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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१३२ * मत्स्यपुराण *


छत्तीसावाँ अध्याय

इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शौनक उवाच<br>स्वर्गतस्तु स राजेन्द्रो न्यवसद् देवसद्मनि।<br>पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा॥ १<br>देवलोकाद् ब्रह्मलोकं स चरन् पुण्यकृद् वशी।<br>अवसत् पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः॥ २<br>स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागतः।<br>कथान्ते तत्र शक्रेण पृष्टः स पृथिवीपतिः॥ ३**शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! स्वर्गलोकमें जाकर महाराज ययाति देव-भवनमें निवास करने लगे। वहाँ देवताओं, साध्यगणों, मरुद्गणों तथा वसुओंने उनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। पुण्यात्मा तथा जितेन्द्रिय राजा वहाँ देवलोकसे ब्रह्मलोकतक भ्रमण करते हुए दीर्घकालतक रहे—ऐसी पौराणिक परम्परा है। एक दिन नृपश्रेष्ठ ययाति देवराज इन्द्रके पास आये। वार्तालापके अन्तमें इन्द्रने राजा ययातिसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–३॥
शक्र उवाच<br>यदा स पूरुस्तव रूपेण राज-<br>ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार लोके।<br>तदा राज्यं सम्प्रदायैवमस्मै<br>त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम्॥ ४**इन्द्रने पूछा—**राजन्! जिस समय पूरु आपसे वृद्धावस्था लेकर आपके स्वरूपसे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगा, सत्य कहिये, उस समय राज्य देकर आपने उसको क्या आदेश दिया था?॥ ४॥
ययातिरुवाच<br>प्रकृत्यनुमते पूरुं राज्ये कृत्वेदमब्रुवम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोऽयं विषयस्तव।<br>मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्तेऽधिपास्तव॥ ५<br>अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट-<br>स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः।<br>अमानुषेभ्यो मानुषश्च प्रधानो<br>विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः॥ ६<br>आक्रोशमानो नाक्रोशेन्मन्युमेव तितिक्षति।<br>आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति॥ ७<br>नारंतुदः स्यान्न नृशंसवादी<br>न हीनतः परमभ्याददीत।<br>ययास्य वाचा पर उद्विजेत<br>न तां वदेद् रुशतीं पापलौल्याम्॥ ८**ययातिने कहा—**देवराज! मैंने प्रजाओंकी अनुमतिसे पूरुको राज्याभिषिक्त करके उससे यह कहा था कि 'बेटा! गङ्गा और यमुनाके बीचका यह सारा प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें रहेगा। यह पृथ्वीका मध्य भाग है, इसके तुम राजा होओगे और तुम्हारे भाई सीमान्त देशोंके अधिपति होंगे।' देवेन्द्र! (इसके बाद मैंने यह उपदेश दिया कि मनुष्यको चाहिये कि वह दीनता, शठता और क्रोध न करे। कुटिलता, मात्सर्य और वैर कहीं न करे। माता, पिता, विद्वान्, तपस्वी तथा क्षमाशील पुरुषका बुद्धिमान् मनुष्य कभी अपमान न करे। शक्तिशाली पुरुष सदा क्षमा करता है। शक्तिहीन मनुष्य सदा क्रोध करता है। दुष्ट मानव साधु पुरुषसे और दुर्बल अधिक बलवान्‌से द्वेष करता है। कुरूप मनुष्य रूपवान्‌से, निर्धन धनवान्‌से, अकर्मण्य कर्मनिष्ठसे और अधार्मिक धर्मात्मासे द्वेष करते हैं। इसी प्रकार गुणहीन मनुष्य गुणवान्‌से डाह रखता है। इन्द्र! यह कलिका लक्षण है।) क्रोध करनेवालोंसे वह पुरुष श्रेष्ठ है जो कभी क्रोध नहीं करता। इसी प्रकार असहनशीलसे सहनशील उत्तम है, मनुष्येतर प्राणियोंसे मनुष्य श्रेष्ठ है और मूर्खोंसे विद्वान् उत्तम है। यदि कोई किसीकी निन्दा करता या उसे गाली देता है तो वह भी बदलेमें निन्दा या गाली-गलौज न करे; क्योंकि जो गाली या निन्दा सह लेता है, उस पुरुषका आन्तरिक दुःख ही गाली देनेवाले या अपमान करनेवालेको जला डालता है। साथ ही उसके पुण्यको भी वह ले लेता है। क्रोधवश किसीके मर्म-स्थानमें
* अध्याय ३६ *१३३

| अरंतुदं पुरुषं तीव्रवाचं<br>वाक्कण्टकैर्विंतुदन्तं मनुष्यान्।<br>विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां<br>मुखे निबद्धं निर्ऋतिं वहन्तम्॥ ९<br><br>सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात्<br>सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात्।<br>सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत्<br>सतां वृत्तं पालयन् साधुवृत्तः॥ १०<br><br>वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति<br>यैराहतः शोचति रात्र्यहानि।<br>परस्य वा मर्मसु ते पतन्ति<br>तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु॥ ११<br><br>नास्तीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।<br>यथा मैत्री च लोकेषु दानं च मधुरा च वाक्॥ १२<br><br>तस्मात् सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित्।<br>पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्नाभिशापं कदाचन॥ १३ | चोट न पहुँचाये (ऐसा बर्ताव न करे, जिससे किसीको मार्मिक पीड़ा हो)। किसीके प्रति कठोर बात भी मुँहसे न निकाले, अनुचित उपायसे शत्रुको भी वशमें न करे। जो जीको जलानेवाली हो, जिससे दूसरेको उद्वेग होता हो ऐसी बात मुँहसे न बोले; क्योंकि पापीलोग ही ऐसी बातें बोला करते हैं। जो स्वभावका कठोर हो, दूसरोंके मर्ममें चोट पहुँचाता हो, तीखी बातें बोलता हो और कठोर वचनरूपी काँटोंसे दूसरे मनुष्यको पीड़ा देता हो, उसे अत्यन्त लक्ष्मीहीन (दरिद्र या अभागा) समझे। उसको देखना भी बुरा है; क्योंकि वह कड़वी बोलीके रूपमें अपने मुँहमें बँधी हुई एक पिशाचिनीको ढो रहा है। (अपना बर्ताव और व्यवहार ऐसा रखे, जिससे) साधु पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ-पीछे भी उनके द्वारा अपनी रक्षा हो। दुष्ट लोगोंकी कही हुई अनुचित बातें सदा सह लेनी चाहिये तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके सदाचारका आश्रय लेकर साधु पुरुषोंके व्यवहारको ही अपनाना चाहिये। दुष्ट मनुष्योंके मुखसे कटुवचनरूपी बाण सदा छूटते रहते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है। वे वाग्बाण दूसरोंके मर्मस्थानोंपर ही चोट करते हैं; अतः विद्वान् पुरुष दूसरेके प्रति ऐसी कठोर वाणीका प्रयोग न करे। सभी प्राणियोंके प्रति दया और मैत्रीका बर्ताव, दान और सबके प्रति मधुर वाणीका प्रयोग—तीनों लोकोंमें इनके समान कोई वशीकरण नहीं है। इसलिये कभी कठोर वचन न बोले। सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले। पूजनीय पुरुषोंका पूजन (आदर-सत्कार) करे। दूसरोंको दान दे और स्वयं कभी किसीसे कुछ न माँगे॥ ५—१३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३६॥

