भारतकोश
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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा

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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा

वैशम्पायन उवाच

यथागतं गते शक्रे भ्रातृभिः सह सङ्गतः ।
कृष्णया चैव बीभत्सुर्धर्मपुत्रमपूजयत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवराज इन्द्रके चले जानेपर भाइयों तथा द्रौपदीके साथ मिलकर अर्जुनने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम किया ॥ १ ॥

अभिवादयमानं तं मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम् ।
हर्षगद्गदया वाचा प्रहृष्टोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुनको प्रणाम करते देख युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए एवं उनका मस्तक सूँघकर हर्षगद्गद-वाणीमें इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥

कथमर्जुन कालोऽयं स्वर्गे व्यतिगतस्तव ।
कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्च तोषितः ॥ ३ ॥
'अर्जुन! स्वर्गमें तुम्हारा यह समय किस प्रकार बीता? कैसे तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त किये और कैसे देवराज इन्द्रको संतुष्ट किया? ॥ ३ ॥

सम्यग् वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि पाण्डव ।
कच्चित् सुराधिपः प्रीतो रुद्रो वास्त्राण्यदात् तव ॥ ४ ॥
'पाण्डुनन्दन! क्या तुमने सभी अस्त्र अच्छी तरह सीख लिये? क्या देवराज इन्द्र अथवा भगवान् रुद्रने प्रसन्न होकर तुम्हें अस्त्र प्रदान किये हैं? ॥ ४ ॥

यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान् वा पिनाकधृक् ।
यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधितश्च ते ॥ ५ ॥
यथोक्तवांस्त्वां भगवान् शतक्रतुररिंदम ।
कृतप्रियस्त्वयास्मीति तस्य ते किं प्रियं कृतम् ॥ ६ ॥
'शत्रुदमन! तुमने जिस प्रकार देवराज इन्द्रका दर्शन किया है अथवा जैसे पिनाकधारी भगवान् शिवको देखा है, जिस प्रकार तुमने सब अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है और जैसे तुम्हारेद्वारा देवाराधनका कार्य सम्पादित हुआ है, वह सब बताओ। भगवान् इन्द्रने अभी-अभी कहा था कि 'अर्जुनने मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न किया है' सो वह उनका कौन-सा प्रिय कार्य था, जिसे तुमने सम्पन्न किया है ॥ ५-६ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ।
यथा तुष्टो महादेवो देवराजस्तथानघ ॥ ७ ॥
यच्चापि वज्रपाणेस्तु प्रियं कृतमरिंदम ।
एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनंजय ॥ ८ ॥
‘महातेजस्वी वीर! मैं ये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले निष्पाप अर्जुन! जिस प्रकार तुम्हारे ऊपर महादेवजी तथा देवराज इन्द्र संतुष्ट हुए और वज्रधारी इन्द्रका जो प्रिय कार्य तुमने सम्पन्न किया है, वह सब पूर्णरूपसे बताओ’ ॥ ७-८ ॥

अर्जुन उवाच

शृणु हन्त महाराज विधिना येन दृष्टवान् ।
शतक्रतुमहं देवं भगवन्तं च शङ्करम् ॥ ९ ॥
विद्यामधीत्य तां राजंस्त्वयोक्तामरिमर्दन ।
भवता च समादिष्टस्तपसे प्रस्थितो वनम् ॥ १० ॥
अर्जुन बोले— महाराज! मैंने जिस विधिसे देवराज इन्द्र तथा भगवान् शंकरका दर्शन किया था, वह सब बतलाता हूँ, सुनिये! शत्रुओंका मर्दन करनेवाले नरेश! आपकी बतायी हुई विद्याको ग्रहण करके आपहीके आदेशसे मैं तपस्या करनेके लिये वनकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ९-१० ॥

भृगुतुङ्गमथो गत्वा काम्यकादास्थितस्तपः ।
एकरात्रोषितः कञ्चिदपश्यं ब्राह्मणं पथि ॥ ११ ॥
काम्यक वनसे चलकर तपस्यामें पूरी आशा रखकर मैं भृगुतुंग पर्वतपर पहुँचा और वहाँ एक रात रहकर जब आगे बढ़ा, तब मार्गमें किसी ब्राह्मणदेवताका मुझे दर्शन हुआ ॥ ११ ॥

स मामपृच्छत् कौन्तेय क्वासि गन्ता ब्रवीहि मे ।
तस्मा अवितथं सर्वमब्रुवं कुरुनन्दन ॥ १२ ॥
उन्होंने मुझसे कहा—‘कुन्तीनन्दन! कहाँ जाते हो? मुझे ठीक-ठीक बताओ।’ तब मैंने उनसे सब कुछ सच-सच बता दिया ॥ १२ ॥

स तथ्यं मम तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणो राजसत्तम ।
अपूजयत मां राजन् प्रीतिमांश्चाभवन्मयि ॥ १३ ॥
नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणदेवताने मेरी यथार्थ बातें सुनकर मेरी प्रशंसा की और मुझपर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १३ ॥

ततो मामब्रवीत् प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत ।
तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्यसे विबुधाधिपम् ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक कहा—'भारत! तुम तपस्याका आश्रय लो! तपमें प्रवृत्त होनेपर तुम्हें शीघ्र ही देवराज इन्द्रका दर्शन होगा' ।। १४ ।। ततोऽहं वचनात् तस्य गिरिमारुह्य शैशिरम् । तपोऽतप्यं महाराज मासं मूलफलाशनः ।। १५ ।। महाराज! उनके इस आदेशको मानकर मैं हिमालय पर्वतपर आरूढ़ हो तपस्यामें संलग्न हो गया और एक मासतक केवल फल-फूल खाकर रहा ।। १५ ।। द्वितीयश्चापि मे मासो जलं भक्षयतो गतः । निराहारस्तृतीयेऽथ मासे पाण्डवनन्दन ।। १६ ।। ऊर्ध्वबाहुश्चतुर्थं तु मासमस्मि स्थितस्तदा । न च मे हीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ।। १७ ।। इसी प्रकार मैंने दूसरा महीना भी केवल जल पीकर बिताया। पाण्डवनन्दन! तीसरे महीनेमें मैं पूर्णतः निराहार रहा। चौथे महीनेमें मैं ऊपरको हाथ उठाये खड़ा रहा। इतनेपर भी मेरा बल क्षीण नहीं हुआ, यह एक आश्चर्यकी-सी बात हुई ।। १६-१७ ।। पञ्चमे त्वथ सम्प्राप्ते प्रथमे दिवसे गते । वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपं समागमत् ।। १८ ।। पाँचवाँ महीना प्रारम्भ होनेपर जब एक दिन बीत गया तब दूसरे दिन एक शूकररूपधारी जीव मेरे निकट आया ।। १८ ।। निघ्नन् प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्चरणैरपि । सम्मार्जञ्जठरेणोर्वीं विवर्तंश्च मुहुर्मुहुः ।। १९ ।। वह अपनी थूथुनसे पृथ्वीपर चोट करता और पैरोंसे धरती खोदता था। बार-बार लेटकर वह अपने पेटसे वहाँकी भूमिको ऐसा स्वच्छ कर देता था, मानो उसपर झाड़ दिया गया हो ।। १९ ।। अनु तस्यापरं भूतं महत् कैरातसंस्थितम् । धनुर्बाणासिमत् प्राप्तं स्त्रीगणानुगतं तदा ।। २० ।। उसके पीछे किरात-जैसी आकृतिमें एक महान् पुरुषका दर्शन हुआ। उसने धनुष-बाण और खड्ग ले रखे थे। उसके साथ स्त्रियोंका एक समुदाय भी था ।। २० ।। ततोऽहं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । अताडयं शरेणाथ तद् भूतं लोमहर्षणम् ।। २१ ।। तब मैंने धनुष तथा अक्षय तरकस लेकर एक बाणके द्वारा उस रोमांचकारी सूकरपर आघात किया ।। युगपत् तं किरातस्तु विकृष्य बलवद् धनुः । अभ्याजघ्ने दृढतरं कम्पयन्निव मे मनः ।। २२ ।।

