ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
ह्वयाम्यग्निं प्रथमं स्वस्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे. ह्वयामि रात्रीं जगतो निवेशनीं ह्वयामि देवं सवितारमूतये.. (१) मैं अपनी रक्षा के लिए सबसे पहले अग्नि को बुलाता हूं. मैं अपनी रक्षा के लिए मित्र और वरुण को यहां बुलाता हूं. मैं संसार के सभी प्राणियों को विश्राम देने वाली रात को बुलाता हूं. मैं अपनी रक्षा के लिए सविता को बुलाता हूं. (१) आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च. हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. (२) सविता का रथ सोने का है. वे अंधकार से भरे आकाश में बार-बार भ्रमण करते हुए देवों और मानवों को अपने-अपने कर्मों में लगाते हुए सभी लोकों की यात्रा करते हैं. (२) याति देवः प्रवता यात्युद्वता याति शुभ्राभ्यां यजतो हरिभ्याम्. आ देवो याति सविता परावतोऽप विश्वा दुरिता बाधमानः.. (३) सविता देव प्रातःकाल से मध्याह्न तक उन्नत मार्ग से और मध्याह्न से संध्या तक अवनत मार्ग से चलते हैं. यज्ञ के योग्य सूर्य देव सफेद घोड़ों की सहायता से चलते हैं. वे समस्त पापों का नाश करते हुए दूर देश से यज्ञ में आते हैं. (३) अभीवृतं कृशनैर्विश्वरूपं हिरण्यशम्यं यजतो बृहन्तम्. आस्थद्रथं सविता चित्रभानुः कृष्णा रजांसि तविषिं दधानः.. (४) यज्ञ के योग्य एवं रंग-बिरंगी किरणों वाले सविता अपने तेज से लोकों में व्याप्त अंधकार को नष्ट करने के लिए स्वर्ण मूर्तियों से सुशोभित एवं सोने की कीलों वाले विशाल रथ पर सवार हुए. (४) वि जनाञ्छ्यावाः शितिपादो अख्यन्रथं हिरण्यप्रउगं वहन्तः. शश्वद्विशः सवितुर्देवस्योपस्थे विश्वा भुवनानि तस्थुः.. (५) सूर्य के सफेद पैरों वाले घोड़े सोने के जुए वाले रथ को खींचते हुए मनुष्यों को विशेष रूप से प्रकाश देते हैं. मनुष्य एवं सारा संसार प्रकाश के लिए सूर्य देवता के समीप जाता है. (५) तिस्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ एका यमस्य भुवने विराषाट्. आणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत्.. (६) स्वर्ग आदि तीन लोक हैं. इनमें स्वर्गलोक और भूलोक दो सूर्य के अधिकार में हैं. एक आकाशलोक यमराज के घर जाने का मार्ग है. जिस प्रकार आणि नाम की कील के ऊपर रथ टिका रहता है, उसी प्रकार चंद्रमा आदि नक्षत्र सूर्य का सहारा लिए हुए हैं. जो सूर्य के विषय ebook converter DEMO Watermarks*
में जानते हैं, वे बोलें. (६) वि सुपर्णो अन्तरिक्षाण्यख्यद्गभीरवेपा असुरः सुनीथः. क्वे३दानीं सूर्यः कश्चिकेत कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान.. (७) गंभीर कंपन वाली, सबको प्राण देने वाली और सरलता से सब जगह पहुंचने वाली सूर्य की किरणें आकाश आदि तीनों लोकों में फैली हुई हैं. यह कौन बता सकता है कि इस समय सूर्य कहां है? सूर्य की किरणें किस स्वर्गलोक में विस्तृत हैं? (७) अष्टौ व्यख्यत्ककुभः पृथिव्यास्त्री धन्व योजना सप्त सिन्धून्. हिरण्याक्षः सविता देव आगाद्दधद्रत्ना दाशुषे वार्याणि.. (८) सूर्य ने पृथ्वी की आठों दिशाएं, प्राणियों के तीनों लोक और सातों नदियां प्रकाशित की हैं. सोने की आंखों वाले सूर्य द्रव्य देने वाले यजमान को उत्तम धन देते हुए यहां आवें. (८) हिरण्यपाणिः सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अन्तरीयते. अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति.. (९) हाथों में सोना लिए हुए एवं विविध पदार्थों को देखते हुए सूर्य आकाश और धरती दोनों लोकों में जाते हैं. वे रोगों को दूर भगाते हैं, उदय होते हैं और अंधकार को नष्ट करने वाले प्रकाश को लेकर सारे आकाश को व्याप्त करते हैं. (९) हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ्. अपसेधन्नक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषं गृणानः.. (१०) हाथों में सोना लिए हुए, प्राणदाता, अच्छे नेता, सुख और धन देने वाले सविता यज्ञ में सामने से आवें. सूर्य देव प्रतिरात्रि स्तुति सुनकर यातुधानों और राक्षसों को यज्ञ से निकालकर स्थित हुए. (१०) ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासोऽरेणवः सुकृता अन्तरिक्षे. तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधि च ब्रूहि देव.. (११) हे सविता! आकाश में तुम्हारा मार्ग निश्चित, धूलिरहित एवं भली प्रकार बनाया गया है. तुम उसी मार्ग से आकर आज हमारी रक्षा करो. हे देव! हमारी बातें देवताओं तक पहुंचा दो. (११) सूक्त—३६ देवता—अग्नि प्र वो यह्वं पूरूणां विशां देवयतीनाम्. अग्निं सूक्तेभिर्वचोभीरीमहे यं सीमिदन्य ईळते.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