४०- ययाति और अष्टकका आश्रमधर्म-सम्बन्धी संवाद

१३४ * मत्स्यपुराण *


सैंतीसवाँ अध्याय

ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना

इन्द्र उवाच<br>सर्वाणि कार्याणि समाप्य राजन्<br>गृहान् परित्यज्य वनं गतोऽसि।<br>तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र<br>केनासि तुल्यस्तपसा ययाते॥ १इन्द्रने कहा—राजन्! आप सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे; अतः नहुषपुत्र ययाते! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप तपस्यामें किसके समान हैं?॥ १॥
ययातिरुवाच<br>नाहं देवमनुष्येषु न गन्धर्वमहर्षिषु।<br>आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव॥ २ययातिने कहा—इन्द्र! मैं न तो देवताओं एवं मनुष्योंमें तथा न गन्धर्वों और महर्षियोंमें ही किसीको ऐसा देख रहा हूँ जो तपस्यामें मेरे समान हो (अर्थात् मैं तपमें अद्वितीय हूँ)॥ २॥
इन्द्र उवाच<br>यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च<br>पापीयसश्चाविदितप्रभावः ।<br>तस्माल्लोका ह्यन्तवन्तस्तवेमे<br>क्षीणे पुण्ये पतितोऽस्यद्य राजन्॥ ३इन्द्र बोले—राजन्! आपने अपने समान, अपने-से बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः आपके इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) आपका पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब आप यहाँसे नीचे गिरेंगे॥ ३॥
ययातिरुवाच<br>सुरर्षिगन्धर्वनरावमानात्<br>क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः।<br>इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनः<br>सतां मध्ये पतितुं देवराज॥ ४ययातिने कहा—देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ॥ ४॥
इन्द्र उवाच<br>सतां सकाशे पतितोऽसि राजं-<br>श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः।<br>एवं विदित्वा तु पुनर्ययाते<br>न तेऽवमान्याः सदृशः श्रेयसे च॥ ५इन्द्र बोले—राजन् ययाति! आप यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके ही समीप गिरेंगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लेंगे; किंतु यह सब जानकर आप फिर (आगे) कभी अपनी बराबरीवाले तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान मत कीजियेगा॥ ५॥
शौनक उवाच<br>ततः पपातामरराजजुष्टात्<br>पुण्याल्लोकात् पतमानं ययातिम्।<br>सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त-<br>मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता॥ ६शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग कर राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ एवं उत्तम धर्मविधिके पालक अष्टकने उन्हें गिरते देखा। (तब) उन्होंने उन (ययाति)-से (इस प्रकार) कहा॥ ६॥
अष्टक उवाच<br>कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः<br>स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः।<br>पतस्युदीर्णाम्बुधरप्रकाशः<br>खे खेचराणां प्रवरो यथार्कः॥ ७अष्टकने पूछा—'इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष आप कौन हैं? आप अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान आप कैसे गिर रहे हैं?
* अध्याय ३८ *१३५
दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं<br>वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम्।<br>किं नु स्विदेतत् पततीव सर्वे<br>वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः॥ ८<br>दृष्ट्वा च त्वाधिष्ठितं देवमार्गे<br>शक्रार्कविष्णुप्रतिप्रभावम् ।<br>प्रत्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे<br>तस्मात् पाते तव जिज्ञासमानाः॥ ९<br>न चापि त्वां धृष्णवः प्रष्टुमग्रे<br>न चत्वमस्मान् पृच्छसि के वयं स्म।<br>तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप<br>कस्य त्वं वा किं निमित्तं त्वमागाः॥ १०<br>भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ<br>त्यजाशु देवेन्द्रसमानरूप।<br>त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे<br>शक्रो न सोढुं बलहापि शक्तः॥ ११<br>सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां<br>सतां सदैवामरराजकल्प।<br>ते सङ्गताः स्थावरजङ्गमेशाः<br>प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु॥ १२<br>प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः।<br>प्रभुः सूर्यः प्रकाशाच्च सतां चाभ्यागतः प्रभुः॥ १३आपका तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। आप अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हैं। आपको सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित (आश्चर्यचकित) होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि यह क्या गिर रहा है ? आप इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हैं। आपको आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये आपके निकट आये हैं कि आपके पतनका यथार्थ कारण क्या है। हम पहले आपसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और आप भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते कि हम कौन हैं। इसलिये मैं ही आपसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवाले महापुरुष! आप किसके पुत्र हैं और किसलिये यहाँ आये हैं? इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! आपका भय दूर हो जाना चाहिये। अब आपको (स्वर्गसे गिरनेका) विषाद और मोह भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय आप संतोंके समीप विद्यमान हैं। बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब आपका तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं। देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वञ्चित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जङ्गम—सभी प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। आप अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हैं। जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, उसी प्रकार संतोंका स्वामित्व—उनपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिको ही प्राप्त है'॥ ७—१३॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते ययातिपतनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३७॥


अड़तीसवाँ अध्याय

ययाति और अष्टकका संवाद

ययातिरुवाच<br>अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रः<br>पूरोः पिता सर्वभूतावमानात्।<br>प्रभ्रंशितोऽहं सुरसिद्धलोकात्<br>परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः॥ १**ययातिने कहा—**महात्मन्! मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता ययाति हूँ। समस्त प्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो गया है। इस कारण मैं देवताओं तथा सिद्धोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ।

४१- अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना

१३६ * मत्स्यपुराण *


अहं हि पूर्वो वयसा भवद्ध्य-<br>स्तेनाभिवादं भवतां न युञ्जे।<br>यो विद्यया तपसा जन्मना वा<br>वृद्धः स वै सम्भवति द्विजानाम्॥ २मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है वही पूजनीय माना जाता है॥ १-२॥
अष्टक उवाच<br>अवादीस्त्वं वयसास्मि वृद्ध<br>इति वै राजन्नधिकः कथंचित्।<br>यो वै विद्वांस्तपसा च वृद्धः<br>स एव पूज्यो भवति द्विजानाम्॥ ३**अष्टक बोले—**राजन्! आपने जो यह कहा है कि मैं अवस्थामें बड़ा हूँ, इसलिये ज्येष्ठ हूँ, सो इसमें आप कुछ अधिक कह गये; क्योंकि द्विजोंमें जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा होता है, वही पूज्य माना जाता है॥ ३॥
ययातिरुवाच<br>प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-<br>स्तद्दर्त्तिनां प्रवणं पापलोकम्।<br>सन्तोऽसतो नानुवर्तन्त ते वै<br>यदात्मनैषां प्रतिकूलवादी॥ ४**ययातिने कहा—**पापको पुण्यकर्मोंका नाशक बताया जाता है। वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है। श्रेष्ठ पुरुष दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका अनुसरण नहीं करते। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे।
अभूद् धनं मे विपुलं महत् वै<br>विचेष्टमानोऽधिगन्ता तदस्मि।<br>एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो<br>यो वर्तते स विजानाति धीरः॥ ५मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था, किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। मेरी इस दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और धीर है।
नानाभावा बहवो जीवलोके<br>दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः।<br>तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो<br>दिष्टं बलीय इति मत्वात्मबुद्ध्या॥ ६इस जीव-जगत्‌में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे
सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं<br>दैवाधीनं विन्दति नात्मशक्त्या।<br>तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ७'प्रारब्ध ही बलवान् है'—यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको न प्राप्त हो। जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह उसे प्रारब्ध (भाग्य)-से ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं; अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे।
दुःखे न तप्येत सुखे न हृष्येत्<br>समेन वर्तेत सदैव धीरः।<br>दिष्टं बलीय इति मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ८दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो।
भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित्<br>संतापे मे मानसो नास्ति कश्चित्।<br>धाता यथा मां विदधाति लोके<br>ध्रुवं तदाहं भवितेति मत्वा॥ ९अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा वैसे ही रहूँगा।
संस्वेदजा ह्याण्डजा ह्युद्भिदश्च<br>सरीसृपाः कृमयोऽप्यप्सु मत्स्याः।<br>तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वं<br>दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते॥ १०स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ—ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं।
* अध्याय ३८ *१३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा<br>कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम्।<br>किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये<br>तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः॥ ११अष्टक! मैं सुख तथा दुःख—दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतस न होऊँ—इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ, अतः सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ॥ ४–११॥
शौनक उवाच<br>एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-<br>मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत्।<br>मातामहं सर्वगुणोपपन्नं<br>यत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत्॥ १२शौनकजी कहते हैं—शतानीक! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, जैसे मानो स्वर्गलोकमें हों। जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया॥ १२॥
अष्टक उवाच<br>ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्रे प्रधाना-<br>स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथा च।<br>तन्मे राजन् ब्रूहि सर्वं यथावत्<br>क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मम्॥ १३अष्टकने कहा—महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक वहाँके सुखोंका भली-भाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये। राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं॥ १३॥
ययातिरुवाच<br>राजाहमासं त्विह सार्वभौम-<br>स्ततो लोकान् महतश्चार्जयं वै।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १४ययातिने कहा—अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोंद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोतक (सुखपूर्वक) निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा।
ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां<br>सहस्रद्वारां शतयोजनान्ताम्।<br>अध्यावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १५वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया।
ततो दिव्यमजरं प्राप्य लोकं<br>प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् ।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १६तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्यलोकमें जा पहुँचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया।
देवस्य देवस्य निवेशने च<br>विजित्य लोकान् न्यवसं यथेष्टम्।<br>सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-<br>स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम्॥ १७वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था।
तथावसं नन्दने कामरूपी<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>सहाप्सरोभिर्विचरन् पुण्यगन्धान्<br>पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान्॥ १८इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे।