साथ ही किरातने भी अपने सुदृढ़ धनुषको खींचकर उसपर गहरी चोटकी, जिससे मेरा हृदय कम्पित-सा हो उठा ॥ २२ ॥

स तु मामब्रवीद् राजन् मम पूर्वपरिग्रहः ।
मृगयाधर्ममुत्सृज्य किमर्थं ताडितस्त्वया ॥ २३ ॥
राजन्! फिर वह किरात मुझसे बोला—'यह सूअर तो पहले मेरा निशाना बन चुका था, फिर तुमने आखेटके नियमको छोड़कर उसपर प्रहार क्यों किया?' ॥ २३ ॥

एष ते निशितैर्बाणैर्दर्पं हन्मि स्थिरो भव ।
स धनुष्मान् महाकायस्ततो मामभ्यभाषत ॥ २४ ॥
इतना ही नहीं उस विशालकाय एवं धनुर्धर किरातने उस समय मुझसे यह भी कहा—'अच्छा, ठहर जाओ। मैं अपने पैने बाणोंसे अभी तुम्हारा घमंड चूर-चूर किये देता हूँ' ॥ २४ ॥

ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरैः ।
तं चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् ॥ २५ ॥
ऐसा कहकर उस भीलने जैसे पर्वतपर वर्षा हो, उस प्रकार महान् बाणोंकी बौछार करके मुझे सब ओरसे ढक दिया; तब मैंने भी भारी बाणवर्षा करके उसे सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ २५ ॥

ततः शरैर्दीप्तमुखैर्यन्त्रितैरनुमन्त्रितैः ।
प्रत्यविध्यमहं तं तु वज्रैरिव शिलोच्चयम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर जैसे वज्रसे पर्वतपर आघात किया जाय, उसी प्रकार प्रज्वलित मुखवाले अभिमन्त्रित और खूब खींचकर छोड़े हुए बाणोंद्वारा मैंने उसे बार-बार घायल किया ॥ २६ ॥

तस्य तच्छतधा रूपमभवच्च सहस्रधा ।
तानि चास्य शरीराणि शरैरहमताडयम् ॥ २७ ॥
उस समय उसके सैकड़ों और सहस्रों रूप प्रकट हुए और मैंने उसके सभी शरीरोंपर बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ २७ ॥

पुनस्तानि शरीराणि एकीभूतानि भारत ।
अदृश्यन्त महाराज तान्यहं व्यधमं पुनः ॥ २८ ॥
भारत! फिर उसके वे सारे शरीर एकरूप दिखायी दिये। महाराज! उस एकरूपमें भी मैंने उसे पुनः अच्छी तरह घायल किया ॥ २८ ॥

अणुर्बृहच्छिरा भूत्वा बृहच्चाणुशिराः पुनः ।
एकीभूतस्तदा राजन् सोऽभ्यवर्तत मां युधि ॥ २९ ॥
यदाभिभवितुं बाणैर्न च शक्नोमि तं रणे ।
ततो महास्त्रमातिष्ठं वायव्यं भरतर्षभ ॥ ३० ॥

कभी उसका शरीर तो बहुत छोटा हो जाता, परंतु मस्तक बहुत बड़ा दिखायी देता था। फिर वह विशाल शरीर धारण कर लेता और मस्तक बहुत छोटा बना लेता था। राजन्! अन्तमें वह एक ही रूपमें प्रकट होकर युद्धमें मेरा सामना करने लगा। भरतर्षभ! जब मैं बाणोंकी वर्षा करके भी युद्धमें उसे परास्त न कर सका, तब मैंने महान् वायव्यास्त्रका प्रयोग किया ।। २९-३० ।।

न चैनमशकं हन्तुं तदद्भुतमिवाभवत् ।
तस्मिन् प्रतिहते चास्त्रे विस्मयो मे महानभूत् ॥ ३१ ॥
किंतु उससे भी उसका वध न कर सका। यह एक अद्भुत-सी घटना हुई। वायव्यास्त्रके निष्फल हो जानेपर मुझे महान् आश्चर्य हुआ ।। ३१ ।।

भूय एव महाराज सविशेषमहं ततः ।
अस्त्रपूगेन महता रणे भूतमवाकिरम् ॥ ३२ ॥
महाराज! तब मैंने पुनः विशेष प्रयत्न करके रणभूमिमें किरातरूपधारी उस अद्भुत पुरुषपर महान् अस्त्रसमूहकी वर्षा की ।। ३२ ।।

स्थूणाकर्णमथो जालं शरवर्षमथोल्बणम् ।
शलभास्त्रमश्मवर्षं समास्थायाहमभ्ययाम् ॥ ३३ ॥
स्थूणाकर्ण<sup></sup>, वारुणास्त्र<sup></sup>, भयंकर शरवर्षास्त्र<sup></sup>, शलभास्त्र<sup></sup> तथा अश्मवर्ष<sup></sup> इन अस्त्रोंका सहारा ले मैं उस किरातपर टूट पड़ा ।। ३३ ।।

जग्रास प्रसभं तानि सर्वाण्यस्त्राणि मे नृप ।
तेषु सर्वेषु जग्धेषु ब्रह्मास्त्रं महदादिशम् ॥ ३४ ॥
राजन्! उसने मेरे उन सभी अस्त्रोंको बलपूर्वक अपना ग्रास बना लिया। उन सबके भक्षण कर लिये जानेपर मैंने महान् ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया ।। ३४ ।।

ततः प्रज्वलितैर्बाणैः सर्वतः सोपचीयते ।
उपचीयमानश्च मया महास्त्रेण व्यवर्धत ॥ ३५ ॥
तब प्रज्वलित बाणोंद्वारा वह अस्त्र सब ओर बढ़ने लगा। मेरे महान् अस्त्रसे बढ़नेकी प्रेरणा पाकर वह ब्रह्मास्त्र अधिक वेगसे बढ़ चला ।। ३५ ।।

ततः संतापिता लोका मत्प्रसूतेन तेजसा ।
क्षणेन हि दिशः खं च सर्वतो हि विदीपितम् ॥ ३६ ॥
तदनन्तर मेरे द्वारा प्रकट किये हुए ब्रह्मास्त्रके तेजसे वहाँके सब लोग संतप्त हो उठे। एक ही क्षणमें सम्पूर्ण दिशाएँ और आकाश सब ओरसे आगकी लपटोंसे उद्दीप्त हो उठे ।। ३६ ।।

तदप्यस्त्रं महातेजाः क्षणेनैव व्यशातयत् ।
ब्रह्मास्त्रे तु हते राजन् भयं मां महदाविशत् ॥ ३७ ॥

परंतु उस महान् तेजस्वी वीरने क्षणभरमें ही मेरे उस ब्रह्मास्त्रको भी शान्त कर दिया। राजन्! उस ब्रह्मास्त्रके नष्ट होनेपर मेरे मनमें महान् भय समा गया ।।

ततोऽहं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी ।
सहसाभ्यहनं भूतं तान्यप्यस्त्राण्यभक्षयत् ॥ ३८ ॥