देवों की कामना करने वाले हम बहुसंख्यक प्रजाजनों पर अनुग्रह के निमित्त सूक्तरूपी वचनों द्वारा महान् अग्नि की प्रार्थना करते हैं. अन्य ऋषिगण भी इसी अग्नि की स्तुति करते हैं. (१) जनासो अग्निं दधिरे सहोवृधं हविष्मन्तो विधेम ते. स त्वं नो अद्य सुमना इहाविता भवा वाजेषु सन्त्य.. (२) यज्ञ करने वाले लोगों ने शक्तिवर्धक अग्नि को धारण किया था. हे अग्नि! हम लोग हवि लेकर तुम्हारी सेवा करते हैं. तुम अन्नदान में तत्पर हो. आज इस यज्ञ में हम पर परम प्रसन्न होकर हमारे रक्षक बनो. (२) प्र त्वा दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. महस्ते सतो वि चरन्त्यर्चयो दिवि स्पृशन्ति भानव:.. (३) हे अग्नि! तुम यज्ञ के होता एवं सर्वज्ञ हो. हम तुम्हें देवों का दूत समझकर वरण करते हैं. तुम महान् और नित्य हो. तुम्हारी चमक बढ़ती है. तुम्हारी किरणें आकाश को छूती हैं. (३) देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूतं प्रत्नमिन्धते. विश्वं सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्ते ददाश मर्त्य:.. (४) हे अग्नि! वरुण, मित्र और अर्यमा—ये तीनों देव तुम्हें अपना प्राचीन दूत समझकर भली प्रकार चमकाते हैं. जो यजमान तुम्हें हवि देता है, वह तुम्हारे द्वारा सभी प्रकार की संपत्ति जीत लेता है. (४) मन्द्रो होता गृहपतिरग्ने दूतो विशामसि. त्वे विश्वा संगतानि व्रता ध्रुवा यानि देवा अकृण्वत.. (५) हे अग्नि! तुम देवों को बुलाने वाले, यजमान रूप प्रजाओं के पालक एवं हर्षित करने वाले हो. तुम देवताओं के दूत हो. पृथ्वी आदि देवता जो स्थिर कर्म करते हैं, वे तुम में मिल जाते हैं. (५) त्वे इदग्ने सुभगे यविष्ठ्य विश्वमा हूयते हवि:. स त्वं नो अद्य सुमना उतापरं यक्षि देवान्त्सुवीर्या.. (६) हे युवक अग्नि! तुझ परम सौभाग्यशाली को लक्ष्य करके सब हव्य दिए जाते हैं. तुम प्रसन्न मन होकर आज, कल और सर्वदा सुंदर एवं शक्तिशाली देवों का यज्ञ करो. (६) तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते. होत्राभिरग्निं मनुष: समिन्धते तितीर्वांसो अति स्रिध:.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
यजमान नमस्कार करते हुए अपने आप चमकने वाले उसी अग्नि को हवि देकर उपासना करते हैं. शत्रु को करारी हार देने के इच्छुक लोग होताओं द्वारा अग्नि को प्रज्वलित करते हैं. (७) घ्नन्तो वृत्रमतरन्रोदसी अप उरु क्षयाय चक्रिरे. भुवत्कण्वे वृषा द्युम्न्याहुतः क्रन्ददश्वो गविष्टिषु.. (८) हे अग्नि! तुम्हारी सहायता से देवों ने वृत्र को मारकर रहने के लिए स्वर्ग, पृथ्वी और आकाश को विस्तृत किया. जिस प्रकार संग्राम में हिनहिनाता हुआ घोड़ा गाएं प्राप्त करता है, उसी प्रकार भली प्रकार बुलाए जाने पर तुम कण्व ऋषि के लिए इच्छानुसार धन बरसाओ. (८) सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः. वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्.. (९) हे अग्नि! तुम भली प्रकार बैठो. तुम महान् हो. तुम देवताओं की प्रबल इच्छा करते हुए जलो. हे बुद्धिमान् एवं प्रशंसनीय अग्नि! तुम इधर-उधर फैलने वाले धुएं को विशेष रूप से बनाओ. (९) यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन. यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः.. (१०) हे हव्यवाहक अग्नि! समस्त देवों ने मनु के लिए इस यज्ञस्थल में तुझ परम पूज्य अग्नि को धारण किया था. कण्व ने पूज्य अतिथियों के साथ धन द्वारा प्रसन्न करने वाले तुझ अग्नि को धारण किया था. वर्षा करने वाले इंद्र एवं अन्य स्तुतिकर्त्ताओं ने भी तुम्हें धारण किया था. (१०) यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि. तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस्तमग्निं वर्धयामसि.. (११) पूज्य अतिथियों वाले कण्व ने जिस अग्नि को सूर्य से लेकर प्रज्वलित किया था, उसी अग्नि की फैलने वाली किरणें चमक रही हैं. हमारी ये ऋचाएं तथा हम उसी अग्नि को बढ़ाते हैं. (११) रायस्पूर्धि स्वधावोऽस्ति हि तेऽग्ने देवेष्वाप्यम्. त्वं वाजस्य श्रुत्यस्य राजसि स नो मृळ महाँ असि.. (१२) हे अन्न सहित अग्नि! हमें धन दो. तुम्हारी देवों से मित्रता है, तुम प्रसिद्ध अन्न के स्वामी एवं महान् हो. तुम हमें सुखी बनाओ. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता. ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे.. (१३) तुम हमारी रक्षा के लिए सूर्य के समान उन्नत बनो. ऊंचे उठकर तुम हमें अन्न देने वाले बनोगे, क्योंकि यूप गाड़ने वाले एवं यज्ञ पूर्ण करने वाले ऋत्विजों द्वारा हम तुम्हें बुलाते हैं. (१३) ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह. कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः.. (१४) तुम ऊंचे उठकर ज्ञान की सहायता से हमें पापों से बचाओ एवं समस्त राक्षसों को जला दो. संसार में घूमने-फिरने के लिए हमें उन्नत बनाओ तथा हमें जीवित रखने के लिए हमारा हविरूपी धन देवों के पास ले जाओ. (१४) पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेररावणः. पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य.. (१५) हे विशाल किरणों वाले युवक अग्नि! हमें बाधक राक्षसों से बचाओ. धन दान न करने वाले धूर्त हिंसक पशु और मारने की इच्छा रखने वाले शत्रु से हमारी रक्षा करो. (१५) घनेव विष्वग्वि जह्यरावणस्पुर्जम्भ यो अस्मध्रुक्. यो मर्त्यः शिशीते अत्यक्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत.. (१६) हे उष्ण किरणों वाले अग्नि! हम लोग जिस प्रकार डंडे, पत्थर आदि से मिट्टी का बर्तन फोड़ते हैं, तुम उसी प्रकार धन दान न करने वाले, हमसे द्वेष रखने वाले एवं हमें डराने- धमकाने वाले तथा शस्त्रप्रहार करने वाले शत्रु का सब प्रकार से संहार करो. (१६) अग्निर्वव्ने सुवीर्यमग्निः कण्वाय सौभगम्. अग्निः प्रावन्मित्रोत मेध्यातिथिम्नग्निः साता उपस्तुतम्.. (१७) अग्नि से शक्तिदायक अन्न की याचना की जाती है. अग्नि ने कण्व को सौभाग्य प्रदान किया, हमारे मित्रों की रक्षा की तथा पूज्य अतिथियों वाले ऋषि की रक्षा की. धन प्राप्ति के लिए जिस किसी ने अग्नि की स्तुति की, उसी को धन देकर अग्नि ने रक्षा की. (१७) अग्निना तुर्वशं यदुं परावत उग्रादेवं हवामहे. अग्निर्नयन्नववास्त्वं बृहद्रथं तुर्वीतिं दस्यवे सहः.. (१८) हम चोरों का दमन करने वाले अग्नि को तुर्वया, यदु और उग्रादेव ऋषियों के साथ दूर देश से बुलाते हैं. यह अग्नि न्वास्त्व, बृहद्रथ और तुर्वीत नामक राजर्षियों को इस यज्ञ में बुलावें. (१८) eBook converter DEMO Watermarks*
नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते. दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टय:.. (१९) हे प्रकाशरूप अग्नि! मनु ने समस्त जातियों के कल्याण के लिए तुम्हारी स्थापना की थी. हे अग्नि देव! तुमने यज्ञ के निमित्त उत्पन्न होकर हव्य से तृप्ति प्राप्त की और कण्व को प्रकाश दिया. मनुष्य तुम्हें नमस्कार करते हैं. (१९) त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये. रक्षस्विनः सदमिद्यातुमावतो विश्वं समत्रिणं दह.. (२०) अग्नि की ज्वालाएं चमकीली, शक्तिशाली और भयानक हैं. इसलिए उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता. हे अग्नि देव! राक्षसों, यातुधानों एवं हमारे विश्व भक्षक शत्रुओं को जलाओ. (२०) सूक्त—३७ देवता—मरुद्गण क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम्. कण्वा अभि प्र गायत.. (१) हे कण्व गोत्रोत्पन्न ऋषियो! विहरणशील एवं शत्रुरहित मरुतों को लक्ष्य करके स्तुति करो. वे अपने रथ पर सुशोभित होते हैं. (१) ये पृषतीभिरृष्टिभिः साकं वाशीभिरञ्जिभिः. अजायन्त स्वभानवः.. (२) बिंदुयुक्त हरिणियां मरुतों का वाहन हैं. उन्होंने इन वाहनों के साथ प्रकाशवान् होकर घोर गर्जन, आयुधसमूह तथा अलंकारों सहित जलग्रहण किया. (२) इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान्. नि यामञ्चित्रमृञ्जते.. (३) मरुतों के हाथ में रहने वाले चाबुक का शब्द हम सुन रहे हैं. चाबुक का वह शब्द युद्ध में हमारी शक्ति बढ़ाता है. (३) प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे. देवत्तं ब्रह्म गायत.. (४) हे ऋत्विजो! तुम्हारे बल का समर्थन करने वाले, शत्रु दमनकारी, उज्ज्वलकीर्तिसंपन्न एवं शक्तिशाली मरुतों की स्तुति हवि ग्रहण के उद्देश्य से करो. (४) प्र शंसा गोष्वघ्न्यं क्रीळं यच्छर्धो मारुतम्. जम्भे रसस्य वावृधे.. (५) हे ऋत्विजो! दूध देने वाली गायों के बीच स्थित मरुद्गणों के अविनाशी, विहारशील एवं सहन करने योग्य तेज की प्रशंसा करो. वह तेज गाय का दूध पीने के कारण बढ़ा है. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
को वो वर्षिष्ठ आ नरो दिवश्च ग्मश्च धूतयः. यत्सीमन्तं न धूनुथ.. (६) हे धरती और आकाश को कंपित करने वाले मरुद्गणो! तुमसे कौन बड़ा है? तुम जैसे पेड़ की चोटी को कंपित कर देते हो, उसी प्रकार सब दिशाओं को कंपा दो. (६) नि वो यामाय मानुषो दध्र उग्राय मन्यवे. जिहीत पर्वतो गिरिः.. (७) हे मरुद्गणो! तुम्हारे चलने से घर गिर पड़ेगा, इस भय से लोगों ने घरों में मजबूत खंभे गाड़े हैं. तुम्हारी चाल उग्र एवं झकझोरने वाली है. तुम्हारी तेज चाल से चोटियों वाले अनेक पर्वत हिल जाते हैं. (७) येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वाँ इव विश्पतिः. भिया यामेषु रेजते.. (८) हे मरुद्गणो! तुम्हारी चाल सभी पदार्थों को दूर फेंक देती है. वृद्ध एवं दुर्बल राजा शत्रु के भय से जिस प्रकार कांपता है, उसी प्रकार तुम्हारे चलने से धरती कांपती है. (८) स्थिरं हि जानमेषां वयो मातुर्रिरतवे. यत्सीमनु द्विता शवः.. (९) मरुतों की उत्पत्ति का स्थान आकाश स्थिर रहता है. आकाश मरुतों की माता के समान है. आकाश में होकर पक्षी निकल सकते हैं. मरुतों का बल धरती और आकाश को पृथक् करता है. (९) उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा अज्मेश्वत्नत. वाश्रा अभिज्ञु यातवे.. (१०) शब्दों के जन्मदाता मरुद्गण चलते समय जल का विस्तार करते हैं और रंभाती हुई गायों को घुटने तक गहरे जल में प्रवेश करने को प्रेरित करते हैं. (१०) त्यं चिद्घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातममृध्रम्. प्रच्यावयन्ति यामभिः.. (११) मरुद्गण अपनी तेज चाल से विस्तृत, मोटे, जल न बरसाने वाले, अपराजेय एवं प्रसिद्ध बादलों को भी कंपित कर देते हैं. (११) मरुतो यद्ध वो बलं जनाँ अच्युच्यवीतन. गिरीँ रचुच्यवीतन.. (१२) हे मरुतो! तुम शक्तिशाली हो, इसलिए समस्त प्राणियों को अपने-अपने काम में लगाते हो तथा मेघों को भी प्रेरित करते हो. (१२) यद्व यान्ति मरुतः सं ह ब्रुवतेऽध्वन्ना. शृणोति कश्चिदेषाम्.. (१३) मरुद्गण जब चलते हैं तो मार्ग में सब ओर ध्वनि अवश्य करते हैं. उस ध्वनि को चाहे जो सुन सकता है. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
