन कर रहा है, इसकी अधीनतासे कभी कदाचित् कोई बाहर जा सकता है। जिसपर कबीर साहबकी परम दया होती है उसको वह स्वयम् कालपुरुषके पञ्जेसे छुड़ाता है। मनुष्योंमें से ऐसा कोई नहीं है कि, अपनी पूजा पाठ तथा तपस्यासे सत्यपथ पावे। कारण यह हैं। कि, जब बड़ों बड़ोंको पथ नहीं मिला तो वे दूसरेको क्या दिखलावेंगे ? इसी कारण प्रायः ऋषि मुनि जन्मबंधुवे हुए। इन सबकी बुद्धिको कालपुरुषने विलोपित कर दिया है कुछ सूक्ष्मता नहीं है, कोई बूझता नहीं सब जिह्वाओं पर इसकी मुहर लग गई है। इस कारण वे लोग देखते हैं पर देखते नहीं। सुनते हैं पर सुनते नहीं। बोलते हैं पर बोलते नहीं। प्रत्यक्ष दुष्कर्मोंको देखते जाते हैं उसीका अनुसरण करते जाते हैं। फिर इनको मनुष्य कहना चाहिये अथवा मनुष्यतासे पृथक् ? वास्तवमें मनुष्य वह है जो बुराईको देखे और उससे तुरंत भाग जावे फिर उस पथपर कभी पैर न रखे ॥
अकालपुरुषके धार्मिक नियम ।
अकालपुरुषके धार्मिक ग्रंथ चार वेद हैं । ये चारों वेद मायासृष्टिके आरंभ कालमें प्रकट हुए । ये चारों ग्रन्थ वैदिकभाषामें निकलकर समस्त संसारमें फैल गए । वैदिक संस्कृत भाषा होनेके कारण इसके समझानेवाले धोखेमें पड़े । कारण यह कि, इसका अर्थ कोई किसी प्रकार और कोई किसी प्रकार करता है वास्तवमें वेदके भाषाकारोंमें किसीको ऐसी विद्या नहीं हुई कि, इस वेदकी यथार्थ अवस्था को जान सके । सबके सब शब्दार्थ लगाकर लोगोंपर अपना विचार प्रगट करते आए हैं । प्रत्येक मनुष्य अपने ढङ्गपर अपनी मृत्यनुसार आप समझाते रहे । विचारहीन सांसारिक मनुष्य जिस पथके अधीन हुए, उन्होंने वही अर्थ स्वीकार कर लिया । उनको उसी ढङ्गपर चलना पड़ा । उनको मिथ्या तथा सत्यकी क्या सुध, वे तो अपने गुरु तथा अग्रगामीकी पथदर्शकताको स्वीकार करके वही सत्य मानते हैं । वही ठीक ठहराते हैं । अयथार्थवक्ता विद्वानोंने लोगोंको भटका मारा । वेदकोशमें एक शब्दके अनेक अर्थ होनेके कारण जिस किसीको जो अर्थ अच्छा जान पड़ा वही अर्थ लगाया । अपने विचारके अनुसार विख्यात किया । वेदकी उलझनोंसे समस्त संसार अनभिज्ञ रहा । वास्तविक भेदको कोई न जान सका कि, इस यवनिकाके भीतर कौनसा रहस्य भरा पड़ा है । इस कारण समस्त संसार धोखेमें पड़ा । बिना भक्तिवेत्ताके तथा सत्यपुरुषकी भक्ति और मुक्तिमार्गको पहचाने नहीं जान सके । इस कारण कालपुरुषने वेदके वास्तविक पदार्थको छिण कर समस्त मनुष्योंको फँसा लिया । कबीर साहब सृष्टिकी उत्पत्तिकालसे लेकर आजपर्यन्त बराबर समझाते आते हैं कि, काल पुरुषके धोखेकी चालसे बचो परन्तु यह, जीव नहीं समझता, नहीं मानता । कारण यह कि, मनुष्योंकी बुद्धिपर परदा पड़ रहा है यदि वेदकी वास्तविकताको समझ जाय तो सत्यपुरुषको पाजाय ।