तब मैं धनुष और दोनों अक्षय तरकस लेकर सहसा उस दिव्य पुरुषपर आघात करने लगा, किंतु उसने उन सबको भी अपना आहार बना लिया ।। ३८ ।।

हतेष्वस्त्रेषु सर्वेषु भक्षितेष्वायुधेषु च ।
मम तस्य च भूतस्य बाहुयुद्धमवर्तत ॥ ३९ ॥

जब मेरे सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट होकर उसके आहार बन गये, तब मेरा उस अलौकिक प्राणीके साथ मल्लयुद्ध प्रारम्भ हो गया ।। ३९ ।।

व्यायामं मुष्टिभिः कृत्वा तलैरपि समागतैः ।
अपारयंश्च तद् भूतं निश्चेष्टमगमं महीम् ॥ ४० ॥
ततः प्रहस्य तद् भूतं तत्रैवान्तरधीयत ।
सह स्त्रीभिर्महाराज पश्यतो मेऽद्भुतोपमम् ॥ ४१ ॥

पहले मुक्कों और थप्पड़ोंसे मैंने उससे टक्कर लेनेकी चेष्टाकी, परंतु उसपर मेरा कोई वश नहीं चला और मैं निश्चेष्ट होकर पृथिवीपर गिर पड़ा। महाराज! तब वह अलौकिक प्राणी हँसकर मेरे देखते-देखते स्त्रियोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गया ।। ४०-४१ ।।

एवं कृत्वा स भगवांस्ततोऽन्यद् रूपमास्थितः ।
दिव्यमेव महाराज वसानोऽद्भुतमम्बरम् ॥ ४२ ॥
हित्वा किरातरूपं च भगवान्स्त्रिदशेश्वरः ।
स्वरूपं दिव्यमास्थाय तस्थौ तत्र महेश्वरः ॥ ४३ ॥

राजन्! वास्तवमें वे भगवान् शंकर थे। उन्होंने पूर्वोक्त बर्ताव करके दूसरा रूप धारण कर लिया। देवताओंके स्वामी भगवान् महेश्वर किरातरूप छोड़कर दिव्य स्वरूपका आश्रय ले अलौकिक एवं अद्भुत वस्त्र धारण किये वहाँ खड़े हो गये ।। ४२-४३ ।।

अदृश्यत ततः साक्षाद् भगवान् गोवृषध्वजः ।
उमासहायो व्यालधृग् बहुरूपः पिनाकधृक् ॥ ४४ ॥
स मामभ्येत्य समरे तथैवाभिमुखं स्थितम् ।
शूलपाणिरथोवाच तुष्टोऽस्मीति परंतप ॥ ४५ ॥

इस प्रकार उमासहित साक्षात् भगवान् वृषभ-ध्वजका दर्शन हुआ। उन्होंने अपने अंगोंमें सर्प और हाथमें पिनाक धारण कर रखे थे। अनेक रूपधारी भगवान् शूलपाणि उस रणभूमिमें मेरे निकट आकर पूर्ववत् सामने खड़े हो गये और बोले—'परंतप! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ' ।। ४४-४५ ।।

ततस्तद् धनुरादाय तूणौ चाक्षय्यसायकौ ।

प्रादान्मैव भगवान् धारयस्वेति चाब्रवीत् ॥ ४६ ॥
तुष्टोऽस्मि तव कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते।
यत् ते मनोगतं वीर तद् ब्रूहि वितराम्यहम् ॥ ४७ ॥
अमरत्वमपहाय ब्रूहि यत् ते मनोगतम्।
तदनन्तर मेरे धनुष और अक्षय बाणोंसे भरे हुए दोनों तरकस लेकर भगवान् शिवने मुझे ही दे दिये और कहा—'परंतप! ये अपने अस्त्र ग्रहण करो।' कुन्तीकुमार! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? वीर! तुम्हारे मनमें जो कामना हो, बताओ। मैं उसे पूर्ण कर दूँगा। अमरत्वको छोड़कर और तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, बताओ' ॥ ४६-४७ १/२ ॥
ततः प्राञ्जलिरेवाहमस्त्रेषु गतमानसः ॥ ४८ ॥
प्रणम्य मनसा शर्वं ततो वचनमाददे।
भगवान् मे प्रसन्नश्चेदीप्सितोऽयं वरो मम ॥ ४९ ॥
अस्त्राणीच्छाम्यहं ज्ञातुं यानि देवेषु कानिचित्।
ददानीत्येव भगवानब्रवीत् त्र्यम्बकश्च माम् ॥ ५० ॥
मेरा मन तो अस्त्र-शस्त्रोंमें लगा हुआ था। उस समय मैंने हाथ जोड़कर मन-ही-मन भगवान् शंकरको प्रणाम किया और यह बात कही—'यदि मुझपर भगवान् प्रसन्न हैं, तो मेरा मनोवांछित वर इस प्रकार है—देवताओंके पास जो कोई भी दिव्यास्त्र हैं, उन्हें मैं जानना चाहता हूँ।' यह सुनकर भगवान् शंकरने मुझसे कहा—'पाण्डुनन्दन! मैं तुम्हें सम्पूर्ण दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर देता हूँ' ॥ ४८—५० ॥
रौद्रमस्त्रं मदीयं त्वामुपस्थास्यति पाण्डव।
प्रददौ च मम प्रीतः सोऽस्त्रं पाशुपतं महत् ॥ ५१ ॥
'पाण्डुकुमार! मेरा रौद्रास्त्र स्वयं तुम्हें प्राप्त हो जायगा।' यह कहकर भगवान् पशुपतिने बड़ी प्रसन्नताके साथ मुझे अपना महान् पाशुपतास्त्र प्रदान किया ॥ ५१ ॥
उवाच च महादेवो दत्त्वा मेऽस्त्रं सनातनम्।
न प्रयोज्यं भवेदेतन्मानुषेषु कथञ्चन ॥ ५२ ॥
अपना सनातन अस्त्र मुझे देकर महादेवजी फिर बोले—'तुम्हें मनुष्योंपर किसी प्रकार इस अस्त्रका प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ ५२ ॥
जगद् विनिर्दहेदेवमल्पतेजसि पातितम्।
पीड्यमानेन बलवत् प्रयोज्यं स्याद् धनंजय ॥ ५३ ॥
अस्त्राणां प्रतिघाते च सर्वथैव प्रयोजयेत्।

‘अपनेसे अल्पशक्तिवाले विपक्षी पर यदि इसका प्रहार किया जाय तो यह सम्पूर्ण विश्वको दग्ध कर देगा। धनंजय! जब शत्रुके द्वारा अपनेको बहुत पीड़ा प्राप्त होने लगे, उस दशामें आत्मरक्षाके लिये इसका प्रयोग करना चाहिये। शत्रुके अस्त्रोंका विनाश करनेके लिये सर्वथा इसका प्रयोग उचित है’ ।। ५३ १/२ ।।

तदप्रतिहतं दिव्यं सर्वास्त्रप्रतिषेधनम् ।। ५४ ।।
मूर्तिमन्मे स्थितं पार्श्वे प्रसन्ने गोवृषध्वजे ।
इस प्रकार भगवान् वृषभध्वजके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण अस्त्रोंका निवारण करनेवाला और कहीं भी कुण्ठित न होनेवाला दिव्य पाशुपतास्त्र मूर्तिमान् हो मेरे पास आकर खड़ा हो गया ।। ५४ १/२ ।।