४२- राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना

१३८* मत्स्यपुराण *
तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं<br>कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम्।<br>दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो<br>ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण॥ १९<br>एतावन्मे विदितं राजसिंह<br>ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः।<br>वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणा-<br>मनुक्रोशाच्छोचतां मां नरेन्द्र॥ २०<br>अकस्माद् वै क्षीणपुण्यो ययातिः<br>पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः।<br>तानब्रुवं पतमानस्तदाहं<br>सतां मध्ये निपतेयं कथं नु॥ २१<br>तैराख्यातं भवतां यज्ञभूमिं<br>समीक्ष्य चैनामहमागतोऽस्मि।<br>हविर्गन्धैर्दर्शितां यज्ञभूमिं<br>धूमापाङ्गं परिगृह्य प्रतीताम्॥ २२वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला—‘गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ।’ राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा। नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी—‘अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं!’ तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा—‘देवताओ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है?’ तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूप्रप्रान्तका अवलोकन कर मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है॥ १४—२२॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरितेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३८॥


उन्तालीसवाँ अध्याय

अष्टक और ययातिका संवाद

अष्टक उवाच<br>यदा वसन् नन्दने कामरूपे<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>किं कारणं कार्तयुगप्रधानं<br>हित्वा तद् वै वसुधामन्वपद्यः॥ १<br>ययातिरुवाच<br>ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो यो यथेह<br>क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि।<br>तथा स्वर्गे क्षीणपुण्यं मनुष्यं<br>त्यजन्ति सद्यः खचरा देवसंघाः॥ २<br>अष्टक उवाच<br>कथं तस्मिन् क्षीणपुण्या भवन्ति<br>सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम्।<br>किं विशिष्ठाः कस्य धामोपयान्ति<br>तद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे॥ ३अष्टकने पूछा— सत्ययुगके निष्पाप राजाओंमें प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसार रूप धारण करके दस लाख वर्षोंतक नन्दनवनमें निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है कि आप उसे छोड़कर भूतलपर चले आये?॥ १॥<br>ययाति बोले— जैसे इस लोकमें जाति-भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो, धन नष्ट हो जानेपर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं, उसी प्रकार स्वर्गलोकमें जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है, उस मनुष्यको देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देते हैं॥ २॥<br>अष्टकने पूछा— देवलोकमें मनुष्योंके पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है। प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट (अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले) पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे ज्ञानी जान पड़ते हैं॥ ३॥

* अध्याय ३९ * <span style="float: right;">१३९</span>


| ययातिरुवाच<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>लालप्यमाना नरदेव सर्वे।<br>ते कङ्कगोमायुपलाशनाथं<br>क्षितौ विवृद्धिं बहुधा प्रयान्ति॥ ४<br>तस्मादेवं वर्जनीयं नरेन्द्र<br>दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म।<br>आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेतद्<br>भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि॥ ५ | **ययाति बोले—**नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्यकर्मोंका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं। इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया; बोलो, अब तुम्हें क्या बताऊँ॥ ४-५॥ | | अष्टक उवाच<br>यदा तु तांस्ते वितुदन्ते वयांसि<br>तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>त्वत्तो भौमं नरकमहं शृणोमि॥ ६ | **अष्टकने पूछा—**जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, मयूर और पतङ्ग—ये नोच-नोचकर खा लेते हैं तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? आज मैं आपके ही मुखसे (प्रथम बार) भौम नरकका (जिसे कभी नहीं सुना था) नाम सुन रहा हूँ॥ ६॥ | | ययातिरुवाच<br>ऊर्ध्वं देहात् कर्मणो जृम्भमाणाद्<br>व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति।<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान्॥ ७<br>षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि<br>तथाशीतिं चैव तु वत्सराणाम्।<br>तान् वै तुदन्ते प्रपतन्तः प्रयातान्<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः॥ ८ | **ययाति बोले—**कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते। कितने ही प्राणी स्वर्गादि लोकोंमें साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजार वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं। यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंको तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस (दुष्ट प्राणी) अत्यन्त पीड़ा देते हैं॥ ७-८॥ | | अष्टक उवाच<br>यदेतांस्ते सम्पतन्तस्तुदन्ति<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>कथंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ९ | **अष्टकने पूछा—**तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरते हुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसे युक्त होते हैं? और गर्भमें कैसे आते हैं?॥ ९॥ | | ययातिरुवाच<br>असृग्रेतःपुष्परसानुयुक्त-<br>मन्वेति सद्यः पुरुषेण सृष्टम्।<br>तद्वै तस्या रज आपद्यते च<br>स गर्भभूतः समुपैति तत्र॥ १०<br>वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति<br>अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम्।<br>चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्वं<br>एवंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ११ | **ययाति बोले—**अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी असृक् (रक्त) होता है। फिर वही क्रमशः नूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है। (फिर) वह पुष्पके रससे संयुक्त होकर कर्मानुरूप योनिका अनुसरण करता है। गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्ग होनेपर वीर्यमें आविष्ट हुआ वह जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है। तदनन्तर वही गर्भरूपमें परिणत हो जाता है। जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश करते हैं तथा जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इस प्रकार वे भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं॥ १०-११॥ |

१४०* मत्स्यपुराण *

| अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमें आता है या दूसरा शरीर धारण करता है? आप यह रहस्य मुझे बताइये। मैं संशय होनेके कारण पूछता हूँ। गर्भमें आनेपर वह भिन्न-भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंको तथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछनेपर ये सब बातें आप बताइये। तात! हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) मानते हैं॥ १२-१३॥ | | अन्यद्वपुर्विदधातीह गर्भे<br>उताहोस्वित् स्वेन कामेन याति।<br>आपद्यमानो नरयोनिमेता-<br>माचक्ष्व मे संशयात् पृच्छतस्त्वम्॥ १२<br>शरीरदेहादिसमुच्छ्रयं च<br>चक्षुः श्रोत्रे लभते केन संज्ञाम्।<br>एतत् सर्वं तात आचक्ष्व पृष्टः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां मन्यमाना हि सर्वे॥ १३ | | | ययातिरुवाच | ययाति बोले— ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लेता है और वह वहाँ उसपर अधिकार जमाकर क्रमशः गर्भकी वृद्धि करता रहता है। वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न हो जाता है तब चेतनाका आश्रय ले योनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूप देखता है, नासिकासे गन्ध लेता है, जिह्वासे रसका आस्वादन करता है, त्वचासे स्पर्श और मनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महान् आत्मबलसे सम्पन्न प्राणधारियोंके शरीरमें जीवकी स्थापना होती है॥ १४—१६॥ | | वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि-<br>मृतौ रेतः पुष्परसानुयुक्तम्।<br>स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः<br>क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम्॥ १४<br>स जायमानोऽथ गृहीतगात्रः<br>संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः।<br>स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं<br>स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च॥ १५<br>घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च<br>त्वचा स्पर्शं मनसा देवभावम्।<br>इत्यष्टकेहोपचितं हि विद्धि<br>महात्मनः प्राणभृतः शरीरे॥ १६ | | | अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जलमें बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाता है। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है?॥ १७॥ | | यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा<br>निखन्यते वापि निकृष्यते वा।<br>अभावभूतः स विनाशमेत्य<br>केनात्मानं चेतयते पुरस्तात्॥ १७ | | | ययातिरुवाच | ययाति बोले— राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर उसी पुण्य-पापके अनुसार अन्य योनिको प्राप्त होता है। पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य-योनिमें और पाप करनेवाले मनुष्य पाप-योनिमें जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतङ्ग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब विषयोंको विस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती। | | हित्वा सोऽसून सुम्वन्निष्ठितत्वात्<br>पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं च।<br>अन्यां योनिं पुण्यपापानुसारां<br>हित्वा देहं भजते राजसिंह॥ १८<br>पुण्यां योनिं पुण्यकृतो विशन्ति<br>पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति।<br>कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा-<br>न्र मे विवक्षास्ति महानुभाव॥ १९ | |