प्र यात शीभमाशुभिः सन्ति कण्वेषु वो दुवः. तत्रो षु मादयाध्वै.. (१४) हे मरुद्गणो! अपने तीव्रगामी वाहन के द्वारा यज्ञभूमि में शीघ्र आओ. बुद्धिमान् यजमानों के द्वारा की गई सेवा से उनके प्रति तृप्त बनो. (१४) अस्ति हि ष्मा मदाय वः स्मसि ष्मा वयमेषाम्. विश्वं चिदायुर्जीवसे.. (१५) हे मरुद्गणो! हमारे द्वारा दिया हुआ हवि तुम्हें तृप्त करने के लिए है. हम पूर्ण आयु जीने के लिए तुम्हारे सेवक बने हैं. (१५) सूक्त—३८ देवता—मरुद्गण कद्ध नूनं कधप्रियः पिता पुत्रं न हस्तयोः. दधिध्वे वृक्तबर्हिषः.. (१) हे मरुद्गणो! प्रार्थना चाहने वाले तुम लोगों के लिए कुश बिछा दिए गए हैं. जिस प्रकार पिता पुत्र को हाथों पर धारण करता है, क्या तुम भी हमें उसी प्रकार धारण करोगे? (१) क्व नूनं कद्धो अर्थं गन्ता दिवो न पृथिव्याः. क्व वो गावो न रण्यन्ति.. (२) हे मरुद्गणो! इस समय तुम कहां हो? तुम इस यज्ञ में कब आओगे? तुम यहां आकाश से आओ, धरती से मत आना. जिस प्रकार गाएं रंभाती हैं, उसी प्रकार यजमान तुम्हें यहां बुलाते हैं. (२) क्व वः सुम्ना नव्यांसि मरुतः क्व सुविता. क्वो३विश्वानि सौभगा.. (३) हे मरुद्गणो! तुम्हारी प्रजा पशुरूपी नवीन धन, मणि, मुक्ता आदि रूपी शोभन धन और गज, अश्व आदि रूपी सौभाग्य धन कहां है? (३) यद्द्यूं पृश्निमातरो मर्तासः स्यातने. स्तोता वो अमृतः स्यात्.. (४) हे पृश्नि नामक धेनु के पुत्र मरुद्गण! यद्यपि तुम मरणधर्मा हो, पर तुम्हारी स्तुति करने वाला अमर होगा. (४) मा वो मृगो न यवसे जरिता भूदजोष्यः. पथा यमस्य गादुप.. (५) घास के बीच में मृग जिस प्रकार सेवारहित नहीं रहता, अपितु घास खाता है, उसी प्रकार तुम्हारी स्तुति करने वाले तुम्हारी सेवा से कभी शून्य न हों. इस प्रकार वे यमराज के मार्ग पर नहीं जाएंगे. (५) मो षु णः परापरा निर्ऋतिर्दुर्हणा वधीत्. पदीष्ट तृष्णया सह.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे मरुद्गण! अत्यंत शक्तिशाली पाप की देवी निर्ऋति का कोई विनाश नहीं कर सकता. वह हमारा वध न करे और हमारी तृष्णा के साथ ही समाप्त हो जाए. (६) सत्यं त्वेषा अमवन्तो धन्वञ्चिदा रुद्रियासः. मिहं कृण्वन्त्यवाताम्.. (७) रुद्र द्वारा पालित, दीप्तिसंपन्न एवं बलशाली मरुद्गण मरुस्थल में भी वायुरहित वर्षा करते हैं, यह बात सत्य है. (७) वाश्रेव विद्युन्मिमाति वत्सं न माता सिषक्ति. यदेषां वृष्टिरसर्जि.. (८) दूध भरे स्तनों वाली रंभाती हुई गाय के समान बिजली गरजती है. गाय जिस तरह बछड़े को चाटती है, उसी प्रकार बिजली मरुद्गणों की सेवा करती है. इसी के फलस्वरूप मरुद्गणों ने वर्षा की है. (८) दिवा चित्तमः कृण्वन्ति पर्जन्येनोदवाहेन. यत्पृथिवीं व्युन्दन्ति.. (९) मरुद्गण जल ढोने वाले बादलों की सहायता से दिन में भी अंधेरा कर देते हैं. वे उसी समय धरती को सींचते हैं. (९) अध स्वनान्मरुतां विश्वमा सद्म पार्थिवम्. अरेजिन्त प्र मानुषाः.. (१०) मरुद्गणों के गरजने की ध्वनि से धरती पर बने सभी घर एवं उन में रहने वाले मनुष्य कांपने लगते हैं. (१०) मरुतो वीळुपाणिभिश्चित्रा रोधस्वतीरनु. यातेमखिद्रयामभिः.. (११) हे मरुद्गणो! जिस प्रकार विचित्र किनारों वाली नदी बहती है, उसी प्रकार तुम अपने शक्तिशाली हाथों की सहायता से बिना रुके हुए चलते रहो. (११) स्थिरा वः सन्तु नेमयो रथा अश्वास एषाम्. सुसंस्कृता अभीशवः.. (१२) हे मरुद्गणो! तुम्हारी नेमि, रथ और घोड़े शक्तिशाली हों. तुम्हारी उंगलियां सावधानी से घोड़ों की लगाम पकड़ें. (१२) अच्छा वदा तना गिरा जराये ब्रह्मणस्पतिम्. अग्निं मित्रं न दर्शतम्.. (१३) हे ऋत्विजो! मंत्र के पालक मरुद्गण, अग्नि एवं दर्शनीय मित्र की प्रार्थना के लिए हमारे सामने ऐसे मंत्रों से स्तुति करो जो उन देवताओं का स्वरूप बताने वाले हों. (१३) मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः. गाय गायत्रमुक्थ्यम्.. (१४) हे ऋत्विजो! अपने मुंह से स्तोत्रों की रचना करो. जिस प्रकार बादल वर्षा का विस्तार ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—३९ देवता—मरुद्गण
करते हैं, उसी प्रकार तुम उस स्तोत्र के श्लोकों को बढ़ाओ, तुम गायत्री छंद द्वारा निर्मित शास्त्रसम्मत स्तोत्र को पढ़ो. (१४) वन्दस्व मारुतं गणं त्वेषं पनस्युमर्किणम्. अस्मे वृद्धा असन्निह.. (१५) हे ऋत्विजो! प्रकाशयुक्त, स्तुतियोग्य एवं सब लोगों द्वारा अर्चित मरुद्गणों की तुम वंदना करो, जिससे वे हमारे इस यज्ञ में वृद्धि को प्राप्त हों. (१५) सूक्त—३९ देवता—मरुद्गण प्र यदिस्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ. कस्य क्रत्वा मरुतः कस्य वर्पसा कं याथ कं ह धूतयः.. (१) हे कंपनकारी मरुद्गणो! जिस प्रकार सूर्य आकाश से अपनी तेज रोशनी धरती पर फेंकता है, उसी प्रकार जब तुम दूर आकाश से अपनी शक्ति धरती पर डालते हो तो तुम किस यज्ञ में किस यजमान द्वारा आकर्षित किए जाते हो तथा किस यजमान के समीप जाते हो? (१) स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे. युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः.. (२) हे मरुद्गणो! तुम्हारे आयुध शत्रु विनाश के लिए स्थिर और शत्रुओं को रोकने के लिए दृढ़ हों. तुम्हारी शक्ति स्तुति करने योग्य हो, हमारे प्रति धोखा करने वाले शत्रुओं की शक्ति प्रशंसनीय न हो. (२) परा ह यत्स्थिरं हथ नरो वर्तयथा गुरु. वि याथन वनिनः पृथिव्या व्याशाः पर्वतानाम्.. (३) हे नेताओ! जब तुम वृक्षादि स्थिर वस्तु को तोड़ते हुए एवं पत्थर आदि भारी वस्तुओं को हिलाते हुए चलते हो, तब पृथ्वी पर खड़े वनों के बीच से तथा पर्वतों के बगल वाले मार्ग से चलते हो. (३) नहि वः शत्रुर्विविदे अधि द्यवि न भूम्यां रिशादसः. युष्माकमस्तु तविषि तना युजा रुद्रासो नू चिदाधृषे.. (४) हे शत्रुनाशकारी! धरती और आकाश में तुम्हारा कोई शत्रु नहीं हुआ. हे रुद्रपुत्रो! तुम सबकी सम्मिलित शक्ति शत्रुओं का दमन करने के लिए विस्तृत हो. (४) प्र वेपयन्ति पर्वतान्वि विञ्चन्ति वनस्पतीन्. प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वया विशा.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