उत्सादनममित्राणां परसेनानिकर्तनम् ।। ५५ ।।
दुरासदं दुष्प्रसहं सुरदानवराक्षसैः ।
अनुज्ञातस्त्वहं तेन तत्रैव समुपाविशम् ।। ५६ ।।
प्रेक्षतश्चैव मे देवस्तत्रैवान्तरधीयत ।। ५७ ।।
वह शत्रुओंका संहारक और विपक्षियोंकी सेनाका विध्वंसक है। उसकी प्राप्ति बहुत कठिन है। देवता, दानव तथा राक्षस किसीके लिये भी उसका वेग सहन करना अत्यन्त कठिन है। फिर भगवान् शिवकी आज्ञा होनेपर मैं वहीं बैठ गया और वे मेरे देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ।। ५५—५७ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि गन्धमादनवासे युधिष्ठिरार्जुनसंवादे सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें गन्धमादननिवासकालिक युधिष्ठिर-अर्जुन-संवादविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६७ ।।


१. आचार्य नीलकण्ठके मतसे स्थूणाकर्ण नाम है शंकुकर्णका, जो भगवान् रुद्रके एक अवतार हैं। वे जिस अस्त्रके देवता हैं, उसका नाम भी स्थूणाकर्ण है।
२. मूलमें जाल शब्द आया है, जिसका अर्थ है, जालसम्बन्धी। यह जलवर्षक अस्त्रकी ही वारुणास्त्र है।
३. जैसे बादल पानीकी वर्षा करता है, उसी प्रकार निरन्तर बाणवर्षा करनेवाला अस्त्र शरवर्ष कहलाता है।
४. जैसे असंख्य टिड्डियाँ आकाशमें मँडराती और पौधोंपर टूट पड़ती हैं, उसी प्रकार जिस अस्त्रसे असंख्य बाण आकाशको आच्छादित करते और शत्रुको अपना लक्ष्य बनाते हैं, उसीका नाम शलभास्त्र है।
५. पत्थरोंकी वर्षा करनेवाले अस्त्रको अश्मवर्ष कहते हैं।

१६८-

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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन

अर्जुन उवाच

ततस्तामवसं प्रीतो रजनीं तत्र भारत ।
प्रसादाद् देवदेवस्य त्र्यम्बकस्य महात्मनः ॥ १ ॥
**अर्जुन कहते हैं—**भारत! देवाधिदेव परमात्मा भगवान् त्रिलोचनके कृपाप्रसादसे मैंने प्रसन्नतापूर्वक वह रात वहीं व्यतीत की ॥ १ ॥

व्युषितो रजनीं चाहं कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रियाः ।
अपश्यं तं द्विजश्रेष्ठं दृष्टवानस्मि यं पुरा ॥ २ ॥
सबेरा होनेपर पूर्वाह्नकालकी क्रिया पूरी करके मैंने पुनः उन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपने समक्ष पाया, जिनका दर्शन मुझे पहले भी हो चुका था ॥ २ ॥

तस्मै चाहं यथावृत्तं सर्वमेव न्यवेदयम् ।
भगवन्तं महादेवं समेतोऽस्मीति भारत ॥ ३ ॥
भरतकुलभूषण! उनसे मैंने अपना सारा वृत्तान्त यथावत् कह सुनाया और बताया कि 'मैं भगवान् महादेवजीसे मिल चुका हूँ' ॥ ३ ॥

स मामुवाच राजेन्द्र प्रीयमाणो द्विजोत्तमः ।
दृष्टस्त्वया महादेवो यथा नान्येन केनचित् ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! तब वे विप्रवर बड़े प्रसन्न होकर मुझसे बोले—‘कुन्तीकुमार! जिस प्रकार तुमने महादेवजीका दर्शन किया है, वैसा दर्शन और किसीने नहीं किया है ॥ ४ ॥

समेत्य लोकपालैस्तु सर्वैर्वैवस्वतादिभिः ।
द्रष्टास्यनघ देवेन्द्रं स च तेऽस्त्राणि दास्यति ॥ ५ ॥
‘अनघ! अब तुम यम आदि लोकपालोंके साथ देवराज इन्द्रका दर्शन करोगे और वे भी तुम्हें अस्त्र प्रदान करेंगे' ॥ ५ ॥

एवमुक्त्वा स मां राजन्नाश्लिष्य च पुनः पुनः ।
अगच्छत् स यथाकामं ब्राह्मणः सूर्यसंनिभः ॥ ६ ॥
राजन्! ऐसा कहकर सूर्यके समान तेजस्वी ब्राह्मण देवताने मुझे बार-बार हृदयसे लगाया और फिर वे इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ॥ ६ ॥

अथापराह्ले तस्याह्नः प्रावात् पुण्यः समीरणः ।
पुनर्नवमिमं लोकं कुर्वन्निव सपत्नहन् ॥ ७ ॥

दिव्यानि चैव माल्यानि सुगन्धीनि नवानि च । शैशिरस्य गिरेः पादे प्रादुरासन् समीपतः ॥ ८ ॥ शत्रुविजयी नरेश! तदनन्तर जब वह दिन ढलने लगा, तब पुनः इस जगत्में नूतन जीवनका संचार-सा करती हुई पवित्र वायु चलने लगी और उस हिमालयके पार्श्ववर्ती प्रदेशमें दिव्य, नवीन और सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥ ७-८ ॥ वादित्राणि च दिव्यानि सुघोराणि समन्ततः । स्तुतयश्चेन्द्रसंयुक्ता अश्रूयन्त मनोहराः ॥ ९ ॥ चारों ओर अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाले दिव्य वाद्यों और इन्द्रसम्बन्धी स्तोत्रोंके मनोहर शब्द सुनायी देने लगे ॥ ९ ॥ गणाश्चाप्सरसां तत्र गन्धर्वाणां तथैव च । पुरस्ताद् देवदेवस्य जगुर्गीतानि सर्वशः ॥ १० ॥ सब गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह वहाँ देवराज इन्द्रके आगे रहकर गीत गा रहे थे ॥ १० ॥ मरुतां च गणास्तत्र देवयानैरुपागमन् । महेन्द्रानुचरा ये च ये च सद्मनिवासिनः ॥ ११ ॥ देवताओंके अनेक गण भी दिव्य विमानोंपर बैठकर वहाँ आये थे। जो महेन्द्रके सेवक थे और जो इन्द्रभवनमें ही निवास करते थे, वे भी वहाँ पधारे ॥ ११ ॥ ततो मरुत्वान् हरिभिर्युक्तैर्वाहैः स्वलङ्कृतैः । शचीसहायस्तत्रायात् सह सर्वैस्तदामरैः ॥ १२ ॥ तदनन्तर थोड़ी ही देरमें विविध आभूषणोंसे विभूषित हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए एक सुन्दर रथके द्वारा शचीसहित इन्द्रने सम्पूर्ण देवताओंके साथ वहाँ पदार्पण किया ॥ १२ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु कुबेरो नरवाहनः । दर्शयामास मां राजँल्लक्ष्म्या परमया युतः ॥ १३ ॥ राजन्! इसी समय सर्वोत्कृष्ट ऐश्वर्य—लक्ष्मीसे सम्पन्न नरवाहन कुबेरने भी मुझे दर्शन दिया ॥ १३ ॥ दक्षिणस्यां दिशि यमं प्रत्यपश्यं व्यवस्थितम् । वरुणं देवराजं च यथास्थानमवस्थितम् ॥ १४ ॥ दक्षिण दिशाकी ओर दृष्टिपात करनेपर मुझे साक्षात् यमराज खड़े दिखायी दिये। वरुण और देवराज इन्द्र भी क्रमशः पश्चिम और पूर्व दिशामें यथास्थान खड़े हो गये ॥ १४ ॥ ते मामूचुर्महाराज सान्त्वयित्वा नरर्षभ । सव्यसाचिन् निरीक्षास्माँल्लोकपालानवस्थितान् ॥ १५ ॥ महाराज! नरश्रेष्ठ! उन सब लोकपालोंने मुझे सान्त्वना देकर कहा—‘सव्यसाची अर्जुन! देखो, हम सब लोकपाल यहाँ खड़े हैं ॥ १५ ॥