* अध्याय ३९ * १४१


चतुष्पदा द्विपदाः पक्षिणश्च<br>तथाभूता गर्भभूता भवन्ति।<br>आख्यातमेतन्निखिलं हि सर्वं<br>भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह॥ २०॥नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चार पैरवाले (चतुष्पाद), दो पैरवाले मनुष्यादि और पक्षियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं। यह सब मैंने पूरा-पूरा बतला दिया। अब और क्या पूछना चाहते हो?॥ १८–२०॥
अष्टक उवाच<br>किंस्वित् कृत्वा लभते तात संज्ञां<br>मर्त्यः श्रेष्ठां तपसा विद्यया वा।<br>तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव-<br>च्छुभॉल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण॥ २१॥अष्टकने पूछा— तात! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम यश प्राप्त करता है? वह यश तपसे प्राप्त होता है या विद्यासे? मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्मके द्वारा क्रमशः श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थ-रूपसे बताइये॥ २१॥
ययातिरुवाच<br>तपश्च दानं च शमो दमश्च<br>ह्रीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा।<br>स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो<br>द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम्॥ २२॥<br>सर्वाणि चैतानि यथोदितानि<br>तपः प्रधानान्यभिमर्षकेण ।<br>नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः<br>पुंसः सदैवति वदन्ति सन्तः॥ २३॥<br>अधीयानः पण्डितम्मन्यमानो<br>यो विद्यया हन्ति यशः परस्य।<br>तस्यान्तवन्तः पुरुषस्य लोका<br>न चास्य तद् ब्रह्मफलं ददाति॥ २४॥<br>चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि<br>भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि।<br>पानाग्निहोत्रमुत मानमौनं<br>मानेनाधीतमुत मानयज्ञः॥ २५॥<br>न मान्यमानो मुदमाददीत<br>न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात्।<br>सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके<br>नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते॥ २६॥<br>इति दद्यादिति यजेदित्यधीयीत मे श्रुतम्।<br>इत्येतान्यभयान्याहुस्तान्यवर्ज्यानि नित्यशः॥ २७॥<br>ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं<br>मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम्।<br>तन्निःश्रेयस्तेन संयोगमेत्य<br>परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह॥ २८॥ययाति बोले— राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हैं। उनके नाम ये हैं—तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसे आच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है। जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरोंके यशका नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् (विनाशशील) होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता। अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ—ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं; परंतु वे ही ठीकसे न किये जायँ, दूषित भावसे अनुष्ठित हों तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं। विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो, अपमानित होनेपर संतस न हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषोंको 'यह सत्पुरुष है' ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती। ऐसा दान देना चाहिये, इस प्रकार यजन करना चाहिये, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहना चाहिये—ये सभी वचन अभयदायक हैं, अतः नित्य पालनीय हैं—ऐसा मैंने सुना है। जो सबका आश्रय है, पुराण (कूटस्थ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है, वह (परब्रह्म परमात्मा) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं वे उस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होते हैं॥ २२–२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३९॥

४३- ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा

१४२ * मत्स्यपुराण *


चालीसवाँ अध्याय

ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टक उवाच<br>चरन् गृहस्थः कथमेति देवान्<br>कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा।<br>वानप्रस्थः सत्पथे सन्निविष्टो<br>बहून्यस्मिन् सम्प्रति वेदयन्ति॥ १अष्टकने पूछा— महाराज! वेदज्ञ विद्वान् इस धर्मके अन्तर्गत बहुत-से कर्मोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका द्वार बताते हैं, अतः मैं आपसे पूछता हूँ कि आचार्यकी सेवा करनेवाला ब्रह्मचारी, गृहस्थ, सन्मार्गमें स्थित वानप्रस्थ और संन्यासी किस प्रकार धर्माचरण करके उत्तम लोकमें जाते हैं?॥ १॥
ययातिरुवाच<br>आहूताध्यायी गुरुकर्मसु चोद्यतः<br>पूर्वोत्थायी चरमं चाथ शायी।<br>मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः<br>स्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी॥ २<br><br>धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत<br>दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च।<br>अनाददानश्च परैरदत्तं<br>सैषा गृहस्थोपनिषत् पुराणी॥ ३<br><br>स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो<br>दाता परेभ्यो न परोपतापी।<br>तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां<br>वसन्मरण्ये नियताहारचेष्टः॥ ४<br><br>अशिल्पजीवी विगृहश्च नित्यं<br>जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रमुक्तः।<br>अनोकशायी लघु लिप्समान-<br>श्चरन् देशानेकाम्बरः स भिक्षुः॥ ५<br><br>रात्र्या यया चाभिरताश्च लोका<br>भवन्ति कामाभिजिताः सुखेन च।<br>तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा-<br>नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा॥ ६<br><br>दशैव पूर्वान् दशचापरांस्तु<br>ज्ञातींस्तथात्मानमथैकविंशम्।<br>अरण्यवासी सुकृतं दधाति<br>मुक्त्वा त्वरण्ये स्वशरीरधातून्॥ ७ययाति बोले— शिष्यको उचित है कि गुरुके बुलानेपर उसके समीप जाकर पढ़े, गुरुकी सेवामें बिना कहे लगा रहे, रातमें गुरुजीके सो जानेके बाद सोवे और सबेरे उनसे पहले ही उठ जाय। वह मृदुल (विनम्र), जितेन्द्रिय, धैर्यवान्, सावधान और स्वाध्यायशील हो। इस नियमसे रहनेवाला ब्रह्मचारी सिद्धिको पाता है। गृहस्थ पुरुष न्यायसे प्राप्त हुए धनको पाकर उससे यज्ञ करे, दान दे और सदा अतिथियोंको भोजन करावे। दूसरोंकी वस्तु उनके दिये बिना ग्रहण न करे। यह गृहस्थधर्मका प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है। वानप्रस्थ मुनि वनमें निवास करे। आहार और विहारको नियमित रखे। अपने ही पराक्रम एवं परिश्रमसे जीवन-निर्वाह करे, पापसे दूर रहे। दूसरोंको दान दे और किसीको कष्ट न पहुँचाये। ऐसा मुनि परम मोक्ष (सिद्धि)-को प्राप्त होता है। संन्यासी शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह न करे। वह शम, दम आदि श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो, सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखे, सबसे अलग रहे, गृहस्थके घरमें न सोये, परिग्रहका भार न लेकर अपनेको हलका रखे, थोड़ा-थोड़ा चले और अकेला ही अनेक स्थानोंमें भ्रमण करता रहे। ऐसा संन्यासी ही वास्तवमें भिक्षु कहलाने योग्य है। जिस समय रूप, रस आदि विषय तुच्छ प्रतीत होने लगें, इच्छानुसार जीत लिये जायँ तथा उनके परित्यागमें ही सुख जान पड़े, उसी समय विद्वान् पुरुष मनको वशमें करके समस्त संग्रहोंका त्याग कर वनवासी होनेका प्रयत्न करे। जो वनवासी मुनि वनमें ही अपने पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग करता है, वह दस पीढ़ी पूर्वके और दस पीढ़ी बादके जाति-भाइयोंको तथा इक्कीसवें अपनेको भी पुण्यलोकोंमें पहुँचा देता है॥ २—७॥
* अध्याय ४० *१४३