इन्हीं चारों वेदोंसे जो चारों पुस्तकें निकली हैं और भिन्न २ भाषाओंमें उनका अनुवाद हो चुका है, उनके द्वारा वेदोंकी थोड़ीसी अवस्था जानी जा सकती है । क्योंकि, इसका यथार्थ ज्ञान होना सत्यपुरुषकी इच्छा पर निर्भर है । उसके मुँहसे अग्नि उत्पन्न हुई उसी पुरुषके मुँहसे ब्राह्मण उत्पन्न हुवा इस कारण ब्राह्मण को यज्ञ करने और करानेका भाग मिला । वेदपाठका अधिकारी विशेषतः ब्राह्मण ठहराया गया । यद्यपि इतरोंके निमित्त भी वेदपाठ अत्यन्त आवश्यक है । कारण यह कि, यह प्रथा समस्त संसारके निमित्त नियत की गई है, सबकी ऐतिहासिक बातें पृथक् हैं, कर्मकाण्ड एक जैसीही है ।
बलिप्रदान ।
बलिप्रदानके विषयमें समस्त बातोंका मिलान करके देखलो । सबमें मिलान ठहरेगा । बलिप्रदान सत्य तथा ठीक अवश्य है । कारण यह कि, इस विराट् पुरुषका भोजन है । अग्नि उसका मुख है । जो हृव्य वस्तुएँ वेदमंत्रोंको पढ कर या इसपुरुषका ध्यान करके अग्निमें डाली जाती हैं सो सब उसका भोजन है । वह उसको खाता है । इसी विराट् पुरुषके निमित्त बलिदान करना आवश्यक है । उत्पत्तिकालके आरम्भसे लेकर अबलें वही काम नियमानुसार होता चला आता है । इस महापुरुषके निमित्त बलिप्रदान नियत किये गये । इसी प्रकार महामाया की सभामें प्रत्यक्ष गला काटा जाता है । कोट कांगडा और कामरू कामक्षा आदि सहस्त्रों स्थानोंमें गले काटे जाते हैं । ये पांचों बटुक आदि भयानक तथा मनुष्यों को त्रास देनेवाले हैं । इन्हींकी पूजा वाममार्गके पुस्तकोंमें है । जो लोग उनकी पूजा कर उसे तो बलि करना आवश्यक है । बिना बलिके यह विराट्पुरुष प्रसन्न न होगा । भला जी ! यदि खेती करने वाला राजा अथवा पदाधिकारीको भूमि कर न दे तो खेतीका काम उससे निश्चय छीन लिया जावेगा । भला जी ! समस्त संसार तो उसकी प्रजा है । सबका सब सके हाथोंके नीचे हैं । फिर कैसे बलि न करें ? निदान यह बलि तथा बैसाही अग्नि पूजन प्राचीन कालसे चला आता है । वाममार्गी पंडित और मुल्ला क्राजी इत्यादि इस बलिप्रदान करनेके अगुवा तथा पथदर्शक हैं । इन बलिप्रदानोंके पापोंने सब जीवोंको आवागमनके बन्धनमें फँसा रक्खा है । इसी निर्दयता और प्राणघातके कार्यने समस्त मनुष्योंको निर्दयी बना दिया है । जो कोई वाममार्गी पश्चिमकी पुस्तकोंके अनुसार चलेगा, वह अवश्य बलिप्रदान करेगा । चारोंमें बराबर बलिकी आज्ञा है उन पुस्तकोंके मानने वाले सदैवसे करते आए हैं, पर वेद उनके विरुद्ध है । उसका तो सिद्धांत है कि, अस्तित्व नु तस्मादोजीयो यद्भि हव्येन ईजिरे यानी उस सत्य पुरुषका ध्यान ही सबसे बड़ा है ।