सुरकार्यार्थसिद्ध्यर्थं दृष्टवानसि शङ्करम् । अस्मत्तोऽपि गृहाण त्वमस्त्राणीति समन्ततः ॥ १६ ॥ ‘देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये ही तुम्हें भगवान् शंकरका दर्शन प्राप्त हुआ था। अब तुम चारों ओर घूमकर हमलोगोंसे भी दिव्यास्त्र ग्रहण करो’ ॥ १६ ॥

ततोऽहं प्रयतो भूत्वा प्रणिपत्य सुरर्षभान् । प्रत्यगृह्णां तदास्त्राणि महान्ति विधिवद् विभो ॥ १७ ॥ प्रभो! तब मैंने एकाग्रचित्त हो उन उत्तम देवताओंको प्रणाम करके उन सबसे विधिपूर्वक महान् दिव्यास्त्र प्राप्त किये ॥ १७ ॥

गृहीतास्त्रस्ततो देवैरनुज्ञातोऽस्मि भारत । अथ देवा ययुः सर्वे यथागतमरिंदम ॥ १८ ॥ भारत! जब मैं अस्त्र ग्रहण कर चुका तब देवताओंने मुझे जानेकी आज्ञा दी। शत्रुदमन! तदनन्तर सब देवता जैसे आये थे, वैसे अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ १८ ॥

मघवानपि देवेशो रथमारुह्य सुप्रभम् । उवाच भगवान् स्वर्गं गन्तव्यं फाल्गुन त्वया ॥ १९ ॥ देवेश्वर भगवान् इन्द्रने भी अपने अत्यन्त प्रकाशपूर्ण रथपर आरूढ़ हो मुझसे कहा—‘अर्जुन! तुम्हें स्वर्गलोककी यात्रा करनी होगी ॥ १९ ॥

पुरैवागमनादस्माद् वेदाहं त्वां धनंजय । अतः परं त्वहं वै त्वां दर्शये भरतर्षभ ॥ २० ॥ ‘भरतश्रेष्ठ धनंजय! यहाँ आनेसे पहले ही मुझे तुम्हारे विषयमें सब कुछ ज्ञात हो गया था। इसके बाद मैंने तुम्हें दर्शन दिया है ॥ २० ॥

त्वया हि तीर्थेषु पुरा समाप्लावः कृतोऽसकृत् । तपश्चेदं महत् तप्तं स्वर्गं गन्तासि पाण्डव ॥ २१ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! तुमने पहले अनेक बार बहुत-से तीर्थोंमें स्नान किया है और इस समय इस महान् तपका भी अनुष्ठान कर लिया है, अतः तुम स्वर्गलोकमें सशरीर जानेके अधिकारी हो गये हो ॥ २१ ॥

भूयश्चैव च तप्तव्यं तपश्चरणमुत्तमम् । स्वर्गं त्ववश्यं गन्तव्यं त्वया शत्रुनिषूदन ॥ २२ ॥ ‘शत्रुसूदन! अभी तुम्हें और भी उत्तम तपस्या करनी है और स्वर्गलोकमें अवश्य पदार्पण करना है ॥ २२ ॥

मातलिर्मन्नियोगात् त्वां त्रिदिवं प्रापयिष्यति । विदितस्त्वं हि देवानां मुनीनां च महात्मनाम् ॥ २३ ॥ इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठ तपः कुर्वन् सुदुष्करम् ।

‘मेरी आज्ञासे मातलि तुम्हें स्वर्गमें पहुँचा देगा। पाण्डवश्रेष्ठ! यहाँ रहकर जो तुम अत्यन्त दुष्कर तप कर रहे हो, इसके कारण देवताओं तथा महात्मा मुनियोंमें तुम्हारी ख्याति बहुत बढ़ गयी है’ ।। २३ १/२ ।।

ततोऽहमब्रुवं शक्रं प्रसीद भगवन् मम । आचार्यं वरयेयं त्वामस्त्रार्थं त्रिदशेश्वर ।। २४ ।। तब मैंने देवराज इन्द्रसे कहा—‘भगवन्! आप मुझपर प्रसन्न होइये। देवेश्वर! मैं अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये आपको अपना आचार्य बनाता हूँ’ ।। २४ ।।

इन्द्र उवाच

क्रूरकर्मास्त्रवित् तात भविष्यसि परंतप । यदर्थमस्त्राणीप्सुस्त्वं तं कामं पाण्डवाप्नुहि ।। २५ ।। इन्द्रने कहा—परंतप तात अर्जुन! दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर तुम भयंकर कर्म करने लगोगे। अतः पाण्डुनन्दन! मेरी इच्छा है कि तुम जिसके लिये अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त करना चाहते हो, तुम्हारा वह उद्देश्य पूर्ण हो ।। २५ ।।

ततोऽहमब्रुवं नाहं दिव्यान्‍यस्त्राणि शत्रुहन् । मानुषेषु प्रयोक्ष्यामि विनास्त्रप्रतिघातनात् ।। २६ ।। यह सुनकर मैंने उत्तर दिया—‘शत्रुघाती देवेश्वर! मैं शत्रुओंद्धारा प्रयुक्त दिव्यास्त्रोंका निवारण करनेके सिवा अन्य किसी अवसरपर मनुष्योंके ऊपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग नहीं करूँगा ।। २६ ।।

तानि दिव्यानि मेऽस्त्राणि प्रयच्छ विबुधाधिप । लोकांश्चास्त्रजितान् पश्चाल्लभैयं सुरपुङ्गव ।। २७ ।। ‘देवराज! सुरश्रेष्ठ! आप मुझे वे दिव्य अस्त्र प्रदान करें। अस्त्रविद्या सीखनेके पश्चात् मैं उन्हीं अस्त्रोंके द्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार प्राप्त करना चाहता हूँ’ ।। २७ ।।

इन्द्र उवाच

परीक्षार्थं मयैतत् ते वाक्यमुक्तं धनंजय । ममात्मजस्य वचनं सूपपन्नमिदं तव ।। २८ ।। इन्द्र बोले—धनंजय! मैंने तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये उपर्युक्त बात कही थी। तुमने जो अस्त्रविद्याके प्रति अत्यन्त उत्सुकता प्रकट की है, वह तुम्हारे जैसे मेरे पुत्रके अनुरूप ही है ।। २८ ।।

शिक्ष मे भवनं गत्वा सर्वाण्यस्त्राणि भारत । वायोरग्नेर्वसुभ्योऽपि वरुणात् समरुद्गणात् ।। २९ ।। साध्यं पैतामहं चैव गन्धर्वोरगरक्षसाम् । वैष्णवानि च सर्वाणि नैर्ऋतानि तथैव च ।। ३० ।।