| अष्टक उवाच<br>कतिस्विद् देव मुनयो मौनानि कति चाप्युत।<br>भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥ ८<br><br>ययातिरुवाच<br>अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः।<br>ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप॥ ९<br><br>अष्टक उवाच<br>कथंस्विद् वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः।<br>ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः॥ १०<br><br>ययातिरुवाच<br>न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत्।<br>तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः॥ ११<br><br>अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः।<br>कौपीनाच्छादनं यावत् तावदिच्छेच्च चीवरम्॥ १२<br><br>यावत् प्राणाभिसंधानं तावदिच्छेच्च भोजनम्।<br>तदास्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः॥ १३<br><br>यस्तु कामान् परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः।<br>आतिष्ठेत मुनिर्मौनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात्॥ १४<br><br>धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलङ्कृतम्।<br>असितं सितकर्मस्थं कस्तं नार्चितुमर्हति॥ १५<br><br>तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः।<br>यदा भवति निर्द्वन्द्वो मुनिर्मौनं समास्थितः॥ १६<br><br>अथ लोकमिमं जित्वा लोकं चापि जयेत् परम्।<br>आस्येन तु यथाहारं गोवन्मृगयते मुनिः।<br>अथास्य लोकः सर्वो यः सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १७ | **अष्टकने पूछा—**राजन्! मुनि कितने हैं? और मौन कितने प्रकारके हैं! यह बताइये, हम इसे सुनना चाहते हैं॥ ८॥<br><br>**ययातिने कहा—**जनेश्वर! अरण्यमें निवास करते समय जिसके लिये ग्राम पीछे होता है और ग्राममें वास करते समय जिसके लिये अरण्य पीछे होता है, वह मुनि कहलाता है॥ ९॥<br><br>**अष्टकने पूछा—**अरण्यवासीके लिये ग्राम और ग्राममें निवास करनेवालेके लिये अरण्य पीछे कैसे है?॥ १०॥<br><br>**ययातिने कहा—**जो मुनि वनमें निवास करता है और गाँवोंमें प्राप्त होनेवाली वस्तुओंका उपयोग नहीं करता, इस प्रकार वनमें निवास करनेवाले उस (वानप्रस्थ) मुनिके लिये गाँव पीछे समझा जाता है। जो अग्नि और गृहको त्याग चुका है, जिसका गोत्र और चरण (वेदकी शाखा एवं जाति)-से भी सम्बन्ध नहीं रह गया है, जो मौन रहता और उतने ही वस्त्रकी इच्छा रखता है, जितनेसे लँगोटी और ओढ़नेका काम चल जाय; इसी प्रकार जितनेसे प्राणोंकी रक्षा हो सके उतना ही भोजन चाहता है, इस नियमसे गाँवमें निवास करनेवाले उस (संन्यासी) मुनिके लिये अरण्य पीछे समझा जाता है। जो मुनि सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़कर कर्मोंको त्याग चुका है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक सदा मौनमें स्थित है, ऐसा संन्यासी लोकमें परम सिद्धिको प्राप्त होता है। जिसके दाँत शुद्ध और साफ हैं, जिसके नख (और केश) कटे हुए हैं, जो सदा स्नान करता है तथा यम-नियमादिसे अलंकृत (उन्हें धारण किये हुए) है, शीतोष्णको सहनेसे जिसका शरीर श्याम पड़ गया है, जिसके आचरण उत्तम हैं—ऐसा संन्यासी किसके लिये पूजनीय नहीं है। तपस्यासे मांस, हड्डी तथा रक्तके क्षीण हो जानेपर जिसका शरीर कृश और दुर्बल हो गया है तथा जो सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित एवं भलीभाँति मौनावलम्बी हो चुका है, वह इस लोकको जीतकर परलोकपर भी विजय पाता है। जब संन्यासी मुनि गाय-बैलोंकी तरह मुखसे ही आहार ग्रहण करता है, हाथ आदिका भी सहारा नहीं लेता, तब उसके द्वारा ये सब लोक जीत लिये गये समझे जाते हैं और वह मोक्षकी प्राप्तिके लिये समर्थ समझा जाता है॥ ११—१७॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशवर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४०॥

१४४* मत्स्यपुराण *

एकतालीसवाँ अध्याय

अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टक उवाच<br>कतरस्त्वेतयोः पूर्वं देवानामेति सात्म्यताम्।<br>उभयोर्धावतो राजन् सूर्याचन्द्रमशोरिव॥ १अष्टकने पूछा— राजन्! सूर्य और चन्द्रमाकी तरह अपने-अपने लक्ष्यकी ओर दौड़ते हुए वानप्रस्थ और संन्यासी—इन दोनोंमेंसे पहले कौन-सा देवताओंके आत्मभाव (ब्रह्म)-को प्राप्त होता है?॥ १॥
ययातिरुवाच<br>अनिकेतगृहस्थेषु कामवृत्तेषु संयतः।<br>ग्राम एव चरन् भिक्षुस्तयोः पूर्वतरं गतः॥ २<br>अप्राप्यं दीर्घमायुस्तु यः प्राप्तो विकृतिं चरेत्।<br>तप्येत यदि तत् कृत्वा चरेत् सोग्रं तपस्ततः॥ ३<br>यद् वै नृशंसं तदपथ्यमाहु-<br>र्यः सेवते धर्ममनर्थबुद्धिः।<br>असावनीशः स तथैव राजं-<br>स्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम्॥ ४ययाति बोले— कामवृत्तिवाले गृहस्थोंके बीच ग्राममें ही वास करते हुए भी जो जितेन्द्रिय और गृहरहित संन्यासी है, वही उन दोनों प्रकारके मुनियोंमें पहले ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। जो वानप्रस्थ दुर्लभ दीर्घायुको पाकर भी विषयोंके प्राप्त होनेपर उनसे विकृत हो उन्हींमें विचरने लगता है, उसे यदि विषयोपभोगके अनन्तर पश्चात्ताप होता है तो उसे मोक्षके लिये पुनः तपका अनुष्ठान करना चाहिये। राजन्! जो पापबुद्धिवाला मनुष्य अधर्मका आचरण करता है, उसका वह आचरण नृशंस (पापमय) और असत्य कहा गया है (एवं उस अजितेन्द्रियका धन भी वैसा ही पापमय और असत्य है); परंतु वानप्रस्थ मुनिका जो धर्मपालन है, वही सरलता है, वही समाधि है और वही श्रेष्ठ आचरण है॥ २—४॥
अष्टक उवाच<br>केनाद्य त्वं तु प्रहितोऽसि राजन्<br>युवा स्रग्वी दर्शनीयः सुवर्चाः।<br>कुत आगतः कतमस्यां दिशि त्व-<br>मुताहोस्वित् पार्थिवं स्थानमस्ति॥ ५अष्टकने पूछा— राजन्! आपको यहाँ किसने भेजा है? आप अवस्थामें तरुण, फूलोंकी मालासे सुशोभित, दर्शनीय तथा उत्तम तेजसे उद्भासित जान पड़ते हैं। आप कहाँसे आये हैं? अथवा क्या आपके लिये इस पृथ्वीपर ही किसी दिशामें कोई उत्तम वासस्थान है?॥ ५॥
ययातिरुवाच<br>इमं भौमं नरकं क्षीणपुण्यः<br>प्रवेष्टुमुर्वी गगनाद् विप्रहीणः।<br>उक्तवाहं वः प्रपतिष्याम्यनन्तरं<br>त्वरन्वमी ब्रह्मणो लोकपा ये॥ ६<br>सतां सकाशे तु वृतः प्रपात-<br>स्ते सङ्गता गुणवन्तस्तु सर्वे।<br>शक्राच्च लब्धो हि वरो मयैष<br>पतिष्यता भूमितलं नरेन्द्र॥ ७ययातिने कहा— मैं अपने पुण्यका क्षय होनेसे भौमनरकमें प्रवेश करनेके लिये आकाशसे गिर रहा हूँ। ये जो ब्रह्माजीके लोकपाल हैं, वे मुझे गिरनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं। अतः (अब) आपलोगोंसे पूछकर—विदा लेकर इस पृथ्वीपर गिरूँगा। नरेन्द्र! मैं जब इस पृथ्वीतलपर गिरनेवाला था, उस समय मैंने इन्द्रसे यह वर माँगा था कि मैं साधु पुरुषोंके समीप गिरूँ। वह वर मुझे मिला, जिसके कारण आप सब सद्गुणी संतोंका सङ्ग प्राप्त हुआ॥ ६-७॥
अष्टक उवाच<br>पृच्छामि त्वां प्रपतन्तं प्रपातं<br>यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ ८अष्टक बोले— महाराज! मेरा विश्वास है कि आप पारलौकिक धर्मके ज्ञाता हैं। मैं नीचे गिरनेवाले आपसे एक बात पूछता हूँ—'क्या अन्तरिक्ष या स्वर्गलोकमें मुझे प्राप्त होनेवाले कोई पुण्यलोक भी हैं?'॥ ८॥
* अध्याय ४१ *१४५