मरुद्गण पर्वतों को भली प्रकार कंपित करते एवं वृक्षों को एक-दूसरे से अलग करते हैं. हे देवो! जिस प्रकार मतवाले लोग स्वेच्छा से सब जगह जाते हैं. उसी प्रकार तुम भी प्रजाओं के साथ सर्वत्र जाते हो. (५) उपो रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं प्रष्टिर्वहति रोहितः. आ वो यामाय पृथिवी चिदश्रोदबीभयन्त मानुषाः.. (६) तुम बुंदकियों वाले हरिणों को अपने रथ में जोतते हो. लाल हरिण तुम्हारे रथ के जुए को खींचता है. तुम्हारे आने की ध्वनि धरती और आकाश ने सुनी है तथा मनुष्य भयभीत हो उठे हैं. (६) आ वो मक्षू तनाय कं रुद्रा अवो वृणीमहे. गन्ता नूनं नोऽवसा यथा पुरेत्था कण्वाय बिभ्युषे.. (७) हे रुद्रपुत्रो! हम पुत्र-प्राप्ति के लिए तुम्हारी रक्षणशक्ति की शीघ्र प्रार्थना करते हैं. पहले किए गए यज्ञों में हमारी रक्षा के लिए तुम जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार भयभीत एवं बुद्धिमान् यजमान की रक्षा के लिए उनके समीप आओ. (७) युष्मेषितो मरुतो मर्त्येषित आ यो नो अभ्व ईषते. वि तं युयोत शवसा व्योजसा वि युष्माकाभिरूतिभिः.. (८) हे मरुद्गणो! तुम्हारी अथवा किसी अन्य पुरुष की प्रेरणा से जो भी शत्रु हमारे सामने आवे, तुम उसका बल और अन्न छीन लो और उससे अपनी रक्षा भी वापस कर लो. (८) असामि हि प्रयुज्यवः कण्वं दद प्रचेतसः. असामिभिर्मरुत आ न ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं न विद्युत:.. (९) हे मरुद्गणो! तुम पूर्ण रूप से यज्ञपात्र एवं परम ज्ञानसंपन्न हो. तुम यजमान को धारण करो. जिस प्रकार बिजली वर्षा लेकर आती है, उसी प्रकार तुम अपनी पूरी शक्ति से हमारी रक्षा करने को आओ. (९) असाम्योजो बिभृथा सुदानवोऽसामि धूतयः शवः. ऋषिद्विषे मरुतः परिमन्यव इषुं न सृजत द्विषम्.. (१०) हे शोभन दान करने वाले मरुतो! तुम अपनी समस्त शक्ति धारण करो. हे कंपनकर्त्ताओं! ऋषियों से द्वेष करने वाले एवं क्रोधी शत्रु के प्रति बाण के समान अपना क्रोध व्यक्त करो. (१०) सूक्त—४० देवता—ब्रह्मणस्पति ebook converter DEMO Watermarks*
उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे. उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! हम पर अनुग्रह करने के लिए अपने निवासस्थान से उठो. देवताओं की इच्छा करने वाले हम तुमसे याचना करते हैं. सुंदर दान करने वाले मरुद्गण तुम्हारे समीप जावें. हे इंद्र! तुम ब्रह्मणस्पति के सोमरस का सेवन करो. (१) त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते. सुवीर्यं मरुत आ स्वश्व्यं दधीत यो व आचके.. (२) हे परम बल पालक! शत्रुओं के बीच फंसे हुए धन को प्राप्त करने के लिए मनुष्य तुम्हारी ही स्तुति करते हैं. हे मरुद्गणो! धन का इच्छुक जो मनुष्य, ब्रह्मणस्पति सहित तुम्हारी स्तुति करता है, वह सुंदर अश्व एवं शोभन वीर्य संपन्न धन प्राप्त करता है. (२) प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता. अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (३) ब्रह्मणस्पति एवं प्रिय सत्य रूपा वाग्देवी हमें प्राप्त हों. ब्रह्मणस्पति आदि देव वीर शत्रुओं को हमसे बहुत दूर ले जावें एवं हमें मानव हितकारी तथा द्रव्यपूर्ण यज्ञों में ले जावें. (३) यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः. तस्मा इळां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (४) ऋत्विज् को उत्तम धन देने वाला यजमान अक्षय अन्न प्राप्त करता है. उस यजमान के निमित्त हम सुवीरा इला से याचना करते हैं. वह शत्रु का नाश करती है, पर उसे कोई नहीं मार सकता. (४) प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्. यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे.. (५) ब्रह्मणस्पति होता के मुख में बैठकर निश्चय ही पवित्र मंत्र बोलते हैं. उस मंत्र में इंद्र, वरुण, मित्र और अर्यमा देव निवास करते हैं. (५) तमिद्द्रोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम्. इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद्वामा वो अश्नवत्.. (६) हे ब्रह्मणस्पति प्रभृति देवो! हम उसी इंद्र प्रतिपादक पवित्र मंत्र को बोलते हैं. हे नेताओ! यदि आप हमारे वचनों को चाहते हैं तो सभी शोभन वचन आपको प्राप्त होंगे. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