मद्गतानि च जानीहि सर्वास्त्राणि कुरुद्वह ।
एवमुक्त्वा तु मां शक्रस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३१ ॥
भारत! तुम मेरे भवनमें चलकर सम्पूर्ण अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त करो। कुरुश्रेष्ठ! वायु, अग्नि, वसु, वरुण, मरुद्गण, साध्यगण, ब्रह्मा, गन्धर्वगण, नाग, राक्षस, विष्णु तथा निर्ऋतिके और स्वयं मेरे भी सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करो, मुझसे ऐसा कहकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये ॥
अथापश्यं हरियुजं रथमैन्द्रमुपस्थितम् ।
दिव्यं मायामयं पुण्यं यत्तं मातलिना नृप ॥ ३२ ॥
तदनन्तर थोड़ी ही देरमें मुझे हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ देवराज इन्द्रका रथ वहाँ उपस्थित दिखायी दिया। राजन्! वह दिव्य मायामय पवित्र रथ मातलिके द्वारा नियन्त्रित था ॥ ३२ ॥
लोकपालेषु यातेषु मामुवाचाथ मातलिः ।
द्रष्टुमिच्छति शक्रस्त्वां देवराजो महाद्युते ॥ ३३ ॥
जब सभी लोकपाल चले गये, तब मातलिने मुझसे कहा—‘महातेजस्वी वीर! देवराज इन्द्र तुमसे मिलना चाहते हैं ॥ ३३ ॥
संसिद्धयस्व महाबाहो कुरु कार्यमनन्तरम् ।
पश्य पुण्यकृताँल्लोकान् सशरीरो दिवं व्रज ॥ ३४ ॥
‘महाबाहो! तुम उनसे मिलकर कृतार्थ होओ और अब आवश्यक कार्य करो। इसी शरीरसे देवलोकमें चलो तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकोंका दर्शन करो ॥ ३४ ॥
देवराजः सहस्राक्षस्त्वां दिदृक्षति भारत ।
इत्युक्तोऽहं मातलिना गिरिमामन्त्र्य शैशिरम् ॥ ३५ ॥
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारोहं रथोत्तमम् ।
‘भरतनन्दन! सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र तुम्हें देखना चाहते हैं।’ मातलिके ऐसा कहनेपर मैं हिमालयसे आज्ञा ले रथकी परिक्रमा करके उस श्रेष्ठ रथमें सवार हुआ ॥ ३५ १/२

चोदयामास स हयान् मनोमारुतरंहसः ॥ ३६ ॥
मातलिर्हयतत्त्वज्ञो यथावद् भूरिदक्षिणः ।
मातलि अश्वसंचालनकी कलाके मर्मज्ञ थे। सारथिके कार्यमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने मन तथा वायुके समान वेगशाली अश्वोंको यथोचित रीतिसे आगे बढ़ाया ॥ ३६ १/२ ॥
अवैक्षत च मे वक्त्रं स्थितस्याथ स सारथिः ॥ ३७ ॥
तथा भ्रान्ते रथे राजन् विस्मितश्चेदमब्रवीत् ।
राजन्! उस समय देवसारथि मातलिने आकाशमें चक्कर लगाते हुए रथपर स्थिरतापूर्वक बैठे हुए मेरे मुखकी ओर दृष्टिपात किया और आश्चर्यचकित होकर कहा— ॥ ३७ १/२ ॥
अत्यद्भुतमिदं त्वद्य विचित्रं प्रतिभाति मे ॥ ३८ ॥
यदास्थितो रथं दिव्यं पदान्न चलितः पदम् ।
‘भरतश्रेष्ठ! आज मुझे यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात दिखायी दे रही है कि इस दिव्य रथपर बैठकर तुम अपने स्थानसे तनिक भी हिल-डुल नहीं रहे हो ॥ ३८ १/२ ॥
देवराजोऽपि हि मया नित्यमत्रोपलक्षितः ॥ ३९ ॥
विचलन् प्रथमोत्पाते हयानां भरतर्षभ ।
त्वं पुनः स्थित एवात्र रथे भ्रान्ते कुरूद्वह ॥ ४० ॥

‘कुरुकुलभूषण भरतश्रेष्ठ! जब घोड़े पहली बार उड़ान भरते हैं' उस समय मैंने सदा यह देखा है कि देवराज इन्द्र भी विचलित हुए बिना नहीं रह पाते, परंतु तुम चक्कर काटते हुए रथपर भी स्थिरभावसे बैठे हो ।। ३९-४० ।।

अतिशक्रमिदं सर्वं तवेति प्रतिभाति मे ।
इत्युक्त्वाऽऽकाशमाविश्य मातलिर्विबुधालयान् ।। ४१ ।।
दर्शयामास मे राजन् विमानानि च भारत ।
स रथो हरिभिर्युक्तो ह्यूर्ध्वमाचक्रमे ततः ।। ४२ ।।

‘कुरुश्रेष्ठ! तुम्हारी ये सब बातें मुझे इन्द्रसे भी बढ़कर प्रतीत हो रही हैं।' भरतकुलभूषण नरेश! ऐसा कहकर मातलिने अन्तरिक्षलोकमें प्रविष्ट होकर मुझे देवताओंके घरों और विमानोंका दर्शन कराया, फिर हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ वह रथ वहाँसे भी ऊपरकी ओर बढ़ चला ।। ४१-४२ ।।

ऋषयो देवताश्चैव पूजयन्ति नरोत्तम ।
ततः कामगमाँल्लोकानपश्यं वै सुरर्षिणाम् ।। ४३ ।।

नरश्रेष्ठ! ऋषि और देवता भी उस रथका समादर करते थे। तदनन्तर मैंने देवर्षियोंके अनेक समुदायोंका दर्शन किया, जो अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र जानेकी शक्ति रखते हैं ।। ४३ ।।

गन्धर्वाप्सरसां चैव प्रभावममितौजसाम् ।
नन्दनादीनि देवानां वनान्युपवनानि च ।। ४४ ।।
दर्शयामास मे शीघ्रं मातलिः शक्रसारथिः ।
ततः शक्रस्य भवनमपश्यममरावतीम् ।। ४५ ।।
दिव्यैः कामफलैर्वृक्षै रत्नैश्च समलङ्कृताम् ।
न तत्र सूर्यस्तपति न शीतोष्णे न च क्लमः ।। ४६ ।।

अमित तेजस्वी गन्धर्वों और अप्सराओंका प्रभाव भी मुझे प्रत्यक्ष दिखायी दिया। फिर इन्द्रसारथि मातलिने मुझे शीघ्र ही देवताओंके नन्दन आदि वन और उपवन दिखाये। तत्पश्चात् मैंने अमरावतीपुरी तथा इन्द्रभवनका दर्शन किया। वह पुरी इच्छानुसार फल देनेवाले दिव्य वृक्षों तथा रत्नोंसे सुशोभित थी। वहाँ सूर्यका ताप नहीं होता, सर्दी या गर्मीका कष्ट नहीं रहता और न किसी-को थकावट ही होती है ।। ४४—४६ ।।

न बाधते तत्र रजस्तत्रास्ति न जरा नृप ।
न तत्र शोको दैन्यं वा दौर्बल्यं चोपलक्ष्यते ।। ४७ ।।

नरेश्वर! वहाँ रजोगुणजनित विकार नहीं सताते, बुढ़ापा नहीं आता; शोक, दीनता और दुर्बलताका दर्शन नहीं होता ।। ४७ ।।

दिवौकसां महाराज न ग्लानिररिमर्दन ।
न क्रोधलोभौ तत्रास्तां सुरादीनां विशाम्पते ।। ४८ ।।