| ययातिरुवाच<br>यावत् पृथिव्यां विहितं गवाश्वं<br>सहारण्यैः पशुभिः पक्षिभिश्च।<br>तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै<br>तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह॥ ९ | **ययातिने कहा—**नरेन्द्रसिंह! इस पृथ्वीपर जंगली पशुओं और पक्षियोंके साथ जितने गाय, घोड़े आदि पशु रहते हैं, स्वर्गमें तुम्हारे लिये उतने ही लोक विद्यमान हैं। तुम इसे निश्चय जानो॥ ९॥ | | अष्टक उवाच<br>तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं<br>ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-<br>स्तानाक्रम क्षिप्रममित्रहासि॥ १० | **अष्टक बोले—**राजेन्द्र! स्वर्गमें मेरे लिये जो लोक विद्यमान हैं, उन्हें मैं आपको देता हूँ, परंतु आपका पतन न हो। अन्तरिक्ष या द्युलोकमें मेरे लिये जो स्थान हैं, उनमें आप शीघ्र ही चले जायें; क्योंकि आप शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं॥ १०॥ | | ययातिरुवाच<br>नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च<br>प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य।<br>यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य-<br>स्तथा ददे पूर्वमहं नरेन्द्र॥ ११<br>नाब्राह्मणः कृपणे जातु जीवेद्<br>याच्ञापि स्याद् ब्राह्मणी वीरपत्नी।<br>सोऽहं यदेवाकृतपूर्व चरेयं<br>विधित्समानः किमु तत्र साधुः॥ १२ | **ययातिने कहा—**नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण ही प्रतिग्रह लेता है, मेरे-जैसा क्षत्रिय कदापि नहीं। नरेन्द्र! जैसे दान करना चाहिये, उस विधिसे मैंने पहले भी सदा उत्तम ब्राह्मणोंको बहुत दान दिये हैं। जो ब्राह्मण नहीं है, उसे दीन याचक बनकर कभी जीवन नहीं बिताना चाहिये। याचना तो विद्यासे दिग्विजय करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी पत्नी है अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ही याचना करनेका अधिकार है। मुझे सत्कर्म करनेकी इच्छा है, अतः ऐसा कोई अकार्य कैसे कर सकता हूँ, जो पहले कभी न किया हो॥ ११-१२॥ | | प्रतर्दन उवाच<br>पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप<br>प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ १३ | **प्रतर्दन बोले—**वाञ्छनीय रूपवाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ, यदि अन्तरिक्ष अथवा स्वर्गमें मेरे भी लोक हों तो बताइये। मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १३॥ | | ययातिरुवाच<br>सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र<br>अप्येकैकं सप्त समान्यहानि।<br>मधुच्युतो घृतवन्तो विशोका-<br>स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति॥ १४ | **ययातिने कहा—**नरेन्द्र! तुम्हारे तो बहुत लोक हैं, यदि एक-एक लोकमें सात-सात दिन रहा जाय तो भी उनका अन्त नहीं है। वे सब-के-सब अमृतके झरने बहाते हैं एवं घृत (तेज)-से युक्त हैं। उनमें शोकका सर्वथा अभाव है। वे सभी लोक तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ १४॥ | | प्रतर्दन उवाच<br>तांस्ते ददामि पतमानस्य राजन्<br>ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-<br>स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः॥ १५ | **प्रतर्दन बोले—**महाराज! वे सभी लोक मैं आपको देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो मेरे लोक हैं, वे सब आपके हो जायें। वे अन्तरिक्षमें हों या स्वर्गमें, आप शीघ्र मोहरहित होकर उनमें चले जाइये॥ १५॥ | | ययातिरुवाच<br>न तुल्यतेजाः सुकृतं हि कामये<br>योगक्षेमं पार्थिवात् पार्थिवः सन्।<br>दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां-<br>श्रेयन्नृशंसं हि न जातु राजा॥ १६ | **ययातिने कहा—**राजन्! मैं स्वयं एक तेजस्वी राजा होकर दूसरेसे पुण्य तथा योग-क्षेमकी इच्छा नहीं करता। विद्वान् राजा दैववश भारी आपत्तिमें पड़ जानेपर भी कोई पापमय कार्य न करे। |

४४- कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन

१४६* मत्स्यपुराण *

| धर्म्यं मार्गं चिन्तयानो यशस्यं<br>कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः।<br>न मद्धिधो धर्मबुद्धिर्हि राजा<br>ह्येवं कुर्यात् कृपणं मां यथात्थ ॥ १७<br>कुर्यामपूर्वं न कृतं यदन्यै-<br>र्विधित्समानः किमु तत्र साधुः।<br>ब्रुवाणमेवं नृपतिं ययातिं<br>नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत्तम् ॥ १८ | धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रयत्नपूर्वक धर्म और यशके मार्गपर ही चले। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हो, उस मेरे-जैसे मनुष्यको जान-बूझकर ऐसा दीनतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिये जिसके लिये तुम मुझसे कह रहे हो। जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्य राजाओंने नहीं किया हो। (तदनन्तर) इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसे नृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ॥ १६—१८ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥


बयालीसवाँ अध्याय

राजा ययातिके वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना

वसुमानुवाच<br>पृच्छाम्यहं वसुमानौषदश्वि-<br>र्यद्यस्ति लोको दिवि मह्यं नरेन्द्र।<br>यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १वसुमान्ने कहा— नरेन्द्र! मैं उषदश्वका पुत्र हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदि स्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन्! मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १ ॥
ययातिरुवाच<br>यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च<br>यत्तेजसा तपते भानुमांश्च।<br>लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै<br>ते त्वां भवन्तं प्रतिपालयन्ति ॥ २ययातिने कहा— राजन्! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं, उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ २ ॥
वसुमानुवाच<br>तांस्ते ददामि पत मा प्रपातं<br>ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु।<br>क्रीणीष्वैनांस्तृणकेनापि राजन्<br>प्रतिग्रहस्ते यदि सम्यक् प्रदुष्टः ॥ ३वसुमान् बोले— राजन्! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, वे सब आपके हो जायँ। धीमन्! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोष दिखायी देता हो तो एक मुट्ठा तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंको आप खरीद लें ॥ ३ ॥
ययातिरुवाच<br>न मिथ्याहं विक्रियं वै स्मरामि<br>मया कृतं शिशुभावेऽपि राजन्।<br>कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै-<br>र्विधित्समानो वसुमन् न साधु ॥ ४ययातिने कहा— राजन्! मैंने बचपनमें भी कभी इस प्रकार झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया, वह कार्य मैं भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि मैं सत्कर्म करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
* अध्याय ४२ *१४७
वसुमानुवाच<br>तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्<br>मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते।<br>नाहं तान् वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र<br>सर्वे लोकास्तावका वै भवन्तु॥ ५वसुमान् बोले— राजन्! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र! निश्चय जानिये कि मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें॥ ५॥
शिबिरुवाच<br>पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहं<br>ममापि लोका यदि सन्ति तात।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ ६शिबिने कहा— तात! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष या स्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानता हूँ॥ ६॥
ययातिरुवाच<br>न त्वं वाचा हृदयेनापि राजन्<br>परीप्समानो मावमंस्था नरेन्द्र।<br>तेनानन्ता दिवि लोकाः स्थिता वै<br>विद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः॥ ७ययाति बोले— नरेन्द्र! जो-जो साधु पुरुष तुमसे कुछ माँगनेके लिये आये, उनका तुमने वाणीसे कौन कहे, मनसे भी अपमान नहीं किया। इस कारण स्वर्गमें तुम्हारे लिये अनन्त लोक विद्यमान हैं जो विद्युत्के समान तेजोमय, भाँति-भाँतिके सुमधुर शब्दोंसे युक्त तथा महान् हैं॥ ७॥
शिबिरुवाच<br>तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्<br>मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते।<br>न चाहं तान् प्रतिपद्येह दत्त्वा<br>यत्र त्वं तात गन्तासि लोके॥ ८शिबिने कहा— महाराज! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वयं अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। तात! उन सबको देकर निश्चय ही मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा जिन लोकोंमें आप जा रहे होंगे॥ ८॥
ययातिरुवाच<br>यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव-<br>स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः।<br>तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते<br>तस्माच्छिबे नाभिनन्दामि वाचम्॥ ९ययाति बोले— नरदेव शिबि! जिस प्रकार तुम इन्द्रके समान प्रभावशाली हो उसी प्रकार तुम्हारे वे लोक भी अनन्त हैं, तथापि दूसरेके दिये हुए लोकमें मैं विहार नहीं कर सकता; इसीलिये तुम्हारे दिये हुएका अभिनन्दन नहीं करता॥ ९॥
अष्टक उवाच<br>न चेदेकैकशो राजँल्लोकान् नः प्रतिनन्दसि।<br>सर्वे प्रदाय ताँल्लोकान् गन्तारो नरकं वयम्॥ १०अष्टकने कहा— राजन्! यदि आप हममेंसे एक-एकके दिये हुए लोकोंको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते तो हम सब लोग अपने पुण्यलोक आपकी सेवामें समर्पित करके नरक (भूलोक)-में जानेको तैयार हैं॥ १०॥
ययातिरुवाच<br>यदहार्हस्तद् वदध्वं वः सन्तः सत्यादिदर्शिनः।<br>अहं तु नाभिगृह्णामि यत् कृतं न मया पुरा॥ ११<br>अलिप्समानस्य तु मे यदुक्तं<br>न तत्तथास्तीह नरेन्द्रसिंह।<br>अस्य प्रदानस्य यदेव युक्तं<br>तस्यैव चानन्तफलं भविष्यम्॥ १२ययाति बोले— मैं जिसके योग्य हूँ, उसीके लिये यत्न करो; क्योंकि साधु पुरुष सत्यका ही अभिनन्दन करते हैं। मैंने पूर्वकालमें जो कर्म नहीं किया, उसे अब भी स्वीकार नहीं कर सकता। नरेन्द्रसिंह! मुझ निर्लोभके प्रति तुमलोगोंने जो कुछ कहा है उसका फल वैसे ही निराशापूर्ण नहीं होगा, अपितु इतने बड़े दानके लिये जो उपयुक्त होगा, वह अनन्त फल तुम लोगोंको अवश्य प्राप्त होगा॥ ११-१२॥
१४८* मत्स्यपुराण *