यज्ञ शब्दार्थ ।
देवपूजा, संगतिकरण और दान इन अर्थोंवाले यज्ञ धातुसे नङ् प्रत्यय होकर 'यज्ञ' शब्द बनता है । कोशकार हैमने इसका आत्मा, मख, नारायण और हुताश (अग्नि) अर्थ माना है । इसके विवरण कल्पसूत्र और श्रौतसूत्रोंमें भरा पड़ा है । पहिले पुरुष मखोंसे ही सत्यपुरुषको प्रसन्न करते हुए उसके पुण्यसे पापों को नष्ट किया करते थे । विराट् पुरुषको भी इसीसे तृप्त किया करते थे । आज
ब्रह्माजीकी कथा शिवजी महाराजकी कथा
भारतमें इनका एक तरहका अभावसाही होता जा रहा है। रही सही क्रियाको आज कालके नास्तिक मिटाये डालते हैं।
नरमेध ।
जो पुरुषमेध यजु० के ३१ और बत्तीसके अध्यायमें आता है जिससे सच्चिदानन्द सत्यपुरुषका, पूजनादि होता है। इस कारण इसे पुरुषमेध कहते हैं यानी पुरुष सत्यपुरुष, सच्चिदानन्द नारायण, उसका जो मेध यानी पूजन तथा ध्यानद्वारा संगम तथा उसके उद्देश्यसे इन दोनों अध्यायोंका वैध ध्यान इसे पुरुष मेध कहते हैं, इसीका पथ्ययिवाची शब्द नरमेध भी है। जिसका कि यहाँ . योग दीख रहा है, इसी तरह जहाँ जो मेध आया है वहाँ उसीमें उच्च भावना करके पूजन आदि कर दिया गया है। जो कोई इनका बलिदान अर्थ समझते हैं यह उनकी बुद्धिका दोष है।
देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपति भगाय ॥ दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचिन्नः स्वदतु ॥ य० अ० ३० मंत्र १ ॥ हे दीप्यमान सबके प्रेरक परमात्मन् ! इस वाजपेय नामक यज्ञको प्रवृत्त करो। यजमानको ऐश्वर्य लाभके निमित्त वा भजनीय अनुष्ठानके निमित्त प्रेरणा करो, दीप्यमान अन्नके पवित्र करनेवाले रश्मियोंके धारण करनेवाले सूर्यमण्डलमें वर्तमान सच्चिदानन्द सत्यपुरुष नारायण, हमारे अन्नको पवित्र करें। वाक्यके अधिपति प्रजापति हमारे हवि लक्षणरूप अन्नका आस्वादन करें यह आहुति भलीप्रकार गृहीत हो ॥
अश्वमेध ।
ईड्यश्चासिवन्द्यश्चवाजिन्नाशुश्चासि मेध्यश्च सप्ते ॥ अग्निष्टवा देर्वंसुभिः संजोषाः प्रीतंर्वहि वहतु जात वेदाः ॥ य० अ० २९ म० ३ ॥ और हे वेगवाले अश्व ! तुम ऋत्वियों करके स्तुति करने योग्य हो तथा शिर करके नमस्कार करने योग्य हो, शीघ्रही अश्वमेध यज्ञके योग्य होते हो और वसु देवताओंके सहित प्रीतिवाला अग्नि, प्रसन्न हुए तुझ हविबहनेवालेको देवताओंमें प्राप्त करावे ॥
इस यजुर्वेदमें यज्ञोंकी बहुत बातें हैं ३- ११-१२ अध्यायके मन्त्रोंको देखो। यजुर्वेद है ही यज्ञोंके लिये ? ।
गोमेध ।