महाराज! शत्रुसूदन! स्वर्गवासी देवताओंको कभी ग्लानि नहीं होती। उनमें क्रोध और लोभका भी अभाव होता है ॥ ४८ ॥ नित्यतुष्टाश्च ते राजन् प्राणिनः सुरवेश्मनि । नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ॥ ४९ ॥ राजन्! स्वर्गमें निवास करनेवाले प्राणी सदा संतुष्ट रहते हैं। वहाँके वृक्ष सर्वदा फल-फूलसे सम्पन्न और हरे पत्तोंसे सुशोभित रहते हैं ॥ ४९ ॥ पुष्करिण्यश्च विविधाः पद्मसौगन्धिकायुताः । शीतस्तत्र ववौ वायुः सुगन्धी जीवनः शुचिः ॥ ५० ॥ वहाँ सहस्रों सौगन्धिक कमलोंसे अलंकृत नाना प्रकारके सरोवर शोभा पाते हैं और शीतल, पवित्र, सुगन्धित एवं नवजीवनदायक वायु सदा बहती रहती है ॥ ५० ॥ सर्वरत्नविचित्रा च भूमिः पुष्पविभूषिता । मृगद्विजाश्च बहवो रुचिरा मधुरस्वराः ॥ ५१ ॥ विमानगामिनश्चात्र दृश्यन्ते बहवोऽम्बरे । ततोऽपश्यं वसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान् ॥ ५२ ॥ आदित्यानश्विनौ चैव तान् सर्वान् प्रत्यपूजयम् । ते मां वीर्येण यशसा तेजसा च बलेन च ॥ ५३ ॥ अस्त्रैश्चाप्यन्वजानन्त संग्रामे विजयेन च । वहाँकी भूमि सब प्रकारके रत्नोंसे विचित्र शोभा धारण करती है और (सब ओर बिखरे हुए) पुष्प उस भूमिके लिये आभूषणका काम देते हैं। स्वर्गलोकमें बहुत-से मनोहर पशु और पक्षी देखे जाते हैं, जिनकी बोली बड़ी मधुर प्रतीत होती है। वहाँ अनेक देवता आकाशमें विमानोंपर विचरते दिखायी देते हैं। तदनन्तर मुझे वसु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, आदित्य और अश्विनीकुमारोंके दर्शन हुए। मैंने उन सबके आगे मस्तक झुकाकर उनका सम्मान किया। उन सबने मुझे पराक्रमी, यशस्वी, तेजस्वी, बलवान्, अस्त्रवेत्ता और संग्राम-विजयी होनेका आशीर्वाद दिया ॥ ५१—५३ १/२ ॥ प्रविश्य तां पुरीं दिव्यां देवगन्धर्वपूजिताम् ॥ ५४ ॥ देवराजं सहस्राक्षमुपातिष्ठं कृताञ्जलिः । ददार्धमासनं प्रीतः शक्रो मे ददतां वरः ॥ ५५ ॥ तत्पश्चात् देव-गन्धर्वपूजित दिव्य अमरावतीपुरीमें प्रवेश करके मैंने हाथ जोड़कर सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रको प्रणाम किया। दाताओंमें श्रेष्ठ देवराज इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझे अपने आधे सिंहासनपर स्थान दिया ॥ ५४-५५ ॥ बहुमानाच्च गात्राणि पस्पर्श मम वासवः । तत्राहं देवगन्धर्वैः सहितो भूरिदक्षिण ॥ ५६ ॥ अस्त्रार्थमवसं स्वर्गे शिक्षमाणोऽस्त्राणि भारत ।

विश्वावसोश्च वै पुत्रश्चित्रसेनोऽभवत् सखा ॥ ५७ ॥ इतना ही नहीं, उन्होंने बड़े आदरके साथ मेरे अंगोंपर हाथ फेरा। यज्ञोंमें पूरी दक्षिणा देनेवाले भरतश्रेष्ठ! उस स्वर्गलोकमें देवताओं और गन्धर्वोंके साथ अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये रहने लगा और प्रतिदिन अस्त्रोंका अभ्यास करने लगा। उस समय गन्धर्वराज विश्वावसुके पुत्र चित्रसेनके साथ मेरी मैत्री हो गयी थी ॥ ५६-५७ ॥

स च गान्धर्वमखिलं ग्राहयामास मां नृप ।
तत्राहमवसं राजन् गृहीतास्त्रः सुपूजितः ॥ ५८ ॥
सुखं शक्रस्य भवने सर्वकामसमन्वितः ।
शृण्वन् वै गीतशब्दं च तूर्यशब्दं च पुष्कलम् ।
पश्यंश्चाप्सरसः श्रेष्ठा नृत्यन्तीर्भरतर्षभ ॥ ५९ ॥
नरेश्वर! उन्होंने मुझे सम्पूर्ण गान्धर्ववेद (संगीत-विद्या)-का अध्ययन कराया। राजन्! वहाँ इन्द्रभवनमें अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण करते हुए मैं बड़े सम्मान और सुखसे रहने लगा। वहाँ सभी मनोवांछित पदार्थ मेरे लिये सुलभ थे। भरतश्रेष्ठ! मैं वहाँ कभी मनोहर गीत सुनता, कभी पर्याप्तरूपसे दिव्य वाद्योंका आनन्द लेता और कभी-कभी श्रेष्ठ अप्सराओंका नृत्य भी देख लेता था ॥

तत् सर्वमनवज्ञाय तथ्यं विज्ञाय भारत ।
अत्यर्थं प्रतिगृह्याहमस्त्रेष्वेव व्यवस्थितः ॥ ६० ॥
भारत! इन समस्त सुख-सुविधाओंकी अवहेलना न करते हुए उन्हें स्वीकार करके भी मैं इनके असली रूपको जानकर—इनकी निःसारताको भलीभाँति समझकर अधिकतर अस्त्रोंके अभ्यासमें ही संलग्न रहता था। (गीत आदिमें कभी आसक्त नहीं हुआ) ॥ ६० ॥

ततोऽतुष्यत् सहस्राक्षस्तेन कामेन मे विभुः ।
एवं मे वसतो राजन्नेष कालोत्यगाद् दिवि ॥ ६१ ॥
अस्त्रविद्याकी ओर मेरी ऐसी अभिरुचि होनेसे सहस्रनेत्रधारी भगवान् इन्द्र मुझपर बहुत संतुष्ट रहते थे। राजन्! इस प्रकार स्वर्गमें रहकर मेरा यह समय सुखपूर्वक बीतने लगा ॥ ६१ ॥

कृतास्त्रमतिविश्वस्तमथ मां हरिवाहनः ।
संस्पृश्य मूर्ध्नि पाणिभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६२ ॥
धीरे-धीरे मैं अस्त्रविद्यामें निपुण हो गया। मेरी विज्ञतापर सबको अधिक विश्वास था। एक दिन भगवान् इन्द्रने अपने दोनों हाथोंसे मेरे मस्तकका स्पर्श करते हुए मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ ६२ ॥

न त्वमद्य युधा जेतुं शक्यः सुरगणैरपि ।
किं पुनर्मानुषे लोके मानुषैरकृतात्मभिः ॥ ६३ ॥

‘अर्जुन! अब तुम्हें युद्धमें देवता भी परास्त नहीं कर सकते। फिर मर्त्यलोकमें रहनेवाले बेचारे असंयमी मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ।। ६३ ।।

अप्रमेयोऽप्रधृष्यश्च युद्धेष्वप्रतिमस्तथा ।
अजेयस्त्वं हि संग्रामे सर्वैरपि सुरासुरैः ।
अथाब्रवीत् पुनर्देवः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।। ६४ ।।
‘तुम युद्धमें अप्रमेय, अजेय और अनुपम हो। संग्रामभूमिमें सम्पूर्ण देवता और असुर भी तुम्हें पराजित नहीं कर सकते।’ इतना कहते-कहते देवराजके शरीरमें रोमांच हो आया। तदनन्तर वे फिर बोले— ।। ६४ ।।