को देवयन्तमश्ववज्जनं को वृक्तबर्हिषम् प्रप्र दाश्वान्पस्त्याभिरस्थितान्तर्वात्वक्षयं दधे.. (७) देवों की अभिलाषा करने वाले एवं यज्ञ के निमित्त कुश तोड़ने वाले यजमान के समीप ब्रह्मणस्पति के अतिरिक्त कौन देवता आ सकता है? हव्यदाता यजमान ऋत्विजों के साथ भांति-भांति की संपत्तियों से युक्त घर से निकलकर यज्ञस्थल की ओर प्रस्थान कर चुके हैं. (७) उप क्षत्रं पृञ्चीत हन्ति राजभिर्भये चित्सुक्षितिं दधे. नास्य वर्ता न तरुता महाधने नार्भे अस्ति वज्रिण:... (८) ब्रह्मणस्पति अपने शरीर में शक्ति का संचय करें. वे वरुण आदि राजाओं के साथ शत्रुओं का नाश करते हैं एवं भयानक युद्ध में भी डटे रहते हैं. वज्रधारी ब्रह्मणस्पति को प्रभूत घर प्राप्ति के लिए होने वाले बड़े अथवा छोटे युद्ध में प्रेरित या उत्साहहीन करने वाला दूसरा नहीं है. (८) सूक्त—४१ देवता—वरुण आदि यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्र अर्यमा. नू चित्य दभ्यते जन:... (१) उत्तम ज्ञान से संपन्न वरुण, मित्र और अर्यमा देवता जिसकी रक्षा करते हैं, वह शीघ्र ही सब शत्रुओं को मार डालता है. (१) यं बाहुतेव पिप्रति पान्ति मर्त्यं रिष:. अरिष्ट: सर्व एधते.. (२) वरुणादि देव जिस यजमान को अपने हाथ से धनसंपन्न करते एवं हिंसकों से बचाते हैं, वह सबसे सुरक्षित रहकर उन्नति करता है. (२) वि दुर्गा वि द्विषः पुरो घ्नन्ति राजान एषाम्. नयन्ति दुरिता तिर:... (३) वरुणादि राजा अपने यजमान के सामने स्थित शत्रु का दुर्ग तोड़कर शत्रुओं का नाश करते हैं. इसके पश्चात् वे यजमान के पापों को भी नष्ट कर देते हैं. (३) सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते. नात्रावखादो अस्ति व:... (४) हे आदित्यो! तुम जिस मार्ग से यज्ञ में जाते हो, वह सुगम और निष्कंटक है. इस यज्ञ में ऐसा हवि नहीं, जिससे तुम्हें घृणा हो. (४) यं यज्ञं नयथा नर आदित्या ऋजुना पथा. प्र वः स धीतये नशत्.. (५) eBook converter DEMO Watermarks*
हे नेतारूप आदित्यो! तुम सरल मार्ग से जिस यज्ञ में आते हो, उस में तुम्हें सोमरस का उपभोग मिले. (५) स रत्नं मर्त्यो वसु विश्वं तोकमुत त्मना. अच्छा गच्छत्यस्तृतः.. (६) तुम्हारे द्वारा अनुगृहीत यजमान तुम्हारे सामने ही सभी रमणीय धन प्राप्त करता है. कोई उसकी हिंसा नहीं कर सकता, अपितु वह अपने समान संतान भी प्राप्त करता है. (६) कथा राधाम सखायः स्तोमं मित्रस्यार्यम्णः. महि प्सरो वरुणस्य.. (७) हे ऋत्विज् मित्रो! हम मित्र, अर्यमा और वरुण के महत्त्व के अनुरूप स्तोत्र कब प्राप्त करेंगे? (७) मा वो घ्नन्तं मा शपन्तं प्रति वोचे देवयन्तम्. सुम्नैरिद्ध आ विवासे.. (८) हे मित्रादि देवो! देवों की कामना करने वाले यजमान को मारने वाले एवं कटु वचन बोलने वाले मनुष्य के विरुद्ध मैं कुछ नहीं कहता. मैं तो तुम्हें धन से तृप्त करता हूं. (८) चतुरश्चिद्ददमानाद्विभीयादा निधातोः. न दुरुक्ताय स्पृहयेत्.. (९) जुए के खेल में चार कौड़ियां हाथ में रखने वाले से लोग तभी तक डरते हैं, जब तक वह उन्हें फेंक नहीं देता, उसी प्रकार यजमान दूसरे की निंदा नहीं करना चाहता, अपितु उससे डरता है. (९) सूक्त—४२ देवता—पूषा सं पूषन्नध्वनस्तिर व्यंहो विमुचो नपात्. सक्ष्वा देव प्र णस्पुरः.. (१) हे पूषा! हमें मार्ग के पार लगा दो. पाप विघ्नों का कारण है, तुम उसे नष्ट करो. हे जलवर्षक मेघ के पुत्र! हमारे आगे चलो. (१) यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति. अप स्म तं पथो जहि.. (२) हे पूषा! यदि कोई आक्रमणकारी, धन अपहरण करने वाला एवं दुष्ट शत्रु हमें गलत रास्ता दिखाता है तो उसे हमारे मार्ग से हटा दो. (२) अप त्यं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितम्. दूरमधि सुतेरज.. (३) तुम हमारा रास्ता रोकने वाले चोर एवं कुटिल व्यक्ति को हमारे मार्ग से दूर भगा दो. (३) त्वं तस्य द्वयाविनोऽघशंसस्य कस्य चित्. पदाभि तिष्ठ तपुषिम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे देव! हमारे सामने और पीठ पीछे दोनों प्रकार से हमारा धन हरण करने वाले अनिष्टसाधक चोर के परपीड़क शरीर को अपने पैरों से कुचल दो. (४) आ तत्ते दस्र मन्तुमः पूषन्नवो वृणीमहे. येन पितॄनचोदयः.. (५) हे ज्ञानसंपन्न एवं शत्रुनाशक पूषा! तुमने जिस रक्षाशक्ति से अंगिरा आदि पूर्वजों को प्रेरित किया था, हम तुम्हारी उसी शक्ति की प्रार्थना करते हैं. (५) अधा नो विश्वसौभग हिरण्यवाशीमत्तम. धनानि सुषणा कृधि.. (६) हे सर्वसंपत्तिशाली एवं सुवर्णमय आयुधों वाले पूषा! हमारी प्रार्थना के पश्चात् हमें भांति-भांति का धन देना. (६) अति नः सश्चतो नय सुगा नः सुपथा कृणु. पूषन्निह क्रतुं विदः.. (७) हमें बाधा पहुंचाने के लिए आए हुए शत्रुओं से हमें दूर ले जाओ. हमारा मार्ग सुगम और शोभन बनाओ. हे पूषा! इस मार्ग में हमारी रक्षा का उत्तरदायित्व तुम्हारा है. (७) अभि सूयवसं नय न नवज्वारो अध्वने. पूषन्निह क्रतुं विदः.. (८) तुम हमें घास वाले सुंदर देश में ले जाओ. हमें मार्ग में कोई नया कष्ट न हो. हे पूषा! इस मार्ग में हमारी रक्षा के विषय में तुम्हीं जानते हो. (८) शग्धि पूर्धि प्र यंसि च शिशीहि प्रास्युदरम्. पूषन्निह क्रतुं विदः.. (९) हे पूषा! हम पर अनुग्रह करके हमारे घरों को धनधान्य से भर दो, हमें अन्य इच्छित वस्तुएं देकर परम तेजस्वी बनाओ एवं उत्तम अन्न से हमारी उदरपूर्ति करो. हे पूषा! इस मार्ग में हमारी रक्षा का उपाय तुम्हें ही करना है. (९) न पूषणं मेथामसि सूक्तैरभि गृणीमसि. वसूनि दस्ममीमहे.. (१०) हम पूषा की निंदा नहीं करते, अपितु सूक्तों से उनकी स्तुति करते हैं. हम दर्शनीय पूषा से धन की याचना करते हैं. (१०) सूक्त—४३ देवता—रुद्र आदि कद्रुद्राय प्रचेतसे मीळ्हुष्टमाय तव्यसे. वोचेम शन्तमं हृदे.. (१) प्रकृष्ट ज्ञान युक्त, मनोकामना पूर्ण करने वाले, अत्यंत महान् एवं हृदय में निवास करने वाले रुद्र को लक्ष्य करके हम कब सुखकर स्तोत्र पढ़ेंगे? (१) ebook converter DEMO Watermarks*