अ्यविश्चमे अ्यवीचमे दित्यवाट्चमे दित्यौहीचमे पञ्चविश्चमे पञ्चावीचमे त्रिवत्सश्च त्रिवत्साचमे तुर्यवाट्चमे तुर्यौहीचमे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥
य० अ० १८ मं० २६ ॥ और मेरी प्रीतिके निमित्त डेढ वर्षवाला बछड़ा तथा डेढ वर्षवाली बछिया मेरे निमित्त दो वर्षवाला बैल तथा दो वर्षवाली गौ और मेरे निमित्त ढाई वर्षवाला बैल तथा ढाई वर्षवाली गौर एवं मेरे निमित्त तीन वर्षवाला बैल तथा तीन वर्षवाली गौ कल्पना करें । षष्ठवाट्चमे षष्ठाह-
चिमऽउक्षाचमे वशाचमेऽऋषभश्चमे वेहश्चमेऽनङ्गवांश्चमे धेनुश्चमे यज्ञेन
कल्पन्ताम् ॥ य० अ० १८ मं० २७ ॥ और मेरे निमित्त चार वर्षवाला बैल
तथा चार वर्षवाली गौ, मेरे निमित्त सेचनसमर्थ बैल तथा वन्ध्या गौ, मेरे
निमित्त अतिजवान बैल तथा गर्भघातिनी गौ, मेरे शकट वहनेमें समर्थ बैल तथा
नवीन ब्याई हुई गौ, पूजन करके देवता कल्पना करें ॥
बारह मासके देवताओंके निमित्त भिन्न २ यज्ञ बनाये हैं उन समस्त पशुओं
को उनदेवोंकी प्यारी वस्तु समझकर पूजते हैं ताकि, हृदयमें दया बनी रहे ।
उष्ट्रमेध ।
इसमूर्णयिं वरुणस्य नाभि त्वचं पशूनां द्विपदां त्रतुष्पदाम् ॥ त्वष्ट्रः
प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने माहिःॐसीः परमेव्योमन् । उष्ट्रमारण्यमनुते दिशामि
तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ॥ उष्ट्रन्तेशुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं तेशुगृच्छतु ॥ य०
अ० १३ मं० ५० ॥ हे अग्ने ! उत्कृष्टस्थानमें स्थित इस ऊर्णवाला, वरुणकी
नाभि अर्थात् सन्तानोंके समान प्रिय मनुष्यों और चौपायों दोनों प्रकारके
पशुओंकी कंबलोंसे एवं आच्छादक होनेसे त्वचाकी तरह रक्षा करनेवाला
प्रजापतिकी प्रजाओंके मध्यमें प्रथममें उत्पन्न हुए अविको मत पीडा दो बनके
उष्ट्र तुमको उपदेश करता हूं शरीर उसके द्वारा पुष्ट करते हुए तुम यहाँ स्थित
हो तुम्हारी ज्वाला बनवाले ऊँटपूजनसे तुमें भूख प्राप्तहो, जिससे हम द्वेष
करें उसको तुम्हारी ज्वाला प्राप्त हो ॥ ५ ॥
मेषमेध ।
ऋग्वेदाष्टक (४- अध्याय-१) सूक्त (८) मंत्रमें लिखा है कि, तीन
सौ भैंसोंका बलिप्रदान हुआ ।
जीवोंके पूजन एवम् शाखा आदिके पूजनका जिन घृणित वेदोंमें उल्लेख
किया गया है वो एकात्मभावसे विस्तारपूर्वक है । उनके लिखनेसे अनावश्यक
विस्तार बढ़ता है । न मुझे बातकी कोई आवश्यकता है । मुक्ति पानेवालोंके देखने
के निमित्त तथा न्यायप्रिय मनुष्योंके हितार्थ थोड़ा सा आवश्यक विवरण इस
स्थानपर कर दिया गया है । वेदोंमें भाँति २ के पशु तथा पक्षी आदिके सत्कार
आत्मभावसे लिखे हुए हैं । उन सबको मैं छोड़े जाता हूं । केवल आवश्यक बातों