| अष्टक उवाच<br>कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः।<br>उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव॥ १३ | अष्टकने पूछा—आकाशमें ये किसके पाँच सुवर्णमय रथ दिखायी देते हैं, जो आकाशमण्डलमें बड़ी ऊँचाईपर स्थित हैं और अग्नि-शिखाकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं?॥ १३॥ | | ययातिरुवाच<br>भवतां मम चैवैते रथा भान्ति हिरण्मयाः।<br>आरुह्यैतेषु गन्तव्यं भवद्भिश्च मया सह॥ १४ | ययाति बोले—ये जो स्वर्णमय रथ चमक रहे हैं, सभी मेरे तथा तुमलोगोंके लिये आये हैं। इन्हींपर आरूढ़ होकर तुमलोग मेरे साथ इन्द्र-लोकको चलोगे॥१४॥ | | अष्टक उवाच<br>आतिष्ठस्व रथं राजन् विक्रमस्व विहायसा।<br>वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति॥ १५ | अष्टक बोले—राजन्! आप रथमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे॥१५॥ | | ययातिरुवाच<br>सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गो जितो यतः।<br>एष वो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्भगः॥ १६ | ययाति बोले—हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है॥१६॥ | | शौनक उवाच<br>तेऽभिरुह्य रथं सर्वे प्रयाता नृपते नृपाः।<br>आक्रमन्तो दिवं भान्ति धर्मेणावृत्य रोदसी॥ १७ | शौनकजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी॥ १७॥ | | अष्टक उवाच<br>अहं मन्ये पूर्वमेकोऽभिगन्ता<br>सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा।<br>कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-<br>मेकोऽत्ययात् सर्ववेगेन वाहन्॥ १८ | अष्टक बोले—राजन्! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा; परंतु ये उशीनर-पुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ?॥१८॥ | | ययातिरुवाच<br>अददाद् देवयानाय यावद् वित्तमनिन्दितः।<br>उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः॥ १९<br>दानं शौचं सत्यमथो ह्यहिंसा<br>ह्रीः श्रीस्तितिक्षा समताऽऽनृशंस्यम्।<br>राजन्य्नेतान्यथ सर्वाणि राज्ञि<br>शिबौ स्थितान्यप्रतिमेषु बुद्ध्या।<br>एवं वृत्तं ह्रीनिषेवी बिभर्ति<br>तस्माच्छिबिरभिगन्ता रथेन॥ २० | ययातिने कहा—राजन्! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसलिये ये तुमलोगोंमें श्रेष्ठ हैं। नरेश्वर! दान, पवित्रता, सत्य, अहिंसा, ह्री, श्री, क्षमा, समता और दयालुता—ये सभी अनुपम गुण राजा शिबिमें विद्यमान हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है। राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं। (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि रथारूढ़ हो हम सबसे आगे बढ़ गये हैं॥१९-२०॥ | | शौनक उवाच<br>अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-<br>न्मातामहं कौतुकादिन्द्रकल्पम्।<br>पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं<br>कुतश्च कश्चासि कथं त्वमागाः।<br>कृतं त्वया यद्वि न तस्य कर्ता<br>लोके त्वदन्यो ब्राह्मणः क्षत्रियो वा॥ २१ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रतुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया—'महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है'॥२१॥ |

* अध्याय ४२ *१४९
Sanskrit ShlokaHindi Meaning
ययातिरुवाच<br>ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः<br>पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम्।<br>गुह्यं मन्त्रं मामकेभ्यो ब्रवीमि<br>मातामहो भवतां सुप्रकाशः॥ २२<br>सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय<br>ऋद्धां महीमददां ब्राह्मणेभ्यः।<br>मेध्यानश्वान् नैकशस्तान् सुरूपां-<br>स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति॥ २३<br>अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः<br>पूर्णांमिमामखिलान्नैः प्रशस्ताम्।<br>गोभिः सुवर्णैश्च धनैश्च मुख्यै-<br>रश्वाः सनागाः शतशस्त्वर्बुदानि॥ २४<br>सत्येन मे द्यौश्च वसुंधरा च<br>तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु।<br>न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं<br>सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति॥ २५<br>साध्वष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं<br>प्रतर्दनं वसुमन्तं शिबिं च।<br>सर्वे देवा मुनयश्च लोकाः<br>सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम्॥ २६<br>यो नः स्वर्गजितं सर्वं यथावृत्तं निवेदयेत्।<br>अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स भोजेन्नः सलोकताम्॥ २७ययातिने कहा— मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता राजा ययाति हूँ। मैं इस लोकमें चक्रवर्ती नरेश था। तुम सब लोग मेरे अपने हो, अतः तुमसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं तुमलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ।) मैंने इस सारी पृथ्वीको जीत लिया था और पुनः इस समृद्धिशालिनी पृथ्वीको ब्राह्मणोंको दान भी कर दिया था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं। मैंने सब तरहके अन्न, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह प्रशस्त पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) हाथियोंसहित घोड़ोंका दान भी किया था। सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा सत्यका ही आदर करते हैं। अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे, वसुमान्‌से और शिबिसे भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ, वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं। जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा॥ २२—२७॥
शौनक उवाच<br>एवं राजन् स महात्मा ययातिः<br>स्वदौहित्रैस्तारितो मित्रवर्यैः।<br>त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा<br>स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम्॥ २८<br>एवं सर्वं विस्तरतो यथाव-<br>दाख्यातं ते चरितं नाहुषस्य।<br>वंशो यस्य प्रथितः पौरवेयो<br>यस्मिञ्जातस्त्वं मनुजेन्द्रकल्पः॥ २९शौनकजी कहते हैं— राजन्! राजा ययाति बड़े महात्मा थे और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके श्रेष्ठ मित्ररूपी दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे सत्कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वीको छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे नहुष-पुत्र राजा ययातिका सारा चरित्र यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह सुनाया। यही वंश आगे चलकर पूरुवंशके नामसे विख्यात हुआ, जिसमें तुम मनुष्योंमें इन्द्रके समान उत्पन्न हुए हो॥ २८-२९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन-विषयक बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४२॥