यथा नो अदितिः करत्पश्वे नृभ्यो यथा गवे. यथा तोकाय रुद्रियम्.. (२) अदिति येन-केन प्रकारेण हमें, पशुओं को, मनुष्यों को, गायों को और हमारी संतान को रुद्र संबंधी ओषधि प्रदान करें. (२) यथा नो मित्रो वरुणो यथा रुद्रश्चिकेतति. यथा विश्वे सजोषसः.. (३) मित्र, वरुण, रुद्र और परस्पर समान प्रीति रखने वाले अन्य सब देवता हमारे ऊपर कृपा करें. (३) गाथपतिं मेधपतिं रुद्रं जलाषभेषजम्. तच्छंयोः सुम्नमीमहे.. (४) स्तुतिपालक, यज्ञरक्षक एवं सुखकारी ओषधियों से युक्त रुद्र के समीप हम बृहस्पतिपुत्र शंयु के समान सुखों की याचना करते हैं. (४) यः शुक्र इव सूर्यो हिरण्यमिव रोचते. श्रेष्ठो देवानां वसुः.. (५) जो रुद्र सूर्य के समान दीप्तिमान् एवं सोने के समान चमकीले हैं, वे देवताओं में श्रेष्ठ एवं उनके निवास के कारण हैं. (५) शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये. नृभ्यो नारिभ्यो गवे.. (६) देवगण, हमारे घोड़ों, मेष, भेड़, पुरुष, स्त्री और गायों के लिए सुलभ सुख प्रदान करें. (६) अस्मे सोम श्रियमधि नि धेहि शतस्य नृणाम्. महि श्रवस्तुविनृम्णम्.. (७) हे सोमदेव! हमें सौ मनुष्यों के बराबर पर्याप्त धन तथा प्रभूत बलयुक्त एवं महान् अन्न दो. (७) मा नः सोम परिबाधो मारातयो जुहुरन्त. आ न इन्दो वाजे भज.. (८) सोम के विरोधी एवं शत्रु हमारी हिंसा न करें. हे इंद्र देव! हमें अन्न दो. (८) यास्ते प्रजा अमृतस्य परस्मिन्धामन्नृतस्य. मूर्धा नाभा सोम वेन आभूषन्तीः सोम वेदः.. (९) हे सोम! मरणरहित एवं उत्तम स्थान प्राप्त करने वाले तुम सब देवों के शिरोमणि बनकर अपनी प्रजाओं की कामना करो. वह प्रजा तुम्हें सुशोभित करती है, तुम उसका ध्यान रखो. (९) सूक्त—४४ देवता—अग्नि आदि ebook converter DEMO Watermarks*
अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य. आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः.. (१) हे मरणरहित, सर्वभूतज्ञाता अग्नि! तुम हवि देने वाले यजमान के लिए उषा देवता के पास से लाकर टिकने योग्य एवं विभिन्न प्रकार का धन दो. उषाकाल में जागने वाले देवों को तुम आज यहां ले आना. (१) जुष्टो हि दूतो असि हव्यवाहनोऽग्ने रथीरध्वराणाम्. सजूरश्विभ्यामुषसा सुवीर्यमस्मे धेहि श्रवो बृहत्.. (२) हे अग्नि! तुम देवताओं द्वारा सेवित दूत एवं हव्य वहन करने वाले हो. तुम यज्ञों के रथ हो. तुम अश्विनीकुमारों तथा उषा से मिलकर हमें शोभन एवं शक्तिसंपन्न पर्याप्त धन दो. (२) अद्या दूतं वृणीमहे वसुर्मग्निं पुरुप्रियम्. धूमकेतुं भ्राऋजीकं व्युष्टिषु यज्ञानामध्वरश्रियम्.. (३) हम देवताओं के दूत, निवास हेतु सबके प्रिय, धूम रूपी ध्वजा से युक्त, प्रसिद्ध प्रकाश से सुशोभित तथा प्रातःकाल यजमान के यज्ञ का सेवन करने वाले अग्नि को वरण करते हैं. (३) श्रेष्ठं यविष्ठमतिथिं स्वाहुतं जुष्टं जनाय दाशुषे. देवाँ अच्छा यातवे जातवेदसमग्निमीळे व्युष्टिषु.. (४) मैं उषाकाल में देव समूह के अभिमुख जाने के लिए श्रेष्ठ, अतिशय युवक, नित्य, चलने में सक्षम, सबके द्वारा बुलाए गए, हव्यदाता के प्रति प्रसन्न एवं सब प्राणियों को जानने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (४) स्तविष्यामि त्वामहं विश्वस्यामृत भोजन. अग्ने त्रातारममृतं मियेध्य यजिष्ठं हव्यवाहन.. (५) हे मरणरहित, विश्वरक्षक, हव्यवाहन एवं यज्ञ के योग्य अग्नि! मैं तुम्हारी स्तुति करूंगा. (५) सुशंसो बोधि गृणते यविष्ठ्य मधुजिह्वः स्वाहुतः. प्रस्कण्वस्य प्रतिरन्नायुर्जीवसे नमस्या दैव्यं जनम्.. (६) हे अतिशय युवक अग्नि! यजमान के लिए स्तुति करने वाले स्तोता के तुम्हीं स्तुति विषय हो. तुम्हारी जिह्वाएं सुख देने वाली हैं. भली प्रकार बुलाए जाने पर तुम हमारा अभिप्राय समझो एवं आयु बढ़ा कर प्रस्कण्व को दीर्घजीवी बनाओ. वह देवभक्त है, तुम उसका सम्मान करो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
होतारं विश्ववेदसं सं हि त्वा विश इन्धते. स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत्.. (७) तुझ होम निष्पादक एवं सर्वज्ञ अग्नि को प्रजाएं भली-भांति प्रज्वलित करती हैं. हे बहुतों द्वारा आहूत अग्नि! तुम उत्तम ज्ञान संपन्न देवों को इस यज्ञ में शीघ्र लाओ. (७) सवितारमुषसमश्विना भगमग्निं व्युष्टिषु क्षप:. कण्वासस्त्वा सुतसोमास इन्धते हव्यवाहं स्वध्वर.. (८) हे शोभन यज्ञ से युक्त अग्नि! निशा समाप्ति के पश्चात् प्रभात होने पर सविता, उषा, अश्विनीकुमार, भग आदि को यज्ञ में ले आओ. सोमरस निचोड़ने वाले मेधावी ऋत्विज् तुम्हें प्रचंड करते हैं. (८) पतिर्ह्यध्वराणामग्ने दूतो विशामसि. उषर्बुध आ वह सोमपीतये देवाँ अद्य स्वर्दृश:.. (९) हे अग्नि! तुम प्रजाओं के यज्ञपालक एवं देवताओं के दूत हो. प्रातःकाल जागकर सूर्य के दर्शन करने वाले देवों को सोमरस पीने