अस्त्रयुद्धे समो वीर न ते कश्चिद् भविष्यति ।
अप्रमत्तः सदा दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।। ६५ ।।
ब्रह्मण्यश्चास्त्रविच्चासि शूरश्चासि कुरूद्वह ।
अस्त्राणि समवाप्तानि त्वया दश च पञ्च च ।। ६६ ।।
पञ्चभिर्विधिभिः पार्थ विद्यते न त्वया समः ।
प्रयोगमुपसंहारमावृत्तिं च धनंजय ।। ६७ ।।
प्रायश्चित्तं च वेत्थ त्वं प्रतीघातं च सर्वशः ।
ततो गुर्वर्थकालोऽयं समुत्पन्नः परंतप ।। ६८ ।।
‘वीर! अस्त्र-युद्धमें तुम्हारा सामना कर सके, ऐसा कोई योद्धा नहीं होगा। कुरुश्रेष्ठ! तुम सर्वदा सावधान रहते हो, प्रत्येक कार्यमें कुशल हो, जितेन्द्रिय, सत्यवादी और ब्राह्मणभक्त हो; तुम्हें अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान है और तुम अद्भुत शौर्यसे सम्पन्न हो। पार्थ! तुमने पाँच विधियोंसहित पंद्रह अस्त्र प्राप्त किये हैं, अतः इस भूतलपर तुम्हारे-जैसा शूर दूसरा कोई नहीं है। परंतप धनंजय! प्रयोग, उपसंहार, आवृत्ति, प्रायश्चित्त³ और प्रतिघात³—ये अस्त्रोंकी पाँच विधियाँ हैं; तुम इन सबका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर चुके हो। अतः अब गुरुदक्षिणा देनेका समय आ गया है ।। ६५—६८ ।।

प्रतिजानीष्व तं कर्तुं ततो वेत्स्याम्यहं परम् ।
ततोऽहमब्रुवं राजन् देवराजमिदं वचः ।। ६९ ।।
विषह्यं यन्मया कर्तुं कृतमेव निबोध तत् ।
ततो मामब्रवीद् राजन् प्रहसन् बलवृत्रहा ।। ७० ।।
‘तुम उसे देनेकी प्रतिज्ञा करो, तब मैं अपने महान् कार्यको तुम्हें बताऊँगा।’ राजन्! यह सुनकर मैंने देवराजसे कहा—‘भगवन्! जो कुछ मैं कर सकता हूँ, उसे किया हुआ ही समझिये।’ नरेश्वर! तब बल और वृत्रासुरके शत्रु इन्द्रने मुझसे हँसते हुए कहा— ।। ६९-७० ।।

नाविषह्यं तवाद्यास्ति त्रिषु लोकेषु किंचन ।
निवातकवचा नाम दानवा मम शत्रवः ।। ७१ ।।

‘वीरवर! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तुम्हारे लिये असाध्य हो। निवातकवच नामक दानव मेरे शत्रु हैं।। ७१ ।। समुद्रकुक्षिमाश्रित्य दुर्गे प्रतिवसन्त्युत। तिस्रः कोट्यः समाख्यातास्तुल्यरूपबलप्रभाः ।। ७२ ।। तांस्तत्र जहि कौन्तेय गुर्वर्थस्ते भविष्यति। ततो मातलिसंयुक्तं मयूरसमरोमभिः ।। ७३ ।। हयैरुपेत्तं प्रादान्मे रथं दिव्यं महाप्रभम्। बबन्ध चैव मे मूर्ध्नि किरीटमिदमुत्तमम् ।। ७४ ।। ‘वे समुद्रके भीतर दुर्गम स्थानका आश्रय लेकर रहते हैं। उनकी संख्या तीन करोड़ बतायी जाती है और उन सभीके रूप, बल और तेज एक समान हैं। कुन्तीनन्दन! तुम उन दानवोंका संहार कर डालो। इतने से ही तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी हो जायगी।' ऐसा कहकर इन्द्रने मुझे एक अत्यन्त कान्तिमान् दिव्य रथ प्रदान किया, जिसे मातलि जोतकर लाये थे। उसमें मयूरोंके समान रोमवाले घोड़े जुते हुए थे। रथ आ जानेपर देवराजने यह उत्तम किरीट मेरे मस्तकपर बाँध दिया ।। ७२—७४ ।। स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम्। अभेद्यं कवचं चेदं स्पर्शरूपवदुत्तमम् ।। ७५ ।। फिर उन्होंने मेरे स्वरूपके अनुरूप प्रत्येक अंगमें आभूषण पहना दिये। इसके बाद यह अभेद्य उत्तम कवच धारण कराया, जिसका स्पर्श तथा रूप मनोहर है ।। अजरां ज्यामिमां चापि गाण्डीवे समयोजयत्। ततः प्रायामहं तेन स्यन्दनेन विराजता ।। ७६ ।। येनाजयद् देवपतिर्बलिं वैरोचनं पुरा। ततो देवाः सर्व एव तेन घोषेण बोधिताः ।। ७७ ।। मन्वाना देवराजं मां समाजग्मुर्विशाम्पते। दृष्ट्वा च मामपृच्छन्त किं करिष्यसि फाल्गुन ।। ७८ ।। तत्पश्चात् मेरे गाण्डीव धनुषमें उन्होंने यह अटूट प्रत्यञ्चा जोड़ दी। इस प्रकार युद्धकी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर उस तेजस्वी रथके द्वारा मैं संग्रामके लिये प्रस्थित हुआ, जिसपर आरूढ़ होकर पूर्वकालमें देवराजने विरोचनकुमार बलिको परास्त किया था। महाराज! तब उस रथकी घर्घरहाटसे सजग हो सब देवता मुझे देवराज समझकर मेरे पास आये और मुझे देखकर पूछने लगे—'अर्जुन! तुम क्या करनेकी तैयारीमें हो?' ।। ७६—७८ ।।

तानब्रुवं यथाभूतमिदं कर्तास्मि संयुगे । निवातकवचानां तु प्रस्थितं मां वधैषिणम् ॥ ७९ ॥ निबोधत महाभागाः शिवं चाशास्त मेऽनघाः । ततो वाग्भिः प्रशस्ताभिस्त्रिदशाः पृथिवीपते । तुष्टुवुर्मां प्रसन्नास्ते यथा देवं पुरंदरम् ॥ ८० ॥ तब मैंने उनसे सब बातें बताकर कहा—'मैं युद्धमें यही करने जा रहा हूँ। आपको यह ज्ञात होना चाहिये कि मैं निवातकवच नामक दानवोंके वधकी इच्छासे प्रस्थित हुआ हूँ। अतः निष्पाप एवं महाभाग देवताओ! आप मुझे ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा मंगल हो।' राजन्! तब वे देवतालोग प्रसन्न हो देवराज इन्द्रकी भाँति श्रेष्ठ एवं मधुर वाणीद्वारा मेरी स्तुति करते हुए बोले— ॥ ७९-८० ॥ रथेनानेन मघवा जितवान् शम्बरं युधि । नमुचिं बलवृत्रौ च प्रह्लादनरकावपि ॥ ८१ ॥ इस रथके द्वारा इन्द्रने युद्धमें शम्बरासुरपर विजय पायी है। नमुचि, बल, वृत्र, प्रह्लाद और नरकासुरको परास्त किया है ॥ ८१ ॥ बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदान्यपि । रथेनानेन दैत्यानां जितवान् मघवा युधि ॥ ८२ ॥