१५० * मत्स्यपुराण *


तैंतालीसवाँ अध्याय

ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>इत्येतच्छौनकाद् राजा शतानीको निशम्य तु।<br>विस्मितः परया प्रीत्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ॥ १<br>पूजयामास नृपतिर्विधिवच्चाथ शौनकम्।<br>रत्नैर्गोभिः सुवर्णैश्च वासोभिर्विविधैस्तथा॥ २<br>प्रतिगृह्य ततः सर्वं यद् राज्ञा प्रहितं धनम्।<br>दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च शौनकोऽन्तरधीयत॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! राजा शतानीक महर्षि शौनकसे यह सारा वृत्तान्त सुनकर विस्मयाविष्ट हो गये तथा उत्कृष्ट प्रेमके कारण उनका चेहरा पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति खिल उठा। तदनन्तर राजाने अनेक प्रकारके रत्न, गौ, सुवर्ण और वस्त्रोंद्वारा महर्षि शौनककी विधिपूर्वक पूजा की। शौनकजीने राजाद्वारा दिये गये उस सारे धनको ग्रहण करके पुनः उसे ब्राह्मणोंको दान कर दिया और स्वयं वहीं अन्तर्हित हो गये॥ १—३॥
ऋषय ऊचुः<br>ययातेर्वंशमिच्छामः श्रोतुं विस्तरतो वद।<br>यदुप्रभृतिभिः पुत्रैर्यदा लोके प्रतिष्ठितम्॥ ४**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! अब हमलोग ययातिके वंशका वर्णन सुनना चाहते हैं। जब उनके यदु आदि पुत्र लोकमें प्रतिष्ठित हुए तब फिर आगे चलकर क्या हुआ? इसे विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ ४॥
सूत उवाच<br>यदोर्वंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः।<br>विस्तरेणानुपूर्व्या च गदतो मे निबोधत॥ ५<br>यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः।<br>महारथा महेष्वासा नामतस्तान् निबोधत॥ ६<br>सहस्रजिरथो ज्येष्ठः क्रोष्टुर्नीलोऽन्तिको लघुः।<br>सहस्रजेस्तु दायादः शतजिर्नाम पार्थिवः॥ ७<br>शतजेरपि दायादास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>हैहयश्च हयश्चैव तथा वेणुहयश्च यः॥ ८<br>हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्रः प्रतिश्रुतः।<br>धर्मनेत्रस्य कुन्तिस्तु संहतस्तस्य चात्मजः॥ ९<br>संहतस्य तु दायादो महिष्मान् नाम पार्थिवः।<br>आसीन्महिष्मतः पुत्रो रुद्रश्रेण्यः प्रतापवान्॥ १०<br>वाराणस्यामभूद् राजा कथितं पूर्वमेव तु।<br>रुद्रश्रेण्यस्य पुत्रोऽभूद् दुर्दमो नाम पार्थिवः॥ ११<br>दुर्दमस्य सुतो धीमान् कनको नाम वीर्यवान्।<br>कनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकविश्रुताः॥ १२<br>कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च।<br>कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत् कृतवीर्यात् ततोऽर्जुनः॥ १३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं ययातिके ज्येष्ठ पुत्र परम तेजस्वी यदुके वंशका क्रमसे एवं विस्तारपूर्वक* वर्णन कर रहा हूँ, आपलोग मेरे कथनानुसार उसे ध्यानपूर्वक सुनिये। यदुके पाँच पुत्र हुए जो सभी देवपुत्र-सदृश तेजस्वी, महारथी और महान् धनुर्धर थे। उन्हें नामनिर्देशानुसार यों जानिये—उनमें ज्येष्ठका नाम सहस्रजि था, शेष चारोंका नाम क्रमशः क्रोष्टु, नील, अन्तिक और लघु था। सहस्रजिका पुत्र राजा शतजि हुआ। शतजिके हैहय, हय और वेणुहय नामक परम यशस्वी तीन पुत्र हुए। हैहयका विश्वविख्यात पुत्र धर्मनेत्र हुआ। धर्मनेत्रका पुत्र कुन्ति और उसका पुत्र संहत हुआ। संहतका पुत्र राजा महिष्मान् हुआ। महिष्मान्‌का पुत्र प्रतापी रुद्रश्रेण्य था, जो वाराणसी नगरीका राजा हुआ। इसका वृत्तान्त पहले ही कहा जा चुका है। रुद्रश्रेण्यका पुत्र दुर्दम नामका राजा हुआ। दुर्दमका पुत्र परम बुद्धिमान् एवं पराक्रमी कनक था। कनकके चार विश्वविख्यात पुत्र हुए, जिनके नाम हैं—कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा और चौथा कृतौजा। इनमें कृतवीर्यसे अर्जुनका जन्म हुआ,

* यह वर्णन भागवत ९। २३। १९ से २४। ६७ तक तथा वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मार्कण्डेय आदि पुराणोंमें भी मिलता है।

* अध्याय ४३ *१५१
श्लोकअर्थ
जातः करसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरो नृपः।<br>वर्षायुतं तपस्तेपे दुष्करं पृथिवीपतिः॥ १४<br><br>दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम्।<br>तस्मै दत्ता वरास्तेन चत्वारः पुरुषोत्तमः॥ १५<br><br>पूर्वं बाहुसहस्रं तु स वव्रे राजसत्तमः।<br>अधर्मं चरमाणस्य सद्भिborder/श्चापि निवारणम्॥ १६<br><br>युद्धेन पृथिवीं जित्वा धर्मेणैवानुपालनम्।<br>संग्रामे वर्तमानस्य वधश्चैवाधिकाद् भवेत्॥ १७जो सहस्र भुजाधारी (होनेके कारण सहस्रार्जुन नामसे प्रसिद्ध था) तथा सातों द्वीपोंका अधीश्वर था। पुरुषश्रेष्ठ कृतवीर्यनन्दन राजा सहस्रार्जुनने दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करते हुए महर्षि अत्रिके पुत्र दत्तात्रेयकी आराधना की। उससे प्रसन्न होकर दत्तात्रेयने उसे चार वर प्रदान किये। उनमें प्रथम वरके रूपमें राजश्रेष्ठ अर्जुनने अपने लिये एक हजार भुजाएँ माँगीं। दूसरे वरसे सत्पुरुषोंके साथ अधर्म करनेवालोंके निवारणका अधिकार माँगा। तीसरे वरसे युद्धद्वारा सारी पृथ्वीको जीतकर धर्मानुसार उसका पालन करना था और चौथा वर यह माँगा कि रणभूमिमें युद्ध करते समय मुझसे अधिक बलवान्‌के हाथों मेरा वध हो॥ ५—१७॥
तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>समोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता॥ १८<br><br>जज्ञे बाहुसहस्रं वै इच्छतस्तस्य धीमतः।<br>रथो ध्वजश्च सञ्जज्ञे इत्येवमनुशुश्रुमः॥ १९<br><br>दशयज्ञसहस्राणि राज्ञा द्वीपेषु वै तदा।<br>निरर्गलानि वृत्तानि श्रूयन्ते तस्य धीमतः॥ २०<br><br>सर्वे यज्ञा महाराजस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः।<br>सर्वे काञ्चनयूपास्ते सर्वाः काञ्चनवेदिकाः॥ २१<br><br>सर्वे देवैः समं प्राप्तैर्विमानस्थैरलङ्कृताः।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः॥ २२<br><br>तस्य यज्ञे जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा।<br>कार्तवीर्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः॥ २३<br><br>न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः।<br>यज्ञैर्दानैस्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च॥ २४<br><br>स हि सप्तसु द्वीपेषु खड्गी चक्री शरासनी।<br>रथी द्वीपान्यनुचरन् योगी पश्यति तस्करान्॥ २५<br><br>पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स नराधिपः।<br>स सर्वरत्नसम्पूर्णश्चक्रवर्ती बभूव ह॥ २६<br><br>स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव हि।<br>स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत्॥ २७<br><br>योऽसौ बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा।<br>भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनैव भास्करः॥ २८उस वरदानके प्रभावसे कार्तवीर्य अर्जुनने क्षात्र-धर्मानुसार सातों समुद्रोंसे परिवेष्टित पर्वतोंसहित सातों द्वीपोंकी समग्र पृथ्वीको जीत लिया; क्योंकि उस बुद्धिमान् अर्जुनके इच्छा करते ही एक हजार भुजाएँ निकल आयीं तथा उसी प्रकार रथ और ध्वज भी प्रकट हो गये—ऐसा हमलोगोंके सुननेमें आया है। साथ ही उस बुद्धिमान् अर्जुनके विषयमें यह भी सुना जाता है कि उसने सातों द्वीपोंमें दस सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान निर्विघ्नतापूर्वक सम्पन्न किया था। उस राजराजेश्वरके सभी यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणाएँ बाँटी गयी थीं। उनमें गड़े हुए यूप (यज्ञस्तम्भ) स्वर्णनिर्मित थे। सभी वेदिकाएँ सुवर्णकी बनी हुई थीं। वे सभी यज्ञ अपना-अपना भाग लेनेके लिये आये हुए विमानारूढ़ देवोंद्वारा सुशोभित थे। गन्धर्व और अप्सराएँ भी नित्य आकर उनकी शोभा बढ़ाती थीं। राजर्षि कार्तवीर्यके महत्त्वको देखकर नारदनामक गन्धर्वने उनके यज्ञमें ऐसी गाथा गायी थी—'भावी क्षत्रिय नरेश निश्चय ही यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्रज्ञानके द्वारा कार्तवीर्यकी समकक्षताको नहीं प्राप्त होंगे।' योगी अर्जुन रथपर आरूढ़ हो हाथमें खड्ग, चक्र और धनुष धारण करके सातों द्वीपोंमें भ्रमण करता हुआ चोरों-डाकुओंपर कड़ी दृष्टि रखता था। राजा अर्जुन पचासी हजार वर्षोंतक भूतलपर शासन करके समस्त रत्नोंसे परिपूर्ण हो चक्रवर्ती सम्राट् बना रहा। राजा अर्जुन ही अपने योगबलसे पशुओंका पालक था, वही खेतोंका भी रक्षक था और वही समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। प्रत्यञ्चाके आघातसे कठोर हुई त्वचाओंवाली अपनी सहस्रों भुजाओंसे वह उसी प्रकार शोभा पाता था, जिस प्रकार सहस्रों किरणोंसे युक्त शारदीय सूर्य शोभित होते हैं॥ १८–२८॥