के लिए यहां लाओ. (९) अग्ने पूर्वा अनूषसो विभावसो दीदेथ विश्वदर्शत:. असि ग्रामेष्वविता पुरोहितो ऽसि यज्ञेषु मानुष:.. (१०) हे विशिष्ट प्रकाशवान् एवं धन के स्वामी अग्नि! तुम सबके दर्शनीय हो. तुम अतीतकाल में उषा के पश्चात् प्रकाशित होते रहे हो. तुम गायों के रक्षक, यज्ञ की वेदी के पूर्व दिशा वाले भाग में अब भी स्थित एवं यज्ञकर्त्ताओं के हितसाधक हो. (१०) नि त्वा यज्ञस्य साधनमग्ने होतारमृत्विजम्. मनुष्वद्देव धीमहि प्रचेतसं जीरं दूतममर्त्यम्.. (११) हे अग्नि! तुम यज्ञ के साधन, देवताओं का आह्वान करने वाले, ऋत्विज्, उत्तम ज्ञानसंपन्न, शत्रुओं की आयु नष्ट करने वाले, देवदूत तथा मरणरहित हो. हम मनु के समान तुम्हें यज्ञ में स्थापित करते हैं. (११) यद्देवानां मित्रमहः पुरोहितोऽन्तरो यासि दूत्यम्. सिन्धोरिव प्रस्वनितास ऊर्मयोऽग्नेर्भ्राजन्ते अर्चयः.. (१२) हे मित्रपूजक अग्नि! जब तुम यज्ञवेदी के पूर्व भाग में स्थापित होकर देवयज्ञ में वर्तमान रहते हुए उनका दूतकर्म करते हो, तब तुम्हारी लपटें उसी प्रकार चमकती हैं, जिस प्रकार गरजते हुए सागर की लहरें चमकती हैं. (१२)
श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः. आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम्.. (१३) हे सुनने में समर्थ कानों वाले अग्नि! हमारी स्तुति सुनो. मित्र, अर्यमा तथा जो अन्य देवता प्रातःकाल देवयज्ञ में जाते हैं, अपने साथ आने वाले अन्य हव्यवाही देवों सहित तुम यज्ञ के निमित्त बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१३) शृण्वन्तु स्तोमं मरुतः सुदानवोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः. पिबतु सोमं वरुणो धृतव्रतोऽश्विभ्यामुषसा सजूः.. (१४) शोभन फलदाता, अग्नि रूपी जिह्वा वाले एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले मरुद्गण हमारा स्तोत्र सुनें. वे व्रत धारण करने वाले वरुण, अश्विनीकुमार एवं उषा के साथ सोमपान करें. (१४) सूक्त—४५ देवता—अग्नि त्वमग्ने वसूँरिह रुद्राँ आदित्याँ उत. यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम्.. (१) हे अग्नि! तुम इस अनुष्ठान में वसुओं, रुद्रों और आदित्यों का यजन करो. तुम शोभन यज्ञ करने वाले, प्रजापति मनु द्वारा उत्पादित एवं जल सींचने वालों की भी अर्चना करो. (१) श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः. तान् रोहिदश्व गिर्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह.. (२) हे अग्नि! विशेष बुद्धि वाले देवता हव्य देने वाले यजमान को फल देते हैं. हे रोहित अश्व के स्वामी एवं स्तुतिपात्र अग्नि! तुम तैंतीस देवों को यहां ले आओ. (२) प्रियमेधवदत्रिवज्जातवेदो विरूपवत्. अङ्गिरस्वन्महिव्रत प्रस्कण्वस्य श्रुधी हवम्.. (३) हे अनेक कर्म करने वाले एवं सर्वज्ञ अग्नि! प्रियमेधा, अत्रि, विरूप और अंगिरा नामक ऋषियों के समान प्रस्कण्व की पुकार भी सुनो. (३) महिकेरव ऊतये प्रियमेधा अहूषत. राजन्तमध्वराणामग्निं शुक्रेण शोचिषा.. (४) प्रौढ़कर्मा एवं प्रिय यज्ञों से सुशोभित ऋषियों ने अपनी रक्षा के लिए यज्ञ के मध्य शुद्ध प्रकाश द्वारा चमकने वाले अग्नि का आह्वान किया था. (४) घृताहवन सन्त्येमा उ षु श्रुधी गिरः. ebook converter DEMO Watermarks*
याभिः कण्वस्य सूनवो हवन्तेऽवसे त्वा.. (५) हे घृत द्वारा बुलाए गए एवं फलप्रद अग्नि! कण्व के पुत्र तुम्हें जिन वचनों से अपनी रक्षा के लिए बुलाते थे, हमारे द्वारा प्रयुज्यमान उन्हीं वचनों को सुनो. (५) त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः. शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोळ्हवे.. (६) हे विविध हविरूप अन्नयुक्त एवं यजमानों के प्रियकारक अग्नि! तुम्हारी चमकीली लपटें तुम्हारे केश हैं. यजमान तुम्हें हव्य-वहन करने के लिए बुलाते हैं. (६) नि त्वा होतारमृत्विजं दधिरे वसुवित्तमम्. श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं विप्रा अग्ने दिविष्टिषु.. (७) हे अग्नि देव! बुद्धिमान् लोग आह्वान करने वाले, ऋतुओं में यज्ञ संपन्न करने वाले, विविध धन प्राप्त कराने वाले, श्रवण समर्थ कानों से युक्त एवं अत्यंत प्रसिद्ध तुमको यज्ञों में धारण करते हैं. (७) आ त्वा विप्रा अचुच्यवुः सुतसोमा अभि प्रयः. बृहद्भा बिभ्रतो हविरग्ने मर्ताय दाशुषे.. (८) हे अग्नि! सोमरस निचोड़ने वाले बुद्धिमान् ऋत्विज् हव्यदाता यजमान के लिए तुम्हें अन्न के समीप बुलाते हैं. तुम महान् एवं तेजस्वी हो. (८) प्रातर्याव्णः सहस्कृत सोमपेयाय सन्त्य. इहाद्य दैव्यं जनं बर्हिरा सादया वसो.. (९) हे काष्ठबल द्वारा मथित, फलदाता एवं निवास हेतु अग्नि! इस देवयज्ञ में आज प्रातःकाल आने वाले देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों को सोमपान के लिए कुशों पर बुलाओ. (९) अर्वाञ्चं दैव्यं जनमग्ने यक्ष्व सहूतिभिः. अयं सोमः सुदानवस्तं पात तिरो अह्न्यम्.. (१०) हे अग्नि! अपने सामने उपस्थित देवों एवं उनसे संबंधित अन्य जनों के समान आह्वानाें के द्वारा यजन करो. हे शोभन दान करने वाले देवो! जो सोमरस तुम्हारे निमित्त पिछले दिन निचोड़ा गया है, सामने उपस्थित उस सोमरस का पान करो. (१०) सूक्त—४६ देवता—अश्विनीकुमार eBook converter DEMO Watermarks*